भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

उपशम-प्रकरण ] * भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और प्रह्लादको तत्त्वज्ञानका उपदेश देना * २९५

परित्याग मत करो । ये हमलोग हैं । ये पर्वत हैं । ये प्राणी हैं । यह तुम हो । यह जगत् है । यह आकाश है । ये सभी जब प्रलयपर्यन्त रहनेवाले हैं, तब तुम भी तबतक इस शरीरको कायम रक्खो । जिसकी बुद्धि स्वात्मतत्त्वके विचारसे ऊबती नहीं, उस यथार्थदर्शी तत्त्वज्ञानीका जीवन शोभा देता है । जिसका अहम्भाव नष्ट हो गया है और जिसकी बुद्धि स्वार्थमें लिप्त नहीं है तथा जिसका सम्पूर्ण पदार्थोंमें समभाव है, उसका जीवन सुन्दर है । जो राग-द्वेषविहीन अतएव अन्तःशीतल बुद्धिसे साक्षीकी भाँति इस जगत्को देखता है, उसीके जीवनकी शोभा होती है । जो सत्य दृष्टिका अवलम्बन करके वासना-रहित होकर लीलापूर्वक इस जगत्-व्यवहारको करता है, उसका जीवन धन्य है । जो लोकव्यवहार करता हुआ भी न तो अनुकूलकी प्राप्तिसे अन्तःकरणमें प्रसन्नताका अनुभव करता है और न प्रतिकूलकी प्राप्ति होनेपर उद्विग्न होता है, उसीका जीवन प्रशंसनीय है । जिसके गुणोंके सुननेपर, स्वरूपका दर्शन करनेपर और जिसकी याद आ जानेपर प्राणियोंको आनन्द प्राप्त होता है, उसीका जीवन सार्थक है ।

"असुरेश ! इस वर्तमान देहकी स्थिरताको लोग जीवन कहते हैं और देहान्तरकी प्राप्तिके लिये इसके परित्यागको मरण कहा गया है; किंतु महामते ! तुम तो इन दोनों ही जन्म-मरणरूप पक्षोंसे रहित हो, अतएव इस लोकमें वस्तुतः न तो तुम्हारा जन्म है और न मरण ही । शत्रुसूदन ! यह सब तो मैंने तुम्हें समझानेके लिये कहा है । सर्वज्ञ ! तुम्हारा तो न कभी जन्म होता है और न तुम कभी मरते ही हो; क्योंकि तुम तो देहदृष्टिसे सर्वथा रहित हो, इसी कारण देहमें स्थित रहते हुए भी तुम विदेह हो । तुम्हें परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो गया है, अतएव तुम प्रबुद्ध हो गये हो । भला, प्रबुद्ध हुए पुरुषोंका शरीरसे क्या सम्बन्ध है ? यह परिच्छिन्न देह तो केवल अज्ञानियोंकी दृष्टिमें ही है अर्थात् 'देह मैं हूँ' ऐसा अभिमान अज्ञानियोंको ही होता है । तुम्हारी बुद्धि तो सर्वदा एकमात्र परमात्मामें ही लीन रहती है, अतएव तुम चिदाकाशसे संयुक्त हो । इसीलिये सब कुछ तुम्हीं हो । तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष प्रलयकालमें उत्पातसूचक वायुओंके बहनेपर, प्रलयाग्निके धधकने तथा पर्वतोंके ढह जानेपर भी नित्य परमात्मामें ही स्थित रहता है । संसारके सभी प्राणी स्थित रहें अथवा सब-के सब चले जायँ, उनका विनाश हो जाय अथवा उनकी वृद्धि हो, तत्त्वज्ञानी तो परमात्मामें ही स्थित रहता है, उससे विचलित नहीं होता । परमात्मा इस शरीरका विनाश हो जानेपर न तो नष्ट होता है, न इसके वृद्धिगत होनेपर बढ़ता है और न इसके चेष्टा करनेपर चेष्टाशील ही होता है । तब 'इस देहको धारण करनेवाला देही मैं हूँ' चित्तके ऐसे अज्ञानके नष्ट हो जानेपर 'मैं इसका त्याग करता हूँ अथवा नहीं करता' ऐसी निरर्थक कल्पना क्यों उत्पन्न होती है ? तात ! जिन्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो चुकी है, उनके हृदयमें 'मैं इस कार्यको समाप्त करके इसे करूँगा और इसका त्याग करके इसे छोड़ूँगा' ऐसे संकल्पोंका सर्वथा अभाव हो जाता है । ज्ञानी पुरुष इस जगत्में शास्त्रोक्त सारे कर्मोंको करते हुए भी कुछ नहीं करते और उनका कभी भी अनुष्ठान न करनेपर वे सदा अकर्तारूपसे ही स्थित रहते हैं । इस प्रकार संसारमें कर्तृत्व और भोक्तृत्वका उपशम हो जानेपर एकमात्र शान्ति ही शेष रह जाती है और वही शान्ति जब सुदृढ़ हो जाती है, तब विद्वान्लोग उसे मुक्ति नामसे पुकारते हैं । ग्राह्य-ग्राहक सम्बन्धका विनाश होनेपर परम शान्तिका उदय होता है । वही शान्ति जब स्थिरताको प्राप्त हो जाती है, तब मोक्ष नामसे कही जाती है । जिनका चित्त परमात्मामें ही संलग्न है, ऐसे ज्ञानीजन संसारके रमणीय विषयभोगोंके प्राप्त होनेपर न तो प्रसन्न होते हैं और न मनके विपरीत

२९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दुःखोंके आ पड़नेपर उद्विग्न ही होते हैं । अर्थात् सुख-दुःखमें उनकी समान स्थिति रहती है । महात्मन् ! तुम परमात्माके परमपदमें स्थित होकर ब्रह्माके एक दिन ( इस कल्पके अन्त ) तक इस पातालमें ही विविध गुणोंसे युक्त राज्यलक्ष्मीका उपभोग करके अविनाशी परमपदको प्राप्त होओ ।"

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं —रघुनन्दन ! जब जगद्-रूपी रत्नोंके आकर तथा त्रैलोक्यरूपी अद्भुत पदार्थोंको प्रदर्शन करानेवाले भगवान् विष्णुने चन्द्रकिरण-सदृश शीतल वाणीद्वारा इस प्रकार कहा, तब जिसके नेत्र-कमल आनन्दवश प्रफुल्लित हो उठे थे तथा जिसने मननक्रम ग्रहण कर लिया था, उस धैर्यशाली प्रह्लाद नामक देहने हर्षपूर्वक यों कहना आरम्भ किया ।

प्रह्लादने कहा —भगवन् ! आपकी कृपासे मुझे तत्त्वज्ञानद्वारा भलीभाँति स्वरूपावस्थिति प्राप्त हो गयी है, जिससे मैं समाधि अथवा व्युत्थानावस्था—दोनोंमें वास्तविकरूपसे सदा ही सम हूँ । देवाधिदेव ! मैंने चिरकालतक विशुद्ध बुद्धिद्वारा अपने हृदयमें आपका साक्षात्कार किया है । देव ! सौभाग्यकी बात है कि अब पुनः बाहर नेत्रोंसे भी आपका प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा हूँ । महेश्वर ! मैं जो समस्त संकल्पोंसे रहित इस अनन्त दृष्टिमें स्थित था, वह शोक, मोह, वैराग्य-चिन्ता, देहत्यागके प्रयोजन अथवा संसारके भयसे नहीं था; क्योंकि जब एक ही विज्ञानानन्दघन परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है, तब शोक, हानि, देह, संसार, स्थिति और भय-अभय कहाँसे प्राप्त होंगे । परन्तु परमेश्वर ! 'हाय ! मैं विरक्त हो गया हूँ, अतः इस संसारका त्याग करता हूँ' इस प्रकारकी अज्ञानियोंद्वारा की गयी चिन्ता हर्ष-शोकरूप विकार उत्पन्न करनेवाली होती है । यह सुख है, यह दुःख है; यह मेरा है, यह मेरा नहीं है—यों द्विधाग्रस्त चित्त मूर्खका ही विनाशक होता है, पण्डितका नहीं । मैं अन्य हूँ और यह अन्य है—ऐसी वासना इस जगत्‌में उन अज्ञानी प्राणियोंको ही प्रभावित करती है, जो तत्त्वज्ञानसे बहुत दूर हैं । कमलनयन ! जब सभी प्राणियोंमें आत्मरूपसे आप ही व्याप्त हैं, तब ग्रहण-त्यागके पक्षका अवलम्बन करनेवाली कल्पना कहाँसे हो सकती है । देवेश्वर ! समाधिकालमें तो मैं भाव-अभावसे परे रहकर ग्रहण-त्यागसे रहित था; परन्तु इस समय प्रबुद्ध होकर वही कार्य करनेके लिये उद्यत हूँ, जो आपको रुचिकर है । भगवन् ! आप तो वे ही पुण्डरीकाक्ष नारायण हैं, जिनकी तीनों लोकोंमें पूजा होती है; अतः मेरेद्वारा स्वभावतः प्राप्त हुई पूजाको ग्रहण कीजिये । यों कहकर दानवराज प्रह्लादने उन भुवनाधिपति भगवान् गोविन्दकी—जिनके अंदर त्रिलोकी वर्तमान थी तथा जो शङ्ख-चक्र आदि आयुधों, अप्सरा-समूह, देवगण और पक्षिराज गरुड़के साथ सामने खड़े थे—पूजा की । पूजोपरान्त चरणोंमें पड़े हुए प्रह्लादसे भगवान् लक्ष्मीपतिने कहा ।

श्रीभगवान् बोले—दानवाधीश ! उठो और तबतक इस सिंहासनपर बैठे रहो, जबतक मैं शीघ्र स्वयं अपने हाथसे ही तुम्हारा राज्याभिषेक करता हूँ । साथ ही पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर जो ये साध्य, सिद्ध और देवगण यहाँ आये हुए हैं, ये सब-के-सब तुम्हारी मङ्गलकामना करें । यों कहकर कमलनयन भगवान् नारायणने प्रह्लादको सिंहासनपर बैठा दिया । तदनन्तर अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न श्रीहरिने समस्त महर्षि-समुदाय, सारे सिद्धगण, विद्याधर और लोकपालोंको साथ लेकर इन महान् असुर प्रह्लादको आवाहन किये गये क्षीराब्धि आदि महासागरों, गङ्गा आदि सरिताओं और सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे सींचकर दैत्यराज्यको उसी प्रकार अभिषिक्त कर दिया, जैसे पूर्वकालमें देवगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए इन्द्रका स्वर्गलोकके राज्यपर अभिषेक किया था । उस समय अभिषिक्त हुए प्रह्लादकी देवता और असुर—

उपशम-प्रकरण ] * भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और प्रह्लादको तत्त्वज्ञानका उपदेश देना * २९७

