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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

२७६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(८) वृश्चिक-गठन व शरोर मध्यम आकार का, ऊंचाई मध्यम, चलने में तिरछः

चले, नाक नुकीलो, स्वभाव क्रोघो, कपटी, साहसी, आत्म विश्वासो, परिश्रमो, निश्चयो

ब ढोठ, वैद्यक शस्त्रक्रिया रसायनशास्त्र, सिपाही गिरी व इंजीनियर के समान कोई

घंघा करने से लाभ हाता है, व्यापार से लाभ हो, सावधान और बहुत झगडाकू, झगड़ने

में परिणाम या हानि का विचार न करे और हठ से निश्‍चय पूर्वक झगडा चाळू रखे,

स्वभाव मे व्यसनी और बे रोक, अपना स्वास्थ्य बिगाड़े, अपने ध्येय प्राप्त करने का अति

परिश्रम करे, बदला लेने वाला, सरलता से उत्तेजित होने वाळा, स्ष्पट वात करने में

कोई पशोपेश न करे, जोबन में उच्च स्थिति रहे, अपने वर्ताव से दूसरों को डर उत्पन्न

करे, उससे मतभेद करने वाले का विरोधो, काम काज में संक्षिप्तता ।

(९) घनु--ऊँचा शरीर, मजबूत, गठोला बदन, सुन्दर गौर वर्ण का दुसरे पर

सरलता से अपनी छाप डालने वाला, लम्बा चेहरा, गंजा, निडर साहसी, स्पष्ट वक्ता,

यात्रा, खेल, शिक्षा वदान्त विषय, घामिक विषय, कानून का प्रेमो, सरल और स्वच्छ

हृदय, सत्य और न्याय के लिए बहुत प्रयत्न करे, उच्च आत्मा, पारितोषिक का विचार

कर काम करने वाला, किसो बात को अच्छी प्रकार समझे । अपने गुण से उच्च स्थिति

प्राप्त करे, तत्त्व ज्ञान की ओर मन का झुकाव रहे । घन सम्पत्ति आदि को असत्य समझे,

घमं और तत्त्व ज्ञान के कायं में बहुत प्रेम, बिना दिखावट के शांत जीवन व्यतीत फरे,

उसका जीवन मनुष्य की सेवा में छगा रहे, दूसरों के दु:ख के लिये अपने सुख का भी

त्याग करे, अपने कुटुम्ब ओर जाति में वह बहुत चतुर और स्मरणोय होगा, उसके बहुत

से आश्रित और सेवक रहें ।

(१०) मकर “साधारण मध्यम शरोर, दुबला, बड़ी नाक, पूर्य आयु में अशक्त,

ठुड्डी लम्बी आगे बढो हुई, लम्बी गर्दन, सकरी छाती, दाढ़ी में थोड़े बाल, पाल काळे क मजबूत, आत्म विश्वासी महत्त्वाकांक्षा, दोघं उद्योगी, टीका टिप्पणी करने वाला, स्वार्थी, लोभी, मौजी, उत्तर वय में आगे प्रसिद्ध होता है । महत्त्वाकांक्षी होने से अधिकार s सम्पत्ति के लिए अनेक प्रयत्न, सब कार्य में बहुत उत्साही, दृढ्तापुर्षक कायं करने वाला, जो उसे हानि पहुंचावे उसका बदला लेने वाला, दुसरे के विचारो की कुछ परवाह न कर अपने विचार स्पष्ट प्रगट करे, कटाक्ष करे, झाकत चित्त, शंका के कार्य में सावघानी से बिचार पुर्वक कायं करे, ईश्वर और भक्त को मानने वाळा, अपने आश्रितां के कार्य , साधन मे चतुर, अधिक जांच पड़ताल करने वाळा नहीं केवल अपने काम की परवाह करने वाला, अपनी कीति प्राप्त करने का प्रयत्न ste, मित्रों और सम्वन्षियों में मान- नीय और प्रसिद्ध होने का इच्छुक ।

(६१) कुम--रूप साधारण सुन्दर, शरीर का गठन मध्यम, शरोर बलवान्‌, वणे साधारण उजला, विद्वान्‌, अच्छा स्वभाव, निश्चयी, व्यवहार कुशळ, चतुर, विद्याव्यसनी, ज्ञान अधिक, मामिक, सार्वजनिक संस्था में काम करने से लाभ, दयाळू, दुसरो के कार्या में सहायता पहुँचाने वाळा, दसरों का == न देव पकने वाला, दूसरों का विचार भाव

rent 2

कालांग विचार : २७७

च सन समझने और अध्ययन करने वाला, ईश्वर घर्म और तत्त्वज्ञान. में प्रेम और विश्वास,

थाप और अघमं से डरे, प्रसन्न चित्त रहे, अच्छा नाम ओर कीति प्राप्त करे, घनवान्‌

शौर प्रिय हो, कोई कार्य सरलता पूर्वक कर सके, दूमरे की स्त्रियों का इच्छुक और

प्रेमी, बड़े लोगों से मित्रता, प्रभावशाली और मिलनसार, बड़े लोगों में मित्रता, कभी-

कभी सिर दर्द, उदर पीड़ा, अजीर्ण आदि अन्य प्रकार के उदर रोग से पीड़ा आदि।

(१२) मीन--शरीर साधारण ठिंगना, मोटा एवं मांसल शरीर, हाथ पांव कम

लंबे । शरीर प्रकृति से अशक्त व रोगी, सरल्मार्गी, अच्छे स्वभाव वाला, आसो,

अस्थिर, चंचल चित्त, घामिक, ममतालु, घामिक संस्था औषधालय आदि से राभ,

संगीत प्रेमी, लेखन कला से लाभ हो, सदा आनन्द का इच्छुक, अधिक से अधिक आनन्द,

शांति और सरल जीवन प्राप्ति का घ्यान रहे । इससे पैसे की परवाह न कर बहुत पैसा

खर्च करे 1 कविता और लेखन में बुद्धि और इसमें आनन्द, सदा काम में लगा रहे व्ययं

समय न जाने दे, कभी भो अपने काम में फिजूळ खर्च न करे । विश्वसनीय, आँख बंद

कर विशवास कर लेवे, बचपन और आरम्भ आयु में बहुत खतरे से बचे, शत्रु से या

ser बाजी में धन की हानि, कभी-कभी डरपोक कभी अवसर पर साहसी, अनिश्चित

अनन की दशा में कभी अच्छा अवसर हाथ से निकल जाने दे, संगीत नृत्य, नॉटक, ललित

वला में रुचि और आनन्द, उसके प्रसिद्ध मित्र रहें ।

लग्न से विशेष विचार--छग्न में जब कोई ग्रह न हो तब इन राशियों का प्रमाय

प्रगट होता है । यदि लग्न में कोई ग्रह हों या लग्न फे अंश पर बलवान्‌ qg का दृष्टि

योग हो तो अपने घमं के प्रमाण से यहाँ वर्णित लग्न के स्वरूप स्वभाव में अन्तर पड़

जायगा ।

जब लग्न में कोई ग्रह न हो उस समय चन्द्र या जन्म लग्नेश जिस राशि पर हो

इन दोनों में जो बली हो गा केन्द्री हो उस राशि के गुण घर्म व स्वरूप के प्रमाण से

विचार कर लग्न से प्राप्त होने वाले स्वरूप व स्वभाव में अन्तर जान लेना । जब एक

राशि में चार या अविक ग्रह हों उस समय उस राशि के गुण घम उस मनुष्य के शरीर

में स्पष्ट दिखाई देंगे । हि काल पुरुष के अंग के अनुसार इन राशियों का कुण्डली से विचारने का उदाहरण

जन्म में जिस राशि का लग्न हो उस जज

छर्न से १२ भाव में जो राशियाँ हैं

उनमें से कही पापग्रह हों तो राशि के

अनुसार जो कालपुरुष का अंग हो उस

अंग मे उस ग्रह की दशा में दुःख

होगा ।

यदि शुभग्रह को दृष्टि उस पापग्रह :

वर हो तो उस शुभग्रह को दक्षा में वह दुःख अच्छा हो जायगा t

२७८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

यदि वह भाव शुभ ओर पापग्रह दोनों से युक्त हो तो यदि शुभ बलवान्‌ होगा तो दुःख

नहीं होने देगा ।

यदि यहाँ केवल शुभग्रह हो तो उस अंग में व्याधि न होगी अपितु वह अंग पुष्ट

होने को संभावना है 1

१--यहाँ कुंडली में मिथुन लग्न है वह जातक का मुख है वहाँ कोई पापग्रह नहीं

है तो मुख पर कोई चिह्व न होगा । लग्न में गुरु है इससे कपाल और सिर सुन्दर देखने

योग्य होगा ।

२--सरे स्थान में कर्क राशि है वह मुख हुआ मुख स्वच्छ होगा क्‍योंकि वहाँ कोई

ग्रह नहीं है ।

३--तृतीय में सिंह है तृतीय छाती का स्थान है वहाँ कोई ग्रह न होने से वह स्व￾स्य होगा ।

४-चतुर्थस्यान हृदय का है कन्या राशि है कोई ग्रह नहीं है तो हृदय स्वच्छ होगा t

५--पञ्जस स्थान पेट का है जिसमें तुला राशि है इसमें ५ ग्रह हैं जिसमें ३ पाप०

ग्रह हैं इनमें शनि मंगल अस्तंगत हैं । अस्तंगत होने के कारण थे प्रभावहीन हो गये परन्तु

