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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

८--स्त्री द्वारा या मृत्युलेख से लाभ, किसी ८--अविचारी काम में प्रवृत्त ओर उससे का ट्रस्टी होकर लाभ, स्त्रीनिधन प्राप्त । लाभ विषैले जीवों से भय विशेष पीड़ा । भाग्य अनुकूल, अनेक प्रकार के सुख ९--भाग्योदय में अड्चन, महत्वाकांक्षा में धर्माचरण में प्रेम, बड़ों की कृपा । कठिनाई, परदेश में भाग्योदय १ १०-सत्कर्मा, सत्याग्रही, उद्योग व्यापार में १०-पितृक्लेश, अहितकारी कार्य में प्रवेश मान, कुलकोति का विस्तार, समाज में कीति। उच्च स्थित से नीची स्थिति, समाज

विरोधी कार्ये । ११-साम्पत्तिक भोग, प्रबल उद्योग व्यापार ११-अकतंव्यों से भी लाभ उठाने वाले या नोकरी में सफलता, साहसी,

मित्रों में सफलता ।

१२-सत्कार में व्यय, परमार्थ की ओर ध्यान, शत्रु वृद्धि, अधिकार में

विघ्नं । संक्षिप्त गोचर फल का चक्र स्थान सूयं चंद्र १--यात्रा, रोग भाग्योदय, सुख, थकावट लाभ, श्रेष्ठ

अन्न प्राप्त २--भय दुःख धोखा घन हानि थोड़, धन हानि लाभ संतोष

सुख ३--धन प्राप्ति सफलता, धन

स्थान प्राप्ति लाभ सुख, सुख यात्रा ४---रोग, विध्न, कुक्षि में रोग,

व्यशन, खचं, कलह,

चिता भय

५-दीनता, क्षोभ, शोक, विध्न, बुरा स्वास्थ्य, वृद्धि मान यश

संतान कष्ट, खर्च

दन शत्रु नाश, सुख लाभ, शत्रु नाश, दुःख और रोग दूर, उत्तम चिता दूर सम्पत्ति छ-यात्रा, स्त्रीपीड़ा, घन लाभ,सुख, पेट व गुदा में रोग, राज-मान्यता

अधिकारियों की कृपा, वड़े भाई को

अनिष्ट, बंधु कलह ।

१२-द्रव्य सम्वन्धी हानि, अपमान, दुष्कीति, ऋणग्रस्त स्थिति,अधिकारी

प्रतिकूल,राजदण्ड |

मंगल बुध

रोग भय, कष्ट बन्धनकष्ट

वियोग धनहानि

चोर भय धन- धन लाभ,

हानि, नेत्र- सुख

पीड़ा, चिता

घन लाभ,कायं शत्रु भय सफल सुख पराक्रम

शत्रु वृद्धि, स्थान- धन वृद्धि

हानि, उदर रोग, सुख लाभ

भय, मातृ कष्ट

ज्ञान धन हानि, पीड़ा, कलह चिता, झगड़ा, बुद्धि वृद्धि ज्वर, भय

घन लाभ, सफलता शोक, शत्रु व शत्रुनाश सुख रोग शत्रु रोगसे पीड़ा भय व झगड़ा अन्त

धननाश, रोग, कष्ट पीड़ा, भय, हानि, मनो-मालिन्य विरोध,छाभ

गोचर विचार : १६३

च-अति पीड़ा, त्रास रोगअनहोनी शस्त्र से चोट धन लाभ, रोग

रोगभय झगड़ा घटना, कलह,पीड़ा कुसंग संतान आदि, हानि,

अपमान भय नष्ट कष्ट भय

९-कांतिक्षय, भग राअभय, रोग, रोगअपमान, खेद, विध्न,

अपमान निराशा, धर्म लाभ, धन हानि, यात्रा, मित्र

चिता कुबुद्धि द्रव्य लाभ यात्रा प्रेम

१०- अभीष्ट सिद्धि, लाभ, आनंद लाभ, वृद्धि लाभ, सुख पुष्टि,

सुख यश, रोग दूर घनागम

११-लाभ सुख मान लाभ, आंनंद लाभ, वृद्धि, लाभ, पुष्टि, धना-

नया पद यश, रोग दूर गम, सुख

१२--खचं, दुःख शोक, खर्च, हानि, धन हानि, अधिक धन नाश,

कलह, पीड़ा कष्ट खर्च, रोग शेय पराभव

धन हानि का भय

गुरु शुक्र शनि राहु केतु

१-भय, कष्ट खर्च स्त्रीसुख, शत्रु स्थान हानि, भय, कष्ट, हानि, रोग

देशत्याग नाश, हषं रोगपीड़ा भोग रोग चिता

२-धन प्राप्ति प्राप्त धन लाभ, धन हानि धन हानि, विरोध

सुख सुख क्लेश खर्चे, चिता हानि

३-रोग पीड़ा, बाधा अति सुख शुभ, सुख, पद सुख धन लाभ

स्थान हानि तरक्की प्राप्ति घन लाभ जय

चिता पराक्रम लाभ

४-शत्रु वृद्धि, शोक, धनलाभ,सुख, शत्रु वृद्धि पीड़ा, शोक बैर भय

कष्ट, धन हानि मित्र वृद्धि बंधन, विरोध क्ष्ट

अपमान हाति कष्ट

५-सुख, हर्ष, मित्रता संतानप्राप्ति पुत्रक्लेश धनशोक धन हानि कष्ट

लाभ, संतान घनागम क्षय, त्रा भय कपट कुबुद्धि हानि

प्राप्ति कष्ट चिता

इ-शत्रवुद्धि सुख वृद्धि, लाभ, घन प्राप्ति) लाभ

विपत्ति शत्रु नाश सुख जय

७-राजमान्य, शुभ शोक, भय, दोष यात्रा भय, हानि, विवाद, थोड़ा

यात्रा, सुखी, स्त्री को कलह, स्त्री को अपमान शोक

्त्रीकष्ठुलाभ पीड़ा पीड़ा शोक

द-दुःख, धन धन लाभ, रोग, पीड़ा और हानि, पीड़ा जीवन का संकट

भय कलह, हानि रोग शत्रु भय भय, रोग- भय

भय यात्रा से थकावट कष्ट

१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

९-सुख, लाभ वस्त्र लाभ, घन सुख, बाधा, शोक, पापकर्म अपमान प्रतिष्ठा लाभ, सुख कुसंग, धन कुबुद्धि कपठ हानि कृष्ट

१०-मानवृद्धि नय धन लाभ,अभय, धन सुख मान सुख धन लाभ लाभ पद लाभ, हषं अधिकार प्राप्त प्राप्त लाभ, यश भय

११-मान वृद्धि, नया घन लाभ, अभय धन सुख मान सख धन लाभ यश पद लाभ, हर्ष अधिकार प्राप्ति यश मान प्राप्ति धन लाभ

१२-पीडा दुःख, धन प्राप्त अनेक अनर्थे द्रव्य हानि विरोध

भय हानि आपत्ति भय खर्च, पीड़ात्रास हानि

गोचर फल शुभाशुभ समय

१-शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में यदि चंद्र शुभ हो तो सारा शुक्ल पक्ष शुभ होता है;

छ 0] अनिष्ट हो तो वह पक्ष अनिष्ट का होगा ।

र-कृष्णपक्षकी , टि अनिष्ट हो तो वह पूराकृष्णपक्षअनिष्ट होगा। .

