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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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२२४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

२-राशि या इसका नवांश लग्न में हो--पद्चिम । .

५-१० राशि या इनका नवाँश लरन में हो--दक्षिण ।

(२) एक ही दिशा लग्न और लग्न नवांश से आती हो तो ठीक वहीं द्वार होगा । यदि दोनों

में भिन्नता हो तो लग्न व नवांश में जो बली है उसके अनुसार लेना ।

(३) अन्यमत--लग्न में प्रथम द्रेष्काण--नवमेश जिस राशि में हो उस राशि की दिशा

में द्वार । लग्न में द्वितीय द्रेष्काण--लग्न में द्वादश राशिका स्वामी राशि कीं

दिशा में द्वार । लग्न में तृतीय द्रेष्काण--लग्न से पंचम राशि का स्वामी राशि

की दिशा में द्वार ।

(४) जो ग्रह केन्द्र में हो उसकी जो दिशा है उस गोर द्वार, केन्द्र में बहुत ग्रह हों तो

बलवान्‌ ग्रह से दिशा का विचार करना । केन्द्र में कोई ग्रह न हों तो लग्न की राशि

या ल्मन द्वादशांश की राशि से, इनमें मुख्य बलवान्‌ ग्रहों Š विचारना ।

(५) छन सिंह हो--तो जन्म गृह के २ द्वार । लग्न कन्या हो--तो जन्म घर कष्टकर

खराब हो गरीब घर होगा ।

(६) उपरोक्त qg दृश्याद्ध में होवें तो उस दिशा के वाम भाग में द्वार होगा ।

उपरोक्त ग्रह अदृक्याद्धं में होवें तो उस दिशा के दक्षिण भाग में द्वार होगा ।

  • यहाँ कई प्रकार से विचार दिया ë जिससे अधिक मिले वही लेना ।

दीप विचार

दीप की दिशा--जैसे खाट के अंग का विचार है उसी प्रकार सूये से दीपफ का

स्थान जानना ।

(१) सूर्य की राशि जिस.दिशा में है उसी दिशा में दिया (दीपक) होगा । या सूर्य

< पहर आठों दिशाओं में घूमता हे उस समय सूयं जहाँ हो वहाँ दिया होगा । दीप-तेल-बत्ती पर विचार '

सूर्य युक्त राशि- दीप ज्ञान । चन्द्र से--त्तेल ज्ञान । लग्न से--बत्ती ।

दीप-¬(१). लग्न चर--दीप चंचल हाथ से चलता फिरता या एक जगह से

दूसरी जगह को धरा गया ।

(२) लग्न स्थिर--दीप स्थिर एक ठिकाने ।

(३) द्विस्वभाव--दीप हाथ में हो होगा या चलित ।

दीप का अन्य विचार

(१) स्य राशि चर--जन्म समय हो दिया लाया गया या एक जगह से दुसरी'

जगह घरा गया । š

सूर्य स्थिर--दिया जन्म के पहिरे था या एक जगह दिया स्थिर था 1

सूर्य द्विस्वभाव--दिया दूसरे ठिकाने था या चलित था । (२) जन्म से सूर्य बलवान्‌ हो और उसे मंगल देखे तो वहां घर में बहुत दीप हो ।

या सूर्य बलवान्‌ हो तो--नवोन बहुमूल्य दीपक हो ।

निषेक अध्याय : २२५

या सूर्य निवल हो तो-टूटा फूटा दीप हो यहाँ बल विचार कर कहना ।

:(३) घास फूस की रोशनी--अन्य ग्रह बली होकर व्यय भाव में हों तथा उन पर

शनि को दृष्टि हो तो घास फूस आदि निम्न प्रकार से प्रकाश हो ।

दिया का मुख जन्म समय में

सूयं १-५-९ राशि के नवांश में हो--दिया का मुख पूर्व ।

सूर्य २-६-१० राशि के नवांश में हो--दिया का मुख दक्षिण ।

सूर्य ३-७-११ राशि के नवांश में हो--दिया का मुख पदिचम ।

सूये ४-८-१२ राशि के नवांश में हो--दिया का मुख उत्तर ।

दीपक में तेल

` चन्द्र के अनुसार विचारना--

(१) चन्द्रमा प्रथम द्रेष्काण में-तेल भरा । चन्द्रमा द्वितीय द्रेष्काण में-तेल आधा ।

चन्द्रमा तृतीय द्रेष्काण में बहुत कम ।

(२) इसी प्रकार चन्द्र राशि से भी विचारना--राशि के आरम्भ में तेल भरा ।

मध्य में आवा । अन्त में--बहुत कम या खाली ।

(३) पूर्ण चन्द्र हो--जन्म समय दिया भर तेल था। क्षीण चन्द्र हो--थोडा तेल ।

चन्द्र के साथ पाप ग्रह--बहुत सूक्ष्म तेल । š

बत्ती

लग्न के अनुसार बत्ती--

(१) जन्म लग्न के आरम्भ में--बत्ती दिखे में पूर्ण । जन्म लग्न के मध्य में--बत्ती

दिये में आधी । जन्म लग्न के अन्त में--बत्ती दिये में थोड़ी ।

(२) बत्ती का रंग--लग्न की राशि का जैसा रंग हो उसी के अनुसार ।

खाट दिया घर आदि पर विशेष विचार

प्रसव कहों-कहीं दो मंजिला, तीन मंजिला घर या कहीं भूमि में होता है भोर दिन

में बिना दीपक के प्रकाश रहता है दीप की आवश्यकता नहीं दै इत्यादि बातों पर जाति

कुल, देश की रीति आदि पर वृद्धि से विचार कर कहना चाहिये ।

बालक को किस दशा में ले जाना मना है

अर्थात्‌ आपत्तिजनक दिशा--जन्म समय-जन्म नक्षत्र के चरण परमे वगंका

विचार करना ।

अ वर्ग-वायब्य, क वर्ग--उत्तर, च वर्ग--ईशान, ट वर्ग --पूर्व, त वर्ग-आग्नेय,

प वर्ग--दक्षिण, य वॉ--नैऋत्य, श वर्ग--पदिचम 1

इन निम्न वर्ग वालों की इन दिशाओं में बालक को ले जाना मना ह । ८ मील से

अधिक दुर इन दिशाओं में नहीं छे जाना ।

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२२६ : ज्योतिष-शिक्षा, ततीय फित खण्ड

पुत्र का मुह देखना

पुत्र होने पर यदि मूल आदि का निषेध न हो तो पिता को शीघ्र ही बालक का मुख

देखना चाहिये । पुत्र का मुंह देखते ही पितरों के ऋण से छूट जाता है ।

गंडांत विचार

गंड--राशि चक्र में किसी राशि के अंत होने के साथ-साथ उसके अंतर्गत नक्षत्र के

चरण का भो अंत हो जाता है ऐसी संधि को गंड कहते हँ । जैसे-- i

( १ ) पहिला गंड--संघ्या गंड---मीन का अंत और मेष के आरम्भ की सन्धि ।

(२) दुसरा गंड--रात्रि गंड--कर्क राशि के इलेषा के अन्त पर और सिंह रादि

के,मघा नक्षत्र प्रारम्भ की सन्धि ।

(३) तीसरा गंड--दिवा गंड--वृश्चिक राशि के ज्येष्ठा नक्षत्र और धन राशि

के मूल नक्षत्र के आरम्भ होने की संधि ।

ये गंडांत ३ प्रकार के हैं जो अशुभ माने जाते हूँ

( १ ) राशि गंडांत। ( २) लग्न गंडांत। ( ३ ) नक्षत्र गंडांत ।

(१) लग्न गंडांत या ( २ ) राशि गंडांत--जैसा ऊपर .बताया है १-मीन-मेष

की संधि । २-कर्क-सिह की संधि। ३-वृश्चिक-घन की सन्धि 1

सन्धि के प्रत्येक लग्न की आवी-आघी घड़ी बालक को घातक है । अर्थात्‌ मीन, ककं

च वृश्चिक लग्नो के अन्त को आधी घडी और मेष, सिंह व घन लग्तो के आदि की आघो-

आघी घड़ी घातक है ।

( ३) नक्षत्र गंडांत (मूल)--१-रेवती के अंत को २ घड़ी, अश्विनी के आदि की

२ घड़ी घातक है । २-इलेषा के अंत की २ घड़ी मघा के आदि की २ घड़ी घातक है ।

३-ज्येष्ठा के अंत की २ घड़ी मूल के आदि की २ घड़ी घातक है ।

अभृक्त मल-(१) ज्येष्ठा के अंत की १ घडी मूळ के आदि की १ घड़ी में होता है ।

अन्यमत से--२-२ घड़ी अर्थात्‌ सन्धि की ४ घड़ी का अभुक्त मूल है 1

अन्यमत--मूल, मघा ओर अश्विनी की आदि को ३-३ घड़ी ज्येष्ठा, इलेषा और

रेवती के अंत की ५ घड़ी लेते हैं । इसमें पिता ८ वर्ष तक वाळक का मुख न. देखे

इसकी शान्ति करावे ।

(२) फल--मूछ में उत्पन्न बालक का फल आगे दिया है । कहा है अभुक्त मूल में

उत्पन्न पुत्र, कन्या, पशु, सेवक, कुल का नाश करते हैँ यदि जीवे तो वंश का कर्ता हो,

