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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

आदमी को तोड़कर रख देता है। वह असहाय और अकेला रह जाता है। उसके दुःख-सुख का कोई साथी नहीं होता। इसी तरह अपने ही लोगों के द्वारा अपमानित होना सर्वाधिक दुःख पहुंचाता है। व्यक्ति यदि कर्ज न चुका पाए तो उसे पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है। जीवन में दरिद्र होने का दुःख सबसे बड़ा है। वह अपनी निर्धनता के कारण अपना सिर गर्व से नहीं उठा पाता। इसी भांति जब आदमी अपने प्रतिकूल किसी सभा का आयोजन देखता है, अर्थात्-समाज में उसे भला-बुरा कहा जाता है तो उसे मर्मान्तक पीड़ा होती है। चाणक्य ने कहा कि ये चीजें यद्यपि आग नहीं हैं, पर इनके द्वारा आदमी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व जलकर राख हो जाता है। नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी। मन्त्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशम्॥ नदी के किनारे खड़े वृक्ष, दूसरे के घर में गई स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इसमें संशय नहीं करना चाहिए।।15।। बरसात के दिनों में नदी में जब बाढ़ आती है, तब उसके किनारे खड़े वृक्ष उखड़कर पानी में गिर जाते हैं और बह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्री यदि दूसरे के घर में रहेगी तो यह भरोसा नहीं कि वह कब भ्रष्ट हो जाए या पतन के मार्ग पर बढ़ जाए, अर्थात स्त्री को दूसरे के घर में नहीं रहने देना चाहिए। इसी प्रकार जिस राजा को उचित सलाह देने वाला गुणी मंत्री नहीं होगा, वह राजा अपनी गलत हरकतों द्वारा शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। इसमें कदापि संदेह नहीं करना चाहिए। 37

बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा। वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्यका॥ ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल छोटा बनकर रहना, अर्थात सेवा-कर्म करना है।।16।। विद्याविहीन, ज्ञानरहित ब्राह्मण की कोई शक्ति नहीं होती, धन यदि वणिक (व्यापारी) के पास न हो तो वह व्यापार करने में असफल हो जाता है। इसलिए धन का होना उसके लिए परम आवश्यक है। इसी प्रकार यदि शूद्र व्यक्ति अपने सेवा कर्म से पीछे हटता है तो वह एक तरह से अपनी शक्ति को ही क्षीण करता है। आचार्य चाणक्य ने भारतीय वर्ण-व्यवस्था, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की शक्तियों का यहां परिचय दिया है। भले ही आज के युग में अपने-अपने कर्म से वर्ण-व्यवस्था की स्थिति को नकार दिया गया हो, पर प्राचीन काल से चली आ रही इस वर्ण-व्यवस्था के मूल में एक सुव्यवस्थित समाज की संरचना का रहस्य छिपा हुआ है। निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्। खगाः वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागतो गृहम्॥ वेश्या निर्धन मनुष्य को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को व अतिथि उस घर को, जिसमें वे आमंत्रित किए जाते हैं, को भोजन करने के पश्चात छोड़ देते हैं।।17।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में सहज अनुभवजन्य बातों को समझाया है। उनका कहना है कि जेब में जब धन न हो तब वेश्या के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि वेश्या को सिर्फ धन से ही मतलब होता है। यह वेश्या का स्वभाव ही है। 38

