भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जन्म चंद्र से शनि=१-६-११ स्थान में-स्वर्ण पाद=्सव प्रकार का सुख हो

» =रजत पाद=्अच्छा भाग्य, काम सफल

» उत्ताम्‌ पाद-समफल, मध्यफल अच्छा न बुरा

„» सलोह पादस्धन नाश, दुःख दरिद्र दायक ।

शनि कीं साढ़ेसाती में शनि कब किस अंग पर है विचारना

फल नरपति-जयचर्योक्त शनि नराकार चक्र

हानि जन्म नक्षत्र से शनि के वर्तेमान नक्षत्र तक

हानि गिनना जिस अंग पर शनि आवे उसका

फल नीचे दिया है ।

“लाभ नक्षत्र क्रम अंग फल

लांभ १ मुख हानि

लाभ ४ दक्षिण भुज जय

लाभ ६ चरण भ्रम

भय शू हृदय श्री प्राप्ति मृत्यु ४ वाम भुज भय

जय ३ शीर्ष राज्य

सोख्य २ नेत्र सौख्य

पर्यटन २ गुह्य मृत्यु भय

योग २७

जन्म नक्षत्र से शनि जिस नक्षत्र पर हो उस नक्षत्र तक गिन के फल का विचार करना

शनि का चरण विचार

१ » रै-१०९

[7] कर =३-७-१०

71 ४. =४-८-१२

भाव मास अंग

व्ययस्थान ७ मस्तक

व्ययस्थान ९ नेत्र

व्ययस्थान ८ मुख

व्यथस्थान ६ कंठ

जन्मस्थान १० हृदय

जन्मस्थान ११ उदर

जन्मस्थान ५ नाभि

जन्मस्थान ४ गुह्यांग

धनस्थान १३ घुटना

घनस्थान १२ जंघा

धनस्थान ५ पाद

नारदोक्त शनि चक्र

नक्षत्र क्रम अवयव

१ ललाट

३ दुख

२ गुह्य

२ नेत्र

शर हृदय

४ वाम हस्त

३ वाम पाद

३ दक्षिण पाद

¥ दक्षिण हस्त

२७ नक्षत्र

फल उदाहरण

रोग जन्म नक्षत्र चित्रा हो और गोचर में

लाभ शनि आश्लेषा पर हो तो चित्रा से

हानि आश्लेषा तक गिनने से २३ संख्या

लाभ आई तो दक्षिण पाद के ३ नक्षत्रों

सौख्य में शनि आया जिसका फल इष्ट

बंधन यात्रा है 1

दुःख

इष्ट यात्रा

अर्थ लाभ

गोचर विचार : १७१

शनि वाहन विचार

शनि. के साढे साती प्रवेश समय के वाहन विचार से भी साढे साती के फल काः विचार होता है ।

रीति--जिस दिन शनि बदले उस दिन को ( तिथि--वार--नक्षत्र-स्वनाम के अक्षर )- ९=तिथिवार नक्षत्र संख्या और नाम के अक्षर की संख्या जोड़कर ९ का भाग दे दें जो शेष बचे तो वाहन जानना ।

शेष वाहन फल अन्य मत से १ खर (गदहा) हानि हो शेष ४ महिष के स्थान में २ अश्व (घोड़ा) जय स्यार तथा मेष वाहन कहते है ३ गज (हाथी) सोख्य जिसका फल अति लाभजनक ४ महिष (भँसा) मध्यम बताया गया है। ५ सिह र शत्रुनाश

६ जम्बुक (स्यार): शोक सन्ताप ७ वायस “काक) कलह

८ मयूर (मोर) लाभ

९ हंस सुख

अन्य मत से वाहन विचार-- जन्म नक्षत्र से गोचर में जिस दिन बदले उस दिन के नक्षत्र तक संख्या गिन कर ९ का भाग देना शेष पर से उपरोक्त वाहन के अनुसार ही फल जानना । न

वाहन पर विशेष विचार

१--साढे साती जो अशुभ फल देने वाली हो उस समय वाहन भी अशुभ फल दे दे तो साढ़े साती का विशेष अशुभ फल होगा ।

२--यदि अशुभ फल दायक साढ़े साती हो प्रवेश समय वाहन शुभ फलद हो तो विशेष अनिष्ट फल नहीं होगा मध्यम फल होगा ।

३-- शुभ फल दायक साढ़े साती हो और शुभदायक वाहन हो तो विशेष शुभ ।

४--शुभ फल दायक साढे साती में प्रवेश समय अशुभ फल दायक वाहन हो तो

मध्यम फल होगा ।

गोचर में जब शनि अपनी राशि से ४, ७ और १० स्थान में जाता है तो-मानसिक

दुख की वृद्धि करता है, जीवन को अव्यवस्थित करता है जिससे नाना प्रकार के दुःखों

का सामना करना पड़ता है ।

शनि चतुर्थ में-स्वास्थ्य बिगड़ता है, निवास में अवश्य ही परिवर्तन करता हैं ।

शनि सप्तम में-परदेश वास हो यदि सप्तम में चर राशि हो तो अवश्य फल हो।

शनि दशम में-नौकरी व्यवसाय आदि में गडबडी, कार्य में सफलता ।

(३) अळ्या शन्तिजन्म राशि से ४, ८ राशि में स्थित शनि अढेया शनि

१७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

कहलाता है यह २॥ वर्ष शुभामुम. फळ करता है । शनि किसी को प्रारम्भ में, किसी

को मध्य में, किसी को अन्त में अनिष्ट करता है ।

गोचर में शनि का वार्षिक ( एक वर्ष का ) फल

शनि गुरु और राहु तीनों शीघ्रगामी नहीं है इन तीनों के फल का गोचर से

बहुत प्रभाव पड़ता है !

गोचर के अनुसार सूर्य मंगल और शुक्र से म्गस का फल कहा जाता है तव इन

बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:

१-जब राशि का गोचर फल बुरा होता है तब अन्य शुभ फलों की हानि हो जाती

है अर्थात्‌ जब गोचर का शनि अशुभ होता है तब उस वर्ष में प्रायः सभी ग्रह अशुभ

फल देते हैं ।

२-जिस वर्ष शनि अशुभ फलदायक होता है और गुरु का फल यदि शुभ हो तो

भी उस वर्ष में विशेष अशुभ ही होता है ।

-जिस वर्ष में शनि उत्तम फल दाता हो और गुरु का अशुभ फल हो तो उस

चर्ष य। उस समय में प्रायः शुभ ही फल होता है ।

४-जिस वर्ष या समय में शनि शुभ फलदाता हो परन्तु गुरु और राहु दोनों अशुभ

फल देवें तो उस वर्ष या समय में शुभ ही फल विशेष होता है ।

५-जिस वर्ष यो समय में शनि शुभ फल दायक हो ओर गुरु राहु भी शुभ फल

दायक हों तो सब प्रकार से शुभ होता है ।

६-यदि वर्ष का फल उत्तम हो फौर मास का फल खराब हो तो उस वर्ष में

उत्तम ही फल होगा ।

७-यदि वर्ष का फल खराव हो और मास का फल उत्तम हो तो उस मास में

उत्तम फल नहीं के बराबर होगा ।

८-यदि वर्ष का फल उत्तम हो और मास का भी फल उत्तम हो तो उस मांस में

समस्त शुभ फल होंगे ।

इसी प्रकार गोचर में वर्ष और मास का फल विचारना ।

लग्न या रवि को साढ़ेसाती

मनुष्य को शनि की साढ़ेसाती न होते हुए भी अनेक प्रकार के दुःख भोगने को

अवसर आ जाता है जिसका कारण लग्न रवि की साढ़ेसाती है ।

जिस प्रकार जन्म राशि के चन्द्र पर से व्यय स्थान जन्म स्थान और धन स्थान

में शनि के जाने से साढ़ेसाती होती है उसी प्रकार लग्न और सूर्य की राशि से भी

विचार होता है ।

१-लग्न को साढ़ेसाती-जन्म लग्न के व्यय स्थान में जव शनि आवे तो शि

की साढ़ेसाती सदृश यह भी साढ़ेसाती मानी जाती है लग्न स्थान और धन स्थान में

अब तक शनि रहेगा तब तक लग्न की साढेसाती रहेगी ।

गोचर विचार : १७३

२-सुयं की साढेसाती-जन्म के सूर्य के व्यय स्थान में शनि आने पर साढ़ेसाती का आरम्भ माना जाता है जो आगे सूर्य की राशि के स्थान व सूर्य के दुसरे स्थान पर शनि रहने तक साढ़ेसाती सूये की समझी जायगी । १-लग्न की साढ़ेसाती में लग्न के १२-१-२ स्थान में जिस प्रकार के शुभ या