श्रीमान हो ।

(३), तिथि गंडांत--नंदा तिथि ( १-६-११) के आदि की एक-एक घडी ।

पूर्णा तिथि ( १५-५-१० ) के अंत की एक-एक घड़ी । अर्थात्‌ पूणिमा के अन्त की और प्रतिपदा के आदि को संघि की १-१ घड़ी । 8 = पंचमो के अंत को और षष्ठी के आदि की संधि की १-१ घड़ो।

दशमी के अंत को थोर एकादशी के आदि की संधि की १-१ घड़ी। `

ENED SPEIRS

निषेक अध्याय : २२७

इन उपरोक्त संधियों में शुभ काम वर्जित है इनमें जन्मे को दुष्ट योग होते हैं ।

(४) कृष्णपक्ष की चतुदंशो के जन्म का विचार

तिथि के ६ भाग करो (१) भाग-शुभ, (२) भाग-पिता का नाश, (३) भाग-माता

का नाश, (४) भाग-मामा का नाश, (५) भाग-भाई का नाश या वंश का नाश, (६)

भाग-स्वयं जातक का नाश या धन हानि।

(५) अन्यगंड--(१) पूर्वाषाढा नक्षत्र में घनु लग्न हो या पुष्य नक्षत्र में कर्क लग्न

हो तो पिता का नाश ।

(२) पूर्वाषाढ़ा मोर पुष्य नक्षत्र में-१ चरण में जन्म हो तो पिता को, दूसरे चरण

में माता को, तीसरे चरण के बालक को, चौथे चरण में माता को क्लेश या हानि ।

(३) उत्तरा फाल्गुनी के प्रथम चरण में, पुष्य नक्षत्र के. मध्य के दोनों चरणों में,

"चित्रा नक्षत्र के तीसरे चरण में, भरणी नक्षत्र के पूर्वाद्ध में, हस्त नक्षत्र के तीसरे चरण

में रेवतो नक्षत्र के चोथे चरण में पुत्र हो तो--पिता को अनिष्ट, कन्या हो तो-माता

को अनिष्ट ।

(४) पिता के नक्षत्र में उत्पन्न पुत्र--पिता को अनिष्ट करता है ५

, माता के नक्षत्र. में उत्पन्न कन्या--भाता को अनिष्ट करती हू ।

(५) अन्यमत-पूर्वाषाड़ा में धनु लग्न, पुष्य में ककं लग्न, चित्रा में कन्या लग्न में

उत्पन्न हो तो माता, पिता, जातक और मामा को अरिष्ट करेगा चाहे लग्न ओर चन्द्र

पर शुभ दृष्टि हो।

(६) अन्यमत---हस्त और. मघा के तीसरे चरण में उत्पन्न--माता-पिता या

काका को अरिष्ट करता है । पूर्वापाढ़ा और पुष्य के प्रथम चरण में उत्पन्न--पिता को

अरिष्ट, चित्रा, विशाखा और हस्त में उत्पन्न--माता को अरिष्ट, मृगशिर के बीच में

उत्पन्न--माता को अरिष्ट करता ë ।

(७) कुल संहारक योग--तिथि ३-६-१० ओर शुक्ल १४ को शनिवार या मंगल

हो इसमें जन्म हो तो कुळ संहारक होता है 1

(८) अन्य कुळनाशक योग--दिन क्षय, व्यतीपात, व्याघात, वैधृति, झुल, गंड,

अतिगड, वस्त्र योग, विष्टि (भद्रा) करण, परिघ, यमघंट, कालदंड, मृत्यु, दग्धयोग,

क्षय ति.थ, संक्रान्ति, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशो, अमावास्या और गंडान्त में जन्म होने सै

बड़ा दोग होआ है । सहोदर भाई बहिन के नक्षत्र में या पिता के नक्षत्र में भो जन्म शुभ

नहीं होता ।

कहा है कि भाई बहनों का पिता पुत्रों . का एक ही नक्षत्र में जन्म हो तो जिसका

जन्म पहले हुआ हो उस संतान का नाश होता हे या पिता को, भ्राता को रोग हो या

पिता या ज्येष्ठ भ्राता का नाश हो ।

(९) अश्विनों मघा मूल जन्म में इनका पूर्वाद्ध-पिता को कष्ट ।

रेवती ज्येष्ठा जन्म में इनका उत्तरार्द--माता को कष्ट 1,

२२८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(१०) अन्यमत--मूल मघा अश्विनी का प्रथम चरण और रेवती ज्पेष्ठा अक्ळेवा

का चतुर्थ चरण में पिता को कष्ट ।

(११) घनिष्ठा १ चरण, हस्त १ चरण, विशाखा २ चरण, आर्द्रा २ चरण,

उ० भाद्रपद ३ चरण, इलेषा ३ चरण, भरणी ४ चरण, मूल ४ चरण ये बुरे हैँ?

, दिन में जन्म हो तो मृत्युदायक हूँ । रात में जन्म हो तो दोष दूर हो । `

(१२) इलेषा १ चरण, उत्तर भाद्र १ चरण, भरणी २ चरण, मूळ २ चरण,

उ० फाल्गुनी ३ चरण, श्रवण ३ चरण, स्वाती ४ चरण, मृग ४ चरण ये भी बुरे हैं ।

दिन में जन्म हो तो रोगदायक हूँ । रात में जन्म हो तो दोष न हों ।

(१३) विशाखा भरणी, पूर्वाभाद्रपद, मघा, आर्द्रा, कृतिका --इनके प्रत्येक चरण

में पहिलो ६ घटी के भोतर जन्म हो तो माता को कष्ट हा ।

(१४) वजगंड की ४ घटी में जन्म होने का दोष--

१ घटी का स्वामी रुद्र-पिता को अरिष्ट । २ घटी का स्वामो यम-माता को अरिष्ट ।

३ घटी का स्वामी अग्नि-घन हानि। ४ घटी का स्वामी मृत्यु-शिशु को अरिष्टकारक

Ë 1 इनके स्वामी का पूजन कर शान्ति करे ।

(१५) गंडयोग में यात्रा करे तो चोरों का डर हो । गंडयोग में विवाह करे पो

मृत्यु हो ।

(१६) जिस गंडयोग में पापग्रहों का योग हो-जन्म महा दोषकारी हूँ 1

शिस गंडयोग में शुभग्रहों का योग हो-थोड़। शुभ करनेवाझा होता है ।

(१७) रात्रि में नक्षत्र के अन्त में अशुभ । दिन में नक्षत्र के आदि में अशुभ ।

(१८) कन्या जन्मफल-मूल में | श्लेषा में विशाखा में । ज्येष्ठा में

स्वसुर का मरण | बुरे आचरण | देवर का मरण | ज्येप्ठ मरे

(१९) ज्वालामुखी योग

नक्षत्र | मूळ | भरणी | कृतिका | रोहिणी , आइलेपा FRR > | १०

कहा है इनमें जन्म हो तो नहीं जोये । इसे भी कई लाग मूळ मानते हैं. इसको भी

शान्ति करानो चाहिये ।

(२०) जन्मतारा का पापग्रह से वेध

हो तो तुरन्त मृत्यु होती है । शुभग्रह से

वेध हो तो जन्म तारा ( नक्षत्र) आदि

शुमफल देते हे । इस वेघ का विचार सप्त

शलाका चक्र से करना चाहिए । अ उनिउचदष मू-ज्थङ्् ?