इसी प्रकार राजा के पराजित होकर अपमानित होने पर प्रजा भी उसका साथ छोड़ देती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार फलरहित वृक्ष को त्यागकर पक्षी उड़ जाते हैं, उसी प्रकार अतिथि को भोजन करने के बाद गृहस्थ का घर छोड़ देना चाहिए। जो वस्तुएं गुणहीन हैं, वे त्याज्य हैं, उनका कभी साथ नहीं करना चाहिए। गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्या गुरुं शिष्याः दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा॥ ब्राह्मण दक्षिणा ग्रहण करके यजमान को, शिष्य विद्याध्ययन करने के उपरान्त अपने गुरु को और हिरण जले हुए वन को त्याग देते हैं॥18॥ इस श्लोक में चाणक्य ने कहा है कि किसी प्रयोजन के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी के पास जाता है तो उसे कार्य पूरा होते ही वह जगह छोड़ देनी चाहिए। उद्देश्य पूर्ति होने के बाद वहां रुकना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है। दुराचारी च दुर्द्दष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति॥ बुरा आचरण अर्थात दुराचारी के साथ रहने से, पाप दृष्टि रखने वाले का साथ करने से तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है।।19।। बुरी संगति का सदैव बुरा असर पड़ता है। यहां चाणक्य ने इसी ओर ध्यान खींचा है। दुश्चरित्र व्यक्ति का साथ करने अथवा गलत जगहों पर जाने या रहने से मनुष्य का चरित्र नष्ट हो जाता है। जिस व्यक्ति का चरित्र नष्ट हो जाता है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है। 39

समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते। वाणिज्यं व्यवहारेषु दिव्या स्त्री शोभते गृहे॥ मित्रता बराबर वालों में शोभा पाती है, नौकरी राजा की अच्छी होती है, व्यवहार में कुशल व्यापारी और घर में सुंदर स्त्री शोभा पाती है॥20॥ मित्रता कभी भी दो स्तर वालों में सफल नहीं होती। एक-सा स्वभाव, एक समान समाज में जीवन स्तर, एक-से कर्म दो व्यक्तियों के बीच में मित्रता के आधार हो सकते हैं। नौकरी हमेशा सरकारी अच्छी होती है क्योंकि इसमें स्थायित्व होता है। जो व्यापारी चतुर और व्यवहार-कुशल होता है, वह इस समाज में सम्मान का पात्र होता है और सुंदर स्त्री घर में ही शोभनीय होती है। 40

॥ अथ तृतीय अध्याय ॥ कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥ दोष किसके कुल में नहीं है? कौन ऐसा है, जिसे दुःख ने नहीं सताया? अवगुण किसे प्राप्त नहीं हुए? सदैव सुखी कौन रहता है?॥1॥ यह संसार दुःखों का सागर है। इस संसार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसे दुःख न हुआ हो। सभी व्यक्तियों में कुछ-न-कुछ दुःख, रोग और अवगुण अथवा कुछ-न-कुछ बुरी आदतें पाई जाती हैं। इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो सदैव सुखी रहता हो। उसे किसी-न-किसी तरह के संकटों का, दुखों का, रोगों का, बुरी आदतों का सामना करना ही पड़ता है। दुःख और सुख तो साथ-साथ लगे ही रहते हैं। जैसे रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आती है। आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥ मनुष्य का आचरण-व्यवहार उसके खानदान को बताता 41 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

है, भाषण अर्थात उसकी बोली से देश का पता चलता है, विशेष आदर-सत्कार से उसके प्रेमभाव का तथा उसके शरीर से भोजन का पता चलता है।।2।। मनुष्य के स्वभाव से, उसकी बातचीत से, उसके व्यवहार से और उसके शरीर से कितनी ही बातों का पता बिना परिचय के ही लगाया जा सकता है, जो आदमी शान्त और शील स्वभाव का होगा, जिसका आचरण, व्यवहार आदि सहृदय होगा, वह व्यक्ति निश्चित रूप से उच्च कुल का होगा, परंतु जिसका व्यवहार दुष्टता से भरा होगा, वह निश्चय ही नीच खानदान का होगा। इसी प्रकार आदमी की बोल-चाल से उसके स्थान का पता चल जाता है कि वह कहां का रहने वाला है, क्योंकि उसकी बोली में स्थानीय शब्दों का पुट आ जाता है। आदमी के आदर-सत्कार से उसके प्रेमभाव का पता चल जाता है कि वह सच्चा है अथवा झूठा या दिखावटी है। इसी तरह आदमी के स्वस्थ और दुबले-पतले शरीर को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह आदमी कैसी खुराक खाता होगा। ये सभी सामान्य बातें हैं। कभी-कभी अति मृदु व्यवहार करने वाला व्यक्ति अत्यन्त दुष्ट व चालाक निकलता है और अत्यधिक दुबला-पतला व्यक्ति बहुत ज्यादा खाना खाता है। अपवाद सभी जगह मिल जाते हैं। सुकुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्। व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत्॥ कन्या का विवाह अच्छे कुल में करना चाहिए। पुत्र को विद्या के साथ जोड़ना चाहिए। दुश्मन को विपत्ति में डालना चाहिए और मित्र को अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए॥3॥ आचार्य चाणक्य का कथन है कि समझदार व्यक्ति 42 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