क शुभहोतो ,, क शुभ होगा ।

गोचर में कौन ग्रह कब फल देते हैं

१--सूर्ये और मंगल जबकि राशि में प्रवेश करते हैं तो आदि में प्रवेश करते ही

फल देते हैं अर्थात्‌ किसी रोशि के १०० पर आदि में फल देते हैं ।

२--गुरु शुक्र राशि के मध्य में जाने के बाद फल देते हैं मध्य के तीसरे भाग में

१०१ के आगे २०१ तक मध्य भाग में ।

३--चंद्र शनि---राशि के अन्त में जाने पर अन्तिम तीसरे भाग में फल देते हैं

अर्थात्‌ २० से ३०° तक अन्तिम भाग में ।

४--बुध और राहु-अपने सम्पूर्ण भाग में अर्थात्‌ सवेदा फल देते हैं ।

१--सूये-जव एक राशि से दूसरी राशि में जाता है उस समय से ५ दिन पूर्व ही

से आगामी राशि के फल की सूचना देता है

२--चंद्र-३ घड़ी पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है ।

३--मंगलू-८ दिन पहिले ही आगामी राशि के फल की सूचना देता है ।

४-_वुध=७ दिन पहिले ही आगामी राशि गत फले की सूचना देता है ।

५--गुरु-२ मास पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता

६--शुक्र=७ दिन पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है ।

७--शनि= ६ मास पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है।

८--राहु5३ मास पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है। अन्यमत से समय

र्‍सूर्य-१ राशि पर १ मास रहता है=प्रथम के ५ दिन फल देता है ।

२--चंद्र १ राशि पर २। दिन्न रहता है अन्त की ३ घड़ी फल देता है ।

३--मंगल १ राशि पर १॥ मास रहता है प्रथम ८ दिन फल देता है ।

गोचर विचार : १६५

४--बुध १ राशि पर १ मास रहता है सवंकाल फल देता है ।

५--गुरु १ राशि पर १३ मास रहता है मध्य के २ मास फल देता है ।

६--शुक्र १ राशि पर १ मास रहता है मध्य के ७ दिन फल देता है ।

७--शनि १ राशि पर २० मास रहता है अन्त के ६ मास फल देता है ।

८---राहु केतु १ राशि पर १८ मास रहता है अन्त के २ मास फल देता है ।

गोचर में नक्षत्र के विचार से ग्रहों के अंग और फल

जन्म नक्षत्र से गिनने पर २७ नक्षत्र जांतक के अंग विभाग में ग्रहों के अनुप्तार

वटे हैं वे नीचे बताये गरे हैं । जन्म नक्षत्र को १ गिन कर आगे वताये क्रमानुसार अंग

की गणना करना । वर्तमान नक्षत्र जिस अंग में पड़े फल विचारना ।

सूर्य का गोचर में अंग विभाग और फल

जन्म नक्षत्र से नक्षत्रों का क्रम अंग विभाग फल

१--पहिला नक्षत्र मुख हानि

२--२, ३, ४ और ४ वां नक्षत्र सिर धन वृद्धि

३--६, ७, ८ और १९ वाँ नक्षत्र छाती सफलता'

४---१०, ११, १२ और १३ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ सम्पत्ति लाभ

५--१४,१५,१६,१७,१८,१९ वाँ नक्षत्र दोनों पैर धन हानि

६--२०, २१, २२, २३ वाँ नक्षत्र बायाँ हाथ शारीरिक बीमारी

७--२४, २५ वां नक्षत्र दोनों आँख लाभ

८--२६ और २७ वाँ नक्षत्र जननेन्द्रिय जीवन को भय

चन्द्र का अंग विभाग के अनुसार गोचर फल

जन्म नक्षत्र से वर्तमान नक्षत्र तक अंग विभाग फल

१--पहिला और दूसरा नक्षत्र चेहरा अतिशय भय

२--३, ४, ५, ६ वाँ नक्षत्र सिर रक्षा

३-७, ८ वाँ नक्षत्र पीठ शत्रु दमन

४-९, १० वां नक्षत्र दोनों आँख सम्पत्ति लाभ

५-११, १२, १३, १४, १५ वाँ नक्षत्र छाती मानसिक सुख

६-१६, १७, १८ वाँ नक्षत्र वाँया हाथ कलह

७-१९,२०,२१,२२,२३,२४ वाँ नक्षत्र दोनों पैर विदेश यात्रा

८-२५, २६, २७ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ सम्पत्ति लाभ

मंगल का अंगविभाग के अनुसार गोचर फल

जन्म नक्षत्र से बर्तमान नक्षत्र तक संख्या अंग विभाग फल

१--पहिला दूसरा नक्षत्र मुख जीवन को भय

२--३, ४, ५, ६, ७, ८ वाँ नक्षत्र दोनों पैर कलह

३--९, १०, ११ वाँ नक्षत्र छाती सफलता

४--१२, १३, १४, १५ वाँ नक्षत्र बायां हाथ गरीबी

१६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

५-- १६, १७ वाँ नक्षत्र सिर

६-१५५ १९, २०, २१ वाँ नक्षत्र चेहरा

७--२२, २३, २४, २५ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ ८---२६, २७ वाँ नक्षत्र दोनों आँखें बुध गुरु शुक्र के अंग विभाग के अनुसार गोचर फल

जन्म नक्षत्र से वर्तमान नक्षत्र तक संख्या अंग विभाग

१--१, २, ३ रा नक्षत्र सिर

२-४, ५, ६ वाँ नक्षत्र मुख ३--७, ८, ९, १०, ११, १२ वाँ नक्षत्र दोनों हाथ ४-१३, १४, १५, १६, १७ वाँ नक्षत्र पेट ५-१८, १९ वाँ नक्षत्र जननेन्द्रिय

६-२०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७ वाँ, दोनों पेर शनि राहु और केतु का अंग विभाग फल

जन्म नक्ष से वर्तमान नक्षत्र तक संख्या अंग विभाग १--प हिला नक्षत्र मुख २--२, ३, ४, ५ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ ३--६, ७, ८ वाँ नक्षत्र दाहिना पेर ४--९, १०, ११ वाँ नक्षत्र बाँयाँ पैर

५-०१२, १३, १४, १५ वाँ नक्षत्र बाँयाँ हाथ ६--१६, १७, १८, १९, २० वाँ नक्षत्र पेट (कुक्षि) ७--२१, २२, २३ वाँ नक्षत्र सिर ८-२४, २५ वां नक्षत्र दोनों नेत्र ९--२६, २७ वाँ नक्षत्र पीठ गोचर से तक्षत्र विचार