अशुभ ग्रह हों तथा उन भावों पर जैसे ग्रहों का योग या दृष्टि हो उसी के अनुसार

हानि लाभ सुख आरोग्य यश अण्यश धन लाभ हानि आदि फल होता है ।

२-रवि की साढ़ेसाती में रवि के १२-१-२ भाव में जैसे ग्रह हाँ या जैसे ग्रहों का

योग या दृष्टि हो उसी के अनुसार उद्योग धंधा, अधिकार, मान सम्मान, सुख दुःख

आदि प्राप्त होता है ।

गोचर के अनुसार ग्रहों का वषे फल￾कोई भी जन्म राशि हो जब किसी को जन्म राशि में सूर्य प्रवेश करता है ( जिस

समय सूर्य की कोई संक्राति उस राशि में हो ) उस दिन से दिनों की गिनती कर

पंचोग देखकर तिथि मास आदि लिखकर पूरे वर्ष भर के समय का सब ग्रहों का वर्ष

फल लो ।

ग्रह दवा कब से कव तक राशि अंश फल

१ सूयं की जन्म राशि को संक्राति से २०० तक ०-२० =धन नाश, चिता

२ चन्द्र की उससे आगे ५०° तक १-२० मधन धर्म की प्राप्ति,

३ मंगल की उससे आगे २८ तक ०-२८ =रोग मृत्यु, शस्त्रादि भय

४ बुध की उससे आगे ५६ तक १-२६ =धन प्राप्ति

५ शनि की उससे आगे ३६ तक १-६ -भालस

६ गुरु की उससे आगे ५८ तक १-२७ =सम्पत्ति की प्राप्ति

७राहु की उससे आगे ४२ तक १-१२ =वंधन

द शुक्र की उससे आगे ७० तक २-१० =अभीष्ट फल की प्राप्ति,

योग ३६० अंश १२-०

इस प्रकार गणना से जातक की फिर जन्म राशि भा जाती है ।

उदाहरण--मान लो किसी की - कुंभ राशि है संवत्‌ २०१८ में कुंभ राशि में

सूर्य माघ कृष्ण ५ इष्ट २७-३० पर प्रवेश हुआ है । इससे १३-२-१९६२ तारीख से

सूर्य दशा की गणना आरम्भ हुई। सूर्य के अंशों की गिनती करने से ठीक समय

निकल आता है । उस समय पचांग से देखकर तारीख क्या पड़ती है यहाँ नोट कर दी

है । तारीख या दिन की गणना में कुछ दिन का अन्तर आ सकता है।

सूर्यं दशा चक्र ,

ग्रह दशा राशि अंश सूर्य की राशि अंश से राशि अंश तक तारीख

सूयं २-२० कुंभ ० अंश से कुंभ के २०° तक ४-२-१९६२ तक

चन्द्र १-२० कुम्भ के २० से मेष के १०° तक २३-४-१९६२

१७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल ०-२८ मेष १०° से वृष ८ तक २२-५-१९६२ चुघ १-२६ वृषदसे ककं ४ तक २०-७-१९६२

शनि १-६ ककं ४ से सिंह १० तक २७-८-१९६२ गुरु वृ-२८ सिंह १० से तुला ८ तक २५-१०-१९६२

राहु १-१२ तुला ८से वृश्चिक २० तक ६-१२-१९६२

शुक्र २-१० वृश्चिक २० से मकर ३०° तक १२-२-१९६३

अरिष्टकारी गोचर फल विचार

१--राहु-यदि जन्म में राहु धन या मीन राशि में हो तो जब गोचर में गुरु इस

राहु के बराबर राशि अंश में आता है तब अरिष्ट होता है । गुरु यदि उस राशि के

त्रिकोण में भी जाये तो भी अरिष्ट होना संभव है ।

२--राहू गुरु-यदि जन्म में राहु और गुरु साथ हों तो जव राहु को राशि से

गोचर का शनि त्रिकोण में आता है तब अरिष्ट होता है ।

३--षष्ठेश-षष्ठेश जिस राशि या नक्षत्र में हो उससे त्रिकोण में जब शनि आवे

सब मृत्यु का भय होता है। यदि उस समय कोई मारकेश या मृत्यु का योग न हो तो

जातक के किसी कुटुम्बी की मृत्यु होती है। गोचर में शनि कई बार सव राशियों

ओर नक्षत्रों में जाता है परन्तु मृत्यु तभी सम्भव होगी जब अन्य योगों से भी उसे

मृत्यु या अरिष्ट होना सम्भव हो ।

४--गुरु-लग्न था चन्द्र से तीसरे द्रेष्काण में गुरु हो तो उस द्रेष्काण के स्वामी

के त्रिकोण में जव गोचर में शनि जाये तब उस वर्ष में परदेश यात्रा, विवाद और

मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

५--अष्टमेश-अष्टमेश जिस द्वादशांश में हो उसके त्रिकोण में जब गोचर का

राहु आवे तब उस समय का अष्टमेश जिस राशि में बैठा हो उसके त्रिकोण में जब

सूये आता है तब उस मास में मृत्यु का भय संभव है । जैसे मान लो कुम्भ का मंगल

अष्टमेश है यह मिथुन के द्वादशांश में है । मिथुन से त्रिकोण तुळा और कुम्भ राशि हुई

जब गोचर में राहु तुला याकुंभ में जोयगा तो जातक को अरिष्ट होना संमव

होगा । यहाँ अष्टमेश कुम्भ का है जिसकी त्रिकोण राशि मिथुन और तुला है इससे जब

सूर्य मिथुन या तुला का होगा उसी मास विशेष अरिष्ट होने की संभावना है ।

६- त्रिक ( ६-८-१२ घर )--इन तीनों भावों के स्पष्ट को जोड़कर जो राशि

कला आदि प्राप्त हो उस राशि मंशादि में या उसके त्रिकोण में जब शनि आवे तक

अरिष्ट होना सम्भव है ।

७--अष्टमेश-अष्टमेश गत राशि के त्रिकोण में जिस समय गोचर का चन्द्र आता

है उस समय अरिष्ट सम्भव है ।

ग्रहों के अष्टक गग से गोचर फल

जन्म कुण्डली के ग्रहों का अष्टक वर्ग निकालो जिस ग्रह की अष्टक वर्ग चक्र में

-....,-...----------%--%त७त0े.२.-न---न----कक+७क>->त६लत६न-नलन कक 9-० 4

गोचर विचार : १७४५

'जिस राशि में शुभ रेखा अधिक हैं उस राशि में वह ग्रह शुभ फल देगा अष्टक वर्ग में = शुभ रेखाए हैं ।