उनकी दशा में पेट में पोड़ा होगो 1 गर्मी का उपद्रव करेगा । इसमें सूर्य भा है जो नीच

का है इससे वह २ वर्ष को आयु तक व्याधि ग्रस्त रहेगा । परन्तु उस स्थान में शुभ

ग्रह भी हूँ वे उस व्याधि को ठोक कर देंगें ओर पेट के भाग में दाग का चिह्न नहीं के

बराबर होगा ।

६--छठा स्थान कटि का ë जिसमें पापग्रह केतु है यह वृश्चिक राशि में है । जिस

समय गोचर में वृषचिक राशिका mg आयेगा तो खाज आदि चर्म रोग उत्पन्न करेगा ॥

परन्तु उस स्थान में चन्द्र भी है वह अपनी दशा में रोग अच्छा कर देगा 1

७--सप्तम स्थान नाभि के नीचे का है--कोई ग्रह न होने से वह निरोग होगा t

८---अष्टम स्थान गुप्तांग का हे कोई ग्रह वहाँ न होने से निरोग होगा 1

९--नवम स्थान दोनों जाँघ और वृषण का है यह स्थान शनि का (कुम्भ राशि) है। शनि उच्च का है और शनि से त्रिकोण पंचम स्थान में है शनि पापग्रह है इससे षह अपनो दशा में दाहिनी ओर वृषण की वृद्धि करेगा परन्तु वह हानिकारकः नहीं होगी ।

१०--दशम भाव घुटने का है इसमें ग्रह न होने से निरोग होंगे ।

११--एकादश भाव--दोनों पिंडली हैं कोई ग्रह नहीं । परन्तु यहाँ मेष रागि है जिसका स्वामी मंगळ उसे देखता है इससे वहाँ कष्ट देगा क्योंकि मंगळ पापग्रह है । १२-वारहवां स्थान पंजों का है जिसमें राहु पापग्रह है इससे वहाँ कोई दाग या चिल्ल करेगा ।

शरोर का रंग गोरा-काला आदि जानना (१) जन्म लर्न से चन्द्र किसी मो राशि में हो परन्तु वह चन्द्र जिस राशि के

`

कालांग विचार : २७९

नवांश में हो उत्त सरीखा रंग होगा 1 कई चन्द्र के होरा से मी विचार करते हैं। चन्द्र

का होरा गौर वर्ण देता है सूर्य का श्याम वर्ण ।

चन्द्र के नवांश के अनुसार इस प्रकार वर्ण होता हेन

सूयं--श्याम वणे, चन्द्र--गौर वरणे, मंगल--रक्त गौर (ललाई लिए गौर वर्ण),

बुध--श्याम वणं, गुरु--तप्त कंचन वण, शुक्र--श्याम वर्ण कितु चित्ताकर्षक, शनि

काला ।

(२) लग्न में जो बलवान्‌ ग्रह हो उस सरीखा वर्ण ।

सूर्य--ताम्र वणे, चन्द्र--गौर वर्ण, मंगल रक्त गोर, बुघ--स्वच्छ एयाम वर्ण

अर्थात्‌ काला नहीं, गुरु--चित्ताकर्षक कंचन वर्ण, शुक्र--रंग गोरा न हो पर चित्ताकर्षक

हो, शनि--काला वणं ।

(३) चन्द्र के नवांश पति ओर छन्न स्पष्ट के समीप कोई ग्रह हो तो दोनों के

भिश्चित रंग के अनुसार होगा । जैसे चन्द्र नवांदा में गुरु और लग्न में सूयं हो तो तप्त

कंचन और ताम्र वर्ण मिश्रित होगा ।

(४) लग्न में कोई ग्रह न हो तो राशि के नवांश स्वामी के सरोखा रंग होगा ।

(५) इसी प्रकार लग्नेश, छान नवांश, चन्द्र, नवांश, ओर लग्न गत TG के मिश्रण

का विचार कर रंग का विचार करना । इन सब में जो बलवान्‌ ग्रह हो उसका ध्यान

रखना । जैसे ग्रह बली हो तो ग्रह नवांश तुल्य, राशि बली हो तो राशि नवांश तुल्य रंग

होगा ।

शरीर का गठन विचार

१--शरीर ५ तत्त्व से बना है और जल का अंश कितना है जानने को कह ग्रह

सजल है या निर्जल नीचे दिया है ।

ग्रह सूर्यं चन्द्र मंगल बुध गुरुं ` शुक्र शनि

तत्त्व अग्नि जल अग्नि ` पृथ्वी . आकाश (तेज) जळ. वायु

जल शुष्क जल शुष्क जल जल जल शुष्क

इसके अनुसार जातक के शरीर का गठन आदि का अनुमान होता है ।

२--केवल ग्रह का हो नहीं, राशि का भो प्रभाव शरीर के गठन पर होता है इस￾छिपे राशियों का तत्त्व और जल का विचार नीचे दिया है । š

राशि मेष वृष मिं कर्क सिंह कन्या तुला वृक्चिक धन मकर कुंभ मीन

तत्व अग्नि पृथ्वो वायु जल अग्नि पृथ्वी वायु जल sf पृथ्वी वायु जळ

जल जल जल निल जळ Fri निजंछ जल जल जल जल जल जल

कितना पूर्ण पूर्ण पूर्ण

क वल WEA MYC DR arden br Q

३--(क) ४-८-१२ राशियाँ जल तत्त्व की हैं परन्तु पूर्ण अदे भाव आवि जलके

२८० : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फलित खण्ड

बिचार से ककं ओर मीन जल तत्व में पूणं जल राशि है । वृश्चिक मेंुछ न्यूनता है क्योंकि वह पाद जल (३) राशि है । : (g) इसी प्रकार पृथ्वी तत्त्व को राशि १०-२-६ में मकर पूर्ण जल राशि है ।

इससे मकर के शरोर में स्थूलता और दृढता दोनों प्रदान करने की शक्ति है । वृष को ३ (अद्ध ) जल होने के कारण स्थूलता में कमी Š । कन्या ये जल शून्य है इससे वह राशि दृढता तो अवश्य देगी परन्तु स्थुल कुछ नहीं होगी 1

(ग) गरिन राशियों में घन अद्ध' जळ, मेष पादजळ और सिंह निर्जल है इससे शरीर में स्थूलता प्रदान करने को शक्ति में मेष से सिंह कम है ।

(ष) वायु राशियों में कुंभ sas, तुला पादजल, मिथुन निर्जल है स्थूलता

प्रदान करने में एक दुसरे से निर्बल है । इन सब बातों के विचार करने से शरीर के गठन का अनुमान होता है ।

४--जल राशि और जल ग्रह के प्रभाव से शरीर में जल की अधिकता होने से मोटे

पन की संभावना है 1

(क) वायु राशि, अग्नि राशि और शुष्क ग्रह के प्रभाव से शरीर में दुर्चलचा

घाती है ।

(ब) पृथ्वी राशि और पृथ्वी ग्रह के प्रमाव से शरीर में दृढ़वा आती है पृथ्वो तत्त्व शै अस्थि आदि की बनावट होती है | afeq दुह होती है जल तत्त्व छै शरीर में घर का बंश बहुत होता है । दृढ शरीर वारे फो हड्छियाँ दुढ़ होंगी । असाधारण गोटे मनुष्य फे शरीर में जल का अंश बहुत होता है । इन सब बातों फा राशि और uq फे योग से विचार करने से शरीर का अनुमान होता है ।

५--इससे शरोर का विचार करने को इन बातों पर ध्यान देना ।

(अ) लग्न राशि कैसी है (क) लग्नेश कैसा है (ख) लग्नेश कौन राशि में ë (ग) लग्नेश के साथी ग्रह कैसे Ç (q) लग्नेश विक में तो नहीं है (छ) छन्न में प्रहु केसा ë 1 (च) लग्न पर कैसे ग्रह की दृष्टि है (छ) लर्न से गुरु का क्या सम्वन्ध है गौर गुर केसा हे इन सब पर विचार कर नीचे बताई बातों पर ध्यान देकर शरीर के गठन फा अनुमान करना ।

६--(क) जल राशि हो, वहाँ जल ग्रह हो--शरीर गवश्य मोटा होगा । (ख) छरनेश और लग्न जल <rfsr— स्थल शरीर, (ग) लग्न में अग्नि राधि और अग्नि प्रह भी हो--मनुष्य बळी होगा परन्तु शरीर की पुष्टि तथा मुटाई न होगी । (घ)-- लग्ने में अग्नि व वायु राशि लग्नेश पृथ्वी राशि गत हडडी साघारण दृढ. और पुष्ट (ङ) छन्न में अग्नि व वायु राशि लग्न जळ राशि गति शरीर स्थूल ब मोटा (च) लग्न में अग्नि व वायु राशि शरीर ठोस पर मोटा हड्डी नहीं होतो (छ) sa वायुराशि व वायु ग्रह व शनि दुबळा पर तीक्ष्ण बुद्धि, (ज) लग्न पृथ्वी राशि और पृथ्वी ग्रह नाटा या दुदकाय हो। (श्र) छनन पृथ्बी राशि छसे पृथ्वी राशि हुद्ढी असाधारण ख्य घे

