भारतकोश
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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

कि तुम इस लोक में ही नहीं, परलोक में भी गोवर्धनधारी के रूप में प्रसिद्ध हो गए, परंतु आश्चर्य तो इस बात का है कि मैं तीनों लोकों के स्वामी अर्थात् तुम्हें अपने हृदय पर धारण किए रहती हूं और रात-दिन मैं तुम्हारी चिन्ता करती हूं, पर मुझे कोई त्रिलोकधारी जैसी पदवी नहीं देता।।19।। भाव यह है कि यश-सम्मान तो पुण्य और भाग्य से ही प्राप्त होता है।

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॥ अथ षोडश अध्याय ॥

न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये, स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः। नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नालिंगितं, मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम्॥ संसार से उद्धार के लिए जिन लोगों ने विधिपूर्वक परमेश्वर का ध्यान नहीं किया, स्वर्ग में समर्थ धर्म का उपार्जन नहीं किया, स्वप्न में भी किसी सुंदर युवती के कठोर स्तनों और जंघाओं के आलिंगन का भोग नहीं किया, ऐसे व्यक्ति का जन्म माता के यौवन रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान है॥1॥ भाव यह है कि जिन लोगों ने न तो इस भौतिक संसार का ही उपयोग किया और न परलोक को सुधारने के लिए ईश्वरोपासना तथा धर्म का ही संग्रह किया, ऐसे लोगों को जन्म देना माता के लिए व्यर्थ ही हुआ। सफलता तो तभी मिलती है, जब इस लोक में सुख उठाते हुए परलोक-सुधार के लिए धर्माचरण किया जाए।

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अध्याय १६-१७ एवं चाणक्य राजनीति सूत्र

जल्पन्ति सार्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः। हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः॥ आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलटा (चरित्रहीन) स्त्रियों का प्रेम एकान्तिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है कि कुलटा स्त्रियां पराए व्यक्ति से बातचीत करती हैं, कटाक्षपूर्वक देखती हैं और अपने हृदय में पर पुरुष का चिन्तन करती हैं, इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है॥२॥ आचार्य चाणक्य ने यहां पर कुलटा स्त्रियों के हाव-भाव और चरित्र का स्पष्ट वर्णन किया है। यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा शकुन्तवत्॥ जो मूर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर खेल की चिड़िया की भांति इधर-से-उधर नाचता फिरता है॥३॥ आचार्य चाणक्य का मत है कि प्रायः स्त्रियां विलासिनी होती हैं जो पुरुषों को अपनी ओर आकृष्ट करके उन्हें मनमाना नाच नचाती हैं। कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः, स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः। कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्। को वा दुर्जन वागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पथि॥ आचार्य चाणक्य का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही मोह-माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। 164 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

उनका कहना है—'धन-वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो इस संसार में अहंकारी न हुआ हो, ऐसा कौन-सा व्यभिचारी है, जिसके पापों को परमात्मा ने नष्ट न कर दिया हो, इस पृथ्वी पर ऐसा कौन धीर पुरुष है, जिसका मन स्त्रियों के प्रति व्याकुल न हुआ हो, ऐसा कौन पुरुष है, जिसे मृत्यु ने न दबोचा हो, ऐसा कौन-सा भिखारी है जिसे बड़प्पन मिला हो, ऐसा कौन-सा दुष्ट है जो अपने संपूर्ण दुर्गुणों के साथ इस संसार से कल्याण-पथ पर अग्रसर हुआ हो।'।।4।। भाव यह है कि इस नश्वर संसार की मोह-माया से छूटना अत्यन्त ही दुष्कर कार्य है। न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरंगः। तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः॥ स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी और ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था, तब भी श्रीराम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग) की इच्छा हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े। किसी ने ठीक ही कहा है—'विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।।5।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि विनाश आने से पहले बुद्धि उलटी जाती है। गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः। प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥ आचार्य चाणक्य का मत है कि व्यक्ति अपने गुणों से ही ऊपर उठता है। ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से ही ऊंचा नहीं हो जाता। 165