यदि ६ रेखा हो तो ६ शुभ और २ शून्य अशुभ समझना, ७ रेखा हो तो १ कम

अर्थात्‌ डे हास होगा इँ फल शूभ होगा । ६ रेखा हो तो २ कम हुए अर्थात्‌ ६ शुभ

२ अशुभ होने से शेष=४ शुभ६-३ फल शुभ होगा । ५ रेखा होने से-३=हे= फल।

४ रेखा-४=० फल । ३ रेखा-५ मअशुभ=-हेै=-ई अशुभ फल होगा । २ रेखा-६

अशुभ---ई-ई अशुभ । १ रेखा-७ अशुभ=६=ई अशुभ फल । रेखा बिलकुल न हो

८ अशुभ रेखा हो तो पूर्ण अशुभ फल होगा । इसका प्रकार अष्टक वर्ग विषय के

चर्णन में यह सब समझा दिया गया है ।

२--यदि जन्मकालीन लग्न या चन्द्रसे गोचर का ग्रह उपचय (३-६-१०-११ घर)

में हो या मित्र ग्रह में हो या अपने उच्च या स्वक्षेत्र में हो और उस राशि में अष्टक￾वर्ग की ४ से अधिक शुभ रेखा हों तो शुभ फल की अधिक वृद्धि होती है ।

या यह अपचय (उपचय के अतिरिक्त स्थान) में अपने नीच या शत्रुगृही हो और

यदि उसमें अष्टकवर्ग की शुभ रेखा की अधिकता भी हो तो भी शुभ फल में न्यूनता

आ जोती है । यदि शुभ रेखा ४ से कम हो तो अनिष्ट फल प्रबल हो जाता है ।

३--गोचर का ग्रह यदि जन्म लग्न-या चन्द्र से उपचय में हो और शुभ रेखा भी

अधिक हो परन्तु निर्बल हो तो शुभ फल नहीं देगा अशुभता ही लायेगा ।

४--छोई भी ग्रह पूरे ३० अंश में भ्रमण करता है । उस ग्रह के अष्टकवर्ग चक्र

से पता लगेगा कि वह किसी विशेष राशि में क्रिस अंश में शुभ होगा कितने में अशुभ

होगा । अष्टकवर्श में ८ शुभ रेखा होती है। ३० अंश<- ८ रेखा>३९-४५' का एक

विभाग पड़ा (२) ७-३०” तक (३) ११-१५ तक (४) १५९-० तक (५) १८९-

४५ (६) २२९१-३० तक (७) २६-१५ तक (८) ३००-०' तक [|

इसका विचार पहिले अष्टकवर्ग चक्र से उदाहरण देकर समझा दिया गया है उस

चक्र में ग्रहों का क्रम शनि, गुरु, मंगल, सूर्ये, शुक्र, वुध, चन्द्र और लग्न के ही क्रम से

रखना बताया गया है । उदाहरण के लिए यहाँ शुक्र का अष्टक वर्ग लेते हैं । जिसमें

रेषा शुभ सूचक और शून्य अशुभ बताया है । शुक्र का अष्टकगगं चक्र जन्म कुण्डली के अनुसार उदाहरण स्वरूप

राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८५ ९ १० ११ १२ १ २ अशुभ

गृहल.रा. . श. . - मं. के- गु. चं. सू. « - ग्रह ०-अशुश

बु. शु. अश

वृशनि । ० ० ० । । । ० ० | 1 । २ सड

रगर - ०० 1 ।! 1 ० ०0:00 १-३०

इमंगल ० । ० । ॥ ० ० 1 ० ॥ ॥ » ११-१५

४सर्यं ० ० ० ० | ० ० | । ० ० ० १३--०

श i Ios NVIUtLUReS VAN १८-४५

१७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

इबुध । । ० ० | ० | ० ० ० | ० २२-३०

जता) ० ० । । ० । । 1 । 1 । २६-१५

८छलगा । ॥ ॥ । । ० ० । | ° 1 ० ३००

योग ५४२४ ८ ३ ४ ५३ ४ ६ ४

मान लो शुक्र गोचर में धनु राशि में है यह जन्म राशि कुंभ से ११ अर्थात्‌

उपचय में है। यहाँ धनराशि में उपरोक्त चक्र में ४ शुभ रेखायें हैं और ४ शून्य

अशुभ सूचक हैं। शुमाशुभ बराबर हो जाता है। यह आरम्भ में १ रेखा पाया है

उसमें ३- तक शुभ होगा । दुसरे-तीसरे ओर चौथे भाग में १५"-० तक शुभ

रेखा न शुभ न अशुभ फल | पांचवें छठवें सातवें भाग में १-१ शुभ रेख्ग होने से

२६-१५ शुभ होगा । अन्तिम भाग में शुभ रेखा न होने से ३०? तक अशुभ

हांगा । इस प्रकार गोचर फल कां गोचर के ग्रह की राशि से जन्म के अष्टक￾वर्ग चक्र से उस राशि के ग्रह की शुभता अशुभता कव तक रहेगो विचार लेना । यहाँ

तुला राशि में उसे प्री ८ रेखा मिली हैं और तुला शुक्र की मूल त्रिकोण राशि भी

है। जन्म राशि से नवम (त्रिकोण) में पड़ती है। इससे जब शुक्र गोचर में तुला राशि

पर आयगा तब अच्छा फल देगा । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के अष्टकवर्ग चक्रसे विचार

लेना । अष्टकवर्ण के वर्गेन में इसका और भो स्पष्ट विचार किया है ।

अध्याय ७

सर्वेतोभद्र चक्र

उत्तर(बायौ) “

(सीधा) परिचम

चित्रा 1 इस्त

दक्षिण (दाहिना)

किसी नक्षत्र में ग्रह हो उसकी दृष्टि से इस चक्र में ३ वेध होते हैं एक बाई ओर

दूसरा सामने, तीसरा दाहिनी ओर ।

दो भूजाओं में चाहे दाहिना या बायाँ वेध हो, कोई ग्रह नक्षत्र एक राशि एक

स्वर से होगा उनका ही वेध होगा और किसी से नहीं ।

उदाहरण--कृतिका में ग्रह-तिरछा अ, वृष, नंदा, भद्रा, तुला, त, बिशाखा से

वेध । पश्चिम छोर पर सीधा श्रवण से भी वेध ।

रोहिणी में ग्रह हो-ऊपर उत्तर की ओर तिरछा अ, अश्विनी । नीचे तिरछा

दक्षिण की ओर व, मिथुन, और कन्य। र, स्वाती । सामने पश्चिम छोरमें अभिजित्‌ ॥

मृग० में ग्रह हो तो तिरछा दक्षिण को क, कर्क, सिह प, चित्रा और उत्तर में

तिरछा रेवती । सामने पश्चिम में उ०षा० इन सबसे वेध होता है ।

ऊपर तीर के निशान द्वारा चक्र देखने से यद्द सब समझ पड़ेगा ।

१२

=

१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड

नंदा तिथि १-६-११, भद्रा तिथि २-७-१२, जया तिथि ३-८-१३, रिक्ता, ४-९-१४, थूर्णा तिथि ५-१०-१५ या अमावस ।

नाम के अक्षर में जो स्वर हो वही स्वर उस वर्ण का स्वर कहलाता है। इधसे चेध का विचार होता है।

इस चक्र में अक्षर से, स्वर से, नक्षत्र से, राशि से, तिथि से, और गोचर में ग्रह ग्जस राशि या जिस नक्षत्र में हो उससे जन्म नक्षत्र के वेध का विचार होता है ।

गोचर के ग्रह वर्तमान में जिस नक्षत्र और राशि में हों स्थापित कर उनका फल विचारना ।