यहाँ बताये नक्षत्रो के सम्मुख नक्षत्र में कोई ग्रह हो तो उसका वेघ होता ¿lt

निषेक अध्याय : २२९

जन्म तारा नाम

प्रथम नक्षत्र-आय । दशवां नक्षत्र-कमं । सोलहवां नक्षत्र-संघातिक । अठारहवां

नक्षत्र-समुदाय । उन्नोसवां नक्षत्र-आजान। तेइसवां नक्षत्र-वैनाशिक। पचीसवां

नक्षत्र-जाति देश अभिपेक ।

गंड काल में जन्म फल

जो बालक गंडान्त में उत्पन्न हो तो शान्ति उपचार आदि: करना चाहिये जिससे

बालक बच जावे तो बड़ा पराक्रमी और वाहन युक्त बड़ा ऐइवयेवान होता है क्योंकि

गंडांत में उत्पन्न बालक माता-पिता कुल व शरीर का नाश करता है जिसका विशेष

फल आगे बताया है।

मास के अनुसार गंडांत वास विचार और फल

वैशाख, श्रावण, माघ, फाल्गुन में>गंडांत स्वर्ग में वास-दोष नहीं 1

ज्येष्ठ, आषाढ, मार्गशीर्ष, पौष में>गंडांत मत्यंलोक में--मृत्यु ।

आश्विन, चैत्र, भाद्रपद, कात्तिक में=गंडांत पाताल मेँच्दोष नहीं ।

गंडांत में जन्म होने पर विचार

उस बालक को पिता ६ मास तक या २७ दिन तक न देखे । पश्चात्‌ फल (गंडांत)

-की शान्ति कराके मुख देखे ।

अश्लेपा का दोष ९ मास तक रहता है । मूल का दोष ८ वपं तक रहता है । ज्येष्ठा

का दोष १५३मास रहता है । अभुक्त मूल का दोष ८ वर्ष तक रहता है । कहा है-- पिता

बालक का मुख न देखे । शान्ति कराने के पश्चात्‌ इतने समय बाद मुख देखे ।

नवांश के अनुसार गंडांत विचार

मेष, सिंह; घन के पहले नवांश में, कक, वृश्चिक, मीन के अन्तिम नवांश में भी

गंडांत माना जाता ë । `

'गडकाल जन्मफल

( १)-गंडकाल की ४ घडियो में से बालक के जन्म का फळ ।

१ पहिली घटी में उत्पन्न हो तो माता मरे, २ दूसरी घटी में उत्पन्न हो तो पिता

मरे, ३ तोसरी घटी में उत्पन्न हो तो स्वयं को भयदायक, ४ चतुर्थ घटी में उत्पन्न हो

तो भाइयों को हानिकर हो ।

(२) तिथि या नक्षत्र गंड में उत्पन्न हो तो पिता-माता की मृत्यु ।

लग्न गंडांत में उत्पन्न हो तो स्वतः की मृत्यु Ll

जब जन्म में तीनों गंडांत हों तो वह तुरन्त मरे और कुटुम्ब का नाश करे ऐसा

बालक किसी प्रकार जी जावे तो नीच की सेवा करे और अनेक दुःख भोगे ।

२३० ¦ ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( ३ ) रग्न गंडांत में जन्म हो तो पिता को अरिष्ट ।

तिथि गंडांत में जन्म हो तो ज्येष्ठ भ्राता को अरिष्ट ।

नक्षत्र गंडांत में जन्म हो तो स्वयं बालक को अरिष्ट ।

तीनों गंडांत में जन्म हो तो कुल का नाश करे ।

रेवती के गंडांत जन्म का फल

( १ ) रेवती के चतुर्थं चरण में दिन को जन्म हो तो पिता को अरिष्ट और चतुर्थ

चरण रात्रि में जन्म हो तो माता को अरिष्ट दोष ३ चरण अच्छे हूँ ।

रेवती प्रथम चरण में जन्म हो तो राजा हो, द्वितीय चरण में मंत्री हो । तृतीय

चरण के जन्म में सुख हो, चतुर्थ चरण में अनेक कष्ट हो ।

( २) आर्लेषा जन्म फल

१ चरण में सुख, सम्पति लाभ । २ चरण में-धन नाश । ३ चरण में माता को

अनिष्ट । ४ चरण में पिता को अनिष्ट ।

अन्यमत--दोनों संष्याओं में जन्म हो तो स्वयं को अरिष्ट कारक होता है.।

(३) ज्येष्ठा के जन्म का फल

१ चरण में बड़ा भाई। २ चरण में छोटा भाई बहन । ३ चरण में पिता या

माता को अरिष्ट । ४ चरण में स्वयं को अरिष्ट ।

अन्यमत--ज्येष्ठा ४ चरण में दिन के जन्म में पिता को अरिष्ट । ज्येष्ठा ४ चरण

छै रात में जम्म में माता को अरिष्ट ।

_ ज्येष्ठा की सर्व घटी में ६ का भाग देने से लगभग १० घटी का १ भाग होगा

उसका फल

१ भाग के जन्म में नानी को अरिष्ट । २ में नाना को अरिष्ट। ३ में मामा को

अरिष्ट । ४ में माता को अरिष्ट । ५ में बालक को अरिष्ट । ६ में कुल को अरिष्ट । ७

में मातु-पितु दोनों बंशों को । ८ में भ्राता । ९ में स्वसुर । १०ब भाग 4 सर्वनाश 1

ज्येष्ठा में कन्या हो और मंगलवार हो तो ज्येष्ठ भाई का नाश करे ।

(४) मूल नक्षत्र के जन्म का विचार

१ चरण में पुत्र जन्म हो तो पिता को अरिष्ट | कन्या का जन्म हो तो स्वपुर को

अरिष्ट । २ चरण में जन्म माता को अरिष्ट, कन्या जन्म हो तो सास को अरिष्ट। ३

रण में जन्म घन नाश । ४ चरण में जन्म हो वंश नाश ।

अन्यमत से--४ चरण में जन्म शुभ हो । जातक पारिजात और जातकाभरण मेँ.

चोथे चरण में जन्म-शुभ माना Š ।

मूल कहाँ है

फाल्गुन, ज्ये, वैशाल, अगहन में पावाऴ में वास शुम ह 1 आढ, भा दो

आरिविन, माघ में स्वग में वास शुभ है । श्रावण, कातिक, पुष, चेत्र में पृथ्बो में वास

` मृत्यु रूप हे ।

—.A-Ag<ks ovOYra

निषेक अध्याय : २३१

मूल नक्षत्र का द्वादश गंड फल

सूल'नत्रक्ष की सवेघटी में १२ का भाग देने पर १ माग लगभग ५ घटी का पड़ेगा ।

१ भाग में जन्म पिता को अरिष्ट । २ में माता को अरिष्ट। ३ में भ्राता को

अरिष्ट 1 ४ में बहिन को अरिष्ट । ५ में स्वपुर को अरिष्ट । ६ में चाचा को अरिष्ट ।

७ में मौसी को अरिष्ट। ८ में सम्पत्ति को अरिष्ट । ९ में बालकोंो अरिष्ट । १० में

दरिद्रता | ११ में राज्य प्राप्ति । १२ वें भाग में सम्पत्ति प्राप्त ।

पुरुषाकार मूल और आदलेषा का फल

नक्षत्र के १० विभाग नीचे बताये प्रकार से शरीर के अंगों के हैं ।

मूल नक्षत्र आश्लेषा नक्षत्र शरोर अंग घटो फल

विभाग क्रम विभाग क्रम

१ पहिला श्०्वाँ सिर ५ छत्र लाभ

२ ९ मुख ५ पिता नाश

३ ८ दोनों कन्घे ८ भार वाहन कर्ता

Y ७ दोनों बांह ८ खोटे कमं करे

५ < दोनों हाथ २ हत्या करनेवाला

६ ष्‌ हृदय ८ राज्य प्राप्ति

७ x नाभि २ अल्पायु

८ ३ कपर १० अद्भुत सुख

९ २ जंघा ६ ` भ्रमण करे

१० qt १ पहिला पैरों में ६ अल्प जीवी

यहाँ आश्लेषा का विरुद्ध क्रम से बताया है: जैसे पहिला भाग ६ घटी का

वैरों में अल्पजीवी । दसवां भाग सिर में ५ घटी का फल छत्र लाभ | इस प्रकार

समझना । मूल का फल यहाँ बताये क्रमानुसार ही लेना । परन्तु मूल के विरुद्ध आश्लेषा

का फल यहाँ बताया है ।

बृक्षाकार मूल से फल विचार

१ जड़ ४ घटी-फल नाश । २ स्तंभ ७ घटी-घननाश । ३ त्वचा १० घटी-माई

को अरिष्ट । ४ शाखा ८ घटी-माता बो अरिष्ट। ५ पत्ते ९ घटो-परिवार को अशुभ ।

६ पुष्प ५ घटी-राज मैत्री । ७ फल ६ घटो-राउय प्राप्ति 1 ८ चोटी ११ घटी-अल्पायु ।

सूल के ३० मुहूतं

यहाँ x चिल्ल वाले नक्षत्र में बालक उत्पन्न हो तो परिवार का नाश करता है ।

ये क्रम से १, २, ६, ८, १८, २३ वें qgd हैं जिनमें परिवार का नाश होता हैं ।

इसमें आएलेषा के ३० मुहूतं के नाम दिये हैं । यहाँ भएलेषा को मूल के विरुद्ध

क्रम से इनकों गिनना चाहिये । Po ट

२३२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मूल नक्षत्र में ३० मुहूतं हैं जिनके नाम