सभी स्तुति कर रहे थे। तब सुरासुरवन्दित भगवान् मधुसूदन उनसे इस प्रकार बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद ! जबतक सुमेरुगिरि, पृथ्वी तथा सूर्य और चन्द्रमाका मण्डल कायम रहेगा, तबतक तुम राज्य करोगे और तुम्हारे समस्त गुणोंकी प्रशंसा होगी। तुम राग, भय और क्रोधसे रहित होकर इष्ट-अनिष्ट फलोंका परित्याग करके समतायुक्त बुद्धिसे इस राज्यका भलीभाँति पालन करो। शत्रु-प्रजा आदिके ऊपर निग्रह-अनुग्रह आदि यथावसर प्राप्त हुई दृष्टियोंसे देश, काल और क्रियाके अनुरूप प्राप्त हुए कर्तव्यका तुम न्यायपूर्वक पालन करो और राग-द्वेष आदि विषमताका त्याग करके समबुद्धि बने रहो। आत्मा देहसे अतिरिक्त है—इस भावसे लाभ-हानिमें सम तथा इदंता ममतासे रहित कार्य करते हुए भी तुम इस जगत्‌में बन्धनको नहीं प्राप्त होओगे। जगद् व्यवहारको तो तुमने देख ही लिया है और उस अनुपम परमपदका अनुभव भी तुम्हें प्राप्त हो गया है। इस प्रकार तुम्हें देश-कालानुरूप सभी वस्तुएँ ज्ञात हैं। अब दूसरा और क्या उपदेश दिया जाय। अर्थात् व्यवहार और परमार्थ—दोनोंमें तुम कुशल हो, अतः अब तुम्हें उपदेशकी आवश्यकता नहीं है। राग, भय और क्रोधसे रहित तुम्हारे राजा होनेपर अब देवताओं-द्वारा प्राप्त दुःख न तो असुरोंमें टिक सकेगा और न उनका संहार ही कर सकेगा। आजसे देवताओं और दानवोंका युद्ध नहीं होगा, जिससे जगत् स्वस्थ हो जायगा।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! प्रह्लादसे ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् नारायण देवता, किन्नर और मनुष्योंके साथ उस दैत्यसदनसे चल पड़े। उस समय प्रह्लाद आदि असुर पीछेसे उनपर अञ्जलि भर-भरकर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे, जिससे गरुडके पंखका पिछला भाग पुष्पोंसे आच्छादित हो गया। इस प्रकार क्रमश चलते हुए वे क्षीरसागरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने देवगणोंको विदा कर दिया और स्वयं शेषशय्यापर स्थित हो गये। इस प्रकार शेषशय्यापर विष्णु, स्वर्गलोकमें देवताओंसहित इन्द्र और पातालमें दानवराज प्रह्लाद—तीनों संतापरहित होकर स्थित हुए। श्रीराम ! प्रह्लादकी ज्ञान-प्राप्ति सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली तथा अमृतके समान शीतल है। उसका वर्णन मैंने तुम्हें सुना दिया। संसारमें जो मनुष्य—चाहे वे घोर-से घोर पातकी ही क्यों न हों—विवेकपूर्वक उसका विचार करेंगे, वे शीघ्र ही परमपदको प्राप्त हो जायँगे। अज्ञान ही पाप कहलाता है और उस अज्ञानका नाश विवेकपूर्वक विचार करनेसे होता है; इसलिये पापका समूल विनाश करनेवाले विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये। प्रह्लादकी इस सिद्धिका विवेक-पूर्वक विचार करनेवाले लोगोंके पूर्वके सात जन्मोंमें किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! महामनस्वी प्रह्लादका मन तो परमपदमें तल्लीन था, वह पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर कैसे प्रबुद्ध हुआ? यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—निर्दोष स्वरूपवाले राम ! लोकमें दो प्रकारकी मुक्ति होती है—एक सदेहमुक्ति अर्थात् जीवन्मुक्ति और दूसरी विदेहमुक्ति। इन दोनोंका विभाग इस प्रकार है, सुनो। जिस अनासक्त बुद्धिवाले पुरुषकी इष्टानिष्ट कर्मोंके ग्रहण-त्यागमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती अर्थात् जिसकी इच्छाका सर्वथा अभाव हो गया है, ऐसे पुरुषकी स्थितिको तुम जीवन्मुक्त-अवस्था—सदेहमुक्ति समझो। फिर देहका विनाश होनेपर पुनर्जन्मसे रहित हुई वही जीवन्मुक्ति विदेहमुक्ति कही गयी है। श्रीराम ! जिन्हें विदेहमुक्तिकी प्राप्ति हो गयी है, वे फिर जन्म धारण करके दृश्यताको नहीं प्राप्त होते—ठीक उसी तरह, जैसे भुना हुआ

२९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बीज जमता नहीं है । महाबाहु राम ! प्रह्लादके अन्तःकरणमें शुद्ध सत्त्वमयी वासना स्थित थी, वह शङ्खध्वनि होते ही उद्बुद्ध हो उठी । अपनी उसी वासनासे प्रह्लादको बोध प्राप्त हुआ था । श्रीहरि ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये उनके मनमें जैसा संकल्प होता है, वह शीघ्र ही उसी रूपमें मूर्त हो जाता है; क्योंकि परमात्मा ही सबके कारण हैं । भगवान् वासुदेवने ज्यों ही ऐसा संकल्प किया कि प्रह्लाद प्रबुद्ध हो जाय, त्यों ही वह क्षणमात्रमें उठ बैठा । अर्थात् भगवान्‌के संकल्पसे ही प्रह्लाद पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनिसे प्रबुद्ध हो गया । भगवान् वासुदेवने निजी स्वार्थके बिना ही प्राणियोंके कल्याणके हेतु अपने आत्मामें ही जगत्‌की सृष्टिके लिये विष्णुरूपसे शरीर धारण किया है । परमात्माके साक्षात्कारसे शीघ्र ही भगवान् माधवका दर्शन प्राप्त हो जाता है और उन माधवकी आराधनासे शीघ्र ही निर्गुण-निराकार परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है ।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं; अतः आपके शुद्ध वचनरूपी किरणोंसे हम उसी प्रकार आह्लादित हुए हैं, जैसे चन्द्रमाकी रश्मियोंके स्पर्शसे अनाजके पौधे प्रफुल्लित हो जाते हैं । परंतु गुरुदेव ! यदि पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न करनेसे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है तो भगवान् माधवके वरदान बिना प्रह्लाद अपने पुरुषार्थसे ही क्यों नहीं प्रबुद्ध हुआ ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! महामनस्वी प्रह्लाद-ने जिन-जिन पदार्थोंको प्राप्त किया था, वे सभी उसे अपने पुरुषार्थसे ही मिले थे । उनकी प्राप्तिमें दूसरा कोई कारण नहीं है । ( क्योंकि प्रह्लादने परम पुरुषार्थसे जो भक्ति की, उसीसे भगवान्‌ने उनको वर दिया; इसलिये भगवान्‌का वर मिलना भी अपना पुरुषार्थ ही है । ) जो विष्णु है, वही सबका आत्मा है और जो सबका आत्मा है, वही विष्णु है । इस प्रकार पुष्प और उसकी सुगन्धकी भाँति आत्मा और नारायण भिन्न नहीं हैं । पहले-पहल प्रह्लाद नामक आत्मा ही अपने-आप अपनी परम शक्तिसे ही विष्णुभक्तिमें नियुक्त हुआ । फिर उसने आत्मभूत विष्णुमे ही स्वयं यह वर प्राप्त किया और स्वयं ही अपने मनको विचारशील बनाकर स्वयं ही आत्मज्ञान प्राप्त किया । इस प्रकार कभी तो आत्मा अपने आप ही अपनी शक्तिसे प्रबुद्ध हो जाता है और कभी भक्तिरूपी प्रयत्नसे प्राप्त होनेवाले विष्णुरूपसे प्रबोधित किया जाता है । इसलिये किसीको जहाँ-कहीं भी जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब उसे अपनी सामर्थ्यरूप प्रयत्नसे ही मिलता है; कहीं भी किसी अन्य कारणसे उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।

( सर्ग ३९-४९ )


मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा, मनकी सर्प और विषवृक्षसे तुलना, उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो भगवत्प्राप्तिके साधनरूप सम्पूर्ण अङ्गोंका उच्छेदक तथा यों वेगपूर्वक घूमता रहता है, उस मायाचक्रका निरोध कैसे किया जाय ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! यह संसाररूपी मायाचक्र नित्य भ्रमणशील तथा भ्रान्तिदायक है। तुम चित्तको इस चक्रकी महानाभि समझो । जब पुरुष प्रयत्नपूर्वक बुद्धिद्वारा इस चित्तको स्तम्भित कर देता है, तब जिसकी नाभि पकड़ ली गयी है, ऐसा यह मायाचक्र शीघ्र ही आगे बढ़नेसे रुक जाता है । इस चित्त-निरोधरूपी युक्ति के बिना आत्माको अनन्त दुःखोंकी प्राप्ति हो रही है, परंतु इस उपर्युक्त दृष्टिके प्राप्त होनेपर तुम सारे-के-सारे दुःखोंको क्षणमात्रमें नष्ट हुआ ही

उपशम-प्रकरण ] * मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा * २९९


समझो। यह संसार एक महाभयंकर रोग है। चित्त-निरोध ही इस रोगकी परमोत्तम औषध है। इस औषधके अतिरिक्त अन्य किसी प्रयत्नसे उस व्याधिकी शान्ति नहीं होती। जैसे घड़ेके भीतर घटाकाश रहता है, परन्तु घड़ेके नष्ट होनेपर घटाकाश नहीं रह जाता, उसी तरह यह संसार चित्तके अंदर ही है, अतः चित्तका नाश होनेपर संसार भी विनष्ट हो जाता है। यह चित्त जब भूत और भविष्यके पदार्थोंका चिन्तन न करके वर्तमान समयका बाह्य बुद्धिद्वारा अनायास ही उपयोग करने लगता है, उसी क्षण अचित्तताको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि चित्तकी वृत्तियाँ तभीतक रहती हैं जबतक संकल्पकी कल्पना बनी रहती है—ठीक उसी तरह, जैसे जबतक मेघका विस्तार रहता है, तभीतक आकाशमें जलके अणु वर्तमान रहते हैं। संकल्प-कल्पना भी तभीतक रहती है, जबतक चेतन जीवात्मा मनके साथ है। रघुनन्दन ! यदि ऐसी भावना की जाय कि चेतन जीवात्मा मनसे पृथक् है तो जैसे सिद्ध पुरुषोंमें मूल अविद्यासहित वासनाओंका ज्ञानद्वारा जलकर अत्यन्ताभाव हो जाता है, उसी तरह तुम अपने संसारके मूलों—वासनाओंको मूलाविद्यासहित जलकर भस्म हुआ ही समझो। चित्तसे शून्य हुआ चेतन प्रत्यक्‌चेतनं अर्थात् शुद्ध आत्मा कहा जाता है। वास्तवमें तो निर्मनस्क रहना उसका स्वभाव ही है; क्योंकि उसमें संकल्परूपी मल नहीं है। वह शुद्ध आत्मा ही वास्तवमें सत्यता है; वही कल्याणरूपता सच्चिदानन्द परमात्माकी प्राप्तिरूप अवस्था, सर्वज्ञता और वास्तविक दृष्टि है। किंतु जिस समय उसका विनाशशील मनके साथ संयोग बना रहता है, उस समय उसकी उपर्युक्त स्थिति नहीं रहती; क्योंकि जहाँ मन रहता है, वहाँ उसके संनिकट अनेक प्रकारकी आशाएँ और सुख-दुःख उसी प्रकार सदा आते रहते हैं, जैसे श्मशानभूमिमें कौए मँडराया करते हैं। परंतु जब परमार्थ वस्तुरूप परमात्माके तत्त्वका ज्ञान हो जाता है, तब उस पुरुषके मनके संकल्पमें आशा आदि सम्पूर्ण भावोंकी व्यवस्थापिका संसाररूपी लताका बीज उत्पन्न ही नहीं होता; क्योंकि उस समय उसका मन भुने हुए बीजके समान हो जाता है। शास्त्राध्ययन और सज्जनोंकी संगतिका निरन्तर अभ्यास करनेसे सांसारिक पदार्थोंकी अवास्तविकताका ज्ञान होता है, अर्थात् जगत्‌के पदार्थ वास्तवमें असत् हैं—ऐसा अनुभव होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक परम प्रयत्नके साथ मनको अविवेकसे हटाकर उसे बलात्कारसे शास्त्राध्ययन और सत्पुरुषोंके सङ्गमें लगाना चाहिये; क्योंकि परमात्माका साक्षात्कार होनेमें, शुद्ध आत्मा ही प्रधान कारण है।

श्रीराम ! अपना आत्मा ही अपनेद्वारा अनुभूत दुःखोंको त्याग देनेकी इच्छा करता है, अतएव परमात्माका साक्षात्कार होनेमें एकमात्र शुद्ध आत्मा ही मुख्य हेतु कहा गया है। इसलिये तुम बोलते हुए, त्याग करते हुए, ग्रहण करते हुए तथा आँखोंको खोलते और मींचते हुए भी अचिन्त्य, अनन्त, नित्यविज्ञानानन्दघन परमात्मामें स्थित रहो। इसी प्रकार बाल्य, यौवन और वृद्धावस्थामें, दुःखोंमें, सुखोंमें तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थाओंमें तुम सदा-सर्वदा अपने वास्तविक सच्चिदानन्द-स्वरूपमें बने रहो। जो आत्मज्ञानसम्पन्न एवं अमृतस्वरूप परमार्थ-तत्त्वका अनुभव करनेवाला है, उसके लिये हलाहल विष भी अमृतके समान फलदायक हो जाता है। जिस समय निर्मल एवं अखण्ड चैतन्यका ज्ञान नहीं रहता, उस समय संसाररूपी भ्रमका कारणस्वरूप महामोह वृद्धिको प्राप्त होता है और जब उस निर्मल एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन परमात्मामें दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब संसार-भ्रमका कारणभूत मोह सर्वथा विनष्ट हो जाता है। श्रीराम ! जो अद्वितीय आनन्दरूप ब्रह्ममें स्थित होकर अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपका साक्षात्कार करनेवाला है, उसके लिये खादिष्ट रसायन