लाभ

अतिभय

सुख

विदेश यात्रा

फल

दुःख या शोक लाभ

कुछ अनहोनी हो द्रव्य का आना

हानि कीति मान

स्त्री भोग

सुख

सुख

जीवन का भय

गोचर विचार : १६७

गोचर से नक्षत्र. वेध फल

इस प्रकार ७ रेखाओं का चक्र बनाकर २८ नक्षत्र यहाँ बताये अनुसार लिखे जहाँ

तीर का निशान दिया है वहाँ से अन्य नक्षत्र की संख्या और नाम लिखना यहाँ बताये

क्रम से आरम्भ करे और अभिजित सहित पूरे २८ नक्षत्र लिख ले 1

१--जतंमान सूर्य नक्षत्र जहाँ हो वहाँ लिख ले यदि जन्म नक्षत्र से सूर्य नक्षत्र का

वेध हो तो जीवन को भय शंका होती है ।

२--जन्म नक्षत्र से १९ वें नक्षत्र से वेध हो तो भय ओर चिन्ता हो ।

३--जन्म नक्षत्र से १० वें नक्षत्र से वेध हो तो धन हानि हो चिन्ता हो ।

` इन स्थानों में सूर्य पाप प्रह युक्त हो तो मृत्यु का अनुभव करना ।

४--यदि उपरोक्त ३ प्रकार के नक्षत्र में से कोई दूसरे पाप ग्रहों के होने से सूयं

की छोड़कर, वेध हो तो मृत्यु हो ।

५--यदि शुभ ग्रह से वेध हो तो जीवन को कोई भय न होगा । इसी प्रकार सब

ग्रहों का.विचार करना ।

६--यदि जन्म नक्षत्र से गिनने पर १, ३, ५, ७, १०, १९, २२ वाँ वेध वर्तमान

पाप ग्रह के नक्षत्र से हो तो जोवन को भय यदि शुभ ग्रह हो तो व्यापार में केवल

हानि हो । र

७--जब सूर्यं संक्रमण जिस दिन हो ( जव सूर्य नई राशि में प्रवेश कर ) या

और कोई ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में जावे ।

या जव ग्रहण हो या ग्रह युद्ध हो या उल्कापात (अकाशसे तारे गिरना) हो तो इन

दिनों में १-१० और १९ वाँ नक्षत्र पड़े तो मृत्यु या इसी प्रकार की अनहोनी घटना हो ।

उल्का--कांल प्रकाशिका मत में सूर्य नक्षत्र से १० वाँ तारा (नक्षत्र) परन्तु बल￾भद्र मत से सूर्य नक्षत्र से २१ वाँ तारा ।

अन्धतारा--अन्ध तारा--पहिला । अनुजन्म या कपंक्ष-जन्म से १० वाँ तारा

आधान या त्रिदन्म तारा-जन्म से १९ बाँ तारा है ऐसा भी कहा है ।

गोचर में शनि का विशेष विचार १--शनि की साढ़े सातो

जन्म राशि से १२ वें स्थान, जन्म राशि पर एवं द्वितीय स्थान पर जब शनि '

रहता है तो उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हँ । शनि एक राशि पर २॥ वर्ष रहता है

इस प्रकार ३ राशि में ७॥ वर्ष हा जाते हैं । इसमें बहुत कष्ट होता है ।

जन्म राशि से जब १२ वें घर में शांन जाता है उस समय से पूरा प्रभाव डालने

लगता है यदि शनि वक्री हो तो ७॥ वर्ष से भी अधिक समय लग जाता है । पंचांग से

पता लग जाता है कि विशेष जन्म राशि वाले को कौन समय से साढ़े साती आरंभ होगी।

साढ़े साती में नाना प्रकार के क्लेश, दुष्टों से भय, कार्य में हानि, विदेश भ्रमण,

संतान पीड़ा, सम्पत्ति नाश, पशुओं से पीड़ा और मृत्यु तक कर देता है, मनमें अशांति,

रोग, स्मरण शक्ति का हास आदि होता है ।

१६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जब १२ वाँ शनि हो तो-शनि की दृष्टि । जन्म राशि में-शनि का भोग । और द्वितीय स्थान में-शनि की लात कही जाती है। जिसका दीर्घ जीवन है उसके जीवन में ३ बार साढे साती आती है । पहिले फेरे में इनमें सब या कुछ बुरा फल देता है परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है और नाना प्रकार से व्यथित कर देता है । दूसरे फेरे में साढे साती का वेग वहुत धीमा हो जाता है कभी-कभी दुःख तो अवश्य होता है परन्तु यथार्थ में उतना हानिकर नहीं होता । दूसरे फरे में किसी को कुछ अच्छा भी फल देता है जिससे उन्नति होती है। परन्तु तीसरा फेरा अर्थात्‌ अन्तिम साढ़े साती प्रायः मृत्यु को ही बुला छाती है कोई भाग्य￾वान्‌ हो इस साढे साती को पाता है ।

साढ़े साती सदा अनिष्ट जाती है ऐसा नहीं है । जव शनि और चंद्र इनकी युति योग, केन्द्र योग या प्रति योग हो तो उस समय साहे साती में विशेष त्रास होता है । साढ़े साती का शुभाशुभ विचार

प्रत्येक राशि के साढ़े साती समय में कौन समय शुभ या अशुभ है यही वताया जाता है--

१-मेष राशि-मीन का पहिला २॥ वपं अति अशुभ मान, धन, मनुष्य की हानि हो । वृष का अंतिम २॥ वर्ष शुभ है ।

२-वृष-मेष का २॥ वर्ष अशुभ । वृष का २॥ वषं शुभ । मिथुन का शुभ धन आदि प्राप्त के लिये अनुकूछ है ।

३-मिथुन राशि-वृष का २॥ वर्ष शुभ, ककं का २॥ वपं शुभाशुभ, सिंह का २॥ वर्ष अशुभ ।

४-कर्क राशि-मिथुन का २॥ वर्ष शुभ, ककं का २॥ वषं शुभाशुभ, सिंह का २॥ वर्षे अशुभ ।

५-सिंह राशि-क्रकं २॥ वर्ष अशुभ, । सिंह २॥ वर्ण अशुभ। कन्या २॥ वपं शुभ।

६-फन्या राशि-सिंह का २॥ वर्ष अशुभ, कन्या का शुभ, तुला का अति शुम ।

इस समय अचानक धन स्थावर मशीन लाभ व श्रेष्ठ दर्जे का शुभ फल मिले ।

७-तुला राशि-कृच्या का शुभ, तुला का अति श्रेष्ठ, वृश्चिक का अति अशुभ ।

८-वृश्चिक राशि-तुला का श्रेष्ठ, वृश्चिक का कनिष्ठ, धन का मध्यम ।

९-धन राशि-तृश्चिक् का अशुभ, धन का शुभ, मकर का मध्यम ।

१०-मकर राशि-धन का शुभ, मकर का मध्यम, कुंभ का उत्तम ।

११--कुंभ राशि-मकर का साधारण. कुंभ का शुभ, मोन काशुभ।

१२--मीन राशि-कुंभ का शुभ, मीन का शुभ, मेष का अशुभ फल ।

विशेष विचार-साढ़े साती का फल विचार करते समय शुभाशुभ भाव शुभाशुभ

ग्रहों की दृष्टि एवं योग पर भी ध्यान देना ।

अन्य मत से साढ़े साती का अनिष्ट समय

मेष राशि को दुसरा २॥ वषं वृष राशिको प्रारम्भ के २॥ वर्ष

गोचर विचार : १६९

वृश्चिक राशि अंत के ५ वर्ष मिथुन राशि “अंत के २। वषं घनराशि >्पहिले ५ वर्ष ककं राशि =दूसरा २॥ वर्ष मकर राशि ज्यहिले २॥ वषं सिंह राशि पहिले ५ वर्ष कुंभ राशि =भंत के २॥ वषं