कालांग विचार : २८१

< और स्थूळ (a) लग्न पृथ्वी राशि लग्नेश जळ राशि हड्डी दृढ़, मध्यम स्थूल शरोर

(टो लग्न पृथ्वी राशि लग्नेश अग्नि व वायु राशि आन्तरिक बल होगा । हड्डी दृढ़ पर

शरीर स्थूल न होगा ।

७--शुष्क देह (कुश शरीर) के अन्य योग

(अ) लग्न में शुष्क ग्रह, (क) लग्न में निल राशि, (ख) लग्नेश निर्जल राशि में

या शुष्क ग्रह के साथ. (ग) लग्नेश त्रिक में या लग्नेश जहाँ है उस राशिका स्वामी

'त्रिक में हो, (घ) लग्नेश का नवांशेश शुष्क ग्रह के साथ, (ङ) लग्न निर्जेल पाप युक्त

या दृष्ट, (च) लग्नेश शुष्क ग्रह, या शुष्क ग्रह से. युक्त, शुष्क ग्रह के नवांश में या मिथुन

या सिंह राशि के नवांश में हो तो दुर्बल शरीर होगा, (छ) शनि व मंगल दुर्बल पन

उत्पन्न करता है । (ज) छग्नेश अष्टम में शुष्क राशि में हो तो दुबंळ होने के अतिरिक्त

क्लेशायुक्त शरीर रहे। (क्ष) शुष्क राशि में जन्म हो और वहाँ सब शुष्क ग्रह हों. तो

दुबला होने के अतिरिक्त स्वास्थ्य खराब होगा लगातार बीमारी दमा कब्ज बवासोर

आदि व्याचियाँ होंगी । (न) जन्म शुष्क लर्न में हो और उसका स्वामी गुरु या शुक्र के

साथ हो तो दुर्बल नहीं होगा ।

स्थूल शरोर होने के अन्य योग

(अ) लग्न जल राशि शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो तो स्थूल शरीर होगा । (क) लग्नेश

जल ग्रह बढी हो शुभ ग्रह युक्त मी हो तो दृढ शरीर होगा (ख) लग्नेश जल ग्रह और

जळ राशि में शुभ ग्रह युवत या दृष्ट हो दृढ स्यूछ शरोर (ग) लग्ने बली हो जल ग्रह

हो अन्य जल ग्रह युक्त हो तो स्थुल शरीर, (घ) लग्न में शुम ग्रह की राशि, लग्नेश का

नवांसेश जलराशि में हो तो स्थूळ शरीर (ङ) लग्न में गुर या जळ राशिस्य गुरु की दृष्टि

हो या लग्न शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो असाधारण स्थूळ शरोर हो । (च) बुघ या चंद्र

केन्द्र में हो तो स्थूल शरीर हो । (छ) छग्नेश का नवांशेश जल राशि में हो लग्न शुभ

राशि में हो बुरे ग्रह की योग दृष्टि न हो तो शरीर पृष्ट होगा, (ज) जळ ग्रह चतुर्थं

स्थान में या जल राशि में हो तो अधिक बलवान्‌ होगा (s) मोटा आदमो कोई दिखे तो

समझना गुरु या चन्द्र लग्न में होगा यदि उपरोक्त बलवानु योग में पाप दृष्टि हो तो

'पुष्टवा नष्ट हो जातो है ओर वह साधारण देह का हो जावा है । (ट) लग्नेश बलवान्‌

होकर शुभग्रह की राशि में हो तो शरीर पुष्ट होगा ।

लग्न के नवांशों द्वारा शरीर का विचार

(१) सूयं-साघारण मोटा ओर चिपटा ।

(२) चंद्र--उन्नत देह, सुन्दर नेत्र, कुछ कृष्ण वर्ण, सुन्दर केश 1

(३) मंगल- कुछ नाटा, नेत्र कुछ लाळ, दृढ़ शरीर ।

(७) बुष--मघ्यम उन्नत, ( मझोला कद ) नेत्रश्कोण छाल, शरीर को नसे निकलो

देखने पे ऊसछड़ । :

२८२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(५) गुर--छुछ पीले नेत्र, गम्भीर आवाज, छाती चौड़ी, ऊँचा शरीर, मध्यक

उन्नत ।

(६) शुक्र--हाथ लम्बे, मुख स्थूल, सुन्दर चंचल नेत्र, विलासी कन्वे के नीचे फा

भाग स्थूल ।

(७) शनि--आँ के नाचे का हिस्सा घसा हुआ, शरीर दुबंछ पर लम्बा, नसे और

नाक स्थूल, कमर के नीचे दुर्बलता ।

ये शुम ग्रह के प्रभाव से सुन्दर, पापप्रह युक्त या दृष्ट होने से कुलूप तथा शारीरिक

कष्ट हो । लग्नेश बलवान्‌ होकर केन्द्र में हो sq ग्रह दृष्ट हो पाप दृष्ट न हो तो दीर्घायु

गुणवान्‌ एवं राजलक्ष्मी का सुख प्राप्त करे ।

लग्न में ग्रह के अनुसार शरोर

(१) रवि--शरोर पीला काला सा रंग का, कड़ा ।

(२) चन्द्र--बहुत कर गठन मध्यम ।

(३) मंगल-चेहरे पर गाढ़ा, चोट, तिळ या लाल दाग हो । शरीर का रंग तासड़।

गठन मजबूत व बडा, अंग में अविक चपलता छाता ë l

(४) बुघ--गठन दुवला पतला व छोटा, चेहरे में चपलता व चंचलता 1

(५) गुरुशरीर का रंग गोर, चेहरा व कपाल भव्य 1

(६) शुक्र--शरीर का रंग सुन्दर, चेहरा मिष्ट एवं मोहक .।

(७) शनि--शरीर का रंग काला, मुख बड़ा लम्बा ।

लग्न में कोई ग्रह हो या किसो ग्रह को पूर्ण दृष्टि हो तो फल में अन्तर पड़ जावा

हैं। नवांश पति के अनुसार छर्न रहने पर भी लग्न में जो ग्रह हो या लग्न को देखता

हो उस ग्रह के प्रभाव का भी कुछ आभास पड़ जाता है । इसी प्रकार किसी ग्रह के

उच्च या बलवान्‌ होने के कारण उस ग्रह का प्रभाव बढ़ जाता है। नीच आदि स्थिति

में प्रभाव घट जाता है । परन्तु कोई ग्रह बलवान्‌ होकर करन में पड़े या उसकी दृष्टि

लग्न पर हो तो उस ग्रहका लक्षण विशेष रूप से जातक के गठन आदि में

अनुभव होगा ।

राशि अनुसार शरीर का गठन

ऊंचा--३-५-९-१ १ राशि, मध्यम--१-६-७ राशि, ठिगना--२-४--८-१०-

१२ राशि । शरीर ऊंचा मोर बडा--पुरुष राशि १-३-५-७-९-११ राशि में ।

छोटा कद होने का योग

१- छन में शनि हो स्वगृह हो या बुघ युक्त शनि चतुर्थ में हो अति छोटा कद हो । २-संगछ स्वगृहो, बुध ३ या ४ भाव में हो, शनि लग्न में हो तो ह्वस्व ( छोटा

कद का ) हो ।

हा स्वगृही, बुध ३ या ४ भाव में हो, sme शनि युक्त कहीँ हो तो ठिगना कद हो ।

कालांग विचार : २८३

हस्व दोघं अंग

हृस्व राशियां ( छोटी )--१, २, ११, १२ राशियाँ ।

सम (न छोटी न बड़ी )--३, ४, ९, १० राशियाँ 1

दीर्घं ( बडी )--५, ६, ७, ८ राशियाँ ।

हृस्व दीघं राशियों के अंग

राशि | मेष | वृष | मिथुन | ककं | सिंह | कन्या योग

: मीन | कुम |मकर | घन बुद्चिक | तुला |= १८०

अश २० २४ | २८ ३२ ३६ ¥o + १८० अंग ३६० अंध

z == सम दोघं हृस्व दीर्घ ग्रह | रवि वुघ शुक्र | मंगल शनि चंद्र

अंग सम == दीघं

१--काळ पुरुष के अंग के अनुसार ये राशियाँ लग्न से लेकर सिर से आरंभ कर

प्रत्येक अंग के छोटे बड़े होने का विचार करे ।

२--प्रह दीर्घ हो राशि में बैठा हो तो उस राशि का अंग दीर्घ होगा, हस्व से

हस्व, मध्यम से मध्यम अंग कहना 1

३--जिस अंग में राशि या राशिस्वामी दीर्घ हो वह अंग दीघ होगा, हस्व हो तो

'हस्व जानो ।

४--दो या अधिक ग्रह किसी अंग की राशि में पड़ें तो सब में जो बलवान्‌ होगा

उसीका प्रभाव अनुमान में आयेगा ।

५-_बहाँ कोई ग्रह न हो तो उसका स्वामी जैसी राशि में पड़े उस राशि से

विचारना ।

६--यदि वह स्वामी जल ग्रह से युक्त हो तो उस अंग में स्युलता विशेष रूप

से होगी ।

७--इसी प्रकार शुक्र ग्रह द्वारा युक्त या दुष्ट होने से कृशता या दुबंछता आयेगी ।

८--उपरोक्त बातों के विचार के लिये देखो--

(क) मंग निर्दिष्ट किस राशि का है । (ख) वहां यदि ग्रह है तो कैसा है यावह

किस राशि का स्वामी है। (ग) उस अंग राशि का स्वामी किस राशि में हे । (घ) अंग

राशि का या उसके स्वामी का कोई जल ग्रह से योग होता है या नहीं ।

अन्य योग सिर मुख रूप आदि के

(१) सिर--छग्न के हृस्व दोघे अनुसार छोटा बड़ा या मध्यम सिर होगा । (२) मुख एवं ख्प--

