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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फित खण्ड

(१) जन्म नक्षत्र का स्वामी कोटेश है । (२) कचट आदि वर्ग का स्वामी जन्म

नक्षत्र या नाम के अनुसार वर्गेश होता है । वर्गश-कोटपाल है ।

अ वर्ग का स्वामी-सुर्ये, क वर्ग का स्वामी=मंगळ, च वर्ग का स्वामी: शुक्र,

ट वर्ग का स्वामी=बुध, त वर्ग का स्वामी=गुरु, प वर्ग का स्वामी-शनि,

य रल व का स्वामी=चंद्र, श स से क्ष तकस्चन्द्र ।

जैसे किसी का नाम आकार से है तो अ वर्ग हुआ जिसका स्वामी सूर्य है इससे

कोटपाल सूर्य हुआ ।

अ कृत्तिका नक्षत्र का पहिला चरण है मेष राशि है। मेष राशि का स्वामी मंगल

है इससे कोटेश मंगल हुआ है |

पचांग में गोचर के ग्रह देखना किस-किस नक्षत्र में है । यहाँ कोट चक्र में दिये

नक्षत्रों में जो ग्रह जिस नक्षत्र में हो वहाँ स्थापित करे ।

युद्ध में कोट ( किला ) भंग होगा या रोग अच्छा होगा या नहीं आदि का

“विचार होता है ।

फल विचार--जब कोटेश कोट के मध्य में हो तथा कोटपाल बाहर हो तो कोट

को भय नहीं होता । इसके विपरीत हो तो विघ्न होता है।

दुर्ग के मध्य में सूर्यं हो--जल या शेष हो ।

दुर्गे के मध्य में चन्द्र हो=भँग सूर्यं शनि मंगल राहु केतु } दुगे भंग हो

-दुगे के मध्य में मंगल हो-दाह सब दुर्ग के मध्य में

दुगे के मध्य में बुध हो-राजा युद्ध युक्त हो गुरु वुध शुक्रचन्द्र वे | इन्द्रसे भी वह

दुर्ग के मध्य में गुरु हो=बहुत सुभिक्ष हो चारों दुगं के मध्य में } दुर्ग न गिरे

और राजा का चित्त चलायमान हो ।

दुर्गे के मध्य में शनि हो=भेद भग हो

दुर्गे के मध्य में राहु केतु=राजा विष में जल जावे ।

सूर्य कालानल चक्र

Me ia २८ २७ कृ, भर» अधिव्सी शवनी उ

जहाँ एक अश्‍विनी लिखा है वह त्रिशूल का दण्ड मूल है । यहाँ अश्विनी यत

सूयंकालानल चक्र : १९१

लिखना गोचर में सूर्य जिस नक्षत्र में है वह नक्षत्र यहाँ लिखना । इस प्रकार अभिजित सहित २८ नक्षत्रों के नाम आगे क्रमानुसार लिख देना यहाँ बताये हुए बाई ओर से क्रमशः लिखना। अपने नाम का नक्षत्र जहाँ हो वहाँ लिख देना इससे रोग विवाद, युद्ध, यात्रा आदि में इससे विचार होता है ।

फल

१--नीचे (त्रिशूल वाली रेखा के नीचे) के नक्षत्रों में अपना जन्म नक्षत्र पड़े तो

क्रम से १-चिन्ता २-वध ३-सव कार्यों में रकावट हो ।

२--दोनों श्व्‌ग में-रोग और भय ।

३--त्रिशुल में मृत्यु ।

४--शेष नक्षत्रों में-जय लाभ अभीष्ट सिद्धि हो :

४--जन्म राशि से ग्रहों के वेध का इस प्रकार फल होगा

सूर्य के वेध से-मन को ताप गुरु के वेध से-धन लाभ ।

मंगल के वेध से-द्रव्य हानि शुक्र के वेध से-रत्न लाभ ।

शनि के वेध से-रोग जन्य पीड़ा चन्द्र के वेध से-स्त्री लाभ ।

राहु केतु.के वेध से-मृत्यु बुध के वेध से-सुख ।

'डिभ चक्र या सूर्य नराकार चक्र--

सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसे सिर पर स्थापित कर वहाँ से जन्म नक्षत्र तक गिनने

में जिस अंग पर जन्म नक्षत्र पड़े उससे निम्नलिखित फल का विचार करे ।

नक्षत्र संख्या अंग फल

३--सिर-श्रेष्ठ रत्न, सोना, सुन्दर वस्त्र, भोजन, राज्य सुख प्राप्त ।

४--मुख-मिष्ट भोजन, शैया आदि आसनों का भोगी व बोलने वाला, हंसता

मुख सदा प्रसन्न चित्त ।

१--दाहिना कंधा-व्ंश में भूषण समान, बड़े उत्सव युक्त, अति उदार, बड़ा

शूर वीर ।

१---बायाँ कंधा-अग्रणी, हाथी पर चढ़ने वाला ।

२--दाहिनी बाँह-अपने देश को त्यागे, बड़ा अभिमानी, वीरता युक्त परदेश में

रहकर ।

१--बाई' बाँह-बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, स्थान भ्रष्ट ।

१--दाहिना हाथ-उदार, श्रेष्ठ गुणरहित,व्यापार में .रत्नों की परीक्षा करनेवाला ।

पृ--बायाँ हाथ-सच और झूठ सहित चोर हो ।

५--हृदय में-स्व कुटम्ब में राजा के समान श्रेष्ठ शील वाला, शास्त्र में प्रवीण

विशाल श्रेष्ठ यज्ञस्वी व समर्थ ।

१--नाभि-दयालु, युद्ध में डरपोक, शास्त्र में प्रवीण, धर्म में वृत्ति, निरन्तर

उदार अनेक कला जानने वाला, थोड़े में संतोष ।

१--मुंह्मय-बड़ा कामी, साधु कर्मो से हीन, गीत और नृत्य में प्रेम, कलाओं को जानने

वाला, बड़ा यश वाला ।

१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(१) जन्म नक्षत्र का स्वामी कोटेश है । (२) कचट आदि वगं का स्वामी जन्म

नक्षत्र या नाम के अनुसार वर्गेश होता है । वर्गश-कोटपाल है ।

अ वर्ग का स्वामी=सू्ये, क वगे का स्वामी=मंगल, च वर्ग का स्वामी- शुक्र,

ट वर्ग का स्वामीस्बुध, त वर्ग का स्वामी=गुरु, प वर्ग का स्वामीच्शनि,

य र र व का स्वामी=चंद्र, श स से क्ष तक-चन्द्र ।

जैसे किसी का नाम आकार से है तो अ वर्ग हुआ जिसका स्वामी सूर्य है इससे

कोटपाल सूर्य हुआ ।

अ कृत्तिका नक्षत्र का पहिला चरण है मेष राशि है। मेष राशि का स्वामी मंगल

है इससे कोटेश मंगल हुमा है ।

पचांग में गोचर के ग्रह देखना किस-किस नक्षत्र में है । यहाँ कोट चक्र में दिये

नक्षत्रों में जो ग्रह जिस नक्षत्र में हो वहाँ स्थापित करें।

युद्ध में कोट ( किला ) संग होगा या रोग अच्छा होगा या नहीं आदि का

“बिचार होता है ।

फल विचार--जव कोटेश कोट के मध्य में हो तथा कोटपाल बाहर हो तो कोट

को भय नहीं होता । इसके विपरीत हो तो विघ्न होता है।

` दुर्गे के मध्य में सूयं हो--जल या शेष हो ।

दुर्गे के मध्य में चन्द्र हो=भँग सुर्यं शनि मंगल राहु केतु] दुगं भंग हो

दुर्ग के मध्य में मंगल हो=्दाह सब दुर्ग के मध्य में }

दुगे के मध्य में बुध हो=राजा युद्ध युक्त हो गुरु वुध शुक्रचन्द्र वे ) इन्द्रसे भी वह