भूल का मुहतं नाम आइलेषा का | मूल का मुहूतं नाम. आइलेषा का

मुहुतं क्रम मुहूर्त क्रम | मुहूतं क्रम मुहूर्त क्रम

१ला राक्षस ३० वां १६ दिवाकर १५

२८२ यातुघान २९ १७ qaq १४. “t ३:17 सोम qs > १८ q. १३

४ शुक्र २७ , १९; ब्रह्मा १२

५ फणीश्वर २६ २० विष्णु ६

x ६ पिता २५ २१ यम १०

७ माता २४ २२ ईश्वर ९

८ यम २३ x २३ विष्णु ८

% ९ काल २२ २४ द्र ७

१० विश्‍व देव २१. २५ पवन ७

११ महेश्वर २० २६ स्वामी कातिकेय ५

१२ रव १९ २७ भूगरीटी ४

१३ कुवेर १८ २८ गौरी ३

१४ शुक्र १७ २९ सरस्वती २

१५ मेघ १६ . ३० वाँ प्रजापति १ पहला मूल के साथ अशुभ योग

यदि मूल नक्षत्र के समय क्षयतिथि, व्यतीपात, व्याघात, वैधृति, शूलगंड, अतिगंड

ओर परिधि योग हो विष्टि करण ( भद्रा ) हो, यमघंट, ब्रह्वादंड या मृत्यु योग आदि अशुभ योग हों तो बालक सारे कुछ का नाश करे। इसकी अवश्य शांति करानी चाहिये । ;

मूल में और भी विचार

(१) मूल नक्षत्र में जन्म हो और कृष्ण तृतीया को मंगलवार हो या कृष्ण दशमी को शनिवार हो या शुक्ल चतुदंशी को बुधवार हो तो ऐसे समय में जन्मा बालक कुल का नाश करे 1

(२) दिन, संध्या, रात्रि और प्रातःकाल में जन्म हो तो क्रम से पिता-माता, पशु ओर मित्र वर्गों को मूल नष्ट करता ë ।

(३) मूल में कन्या इतवार को जन्मे एवसुर का नाश करे । मूल नक्षत्र के १५ विभाग का फल

पूर्ण नक्षत्र की घटी मॅ १५ का भाग देने से १ भाग का समय निकल आयेगा ।

१ भाग पिता को अरिष्ट, २ भाग चाचा को अरिष्ट, ३ भाग बहनोई को अरिष्ट,

EN भाग पितामह को अरिष्ट, ५ भाग माता को अरिष्ट, ६ भाग मौसी को अरिष्ट,

निषेक अध्याय : २३३

“७ भाग मामा को अरिष्ट, ८ भाग चाची को अरिष्ट, ९ भाग सर्वनाश, १० भाग पशु

का नाश, ११ भाग नौकर का नाश, १२:भाग जातक का नाश, १३ भाग ज्येष्ठ भाई

को अरिष्ट, १४ भाग बहि। को अरिष्ट, १५ भाग नाना को अरिष्ट ।

जैसे--मुल का भभोग ६२-१५ है+ १५= १ खंड ४-९, घटी. का पड़ा इसका

आठवां खंड ३३-१२ तक है । ९वां खंड ३७-२१ तक है मान लो इष्ट ३६-११ है तो

९वें खंड में जन्म हुआ जिसका फल सर्वनाश है ।

(५) मघा में जन्म फल

१ चरण जन्म मामा का नाश V ३ चरण में जन्म सुख सम्पत्त ।

२ चरण में जन्म पिता । ४ चरण में जन्म घन लाभ सम फल ।

पिता का नाशक गंडयांग

अश्विनी के पहले चरण में--१६ वर्ष में गंड दोप होता है पिता को अनिष्ट 1

मघा के पहले चरण में--८ वर्ष में गंड दोष होता है पिता को अनिष्ट 1

ज्येष्टा के पहले चरण में--१ वर्ष में गंड दोष होता है पिता को अनिष्ट ।

चित्रा के पहले चरण में--५ वर्ष में गंड दोप होता है पिता को अनिष्ट ।

मूल के पहले चरण मॅ--४ वर्ष में गंड दोष होता है पिता को अनिष्ट ।

आए्लेषा के पहले चरण में--२ वर्ष में गंड दोष होता है पिता को अनिष्ट ।

रेवती के पहले चरण में--१ वर्ष में गंड दोष होता है पिता को अनिष्ट ।

-उत्तरा के पहले चरण में--२ मास में गंड दोष होता है पिता को अनिष्ट ।

“पुष्य कें पहले चरण में--३ मास में गंड दोष होता हैं पिता को अनिष्ट 1

यूर्वाषाढा के पहले चरण में--९ मास में गंढ दोष होता है पिता को अनिष्ट 1

(हस्त के गंड में उत्पन्न--१२ वर्ष में पिता का संहार करे ।

अमुक्त मुल में उत्पन्न--उसो क्षणं पिता का नाश करे ।

इतर जन्म के अशुभ योग

(१) पिता के जन्म नक्षत्र या १०वें नक्षत्र में उत्पन्न बालक पिता का नाझ

करता है । (२) पिता की जन्मराशि के नवांश में तथा उसके लात में बालक पिता का

तुरन्त नाश करता है। (३) मुसल “और मुद्गर योग में उत्पन्न-"शुभ नाशक 1 (४) भद्रा

में उत्पन्न-दरिद्र-। (५) गुलिक में उत्पन्न--अंगहीन । (६) रिक्ता तिथि में उत्पत्त--

नपुंसक । (७) यमघंट में उत्पन्न--लंगड़ा । (८) ग्रह पीडित में उत्पन्न--रोगपीडित ।

(९) व्यतोपात में उत्पन्न--अंगहोनः । (१०) परिधि योग में उत्पन्न--मृत्यु ।

(११) वैधूति योग में उत्पन्न--पिता “का नाशक ।. (१२) विष्कुंभ में उत्पन्‍्त--घन

नाश । (१३) शूल में उत्पन्न-शूल रोगो | (१४) गंड में उत्पन्न--गंड रोग ।

(६) अन्यत्री फल ` i °

(१) चरण--पिता को भय । (३) चरण--मंत्री पद ।

(२) चरण--सुख ऐदवयं । (४) चरण--राज सम्मान ।

२३४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

पर्वाषाढा के जन्म फल

कई ने इसका जन्म भो अशुभ बताया है मूल के आगे यह नक्षत्र है 1

(१) चरण--पिता को अरिष्ट । (३) चरण--मामा को अरिष्ट ।

(२) चरण--माता को अरिष्ट । (४) चरण--बालक का अंग ।

अमावस्या जन्म फल

अमावस्या के दिन जन्म स्त्री, पशु, हाथी, घोड़ा, भैस के बच्चा हो लक्ष्मी का

नाश करता है ।

चतुर्दशी मिली अमावस्या (सिनीवाली) में एवं प्रतिपदा मिली अमावस्या (कुहू) में

उत्पन्न बालक को त्याग देना बताया है । बहुत अशुभ है इसकी शांति विघानपुवंक

करानी चाहिये ।

ग्रहण में जन्म

राहु केतु द्वारा चन्द्रग्रहण में चंद्र का घेरा बन जावे और उसे कोई पापग्रह देखे

तो बालक तुरन्त मरे । ग्रहण के समय जो बालक होता है वह कम जीता है । यदि जिये

तो बड़ा आदमी होता है 1

दाँत विचार

१-दांत सहित बालक उत्पत्न--कुळ का नाशक हो। २-दूसरे मास से ४ मास

तक दांत होवे--पिता को अरिष्ट । ३-६ठे मास में दांत होवे-शिशु को अरिष्ट । ४-७.

: मास में दांत होवे--शुभ होता है।

| गंडयांति विधि

अरिष्ट चंदन कुष्ट गोरोचन इनको घी में मिळाकर ४ कल्शों में भरे फिर पंडित

“सुहस्नशीर्षा” ” इस मंत्र से यदि दिन में बालक उत्पन्न हुआ हो तो पिता सहित,

यदि रात्रि में हुआ हो तो माता सहित यदि दोनों संध्या में उत्पन्न हो तो माता-पिता

i सहित स्नान करावे । और गंड की शांति के लिये घी से पुणं कांसे का बत॑न देवे ग्रह का

ज्ञप भी करावे, यथाशक्ति काळी गाय सुवणं आदि दान देवे ।

अन्यमत--नवरत्न १०० औषधियों की जड़ सप्तमृत्तिका से पणं .करे और १००

छेदवाले घड़े में से निकाले हुऐ जल से उत्पन्न वालक और माता-पिता को स्नान करावे ।

ब्राह्मणों के कहे हुए मंत्र से जप-होम-दान से शांति कराने से मंगळ होता है ।

सर्वे अरिष्ट निवारण के लिए इस प्रकार ब्राह्मणों का दान देना । |

नक्षत्र हस्त अ्बिनी रेवती ज्येष्ठा मघा मूल उत्तरा. पुष्य पूषा चित्रा इलेषा

वस्तु-_ स्वर्ण वस्त्रदान धुत गौ स्वर्ण महिष तिल घेनु सुवर्ण वस्त्र अश्व

i ॥ 1 i

|

अध्याय ११

युगसंबत्सरादि फलाध्याय

कलियुग जन्म फल--बडा कामी, घन से हीन, यशहीन, दुराचारी, दुष्ट बुद्धि, भनेक

प्रकार से दुखी ।

द्वादश युग फल--

६० वषं में १२ युग व्यतीत हो जाते हैं 1 यहाँ प्रत्येक ५ वर्ष का १ युग माना है 1

१२ युगों के फल :

