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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

युगसंवत्सरादि फलाध्याय : २४१

२. वैसाख--भोगी, धनी, प्रसन्नचित्त, विशालनेत्र, बलवान, गुणशीलवंत, देव -

ब्राह्मणभक्त, कामी, दोर्घायु, शास्त्रविद, क्रोषी, ज्रातृसौख्ययुक्त स्वतन्त्र रहे, श्रीमन्त होवे।

३. ज्येष्ड--उदार, घनी, बुद्धिमान, दीर्घायु, परदेश में वास, तीव्र बुद्धि, पुत्रवान,

मंत्र क्रिया का ज्ञाता, साहुकार ।

४. आषाइ- घर्मात्मा, पुत्र पौन्न युक्त, बहुत खच करने वाला, मिथ्यावादी, प्रलापी,

गुरुभक्त, मंदाग्नि रोग, अभिमानी, अल्पसुख, कृपालु, भोगी, घनी ।

५, श्रावण--पुत्र पोत्र स्त्री और मित्र से सुखी, पिता की आज्ञा का पालक, देव,

ब्राह्मण का पूजक, स्थूलदेह, सुख दुःख हानि लाभ में समचित्त ।

६. भाद्रपद--प्रसन्नचित्त बकवादी, कोमल वचन, सुशील, क्षीण शरीर, लक्ष्मीवान,

दानी, नाना प्रकार के देश में लीन, स्त्री और पुत्र का सुख युक्त ।

७. आच्विन--सुखी, काव्य कर्ता, पवित्र आचरण, गुणवान, कामी, विद्वान,

धनवान, दानी, बहुत नौकर वाला, चंचल, अपने जनों का बैरी, श्रेष्ठकायं ।

८. कातिक--कामी, दुराचारी, घनी, व्यापारी, दुष्ट, पापी, बहुत वाणी बोलने

बाला, पुष्टांग, कृषक ।

९. मागंक्षीर्ष--मूदुमाषी, घनी, पराक्रमो, परोपकारी, तीर्थ-यात्रा करने में तत्पर

कलाविद, धर्मात्मा, देव गुरु पितरों का भकत ।

१०. पौष--शुरवीर, प्रतापी, ऐश्वर्यवान; उपकारी, कष्ट से घन प्राप्त, अल्प व्यय,

दुबल, पिता के घन से रहित, गुप्त मंत्र वाला, गुणवान, बलवान ।

११. माघ--विद्वान, घनी, शूरवीर, क्रूर वचन, कामी, घैयंबान, शत्रु नाशक, खल

बुद्धि, योगशास्त्र की विद्या में प्रेम, घर्म करने वाला ।

१२. फाल्गुन--परोपकारी, घनी, विद्वान, विदेश भ्रमण, दयावान, विलासी, गान

विद्या में चतुर ।

१३. मलमास -(अघिक मास)--पनोहर चरित्र, तीर्थयात्रा करने वाला, निरोगी

सबको प्रिय, अपने जनों का.हिंत करने वाला, सांसारिक सुखों से अलग रहने वाला ।

पक्ष फल r

कृष्णपक्ष- क्रूर, स्त्री पी, कलह प्रिय, कामी, माता क भक्त, परिवार का पानु,

परकी सहायता चाहने वाला, चंचल, विवादी ।

शुक्लपक्ष--धनी, उद्यमी, ज्ञानी, कायं कुशल, शास्त्रविद, दीर्घायु, पुत्रवान, नम्न,

चतुर, कृपालु, wá में लीन 1

दिन-रात जन्मफल

दिन में--सतधर्मी, बहुत पुत्र, भोगी, बुद्धिमान, कामी, धनवान, पिता के तुल्य

भाइयों से पूज्य, सुन्दर नेत्र ।

रात कमा अतिकामो, क्षयरोगी, क्रूर आत्मा, s नेत्र, दुष्ट, पापी ।

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२४२ t ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय खण्ड फलित

जन्म के समय का फल

प्रातः--घर्म में युक्त, सत्कर्म में जीवन सुखी ।

मध्याज्ञ--गुणवान, राजा के तुल्य ।

अपराह्ल--घनी ।

सायंकाल--सुगंघ और स्त्री में प्रीत, खल, भ्रमणशील ।

रात्रि में-सायंकाल सदुशफल ।

सूर्योदय के समय--बहुत सौर्य वाला ।

तिथि जन्म फल :

१. प्रतिपदा--महा उद्योगो, घर्माचरण वाला, दुष्ट संग, कुल संत्राप कारक,

व्यसनी, प्रनही न, विद्यावान, परिवार युक्त, अन्यमत से बहुत घन ।

२. द्वितीया--परस्त्रीगामी, चोर, स्नेह रहित, सत्य और पवित्रताहीन, दानी,

दयावान, प्रसन्नचित्त 1

३. तृतीया--विफळ, चेतना रहित, द्रव्यहीन, परद्वेषी, परदेशवासी, अभिमानी,

बुद्धि पूवंक बोलने वाला, कामी ।

४. चतुर्थी--भोगी, दानी, मित्र से स्नेह, घन संताप से युक्त, साहसी, विवादी

चंचल, जुआड़ी, ऋणी ।

५. पंचमी--व्यवहार कुशल, माता पिता का रक्षक, गुणग्राही, अल्प प्रीत, दयालु,

दानी, भोगी, कामी, शास्त्र का ज्ञाता ।

६. षष्ठी--भ्रमण शील, कलह कारक, क्रोधी, बुद्धिमान, पराक्रमी, पेट में दोष

बाला, घन पुत्र युक्त, घाव युक्त देहू ।

७. सप्तमी--संतोषी, तेजस्वी, धनवान, पराया धन हरण करे, कन्या संतान, शत्रुनाशक, बलवान, प्रकृति देवपूजन में चित्त ।

८. अष्टमी-घर्मात्मा, सत्यभाषी, दानी, भोगी, दयावान, गुणज्ञ, चंचल चित्त

स्त्रियों का प्रेमी, कफ प्रकृति, कामी, पुत्र स्त्री में लीन ।

९, नवगी--देवपूजक, पुत्रवान, शास्त्राम्यासी, धन और स्त्री में आसवत मन,

कठोरवाणी, श्रेष्ठ बुद्धि, पदाचार और आदरहीन, दुष्ट स्त्री पुत्र वाला ।

१०. दशमो--देव सेवक, यज्ञ कर्ता, तेजस्वी, सुखी, उदार चित्त, नम्न, लम्बा कंठ,

बहुत शास्त्रों का ज्ञाता, कामी, घनव।न, धर्मात्मा, चतुर ।

११. एकादशो--संतोषो, बुद्धिमान, घन पुत्र युक्त, ब्रत, दान में चित्त, देवब्राह्मण

पूजक, प्रसन्न चित्त, राजा के घर जाने वाला, उत्तमकर्म ।

१२. द्वादश--चंचळ चपल, क्षीण अंग, भ्रमणशील, जल से प्रीत, पुत्रवान, राजा

से घन प्राप्त, धनी, पंडित, व्यवहारशील ।

१२. वयोदशी'-सिद्ध, बुद्धिमान, शास्त्र अम्यासी, जितेन्द्रिय, परोपकारी, sest

गर्दन, शूरवोर, चतुर, कामो, लोभी, घनी ।

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २४३

१४. चतुर्दशी--धर्मी, धनी, शूर, राजमान्य, यशस्वी, हास्ययुक्त, क्रोधी, क्रूर

स्वभाव, होनबुद्धि, परधन ग्राही, परस्त्री ग्राही ।

१५. पूर्णिमा--बुद्धिमान, उत्साही, परस्त्री प्रेमी, अनेक स्त्री, न्याय से घन पैदा करे,

विलासी, दयावान, पुण्यवान, भोजन में अति लालसा, बुद्धिमान ।

३०. अमावास्या--क्रोषी, आलसी, परद्वेषी, गूढ़ मंत्री, मुखं, पराक्रमी, माता-पिता

का भक्त, पर से वैर, पितर देव पूजक, क्लेश प्राप्त, घनी | .

अमावास्या जन्म-्त्री पशु, हाथी, घोड़ा या महिषो के बच्चा हो, यदि इन्द्र के

भी घर हो तो लक्ष्मी का नाश करता है ।

नंदादि तिथि जन्मफल

१. नंदा ( १-६-११ ) तिथि--दानी, पंडित, देशभक्त, ज्ञानी, अभिमानी, स्नेही,

निपुण ।

, भद्रा ( २-७-१२ ) तिथि-राजसेवक, धनवान, बंघुमान्य, परमार्थ में बुद्धि

संसार के भय से डरने वाला ।

३. जया ( २-८-१३ ) तिथि--राजपूज्य, पुत्र-पोत्र युक्त, दीर्घायु, मनोविज्ञानी,

शान्तचित्त, वीर ।

४. रिक्ता ( ४-९-१४ ) तिथि--प्रभावी, गुरु निंदक, शास्त्र का ज्ञाता, कापी,

द्रव्यहीन, बुद्धि का नाशने वाला 1

५, पूर्णा (५-१०-१५) तिथि--घनी, शास्त्र ज्ञाता, सत्यवादी, शुद्ध चित्त, पंडित 1

वार जन्मफल

१. रविवार--पित्त प्रकृति, चतुर, तेजस्वी, युद्धप्रिय, दाता, शुरवीर, पित्त का कोप,

मिष्ठान्न भोजी, अभिमानी, क्रोधी, पिंगल बाल और नेत्र, पराक्रमी ।

q. सोमवार--बुद्धिमान, घनी, शांत प्रकृति, राज्य आश्रय से जीविका, दुःख

सुख सम, मीठो बोली, कामी, दयालु अभिमानी, शास्त्र ज्ञाता 1

३. मंगलवा २>-वक्रबुद्धि, रण उत्साही, स्वकुटुम्ब पालक, घनी, नास्तिक, वेद स्मृति

निंदक कूर-कार्य परायण, साहसी टेढ़ी वाणी, दीर्घायु, तीव्र स्वभाव ।

४. बुधवार--लिपि लेखन जीवी, प्रिय भाषी, पंडित, रूप सम्पत्ति युक्त, व्यवहार

कुशल, चतुर, दयावान, देव ब्राह्मण पूजक, पुराणादि सुनने वाला, कलाविद ।

५. गुरुवार--गुणी, विवेकी, विद्वान, धनवान, राजा से कामना को प्राप्त, श्रेष्ठ

आचार, जनप्रिय, आचार्य या मंत्री की जीविका करने वाला विख्यात, यज्ञ कर्ता, वेद

आदि का ज्ञाता

६. शुक्रवार--चंचल चित्त, देव द्वेषी, विद्वान, प्रिय भाषी, प्रसन्नचित्त, धनी, वीर,