क--द्वितीय भाव काल पुरुष का मुख है वहाँ शुभ ग्रह हो तो रूपवान्‌ होगा 1

ख--द्वितीयेश केन्द्र में हो शुभ दृष्ट हो या द्वितीय में शुभ ग्रह हो तो सुन्दर

आकर्षक मुख होगा ।

२८४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ग--ढितीयेश केन्द्र में उच्च में मित्र स्थानी या अपने वर्ग में हो यां. द्रितीयेश जिस

घर में हो उसका स्वामी गौपुरांश में हो तो उसका मुख पूर्ण होगा और. धनी होगा ।

घ--यदि पाप ग्रह दुसरे में हो या द्वितीयेश नीच में हो या पाप युक्त हो या पाप

दृष्ट हो तो वह कुरूप होगा ।

ङ--कोई कुरूप होते ë पर धनी भी होते हैं । दूसरा घर धन का भी Š । मुख को

'दिखावट को पहिले लग्नेश से विचारना पश्चात्‌ द्वितीयेश से भी विचारना । जब दूसरा

घर अच्छे ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो बहुत धन होगा । परन्तु धन स्वामी (कारक) गुरु से

गिनने पर दुष्ट स्थान में हो तो मुख तो सुन्दर होगा परन्तु घन थोड़ा होगा ।

च--सुन्दरता या कुरूपता द्वितीय भाव, उसके स्वामो ओर द्वितोयेश जिस राशि पर

हो उसके स्वामी के शुभ प्रभाव पर निर्भर है ।

छ--मुख का अचानक कुरूप हो जाना शुभाशुभ ग्रहों को दशा अंतदंशा पर निभंर

ह । उपरोक्त बुरे ग्रहों की दशा में कुरूपता होतो है ।

ज- लग्न में शुभ हो तो सुरूप, पाप ग्रह हो तो कुरूप होगा ।

झ--द्वितीय भाव में बलवान्‌ केतु हो तो लम्बा मुख हो या बड़ा मुख हो !

ब--पिछले बताये ३६ द्रेष्काण के अनुसार अंग विचार कर सिर के दाहिने या

आयें अंग में बुरे ग्रहों के प्रभाव से चोट आदि विचारना ।

अध्याय--१३

भिन्न भिन्न राशि में ग्रहों का फळ

१- सूयं का राशि अनुसार फल

फल सम्वन्ध से भिन्न भिन्न मत हैं उनको भी लिख देना उचित होगा ।

(१) सूयं मेष में--साहसी, रुधिर व पित्त विकार से विकृत देह, भूस्वामी, बड़ा बुद्धिमान्‌, बड़ा साहसी, पर का सदा हितेच्छुक (मान सा०) (जा० भ०) । विख्यात,

चतुर, सर्वत्र फिरने वाला, थोड़ा घन, शस्त्र घारण से आजीविका, यदि सूर्य उच्चांश में हो तो उपरोक्त अल्पघन आदि फल नहों होंगे, अच्छा फळ होगा । सूयं मेष फे १०° तक परमोच्चांश में रहता है 1 शुमफल देता है । (qo जा०)

(२) सूयं वृष में-सुगन्धित द्रव्य, पुष्प शैया, सुन्दर वस्त्र, अनेक. पशुओं से अद्भुत सुख, जळ से डरने वाला, मित्रता करने वाळा, मनुष्यों को उनके योग्य हितकारक उप- देश करने वाळा, (मान सा०) (जा० भ०)। वस्त्र सुगन्धित द्रव्य ओर पापकम से आजीविका, स्वयो से द्वेष, गाने बजाने में चतुर, (qo जा०)

-(३) सूयं मिथुन मे--गणित शास्त्र की कळा जाने या अगणित शास्त्र जानते वाला, श्रेष्ठ शक्ति, मनोहर, अद्भुत वाणो बोलने में अग्रणी, विनययुक्त, सर्वत्र विख्यात, नीति

भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहों का फल : २८५

में अति प्रवीण (मान सा०) (जा० भ०) । व्याकरण आदि विद्या व ज्योतिष शास्त्र जानने वाला, धनवान्‌, विद्या का घनो, क्लेश बुद्धि (जात० पारि०) (qe जा०) । (४) सूर्य ककं में-सौजन्य भाव से रहित अर्थात्‌ मनुष्यता रहित, कलियुग के प्रभाव को अर्थात्‌ काल को जानने वाला, पिता के वचन का निरादर करने वाळा, घन- वानों में अग्रणी, (मान सा०) (जा० भ०) । . diam स्वभाव, निधन, पराया कायं करने चाला, मार्ग आदि क्लेश से युक्त, (qo जा०) नादान (जा० पारि०) । (५) सूर्य सिंह का--स्थिर बुद्धि, पराक्रमो, प्रभुता प्राप्त, अद्भुत कोति, राजा का सेवक, सबको प्रसन्न या संतोष करने वाला, (मान सा०) (जा० भ० ) । बन पर्वत तथा गौवंश इन स्थानों में प्रसन्न रहे, बलवान्‌ और मूर्ख हो (qo जा०), सत्र कला रसज्ञ (ज्ञा० पारि०) ।

(६) सूर्यं कन्या का--राजा से घन प्राप्त करने वाला, कोमल वाणी, गीत का प्रेमो, महिमा युक्त, महिमा के कारण शत्रु का नाश हो, (मान सा०) (जा० भ०) 1 पृस्तक आदि छिल्लने वाला, चित्रकार, काव्य गणित इनका ज्ञानी, स्त्रो के समान शरोर वाला, (qe जा०) सुवर्ण वाला (जा० पारि०) । : (७) सूर्ये तुला का--राणा से प्रोत और भय प्राप्त, मनुष्यों से विरोध करने वाला, पापकरमं करने वाला, कलह करने में मन, अन्य की सेवा करने वाला या पराये काम में प्रेम रखने वाळा, मणि ओर घन से रहित, (मान सा०) (जा० भ०) । मद्य बनाने वाला, मार्ग चलने में तत्पर, सुवर्णकार, अनुचित कर्म करने वाला, (वृ० जा०) साहसी

(जा० पारि०) 1

(८) सूयं वृश्चिक का- कृपण, अतिशय कलह करने वाला, अतिक्रोघी, विष, अग्नि ओर शस्त्र से भय, माता पिता का विरोधी, उन्नति कमी नहीं करता, (मा० सा०) (जा० qo) 1 उग्र स्वभाव, साहसी, विष सम्बन्धित कर्म से घन कमावे या उसका कमाया घन व्यर्थ जावे, शस्त्र विद्या में निपुण (qo जा०) पुज्य (जा० पारि०)। (९) सूर्यं धन का--स्वजनों या मित्रों से कायं मात्र में क्रोध करने वाला, बड़ा विद्वान्‌, बहुत घन वाला, मित्रादि का पूजन करने वाला अर्थात्‌ उनको मान देने वाला, श्रेष्ठ बुद्धि से संतोष बढ़ाने वाला, (मान are) (जा० २०) । सज्जनों का पूजक घनवान्‌, निरपेक्ष, तीक्ष्ण स्वभाव, वैद्य विद्या और शिल्प कमं का ज्ञाता | निकृष्ट वाणिज्य (जा० पारि०) ।

(१०) सूयं मकर का--अपने पक्ष के कारण या शत्रु पक्ष के कारण भ्रमण करने वाला, उत्सव रहित, स्वजनों का विरोधी, घनहोन, सुख रहित, ( मान सा०) (जा? qe) । अपने कुछ के अयोग्य नोच कमं करने वाला, मूर्ख, निद्य, पंराये घन और

पराय उपकार को भोगने वाला, (áo जा०) दक्ष (जार पारि०) 1

(११) सूयं कुम्म का--अतिशठ, सब के हित कायं में सहयोग देनेवाला होकर भी

सुहृद्‌ भाव से रहित अर्थात्‌ मित्रता रहित, मलिन, करुणा गुण से रहित रषिर प्रकोप

२८६ : ज्योतिष-शिक्षा, qata फलित खण्ड

चाला, सुखी, (मान सा०) (जा० भ०) । नोच कर्म करने वाला, पुत्रों के ऐषवयं से

. रहित, निर्धन, (वृ० जा०) पुत्रादि भाग्य से हीन (जा० पारि०) ।

(१२) सूर्य मीन का--क्रम विक्रय से बहुत घनवान्‌, अपने जन द्वारा बाह्य सुख

प्राप्त परन्तु बड़े भारी अंतरंग किसी भय से युक्‍त, बड़ा बुद्धिमान्‌, उसके वैभव भौर