उदाहरण के लिए महल की चोटी पर बैठ जाने से कौआ क्या गरुड़ बन जाएगा?॥6॥ कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति अपने गुणों से ही महान् बनता है और सभी जगह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। केवल स्थान से व्यक्ति की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती। बल्कि पद पर किसी गुणहीन व्यक्ति के बैठ जाने से उस पद की गरिमा ही गिरती है। गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः। पूर्णेन्दु किं तथा वन्द्यो निष्कलंको यथा कृशः॥ गुणों की सभी जगह पूजा होती है, न कि बड़ी सम्पत्तियों की। क्या पूर्णिमा के चांद को उसी प्रकार से नमन नहीं करते, जैसे द्वितीया के चांद को?॥7॥ भाव यह है कि चन्द्रमा किसी भी रूप में रहे विद्वान व्यक्ति के गुण की भांति उसे हर स्थिति में नमन करते हैं। पर-प्रोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्। इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणः॥ दूसरों के द्वारा गुणों का बखान करने पर बिना गुण वाला व्यक्ति भी गुणी कहलाता है, किन्तु अपने मुख से अपनी बड़ाई करने पर इन्द्र भी छोटा हो जाता है॥8॥ आत्म प्रशंसा से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं कहलाता, अपितु जब दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है, तभी वह गुणी कहलाता है। 'अपने मुंह मियां मिट्ठू' नहीं बनना चाहिए। जिन गुणों की प्रशंसा दूसरे करते हैं, वे ही गुण सच्चे होते हैं। विवेकिनमनुप्राप्ता गुणा यान्ति मनोज्ञताम्। सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम्॥ जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई 166

कार्य सम्पन्न करता है, ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों के मेल से और भी सुंदर हो जाते हैं। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न स्वयं ही अत्यन्त शोभा को प्राप्त हो जाता है।। 9 ।। भाव यह है कि गुण गुणी को ही शोभा पहुंचाते हैं, अविवेकी व्यक्ति को नहीं। उसके पास गुण भी दुर्गुण बन जाते हैं। गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः। अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते।। जो व्यक्ति किसी गुणी व्यक्ति का आश्रित नहीं है, वह व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से युक्त होने पर भी कष्ट झेलता है, जैसे अनमोल श्रेष्ठ मणि को भी सुवर्ण की जरूरत होती है। अर्थात सोने में जड़े जाने के उपरान्त ही उसकी शोभा में चार चांद लग जाते हैं।। 10 ।। भाव यह है कि किसी का आश्रय प्राप्त करके गुणी व्यक्ति अपने गुणों को समाज में स्थापित करने का अवसर प्राप्त कर लेता है, तभी उसे उचित यश और प्रसिद्धि प्राप्त होती है। अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु। शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे।। जो धन अति कष्ट से प्राप्त हो, धर्म का त्याग करने से प्राप्त हो, शत्रुओं के सामने झुकने अथवा समर्पण करने से प्राप्त हो, ऐसा धन हमें नहीं चाहिए।। 11 ।। भाव यह है कि जो धन सत्कर्मों से प्राप्त हो, अच्छे आचरण से प्राप्त हो, बिना किसी दबाव के प्राप्त हो, वही धन श्रेष्ठ होता है और स्वाभिमान के लायक होता है। आत्मसम्मान को नष्ट करने वाले धन की अपेक्षा धन का न ही होना अच्छा है। 167

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला। या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते॥ उस लक्ष्मी (धन) से क्या लाभ जो घर की कुलवधू के समान केवल स्वामी के उपभोग में ही आए। उसे तो उस वेश्या के समान होना चाहिए, जिसका उपयोग सब कर सकें॥12॥ इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि सम्पत्ति, धन-वैभव वही अच्छा रहता है, जिसका उपयोग सभी के हित के लिए होता हो। यदि धन पर कुंडली मारकर एक ही व्यक्ति बैठा रहे और केवल अपने ही स्वार्थ के लिए खर्च करे तो ऐसे धन से कोई लाभ नहीं है। धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु। अतृप्तः प्राणिनः सर्वेयाता यास्यन्ति यान्ति च॥ इस संसार में आज तक किसी को भी प्राप्त धन से, इस जीवन से, स्त्रियों से और खान-पान से पूर्ण तृप्ति कभी नहीं मिली। पहले भी, अब भी और आगे भी इन चीजों से संतोष होने वाला नहीं है। इनका जितना अधिक उपभोग किया जाता है, उतनी ही तृष्णा बढ़ती जाती है।। 13।। मनुष्य की इच्छाएं अनन्त हैं। वे कभी पूरी नहीं होतीं। एक इच्छा के पूरी होते ही दूसरी सामने आकर खड़ी हो जाती है। तात्पर्य यह कि मनुष्य अपने आप से कभी संतुष्ट नहीं होता है। अतः संतोष ही सबसे बड़ा धन है। क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञहोमबलिक्रियाः। न क्षीयते पात्रदानमभयं सर्वदेहिनाम्॥ जीवन की समाप्ति के साथ सभी दान, यज्ञ, होम, बलिक्रिया आदि नष्ट हो जाते हैं, किन्तु श्रेष्ठ सुपात्र को दिया गया 168 CC0 Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri

दान और सभी प्राणियों पर अभयदान अर्थात दयादान कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल अमर होता है, सनातन होता है।।14।। अतः सुपात्र को ही दान देना चाहिए और सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। उनकी हत्या नहीं करनी चाहिए। ये दोनों दान कभी नष्ट नहीं होते इसीलिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः। वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयिष्यति॥ तिनका हल्का होता है, तिनके से भी हल्की रुई होती है, रुई से भी हल्का याचक (भिखारी) होता है, तब वायु इसे उड़ाकर क्यों नहीं ले जाती? सम्भवतः इस भय से कि कहीं यह उससे ही भीख न मांगने लगे।।15।। मांगने वाले से सभी डरते हैं कि वह उनसे कुछ मांग न बैठे क्योंकि देना कोई नहीं चाहता। वैसे भी, याचक अर्थात भिखारी निंदा के योग्य ही है। वरं प्राणपरित्यागो मानभंगे जीवनात्। प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभंगे दिने दिने॥ अपमान कराके जीने से तो अच्छा मर जाना है क्योंकि प्राणों के त्यागने से केवल एक ही बार कष्ट होगा, पर अपमानित होकर जीवित रहने से जीवनपर्यन्त दुःख होगा।।16।। भाव यह है कि सम्मानित जीवन ही जीने के योग्य होता है। अपमानित होकर जीने से तो मरना बेहतर है। प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥ मधुर वचन सभी को संतुष्ट करते हैं इसलिए सदैव 169 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

मृदुभाषी होना चाहिए। मधुर वचन बोलने में कैसी दरिद्रता? जो व्यक्ति मीठा बोलता है, उससे सभी प्रसन्न रहते हैं।।17।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि मधुर भाषण में सम्मोहन शक्ति होती है। मधुर भाषण सभी पर प्रभाव डालता है। संसार कटु विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे। सुभाषितं च सुस्वादु संगति सुजने जने॥ इस संसार रूपी विष-वृक्ष पर दो अमृत के समान मीठे फल लगते हैं। एक मधुर और दूसरा सत्संगति। मधुर बोलने और अच्छे लोगों की संगति करने से विष-वृक्ष का प्रभाव नष्ट हो जाता है और उसका कल्याण हो जाता है।।18।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से संसार को कटु वृक्ष कहा है। इसे विष वृक्ष भी कहते हैं। इस कटु वृक्ष के दो फल कड़वे न होकर अत्यंत मीठे हैं, अमृत के समान गुणकारी हैं—मधुर वचन और सज्जनों की संगति। मनुष्य को चाहिए कि सदा मीठा ही बोलें। जन्म-जन्मन्यभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः। तेनैवाऽभ्यासयोगेन तदेवाभ्यस्यते पुनः॥ अनेक जन्मों से किया गया दान, अध्ययन और तप का अभ्यास, अगले जन्म में भी उसी अभ्यास के कारण मनुष्य को सत्कर्मों की ओर बढ़ाता है, अर्थात वह दूसरे जन्म में भी शास्त्रों के अध्ययन को दान देने की प्रवृत्ति को और तपस्यारत जीवन को दूसरों के पास तक पहुंचाता है।।19।। भाव यह है कि हमारे इस जन्म के शुभ कर्म अगले 170

जन्म में भी हमें शुभ कर्मों की ओर ले जाने वाले होंगे। पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम्। उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम्॥ जो विद्या पुस्तकों में लिखी है और कंठस्थ नहीं है तथा जो धन दूसरे के हाथों में गया है, ये दोनों आवश्यकता के समय काम नहीं आते, अर्थात पुस्तकों में लिखी विद्या और दूसरे के हाथों में गए धन पर भरोसा नहीं करना चाहिए।।20।। भाव यह है कि विद्या को सदैव कंठस्थ करना चाहिए और धन को सदैव अपने हाथों में रखना चाहिए ताकि वक्त या जरूरत पड़ने पर काम आ सके। अपना अनुभव और अपना धन ही वक्त पर काम आता है। 171 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