दयालु, ज्योतिषो, बहुत नौकर वाळा, सबं प्रिय, इवेत चस्त्रों को धारण करने वाला 1

७. शनिवार--पराक्रमी, दुःख युक्त चित्त, नोच दृष्टि, दृढ़ प्रतिज्ञ, क्रूर, बहीन,

दुर्बल, तमोगुणी, कुटिल, कृतघ्त, भाइयों. को पीड़ा देने बाला, क्रोधी, किये कार्य का

नाश करने वाला, अधिक केश, बिना समय ही हुढ़पा प्राप्त 1

२४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

वार होरा के जन्म का फल

१. सूयं की होरा में जन्म--क्लेश-से समय व्यतीत हो ।

” २. चंद्र ”—घनवान । |

३. मंग " "--शोक और रोग! |

४.बुघ ” "विद्या और धन। |

wa ” ` स्वं सम्पत्ति ओर प्रभुता ।

६. शुक्र "” ?-्त्रीकासुख।

७.शनि ” ”--धन का नाश।

वार होरा ज्ञान

रबिवार को प्रथम २॥ घड़ी = १ घंटा रवि का होरा रहेगा पश्चात्‌ शुक्र, बुध,

चन्द्र, शनि, गुरु, मंगल इस क्रम से वार का होरा रहेगा ७ होरा हो जाने पर ही क्रम से

आगे भी होरा रहेगा । जो वार होगा उस का होरा प्रथम रहेगा ।

पश्चात्‌ उपरोक्त क्रम से उस वार के आगे जो आवे उसी के क्रम से आगे होरा

रहेगा । जैसे शनिवार को प्रथम १ घंटा शति का होरा रहेगा पश्चात्‌ गुरु, मंगल, रवि

शुक्र, बुघ, चन्द्र का क्रमानुसार १-१ घण्टे का हो होगा 1

किसी दिन वार का होरा जानना

न - ७ छोष--जो वार हो दोष संख्या तक निम्न क्रम से जो आवे वही होरा

| होगा । क्रम शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र । i उदाहरण .

( १ ) शनिवार को इष्ट ३० घडी पर कोन होरा है जानना है ।

: _३० घडी इष्ट? २.७. त 4७२ २१२+ ७ ८ शेष ५ । शनिवार दिन है इससे i ५ [ शनि ( १ ) आगे गुरु ( २ ) मंगल (३), सूर्य (४ ), शुक्र (५) थाया। शुक्र का [ होरा हुआ ।

|; (२) शुक्रवार को इष्ट ४५ घडी पर क्या होरा ë ।

॥ — += -ब +७८१८२७ -केष ४ । शुक्रवार का दिन है । i

॥ शुक्रवार को १ गिना, दूसरा बुंघ, तीसरा चंद्र, चौथा शनि आया = शनि का होरा हुआ ।

जन्मवार अनुसार आयु ओर कष्ट = उ

z १ रविवार--प्रथम मास छठे मास, १३ वें और ३२ वें मास में कष्ट हो । ६०

हि वर्ष जोता है ।

२ सोमवार--८, ११, १६वें मास में १७वें वर्ष में पीड़ा हो । ८४ वर्ष जीता है ।

३ मंगलवार--२ रे वर्ष, ३२वें वर्ष पीड़ा होती है, ७४ वर्ष जीता हे !

४ बुधवार--८वें मास, ¿š वषं पीड़ा होती है, आयु ६४ वषं । ६ गुरुवार--७वें, ८वें, १३वें, १६वें मास में पीड़ा होती है, आयु ८४ वर्ष 1.

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युग संवत्सरादि फलाध्याय : २४५

६ शुक्रवार-शरीर निरोग रहे--आयु ६० वर्ष । ७ शनिवार--भ्रथम मास, १३ वें ओर १८ वें वर्ष में पीड़ा होती हुँ, आयु १०० वर्ष। `

यहाँ केवळ वार जन्म के अनुसार आयु बताई गई है; परन्तु कुंडली में प्रह स्थिति के अनुसार अनेक योग बनने से अल्पायु दीर्घायु आदि योगों के कारण उपरोक्त आयु में बहुत अन्तर पड़ जाता है ।

नक्षत्र जन्मफल

१. अष्विनी--सुन्दर रूप, भूषण श्यंगार में रुचि, बुद्धिमान, सुखी, चतुर, निपुण, शरीर पुष्ट, धनवान, लोकप्रिय, भाग्यवान, स्त्री पुत्र भूषण आदि से सन्तुष्ट, नग्न, सदा सेवा करने वाला, विनय और ज्ञानयुक्त ।

२. भरणी--निरोग, सत्यवक्ता, दृढ्व्रती, सुखी, धनवान, चतुर, विनोदी,,जल से भयमान, चपळ, खल स्वभाव, क्रूर, कृतघ्न, किसी काम फो आरम्भ कर पुरा करने वाला, कभी यश, कभी निन्दा प्राप्त ।

३. कृत्तिका--बहुत भोजन करे, कृपण, पापी, पर स्त्री में प्रेम, तेजस्वी (किसी की

बात न सहे), दुष्टकर्मी, व्यर्थ श्रमण, सत और घन रहित, कठोर वचन ।

४, रोहिणी--सत्य भाषी, मीठी बोली, रूपवान, घनी, कृतज्ञ, बुद्धिमान, राज्य

मान्य, कृषि कमं प्रिय, ज्ञानी, परछिद्रान्वेषी, अर्थ कमं में कुशल ।

५. मृगणिर--चंचळ, चतुर, उद्यमी, योगवान, घनवान, चतुरवाणी, अहंकारी,

स्वार्थी, द्वेषी, कपटी, धीर रोगी, यात्रा प्रिय, कुटिल दृष्टि, कुकर्मी, घनुविद्या के अस्यास

में तत्पर, राजा से स्नेह प्राप्त ।

६. आद्रो--गव॑ युक्त, शठ, पापरत, कृतघ्नी, पर कायं बिगाड़ने वाला, भूखा,

क्रोधी, अभिमानी, धन घान्य पै हीन, जीवघाती, भाइयों का प्यारा, दरिद्र, अमणशील ।

७. पुनवेसु--सुखो, अच्छा स्वभाव, रोगी, तृष्णायुषत, थोड़े लाभ में सन्तुष्ट, लोक￾प्रिय, पुत्र मित्रादि युक्त, बहुत मित्र, स्वर्ण आभूषण युक्त, दानी, धनवान, शास्त्र￾अभ्यासी, कवि ।

८. पुष्य--शान्त इन्द्रिय वाला, सर्व प्रिय, धनवान, घमं में तत्पर, देव ब्राह्मण प्रिय,

कुटुम्ब युक्त, चतुर, शान्त प्रकृति, प्रसन्नदेह, विनय युक्त, माता-पिता का भषत, पास्त्राथं

जानने घाला, घन वाहन युक्त | :

९, आइलेषा--सव॑ भक्षी, क्रोधी, कृतघ्न, ठग, खळ, व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ कष्ट देने

वाला, घन को व्यथं खर्च करे, काम कला से दुःखित चित्त, मोटी बुद्धि ।

१ चरण में जन्म-कल्याण करनेपाळा, २ चरण में जन्म--घन का नाशक,

३ चरण में जन्म-माता को पीड़ा देने वाळा, ४ चरण में जन्म-पिता को पीड़ा देने

||

छ १०. मघा--अनेक नौकर, बड़ा कुदुम्ब, घनवान, भोगी, देव पितरों का भक्त,

उद्यमी, महंकारी, स्त्री के वश, राज सेवक, पिता भक्त, कठोर चित्त, श्रेष्ठ बुद्धि, शत्रु

नाशक ।

२४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

११. पूर्वाफाल्गुनी-- प्रिय वाणी, उदार, भ्रमणशील, राजसेवा में तत्पर, सुखी,

स्त्री को प्रिय, विद्या, गौ, घन युक्त, गम्भीर स्वभाव, सुखी, शूरवीर साहसी, बहुत

नौकरों वाला, चतुर, घूतं, उग्र, अभिमानी, काम से दुःखी, पंडितों से पूज्य ।

१२. उत्तरा फाल्गुनी--सर्व प्रिय, विद्या द्वारा घनवान, भोगी, सुखी, दानी, वीर,

इन्द्रिय जित, मृदु वाणी, सुशील, कोतिवान, धैय वान, धनुर्वेद आदि फा ज्ञाता, कृतज्ञ,

पाण्डत ।

१३. हस्त--निर्लज्ज, उद्यमी, मद्य पोने वाला, चोर, पर स्त्री गामी, देव ब्राह्मण

पूजक, बन्धु रहित, दानी, सम्पत्तिवान, घृष्ट, झूठा, उपकारी ।

१४. चित्रा--स्त्री पत्नी युवत, धनधान्य युक्त, सदा प्रसन्न, देव ब्राह्मण भवत, नीति

š चतुर, विचित्र वस्त्र पहिनने वाळा, पुष्पपाळा घारण करनेवाला, शत्रु पीडक ।

१५. स्वाती--दयावान, उदार, व्यापारी, प्यारी वाणो, घनी, देव ब्राह्मण प्रिय,

घामिक, कृपण, राजा से वैभव प्राप्त, थोड़ा धन, स्त्रियों से अधिक प्रीत, सुशील,

मन्द बुद्धि ।

१६. विशाला-ई्ष्यालू, लोभी, कलह प्रिय, अहंकारी, क्रोधी, स्त्री के वश,

अभिमानी, निष्ठुर, वेश्या प्रेमो, बोलने में चतुर, किसी का मित्र नहीं, उम्र और

सोम्य स्वमाव ।

१७, अनुराघा--घनवान, परदेश वासी, भ्रमण शीळ, अति क्षुघातुर, प्रिय वचन,

यशस्वी, पुरुषार्थी, ढीठ, बंधु कार्य में सदा उद्धत, शत्रुजित, कला में प्रवीण, उद्यमी,

प्रसन्न चित्त ।

१८. ज्येष्ठा-संतोषी, धर्मज्ञ, क्रोधी, घमं रत, दानी, निपुण, घनवान, प्रतापी,

बोलने में चतुर, श्रेष्ठ प्रतिज्ञा, शूद्रो से पूजित, पर्‌ स्त्री प्रेमी ।.