अपनी पुत्री का विवाह वर पक्ष के खानदान को अच्छी तरह परखकर ही करता है। वह अपने पुत्र को अच्छी और उच्च शिक्षा प्रदान करता है या कराता है। शत्रु यदि निकट आ जाए तो उसे विपत्ति में डाल देता है और अपने प्रिय मित्र को वह अच्छे और महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगाता है। दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥ दुर्जन और सर्प के सामने आने पर सर्प का वरण करना उचित है, न कि दुर्जन का, क्योंकि सर्प तो एक ही बार डसता है, परंतु दुर्जन व्यक्ति कदम-कदम पर बार-बार डसता है॥4॥ आचार्य चाणक्य ने कहा है कि सर्प और दुष्ट व्यक्ति में से यदि किसी का चुनाव करना पड़ जाए तो सर्प का ही चुनाव करना चाहिए न कि दुष्ट व्यक्ति का, क्योंकि सांप तो एक ही बार डसकर छोड़ देगा, परंतु दुष्ट व्यक्ति जीवन-भर कष्ट पहुंचाता रहेगा। इसका भाव यही है कि सांप तो तभी काटेगा, जब उसके ऊपर बेध्यानी में पांव पड़ जाए और उसे आपके द्वारा कष्ट पहुंचे, लेकिन दुष्ट व्यक्ति अपनी आदत के अनुसार बिना कारण के भी कष्ट पहुंचाता रहेगा। एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्। आदिमध्याऽवसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥ इसीलिए राजा खानदानी लोगों को ही अपने पास एकत्र करता है क्योंकि कुलीन अर्थात अच्छे खानदान वाले लोग प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में, राजा को किसी दशा में भी नहीं त्यागते॥5॥ भाव यही है कि खानदानी अर्थात कुलीन वंश के लोगों का यह स्वाभाविक गुण होता है कि वे सम-विषम स्थितियों में भी राजा का साथ नहीं छोड़ते। राजा के हर सुख-दुःख में 43

अध्याय ४-६: कर्म-फल, पुत्र-पालन व लोक-व्यवहार

वे सदैव साथ रहते हैं और राजा के प्रति अपनी स्वामिभक्ति को नहीं छोड़ते। कुलीन वंश के लोग किसी भी परिस्थिति में अपनी वफादारी पर कभी आंच नहीं आने देते। प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥ प्रलय काल में सागर भी अपनी मर्यादा को नष्ट कर डालते हैं परंतु साधु लोग प्रलय काल के आने पर भी अपनी मर्यादा को नष्ट नहीं होने देते॥6॥ समुद्र की मर्यादा प्रसिद्ध है कि उसमें कितना ही जल गिरता जाए, पर वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, लेकिन प्रलय काल में सागर की मर्यादा भी छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है, मगर साधु पुरुष अपने कर्त्तव्य पथ से कभी नहीं हटते। अतः सागर की विशालता साधु पुरुष के हृदय की विशालता के सामने तुच्छ है। बड़ी-बड़ी भयानक लहरें धरती को लील जाती हैं, परंतु साधु पुरुष कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ते इसीलिए साधु पुरुष को सागर से भी गंभीर और मर्यादित माना गया है। मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः। भिनत्ति वाक्शल्येन अदृष्टः कण्टको यथा॥ मूर्ख व्यक्ति से बचना चाहिए। वह प्रत्यक्ष में दो पैरों वाला पशु है। जिस प्रकार बिना आंख वाले अर्थात अंधे व्यक्ति को कांटे भेदते हैं, उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपने कटु व अज्ञान से भरे वचनों से भेदता है॥7॥ मूर्ख व्यक्ति का कभी साथ नहीं करना चाहिए। वह बिना 44 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