जब नक्षत्र से वेध होता है तो गड़बड़ी होती है । जब अक्षर से वेध होता है तो हानि होती है । जब स्वर से वेध होता है तो बीमारी होती है । जब तिथि या-राशि से वेध होता है तो बहुत बड़ी रुकावट होती है ।

इनमें इकहरे वेध से लड़ाई में खतरा,र से वेध हो तो धन हानि, ३ से वेध हो तो ` बाधा, ४ से वेध हो तो मृत्यु भय, लगातार ५ से वेध हो तो मृत्यु होगी ।

नक्षत्र आर्द्रा, हस्त, पूर्वाषाढ़ा और उत्तर भाद्र पद में ४ केन्द्र के हैं इनमें जू दुसरे से रेखा खींचो तो चारों कोनों में ३ त्रिकोण वन जाते हैं। इन चार कोण में कोई ग्रह कहीं जाता है तो ४ स्वर अ, आ, इ, ई का वेध हो जाता है और पुर्णा तिथि का भी।

यहाँ चक्र में जो नक्षत्र दिये हैं और उनके समीप जो अक्षर दिये हैं ये उस नक्षत्र के होड़ा चक्र के अनुसार दिये अक्षरों से ही एक अक्षर है । क्योंकि यहाँ एक नक्षत्र के चारों चरणों के चार अक्षर देने का स्थान नहीं है इससे एक ही दिया है। ऊपर बताये केन्द्र के ४ नक्षत्र हैं। आर्द्रा का अक्षर होड़ाचक्रानुसार क घ ङ छ है, हस्त का पुष ण ठ है, पुर षा० का भू ध फ ढ़ है, उ भाद्र० का दुथ झ न है इनके सब अक्षर नहीं दिये परन्तु इनके चोखटे में एक नक्षत्र के पहले चरण का दूसरे के पहिले चरण से वेध होता है जैसे हस्त के दुसरे चरण का ण वेध उषा के दुसरे चरण के अक्षर से होता है इसी प्रकार और भी समझना । इसमें स-श, ब्व, घ-ख, थस्छ, त्र-त, जरग ये बराबर हैं । इनमें किसी एक से वेध हो तो दूसरे से भी वेध होना समझा जायेगा । शुभ ग्रह का वेध सौम्य वेध होता है ।

यहाँ शतपद चक्र दिया है । जिसमें २८ नक्षत्रों के प्रत्येक चरण के एक-एक अक्षर दिये हैं। इस चक्र में २८ नक्षत्रों के ११२ अक्षर है । जिनमें से विना मात्रा के अक्षर केवल इस सर्वतों भद्रचक्र में यहाँ दिये क्रम से ही दिये हैं जिससे उन अक्षरों के क्रम का पता चळ जायगा । इसी स्पष्टीकरण को यह चक्र यहाँ दिया है—

सर्वतोभद्र चक्र : १७९

शतपद चक्क ( सवंतोभद्र चक्र के उपयोग के लिये )

षक ५ ह ७ ड ८ म १० ट ११ प १२ र १४ त १५

४कि ५ हि ७डि ९ मि १० टि ११पि १२ रि १४ति १६

४ कु ६घहु८ डु ९ मु १० टु ११ पु परु १५ तु १६

ङ छ ण १३ ठ

ए३वे५के७हे ८ डे ९ मे १० टे १२ पे १४ रे १५ ते १६

ओ४वो शको ७ हो ८डो ९मो ११टो १२पो १४ रो १५ तो १६

न १७य १८ भ १९ ज २१ख कचे ग२३ स२४द२५ च २७७ १

नि१७यि१८भि १९जि २१खि २२ गि २३ सि २४ दि २५ चि २७ लि २

नु १७ यु १८ भु २० धजु $ खु २२ गु २३ सु२४ दु२६थचु१ नु २

फढ फ्‌झ

ने १७ये १९ भे २१जे ३२ खे २२ गे २३ से२४दे २७ चे १ ले २

नो१८यो१९भो २१जो३२खो २२ गो २३सो २४दो २७ चो १ लो २,

यहाँ नक्षत्रों के नाम अंकों में बनाये उनके चारों चरण अक्षरों में एक सा अंक

पड़ा है जैसे अ इ उ ए प्रत्येक में ३ अर्थात्‌ तीसरा कृतिका नक्षत्र सूचक अंक पड़ा है।

अभिजित का अंक ३* दिया है जिससे शतपद चक्रमें पुरे २७ नक्षत्रों के चारों चरणों

के अक्षर आ जाते हैं। अब इस चक्र के ऊपर के विना मात्रा वाले अक्षर अ, व, क,

ह, आदि यहाँ दिये क्रम से ही स्वतो भद्र चक्रमें दिये हैं जिसमें ६, १३, २० और २६

वाँ नक्षत्र पहिले वर्णन किये हुए केन्द्र के नक्षत्र हैं ।

शतपद चक्रका पृथक्‌ भी विचार होता है। नाम के अक्षर के अनुसार नक्षत्र

के चरण होते हैं। जिस नक्षत्र के चरण में शुभया क्रूर ग्रह आवे उससे वेध

विचारते हैं ।

शुभ ग्रहों के वेध से शुभ फल । पाप ग्रहों के वेध से पाप फळ । शुभाशुभ ग्रहों

के वेध से मिश्र फल होता है । यह सत्र सवंतोभब्र चक्र के विचारने से स्पष्ट

प्रकट होगा ।

इस चक्र में लत्ता र प्रकार का है ।

(१) पुरोलत्ता--यह सूर्ये, मंगल, गुद और शनि की छत्ता है इसमें नक्षत्र आदि

की गिनती क्रम से होती है जैसे अश्विनी के बाद भरणी फिर कृत्तिका आदि ।

(२) पृष्ठ छत्ता--यह शेष ग्रहों का लत्ता है अर्थात्‌ चंद्र, बुध, शुक्र, राहु, केतु की

यह लत्ता है । इसमें नक्षत्र आदि की गिनती विरुद्ध कम से होती है जैसे श्रत्रण के बाद

उल्टा गिना तो उ० षाढ़ा फिर पूर्वाषाढा फिर मूल इत्यादि ।

अन्तर विचार--

१ सूये से गिनने पर १२ वाँ नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

अ हेव

इ ३ वि

उ ३ वु

१८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२ मंगल से गिनने पर तीसरा नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

३ गुरु से गिनने पर छठा नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

४ शनि से गिनने पर आठवां नक्षत्र पुरोलत्ता है अर्थात्‌ आगे की लात (सीधी गिनती)

५ शुक्र से गिनने पर पाँचवां नक्षत्र पुष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की लात (उल्टी गिनती)

६ बुध से गिनने पर सातवां नक्षत्र पृष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की लात (उल्टी गिनती)

७ राहु से गिनने पर नवां नक्षत्र पृष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की ळात (उल्टी गिनती)

८ चंद्र से गिनने पर २२वाँ नक्षत्र पृष्ठा लत्ता है अर्थात्‌ पीछे की लात (उल्टी गिनती)