दुर्ग के मध्य में गुर हो=बहुत सुभिक्षहो चारों दुगं के मध्य में | दुर्ग न गिरे

और राजा का चित्त चलायमान हो ।

दुर्ग के भध्य में शनि हो=भेद भग हो

दुर्गे के मध्य में राहु केतु-राजा विष में जल जावे ।

सुर्यं कालानल चक्र

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जहाँ एक अश्विती लिखा है वह त्रिशूल का दण्ड मूल है । यहाँ अश्विनी मत

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सुयंकालानल चक्र : १९१

'लिखना गोचर में सूयं जिस नक्षत्र में है वह नक्षत्र यहाँ लिखना । इस प्रकार अभिजित सहित २८ नक्षत्रों के नाम आगे क्रमानुसार लिख देना यहाँ बताये हुए बाई ओर से क्रमशः लिखना । अपने नाम का नक्षत्र जहाँ हो वहाँ लिख देना इससे रोग विवाद, युद्ध, यात्रा आदि में इससे विचार होता है।

फल

१--नीचे (त्रिशूल वाली रेखा के नीचे) के नक्षत्रों में अपना जन्म नक्षत्र पड़े तो क्रम से १-चिन्ता २-वध ३-सब कार्यों में रुकावट हो ।

२--दोनों श्युग में-रोग और भय ।

३--त्रिशूल में मृत्यु ।

४--शेष नक्षत्रों में-जय लाभ अभीष्ट सिद्धि हो :

५--जन्म राशि से ग्रहों के वेध का इस प्रकार फल होगा

सूर्य के वेध से-मन को ताप गुरु के वेध से-धन लाभ।

मंगल के वेध से-द्रव्य हानि शुक्र के वेध से-रत्न लाभ ।

शनि के वेध से-रोग जन्य पीड़ा चन्द्र के वेध से-स्त्री लाभ।

राहु केतु के वेध से-मृत्यु बुध के वेध से-सुख ।

'डिभ चक्र या सूर्य नराकार चक्र--

सूर्यं जिस नक्षत्र में हो उसे सिर पर स्थापित कर वहाँ से जन्म नक्षत्र तक गिनने

में जिस अंग पर जन्म नक्षत्र पड़े उससे निम्नलिखित फल का विचार करे ।

नक्षत्र संख्या अंग फल

३--सिर-श्रेष्ठ रत्न, सोना, सुन्दर वस्त्र, भोजन, राज्य सुख प्राप्त ।

४--मुख-मिष्ट भोजन, शैया आदि आसनों का भोगी व बोलने वाला, हंसता मुख सदा प्रसन्न चित्त।

1--दाहिना कंधा-त्रंश में भूषण समान, बड़े उत्सव युक्त, अति उदार, बड़ा "शर वीर ।

१--बायाँ कंधा-अग्रणी, हाथी पर चढ़ने वाळा ।

२-दाहिनी बाँह-अपने देश को त्यागे, वड़ा अभिमानी, वीरता युक्त परदेश में रहकर ।

१--बाई बाँह-बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, स्थान भ्रष्ट ।

१--दाहिना हाथ-उदार, श्रेष्ठ गुणरहित,व्यापार में रत्नों की परीक्षा करनेवाला ।

१--बायां हाथ-सच और झूठ सहित चोर हो ।

५--हृदय में-स्व कुटम्ब में राजा के समान श्रेष्ठ शील वाला, शास्त्र में प्रवीण विशाल श्रेष्ठ यज्ञस्वी व समर्थ ।

१--वाभि-दयालू, युद्ध में डरपोक, शास्त्र में प्रवीण, धमं में वृत्ति, निरन्तर

उदार अनेक कला जानने वाळा, थोड़े में संतोप ।

६--गुह्य-वडडा कामी, साधु कर्मो से हीन, गीत और नृत्य में प्रेम, फलाओं को जानने चाला, बड़ा यश वाळा ।

१९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२--जानु-अनेक देश में अनेक तरह का प्रचार करने वाला, कार्य में उत्साही,

चञ्चल, दुर्बल देह, धूतं, सत्यहीन, दुःखी । 9

३--दाहिना पैर-खेती की क्रिया में कुशळ, थोड़ा कमं करने वाला, शत्रु रहित ।

३--बाँयाँ पैर-सेवा का काम करने वाला, अल्पात्रु, निर्धन ।

योग २७--मतांतर-कोई जानु में ६ नक्षत्र और पैर में केवल २ ही नक्षत्र लेते

हैं । परन्तु बहुमत उपरोक्त ही है।

` » जन्म नक्षत्र अनुसार आयु विचार--

३--नक्षत्र मस्तक में-आयु१०० वर्ष । ३-नक्षत्र मुख में-आयु ८० वर्ष । २-नक्ष त्र

कंधों में-आयु ७७ वर्ष, २-नक्षत्र दोनों भु जा, २-नक्षत्र दोनों हाथ-५ नत्रक्ष हृदय में

आयु ६८ वर्ष । १-नक्षत्र नाभि-आयु ६८ । १-नक्षत्र गुह्य-आयु ६० वर्ण । २-नक्षत्र

दोनों जानु--आयु ८ वर्ष । ६--नक्षत्र दोनों पाँव--आयु ६ वर्ण । स्त्री डिभाख्य चक्र--

यह विशेषकर स्त्रियों के लिए है ।

सूयं जिस नक्षत्र पर हो उससे जन्म नक्षत्र गिनने में जहाँ पड़े उसका फल ।

नक्षत्र अंग फल

३“ मस्तक- संताप

७-- मुख “ मिष्ठान्न देने वाला

८-- स्तन ---काम का देने वाला

३-- हृदय --पति को सुख देवे ०

३--- गुह्य --कोमता सदा ही पूर्ण करे

चन्द्र कालानल चक्र

१६ १२ १४ यह गोलाकार भी बनाया जाता है । इस चक्र में सबसे ऊपर जहाँ १ लिखा है यहाँ गोचर के अनुसार वर्तमान दिन नक्षत्र अर्थात्‌ चन्द्र नक्षत्र 'लिखे वहाँ से यहाँ बताये

ककल ७

पुरुषाकार चक्र : १९३

क्रमानुसार सब नक्षत्र इस चक्र में बताये अनुसार लिख-देखेँ। जिस नक्षत्र पर अन्य

नक्षत्र हो वहाँ लिख देवें फिर फल विचारे ।

इससे भी युद्ध के समय यात्रा आदि में फल विचारते है ।

जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल

यदि त्रिशूल पर जन्म नक्षत्र पड़े - मृत्यु हो ।

यदि बाहर के ८ नक्षत्रों में पड़े--मध्यम फल ।

यदि भीतर के ८ नक्षत्रों में पडे-निःसंदेह जय लाभ हो आयु बढ़े आदि शुभ फल हो। -

सूर्य कालानल चक्र में जो ग्रहों के वेध का फल बताया है उसी प्रकार चन्द्र-काला-

नल चन्द्र से भी विचारे ।

ग्रहों का पुरुषाकार चक्र .