कन्या राशि =्पहिले २॥ वषं मीन राशि =अंत के २॥वपं

तुला राशि =अन्त के २॥ वषं

शनि की साढ़े साती में तीनों स्थान का फल

१--व्यय में शनि-व्यय की मात्रा अधिक, अकस्मात्‌ धन हानि, एक स्थान में

शांति पूर्वक वास कठिन हो । स्वास्थ्य भी बिगड़े ।

२-णलग्न में शनि-शरीर की शांति एवं स्वास्थ्य में हानि, चित्त में अशांति, धन

का व्यय धन हानि, कार्य में विघ्त, कार्य असफल होने से धन का खच ।

३--धन में शनि-बन्धु वर्गों से अनायास निरथेक झगड़ा, कुटूम्वियों को रोग या

किसी की मृत्यु के कारण अधिक खर्च ।

जन्म कुण्डली से साढ़े साती का विचार

१--अन्म कुंडली में शनि ६-८-१२ भाव में होकर अशुभ ग्रह से युक्त या ६

दुष्ट हो तो अशुभ फल ।

२--जन्म चन्द्र यदि २ या १२ भाव में होकर मंगळ, सूर्य, राहु से युक्त हो तो

अशुभ फल ।

३--जन्म चन्द्र निवंछ हो शुभ ग्रहों से दृष्ट नहीं हो तो साढ़े साती का अशुभ

फळ होता है।

४- जन्म चन्द्र यदि वृश्चिक या शत्रुराशि में होकर राहु केतु मंगल से युक्त'व

दृष्ट हो तो अशुभ है ।

५--जन्म चन्द्र के २ और १२ भाव में शुभ ग्रह हो या इनपर शुभ दृष्टि हो तो

शुभ फल होता है ।

६--जन्म चंद्रके २-१२ स्थानमें कोई ग्रह न हो तो भी साधारण शुभ फल मिलेगा।

७--जन्म चंद्र यदि गुरु शुक्र बुध से युक्त हो नो साढे साती का शुम फल होगा ।

८--जन्म चन्द्र शनि से युक्त हो पर मंगल से दृष्ट न हो तो साढ़े साती का

शुभ फल होगा।

९--जन्म चन्द्रमा तथा शनि २, ६, ८, १२, स्थान में हो व नीच के या पाप

राशि के सोथ हो या अस्तंगत तथा पापदृश्य या पाप युक्त होकर ८-१२ स्थान में पड़े

हों तो शनि की साढ़े साती अशुभ फल करेगी ।

१०--यदि जन्म में सबल चंद्र युक्त शनि (लग्न या चंद्रमा से केन्द्र या त्रिकोण में)

हो या राज्येश, लाभेश, पंचमेश से सम्बन्धित हो और शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो

तो सब प्रकार से सुख कारक होता है।

१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जन्म चंद्र से शनि=१-६-११ स्थान में-स्वर्ण पाद=्सव प्रकार का सुख हो

» =रजत पाद=्अच्छा भाग्य, काम सफल

» उत्ताम्‌ पाद-समफल, मध्यफल अच्छा न बुरा

„» सलोह पादस्धन नाश, दुःख दरिद्र दायक ।

शनि कीं साढ़ेसाती में शनि कब किस अंग पर है विचारना

फल नरपति-जयचर्योक्त शनि नराकार चक्र

हानि जन्म नक्षत्र से शनि के वर्तेमान नक्षत्र तक

हानि गिनना जिस अंग पर शनि आवे उसका

फल नीचे दिया है ।

“लाभ नक्षत्र क्रम अंग फल

लांभ १ मुख हानि

लाभ ४ दक्षिण भुज जय

लाभ ६ चरण भ्रम

भय शू हृदय श्री प्राप्ति मृत्यु ४ वाम भुज भय

जय ३ शीर्ष राज्य

सोख्य २ नेत्र सौख्य

पर्यटन २ गुह्य मृत्यु भय

योग २७

जन्म नक्षत्र से शनि जिस नक्षत्र पर हो उस नक्षत्र तक गिन के फल का विचार करना

शनि का चरण विचार

१ » रै-१०९

[7] कर =३-७-१०

71 ४. =४-८-१२

भाव मास अंग

व्ययस्थान ७ मस्तक

व्ययस्थान ९ नेत्र

व्ययस्थान ८ मुख

व्यथस्थान ६ कंठ

जन्मस्थान १० हृदय

जन्मस्थान ११ उदर

जन्मस्थान ५ नाभि

जन्मस्थान ४ गुह्यांग

धनस्थान १३ घुटना

घनस्थान १२ जंघा

धनस्थान ५ पाद

नारदोक्त शनि चक्र

नक्षत्र क्रम अवयव

१ ललाट

३ दुख

२ गुह्य

२ नेत्र

शर हृदय

४ वाम हस्त

३ वाम पाद

३ दक्षिण पाद

¥ दक्षिण हस्त

२७ नक्षत्र

फल उदाहरण

रोग जन्म नक्षत्र चित्रा हो और गोचर में

लाभ शनि आश्लेषा पर हो तो चित्रा से

हानि आश्लेषा तक गिनने से २३ संख्या

लाभ आई तो दक्षिण पाद के ३ नक्षत्रों

सौख्य में शनि आया जिसका फल इष्ट

बंधन यात्रा है 1

दुःख

इष्ट यात्रा

अर्थ लाभ

गोचर विचार : १७१

शनि वाहन विचार

शनि. के साढे साती प्रवेश समय के वाहन विचार से भी साढे साती के फल काः विचार होता है ।

रीति--जिस दिन शनि बदले उस दिन को ( तिथि--वार--नक्षत्र-स्वनाम के अक्षर )- ९=तिथिवार नक्षत्र संख्या और नाम के अक्षर की संख्या जोड़कर ९ का भाग दे दें जो शेष बचे तो वाहन जानना ।

शेष वाहन फल अन्य मत से १ खर (गदहा) हानि हो शेष ४ महिष के स्थान में २ अश्व (घोड़ा) जय स्यार तथा मेष वाहन कहते है ३ गज (हाथी) सोख्य जिसका फल अति लाभजनक ४ महिष (भँसा) मध्यम बताया गया है। ५ सिह र शत्रुनाश

६ जम्बुक (स्यार): शोक सन्ताप ७ वायस “काक) कलह

८ मयूर (मोर) लाभ

९ हंस सुख

अन्य मत से वाहन विचार-- जन्म नक्षत्र से गोचर में जिस दिन बदले उस दिन के नक्षत्र तक संख्या गिन कर ९ का भाग देना शेष पर से उपरोक्त वाहन के अनुसार ही फल जानना । न

वाहन पर विशेष विचार

१--साढे साती जो अशुभ फल देने वाली हो उस समय वाहन भी अशुभ फल दे दे तो साढ़े साती का विशेष अशुभ फल होगा ।

२--यदि अशुभ फल दायक साढ़े साती हो प्रवेश समय वाहन शुभ फलद हो तो विशेष अनिष्ट फल नहीं होगा मध्यम फल होगा ।

३-- शुभ फल दायक साढ़े साती हो और शुभदायक वाहन हो तो विशेष शुभ ।

४--शुभ फल दायक साढे साती में प्रवेश समय अशुभ फल दायक वाहन हो तो

मध्यम फल होगा ।

गोचर में जब शनि अपनी राशि से ४, ७ और १० स्थान में जाता है तो-मानसिक

दुख की वृद्धि करता है, जीवन को अव्यवस्थित करता है जिससे नाना प्रकार के दुःखों

का सामना करना पड़ता है ।

शनि चतुर्थ में-स्वास्थ्य बिगड़ता है, निवास में अवश्य ही परिवर्तन करता हैं ।

शनि सप्तम में-परदेश वास हो यदि सप्तम में चर राशि हो तो अवश्य फल हो।

शनि दशम में-नौकरी व्यवसाय आदि में गडबडी, कार्य में सफलता ।

(३) अळ्या शन्तिजन्म राशि से ४, ८ राशि में स्थित शनि अढेया शनि

१७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

कहलाता है यह २॥ वर्ष शुभामुम. फळ करता है । शनि किसी को प्रारम्भ में, किसी

को मध्य में, किसी को अन्त में अनिष्ट करता है ।

गोचर में शनि का वार्षिक ( एक वर्ष का ) फल

शनि गुरु और राहु तीनों शीघ्रगामी नहीं है इन तीनों के फल का गोचर से

बहुत प्रभाव पड़ता है !