, १९. मूल--दानी, धनवान; शत्रु हुता, उपकारी, मोगी, विचारवान, हिंसक, बली,

चतुर्‌ 'बचन, धूतं, कृतष्न, वाहन युक्त, अभिमानी ।

अभुक्त मूल में--नड़ से कुछ का नाश करता है । अभुक्त मूल न हो तो सौभाग्य

और आयु वर्धक होता है ।

मूल के पहिले चरणं में--पिता को पीड़ा। दूसरे चरण में-माता को पीड़ा । तीसरे

चरण में-घन हीन । चौथे चरण में-सुख सम्पदा प्रद ।

२०. पूर्वाषाढ़ा-सुखी, शांत बुद्धि, भाग्यवान, जन प्रिय, कार्य निपुण, धनवान,

बार-बार जल पिये, भोगी, शोछवंत, उपकारी, सुखी, श्रेष्ठ वाणो, अच्छे मित्र ।

२१. उत्तराषाढ़ा--नत्र, धर्मात्मा, बहुत मित्र, गुणज्ञ, सुखी, धनवान, कृतज्ञ,

विजयी, श्र वीर, विनयी, दानी, दयावान, अभिमानी, स्त्री पुत्र युक्त, पंडित,

मान्य, शांत ।

२२. अभिजित--विनीत, यशस्वो, गुणी, स्पष्टवक्ता, देव ब्राह्मण मक्त, कुटुम्ब में

श्रेष्ठ, मनोहर कांति, सज्जनों द्वारा मान्य ।

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युग संवत्सरादि फलाध्याय : २४७

२३. श्रवण--घनवान, विख्यात, कृतज्ञ, गुणी, बहुत संतान, बहुत मित्र, आरोग्य,

बलवान, शत्रु को जोतने वाला, दानी, सत्पुरुषों का संग, शास्त्र प्रेमी, घर्मवान, देव ब्राह्मण भक्त ।

२४. घनिष्श--श्रवीर, धनी, गानप्रिय, घन का लोभी, वंधु मान्य, भूषण युक्त;

सैकड़ों का स्वामी, शीलवान, आचार युक्त, दयालु, सुखी, आशावान ।

२५. शतभिषा--स्पष्ट वाणी, अनेक व्यसन, शात्रुहंता, साहसी, कृपण, धनवान,

पर स्त्री प्रेमी, शीत से भय, कठोर चित्त, चतुर, विदेश में अधिक, काम चेष्टा, अल्प

भोगी, शांत ।

२६. पूर्वाभाद्रपद--उद्विग्न मन, स्त्री के वश, कृपण, धन कमाने मॅ चतुर, सुखी,

यक्ता, संतति युक्त, बहुत सोने वाला, सब कलाओं में चतुर, निरर्थक दुःख भी प्राप्त

हो, शत्रु जित, धूर्त, भयवान, तेज वचन । : :

२७. उत्तरा भाद्रपद--सुखी, संततिवान, धर्मात्मा, शत्रुजित, धैर्यवान, साहस

गुणी, पूज्य, स्वकुल में भूषण, धनवान, शुभ कमं कर्ता, पंडित ।

२८. रेवती--संर्व अंग परिपूर्ण, शूरवीर, धनवान, पथिक, पुत्र स्त्री मित्र युक्त,

चतुर, साधु, बुद्धिमान, विचार करने वाला, शीलवान ।

२७ योगफल

१. विष्कुभ--रूपवान, भाग्यवान, अलंकार युक्त, बुद्धिमान, चतुर, धनवान, पशु

युवत, शत्रुजित, स्त्री पुत्र मित्र का सुख प्राप्त, स्वाधीनता प्रेमी ।

२. प्रीति--स्त्रियों का प्यारा, तत्वज्ञानी, उत्साही, वाचाल. सम्पत्तिबान, प्रसन्न

चित्त, दानी, विनोदी, स्त्री के वश, उद्यमी । š

३. आयुष्मान--दीर्घायु, निरोग, घनी, साहसी, मानी अभिमानी, कवि, विजयी,

अनेक स्थान एवं जंगल घूमने का इच्छुक ।

४. सौभाग्य- ज्ञानवान, सुखी, धनवान, आचारवान, बलवान, सौभाग्य युक्त,

अभिमानी, निपुण, स्त्रियों का प्यारा, राजा का मंत्री ।

५. शोभन--भोगी, गौरव युक्त, श्रेष्ठ बुद्धि, पुत्र स्त्री युक्त, युद्ध में उत्सुक, सबी

कार्यों में आतुर, शुभ कायं में तत्पर, वध करने में रुचि । '

६. अतिगंड--घनी, अभिमानी, क्रोघी, कलह प्रिय, धूर्त, पाखण्डी, मातृ हंता, गले

में बीमारी, विशाल हाथ पैर, बडी ठोड़ी, अति गंड के अंत में जन्म- फुलका नाशक हो |

७. सुकमं--अच्छे कमं करने वाला, सुशील, सबसे प्रेम, गुणी, भोगी, प्रसन्न चित्त

पराक्रमी, उपकारी, आचारवान ।

८. धृतिमान (घृति)--धनवान, भाग्यवान. सुखी, गुणवान, विद्यावान, शीलवंत,

नीतिवान, सभा में चतुरता युक्त बोछने वाला, पर स्त्री के घन से घनी ।

९, शूल--दरिद्र, रोगी, क्रोधी, कलहकारी, कभी-कभी शूल का रोग, शास्त्रज्ञ,

विद्या और द्रव्य में कुशल ।

१०. गंड--दुराचारी, गलगंड रोगी, क्लेश' भोगो, योगी, शूर वीर, दृढ़ प्रती,

कठोर स्वभाव, क्रोधी, बड़ा सिर, हृस्व देह, बहुत मोटा ।

२४८: ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

११. वृद्धि-क्रयःविक्रय के काम से धनवान, दीर्घायु, पुत्र मित्र युक्त, भोगी,

बलवान्‌, पराक्रमी, सब्र चीजों के संग्रह में चतुर, पंडित के सदृश बोलने बाला, नियम

से भाग्य की वृद्धि करने वाला ।

१२. ध्रुव--दीर्घायु, विशेष घनी, कीर्तिमान, सवे प्रिय, स्थिर बुद्धि, स्थिर कमं

करने वाला, मुख में सरस्वती का वास ।

१३. व्याघात--क्रूर स्वभाव, घातक, दया हीन, असत्य में प्रीत, सब कामों में

चतुर ओर लोक प्रसिद्ध, झूठा विवाद करने वाला ।

१४. हर्षण- ज्ञानी, बड़े यश वाला, शास्त्र प्रेमी, शत्रु नाशक, प्रसन्न वित्त,

घनवान, भाग्यशाली, ढीठ, सुन्दर आभूषण, लाल वस्त्र पहिरने वाळा ।

१५. वज- धनी, कामी, गुणदान, सुन्दर बुद्धि, पराक्रमो, रत्न परीक्षक, रत्न युक्त

आभूषण और वस्त्र, बली, घन धान्य युक्त, अस्त्र विद्या में पारंगत, वप्त्रसम कड़ी मुट्ठी ।