प्रत्येक ग्रहों के पुरुषाकार चक्र से फल का विचार होता है उस ग्रह के नक्षत्र से

जन्म नक्षत्र के फल का विचार होता है।

१--चन्द्र पुरुषाकार चक्र--३ नक्षत्र मस्तक-धन प्राप्ति । ३ नक्षत्र मुख-पूणं

लक्ष्मी । ६ भुजा-कुशल । ३ हृदय-कल्याण । ३ पेट-मागं में मृत्यु । ३ गुदा-लक्षमी ॥

६ पाँव-श्रेय प्राप्त ।

( गोचर में चन्द्र जहां हो उससे गिनकर जन्म नक्षत्र जहाँ पड उसके अनुसार

क्रशमः फल ) जन्म नक्षत्र से वर्तमान चन्द्र नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आवे उसके:

अनुसार फल-६ नक्षत्र मुख में-हानि । ६ नक्षत्र पीठ में-धन लाभ । ६ नक्षत्र हाथ में

राजा से भय। ३ नक्षत्र गुह्य मे-राजाओं से मान । ३ नक्षत्र चरण में-स्यान से भ्रष्ट ॥

३ नक्षत्र कण्ठ में-सव सुख प्राप्त ।

२- मंगल का पुरुषाकार चक्र--गोचर में मंगल जहाँ हो उससे आरम्भ कर

जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल-३ नक्षत्र-मस्तक-राज्य । ३ नक्षत्र-मुख-रोग । ३

नक्षत्र-नेत्र-सुख । २ नक्षत्र-कण्ठ-रोग । ४ नक्षत्र-हाथ-रोग। ५ नक्षत्र पेट-धन ।

३ नक्षत्र-गुदा -भ्र मयुक्त । ४ नक्ष त्र-पांव-भ्रम युक्त ।

३--बुघ का पुरुषाकार चक्र (जहाँ गोचर में बुध हो उससे जन्म नक्षत्र तक

संख्या अनुसार फल) ४ नक्षत्र सिर में--राज्य । नक्षत्र मुख में-वांछित भोजन ।

४ नक्षत्र चायाँ हाथ-कष्ट। ४ नक्षत्र दाहिना-सुख। ६ नर'त्र हृदय-सुख । ४ नक्षत्र

गुदा-रोगी । २ नक्षत्र पेर-मन में भ्रम ।

४--गुह का पुरुषाकार चक्र

जिस नक्षत्र पर गुरु गोचर में हो उससे जन्म नक्ष त्र तक गिनने में जो संख्या हो .

उसका फल ।

४ नक्षत्र सिर में--राज्य । ४ नक्षत्र. कंघा में-लक्ष्मी प्राप्ति । १ नक्षत्र कठ में-

विभूति प्राप्त । श्नक्षत्र हृदयःप्रीति छाभ । धुनक्षत्र पांव-मीड़ा । ४ नक्षत्र यायां हाथ￾मृत्यु । ३ नक्षत्र दोनों नेत्र-राजा सम सुख ।

१३

१९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

क का पुरुषाकार चक्र *

वा नक्षत्र पर शुक्र हो उससे जन्मनक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आये उसका

फल । ४ नक्षत्र सिर में-राज्य । ५ नक्षत्र कंठ में-धन छाभ। ५ नक्षत्र हृदय में-सुख ।

३ नक्षत्र गुदा में-शत्रुभय । ५ नक्षत्र जांघ में--मिष्ट भोजन । ३ नक्षत्र दाहिने पाँव

में-सुख । २ नक्षत्र वायां पाँव में-सुख ।

६--राहु का पुरुषाकार चक्र

जिस नक्षत्र पर राहु गोचर में हो उससे गिंनने पर जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका

फल । ७ नक्षत्र पांव में-धन हानि । ५ नक्षत्र दाहिनी भुजा में-संताप । ३ नक्षत्र सिर

में-शत्रभय । २ नक्षत्र हृदय में-दुजेन से स्नेह । १ नक्षत्र मुख में-दुजन संहार ।

५ नक्षत्र बायाँ हाथ में मृत्यु । १ नक्षत्र नाभि में-सवेनाश । २ नक्षत्र गुदा में--

प्राणनाश । ७--केतु पुरुषाकार चक्र है.

गोचर में केतु जिस नक्षत्र में हो वहां से शिनने पर जन्म नक्षत्र जहां पड़े उसका

फल | ४ नक्षत्र सिर में-जय । २ नक्षत्र मुख में>भय । ५ नक्षत्र कान में-भय ।

२ नक्षत्र हृदय में-शोक । ४ नक्षत्र हाथ-सुख । ५ नक्षत्र पांव में सुख । ४ नक्षत्र वस्ति

में भ्रम, दुःख विकार ।

स--शनि पुरुषाकार चक्र न

जिस नक्षत्र पर शनि हो उससे गिनने पर जन्म नक्षत्र जहाँ पड़े उसका फल-जेसे

श्रवण पर शनि है जन्म शतभिषा नक्षत्र का है तीसरा हुआ दक्षिण भुजा पर आया

फल जय है-१ नक्षत्र मुख में-हानि । ४ नक्षत्र दक्षिण भुज-जय । ६ नक्षत्र चरण में

भ्रम । ५ नक्षत्र हृदय में-श्रीप्राप्ति । ४ नक्षत्र वामकर में-भ य । ३ नक्षत्र शीर्ष में-

राज्य । २ नक्षत्र नेत्र मे-सोख्य । २ नक्षत्र गुह्य में-मृत्यु भय ।

जन्म नक्षत्र से शनि नक्षत्र तक गिनने में जो आवे उसका फल--१ नक्षत्र सिर

में-फल रोग । ३ नक्षत्र मुख में-छाभ । २ नक्षत्र गुह्य में-हानि । २ नक्षत्र नेत्र में--

रूाभ। ५ नक्षत्र हृदय में-सोख्य । ४ नक्षत्र वाम हस्त में-वंधन । ३ नक्षत्र वाम पद में

दुःख, पीड़ा । ३ नक्षत्र दक्षिणपद में-इष्ट यात्रा । ४ नक्षत्र दक्षिण हस्त-अथे लाभ!

चक्रो शनि का पुरुषाकार चक्र -

यदि शनि वक्री हो तो शनि जहाँ हो वहाँ से जन्म नक्षत्र तक गिनके यहां विरुद्ध

क्रम से गिनने से जो आये उत समय फन्न जानना-१ नक्षत्र सिर में-अति पीड़ा । ४

नक्षत्र दाहिने हाथ मॅ-लक्ष्मी और यश प्राप्त । ६ नक्षत्र दोनों पैरों में-निष्फलता । ४

नक्षत्र वाम हस्त मे-युद्ध में शरीर में संशय ।५ नक्षत्र पेट मे-द्रव्य । ३ नक्षत्र मस्तक

में-राज्य सौर्य । २ नक्षत्रनेत्र मे-परम सोख्य । २ नक्षत्र गुह्य में-अल् मृत्यु ।

यहाँ पहिले सिर या १ मुख, २ गुह्य, २ नेत्र, ३ मस्तक, ५ पेट, ४ बायांहाय

« ६ दोनों पर, ४ दाहिना हाथ इस प्रकार विरुद्ध क्रम से नक्षत्रों की गिनती कर जन्म

नक्षत्र जहाँ पडे उसका फल जानना ।

गजादि चक्र : १९५

अन्यमत से वक्रो शनि का पुरुषाकार चक्र

जिस नक्षत्र पर वक्री शनि हो उस नक्षत्र से जन्म तक का फल विलोम (उल्टो

क्रम से विचारना ४ नक्षत्र दाहिना हाथ फल-रोग । ६ नक्षत्र पैर-छाभ। ४ नक्षत्र

चाँया हाथ-द्रव्य लाभ । ५ नक्षत्र पैर-बन्धन । ३ नक्षत्र मस्तक-पूजा । २ नक्षत्र नेत्र￾जन सौख्य । ३ नक्षत्र गुदा-अल्प मृत्यु ।