गोचर के अनुसार सूर्य मंगल और शुक्र से म्गस का फल कहा जाता है तव इन

बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:

१-जब राशि का गोचर फल बुरा होता है तब अन्य शुभ फलों की हानि हो जाती

है अर्थात्‌ जब गोचर का शनि अशुभ होता है तब उस वर्ष में प्रायः सभी ग्रह अशुभ

फल देते हैं ।

२-जिस वर्ष शनि अशुभ फलदायक होता है और गुरु का फल यदि शुभ हो तो

भी उस वर्ष में विशेष अशुभ ही होता है ।

-जिस वर्ष में शनि उत्तम फल दाता हो और गुरु का अशुभ फल हो तो उस

चर्ष य। उस समय में प्रायः शुभ ही फल होता है ।

४-जिस वर्ष या समय में शनि शुभ फलदाता हो परन्तु गुरु और राहु दोनों अशुभ

फल देवें तो उस वर्ष या समय में शुभ ही फल विशेष होता है ।

५-जिस वर्ष यो समय में शनि शुभ फल दायक हो ओर गुरु राहु भी शुभ फल

दायक हों तो सब प्रकार से शुभ होता है ।

६-यदि वर्ष का फल उत्तम हो फौर मास का फल खराब हो तो उस वर्ष में

उत्तम ही फल होगा ।

७-यदि वर्ष का फल खराव हो और मास का फल उत्तम हो तो उस मास में

उत्तम फल नहीं के बराबर होगा ।

८-यदि वर्ष का फल उत्तम हो और मास का भी फल उत्तम हो तो उस मांस में

समस्त शुभ फल होंगे ।

इसी प्रकार गोचर में वर्ष और मास का फल विचारना ।

लग्न या रवि को साढ़ेसाती

मनुष्य को शनि की साढ़ेसाती न होते हुए भी अनेक प्रकार के दुःख भोगने को

अवसर आ जाता है जिसका कारण लग्न रवि की साढ़ेसाती है ।

जिस प्रकार जन्म राशि के चन्द्र पर से व्यय स्थान जन्म स्थान और धन स्थान

में शनि के जाने से साढ़ेसाती होती है उसी प्रकार लग्न और सूर्य की राशि से भी

विचार होता है ।

१-लग्न को साढ़ेसाती-जन्म लग्न के व्यय स्थान में जव शनि आवे तो शि

की साढ़ेसाती सदृश यह भी साढ़ेसाती मानी जाती है लग्न स्थान और धन स्थान में

अब तक शनि रहेगा तब तक लग्न की साढेसाती रहेगी ।

गोचर विचार : १७३

२-सुयं की साढेसाती-जन्म के सूर्य के व्यय स्थान में शनि आने पर साढ़ेसाती का आरम्भ माना जाता है जो आगे सूर्य की राशि के स्थान व सूर्य के दुसरे स्थान पर शनि रहने तक साढ़ेसाती सूये की समझी जायगी । १-लग्न की साढ़ेसाती में लग्न के १२-१-२ स्थान में जिस प्रकार के शुभ या

अशुभ ग्रह हों तथा उन भावों पर जैसे ग्रहों का योग या दृष्टि हो उसी के अनुसार

हानि लाभ सुख आरोग्य यश अण्यश धन लाभ हानि आदि फल होता है ।

२-रवि की साढ़ेसाती में रवि के १२-१-२ भाव में जैसे ग्रह हाँ या जैसे ग्रहों का

योग या दृष्टि हो उसी के अनुसार उद्योग धंधा, अधिकार, मान सम्मान, सुख दुःख

आदि प्राप्त होता है ।

गोचर के अनुसार ग्रहों का वषे फल￾कोई भी जन्म राशि हो जब किसी को जन्म राशि में सूर्य प्रवेश करता है ( जिस

समय सूर्य की कोई संक्राति उस राशि में हो ) उस दिन से दिनों की गिनती कर

पंचोग देखकर तिथि मास आदि लिखकर पूरे वर्ष भर के समय का सब ग्रहों का वर्ष

फल लो ।

ग्रह दवा कब से कव तक राशि अंश फल

१ सूयं की जन्म राशि को संक्राति से २०० तक ०-२० =धन नाश, चिता

२ चन्द्र की उससे आगे ५०° तक १-२० मधन धर्म की प्राप्ति,

३ मंगल की उससे आगे २८ तक ०-२८ =रोग मृत्यु, शस्त्रादि भय

४ बुध की उससे आगे ५६ तक १-२६ =धन प्राप्ति

५ शनि की उससे आगे ३६ तक १-६ -भालस

६ गुरु की उससे आगे ५८ तक १-२७ =सम्पत्ति की प्राप्ति

७राहु की उससे आगे ४२ तक १-१२ =वंधन

द शुक्र की उससे आगे ७० तक २-१० =अभीष्ट फल की प्राप्ति,

योग ३६० अंश १२-०

इस प्रकार गणना से जातक की फिर जन्म राशि भा जाती है ।

उदाहरण--मान लो किसी की - कुंभ राशि है संवत्‌ २०१८ में कुंभ राशि में

सूर्य माघ कृष्ण ५ इष्ट २७-३० पर प्रवेश हुआ है । इससे १३-२-१९६२ तारीख से

सूर्य दशा की गणना आरम्भ हुई। सूर्य के अंशों की गिनती करने से ठीक समय

निकल आता है । उस समय पचांग से देखकर तारीख क्या पड़ती है यहाँ नोट कर दी

है । तारीख या दिन की गणना में कुछ दिन का अन्तर आ सकता है।

सूर्यं दशा चक्र ,

ग्रह दशा राशि अंश सूर्य की राशि अंश से राशि अंश तक तारीख

सूयं २-२० कुंभ ० अंश से कुंभ के २०° तक ४-२-१९६२ तक

चन्द्र १-२० कुम्भ के २० से मेष के १०° तक २३-४-१९६२

१७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल ०-२८ मेष १०° से वृष ८ तक २२-५-१९६२ चुघ १-२६ वृषदसे ककं ४ तक २०-७-१९६२

शनि १-६ ककं ४ से सिंह १० तक २७-८-१९६२ गुरु वृ-२८ सिंह १० से तुला ८ तक २५-१०-१९६२

राहु १-१२ तुला ८से वृश्चिक २० तक ६-१२-१९६२

शुक्र २-१० वृश्चिक २० से मकर ३०° तक १२-२-१९६३

अरिष्टकारी गोचर फल विचार

१--राहु-यदि जन्म में राहु धन या मीन राशि में हो तो जब गोचर में गुरु इस

राहु के बराबर राशि अंश में आता है तब अरिष्ट होता है । गुरु यदि उस राशि के

त्रिकोण में भी जाये तो भी अरिष्ट होना संभव है ।

२--राहू गुरु-यदि जन्म में राहु और गुरु साथ हों तो जव राहु को राशि से

गोचर का शनि त्रिकोण में आता है तब अरिष्ट होता है ।

३--षष्ठेश-षष्ठेश जिस राशि या नक्षत्र में हो उससे त्रिकोण में जब शनि आवे

सब मृत्यु का भय होता है। यदि उस समय कोई मारकेश या मृत्यु का योग न हो तो

जातक के किसी कुटुम्बी की मृत्यु होती है। गोचर में शनि कई बार सव राशियों

ओर नक्षत्रों में जाता है परन्तु मृत्यु तभी सम्भव होगी जब अन्य योगों से भी उसे

मृत्यु या अरिष्ट होना सम्भव हो ।

४--गुरु-लग्न था चन्द्र से तीसरे द्रेष्काण में गुरु हो तो उस द्रेष्काण के स्वामी

के त्रिकोण में जव गोचर में शनि जाये तब उस वर्ष में परदेश यात्रा, विवाद और

मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

५--अष्टमेश-अष्टमेश जिस द्वादशांश में हो उसके त्रिकोण में जब गोचर का

राहु आवे तब उस समय का अष्टमेश जिस राशि में बैठा हो उसके त्रिकोण में जब

सूये आता है तब उस मास में मृत्यु का भय संभव है । जैसे मान लो कुम्भ का मंगल

अष्टमेश है यह मिथुन के द्वादशांश में है । मिथुन से त्रिकोण तुळा और कुम्भ राशि हुई

