सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
~
फल विचार : १६१
इसी प्रकार शेष दिनों की या इच्छित दिन की दिनप्रवेश कुण्डली पंचांग पर से वना लेनी चाहिए । सूक्ष्म फल वर्ष की अपेक्षा मास से और मास की अपेक्षा दिन प्रवेश से प्रगट होता है ।
अध्याय १८
(वर्षं फल खंड का उत्तराद्ध-फलित भाग)
फल विचार
वर्षं फल में फल के विचार में वर्षेश, मासेश, दिनेश, मुन्था, मुन्थेश,सहम,सहमेश
एवं मैत्री दृष्टि, पंचवर्गी वळ, हं वल, हद्दा आदि का विशेष विचार होता है ।
इनके अतिरिक्त भाव फल, दशाफल,राज योग,राजयोग भंग,भ रिष्ट योग, अरिष्ट
भंग,एवं अन्य कई प्रकार के योग जातक के अनुसार ही विचारणीय है । ज्योतिष
दिक्षा भाग ३ फलित खण्ड में इनका पूरा फल विस्तार पूर्वक दिया है । इसी कारण
यहाँ अरिष्टयोग राजयोग आदि एवं मुद्दा ध्रिशोत्तरी दशा योगिनी दशा आदि का
संक्षिप्त वर्णन दिया गया है ।
आशा है कि पाठक उपरोक्त फलित खण्ड अवश्य देख चुके होंगे। यदि अभी
तक उक्त फलित खण्ड को न देखा हो तो निवेदन करता हू कि उसे अवश्य देखें।
उससे वर्ष प्रवेश, मास प्रवेश या दिन प्रवेश कुण्डली में उक्त फलित खण्ड के सहारे
कई योग खोजने में सहायता मिलेगी जैसे ऊपर से गिरने या चोट लगने या सर्प आदि
के काटने का योग, इसी प्रकार के अनेक योग हैं जो इष्ट कुण्डली में हैं या नहीं
खोजना पड़ेगा । ऐसे अनेक योग फलित खंड में दिये हैं जिन को जानना आवइयक
है । ग्रंथ के विस्तार होने के भय से वे यहाँ नहीं दिये इस आशय से कि पाठक उनको
देख चुक्रे होंगे ।
इन के अतिरिवत नीलकंठी के १६ योग भी यहाँ दिये हैं और उदाहरण देकर
उनको समझाया है । ये योग अधिकतर प्रश्न सम्वन्ध में काम आते हैं । परन्तु वर्ष के
फक वर्णन में भी इनका उपयोग हुआ है । इस कारण उनको भी यहाँ दे दिया है
जि्षसे पाठक उनसे अनभिज्ञ न रहें और यहाँ वणित फल को समझ सके ।
वर्ष में किस भाव से क्या विचारना
(१) लग्न से-शरीर वर्ण चिह्न घाव आयु सुख दुःख जाति स्वभाव ।
(२) दवितीय से--पोना चाँदी रत्न धातु आदि सव द्रव्यो की स्थिरता और मित्रों
का विचार । * ११
१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
(३) तृतीय से--भाइयों का सुख और उन से धन की प्राप्ति, साहस, मार्ग,
नोकर, पितृ सम्वन्धी हानि ।
(४) चतुर्थ--माता और पिता से सुख, भूमि आदि का लाभ, गडी सम्पत्ति,खेत,
बाड़ी घर, वाहन का सुख, पिता का धन ।
(५) पंचम--विद्या और संतान का लाभ तथा गर्भपात का विचार, यन्त्र-मन्त्र,
पुत्र-कन्या, गर्भनेत्र, धन का उपाय ।
(६) षष्ठ--रोग, मामा, शत्रुभय, शरीर क्लेश, पशु, पराश्रय, भथ, घाव, फोड़ा आदि ।
(७) सप्तम--स्त्री, व्यापार, खोई हुई चीज, भूले-भटके की वात-चीत, चोरी
गया द्रव्य, रास्ता, यात्रा, झगड़।। सप्तम में कोई ग्रह रहने से अच्छा फल नहीं देता । यदि शुक्र हो तो कामी होता है ।
(=) अष्टम--पुर्वजनों का धन, मरे हुए की सम्पत्ति, संग्राम, शत्रु, किले की चढ़ाई का विचार, मरण विचार, नष्ट धन का, परिवार का तथा मानसिक दुःख का विचार, युद्ध से भय,आयु । इसमें मरण विचार इस प्रकार है, अष्टम भाव की नवांश राशि स्थिर--घर में, चर--परदेश में, द्विस्वभाव-मार्ग में । शुभ युक्त दृष्ट- तीर्थ में । पाप युक्त दृष्ट-कुत्सित स्थान में क्लेश से मरण । उसमें भी द्रेष्काण वश फाँसी से या दूसरे के मारने से या अपने द्वारा, पानी में डूबने आग में गिरने विष आदि से मरने का विचार करना ।
(९) नवम- भाग्य धर्म आदि का विचार, मार्ग, स्त्री संग ।
(१०) दशम--कमं, राज्य का लाभ, माता पिता से धन मुद्रा, अत्यन्त पुण्य विपय, तीर्थं यात्रा, यज्ञ महादान, आरोग्यता ।
(११) लाभ से--राज्य लाभ, सन्मान आदि से लाभ, प्रत्येक धनों का प्रयोजन, अनाज का भाव, मित्र लड़की, चतुष्पद, राजा धन, वहुत-सी आमदनी की युक्ति, परिवार ।
(१२) व्यय भाव से--शत्रु से दुःख वहुत खर्च,शत्रु को रोकना,पकड़ना, हराना, पीड़ा ।
जन्म लान से वर्ष लान का विचार
- वर्ष कुण्डली जब बन जाती है तब देखना वर्ष में जन्म की लग्न राशि कहाँ पड़ी है। जैसे यदि जन्म कुण्डली में कुम्भ राशि है और वर्ष कुण्डली में ककं राशि है। तो यह कुम्भ राशि वर्ष कुण्डली में आठतें स्थान में है । तव नीचे बताये अनुसार अष्टम का फल बुरा बताया हे । रट
(१) प्रथम स्थान--यह पुनर्जन्म वर्षे है। शरीर कष्ट या मृत्यु सम्भव है । स्वास्थ्य हानि वाधाऐं चिता आदि । (२) दूसरे सें--इस वर्ष ऐक्सीडेन्ट का भय हो, चिता बीमारी आदि हो । परन्तु सम्पत्ति लाभ के विचार से यह् वर्षे अच्छा होगा धन लाभ के नये जरिये निकळेंगे ।
फल विचार : १६३
(३) तीसरे में--समाज के कायं में सम्मान एवं कीर्ति वढ, पराक्रम वढ़े,भाइयों में सद्भाव एवं उन्नति ।
(४) चौथे में--वाहन एवं धन लाभ, सुख प्राप्त, प्रसन्नता, ऐश्वर्य साधन संबंध से खर्च बढ़े ।
(५) पंचम--यह उद्यमी वर्ष है । परीक्षा में सफलता, परिश्रम में सफलता प्राप्त करे, कार्य सिद्ध हो, सुख प्राप्त हो, मोगलिक कार्य हो संतान सुख हो । (६) छठें-शत्रु चिता, बाधाएँ, धन हानि, कलह, पराजय, पश्चात्ताप हो, संघर्ष करना पड़े ।
(७) सप्तम--अनुकूछ कार्य हो, इच्छित सफलता प्राप्त करे, मांगलिक कार्य हो । (८) अष्टम--असफछता, धन एवं मान हानि, कष्ट ऐक्सी डेन्ट, रोग,वहुत दुःख । (९) नवम--यह् भाग्योदय का वर्ष है । आथिक लाभ,सुख, व्यापार में सफलता इच्छित कार्य में प्रसन्नता, सम्मान प्राप्त हो ।
(१०) दशम--यह् सफल वर्ष है। सम्मान प्राप्त हो, विशेष आथिक लाभ, इच्छित काये में सफलता, सुख, व्यापार में लाभ ।
(११) एकादश--अकस्मातु धन लाभ, सम्मान का पद प्राप्त हो, व्यापार में अच्छा लाभ, आथिक चिता का समाधान हो।
(१२) द्वादश--यह दुर्भाग्य का वर्ष है। व्यथं का खचे, कजं वढे, झूठी निंदा, मानसिक चिता, इच्छा तृप्ति के लिए अनावश्यक व्यय, आथिक चिता बहे ।
वर्षेश निर्णय
पंचाधिकारियों में जो लग्न को देखे वह वर्षेश होता है। बलूवान् होने पर भी वह लग्न को न देखे तो वर्षेश नहीं हो सकता । द्रष्टा ग्रहों में जिसकी दृष्टि लग्न पर विशेष हो वह वर्षेश होगा । यदि द्रष्टा ग्रह बल और दृष्टि में समान हों या सब निर्वळ हो तो मुन्थेश वर्षेश होगा ।