सौन्दर्य के कारण विस्तृत अद्भुत और चहुँओर यश पानेबाला (मान सा०) (ste भ०)।

जल से उत्पन्न मोती आदि रत्नों के व्यापार से ऐश्‍वये पावे, स्त्रियों का पूजनीय,

(बु० जा०) जल से और कृषि आदि से श्रोमान्‌ हो (जा० पारि०) ।

२-चन्द्र का राशिफल

(१) चन्द्र मेष का--स्थिर घन से युक्त, श्रेष्ठ जनों से रहित, पुत्र युक्त, अपनी

स्त्री से पराजित, अद्भुत ऐइवयं के कारण सतकीति प्राप्त हो, (मान सा०) । कामी,

भ्रमण शील, अस्थिर घन, शूरवोर, स्त्रियों का प्यारा, जल से भय, अति चपल, सेवा

जानने वाला, (वृ० जा०) । £

(२) चंद्र वृष का--गम्भीर विचार, उत्तम बुद्धि, शोभित शरीर, बड़ा कुशळ,

“भोगी, विलासी, श्रेष्ठ कर्म करने वाला, काव्य करने वाला, कुशलता से सोस्य प्राप्त,

(मान are) (जा० भ०) देने में उदार, क्लेश सहने वाळा, उसका आज्ञा कोई भंग न

करे, कुटुम्ब घन व पुत्र से रहित, सौभाग्य युक्त, सबका प्यारा, गाढे मित्र, (बुन्म्ज्ञा[०) ।

(३) चन्द्र मिथुन का--सबका प्रिय कर्ता, हाथ में मत्स्य रेखा, रति सुख भोगी,

स्त्रियों को अतिप्रिय, सज्जनता युक्त, मनुष्य इसका गौरव करते हैं, देव कार्य में लोन,

(मान सा०) (जा० भ०) । काम शास्त्र में चतुर, स्त्रियों का अति अभिलाषी, शास्त्रच,

दूतकमं, चतुर वुद्धि, सबको Car वाला, जुआड़ो, मीठो बोली, नाच गीत का प्रेमी,

पमन की बात चिल्लो से जानने वाला 1

(४) चन्द्र ककं का--शास्त्र व गान विद्या कला आदि का ज्ञाता, शारीरिक बल से

निर्मल व्यापार वाला, पुष्प गन्ध प्रेमी, जल में क्रीडा करने वाला, भूमि सहित, श्रेष्ठ

बुद्धि से मनोरथ प्राप्त करे या घन सम्पादन करे, (मान सा०) (जा० भा०) । कुटिल,

शीघ्र गामी, अच्छे मित्र, स्त्री के वश, ज्योतिष शास्त्र ज्ञाता, बहुत घर हों, कभी घनी

कमी निर्धन, मित्रों का प्यारा, जलाशय बगीचा आदि से प्रेम (qo जा०) ।

(५) चन्द्र सिंह का--वन पर्वत में जाने से मनोरथ सिद्ध करने वाला, घर में कलह

कारक, जिससे विकलता प्राप्ति हो । पेट में पीडा, तेज से रहित शरीर, यशहीन (जा०

म०) (मान सा०) 1 क्रोधी, अल्प सन्तान, स्त्रियों का द्वेषी, निकम्मे क्रोध करे, दाता,

पराक्रमी, अभिमानी, मातृ भक्त, मानसिक पोड़ा, मांस वन पर्वत प्रिय (व० जा०) ।

(६) चन्द्र कन्या कॉ- स्त्रियों के साथ अधिक विलास, कोौतुक युक्त, श्रेष्ठ शील,

कन्या सन्तान के उत्सव युक्त, श्रेष्ठ भाग्यवान्‌, निर्बल आचरण, (जा० भ०) (मान सा०) 1

मधुर, वाणो, सत्य वक्ता, गीत नृत्य वाद्य आदि का प्रेमी, पुस्तक, चित्र कमं आणि में

भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहों का फल : २८७

निपुण, शास्त्राथं ज्ञाता, घर्मात्मा, बुद्धिमान्‌, संभोग में चंचळ, पराया घर व धन से युक्त, परदेश वासी, अल्प पुत्र अधिक कन्या (qo जा०) । (७) चन्द्र तुला का--बैलों या घोड़ों आदि फे बेचने खरीदने से जीविका चलावे पराक्रमी, देव ब्राह्मण पूजक, दानी, बहुत स्त्रियां, पराक्रम से वैभव और प्रतिष्ठा मानने वाळा, (मान सा०) (जा० भ०) । देव ब्राह्मण साधु का पूजक, बुद्धिमान्‌, पर घन आदि में निर्लोमी, स्त्री फे वशीभूत, घनवान्‌, फिरने वाला, अंगहोन, क्रय-विक्रय व्यापार जानने याला, रोगी, कुटुम्ब का हितकारी, बन्धु जनों से त्यक्त (वृ० जा०) ।

(८) वृश्चिक का चन्द्र--राजा से या जुआ से घन का नाश, कर भ्रिय, साहस

होन, दुष्ट मन, खोटे ख्याल वाला, शांति रहित, अन्त में रोगी (मान०) (जा० भ०) । माता-पिता गुरु से रहित, राज पूज्य, गुप्त पापी, वाल्यावस्था में रोगी, विषम स्वभाव (वृ० जा०) ।

(९) घन का चन्द्र--अनेक कला कुशल, संगीतज्ञ, सरल वाणी, पूर्ण घनी होकर भी कपण, निर्मलता युक्त, (मानसा०) (जा० भ०) । पितृ घन युक्त, दानी, कवि, बल- चान्‌, बोलने में चतुर, उद्यमा, लिपि, चित्र आदि शिल्प कर्म ज्ञाता, अति प्रगल्भ, घमंज्ञ

बन्धु वेरी, केवळ प्रोत के बश में होने वाला (qo जा०) ।

(१०) मकर का चन्द्र--शीत से डरने वाला, गायन विद्या का ज्ञाता, किंचित्‌

क्रोघी, अति कामी, अपने कुळ के अनुकूल उत्तम वृत्ति करनेवाला (मान० सा०) 1 अपनो

स्त्री qi सं प्रेम, दम्भो, मिथ्या घमं करने वाला, सवे प्रिय विद्वान्‌, लोमी, बलवान्‌,

काव्य करने वाला, फिरने वाला, निलंज्ज, निइ'य (qo जा०) ।

(११) कुम्भ का घंद्र--अति आलसो, पराये पुत्र से.प्रोत, अत्यन्त चतुर, वैरियों

का नाशक (मान सा०) । पर स्त्री पर घन आर पाप कमं में तत्पर, मित्रों का प्रिय,

वृद्धि क्षय से युक्त, पुष्प चन्दन प्रिय (qo जा०) ।

(१२) मीन का चन्द्र- जितेद्धिय, गुणवान्‌, अतिनिपुण, निमंल बुद्धि, शस्त्र विद्या

में प्रवीण, चंचल, जल की लालसा वाला (मान०) (जा० qo) । जल रत्न के क्रय￾विक्रय से उत्पन्न घन, पराये कमाये घन का मोगी, स्त्री विषय वस्त्रादि में अनुरक्त,

शत्रु को जीतने वाला, निधि (भूमिगत द्रव्य) आदि का भोगो, शास्त्रज्ञ पंडित

(बु० जा०) 1

३ मंगल का राशि फल

( १ ) मंगल मेष का--राजा से प्राप्त भूमि, मान ओर घन से परिपूर्ण, सुन्दर

वाणी, तेजस्वी, साहसी, निरन्तर, सब मनुष्यों का प्यारा, (मान० सा०) (जा० अ०) ।

स्वगृही १-८ राशि का--राज पूजित, फिरने वाला, सेनापति, व्यापारी, घनवान्‌, चोर,

चंचल इन्द्रिय (विषयी), शरीर में चोट हो (go जा०)। (२) मंगल वृष का--घर ओर घन का थोड़ा सुख, छत्रुओं से युक्त, दुसरे के घर में वास करने वाळा, अत्यन्त पुत्र जनित पोड़ा को प्राप्त, अनीति और अग्नि रोग

२८८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

सहित (जा० भ०) (मान०) । शुक्रपृहो (२-७ राशि फा)-स्त्री के बश में रहने वाला,

मित्रो के विरुद्ध रहने वाला, पर स्त्री गामी, इन्द्र जाली, सुन्दर श्यंगार युक्त, उरने

वाला, स्नेह हीन, (zo जा०) ।

(3 ) मंगल मिथुन का-- बहुत कलाओं का ज्ञाता, स्वघर में परदेश जाने में

य पुत्र आदिको से सौख्य पाने वाला, कुटुम्बी, पुरुषों से कलह करने वाला

(मान सा०) । बुध गृहो (३-६ राशि का)--तेजस्वी पुत्रवान्‌, मित्र

गायन विद्या तथा युद्ध विद्या को जानने वाला, कृपण, निर्भय,

बहुत मन, प्रि

-(जा० wo)

रहित, परोपक्रारी, कृतज्ञ,

मांगने वाला (वृ० जा०) 1

(८) मंगल कर्क फा--पराये घर का वासी, अत्यन्त दीन, बुद्धि हीन, शत्रुओं के

उपद्रव से शक्ति हस के कारण शान्त, स्त्रो से कलह करने वाला (जा० भ०):(मान०

सा०) । नाव, जहाज आदि के काम में धनवान्‌ हो, बुद्धिमान्‌, अंगहीन, तथा दुर्जन

(१० जाश) ।

(५) मंगछ सिंह का--पुत्र और स्तो के सुख की प्राप्ति, शत्रुओं का नाशक, बड़ा

उद्यमी, साहसी, राजनीति, घर्म नीति से कार्य करे, अनीति और नोति सहित, (जा०

o (मान०) । निर्धन, क्लेश सहने वाळा, वन मे फिरने वाळा, अल्प स्त्री पुत्र (a=

जा०)। |

(६) मंगल कन्या का--स्वजन के भरण पोषण में व्याकुल, अधिक : कुटुम्बी,

यज्ञ आदि करने वाला, स्त्री और भूमि के सुख से सुखो । श्रेष्ठ जनों में. पुबनीय (जा०