॥ अथ सप्तदश अध्याय ॥ पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ। सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः॥ जिस प्रकार पर-पुरुष से गर्भ धारण करने वाली स्त्री समाज में शोभा नहीं पाती, उसी प्रकार गुरु के चरणों में बैठकर विद्या प्राप्त न करके इधर-उधर से पुस्तकें पढ़कर जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वे विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते क्योंकि उनका ज्ञान अधूरा होता है। उसमें परिपक्वता नहीं होती। अधूरे ज्ञान के कारण वे शीघ्र ही उपहास के पात्र बन जाते हैं।।1।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि पुस्तक से पढ़कर शुद्ध उच्चारण नहीं सीखा जा सकता। इसी प्रकार व्यभिचार कर्म से गर्भधारण किया गया शिशु पिता का नाम नहीं पा सकता। कृते प्रतिकृतं कुर्याद्धिंसने प्रतिहिंसनम्। तंत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टं समाचरेत्॥ उपकार का बदला उपकार से देना चाहिए और हिंसा वाले के साथ हिंसा करनी चाहिए। वहां दोष नहीं लगता 172 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

क्योंकि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना ही ठीक रहता है॥2॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में कहा है कि यूं तो सबके साथ प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए पर दुष्ट के साथ प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना उसकी दुष्टता को बढ़ावा देना होता है। यद्दूरं यद्दुराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥ तप में असीम शक्ति है। तप के द्वारा सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। जो दूर है, बहुत अधिक दूर है, जो बहुत कठिनता से प्राप्त होने वाला है और बहुत दूरी पर स्थित है, ऐसे साध्य को तपस्या के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। तप के द्वारा तो ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है। अतः जीवन में साधना का विशेष महत्त्व है। इसके द्वारा ही मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की जा सकती है॥3॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि तप से कठिन-से-कठिन कार्य सहज बन जाते हैं। तप से मृत्यु पर विजय पाई जा सकती है। तप का अर्थ है विपत्तियां आने पर भी धर्म को न छोड़ना। लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः, सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्। सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः, सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना॥ लोभ सबसे बड़ा अवगुण है, पर निन्दा सबसे बड़ा पाप है, सत्य सबसे बड़ा तप है और मन की पवित्रता सभी तीर्थों में जाने 173

से उत्तम है। सज्जनता सबसे बड़ा गुण है, यश सबसे उत्तम अलंकार (आभूषण) है, उत्तम विद्या सबसे श्रेष्ठ धन है और अपयश मृत्यु के समान सर्वाधिक कष्टकारक है॥4॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में लोभ को दुर्गुणों की खान बताया है। यदि लोभ है तो अन्य दुर्गुण की क्या आवश्यकता? यदि चुगलखोरी का स्वभाव है तो और पातकों का क्या काम? यदि जीवन में सत्य है तो तप करने की क्या आवश्यकता? मन की शुद्धि से तीर्थ की, प्रेम है तो गुणों की, यश है तो आभूषणों की, श्रेष्ठ विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता? इसी तरह अपयश है तो मृत्यु से क्या? पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरा। शंखो भिक्षाटनं कुर्यान्नाऽदत्तमुपतिष्ठते॥ जिसका पिता समुद्र है, जिसकी बहन लक्ष्मी है, ऐसा होते हुए भी शंख भिक्षा मांगता है॥5॥ लक्ष्मी और शंख का जन्म समुद्र से ही माना जाता है। प्रायः देखा जाता है कि साधु लोग शंख बजाकर गृहस्थियों के घर से भिक्षा मांगते हैं। इसी से कहा गया है कि शंख भिक्षा मांगता है। भाव यह है कि एक ही कोख से जन्म लेने वालों का भाग्य अलग-अलग होता है। अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः। व्याधिष्ठो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता॥ शक्तिहीन मनुष्य साधु होता है, धनहीन व्यक्ति ब्रह्मचारी होता है, रोगी व्यक्ति देवभक्त और बूढ़ी स्त्री पतिव्रता होती है॥6॥ भाव यह है कि ये सभी लोग असमर्थ रहने के कारण से ही ऐसे हैं। अतः जो व्यक्ति प्रयास नहीं करता, परिश्रम नहीं करता, वह आलसी और निकम्मा होकर अपने को ऐसा बना 174 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