१ युग--मद्य मांस अक्षी, परदारा रत, बड़ा कवि, बड़ा कारीगर, वुद्धिमान ।

२ युग--वाणिज्य व्यवहारी, घामिक, संत्यवादी, द्रव्यलोभी, अतिपापी 1

३ युग --भोक्ता, दानी, देव ब्राह्मण पूजक, बड़ा तेजस्वी, धन युक्त ।

४ युग--बाग बगीचा; खेत की प्राप्ति, दवा सेवन का प्रेमी, घातु विषयक कर्म

में घन नाशक । 2

५ युग--पुत्र संतति हो, घनवान, इन्द्रिय जीत, माता-पिता का प्रिय ।

६ युग अनेक शत्रुयुवत, बड़ा नीच, सदा भैंस की सेवा करने में प्रसन्न, पत्थर

हारा अपघात हो, बड़ा भयभीत ।

७ युग- बहुत मित्रों का प्रिय, अनेक मनुष्यों का प्यारा, व्यापार में कुटिल बुद्धि,

शीघ्रता से चलने वाला, अतिकामी ।

_ ८ युगं--पापकर्म कर्ता; व्याधि और दुःख से युक्त; संतोष युक्त, जीवों की हिसा

करने वाला । i

९ युग--कुआ तालाब बावली आदि बनवाने वाळा, देव-अतिथि प्रेमी, इन्द्र के

समान प्रतापी । 2

१० युग--राजा का मन्त्री, सुन्दर रूप, सुन्दर वेश करनेवाला, दानी, स्थानप्राप्ति

के कारण महा सुखी ।

११ युग--बड़ा बुद्धिमान, बड़ा सुशील, युद्ध में शूरवीर । !

१२ युग--बड़ा प्रतापी, सदा प्रसन्न, मनुष्यों में श्रेष्ठ, खेती और व्यापार करने

चाला ।

६० सम्ध॑त्सर हैं उनमें जन्म का फल च

(१) प्रभव में--साहसी, सत्यवक्ता, समस्त. गुणयुक्त, घर्मवान, कालज्ञ सम्पूर्ण

वस्तुओं के संग्रह में तत्पर, पुत्र संतानवाला, श्रेष्ठ बुद्धि, भोगी, दीर्घायु, विद्वान,

बलवान, क्रूर स्वभाव । B

(२) विभव--कामी, मित्र संतुष्ट, धनवान, बंधु विद्याय युक्त अतिचंचल स्त्रियों

जैसे स्वभाव वाला, परोपकारी, चोर, भोगी, बलवान, कलाविद कुल में राजा के समान,

शीलवान, पण्डित । -

(३) शुक्छ-बलछ रहित, परस्त्री गामी, त्यागी, सुशीछ, बड़ाशांत, निघंन,

परोपकारी, विद्या और नम्रता युक्त, श्रेष्ठ पुत्र ओर स्त्री, श्रेष्ठ भाग्य, शुद्धता पुर्वक

रहने वाला । | - š

२३६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(४) प्रमोद--जोलने में चतुर, मंत्री, कार्य में लीन, दाता, पुत्र से आनन्दयुक्त,

गुणवान, चतुर, धूर्त, अभिमानी, पराया. कार्यं करनेवाला, बांधवों से शत्रुता. रखने

वाला, राज्य कुल में पूज्य, मित्रों से झगड़ा, कभी लक्ष्मी, कभी भार्यायुक्त ।

(५) प्रजापति या प्रजाधीश--धर्म करने वाळा, दान में तत्पर, धनवान, शांत,

पुत्रवान, दयावान, सुन्दर शोल, देव, ब्राह्मण पुजक, नम्र, भोगी, धन के कारण देशों में

विख्यात, स्त्री का अभिमानी, प्रजा पालन में प्रसन्न ।

(६) अंगिरा--नीतिज्ञ, निपुण, घनी, कृपाळू, स्त्री से सुखी, भोगी, मानी, प्यारी

बोली, दीर्घायु, बहुत पुत्र, धर्मशास्त्र मंत्रशास्त्र आदि शास्त्रों में प्रवीण, अतिथि. एवं

मित्रों का भवत, छिपी बुद्धि। :

(७) श्रींमुख--लक्ष्मीवान, सदा प्रतापी, शास्त्रों का ज्ञाता, सुन्दर पति, मित्रो को

प्रिय, बलवान, उदार, श्रेष्ठ कीति, देवभक्त पाखण्डी, धनवान, पवित्र, परस्त्री में प्रेम ।

(८) भाव--श्रेष्ठ चित्त, यशस्वी, गुणी, दानी, नम्र, बंधुजनों को प्रिय, विचार￾कुशल, मछली के मांस का प्रेमी, बलवान, धनवान, योगी, राज्य करने वाछा 1

(९) युवा--प्रसन्न, नञ्ज, गुणवान, शांत, दानी, दृढ़ देह, श्रेष्ठ बुद्धि दीर्घायु, जल

से डरने वाला, स्त्री निमित्त दुःखी, व्याधि और दुःख से पीड़ित, लोभी, चंचल बुद्धि,

क्रोधी, ऋणदेह, वैद्य, सबसे प्रेम व्यवहार ।

(१०) घातृ या धाता--गुणवान, गौरवयुक्त, गुरुभक्त, शिल्पविद्या में चतुर, शीलवंत,

सुन्दर रूप, धनवान, शठ, परस्त्री में प्रेम, दीन रक्षक ।

(११) ईइवर--शीध्न क्रोधित होने वाला, प्रतापी, चतुर, गुणवान, प्रसन्न चित्त,

शीलवान, कलाओं में कुशल, घनवान, भोगो, कामी, पशुपालन का प्रेमी, अर्थ धर्मयुक्त,

बलवान, बुद्धिमान ।

(१२) बहुधान्य--व्यापार में चतुर, राजा से मान्य, दानी, अभिमानी, शास्त्रज्ञाता,

अन्न और धनयुक्त, कला और संगीत में कुशळ, सत्कर्मो, भोगी, मद्य पीनेवाला ।

(१३) प्रमाथी-क्रूर, पापी, “क्रोधी, वंधुहीन, सुखी, अनेक व्यसन युक्त, दूत कर्म

करने वाला, पर दारा, पर धन प्रेमी, शत्रु नाशक, मन्त्री, शास्त्र का ज्ञाता, रथ, घ्वजा, घोड़े, छत्र आदियुक्त ।

(१४) विक्रम--पराक्रमी, धनी, सेनापति, सदा संतोषी, प्रतापी, अनेक विद्या का

ज्ञाता, शत्रु नाशक, उदार, बलवान, चतुर, उम्र कर्म करने में तत्पर 1

(१५) वृष--निलंज्ज, दरिद्री, कमंहीन, मोटा पेट, स्थूल शरीर, छोटे हाथ, कुल￾निंदक, बहुतों से घन का लेनेवाला, भाळसी, लोभी, मलीन, बहुत जनों का स्वामी,

पराया काम करने वाला, निद्यशील, कार्य में अधिक बात करनेवाला ।

(१६) चित्रभॉनु--चित्र-विचित्र पुष्यों को धारण करनेवाला, चिन्तायुवत, कला-

युक्त, शीलवान, तेजस्वी, घमण्डो, देवपूजा प्रेमी, दृढ़, हीन कर्म करनेवाळा । |

(१७) सुभानु--सव॒ वस्तुओं का संग्रहकर्ता, श्रेष्ठ कांति, बुद्धिमान, शत्रुओं को

जीतनेवाला, नग्न, प्रसन्न चित्त, निज कुल की विद्या और आचारयुक्त, वैभवयुकत । .