सींग वाला, दो पैरों से चलने वाला पशु है, अर्थात मूर्ख और बुद्धिहीन है। जिस प्रकार दिखाई न देने पर कांटे अंधे व्यक्ति के शरीर में चुभकर पीड़ा पहुंचाते हैं, उसी प्रकार अज्ञानता से भरे मूर्ख व्यक्ति के वचनों को सुनकर मार्मिक पीड़ा होती है। ऐसे व्यक्ति को छोड़ना ही उत्तम है। रूप यौवन सम्पन्नाः विशालकुलसंभवाः। विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥ रूप और यौवन से सम्पन्न तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी यदि विद्या से रहित है तो वह बिना सुगंध के फूल की भांति शोभा नहीं पाता॥8॥ भाव यही है कि आदमी की शोभा उसके सुंदर रूप, यौवन और उच्च कुल में जन्म लेने से नहीं है। उसकी शोभा उसकी विद्वता से है, उसके ज्ञान से है। यदि वह मूर्ख है, अज्ञानी है और किसी श्रेष्ठ कुल में उसका जन्म हुआ है, तब भी उसकी कोई मान्यता समाज में नहीं होती। आचार्य चाणक्य का कहना यही है कि आदमी के वंश की, उसके रूप-यौवन की, उसकी शक्ति-संपदा की तभी शोभा होती है, जब वह व्यक्ति विद्वान होता है। अन्यथा तो गंध-रहित पुष्प की भांति उसकी शोभा और सम्मान बनावटी होता है। कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्। विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥ कोयल की शोभा उसके स्वर में है, स्त्री की शोभा उसका पतिव्रत धर्म है, कुरूप व्यक्ति की शोभा उसकी विद्वता में है और तपस्वियों की शोभा क्षमा में है॥ 9॥ कोयल की सुरीली तान (स्वर) ही उसकी शोभा अर्थात उसका सौंदर्य है। पतिव्रत धर्म ही स्त्री का सौंदर्य है, 45 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

अर्थात् जो स्त्री अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित है, जो भूलकर भी पर-पुरुष का ध्यान अपने मन में नहीं लाती, वह स्त्री रूप और गुणों में सर्वोत्तम है। व्यक्ति यदि कुरूप है, पर विद्वान है तो उसकी वह विद्वता ही उसका सौंदर्य है। जैसे महाज्ञानी अष्टावक्र शरीर से कुरूप होते हुए भी महाज्ञानी कहलाए और राजा जनक की सभा में सबसे अधिक सम्मानित हुए। इसी प्रकार जो तपस्वी सहृदय है, संवेदनशील है, क्षमा करना जानता है, वह अपनी इस सदाशयता के कारण ही शोभित होता है। त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥ किसी एक व्यक्ति को त्यागने से यदि कुल की रक्षा होती हो तो उस एक को छोड़ देना चाहिए। पूरे गांव की भलाई के लिए कुल को तथा देश की भलाई के लिए गांव को और अपने आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए सारी पृथ्वी को छोड़ देना चाहिए॥10॥ आचार्य चाणक्य ने यहां एक के सामने अनेक को महत्त्व दिया है। उनका कहना है कि यदि एक व्यक्ति के बलिदान से कुल का सम्मान बचता हो तो उसे बलिदान होने से नहीं रोकना चाहिए। यदि ग्राम की अस्मिता को बचाने के लिए पूरे परिवार का त्याग करना पड़े तो उसे छोड़ देना चाहिए और यदि देश के सम्मान की रक्षा के लिए ग्राम को त्यागना पड़े तो ग्राम का त्याग कर देना चाहिए। प्रायः सरहद पर युद्ध छिड़ जाने से सरहद के गांवों को खाली करा लिया जाता है। इसके अतिरिक्त आचार्य ने आत्म-सम्मान को सर्वोपरि माना है। 46 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्। मौने च कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥ उद्योग-धंधा करने पर निर्धनता नहीं रहती। प्रभु नाम का जप करने वाले का पाप नष्ट हो जाता है। चुप रहने अर्थात सहनशीलता रखने पर लड़ाई-झगड़ा नहीं होता और जो जागता रहता है अर्थात सदैव सजग रहता है उसे कभी भय नहीं सताता।।11।। जो व्यक्ति कर्मठ हैं, परिश्रमी हैं, उद्योग-धंधा करने में आलसी नहीं हैं, निर्धनता उनके निकट नहीं आती। वे सदैव सुखी और प्रसन्न रहते हैं। परिश्रम द्वारा वे सुख-सम्पत्ति अर्जित करते हैं। जो प्रभु को पूरी तरह समर्पित होकर उसके नाम का निरंतर जाप करते हैं, उसे स्मरण करते रहते हैं, उनके सभी पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। क्रोध अर्थात पलटकर आक्रमण होने से सदैव झगड़ा बढ़ता है। यदि व्यक्ति दूसरे की कटु बात का जवाब न दे और सहनशील बना रहे तो सामने वाले का क्रोध स्वतः ही नष्ट हो जाता है। झगड़ा बढ़ नहीं पाता। झगड़ा तभी बढ़ता है जब ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाता है। जो व्यक्ति जीवन में सावधान रहता है, उसे कभी भय नहीं सताता। भाव यही है कि परिश्रम से समृद्धि आती है, प्रभु स्मरण से पापों का नाश होता है, सहनशीलता से संघर्ष का अंत होता है और सजगता से भय कभी नहीं होता। अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः। अतिदानं बलिर्दत्वा अति सर्वत्र वर्जयेत्॥ अति सुंदर होने के कारण सीता का हरण हुआ, अत्यंत अहंकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान के कारण राजा बलि बांधा गया। अतः सभी के लिए अति ठीक नहीं है। 'अति सर्वथा वर्जयेत्।' अति को सदैव छोड़ देना चाहिए।।12।। 47 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