१६. सिद्धि--ठदार चित्त, चतुर, शीलवंत, शास्त्र का ज्ञाता, बली, भाग्य की

वृद्धि, सवं सिद्धि युक्त, सुखी, दाता, रोगी, सर्व का आश्रित, दानी 1

१७. व्यतीपात--मायाधी, उदार, माता पिता की आज्ञा पालक, कठोर चित्त,

रोगी, पराये कायं को विगाहे ।

इसमे उत्पन्न बड़े कष्ट से जीता है यदि जीता रहे तो उत्तम मनुष्य होता है ।

१८. बरियान--भोगी, नम्र, थोड़ा घन, श्रेष्ठ कार्य में खच, काव्य कळा गीत

नृत्य का ज्ञाता, श्रेष्ठ कारीगर ।

१९. परिघ--विद्वेषी, घनी, झूठ वक्ता, दयाहीन, चतुर, अल्प भोजन, Frda,

शत्रुजित, दानी, भोगी, कवि, वाचाल, प्रियमाषी शास्त्रज्ञ, कुल की उन्नति

करने वाला ।

२०. शिव--शास्त्रज्ञ, घनी, राजा का प्रिय, मंत्र शास्त्रज्ञ, महाबुद्धि, कल्याण का

भाजन, जितेन्द्रिय, संसार में पुज्य ।

२१. सिद्धि--इस्द्ियजित, चतुर, गौरव युक्त, जो कार्य करे सब सिद्ध हो, मंत्र

सिद्धि वाला, सम्पत्ति ओर दिव्य स्त्री युक्त, घर्मी, यज्ञ प्रेमी ।

२२. साध्य--नम्र, हास्य युक्त, कार्य में चतुर, शत्रुजित, मंत्र विद्या का ज्ञाता,

मानसिक सिद्धि युक्त, सुखी, सबका मित्र, यशस्वी, आळसी, शुभाचरण, प्रसिद्ध ।

२३. शुम--श्रेष्ठ वाणी, शुभ कर्म कर्ता, wal, घर्म, दानी, विज्ञानी, ज्ञानी, दाता

ब्राह्मण पूजक, चंचल अंग, कामी, कफ प्रकृति ।

२४, शुक्ल--सत्य भाषी, पराक्रमी, विजयी, सम्मान प्राप्त, कलाविद, सर्व प्रिय,

घनी, कवि, प्रतापी, क्रोधी, चतुर वचत, घमं में तत्पर, पंडित, इन्द्रियजित ।

« २५. ब्रह्म--विद्या अध्ययन में प्रेम, सत्याचार वाळा, सुन्दर कमं, आदरणीय,

विद्वान, शास्त्रज्ञ, सब काम करने में कुशल, छिपा हुआ विदोष घन, श्रेष्ठ विवेकी ।

२६. ऐन्द्र- चतुर बलवान्‌, घनबान, पराक्रमी, कफ प्रकृति, अपने वंदा में श्रेष्ठ

हल्पायु परन्तु सुखी, गुणवान, भोगी, बुद्धिमान, उपकारी । ०

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २४९

२७. वैधृति--चंचल, चुगल, मायावी, परनिदक, धनी, ' दुष्टों से मित्रता, शास्त्र

भक्ति से रहित, उत्साह हीन, प्रीति करने पर भी मनुष्यों का अप्रिय ।

करण जन्मफल

१. बव--कामी, दयालु बलवान, शीलवंत, चतुर, भाग्यवान, अनेक सम्पत्तिवान,

अभिमानी, घमं रत, प्रतापी, शुभ मंगल कार्यं कर्ता, बालकवत्‌ काम करने वाला ।

२. बालव--शूरवोर, बलवान, विलासी, दानी, बुद्धिमान, कलाविद, काव्य प्रेमी,

विद्या और द्रव्य युक्त, तीर्थ और देव सेवक, राजा से मान्य, चरित्रवान ।

३. कौलव--बुद्धिमान कामी, जन प्रिय, बहुत मित्र, बलवान, कोमल वाणी, सुन्दर

चरित्र, वाहन युक्त, स्वाधीनता को प्राप्त ।

४. तैतिल--हास्य विलास में प्रीत, वाणी विलास में चतुर, शीलवंत, बुद्धिमान,

चचल नेत्र, सबसे स्नेह, पुण्यात्मा , सौभाग्य और गुण युक्त, धनवान, विचित्र घर में

रहने वाला ।

५, गर--परोपकारो; विचारशील, शत्रुजित, शूरवीर, धैयंवान्‌, उदार, कृषिःप्रेमी,

कायं में निपुण, उद्यम से अभीष्ट वस्तु प्राप्त हो, प्रतापी, शत्रु रहित 1

६. वाणज--कला में प्रवीण, हास्य युक्त, चतुर, सन्मानी, व्यापार से घन पैदा

करे, देशान्तर गमन, वक्ता, विनयी, चंचळ, इच्छित वस्तु प्राप्त ।

७, विष्टि--दुष्ट बुद्धि, बहुत सोने वाला, शत्रु नाशक, अशुभ कार्य आरम्भ करने

चाला, विष कर्म में रत, पर को मारने में रत, पर स्त्री गामी, स्वतन्त्र, सवका विरोषी,

पापकर्मी, अपवादी 1

८. शकुनि-सुन्दर बुद्धि, मंत्र विद्या का ज्ञाता, शकुन जानने वाला, औषधि

आदि कर्म में निपुण, वैद्य, कालज्ञ, सुखी, मित्र युक्त, गुणी, सावधान ।

९, चतुष्पद--क्षीण शरीर, चौपायों के वळ वाला, गायों का रक्षक, चौपायो की

औषधि करने वाला, देव ब्राह्मण प्रेमी, अच्छी बुद्धि, यश, घनयुक्त ।

१०, नाग--खोटा स्वभाव, बलवान्‌, दुष्टात्मा, क्रोध से नष्ट बुद्धि, कलहकारी,

कुल का शत्रु, वैर से कुल का नाशक, संग्राम में घीर, दारुण कमं, चंचल नेत्र, तेजवान,

स्थावर से प्रीत । १

११. किस्तुघ्न--हास्यग्रिय, पर कार्य करने. वाला, चंचल बुद्धि, काम क्रीडा में

निर्बल, घ्म-अघमं में बराबर, मित्रता शत्रुता सदा अस्थिर, शुम कर्म में रत, तुष्टि,

मांगल्य और सिद्धि को प्राप्त ।

गण जन्म +

a १. FS + जे भोजो, विद्वान्‌, गुणी, बुद्धिमान्‌, दानी, घनवान्‌, श्रेष्ठ बोछी,

अल्पभोगी ।

२. मनुष्यगण--देव ब्राह्मण का पूजक, अभिमानी, दयालु, बलवान्‌ षगवान्‌, कराः

बिद, सुखदायक, निशान बेघने वाला घनुर्घारी, सुन्दर नेत ।

३. राक्षसगण--बहुत बोलने वाला, उन्मादी, कठोर चित्त, साहसी, क्रोधी, कलह”

कारी, भयानक स्वरूप, बिरोधी, दुवंचन भाषी, प्रमेह रोगी ।

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२५० : ज्योतिश-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

योनिफल

(१) अच्व- स्वेच्छाचारी, उत्तम गुण, शूरवीर, स्वामि भवत, घर-घर रवर वाला ।

(२) गज--राजमान्य, बलवान्‌, भोगी, उत्साही, राज का आभूषण ।

(३) पशु--स्त्रियों का प्रिय, सदा उत्साही, अल्पायु, बहु वाक्य विशारद ।

(४) सर्प-क्रोधी, सदा क्रूर, कृतघ्न, चपल, जीभ छोलुप (सब वस्तु पर

मन चले) ।

(५) इवान-उद्यमी, उत्साही, शूरवीर, माता-पिता का भक्त, स्वजाति से बिगाड़ ।

(६) मार्जार--स्वकाये में शूरवीर, चतुर, मिष्ठान्नभोजी, निर्दय, दुष्टो से प्रेम ।

(७) मेष--पराक्रमी, सवंकार्य में समर्थ, विभवशाली, परोपकारी ।

(८) मूषक--बु छिमानू, धन सम्पन्न, स्वकाय में सदा उद्यत, सदा सावधान, सबक,

विश्‍वास करने वाला, युद्ध करने वाला |

(९) सिह--अपने घमं में सच्चा, आचारवान्‌, उत्तमक्रिया, उत्तम गुण, कुरुस्व

उद्धारक ।

(१०) महिष--संग्राम विजयी, योद्धा, कामी, अनेक सन्तान, वात प्रकृति. मंदा

I

(११) व्याघ्-स्वेच्छाचारी, धन के उद्यम में विरत, उपदेशों का ग्रहणकर्ता,

दीक्षायुक्त, सदा समर्थ, आत्म स्तुति करने में तत्पर ।

(१२) मृग--स्वतन्त्रता पूवंक रहना, शांत प्रकृति, उत्तम बर्ताव, सत्यवक्ता, स्वजन

प्रेमी, धर्माचरण करने वाला, युद्ध में शुरवीर ।

(१३) वानर--चपछ, सिष्ठ पदार्थ भोजी, घन का लोभी, कलहप्रिय, शूरवीर,

कामी, अच्छी सन्तान ।

(१३) नकुल--परोपकार करने में प्रवीण घनियों में प्रधान, वड़ा चतुर, मातृ-

पितृ प्रेमी

जन्म लग्न फल

१. मेष--तेज मिजाज, अभिमानी, घनवान्‌, शुभाचरण, पराक्रमी, क्रोधी, सर्वभक्षी

गोल आँख, अशक्त घुटने, जल से डरे, सदा अपन पैर पर खड़ा, अल्पाहारी, मिथ्यावादी

अंग में चोट, मित्रों स॑ विरोध, अन्य से प्रेम, अल्पबुद्धि, शन्रुगणों से जीता हुआ, पित्त

प्रकृति, विलक्षण बुद्धि, बंधुओं का द्वेषी, भ्रमणशील, अस्थिर घन, विवाद प्रिय, अगम्या गमन की ओर झुकाव ।

बनचर है, ह्रस्व, लाल वर्ण, लाल नेत्र, भोजन में उष्ण पदार्थं प्रिय, शीघ्र प्रसन्न

हो, स्त्री प्रिय, दूसरे की नोकरी करे, बुरे नख, मस्तक पर बहुत फोड़े, हाथ में चिल्ल,

मति चंचळ ।

यह पृष्ठोदय है रात्रि में बलवान्‌, दिन को निर्बछ, क्रूर, पुरुष, चर, तेजस्वी, इसकी

पुर्वं दिशा हैं, स्वामी मंगल, दक्षिण दिशा तर्फ दुःख, यह लग्न दशम भाव में हो तो

केवल पूर्वाद्ध मे बहुत बलवान्‌ होता Š ।

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २५१

२. वृष लग्न-छोक तथा गुरुजन का भकत, प्रिय, वक्ता, गुणवान्‌, पण्डित, घनी,

लोभी, शूरवीर, सवे प्रिय, कृषि कार्य में दत्त, युवतियों का प्रेमो, बालपने में दु:खी,