१1"

युगसंवत्सरादिफलाध्याय : २३७०

(१८) तारण--धृतं, शूर वीर, ` चपल; कलाविद्‌, कठोर चित्त, निदित काम करनेवाला, घनो, लोकप्रिय, राजद्वार से घन पानेवाला, सब घर्म बहिष्कृत, विवेकी ।

(१९) पाथिव--स्वघम कर्म में तत्पर, कला और शास्त्रों का ज्ञाता, सुखी, विलासी,

धर्मात्मा, श्रीमान्‌ ।

(२०) व्यय-कामी, डरपोक, पापी, शील, घन गुणरहित, अनेक मित्र, भोगो,

'कजंमंद, खर्चीछा, अस्थिर चित्त, सब में प्रधान, निर्भय ।

(२१) सवंजित--वाचाल,; बलवान्‌, गुणी, -तत्ववेत्ता, शास्त्रों, पुण्य कर्मी, राजा

से वेभव प्राप्त, पवित्र मोटो देह, शत्रुजित, उत्सव्‌ युक्त ।

(२२) सरवंघारी--राजम्रिय, माता-पिता को प्रिय, गुरुभक्त, शूरवीर, शांत प्रकृति,

प्रतापो, धीर, गुगवान, योगी, मिष्ठान्न प्रिय, बहुत सेवक हों ।

(२३) विरोधी--बड़ा बोळनेवाला, परदेश भ्रमण, कुटुम्ब एवं सौख्य युक्त, धूर्त,

मित्र रहित, मांस मत्स्य भक्षक, लोक पूज्य, निजघमं में प्रोति, पाप कमं करने वाला,

दुष्ट, शोक युक्‍त ।

(२४) विकृति--धनहीन, अभिमानी, सुन्दर बुद्धि, मित्र .रहित, नृत्य गान में

चतुर, दाता, भोगी, विचित्र वचनमाषी, मायावी, कामातुर, तंत्र-मंत्र विद्या का ज्ञाता 1

(२५) खर--कामातुर, मलिन देह, असार वाणी, कठार, लज्जा रहित, बलेश

युक्त, दोघं, कुटुम्ब के वोझ को उठाने में उत्साह, निर्मोही, निर्गुण, पापो, दीन वचन ।

(२६) नन्दन--तालाव वावली कुआ भादि बनाने में प्रेम, अन्नदान में प्रीत, सब

में प्रीत, कल्याण कमं कर्ता, राज्य में प्रतिष्ठा प्राप्त, राजा का प्रिय, आनन्द प्राप्त,

मंत्र के मर्थं का ज्ञाता ।

(२७) विजय--युद्ध में धीर, श्रेष्ठ शरीर, राजा से मान्यता प्राप्त, दाता, दयालु

श्रेष्ठ बोली, शत्रु नाशक, शुभ कमं करने वाला, कीतिवान, आयु यश'ओर सुख से युक्त),

घामिक सम्पत्ति युक्त, ' सत्यवक्ता ।

(२८) जय--शास्त्रार्थ प्रेमी, माननीय, शत्र, नाशक, पराक्रमी, विषयी, युद्ध में

जय, व्यापार करने वाला, राजा के सदृश । .

(२९) मन्मथ--विशेष आभूषण युक्त, मीठी वाणी, विलासी, कलाविद, गीत नृत्य

प्रिय, भोगी, कामी, बुद्धिमान, लोभी, घनी, निष्ठुर, बली, श्रु जित 1

(३०) दुमुख--क्रूर, दुष्ट बुद्धि, छोभी, शीलहीन, विकृत अंग, गुगहीन, विवादों,

कुरूप स्त्रियों से प्रेम, चतुर, परोपकारी ।

(३१) हेबिलम्ब या हेमलम्ब--धन, रत्न, वाहन, सेना आदि से युवत, पुत्र और

स्त्री का सुख प्राप्त, कृपण, दान न देने वाला, दुष्ट, कृषि आदि कमं में प्रेम, परन्तु

सर्वत्र पूजित ।

(३२) विलम्ब या विलम्बि--बडा घृतं, लोभी, आलसी, कफ प्रकृति, बलहीन,

व्याघि से दुःखो, कुटम्ब पालक, श्रीमान, विप्र जन का आश्रित, प्रारब्ध कार्यों में सदा

प्रलाप करने वाला ।

7२३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(३३) विकारी -मिथ्या हठ करनेवाला, कला में प्रवीण, चंचल बुडि, qq बहुत

"बोल्ने वाला, रवत विकार युक्त, पित्त प्रकृति, रक्तनेत्र, दरिद्री, वनवासी, डरपोक ।

(३४) शबंरी--व्यापार के काम में -चतुर, विलासी, मित्रों का विरोधो, अनेक

विद्याओं का प्रेमी, वेद शास्त्र प्रेमी, देव ब्राह्मण भक्त, मिष्ठान्न रस भोजी, आचारवान

घनवान ।

(३५) प्लव--कामी, धनवान, सेवा से आदर पाने वाला, चञ्चल स्वभाव, निद्रालु,

भोगी, लोक पूजित, शांत, उदार, पराक्रमी, दयालु घर्मात्मा व्यवसाय करनेवाला ।

(३६) शुभकृत--सोभाग्य, विद्या नम्रता युक्त, पुण्यवान, दीर्घायु, पुत्र और घन

से सुखी, शुभ कर्म कर्ता, यशस्वी, घर्मशीक, प्रतापी, प्रजापालक, पंडित, स्त्रीजनों

से वंचित ।

(३७) शोमन--ऊँचा शरीर, गुणी, दयावान, श्रेष्ठ कर्म, नम्र, प्रवीण, श्रेष्ठ नेत्र

शांत चित्त, श्रवोर दानी, ज्ञानी, विद्या का प्रेमी ।

(३८) क्रोधी--क्रूर दृष्टि, दुष्ट, अति अभिमानी, स्त्री को प्रिय, परकार्य को

बिगाइने वाला, क्रोधी, शरवोर, विज्ञान और औषधियों का संग्रह करने वाला या इनका

ज्ञाता, पर स्त्रो से प्रेम, राठ बुद्धि ।

(३९) विश्वावसु या विश्व--पुत्र और स्त्रो युक्त; उदार, भाचारवान, धयंवान

मिष्ठान्न प्रिय, गुणी, मनुष्यों में प्रधान, हास्य रस प्रिय, माननीय ।

(४) पराभव-_कठोर वचन, कितना ही संग्रह करे परन्तु घन धान्य रहित, धूर्त,

आचार विचार हीन, भय युक्त, शीत से भय, डरपोक, अधर्मी जीव, हिंसक, कुल

नाशक, दृष्ट आचरण ।

(४१) प्लवंग-चंचल चित्त, घृतं, आचार विचार रहित, कूर, चोर, योगा म्यासो

पृथ्वी पालक, कामो, मंद बुद्धि, श्रेष्ठ कायं में प्रवृत्ति नहीं करे ।

(४२) कीलक--प्रिय वाणी, दयाछु, जळ को बारम्बार इच्छा, स्थूल और श्रेष्ठ,

स्थिर, बलवान्‌, चित्रकार, अभिमानी, मातु पितृ भक्त, ब्राह्मण प्रिय, पराक्रमी, सुखी ।

(४३) सौम्य--पंडित, धनवान, भोगो, देव और अतिथि का प्रेमो, पवित्र, सात्विक

स्वभाव, दुर्बळ देह, शीलयुक्त, चतुर, प्रतापी, इन्द्रिय जित, शांत स्वभाव, सर्वं जन

प्रिय, धैयंवान । ` °

ओ- (४४) साधारण--क्रोधी,£ विवेकी, दृढ विश्वासी, अल्प संतोष, धमं कर्म में तत्पर,

मंत्र शास्त्र ज्ञाता, विफल बुद्धि, लेखन क्रिया में कुशल, इधर उघर घूमने वाला 1

(४५) विरोधीकृत--क्रोधी, विरोधी, पिता की आज्ञा का विरोधी, वांधवों से

विरोध, देव आराघन में तत्पर, क्षण में.सोम्य क्षण में होन. भ्रमण शील, दरिद्र, आशा

पर रहने वाला ।

(४६) परिघावी- विद्वान, शीलवान, कला में कुशल, श्रेष्ठ बुद्धि, राजा से मान्य,

युग संवत्सरादि फलाध्याय ११ : २३९

व्यापार में प्रतिष्ठा, कर्म में आळसी, देशों म॑ भ्रमण करने वाला, देव ब्राह्मण का प्रेमी,

धनवान, कटुवचन भाषी 1

(४७) प्रमादी-- दुष्ट, अभिमानी, कलही, लोभी, अल्प बुद्धि, बुरे कर्म, परस्त्री

अमी, बंधुओं से विराग, ईश्वर. पूजक ।

(४८) आनन्द-चतुर, पंडित, कृतज्ञ, नम्रता युक्त, पत्रों से आनन्द, बहुत स्त्री

अतिथियों का सेवक, धनवान, प्रसन्त चित्त, तत्वज्ञानी, वेद शास्त्र प्रेमी, सदा आनन्द

युक्त ।

(४९) रासक्ष--क्रूर, खोटे कर्म, कलह कारक, श्रेष्ठ घर्महीन, दयाहीन, साहसी,

मछली के मांस का प्रेमी, हिसक वृत्ति, मद्यपान ` करे, निष्प्रयोजन पाप कर्म करे, पापी,

अपकारी, वृथावफ़वादी ।

(५०) नल--श्रेष्ठ बुद्धि, खेती से घान प्राप्त, वैश्य वृत्ति.में चतुर, थोड़ा घन,

सुशील, चपल, बहुत जनों का पालक, अनेक पुत्र व मित्र, द्रव्य लोभी, कलह प्रिय, दानी,

-गुणी, शांत, सदाचारी ।

(५१) पिंगलळ--पीले नेत्र, शठ, त्यागी, निषिद्ध कमं करने वाला, अति कठोर,

पित्त कोप से रोग, अनेक वाहन, मन को जीतने वाला, तपस्वी !