इस प्रकार गोचर के अनुसार ग्रह के नक्षत्र से जन्म नक्षत्र तक गिनने पर उपरोक्त

लत्ता तारा आ जावे तो बीमारियाँ व्यथा हो ।

१-मान छो सूर्य गोचर में मूल नक्षत्र १९ वें नक्षत्र में है इससे सीघा १२ गिना

तो १२वाँ नक्षत्र कृतिका आया । यदि जन्म नक्षत्र कृतिका हो तो बीमारी होगी ।

२-मान लो शुक्र श्रवण में है शुक्र का पृष्ठ लत्ता पाँचवां है तो श्रवण से उल्टा

गिना १ श्रवण २ उ०्षा० ४ मूल, ५ ज्येष्ठा आया यदि ज्येष्ठा अन्म नक्षत्र हो तो

बीमारी होगी इसी प्रकार सब ग्रहों का पुरोलत्ता या पृष्ठ लत्ता विचारे ।

लत्ता फल

सूर्यं लत्ता में-सब व्यापार में हानि ।

राहु केतु लत्ता में-दुःख ।

शुक्र लत्ता में-कलह ।

चन्द्र लत्ता में-बडी हानि ।

गुरु लत्ता में-मृत्यु, बन्धुद्दानि, सावेजनिक भय या अरक्षिता हो ।

बुध छत्ता में-स्थान हानि या इसी प्रकार के बुरे फल ।

जब २ या अधिक लत्ता साथ पड़े तो अनुपात से दुगुना या तिगुना बुरा फळ

सबके मेल से विचारना । त

वेघ का प्रकार |

जब ग्रह गति में वक्री हो तो उसकी दृष्टि दाहिनी ओर रहती है ।

जब ग्रह गति में सीधा हो तो उसकी दृष्टि बाइ ओर रहती है ।

जब ग्रह गति में मध्य हो तो उसकी दृष्टि सामने की ओर रहती है ।

यह विचार मंगल आदि ५ ग्रहों का है ।

राहु केतु सदा वक्री हैं उनका वेध दाहिनी ओर होगा ।

सूर्य चन्द्र सदा मार्गी हैं उनका वेध बाइं ओर होगा ।

गति में समता न होने से ग्रहों के यहाँ ३ प्रकार के वेध बताये गये हैं|

अशुभ वेध-कोई तिथि राशि या अंश या नक्षत्र पाप ग्रह से वेध हो तब उसे

शुभ कार्यों में त्याग देना ।

वेध में विवाह करने से सुखी नहीं होता । यात्रा में उन्नतिशील नहीं होगा ।

रोगी को दवा करने में अच्छा न होगा । व्यापार करने में सफलता नहीं होगी ।

सवंतोभद्र चक्र: १८१

पाप ग्रहों के वेध में जब ग्रह वक्री हो तो वहुत बुरा फल देता है यः मृत्यु देता है।

शुभ ग्रहों के वेध में जव ग्रह हो तो अच्छा फल होता है।

पाप और शुभ ग्रह जब शीघ्र में हों तो उस ग्रह का स्वभाव ग्रहण कर लेते हैं

जिसके साथ कि वे रहते हैं ।

ग्रह वेध फल

सूर्य का वेध हो तो-मनोमालिन्य हो, मन में ताप ।

भंगल का वेध हो तो-धन हानि ।

शनि का वेध हो तो-रोग से पीडित ।

राहु केतु का वेध हो तो-बाधा विघ्न हो ।

चन्द्र का वेध हो तो-मिश्र फल ( शुभाशुभ ) ।

शुक्र का वेध हो तो-स्त्री भोग, अन्य मत में शत्रु वृद्धि ।

बुध का वेध हो तो-ज्ञान वृद्धि ।

गुरु का वेध हो तो-सदा अच्छा फल । ५

वेध कारक ग्रह यदि-वक्री हो-प्रभाव दुगुना हो, उच्च में-प्रभाव तिगुना हो, गति

( मार्गी ) साधारण फल, नीच में आधा फल ।

पाप ग्रह बुरा फल देता है शुभ ग्रह अच्छा फल देता है।

परन्तु शुभ ग्रह पाप ग्रह के साथ हो तो अच्छा फल नहीं देता ।

पाप ग्रह वेध में यदि वक्री ग्रह हो तो मृत्यु फल देता है।

गति शीघ्री हो तो बीमारी शीघ्र अच्छी होती है।

पाप ग्रह का वेध अपने जन्म दिन में हो तो मानसिक पीड़ा हो मन में शांति नमिले;

१ करूर ग्रह के वेध से उद्वेग यां लड़ाई में खतरा ।

२ क्रूर ग्रह के वेध से-हानि, धन हानि ।

३ क्रूर ग्रह के वेध से-भंग या बाधा ।

४ क्रूर ग्रह के वेध से-मृत्यु ।

(१) सूर्ये गोचर में ३ राशि वृष मिथुन कके (जो पूर्व में है) वह दिशा अन्त समझी

जावेगी शेष ३ दृश्य समझी जावेगी ।

(२) स्वर अ. उ. छू. ओर बो. जो उत्तर पू में हैं इन्हें पूवं दिशा का समझना ।

स्वर आ. ऊ. लू और ओ. जो दक्षिण पूर्व में हैं उन्हें भी पूर्व दिशा का समझना ।

स्वर इ ए ओर अं जो दक्षिण पश्चिम में है उन्हें पश्चिम का समझना । स्वर ई ऋ ए

और अः जो पश्चिम-उत्तर में है उन्हें पश्चिम का समझना ।

(३) यदि विशेष दिशा में जिसमें सूयं ( ३ राशियों में ) ३ मास तक ठहुहता है

सबै नक्षत्र स्वर, राशि और तिथि उस दिशा की अस्त समझी जाती है ।

(४) जब नक्षत्र अस्त हो वहाँ वेध हो तो बीमारी भ्रम हो ।

जब व्यंजन अस्त हो वहाँ वेध हो तो-हानि ।

जब स्वर अस्त हो वहाँ वेध हो तो-शोक, व्याधि ।

१८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड ०

जब राशि अस्त हो वहाँ वेध हो तो-बाध ।

जब तिथि अस्त हो वहाँ वेध हो तो-भय उत्पन्न हो ।

जब ये पाँचों अस्त हों तो-निश्चय मृत्यु हो ।

(५) जिस दिशा की ओर जो अस्त हो-यात्रा युद्ध विवाद नया द्वार या मह

अटारी बनाना या और भी इसी प्रकार के शुभ कार्य नहीं करना ।

(६) जिसके नाम का आदि अक्षर अस्त हो तो उस समय वह अभाग्यवान्‌ हो ।

मनुष्य जिसके नाम का अक्षर अस्त है तो कविता या प्रतिरोध, किला, युद्ध आदिमें `

यदि सफलता चाहता है तो उस अस्त दिशा को त्याग देना।

(७) कोई नक्षत्र किसी उदय दिशा में हो और वेध हो तो बढ़ती हो ।

वेध यदि व्यंजन में हो तो-लाभ हो

वेध यदि स्वर में हो तो-सुख

वेध यदि राशि में हो तो-सफलता

वेध यदि तिथि में हो तो-प्रसिद्धता

यदि पाँचों का वेध हो तो स्थान सुरक्षित रहे ।

(८) जब पाप ग्रह से वेध हो और दोनों बाजू ( दाहिने और बायें बाजू ) व्यं-

जन, तिथि,स्वर, राशि और नक्षत्र से कोई समय वेध हो तो उसकी निश्चित मृत्यु हो।

जब पाप ग्रह का वेध हो और उपग्रह भी हो तो रोग या लड़ाई में मृत्यु होती है।

यहाँ उपग्रह ५ हैं इतका विचार

सूर्य स्थान से गिनने पर इस प्रकार नाम हैं

(१) सूर्य से पाचवा तारा=विदयुन्मुख जब गोचर में इनमें किसी. स्थान

(२) सूयं से आठवा तारा=शूर में ये उपग्रह हों तो कोई शुभ

(३) सूर्य से १४ वाँ तारा=्सन्तिपात कार्य नहीं करना । उस समय

(४) सूर्य से १८ वाँ तारा=केतु कोई काय करो तो वाधा होती

(५) सूर्य से २१ बाँ तारा=उल्का है।

(६) सूर्य से २२ वाँ तारा-कम्प

(७) सूर्य से २३ वाँ तारा=्वप्त्रक

(८) सूर्यं से २४ वाँ तारा=निर्घात

जन्म नक्षत्र से गिनने पर नक्षत्रों के नाम--

(१) जन्मभा, जन्मक्षे=जन्म समय जिस नक्षत्र पर चन्द्र हो ।

(२) कमं=्कमंख, कमंभ= नं० १ से १० वां नक्षत्र

(३) आधान- 5) 0007

(४) विनाश, विनाशन, वैनाशिक २३ वाँ,

(५) सामुद्रिक —- » १वाँ,,

(६) संघातिक ¬ छ» ष्वा,

(७) जाति SS 11) २७ वाँ 34

सर्वतोभद्र चक्र: १८३

(ऽ) देश -- नं० १ से २७ वाँ नक्षत्र (९) अभिषेक — _,, रष्वा, जन्म नक्षत्र का वेध इनमें से किसी में हो तो नीचे लिखा फल होगा- वेधफल