आयु के मध्य एवं अन्त भाग में सुखी, क्लेश सहन करने वाला, क्षमावन्त, गौ युक्त,

क्रोधी, कृतघ्न, मन्द बुद्धि, दूसरों से पराजय प्राप्त, शांत रूप, आहार बहुत, लोकप्रिय,

बहुत मित्र, संग्राम प्रिय, शान्त बुद्धि, दयालु, स्त्री का चाकर, अच्छा स्वभाव, देव पूजक,

धर्मे कर्म करने वाला, भ्रमणशील, श्वेत शरीर, कफाविक्य, चौड़ी जाँघ, बड़ा चेहरा,

पीठ, मुख या पाव में चिह्व या तिछ । घन कुटुम्ब आदि इसका नहीं रहे ।

बनचर, मंगल में रहे, वर्ण शुभ्र, स्वभाव सोम्य, वृषभ लग्न पृष्ठोदय, रात्रि बली

ë । दक्षिण दिशा में बलिष्ठ ये आग्नेय दिशा में है, स्थिर स्त्री संज्ञक है ।

३. मिथुन लग्न --अभिमानी, बन्धुजनो को प्रिय, त्यागी, भोगी, कामी, घनवान,

आलसी, शत्रुनाशक, स्त्रियों से क्रीडा का प्रेमी, नृत्य वाद्य प्रेमी, सदा घर में रहने वाला,

बहुत पुत्र मित्र वाला, श्रेष्ठशील, राजा के समीप वास, धीरे काम करने वाला, स्त्री का

अनुरागी, प्रसन्न चित्त, राजा से कष्ट पानेवाला, नम्न, प्रिय वचन भाषी, दयावन्त, गुणी,

तत्वज्ञ, योगात्मा, शास्त्र जाननेवाला, नौकरी करे, वुद्धिमान, जुआड़ी, नपुंसक की

संगति, भोगी ।

काली आँखें, घुघराले बाल, उठी, नाक, यह गौर वर्ण राशि गाँव में रहनेवाली,

हस्व, रात्रि बली, शीर्षोदय, पुरुष, क्रूर Gera, पश्चिम दिशा में बलवान, मुह

उत्तर को है, लाळ नेत्र ।

४. ककं लरत--भोगी, धर्मात्मा, लोक प्रिय, मिष्टान्न पान, भाग्यशाली, स्त्री के

अधिकार में, मित्रों से घिरा, बहुत घरवाला, धनवान, बुद्धिमान, अल्प संतान, Ts, जल￾बिहार, उदार, साथु संग, उल्टी बुद्धि, भाइयों का प्यारा, बोलने में प्रगल्म, क्षमाशीळ

कपट बुद्धि, पारी, पराया धन हरने वाला, उठे कूल्हे, ठिंगनाकद, वक्र दृष्टि, चलने में

तेज, गौर वर्ण, मिन्राधिवय, qg लग्न पृष्टोदय रात्रि बली, चर, स्त्री, सौम्य, उत्तर दिशा

में बलवान, वायव्य दिशा में मुंह है । ;

५. सिह--योगी, शत्रु हंता, छोटा पेट, अल्प संतान, उत्साही, रण में पराक्रमी,

अभिमानी, शीघ्र क्रोध होने वाला, दृढ़ मन, माता-पिता का आज्ञाकारी, अल्प भोजी,

मांस भक्षण में प्रीति, जंगल पहाड़ में जाना पसंद, बोलने में प्रगल्म, निश्चेष्ट, संतुष्ट,

हिंसक, शत्रुओं को जीतने वाला, कामी, परदेश में जाने वाला, राजा को वश में

करने वाला, देवकार्य में विघ्न करने वाला, दयालु, नोकर पर क्रोध, इच्छानुसार

बेसमय खाने-पीने लगे, लाल नेत्र, बड़े गाल, चौडा, चेहरा, पोत मिला श्वेत वर्ण, बात कफ से पीडित, तीक्ष्ण प्रकृति । यह लग्न शीर्षोदय, दिन बली, स्थिर, पुरुष, पूर्व में बली, कको

š कन्या लग्न- अनेक शास्त्रविशारद, गुणी, परंघन का भोगी, सत्यरत, प्रिय￾भाषी, भोग का प्रेमी, अल्प सन्तान, शास्त्र शाता, कामी, चतुर, प्रसन्न चित्त, कर

वदा, बुद्धिमान, सात्विक, बन्नु मिय, सुखो, स्त्री विलास का रसिक) मायावी, थीमंत,

२५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

लक्ष्मी को प्राप्त, बड़ी लज्जा वाला, बहुत कन्या संतति, थोड़े पुत्र, नृत्य वाद्य चित्र व

कला में कुशल, लोगों से घन मिले, दुसरे गाँव फिरे, सत्य भाषी, सुन्दर, कफपित्त युवत

प्रकृति, गम्भीर, शीतल दृष्टि, दीघं, शीर्षोद्य राशि, दिवावली, द्विस्वभाव, स्त्री, मृदु,

दक्षिण दिशा में बली, इसका मुह उत्तर पडे ।

७-तुला लग्ग--पंडित, सत्कर्मो से जीविका, विद्वान्‌, धनवान्‌, लोक पुजित, सब

क्ला का ज्ञान, अल्प सन्तान, ब्राह्मण देव पूजक, भ्रमणजील, व्यापार में चतुर, शूर,

निर्दय, अच्छे कर्म से जीविका, अच्छी बुद्धि, कुल में प्रकाशवान्‌, सत्य भाषी, राजा का

प्रिय, शान्त वृद्धि, विषादी, चंचल, डरपोक, विचारवान्‌, स्त्री वश्य, सभ्य, रोगो, कुटुम्ब

का उपकारी, भाइयों का निदक, दो नाम हों, ऊँचा कद, कफ की अधिकता, विरल

दाँत, नाक ऊँची, दुबला, अंगहोन, यह राशि शीर्षोदय, दिवावली, चर, पुरुष, पश्चिम

दिक्षा में वरिष्ठ, आग्नेय दिशा में मुह 1

८-वृद्चिक--शूरवीर, घनवान, पंडित कुल पूज्य, पूज्य बद्धिमान्‌, आरिम्मक जीवन

में रोगी, माता पिता गुरु से वियोग, क्रूर कर्म कर्ता, राजा से मान प्राप्त, सदा क्लेश को

प्राप्त, बुद्धि ज्ञान विज्ञान से युक्त, सुखी, क्रोधी, असत्य भाषी, शास्त्रकथा में निपुण,

शत्रुजित्‌, पर घन हरे, पर स्त्री से प्रेम, दीर्घायु, सुजनों का वैरी, विवाद प्रिय, सन्तान

से दुःखी, अपने कुल में मुख्य, गुप्त पापी, गोल कटि, घुटने चौड़े, विशाल नेत्र, चौड़ी

छाती, हाथ पैर में पद्म रेखा, गोल जांघ, पिंगल वर्ण, मत्स्य, पक्षी या वज्र से शरीर

में कहीं चिल्ल हो । यदि शीर्षोदय राशि, दिवाबली, स्थिर, सोम्य, स्त्री, उत्तर दिशा में

बली, दक्षिण दिशा की ओर मुह ।

९-धनलग्न--नीतिज्ञ, ss, कुल में प्रधान, विद्वान्‌, मनुष्यों का पोषक, राजा

का कृपा पात्र, प्रगल्भ (बातूनी), त्यागी, शत्रु, पीडक, बली, चतुर, कलाओं का ज्ञाता,

घनुर्वेद का ज्ञाता, हिज देव भवत, दयाळु, तालाब आदि बनाने वाला, बुद्धिमान्‌, यशस्वी,

वाहन युक्त, सत्पप्रतिज्ञ, गविष्ट, मधुर भाषी, बन्धुओं का द्वेषी, बाप का घन बहुत

हो। लम्बा चेहरा, गर्दन, कान नाक दाँत ओंठ मोटे, बुरे नख, बहुत मोटा, कई दिन

में कुबड़ा हो, राशि पृष्ठोदय, रात्रि बली, द्विस्वभाव, पुरुष, क्रूर, चंद्र, पूर्व में बली, ईशान की ओर मुख ।

१०-मकर छग्न-नीच कर्म, बहुत संतान, लोमी, आलसी, सर्वंनाशी, उद्यमी

भाग्यवान्‌, सदा अपने पैर पर खड़ा, सर्व घमं के कायं में प्रेम, कठोर, शठ, अपने का

काम करने वाला, अच्छे आचरण, सन्तोषी, भयभीत दूसरों को ठगने वाला, पराया घन

हरने वाळा, परस्त्री से. प्रेम, दीन वचन, काव्य जाने, विद्वान्‌, निदेय, निर्लज्ज, ठंड से

डरे, कृश, निम्न अंग दुबंछ (कमर के दुबंछ), वात कफ पीड़ित, बड़ा शरीर, उत्तम नेत्र,

यह पुष्टोदय राशि है, रात्रि बली; सोम्य, स्त्रो, चर, दक्षिण में बली, पश्चिम में मुह ।

५ ११-कुंभ--परस्त्रीगामी, धीरे काम करने वाला, अनन्त सुख चाहने बाला, गुप्त

रूप से पाप कमं करे, पर कायं में बाघक, चलने में सहनशील, अल्पघन, लोभी, पर

घन का स्वतंत्रता पूवंक उपभोगी, हानि-छाभ युक्त) गंध ओर पुष्प का प्रेमी, चंचल,

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २५३

मित्रों से प्रीति, क्रोधी, चलायमान चित्त, सुखी, जल सेवन में उत्साह, सुंदर हृदय, लोक

प्रिय, कृतज्ञ, कृपण, घनी, भीतरी शठ, अटलचित्त, सुह्ृद्‌ भाव पूर्ण, सुन्दर देह, वाता-