अ०) (मान०) । मिथुन के मंगल सदुश फल (qo जा०)। S

(७) मंगल तुछा का--आमदनी से खर्च अधिक, किसी अंग से हीन, माता-पिता

आदि बुद्ध जनों से स्नेह रखे, सबको दुःखदाई, विफलता युक्त, मूमि ओर स्त्री के

निमित्त दुःख पाने वाला ( मान० ) ( जा० म० )। वृष के मंगल सदृश फळ

(a° जा०) ।

(८) मंगल वृश्चिक का-- विष अग्नि शस्त्र से भय, संतान ओर स्त्री में सुख, राजा

से स्नेह, शत्रुओं को जय करने वाला, (जा० qo) (मान०) । मेष के मंगल सदृश फळ (बृ० जा०) । ' (९) मंगल घनु का--रथ वाहन आदि गौरव युवत, शत्रु से भय, श्रेष्ठ स्त्री वाला,

स्त्री के साथ भ्रमण, ब्रण रोग से पीड़ित (जा० भ०) (मान०) ।

गुरु क्षेत्री (९-१२ राशि का) शत्रु बहुत हों, राजमन्त्री, विद्वान्‌, निर्भय, थोड़ीसंतान

(वृ० जा०) । |

(१०) मंगल मकर का-ंग्राम में बडा पराक्रमी, स्त्री सुख युक्त, अपने जः

प्रतिकूल, मनुष्यों से भयभीत, अनेक वैभव युक्त, हस्तगत 9 बाला, | ma ) a

म०) । घन और संतति बहुत हो, राजा के तुल्य हो (qo जा०) ।

` \११) मंगल कुम्भ फा--विनय से रहित, रोगी, अपने मनुष्यों के प्रतिकूल, बड़ा

भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहों का फल : २८९

दुष्ट, अनेक पुत्र होने के कारण सदा दुःखी (मान०) (जा० म० ) । अनेक दुःखों से पीड़ित निघंन, पोड़ित, मिथ्या वादी, क्रूर (qo जा०) ।

(१२) मंगल मीन का--व्यसनी, खल, निर्दय, बिकल, अपने घर से अन्यत्र घुमने वाला, निबुद्धि, कुबुद्धि से उसका नाश हो (जा० wo) (मान०) । घन में मंगल qaw फल (qo जा० ) 1

४ बुध का राशि फल

१-बुष मेष में--खल बुद्धि, चंचल मन, बहुत भोजी, कलह कारक, निर्दय, कर्ज लेने वाला, इच्छित वस्तुओं से रहित, भूमि फे साघन रहित (जा० भ०) (मान०) 1 भौम क्षेत्री (१-८ राशि का)--जुआ, ऋण आदि, परघन {लेने में, मद्यपान में, नास्तिकता में, चोरी में तत्पर, दरिद्री, उसकी स्त्री निन्दा करे, झूठा, घमंडी और अघर्मी (बु० जा०) ।

२-बुध वृष का--दानी, अनेक वस्तुओं का देने वाळा, गुणी, अनेक कला कुशल, फामी, घनी, पुर और छोटे भाई से सुख पावे (मान०) (जा० भ०) । शुक्र क्षेत्री (२-७ राशि का)--उपदेश, शिक्षा फरने वाला आचार्य हो, स्त्री तथा संतान बहुत, धन जमा करने में तत्पर, उदार, माता-पिता और गुरु की भक्ति में तत्पर (वृ० जा०) ।

३-बुघ मिथुन का--प्रिय वचन भाषी, रचनाओं में चतुर, २ माता हों, शुम वेष चाला, स्थान और भोजन से सब प्रकार सुखी (मान०) (जा० भ०) । वाचाल, क्रूरबोलने

चाला, शास्त्र विद्या गीत वाद्य, नृत्य आदि कला का ज्ञाता, प्यारी वाणी, सुखी (qo

ल्ला०)॥

४-बुघ ककं का- दुष्ट आचरण, राज सेवा में रुचि, परदेश जाने वाला, सुन्दर

स्त्रियों के साथ रमण करने वाला, गाने बजाने व कलाओं में आदर करने वाला ( मान० ) ( जा० भ० ) । जल कमं से उत्पन्न घन से घनवान्‌, मित्र बन्चुजनो का

शत्रु हो ।

५-बुघ सिंह का--मिथ्यावादी, दुष्ट बुद्धि, सहोदर भाइयों का वरी, स्वस्त्री को

प्रसन्न रखे, शत्रुओं के वश में रहने वाला, अपनी उन्नति से रहित, स्त्रियों के साथ

आनन्द करने वाला, (मान०) (जा० wo) स्त्रियों का बेरी, घन, पुत्र, सुख इनसे रहित,

फिरने वाला, मूर्ख, स्त्रियों की बहुत अभिलाषा करने वाला, अपने जनों से पराजित

(बृ० जा०)।

६-बुघ कन्या का-- सुन्दर वचन, चतुर, लिखाई का काम करने वाला, अति उन्नति

पाने वाला, सुख पाने वाला, उत्तम नेत्र वाली स्त्री के साथ सुख भोगने वाला (मान०)

(जा० भ०) । दाता, पण्डित, गुणवान्‌, सोस्यवान्‌, क्षमावान्‌, निभंय, प्रयोग युक्ति जानने

वाला (qe जा०) |

७-वुघ तुला का--मिष्ट भाषी, खर्च करने में उद्यत, अनेक शिल्प जानने वाला,

१९

२९० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

खोटे आचरण को स्त्री से भोग करने वाला, बडा बकवादी, अनेक व्यसनो में आसक्त,

गाने बजाने के समय और पाप युक्त होता है । झूठ बोलने वाला (जा० qo) (मान०) ।

वृष के बुध सदृश फल (qo जा०) 1

८-बुध वृश्चिका का--कृपण स्त्रियों के साथ भोग में आसक्त, श्रेष्ठ कर्म और सुख

से होन, हानि और आलस्य युक्त, गुणों में दोष देने वाला, कृपण (जा० wo) (मान०)।

मेष के बुघ सदृश फल (qo जा०) ।

९-बुघ घनु का--दानो, धनी, कला कुशल, कुछ पालक, कमाई हुई श्रेष्ठ लक्ष्मी

युक्त, भाग्यशाली, योग्य स्त्रियों के साथ रमण करने वाला (जा० भ०) (मान०) । राज

पूजित, या राज बल्लभ, विद्वान्‌, व्यवहार जानने वाला, समय के अनुकूल बोलने घाला

० जा०) । 31 मकर का- शत्रु के भय से युक्त, दृष्ट बुद्धि, काम कला रहित, दूसरों का

काम करने वाला अर्थात्‌ नोकर, व्यसनी, नम्र स्वभाव (मान०) (जा० भ०) शनि क्षेत्री

(१०-११ राशि का)--पराया काम करने वाला, दरिद्री, शिल्प कर्म करने वाला, कुणी,

पराई आशा पर रहने बाला (वु० जा०) ।

११-वुध कुम्भ का--घर में कलह हो, दीनता, हल्कापन, घन, पराक्रम सर घम से

होन, दुष्ट बुद्धि, शत्रु दारा ताप ( मान० ) ( जा० भ० ) । मकर के बुध समान फल

(बु? जा०) ।

१२-बुघ मीन का--दूसरे के घन आदि का रक्षक, देव ब्राह्मण का गनुझर, श्रेष्ठ

स्त्रियों के सुख का दर्शक ( मान० ) ( जा० भ० ) । पराई सेवा में तत्पर, उसके सेवक

जीते हुए रहें, पराया अभिप्राय जानने बाला, नीच, शिल्यी (या सेवक से पराजित )

(qo जा०) ।

गुरु का राशि फल

१-गुरु मेष का--अति उदार, उत्तम कर्म करने वाला, अघिक्र शत्रुओं वाला, अति

वैभव युक्त, मति पूर्वक काम करने वाला, प्रारब्धवान्‌, बडो बुद्धि (जा० wo) (मान०)

भौम क्षेत्री (६-८ राशि का)--सेनापति, घनाढय, बहुत स्त्री युक्त, दाता, अच्छे भूत्य,

क्षमावान्‌, तेजस्वी, गुणवतो स्तरा से युक्त, प्राख्यात कोति (qo जा०) ।

« २-गुरु वृष का--देव ब्राह्मण पुजक, ऐश्वयंवान्‌, घन वाहून ओर गौरव युक्त,

“अधिक शत्रु हों, पराक्रम से शत्रुओं को हराने वाला ( मान० ) (जा० भ०) गुक्र क्षेत्री

(२-७ राशि का)--स्वस्थ देह, सुखो, घन,१मित्रों से युक्त, सत्पुत्र वाला, उदार, सबका

प्यारा (व्‌० जा०) ।

३-गुरु मिथुन का--क्रषि, प्रिय बोलने वाला, पवित्र, निर्मळ स्वभाव में रुचि,निपुण,

अनेक मित्र (मान०) (जा० qo) । बुध क्षेत्रो (३-६ राशि का)--घर परिवार बहुत,

पुत्र और मित्र बहुत, सुख युक्त, मन्त्री हो (बु० जा०) ।

४-गुरु कक का--अनेक घन युक्त, कामदेव के मद से मत्त, अनेक शास्त्र ब कलाओं

भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहो का फल : २९१

सें कुशल, प्रिय वचन भाषी, चतुर, घोडा आदि वाहन युक्त (मान०) (जा०भ०) । मणि,

युत्र, घन, स्त्री, ऐश्वर्य, बुद्धि, सुख इनसे युक्त (qo जा०) 1

५-गुरु सिह का--पहाड़ किला कोट का स्वामी, अपनी प्रभुता के कारण बन आदि

आप्त करने वाला, दृढ्‌ शरीर, दानी, शत्रुओं के वेभव को हरने वाला, प्रिय वाणी (मान)