अध्याय १६
वर्षफल में भाव फल विचार
(१) लग्न भाव--
लग्न में सूयं मंगल शनि या ये तीनों या प्रत्येक ग्रह लग्न में हो तो-ज्वर पीडा, धन क्षय हो । ६ * लग्न में सूर्य-पित्त ज्वर । मंगछ-रक्त चिह्न, शोत ज्वर। दनि-वायु मूलक ज्वर । तीनों-त्रिदोंष उत्पन्न करें । पाप युक्त क्षीण चंद्र-ज्वर कफ, धन क्षय ।
१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
शुभ युक्त पूर्ण चंद्र-सुख हो ।
गुरु बुध शुक्र ये प्रत्येक या तीनों-धन लाभ, धान्य लाभ ।
लगत में सूर्य - वात पित्त रोग हो, स्त्री के शरीर में पीड़ा, मस्तक में कफ रोग,
अपने कुटुम्बियों से विवाद और गुप्त चिन्ता । रवि की दशा अंतर्दशा का फक
अनिष्ट हो ।
चन्द्र--शरीर में विकलता, कफ, क्षय रोग, ज्वर पीड़ा पाप युक्त या दृष्ट हो
तो शरीर को नष्ट करे-तथा बहुत खर्च करावे ।
मंगल--शत्रुओ से विवाद, कठिन वात रोग, फोड़ा, नेत्र और मस्तक में पीड़ा
खाँसी, उल्टी, स्त्री को कष्ट, राजा से भय, लोहा तथा अग्नि से भय । घर में कलह ।
वुध--बल की वृद्धि, स्त्री को सुख, शत्रु का नाश, राज पक्ष से लाभ, धन, जन
ओर मित्र लाभ, तेज और धैय की वृद्धि ।
गुरु--धन की अति वृद्धि, कीति वृद्धि, व्यापार की वृद्धि, स्त्री का सुख, मोती,
धन, स्वर्ण लाभ, शत्र का नाश, शरीर आरोग्य, श्रेष्ठ बुद्धि ।
लगत में शुक्र--विशेष प्रतिष्ठा, धन लाभ, शत्र, नाश, राजा से सन्मान एवं
जय, आभूषण लाभ । वंश वृद्धि, उत्सव, ।
शनि--मंद बुद्धि करे, शत्र भय वात पीड़ा, उपवास, स्त्री कष्ट, ज्वर, शिर
तथा जठर में पीड़ा, मुख में पीड़ा, मित्रों से वेर ।
उच्च का हो तो पुत्र लाभ, स्वगृही हो तो शरीर पुष्ट ।
राहु--स्त्री को पीड़ा, शत्रु से भय, धन खर्च, विकलता, राजा से भय, मानभंग,
सिर या नेत्र में रोग, पुत्र मित्र आदि से कष्ट । राज भय ।
केतु--भय, विकलता, चिता, शत्रु से भय, शिर या नेत्र में पीड़ा, राज भय ।
हीन वल सूर्य--यदि जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, मुंथेश, वर्षश, त्रिराशीश इन
सव में कोई अधिकार वाला होकर सूर्य हीनवळ हों तो त्वचा के रोग, नेत्र रोग
करते हैं आल्स्य नीचता क्षुद्र वृत्ति से निर्वाह, माता पिता से भी कष्ट ।
चंद्र--पूर्वोक्त अधिकारी होकर चंद्र हीन वली हो तो नेत्र रोग, कार्य नाश,
दरिद्रता, पराभव, रोगभय, मन में संताप, घर में कलह ।
मंगरू--उक्त अधिकारी हीन वल मंगल---चं चछता कायरता
वुध-- 27 र „ - मति भ्रम, क्लेश प
गुर छ ह] 9१ --धर्मेनाश, जीवन में अंत के क्लेश
शुक „» ५ ¬ भ्लेश, दुःख, स्त्रियों से कलह
दानि-- 4, वायु कोप, सेवक से दुख लग्नेश वली होकर लग्न में--अति सुख, कांति, मध्यम वली हो तो मध्यम फल । अल्पबळी--अल्प फल ।
लग्नेश केन्द्र या त्रिकोण में_बहुत सुख देवे । विजय वृद्धि। ६-८-१२ भाव में रोग मरण, खर्च ।
वर्ष फल में भाव फल विचार: १६५
लग्नेश पूर्ण बली हो तो--सुख, आरोग्य, धन छाभ, मनोविनोद ये सब प्राप्त
हों । मध्यवली में सुख धन लाभ आदि प्राप्त हो । हीनवछी--विशेष क्लेश और
(विपत्ति हो ।
वर्ष छग्नेश यदि पाप युक्त हो शुभ युक्त न हो तो विवाद, प्रतारण, कदभन्न भोजन |
जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, अष्टमेश, वर्षश मुंथेश ये सभी ग्रह वल युक्त हों
६-८-१२ भाव में न हों तो सम्पूर्ण वर्ष शुभ हो सुख यश धन लाभ हो। ये सब
निवल हों ६-३-१२ भाव में हों तो दुःख, भय प्रद हो । इन में शुभ की दृष्टि न
हो तो सम्पूर्ण बर्ष अशुभ रहे ।
लग्न में बुध्--तरुध वर्गेश होकर मुंबा युक्त लग्न में हो तो पठन लेखन आदि
से लाम ।
लग्न में गुर—गुरु वर्षेश होकर पाप ग्रहों से पीडित होकर वर्ष लग्न में हो तो
धन हानि, राजा से भय हो ।
अष्टमेश --पाप युक्त अण्टमेश लग्न में हो और लग्नेश चंद्र युक्त अष्टम में हो
तो उम वपं रोग शोक आदि से शरीर क्षय हो।
पष्ठेश लाभेश--पष्ठेश और लाभेश एक ही होकर लग्न में हो तो उस वर्ष
चाहन और राजा से मान मिले ।
पाप ग्रह्-लग्न में पाप ग्रह हों शुम दृष्टि न हो तो बह वर्ष मध्यम होता है
मनुष्यों से विवाद अधिक हो ।
सूर्य -लग्न में कन्या के या सिंह के सूर्य हों और सप्तम या दशम भाव पाप युक्त
हो तो कष्ट हो और स्त्री की मृत्यु हो ।
अष्टमेश --लग्न में अष्टमेश हो और लग्नेश पष्ठ में हो तो उस वपं में मृत्यु हो।
पाप ग्रह--१, २, ७, १२ घर में पाप ग्रह हों शुम दृष्टि न हो तो अंधा हो।
नीच ग्रह--लग्न में नीच का ग्रह हो, लग्नेश सूये से युक्त हो, तृतीयेश वारहवें
हो तो विष का भय हो ।
मंगल--लग्न में पाप युक्त मंगल हो, पंचम में .चंद्र, ऊग्नेश अष्टम हो क्रूर ग्रह
शति का योग या दृष्टि हो तो बिजली से मुत्यु हो ।
शनि चंद्र-लग्न में शनि युक्त चंद्र हो तो स्त्री को कष्ट वात रोग ज्वर इवास
आदि का कष्ट या वंधन हो ।
राइ--ळग्न में राहु, पंचम में शनि अष्टम में चंद्र युक्त लग्नेश हो तो वात रोग
गुल्म आदि रोग से मृत्यु हो ।
अष्ठमेश--लग्न में अष्टमेश हो तो वात कफ रोग से शरीर क्षय हो, मुख कंठ
आदि में रोग हो।
लूग्नेश--लग्नेश नीच का लग्न में हो नीच ग्रह से युक्त हो तो शरीर में रोग
स्त्री पुत्र को कष्ट हो ।
१६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
शनि--शनि लग्न या अष्टम में हो और वर्षेश भी शनि युक्त अष्टम हो तो सर्पे
स्पश का कष्ट हो ।
सूय-लग्न में उच्च का सूर्य हो, गुरु चतुर्थ और मंगळ दशम हो तो सव राजा
उसके पराक्रम की बड़ाई करें ।
लग्नेश--लग्नेश लग्न में हो कर्कं का वलवान् गुरु चतुर्थ में हो और शुभप्रह
युक्त दृष्ट हो तो बहुत सुख हो ।
शनि, चंद्र->लग्न में शनि युक्त चंद्र हो, नवम गुरु और तीसरे शुक्र हो | तो
पराक्रम और कीति लाभ, संताप वृद्धि हो ।
गुरु चंद्र--लग्न में चंद्र युक्त गुरु हो दशम में शुक्र के साथ बुध हो तो उसकी
बुद्धि का सवंत्र प्रकाश हो ।
सौम्य या पाप ग्रह--छग्न में ३ सौम्य ग्रह हों तो अनेक सुख हो ३ पाप ग्रह
हों तो दुःख शोक आदि करते हैं ।