३०० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भी तृण-तुल्य हो जाता है। परमात्माके तत्त्वको जानने- वाला महापुरुष समस्त प्रकाशोंमें, सभी प्रभावोंमें, समस्त बलवानोंमें, सम्पूर्ण महान् व्यक्तियोंमें तथा सभी उन्नतिशाली मनुष्योंमें परम उन्नत होता है। जिस परमात्माकी प्रभासे सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, मणि और तारे आदि प्रकाशित होते हैं, उस जगदीश्वरका जिन महापुरुषोंको ज्ञान हो गया है, वे भी सूर्यादिकी भाँति जगत्‌में सुशोभित होते हैं। परंतु श्रीराम ! जो मानव परमात्मविषयक ज्ञानसे हीन हैं, वे पृथ्वीके दरारोंमें रहनेवाले कीड़ों, गदहों एवं अन्य तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जीवोंसे भी अत्यन्त तुच्छ माने जाते हैं। आत्मज्ञान- विहीन पुरुषकी सारी चेष्टाएँ दुःखदायिनी होती हैं। वह भूतलपर चलता-फिरता हुआ भी मुर्दा ही है। इसलिये आत्मज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह भोगोंके रसोंमें आसक्त न होते हुए उनके उपभोगके तिरस्कारद्वारा मनको अत्यन्त सूखे हुए पत्तेके समान समयानुसार धीरे-धीरे कृश बना डाले; क्योंकि यह मन अनात्मामें आत्मभाव, देहमात्रमें ऐसी आस्था, पुत्र, कलत्र और कुटुम्बकी ममता, अहंकारके विकास, ममतारूपी मलमें सने रहना, 'यह मेरा है' ऐसी भावना, जरा-मरणरूपी दुःख, व्यर्थ ही उन्नतिको प्राप्त हुए काम-क्रोधादि दोषरूपी सर्पोंके विवररूप संसारकी ममता, आधि-व्याधिकी अभिवृद्धि, संसारकी रमणीयतामें विश्वास, हेयोपादेयके प्रयत्न, स्त्री-पुत्र आदिके प्रति स्नेह तथा रत्नों और स्त्रियोंके आपातकमणीय लाभसे उत्पन्न हुए धनके लोभसे स्थूलताको प्राप्त होता है। यह चित्त सर्पके समान है, जो दुराशारूपी दूधके पीनेसे, भोगरूपी वायुके बलसे, आदरप्रदानसे तथा नाना प्रकारके विषयोंमें संचरण करनेसे मोटा-ताजा हो जाता है। आना और जाना—उत्पत्ति विनाश ही जिनका स्वरूप है तथा जो चित्तकी विषमताको सूचित करनेवाले हैं, ऐसे भीषण भोगोंका उपभोग करनेसे चित्त स्थूलभावको प्राप्त हो जाता है।

राघव ! यह चित्त विषवृक्षके समान है, जो चिरकाल- से शरीररूपी बुरे गड्ढेमें उगा हुआ है। आशाएँ ही इसकी विशाल शाखाएँ और विकल्प ही इसके पत्ते हैं। अनेक प्रकारकी चिन्ताएँ ही इसकी लंबी-लंबी मञ्जरियाँ हैं। कामोपभोगोंके समूह ही इसमें खिले हुए पुष्प हैं। यह जरा-मरण और व्याधिरूपी फलोंके भारसे झुका हुआ है। इस पर्वताकार अद्भुत वृक्षको तुम निःशङ्क होकर हठपूर्वक विवेक-विचाररूपी मजबूत आरेसे काट डालो। जबतक इस चित्तरूपी पिशाचको—जो अज्ञानरूपी विशालवटवृक्षोंपर विश्राम करनेवाला है, तृष्णा-पिशाची जिसकी परिचर्या करती है और जो चेतनरहित सैकड़ों देह धारण करके अपनी कल्पनारूपी अटवीमें चिरकालसे भटक रहा है—विवेक, वैराग्य, गुरुसन्निधि, प्रयत्न और मन्त्र आदि स्वतन्त्र उपायोंद्वारा चेतन जीवात्माके निवास- स्थानरूप अपने हृदयसे हटाया नहीं जायगा, तबतक इस जगत्‌में आत्मसिद्धिकी प्राप्ति कैसे हो सकती है।

रघुनन्दन ! मेरे वाक्योंके एकमात्र तत्त्वज्ञ तो तुम्हीं हो, इसीलिये केवल मेरे वाक्यार्थोंकी भावनासे तुम्हें सुख मिलना है। वत्स राम ! पूर्वकालमें उद्दालक मुनिको पञ्च महाभूतोंके विचार विमर्शसे जिस प्रकार परमोत्कृष्ट एवं अविनाशी दृष्टि प्राप्त हुई थी, वह वृत्तान्त तुम्हें कहता हूँ; सुनो। प्राचीनकालमें पर्वतराज गन्धमादनके किसी भूभागमें एक ऊँचे शिखरपर एक मुनि निवास करते थे। उनका नाम उद्दालक था। अभी उनकी जवानी नहीं आयी थी। वे स्वाभिमानी और महाबुद्धिमान् थे तथा मौन रहकर घोर तपस्यामें संलग्न थे। पहले तो उनकी बुद्धि मन्द थी। उनमें विवेक-विचार भी नहीं था। उन्हें परमपदरूप शान्तिकी प्राप्ति भी नहीं हुई थी तथा वे परमात्माके तत्त्वसे भी अनभिज्ञ थे; परंतु उनका अन्तःकरण शुभ भावोंसे युक्त था। तदनन्तर तपस्या, नियमपूर्वक शास्त्रार्थ-चिन्तन और अभ्यासके पाकरूप कर्मोंसे उनके हृदयमें विवेक जाग उठा। उनका मन तो शुद्ध था ही, अतः उनकी बुद्धि इस

उपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०१

संसाररूपी रोगको देखकर भयभीत हो उठी। तब वे किसी समय एकान्तमें बैठकर इस प्रकार विचार करने लगे—

‘जिसमें विश्राम प्राप्त हो जानेपर शोकका अत्यन्ताभाव हो जाता है तथा जिसे पा लेनेपर पुनर्जन्म नहीं होता, वह प्राप्त करने योग्य प्रधान वस्तु क्या है ! मैं मननरहित परम पवित्र पदमें चिरकालके लिये कब विश्रामको प्राप्त होऊँगा ? जैसे कलोल करती हुई चञ्चल तरङ्गे समुद्रमें ही विलीन हो जाती हैं, उसी तरह भोगतृष्णाएँ कब मेरे अंदर ही शान्त हो जायँगी ? कब मैं परमपदमें विश्राम-को प्राप्त हुई अपनी बुद्धिद्वारा ‘यह कार्य करके पुनः इस दूसरे कार्यको भी करना है’ ऐसी व्यर्थ कल्पनाका भीतर-ही-भीतर उपहास करूँगा ? मेरे मनमें स्थित हुए भी विकल्प-समूह कमलदलपर पड़े हुए जलकी तरह सम्बन्धरहित होकर कब चित्तसे विलग हो जायँगे ? अर्थात् संकल्प-विकल्पोंका अभाव कब होगा ? मैं उन्मत्त होकर बहनेवाली तृष्णा-नदीको, जो बहुसंख्यक भीषण

तरङ्गोंसे युक्त है, अपनी परमोत्कृष्ट बुद्धिरूपी नौकासे कब पार कर जाऊँगा ? मैं जगत्के प्राणियोंद्वारा की जानेवाली इस बाह्य प्रवृत्तिको, जो मिथ्या तथा चित्तको व्यग्र कर देनेवाली है, बालकोंकी क्रीड़ाके समान समझकर कब उसका उपहास करूँगा ? मेरा मन, जो विकल्पोंसे विक्षिप्त तथा हिंडोलेकी तरह चञ्चल है, कब शान्ति लाभ करेगा ? मेरा अन्तःकरण परमात्माके समान आकारवाला, सौम्य और सम्पूर्ण पदार्थोंकी स्पृहासे रहित होकर कब शान्तिको प्राप्त होगा ? वह दिन कब होगा, जब मैं अपनी शान्त हुई कल्पनाओंवाली बुद्धिद्वारा बाहर-भीतरसहित इस सम्पूर्ण विश्वको सच्चिदानन्द-रूपसे देखता हुआ अनुभव करूँगा ? कब मैं इष्ट और अनिष्ट तथा हेय और उपादेयसे रहित एवं स्वयंप्रकाश-स्वरूप परमपदमें स्थित होकर अपने अन्तःकरणमें परम शान्तिको प्राप्त होऊँगा ? ऐसा सुअवसर कब आयेगा, जब मैं किसी पर्वतकी कन्दरामें निर्विकल्प-समाधिद्वारा मनके व्यापारसे रहित होकर शिलाकी भाँति निश्चल हो जाऊँगा ? मौनव्रत धारण करके अविचल ध्यानमें निमग्न हुए मेरे मस्तकपर वनकी चिड़ियाँ कब घोंसला बनायेंगी ?’

यों चिन्तापरवश हुए उद्दालक मुनिने वनमें स्थित होकर बारंबार ध्यानका अभ्यास किया, परंतु विषय उनके बंदरके समान चञ्चल चित्तको अपनी ओर खींच ले जाते थे; जिससे प्रसन्नता प्रदान करनेवाली समाधिस्थिरता उन्हें न मिल सकी। उनका मन कभी-कभी विषयासक्त हो जाता था; उस अवस्थामें वह अपने हृदयान्तर्वर्ती तमोगुणका त्याग करके भयभीत पक्षीकी भाँति वहाँसे भाग निकलता था। कभी वह बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंके चिन्तनका परित्याग करके तमोगुणमें लीन होकर निद्रारूपी लंबे कालतक रहनेवाली स्थितिको प्राप्त हो जाता था। यद्यपि वे प्रतिदिन भयानक गुफाओंमें बैठकर अपने मनको ध्यानमग्न करनेमें तत्पर

३०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


थे, फिर भी ध्यानवृत्तियोंमें विघ्न पड़नेके कारण उनका अन्तःकरण अत्यन्त व्याकुल हो गया और शरीर तुच्छ तृष्णा-नदीके तटवर्ती तरङ्गोंके थपेड़ोंसे चञ्चल हो उठा। इस प्रकार जब वे मुनि संकटापन्न हो गये, तब विक्षिप्तचित्त होकर उस पर्वतपर भ्रमण करने लगे।

रघुकुलभूषण राम ! तदनन्तर धर्मात्मा उद्दालक बहुत अन्वेषणके पश्चात् प्राप्त हुई गन्धमादनकी एक रमणीय गुहामें प्रविष्ट हुए। यहाँ उन्होंने न मुरझाये हुए कोमल पत्तोंका एक आसन बनाया, जिसके चारों ओर पुष्पोंके गुच्छे शोभा पा रहे थे। उस आसनके ऊपर उन्होंने एक सुन्दर मृगचर्म फैला दिया। तत्पश्चात् शुद्ध अन्तःकरणवाले उद्दालक अपने मनकी वृत्तियोंको सूक्ष्म बनाते हुए उस आसनपर विराजमान हुए। वहाँ उन्होंने उत्तराभिमुख होकर दोनों एड़ियोंसे अण्डकोषोंको दबाकर ज्ञानीकी भाँति सुदृढ़ पद्मासन लगाया। वे विषयोंकी ओर दौड़ते हुए अपने मनरूपी मृगको वासनाओंसे हटाकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित होना चाहते थे, इसलिये विचार करने लगे—