घिक्य, ऊँट सरीखी गर्दन, शरीर पर नसें, कड़े बाल, लम्बा शरीर, हाथ पैर मोटे, जंघा व पृष्ठ भाग लम्बा, मुँह बड़ा, कमर व बैठक बडी । यह शीर्षोदय, दिवावली, क्र्र, पुरुष, स्थिर, पश्चिम में वली, परिचिम की ओर मुख ।

१२-मीन लग्न--रत्न और सुवणं से परिपूर्ण, बहुत विचार कर काम करने वाला अधिक जल पिये, समुद्र या जल की उपज के व्यापार से धन प्राप्त, विद्वान्‌ कृतज्ञ, शत्रु

का दमन कर्ता, भाग्यवान्‌, अल्प भोजन, धूर्त, नम्र, घन घान्य युक्त, बली, यज्ञ करने

बाला, तालाव आदि बनवाने वाला, बहुत आदमियों का स्वामी, विलासी, अल्प रीति,

अपनी स्त्री का प्रेमी, चतुर, जल से उत्पन्न पदाथ प्रिय, गडा द्रव्य प्राप्त हो, अच्छे

नेत्र, बहुत दुबंल, पित्ताधिक्य, सुन्दर ऊँची नाक, वड़ा सिर, कांतिवान्‌ । यह उभयोदय

दोनों ओर से मुख, रात्रि और दिन दोनों में बली, सौम्य, स्त्री, द्विस्वभाव, उत्तर दिशा

में बली, ईशान की ओर मुंह ।

चंद्र को राशि का फल

१-मेष राशि-- चंचल, नेक, सदा रोगी, पुष्ट जंधा, कृतध्नी, राजा से पूज्य, दाता,

जल से भय, क्रामिनियों को आनन्द दायक, प्रचंड कमं, घनवान्‌, उग्र, परोपकारी, शील

वंत, गुशी, देव ब्राह्मण का पुजक, शूरवीर, कामो, सेवकों का प्यारा, दो स्त्रियों वाला,

संग्राम में भय, चपल, परदेश जाने में तत्पर, जल्दी चलने वाळा, गर्म भोजो, शाक भोजी,

अल्पहारी, शीघ्र प्रसन्न, भ्रमण शील, भाइयों में श्रेष्ठ, वृद्धावस्था में शांत होता हैं ।

ताँबे के समान लाल नेत्र, दुर्बल जानु वाला, शिर में qu, कुनखी, हाथ में शक्ति

का चिह्न हो ।

२-वृष राशि--नम्न, अल्प तैज, सत्य वक्ता, धनवान्‌, कामी, स्त्रियों की आशा में

चलने वाला, दीर्घायु, परोपकारी, माता पिता गुरु का भक्त, राजा का प्रिय, सभा में

चतुर, संतुष्ट, भोगी, दानी, पवित्र, चतुर, धैर्यवान्‌, बलवान्‌, क्रीड़ा करने वाला, तेजस्वी,

अच्छे भित्र, अभिमानी, सहनशील, उसकी आज्ञा लोग मानें, कन्या संतान, बहुभोजी,

यशस्वी जवानी या बुढ़ापे में सुखी ।

दृढ़ जाँघ तथा पैर, अल्प केश, देखने में कुरूप, सजीली चाल चलने वाला, कूल्हे

और मुख मोटे, पीठ, मुख, या कुक्षि में चिह्न, गर्दन बड़ी, कफ प्रकृति ।

३-मिथुन राशि--स्त्रियों में बडा चतुर, पक्की मित्रता, मिष्ठान्न भोजन, शील￾वंत, कुटुम्व का प्यारा, बालपने में सुखो, जवानी में मध्यम सुख, बुढ़ापे में दुखी, दो

स्त्रियां, गुरु का प्यारा, अल्प संतान, कामी, गायन, वांदन, नृत्य प्रिय, बुद्धिमान्‌, शास्त्र"

ज्ञाता, मिष्टमाषी, कोतिमान्‌, गुणवान्‌, घनवान्‌, चतुर, वक्ता, दृढ़ संकल्प, सर्व काम में

` समर्थ, कामशास्त्र में निपुण, दूतकमं, sar, नपुंसक से प्रीत, हास्य प्रीत, दीर्घायु

२५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फलित खण्ड

बहुमोजी, चंचल) नेत्र, कंठ में रोग, गौर अंग, शरोर लम्बा, तामे के रंग के समान

नेत्र, सुन्दर शरीर ।

४-कर्क राशि--परोपकारी, पृभ्रवान्‌, गुणवान्‌, सावु, माता पिता का भकत,

अल्पायु, घनहीन, युवावस्था में सुखी, वृद्धावस्था में धमं में रुचि, तोर्थ यात्रा करे, सिर

में रोग, बहुत बंधु, बहुत स्त्री, बहुत मित्र, प्यारी वाणी, शूरवीर, गुरु भक्त, धर्मात्मा,

परदेशवासी, क्रोषांध, बलहीन, स्त्री के वश रहे, ज्योतिष शास्त्र में प्रेम, कभी घनवान्‌,

कभी निर्धन, जलाशय बगीचे आदि में प्रेम, कामासक्त, भ्रमणशील, दुर्वेल देह, कुटिल,

शीघ्र चलने वाला, मोटी गर्दन ।

५-सिंह राणि-घनघान्य युक्त, लक्ष्मीवान्‌, संग्राम प्रिय, विद्वान्‌, सब कला जाने,

परदेश में भ्रमण का इच्छुक, क्रोधी, अल्प पुत्र, सब जगह, रहने वाला, शत्रुनाशक, सिर

में रोग, कठोर, श्रेष्ठशील, कृपण, सत्यवादी, क्षमावान्‌, सदा मद्य मांस का प्रेमी, शीत

से भय, सच्चे मित्र वाला, विनयी, शीधक्रोधो, माता पिता का भवत, विख्यात, व्यसनी,

लज्जावान्‌, स्त्रियों के साथ द्वेषी, मानसी पीड़ा, दाता, परात्रमी, घीर बुद्धि, अभिमानी,

सुखी, सुन्दर मुख, गंभीर दृष्टि, मोटी दाढ़ी; बड़ा मुख, पीछे नेत्र, दंत रोगी, क्षुधा

तृषा से युक्त । `

६-कत्या राशि--धनवान्‌, बहुत नौकर, परदेश जाने वाळा, सदा थानन्द करने

चाला, देव ब्राह्मण भवत, बहुत पुत्र, अल्प कन्या संतान, विलासी, घर्मात्मा, दाता,

चतुर, कवि, लोकप्रिय, नृत्य गान का व्यसनी, स्त्री निमित्त दुःखी, सज्जनों को आतुर ५

दायक, वेद मार्ग में परायण, आळसी, मधु रवाणी, सत्यवादी, पराये घर या धर्नःसे ह

युक्त, विषयों में आतुर, अधिक विद्या, लिंग और कठ में चिह्न ।

७-तुलाराशि --माननीय, भोगी, घर्मो, बहुत नौकर, चतुर, कुंआ तालाब आदि

बनवाने वाळा, कलाओं का जाता, राजाओं का प्यारा, मीठे अन्न और रसों में प्रीति,

पिता का भक्त, स्त्रीयुक्त, अल्प संतान, थोड़े भाई, कृषि कम में चतुर, क्रय-विक्रय से

घन पैदा करे, देव ब्राह्मण पूजक, स्त्री के वचन में चलने वाला, असमय क्रोध, दयालु,

पराक्रमी, व्यापार में कुशल, स्वजन प्रिय, बुद्धिमान्‌, अति क्रोधी, घनवान, अंगहीन

योगी बंधु, एक जम्म का नाम पीछे दूधरा देव संज्ञक नाम विख्यात हो, कुटुस्ब का

हितकारी, दु.खयुक्त, कोमल वचन, ऊँचा शरीर, नाक पतली, शिथिल गान । ८_ृश्चिक राशि--शत्रु से संतप्त, कलह प्रिय, शत्रुता करने वाला, विश्वासघाती, द्रोह करने में चतुर, संतोषहोन, पराये कार्य में बिघ्न करे, राज पुज्य, २ स्त्री, ४ भाई,

बालपन से ही परदेश वासी, क्रूर हृदय, शूरवोर, पर स्त्री गामी, स्वजनों में निष्ठुरता युक्त, साहस से लक्ष्मी पावे, माता में दुष्ट बुद्धि रखे, चोर, घुर्त, माता-पिता व गुर से रहित, बाल्यावस्था में रोगो, गुप्त पापी, पिंगळ नेत्र, पर स्त्री रत, नेत्र; छाती बड़े, जाँच व जानु गोल पात शरीर, विषम स्वभाव, मछली वज्र या पक्षी का चिल्ल हाथ पैर में । लोभी, रोगी, भ्रमणशील ।

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २५५

९-घन राशि--चतुर, धर्मवान्‌, राज्यमान्य, श्रेष्ठ पुत्र, देव ब्राह्मण भक्त, लोकप्रिय प्रगल्भ, सभा में बोलने वाला, भाग्यवान्‌, दृढ़ मित्र, साहसी, नम्र, सहनशील, शांत स्वभाव, सात्विक प्रकृति, शिल्प विद्या का ज्ञाता, घन सम्पन्न, पानो, दिव्य स्त्री, चरित्र" वान्‌, तेजस्वी, कुलनाशक, पितृ धन युक्त, दानी, कविता करने वाला, बोलने में चतुर, वंधु बैरी, सुंदर नख, मोटे दाँत, ओंठ और गर्दन, पैर के तलुए कोमल, गर्दन छोटी, कुवड़ा, हाथ पैर मोटे । यह प्रीति से पक्ष होने वाला, श्रेष्ठ कुछ, रुचिर दृष्टि 1 १०-मकर राशि--घीर, चतुर, क्लेश युक्त, राजा का प्यारा, पुत्रवंत, दयावान्‌, सत्यवान्‌, भाग्यवान्‌, आलसी, स्त्रियों के वश रहे, कुछ में सबपे हीन, बुराई करने वाला, गान विद्या का प्रेमी, माता का प्यारा, धन, दानी, दयावान्‌, अच्छे नौकर, बहुत भाई, दंभी, मिथ्या घमं करने वाला, आलसी, शीत न सहन कर सके, विद्वान्‌, लोभी, निर्लज्ज, पर स्त्रीगामी, बड़ा मस्तक, अगम्या या वृद्धा से गमन करने वाला,