जब गोचर में राहु तुला याकुंभ में जोयगा तो जातक को अरिष्ट होना संमव

होगा । यहाँ अष्टमेश कुम्भ का है जिसकी त्रिकोण राशि मिथुन और तुला है इससे जब

सूर्य मिथुन या तुला का होगा उसी मास विशेष अरिष्ट होने की संभावना है ।

६- त्रिक ( ६-८-१२ घर )--इन तीनों भावों के स्पष्ट को जोड़कर जो राशि

कला आदि प्राप्त हो उस राशि मंशादि में या उसके त्रिकोण में जब शनि आवे तक

अरिष्ट होना सम्भव है ।

७--अष्टमेश-अष्टमेश गत राशि के त्रिकोण में जिस समय गोचर का चन्द्र आता

है उस समय अरिष्ट सम्भव है ।

ग्रहों के अष्टक गग से गोचर फल

जन्म कुण्डली के ग्रहों का अष्टक वर्ग निकालो जिस ग्रह की अष्टक वर्ग चक्र में

-....,-...----------%--%त७त0े.२.-न---न----कक+७क>->त६लत६न-नलन कक 9-० 4

गोचर विचार : १७४५

'जिस राशि में शुभ रेखा अधिक हैं उस राशि में वह ग्रह शुभ फल देगा अष्टक वर्ग में = शुभ रेखाए हैं ।

यदि ६ रेखा हो तो ६ शुभ और २ शून्य अशुभ समझना, ७ रेखा हो तो १ कम

अर्थात्‌ डे हास होगा इँ फल शूभ होगा । ६ रेखा हो तो २ कम हुए अर्थात्‌ ६ शुभ

२ अशुभ होने से शेष=४ शुभ६-३ फल शुभ होगा । ५ रेखा होने से-३=हे= फल।

४ रेखा-४=० फल । ३ रेखा-५ मअशुभ=-हेै=-ई अशुभ फल होगा । २ रेखा-६

अशुभ---ई-ई अशुभ । १ रेखा-७ अशुभ=६=ई अशुभ फल । रेखा बिलकुल न हो

८ अशुभ रेखा हो तो पूर्ण अशुभ फल होगा । इसका प्रकार अष्टक वर्ग विषय के

चर्णन में यह सब समझा दिया गया है ।

२--यदि जन्मकालीन लग्न या चन्द्रसे गोचर का ग्रह उपचय (३-६-१०-११ घर)

में हो या मित्र ग्रह में हो या अपने उच्च या स्वक्षेत्र में हो और उस राशि में अष्टक￾वर्ग की ४ से अधिक शुभ रेखा हों तो शुभ फल की अधिक वृद्धि होती है ।

या यह अपचय (उपचय के अतिरिक्त स्थान) में अपने नीच या शत्रुगृही हो और

यदि उसमें अष्टकवर्ग की शुभ रेखा की अधिकता भी हो तो भी शुभ फल में न्यूनता

आ जोती है । यदि शुभ रेखा ४ से कम हो तो अनिष्ट फल प्रबल हो जाता है ।

३--गोचर का ग्रह यदि जन्म लग्न-या चन्द्र से उपचय में हो और शुभ रेखा भी

अधिक हो परन्तु निर्बल हो तो शुभ फल नहीं देगा अशुभता ही लायेगा ।

४--छोई भी ग्रह पूरे ३० अंश में भ्रमण करता है । उस ग्रह के अष्टकवर्ग चक्र

से पता लगेगा कि वह किसी विशेष राशि में क्रिस अंश में शुभ होगा कितने में अशुभ

होगा । अष्टकवर्श में ८ शुभ रेखा होती है। ३० अंश<- ८ रेखा>३९-४५' का एक

विभाग पड़ा (२) ७-३०” तक (३) ११-१५ तक (४) १५९-० तक (५) १८९-

४५ (६) २२९१-३० तक (७) २६-१५ तक (८) ३००-०' तक [|

इसका विचार पहिले अष्टकवर्ग चक्र से उदाहरण देकर समझा दिया गया है उस

चक्र में ग्रहों का क्रम शनि, गुरु, मंगल, सूर्ये, शुक्र, वुध, चन्द्र और लग्न के ही क्रम से

रखना बताया गया है । उदाहरण के लिए यहाँ शुक्र का अष्टक वर्ग लेते हैं । जिसमें

रेषा शुभ सूचक और शून्य अशुभ बताया है । शुक्र का अष्टकगगं चक्र जन्म कुण्डली के अनुसार उदाहरण स्वरूप

राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८५ ९ १० ११ १२ १ २ अशुभ

गृहल.रा. . श. . - मं. के- गु. चं. सू. « - ग्रह ०-अशुश

बु. शु. अश

वृशनि । ० ० ० । । । ० ० | 1 । २ सड

रगर - ०० 1 ।! 1 ० ०0:00 १-३०

इमंगल ० । ० । ॥ ० ० 1 ० ॥ ॥ » ११-१५

४सर्यं ० ० ० ० | ० ० | । ० ० ० १३--०

श i Ios NVIUtLUReS VAN १८-४५

१७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

इबुध । । ० ० | ० | ० ० ० | ० २२-३०

जता) ० ० । । ० । । 1 । 1 । २६-१५

८छलगा । ॥ ॥ । । ० ० । | ° 1 ० ३००

योग ५४२४ ८ ३ ४ ५३ ४ ६ ४

मान लो शुक्र गोचर में धनु राशि में है यह जन्म राशि कुंभ से ११ अर्थात्‌

उपचय में है। यहाँ धनराशि में उपरोक्त चक्र में ४ शुभ रेखायें हैं और ४ शून्य

अशुभ सूचक हैं। शुमाशुभ बराबर हो जाता है। यह आरम्भ में १ रेखा पाया है

उसमें ३- तक शुभ होगा । दुसरे-तीसरे ओर चौथे भाग में १५"-० तक शुभ

रेखा न शुभ न अशुभ फल | पांचवें छठवें सातवें भाग में १-१ शुभ रेख्ग होने से

२६-१५ शुभ होगा । अन्तिम भाग में शुभ रेखा न होने से ३०? तक अशुभ

हांगा । इस प्रकार गोचर फल कां गोचर के ग्रह की राशि से जन्म के अष्टक￾वर्ग चक्र से उस राशि के ग्रह की शुभता अशुभता कव तक रहेगो विचार लेना । यहाँ

तुला राशि में उसे प्री ८ रेखा मिली हैं और तुला शुक्र की मूल त्रिकोण राशि भी

है। जन्म राशि से नवम (त्रिकोण) में पड़ती है। इससे जब शुक्र गोचर में तुला राशि

पर आयगा तब अच्छा फल देगा । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के अष्टकवर्ग चक्रसे विचार