लाभेश पष्ठेश--लाभेश षष्ठेश एक होकर लग्न में हों तो वाहन और राजा से
सन्मान प्राप्त हो ।
यदि कोई भी ग्रह लग्न को न देखे तो पंचाधिकारियो में जो सबसे वली हो
बह वर्षेश होगा पंचवर्गी बल के अनुसार बल का विचार करना ।
अन्य मत है कि वल और दृष्टि में समानता हो और दिन में वर्ष प्रवेश हो तो
सूर्य जिस राशि पर हो उस राशि का स्वामी वर्षश होता है । यदि रात्रि का जन्म है
तो जिस राशि पर चंद्र हो उस राशि का स्वामी वर्षेश होता है । उ
अन्य मत है पाँचों में वल और दृष्टि से पूर्ण कोई न हो तो वर्ष लग्नेश ही
वर्षश होता है ।
किसी का मत है कि ऐसी स्थिति में जिसके स्वग्रृही, उच्च, नवांश, द्रेष्काण,
हुद्दा आदि में बहुत अधिकार हों वह वर्षश होता है ।
किसी का मत है कि इन पाँचों में जिसके ३ या अधिक अधिकार मिलें वह
वर्षेश होगा । इनमें जिनके बळ और दृष्टि अधिक हो वह वर्षश होगा ।
यदि उपरोक्त नियम से चंद्रमा वर्षश होता हो तव भी वह वर्षेश नहीं होगा ।
ऐसी परिस्थिति में यदि वह चंद्र पंचाधिकारियो में से किसी से इत्थशाल करता हो
तो वह इत्थशाल' करने वाला ग्रह वर्षश होगा ।
यदि किसी में चंद्र इत्थशाछ न करता हो तब दिन या रात्रि में वर्ष प्रवेश के
अनुसार सूर्य राशीश या चंद्र राशीश वर्षश होगा जेता कि ऊपर वता चुके हैं । यदि
ऐसी परिस्थिति में चंद्र राशीश स्वयं चंद्रमा हुआ तो वही वर्पेश होगा । इसी कारण वर्षश चन्द्र का वर्णन किया है।
वर्ष प्रवेश के पंचांग का फल
(१) तिथि- वर्षे प्रवेश के समय, नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा तिथि शुम फल प्रद हैं | द्वादशी और रिक्ता तिथि अशुभ हैं ।
वर्ष फल में भाव फल विचार : १६७
(२) वार--वषं प्रवेश में चंद्रवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार उत्तम है रविवार
मंगलवार शनिवार ये हानिकारक हैं ।
(३) नक्षत्र--वर्ष प्रवेश में अश्विनी, मृग ०, हस्त, पुष्य,पुन०, स्वा० और रेवती
शुभ हैं कृ० रो० आद्रा, ज्ये०, म्» श्र० अनु» तीनों पूर्वा तीनों उत्तरा मध्यम हैं ।
भर० म० चि० वि० शत० धनि० इले० अति निदित हैं जिस वपं प्रवेश में भद्रा
हो या निदित योग हो वह शुभ नहीं होता ।
(४) लग्न--वपे प्रवेश में लग्न शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो या वर्षेश से युक्त दृष्ट
हों तो स्त्री पुत्र आदि का सुख होता है आपत्तियाँ दूर हों यदि वर्ष लग्न क्रूर हो या
पाप ग्रह से युक्त्र दुष्ट हो तो घन हानि ज्र, भय, रोग आदि हों ।
(५) रग्नेश--वपं लग्नेश सूर्य-पराधीनता व्याकुलता दुःख ।
चंद्र-परान्न भोजी, धातुक्षीण, स्वजनों से आश्रय हीन ।
मंगल--रोग, सवसे विरोध और विवाद ।
बुध--विद्या वुद्धि आदि की वृद्धि ।
गुरु या शुक्र--अति सुख ।
शनि--फ़लूह उद्वेग विकार आदि अशुभ फल होते हैं ।
वर्षं का साधारण फल विचार
जन्म ळग्नेश,वर्प लग्नेश, अष्टमेश और मुंयेश बळत्र।न् हों ६-८-१२ स्थान में न
हों तो पूरा वर्ष शुभ होता है. यश धन और सुख की प्राप्ति होती है। यदि वे
६-८-१२ स्थान में हों तो दुःख और भयदायक हैं ।
यदि वे वल हीन हों और शुभ ग्रह की दृष्टि रहित हों तो वपं अशुभ होता है।
द्विजन्माइय योग--जिस वर्प में जन्म लग्न तथा वर्षे लग्न एक ही हो तब यह
योग होता है जिसका फल कष्ट या मुत्यु है ।
जगल्लग्न विचा र--मेष का सूर्य प्रवेश के समय जो लग्न हो उसे जगल्लग्न
कहते हैं ।
जन्म लग्न से जित भाव में सूर्य का मेषाक प्रवेश हो यदि वह भाव शुभ ग्रह
युक्त दृष्ट हो तो उस वपं में उस भाव की वृद्धि होती है। यदि वह भाव पाप युक्त
दृष्ट हो तो वर्ष में उस भाव की हानि होती है ।
इस कारण यह देखना कि मेषाकं का जो लग्न हो उसे देखे कि वह जन्म लग्न
से क्रिस भाव में पड़ा है। यदि वह--
(१) जन्म लग्न में हो--देह सुख ।
(२) धन स्थान में--धन लाभ ।
(३) तृतीय में--कुटुम्ब की वृद्धि।
(४) चतुर्थ में--मित्र सुख ।
(५) पंचम में--पृत्र प्राप्ति ।
१६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
(६) षष्ठ में--शत्रु का पराजय ।
(७) सप्तम में--स्त्री सुख ।
(८) अष्टम में--मूत्यु तथा रोग भय ।
(९) नवम में-धन और धर्म की प्राप्ति ।
(१०) दशम में--स्थान, धन और सुख की प्राप्ति ।
(११) लाभ में-लाभ, सुख तथा घन का संग्रह ।
(१२) व्यय में--दुःख, दरिद्रता की प्राप्ति ।
संक्षिप्त. ताजिक फल
जन्म लग्न वर्ष लग्न एक हो--वर्ष कष्टदायक ।
वर्ष लग्न से जन्म लग्न ६-८-१२वें हो--वर्ष कष्टदायक ।
जन्म लग्नेश वषं लग्नेश से ६-८-१२ में हो--वर्ष कष्टदायक ।
वर्षे लग्न से छठे स्थान में-सू्य, शुक्र--दाहिने पाँव में शस्त्र भय ।
लग्नेश सूर्य और चंद्र से युक्त--दमा और खाँसी का रोग हो ।
लग्नेश अस्तंगत या लग्नेश चंद्र से दृष्ट--सरदी और खाँसी हो ।
जन्म में अष्टमेश लग्नस्थ हो भौर शुक्र शनि ११ या १२वें भाव में हो--हैजे के
रोग से मृत्यु ।
बली प्रह लक्षण
केन्द्र में ग्रह बलवान होता है । इसमें छग्न में विशेष रूप से बलवान् होता है । १, १०, ७, ४, ११, ५, ९ इनमें पूर्व क्रम से वली होते हैं ।
चन्द्रमा २, ३ स्थान सहित पूर्वोक्त स्थान में रहने से बली होते हैं जैसे २ से
३, ३ से ९, उससे ५ इस क्रम से पहले दिये स्थान से अधिक वली होते हैँ ।
मंगल तृतीय भाव सहित पूर्वोक्त भावों में रहने से पूर्वं कथित अधिक बली
होता है जसे ३ से ९, ५, ११, ४, ७, १०, १ यथा क्रम वली हैं ।
६-८-१२ भाव अशुभ हुँ शेष शुभ हैं। ये अशुभ भाव भी यदि उस भावस्थ
ग्रह के दीप्तांश को अति क्रमण किया हो तो अशुभ नहीं है ।
जो ग्रह जन्म में बली हों परन्तु वर्ष प्रवेश में वलहीन हों तों ग्रह वर्ष के अन्त
में अशुभ अर्थात् वर्ष के प्रथम भाग में शुभ होते हैं। यदि जन्म में हीन बली हों वर्ष में सबळ हों तो वर्ष में पहिले अशुभ फल देते हैं पीछे शुभ फल देते हैं । जन्म और वर्ष में समान बल हों तो सम्पूर्ण वर्ष भर शुभ फल देते हैं । यदि जन्म और वर्ष में निर्वोल हों तो पूरा वर्ष अशुभ होता है । मंगळ--नीच का मंगळ लग्न में पाप युक्त दृष्ट हो तो उस वपं में स्थियों को विशेष कर कष्ट होता है।