गज चक्र

यात्रा और युद्ध में जय का विचार इससे होता है । अभिजित सहित २८ नक्षत्र

हाथी का चित्र बनाकर क्रमानुसार लिखना। पहिले मुख से लेकर निम्न क्रम से नक्षत्र

{लखे और उसके अनुसार फल विचारे---

२ नक्षत्र मुख में = युद्ध में विजय

२ नक्षत्र सूंड के अग्र भाग में = युद्ध में विजय

२ नक्षत्र नेत्रों में = युद्ध में विजय

२ नक्षत्र कर्णो में = वली हो तब भी मृत्यु या भंग हो

२ नक्षत्र सिर में = जीत

८ नक्षत्र पाँच में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग

२ नक्षत्र पूँछ में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग

४ नक्षत्र पीठ में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग

४ नक्षात्र पेट में = युद्ध में जीत

यहाँ बताये अशुभ अङ्ग में यदि शनि हो तो युद्ध, राज्याभिषेक आदि सवथा

वर्जित है ।

अश्व चक्र

यात्रा, युद्ध, राजतिळक आदि में इसका विचार होता है ।

घोड़े का चित्र बनाकर अभिजित सहित २८ नक्षत्र उसके मुख से लेकर नीचे

बताये क्रम से लिखे फिर उसके फल का विचार करे ।

२ नक्षत्र मुख = शत्रु हार कर वश हो जावे

२ नक्षत्र नेत्र ८ शत्रु हार कर वश हो जावे

२ नक्षत्र काना = शत्रु हार कर वश हो जावे

२ नक्षत्र सिर = शत्रु हार कर वश में हो जावे

२ नक्षत्र पूंछ = विभ्रम, भंग और हानि

८ नक्षत्र पाँव = विश्वम, भंग और हानि

५ नक्षत्र पेट = विश्रग, भंग और हानि

५ नक्षत्र पीठ = विभ्रम, भंग और हानि

जिस नक्षत्र में शनि हो उसके अनुसार फळ का विचार करे ।

यमदंष्ट्रा चक्र

यह काळ चक्र सर्पाकार होता है वतमान दिन नक्षत्र से अर्थात्‌ गोचर फे चन्द्र

१९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

नक्षत्र से लेकर जन्म नक्षत्र तक गिन कर विचार करना । जहाँ जन्म नक्षत्र पड़े उसके

अनुसार फल विचारना ।

ज्वर आने पर, सपं आदि विष युक्त जीवों के काटने पर, विवाद, विग्रह और रण

में इस चक्र में शुभाशुभ का विचार होता है ।

इसमें ९ नक्षत्र ऊपर, ९ नक्षत्र तिरछे, ९ नक्षात्र नीचे सर्पाकार लिखना । इसमें

मध्य के अर्थात्‌ बीच में आरम्भ के ३ नक्षत्र कालमुख हैं कोण स्थित जो चन्द्राधिष्ठित

नक्षत्र होते हैं वे दोनों द्रेष्ट्रा ( दाढ ) हैं ।

जन्म नक्षत्र मुख या द्रष्टा में पड़े तो=मृत्यु जन्म नक्षत्र के योग से ४० घड़ी

इनको छोड़ दूसरे स्थानों में पड़े तो -शुभ का वेध होता है।

यम द्रष्ट्रा चक्र ( वर्तमान चन्द्र नक्षत्र से आरम्भ करना )

आदि अश्वि० आर्द्रा" पुन० उ०फा० हस्त ज्ये० मूल० शत० पू०भा०

मध्य भरणी मृग० पुष्य प्‌०फा० चित्रा अनु० पृ०षा० धनि० उ०भा०

अन्त कतिका रोहि० अश्ले० मघा स्वा० वि० उ०षा० श्रवण रेवती

त्रिनाड़ी चक्र

यह भी सर्प के आकार फां होता है आर्द्रा से मृगशिर तक २७ नक्षत्र इसमें रहते

हैं। प्रथम कोष्ठ में आर्द्रा, मध्य में मूल, अन्त कोष्ठ में मुगशिर आ जाता है । इसमें

दैनिक चन्द्र नक्षत्र, सूर्य नक्षत्र और जन्म नक्षत्र लिखा जाता है | इससे विवाद, संग्राम

रोग आदि का विचार होता है ।

(१) सूर्य चन्द्र और जन्म नक्षत्र एक नाड़ी ( नक्षत्र ) में हो तो-मृत्यु होती है।

इस दिन विवाद विग्रह संग्राम आदि नहीं करना ।

(२) जन्म नक्षत्र और सूर्य नक्षत्र एक नाडी में हो तो उस नक्षत्र में सूर्य रहने तक रोगी को पीड़ा रहे ।

(३) जन्म नक्षत्र और वर्तमान चन्द्र नक्षत्र एक नाड़ी में हो तो रोगी को ८ पहर

की पीड़ा रहे ।

(४) जन्म नक्षत्र चंद्र और सूर्य भिन्न-भिन्न नाड़ी में हो तो निरोगता रहे । त्रिनाड़ी चक्र

आर्द्रा पू०्फा० उ०फा० अनु० ज्ये० घनि० शत० भरणी कृतिका . पुन० मघा हस्त विशा० मूल श्रवण पू०भा० अश्वि० रोहि० पुष्य अश्ले० चित्रा स्वा पू०षा० उ०्घा० उ०भा० रेवती मृग०