(५२) काल युक्‍त--खोटी बुद्धि, बहुत बोलने वाला, कलहकारी, विकरालरूप,

खेती और व्यापार करने वाला, कालज्ञ, घन का उपयोगी, प्रीत वाला, क्रय विक्रय का

काम करने वाला l :

(५३) सिद्धार्थी--उदार चित्त, दयावान, संग्राम में यश, सुन्दर केश, मन्त्री

पुजनीय, वेद शास्त्र ज्ञाता, सुकुमार, कोमल चित्त, कवि, विद्वान, सिद्धार्थी, गुरु तथा

देव का भक्त । :

(५४) रोद्र--भयंकर पशुओं का पालक, धूर्त, विवादी, अपयशी, रौद्र स्वरूप चोर,

चपल, निर्दय कम करने वाला, दुराचारी, पर स्त्री गामी ।

(५५) दुमंति--खल, कामी, पापी, दुष्ट बुद्धि अभिमानी, अपने वाक्य का qeq

करने वाला, प्रसन्नता हीन शोक से संतप्त ।

(५६) दुंदुमि--राजा से. गौरव प्राप्त, वाहन, सुवर्ण, भूमि, गीत वाद्य नृत्य में प्रेम

मंत्र औषधि आदि जानने वाला, स्थूल शरीर भोगवान ।

(५७) रुघिरोंदुगारी--क्रोषी, वायु और रुधिर के रोग, कफ वात प्रकृति, झूठी

गवाही देने वाला, सुखी, घनवान बुद्धिमान, लाल नेत्र ।

(५८) रक्ताक्षि या रक्ताक्ष--आचार और घमं में तत्पर, नेत्र रोगी, कामी, देश

का त्याग करने«वाला, सर्वत्र हानि युक्त, विना विवाह के स्त्री रखे, शीलवान बंधुजन

का प्रिय, शांत ।

(५९) क्रोधन--पर कायं में विघ्न; कर्ता, क्रोधी, अयंकर स्वरूप, पराक्रमी पर स्त्री

गामी, बंधु से वर, चोरी में विरत, दूसरों से जीविका करने वाला ।

|

२४० : ज्योतिष-शिक्षा, q तीय फलित खण्ड

(६०) क्षय-- कुटुम्ब में कलह, मद्य पान, वेष्या संग का प्रेमी, कठोर चित्त, “माती

शत्रुहीन, निरोग, सेवा में तत्पर, शिष्टाचार वाला पर घमं अघमं के विचार.से शुन्य ।

अयन फल

मकरादि---उत्तरायण-शिशिर आदि ३ ऋतु=्देव का दिन ।

कर्काद--दक्षिणायन-शेष ३ ऋतु=्देव की रात्र ।

१ उत्तरायण--रूपवान, गुणी, प्रतापी, सब शास्त्रों में प्रेम, धर्मार्थ काम विषय में

कुशल, प्रसन्त चित्त, उदार, घैयंवान्‌ आचार में तटार, दीर्घायु, पुत्र स्त्री इनसे संतोष ।

२ दक्षिणायन--झूठ वकता, अवर्मी, रोगी, अभिमानी, खेती करने वाला, गो-भेंस

आदि चतुष्पद युक्त, कठोर, शठ, किसी की बात न सहन करने वाला, बोलने में चतुर ।

गोल फल

मेषादि-उत्तर गोल, तुलादि--दक्षिणं गोल । `

उत्तरगोल--घनवान, विद्वान, पुंत्र-पौत्र युक्त, राजमान्य 1 .

दक्षिण गोल--सदा सुख से हान, झुठ ववता, दुराचारी, अंगहीन, घन रहित t

ऋतुफल

(१) शिशिर--मकर कुंभ के सूर्य में (२) वसंत--मीन, मेष के सूर्य में ।

(३) ग्रीष्म--वृष, मिथुन के सूर्य में (v) वर्षा--कर्क सिंह के सूर्य में ।

(५) शरद--कन्या तुला के सूर्य में । (s) हेमन्त--वृश्चिक घन के सूर्य में

(१) शिशिर--अमिमानी, उद्दंड, कामी, मिष्टान्न प्रेमी, बलवान, क्षुघायुबत, पुत्र,

स्त्री सहित, रूप यौवन सम्पन्न, यशस्वो, दानी, मानी श्रेष्ठ कर्म करने वाला, सुखी ।

(२) वसंत--परिश्रमी, धैर्यवान, तेजस्वी, बुद्धि मान, प्रतापी, गाने-बजाने में चतुर,

  • ` शास्त्रविद, प्रसन्न चित्त, उद्यमी, अनेक देशों में रत, बहुत कार्य करने वाला सुगन्ध

प्रिय, घनिक दीर्घायु ।

  • (३) ग्रीष्म--ऐश्वयंवान, विद्या घन, अन्न युत, भोगी, वाचाल, क्रोधजित, दानी,

, बुद्धिमान, शूरवीर, जलविहार, प्रिय, लम्वा शरीर, कृश तनु ।

(४) वर्षा--बुद्धिमान, प्रतापो, घाड़े से प्रीत, भोगी, गुणी, राजमान्य, जितेन्द्रिय,

चतुर, कफ और वात युक्त, घातु .वादी, सुवचन, स्वच्छ बुद्धि, क्षीर दूध, कटु

पदार्थ का ग्रेमी ।

(५) शरद--वाणिज्य तथा खेती द्वारा जीविका, प्रतापी, प्रतिष्ठित, धनघान्य युक्त,

क्रोध हीन, वात प्रकृति, अभिमानी वाहन युक्त, संग्राम प्रिय, पुण्यात्मा, कामी ।

(६) हेमंत--व्याधि युक्त) तेजहीन, नम्र, पराक्रमी, श्रेष्ठ md और घर्म युक्त

चतुर, उदार, कृषक, भोगी, कृष, शरोर।।

मास फल

१. चैत्र--लालनेत्र, अहंकारी, क्रोधी, भोगो, श्रेष्ठकर्म, विद्या विनययुक्त, मधुर

अन्न भोजी । शास्त्रज्ञाता, सत्पुरुषों से मित्रता, कलाविद, विचित्र यंत्र ।

युगसंवत्सरादि फलाध्याय : २४१

२. वैसाख--भोगी, धनी, प्रसन्नचित्त, विशालनेत्र, बलवान, गुणशीलवंत, देव -

ब्राह्मणभक्त, कामी, दोर्घायु, शास्त्रविद, क्रोषी, ज्रातृसौख्ययुक्त स्वतन्त्र रहे, श्रीमन्त होवे।

३. ज्येष्ड--उदार, घनी, बुद्धिमान, दीर्घायु, परदेश में वास, तीव्र बुद्धि, पुत्रवान,