लेना । अष्टकवर्ण के वर्गेन में इसका और भो स्पष्ट विचार किया है ।

अध्याय ७

सर्वेतोभद्र चक्र

उत्तर(बायौ) “

(सीधा) परिचम

चित्रा 1 इस्त

दक्षिण (दाहिना)

किसी नक्षत्र में ग्रह हो उसकी दृष्टि से इस चक्र में ३ वेध होते हैं एक बाई ओर

दूसरा सामने, तीसरा दाहिनी ओर ।

दो भूजाओं में चाहे दाहिना या बायाँ वेध हो, कोई ग्रह नक्षत्र एक राशि एक

स्वर से होगा उनका ही वेध होगा और किसी से नहीं ।

उदाहरण--कृतिका में ग्रह-तिरछा अ, वृष, नंदा, भद्रा, तुला, त, बिशाखा से

वेध । पश्चिम छोर पर सीधा श्रवण से भी वेध ।

रोहिणी में ग्रह हो-ऊपर उत्तर की ओर तिरछा अ, अश्विनी । नीचे तिरछा

दक्षिण की ओर व, मिथुन, और कन्य। र, स्वाती । सामने पश्चिम छोरमें अभिजित्‌ ॥

मृग० में ग्रह हो तो तिरछा दक्षिण को क, कर्क, सिह प, चित्रा और उत्तर में

तिरछा रेवती । सामने पश्चिम में उ०षा० इन सबसे वेध होता है ।

ऊपर तीर के निशान द्वारा चक्र देखने से यद्द सब समझ पड़ेगा ।

१२

=

१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड

नंदा तिथि १-६-११, भद्रा तिथि २-७-१२, जया तिथि ३-८-१३, रिक्ता, ४-९-१४, थूर्णा तिथि ५-१०-१५ या अमावस ।

नाम के अक्षर में जो स्वर हो वही स्वर उस वर्ण का स्वर कहलाता है। इधसे चेध का विचार होता है।

इस चक्र में अक्षर से, स्वर से, नक्षत्र से, राशि से, तिथि से, और गोचर में ग्रह ग्जस राशि या जिस नक्षत्र में हो उससे जन्म नक्षत्र के वेध का विचार होता है ।

गोचर के ग्रह वर्तमान में जिस नक्षत्र और राशि में हों स्थापित कर उनका फल विचारना ।

जब नक्षत्र से वेध होता है तो गड़बड़ी होती है । जब अक्षर से वेध होता है तो हानि होती है । जब स्वर से वेध होता है तो बीमारी होती है । जब तिथि या-राशि से वेध होता है तो बहुत बड़ी रुकावट होती है ।

इनमें इकहरे वेध से लड़ाई में खतरा,र से वेध हो तो धन हानि, ३ से वेध हो तो ` बाधा, ४ से वेध हो तो मृत्यु भय, लगातार ५ से वेध हो तो मृत्यु होगी ।

नक्षत्र आर्द्रा, हस्त, पूर्वाषाढ़ा और उत्तर भाद्र पद में ४ केन्द्र के हैं इनमें जू दुसरे से रेखा खींचो तो चारों कोनों में ३ त्रिकोण वन जाते हैं। इन चार कोण में कोई ग्रह कहीं जाता है तो ४ स्वर अ, आ, इ, ई का वेध हो जाता है और पुर्णा तिथि का भी।

यहाँ चक्र में जो नक्षत्र दिये हैं और उनके समीप जो अक्षर दिये हैं ये उस नक्षत्र के होड़ा चक्र के अनुसार दिये अक्षरों से ही एक अक्षर है । क्योंकि यहाँ एक नक्षत्र के चारों चरणों के चार अक्षर देने का स्थान नहीं है इससे एक ही दिया है। ऊपर बताये केन्द्र के ४ नक्षत्र हैं। आर्द्रा का अक्षर होड़ाचक्रानुसार क घ ङ छ है, हस्त का पुष ण ठ है, पुर षा० का भू ध फ ढ़ है, उ भाद्र० का दुथ झ न है इनके सब अक्षर नहीं दिये परन्तु इनके चोखटे में एक नक्षत्र के पहले चरण का दूसरे के पहिले चरण से वेध होता है जैसे हस्त के दुसरे चरण का ण वेध उषा के दुसरे चरण के अक्षर से होता है इसी प्रकार और भी समझना । इसमें स-श, ब्व, घ-ख, थस्छ, त्र-त, जरग ये बराबर हैं । इनमें किसी एक से वेध हो तो दूसरे से भी वेध होना समझा जायेगा । शुभ ग्रह का वेध सौम्य वेध होता है ।

यहाँ शतपद चक्र दिया है । जिसमें २८ नक्षत्रों के प्रत्येक चरण के एक-एक अक्षर दिये हैं। इस चक्र में २८ नक्षत्रों के ११२ अक्षर है । जिनमें से विना मात्रा के अक्षर केवल इस सर्वतों भद्रचक्र में यहाँ दिये क्रम से ही दिये हैं जिससे उन अक्षरों के क्रम का पता चळ जायगा । इसी स्पष्टीकरण को यह चक्र यहाँ दिया है—

सर्वतोभद्र चक्र : १७९

शतपद चक्क ( सवंतोभद्र चक्र के उपयोग के लिये )

षक ५ ह ७ ड ८ म १० ट ११ प १२ र १४ त १५

४कि ५ हि ७डि ९ मि १० टि ११पि १२ रि १४ति १६

४ कु ६घहु८ डु ९ मु १० टु ११ पु परु १५ तु १६

ङ छ ण १३ ठ

ए३वे५के७हे ८ डे ९ मे १० टे १२ पे १४ रे १५ ते १६

ओ४वो शको ७ हो ८डो ९मो ११टो १२पो १४ रो १५ तो १६

न १७य १८ भ १९ ज २१ख कचे ग२३ स२४द२५ च २७७ १

नि१७यि१८भि १९जि २१खि २२ गि २३ सि २४ दि २५ चि २७ लि २

नु १७ यु १८ भु २० धजु $ खु २२ गु २३ सु२४ दु२६थचु१ नु २

फढ फ्‌झ

ने १७ये १९ भे २१जे ३२ खे २२ गे २३ से२४दे २७ चे १ ले २

नो१८यो१९भो २१जो३२खो २२ गो २३सो २४दो २७ चो १ लो २,

यहाँ नक्षत्रों के नाम अंकों में बनाये उनके चारों चरण अक्षरों में एक सा अंक

पड़ा है जैसे अ इ उ ए प्रत्येक में ३ अर्थात्‌ तीसरा कृतिका नक्षत्र सूचक अंक पड़ा है।

अभिजित का अंक ३* दिया है जिससे शतपद चक्रमें पुरे २७ नक्षत्रों के चारों चरणों

के अक्षर आ जाते हैं। अब इस चक्र के ऊपर के विना मात्रा वाले अक्षर अ, व, क,

ह, आदि यहाँ दिये क्रम से ही स्वतो भद्र चक्रमें दिये हैं जिसमें ६, १३, २० और २६

वाँ नक्षत्र पहिले वर्णन किये हुए केन्द्र के नक्षत्र हैं ।

शतपद चक्रका पृथक्‌ भी विचार होता है। नाम के अक्षर के अनुसार नक्षत्र

के चरण होते हैं। जिस नक्षत्र के चरण में शुभया क्रूर ग्रह आवे उससे वेध

विचारते हैं ।

शुभ ग्रहों के वेध से शुभ फल । पाप ग्रहों के वेध से पाप फळ । शुभाशुभ ग्रहों

के वेध से मिश्र फल होता है । यह सत्र सवंतोभब्र चक्र के विचारने से स्पष्ट

प्रकट होगा ।

इस चक्र में लत्ता र प्रकार का है ।

(१) पुरोलत्ता--यह सूर्ये, मंगल, गुद और शनि की छत्ता है इसमें नक्षत्र आदि

की गिनती क्रम से होती है जैसे अश्विनी के बाद भरणी फिर कृत्तिका आदि ।

(२) पृष्ठ छत्ता--यह शेष ग्रहों का लत्ता है अर्थात्‌ चंद्र, बुध, शुक्र, राहु, केतु की