अध्याय ८

आयुर्दाय विचार

सबसे पहिले जांतक की आयु का विचार करना चाहिये पीछे लक्षण कहना चाहिये

क्योंकि आयुहीन मनुष्य के लक्षण विचारना निरथंक है ।

आयु भेद-अल्प मध्य दीर्घायु के भेद से ३ प्रकार की आयु हैं इनमें वैसे ग्रह योग

दृष्टि और उनका बल और स्थिति पर ध्यान देकर मारकेश व मारकेश की दशा

आदि पर भी विचार करते हुए आयु का निर्णय करना चाहिये ।

मनुष्य एवं जीवों की परम आयु

मनुष्य व हाथी की १२० वर्ष ५ दिन

घोड़ा ८ ३२ वर्ष काक, गीध, उल्लू = १ हजार वर्ष

गधा व ऊँट > २५ वर्ष बाज = ३०० वर्ष

गाय, भैंस - २४ वर्ष कोयल, कवृतर, मोर = २० वषं

बकरा, भेड़ = १६ वर्षे . हंस = १४ वर्ष

कुत्ता-१२ वर्ष बुलबुल आदि-७ वषं

विल्ली-१० वर्ष मुरगा-८ वर्ष

मृग-२ वर्ष सपं-१००० वर्षं

रीछ, वानर-३०० वर्ष कूर्म-१५०० वर्ष

बाघ-६४ वर्ष वृश्चिक, गोह आदि-८ वषं

वृक्ष-५०० वषं चींटी--१ वर्ष

राक्षसों की-१५० वर्ष -

इतर जीवों की परम आयु देने का प्रयोजन-जिस प्रकार गणित द्वारा लग्न

कुंडली के ग्रहों पर से मनुष्य की आयु निकाली जाती है उसी प्रकार यदि अन्य जीवों

आदि की भी कुंडली बनाई गई हो तो उनकी आयु निकालने को परम आयु का आधार

लेकर निकालना पड़ता है । गणित से जो आयु निकले उसे जीव के परम आयु से गुणा

कर १२० का भाग देने से उस जीव की स्पष्ट आयु निकल आवेगी । जैसे मनुष्य की

आयु साधन की रीति से गणित करने पर ८५ वषे ५ मास १० दिन ५४ घ० ३० प०

निकली । किसी ने अपनी गाय की कुंडली बनवाई थी जिसके ग्रह स्पष्ट लग्न आदि के

द्वारा गणित करने से उपरोक्त आयु में २४ का गुणा कर १२० वर्ष का भाग देंगे तो

गाय की स्पष्ट आयु निकल आयगी ३१८=ब३=५ यहाँ उपरोक्त आयु में ५ का भाग

दिया तो १७ वर्ष १ माह २ दिन ११ घः ६ प० आयु गाय की निकली ।

गणित द्वारा आगु निकालना गणित खंड में बता चुके है ।

१९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

आयु पर विचार-यह परमायु सत्कमं करने वाखों की है जिनकी इन्द्रियाँ काबू

में रहती हैं, लाभ जनक भोजन मिलता है, देव ब्राह्मण आदि का पूजन ईश्वर भजन

आदि सत्कार्य में जिनका मन शान्त रहता है वे पूर्ण आयु पाते हैं । मानसिक रोग

चिन्ता क्रोध कामवासनो आदि के प्रवाह से शरीर में निबंलता आ जाने से आयु क्षीण

हो जाती है।

परन्तु सदाचार से, धमं से, योगादि साधन से, एवं रसायन प्रयोग से मनुष्य गणि-

तागत आयु से भी अधिक जी सकता है | इसीप्रकार अनियमित एवं अनर्थ कर्म व्यसन

आदि अनियमित जीवन से आयु क्षीण भी हो जाती है । क

इससे मनुष्य की जो परमायु १२० वर्ष की मानी गई है उससे न्यून अधिक आय

हो सकती है । १२० वर्ष आदि के अंक केवल गणित के निमित्त एक प्रकार दृष्ट व

केन्द्र माना है ।

ग्रहों के कई ऐसे योग भी हैं जिनसे १२० वर्ष से अधिक आयु जातक की हो

सकती है । ये योग अमित आयु के आगे दिये हैं ।

यह नियम नहीं है कि १२० वर्ष की ही आयु गणित से आ सकती है परन्तु गणित

द्वारा इससे भी अधिक आयु निकल सकती है । जेसे ककं लग्न में चन्द्रमा, गुरु केन्द्र में

बुध शुक्र, पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में से किसी में हों तो गणित से भी अधिक

आयु आवेगी ।

आयुर्दाय के ७ भेद

आयुर्दाय ७ प्रकार की है !

(१) बालारिष्ट-८ वर्ष तक।

(२) योगारिष्ट-२० वर्ष तक-दुष्ट ग्रह के उत्पन्न प्रभाव से ।

(३) अल्पायु-३२ वर्ष तक।

(४) मध्यमायु-३२ से ६४ वर्ष तक या ४० वर्ष तक ।

(५) दीर्घायु-१२० वर्ष तक ।

(६) दिव्यायु-१००० वर्ष-देव आयु ।

(७) अमितायु-योग्याभ्यास आदि द्वारा असंख्य आयु प्राप्त होती है अन्य मत से

मध्यमायु ३२ से ७० वर्ष तक है पश्चात्‌ दीर्घायु है।

कहा है कि २० वर्ष तक आयु का निश्चय करना कठिन है क्योंकि इस बीच में

कोई पिता के दोष से कोई माता के दोष से कोई अपने पूर्व जन्म के कमं जन्य अरिष्ट

योग से मर जाते हैं । इससे २० वर्ष के पश्चात्‌ आयुर्दाय का गणित करना ।

इसमें भी १२ वषं के भीतर तो आयु का निश्चय करना कठिन है । तव तक जप

होम औषधि आदि से वालक की रक्षा करना !

४ वर्ष तक-माता के पाप कमं से मरता है ।

८ वर्ष तक-पिता के पाप कमं से मरता है ।

१२ वर्ष तक-वालक अपने पाप कमं से मरता है

आयुर्दाय विचार : १९९

बाल अरिष्ट अल्पायु आदि के योग आगे दिये हैं अर्थात्‌ बालक की मृत्यु २ प्रकार

से होती है ।

(१) कोई माता पिता के दोष से मरते हैं। (२) कोई पूतना आदि मातु ग्रहों के दोष से मरते हैं।

(३) कोई अरिष्ट योग से मरते हैं। स्थूल रूप से आयु का अनुमान

(१) राशि धुवांक के अनुसार अ ८ कुंडली में जहाँ-जहाँ जिन-जिन राशियों में ग्रह हों केवल उन राशियों के ध्ुवांक

को जोड़ना तो आयु प्राप्त होगी ।

राशि मेष वृष मिथुन ककं सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर. कुम्भ मीन

शुवांक १० ६ २० ५ ८ २ २० ६ १२१४ है ४

सग्रह राशि ३ ५ ८ ९ १० ११ १२ योग र ध्रुवांक २० ८ ६१० १४ ३ ४ =६५ वष

कुण्डली में जिन-जिन राशियों में ग्रह ee 92.

हैं उनके श्रुवांक जोड़ने से स्थूळ रूप से 2 >> >

६५ वर्ष की आयु आई ।

(२) केन्द्रायु योग

कुण्डली के केन्द्र स्थानों में जो अंक

राशियों के हों उन सबका योग कर तिगुना

करना । यदि केन्द्र में राहु या शनि हो तो

उन दोनों की राशि के अंकों को जोड़ कर

तिगुना करना उसे पूर्व प्राप्त गुणन फल में से घटा देना तो स्थूल रूप से आयु प्रगट

होगी । इसमें राहु और शनि दोनों केन्द्र में हों तो दोनों के अंक घटाना यदि केवल

एक ही हो तो एक का घटाना ।

उपरोक्त कुंडली में केन्द्र में ३, ६, ९, १२ राशियाँ हैं जिनका योग ३० हुआ >

३८९० आया । केन्द्र में केवल राहु लग्न में है ३ राशि है ३ > ३-९ आया इसे ९०

में से घटा दिया तो ९०-९-८१ वर्षे की आयु स्थूल रूप से आई ।

इसमें भी बताया गया है कि केन्द्र में जो ग्रह हों उनका भी विचार करना कि वे

उच्च या नीच में हैं शत्रु या मित्र गृही हैं उन पर शुभ या पाप दृष्टि है इत्यादि बातों

को भी विचारना चाहिए । जिससे आयु गणना में अन्तर आ जाएगा ।

अन्यमत-केन्द्र के अंकों की संख्या के योग को तिगुना कर उसमें से राहु और

मंगल की संख्या घटा देने से स्थूल आयु प्रगट होती है ।

नराकार चक द्वारा स्थूल आयु विचार ॥

एक नराकार चक्र बनाकर सिर पर हस्त नक्षत्र रखना आगे क्रमानुसार सर्वे

५ शः

२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जक्षात्रों की स्थापना नीचे बताये अनुसार करे! जिस भाग में जन्म नक्षत्र पड़े उसके

अनुसार फल विचारना । फल आयु वर्ष

सिर में-हस्त, चित्रा, स्वाती राजा या अधिकारी हो १००

मुख में-विशाखा, अनुराधां, ज्येष्ठा दान प्रिय, घनी द०

गदेन में-मूल, पूर्वाषाढ़ा भोग प्रिय ७०

कंधा में-उत्तराषाढ़ा, श्रवण रंज हो ६०

हाथ में-घनिष्ठा, शतभिषा अशुद्ध आचरण ३०

हृदय में-पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद बहुत ही धनी 53.93.