सुर्य मंगल सूर्य और मंगल के साथ शुक्र लग्न या व्यय में हो तो नेत्र रोग हो ।
धाप ग्रह कस्न, धन, सप्तम वा व्यय में पाप ग्रह हो शुभ दृष्टि न हो तो अन्ध दोप होगा ।
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5 ४-७).__
वर्षं फल में भाव फल विचार : १६९
रूग्नेश--मुंथा युक्त वर्ष लग्नेश केन्द्रेश ४--- घर में हो तो मरण हो ।
ग्नेश-छम्नेश नीच में हो अष्टमेश अस्तगत हो तो शरीर का क्षय और
शूल हो ।
लग्नेश--लग्नेश और अष्टमेश दोनों एक होकर ४-६-८ या १२ स्थान में
हो तो मरण हो।
पाप ग्रह--१, ७, ८ घर में पाप ग्रह हो तो चोर अग्नि या शस्त्र का भय हो
अष्टमेश--अध्टमेश वर्ष लग्न में हो लग्न सूर्य से दृष्ट हो लग्नेश निवंल हो तो
शस्त्रघात, कष्ट व मरण तुल्य पीड़ा हो ।
सूर्य- लग्न में सूर्य, अष्टम में शुक्र वा सप्तम में कन्या राशि पर पाप ग्रह हो
तो स्त्री संग वा अकस्मात् सन्तान की मृत्यु हो । |
लग्नेश--लग्नेश केन्द्र में हो या उच्चग्रह केन्द्र में हो और यदि लग्नेश या
उच्चग्रह की मित्र दृष्टि हो तो वह धनवान् प्रतापवान् हो सा वं भौम पद प्राप्त करे।
जन्म लग्नेश या वर्ष लग्नेश अधिक वली शुभ ग्रह युक्त हो और वर्ष लग्न को
देखता हो तो अरिष्ट दूर कर शुभ फलदायक है ।
लग्नेश-- जन्म लग्नेश वर्ष लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो तो धर्मे कर्म कीः
प्राप्ति होती है सव अरिष्ट दूर हो ।
लग्नेश--वलवान् लग्नेश त्रिकोण में हो त्रिराशि पति केन्द्र में हो क्रूर ग्रह की
दृष्टि न हो तो निरन्तर सुख मिले अरिष्ट दूर हों ।
ग्नेश--वली लग्नेश केन्द्र में शुभ युक्त या दुष्ट हो तो गुप्त सुख मिले धन
लाभ, अरिष्ट दूर हो।
लग्नेश--लग्नेश केन्द्र या पंचम में शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो ठो सुख, स्त्री सम्तान
का सुख, वस्त्र-भूषण प्राप्त हो अरिष्ट दूर हो।
लग्नेश- जन्म लग्नेश वपं में अष्टम क्रूरग्रह युक्त या दृष्ट हो तथा अष्टम और
कर्म भाव को देखता हो तो उस वर्ष में शस्त्राघात से मृत्यु हो ।
छग्तेश--वर्ष लग्नेश अस्त हो, जन्म लग्नेश वर्ष कुण्डली में छठे हो और जन्म
लग्न से अष्टम लग्न वर्ष लग्न हो उस पर मंगल बैठा हो तो उस वर्ष मृत्यु हो!
(२) धन भाव में ग्रह फल
चन्द्रमा, वुध, गुरु, णुक्र--धन लाभ, राज्य सुख ।
सूर्य, मंगल, शनि, राहु केतु--धन हानि ।
शनि-राजा से भय, कार्य हानि ।
धन में सूयं - कुटुम्ब से विरोध, राजा, अग्नि, चोर से भय, पशुओं को पीडा,
वेट में रोग, धन हानि, आपत्ति ।
धन में चन्द्र--कुटुम्ब व मित्र जनों से छाभ,धन की प्राप्ति, शत्रु नाश, नेत्र पीड़ा
राजा से सुख, आरोग्यता, इवेत वस्तुओं से धन लाभ ।
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RRR er जाhE
१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
धन में मंगल--विरोध, सूयं, अग्नि से भय, सिर में पीड़ा, द्रव्य नाश, स्त्री के आँख में रोग, मनोरथ पूर्ण न हो, राजा से भय, शोक, मोह । धन में बुध- द्रव्य से लाभ, कुटुम्बियों से जय, शत्रु नाश, मान और यश की वृद्धि, प्रतिष्ठा प्राप्त हो, सुख हो। धन में गुर धन आदि का सुख, पशुओं की प्राप्ति, राजा से तभ, मित्र मिलाप, सज्जनों की संगति, वस्तुओं की प्राप्ति, भाइयों से आनन्द, शरीर पुष्ट । धन में शुक्न--धान्य और धन का लाभ, म्झेच्छ जाति से सुख, पशुओं का घर में सुख, मित्रो की वृद्धि, भाइयों की वृद्धि, शरीर में तेज की वृद्धि, शत्रु नाश । धन में शनि--स्थानात्तरण, गमन, शरीर में पीड़ा, शत्रु वृद्धि, नेत्र मुख या उदर में पीड़ा, कफ विकार, कुटुम्बसे विरोध,धन नाश,राज भय,स्त्री पुत्र आदि की चिंता । धन में राहु--राजा से भय, नेत्र और उदर में पीड़ा, अपवाद (कलंक), धन नाश, चिता, चित्त में खेद, किसी नीच से लाभ । धन में केतु--राजा से भय, धन हानि, नेत्र तथा पेट में पीड़ा, भय दुःख, निदा, लड़ाई का दुःख ।
धन में सूर्य-जम्म में सूयं लग्न में हो,वर्ष में दुसरे भाव में हो तो धन सुख देता है। गुरु--यदि गुरु २-७ स्थान में पाप युक्त हो तो राजदण्ड हो । यदि धन स्थान शुभ ग्रह् युक्त या दृष्ट हो तो शुभ फल धन आदि देवे । गुर् जन्म कुण्डली में गुरु लग्न को देखे और वर्ष में बली होकर वषेश हो तो विना प्रयास से अनेक प्रकार से धन लाभ हो । गुरु-जन्म कुण्डली में गुर जिस भाव का स्वामी हो वर्ष कुण्डली में यदि उसी भाव में आ जाय और वर्ष लग्नेश से इत्थशाल हो तो उस भाव का सुख होता है । वैसे ही जन्म से गुरु जिस भाव को देखे, वर्ष में गुरु वषेश होकर उसी भाव को देखे तो उस भाव का उत्तम सुख होता है । गुरु २ भाव में शुभ युत दृष्ट हो या वर्ष में भी मुन्था की राशि को देखता हो तो विशेष रूप में राजसुख हो। जन्म में गुरु जिस राशि में हो वह राशि यदि वर्ष में लग्न हो और शुभ ग्रह से या लग्नेश से दृष्टयुत हो तो आरोग्य और धन को देता है। गुरु जन्म में धन भाव में हो, वर्ष में वर्षश होकर जिस भाव में हो उस भाव का आश्रय लेकर लाभ प्रद होता है। जैसे लग्न में हो तो अपने से धनवान हो क्योंकि लग्न से आत्मा का विचार होता है। धन भाव में हो तो कुटुम्ध में, तीसरे में सहज से, चौथे में माता, वाहन, घर आदि से और जळ से धन कहना । जन्म में घनेश और वर्ष में वर्षेश होकर गुरु यदि धन भाव में हो तो सोना चाँदी का लाभ, तीसरे में भाई आदि से लाभ, चौथे में माता वाहन भूमि से, पांचवें में मित्र और पुत्र से, छठे में शत्रु से, सातव में स्त्री से, आठवें में मरण से, नर्वे में धन लाभ का मार्ग, दसवें में राजा से, ११ में राजा के वंश से लाभ,बारहवे में खच कराता है।
वर्ष फल में भाव फल विचार : १७१
जन्म कुण्डली में द्वितीयेश गुरु यदि वर्ष में दूसरे भाव में हो और लग्नेश के साथः
इत्थशाली ही तो वर्ष भर धन लाभ होता है । यदि गुरु के साथ पाप ग्रह का
इशराफ होदा हो तो धन-धान्य का नाश होता है ।
बुध--जन्म में षष्ठेश बुध वर्ष में भी षष्ठ हो तो थोड़ा लाभ देता है ( यह
योग जिसका १ या ११ जन्म लग्न हो उसकी जन्म कुण्डली में हो सकता है) ।