हर चीज की एक सीमा होती है, मर्यादा होती है। सीमा से बाहर जाने पर प्रायः नुकसान ही होता है। उदाहरण देते हुए चाणक्य ने बताया कि अनुपम सुंदरी होने के कारण सीता का हरण हुआ और अति अहंकारी होने के कारण रावण का वध हुआ। इसी तरह असुरराज बलि ने दान का वचन देकर वामन को अपना सर्वस्व दान कर दिया। कथा इस प्रकार है, प्रह्लाद पुत्र बलि बड़ा दानवीर था। देवता उससे भयभीत रहते थे। विष्णु भगवान ने वामन अंगुल का रूप धारण करके बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि ने हंसकर तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। तब भगवान विष्णु ने दो पग में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग बलि के शरीर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया। को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥ समर्थ को भार कैसा? व्यवसायी के लिए कोई स्थान दूर क्या? विद्वान के लिए विदेश कैसा? मधुर वचन वाले का शत्रु कौन?॥13॥ समर्थ व्यक्ति कोई भी कार्य सहज ही कर लेता है। उसे कोई भी कार्य भार स्वरूप नहीं लगता। व्यवसायी व्यक्ति अपने व्यवसाय के लिए कहीं भी जा सकता है। वह स्थान की दूरी को नहीं, अपने लाभ को देखता है। इसी तरह विद्वान व्यक्ति के विदेश में भी लाखों मित्र होते हैं। उसे परदेस में कोई कठिनाई नहीं होती। मधुर वचन बोलने वाला व्यक्ति कभी दूसरों के प्रति ईर्ष्या नहीं रखता, सभी को समान भाव से देखता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता। अतः सब उसके मित्र बन जाते हैं। 48 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