नक्षत्र या तारा जन्म तारा पापग्रह शुभ ग्रह युद्ध समय पर ग्रह वेध

नाम से संख्या वेध फल वेध फल

१ जन्मक्षं पहिला मृत्यु शुभ भय

२ कमं १० वां शोक, क्लेश शुभ असफलता

३ आधान १९ वां स्थान परिवतंन शुभ घात खून खराबी

रः बुद्धि प्रवेश ]

४ विनाश २३ वां बन्धु से कलह शुभ मृत्यु अपयश

५ सामुद्रिक १८ वां बुरा अनहोनी ;ष्ट शुभ भंग युक्त स्थिति

६ संघातिक १६ वां हानि शुभ

७ जाति २६ वां कुटुम्बनाश शुभ

८ देश २७ वां देश निकाला शुभ

९ अभिषेक २८ वां बंधन शुभ

इन नक्षत्रों में यात्रा विवाह आदि मंगल कार्य वर्जित हैं। उपग्रह में भी वेध हो

तो मृत्यु ।

बंधकारक ग्रहशुभ या अशुम हो जिस दिन वेध हो व शुभ या अशुभ समझे जायेंगे ॥

चन्द्रवेध में लगातार हो तिथि या नक्षत्र स्वर राशि और व्यंजन से किसी दिन

वेध हो तो वेधकारक ग्रह जैसा शुभ या अशुभ हो उसके अनुसार वहू दिन शुभ या

अशुभ समझा जायेगा ।

बाल युवा आदि स्वर जानता

जिस समय कोई तिथि में कोई प्रश्न हो उसका विचार करने को तिथि की भुक्त

घड़ी की संख्या को पल बनाकर ५ का भाग देवें जो शेष बचे उससे स्वर समझें ।

स्वर नाम--(१) बाळ (२) कुमार (३) युवा (४) वृद्ध (५) मृत्यु स्वर ।

फल-बाल स्वर = किंचित लाभ ) इनमें से जो स्वर जिसके पञ्चम

कुमार स्वर ८ अद्ध लाभ स्थान में हो वह स्वर मृत्यु देने वाला

युवा स्वर > सवं सिद्धि ? होता है ।

वृद्ध स्वर = हानि |

मृत्यु स्वर = क्षय ]

किसी उद्देश्य से प्रश्न पूछे तो उसके अनुसार फल कहना जैसे--

बाल स्वर युवा स्वर वृद्ध स्वर मृत्यु स्वर

लाभ विषय स्वल्प लाभ राज लाभ लाभ न हो जिस प्रयोजन का

रोग विषय चिर काल तक तत्‌ क्षण क्लेशनाश क्लेश बढे प्रश्‍न हो उस कारण

रोग

२८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

गमन विषय हानि साफल्य राया न लोटे मृत्यु हो।

रण विषय नाश शत्रु मोरने वाला भंग मृत्यु तथा भंग

100

यह चक्र बहुधा गोल बनाया जाता है परन्तु सुगमता के निमित्त यहाँ चौकोर

बनाया गया है । किसी प्रकार बनाओ परन्तु इसमें कुंडली के १२ स्थान अवश्य होने

चाहिये । इसमें सबसे नीचे भीतर पहिले लग्न कुंडली रहती है उसके ऊपर चंद्र कुंडली

पूरी रहती है और सबसे ऊपर सूर्य कुंडली रहती है जैपा यहाँ बनाया है चक्र देखने से

सब समझ में'आ जायगा।

लग्न कुंडली के अनुसार को ऊपर रखकर लग्न कुडली यहाँ भर दी गई है।

चंद्र जिस राशि पर है वह राशि ऊपर रखकर बीच में पूरी चंद्र कुंडली भर दी गई

है । सबसे ऊपर सूर्यं जिस राशि में है उसे ऊपर रखकर कुंडली रख दी गई है।

यास्तव में लग्न कुण्डली ही है जो यहाँ ३ प्रकार से एकत्र रख दी गई है जिससे कि

तीनों प्रकार की कुण्डली से एक साथ किसी भाग का विचार किया जा सके ।

इसमें विशेषता यही है कि लग्न चंद्र ओर सूर्य तीनों एक भाव में अर्थात्‌ लग्त

भाव में आ जाते हैं । इसी को इस चक्र का लग्न भाव समझकर पूरी सुदर्शन कुण्डली

का विचार ( करना ) अर्थात्‌ लग्न के आगे धन भाव फिर सहज भाव आदि क्रमशः

मानकर उनका फल विचारना ।

यदि सूर्य और चन्द्र लग्न में ही हों तो इस सुदर्शन चक्र की कुण्डली लिखने की

आवश्यकता नहीं रहेगी। सूर्य ओर चंद्र जब पृथक्‌-पृथक्‌ राशियों में लग्न से अन्य

राशि में हों तब ही इस चक्र द्वारा फल विचारने की आवश्यकता होगी ।

(१) उपरोक्त सुदर्शन चक्र की कुण्डली में लग्न भाव में सूर्य शुभ माना जाता

है अन्य भाव में पाप समझा जाता है । पाप ग्रह की उच्च या स्वराशि में हो तो अशुभ

फल नहीं देगा ।

सुदर्शन चक्र : १८४

(२) जो भाव अपने स्वामी या शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो उस भाव की वृद्धि होती है

जिस भाव में पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव की हानि होती है ।

इस प्रकार ग्रहों का शुभत्व और अशुभत्व विचार कर भावों में ग्रहों के योग और

दृष्टि के अनुसार फल विचारना ।

(३) जिस भाव में ग्रह हो उस भाव का फल उसी ग्रह के अनुसार विचारना ।

(४) जिस भाव में ग्रह न हो उस भाव पर जिस ग्रह की दृष्टि हो उसके अनुसार

फल विचारना।

(५) जिस भाव में केवल शुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव का फल शुभ

जानना ।

जिस भाव में केवल पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव का फल अशुभ

न जानना ।

जिसमें शुभ और पाप ग्रह दोनों की दृष्टि या योग हों तो मिश्र फल होगा । इसमें

भी शुभाधिक्य से शभ फल पापाधिक्य से अशुभ फल होगा ।

शुभ और पाप ग्रह दोनों बराबर हों तो उनका वल देखकर जिसका बल अधिक

हो उसका फल कहना । इसी प्रकार दृष्टि के सम्बन्ध में भी विचार करना ।

(६) जिस भाव में कोई ग्रह न हो और न किसी ग्रह की दृष्टि हो तो उस भाव

के स्वामी के अनुसार फल विचारना ।

(७) शुभत्व अशुभत्व का विशेष विचार ।

स्वाभाविक शुभ ग्रह यदि सप्त वर्ग में पाप वर्ग में पड़े तो शुभत्व नष्ट हो जाता है ।

