संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
३५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
लोकमें यही चित्तका विनाश है और इसीको भूने हुए बीजके समान विनष्ट चित्त भी कहते हैं। यही जीवन्मुक्त महापुरुषकी चित्तनाश-दशा है। निष्पाप श्रीराम ! जीवन्मुक्त पुरुषका मन मैत्री आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न, उत्तम वासनाओंसे युक्त तथा पुनर्जन्मसे शून्य होता है। ब्रह्मकी वासनासे ओतप्रोत, पुनर्जन्मसे रहित जो जीवन्मुक्त पुरुषके मनकी सत्ता है, वह सत्त्व नामसे कही जाती है। जिस प्रकार चन्द्रमामें प्रसन्न किरणें रहती हैं, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुषके मनके विनाशमें विशुद्ध मैत्री आदि गुण सदा सब तरहसे रहते हैं। शान्तिरूप शीतलताके आश्रय जीवन्मुक्त पुरुषके सत्त्वनामक मनके नाशकी अवस्थामें अनेक गुण-सम्पत्तियों प्रकट होती हैं।
रघुकुलतिलक ! जो मैंने पहले अरूप-मनोनाश कहा था, वह विदेहमुक्तका ही होता है तथा जो अवयवादि विकारोंसे रहित है, उस परम पवित्र विदेहमुक्ति-रूपी निर्मल परमपदमें समस्त श्रेष्ठ गुणोंका आश्रयरूप मन भी विलीन हो जाता है। विदेहमुक्त महात्माओंकी उस सत्त्व-विनाशरूप अरूपचित्तनाश-दशामें किसी भी दृश्य-पदार्थका अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् संकल्पसहित सम्पूर्ण संसारका अत्यन्त अभाव हो जाता है। उस अरूपचित्तविनाश-दशामें न गुण हैं न अवगुण हैं, न शोभा है न अशोभा है, न चञ्चलता है न अचञ्चलता है, न उदय है न अस्त है, न हर्ष है न अमर्ष है और न ज्ञान है, न प्रकाश है न अन्धकार है, न संध्या है न दिन या रात है, न दिशाएँ हैं न आकाश है, न अधः है और न अनर्घरूपता है, न कोई वासना है न किसी प्रकारकी रचना है, न इच्छा है न अनिच्छा है, न राग है न भाव है और न अभाव है और न वह पदसाध्य ही है। वह परमपद तम और तेजसे शून्य, तारे, चन्द्र, सूर्य और वायुसे तथा संध्या, रजःकण और सूर्य-क्रान्तिसे रहित शरत्कालीन स्वच्छ आकाशके समान अत्यन्त निर्मल है। वह विशाल पद उन लोगोंका आश्रय-स्थान है, जो बुद्धि और संसार-भ्रमणसे पार हो गये हैं। सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित, चिन्मय, निष्क्रिय ब्रह्मानन्दसे परिपूर्ण तथा रज और तमसे रहित जो परमपद है, उस परम-पदमें वे चित्तसे रहित और आकाशके सदृश सूक्ष्म विदेहमुक्त आत्मा तद्रूप हुए स्थित रहते हैं, वे अपुनरा-वृत्तिरूप परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। (सर्ग ९०)
शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना, इनका कारण विषय, विषयका कारण जीवात्मा और जीवात्माका कारण परमात्मा है—इस तत्त्वका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! भाव और अभावका तथा दुःखरूपी रत्नोंका खजाना चित्त ही, जो वासनाओंके वशमें रहनेवाला एक तरहसे अनुचर है, शरीरका कारण है। प्रतीत होनेके कारण सत् और विनाशशील होनेके कारण असत्रूप ये शरीरसमूह एकमात्र चित्तसे ही उत्पन्न हुए हैं, जैसे स्वप्नमें भ्रमसे संसारकी प्रतीति सबको स्वयं होती है। जो यह मिथ्या जगत्का स्वरूप दृश्यताको प्राप्त है, वह चित्तसे उसी प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार मिट्टीसे घड़े आदि उत्पन्न होते हैं। अनेक तरहकी वृत्तियाँ धारण करनेवाले इस चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं—एक प्राण-संचरण और दूसरा दृढ़भावना। जब शरीरकी नाड़ियोंमें प्राण-वायु संचरण करने लगता है, तब वृत्तिमय चित्त तत्काल ही उत्पन्न होता है। किंतु जब शरीरकी नाड़ियोंमें प्राण संचरण नहीं करता, तब वृत्तिज्ञान न होनेके कारण उसमें चित्त उत्पन्न नहीं होता। यह प्राण-संचरणरूप जगत् ही चित्तके द्वारा दिखायी पड़ता है, जिस प्रकार आकाशमें नीलता आदि दिखायी पड़ते हैं। राघव ! जीवात्माके विषयोंके सम्पर्कसे रहित होनेपर ही उसका परम कल्याण होता है, ऐसा जानो। किंतु प्रकट हुआ जीव ही
उपशम-प्रकरण ] * शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना :- ३५५
तत्काल बाह्य विषयोंकी ओर रागवश चला जाता है और उन विषयोंके भोगके अनुभवसे चित्तमें अनन्त दुःख उत्पन्न होते हैं। जब जीवात्मा बाह्य विषयोंसे उदासीन होकर परमात्माके ज्ञानके लिये प्रयत्नशील होता है, तब वह प्राप्त करने योग्य निर्मल परमपदरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है। श्रीराम ! जीवात्माके संकल्पको ही तुम चित्त जानो। उसी चित्तने इस अनर्थ-जालका विस्तार किया है।
योगीलोग चित्तकी शान्तिके लिये योगशास्त्रमें बतलाये गये प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यानरूप योगकी युक्तियोंके द्वारा प्राणका निरोध करते हैं। विद्वान्-लोग प्राण-निरोधको ही चित्तशान्तिरुप फलका दाता, उत्तम समताका हेतु और जीवात्माकी अपने वास्तविक स्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें सुन्दर स्थिति कहते हैं। महाबाहु श्रीराम ! तीव्र संवेगसे आत्माके द्वारा जिस पदार्थकी भावना की जाती है, तत्काल ही वह जीवात्मा अन्य स्मृतियोंको छोड़कर तद्रूप ही हो जाता है। वासनाके अत्यन्त वशीभूत और तद्रूप हुआ वह जीवात्मा जिस किसीको देख लेता है, उस सबको अज्ञानसे सत्-वस्तु मान लेता है और वासनाके वेगवश अपने स्वरूपको भूल जाता है। फिर वह वास्तविक आत्मज्ञानसे रहित जीवात्मा भीतरी वासनाओंके अभिभूत होकर, विषसे अभिभूत पुरुषकी तरह अनेक मानसिक आपत्तियोंसे व्याकुल रहता है। श्रीराम ! जिससे देहादि अनात्मामें आत्मभावनारूप और अवस्तु संसारमें वस्तुभावनारूप अयथार्थ ज्ञान होता है, उसको तुम चित्त जानो। दृढ़ अभ्यासके कारण देह आदि पदार्थोंमें 'अहम्' 'मम' आदि वासनासे ही जन्म, जरा और मरणका कारण अति चञ्चल चित्त उत्पन्न होता है। जब निरन्तर वासनाका अभाव होनेसे मन मनसे रहित हो जाता है, तब मनका अभाव हो जाता है, जो परम उपरतिस्वरूप है। जब जगद्रूप वस्तुमें किसी पदार्थकी भावना नहीं होती, तब शून्य
सं० यो० व० अं० १३—
हृदयाकाशमें चित्त कैसे उत्पन्न हो सकता है। श्रीराम ! मैं तो यही मानता हूँ कि आसक्तिसे विनाशशील जगत्-रूपी वस्तुमें वस्तुत्वकी भावना करनामात्र ही चित्तका स्वरूप है। बाह्य वस्तुओंके अस्मरणरूप साधनका अवलम्बन करनेसे जो समस्त दृश्य-जगत्के अभावकी भावना और परमार्थ वस्तु परमात्माका अनुभव होता है, यह अचित्त कहा जाता है। अत जिस महामति पुरुषको संस्कारसे उत्पन्न विषय-रसास्वादके स्मरणसे विषयोंमें आसक्ति उत्पन्न नहीं होती, उस पुरुषका चित्त अचित्त-रूपताको तथा विशुद्ध सत्त्वको प्राप्त कहा जाता है। जिस महापुरुषमें पुनर्जन्मकी कारणभूता अहंता-ममतारूप वासनाका अभाव हो गया है, वह चक्रके भ्रमण-सदृश जगत्के व्यवहारमें लगा हुआ भी जीवन्मुक्त और परमात्मा-में स्थित है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार कुम्भ-कारके व्यापारके अभावमें भी चक्रका भ्रमण तबतक होता रहता है, जबतक उसमें वेग रहता है, उसी प्रकार अविद्याके नाश होनेपर भी प्रारब्ध संस्कारके अवशिष्ट रहनेसे अहंकारके बिना ही जीवन्मुक्तका शरीर और उसका व्यवहार—दोनों प्रारब्ध-भोगपर्यन्त विद्यमान रहते हैं। जिनका चित्त भुने हुए बीजके सदृश पुनर्जन्म-से शून्य और विषयानुरक्तिसे रहित है, वे महानुभाव जीवन्मुक्त हुए स्थित रहते हैं। जिनका चित्त विशुद्ध सत्त्वरूपता प्राप्त कर चुका है, ऐसे ज्ञानके पारगत महात्मा चित्तसे रहित कहे जाते हैं। प्रारब्धका क्षय हो जानेपर वे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें विलीन हो जाते हैं।
वासनाका ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे वह जीवात्माके क्षोभकारक कर्मसे प्राण-स्पन्दनका उद्बोधन करती है और उससे चित्त उत्पन्न होता है। एवं स्पन्दन-धर्मवाला होनेसे हृदयगत राग आदि गुणोंका स्पर्श करके प्राण जीवात्माका उद्बोधन करता है और क्रमसे चित्तरूपी बालक उत्पन्न होता है। श्रीराम ! वासना और प्राणस्पन्द—दोनों चित्तके कारण हैं। उनमेंसे किसी एकका लय
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हो जानेपर दोनोंका और उनके कार्य चित्तका विनाश हो जाता है, जैसे विदेहमुक्त ज्ञानीका वासनासहित चित्त और प्राण ब्रह्ममें विलीन हो जाता है। वासना और प्राणस्पन्दन--इन दोनोंका कारण विषय है; क्योंकि उसीके सम्बन्धसे वे दोनों प्रस्फुरित होते हैं। हृदयमें प्रिय और अप्रिय शब्द आदि विषयोंका चिन्तन करके ही प्राणस्पन्दन और वासना दोनों आविर्भूत होते हैं; इसलिये विषय ही उन दोनोंका बीज (कारण) है। जिस प्रकार मूलके उच्छेदसे वृक्ष तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार विषयचिन्तनका परित्याग करनेसे प्राणस्पन्दन और वासना—दोनों ही तत्काल समूल नष्ट हो जाते हैं। रघुनन्दन ! जीवात्मा ही अपनी धीरताका परित्याग करके अपने संकल्पसे विषयरूप-सा बनकर चित्तका बीजरूप हो जाता है, ऐसा जानो। जिस प्रकार तिल तेलसे रहित नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मासे रहित कोई भी विषय नहीं हैं; क्योंकि जीवात्मा सब विषयोंमें व्यापक है। इसलिये बाहर और भीतर कोई भी पदार्थ जीवात्मासे अलग नहीं है। अपने संकल्पसे चेतन जीवात्मा ही प्रस्फुरित होता हुआ स्वयं पदार्थोंको देखता है। जिस तरह स्वप्नमें अपना मरण और भिन्न देशमें स्थिति—दोनों अपने संकल्पसे ही होते हैं, उसी तरह जाग्रत्कालीन पदार्थ भी जीवात्माके सङ्कल्पसे ही होते हैं। रघुनन्दन ! जिस विवेक-अवस्थामें अपने पारमार्थिक स्वरूपका अनुभव होता है, वह अपने संकल्पसे हुआ स्वस्वरूपानुभव भी जगज्जाल (स्वप्नके सदृश) ही है; क्योंकि सच्चिदानन्द ब्रह्म अनुभव करनेवाला, अनुभव करने योग्य और अनुभव--इन तीनोंसे ही रहित है; अतः उस अनुभवको जगज्जाल कहना उचित ही है। जैसे बालकको अपने संकल्पसे ही प्रेतका और मनुष्योंको स्थाणुमें पुरुषका भ्रम होता है, वैसे ही संकल्पसे उत्पन्न भ्रमसे ही चेतन जीवात्माकी पदार्थरूपता होती है; वास्तवमें नहीं । यह भ्रान्तिज्ञान मिथ्या है। वह यथार्थ परमात्मज्ञानसे उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जिस प्रकार रज्जु और चन्द्रके निर्दोष दर्शनसे रज्जुमें सर्प-भ्रान्ति और एक चन्द्रमें दो चन्द्ररूपोंकी भ्रान्ति विलीन हो जाती है। पहले देखा हुआ या न देखा हुआ जो पदार्थ इस जीवात्माको भासता है, विद्वान्को उसे विवेक-वैराग्यरूप प्रयत्नद्वारा मिथ्या समझकर उसका बाध कर देना चाहिये। इस जड जगत्रूप दृश्यका बाध न करना ही इस बड़े भारी संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ना है। यही बन्धन है तथा इस संसारके सम्बन्धसे रहित होना ही मोक्ष है—यह महात्माओंका अनुभव किया हुआ निश्चय है; क्योंकि इस जड दृश्य जगत्का चिन्तन ही जन्मरूप अनन्त दुःखका हेतु है और उस दृश्य-चिन्तनसे रहित होकर सच्चिदानन्द परमात्मामें स्थित रहना ही पुनर्जन्मरहित अक्षय सुखका हेतु है।