'अरे मूर्ख मन ! इन सांसारिक वृत्तियोंसे तेरा क्या प्रयोजन है ? क्योंकि बुद्धिमान् लोग ऐसी क्रियाके लिये चेष्टा नहीं करते, जो परिणाममें दुःखदायिनी हो। जो शान्तिप्रद उपरतिरूपी रसायनको छोड़कर विषयभोगोंके पीछे दौड़ता है, वह मानो मन्दार-वनका परित्याग करके विषवृक्षोंसे भरे हुए जंगलकी ओर जा रहा है। तू चाहे पातालमें चला जा अथवा ब्रह्मलोकमें ही क्यों न पहुँच जा किंतु शान्तिप्रद उपरतिरूपी अमृतके बिना तुझे निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती। रे मन ! तू सैकड़ों भोगाशाओंसे परिपूर्ण होनेके कारण इस प्रकार समस्त दुःखोंका प्रदाता बना हुआ है, अतः इन दुःखदायिनी भोगाशाओंका सर्वथा परित्याग करके अत्यन्त सुन्दर परम ऐकान्तिक कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त कर ले। ये उत्पत्ति-विनाशमयी विचित्र कल्पनाएँ तो तुझे भयानक दुःख देनेवाली ही हैं, इनसे कभी सुखकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अरे मूर्ख ! तू व्यर्थ बहिर्मुखतारूप उत्थानसे वृद्धिको प्राप्त हुई श्रोत्रेन्द्रियके वशीभूत होकर सांसारिक रसिक-गानका अनुसरण करनेवाली बुद्धिवृत्ति-द्वारा व्याधके वीणा-गीत आदिसे मोहित हुए मृगके समान विनाशको मत प्राप्त हो। मन्दबुद्धे ! जैसे हथिनीके स्पर्शसुखका लोभी गजेन्द्र शिकारियोंद्वारा बाँध लिया जाता है, उसी तरह तू भी सुन्दरी युवतीके स्पर्श-सुखका अनुभव करनेके लिये उन्मुख हुई बुद्धिवृत्तिसे केवल दुःखके लिये ही त्वगिन्द्रियका आश्रय लेकर बन्धनमें मत पड़। रे अंधे ! परिणाममें दुःख देनेवाले स्वादिष्ट अन्नोंकी अभिलाषासे रसनेन्द्रियताको प्राप्त होकर बंसीमें लगे हुए चारेके लोभी मत्स्यकी भाँति तू अपना विनाश मत कर। मूढ ! तू युवती स्त्री, बालक, बालिका आदि नाना प्रकारके सुन्दर दृश्योंको देखनेमें तत्पर हुई चक्षुरिन्द्रियका अवलम्बन करके प्रकाशके लोलुप फतिंगेके समान जलनको मत प्राप्त हो। जैसे गन्धलोलुप

उपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०३


भ्रमर सायंकालमें कमल-कोशमें बंद हो जाता है, उसी प्रकार तेल-फुलेल, इत्र, पुष्प आदि सुगन्धित पदार्थोंकी गन्धके अनुभवकी इच्छासे घ्राणेन्द्रियका आश्रय लेकर तू भी शरीररूपी कमल-कोशके भीतर बँध मत जा। मन्दबुद्धे ! मृग शब्दसे, भ्रमर गन्धसे, पतंगा रूपसे, गजेन्द्र स्पर्शसे और मत्स्य रससे—इस प्रकार ये सब तो केवल एक-एक विषयसे नष्ट हो गये; किंतु तू तो इन पाँचों इन्द्रियोंके विषय-भोगरूप अनर्थोंसे व्याप्त है, अतः तुझे सुख कैसे मिल सकता है। यदि तू सांसारिक दोषोंसे रहित, अतएव शरत्कालीन मेघके समान निर्मल अन्तःकरणकी शुद्धिको प्राप्त होकर समस्त अनर्थोंके मूल अज्ञानका उच्छेद करके शान्तिको प्राप्त होगा तो यह तेरी असीम विजय होगी। जैसे जबतक वर्षा ऋतुके मेघ वर्तमान हैं, तबतक कुहरेकी प्रचुरता रहेगी ही, उसी तरह जबतक घनीभूत अज्ञान मौजूद है, तबतक चित्तकी स्थूलताका रहना निश्चित ही है। तथा ज्यों-ज्यों वर्षाकालीन मेघ क्षीण होते जाते हैं, त्यों-त्यों कुहरेका भी विनाश होता जाता है, उसी प्रकार ज्यों ज्यों अज्ञान क्षीण होता जायगा, त्यों-त्यों चित्तकी भी सूक्ष्मता बढ़ती जायगी।

"असत्स्वरूप मन ! मैं अहंकार और वासनाओंसे रहित निर्विकल्प चिन्मय ज्योतिःस्वरूप हूँ और तू अहंकारका बीजस्वरूप है। अतः तुझसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। 'अहं' रूपसे कौन स्थित है ?—इसका मैंने पैरके अँगूठेसे लेकर सिरतक सर्वत्र अन्वेषण किया; किंतु यह 'अहं' नामक पदार्थ मुझे कहीं उपलब्ध नहीं हुआ। इस शरीरमें यह मांस है, यह रक्त है, ये हड्डियाँ हैं, ये श्वासवायु हैं, फिर यह 'अहं' रूपसे स्थित कौन है ? देहमें स्पन्दनांश तो प्राणवायुओंका है, चेतनांश परमात्माका है तथा जरा-मरण शरीरके धर्म हैं; फिर यह 'अहं' क्या वस्तु है ? रे चित्त ! मांस अहंस पृथक् है, रक्त उससे भिन्न है, हड्डियाँ भी दूसरी हैं, चेतनता उससे अन्य है, स्पन्दन भी उससे अलग है; फिर 'अहं' रूपसे स्थित पदार्थ कौन है ? यह नासिका है, यह जिह्वा है, यह त्वचा है, ये दोनों कान हैं, यह आँख है और यह स्पन्दन है; फिर 'अहं' रूपसे स्थित कौन वस्तु है ? परमार्थरूपसे विचार करनेपर न तो मन अहं है न चित्त अहं है और न वासना ही अहं है। आत्मा तो अहं हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो केवल शुद्ध चेतन प्रकाशस्वरूप है। वस्तुतः तो इस जगत्में जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, सर्वत्र मेरा ही स्वरूप है। अथवा विनाशशील असत् होनेके कारण कोई भी पदार्थ मेरा स्वरूप नहीं है--यही दृष्टि सच्ची है, इससे भिन्न दूसरा कोई क्रम नहीं है। परंतु अज्ञानरूपी धूर्त अहंकारके द्वारा चिरकालसे मुझे उसी प्रकार कष्ट दे रहा है, जैसे जंगलमें कोई ढीठ भेड़िया मृगछौनेको क्लेश पहुँचाये। सौभाग्यकी बात है कि अब मैंने उस अज्ञानरूपी चोरको भलीभाँति जान लिया है। वह मेरे स्वरूपरूपी धनका अपहरण करनेवाला है, अतः अब मैं पुनः उसका आश्रय नहीं ग्रहण करूँगा। यह देहमें अहंतारूपी भावना मृगतृष्णाके सदृश व्यर्थ है। जब ऐसी भावना असत्य ही है, तब 'यह देह अहं है' ऐसा जो भाव है, वह केवल भ्रम ही है। किंतु ज्ञानी महात्मा जो वासनाहीन हो गये हैं, वे भी अपने जीवन-निर्वाहके लिये स्वतः बाह्यरूपसे चक्षु आदि इन्द्रियोंद्वारा कर्मोंमें प्रवृत्त होते ही हैं। उनकी इस प्रवृत्तिमें वासना कारण नहीं है। चित्त ! यदि केवल वासनारहित कर्म किया जाय तो भविष्यमें होनेवाले सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता। इसलिये मूर्ख इन्द्रियो ! यदि तुम अपनी अन्तर्वासनाका परित्याग करके सम्पूर्ण कर्म करोगी तो तुम्हें दुःखकी प्राप्ति नहीं होगी। निष्पाप ! जैसे तरङ्ग आदि जलसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह ज्ञानी महात्माकी दृष्टिमें ये वासना आदि सभी पदार्थ आत्मासे पृथक् नहीं हैं; किंतु अज्ञानीकी दृष्टिमें उनकी पृथक् सत्ता है। इन्द्रियरूपी बालको ! जैसे रेशमके कीड़े अपनेद्वारा उत्पन्न हुए

३०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तन्तुसे ही नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह तुमलोग भी स्वतः उद्भूत तृष्णाद्वारा विनष्ट हो रहे हो। वासना ही तुमलोगोंको एक जगह बाँधनेमें हेतु है— ठीक उसी तरह, जैसे छिद्रोंमें पिरोयी हुई रज्जु मोतियोंके बन्धनमें कारण होती है। वस्तुतः तो यह वासना कल्पनामात्रसे ही उद्भूत हुई है, अतः यह सत्य नहीं है; क्योंकि संकल्पका त्याग कर देनेसे यह विनष्ट हो जाती है।

"यह चेतन आत्मा सर्वव्यापक सच्चिदानन्दरूप है, अतः इसका जन्म अथवा मरण नहीं होता। फिर कैसे इसकी मृत्यु हो सकती है अथवा कैसे किसीके द्वारा यह मारा जा सकता है। इसका जीवनसे तो कोई प्रयोजन है नहीं; क्योंकि यह सर्वात्मा ही सबका जीवन है। यदि शुद्ध चेतन आत्मा ही सबका जीवन है तो उसे इस जीवनसे कब कौन-सी दूसरी अप्राप्त वस्तु प्राप्त होगी, जिसके लिये उसे जीवनकी इच्छा हो ? जिसका अपनी देहमें अहंभाव है, वही भाव-अभावरूप जन्म-मरणके बन्धनमें पड़ता है; परंतु आत्मन् ! तुम्हारेमें तो देहाहंभाव है नहीं, इसलिये तुम्हें भाव-अभावरूप जन्म-मरण कहाँसे प्राप्त होंगे। अहंकार तो व्यर्थ मोहरूप है, मन मृगतृष्णाके समान है और पदार्थसमूह जड है; ऐसी दशामें अहंभाव किसको हो ? शरीर रक्त-मांसमय है, विवेक-विचारद्वारा मनका विनाश हो गया है और चित्त आदि सभी जड हैं, फिर देहमें अहंभावना किसको कैसे हो ? सभी इन्द्रियाँ नित्य अपने-अपने व्यापारमें संलग्न हैं और जड पदार्थ अपने स्वरूपमें स्थित हैं; फिर किसको और कैसे अहंभाव हो ? गुणोंकी कार्यरूपा इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंमें बरत रही हैं, प्रकृति गुणसाम्यावस्थारूप अपने स्वभावमें स्थित है और सच्चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें ही पूर्णरूपसे विराजमान है; फिर देहमें अहंभावना किसको और कैसे हो ? इस प्रकार इस भूतलपर जो कुछ स्थित है, वह सब ब्रह्मस्वरूप ही है। वह 'सत्' (ब्रह्म) मैं ही हूँ और वह 'तत्' (ब्रह्म) भी मैं ही हूँ; फिर मैं व्यर्थ ही शोक क्यों करूँ। जब केवल एक ही सर्वव्यापक विशुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मारूप परमपद सर्वत्र व्याप्त हो रहा है, तब अहंकाररूपी कलङ्ककी उत्पत्ति कहाँसे हो सकती है। वास्तवमें तो पदार्थ-सम्पत्ति है ही नहीं, एकमात्र सर्वव्यापक विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हो रहा है। अथवा यदि पदार्थ-सम्पत्तिकी सत्ता मान भी लें तो उसके साथ किसीका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। वस्तुतः तो अहंकाररूपी महान् भ्रम असत्-मिथ्या है; किंतु इसका प्रादुर्भाव होनेपर यह सारा जगत् 'यह मेरा है, यह उसका है' यों व्यर्थ ही विपर्यासको प्राप्त हुआ है। यह आश्चर्यमय अहंकार परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण ही उत्पन्न हुआ है। उस परमात्मतत्त्वके ज्ञात हो जानेपर तो इसका उसी प्रकार विनाश हो जाता है, जैसे सूर्यके तापसे हिमकणिका गल जाती है। इससे सिद्ध हुआ कि परमात्माके अतिरिक्त और किसीकी भी सत्ता नहीं है; इसलिये 'सर्वं ब्रह्म' इस प्रकारका जो मेरा अनुभवसिद्ध तत्त्व है, उसीका मैं चिन्तन करूँगा। मैं तो यही उत्तम समझता हूँ कि आकाशके नीलिमाके सदृश उत्पन्न हुए इस अहंकाररूपी महाभ्रमको ऐसे भुला दिया जाय जिससे पुनः कभी इसका स्मरण ही न हो। मैं चिरकालसे प्राप्त हुए इस मूलाविद्यासहित अहंकाररूपी महाभ्रमका सर्वथा त्याग करके शान्तात्मा होकर विशुद्ध परमात्मामें ही स्थित रहूँगा, जैसे शरत्कालीन आकाश अपने निर्मल स्वभावमें स्थित रहता है। यह अहंभाव जब बढ़ जाता है, तब अनर्थ-परम्पराओंकी सृष्टि करता है, पापका विस्तार करता है और संतापको बढ़ाता है। मरणादि पारलौकिक दुःख पुनर्जन्मतक भोगना पड़ता है एवं जीवन आदि ऐहलौकिक कष्ट मरणपर्यन्त रहता है और वर्तमान कालके पदार्थ विनाशशील हैं; अतः यह दुःखवेदना घोर कष्टप्रद है। दुर्बुद्धिजनोक्त 'यह मुझे मिल गया, अब इसे प्राप्त करूँगा' इस प्रकारकी

उपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०५


संतापदायिनी पीडा कभी शान्त नहीं होती । अहङ्कारका समूल विनाश हो जानेपर संसाररूपी वृक्ष सूख जाता है । उसकी उत्पादनशक्ति विनष्ट हो जाती है, जिससे वह पाषाणकी भाँति पुनः अङ्कुर उत्पन्न करनेमें असमर्थ हो जाता है ।

देहरूपी वृक्षको अपना निवासस्थान बनाकर रहने-वाली तृणारूपी काली नागिनें हृदयमें विवेक-विचाररूपी गरुड़का आगमन होते ही न जाने कहाँ लुप्त हो जाती हैं । जब विश्व असत्य सिद्ध हो जाता है, तब उससे उत्पन्न होनेवाला सारा-का-सारा भेद-व्यवहार असत्य हो जाता है । इस प्रकार व्यवहारके असत्य हो जानेपर 'अहं'-'त्वं' का भेद-व्यवहार सत्य कैसे रह सकता है । तरङ्गकी भाँति क्षणभङ्गुर एवं विनाशोन्मुख इस देहमें जिनकी आस्था सुदृढ़ हो गयी है, उन दुर्बुद्धियोंका परमार्थसे पतन हो जाता है, क्योंकि देह आदि समस्त वस्तुएँ सर्वत्र उत्पत्तिके पूर्व और विनाशके पश्चात् नहीं रहतीं, केवल मध्यमें ही इनका प्राकट्य दृष्टिगोचर होता है । फिर उनकी मिथ्या स्थिरतामें आस्था कैसी । अर्थात् इन देह आदि विनाशी पदार्थोंको सत्य मानकर उनमें नहीं फँसना चाहिये । जब मन पूर्णतया इस निर्णयपर पहुँच जाता है कि यह जो कुछ विशाल दृश्यमण्डल है, वह सारा का-सारा अवास्तविक है, तब वह अमन—मनके व्यापारसे शून्य हो जाता है । तदनन्तर 'यह अवास्तविक है' ऐसा मनमें दृढ़ निश्चय हो जानेपर सारी भोग-वासनाएँ उसी प्रकार क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुमें वृक्षोंकी मञ्जरियाँ झड़ जाती हैं । वास्तवमें न तो कोई किसीका स्वाभाविक शत्रु है और न कोई किसीका स्वाभाविक मित्र ही है; किंतु जो सुख पहुँचानेवाला है, वह मित्र कहा गया है और जो दुःखप्रद हैं, वे शत्रु कहलाते हैं । इसलिये अब मैं मनरूपी वनको, जो सङ्कल्परूपी वृक्षोंसे व्याप्त तथा तृणारूपी लताओंसे आच्छादित है, छिन्न-भिन्न करके विस्तृत मुक्तिरूपी भूमिमें जाकर सुख-पूर्वक विचरण करूँगा । इस प्रकार मनके पूर्णतया क्षीण हो जानेपर रक्त-मांस आदि धातुओंका संघातस्प यह मेरा अनिष्टकारी शरीर चाहे रहे अथवा नष्ट हो जाय, इससे कोई हानि नहीं है । अतः मनका विनाश करना ही आवश्यक है । मैं देह नहीं हूँ—इस विषयमें मैं एक युक्ति बतलाता हूँ, सुनो ! यदि देहको ही आत्मा मान लिया जाय तो मरनेपर शरीरके सभी अङ्गोंके वर्तमान रहनेपर भी मुर्दा शरीर व्यवहार क्यों नहीं करता ? इससे सिद्ध हुआ कि देह आत्मा नहीं है । मैं तो नित्य अविनाशी ज्योतिःस्वरूप हूँ और इस देहसे अतीत हूँ । न तो मैं अज्ञानी हूँ, न मुझे कोई दुःख है, न अनर्थ है और न दुःखका कोई कारण ही है । अब तो यह शरीर रहे अथवा न रहे, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है; मैं तो संतापरहित हुआ नित्य स्थित हूँ । मुझे उस परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति हो चुकी है; इसलिये मैं सबसे उत्कृष्ट, केवल—शुद्धस्वरूप, विक्षेपरहित, शान्तरूप अंशांशीभावसे रहित, अपने आपमें परिपूर्ण, निष्क्रिय एवं इच्छारहित ब्रह्मस्वरूप हूँ । स्वच्छता, प्रभावशालिता, सत्ता, सुहृदयता, सत्यभाषण, यथार्थ ज्ञान, आनन्द-रूपता, शान्ति, सदा मृदुभाषिता, पूर्णता, उदारता, सत्यस्वरूपता, कान्तिमत्ता, एकाग्रता, सर्वात्मकता, निर्भयता और द्वैतके विकल्पका अभाव—ये सभी गुण मुझ आत्मनिष्ठके हृदयको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले हैं । चूँकि सर्वरूप परमात्मामें सभी कुछ सर्वदा एवं सर्वथा सम्भव है इसलिये सभी विषयोंके प्रति मेरी इच्छा-अनिच्छा और सुख-दुःख क्षीण हो गये हैं । अब मेरा मोह विनष्ट हो गया है, मन अमनीभावको प्राप्त हो गया है और चित्तके संकल्प-विकल्प दूर हो गये हैं; अतः मैं शान्तस्वरूप परमात्मामें रमण कर रहा हूँ ।

(सर्ग ५०-५३)

३०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन; सत्ता-सामान्य, समाधि और समाहितके लक्षण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उद्दालक मुनि अपनी विशाल एवं विशुद्ध बुद्धिसे यों निर्णय करके पद्मासन लगाकर बैठ गये। उस समय उनके नेत्र आधे मुँदे हुए थे। तदनन्तर "जो ॐकारका उच्चारण करता है, उसे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि 'ॐ' यह अक्षर परब्रह्म है।" ऐसा निश्चय करके उन्होंने ॐकारका, जिसकी ध्वनि ऊपरको जा रही थी, उसी प्रकार उच्चस्वरसे उच्चारण किया, जैसे घण्टेके अधोभागमें लटके हुए लटकनको अच्छी तरह पीटनेसे जोरका शब्द होता है। उनके द्वारा उच्चारित प्रणवध्वनि जबतक ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त व्याप्त नहीं हो गयी और जबतक वे सर्व-व्यापक, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्माके अभिमुख नहीं हो गये, तबतक 'ॐ' का उच्चारण करते रहे। प्रणवके अकार, उकार, मकार और बिन्दु—इस प्रकार साढ़े तीन अंश हैं। उनमेंसे प्रथम अंश अकारके उच्चस्वरसे उच्चरित होनेपर जब शरीरके भीतर शब्दके गूँजनेके कारण प्राण पूर्णरूपसे क्षुब्ध हो उठे, तब प्राणवायुको छोड़नेके क्रमने जिसे रेचक कहा जाता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण शरीरको रिक्त कर दिया, जैसे महर्षि अगस्त्यने सागरके जलको पीकर उसे खाली कर दिया था। तत्पश्चात् प्रणवके द्वितीय अंश 'उकार' के उच्चारणके समय ॐकारकी समस्थिति होनेपर प्राणोंका निश्चल कुम्भक नामक क्रम सम्पन्न हुआ। उस समय प्राण न बाहर थे न भीतर, न अधोभागमें थे न ऊर्ध्वभागमें और न दिशाओंमें ही भ्रमण कर रहे थे, बल्कि मन्त्र-शक्तिसे स्तम्भित किये गये जलकी तरह पूर्णतः शान्त थे। तदनन्तर प्रणवके उपशान्ति-प्रद तृतीयांश मकारके उच्चारण-कालमें प्राणवायुको भीतर ले जानेके कारण प्राणोंका पूरक* नामक क्रम घटित हुआ। इस तीसरे क्रममें प्राण जीवात्मामें भावनाद्वारा भावित अमृतके मध्यमें पहुँचकर हिमस्पर्शके समान सुन्दर शीतलताको प्राप्त हो गये।

तदुपरान्त पद्मासनसे बैठे हुए उद्दालक मुनिने उस भावनामय शरीरमें दृढ़ स्थिति करके आलानमें बँधे हुए गजराजकी तरह अपनी पाँचों इन्द्रियोंको देहमें निबद्ध कर दिया। फिर वे निर्विकल्प समाधिके लिये तथा शरत्कालीन निर्मल आकाशकी तरह अपने स्वभावको शुद्ध बनानेके हेतु प्रयत्न करने लगे। जब उद्दालक मुनिको उस समाधिसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो गयी, तब वे दृश्य-प्रपञ्चके विकल्पोंसे रहित होकर उस नित्य अनन्त विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तद्रूप हो गये, जो जगत्‌का अधिष्ठानभूत, शुद्धस्वरूप एवं महान् हैं। वे शरीरसे पृथक् होकर किसी अनिर्वचनीय स्थितिको प्राप्त हो गये और नित्य-सत्य-सम-निर्मलरूप होकर आनन्दसागर परमात्मामें विलीन हो गये। उस समय वे वातरहित स्थानमें रखे हुए दीपककी भाँति कान्तिमान्, चित्र-लिखितके सदृश अटल मनवाले, निस्तरङ्ग समुद्रके समान गम्भीर एवं बरसे हुए निर्जल बादलकी तरह मूक हो गये।


* यद्यपि रेचक, कुम्भक और पूरक समग्र प्रणवके ही साधन प्रसिद्ध हैं; तथापि रेचकमें प्रथम भागका, कुम्भकमे मध्यभागका और पूरकमे चरम भागका विस्तार किया जाता है; क्योंकि कण्ठमे निकलने हुए प्राणवायुका कण्ठस्थानीय अकारभागकी, संकुचित होते हुए ओष्ठोमे उकार भागकी और ओष्ठोके सम्पुटित होनेपर मकारभागकी अभिव्यक्ति होती है। मकारभागकी अभिव्यक्तिके समय प्राणवायु यद्यपि पुनः प्रवेश करता है; तथापि उसमे प्रणवका ही अनुवर्तन होता है; इसलिये उस-उस भागके अवसर-विभागका कथन है, ऐसा समझना चाहिये।