कमर के नीचे पतला, सुहावने नेत्र ।

११-कुम्भ राशि--दानी, मिष्ठान्न भोजी, प्रिय वचन, क्षीण शरीर, अल्प संतान,

३ स्त्रियों वाला, कामी, घन हीन, आलमी, कृतज्ञ, सदा सुखी, धन भोगी, सामथ्यंवान्‌,

वाहन युक्त, विद्या में उद्यमी, पाप कर्म में तत्पर, पण्डितों का बैरी, अधिक विद्या,

शीळवंत, घर्म कायं को जल्दी करे, बाँये हाथ में चिल्ल, मंडूक के समान कुरव वाला, निर्भय, ऊँट के समान गर्दन, सर्वाज्ध में प्रगट नसें, रूखे और बहुत रोम, ऊँचा शरीर, कुल्हे जाँघ पीठ घुटना मुख कमर पेट ये सब मोटे, पुष्प चन्दन और मित्रों के प्रिय,

पर स्त्री, पर घन और पाप कर्म में तत्पर ।

१२. मोन राशि--घनवान्‌ मानी, नम्न, भोगी, प्रसन्न चित्त, माता-पिता देव

पूजक, गुरुभक्त, उदार, रूपवान्‌, गंध और पृष्प माला का प्रेमी, शूरवीर, बोलने में

चतुर, क्रोधी, कृपण, जानवान्‌, गुणवान्‌ शीघ्रग्रामी, गान विद्या में कुशल, शुभाचरण,

भाई बन्धु ने स्नेह, जल रत्न मोती आदि के क्रय-विक्रय रो उत्पन्न घन, पराये पाये घन

का भोगी, शत्रुजित्‌, अकस्मात्‌ गड़ा या भूमि गत द्रव्य भोगने वाला, विद्वान्‌, बहुत

स्त्रियों का स्वामी, सब बवयवों से परिपूर्ण, सुन्दर शरीर, ऊँची नाक, बड़ा सिर, सुहावने नेत्र, कांतिमान्‌ ।

नवांश जन्म फल

( १ ) पहिले नवांश में जन्म--नन्न, घर्म शील, सत्यवक्ता, दृढ़ प्रतिज्ञ, विद्या का

प्रेमी, ( वृहज्जातक और जातका भरण )

अन्यमत--चुगुल, चंचल, दुष्ट, पापी, चोर, कुरूप, अन्य को दुःखदाई

( मान-सा० और लग्नच स्ट्रिका )

( २) द्वितीय नवांश--उत्पन्त वेभव का भोगी, युद्ध में हार, वेश्या में आसक्त

या गाने वाले की स्त्री में आसक्त, युद्ध में अनिच्छा ।

( ३ ) तृतीय नवांश--स्त्रियों से जीता हुआ, पुत्रहीन, इन्द्रजाळ करने वाला,

-५६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

थोड़ा बल, शुरवीर, धर्मवान्‌, रोगी, सर्वज्ञ, देवों का भक्त, सब का अभिप्राय जानने

वाला ।

( ४ ) चतुर्थ नवांश--बहुत स्त्रियाँ, श्रेष्ठ भाग्य, पूजनीय, घनवान्‌, राज्य सेवी

या राजा का मन्त्री, दोक्षा के लिए गुरु की भवित करने वाला, समस्त वस्तुओं को

प्राप्त करने वाला ।

( ५) पंचम नवांश--बहुत मित्र, राजा का नौकर, कुटुम्ब और मित्रों का सुख,

बड़ी प्रतिष्ठा, बड़ी आयु, बहुत सन्तान, सब लक्षण सम्पन्न ।

( ६ ) षष्ठ नवांश--छूरवीर, शत्रुजित्‌, देश का स्वामी, पक्की मित्रता, प्रसंग

š स्त्री से हारने वाला, अभिमानी, धन का नाशक, नपुंसक सदृश, वाचाल, शुभ हीन 1

(७) सप्तम नवांश--निधंन होकर विचरने वाला, सेना का स्वामी, पराक्रमी,

बुद्धिमान्‌, युद्ध में जीतने वाला, उत्साही, संतोषी, राजाओं की कला युवत ।

( ८) अष्टम नवांश--उदार बृद्धि, क्रोधी, खोटे आदमियों से संताप को प्राप्त,

प्रसिद्ध, धन और अन्न को खर्च करने वाला, कृतघ्न, ईर्ष्यालु, क्रूर, क्लेश भोगी,

बहु संतान, फल के सभय त्याग करने वाला 1

( ९ ) नवम नवांश--दीर्घायु, प्रसन्न देह, विद्या पढ्ने वाळा, जितेन्द्रिय, सुखी,

ज्ञाता, धर्मज्ञ, धनवान्‌, माननीय, प्रतापी , क्रिया में निपुण, प्रवीण, नौकरों से युक्त ।'* चंद्र की राशि का नवांश फल

(१) मेष नवांश--सेनांपति, घनवान्‌, पीले नेत्र, चोर ।

(२) वृष नवांश-- मोटे कंधे, मुख श्याम वर्ण । Se

(३) मिथुन नवांश--सुन्दर अंग, प्रभु का सेवक, लेखक, पंडित ।

(४) कर्क नवांश--श्याम शरीर, पितृ पुत्र सुख से रहित ।

(५) सिह नवांश--स्थूछ शरीर, ऊंची नासिका, घन बल में विख्यात ।

(६) कन्या नवांदा--कोमल वचन, दुर्बळ शरीर, जुआ खेलने में निपुण ।

(७) तुला नवांश--कामी, राजा का सेवक, सुन्दर नेत्र ।

(८) बृश्चिक नवांश--विकल, दरिद्र, दुर्बल शरीर, त्यागी, तपस्वी, धनी ।

(९) धनु नवांश--दुर्बल, बड़ी बाहु, त्यागो, तपस्वी, धनी ।

(१०) मकर नवांश--लो भी, gsl शरीर, स्त्री पुत्र से युक्त ।

(११) कुम्भ नवांश--मिथ्यावादी, अपनी स्त्री के वशीमूत ।

(१२) मीन नवांश-कोमल वचन, हीन वचन, कभी न बोलने वाला, तीय॑यात्री, पुत्रवान्‌ । चरण अनुसार राशि (चन्द्र राशि) का जन्मफल

१-मेष राशि

१ चरण--राजयुक्त; २ चरण--घनी, ३ चरण--विद्वान्‌, ४ चरण--देव गुरुभक्त, ५ चरण--चोर, ६ चरण-क्राल भाषाहीन, ७ चरण--योगीन्द्र, ८ चरण--निर्धन,

९ चरण--शुभ लक्षण युक्त ।

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २५७

२-चुष राशि

१ वरण-ऱयशस्वी, २ चरण--पुत्रवानू, ३ चरण-श्रबीर, ४ चरण--शुभ छक्षण, ५ चरण--विद्यावान्‌, ६ चरण--सौभाग्यवान्‌, ७ चरण--कुछ मंडन, < चरण--धन धान्य समर्थ, ९ चरण--परस्त्री चोर | ३-मिथुन राशि

१ चरण--भाग्यवान्‌, २ चरण--निर्घन, ३ चरण--क्रुत्सित भाषी, ४ चरण--

धर्नरवर, ५ चरण- भाग्यवान्‌, ६ चरण--घन sr भोगो, ७ चरण--चोर,

८ चरण-महात्म सिद्धि, ९ चरण--देव गुरु का मान करने वाला । ४-ककं राशि

१ चरण--धनवान, २ चरण--महीपति, ३ घरण--पुत्रेश्‍वर, ४ चरण-- विद्यावान्‌, ५ चरण--धर्मयान्‌, ६ चरण--चोर, ७ चरण---निर्घन,. ८ चरण--- देशपति, ९ चरण--कुल मंडन ।

५-सिह राशि

१ चरण--राज मान्य, २ चरण--धनेशवर, ३ चरण-_तीर्थयात्री, ४ चरण--

पुत्रवान्‌, ५ चरण--स्वपक्ष हीन, ६ चरण--मातु-पितु तारक, ७ चरण--राजमान्य,

८ चरण--धनघान्य समर्थ, ९ चरण--निघंन ।

६-कन्या राशि

१ चरण--निधेन, २ चरण-पुत्रहीन, ३ चरण-शत्रु मारक, ४ चरग--धनवान्‌,

५ चरण--भोगी, ६ चरण-पृत्रवान्‌, ७ चरण--राजमान्य, ८ चरण--सर्व समर्थ,

९ चरण--पराक्रमी मातु-पितु गुरु भक्त ।

७-तुला राशि

१ चरण--घन भोगी, २ चरण--धनेईवर, ३ चरण- निर्घन, ४ चरण--माषा

हीन (तेज रहित) ५ चरण--कमों को जानने वाहा, ६ चरण-स्त्री चोर,

७ चरण--मातृ-पितृ उद्धारक, ८ चरण--राजमान्य, ९ चरण--भाग्यवान्‌ ।

८-त्रुश्चिक राशि

१ चरण--वनेश्वर, २ चरण--यशवान्‌, ३ चरण--आगम शास्त्र में प्रवीण,

४ चरण-तेज रहित, ५ चरण--कुल भ्रमण, ६ चरण-घनधान्य में समर्थ, ७ च रण￾विद्यावान्‌, ८ चरण--राजमान्य, ९ चरण--यशवान ।