शुक्र--जैसा गुरु के वारे में कहा गया है यदि शुक्र वर्पेश हो तो बहुत द्रव्य"
और धन प्राप्त हो ।
इसी प्रकार बुध यदि बलवान होकर धन भाव में हो तो लेखन कार्य से या
ज्ञान से (उद्योग) से धन होता है ।
या शुभ ग्रह सव जन्म लग्न में हों वर्ष में दूसरे भाव में पढे तो धन लाभ हो।
शनि--द्वितीय स्थान स्थित शनि यदि गुरु से युक्त हो तो भ्रातृ सुख होता है ।
यदि द्वितीय स्थान स्थित गुरु युक्त शनि पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो
बहुत ऐश्वयं होता है। पाप ग्रहों के संयोग या दृष्टि से फल विपरीत होता है ।
धनेश--जन्म में धन योग करने वाला ग्रह और धनभावेश दोनों अस्तंगत हों
तो धन का नाश हो और दूसरे के रक्षित धन का कलंक हो ।
धनेश वली जन्म या लग्न में धन में हो तो धन लाभ हो, यदि पाप ग्रह से
आक्रांत (घिरा हुआ) या निर्व हो तो अनेक प्रकार द्रव्य नाश हो ।
सहम--अथं सहम, बुध, शुक्र, गुरु से युक्त या दृष्ट होकर धन भाव में ही हो
तो विशेप धन होता है और अपने कुल में राज्य पाता है ।
घन सहमेश और धन भावेश ये दोनों यदि शुभ ग्रहों से मित्र दृष्टि से देखे जायें
तो विना प्रयास लाभ हो | यदि वे दोनों शुभ ग्रहों से शत्रु दृष्टि से देखें जायें तो
प्रयत्न से धन लाभ हो ।
धन में धनेश -लग्नेश और धनेश का मित्र दृष्टि (३, ५, ९, ११) से इत्थशाल
होने पर अनायास धन लाभ होता है। उन दोनों में इशराफ योग होने पर
अन्याय से धन नाश होता है ।
वर्णेश बुध--वुध वर्णेश होकर दूसरे स्थान में शुभ युक्त दुष्ट हो तो व्यापार से
लाभ हो।
धनेश--धनेश पाप युक्न हो, घन भाय में नीच का पाप ग्रह हो तो उस वर्ष
अनेक प्रकार से धन की चिन्ता रहती है।
पाप ग्रह--धन और ब्यय भाव में पाप ग्रह हो, अष्टम में पाप ग्रह युक्त शुभः
ग्रह हो तो वृत्ति और धमं का क्षय हो, अपवाद हो ।
चन्द्र--धन स्थान में चन्द्र लग्नेश से युक्त या दृष्ट हो, लाभेश वली हो, अष्टमेशः
निर्वळ हो तो अन्य ग्रहों से किया हुआ सव अरिष्ट दूर हो ।
गुह धन स्थान में गुरु, नवम चन्द्र शुक्र हो तो सवं कायं की सिद्धि होकर
अरिष्ट दर हो । भाग्योदय हो ।
“१७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
झनि-ऱदुसरे या लाभ स्थान में शनि स्वक्षेत्री हो उस वर्ष अफीम के व्यापार से लाभ ।
'तृतीय भाव के ग्रह फल
तीसरे में--रवि, शनि, मंगल-धन, धर्म, राज्य या लाभ में ये पाप ग्रह वली हों
“तो-भूमि लाभ, शुभ ग्रह-सुख, धन, पुत्र, सम्मान, विनोद, लाभ, चन्द्र-पूर्ण हपं ।
तृतीय में सूयं--सहोदर भाइयों को पीड़ा, पराक्रम, राजा की कृपा, लक्ष्मी की आप्ति, शत्रु नाश, कीति की वृद्धि, आरोग्य, कार्य सिद्धि ।
तृतीय में चन्द्र--भाइयो को सुख देवे, धन की प्राप्ति, पुण्य का उदय, गुप्त सुख
"प्रतिष्ठा की वृद्धि, धर्मं में बुद्धि, शत्रु नाश, अधिकार प्राप्त, उत्सव ।
तृतीय में मंगल--भाइयों को कष्ट, वाहन सुख, शत्रु नाश, धन लाभ, राजा से
'तथा मित्रों के पक्ष से जय, मान बढ़े, रोग दूर, घर में महोत्सव ।
तृतीय में बृुध--सम्पूर्ण संताप दूर, मान तथा यश की वृद्धि, धन लाभ, पुत्र
-सुख । लाभ-हानि, सुख-दुःख, मित्र-शत्रु, सव समान भाव से स्थित ।
तृतीय में गुरु--राजा से जय,यश की वृद्धि, धन-धान्य वस्त्र फी वृद्धि,धर्म में प्रीति
स्त्री व माता को सुख,कार्य की वृद्धि, मित्र और भाइयों का समागम, सेवा से सुख ।
तृतीय में शुक्र--परस्पर सहोदर भाइयों में अनेक प्रकार का सुख, धन लाभ,
यश वढे, परोपकार करे, धन की फिजूलखर्ची, स्वजनों से विवाद, मध्यम पराक्रम,
उपद्रव, कुछ चिन्ता ।
तृतीय में शनि---राजा की कृपा, भूमि, धन का लाभ, भोग लाभ, पराक्रम,
सहोदर के अंग में रोग की वृद्धि या भाइयों में विरोध, चिता ।
तृतीय में राहु--धन पुत्र लाभ, मनुष्य राजा के समान हो, पशु तथा वाहन
"सुख, स्वजनों को पीड़ा आरोग्य, शत्रु का क्षय ।
तृतीय में केतु-पशुओं का सुख,धन व पुत्र सुख,राजा के.समान,भाइयो को पीड़ा।
तृतीय में सूर्यं या शुक्र- सवल सूर्यं या सबल शुक्र वर्षेश हो पाप युक्त दृष्ट न हो
तो सहोदरों से परस्पर सुख हो, विपरीत से, अर्थात् ये निर्वेल होकर पाप युत दृष्ट हों, शुभ युत दृष्ट न हो तो भाइयों में कलह ।
तृतीय में गुर--गुरु को तृतीयेश से इत्थशाळ होता हो तो सहज से सुख हो ।
तृतीय में चन्द्र--- मंगल युक्त चन्द्र तींसरे हो और गुरु से युक्त या दृष्ट न तो सहज से कलह हो ।
तृतीय में मंगल--मंगल १० या ११ राशि में होकर सहज में हो या बुध १ या
८ राशि का तीसरे भाव में हो, इन दोनों योगों में शुभ ग्रह का योग दृष्टि हो तों सहोदरों से परस्पर आनन्द व अनेक सुख ।
तृतीय में बुध शुक्र--जन्म लग्नेश और वर्षे लग्नेश वुध और शुक्र हो, सबल "होकर तीसरे भाव में हो और गुरु वल्वानु हो तों सहोदर वन्धु वांधवो को सुख । शुक्र शुक्र यदि सबल चन्द्र की राशि में हो और जन्म वपं काल में पंचाधि- करी में हो तो सहज बंधु गण की वृद्धि हो।
वर्ष फल में भाव फल विचार : १७३
तृतीयेश--वर्ष का अधिकारी होकर यदि तृतीयेश तृतीय में हो या वर्ष लग्नेश से उससे इत्थशाल योग होता हो तो सहोदर से परस्पर सुख हो! तृतीयेश-सहजेश को पाप ग्रह से इशराफ योग होता हो और सहज भाव में हों तो कलह हो ।
तृतीयेश- सहज स्थानं यदि पाप ग्रह युक्त हो और सहजेश तथा प्रात सहमेदा'
की दृष्टि सहज पर नहीं पड़ती हो तो सहोदर को दुःख होता है ।
इसी प्रकार भ्रातु सहमेश में पाप ग्रह हो, उसपर सहजेश तथा भ्रातृ सहमेश की
दृष्टि नहीं पड़ती हो तो भी सहज को क्लेश होता है ।
तृतीयेश जिस स्थान में हो वहाँ से वर्षेश यदि सप्तम में हो, वर्ष रूग्नेश।, सहजेशः
से सप्तम में हो तो सहोदरों से विवाद हो । और जन्मकाल में सहजेश सहज भाव में: हो वर्ष में भी वेसे ही सहज में हो, शुभ दृष्टि हो तो सहोदरों से सुख हो ।
यदि वर्ष लग्न से सहजेश वर्षेश होकर अस्तंगत हो तो कलह हो ।
अथवा रवि शुक्र में से एक ग्रह सहजेश तथा वर्षश होकर अस्तंगत हो तो कलह।'
अथवा वर्षेश को सहजेश से इसराफ योग होता हो तो शारीरिक क्लेश, अपने.