रेवती, अश्विनी भरणी

पेट में-कृतिका साधारण धन हो ५०

लिग में-रोहिणी परस्त्री से व्यभिचार 007

घटना में-मृगशिर, आर्द्रा, पुनवंसु लड़ाई झगडा प्रिय २०

पुष्य, आश्लेषा, मघा

पैर में-पूर्वा फाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी अल्प जीवन १० वर्षे या १० मास

जैसे किसी का जन्म अश्विनी में हुआ तो यह नक्षत्र हृदय में पड़ता है । बहुत

घन होगा । आयु ९० वर्ष की होगी ।

केवल इसी चक्र से विचारने से कुछ नहीं होता और प्रकार से भी विचार करना

चाहिये । क्योंकि यहाँ तो अग की राशि निश्चित कर दी गईं | इससे अनेक भिन्न￾भिन्न रीतियों से भी विचारना ।

आयु जानने के ल्यि ग्रहों के योग और दशा जानना आवश्यक है ।

साधारण प्रकार से आयु भेद

(१) अल्पायु ३२ वर्ण तक (२) मध्यायु ७० वर्ण तक

(३) दीर्घायु ७० वर्ण के ऊपर (४) उत्तमायु १०० वर्ण के ऊपर

१ साधारण प्रकार से आयु का ज्ञान

(१) जन्म लग्नेश सूर्थ का शत्रु हो तो--अल्पायु ।

(२) जन्म लग्नेश सूर्य का सम हो तो--मध्यायु ।

(३) जन्म लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो--दीर्घायु ।

(१) सूर्य के मित्र ग्रह चंद्र मंगल गुरु हैं लग्न ४, १, ८, ९, १२, होता-दीर्घायु

(२) सूर्य के शत्रु ग्रह शुक्र शनि हैं। लग्न २, ७, १०, ११ हो--अल्पायु । कै

(३) सूर्य म के ग्रह बुध है । लग्न ३, ६ होना--मध्यायु।

२ चर स्थिर 'के अनुसार भी आयु का विचार होता है।

आयु विचारने को ३ जोडियो का विचार करना ।

आयु प्रकार-दीर्घायु मध्यायु अल्पायु

चरमचर चर+स्थिर चर+ट्विस्वभाव

स्थिर+द्विस्वभाव स्थिर{चर स्थिर+स्थिर

आयुर्दाय विचार : २०१

दिस्व्थावनस्थिर दिस्वभाव+द्विस्वसाव द्विस्वमाव+चर

पहिले लग्नेश और अष्टमेश से इस प्रकार विचारना

दीर्घायु मध्यायु अल्पायु लग्नेश चर स्थिर द्विस्वभाव | चर स्थिर द्विस्वमाव [चर स्थिर द्विस्वभाव

अष्टमेश चर द्विस्वभाव स्थिर | स्थिर चर द्विस्वभाव | द्विस्व० स्थिर चर

अर्थात्‌ लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर हों या एक स्थिर दूसरा हिस्वभाव में हों

तो दीर्घायु होगी । यदि लग्नेश और अष्टमेश एक चर दूसरा स्थिर में या दोनों द्विस्व￾भाव में हों तो मध्यायु । यदि एक चर दूसरा द्विस्वभाव में हों या दोनों स्थिर हों तो

अल्पायु होगा ।

(३) इसी प्रकार शनि चन्द्र की जोड़ी या लग्न चंद्र की जोड़ी से विचार . करना

जसा कि लग्नेश और अष्टमेश से विचार किया था । एवं जन्म लग्न और होरा लग्न

'पर से शी विचार करना ।

(१) तीनों प्रकार से एक ही आयु आवे वही आयु ग्रहण करना ।

(२) जहाँ २ प्रकार से एक सी हो एक प्रकार से भिन्न हो तो २ प्रकार से अर्थात्‌

बहुमत से जो आयु आवे उसे लेना ।

(३) पूर्वोक्त तीनों प्रकार से भिन्न २ आयु आवे तो लग्न और होरा लग्न से जो

आयु आवे उसे लेना ।

(४) यदि लग्न या सप्तम में चन्द्र हो तो चन्द्रमा और लग्न पर से द्वितीय प्रकोर

की आयु लेना ।

(५) यदि उक्त स्थान से भिन्न स्थान में चन्द्र वैठा हो तो शनि और चन्द्रमा से

आयु का विचार करना ।

यहाँ ३ प्रकार से चर आदि द्वारा विचार करने से ३ भेद हो जाते हैं ।

आयु भेद र प्रकारसे रप्रकारसे १ प्रकार से

दीर्घायु १२० वर्ष १०३ ९६

मध्यायू ८० ६२ ६४

अल्पायु ३२ ३६ ¥o

खण्ड ¥o ३६ ३२

यहाँ होरा लग्न की आवश्यकता पडती है इसलिए होरा लग्न निकालने की रीति

देते हैं--

होरा लग्न निक।लना

इष्ट के पल बनाकर ५ का साग देना ऊब्धि अंश पलादि में प्राप्त होगा । अंश

की राशि वना लो ।

जन्म लग्न विषम हो तो=उपरोक्त फल-- जन्म का सूर्य = होरा लग्न

¬ » सम „» = „ जन्म लग्न ८ होरा लग्न

च प० वि० रा० DA)

२०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

उदाहरण-इष्ट ३७.३८-३७, लर्न ५-१४-१४४३ कन्या = सम

पल वि० ० छ र"

इष्ट पल २२५८-३७ -+ ५ = लब्धि ४५१ - ४३ ¬= २४ = लग्न सम होनेसे | =राशि-० लब्धि में लग्न जोड ? १५-१-४३- २४

J = ३-१-४३२४

+न ५ - १४-१४ - ४३ रा ४ » =होरा लग्न ८ - १९-५८ - ७

होरा लग्न = ८-१५-५८-७

लब्धि ४५१ -+ ३० अंश की रा० राशि बनाये १५-१ हुआ १२ राशि से

अधिक होने से १२ घटाकर लिया ३ राशि १ अंश रहा ।

यहाँ पर आदि के विचार से (१) लग्नेश, अष्टमेश, (२) शनि, चन्द्र और (३)

जन्म लग्न और होरा लग्न से तोक्न प्रकार से विचारना बताया है और कितने प्रकार

से एक सा आने पर क्या आयु आती है उसका विचार भी दिया है!

इसको आधार लेकर कुछ गणित कर आयु स्पष्ट करने की विधि भी है जो यहाँ

देते हैं ।

आयु स्पष्ट करना

यहाँ उपरोक्त ३ जोडियाँ दी हैं इनमें ६ योग कारक हुए तीनों प्रकार से विचारने

में जिससे अधिकता आवे वे योग कारक हुए यदि तीनों से भिन्न आवे तो जन्म लग्न

और होरा लग्न से प्राप्त आयु लेना यहाँ जन्म लग्न और होरा लग्न ही कारक होंगे ।

योग कारक के स्पष्ट में राशि को छोड़कर केवल अंश कला विदःला लेना । फिर

सबका योग करना जितने योग कारक हो उस योग में उतने का भाग देना अर्थात्‌ ४

योग कारक हों तो ४ का, २ योग कारक हो तो, २ का भाग देना । पश्चात्‌ उसमें उस

खण्ड का गुणा करना । ३ प्रकार से मिला हो तो प्रथम खंड ४० का, दो प्रकार से

मिलने पर द्वितीय खण्ड ३६ का, और एक प्रकार से मिलने पर तीसरा खंड ३२ का

गुणा करना । पश्चात्‌ ३० का भाग देने से वर्ण मास घड़ी पल आवेंगे वह गत आयु. हुई इसे खण्ड की प्राप्त आयु में घटा देना तो स्पप्ट आयु होगी 1

यहाँ ३० का भाग देने की क्रिया कुछ क्लिष्ट है इससे गुणनफल में १२ मास का गुणा करना । जो अँश आवे उसमें ३० का भाग देना तो लब्धि मास होंगे शेष दिन होंगे आगे कळा विकला को घड़ी पल जानो । उदाहरण से समझ में आ जायगा ।

आयुर्दाय विचार : २०५

पाप ग्रहों के मध्य में हो या उससे त्रिकोण स्थान पाय ग्रह से युक्त हों तो कक्षा हास