एकेनाऽपि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥ एक ही सुगन्धित फूल वाले वृक्ष से जिस प्रकार सारा वन सुगन्धित हो जाता है, उसी प्रकार एक सुपुत्र से सारा कुल सुशोभित हो जाता है।।14।। अच्छे गुण सभी जगह प्रशंसित होते हैं। उनकी लोक प्रसिद्धि सुगन्धित पुष्प की भांति सभी जगह फैल जाती है। किसी कुल का एक सुपुत्र सारे कुल को सम्मानित करा देता है। एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना। दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं तथा॥ आग से जलते हुए सूखे वृक्ष से सारा वन जल जाता है जैसे कि एक कुपुत्र से कुल का नाश हो जाता है।।15।। कुल का विनाश करने के लिए एक ही कुपुत्र काफी होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक जलता हुआ वृक्ष पूरे वन को जलाकर खाक कर देता है। भाव यही है कि सद्गृहस्थ को अपनी संतान पर पूरा ध्यान रखना चाहिए। एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना। आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥ जिस प्रकार चन्द्रमा से रात्रि की शोभा होती है, उसी प्रकार एक सुपुत्र, अर्थात साधु प्रकृति वाले पुत्र से कुल आनन्दित होता है।।16।। किसी परिवार में यदि साधु प्रकृति का विद्वान पुत्र उत्पन्न होता है तो वह अपनी विद्वता से पूरे परिवार को और समाज को उसी प्रकार से आनन्दित कर देता है, जैसे चन्द्रमा अपनी शीतल चांदनी से रात्रि को जगमग कर देता है। 49 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकै। वरमेकः कुलाऽलम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम्॥ शोक और दुःख देने वाले बहुत-से पुत्रों को पैदा करने से क्या लाभ है? कुल को आश्रय देने वाला तो एक पुत्र ही सबसे अच्छा होता है॥17॥ महाभारत में धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे, पर सभी ने उसे दुःख ही पहुंचाया। वे सभी महाभारत युद्ध के कारण बने। जबकि पांच पाण्डवों ने धर्म के मार्ग पर चलकर विजय श्री प्राप्त की और वंश का नाम सुशोभित किया। यहां चाणक्य ने हजार दुर्गुणों पर एक ही श्रेष्ठता को महत्त्व दिया है। एक श्रेष्ठ और गुणी पुत्र सौ दुष्ट पुत्रों से अच्छा होता है। दुःख देने वाले कई पुत्रों से कुल के नाम को बढ़ाने वाला तथा सहारा देने वाला एक ही पुत्र काफी होता है। लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥ पुत्र से पांच वर्ष तक प्यार करना चाहिए। उसके बाद दस वर्ष तक अर्थात पंद्रह वर्ष की आयु तक उसे दंड आदि देते हुए अच्छे कार्य की ओर लगाना चाहिए। सोलहवां साल आने पर मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए। संसार में जो कुछ भी भला-बुरा है, उसका उसे ज्ञान कराना चाहिए॥18॥ इस प्रकार एक पिता अपने पुत्र के जीवन को भली-भांति सवांर सकता है और उसे गलत मार्ग पर बढ़ने से रोक सकता है। उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे। असाधुजनसम्पर्केयः पलायेत् सः जीवति॥ देश में भयानक उपद्रव होने पर, शत्रु के आक्रमण के 50 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

समय, भयानक दुर्भिक्ष (अकाल) के समय, दुष्ट का साथ होने पर, जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है॥19॥ दैवीय उत्पात के समय, शत्रु के आक्रमण के समय, अकाल पड़ने पर और दुष्ट का साथ होने पर व्यक्ति को अपना बचाव करना चाहिए तभी प्राण रक्षा संभव है। धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म-जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥ जिसके पास धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इनमें से एक भी नहीं है, उसके लिए जन्म लेने का फल केवल मृत्यु ही होता है॥20॥ आचार्य चाणक्य ने यहां धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की महत्ता पर प्रकाश डाला है। धर्म से सद्कर्मों की प्रेरणा प्राप्त होती है, अर्थ से जीवन समृद्ध होता है, काम जीवन की शाश्वत अनिवार्यता है और मोक्ष के द्वारा मनुष्य जीवन-मृत्यु के आवागमन से मुक्त हो जाता है। ये सब मनुष्य जीवन में ही संभव है। मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है इसीलिए ऋषि-मुनियों ने जीवन के इन चार श्रेष्ठ तत्त्वों का विवेचन किया है। मूर्खा यत्र न पूज्यंते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्। दाम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥ जहां मूर्खों का सम्मान नहीं होता, जहां अन्न भंडार सुरक्षित रहता है, जहां पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होता, वहां लक्ष्मी बिना बुलाए ही निवास करती हैं॥21॥ भाव यह है कि जिस देश में मूर्खों की जगह विद्वानों का सम्मान होता है, जहां समुचित अन्न भंडार रहता है, जहां परिवार और घर-गृहस्थी में प्यार बना रहता है, वहां सुख-समृद्धि बराबर बनी रहती है। 51 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