परिजन और सहोदरों से झगड़ा हो ।
गुरु-हीन वल गुरु तीसरे हो तो भाइयों से विरोध हो ।
शनि-यदि १ या ८ राशि में होकर सहज में हो तो सहज को निश्चय रोग हो ।'
मंगरू-मंजल यदि ३ या ६ राशि में रहकर तीसरे भाव में हो तो सहज को
रोग हो ।
तृतीयेश-तृतीयेश तीसरे में वर्षश युक्त हो और लग्तेश भी हो तो भाइयों से
बहुत सुख हो ।
यदि तृतीयेश या वर्षेद की दृष्टि तृतीय पर न हो, और उसमें पाप ग्रह हो या
तृतीय पाप युक्त हो तो भाइयों से दुःख हो ।
वर्षेश मंगल केतु--वर्षश मंगल और केतु युक्त तीसरे हो तो बहुत कष्ट हो, शत्रु
का भय, वात रोग हो ।
तृतीयेश--तृतीयेश तीसरे घर में या केन्द्र त्रिकोण में हो, शुभ ग्रहों की दृष्टि
हो तो अग्नि भय हो ।
पाप ग्रह--तीसर छठ पाप ग्रह हो तो वन्धु वर्ग से सुख हो ।
तुतीयेश--तृतीयेश शत्रु गृही हो, शत्रु पति तृतीय में हो तो भ्राता से शस्त्र
द्वारा सिर मे आघात होगा ।
तृतीयेश तृतीय में हो और बुध गुरु यदि शुक्र के साथ हों तो सम्पूर्ण अरिष्ट दूर
हो, यद्यपि सप्तम भाव के हों तो भी जय करते हैं ।
शुक्र--तृतीय में शुक्र, नवम में गुरु, ल्ग्त में चन्द्र और शनि हो तो महान कीति
व धन लाभ हो, ऐश्वर्य बढ़े अरिष्ट नाश हो ।
“१७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल' खण्ड
गुरु--गुरु तीरे घर या लग्न में हो लग्नेश व सौम्य ग्रह से युक्त हो तो धन 'संतान की वृद्धि शत्रु का नाश हो । न वर्षे लग्नेद--३-६-१० घर में बल युक्त हो तो शत्रु नाश सुख प्रसन्नता व 'धन की प्राप्ति हो अरिष्ट दूर हो ।
वर्षेश मंगल--वर्षेश्ष मंगल तीसरे स्थान में हो या उच्च का हो या केन्द्र त्रिकोण में हो तो धन लाभ हो राजा तुल्य हो । अरिष्ट नाश हो । पाप ग्रह--पापग्रह ३-६-११ घर में हो सौम्य ग्रह केन्द्र में पाप ग्रह रहित हो तो सुख, कीति, पुत्र, धन वस्त्र रत्न आदि प्राप्त हो । सृतीयेद्--तृतीयेश तृतीय में हो बुध गुरु शुक्र यदि एक स्थान में हों तो सम्पूर्ण अहों का अरिष्ट दूर होता है यदि सप्तम में हो तो विजय करते हुँ। शुभ ग्रह--तृतीय में वुध गुरु शुक्र युक्त हो तो सम्पूर्ण अरिष्ट दूर हो यदि ये सप्तम में हों तो भी जय करते हँ ।
चतुर्थ भाव फा फल
चतुर्थ में पाप ग्रह-सुख व धन का नाश हो, रोग हो, झंझट व अधिक भय हो। चतुर्थ में शुभ ग्रह--नाना प्रकार के सुख हों । चतुर्थ में पाप युक्त दृष्ट निर्वेल चन्द्र--क्लेश, रोग हो। चतुर्थ में णुभयुत दृष्ट बली चन्द्र--सुख प्रद हो । चतुर्थं में सुयं--पशुओं को पीड़ा, खेती के काम में हानि, शरीर में पीड़ा, राजा से भय, माता को कष्ट, पेट तथा छाती में पीड़ा, मित्रों से बैर, वाहन से भय देह दुर्बल हो ।
चतुर्थ में चन्द्र--राजा से जय, कृषि से लाभ, शरीर में सुख, व्यापार से लाभ, वाहन का सुख, धन प्राप्ति, शत्रु नाश, पुत्र की वृद्धि, स्त्री सुख, पशु धन से लाभ, आनन्द ।
चतुर्थ में मंगल-अग्नि भय, मस्तक में पीडा, विफलता, क्लेश, खेती में हानि, व्यापार से हानि, परदेश भ्रमण, कुटुम्ब से दुःख, पशुओं का मरण, मित्रों से विवाद, *संकट ।
चतुर्थ में बुध--सुख, धन लाभ, मित्र मिलाप, चौपाये धन का आगम, सुवर्ण "भूमि वाहन लाभ, राजा से मान, स्त्री को सुख । चतुर्थ में गुरु--वाहून सुख, व्यापार में लाभ, राजा से जय, खेती से अधिक लाभ, स्त्री पुत्र भ्रातृ सुख, विद्या की प्राप्ति, धन लाभ । चतुर्थ शुक्र--कृषि और वाहुन सुख, राजा समान सुखी हो, आरोग्यता, भूमि, सुवर्ण लाभ, मान प्राप्ति, मित्र आदि से सुख । चतुर्थ में गनि--गुप्त चिता, रोग, पशुओं को पीड़ा, मातृ पक्ष में रोग, प्रवास, धन क्षय, खेती से हानि, स्त्री चिता से दुःखित, निंदा, लोह अग्नि से भय, परदेश जाने की चिता । १
वर्ष फल में भाव फल विचार : १७४
चतुर्थ राहु--वाहन नाश, राजा से भय, कफ पीड़ा, बात रोग, विदेश भ्रमण,
चौपायों का नाश, चिता, दुःख स्वजनों से विवाद, शरीर दुर्बल ।
चतुर्थ केतु--मन में दुःख, कफ एवं वादी की पीड़ा, शरीर दुर्वल, विदेश भ्रमण,
राजा पक्ष से भय, वाहन से भय ।
चतुर्थ सूर्य--पाप युक्त या दृष्ट-पिता को पीडा ।
चतुर्थ चन्द्र-पाप युक्त या दृष्ट-माता को पीड़ा ।
चतुर्थं शनि-शनि सूर्य युक्त हो-पिता से अपमान तथा शत्रुता कलह ।
'इसी प्रकार जन्म में चन्द्र जिस राशि पर हो उस राशिमें यदि वर्ष में शनि
हों तो माता के साथ विरोध कलह । प
जन्म में चतुर्थ में जो राशि है वह चतुर्थ भाव का पद कहलाता है । वहाँ वर्ष
में शनि और मंगल ये दोनों पद में हों शुभ दृष्टि न हो तो माता पिता को क्लेश हो ।
चतुर्थ में--चन्द्र युक्त रवि हो और पाप दृष्ट हो तो पिता को दुःख ।
यदि सूर्य या चन्द्र में से किसी' एक के घर में शनि हों तो माता पिता से विवाद
ही । सूर्य के गृह में पिता से चन्द्र के गृह में माता से विवाद ।
अतुर्थेश-यदि सुख भाव में हों तो माता पिता को सुख ।
था वली चतुर्थेश लग्नेश से इत्थशाल करता हो तो माता पिता को सुख होता है।
वर्ष और जन्म में चतुर्थेश यदि वलहीन हो तो माता पिता को अनिष्ट ।
या मातृ सहम पितृ सहम पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो मुंथा से चोथे स्थान में
हो तो माता पिता का नाश होता है ।
यदि मातृ सहमेश अस्तंगत हो पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो माता पिता का
नाश होता है ।
चतुर्थ मे-पहम-मातृ सहम व पितु सहम लग्नेश से इत्थशाल करता हो तो
माता पिता को सुख ।
सातु सहम या पितु सहम चौथे घर में हो तो भी माता पिता को सुख हो!
यदि मातु सहम या पितु सहम पाप ग्रह से इत्थशाल करता हो तो माता पिता
को विपत्ति, यदि शत्रु से इत्थशाल योग करता हो तो भय होता है ।
चतुर्थं सूर्य-बली वेश सुर्य चतुर्थ में हो तो पूर्वजों का उपाजित स्थान या कोई
अधिकार मिले ।
गुद-चतुथ में कक का गुरु वलवान् हो शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो और
लग्नेश हो तो शुभ फल हो सुख हों ।
शनि-चतुर्थ में शनि दशम में मंगल हो धनेश नीच का वक्री होकर अस्त हो
गया हो तो माता पिता का क्षय हो ।
पाप ग्रह- पाप ग्रह ४-८-१२ वें हों तो आम वात कफ स्त्रांस से शरीर में
अलेश हो ।
१७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
चतुर्थश-चतुर्थेश शुभ ग्रह युक्त वी हो और लग्नेश लाभेश से युक्त हो तो
वाहन छाभ और शरीर सुख हो ।
पाप ग्रह-वर्ष या जन्म में चौथे में पाप ग्रह हो तो पुत्रों को अरि हो । इसी
प्रकार पंचम घर चतुर्थेश युक्त हो तो वर्ण मंद फल हो ।
चतुर्थेश--चतुर्थेश केन्द्र में हो जन्म लग्नेश चौथे हो तो राजा से धन और सुख
प्राप्त हो ।
उपरोक्त ग्रह चंद्र युक्त हो तो पुत्र का भी सुख हो ।
च॒तुर्थेश--चतुर्थेश वलवान होकर चतुर्थ में बुध गुरु युक्त या दुष्ट हो तौ सुख
हो धन प्राप्त हो सव अरिष्ट दूर हो ।
चतुर्थेश-चतुर्थेश जन्म में पूर्ण वली हों या केन्द्र त्रिकोण में शुभ ग्रह हो तो
माता को सुख हो धन यश मिले शत्रु नाश हो।
चतुर्थे -चतुर्थेश यदि ६-८-१२ भाव में पाप युक्त हो अथवा अस्त होकर पाप
अह से दृष्ट हो तो उस वर्ष में माता को अनेक रोग व माता का क्षय हो ।
चंद्र--लग्न से चतुर्थ स्वक्षेत्री चंद्रमा या शुक्र हो उस वर्ष में नवीन घर वनता है!