स्वाभाविक पाप ग्रह यदि सप्त वर्ग में शुभ वर्ग में पड़े तो शुभप्रद हो जाता है ।

(८) अपनी राशि ओर शुभ ग्रह के वर्ग शुभ होते हैं । पाप ग्रह, शत्रु और नीच￾राशि के वर्ग अशुभ होते हैं।

( ९) पाप ग्रह भी अधिक शुभ व में हो तो शुभ हो जाता है क्योंकि शुभ वर्ग

में आने से उसका पापत्व नष्ट हो जाता है ।

अशुभ वर्ग में शुभ ग्रह का शुभत्व नष्ट हो जाता है। इससे उसका फल कहा है ।

(१०) इस प्रकार सप्त वर्ग में ग्रहों का वर्ग निकाल कर उनके शुभत्व पर विचार

करना और भावों के भी वर्ग निकालकर उनका भी शुभत्व अशुभत्व पर विचार करना

पश्चात्‌ सुदर्शन चक्र की स्थिति पर विचार कर फळ विचारना ।

( ११ ) सुदर्शन चक्र में राहु केतु का भी विचार होता है इससे इनका भी सप्त

बगे निकाल लेना चाहिये ।

(१२) वर्ग में ५ या अधिक वर्ग में शुभ ग्रह हो तो शुभ । ४ शुभ का वर्ग होने

से मध्यम । कम शुभ वर्ग होने से ग्रह पाप फलप्रद समझा जायेगा जैसा आगे उदा-

हरण देकर बताया है ।

१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ग्रहों का एवं भावों का सप्त वर्ग का उदाहरण सुदर्शन चक्र विचार के लिये ग्रह स्पष्ट भाग

सूर्य ११- ५-४०-४५ लग्न २-२०-११-५३ सप्तम ८-२०-११-५३ चंद्र १०- २- ७-५५ धन ३-१७-१७-५० अष्टम ९-१७-१७-५९ मंगल ७-१२-२९-४४ सहज ४-१४-२४- ६ नवम १०-१४-२४- ६

बुध १०-२०-१६-५६ चतुर्थं ५-११-३०-१३ दशम ११-११-३०-१३

गुरु ९-१३-३४- ९ पंचम ६्‌-१४-२४- ६ लाभ ०-१४-२०- ६

शुक्र ११-१३-३३-४८ षष्ठ ७-१७-१७-५९ व्यय १-१७-१७-५९

शनि ४- ८-३९-४८

राहु २- ८- ६-३२ केतु ८- ८- ६-३२ ग्रहों का सप्त गर्ग वर्ग सूयं चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु १ गृह १२ गु. ११ श. ८स्व. ११ श. १० श. १२ गु. एसू. ३ बु. ९ गु. रहोरा ४चं. शसू. ४चं. ४चं. ४चं. ४चं. ५सू. श्सू.५सू.

३ द्रेष्काण १२ गु. ११ श. १२ गु. ७ शु. र शु. ४चं. १ सू. ३ बु. ९ गु. ४ सप्तमांश ७ शु. ११ श. ४चं. २३ बु. ७ शु. ९ गु. ६ वु. ४च १०श.

५ नवमांश ५ सु. ७ शु. ७शु. १ मं. र शु. ८मं. ३ बु. ९ गु, ३ बु.

६ द्वादशाँश २ शु. ११ श. १२ गु. ७ शु. ३ वु, ५ सू. ८ मं. १ सू. ११श￾७ त्रिशाँश ६३ बु. १ सं. १२ गु. ३ बु. १२ गु. १२ गु. ११ श. ११ श. ११श.

शुभप्रद पाप शुभ शुभ शुभ शुभ पाप मध्यम पाप यहाँ वर्ग में चंद्र में पाप का वर्ग अधिक होने से पाप फल । इसी प्रकार शनि व केतु में भी पाप वर्ग अधिक होने से पाप फलप्रद हुआ । राहु में ४ शुभ वर्ग होने से . मध्यम इतर में शुभ वर्ग अधिक होने से शुभ हुए ।

भाग का सप्त गर्ग--(यहाँ ग्रह के स्थान में उस भाव की राशि और भावेश लिखना )

वर्गे लग्न धन तृतीय चतुर्थ पंचम षष्ठ सप्तम अष्टम नवम दशम आय व्यय

MR २ - उ... ७ SAE EN 11. ५१९२ १ गृह ३वु. ४चं. ५सूः इवु. ७शू. ममं. ९गु. १०श. ११श. १२गु. १मं. रशु. रहोरा एसू. ५सू. ४चं. डच. ५सू. ५सू. ४चं. सू. शसू. अचं. ५मू, ५सू- ३२ ७सू. पमं. ९गु. १०श. ११श. १२गु. सू, रशु. बु. ४चं. ५सू- ६बु. सप्त, शसू. रशु. ऽमं. रशु. १०श. ६बु. १मं. ८मं रसू. ८मं. ४चं. १२गुः शचव० १०सु. ९गु. शसू. १मं. ११श. ९गु. ७शु. ३बु. ११श. ७शु. ५सू. ३बु. ६द्वाद० ७ऽशु, १०श, ११श. १०श. १२गु. रेश. ५सू. ४चं. ४चं. ४चं. इवु. पम. ७त्रिशांश ९गु. १रगु. ९गु. ६बु. ९गु. १२गु. उबु. १२गु. ९गु. ६बृ. ९गु. १२गु-

सुदर्शन चक्र : १८७

सुदर्शन कुण्डली चक्र के अनुसार भाव फल विचार 2

१--लनन में ५ ग्रह सू० शु० चं० बु० ओर राहु हैं । इतमें सप्तवर्ग में शुभ वर्गंकी

अधिकता से शुभ है । शुक्र बुध भी शुभ वर्ग की अधिकता-से शुभ हैं। चंद्र पाप वर्ग

अधिक होने से पाप और राहु मध्यम है । शुभ ग्रह की अधिकता है इससे शरीर सुख

उत्तम रहेगा । शील आदि भी उत्तम रहेगा । लग्न में भी ४ शुभ वर्ग है सूर्य में भी

वर्ग के अनुसार शुभता आ जाने से २ वर्ग में शुभ हुआ केवल एक शनि पाप फलप्रद

` है। इससे लग्न में भी शुभ वर्ग की अधिकता से शुभ गुण आदि होंगे । '

२--धन भाव में केवळ सूर्य और शुक्र हैं । वर्ग के अनुसार ये दोनों ग्रह शुभप्रद

हैं इससे धनवान्‌ होगा । घन भाव में वर्ग में ३ शुभ ग्रह हैं २ शुभप्रद ओर २ पाप फल

प्रद ग्रह हैं। शुभता अधिक होने से सन्माग से धन का संग्रह होगा । शुभ ग्रह गुरु की

दृष्टि होने से भी घन भाव सम्वन्धी शुभ फल होगा ।

३-- सहज भाव-में केवल शनि है जो पाप ग्रह भी है और पाप फलप्रद है क्योंकि

वर्ग में पाप का वर्ग अधिक है भाव में २ शुभ वर्ग २ पापप्रद, ३ शूभप्रद वर्ग हैं। भाव

में शुभता अधिक है । इसमें स्वस्थानी मंगल की दृष्टि है जो वर्ग में शुभप्रद है । इससे