वासनारहित होनेके कारण अपनी आत्मामें जब किसी पदार्थकी भावना नहीं रहती और वह परमात्माके स्वरूपमें अचल स्थित रहता है, तब जडतासे रहित, विशाल एवं विशुद्ध यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये ज्ञानवान् फिर कभी संसारमें लिप्त नहीं होता। समस्त वासनाओंका अत्यन्त अभाव होनेपर निर्विकल्प समाधिसे परम आनन्दरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। संसारके चिन्तनसे रहित योगीलोग उसी असीम आनन्दमें नित्य स्थित रहते हैं। इसलिये संसार-चिन्तनसे रहित योगी चलते, बैठते, स्पर्श करते और सूंघते हुए भी चिन्मय अक्षय आनन्दसे पूर्ण और सुखी कहा जाता है। श्रीराम ! यह जीवात्मा जिसकी भावना करता है, उसी रूपमें तत्काल परिणत हो जाता है। अज्ञानकी भूमिकाओंसे मुक्त न होनेके कारण जीवात्मा दीर्घकाल बीत जानेपर भी अपना वास्तविक स्वरूप नहीं प्राप्त कर पाता। जीवात्मा ब्रह्मका अंश है, अत एकमात्र सच्चिदानन्द ब्रह्म ही इस जीवात्माका कारण कहा जाता है। श्रीराम ! सत्ताके दो रूप हैं—एक तो अनेक
उपशम-प्रकरण ] * तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति * ३५७
आकारवाली व्यावहारिक सत्ता और दूसरी एक रूप- वाली वास्तविक सत्ता। अब उनका विभाग सुनो। घटादि रूपोंके विभागसे जो घटत्व, पटत्व, स्तम्भ, मत्त्व आदि उपाधिभूत सत्ता कही जाती है, वह नानाकृति व्यावहारिक सत्ता है। जो विभागसे रहित, सत्तारूपसे व्याप्त समानभावसे स्थित वास्तविक सत्ता है, वह एक- रूपा वास्तविक सत्ता है। जो दृश्यरूप विशेषतासे रहित, निर्लेप और केवल सत्-स्वरूप अद्वितीय महान् वास्तविक सत्ता है, उसीको विद्वान् परमपद कहते हैं। वास्तवमें सत्ताका रूप नाना आकारके रूपमें कभी नहीं है, क्योंकि वह कायम नहीं रहता, अतः वह सत्यरूप नहीं हो सकता। सत्ताका जो विशुद्ध एकरूप वास्तविक स्वरूप है, वह कभी नष्ट नहीं होता और न कभी लुप्त ही होता है। वह नित्य विज्ञानआनन्दस्वरूप होनेसे सदा कायम रहता है। उसका अभाव कभी नहीं होता। किंतु जो विभिन्न पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाली विभाग- कल्पना नानारूपताका कारण देखी जाती है, वह विशुद्ध पदरूपा कैसे हो सकती है।
श्रीराम ! सत्ता-सामान्यकी चरम अवधिरूप जो कल्पनाओंसे और आदि-अन्तसे रहित परमपद है, उसका और कोई कारण नहीं है; क्योंकि वही सबका परम कारण है। जिस परमपदमें सम्पूर्ण सत्ताएँ विलीन हो जाती हैं, उस निर्विकार परमपदमें स्थित पुरुष इस दुःखमय संसारमें कभी नहीं आता। और वही वास्तवमें परम पुरुषार्थी है। वह परमात्मा ही समस्त कारणोंका कारण है, उसका कोई दूसरा कारण नहीं है। वही सम्पूर्ण सारोंका सार है, उससे बढ़कर दूसरी सारभूत वस्तु नहीं है। जैसे तालाबमें तटस्थ वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं, वैसे ही उस असीम चिन्मय परमात्मारूप दर्पणमें ये सब पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं। उसी आनन्द-समुद्र परब्रह्मसे सभी प्रकारके सुख प्रतिबिम्बित होते हैं। उस आनन्दमय परमात्मामें ही सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है, स्थित रहता है, बढ़ता है और विलीन हो जाता है। वह परब्रह्म भारीसे भी भारी, हलकेसे भी हलका, स्थूलसे भी स्थूल और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम है। वह दूरसे भी दूर, निकटसे भी निकट, छोटेसे भी छोटा और बड़ेसे भी अत्यन्त बड़ा है तथा सबका प्रकाशक होनेसे ज्योतियोंका ज्योति है। वह सम्पूर्ण वस्तुओंसे रहित और सर्ववस्तु- रूप है, वही सत् और असत् है, वही दृश्य और अदृश्य है, वह अहंतासे रहित और अहरस्वरूप है। श्रीराम ! वास्तवमें वही विशुद्ध जरारहित परमात्मतत्त्व है। उसकी प्राप्ति होनेपर चित्त परम शान्त हो जाता है।
(सर्ग ९१)
तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति तथा मनको वशमें करनेके उपायोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जबतक मन विलीन नहीं होता, तबतक वासनाका सर्वथा विनाश नहीं होता और जबतक वासना विनष्ट नहीं होती, तबतक चित्त शान्त नहीं होता। जबतक परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, तबतक चित्तकी शान्ति कहाँ और जबतक चित्तकी शान्ति नहीं होती, तब- तक परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता। जब- तक वासनाका सर्वथा नाश नहीं होता, तबतक तत्त्व ज्ञान कहाँसे होगा और जबतक तत्त्वज्ञान नहीं होता, तबतक वासनाका सर्वथा विनाश नहीं होगा। इसलिये परमात्माका यथार्थ ज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय—ये तीनों ही एक दूसरेके कारण हैं। अतः ये दुःसाध्य हैं, किंतु असाध्य नहीं। विशेष प्रयत्न करनेसे ये तीनों कार्य सिद्ध हो सकते हैं। श्रीराम !
३५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विवेकसे युक्त होकर प्रयत्नसे भोगेच्छाका दूरसे ही परित्याग करके इन तीनों साधनोंका अवलम्बन करना चाहिये । यदि इन तीनों उपायोंका एक साथ प्रयत्नपूर्वक भली प्रकार बार-बार अभ्यास न किया जाय तो सैकड़ो वर्षोंतक भी परमपदकी प्राप्ति सम्भव नहीं । किंतु महाबुद्धिमान् श्रीराम ! वासनाक्षय, परमात्माका यथार्थ ज्ञान और मनोनाश—इन तीनोंका एक साथ दीर्घकालतक प्रयत्नपूर्वक अभ्यास किया जाय तो ये परमपदरूप फल देते हैं । * इन तीनोंका चिरकालतक प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेसे अत्यन्त दृढ़ हृदयग्रन्थियाँ निःशेषरूपसे टूट जाती हैं ।
श्रीराम ! यह संसारकी दृढ़ स्थिति सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरोंसे मनुष्योंके द्वारा अभ्यस्त है; अतः चिरकालतक अभ्यास किये बिना वह किसी तरह भी नष्ट नहीं हो सकती। इसलिये चलते-फिरते, श्रवण करते, स्पर्श करते, सूँघते, खड़े रहते, जागते, सोते—सभी अवस्थाओंमें परम कल्याणके लिये इन तीनों उपायोंके अभ्यासमें लग जाना चाहिये । तत्त्वज्ञोंका मत है कि वासनाओंके परित्यागके समान ही प्राणायाम भी एक उपाय है । इसलिये वासना-परित्यागके साथ-साथ प्राण-निरोधका भी अभ्यास करना आवश्यक है । वासनाओंका भली-भाँति परित्याग करनेसे चित्त भूने हुए बीजके समान अचित्तरूप हो जाता है और प्राणस्पन्दके निरोधसे भी चित्त अचित्तरूप हो जाता है; इसलिये तुम जैसा उचित समझो, वैसा करो । चिरकालतक प्राणायामके अभ्याससे, योगाभ्यासमें कुशल गुरुद्वारा बतायी हुई युक्तिसे, स्वस्तिक आदि आसनोंकी सिद्धिसे और उचित भोजनसे प्राण-स्पन्दनका निरोध हो जाता है । परमात्माके स्वरूपका साक्षात् अनुभव होनेपर वासना उत्पन्न नहीं होती । आदि, मध्य और अन्तमें कभी पृथक् न होनेवाले एकमात्र सत्यस्वरूप परमात्माको भलीभाँति यथार्थरूपसे जान लेना ही ज्ञान है। यह ज्ञान वासनाका सर्वथा विनाश कर देता है तथा अनासक्त होकर व्यवहार करनेसे, संसारका चिन्तन छोड़नेसे और शरीरको विनाशशील समझनेसे वासना उत्पन्न नहीं होती । जिस प्रकार पवन-स्पन्दके शान्त हो जानेपर आकाशमें धूलि नहीं उठती, वैसे ही वासनाका विनाश हो जानेपर चित्त विषयोंमें नहीं भटकता । बुद्धिमान् पुरुषको एकाग्रचित्तसे बार-बार एकान्तमें बैठकर प्राण-स्पन्दके निरोधके लिये विशेष यत्न करना चाहिये। जिस प्रकार मदमत्त दुष्ट हाथी अङ्कुशके बिना दूसरे उपायसे वशमें नहीं होता, उसी प्रकार पवित्र युक्तिके बिना मन वशमें नहीं होता । अध्यात्मविद्याकी प्राप्ति, साधु-संगति, वासनाका सर्वथा परित्याग और प्राणस्पन्दनका निरोध—ये ही युक्तियाँ चित्तपर विजय पानेके लिये निश्चितरूपसे दृढ़ उपाय हैं । † इनसे तत्काल ही चित्तपर विजय प्राप्त हो जाती है । उपर्युक्त इन चार युक्तियोंके रहते जो पुरुष हठसे चित्तको वशीभूत करना चाहते हैं, उनके सम्बन्धमें मेरा यही मत है कि वे दीपकका परित्याग करके अञ्जनोंसे अन्धकारका निवारण करना चाहते हैं । उपर्युक्त इन चार युक्तियोंको त्यागकर जो पुरुष चित्त या चित्तके निकटवर्ती अपने शरीरको स्थिर करनेके लिये यत्न करते हैं, उन हठ करनेवाले पुरुषोंको विवेकी लोग हठी समझते हैं।
( सर्ग ९२ )
* वासनाक्षयविज्ञानमनोनाशा महामते । समकालं चिराभ्यस्ता भवन्ति फलदा मुने ॥
( योगवा० उप० ९२ । १७ )
† अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च । वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥
एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ।
( योगवा० उप० ९२ । ३५ ३६ )
उपशम-प्रकरण ] * विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति * ३५९
विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति और जीवन्मुक्त महात्माओंकी स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! किंचिन्मात्र विवेकपूर्वक विचारसे जिसने अपने चित्तका निग्रह कर लिया, उसने जन्मका फल पा लिया । यदि हृदयमें इस विचाररूपी कल्पवृक्षका कोमल अङ्कुर भी प्रकट हो जाय तो वही अङ्कुर अभ्यासयोगके द्वारा सैकड़ों शाखाओंमें फैल सकता है । विवेक-वैराग्यसे जिसका विचार कुछ दृढ़ हो गया है, उस पुरुषका शान्ति, समता, क्षमा, दया आदि पवित्र गुण उसी प्रकार आश्रय लेते हैं, जिस प्रकार जलसे परिपूर्ण सरोवरका पक्षी और मत्स्य, कच्छप आदि आश्रय लेते हैं, भलीभाँति परमात्मविषयक विचार करनेसे जिसे परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार हो गया है ऐसे ज्ञानी महापुरुषको अविद्यासे उत्पन्न अत्यन्त रमणीय और विशाल वैभव भी आकृष्ट नहीं कर पाते । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे जिसकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है, उस महात्माका यहाँके विषय, मानसिक वृत्तियाँ, आधि और व्याधि—ये सब क्या कर सकते हैं अर्थात् वे उसे तनिक भी विचलित नहीं कर सकते । जिसने ज्ञानकी चतुर्थ भूमिका प्राप्त कर ली है और जिसने जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका अनुभव कर लिया है, उस धीर-वीर ज्ञानी महात्मा पुरुषपर विषय तथा इन्द्रियरूपी डाकू क्या कभी आक्रमण कर सकते हैं ? जिस पुरुषका अन्तःकरण चलते-फिरते या बैठते, जागते या सोते—इन सभी अवस्थाओंमें विवेकपूर्ण ब्रह्मविचारसे युक्त नहीं रहता, वह मृतकके समान है । अज्ञानरूपी अन्धकारका हरण करनेवाले परमात्मविषयक विचारसे तत्काल ही विशुद्ध परमपदरूप परमात्माका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है—ठीक उसी प्रकार जैसे प्रकाशमान दीपकसे वस्तु प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती है तथा परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे सम्पूर्ण दुःखोंका उसी प्रकार अत्यन्त अभाव हो जाता है, जिस प्रकार सूर्यके उदयसे अन्धकारका अत्यन्त अभाव हो जाता है । क्योंकि जब परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान पूर्णतया प्राप्त हो जाता है, तब जानने योग्य ब्रह्मके स्वरूपकी प्राप्ति अपने-आप ही उसी प्रकार हो जाती है, जिस प्रकार सूर्यका उदय हो जानेपर भूमण्डलपर विशुद्ध प्रकाश उसी क्षण अपने-आप अनायास ही हो जाता है । जिस सत्-शास्त्रके विवेकपूर्वक विचारसे सच्चिदानन्द परमात्माके स्वरूपका यथार्थ अनुभव हो जाता है, वही ज्ञान कहा जाता है और वह ज्ञान ज्ञेयरूप परमात्मासे भिन्न नहीं है—परमात्माका स्वरूप ही है ।
श्रीराम ! पण्डितलोग विवेकपूर्वक परमात्मविषयक विचारसे उत्पन्न परमात्मस्वरूपके अनुभवको ही ज्ञान कहते हैं । उसी ज्ञानके अंदर ज्ञेय उसी प्रकार छिपा रहता है, जिस प्रकार दूधके अंदर माधुर्य छिपा रहता है । सम्यग्-ज्ञानके प्रकाशसे आलोकित पुरुष स्वयं ज्ञेयरूप हो जाता है । सम और विशुद्धस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही ज्ञेय कहा जाता है । जिसके अन्तःकरणमें आनन्दका प्राकट्य हो गया है, वह ज्ञानवान् पुरुष किसी भी सांसारिक विषयमें नहीं फँसता । समस्त सङ्गोंसे रहित पूर्णकाम जीवन्मुक्त ज्ञानी सम्राटकी तरह सदा मस्त रहता है । श्रीराम ! ज्ञानी महात्मा पुरुष वीणा-वंशीकी मधुरध्वनि आदि मनोहर शब्दोंमें, कामिनियोंके शृङ्गार-रस-मिश्रित कमनीय गीतोंमें, करताल, गम्भीर मृदङ्ग तथा चित्र-विचित्र कांस्यताल आदि वाद्योंकी ध्वनियोंमें—चाहे ध्वनि रूक्ष हो या मधुर कहीं भी प्रेम नहीं करता । आसक्ति-रहित ज्ञानी पुरुष कोमल कदलीके स्तम्भोंकी पल्लव-पङ्क्तियोंसे युक्त तथा देवता एवं गन्धर्वोंकी कन्याओंके अङ्गोंके समान अतिकोमल अवयववाली लताओंसे युक्त नन्दनवनकी क्रीडाओंमें कभी भी रमण नहीं करता । जिस प्रकार हंस मरुभूमिमें रमण नहीं करता, उसी प्रकार स्वाधीन विषयभोगोंमें भी आसक्ति न रखनेवाला धीर तत्त्वज्ञ किसी भी विषयमें रमण नहीं करता । कदम्ब, कटहल, अंगूर, खरबूजा, अखरोट तथा नारंगी आदि फलोंमें; दही, दूध, घी, मक्खन, चावल आदि भोज्य पदार्थोंमें; लेह्य (चटनी), पेय
३६० ॐ अविच्छिन्नाचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् ॐ [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
(चर्वण) आदि त्रिचमत्पूर्व चित्र-विचित्र छः प्रकारके रसयुक्त पदार्थोंमें, इनके सिवा अन्यान्य फल, कन्द, मूल, शाक आदि भोज्य पदार्थोंमें—कहींपर भी वह परमात्माके आनन्दमें तृप्त, आसक्तिरहित ज्ञानी महात्मा पुरुष नहीं फँसता।
धर्मराज, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, सूर्य और वायुके लोकोंको; मेरु, मन्दराचल, कैलास, सह्याद्रि तथा दर्दुर पर्वतोंके शिखरोंको; चन्द्रमाकी चाँदनी को; मणियुक्तमय रत्न और सुवर्ण-निर्मित महलोंको; तिलोत्तमा, उर्वशी, रम्भा, मेनका आदिकी अङ्गलताओँको—किसीको भी वह आसक्ति-रहित ज्ञानी महात्मा देखना भी नहीं चाहता और वह विज्ञानानन्दघन परमात्मामें परिपूर्ण, मान न चाहनेवाला, मौनी महात्मा शत्रुओंके प्रतिकूल व्यवहारको देखकर भी विचलित नहीं होता। जो एक ब्रह्मदृष्टि रखनेवाला तथा विकाररहित समबुद्धि ज्ञानवान् पुरुष है, वह कनेर, मन्दार, कल्हार, कमल आदिमें; कुईं, नीलकमल, चम्पा, केतकी, अगर, जाति (मालती) आदि पुष्पोंमें; चन्दन, अगरु, कपूर एवं कस्तूरी आदिमें; केसर, लौंग-इलायची, कक्कोल (शीतलचीनीके वृक्षका भेद), तगर आदि अङ्गरागोंमेंसे किसीकी भी सुगन्धसे प्रेम नहीं करता। जो सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके ध्यानमें मग्न है, वह वज्रके भयावह शब्दसे, पर्वतके विस्फोटसे एवं ऐरावत आदि हाथियोंके चिग्घाड़नेसे कम्पित नहीं होता। तीक्ष्ण छुरेकी धारोंमें या नवीन कमलोंसे निर्मित शय्याओंमें, सूर्य-किरणोंसे प्रतप्त शिलाओंमें या कोमल ललनाओंमें, सम्पत्तियोंमें या उग्र विपत्तियोंमें एवं क्रीडाओं तथा उत्सवोंमें विहार करते हुए भी ज्ञानी महात्माको प्रतिकूल पदार्थोंसे तो उद्वेग नहीं होता और अनुकूलकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं होता। वह भीतरसे सदा अहंता-ममता एवं आसक्तिसे रहित होता है और बाहरसे निःस्वार्थभावसे कर्म करता रहता है। जीवनका विनाश करनेवाला तथा जीवनका दान देनेवाला—इन दोनों पुरुषोंको ज्ञानी पुरुष प्रसन्नता एवं मधुरतासे शोभित समदृष्टिसे देखता है। ज्ञानवान् पुरुष देवता और मनुष्य आदि शरीरोंसे तथा प्रिय और अप्रिय पदार्थोंसे न हर्षित होता है और न ग्लानिका अनुभव करता है अर्थात् अनुकूलमें हर्षित नहीं होता और प्रतिकूलमें ग्लानि और विषादके वशीभूत नहीं होता। श्रीराम! अपने चित्तमें आसक्तिका अभाव और परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे तत्त्वज्ञानी पुरुष जगत्को मिथ्या समझता है। इसलिये वह किसी भी समय इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंमें रमण नहीं करता; क्योंकि उसकी बुद्धि समस्त मानस पीडाओंसे मुक्त हो चुकी रहती है। किंतु जो तत्त्वज्ञानसे शून्य और शान्तिरहित है एवं परमात्माको प्राप्त नहीं हुआ है, उस वास्तविक स्थितिसे वञ्चित मनुष्य-को इन्द्रियाँ तत्काल उसी प्रकार निगल जाती हैं, जिस प्रकार हरिन हरे कोमल पत्तोंको निगल जाते हैं।
रघुनन्दन! जो विवेकपूर्वक विचारशील है एवं जिसकी एकमात्र सच्चिदानन्द ब्रह्मके स्वरूपमें ही स्थिति है और परमात्माके स्वरूपमें ही जिसको विश्राम प्राप्त हो गया है, उस ज्ञानी महात्माको संसारके संकल्प-विकल्प विचलित नहीं कर सकते—ठीक उसी प्रकार जैसे जलका प्रवाह अचल पहाड़को विचलित नहीं कर सकता। समस्त संकल्पोंकी सीमाके अन्तरूप पदमें जो महानुभाव विश्रामको प्राप्त हो गये हैं, उन परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंकी दृष्टिमें सुवर्णमय सुमेरु पर्वत भी तृणके सदृश है अर्थात् कुछ भी नहीं है। उन विशालहृदय महात्माओंकी दृष्टिमें सारा संसार और एक छोटा-सा तृण, अमृत और विष, कल्प और क्षण समान हैं। जिस जड दृश्य संसारका आदि और अन्तमें अस्तित्व नहीं है, उसकी यदि वर्तमान कालमें कुछ कालतक सत्ता प्रतीत हो रही है तो वह जीवात्माका भ्रम ही है। ज्ञानी शरीर, मन, बुद्धि तथा आसक्तिसे रहित इन्द्रियोंसे चाहे कर्म करे या न करे, असङ्ग होनेके कारण कर्मसे लिप्त नहीं होता। महाबाहु श्रीराम! जिस प्रकार कोई भी मनोराज्यकी सम्पत्तियोंके नष्ट होने या न होनेपर, उससे उत्पन्न सुख-दुःखोंसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी
उपशम-प्रकरण ] * विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति * ३६१