होता है ।

३--पाप ग्रह होकर कारक नीच स्थान में या उच्च नीच स्थान से भिन्न स्थान

में होकर पाप ग्रह युक्त हो तो भी कक्षा हास होगा ।

४-- इसके विपरीत होने पर कक्षा वृद्धि होती है अर्थात्‌ लग्न और उससे सप्तम

तथा कारक ओर उससे सप्तम शुभ ग्रहों के मध्यवर्ती हों या उससे त्रिकोण स्थान शुभ

ग्रह से युक्त हो, या शुभ ग्रह कारक होकर उच्च में या उच्च नीच से इतर स्थान में

होकर शुभ ग्रह से युक्त हो तो कक्षा वृद्धि होती है ।

५--इसी प्रकार गुरु से भी कक्षा वृद्धि का विचार करना । जसे गुरु पाप ग्रह के

मध्य हो या उससे त्रिकोण स्थान पाप ग्रह से युक्त हो तो कक्षा हास होता है।

६--शुभ ग्रह्‌ के मध्य में हो या उसके त्रिकोण स्थान में शुभ ग्रह हो या उच्च

स्थान में हो या उच्च नीच से भिन्न स्थान में स्थित होकर शुभ ग्रह से युक्त हो तो

कक्षा वृद्धि होती है ।

७-_पूर्वं बताये कक्षा योग में पूर्व चन्द्र और शुक्र का योग हो तो वहाँ पर दशा

में एक राशि की वृद्धि होती है किन्तु कक्षा वृद्धि नहीं होती ।

८-_पूर्वोकत कक्षा ह्लास योग में शनि का योग हो तो दशा में एक राशि का

ह्रास होता है ।

(४) आयु विचारने को नीचे बताई तीन जोडियो पर भी विचार करो

(१) चन्द्र की ओर लग्न की द्रेष्काण की राशियाँ ।

(२) लग्नेश और चन्द्र राशिं पर की नवांश राशि।

(३) लग्नेश और अष्टमेश की द्वादशांश राशि ।

ऊपर बताई चर स्थिर आदि के अनुसार दीघं मध्य अल्पायु का विचार करना ।

(५) शुभ ग्रह और लग्नेश की केन्द्र आदि स्थिति के अनुसार

(१) शुभ ग्रह और लग्नेश केन्द्र में हो--दीर्घायु

(२) ४ ४7 र ¬ पणफर में हो-मध्यायु

(३ ) sn 7 i Fe आपोक्लिम में हो---अल्पायु

यहाँ लग्नेश अष्टमेश में जो वली हो उससे विचारना

अष्टमेश और पाप ग्रह इसी प्रकार हों तो इससे विरुद्ध फल जानो ।

(६) नीचे बताई जोड़ियों में मैत्री निकालो

१. चन्द्र राशि का स्वामी और चन्द्र से अष्टम राशि का स्वामी ।

२. लग्न से लग्नेश अष्टमेश । ३. लग्नेश और सूर्य

ये मित्र हों तो-दीघं आयु । ये सम हों तो-मध्यायु । ये शत्रु हों तो-अल्पायु ।

(७)लग्नेश या लग्न नवांशेश वली हो और उस स्थान से गिनने पर-- १

१. अच्छे स्थान में हों या अष्टमेश से गिनने पर अच्छे स्थान में हो जैसी स्थिति

हो तो जातक दीघंजीवी होगा ।

२०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चन्द्र राशि का स्वामी या चन्द्र का नवांशेश के सम्बन्ध से भी उपरोक्त फल

होगा । यदि ऐसा न हो तो विरुद्ध फल होगा । न

२. लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश अति बली हो केन्द्र में हो और यदि पाप ग्रह

अष्टम और द्वादश भाव में हों तो अल्पायु होगी ।

३, लग्न से अष्टम स्थान का स्वामी और सप्तम स्थान से अष्टम स्थान का स्वामी

इन दोनों में जो वळी हो वह केन्द्र में हो तो दीर्घायु । पणफर में हो तो मध्यायु ।

आपोक्लिम में हो तो अल्पायु होगी ।

४. इसी प्रकार आत्म कारक का स्वामी और उससे सप्तम स्थान से अष्टम स्थान

का स्वामी इन दोनों में जो बली हो वह आत्म कारक से केन्द्र में होतो दीर्घायु, पणफर

सें मध्याय, आपोक्लिम में अल्पायु होगी । लग्न विषम हो तो क्रम से, सम हो तो

उत्क्रम से ( उल्टी गिनती से ) अष्टमेश जानना ।

यदि लग्न तृतीय में कारक हो तो केन्द्र आदि में स्थित अष्टमेश के वश विपरीत

आयुर्दाय जानना । जैसे केन्द्र में अष्टमेश हो तो अल्पायु, पणफर में मध्यायु, आपोक्लिम

में दीर्घायु होती है।

(८) लग्नेश अष्टमेश आदि का चर स्थिर आदि के अनुसार ऊपर दीर्घ मध्य अल्प

आयु का निर्णय बताया है । इसीप्रकार यहाँ धर्मादि स्थान स्थिति के वश दीर्घादि आयु

का निर्णय करना ।

(१) एक पंचम में दूसरा लाभ में -दीर्घायु।

(२) एक तृतीय में दूसरा लाभ में-मध्यायु ।

(३) एक नवम में दूसरा लाभ में--अल्पायु ।

(४) दोनों लाभ में--हीनायु ।

इसी प्रकार लग्न होरा लग्नआदि के वश आयु विचारना ।

आयु दीर्घायु मध्यायु अल्पायु हीनायु

लग्नेश ११ भाव में ११ में ११ में ११ में

अष्टमेश में ३ में ९ में ११ में

(९) अष्टमेश आदि योग कारक ग्रह र

१. लग्न से त्रिकोण ( १-५-९ ) में होने से ३ प्रकार को अल्पायु होती है । २.

लग्नेश से त्रिकोण में होने से ३ प्रकार की अल्पायु और ३. लग्नेश आश्रित राशि से ३

प्रकार की दीर्घायु होती हे प्रत्येक का प्रमाण १२ वर्ष का होता है जैसा यहाँ दिया है- रग्न से लग्नेश से लग्नेश आश्रित राशिसे

त्रिकोण १ ५ ९ 24 “९ १ 4 ९ आयु १२ २४ ३६ उडद ६० ७२ ८४ ९६ १०८ वर्ण अल्पायु मध्यायु दीर्घायु जैसे लग्न से अष्टमेश आदि कोई योग कारक ग्रद्द लग्न में न हो तो अल्पाय १२ वर्ष की, पंचम में हो तो १४ वर्ण की, नवम में हो तो ३५ वर्ण की होगी । बह जगे से

उदाहरण

लग्नेश |भष्टमेश | शनि ॥ लग्न |होरा लग्न

बुध द मंगल मिष कन्या धरन

मकर में मिष

चर [चर चर [चर द्वि ०ट्विस्वभाव

“अ

दीर्घायु | दीर्घायु | मध्यायु

  1. बी : यहाँ २ प्रकार से दीर्घायु आई १०८ वर्ण | दो प्रकार से आने का गुणक ३६

है। यहाँ योग कारक लग्नेश, अष्टमेश शनि

आयुर्दाय विचार ; २०३

और चन्द्र ४ हैं । इनका योग कर ४ का भाग देना होगा । ता.“ लग्नेश बुध स्पष्ट ९-२१-२७-३१

अष्टमेश मंगल ,, ०-१९-. ८-२२

शनि

२१-२७-३१ यहाँ इनकी राशि

१९- ८-२२ छोड़कर केवल

४. ०¬२५-१३-३१ २५- १- १ अंशादि ल्या है

चन्द्र ॥ ६०२५-५९-२७ २८-५९-२७ रीति पहली योग ९४-३८-९८ = ४ २२-३९-४२ % ३६ = २२-३६-४२ ( रीति दूसरी ) = ५५१९-४९-१२ गुणन फल यहाँ गुण नफल ८५१:४९-१२ में i २८१२ यदि ३० का भाग देना है तो :---

१०२२१-५०-२४ ३०)८५१-४९-१२(२८ वर्ण

मास मास ६०

३०)१०२२१०(३४० १२)३४०(२ वर्ण 00

0 ४ पपन मम

7 > ११-४९-१२ १२२ १०० >१२

ER १४१-५०-२४ २१ दिन ४ मास ३०)१४१-५०-२४(४ माह = वर्ण - मास - दिन - घ० - पल

२८-४ - २१ - ५० - २४गतायु

इस प्रकार से पूर्णायु १०८ वर्ष आती है

व० मा० दि० घ० प०

पूर्णायु १०८-०-०-०-०

गतायु २८ - ४ -२१- ५०-२४

शेष आयु ७३ - ७ - ८- ९ -३६

आयु वर्ण माह दि० घ० प० आदि

७९- ७-० ८- ९ - ३६

१२०

२१-५०-२४ SRG

३०)६५५-१२-०(२१

२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

वर्ष मास दिन घण्टा पल

= २८ ४ २१ १० २४

` इस प्रकार ३० का भाग देने में असुविधा

होती है इससे पहिली बताई रीति सरल है

यदि तीनों भिन्न २ प्रकार से आयु आवे, तो लग्न और होरा लग्न से आई आयु .