॥ अथ चतुर्थ अध्याय ॥ आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च। पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥ यह निश्चित है कि शरीरधारी जीव के गर्भकाल में ही आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु, इन पांचों की सृष्टि साथ-ही-साथ हो जाती है॥1॥ इस नीति के द्वारा चाणक्य मानव-जीवन की सभी बातों को पूर्व निर्धारित मानते हैं। उनका मत है कि मनुष्य जीवन की अवधि, मृत्यु, सुख-दुःख, मान-अपमान, विद्या और सम्पत्ति का भोग सभी कुछ ईश्वर के अधीन है। बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता। अतः सब कुछ उस पर छोड़कर मनुष्य को अपने कर्म में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः। ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥ साधु-महात्माओं के संसर्ग से पुत्र, मित्र, बंधु और जो अनुराग करते हैं, वे संसार-चक्र से छूट जाते हैं और उनके कुल-धर्म से उनका कुल उज्ज्वल हो जाता है॥2॥ 52 CC0. Vasishthe Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

भाव यह है कि जिस कुल में साधु-महात्मा जैसा कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता है, उसके संसर्ग से बाकी सभी लोगों का भी सांस्कारिक परिष्कार हो जाता है। दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी। शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसंगतिः॥ जिस प्रकार मछली देख-रेख से, कछुवी चिड़िया स्पर्श से (चोंच द्वारा) सदैव अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं, वैसे ही अच्छे लोगों के साथ से सर्व प्रकार से रक्षा होती है॥३॥ यहां चाणक्य ने सद्-संगति पर जोर दिया है। अच्छे लोगों का साथ होने पर किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सज्जनों का साथ सदैव सुखकारी और हितरक्षक होता है। यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः। तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति॥ यह नश्वर शरीर जब तक निरोग व स्वस्थ है या जब तक मृत्यु नहीं आती, तब तक मनुष्य को अपने सभी पुण्य-कर्म कर लेने चाहिए क्योंकि अंत समय आने पर वह क्या कर पाएगा॥४॥ समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। समय गुजरता जाता है इसीलिए किसी कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। कहा भी है—‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, फेर करेगा कब?’ अतः समय का कोई भरोसा नहीं। जो पुण्य-कर्म करने हैं, अभी कर लेने चाहिए, फिर समय नहीं मिलेगा। कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी। प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥ विद्या कामधेनु के समान सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाली 53