महात्मा पुरुष आसक्तिरहित मनसे कर्म करता हुआ भी उससे 'उत्पन्न सुख-दुःखरूप फलसे लिप्त नहीं होता तथा आसक्तिरहित मनवाला महात्मा पुरुष चक्षुसे विषयोंको देखता हुआ भी, उसका चित्त अन्यत्र—परमात्मामें स्थित होनेके कारण, कुछ नहीं देखता। जिसका चित्त दूसरी जगह तत्परतासे लगा रहता है, वह विषयको नहीं देखता—यह बात बालक भी जानता है। इसलिये आसक्तिरहित मनवाला ज्ञानी महात्मा पुरुष सुनता हुआ भी नहीं सुनता, स्पर्श करता हुआ भी स्पर्श नहीं करता, सूंघता हुआ भी नहीं सूंघता, नेत्रोंको खोलता और बंद करता हुआ भी न उन्हें खोलता और न बंद ही करता है। श्रीराम ! आसक्ति ही संसारका कारण है, आसक्ति ही समस्त पदार्थोंका हेतु है, आसक्ति हीं वासनाओंकी जड़ है और आसक्ति ही समस्त विपत्तियोंका मूल है। अतः आसक्तिके त्यागको ही मोक्ष समझा गया है और आसक्तिके त्यागसे ही मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—अखिल संशयरूपी कुहरेका नाश करनेवाले शरत्कालके वायुरूप महामुने ! सङ्ग (आसक्ति) किसे कहते हैं—प्रभो ! यह मुझसे कहिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंकी उत्पत्ति और विनाशमें जो हर्ष और विषादरूप विकार उत्पन्न करनेवाली मलिन वासना है, वही सङ्ग (आसक्ति) है—ऐसा ज्ञानीजन कहते हैं। जीवन्मुक्त स्वरूपवाले तत्त्ववेत्ताओंके पुनर्जन्मका नाश करनेवाली, हर्ष एवं विषाद दोनोंसे रहित, शुद्ध वासना—आसक्तिरहित चित्तवृत्ति होती है। वह भूने हुए बीजके समान आकृतिमात्र है। उस शुद्ध वासनाका दूसरा नाम असङ्ग (आसक्तिका अभाव) जानो। वह तबतक रहती है, जबतक प्रारब्ध भोगोंका संस्काररूप देह रहता है। उस शुद्ध वासनासे जो कुछ किया जाता है, वह पुनः संसारमें जन्म-मरणरूप बन्धनका कारण नहीं होता। जो जीवन्मुक्त नहीं हैं, जो दीन एवं मूढ़चित्त हैं, उनकी वासना हर्ष तथा विषादसे युक्त रहती है। वह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली होती है। इसी बन्धनकारक वासनाका दूसरा नाम सङ्ग है। यह पुनर्जन्मका कारण है। इस वासनासे जो कुछ किया जाता है, वह केवल बन्धनका ही हेतु होता है। रघुनन्दन ! यदि तुम दुःखोंसे घबराते नहीं, सुखोंसे हर्षित नहीं होते और सम्पूर्ण आशाओंसे रहित हो तो तुम असङ्ग ही हो। समस्त व्यवहारोंमें एवं सुख-दुःखकी अवस्थाओंमें समचित्त रहते हुए ही यदि विचरण करते हो तो तुम असङ्ग ही हो। सांसारिक पदार्थोंको तुम अपनी आत्मा ही समझते हो और जिस समय न्याययुक्त जैसा व्यवहार प्राप्त होता है, उसीके अनुसार शास्त्रानुकूल आचरण करते हो तो तुम असङ्ग ही हो। जीवन्मुक्तोंके ज्ञानसे सम्पन्न, इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला, परमात्माके स्वरूपका मनन करनेवाला श्रेष्ठ मुनि मान, मद, मात्सर्य और चिन्ताज्वरसे रहित होकर स्थित रहता है। श्रीराम ! प्रचुरतर पदार्थोंके सदा रहते हुए भी सबमें समानभाव रखनेवाला तथा बाहर एवं भीतर इच्छा एवं याचना आदि रूप दीनतासे शून्य अन्त करणवाला यह महात्मा एकमात्र अपने वर्णाश्रमोचित स्वाभाविक क्रम-प्राप्त न्याययुक्त व्यापारसे पृथक् दूसरा कुछ भी व्यापार नहीं करता। वर्णाश्रमानुसार परम्परा-प्राप्त अपना जो कुछ भी कर्तव्य है, उसका वह ज्ञानी संसर्ग-सम्बन्ध अर्थात् आसक्ति, अहंता-ममतासे रहित बुद्धिसे खेदशून्य हो अनुष्ठान करता हुआ परमात्मस्वरूप अपने आत्मामें रमण करता है। जिस प्रकार मन्दराचल पर्वतसे मथे जानेपर भी क्षीरसमुद्र अपना स्वाभाविक शुक्लपन नहीं छोड़ता, उसी प्रकार आपत्ति अथवा उत्तम सम्पत्तिके प्राप्त होनेपर वह महामति तत्त्वज्ञ अपना सहज स्वभाव नहीं छोड़ता।
(सर्ग ९३)
उपशम-प्रकरण सम्पूर्ण
निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध
श्रीवसिष्ठजीके कहनेपर श्रोताओंका सभासे उठकर दैनिक क्रिया करना तथा सुने गये विषयोंका चिन्तन करना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं*—भरद्वाज ! उपशम-प्रकरणके अनन्तर अब इस निर्वाण-प्रकरणका श्रवण करो। उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह मोक्षरूप फल देता है। जिस समय महाराज वसिष्ठजी उस प्रकारके गम्भीर अर्थके प्रतिपादक वचन कह रहे थे, उनके श्रवणके ही आनन्दमें निमग्न श्रीराम मौन होकर स्थित थे; महामुनि वसिष्ठजीकी वाणी और उसके द्वारा प्रतिपादित अर्थोंको मनमें धारणकर राजालोग, जो बाह्य विषयोंके विज्ञान एवं शारीरिक चेष्टासे रहित थे, निश्चेष्ट होकर चित्रलिखित मूर्तिकी तरह अचल स्थित थे। एवं महामुनि वसिष्ठजी-द्वारा उपदिष्ट वाक्योंका बड़े आदरके साथ श्रोता मुनिगण विचार कर रहे थे, उस समय दिनके चतुर्थ भागमें भेरी और शङ्खकी ध्वनि हुई। उक्त ध्वनिसे मुनि वसिष्ठजीका उन्नत स्वर भी उसी प्रकार दब गया, जिस प्रकार मेघोंके नादसे मयूरोंका शब्द। धीरे-धीरे उस शङ्ख-ध्वनिके शान्त होनेपर मुनिश्रेष्ठ महाराज श्रीवसिष्ठजी सभामें श्रीरामचन्द्रजीसे यों मधुर वचन कहने लगे—'श्रीराम ! मेरी इस वाणीके अर्थको तुमने क्या उसी तरह ग्रहण किया, जिस तरह हंस जलका त्यागकर दूधको ग्रहण करता है ? तुमको इसे अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह बार-बार विचारकर उसीके अनुसार चलना चाहिये। समस्त शास्त्रोंके सिद्धान्तको समझकर तुम उदार चित्त-से मेरे द्वारा कथित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये असङ्ग होकर समयानुसार प्राप्त व्यवहारका परिपालन करो।'
'सभासद्गण ! महाराज दशरथ ! श्रीराम ! लक्ष्मण ! तथा अन्यान्य नृपवर्ग ! आप सभी आज अपने-अपने नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करें; क्योंकि आजका दिन प्रायः समाप्त होने जा रहा है। अब जो विचार करना शेष है, उसका जब आपलोग प्रातःकाल सभामें आयेंगे, तब हमलोग विचार करेंगे।'
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! मुनिवर वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर वह सभा उठ खड़ी हुई। समस्त सभाका वदन कमलकी तरह था, अतएव वह विकासयुक्त कमलिनीके सदृश भली मालूम पड़ती थी। उस समय अन्यान्य राजाओने महाराज दशरथकी स्तुति की, श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार किया तथा महर्षि वसिष्ठजीकी विशेषरूपसे स्तुति की। तदनन्तर वे अपने-अपने आश्रममें चले गये। आकाशचारी देवताओंकी वन्दना करके महाराज वसिष्ठजी महर्षि विश्वामित्रके साथ आश्रममें जानेके लिये आसनसे उठे। दशरथ आदि राजा तथा मुनिश्रेष्ठ अपने अनुरूप उपदेष्टा मुनिवर वसिष्ठजीके पीछे-पीछे आश्रमपर्यन्त जाकर उनकी आज्ञा लेकर
* वैराग्य और मुमुक्षु-व्यवहार नामक प्रकरणोंके बाद जो उत्पत्ति, स्थिति और उपशम नामक तीन प्रकरण कहे गये हैं, उनमें यह बताया गया कि उत्पत्ति, स्थिति और लयके बोधक तथा 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे प्रपञ्चके निषेधक जो वेदान्त-वाक्य हैं, वे अध्यारोपापवाद-न्यायसे परमात्मतत्त्वका ही प्रतिपादन करनेवाले हैं। अतः वासनाक्षय और मनोनाशपूर्वक परमात्म-ज्ञानके द्वारा परमपुरुषार्थकी प्राप्ति करानेमें ही उनका तात्पर्य है। अब 'यत्र नान्यत् पश्यति' (छान्दोग्य० ७। २४। १)—'जहाँ परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखता', 'यतो वाचो निवर्तन्ते' (तैत्तिरीय० २।४।१)—'जहाँसे वाणी उसे न पाकर लौट आती है', 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन' (तैत्तिरीय० २।४।१)—'ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला कभी भयभीत नहीं होता।' 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्' (बृहदा० २।५।१९)—'वह यह ब्रह्म अपूर्व है' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध तथा पहले बताये गये सम्पन्न साधनोंसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके फलरूप मोक्षके स्वरूपका बोध करानेके लिये महर्षि वाल्मीकि निर्वाण-नामक प्रकरणका आरम्भ करते हैं।
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीको सभामें लाना *
कोई आकाशकी ओर, कोई अरण्यकी ओर, कोई राज-मन्दिरकी ओर कमलसे उत्थित भ्रमरोंकी तरह चले गये । श्रीराम, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नने गुरुवर वसिष्ठजीके आश्रममें उनके साथ जाकर उनके चरणोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की और फिर दशरथजीके भवनकी ओर चले गये । अपने-अपने स्थानमें आकर उन सब श्रोताओंने स्नान किया, देवता और पितरोंकी पूजा की तथा ब्राह्मणों और अतिथियोंका स्वागत-सत्कार किया । इन क्रियाओंसे निवृत्त होकर उन श्रोताओंने ब्राह्मण आदिसे लेकर नौकर-पर्यन्त अपने-अपने परिवारके साथ वर्ण-धर्मके क्रमानुसार भोज्यपदार्थोंका भोजन किया । दैनिक क्रियाओंके साथ सूर्यभगवान्के अस्ताचलकी ओर प्रस्थान करनेपर तथा रात्रि-कृत्योंके साथ निशाकरके उदित होनेपर आस्तरणोंसे युक्त शय्याओंपर तथा आसनोंपर भूमिपर विहार करनेवाले मुनि, राजा, राज-महर्षिलोग अत्यन्त आदरपूर्वक महर्षि वसिष्ठके कमलसे निर्गत संसार-तरणके उपायका एकाग्र यथावत् विचार करने लगे । तदनन्तर प्रहर-श्रोतागण सुन्दर स्वप्नसे युक्त निद्राको प्राप्त हुए लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न—इन तीनों भ्राताओंने तीन महर्षिके उपदेशका निरन्तर विचार किया । केवल आधे प्रहर ( दो घड़ी ) तक ही नयनोंमें उत्तम स्वप्नसे युक्त तथा क्षणभरमें श्रमका निव देनेवाली निद्रा प्राप्त की । (
श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीको सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वार उपदेशका आरम्भ; चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—रात्रिके क्षीण होनेपर श्रीराम, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न अपने-अपने अनुचरोंके साथ उठकर स्नान, संध्या आदि कर्मोंका अनुष्ठान करके महामुनि श्रीवसिष्ठजीके आश्रमपर चले गये । वहाँ उन्होंने संध्या करके आश्रमसे बाहर निकलते हुए महर्षि वसिष्ठजीके चरणोंमें अर्घ्य प्रदानकर प्रणाम किया । क्षणभरमें महर्षि वसिष्ठजीका आश्रम मुनियों, ब्राह्मणों और राजाओंसे तथा हाथी, घोड़े, रथ आदि अन्यान्य वाहनोंसे इतना भर गया कि वहाँ तनिक भी अवकाश नहीं रहा । तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ महाराज वसिष्ठजी उस सेनाके साथ ही श्रीराम आदिसे अनुगत होकर यथासमय दशरथजीके घरपर जा पहुँचे । वहाँपर शीघ्रतापूर्वक मिलनेके उत्साहसे संध्या-वन्दनसे निवृत्त हुए महाराज दशरथने आदरपूर्वक दूर मार्गमें ही जाकर महर्षिका पूजन किया । वे सब श्रोतागण पुष्पों, मोतियों तथा मणियोंके समूहोंसे पहलेकी अपेक्षा पुनः अधिक सजायी गयी सभामें प्रविष्ट होकर अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये । इसके अनन्तर उसी सा दिनके जो आकाशचर, भूचर आदि श्रोता थे, वे-सब आ गये । एक दूसरेका अभिवाद सभा बैठ गयी । तदनन्तर वाक्यरचनामें पटु वसिष्ठजी पूर्व प्रकरणके अनुसार ही वाक्यार्थके श्रीरघुनन्दनको कहने लगे ।