मंत्र क्रिया का ज्ञाता, साहुकार ।

४. आषाइ- घर्मात्मा, पुत्र पौन्न युक्त, बहुत खच करने वाला, मिथ्यावादी, प्रलापी,

गुरुभक्त, मंदाग्नि रोग, अभिमानी, अल्पसुख, कृपालु, भोगी, घनी ।

५, श्रावण--पुत्र पोत्र स्त्री और मित्र से सुखी, पिता की आज्ञा का पालक, देव,

ब्राह्मण का पूजक, स्थूलदेह, सुख दुःख हानि लाभ में समचित्त ।

६. भाद्रपद--प्रसन्नचित्त बकवादी, कोमल वचन, सुशील, क्षीण शरीर, लक्ष्मीवान,

दानी, नाना प्रकार के देश में लीन, स्त्री और पुत्र का सुख युक्त ।

७. आच्विन--सुखी, काव्य कर्ता, पवित्र आचरण, गुणवान, कामी, विद्वान,

धनवान, दानी, बहुत नौकर वाला, चंचल, अपने जनों का बैरी, श्रेष्ठकायं ।

८. कातिक--कामी, दुराचारी, घनी, व्यापारी, दुष्ट, पापी, बहुत वाणी बोलने

बाला, पुष्टांग, कृषक ।

९. मागंक्षीर्ष--मूदुमाषी, घनी, पराक्रमो, परोपकारी, तीर्थ-यात्रा करने में तत्पर

कलाविद, धर्मात्मा, देव गुरु पितरों का भकत ।

१०. पौष--शुरवीर, प्रतापी, ऐश्वर्यवान; उपकारी, कष्ट से घन प्राप्त, अल्प व्यय,

दुबल, पिता के घन से रहित, गुप्त मंत्र वाला, गुणवान, बलवान ।

११. माघ--विद्वान, घनी, शूरवीर, क्रूर वचन, कामी, घैयंबान, शत्रु नाशक, खल

बुद्धि, योगशास्त्र की विद्या में प्रेम, घर्म करने वाला ।

१२. फाल्गुन--परोपकारी, घनी, विद्वान, विदेश भ्रमण, दयावान, विलासी, गान

विद्या में चतुर ।

१३. मलमास -(अघिक मास)--पनोहर चरित्र, तीर्थयात्रा करने वाला, निरोगी

सबको प्रिय, अपने जनों का.हिंत करने वाला, सांसारिक सुखों से अलग रहने वाला ।

पक्ष फल r

कृष्णपक्ष- क्रूर, स्त्री पी, कलह प्रिय, कामी, माता क भक्त, परिवार का पानु,

परकी सहायता चाहने वाला, चंचल, विवादी ।

शुक्लपक्ष--धनी, उद्यमी, ज्ञानी, कायं कुशल, शास्त्रविद, दीर्घायु, पुत्रवान, नम्न,

चतुर, कृपालु, wá में लीन 1

दिन-रात जन्मफल

दिन में--सतधर्मी, बहुत पुत्र, भोगी, बुद्धिमान, कामी, धनवान, पिता के तुल्य

भाइयों से पूज्य, सुन्दर नेत्र ।

रात कमा अतिकामो, क्षयरोगी, क्रूर आत्मा, s नेत्र, दुष्ट, पापी ।

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२४२ t ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय खण्ड फलित

जन्म के समय का फल

प्रातः--घर्म में युक्त, सत्कर्म में जीवन सुखी ।

मध्याज्ञ--गुणवान, राजा के तुल्य ।

अपराह्ल--घनी ।

सायंकाल--सुगंघ और स्त्री में प्रीत, खल, भ्रमणशील ।

रात्रि में-सायंकाल सदुशफल ।

सूर्योदय के समय--बहुत सौर्य वाला ।

तिथि जन्म फल :

१. प्रतिपदा--महा उद्योगो, घर्माचरण वाला, दुष्ट संग, कुल संत्राप कारक,

व्यसनी, प्रनही न, विद्यावान, परिवार युक्त, अन्यमत से बहुत घन ।

२. द्वितीया--परस्त्रीगामी, चोर, स्नेह रहित, सत्य और पवित्रताहीन, दानी,

दयावान, प्रसन्नचित्त 1

३. तृतीया--विफळ, चेतना रहित, द्रव्यहीन, परद्वेषी, परदेशवासी, अभिमानी,

बुद्धि पूवंक बोलने वाला, कामी ।

४. चतुर्थी--भोगी, दानी, मित्र से स्नेह, घन संताप से युक्त, साहसी, विवादी

चंचल, जुआड़ी, ऋणी ।

५. पंचमी--व्यवहार कुशल, माता पिता का रक्षक, गुणग्राही, अल्प प्रीत, दयालु,

दानी, भोगी, कामी, शास्त्र का ज्ञाता ।

६. षष्ठी--भ्रमण शील, कलह कारक, क्रोधी, बुद्धिमान, पराक्रमी, पेट में दोष

बाला, घन पुत्र युक्त, घाव युक्त देहू ।

७. सप्तमी--संतोषी, तेजस्वी, धनवान, पराया धन हरण करे, कन्या संतान, शत्रुनाशक, बलवान, प्रकृति देवपूजन में चित्त ।

८. अष्टमी-घर्मात्मा, सत्यभाषी, दानी, भोगी, दयावान, गुणज्ञ, चंचल चित्त

स्त्रियों का प्रेमी, कफ प्रकृति, कामी, पुत्र स्त्री में लीन ।

९, नवगी--देवपूजक, पुत्रवान, शास्त्राम्यासी, धन और स्त्री में आसवत मन,

कठोरवाणी, श्रेष्ठ बुद्धि, पदाचार और आदरहीन, दुष्ट स्त्री पुत्र वाला ।

१०. दशमो--देव सेवक, यज्ञ कर्ता, तेजस्वी, सुखी, उदार चित्त, नम्न, लम्बा कंठ,

बहुत शास्त्रों का ज्ञाता, कामी, घनव।न, धर्मात्मा, चतुर ।

११. एकादशो--संतोषो, बुद्धिमान, घन पुत्र युक्त, ब्रत, दान में चित्त, देवब्राह्मण

पूजक, प्रसन्न चित्त, राजा के घर जाने वाला, उत्तमकर्म ।

१२. द्वादश--चंचळ चपल, क्षीण अंग, भ्रमणशील, जल से प्रीत, पुत्रवान, राजा

से घन प्राप्त, धनी, पंडित, व्यवहारशील ।

१२. वयोदशी'-सिद्ध, बुद्धिमान, शास्त्र अम्यासी, जितेन्द्रिय, परोपकारी, sest

गर्दन, शूरवोर, चतुर, कामो, लोभी, घनी ।

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २४३

१४. चतुर्दशी--धर्मी, धनी, शूर, राजमान्य, यशस्वी, हास्ययुक्त, क्रोधी, क्रूर

स्वभाव, होनबुद्धि, परधन ग्राही, परस्त्री ग्राही ।

१५. पूर्णिमा--बुद्धिमान, उत्साही, परस्त्री प्रेमी, अनेक स्त्री, न्याय से घन पैदा करे,

विलासी, दयावान, पुण्यवान, भोजन में अति लालसा, बुद्धिमान ।

३०. अमावास्या--क्रोषी, आलसी, परद्वेषी, गूढ़ मंत्री, मुखं, पराक्रमी, माता-पिता

का भक्त, पर से वैर, पितर देव पूजक, क्लेश प्राप्त, घनी | .

अमावास्या जन्म-्त्री पशु, हाथी, घोड़ा या महिषो के बच्चा हो, यदि इन्द्र के

भी घर हो तो लक्ष्मी का नाश करता है ।

नंदादि तिथि जन्मफल

१. नंदा ( १-६-११ ) तिथि--दानी, पंडित, देशभक्त, ज्ञानी, अभिमानी, स्नेही,

निपुण ।

, भद्रा ( २-७-१२ ) तिथि-राजसेवक, धनवान, बंघुमान्य, परमार्थ में बुद्धि

संसार के भय से डरने वाला ।

३. जया ( २-८-१३ ) तिथि--राजपूज्य, पुत्र-पोत्र युक्त, दीर्घायु, मनोविज्ञानी,

शान्तचित्त, वीर ।

४. रिक्ता ( ४-९-१४ ) तिथि--प्रभावी, गुरु निंदक, शास्त्र का ज्ञाता, कापी,

द्रव्यहीन, बुद्धि का नाशने वाला 1

५, पूर्णा (५-१०-१५) तिथि--घनी, शास्त्र ज्ञाता, सत्यवादी, शुद्ध चित्त, पंडित 1

वार जन्मफल

१. रविवार--पित्त प्रकृति, चतुर, तेजस्वी, युद्धप्रिय, दाता, शुरवीर, पित्त का कोप,

मिष्ठान्न भोजी, अभिमानी, क्रोधी, पिंगल बाल और नेत्र, पराक्रमी ।

q. सोमवार--बुद्धिमान, घनी, शांत प्रकृति, राज्य आश्रय से जीविका, दुःख

सुख सम, मीठो बोली, कामी, दयालु अभिमानी, शास्त्र ज्ञाता 1

३. मंगलवा २>-वक्रबुद्धि, रण उत्साही, स्वकुटुम्ब पालक, घनी, नास्तिक, वेद स्मृति

निंदक कूर-कार्य परायण, साहसी टेढ़ी वाणी, दीर्घायु, तीव्र स्वभाव ।

४. बुधवार--लिपि लेखन जीवी, प्रिय भाषी, पंडित, रूप सम्पत्ति युक्त, व्यवहार

कुशल, चतुर, दयावान, देव ब्राह्मण पूजक, पुराणादि सुनने वाला, कलाविद ।

५. गुरुवार--गुणी, विवेकी, विद्वान, धनवान, राजा से कामना को प्राप्त, श्रेष्ठ

आचार, जनप्रिय, आचार्य या मंत्री की जीविका करने वाला विख्यात, यज्ञ कर्ता, वेद

आदि का ज्ञाता

६. शुक्रवार--चंचल चित्त, देव द्वेषी, विद्वान, प्रिय भाषी, प्रसन्नचित्त, धनी, वीर,

दयालु, ज्योतिषो, बहुत नौकर वाळा, सबं प्रिय, इवेत चस्त्रों को धारण करने वाला 1

७. शनिवार--पराक्रमी, दुःख युक्त चित्त, नोच दृष्टि, दृढ़ प्रतिज्ञ, क्रूर, बहीन,

दुर्बल, तमोगुणी, कुटिल, कृतघ्त, भाइयों. को पीड़ा देने बाला, क्रोधी, किये कार्य का

नाश करने वाला, अधिक केश, बिना समय ही हुढ़पा प्राप्त 1