लेता है। परिस्थितियों से घबराकर मुंह मोड़ लेना कायर मनुष्य का काम है। व्यक्ति को तो चाहिए कि वह अपना कार्य पूरे मनोयोग से करे। सच्चे अर्थों में वही धर्म भी है। नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा। न गायत्र्याः परो मंत्रो न मातुपरं दैवतम्॥ अन्नदान व जलदान से बड़ा कोई अन्य दान नहीं, द्वादशी तिथि के समान कोई अन्य तिथि नहीं, गायत्री मंत्र के समान कोई अन्य मंत्र नहीं और माता के समान कोई दूसरा देवता नहीं॥7॥ द्वादशी तिथि पर किए गए पुण्य कर्मों का फल उत्तम होता है, गायत्री मंत्र श्रेष्ठ फल देने वाला है और मां का आशीर्वाद सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला है। मां के दूध का ऋण उतारना असंभव है। आचार्य चाणक्य के इस कथन को ध्यान में रखकर चलने वाला मनुष्य सदैव अच्छा फल प्राप्त करता है। तक्षकस्य विषं दंते मक्षिकायास्तु मस्तके। वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुर्जने विषम्॥ तक्षक (एक सांप का नाम) के दांत में विष होता है, मक्खी के सिर में विष होता है, बिच्छू की पूंछ में विष होता है, परन्तु दुष्ट व्यक्ति के पूरे शरीर अर्थात सारे अंगों में विष होता है॥8॥ भाव यह है कि दुर्जन व्यक्ति हर प्रकार से सज्जनों को कष्ट पहुंचाने वाला होता है। उसका साथ किसी रूप में भी सुखकर नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ऐसे दुष्ट लोगों से बचकर चलते हैं क्योंकि दुर्जन व्यक्ति के तो सारे अंगों में विष भरा होता है। 175 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

पत्युराज्ञां विना नारी ह्युपोष्य व्रतचारिणी। आयुष्यं हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत्॥ पति की आज्ञा के बिना जो स्त्री उपवास और व्रत करती है, वह अपने पति की आयु को कम करने वाली होती है, अर्थात पति को नष्ट करके सीधे नर्क में जाती है॥१॥ अतः पति की आज्ञा लेकर ही व्रत-उपवास आदि करने चाहिए, तभी इन कर्मों का उत्तम फल प्राप्त होता है। न दानैः शुद्ध्यते नारी नोपवासशतैरपि। न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा॥ स्त्री न तो दान से, न सैकड़ों उपवास-व्रतों से, न तीर्थाटन करने से उस प्रकार से शुद्ध हो पाती है, जैसे वह अपने पति के चरण-जल से शुद्ध होती है॥10॥ अतः पति की चरण-सेवा ही स्त्री के कल्याण के लिए उत्तम है। उसका पति ही उसके लिए परमेश्वर है। पाद्यशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च। श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ पैरों के धोने से बचा हुआ, पीने के बाद पात्र में बचा हुआ और सन्ध्या से बचा हुआ जल कुत्ते के मूत्र के समान है। उसे पीने के बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य चन्द्रायण व्रत को करें, तभी वे पवित्र हो सकते हैं॥11॥ आचार्य चाणक्य कहते हैं कि किसी भी कार्य से बचे हुए जल को नहीं पीना चाहिए। वह जल अशुद्ध माना जाता है। उनका मानना है कि पैरों के धोने के बाद बचा हुआ जल, पीने के बाद बचा हुआ जल तथा सन्ध्या से बचे हुए जल को जो व्यक्ति पीता है वह चन्द्रायण व्रत करने के उपरान्त 176 सम्पूर्ण चाणक्य नीति-11