महाराज वसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सुन्दर पद्धतिसे जो अत्यन्त गहन अर्थवाला तत्त्व का बोधक वाक्य कहा था, उसका क्या तुमने है ? अब मैं तुम्हारे समझनेके लिये यह शाश्वत सिद्धिदायक उपदेश करता हूँ, इसे श्रीराम ! परमात्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे अज्ञा तथा वासनाका विनाश हो जानेपर शोकशून्य प्राप्त हो जाता है । देश, काल और वस्तुसे र अद्वितीय परब्रह्म परमात्मा ही है । उस द्वित्वरूप जगत् तो अज्ञानसे प्रतीत होता है ।
३६४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परमात्माके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि जहाँ समस्त पदार्थोंसे रहित, परम शान्त, समानभावसे प्रकाशित एक सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है, वहाँ उस परमात्माके सिवा दूसरा पदार्थ कैसे रह सकता है। जो सम्पदाएँ हैं, जो दृश्य हैं, जो प्राणी हैं और जो उनकी इच्छाएँ हैं—इन सबके रूपमें आदि और अन्तसे रहित एक विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही है, जैसे समुद्रकी तरङ्गें समुद्र ही हैं। पातालमें, भूमिमें, स्वर्गमें, तृण आदि जड पदार्थोंमें, प्राणी एवं आकाशमें—सर्वत्र वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है, दूसरा कुछ नहीं। जैसे समुद्रकी नाना तरङ्गें समुद्र ही हैं, वैसे ही उपेक्ष्य, हेय, उपादेय, बन्धु-बान्धव, सम्पदाएँ, देह—इन सभी रूपोंमें आदि और अन्तसे रहित परब्रह्म ही प्रकाशित है। जबतक अज्ञानकी कल्पना, ब्रह्मसे अतिरिक्त पदार्थकी भावना और जगज्जालमें आस्था रहती है, तभीतक चित्त आदिकी कल्पना रहती है। जबतक देहमें अहम्भावना रहती है, जबतक इस दृश्यमें आत्मरूपता रहती है, जबतक यह मेरा है—इस प्रकारकी आस्था रहती है, तभीतक चित्तरूप भ्रम रहता है।
जबतक पूर्णताका उदय नहीं होता और जबतक सज्जनोंके संसर्गसे अज्ञानका विनाश नहीं होता, तभीतक चित्त आदि पतनकी ओर जाते रहते हैं । जबतक सच्चिदानन्द परमात्माके यथार्थ अनुभवके प्रभावसे यह जगल्लक्षी वासना शिथिल नहीं हो जाती, तभीतक चित्त आदि प्रतीत होते हैं। जबतक अज्ञानरूप मूर्खता रहती है, जबतक विषयाभिलाषासे विवशता रहती है एवं जबतक मूर्खतावश मोहका समुद्र बना रहता है, तबतक चित्त आदिकी कल्पना रहती है। किंतु जिसका अन्तःकरण भोगोंमें आस्था नहीं रखता, जिसको सुशील निर्मल निर्वाण परमपद प्राप्त हो चुका है एवं जिसके आशापाशके जाल छिन्न-भिन्न हो गये हैं, उसका चित्तरूप भ्रम नष्ट हो जाता है। मिथ्या भ्रमको उत्पन्न करनेवाले अनात्मदर्शन-का विनाश तथा परमार्थभूत सच्चिदानन्द परमात्मज्ञानरूप उत्तम सूर्यका उदय होनेपर चित्त विनष्ट होकर उसी प्रकार पुनः दिखायी नहीं देता, जिस प्रकार अग्निमें सूखा पत्ता या घीकी बूँद गिरनेपर पुनः दिखायी नहीं देती। परमात्माके सगुण-निर्गुण स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए जो जीवन्मुक्त महात्मा हैं, उनका पवित्र अन्तःकरण ही 'सत्त्व' नामसे कहा गया है। जो समरूप परमात्मपदमें नित्य स्थित, चित्तरहित तत्त्वज्ञानी महात्मा हैं, वे सत्त्वगुणमें स्थितिसे उत्पन्न उपेक्षासे ही लीलामात्र व्यवहार करते हैं। परमात्मामें स्थित, संयतेन्द्रिय, परम शान्त महात्मा पुरुष उस ब्रह्मरूप ज्योतिका सदा ही साक्षात्कार करते रहते हैं; अतः उनमें द्वैतभाव, एकभाव और वासना नहीं हो सकती। 'मैं सर्वात्मक हूँ' इस प्रकारकी परिपूर्ण आत्मभावनासे समस्त त्रिजगत्-रूपी तृणका सच्चिदानन्दरूप अग्निमें हवन करनेवाले महामुनिके चित्त आदि भ्रम निवृत्त हो जाते हैं। विवेक-से विशुद्ध हुआ चित्त सत्त्व कहा जाता है। वह फिर मोहरूपी फल उसी प्रकार उत्पन्न नहीं करता, जिस प्रकार दग्ध हुआ बीज नहीं उगता। मूढ मनुष्योंके भीतर पुनर्जन्मका विधायक वासनायुक्त चित्त होता है; किंतु तत्त्वज्ञान हो जानेपर वही वासनारहित सत्त्वरूप होकर पुनर्जन्मका बाधक हो जाता है। श्रीराम ! तुम प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर चुके हो। तुम्हें कुछ भी प्राप्त करना नहीं है, तुम्हारा चित्त शुद्ध है और ज्ञानरूप अग्निसे दग्ध हो चुका है; अतः वह भावी जन्मका कारण नहीं हो सकता अर्थात् तुम जन्म-मरणसे रहित हो। तुम वास्तवमें अवयव और सीमासे रहित, चेतनस्वरूप ही हो; अतः तुम अपने स्वरूप-का स्मरण करो, उसे कभी भूलो मत। तुम वही परिपूर्ण, परम शान्त, सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा हो। श्रीराम ! सारा चराचर चेतन-समूह तुम्हारे अंदर है और वास्तवमें वह नहीं है। तुम जो हो सो हो, तुम सत् भी हो, असत् भी हो। जो कुछ सत्-असत् प्रतीत होता
निर्वाण-प्रकरण पू०] * ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाका विनाश * ३६५
है, वह तुम्हारा संकल्प होनेसे तुम ही हो और तुम स्वयं प्रकाशरूप हो । वास्तवमें जड़-पदार्थविशेष तुम नहीं हो और न वह सब तुममें है । तुम्हारा संकल्प होनेसे वह तुम्हारा स्वरूप भी है और वस्तुसे असत् होनेके कारण वह नहीं है, तुम अपने सच्चिदानन्द-स्वरूपमें नित्य स्थित हो । तुम्हें नमस्कार है । तुम आदि और अन्तसे रहित, शिलाके समान चेतनघन हो—जिस प्रकार शिलामें पत्थरके सिवा कोई वस्तु नहीं उसी तरह तुममें एक चेतनके सिवा और कुछ नहीं है । तुम आकाशकी तरह निर्मल और स्वस्थ हो । तुम लीलासे ही सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हो । ऐसे ब्रह्मस्वरूप तुम्हें नमस्कार है । (सर्ग २)
ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! जिस प्रकार समुद्रमें उठनेवाली असंख्य तरङ्गोंका मूल कारण जल ही है, उसी प्रकार जो नाना प्रकारके असंख्य ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति और धारण करनेवाला चेतन है, वह तुम हो । समरूप, आकाशकी तरह सौम्य, बड़ी-बड़ी सृष्टिरूपी जल-तरङ्गोंसे घन प्रकाशमय परमात्म-चैतन्यरूप समुद्र तुम ही हो ।* जिस प्रकार अग्निसे उष्णत्व भिन्न नहीं है, कमलसे सौगन्ध्य भिन्न नहीं है, कज्जलसे कृष्ण रूप भिन्न नहीं है, बर्फ-से शुक्ल रूप भिन्न नहीं है, ईखसे माधुर्य भिन्न नहीं है, तेजसे प्रकाश भिन्न नहीं है, चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है, जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्मसे चराचर जगत् भिन्न नहीं है; क्योंकि ब्रह्म ही सबका कारण है । इसलिये चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है । अनुभवसे 'अहम्' भिन्न नहीं है, 'अहम्'से जीव भिन्न नहीं है, जीवसे मन भिन्न नहीं है, मनसे इन्द्रिय भिन्न नहीं है, इन्द्रियोंसे देह भिन्न नहीं है, देहसे यह जड़ दृश्य जगत् भिन्न नहीं है, जगत्से भिन्न अन्य कोई पदार्थ नहीं है ।
* रमन्ते योगिनो यस्मिन् नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
'जिस नित्यानन्द चिदात्मामें योगीलोग निरन्तर रमण करते हैं, वह परब्रह्म 'राम' पदसे कहा जाता है'—ऐसी व्युत्पत्तिवाले 'राम' शब्दके वाच्य भी तुम ही हो ।
श्रीराम ! यह दृश्यमान जगतरूपी चक्र चिन्मय परमात्माने ही अनादि कालसे अपने संकल्पद्वारा प्रवृत्त किया है । वास्तवमें तो कुछ भी प्रवृत्त नहीं किया है । यथार्थमें तो यह सब कुछ विभागरहित अनन्त सच्चिदानन्दरूप आकाश ही अपने आपमें स्थित है । उसके सिवा दूसरा और कुछ भी नहीं है । ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों और मनके व्यापारोंको करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता; क्योंकि उसमें कर्तृत्व है ही नहीं । श्रीराम ! तुम भीतरसे आकाशकी तरह निर्मल हो, बाहरसे अपने वर्णाश्रमानुकूल आचरण करते हो एवं हर्ष और ईर्ष्या आदि विकारोंमें काष्ठ और लोष्टके समान निर्विकार हो । जो तत्क्षण मारनेके लिये उद्यत अत्यन्त ही कठोर शत्रु है, उसे स्वाभाविक प्रियतम मित्रके रूपमें जो देखता है, वही यथार्थ देखनेवाला ज्ञानी महात्मा है । जिस प्रकार तटवर्ती वृक्षको नदी वेगसे मूलोच्छेदपूर्वक उखाड़कर फेंक देती है, उसी प्रकार जो महात्मा सौहार्द और ईर्ष्याको वेगसे समूल उखाड़ फेंक देता है, वही हर्ष और ईर्ष्यारूपी दोषोंका विनाश कर सकता है । जिस पुरुषके अन्तःकरणमें 'मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है ।
३६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीराम ! जिसका त्रिकालमें अस्तित्व नहीं है, उसकी व्यावहारिक सत्ताका ज्ञान करानेके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किया गया है। वह माया उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे निस्संदेह विनष्ट हो जाती है।