उपशम-प्रकरण ] * महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन * ३०७


इस प्रकार जब इस महालोकस्वरूप परब्रह्ममें स्थित हुए उद्दालकका बहुत-सा समय व्यतीत हो गया, तब उन्होंने बहुसंख्यक आकाशचारी सिद्धों तथा देवताओंको भी देखा। तदनन्तर जो इन्द्र और सूर्यका पद प्रदान करनेकी सामर्थ्य रखती थीं, ऐसी बहुत-सी विचित्र सिद्धियाँ भी अप्सराओंसे घिरी हुई वहाँ चारों ओरसे आ पहुँचीं; परंतु उद्दालक मुनिने उन सिद्धियोंको बच्चोंके खिलौनोंकी तरह समझकर उनका कुछ भी आदर नहीं किया, क्योंकि उनका मन क्षोभरहित और बुद्धि गम्भीर थी। इस प्रकार सिद्धि-समूहोंका अनादर करके वे छः महीनेतक उस आनन्द-मन्दिररूप समाधिमें स्थित रहे—ठीक उसी तरह, जैसे उत्तरायणके छः मासतक सूर्य उत्तर दिशाकी ओर रहते हैं। इतने समयतक उद्दालक मुनिको जीवन्मुक्त-पदकी प्राप्ति हो गयी। तब वहाँ उनके समीप सिद्धोंका दल, देवताओंका समुदाय, साध्यगण, ब्रह्मा और शंकर आदि उपस्थित हुए। परमात्माकी प्राप्ति ही वह परम पद है, वही परम शान्त गति है, वही शाश्वत कल्याणस्वरूप मङ्गलमय पद है। जिसे वहाँ विश्राम करनेका अवसर प्राप्त हो गया, उसे भ्रम पुनः बाधा नहीं पहुँचा सकता। संत पुरुष उस परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करके इस विनाशीशील बाह्य दृश्य प्रपञ्चमें उसी प्रकार नहीं रमते, जैसे चैत्ररथ नामक रमणीय उद्यानमें पहुँचे हुए जन खैरके वनमें जानेकी इच्छा नहीं करते। उद्दालक मुनिने सिद्धियोंको दूर हटा दिया था। वे छः मासतक समाधिमें स्थित रहनेके पश्चात् जब पुनः समाधिसे विरत होकर जागे, तब उन्हें अपने सम्मुख कुछ परम तेजस्विनी रमणियाँ दीख पड़ीं, जो चन्द्रबिम्बके समान सुन्दर शरीरवाली, स्नेहमयी और प्रणाम करनेकी लालसासे युक्त थीं। साथ ही कतार-के-कतार दिव्य विमान भी दृष्टिगोचर हुए, जो गौर वर्णवाले मन्दारपुष्पोंके परागसे धूसरित भ्रमरों और चँवरोंसे सुशोभित थे तथा जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं। दूसरी ओर उन्होंने जिनके करकमलोंमें कुशाकी पवित्री धारण करनेसे चिह्न पड़ गये थे, उन हमारेजैसे मुनियोंको और विद्याधरियोंसहित श्रेष्ठ विद्याधरोंको भी देखा। उन सबने उन महात्मा उद्दालक मुनिसे कहा—'भगवन्! हम आपको प्रणाम कर रहे हैं। आप अनुग्रहपूर्ण दृष्टिसे हमारी ओर देखिये। मुने! आइये और इस विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकको पधारिये; क्योंकि जगत्‌की भोग-सम्पत्तियोंकी चरम सीमा स्वर्ग ही तो है। विभो! यहाँ चलकर आप कल्पपर्यन्त अपने अभीष्ट भोगोंका समुचित रूपसे उपभोग कीजिये; क्योंकि समस्त तपस्याएँ स्वर्गादिरूप फलका उपभोग करनेके लिये ही होती हैं। भगवन्! ये विद्याधरोंकी ललनाएँ हार और चँवर धारण किये आपके पास खड़ी हैं, इनपर दृष्टिपात कीजिये; क्योंकि धर्म और अर्थका सार काम है तथा कामकी सारभूता सुन्दरी युवतियाँ हैं। जैसे मञ्जरियाँ वसन्त ऋतुमें ही उत्पन्न होती हैं, उसी तरह ये वराङ्गनाएँ स्वर्गमें ही मिलती हैं।'

यों कहनेवाले उन सर्व विद्याधर और ऋषि-मुनि आदि अतिथियोंका यथोचित आदर-सत्कार करके उद्दालक मुनि निर्भ्रान्त एवं निष्कम्प भावसे बैठे रहे। उनकी बुद्धि तो गम्भीर थी ही; अत उन्होंने न तो उस विभूतिका अभिनन्दन किया और न तिरस्कार ही किया अर्थात् उदासीन बने रहे तथा 'भो सिद्धगण! आपलोग जाइये' यों कहकर वे अपने समाधिरूप कार्यमें संलग्न हो गये। तदनन्तर सिद्धगण कुछ दिनोंतक उद्दालक मुनिकी, जो भोगोंकी आसक्तिसे रहित और अपने धर्ममें निरत थे, प्रणाम, स्तुति-प्रशंसा आदिद्वारा उपासना करके अपने-आप चले गये। तब जीवन्मुक्त अवस्थाको प्राप्त हुए मुनि स्वेच्छानुसार वनप्रान्तों तथा मुनियोंके आश्रमोंमें सुखपूर्वक विचरते रहे। उस समयसे उद्दालकमुनि परमपदके प्राप्त होनेपर पर्वतोंकी कन्दराओंमें ध्यान आदि लीलाएँ करते हुए निवास करने लगे।

३०८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ध्यानस्थ होनेपर उनका कभी एक दिनमें, कभी एक मासमें, कभी एक वर्षमें और कभी-कभी तो कई वर्षोंमें उस ध्यान-समाधिसे व्युत्थान होता था। उस समयसे लेकर उद्दालक मुनि व्यवहारमें तत्पर रहते हुए भी चिन्मय परमात्मामें एकीभावसे स्थित होकर परम समाहित-चित्त बने रहते थे। यों चिन्मय परमात्मतत्त्वमें एकीभावके दृढ़ अभ्याससे महान् चिन्मय विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करके उन मुनिकी सर्वत्र समदृष्टि हो गयी, जैसे सूर्यका तेज भूतलपर सर्वत्र समभावसे पड़ता है। इस प्रकार समस्त विक्षेपोंका उपशमन होनेके कारण परम पदकी प्राप्तिसे उनका चित्त जब शान्त हो गया, उनकी जन्म-मरणरूपी फाँसी कट गयी और वे संशय तथा चञ्चलतासे रहित हो गये, तब वे शरत्कालीन आकाशके समान शान्त, सर्वव्यापक, तेजस्वी, प्रकाशमय, चित्त-रहित विशुद्धस्वरूप चिन्मय परमात्माको प्राप्त हो गये।

श्रीरामजीने पूछा—ऐश्वर्यशाली गुरो! आप आत्मज्ञान-रूपी दिनके लिये सूर्यरूप हैं, अतः अब यह बतलाने-की कृपा करें कि सत्ता-सामान्यका क्या लक्षण है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! दृश्य वस्तु है ही नहीं—इस प्रकारकी दृढ़ भावनासे चित्त जब सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब उस सामान्यस्वरूप चेतनकी सबमें सामान्यभावसे व्यापक स्वतःसिद्ध सत्तामात्र ही सत्ता-सामान्य अवस्था होती है। जब चैतन्य समस्त दृश्य पदार्थोंसे रहित होकर परमात्मामें विलीन हो जाता है, तब उसकी निराकार आकाशकी भाँति अत्यन्त निर्मल सत्ता-सामान्यता होती है। जब चैतन्य बाह्य एवं अभ्यन्तरसहित यह जो कुछ है, उन सबका अपलाप करके स्थित हो, उस समय उसकी सत्ता-सामान्य अवस्था समझनी चाहिये। जब साधक सम्पूर्ण दृश्यप्रपञ्चको अपने वास्तविक स्वरूपसे स्वप्रकाशात्मक सत्ता-सामान्यस्वरूप परमात्मा ही अनुभव करता है, तब उसकी सत्ता-सामान्यतावस्था जाननी चाहिये। यह परम दृष्टि तुर्यातीत पदके सदृश है, अतः यह सदेहमुक्त और विदेहमुक्त दोनोंके लिये सदा समान है। निष्पाप राम ! यह दृष्टि ज्ञानसे प्रादुर्भूत होती है, अतः यह केवल तुर्यातीत ज्ञानी महापुरुषको समाधि-अवस्था एवं व्युत्थान-अवस्था—दोनोंमें होती है, किंतु अज्ञानीको कभी नहीं होती। यह सत्ता-सामान्य पदवी समस्त भयोंका विनाश करनेवाली है। इसका आश्रय लेकर उद्दालक मुनि दैवेच्छानुसार प्रारब्ध कर्मोंका क्षय होनेतक जगत्में स्थित रहे। वे पर्वतकी गुफामें पत्तोंके आसनपर नेत्रोंको आधा मूँदकर पद्मासनसे बैठे थे। उस समय वे महात्मा चित्रलिखित-से निश्चल होकर शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशमें सम्पूर्ण कलाओंसे परिपूर्ण चन्द्रमाके समान विशुद्ध और सम हो गये। उनके सारे संकल्प-विकल्प जाते रहे। वे निर्विकार एवं समस्त पापों और विषय-भोगोंकी उपाधिसे रहित होनेके कारण अभिराम हो गये। उन्हें उस चिन्मय परम आनन्दकी प्राप्ति हुई, जहाँसे सारे सांसारिक सुख प्रादुर्भूत होते हैं तथा जिसकी समतामें इन्द्रका ऐश्वर्य भी समुद्रमें तिनकेके समान है। तदनन्तर वे विप्रवर उद्दालक, जो अनन्त आकाशोंमें व्याप्त रहनेवाली दिशाओंको भी व्याप्त करनेवाला, सदा समस्त वस्तुओंसे पूर्ण, भुवनोंका भरण-पोषण करनेवाला, बड़े भाग्यसे एव उत्तम जनोंद्वारा सेवा करनेयोग्य, वाणीसे परे, अनन्त, सबका आदि और सत्यस्वरूप है, उस परम विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तद्रूप हो गये। जो विवेकद्वारा स्फुरित हुए आनन्दरूपी विकसित पुष्पोंसे सुशोभित है, उद्दालककी वह चञ्चलतारहित पवित्र चित्तवृत्तिरूपिणी कल्पलता जिसके हृदय-काननमें उगकर विस्तारको प्राप्त हो जाती है, वह संसार-काननमें विहार करता हुआ भी सत्यस्वरूप परमात्माके आश्रयरूपा छायासे कभी वियुक्त नहीं होता, अपितु उसका सर्वोत्कृष्ट मोक्षफलसे सम्बन्ध जुड़ जाता है। इसलिये कल्याणकामी मनुष्यको उद्दालककी चित्तवृत्तिरूपा लताको हृदयमें रोपकर उसका विस्तार करना चाहिये।

उपशम-प्रकरण ] * महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन * ३०९


रघुकुलभूषण राम ! संसारसे वैराग्य, जप-ध्यानके अभ्यास, सत्-शास्त्रोंके विचारपूर्वक अध्ययन, पवित्र और तीक्ष्ण बुद्धि, सद्गुरुके उपदेश और यम-नियमोंके पालनसे परमात्माकी प्राप्तिरूप विशुद्ध परमपदकी प्राप्ति होती है अथवा केवल विशुद्ध और तीक्ष्ण प्रज्ञासे ही परमपद मिल जाता है; क्योंकि जो बुद्धि सम्यक् प्रकारसे ज्ञानयुक्त, तीक्ष्ण और दोषरहित है, वह सम्पूर्ण साधनोंके बिना भी यथार्थ ज्ञानद्वारा जीवको अविनाशी परमपदकी प्राप्ति करा देती है।

श्रीरामजीने पूछा—भूत और भविष्यके ज्ञाता भगवन् ! कोई ज्ञानी पुरुष व्यवहार करता हुआ भी समाधिस्थके सदृश विश्रामको प्राप्त हुआ रहता है और कोई एकान्तका आश्रय लेकर ध्यान-समाधिमें स्थित रहता है। इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है ? यह मुझे बतलानेकी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! जो इस सत्त्वादि गुणोंके समाहाररूप दृश्य जड संसारको अनात्मरूप ( अनित्य और मिथ्या ) देखता है, उस पुरुषकी जो यह परम शान्तिस्वरूप अन्तःशीतलता है, वही समाधि कहलाती है। मनके रहनेपर दृश्य पदार्थोंके साथ सम्बन्ध होता है — ऐसा निश्चय करके जो मनसे रहित होकर परम शान्तिको प्राप्त हो चुका है, ऐसा कोई पुरुष तो व्यवहारमें लगा रहता है और कोई ध्यान-समाधिमें तल्लीन हो जाता है। यदि उनके अन्तःकरणमें परम शान्तिरूप शीतलता है तो वे दोनों ही सुखी हैं; क्योंकि जो अन्तःकरणकी शीतलता है, वह अनन्त साधनरूप तपस्याओंका फल है। इसलिये जो ज्ञानी व्यवहारपरायण है और जिसने ज्ञान प्राप्त करके वनका आश्रय ले लिया है, वे दोनों ही सर्वथा समान हैं; क्योंकि उन दोनोंको ही सम्पूर्ण सन्देहोंसे रहित परम पदकी प्राप्ति हो गयी है। रघुनन्दन ! चित्तमें जो कर्तापनका अभाव है, वह उत्तम समाधान है और वही मङ्गलमय परमानन्द-पद है। उसीको तुम केवल चिन्मयभाव समझो। जो मन वासनाओंसे रहित हो गया है, वह स्थिर कहा गया है, वही ध्यान-समाधि है, वही केवल चिन्मयभाव है और वही अविनाशी परम शान्ति है। जिसके मनकी वासनाएँ क्षीण हो चुकी हैं, वह पुरुष सर्वोत्कृष्ट परमपदकी प्राप्तिके योग्य कहा जाता है; क्योंकि वासनाशून्य मनवाला पुरुष कर्तापनसे रहित हो जाता है, अतः उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। जिस साधनसे मनुष्यकी जगद्विषयिणी आस्था पूर्णतया शान्त हो जाती है और उसका अन्तःकरण शोक, भय और एषणाओंसे रहित हो जाता है तथा आत्मा अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो जाता है, उस साधनको समाधि कहते हैं। जिन गृहस्थोंके चित्त अच्छी प्रकार समाहित हो चुके हैं तथा जिनके अहङ्कार आदि दोष शान्त हो गये हैं, उनके लिये घर ही निर्जन वनस्थलियोंके समान है। समाहित मन और बुद्धिशाले तुम्हारे-जैसे प्राणियोंके लिये इस जगत्में घर और वन एक-से हैं। राजकुमार राम ! जिसका चित्त अहंता, ममता, रागादि दोषरूप महामेघसे रहित होकर शान्त हो चुका है, उसके लिये जनसमूहोंसे व्याप्त नगर भी सुनसान अरण्य-जैसे लगते हैं; परंतु शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले रघुनन्दन ! जिसका चित्त अहन्ता, ममता, राग आदि वृत्तियोंसे युक्त होनेके कारण उन्मत्त बना रहता है, उसके लिये निर्जन वन भी प्रचुर जनोंसे परिपूर्ण नगर-जैसे ही हैं।