चतुर्थश--चतुर्थेश अस्त होकर शात्रु क्षेत्री हो तो उस वर्ष घर में आग लगे ।
पत्चम भाव में ग्रह फल
शुभ ग्रह-- पुत्र सुख, धन लाभ, आनन्द । ;
पाप ग्रह-- पुत्र नाश,धन धान्य नाश, बुद्धि नाश, चोर का उपद्रव, रोग, विरोध ।
पंचम सूर्य-पुत्रो के शरीर में पीड़ा, सुबुद्धि की हानि, शोक, मोह, शरीर में
रोग, धन हानि, राजा से भय, परिजनों से विवाद, स्त्री को कप्ट, सुख हीन ।
पंचम चंद्र--अपनी वुद्धि से जय की प्राप्ति, मित्र से लाभ, संतान सुख, गौरव
स्त्री सुख, विजय, मान, धन लाभ ।
पाप दृष्ट हो तो--पुत्रों के शरीर में रोग ।
शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो-पुत्रो को सुख हो ।
पंचम मंगल--पुत्रो को पीड़ा, शत्रु से विवाद, गुप्त चिता, उदर में पीड़ा, बुद्धि
नाश, अग्निभय और शोक, पुत्र उत्पत्ति, धन लाभ, नौकरों से सुख, सुवर्ण वस्त्र अन्न
का लाभ, रत्री पुत्र और भाइयों का सुख, राजा से मनोरथ की वृद्धि, भाग्योदय यश ।
पंचम गुरु-पुत्र की वृद्धि, बुद्धि वळ से जय, शत्रु नाश, शरीर सुख, मनोवाछित
भोग, भूमि सुवर्ण वस्त्र की प्राप्ति, मंत्र विद्या आदि जनित सुख, श्रेष्ठ बुद्धि ।
पंचम शुक्र--पुत्रों की वृद्धि, भय क्लेश चिता आपत्तियों का और छात्रु का नाश,
धन युक्त, अनेक प्रकार के मंत्र और शास्त्र में अभ्यास, श्रेष्ठ बुद्धि स्त्री पुत्र आदिं
का सुख ।
पंचम शनि--पुत्र कष्ट, पेट में पीड़ा, धन क्षय, राजभय, कष्ट विकलता, खोटी
बुद्धि, स्त्री पुत्र मित्र जनों में पीड़ा ।
` वर्षे फल में भाव फल विचार : १७७
पंचम राहु--बुद्धि नाश, संतान को पीड़ा, उदर में व्यया, चिता क्लेश, पुत्र से सुख, बैर, विग्रह ।
कु: पंचम केतु- बुद्धि नाश, संतान को पीड़ा, पेट में विकार से कष्ट, चिता, भय का ।
पंचम गुरु--यदि गुरु वर्षेश होकर ५-११ घर में हो तो पुत्र सुख हो । पंचम वृध शुक्र--यदि रवि, मंगल, वुध, शुक्र भी वर्षेश होकर ५-११ घर में हों तो पृत्रसुख हो ।
यदि ५-११ घर में रह कर पाप ग्रहों से पीडित हो (युत दृष्ट या इत्यद्याली हो) तो पुत्र से ही दुःख होते हैं पुत्रसुख नहीं होता । पंचम गुरु-गुरु जन्म में जिस राशि में हो यह राशि वष में पंचम में हो और बली हो तो पुत्रसुख हो ।
जन्म से गुरु जिस राशि में हो वह राशि वषं में वर्ष लग्न हो तो पुत्र लाभ हो। पंचम वृध--यदि मंगल से युत बुध शुभ ग्रह की राशि में स्थित होकर वर्ष लग्न से ५-११ स्थान में हो तो पुत्र सुख हो। ऐसा बुध यदि निर्बल हो तो पुत्रपीड़ा करता है।
जन्म में जहाँ बुध हो यह राशि वषं लग्न हो या जन्म में जहाँ शुक्र हो वह राशि वर्ष लग्न हो तो पुत्र लाभ हो ।
पंचम शनि मंगल--ऐसे शनि व मंगल जन्म में जिस राशि में हो वह राशि वर्ष में लग्न या पंचम में हो तो निश्चय पुत्र कष्ट करता है।
पंचम चं शु. गु.-चन्द्र गुरु या शुक अपने-अपने उच्च में होकर यदि पंचम में हों तो पुत्रलाभ हो ।
पंचम मंगल--यदि मंगल वक्री होकर पंचम हो तो उत्पन्न पुत्र का भी नाश करता है।
पंचम शुक्र--जन्म में शुक्र पंचमेश होकर वषं में पंचम हो ओर लग्नेश से इत्थ- शाल करता हो तो पुत्र देता है।
पंचम शनि--जन्म में शनि जहाँ हो बह् राशि वपं में पुत्र भाव में हो और पाप
ग्रह के अधिकारी ग्रह से दुष्ट हो तो पुत्रपीड़ा हो ।
सहम - पंचम भाव बली हो या पुत्र सहम बली हो या वली पुत्र सहम पंचम में
हो तो पुत्रलाभ हो ।
यदि पुण्य सहम पंचम भाव में हो शुभ ग्रह से युत दृष्ट हो तो पुत्रलाभ हो ।
पंचमेश--यदि वली लग्नेश पंचमेश ये दोनों पंचम में हों तो पुत्रलाभ हो ।
यदि बली पंचमेश पंचम में हो तो पृत्रसुख हो ।
वर्षेश--पंचम भाव में वर्षेश शुभग्रह से दुष्ट हो तो पुत्र का अत्यन्त सुख हो ।
मं. वु--जन्म में जो गुरु की राशि हो यही राशि वर्प में पंचम हो और वहाँ
मंगल या वुध वषश होकर पड़ें तो उस वषं में अवश्य पुत्रलाभ हो ।
१२
१७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षकछ खण्ड
पंचमेश--पाप ग्रहों से आक्रान्त या अस्त हो तो पुत्रों को महाक्लेश हो ।
शनि-- जिस राशि में जन्म का शनि हो वही राशि वर्ष में पंचम हो तथा
विषम राशिस्थ मंगल पंचम में हो तो उस वर्ष पुत्रों की चिता हो । यदि समराशि
का मंगल पंचम हो तो पुत्र को पीड़ा हो ।
मं.श. चं-मंगळ शनि या चन्द्र निर्बल हो ५ या ११ घर में हो तो पुत्र कष्ट हो ।
पंचम गुरु--वर्ष कुण्डली में पंचम या नवम घर में गुरु हो और जन्मराशि से
पंचम नवम या प्रथम गुरु हो तो उस वषे में स्त्री के गर्भ रहे पुत्र का जन्म हो ।
शनि राहु--पंचम भाव शनि राहु से युक्त या दृष्ट हो तो कमर दुखे ।
सप्तमेदा पंचम --सप्तमेश वर्ष में पंचम या लग्न में हो और जन्म राशि से ७,
९, ८, ६, ११, ५ घर में गुरु हो तो उस वर्ष निएचय विवाह हो ।
पाप ग्रह--पंचम में पाप ग्रह हो पंचमेश सूर्य के स्थान में हो तो संतान कष्ट
हो धन धान्य का नाश हो।
लग्नेश दशमेदा- लग्नेशा दशमेशा युक्त पंचम में हो तो राजाओं से प्रीत यदा
धनधान्य लाभ हो।
द्वितीयेदा-द्वितीयेश पंचम में हो दशमेश दशम में हो तो शत्रु नाश हो धन धान्य
लाभ हो अरिष्ट दूर हो ।
गुरु-जन्म में गुरु जिस राशि में हो वह राशि पंचम हो या वहाँ वर्षेश या बुध
या मंगल हो तो पुत्र की प्राप्ति हो ।
मुंथा चन्द्र पंचमेश-पंचम में मुंथा युक्त चन्द्र हो पंचमेश युक्त हो या पंचमेश
बलवान हो तो अवश्य पुत्र हो ।
शुक्र मंगल-पंचम में शुक्र हो और मंगल से युक्त या दुष्ट हो तो उस वर्ष पुत्र
की प्राप्ति हो ।
क्रूर ग्रह मंगल चन्द्र-क्र्र ग्रह युक्त मंगल या चन्द्र ५, ७ या १२ भाव में हो तो
कलत्र का वियोग हो ।
लग्नेश दशमेश-लग्नेश और दशमेश एक हो और पंचम में हो तो धन धान्य
लाभ हो, यश बढ़े राजाओं से मित्रता हो ।
संतान योग-जिस वर्षे पंचमेश अपने भाव को देखता हों और कोई शुभ ग्रह या