ही पवित्र हो सकता है। अतः मनुष्य को उपयुक्त बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। दानेन पाणिर्न तु कंकणेन, स्नानेनशुद्धिर्न तु चन्दनेन। मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन, ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन॥ हाथ की शोभा दान से होती है, न कि कंगन पहनने से, शरीर की शुद्धि स्नान से होती है, न कि चंदन लगाने से, बड़ों की तृप्ति सम्मान करने से होती है, न कि भोजन कराने से, शरीर की मुक्ति ज्ञान से होती है, न कि शरीर का शृंगार करने से॥12॥ भाव यह है कि बाह्याडम्बरों से शरीर को शुद्ध नहीं किया जा सकता। दान देने, स्वच्छ जल में स्नान करने, बड़ों का सम्मान करने और उचित ज्ञान प्राप्ति के उपरान्त ही मनुष्य का जीवन सफल, पवित्र और मोक्ष को प्राप्त होता है। अतः मनुष्य को इन बाह्य आडम्बरों की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गंधलेपनम्। आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यापि श्रियं हरेत्॥ नाई के घर पर जाकर केश कटवाना, पत्थर पर चंदन आदि सुगंधित द्रव्य लगाना, जल में अपने चेहरे की परछाई देखना, यह इतना अशुभ माना जाता है कि यदि देवराज इन्द्र भी स्वयं इसे करने लगें तो उसके पास से लक्ष्मी अर्थात धन-सम्पदा नष्ट हो जाती है॥13॥ आचार्य का मत है कि नाई के घर जाकर बाल कटवाने से, पत्थर की देव-प्रतिमाओं पर चंदन लगाने से और अपनी परछाई को पानी में देखने से आदमी की प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है और वह शोभाहीन हो जाता है। 177 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—12

सद्यः प्रज्ञाहरा तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा। सद्यः शक्तिहरा नारी सद्यः शक्तिकरं पयः॥ 'तुण्डी' (कुंदरू) को खाने से बुद्धि तत्काल नष्ट हो जाती है, 'वच' के सेवन से बुद्धि को शीघ्र विकास मिलता है, स्त्री के साथ समागम करने से शक्ति तत्काल नष्ट हो जाती है और दूध के प्रयोग से खोई हुई ताकत तत्काल वापस लौट आती है॥14॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में आयुर्वेद नीति का ज्ञान दिया है। उनके अनुसार नारी व्यक्ति को दुर्बल बनाती है, अतः उससे बचना चाहिए। बुद्धि और ताकत के लिए 'वच' और 'दूध' का प्रयोग करना हितकर रहता है, क्योंकि ये दोनों तुरंत असर करने वाले हैं। परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम्। नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे॥15॥ जिन सज्जनों के हृदय में परोपकार की भावना जाग्रत रहती है, उनकी तमाम विपत्तियां अपने आप दूर हो जाती हैं और उन्हें पग-पग पर सम्पत्ति एवं धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है॥15॥ यहां चाणक्य के कहने का अर्थ यह है कि परोपकार ही जीवन है। अपना पेट तो पशु भी भर लेता है। यदि पेट पालना ही जीवन का उद्देश्य है तो मानवता क्या हुई? स्वार्थी मनुष्य का जीवन निरर्थक है। यदि रामा यदि च रमा यद्यपि तनयो विनयगुणोपेतः। यदि तनये तनयोत्पत्तिः सुरवरनगरे किमाधिक्यम्॥ यदि स्त्री सुंदर हो और घर में लक्ष्मी हो, पुत्र विनम्रता आदि 178 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

गुणों से युक्त हो और पुत्र का पुत्र घर में हो तो इससे बढ़कर सुख तो इन्द्रलोक में भी नहीं। ऐसी स्थिति में स्वर्ग घर में ही है।। 16।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि उत्तम पत्नी, आवश्यक धन-धान्य, सुशील पुत्र और पोते आंगन में खेल रहे हों तो यही सब स्वर्गिक आनंद है। स्वर्ग कहां है? स्वर्ग आकाश में नहीं है, स्वर्ग इसी भूतल पर है। आचार्य का सुंदर पत्नी से आशय सिर्फ रूप की सुंदरता से नहीं है बल्कि गुण की सुंदरता से भी है। गुण की सुंदरता महान बताई गई है। पत्नी यदि पति धर्म निभाने वाली हो तो तभी पुरुष के लिए पृथ्वी स्वर्ग समान है। इसी प्रकार पुत्र आदि आज्ञाकारी हो तभी पुत्र का होना सार्थक है अन्यथा इस पृथ्वी स्वर्ग समान है, इसी प्रकार पुत्र आदि आज्ञाकारी हो तभी पुत्र का होना सार्थक है अन्यथा यह पृथ्वी स्वर्ग के बजाय नर्क समान बन जाती है। आहरनिद्रामय मैथुननानि, समानि चैतानि नृणा पशूनाम। ज्ञानपं नराणामधिको विशेषो ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः॥ भोजन, नींद, डर, संभोग आदि, ये वृत्ति (गुण) मनुष्य और पशुओं में समान रूप से पाई जाती हैं। पशुओं की अपेक्षा मनुष्यों में केवल ज्ञान (बुद्धि) एक विशेष गुण, उसे अलग से प्राप्त है। अतः ज्ञान के बिना मनुष्य पशु के समान ही होता है।। 17।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में मनुष्य के पशु से अलग होने का जो गुण बताया है वह है उसकी ज्ञानशक्ति। ज्ञान से मनुष्य उन्नत होता है। ज्ञान से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। ज्ञान द्वारा ही मनुष्य के नैतिक गुणों का विकास होता है। नैतिक गुण है सत्य, न्याय, धर्म, हिंसा, परोपकार, दान, विनयशीलता। 179