इस भाव सम्बन्धी .फल मध्यम रहेगा ।

३---चतुर्थ भाव-केवल राहु मध्यम फलप्रद या उदासीन ग्रह है । इसमें ४ शुभ ग्रह

का वर्ग है। १ स्थान में शुभप्रद मंगल है। २ स्थानों में शनि पापफल प्रद है। इस

कारण साधारण सुख, मातुसुख, वाहन सुख आदि रहेगा ।

५--पंचम में-केवळ राहु मध्यम फलप्रद है । इस भाव में ३ शुभ वर्ग, १ स्यान

में शुभ सूर्य की २ स्थानों में शनि पापप्रद का वर्ग है । इससे इस भाव सम्बन्धी विद्या

सन्तान आदि का सुख साधारण रहेगा ।

५--रिपुभाव-शनि और मंगल । वर्ण में मंगल शुभप्रद है । शनि पापप्रद है। इस

भाव में ५ शुभ ग्रह के वर्ग हैं। शेष सूर्यं ओर मंगल भी शुभप्रद हैं। इसलिए शत्रु

और रोगभय नाममात्र को रहेगा । शत्रु और रोग होने पर इनपर विजय होगी ।

७--जाया भाव-इसमें केतु और शनि दोनों पापग्रह हैं ओरं वग में पाप फलप्रद

होने से स्त्रीसुख का अभाव रहेगा । भाव में ४ शुभ ग्रह का वर्ग है । २ स्थानों में सूर्य

१ में मंगळ का वर्ग है जो शुभप्रद है। इससे अल्प स्त्रीसुख भी होगा ।

८--मृत्यु भाव-में केवळ गुरु शुभ फलश्रद है। अष्टम भाव में ४ शुभ ग्रह का वगं

है १ वर्ग सूयं का शुभप्रद, १ मंगळ का शुभप्रद है और १ शनि का पापप्रद है | शुभ

की अधिकता होने से जीवन में सफलता हो आयु पूर्णायु के लगभग हो ।

९--धर्म भाव-इसमें चन्द्र बुध और मंगल ग्रह हैं । चन्द्र पाप फलप्रद है शेष बुध

और मंगल शुभप्रद हैं । इस भाव में ४ शुभ ग्रह का वर्ग है २ वर्ग शनि के पापप्रद १

` सूये का शुभप्रद है । शुभ की अधिकता होने से धर्मशील हो, यात्रा में सफलता मिले ॥:

१८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१०--कमे भाव-इसमें ४ ग्रह सूर्य शुक्र मंगल केतु हैँ । केवळ केतु पाप फलप्रद है

शेष ग्रह शुभप्रद हैं । भाव में भी ६ शुभ ग्रह के वर्ग हैं १ मंगळ शुभप्रद है। भाव में

शुभता अधिक है । इससे पितृसुख राजसम्मान आदि अच्छा रहेगा ।

११--लाभ भाव में-गुर ओर केतु हैं । केतु पापप्रद है । गुरु शुभप्रद है । भाव में

३ शुभ ग्रह के वर्ग हैं सूर्यं के १ मंगल का वर्ग है जो शुभप्रद हैं। इससे छाभ अधिक

और नीति पूर्वक हो ।

१२--व्यय भाव में-गुरु चन्द्र बुध हैं । यद्यपि तीनों शुभ ग्रह हैं परन्तु चंद्र पाप

फलप्रद है । भाव में ५ शुभ ग्रह का वर्ग १ सूर्य का १ मंगल का वर्ग है दोनों शुभ प्रद

हैं । इससे आय से खर्च कम ओर शुभ कार्यों में खर्चे होगा ।

सुदर्शन चक्र दशा का उदाहरण

राशिलग्न ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १

एऐं TO NO १०१ १ ५

मास ० २० ० ० ० ० ° ० ० ०

सम्वत्‌ १९४७४८ ४९ ५० ५१ ५२ ५३ ५४ ५५ ५६ ५७ १९५८

सूर्यं राशि ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११

अंश (0 CU 05 FU Cl SI Ut ON TR

कला ४० Yo ४० ४० Yo Yo Yo Yo ४० ४० ४० ४०

१ र

१ १

० ०

प्रथम वर्ष की अन्तदेशा

राशि ३0४0 ४00 ७ ८! 7९- १० ११" १२

मास १ पे अप १ “१ १ १ १ १ १

दिन ० ० ० ° ° ० ° ० ° ०

सम्वत्‌ १९४६ १९४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ ४७ १९४७

सूर्य राशि ० १२ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११

अश 4 ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ षु

कला Yo . ४० ४० २० ४० ४० ४० ४० ४० ४० ४० ४०

प्रथम प्ररयंतर्देशा

राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १ २

दिन २ २ २ २ र र रे २ २ २२२

घडी ३० ३० २० ३० ३० ३० ३० २० ३० ३० २० २०

सूयं राशि ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ ११ COMO

'अ० ८ १० १३ १५ १८ २० २३ २५ २८ ० ३%

क्‌० १० ४० १० ४० १० ४० १० ४० १० ४० १० ४०

लग्न कुण्डली का लग्न है उसकी दशा १ वर्ष रहेगी । इसी प्रकार प्रत्येक भावकी

~ लक बार TP? नमक SIN

कोंटचक्र : १८९

दशा एक-एक वर्ष रहेमी । इसी प्रकार कुण्डली के पूरे १२ भाव में पूरे १२ वर्ष दशा

भोग करेगी इसके पश्चात्‌ फिर लग्न आदि भाव को दशा आरम्भ हो जाती है अर्थात्‌

१३ वें वर्ष फिर लग्न दशा भा जाती है । यदि किसी की आयु १२० वर्ष की हो तो

इस दशा की १० आवृत्ति हो जायेंगी । १ दशा १ वर्ष रहती है इसकी अन्तर्देशा १-१

मास की होती है । १२ भाव में पूरे १ वर्ष अन्तर्दशा के हो जाते हैं और प्रत्यन्तर्दशा

केवल २॥ दिन की होती है १२ भाव में पूरे ३० दिन (१ मास ) हो जाते हैं । यहाँ

चक्र देखने से स्पष्ट समझ में आ जायगा ।

इसके पश्चात्‌ इसी प्रकार और वर्ष मासादि जोड़कर आगे की दशा या अन्तदंशा

आदि निकाल लेनी चाहिए ।

सुदर्शन चक्र व दिशा का फल विचार

१--जिस भाव व दिशा हो उस भाव का लग्न मानकर उससे तनु घन सहज आदि

१२ भाव क्रम से विचार कर उससे सम्पूर्ण १२ भाव का फल विचारना ।

२--दंशा आरंभ कालिक लग्न से केन्द्र, कोण ओर ८ भाव में शुभ ग्रह हो तो

वह दशा शुभ समझना ।

३--जिस भाव में केवल राहु या केतु हो उस भाव की हानि। ४--जिस भाव में अधिक पाप ग्रह हों उस भाव की हानि ।

५--१२,६ भाव से दूसरे स्थानों में शुभ ग्रह हो तो उस भाव का फल शुभ ४

यदि १२,६ भाव में शुभ ग्रह हो तो उस वर्ष आदि में रोग शत्रु आदि की वृद्धि हो।

६--यदि ३-६-११ भाव में पाप ग्रह हो तो इनका फल शुभ अन्य भाव में पाप

ग्रह हो तो उस भाव की हानि होती है ।

७--इसमें अष्टकवग के अनुसार भी फल विचारना । दोनों प्रकार से शुभ या

अशुभ आवे तो पूर्ण रूप से शुभ या अशुभ फल कहना । इस प्रकार से शुभ दूसरे

प्रकार से अशुभ आवे तो उनके बल का विचार कर फल कहना जिससे फल की

अधिकता हो वह फल कहना ।

कोट चक्र-युद्ध या रोगादि फल जानने को