(जा० भ०) । सेना समूह में श्रेष्ठ या सेनापति । कक के गुरु में बताया फल भी होवे

(o जा०) ।

६-गुरु कन्या का--पुष्प गन्ध, उत्तम वस्त्रघारी, शुद्ध, धन ओर दान में बुद्धि, सुन्दर

स्वरूप, शत्रुओं को सदा तपा देने वाला (मान०) (जा० भ०) । मिथुन के गुरु समान

फल (qo जा०) 1

७-गुरु तुला का--उत्तम सत्पात्र, अनेक पुत्र, जप होम यज्ञादि में उत्सव मनाने वाला,

देव ब्राह्मण पूजक, दान करने में वृद्धि चतुर, शत्रु युक्त, घबड़ाहट युक्त, आतुर, अहित

करने वाला (मान०) (जा० भ०) 1 वृष के गुरु सदृश फल (qo जा०) 1

८-गुरु वृश्चिक का--घन नाश करने वाला, दोषों से उत्पन्न दुबे देह, वडा

'याखंडी, घर की ओर से और बाहर से भी सदा दुःखी (मान०) (जा० भ०)॥ मेष के

सदृश फल (qo जा०) 1

९-गुरु घन का--घन का दान करने का प्रेमी,नम्न, बहुत वैभव, घन वाहन युक्त,

तीव्र बुद्धि, श्रेष्ठ रुचि से सुन्दर आभूषण वाला (मान०) (जा० भ०)। स्वगृही (९-१२

राशि का) मांडलीय (कुछ गांवों का स्वामी) व प्रधान व सेनापति और धनवान्‌

(३० जा०) ।

१०-गुरु मकर का--भ्रष्ट बुद्धि, पराया काम करने वाला, कामदेव रहित, भय

"क्रोध युक्त, कमं मनोरथों वाला या परकार्य नष्ट कर अपना मनोरथ सिद्ध करने वाला

(मान०) (जा० भ०) । नीच कर्म करने वाला, अल्प घन, दुःखित (qo जा०) ।

११--गुरु कुम्भ का--सदा रोगी, अति कुबृद्धि, घन से रहित, अत्यन्त कृपण, पाप

युक्त, खराब भोजन, दाँत और उदर में पीड़ा, (मान०) (जा० भ०) । कर्क के गुरु

समान फल (वृ० जा०) ।

१२-गुरु मीन का--राजा की कृपा से धन प्राप्त, सुन्दर मुख, घर का साधन करने

चाला, दान में तत्पर, सत्पुरुषों का प्यारा, मित्रों को सोख्य देने वाला, अपने को पवित्र

मानने वाला, काम की उन्नति वाला, (जा० भ०) (मान०) । “घनु के गुरु के समान फल (ge जार) ।

६-- शुक्त का राशिफल

१--शुक मेष का--घर, वाहन समूह ओर नगर का स्वामी, परदेश जाने को मन,

कविजनों का साथी, शत्रुओं से रहित, आदर पाने वाळा, ( मान० ) ( जा० भ०)

सोम क्षेत्री शुक्र ( १-८ राशि का )-परस्त्रियों में आसवत, परस्त्रियो द्वारा उनका

'घन हरण करावे, कुल पर कलंक लगावे ( qo जा० ) ।

२९२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२-शुक्र वृष का--बहुत स्त्री पुत्र, उत्सव तथा गौरव सहित, पुष्प गंघ में रुचि,

खेती का काम करने वाला, शत्रुओं से रहित या अल्प शत्रू, लक्ष्मी से सम्पन्न (यान०)

( जा० भ० ) स्वक्षेत्र ( २-७ रात्रि का )-अपने बल से घन पावे, राज पुज्य, अपने

बंघुजनों में प्रधान, विख्यात, निर्मय, (वृ० जा०) ।

३-शुक्र मिथुन का--सस्पूर्ण शास्त्र व कलाओं में कुशळ, सरल मनोहर वचन,

मिष्ठान्न भोजन का इच्छुक (मान०) (जा० भ०)। राज्य कायं करने वाळा, धनवान्‌,

गीत वाद्य आदि कला जानने वाला (qo जा०) ।

४-शुक्र कके का- श्रेष्ठ कर्मों में बुद्धि, गुण सम्पन्न, सबको कलायुक्त वचनों से वश

में करने वाला, मघुर वाणी ( मान० ) ( जा० भ० ) दो स्त्री हों, माँगने वाला, भय

युक्त, उन्मद; अति दुःखो (qo जा०) ।

५-शुक्र सिंह का--स्त्रियों से घन मान और सुख पाने वाळा, अपने मनुष्यों से दुःख

पाने वाला, मित्रों को संतोष करने वाला, शत्रुओं का नाश करने वाला (जा० wo)

(मान०)। स्त्री का कमाया घन पावे, स्त्री उसकी प्रधान रहे, अल्प संतान, (qo जा०)।

६-शुक्र कन्या का--अति धनवान्‌, तीर्थ करने वाला, अति लक्ष्मीवान्‌, अल्प बोलने

वाला (जा० भ०) (मान०) 1 अति नीच कमं करने वाला (वृ जा०) ।

७ शुक्र तुला का- पुष्प और विचित्र वस्त्रों का प्रेमी, घनयुक्त, देशान्तरों में आने

जाने वाला, उत्तम कवि (जा० भ०) (मान०) । वृष के शुक्र समान फल (वू०जा०) ।

८-शुक्र वृश्चिक का--कलह एवं हत्या करने का इच्छुक, निदा का पाश; विषय

इन्द्रियो में रोग, व्यसन युक्त, कभी कभी घन से युक्त (मान०) (जा० अ०)। मेष में

शुक्र समान फळ (वृ० जा०) ।

९-शुक्र घनु का--पुत्र स्त्रो युक्त, धन का आगमन व उत्सव सहित, राजा का

मंत्री, श्रेष्ठ शील, कवियों में प्रेम रखने वाला, घर में वैराग्य रखने वाला (जा० भ०)

(मान०) । बहुतों का पूज्य घनवान्‌ (qo जा०) ।

१०-शुक्र मकर का--बड़ा कामी, स्त्री में प्रीति, व्यसनी, अधिक खचं, भय सहित,

अत्यन्त चितायुक्त, संगीत प्रेमी, कवि, जंगल में रहने का मन करने वाला (मान०)

(जा० wo) । शनिक्षेत्री (१०-११ राशि का) सब का प्यारा, स्त्रो के वश में रहने

चाला, कुत्सित स्त्री में आसक्त (qo जा०) ।

११-शुक्र कुम्भ का--वस्त्र भूषण आदि भोगों से हीन, सत्कर्म करने में आसो,

चनी होकर भी निघंन हो जाता हे (मान०) (जा० भ०) । मकर में शुक्र के समान

फूल (qo जा०) ।

१२-शुक्र मीन का--राजा की कृपा से वैभव प्राप्त, शत्रुओं पर आक्रमण करने

वाळा, घन को प्राप्त, दोन मनुष्यों को घन देने में मन, नम्रता युक्त, तैरने में प्रीठि + (जा० भ०) (मान०) । बिहान्‌ और सम्पन्न, राजपूजक, सबका प्यारा (qo जा०) ।

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भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहो का फल : २९३

७--शनि का राशिफल -

१-शनि मेष में--घन से होन, दुर्बळ देह, पुरुषों से विरोध करने वाला जिससे

मनोरथ की हानि, मित्रों से बिरोध, शांति रहित (मान०) (जा० भ०) । मूखं, फिरने

वाला, कपटी, नेत्र रहित (qo जा०) 1

२-शनि वृष का--स्त्री के सुख से होन, चुगलों या दुष्ट जनों का संग, बुद्धिहीन,

पुत्रोत्सव से रहित (जा० wo) (मान०) । बहुत स्त्री, अगम्या से गमन, ऐश्वर्य रहित (go जा०) ।

३-शनि मिथुन का--ज्यादा चलने से ओर निर्मलता से रहित, घर को छोड़ कर

बाहरी भोगों के कुतुहल से हीन, सज्जन पुरुषों से आनन्द कभी नहों प्राप्त, हास्य विलास

आनन्द करने वाळे सुख को नहीं पाता (जा० भ०) (मान०) । बुध क्षेत्री-निलंज्ज,

दुःखित, अपुत्र, लिखने में भूल करने वाला, रक्षा स्थान (कारागार) आदि का स्वामी

तथा प्रधान (qo जा०) ।

४-हानि कर्क का-<दुबंल देह, माता से रहित, लक्ष्मी के कारण उत्तम भोग￾विलास करने वाला, धनवान्‌, शत्रुओं का नाशक, समता रखने से हीन (जा० To)