मित्र ग्रह की उस पर दृष्टि हो तो उस वर्ष संतान लाभ का योग होता है पंचमेदा
पुरुष ग्रह हो तो पुत्र, स्त्री ग्रह से कन्या होने का योग होता है।
जिस राहि पर दानि, राहु और सूर्य हो उन राशियों के अंक जोड़कर ३ का
भाग दो। शेष १ से पुत्र २ से कन्या । शेष ० हो तो भी पुत्र होगा ।
षष्ठ भाव फल विचार
षष्ठ में पाप ग्रह-धन लाभ, सुख लाभ ।
मंगल-अति हर्ष शत्रु नारा ।
क्षीण चन्द्र-कफ ज्वर, खांसी ।
वर्षफल में भाव फल विचार : १७९
शुभ ग्रह-भय कलह, धन नाश ।
षष्ठ सुयं-शत्रु नाश, मातृ पक्ष में पीड़ा, सुख लाभ, व्यापार से लाभ, राजा
और मित्र पक्ष से लाभ, स्त्री पुत्र का सुख ।
षष्ठ चन्द्र-शत्रु से विरोध या विवाद, नेत्र में पीडा, गुप्त चिता, निरर्थक व्यय,
स्त्री को पीड़ा राजा या चोर से भय, भाइयों से वैर, पीड़ा इलेष्म, वात व्याधि ।
षष्ठ मंगल--राजा से प्राप्ति, मित्र से लाभ, स्त्री सुख, शत्रु नाश, धन लाभ,
घोड़ों आदि का सुख आनन्द ।
षष्ठ बुध-शत्रु से विवाद, स्त्री कष्ट, वृथा खर्च, शरीर में कष्ट कफ पीड़ा आदिं
से दुःख, स्वजनों से विवाद, शत्रु पक्ष की वृद्धि ।
पष्ठ गुरुस्त्री के शारीर में पीड़ा, नेत्र रोग, ज्वर, अतिसार, शत्रु वृद्धि, घन
नाश, कुटुम्व विरोध, चिता, धन हानि ।
षष्ठ शुक्र-दात्रु से भय कष्ट, गुप्त चिता, शरीर में रोग, मस्तक और नेत्र में
पीड़ा, धन नाश, परिजनों से विवाद, घर में कष्ट ।
षष्ठ शनि-भूमि और धन लाभ, कीति की वृद्धि, दुःख का नाश, धान्य और
अस्त्र का लाभ, राजा की कृपा हो, सत्संग, रोग नाश, पराक्रम बढ़े,स्त्री पुत्र से सुख।
पष्ठ राहु-शत्रु नाश, राजा सम कीति, गौ भूमि सुवर्णं वस्त्र का लाभ, धन
प्राप्ति, दुःख नाश आरोग्य, स्त्री पुत्र से सुख ।
षष्ठ केतु-शत्रु नाश, गौ भूमि सुवर्ण वस्त्र का लाभ, धन प्राप्ति, दुःख नाश,
राजा के तुल्य हो ।
षष्ठ मंगल-जन्म से मंगल पष्ठेश होकर वर्ष में ६ भाव में हो तो रोग होता है।
अदि वैसे ही मंगल को पाप ग्रह से इत्यशाल होता हो तो महान रोग हो शुभ ग्रह
"की दृष्टि व योग से कुछ हल्का रोग होता है।
मंगल जन्म में जिस राशि में हो, वह राशि यदि वर्ष लग्न हो और क्षृत दृष्टि
(१-४--१०) से देखा जाय तो रक्त पित्त रोग होता है अग्नि भय हो या और कोई
"रोग हो । शुभ दृष्टि हो तो रोग की अल्पता होती है ।
मंगल वक्रगति होकर छठे स्थान. में पाप पीडित हो और वर्षेश भी हो तो रुधिर
विकार या पित्त रोग होवे ।
शनि-वक़ी और पापाक्रांत शनि वर्षश होकर छठे हो तो रोग, त्रिदोष जनित
रोग भथ, शूल, गुल्म रोग, नेत्र रोग, विषम जवर भय हो ।
म में जिस राशि में शनि हो, वह राशि वर्ष लग्न हो तो रूक्षता रोग, शीत
पित्त रोग हो ।
यदि जन्म कालिक शनि की राशि शनि से दृष्ट हो तो कुछ कम फल हो यदि
'पाप युक्त हो तो मृत्यु हो ।
पष्ठ सूर्य-सूर्य पाप पीडित वर्षेश होकर छठे घर में हो तो नेत्र शूल आदि नेत्र
रोग हो ।
८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
षष्ठ गुरु-वक़ी पाप पीडित गुरु वर्षेश होकर छठे हो और चन्द्रमा से कम्बुलः
योग नहीं करता हो तो बात रोग नेत्र रोग हो ।
पाप युत गुरु अष्टम हो और मंगल लग्न में हो तो आलस्य युक्त मुर्छा रोग,
वेहोशी मृगी रोग हो ।
चन्द्र युक्त गुरु अष्टम हो या चन्द्र युक्त मंगल लग्न में हो तो भंग का नाश या
अति पीड़ा हो ।
षष्ठ शुक्र-वक़ी पाप पीड़ित शुक्र वर्षेश होकर छठे घर में हो तो पित्त रोग हो।
यदि पुरुष राशि का शुक्र पष्ठेश से दृष्ट होकर छठे हो तो इलेष्य (कफ) रोग हो ।
शुक्र जन्म में जिस राशि में हो वह राशि वर्ष लग्न से छठे स्थान में हो और
उस में सूर्य हो और रोग सहम पाप युक्त हो तो वीर्य दोष से रोग हो ।
षष्ठ चन्द्र-पाप पीडित चन्द्र वर्षश होकर छठे स्थान में हो तो कफ रोग हो ।
षष्ठ बुध-पाप पीडित वुध वर्षेश होकर छठे घर में हो तो वात से उत्पन्न रोग हो ।
षष्ठ रूम्नेश-जन्म लग्नेश पाप ग्रह हो वर्षेश से क्षुत दृष्टि (१-४-७-१०) से
दृष्ट हो तो रोग हो । यह पाप लग्नेश यदि पाप युक्त भी हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट हो ।
जन्म लग्नेश और मुंथेश ये दोनों छठें हों पाप युक्त दुष्ट हों निर्बल हों तो ज्वर
मौर शरीर की विकलता आदि अत्यन्त कष्ट देते हैं ।
वर्षे लग्नेश, वर्षेश इन दोनों को षष्ठेश से यदि इत्यशाल योग होता हो तो उन
ग्रहों की जो धातु हो उसके विकार से रोग होता है ।
लग्नेश-वर्ष छग्नेश, मुंथा, वर्ष लग्न ये सव यदि पाप ग्रहों के बीच में हों तो
रोग उत्पन्न करते है । या षष्ठेश शुभ ग्रह हो षष्ठ में हो तो स्त्री के जरिये रोगः प्राप्त हो ।
मंगल-जन्म में गुरु और शुक्र जिस राशि में हों उसी राशि में वर्ष में मंगल हो
अस्तंगत भी हो तो प्लीहा, शीतला आदि रोग होते हैं और शीत पित्त या सर्दी गर्मी
के रोग या गलगंड रोग होते हैं ।
चं. बु.-इसी प्रकार चन्द्र युक्त बुध जन्म कालिक गुरु शुक्र की राशि में हो तो:
कुष्ट और गंडमाला या भगन्दर रोग हो ।
पाप ग्रह-जन्म में केन्द्र में स्थित पाप ग्रह यदि वर्ष लग्न में हो तो रोग हो ।
शुक्र-विषम राशि में शुक्र पर पाप ग्रह की क्षुत दृष्टि हो तो कफ रंग हो ।
दिन का वषे प्रवेश हो-और जन्म तथा वर्ष कालिक लग्न में सूर्य या मंगल का
स्वगृह हद्दाद्रेष्काण नवांश आदि अधिकार हो तो ज्वर से कष्ट हो । जो लग्न पर शुभ
ग्रह की दृष्टि भी हो तो परिणाम में सुख होता है । रात में वर्ष प्रवेश हो और चन्द्रमा शुक्छ पक्ष का हो और वर्ष में मंगल से
इत्यशाल होता हो तो रोग नाश हो । यदि वह चन्द्रमा शनि से इत्यशाल करता हो
तो रोग बढ़ाता है। इसके विपरीत हो तो विपरीत फल जानना जैसे दिन का वर्ष
प्रवेश हो और कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा मंगळ से मुथशिली हो तो रोग करता है यदि
वह चन्द्रमा शनि से मुथशिली हो तो रोग नाश करता है