लेनी पड़ेगी । एक प्रकार से आने का तीसरा गुणक ३२ का गुणा कर ३० का उपरोक्त

प्रकार से भाग देने पर गतायु प्राप्त होगी । एक प्रकार से जो आयु आवे उससे घटा

देने से स्पष्ट आयु प्राप्त होगी । यदि रन्न और होरा लग्न से दीर्घायु आवें तो ९६ वर्ष

लेना मध्यायु आवे तो ६५ वर्ण, अल्पायु आवे तो ४० वर्ण लेकर उसमें से गतायु घटा

देना तव स्पष्ट आयु प्राप्त होगी ।

परन्तु उपरोक्त प्रकार से प्राप्त आयु में भी घट बड़ होती है जिसे कक्षाह्मास या

कक्षा में वृद्धि कहते हैं, जिसका नियम आगे दिया है :--

पूर्ण प्राप्त आयु में कक्षा ह्वास-वृद्धि करने के नियम

(१) कक्षा हास---

यदि शति योग कारक हो तो कक्षा ह्लास होता है अथात्‌ दीर्घायु हो तो उसे मध्यायु

मध्यायु हो तो अल्पायु जानो यदि अल्पायु हो तो उससे भी अल्पहीनायु जानना ।

जंमिनी सूत्र में आयुर्दाय के सम्बन्ध में ३२-३६-४० ये तीन कक्षाये हैं । नियमा-

नुसार ४० की प्रप्ति हो तो ३६, ३६ की प्राप्तिःहो तो ३२ समझो, यदि ३२ की

प्राप्ति हो तो शनि जिस राशि में बैठा हो उस राशि की दशा का आधा ३२ से घट￾कर जो शेष वचे वह उसकी अल्पायु हुई ।

इससे द्विगुण मध्यायु ओर त्रिगुणित दीर्घायु मानकर पुंवत्‌ स्पष्ट आयु के मान

का अनुमान करना ।

शनि अपनी राशि या उच्च में हो तो कक्षा ह्लास नहीं होता ।

(२) कक्षा वृद्धि यदि लग्न या सप्तम में गुरु हो तो कक्षा वृद्धि होती है अर्थात्‌ अल्पायु आवे तो

मध्यायु समझो, मध्यायु में दीर्घायु और दीर्घायु में उससे भी अधिक दीघंआयु होती है ।

अर्थात्‌ ३२-३६-४० इन तीनों कक्षाओं में ३२ की प्राप्ति हो तो ३६ लेना, ३६

की प्राप्ति में ४० ओर ४० की प्राप्ति हो तो गुरु जिस राशि में बैठा हो उस राशि को

चार दशा का आधा ४० में जोड़कर उसके तुल्य लेना । अल्पायु से द्विगुणित मध्यायु

और त्रिगुणित दीर्घायु मानकर आयु स्पष्ट साधन करना ।

(३) कक्षा ह्लास वृद्धि के नियम

१--लग्न और सप्तम पाप ग्रह के मध्यवर्ती हो या उसके त्रिकोण (५-९ स्थान)

पाप ग्रह से युक्त हो तो कक्षा ह्लास होता है ।

२--इसी प्रकार अन्य कारक से भी विचारना जैसे कारक और उसके सप्तम

आयुर्दाय विचार : २०९

में मंगल हो तो बूढ़ा भी युवा के तुल्य समझा जावे ( शंभु० ) । लग्न में मंगल हो तो जातक वृद्ध होकर भी युवा के समान रहता है ( जा० सं० ) । युवा होकर बालक समान- -लग्न में बुध हो तो युवा भी बालक समझा जाता है। न अति बूढ़ा न अति युवा--लूग्न में चन्द्र शनि हो तो न अति वृद्ध न अति युवा मालूम पड़े ( शंभु० ) । लग्न में चन्द्र शुक्र हो तो न अति वृद्ध और न अति युवा

के समान रहे ( जा० सं० )।

स्वभाव से वृद्ध-जिसके २ वळवान्‌ वृद्ध ग्रह छन्न में हों तो वह स्वभाव से ही

वृद्ध रहता है और सव जनों में मान पाने योग्य रहता है ( जा० सं० ) । दीर्घायु योग ( ७० वषं के ऊपर आयु )

दीर्घायु १--षष्ठेश ६ या १२ भाव में हो, व्ययेश १२,१ या ८ भाव में हो ।

दीर्घायु २--लग्नेश या अष्टमेश स्वगृही होकर अपने नवांश में या अधिमित्र के

नवांश में न बेठ कर मित्र के नवांश में हो । ( जैमिनी )

दीर्घायु ३--शुभ ग्रहों से युक्त अष्टमेश उच्च का केन्द्र या त्रिकोण में हो ।

चिरायु ४--अष्टमेश अष्टम में और लग्नेश लग्न में हो । ( जैमिनी )

चिरायु ५--शुभग्नह शुभ राशि में अष्टम में होकर शुभग्रह से दृष्ट हो । (जेमिनी)

दीर्घायु ६--अष्टमेश अपने गृह में हो । ( जैमिनी )

दीर्घायु ७--लग्नेश और अष्टमेश ६ या १२ भाव में शुक्र ग्रह युक्त हो। (जैमिनी)

दीर्घायु द--दशमेश लग्नेश और अष्टमेश केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हो।

( जेमिनी ) ४

दीर्घायु ९--अष्टमेश केन्द्र में हो ( वृ०्पा० )

दीर्घायु १०--षष्ठेश या द्वादशेश ६-१२-१ या ८ भाव में हो (वृ० पा० )

दीर्घायु १९--पंचमेश लग्नेश और अष्टमेश यदि स्वराशि या स्वनवोश में या मित्र गृही हो ( बृ०पा० ) ।

दीर्घायु १२-लग्नेश, अष्टमेश, दशमेश और शनि ये केन्द्र त्रिकोण में हो । ( इन

चारों में जो बलवान्‌ हो उसकी स्थिति से आयु निर्णय करना ) 1

दीर्घायु १३-लग्नेश उच्च में, चन्द्र ११ वें घर में, गुरु अष्टम भाव में हो (वृ.पा.)

दीर्घायु धनी १४-बली लग्नेश, केन्द्र स्थित शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो घन और सब

गुणों से युक्त दीर्घायु हो ( वृ०्पा० ) ।

दीर्घायु धनी १५-लग्नेश, बुध, गुरु, या शुक्र यदि केन्द्र त्रिकोण में हों तो धनी,

बुद्धिमान्‌, राजा का प्रिय और दीर्घायु हो ( वृ० पा० ) ।

दीर्घायु धनी १६-उदय राशि का स्वामी ( लग्नेश ) अति बली हो पाप ग्रह से

दृष्ट न हो शुभ ग्रह से दृष्ट होकर केन्द्र में हो तो मृत्यु को भी भगा देता है दीर्घायु

धनवान्‌ और बहुगुणी राजलक्ष्मी युक्त करता है ( फल० ) ।

दीघंजीवी सुखी १७-कुंडली में १, ४, ५, ७, ८, ९, १० घर में कोई पाप ग्रह

(] १४