है। विद्या से सभी फल समय पर प्राप्त होते हैं। परदेस में विद्या माता के समान रक्षा करती है। विद्वानों ने विद्या को गुप्त धन कहा है, अर्थात विद्या वह धन है जो आपातकाल में काम आती है। इसका न तो हरण किया जा सकता है न ही इसे चुराया जा सकता है॥5॥ विद्या सभी प्रकार से सुरक्षित और समय पड़ने पर रक्षा करने वाली है। इसे जितना दिया जाता है, यह उतनी ही बढ़ती है। इससे बड़ा धन कोई दूसरा नहीं है। इसे न ही कोई छीन सकता और न ही कोई आपस में बांट सकता। वरमेको गुणी पुत्रो निर्गुणैश्च शतैरपि। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥ सैकड़ों अज्ञानी पुत्रों से एक ही गुणवान पुत्र अच्छा है। रात्रि का अंधकार एक ही चंद्रमा दूर करता है, न कि हजारों तारें॥6॥ इसी प्रकार के तीन श्लोक अध्याय तीन में संख्या 14, 16 और 17 भी हैं। आचार्य चाणक्य ने इस प्रकार बार-बार गुणी पुत्र के होने की बात कही है। गुणी पुत्र जीवन-भर सुख देने वाला होता है। मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः। मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥ बहुत बड़ी आयु वाले मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही जो मर गया, वह अच्छा है क्योंकि मरा हुआ पुत्र कुछ देर के लिए ही कष्ट देता है, परंतु मूर्ख पुत्र जीवन-भर जलाता है॥7॥ मूर्ख पुत्र के विषय में चाणक्य ने अध्याय तीन में श्लोक संख्या 15 में भी यही बात कही है। मूर्ख पुत्र जीवन-भर का दुःख होता है। 54 CC0. Vasishta Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥ बुरे ग्राम का वास, नीच कुल की सेवा, बुरा भोजन, झगड़ालू स्त्री, मूर्ख लड़का, विधवा कन्या, ये छः बिना अग्नि के भी शरीर को जला देते हैं॥8॥ चाणक्य का कथन है कि ऐसे गांव में कभी नहीं रहना चाहिए, जहां के लोग दुःख में साथ देने वाले न हों। नीच व्यक्ति की नौकरी में सदैव अपमान ही झेलना पड़ता है। खराब भोजन स्वास्थ्य को खराब कर देता है। कलह करने वाली स्त्री परिवार को नर्क बना देती है, मूर्ख पुत्र अपनी अज्ञानता से बार-बार मुसीबतें खड़ी करने वाला होता है और घर में विधवा बेटी का दुःख जीवन-भर जलाता रहता है। ये छः बिना अग्नि के भी जीवन-भर शरीर को चिंता की अग्नि से जलाते रहते हैं। किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी। कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न भक्तिमान्॥ उस गाय से क्या लाभ, जो न बच्चा जने और न दूध ही दे। ऐसे पुत्र के जन्म लेने से क्या लाभ, जो न तो विद्वान हो, न किसी देवता का भक्त हो॥9॥ भाव यह है कि दूध देने वाली गाय के समान ही ऐसे पुत्र की कामना की गई है जो विद्वान भी हो और ईश्वर में आस्था रखने वाला भी हो। ऐसा पुत्र सदैव सुख देने वाला और मां-बाप का नाम रोशन करने वाला होता है। संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः। अपत्यं च कलत्रं च सतां संगतिरेव च॥ इस संसार में दुःखों से दग्ध प्राणी को तीन बातों से 55 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है—सुपुत्र से, पतिव्रता स्त्री से और सद्‍संगति से॥10॥ संसार दुःखों का सागर है। यहां हर पल कोई-न-कोई दुःख मनुष्य को सताता ही रहता है। ऐसे दुःखमय संसार में यदि उसे सुपुत्र, पतिव्रता स्त्री और सज्जनों की संगति मिल जाए तो उसे चिंता, दुःख व अशान्ति से बहुत राहत मिल सकती है। सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः। सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥ राजा लोग एक ही बार बोलते हैं (आज्ञा देते हैं), पंडित लोग किसी कर्म के लिए एक ही बार बोलते हैं (बार-बार श्लोक नहीं पढ़ते), कन्याएं भी एक ही बार दी जाती हैं। ये तीन एक ही बार होने से विशेष महत्त्व रखते हैं॥11॥ राजा का, विद्वान का और कन्या के पिता का वचन अथवा कथन अटल होता है। इनके वचन लौटाए नहीं जा सकते। इसी प्रकार अच्छे कर्म के लिए बार-बार नहीं कहा जाता। एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः। चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणः॥ तपस्या अकेले में, अध्ययन (पढ़ाई) दो के साथ, गाना तीन के साथ, यात्रा चार के साथ, खेती पांच के साथ और युद्ध बहुत से सहायकों के साथ होने पर ही उत्तम होता है॥12॥ आचार्य चाणक्य ने उक्त श्लोक के माध्यम से जानकारी दी है कि मनुष्य को तप अर्थात ईश्वरभक्ति करनी हो तो उसे एकांत स्थान खोजना चाहिए। अध्ययन दो व्यक्ति मिलकर करें। मिलकर अध्ययन करने का लाभ यह है कि आपस में अध्ययन संबंधी विषय पर विचार-विमर्श भी साथ-साथ चलता रह सकता है। गाने के विषय में तीन लोगों की महत्ता 56