जो मनुष्य समाधि-कालमें परमात्माको सम्पूर्ण भावों और पदार्थोंसे अतीत तथा व्यवहारकालमें सम्पूर्ण भावोंको परमात्माका स्वरूप समझता है, वह समाहित कहा जाता है। जिसका मन सदा अन्तर्मुख बना रहता है, वह सोते, जागते और चलते हुए भी ग्राम, नगर और देशको जंगल-जैसा ही समझता है। यद्यपि यह सारा जगत् प्राणियोंसे परिपूर्ण है, तथापि नित्य अन्तर्मुखी स्थितिवाले पुरुषके लिये सर्वथा अनुपयोगी होनेके कारण यह आकाशकी तरह शून्य हो जाता है। जिन पुरुषोंके

३१० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अन्तःकरणमें परम शान्ति प्राप्त हो जाती है, उनके लिये सारा जगत् सदा शान्तिमय हो जाता हैं; परंतु जिनका अन्तःकरण तृष्णाकी ज्वालासे संतप्त होता रहता है, उनके लिये जगत् दावाग्निसे दग्ध होता हुआ-सा प्रतीत होता है; क्योंकि समस्त प्राणियोंके भीतर जैसा भाव होता है, वैसा ही बाहर अनुभव होता है। जो बाहर कर्मेन्द्रियोंद्वारा क्रियाओंका सम्पादन करता हुआ भीतर केवल आत्मामें ही रत रहता है और हर्ष-शोकके वशीभूत नहीं होता, वह समाहित कहा जाता है। जो शान्तबुद्धि पुरुष सर्वव्यापक आत्माका साक्षात्कार करते हुए न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी चिन्ता ही करता है, वह समाहित कहलाता है। जो आकाशकी तरह निर्मल है, शास्त्र और शिष्टाचारके अनुकूल बाह्य चेष्टाओंका सम्यक् प्रकारसे आचरण करता है और हर्ष, अमर्ष आदि विकारोंमें काष्ठ और मिट्टीके ढेलेके समान विकाररहित एवं शान्तस्वभाववाला है तथा जो भयसे नहीं, बल्कि स्वाभाविक ही समस्त प्राणियोंको अपने आत्माके तुल्य और पराये धनको मिट्टीके ढेलेके सदृश देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो इस प्रकारके आशयसे सम्पन्न होकर सच्चिदानन्द ब्रह्मरूप परमपदको प्राप्त हो गया है, उसके ऐश्वर्य आदि पदार्थ चाहे पूर्ववत् स्थित रहें, चाहे अभ्युदयको प्राप्त हों, चाहे नष्ट हो जायें, चाहे उसके बन्धु-बान्धव मृत्युको प्राप्त हो जायें, चाहे वह उत्तमोत्तम भोग-सामग्रियोंसे परिपूर्ण तथा कुटुम्बी जनोंसे भरपूर घरमें रहे, अथवा सभी प्रकारके भोगोंसे शून्य विशाल वनमें रहे, चाहे उसके शरीरपर चन्दन, अगुरु और कपूरका अनुलेप किया जाय अथवा वह बड़ी-बड़ी ज्वालाओंसे व्याप्त अग्निमें गिरे, चाहे उसकी आज ही मृत्यु हो जाय अथवा अनेक कल्पोंके बाद हो, वह न तो स्वयं कुछ बनता है और न उस महात्माने कुछ किया ही। अर्थात् वह सभी स्थितियोंमें विकार-रहित समभावसे स्थित रहता है। अहंकार और वासनारूपी अनर्थोंके उत्पन्न होनेसे संविदात्मा पुरुषके जीवनमें नाना प्रकारके सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं; परंतु उस अहंताके पूर्णतया शान्त हो जानेपर चित्तमें ऐसी समता प्राप्त हो जाती है, जैसे रज्जुमें सर्पभ्रान्तिके नष्ट हो जानेपर 'यह सर्प नहीं है' इस ज्ञानसे निर्भयता और प्रसन्नता होती है। ज्ञानी जो कार्य करता है, जो खाता है, जो दान देता है, जो हवन आदि करता है—उन सब कर्मोंको करता हुआ भी वह कुछ नहीं करता एवं न उनमें रत ही रहता है; क्योंकि वह अहंता-ममतासे रहित हो जाता है, इसलिये उसका कर्म करना अथवा न करना एक-सा है। उसका न तो कर्मोंके करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके न करनेसे ही कोई मतलब है; क्योंकि वह तो यथार्थ ज्ञानके प्रभावसे स्वाभाविक ही परमात्मामें स्थित है। अतः उसके मनमें कामनाओंकी उत्पत्ति उसी प्रकार रुक जाती है, जैसे पत्थरमे मञ्जरियाँ नहीं निकलतीं।

(सर्ग ५४-५७)


किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना और उपदेश देकर अपने आश्रमको लौट जाना, सुरघुके आत्मविषयक चिन्तनका वर्णन तथा उसे परमपदकी प्राप्ति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो किरात-राज सुरघुका परम विस्मयजनक वृत्तान्त है। पूर्वकालमें हिमालयके शिखरभूत कैलासके मूल देशमें हेमजट नामक किरात निवास करते थे। उनका जो राजा था, उसका नाम सुरघु था। वह उदारचेता एवं शत्रु-नगरोंपर विजय पानेवाला था। विजयलक्ष्मी तो मानो उसकी भुजा ही थी। वह बलवान् तथा प्रजापालनमें दक्ष था। पराक्रममें

उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना * ३११

तो वह सूर्यतुल्य और बलमें साक्षात् मूर्तिमान् वायुके समान था। उसने नाना प्रकारके राज्यवैभवों तथा विविध धन-सम्पत्तियोंसे गुह्यकाधिपति कुबेरको, ज्ञानसे इन्द्रगुरु बृहस्पति‌को और काव्यगुणोंसे असुर-गुरु शुक्राचार्यको जीत लिया था। वह यथावसर प्राप्त हुए राजकार्योंको निग्रह-अनुग्रहकी व्यवस्थासे उत्साहपूर्वक करता था। तदनन्तर उन राजकार्योंसे उत्पन्न हुए सुख-दुःखोंसे उसकी पारमार्थिक गति उसी प्रकार अभिभूत हो गयी, जैसे जालमें फँसे हुए पक्षीकी गति रुक जाती है। तब वह यों विचार करने लगा—'मैं इन दुखी प्रजाजनोंको कोल्हूमें पेरे जाते हुए तिलोंकी भाँति क्यों बलपूर्वक पीड़ित करता हूँ ? मेरे समान ही इन सभी प्राणियोंको भी तो दुःख होता होगा। अतः अब मेरा इन्हें और अधिक दण्ड देना व्यर्थ है। मैं इन्हें धन-सम्पत्ति प्रदान करूँगा; क्योंकि मेरी तरह सभी लोग धनसे आनन्दित होते हैं। अथवा निग्रहका अवसर प्राप्त होनेपर उसे भी करूँगा; क्योंकि निग्रहके बिना प्रजा अपनी मर्यादामें स्थित नहीं रहती। यह मेरे लिये दण्डनीय है। यह सदा मेरे अनुग्रहका पात्र है। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं सुखी हूँ और दुर्भाग्यवश आज मैं दुखी हूँ। यह सब अन्तमें कष्ट-ही-कष्ट है।' पृथ्वीपति सुरघुका मन इस प्रकारके सङ्कल्प-विकल्पोंसे चञ्चल हो गया, जिससे उसे कहीं विश्राम नहीं मिला—जैसे चिरकालकी तृषासे युक्त मन जलके बड़े-बड़े आवर्तोंपर घूमते रहनेपर भी जलके बिना कहीं शान्ति नहीं पाता।

तदनन्तर किसी समय महर्षि माण्डव्य सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए राजा सुरघुके घर पधारे—ठीक उसी तरह, जैसे देवर्षि नारद इन्द्र-भवनमें पदार्पण करते हैं। वे मुनिराज सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे, अतएव सन्देहरूपी दुष्ट वृक्षस्तम्भका छेदन करनेके लिये कुठारस्वरूप थे। राजाने उनका पूजन किया और यों पूछा।

सुरघुने कहा—मुने ! जैसे लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दर्शन करके भक्त परम प्रसन्न होता है, उसी प्रकार आपके शुभागमनसे मुझे परम हर्ष प्राप्त हुआ है। भगवन् ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं और चिर-कालसे परमपदमें विश्राम भी कर चुके हैं; अतः जैसे सूर्य अन्धकारका विनाश कर देते हैं, उसी प्रकार आप मेरे संशयका निवारण कीजिये; क्योंकि दुःखके स्वरूप-को पूर्णतया जाननेवाले विज्ञजन संशयको ही महान् दुःख बतलाते हैं। भला, महापुरुषोंके सङ्गसे किसके दुःखका विनाश नहीं होता अर्थात् सभीके दुःख नष्ट हो जाते हैं। प्रभो ! अपने प्रजाजनोंपर मेरे द्वारा किये गये निग्रह और अनुग्रहसे उत्पन्न हुई चिन्ताएँ मुझे उसी प्रकार उत्पीड़ित कर रही हैं, जैसे सिंहके नख हाथीको कष्टमें डाल देते हैं। अतः मुने ! जिस प्रकार मेरी बुद्धिमें सूर्यकी किरणोंके समान समताका उदय हो और विषमता न आने पाये, कृपापूर्वक वैसा ही प्रयत्न कीजिये।