“धन राशि

१ चरण--ज्ञानवान्‌, २ चरण--निर्वन, ३ चरण- नीच कर्मकर्ता, ४ चरण

राजमान्य, ५ चरण--क्रोधी, ६ चरण-पुत्रवान्‌, ७ चरण--काम लम्पट, ८ चरण

घनेइवर, ९ चरण--दघि« विकारो ।

१०-मकर राशि

१ चरण--भंगहीन, २ चरण--गुरुषक्त, २ चरण--पर स्त्रो रत, ४ चरण--शुम

१५

२५८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

क्षण, ५ चरण--देवांश, ६ चरण--पृत्रवान्‌, ७ चरण--उत्तम, ८ परण--महीपति,

९ चरण--घनेश्वर, उभय पक्ष तारक ।

११-कुंम राशि

१ चरण--मध्यम, २ चरण--श्रीमान्‌, ३ चरण--तेजहीन, कष्टयुक्त, ४ चरञ-=

पुत्रवान्‌, ५ चरण--राजमान्य, ६ चरण--पाप कमं करने में हीन, ७ चरण-¬

योगीन्द्र, ८ चरण--अंगहीन, ९ चरण--शुम लक्षण युक्त ।

१२-मीन राशि

१ चरण--षनवान्‌, २ चरण--कालहीन, ३ चरण--रम्पट, ४ घरण-घनवान्‌,

५ चरण--चोर, ६ चरण--कपटी, ७ चरण--निर्घन, ८ चरण--भाग्यवान्‌,

९ चरण--बलेश युक्त ।

सम्वत्सर आदि के जन्म में फल का समय

(१) जन्म समय फे सम्वत्सर का फल--सावन वर्षपति की दशा में होता है ।

(२) अयन और ऋतु का फल- सुर्य की दशा में होता है ।

(३) मास का फल-- मासपति दथा में होता है ।

(४) गण्ड का फल--चन्द्रमा की दशा में होता है ।

(५) नक्षत्र का फल--चन्द्रमा की दशा में होता है ।

(६) पक्ष का फल--चन्द्रमा की दशा में होता है ।

(७) तिथि ओर करण का फल चंद्र का अंतर ओर सूर्य की दशा में होता है ।

(८) वार का फल--वार के स्वामी को दशा में होता है।

(९) योग का फल--सूर्य चंद्र में जो बली हो उसकी दशा में होता है ।

(१०) लग्न का फल--लग्न पति को दशा में होता है ।

(११) दृष्टि, भाव, राशि का फछ--इनके स्वामियों की दशा में होता है । जन्म वेला का फल

यहाँ आघा-आधा पहर की सत रज तम को एक-एक वेला चक्र में बताई गई है । दिन में ८ पहर होते हैँ । ८% २० १६ प्रहरार्ड हुए। यहाँ तम सत रज ये ३ गुण क्रमानुसार दिये हैँ । जन्म के समय दिन के ओर प्रहराद्धं के विचार से जो गुण प्राप्त हो उसका फळ नीचे दिया है ।

वेलानुसार उत्पन्न गुण फल

१. सत्व वेला में--वाग्मी, शिष्टाचार वाला, धर्मी, तपस्वी, नित्य उत्साह करने वाला, निर्मल, दानी, तेजस्वी, विद्वान्‌, पुण्यवान्‌, सत्य वक्ता, शत्रु रहित ।

२. रजो वेला में--घन सुख या, रूपवान्‌, शनुओं को जीतने वाला, कामातुर बुद्धि, बिना दरबार मित्र वाला ।

३. तमो वेला में--पराया घन, पर स्तरो को ग्रहण करने वाला, , शरे ` का स्वामी, मित्र, द्विज, गुरु इनका विरोधी, चंचल न्हे वाला । डल रहित

युग संवत्सरादि फलाध्याय : २५९ (०८ oe ) | ७ Bob ४ kis WB >1९५७ Bb ७४६ 909] hbk Bib bib 12 Fie Dk ७४७ y> P I 1298 Bibb Le 1242 ४5७ 1219 $ ७४ tt २६२ Bb oË “kË है 9 R ७४ ११८ “12७ E 92७४ 10६ है bB Ë 9258 tk hk ५७ 21] Ñ ४४ h ७९ ९३ Msp) kak ४४ ०३ 100० pep) > 19:01) pepo ‘rk ८४2 99 2812 120 ४ pe ३७७ (०1७ FlB) ७8980 run ६ ४8० pe ‘kkk 1098. hls ७ ai hit २७0 Fie Le] 9 918 5 bh ५2 ID hie hh BPB Eš 910 ४ hh tb १2०७ है २ ०१ E. bb ९% “१ b $ bb ४५ 108 है 312 Ë ७४ ६६ “hh 90 E bb 2 ‘hk ८४७ EF hb h—Ji> sb (६)

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२६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(३) मिथुन राशि--६ मास, ६ वर्ष में कष्ट, अंग रोग, १० में नेत्र पीडा, १२८

१८ š घात, २४, ५३, ६३ में अल्प मृत्यु । उस राशि पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो ८५

वर्ष की आयु हो पोष मास अष्टमी, बुधवार, आर्द्रा नक्षत्र, प्रथम प्रहर में मृत्यु हो

(मान सा०) पांचवें में वृक्ष भय, १६ में शत्रु मय, १८ में मृत्यु तुल्य पीड़ा, ८० वर्ष

की आयु हो । वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि वुधवार, के मध्याह्न समय हस्त नक्षत्र में

मृत्यु हो । (जा० भ०)

(४) कर्क राशि--११ दिन में कष्ट, ९ मास में कष्ट, १ वर्ष में रोग, ७-में जल

चात, ९ में अंग रोग, १२ में जल घात, १६ में अंग रोग, २० वषं में लोह घात, २७

और ३५ में अल्प मृत्यु, ४५ में देव दोष, ५५ ओर ६१ में अल्प मृत्यु, राज कष्ट, असाध्य

रोग, सर्प घात, जल घात, साँड़ से और व्याघ्र से मय इस राशि पर शुमग्रह की दृष्टि

हो तो ७० वषं ५ मास ६ दिन में.फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष के चतुर्थ प्रहर में गोधूलि के

समय मृत्यु हो (मान० सा०) पहिले में रोग हो, ३० में लिंग पोड़ा, ३१ में सर्प से भय,

३२ में बहुत पीड़ा, ८५ या ९६ वर्ष को आयु माघ मास शुक्ल ९ तिथि शुक्रवार रोहणो

नक्षत्र मे मृत्यु हो (जा० भ०)

(५) पिह राशि--८ मास या १ वर्ष में कष्ट, १० वर्ष, १५ वर्ष में अंग रोग,

२५, ४५ वर्ष में देव दोष, सन्निपात, ५१, ६१ वर्ष में घात । अस्प मृत्यु से बचे तो

६५ वषं जोवे, श्रावण शुदी १० रविवार पूर्वाफाल्गुनो नक्षत्र एक प्रहर में मृत्यु हो

` (मान सा०) पहिले वर्ष में मूत बाघा, पाँचवें वर्ष में अग्नि भय, ७ वें वर्ष में ज्वर,

या विणूचिका रोग हो । २८ वषं में झगड़ा, ३२ वर्ष में बड़ी पीड़ा, पेट के दाहिने तरफ

वात रोग गुल्म रोग हो । जो चन्द्र को शुभग्रह देखता हो तो १०० वर्ष को आयु हो

फाल्गुल शुक्ल पक्ष मे, पंचमी, मंगलवार को भध्याह्ल समय जल के बोच मृत्यु हो

(जा० qo)!

(६) कन्या राशि--३ मास ३ वर्ष में अंग रोग, १ वषं १३ वर्ष में नेत्ररोग और

जल घात, २६ वर्ष में अंग रोग, देवकोप स पीड़ा, ३३ वर्ष में लोह घात, ४३ वर्ष में

अंग रोग । चन्द्र पर शुभग्रह को दृष्टि हो तो ८४ वर्ष जीकर भाद्र शुक्र ९ रविवार हस्त￾नक्षत्र में गोधुली के समय देह त्यागे (मान सा०) तोसरे वर्ष अग्नि को पोड़ा, पांचवे

वर्ष नेत्र रोग, नवम वर्ष, १३ वर्ष में बाधा, १५ वर्ष में सर्प भय, २१ वर्ष में वृक्ष से गिरे

या भीत से गिरे । ३० वर्ष में जंगछ में हथियार का घात, ८० वर्ष को आयु हो बदि

चंद्र पर शुभग्रह को दृष्टि हा तो चैत्र कृष्ण १३ रविवार को मृत्यु हो ( जा० भ० )।

(७) तुला राशि--४ मात मॅ कष्ट, १६ मास में अंग रोग, ४ वर्ष में कष्ट, १६

वर्ष में जल घात, २१, २३ वर्ष में अंग रोग, ४१ वर्ष में अंग वृद्धि, ५१ वर्ष में देव

दोष, ६१ वर्षमें अल्प मृत्यु, चन्द्र पर गुमप्रह को दृष्टि हों तो ८५ वर्ष जीवें,

वैशाख शुक्ल १३ शुक्रवार चित्रा नक्षत्र मध्याह्न के समय मृत्यु हो ( मान० सा० ) ।

७ वर्ष में अग्नि भय, ८ वर्ष में ज्वर, १२ वर्ष में जल से भय, वृक्ष से या घोड़े से गिरने

  • का। २० वर्ष सें सपं का सय । २१ वर्ष में पीड़ा । चन्द्र पर शुभ दृष्टि हो तो ८५ वर्ष