जिस मनुष्य ने अपने में इन नैतिक गुणों को विकसित कर लिया, उसने अपने ज्ञान चक्षु से अच्छा-बुरा समझना सीख लिया, उसका ही मनुष्य रूप में जीवन लेना सफल रहा, अन्यथा यदि मनुष्य रूप में जन्म लेकर खाने, सोने, डरने और संतान पैदा करने के लिए वह जन्मा है तो पशु समान है। दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालैर् दूरीकृताः करिवरेण मदान्धबुद्ध्या। तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेषा, भृङ्गाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति॥ अपने मद से अंधा हुआ गजराज (हाथी) यदि अपनी मंदबुद्धि के कारण, अपने गन्डस्थल (मस्तक) पर बहते मद को पीने के इच्छुक भौरों को, अपने कानों को फड़फड़ाकर भगा देता है तो इसमें भौरों की क्या हानि हुई? अर्थात कोई हानि नहीं हुई। वहां से हटकर वे खिले हुए कमलों का सहारा ले लेते हैं और उन्हें वहां पराग रस भी प्राप्त हो जाता है, परंतु भौरों के न रहने से हाथी के गंडस्थल की शोभा नष्ट हो जाती है॥18॥ यदि कोई रसिक विद्वान किसी धनी व्यक्ति के पास कोई आस लेकर जाए और वह उसे अपमानित करके भगा दे तो इसमें विद्वान का तो कुछ नहीं बिगड़ता, अपितु उस धनी की शोभा ही नष्ट हो जाती है। गुणी व्यक्ति के लिए तो सारा संसार पड़ा है, पर धनी व्यक्ति के घर विद्वान पधारे, यह कोई जरूरी नहीं। राजा वेश्या यमो ह्यग्निस्तस्करो बालयाचको। परदुःखं न जानन्ति अष्टमो ग्रामकंटकाः॥ राजा, वेश्या, यमराज, अग्नि, चोर, बालक, भिक्षु और 180

आठों गांव का कांटा, ये दूसरे के दुःख को नहीं जानते।। 19।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि अग्नि जड़ पदार्थ है, वह तो किसी के दुख-सुख को जान ही नहीं सकता। शेष चेतन भी दूसरों के दुख को न जानकर अपने ही घर को भरने का प्रयत्न करते हैं। राजा जनता को पीड़ित करके भी अपना कोष भरना चाहता है। वेश्या को धन चाहिए, चाहे प्रेमी कहीं से लाकर दे। यमराज प्राणियों को समय आने पर दूसरी योनियों में भेज देता है चाहे परिवार वालों को कितना ही कष्ट हो। चोर को अपनी चोरी मतलब है, वह यह नहीं सोचता कि इस धन को चुराने से उसके स्वामी की क्या दशा होगी? बाल हठ प्रसिद्धि ही है, वह रोने लगता है तो इस बात को नहीं सोचता कि किसका नुकसान होता है। याचक भी अपना ही स्वार्थ सोचता है और ग्राम कण्टक का तो निर्वाह ही ग्रामवासियों को पीड़ा देकर होता है। वह इस बात का आभास नहीं करता कि अपने स्वार्थ के लिए वह लोगों को कष्ट दे रहा है। अधः पश्यसि किं बाले! पतितं तव किं भुवि। रे रे मूर्ख! न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम्॥ नीचे की ओर देखती एक अधेड़ वृद्ध स्त्री से कोई पूछता है—'हे बाले ! तुम नीचे क्या देख रही हो ? पृथ्वी पर तुम्हारा क्या गिर गया है ?' तब वह स्त्री कहती है—'रे मूर्ख ! तुम नहीं जानते, मेरा युवावस्था रूपी मोती नीचे गिरकर नष्ट हो गया है।' ।।20।। 181