निष्पाप श्रीराम ! मन, बुद्धि, अहंकार तथा इन्द्रिय आदि सब कुछ जड़तारहित एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। फिर जीवात्मा उस परमात्मासे अलग कैसे रह सकता है, अर्थात् वह भी परमात्माका स्वरूप ही है। जब भोग-तृष्णारूपी विषका आवेश विनष्ट हो जाता है—संसारके विषयभोगोंसे तीव्र वैराग्य हो जाता है, तब अज्ञान उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे गत रात्रिके अन्धकारके नष्ट हो जानेपर रतौंधी भाग जाती है, भली प्रकारसे आलोचित अध्यात्मशास्त्ररूपी विचारसे तृष्णाविषरूपी महामारी क्षीण हो जाती है। जैसे विस्तृत आकाशमें अव्यक्त वायु स्थिर है, वैसे ही मायाभावसे रहित हुए तुम उस अत्यन्त विस्तृत परम पदरूप अपने ब्रह्मस्वरूपमें स्थिर हो। श्रीराम ! जब साधारण मनुष्योंको भी अपने कुलगुरुके वचन लग जाते हैं, तब फिर तुम उदार (विशाल)-बुद्धिको मेरा उपदेश क्यों नहीं लगेगा? क्योंकि तुमने अपनी बुद्धिसे मेरे वचनोंको ग्रहण करने योग्य समझ लिया है, अतएव मेरे वचन तुम्हारे हृदयके अंदर प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ महानुभाव श्रीराम ! मैं रघुकुलको उन्नत करनेवाले तुमलोगोंका सदासे कुलगुरु हूँ, इसलिये तुम मेरे द्वारा कहे गये शुभ वचनोंको हृदयमें हारकी तरह धारण करो।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मैं केवल परम शान्तिका अनुभव कर रहा हूँ और परमानन्दमय स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ। मुने ! मुझे कुहरेसे शून्य दिङ्मण्डलकी भाँति भली प्रकार प्रसन्न यह समस्त जगत् वास्तविक सच्चिदानन्दस्वरूप दीख रहा है। भगवन् ! मैं संदेहसे, आशारूप मृगतृष्णासे, राग और वैराग्यसे रहित हूँ। नाथ ! मैं अपने आपसे ही अपने उस अविनाशी विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें स्थित हूँ, जहाँपर अमृतका रसास्वाद भी तृणके सदृश नीरस होकर उपेक्षणीय हो जाता है। मैं अपने प्राकृत स्वरूपमें स्थित हूँ,—स्वस्थ हूँ, प्रसन्न हूँ। लोक जहाँ विश्राम करते हैं, उस सुखका केन्द्रस्वरूप मैं हूँ। अतएव मैं वास्तविक राम हूँ, मैं अपने परमार्थ स्वरूपको तथा आपको प्रणाम करता हूँ। शुद्ध आत्मामें अज्ञान आदि विकार कैसे आ सकते हैं। सदा शुद्ध आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है। सब कुछ आत्मा ही है। यह दूसरा है, यह दूसरा है—इत्यादि असत् कल्पनाएँ कैसे आ सकती हैं। (सर्ग ३–५)
देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्यमय और प्रभावयुक्त वचन सुनो, जिन्हें मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहता हूँ। श्रीराम ! जिस अज्ञानी पुरुषकी अज्ञानवश देहमें ही आत्मभावना उत्पन्न हो जाती है, उस पुरुषको इन्द्रियाँ रोषपूर्वक शत्रु बनकर पराजित कर देती हैं। किंतु जिस विवेकी पुरुषकी ज्ञानपूर्वक एकमात्र नित्य परमात्माके स्वरूपमें ही स्थिति रहती है, उस निर्दोष पुरुषकी इन्द्रियाँ संतोषपूर्वक मित्र बनकर रहती हैं, उसका पतन नहीं कर सकतीं।* व्यवहार करते हुए जिस ज्ञानी पुरुषको
* कठोपनिषद्में भी बताया गया है—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धिका वर्णन * ३६७
निन्दनीय भोग्य पदार्थोंमें दोष-दर्शनके कारण निन्दाके सिवा स्तुतिबुद्धि उत्पन्न होती ही नहीं, वह पुरुष दुःखदायी देहमें किसलिये आत्मबुद्धि करेगा ? कभी नहीं करेगा। जैसे प्रकाश और अन्धकार एक दूसरेसे अत्यन्त भिन्न हैं, वैसे ही शरीर और आत्मा एक दूसरेसे अत्यन्त विलक्षण हैं; क्योंकि शरीर जड और मिथ्या है तथा आत्मा चेतन और सत्य है। इसीसे न आत्मा शरीरका सम्बन्धी है और न शरीर ही आत्माका सम्बन्धी, अर्थात् परस्पर विरुद्ध होनेके कारण इनका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। भगवन् ! समस्त भावविकारोंसे नित्यमुक्त एवं निर्लिप्त आत्मा न कभी उत्पन्न होता है और न कभी विनष्ट ही होता है, वरं वह सदा-सर्वदा एकरूपसे रहता है। पत्थरके समान जड, ज्ञानरहित, तुच्छ, कृतघ्न तथा विनाशशील इस शरीरका जो कुछ भी होनेवाला हो वह भले ही हो, इससे आत्माकी न तो हानि है और न इससे उसका कोई सम्बन्ध ही है।
विभिन्न दृष्टियोंसे देखनेपर भी सद्रूप ब्रह्म कभी असद्रूप नहीं हो सकता, इसी प्रकार सर्वव्यापक जीवात्माका शरीरके साथ तनिक भी सम्बन्ध सम्भव नहीं। जैसे जलमें स्थित कमलपत्रका जलसे किंचिन्मात्र सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहमें स्थित जीवात्माका भी देहसत्ताके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। परमात्माका अच्छी प्रकार साक्षात्कार हो जानेपर परमार्थ सत्यरूप परमात्मामें ही स्थिति हो जाती है और देहात्मबुद्धिरूप अज्ञान-प्रयुक्त भ्रम नष्ट हो जाता है। देह और आत्माके यथार्थ ज्ञानसे देहकी असत्ता और आत्माकी सत्ता सिद्ध हो जाती है। सभी प्राणियोंमें अविनाशी चेतन रहता ही है, परंतु जीवात्माको इसका भली प्रकार ज्ञान न होनेके कारण उसमें कायरता आ गयी है। ऐसे अज्ञानी जीवोंके शरीरसे श्वास उसी प्रकार निकलते रहते हैं, जैसे लोहारकी धौंकनीसे हवा निकलती है; अतः उनका जीवन व्यर्थ है । अज्ञान ही आपत्तियोंका आश्रय-स्थान है। भला, बतलाइये तो सही कि कौन-सी आपत्तियाँ अज्ञानीको नहीं प्राप्त होतीं ? अज्ञानीको उग्र दुःख और सांसारिक क्षणिक सुख भी बार-बार आते और जाते रहते हैं। देह, धन, स्त्री आदिमें आसक्ति रखनेवाले अज्ञानीका यह दुष्ट दुःख कभी भी शान्त नहीं होता। इस अनात्मभूत जड देहमें आत्मभाव करनेवाले अज्ञानी पुरुषकी असत्य बोधमयी माया क्या किसी प्रकार भी नष्ट हो सकती है ? अर्थात् बिना ज्ञानके किसी प्रकार नष्ट नहीं हो सकती। उस अज्ञानी पुरुषका ही जन्म पुनः-पुनः बालपन प्राप्त करता रहता है, बालपन बार-बार यौवन प्राप्त करता रहता है, यौवन बार-बार वार्धक्य प्राप्त करता रहता है और वार्धक्य बार-बार मरण प्राप्त करता रहता है। अज्ञानी पुरुष ही इस जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र (रहँट) में संसाररूपी रज्जुसे बँधा हुआ कलश-रूप होकर जलमें डूबता और निकलता रहता है। अर्थात् यह अज्ञानी जीव संसारमें बार-बार जन्मता-मरता रहता है। जिस प्रकार पक्षिणियाँ पिंजरेसे बाहर निकल नहीं पातीं, वैसे ही उदरभरणमें अति आसक्तिरूपी बन्धनसे बँधे ज्ञानदृष्टिसे हीन अज्ञानी पुरुषकी बुद्धियाँ अपारसंसार-समुद्रके पार नहीं जा सकतीं । श्रीराम ! विषयोंकी जो केवल ऊपर-ऊपरसे दिखायी पड़नेवाली मधुरता, परिणाममें अनर्यरूपता, आद्यन्तवत्ता, देशतः परिच्छिन्नता और समस्त अवस्थाओंमें नश्वरता प्रसिद्ध है, वे सब अज्ञानरूपी वृक्षके ही फल हैं।
(सर्ग ६)
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
(कठ० १।३।५, ६)
'जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और अवशीभूत चञ्चल मनसे युक्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथिके दुष्ट घोड़ोंकी भाँति वशमें नहीं रहतीं। परंतु जो सदा विवेकयुक्त बुद्धिवाला और वशमें किये हुए मनसे सम्पन्न रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथिके अच्छे घोड़ोंकी भाँति वशमें रहती हैं।'
३६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मदरूपी चन्द्रके उदित होनेपर मोतियोंसे वेष्टित तथा रत्नोंसे सुशोभित स्त्रियों क्षुब्ध काम-क्षीरसागरकी तरङ्गके समान जो दिखायी पडती हैं, वह केवल अज्ञानकी ही विभूति है। वसन्तऋतुमें भूमिपर वनखण्डोंमें पुष्प कामके दास कामियोंको जो रमणीय दिखायी पड़ते हैं, उसमें भी अज्ञान ही कारण है। गीध, गीदड़, कुत्ते आदिके खाने योग्य मांस-पिण्डरूप स्त्रियोंके शरीरोंकी जो चन्द्रमा, चन्दन और कमलसे उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। लारसे आर्द्र ओष्ठनामक मांसके टुकड़ेकी जो रसायन, अमृत, मधु आदिके साथ उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञान ही है। आरम्भमें अज्ञानी लोगोंको अत्यन्त मधुर लगनेवाली, मध्यमें राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे बाँधनेवाली एवं अन्तमें शीघ्र नष्ट हो जानेवाली धनराशिकी जो अभिलाषा की जाती है, वह भी अज्ञान ही है। जिसने अनन्त ब्रह्माण्डरूपी पके हुए फलोंको ग्रास बना लिया है और जो सदा खानेकी चेष्टा करनेवाली जठराग्निसे युक्त है, वह काल कल्पोंतक जो तृप्त नहीं होता, उसमें भी अज्ञानकी ही महिमा है। जीवोंकी जो यौवन-रात्रि चिन्तारूपी पिशाचोंसे उपहत तथा विवेकरूपी चन्द्रमाके उदयसे शून्य, अतएव अन्धकारकी तरह प्रकाशरहित बीत जाती है, वह अज्ञानका ही विलास है। आरम्भकालमें कानोंके संनिहित कपोल-प्रदेशको आक्रान्त कर चारो ओरसे निश्चयपूर्वक स्फुरणशील जरारूपी बूढ़ी बिल्ली, जो यौवनरूपी चूहोंका भक्षण करती रहती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। प्रतीतिरूपी पुष्पोंसे उज्ज्वल व्यावहारिक सत्तारूपी लता, जिसमें जगत्रूपी पल्लव हैं और जो धर्म-अर्थरूपी फल धारण करती है एवं विकसित होती है, इसका कारण भी माया ही है। जिसमें बड़े-बड़े पर्वत ही खंभे हैं, सूर्य-चन्द्र ही खिड़कियाँ हैं, आकाश ही आच्छादन (छत) है, ऐसा जगत्-त्रयरूपी महल जो खड़ा हो जाता है, वह भी मायाकी ही महिमा है। अपनी वासनारूपिणी शलाकाओंसे निर्मित शरीरके भीतर स्थित इन्द्रिय-समूहरूप पिंजरेमें जो जगत्के अन्तर्गत जीवरूपी पक्षी आशारूपी सूतसे बँधा हुआ है, उसमें भी उसका अज्ञान ही कारण है।