(सान०) । दरिद्री, दंत रोगो, मातृ रहित, पुत्र रहित, मूर्ख (qo जा०) ।

५-शनि सिंह का--लिखने को विद्या में कुशल, कलह करने में मन, उत्तम शील

(स्वभाव) से हीन, नोति मार्ग से बहिष्कृत, पुत्र स्त्री से पीड़ा को प्राप्त (जा० भ०)

(मान०)। मूर्ख, दुःखित, पुत्र रहित, भार ढोने वाला या दास कर्म करने वाला

[वृ० जा०) ।

६-शनि कन्या का--जो कुछ काम करे असफलता पावे, विनय से हीन, चञ्चल,

स्नेह वाला, कभी बलयुक्त कभी बलहीन, चलायमान मन, नम्नताहीन (जा० To)

(मान०) । मिथुन के शनि सदृशफल (qo जा०) ।

७-शनि तुला का--अपने कुल में राजा के समान बलयुक्त, अधिक कामी, दरिद्रं

को दान देने वाला, राजा से सम्मान प्राप्त, (मान०) (जा० भ०)। प्रख्यात कीति,

समूह प्राम सेवा आदि में पुज्य और धनवान्‌ (बु० जा०) ।

८-शनि वृश्चिक का--विष अग्नि तथा शस्त्र से भय, धन का नाशक, शत्रुओं तथा

रोग से पीडित, विफलता युक्त, इच्छित सुख से रहित ( मान० ) ( जा० भ० ) । मारने

आंघने वाला, हत्यारा, चपल, निदंय ( qo जा० ) ।

९--शनि घनु का-पुत्र गण से परिपूर्ण मनोरथ वाला, विख्यात कीति, उत्तम

जीविका, वैभव ओर संतोष युक्त ( मान० ) ( जा० भ० ) । गुरुक्षेत्री (९-१२ राशि का)

स्वयं अंत अवस्था में सुख पाने वाला, शुभ कमं से मृत्यु, दुर्मरण, अपघात, अत्पमृत्यु

जलप्रवाह, दुर्गपात, अग्नि विष शस्त्र आदि से न होगी । राजद्वार में उसकी प्रतीति हो,

अच्छी स्त्री युक्त, सत्‌ पुत्र, सत्‌ घन युक्त, सेवा या ग्राम का अघिनेता (qo जा०) ।

१०--शनि मकर का-राजा में प्रीति रखने से महत्त्व पाने वाला, अगर, पुष्प

कस्तुरी, उत्तम चंदन तथा उत्तम सुगंधित द्रव्यो से सुख ( जा० भ० ) ( मान सा० )1

२९४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स्वक्षेत्री-पराई स्त्री व पराये धन से युक्त, ग्राम सेवा में अग्रणी ( मुख्य ), नेत्र मंद हो,

सदा मलिन शरीर, स्थिर घन व ऐइवयं वाला ( वृ० जा० ) 1

११- शनि कुम्म का- व्यसन करने वाला, शत्रु से हार पाने वाला, कर्तव्य कर्म करने

से रहित, अच्छे मित्र युक्त किन्तु छात्रुओं के मदंन करने में सहायता होन, वडा घनी

(जा० अ० ) ( मान० ) मकर के शनि सदृश फल (qo जा० ) ।

१२--मीन का शनि-विनय, व्यौहार तथा सुशीलता युक्त, सब मनुष्यो में विख्यात

गुण वाला, उपकार करने में निपुण, अनेक वैभव युक्त ( मानसा० ) ( जा० भ०) 1 घनु

के शनि सदुश फल ( qo जा० ) ।

राहु का राशि फल

राहु कन्या या मिथुन का ६ या ८ घर में, केन्द्र या त्रिकोण में हो तो--शूरवोर,

बलवान्‌, सुभोगी हो, घर में हाथी आदि वाहन पुत्र व रत्न आये और आनन्दित हो

( प्रारब्ध योग ) ।

अध्याय--१४

द्वादशा भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फळ

१ लग्न में राशियों का फल

१-लर्न में मेष-छाल शरीर. कफ प्रकृति, अधिक क्रोधी, कृतघ्न, मंद'ईडि, स्थिरता

युक्त, स्त्री तथा नोकरों से सदा पराजित । fA

२-लन् में वृप--मानसिक रोग; स्वजनों से अपमानित, प्रिय पुरुषों से वियोग,

कलह युक्त, सदा दुःखी, शस्त्र से घात, धन क्षय ।

3— में मिथुन-गोरांग, स्त्री में आसक्त, राजा से पीडित, दूत का कर्म करे, प्रिय

याणी, बड़ा नम्र, गान विद्या में प्रवोण, सिरके बाल उत्तम ।

४-हरूग्न में कर्क--गोर अ ग, मित्राषिक्य, पुरुषों को इच्छा पुरी करने वाला, हँसी,

नदी में तैरने का प्रेमी, बड़ा बुद्धिमान्‌, पवित्र, क्षमावान्‌, धमं में रुचि, सेवा करके

योग्य ।

५-छर्त में सिह--पांडुवर्ण, वायु ओर कफ से पीड़ा, मांस प्रिय, बड़ा तीक्षण, शुर￾वीर, बड़ाढीठ, निरंतर भ्रमण करने वाला ।

६-लग्न में कन्या--वात पित्त इलेष्म युक्त, प्रिय स्त्रो से पराजित, वासना से डर￾पोक, मायावी, शुभ कांता को भावना करने वाला, काम से पीड़ितांग ।

७-लग्न में तुला--कफ युक्त, सत्य वक्ता, सदा स्त्रियों से स्नेह, राजा से मान, देव

पुजन में तत्पर ।

< न ¿—s में वृश्चिक--क्रोघी, वृद्धता युक्त, राजा से पीड़ित, गुणों से युक्त, शास्त्रः

क्ता में अनुरागी, शत्रुगणो को मारने वाला ।

९-लनन में धनु--राजा से सम्बन्ध रखने वाला, काय करने में प्रवीण, देव ब्राह्मण

है 7 “° क

द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल : २०५

णनुरागी, घोड़ों को रखने वाला, सुहृदजनों का काम करने वाला, घोड़े के समान जंघा ।

१०-लग्न में मकर--संतोषी, बड़ा डरपोक, पाप करने में निरत, कफ और वायु को

पीडा, लंधा शरोर, शत्र जनों से ठग विद्या करने वाला ।

११-लग्न में कुभ--धैर्य युक्त, वात प्रकृति, अविक जलसेवो, मित्र के उपकार को

शरीर समर्पण, मैंथुन प्रिय, सज्जन अनुरागी, सब पुरुषों का प्रेमी |

सत्याचार्य ने कुम्भ लग्न अच्छा नहों कहा है । यवनाचार्य ने समस्त कुम्भ लग्न को

. नहीं किन्तु लग्न में कुम्भ के द्वादशांश को अशुभ कहा है । विष्णुदत्त कहते Q कि यवन

मत से कुम्भ द्वादशांश बुरा है तो वह सभी लग्नों में आयेगा तो क्या सभो बुरे हो जायेंगे

इसीलिये उचित यही है कि कुम्म लग्न हो जन्म म अशुभ है केवल कुम्भांशक बुरा

नहीं है ।

१२-लरन में मीन--जलक्रीडा प्रेमी, बडा विनोत, स्त्री सहवास को उत्सुक, वडा

पंडित, छोटा शरीर, बडा प्रचण्ड, पित्ताधिक्य, बडा यशस्वी ।

२ धन भाव में राशि फल

१-घन में मेष राशि--पुण्य से एकत्र घन, सुन्दर नातिवान्‌, चतुष्पद पालन से धन,

पंडित, एक अच्छा पुत्र हो ।

२-घन में वृष--खेती से घन प्राप्त, चौपाये, अन्न मणियों से सदा घन प्राप्त या

इनको पास रखने वाला ।

३-घन में मिथुन--स्त्री के निमित्त से घन प्राप्त करे, सुवर्ण चाँदी के आभूषण और

बहुत वाइन युक्त, साधुजनों का प्रिय ।

४-घन में कर्क--वृक्ष, जल से उत्पन्न किया घन, जल से भय, वन के कंद मूल आदि

भोजी, न्याय से धन संग्रह कर्ता, पुत्रों से प्रीति ।

५-घन में सिह--बनवासी, घनवान्‌, तप करने वाला, मान पाने वाला, सब का

उपकारो, अपने पराक्रम से घन एकत्र करने वाला ।

६-चन में कन्या--राजा से घन प्राप्त, सुवर्ण मोतो आदि तथा हाथी घोड़े आदि

से उत्पन्न किया घन होता है ।

७-घन में तुला--पुण्य प्रताप से पाषाण से भी घन निकले, मही के व्यापार से

शारीरिक पीडा से तथा खेती द्वारा उत्पन्न घन को एवं कर्म द्वारा उत्पन्न घन को पाता

है । खरीदने बेचने से या न्याय से इकट्ठा किया घन होता है ।

८-घन में वृश्चिक--स्वघमे पालन, काम इच्छुक, सदा विचित्र बात कहने वाला,

ब्राह्मण देव भक्‍त ।

९-घन में घनु--स्थिर विधान से उत्पन्न किये घन का पाने वाला, उत्तम चतुष्पद

पालन से घन, यशस्वी, रस से उत्पन्न वस्तुओं को खाने वाला, घर्म विघान का लोमी ।

१०-धन में मकर--अनेक प्रपंच से तथा अनेक उपायों से घन पाने वाळा एवं राज

सेवा से, खेती से, विदेश जाने से घन प्राप्त करने वाला ।