३१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

महर्षि माण्डव्य बोले- राजन् ! जैसे सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे कुहरेका विनाश हो जाता है, उसी तरह वैराग्य, श्रवण-मनन-निदिध्यासनरूप अभ्यासादि निजी प्रयत्नसे तथा आत्मस्थितिरूप उपायसे मनकी यह कायरता पूर्णतया नष्ट हो जाती है। आत्मविषयक विवेक-विचार करनेसे ही मनके भीतरी संतापका शमन होता है—ठीक उसी तरह, जैसे शरद्ऋतुके आगमनमात्रसे विशाल मेघमण्डल विलीन हो जाता है। इसलिये तुम मन ही-मन विचार करो—ये जो पुत्र, मित्र आदि अपने सम्बन्धी हैं तथा अपने शरीरमें रहनेवाली इन्द्रियाँ हैं, वे तत्त्वतः कौन हैं और कैसी हैं? मैं कौन हूँ? कैसा हूँ? यह दृश्य जगत् क्या है ? प्राणियोंके जन्म-मरण कैसे होते हैं? यों हृदयमें विचार करनेसे तुम्हें परमोत्कृष्ट महत्ता प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार जब परमात्म-तत्त्वका यथार्थ अनुभव कर लेनेपर तुम संतुष्ट हो जाओगे, तब जैसे संतान संतुष्ट हुए पिताकी कृपाका पात्र होती है, उसी तरह वे सभी सम्पत्तिशाली राजा-महाराजा तुम्हारे कृपापात्र हो जायँगे। सज्जनशिरोमणे ! परमात्माकी प्राप्तिरूप महत्ताके प्राप्त कर लेनेपर तुम्हारा चित्त जागतिक विषय-भोगोंमें उसी प्रकार नहीं डूबेगा, जैसे गायके खुरके गढ्ढेके जलमें हाथी नहीं डूबता। तुम्हारे अन्त:करणमें केवल दृश्यका अवलम्बन करनेवाली वासनारूपा दीनता छायी हुई है, अभी उसी दीनताके कारण तुम कीड़ेकी भाँति भोगोंमें पच रहे हो। जो सर्वात्मिका बुद्धिसे सब देशमें, सब कालमें, सभी प्रकारोंसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चका परित्याग कर देता है, उसे सर्वरूप परमात्मा अपने-आप उपलब्ध हो जाते हैं; किंतु जबतक सम्पूर्ण दृश्योंका पूर्णतया त्याग नहीं हो जाता, तबतक परमात्मा-का साक्षात्कार होना दुर्लभ है; क्योंकि सभी अवस्थाओं-का परित्याग कर देनेपर जो शेष रहता है, वही परमात्मा कहा गया है। राजन् ! अन्यान्य कार्योंका परित्याग करके आत्मा जिस विषयकी प्राप्तिके लिये स्वयं सब प्रकारसे यत्न करता है, उसीको पाता है; उससे भिन्न कुछ नहीं मिलता। इसलिये अपने आत्मा-का साक्षात्कार करनेके लिये सभी विषयोंका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि सब कुछ त्याग देनेपर अन्तमें जो दृष्टिगोचर होता है, वही परमपद है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! महर्षि माण्डव्य राजा सुरघुको यो उपदेश देकर अपने उसी रुचिर आश्रमकी ओर चले गये, जहाँ मुनियोंका जमघट लगा रहता था। उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर राजा सुरघु किसी दोषरहित एव एकान्त स्थानमें जाकर अपनी बुद्धिसे यों विचार करने लगा—'वस्तुतः स्वयं मैं कौन हूँ ? मै मेरु पर्वत तो हूँ नहीं और न मेरुगिरि मेरा है। न तो मैं जगत् हूँ और न जगत् मेरा है। मैं पर्वत भी नहीं हूँ और न पर्वत मेरे हैं। मैं न पृथ्वी हूँ और न पृथ्वी मेरी है। यह किरात-मण्डल भी मेरा नहीं है और न मैं किरातमण्डल हूँ। केवल अपने संकेतसे ही यह देश मेरा कहा जाता है। लो, मैंने इस संकेतको छोड़ दिया, अतः न तो मैं देश हूँ और न यह देश मेरा है। इस नगरके विषयमें भी इस कल्पनात्यागसे यही निश्चय होता है कि यह पुरी जो पताकाओं और वनश्रेणियोंसे सुशोभित, भृत्यों और उपवनोंसे व्याप्त तथा हाथी, घोड़ों और सामन्तोंसे परिपूर्ण है, वह मैं नहीं हूँ और न यह पुरी मेरी है। जो मिथ्याभूत मान्यतासे सम्बन्ध रखनेवाला और उस मान्यताका विनाश होनेपर नष्ट हो जानेवाला है, ऐसा यह भोग-समुदाय और भार्या आदि कुटुम्ब भी मैं नहीं हूँ और न ये सब मेरे हैं। इसी प्रकार भृत्यों, सेनाओं, वाहनों एवं अन्यान्य नगरोंसे युक्त राज्य मैं नहीं हूँ और न राज्य मेरा है; क्योंकि यह मान्यता तो केवल कल्पित है। इस शरीरमें स्थित मांस और अस्थि भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि ये जड़ हैं। कमलदलपर पड़े

उपशम-प्रकरण ] * सुरघुके आत्मविषयक चिन्तनका वर्णन और उसे परमपदकी प्राप्ति * ३१३

हुए जलकी बूँदकी तरह उनका मेरे साथ सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार मास, रक्त और हड्डियाँ—ये सभी जड हैं; अतः मैं ये नहीं हूँ और न किसी दशामें ये मेरे हैं। कर्मेन्द्रियाँ भी मैं नहीं हूँ और न कर्मेन्द्रियाँ मेरी हैं। इस प्रकार इस देहमें यावन्मात्र जड पदार्थ हैं, वे मैं नहीं हूँ; क्योंकि मैं तो चेतन हूँ। मैं भोग नहीं हूँ और न भोग मेरे हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ भी मेरी नहीं हैं और न मैं ही ज्ञानेन्द्रियाँ हूँ; क्योंकि वे जड और असत्स्वरूपा हैं। जो संसाररूपी दोषका मूल कारण है, वह मन भी मैं नहीं हूँ; क्योकि वह तो जड है। बुद्धि और अहङ्कार भी मैं नहीं हूँ और न वे मेरे हैं; क्योंकि यह दृष्टि मनोमयी होनेके कारण जड है। यों चञ्चलत्वरूपवाले शरीरसे लेकर मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदितक जो स्थूल-सूक्ष्म भूतोंका समुदाय है, उनमेंसे मैं एक भी नहीं हूँ।

'अहो ! महान् आश्चर्यकी बात है, मैं तो सम्पूर्ण विकल्पोंसे रहित विशुद्ध साक्षीस्वरूप चेतन आत्मा हूँ। जिसकी प्राप्तिके लिये मै चिरकालसे प्रयत्नशील था, उस आत्माकी उपलब्धि तो मुझे आज ही हुई है । जिस विशुद्ध आत्माका कहीं अन्त नहीं है, वह तत्पदबोध्य असीम आत्मा ही मैं हूँ। वह चेतन आत्मा निर्मल, विषय-दोषोंसे शून्य, सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको परिपूर्ण करनेवाला, सर्वव्यापक, सूक्ष्म, उत्पत्ति-विनाश- रहित, समस्त आकारोंसे परे एव सर्वदा सर्वभावको प्राप्त है। जगत्की यह अनुमन्त्रात्मक कल्पना भी चेतना- शक्तिमयी ही है। यह जो सुख और दुःखकी दशाका ज्ञान होना है, वह तो मिथ्या अनुभवमात्र है तथा जो नाना प्रकारके आकारोंकी प्रतीति होती है, वह सब कुछ परम चेतन आत्मा ही है। जो समस्त जगत्में व्यापक है, वही चेतन मेरा आत्मा है और जो मेरी बुद्धिका साक्षी है, वही यह चेतन है। इसी चेतन- शक्तिकी कृपासे मन देहरूपी रथपर आरूढ होकर अनेकों सृष्टि-विलासोंमें जाता है, वहाँ दौड़-धूप करता और नाचता है । वस्तुतः तो ये मन-शरीर आदि वस्तुएँ कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि इनके नष्ट हो जानेपर भी आत्माका कुछ नहीं बिगड़ता । चित्तरूपी नटने ही इस जगज्जालरूपी नाटकका विस्तार किया है । इसे' केवल वही बुद्धि देखती है, जो दीप-शिखाके समान देदीप्यमान है। अत्यन्त खेदकी बात है कि निग्रह और अनुग्रहकी स्थितिमें मुझे देहविषयिणी चिन्ता व्यर्थ ही हुई; क्योंकि परमार्थतः देह कुछ भी नहीं है। अहो ! अब तो मुझे विशेषरूपसे ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है, जिससे मेरा असद्विचार नष्ट हो गया है। जिसे जानना आवश्यक था, उसे मैंने जान लिया और जो प्राप्त करने योग्य था, उसे पा लिया । अब लोकमें वे निग्रह और अनुग्रह कहाँ हैं, किस प्रकारके हैं, किसमें रहते हैं और उनका स्वरूप क्या है ? इसी तरह हर्ष और अमर्षकी परम्परा भी कहाँ है ? अर्थात् ये सभी व्यर्थ कल्पनामात्र ही हैं। अब मैं रागशून्य, विषयोंके संसर्ग- से रहित और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे परे होकर उस विशुद्ध विज्ञानानन्दघन परमात्मामें, जो संसार-भ्रम और रागादिसे शून्य है, नित्य निवास करूँगा।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! जैसे गाधिनन्दन विश्वामित्रने अपने तपोबलसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था, उसी तरह हेमजट नामक किरातोंके राजा सुरघुने निश्चयात्मक ज्ञानके बलसे परमपद प्राप्त कर लिया । तभीसे राजा सुरघु चिन्ताओंसे मुक्त हो गया । वह सर्वदा निग्रह-अनुग्रहरूपी अपने राजोचित कार्योंमें उसी तरह अटल बना रहता था, जैसे जल- प्रवाहके सम्मुख पर्वत निष्कम्प बना रहता है। हर्ष, विषाद और ईर्ष्यासे रहित होकर प्रतिदिन यथावसर प्राप्त हुए कार्योंको न्यायपूर्वक करता हुआ राजा सुरघु अपनी उदार और गम्भीर आकृतिद्वारा समुद्रसे भी बढ़- कर सुशोभित होने लगा। उसकी वृत्ति अन्त करणको

३१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


शीतल करनेवाली, निश्चलताके कारण धीर और समदर्शनात्मक थी; उस वृत्तिसे वह परिपूर्ण समुद्र और चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगा। यह सारा जगत् केवल चेतन-तत्त्वकी कल्पना ही है—यों निश्चय करनेके कारण उसकी बुद्धि सांसारिक सुख-दुःखोंसे रहित हो गयी थी; अतः वह पूर्णरूपसे प्रकाशित हो रही थी। इसलिये प्रबुद्ध तथा चेतनमें विलीन हुआ वह राजा हर्षित होते, प्रफुल्लित होते, पूर्णरूपसे स्थित रहते, चलते, बैठते और सोते समय सदा समस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता था। उसका शरीर विकाररहित था तथा नेत्र कमलके समान सुन्दर थे। वह अनासक्तभावसे राज्य करते हुए सैकड़ों वर्षपर्यन्त इस भूमण्डलपर विद्यमान रहा। तत्पश्चात् उसने स्वयं ही इस पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग कर दिया और परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेके कारण, जो सृष्टि और प्रलयके हेतु तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, उन परब्रह्म परमात्मामें प्रवेश कर गया—ठीक उसी तरह, जैसे नदियोंका जल परिपूर्ण समुद्रमें प्रवेश करता है। वह विशुद्ध एकरस स्वप्रकाश परमात्माको यथार्थरूपसे जान चुका था और जन्म आदि विकारोंसे रहित अवस्थाको प्राप्त कर लेनेके कारण उसके समग्र शोक शान्त हो गये थे; इसलिये वह पूर्णरूप परब्रह्म परमात्मामें उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त हो गया, जैसे घटके फूट जानेपर घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है। (सर्ग ५८-६०)


किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का संवाद

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस समय सुरघुको तत्त्वज्ञान हो चुका था, उसी समय अर्थात् उसके जीवनकालमें ही उसका और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का परस्पर जो अद्भुत संवाद हुआ था, उसे सुनो। रघुकुलको आनन्दित करनेवाले राम ! जैसे रथपर रखा हुआ परिघ नामक अस्त्र विपक्षी वीरोंका संहार करनेमें प्रसिद्ध है, उसी तरह पारसीक देशका एक विख्यात राजा हो गया है, जो शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला था। उसका नाम था परिघ। वह किरातराज सुरघुका परम मित्र था। किसी समय जैसे कल्पान्तके

अवसरपर संसारमें वर्षाका अभाव हो जाता है, उसी तरह राजा परिघके राज्यमें महान् अवर्षण हुआ, जिसमें प्रजाजनोंका पापरूपी दोष ही कारण था। उस समय बहुत-सी जनता भूखसे गतप्राण होकर उसी प्रकार विनष्ट हो गयी, जैसे जगलमें आग लग जानेपर झुंड-के-झुंड प्राणी जलकर भस्म हो जाते हैं। प्रजाके उस कष्टको देखकर राजा परिघको अपार विषाद हुआ। उसने प्रजाजनोंको विनाशसे बचानेके लिये अनेकों यत्न किये, किंतु वे सब निष्फल सिद्ध हुए। तब उसे राज्यसे वैराग्य हो गया। फिर तो जैसे राहगीर जले हुए गाँवको छोड़कर