यह लत्ता है । इसमें नक्षत्र आदि की गिनती विरुद्ध कम से होती है जैसे श्रत्रण के बाद

उल्टा गिना तो उ० षाढ़ा फिर पूर्वाषाढा फिर मूल इत्यादि ।

अन्तर विचार--

१ सूये से गिनने पर १२ वाँ नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

अ हेव

इ ३ वि

उ ३ वु

१८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२ मंगल से गिनने पर तीसरा नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

३ गुरु से गिनने पर छठा नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

४ शनि से गिनने पर आठवां नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

५ शुक्र से गिनने पर पाँचवां नक्षत्र पुष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की लात (उल्टी गिनती)

६ बुध से गिनने पर सातवां नक्षत्र पृष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की लात (उल्टी गिनती)

७ राहु से गिनने पर नवां नक्षत्र पृष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की ळात (उल्टी गिनती)

८ चंद्र से गिनने पर २२वाँ नक्षत्र पृष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की लात (उल्टी गिनती)

इस प्रकार गोचर के अनुसार ग्रह के नक्षत्र से जन्म नक्षत्र तक गिनने पर उपरोक्त

लत्ता तारा आ जावे तो बीमारियाँ व्यथा हो ।

१-मान छो सूर्य गोचर में मूल नक्षत्र १९ वें नक्षत्र में है इससे सीघा १२ गिना

तो १२वाँ नक्षत्र कृतिका आया । यदि जन्म नक्षत्र कृतिका हो तो बीमारी होगी ।

२-मान लो शुक्र श्रवण में है शुक्र का पृष्ठ लत्ता पाँचवां है तो श्रवण से उल्टा

गिना १ श्रवण २ उ०्षा० ४ मूल, ५ ज्येष्ठा आया यदि ज्येष्ठा अन्म नक्षत्र हो तो

बीमारी होगी इसी प्रकार सब ग्रहों का पुरोलत्ता या पृष्ठ लत्ता विचारे ।

लत्ता फल

सूर्यं लत्ता में-सब व्यापार में हानि ।

राहु केतु लत्ता में-दुःख ।

शुक्र लत्ता में-कलह ।

चन्द्र लत्ता में-बडी हानि ।

गुरु लत्ता में-मृत्यु, बन्धुद्दानि, सावेजनिक भय या अरक्षिता हो ।

बुध छत्ता में-स्थान हानि या इसी प्रकार के बुरे फल ।

जब २ या अधिक लत्ता साथ पड़े तो अनुपात से दुगुना या तिगुना बुरा फळ

सबके मेल से विचारना । त

वेघ का प्रकार |

जब ग्रह गति में वक्री हो तो उसकी दृष्टि दाहिनी ओर रहती है ।

जब ग्रह गति में सीधा हो तो उसकी दृष्टि बाइ ओर रहती है ।

जब ग्रह गति में मध्य हो तो उसकी दृष्टि सामने की ओर रहती है ।

यह विचार मंगल आदि ५ ग्रहों का है ।

राहु केतु सदा वक्री हैं उनका वेध दाहिनी ओर होगा ।

सूर्य चन्द्र सदा मार्गी हैं उनका वेध बाइं ओर होगा ।

गति में समता न होने से ग्रहों के यहाँ ३ प्रकार के वेध बताये गये हैं|

अशुभ वेध-कोई तिथि राशि या अंश या नक्षत्र पाप ग्रह से वेध हो तब उसे

शुभ कार्यों में त्याग देना ।

वेध में विवाह करने से सुखी नहीं होता । यात्रा में उन्नतिशील नहीं होगा ।

रोगी को दवा करने में अच्छा न होगा । व्यापार करने में सफलता नहीं होगी ।

सवंतोभद्र चक्र: १८१

पाप ग्रहों के वेध में जब ग्रह वक्री हो तो वहुत बुरा फल देता है यः मृत्यु देता है।

शुभ ग्रहों के वेध में जव ग्रह हो तो अच्छा फल होता है।

पाप और शुभ ग्रह जब शीघ्र में हों तो उस ग्रह का स्वभाव ग्रहण कर लेते हैं

जिसके साथ कि वे रहते हैं ।

ग्रह वेध फल

सूर्य का वेध हो तो-मनोमालिन्य हो, मन में ताप ।

भंगल का वेध हो तो-धन हानि ।

शनि का वेध हो तो-रोग से पीडित ।

राहु केतु का वेध हो तो-बाधा विघ्न हो ।

चन्द्र का वेध हो तो-मिश्र फल ( शुभाशुभ ) ।

शुक्र का वेध हो तो-स्त्री भोग, अन्य मत में शत्रु वृद्धि ।

बुध का वेध हो तो-ज्ञान वृद्धि ।

गुरु का वेध हो तो-सदा अच्छा फल । ५

वेध कारक ग्रह यदि-वक्री हो-प्रभाव दुगुना हो, उच्च में-प्रभाव तिगुना हो, गति

( मार्गी ) साधारण फल, नीच में आधा फल ।

पाप ग्रह बुरा फल देता है शुभ ग्रह अच्छा फल देता है।

परन्तु शुभ ग्रह पाप ग्रह के साथ हो तो अच्छा फल नहीं देता ।

पाप ग्रह वेध में यदि वक्री ग्रह हो तो मृत्यु फल देता है।

गति शीघ्री हो तो बीमारी शीघ्र अच्छी होती है।

पाप ग्रह का वेध अपने जन्म दिन में हो तो मानसिक पीड़ा हो मन में शांति नमिले;

१ करूर ग्रह के वेध से उद्वेग यां लड़ाई में खतरा ।

२ क्रूर ग्रह के वेध से-हानि, धन हानि ।

३ क्रूर ग्रह के वेध से-भंग या बाधा ।

४ क्रूर ग्रह के वेध से-मृत्यु ।

(१) सूर्ये गोचर में ३ राशि वृष मिथुन कके (जो पूर्व में है) वह दिशा अन्त समझी

जावेगी शेष ३ दृश्य समझी जावेगी ।

(२) स्वर अ. उ. छू. ओर बो. जो उत्तर पू में हैं इन्हें पूवं दिशा का समझना ।

स्वर आ. ऊ. लू और ओ. जो दक्षिण पूर्व में हैं उन्हें भी पूर्व दिशा का समझना ।

स्वर इ ए ओर अं जो दक्षिण पश्चिम में है उन्हें पश्चिम का समझना । स्वर ई ऋ ए

और अः जो पश्चिम-उत्तर में है उन्हें पश्चिम का समझना ।

(३) यदि विशेष दिशा में जिसमें सूयं ( ३ राशियों में ) ३ मास तक ठहुहता है

सबै नक्षत्र स्वर, राशि और तिथि उस दिशा की अस्त समझी जाती है ।

(४) जब नक्षत्र अस्त हो वहाँ वेध हो तो बीमारी भ्रम हो ।

जब व्यंजन अस्त हो वहाँ वेध हो तो-हानि ।

जब स्वर अस्त हो वहाँ वेध हो तो-शोक, व्याधि ।