संसाररूपी स्वल्प जलाशयमें स्फुरित होनेवाली सृष्टिरूपी क्षुद्र मछलीको शठ कृतान्तरूपी वृद्ध गीध जो पकड़ लेता है, उसमें भी मायाकी ही महिमा है। परमपदरूप अचल ब्रह्ममें संकल्पसे उत्पन्न असंख्य जगत्रूप जंगलोंके जाल युगान्तरूपी अग्निसे जो दग्ध हो जाते हैं, उसमें भी अविद्या ही कारण है। निरन्तर उत्पत्ति और विनाशसे तथा दुःख और सुखकी सैकड़ों दशाओंसे, इस प्रकार जगत्स्थिति जो पुनः-पुनः बदलती रहती है, उसमें भी अविद्या ही कारण है। वासनारूपी जंजीरोंसे बँधी हुई अज्ञानियोंकी दृढ़ धारणा क्षुभित युगोंके आवागमन तथा कठोर वज्रोंके आघातोंसे भी जो विदीर्ण नहीं होती, इसमें उनकी अविद्या ही कारण है। राग-द्वेषसे होनेवाले उत्पत्ति-विनाशसे तथा जरा-मरणरूपी रोगसे समस्त जंगम जाति जीर्ण-शीर्ण हो गयी है, इसमें उनका अज्ञान ही कारण है। कभी लक्ष्यमें न आनेवाले बिलमें रहनेके कारण अदृश्य और अपरिमिति भोजन करनेवाला कालरूपी सर्प निर्भय होकर इस समस्त जगत्को जो क्षणभरमें ही निगल जाता है, यह सब मायाकी ही महिमा है। प्रत्येक कल्परूप क्षणमें क्षीण हो जानेवाले ब्रह्माण्डरूप प्रस्फुट बुद्बुद, जो भयंकर कालरूपी महासमुद्रमें उत्पन्न और विनष्ट हो जाते हैं, यह भी मायाकी महिमा है। उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जानेवाली प्रतप्त सृष्टिरूपी ये बिजलियाँ, जिन्हें चिन्मय परमात्माके सकाशसे प्रकाश-शक्ति प्राप्त हुई है, जो प्रकट होती हैं, वह भी मायाकी महिमा है। अनन्त संकल्पोंवाली समस्त विकल्पोंसे शून्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्मरूप पदमें
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * अविद्याके कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्याके स्वरूपका वर्णन ३६९
आश्चर्योंकी पूर्ति करनेवाली ऐसी कौन-सी शक्तियाँ नहीं हैं ? अर्थात् सभी शक्तियाँ उसमें विद्यमान हैं। उस प्रकार सुदृढ़ संकल्पोंसे प्राप्त अर्थसमूहसे देदीप्यमान जगत्की ब्रह्ममें जो यह कल्पना है, उसमें भी अज्ञान ही हेतु है। इसलिये श्रीराम ! जो कुछ बारंबार प्राप्त होनेवाली सम्पत्तियाँ या आपत्तियाँ हैं, जो बाल्य-यौवन-जरा-मरणरूपी महान् संताप हैं, जो सुख-दुःखकी परम्परारूप संसार-सागरमें गोता लगाना है, वह सब अज्ञानरूपी गाढ़ अन्धकारकी विभूतियाँ हैं।
(सर्ग ७)
अविद्याके कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्याके स्वरूप तथा उन दोनोंसे रहित परमार्थ-वस्तुका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अविद्याका कार्य संसार-लता कब और किस प्रकार विकसित हुई, इसका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ! यह अविद्याका कार्य संसार-लता बड़े-बड़े मेरु आदि पर्वतरूप पर्वोंसे युक्त, ब्रह्माण्ड-रूपी त्वचासे आवृत और जनरूपी पत्र, अङ्कुर आदि विकासोंसे युक्त है। ये तीनों लोक इसकी देह हैं। इस अविद्यारूपी लतामें प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करनेवाले सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु और ज्ञान तो फल हैं और अज्ञान इसका मूल है। जन्मसे ही अविद्या उत्पन्न होती है और वह बादमें जन्मान्तररूप फल प्रदान करती है। जन्मसे ही वह संसारके रूपमें अपना अस्तित्व प्राप्त करती है और बादमें स्थितिरूप फल प्रदान करती है। वह अविद्या अज्ञानसे वृद्धि प्राप्त करती है और बादमें अज्ञान-रूप फल देती है। ज्ञानसे आत्माका अनुभव प्राप्त करती और अन्तमें आत्माका अनुभवरूप फल देती है। प्रतिदिन आकाशमें चारों ओरसे विकसित होनेवाली चन्द्र, सूर्य आदिके सहित ग्रहरूप ज्योतियोंकी जो पंक्तियाँ हैं, वे ही इस सृष्टिरूपा लताके पुष्प हैं। रघुनन्दन ! आकाश-मण्डलको व्याप्तकर स्थित इस लताके ऊपर प्रस्फुरित नक्षत्र और तारे ही पुष्पोंकी कलियाँ हैं। चन्द्र, सूर्य तथा अग्निके प्रकाश इस लताके पराग हैं। इसी परागसे यह शुभाङ्गी स्त्रीके समान लोगोंके मनका आकर्षण करती है। यह लता चित्तरूप हाथीद्वारा प्रकम्पित, संकल्परूप मधुर कलनाद करनेवाली कोकिलसे युक्त, इन्द्रियरूपी साँपोंसे वेष्टित और तृष्णारूपी त्वचासे आच्छादित, चतुर्दश भुवनरूपी वनोंसे शोभित, सात समुद्ररूपी सुन्दर खाइयोंसे आवृत्त एवं स्त्रीरूप पुष्पसमूहोंसे शोभित, मनके स्पन्दरूप वायुसे कम्पित, शास्त्रनिषिद्ध कर्मरूपी अजगरसे व्याप्त, स्वर्गकी शोभारूपी पुण्यमण्डलसे शोभित तथा जीवोंकी जीविकासे पूर्ण एवं अनेक प्रकारके विषयभोगोंकी वासनारूप गन्धोंसे अज्ञोंको उन्मत्त करने-वाली है। वह अविद्यारूपा लता अनेक बार उत्पन्न हो चुकी है और उत्पन्न हो रही है, अनेक बार मर चुकी है और मर भी रही है। वह अतीत कालमें थी और वर्तमान कालमें भी है। वह सर्वदा असत्यपदार्थके सदृश होती हुई भी सत्य पदार्थके सदृश बार-बार प्रतीत होती है तथा नित्य विनष्ट भी होती है। यह अविद्याका कार्य संसार निश्चय ही महती विषमयी लता है; क्योंकि अविचारसे इसका सम्बन्ध होनेपर यह तत्क्षण संसाररूपी विषसे उत्पन्न होनेवाली मूर्च्छा लाती है और विवेकपूर्वक सद्-असत्के विचारसे तत्क्षण नष्ट हो जाती है। इसलिये यह विवेकीके लिये तो नष्ट हो जानी है और अविवेकीके लिये स्थित रहती है। यह सृष्टिरूपा लता जलके रूपमें, पर्वतोंके रूपमें, नागोंके रूपमें, देवताओंके रूपमें, पृथिवीके रूपमें, द्युलोकके रूपमें, चन्द्र, सूर्य और तारोंके रूपमें विस्तृत हो रही है। श्रीराम ! इन समस्त भुवनोंमें उत्कृष्ट प्रभाव-से चारों ओर व्याप्त अथवा जीर्णताको प्राप्त हुए क्षुद्र तिनकेके रूपमें जो कुछ यह दृश्य प्रतीत हो रहा है उस सबको
| ३७० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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अविद्याका कार्य होनेसे विनाशशील अविद्या ही समझना चाहिये । उसका विवेक-वैराग्यपूर्वक यथार्थ ज्ञानद्वारा विनाश हो जानेपर सच्चिदानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
श्रीराम ! यहाँ दृश्यरूप जगत्के सम्बन्धसे और कल्पनाओंसे रहित, परम शान्त, सबका आत्मस्वरूप केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है। जिस प्रकार जलसे तरङ्गें प्रकट होती हैं, वैसे ही उस परमात्माके संकल्पसे कलारूप प्रकृति प्रकट होती है। यह प्रकृति सत्त्व, रज, तम—त्रिगुणमयी है। सत्त्व आदि तीन गुणस्वरूप धर्मोंसे युक्त प्रकृति ही अविद्या (माया) है। यही प्राणियोंका संसार है। इस प्रकृतिसे पार हो जाना ही परमपदकी प्राप्ति है। जो कुछ भी यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी पड़ता है, वह सब इसी अविद्याका कार्य होनेसे उसीके आश्रित है। श्रीराम ! ऋषि, मुनि, सिद्ध, दिव्य नाग, विद्याधर, देवता—इनको प्रकृतिके सात्त्विक, अंशस्वरूप जानो। प्रकृतिका जो शुद्ध सत्त्व-अंश है, वह विद्या है; उस विद्यासे अविद्या उसी प्रकार उत्पन्न होती है, जिस प्रकार जलसे बुद्बुद उत्पन्न होते हैं। और जिस प्रकार बुद्बुद जलमें लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार उस विद्यामें ही यह अविद्या विलीन भी हो जाती है। जैसे जल और तरङ्गकी द्वित्वभावनासे ही भिन्नता है, वैसे ही विद्या और अविद्या-दृष्टियोंकी भेदभावनासे ही भिन्नता है, वस्तुतः नहीं। जिस प्रकार परमार्थतः जल और तरङ्गकी एक-रूपता ही है उसी प्रकार विद्या और अविद्या भी एक-रूप ही हैं, पृथक् नहीं। वास्तवमें एक परमात्मासे भिन्न विद्या और अविद्या नामकी कोई वस्तु ही नहीं है; अतः विद्या और अविद्या-दृष्टिका परित्याग करनेपर यहाँ जो कुछ अवशिष्ट रहता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही वास्तवमें विद्यमान है, दूसरा नहीं; क्योंकि न अविद्या नामका पदार्थ है और न विद्या नामका ही पदार्थ है, इसलिये यह कल्पना व्यर्थ है। वास्तवमें परमात्माको छोड़कर बच रहनेवाला कुछ भी नहीं है; यदि कुछ है तो वह एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। जब परमात्मा-के स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं रहता, तब वह अज्ञान ही अविद्या कहलाता है और जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ज्ञान ही अविद्याक्षय—इस नामसे कहा जाता है। आतप और छायाकी तरह परस्पर-विरुद्ध विद्या और अविद्या दोनोंमेंसे विद्याका अभाव होनेपर अविद्या नामक मिथ्या कल्पना प्रकट होती है, जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर छाया-ही-छाया रह जाती है। श्रीराम ! अविद्याका विनाश हो जानेपर विद्या और अविद्या दोनों ही कल्पनाओंका विनाश हो जाता है। इन दोनोंका अभाव हो जानेपर एक प्राप्तव्य सच्चिदानन्द परब्रह्म ही बच रहता है। जैसे समुद्र तरङ्गोंका और निर्मल मणि रश्मियोंका खजाना है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अनन्त चराचर प्राणियोंका खजाना है। जैसे अनन्त घड़ोंमें एक ही आकाश बाहर-भीतर परिपूर्ण है, उसी प्रकार समस्त जड़-चेतन वस्तुओंमें बाहर और भीतर भी एक अविनाशी सत् वस्तुस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। जिस प्रकार अयस्कान्तमणि (चुम्बक) के सकाशमात्रसे जड लोह क्रियाशील हो जाता है, वैसे ही एकमात्र चिन्मय परमात्माके सकाशसे जड देहादि पदार्थ क्रियाशील होते हैं। जगत्के एकमात्र कारण उस चिन्मय परमात्मामें उसकी कल्पनासे ही यह कल्पित दृश्य जगत् स्थित है—ठीक उसी प्रकार, जैसे चित्र-विचित्र चञ्चल तरङ्ग-समूह जलमें स्थित है। वास्तवमें अनन्त आकाशकी तरह निराकार चिन्मय परमात्मामें यह कुछ भी नहीं है।
(सर्ग ८-९)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा अविद्याके नाशका प्रतिपादन * ३७१
अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याके नाशका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! परमात्माके सिवा जो यह स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् प्रतीत होता है, यथार्थमें वह कुछ भी नहीं है; क्योंकि विवेकपूर्वक विचार करने-पर जैसे रज्जुमें होनेवाले सर्पभ्रमसे किसी भी सर्पकी उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार हृदयके भीतर जो यह देहमें अहंता और बाह्य विषयोंमें ममतारूपी सम्बन्ध भी होता है, विवेकपूर्वक विचार करनेपर उसकी किसी तरह भी उपलब्धि. नहीं होती । जाने बिना ही भ्रमसे ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रतीत होता है, ब्रह्मका अच्छी प्रकार ज्ञान हो जानेपर सम्पूर्ण जड़-चेतनकी अन्तिम सीमारूप ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। अज्ञानी बालककी तरह यह जीवात्मा अज्ञानके कारण चित्तस्वरूपको प्राप्त हुआ है, इसलिये चित्तके चलनेपर अपने आपको चलता हुआ देखता है, चित्तके स्थिर होनेपर अपनेको भी स्थिर देखता है। यह आत्मा इस तरह अज्ञानसे इस उपद्रवयुक्त चित्तको ही अपना स्वरूप समझता है। यह चित्त बालक यानी विवेकशून्य है, इसलिये वह चित्तप्राय मनुष्य रेशमके कीड़ेकी तरह अपनेको चित्तगत वासनारूप दीर्घतन्तुओं-से भीतर बाँधता हुआ भी नहीं जानता।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! अत्यन्त घनीभावको प्राप्त हुआ अविवेक (अज्ञान) वृक्ष-पहाड़ आदि स्थावर योनियोंको प्राप्त होता हुआ किस प्रकार स्थित रहता है ? यह कृपा करके कहिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अमनस्त्व अर्थात् सुषुप्तिकी भाँति मनके लयको प्राप्त न हुआ और मनस्त्व अर्थात् मननशीलतासे च्युत हुआ जीवात्मा स्थावर योनिमें साक्षी (उदासीन)-की भाँति स्थित रहता है। तात्पर्य यह कि स्थावर योनियोंमें जीवात्माका चित्त न तो सुषुप्तिकी तरह विलीन ही होता है और न जंगम प्राणियोंकी तरह चञ्चल ही रहता है; बल्कि मूढ़ मनुष्यकी तरह वह बीचकी-सी स्थितिमें रहता है। ज्ञातव्य ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! उन स्थावर योनियोंमें जीवात्मा विवेकशून्य और दुःखका प्रतीकार करनेमें असमर्थ रहता है; अतः उन स्थावर शरीरोंमें मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसा मैं मानता हूँ; क्योंकि वहाँ जीवात्मा कर्मेन्द्रियोंसे, ज्ञानेन्द्रियोंके व्यापारोंसे तथा मानस व्यापारोंसे शून्य हुआ केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! जिन स्थावर शरीरोंमें जीवात्मा एकमात्र सत्तारूपसे ही स्थित रहता है, वहाँ मुक्ति दुर्लभ है—ऐसा ही मैं भी मानता हूँ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! बुद्धिपूर्वक विचारने-पर यथार्थ वस्तुरूप परमात्माके साक्षात्कारसे चिन्मय सत्ताका जो सबमें समान भावसे अनुभव होता है, वही अविनाशी मोक्षपद है। परमात्मतत्त्वको यथार्थतः जान लेने-पर वासनाओंका जो उत्तम यानी अशेषरूपसे अभाव है, उसे ही सबमें समभावसे सत्तारूप मोक्षपद कहा गया है। ज्ञानी महात्मा पुरुषोंके साथ विचार करके और अध्यात्मभावनासे शास्त्रोंको समझकर सत्ता-सामान्यमें जो निष्ठा होती है, उसी निष्ठाको मुनिलोग परब्रह्म कहते हैं। यही परब्रह्मकी प्राप्ति है। जिसके भीतर मानस व्यापाररूप मनन भलीभाँति लीन हो गया है। तथा चारों ओरसे जिसमें वासनाएँ तिरोहित हो गयी हैं, वह जड़ वर्गवाली स्थावर जीवोंकी सुषुप्ति सैंकड़ों जन्म-रूपी दुःखोंको देती है। जड़ स्वभाववाले ये सभी वृक्ष-पहाड़ आदि स्थावर योनिके जीव सुषुप्ति अवस्थाको प्राप्त हुए-से पुनः-पुनः जन्मके भागी होते हैं। श्रेष्ठ श्रीराम ! जिस तरह बीजोंमें अङ्कुरसे लेकर पुष्पतक पदार्थ स्थित हैं एवं जिस तरह मिट्टीमें घट स्थित है, उसी तरह स्थावरोंके भीतर भी अपनी वासना स्थित है । वासना,
३७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अग्नि, ऋण, व्याधि, शत्रु, स्नेह, विरोध एवं विष—ये थोड़े-से भी शेष रहनेपर हानि पहुँचाते हैं । जिसका वासना-बीज ज्ञानाग्निसे दग्ध हो गया है और जिसने सत्त्वमें समान सत्तारूप परमात्माको प्राप्त कर लिया है, वह महात्मा पुरुष, चाहे सदेह हो या देहसे रहित पुनः कभी दुःखका भागी नहीं होता ।
श्रीराम ! आत्मदर्शनके विरोधी अज्ञानसे आवृत हुई यह चेतनशक्ति संसाररूप भ्रमको जन्म देती है और अज्ञानसे मुक्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश कर देती है । इस आत्मदृष्टिका जो अभाव है, उसीको विद्वान्लोग अविद्या कहते हैं । अविद्या जगत्की कारणभूत है, अतः उसीसे सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है । रूपरहित इस अविद्याका जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब तुरंत यह उसी प्रकार विनष्ट हो जाती है, जैसे घाममें तुषारके परमाणु गल जाते हैं । दीपकको प्रज्वलित करनेपर जिस प्रकार अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी तरह अच्छी प्रकार विचार करनेपर यह अविद्या नष्ट हो जाती है । वास्तवमें यह अविद्या कोई वस्तु न होनेसे असत् है और विचार न करनेसे ही दीख पड़ती है । रक्त, मांस तथा अस्थिमय इस देह-यन्त्रमें 'मैं स्वयं कौन हूँ ?' इस प्रकार जब विवेकपूर्वक विचार किया जाता है, तब देहके किसी भी पदार्थमें मैं-पन सिद्ध नहीं होता, वरं शरीरका अभाव हो जाता है । अपने अन्तःकरणके विवेक-विचारसे आदि-अन्तमें असद्रूप इस शरीर और संसारका परिहार कर देनेपर अविद्याका क्षय हो जाता है; फिर शेषमें एक परमात्मा ही रह जाता है । वही वास्तवमें शाश्वत ब्रह्म है । वही वास्तविक पदार्थ और उपादेय है; क्योंकि उसीसे अविद्या निवृत्त हो जाती है । 'अविद्या' इस अपने नामसे ही इसके अभावरूपका ज्ञान हो जाता है । वास्तवमें अविद्या नामकी कोई वस्तु कहीं भी नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् अखण्ड ब्रह्मस्वरूप ही है, जिस ब्रह्मने कार्य-कारणरूप इस सम्पूर्ण जगत्का निर्माण किया है । 'यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप नहीं है' इस प्रकारका निश्चय ही अविद्याका स्वरूप है और 'यह जगत् ब्रह्मरूप है' यह निश्चय ही उसका विनाश है । (सर्ग १०)
परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एवं महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण-निरोधरूप योगका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अज्ञान अत्यन्त बलवान् है । इसीका दूसरा नाम 'अविद्या' है । वह अन्य असंख्य जन्मोंसे चला आ रहा है, अतएव वह दृढ़ हो गया है । देहकी उत्पत्ति और विनाशमें, बाहर-भीतर—सर्वत्र समस्त इन्द्रियाँ उस अविद्याका ही निरन्तर अनुभव करती हैं, इसलिये वह अविद्या दृढ़ हो गयी है; क्योंकि परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान तो किसी भी इन्द्रियका विषय नहीं है । मनसहित छहों इन्द्रियोंका विनाश हो जानेपर वह सत्स्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही कायम रहता है । इन्द्रिय-वृत्तियोंसे अतीत होनेके कारण वह परमात्माका स्वरूप प्राणियोंको प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि प्राणी तो पदार्थोंका अनुभव मन-इन्द्रियोंके द्वारा ही करते हैं । रघुनन्दन ! जिस प्रकार परमात्मज्ञानके अभ्यासमें निरत राजा जनक परमात्मतत्त्वको यथार्थरूपमें जानकर भूमण्डलमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी विचरण करो । भगवान् नारायण जीवोंके कल्याणके लिये विभिन्न लीलाएँ करनेके जिस निश्चयसे पृथ्वी-पर नाना योनियोंमें अवतार लेते हैं, वही निश्चय वास्तविक यथार्थज्ञान है । रघुनन्दन ! जगदम्बा पार्वतीके साथ रहनेवाले त्रिनेत्र महादेवजीका या रागरहित ब्रह्माका जो
[निर्वाण-प्रकरण पू०] * परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन * ३७३
श्चय है, वही निश्चय वास्तविक है। तुम्हारा भी वही निश्चय होना चाहिये। देवगुरु बृहस्पति, शुक्राचार्य, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, महामुनि नारद, महर्षि अगस्त्य, अङ्गिरा, प्रचेता, भृगु, क्रतु, अत्रि, शुकदेव तथा अन्यान्य जीवन्मुक्त ब्रह्मर्षि और राजर्षि महात्माओंका तथा मेरा भी परमात्माके स्वरूपके विषयमें जो निश्चय है, वही निश्चय तुम्हारा होना चाहिये।
श्रीरामजी बोले—भगवन् ! ब्रह्मन् ! जिस निश्चयके कारण ये पूर्वोक्त महाबुद्धिमान् एवं धीर बृहस्पति आदि शोकरहित हुए स्थित हैं, उसका मुझसे तात्त्विक रूपसे वर्णन कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—समस्त जाननेयोग्य पदार्थोंको यथार्थतः जाननेवाले महाबाहु श्रीराम ! जो तुमने पूछा है, उसका उत्तर स्पष्टरूपसे सुनो। उनका यही निश्चय है, जो मैं बतला रहा हूँ। श्रीराम ! जो कुछ भी यह भोगरूप संसार-जाल स्थित दिखायी पड़ता है, वह सब निर्मल ब्रह्म ही है। ब्रह्म ही जीवात्मा है, चौदह भुवन ब्रह्म ही हैं, आकाशादि भूत भी ब्रह्म ही हैं, मैं भी ब्रह्मस्वरूप हूँ, मेरा शत्रु भी ब्रह्मस्वरूप है; सन्मित्र, बन्धु-बान्धव आदि भी ब्रह्म-स्वरूप हैं। तीनों काल भी ब्रह्मस्वरूप हैं, क्योंकि वे ब्रह्ममें ही अवस्थित हैं। जैसे समुद्र अपने आपमें तरङ्गोंके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही यह सच्चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें सांसारिक पदार्थ-सम्पत्तिके रूपमें प्रकट होता है। नेत्र-दोषके कारण आकाशमें बिना हुए ही भ्रान्तिसे वृक्षकी प्रतीति होती है, किंतु वास्तवमें वृक्ष नहीं है; इसी तरह ब्रह्ममें जो राग-द्वेष आदि दोष भ्रमसे प्रतीत होते हैं, वे वास्तवमें हैं ही नहीं; क्योंकि ये सब कल्पनामात्र हैं, इसलिये संकल्पके अभावसे इनका अत्यन्त अभाव हो जाता है। गमनागमन आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ भी ब्रह्ममें ही होती हैं; क्योंकि ब्रह्म ही अपने संकल्पसे अद्वितीय सुखरूपमें स्फुरित होता है, तब उसमें दुःख और सुख कैसे ? ब्रह्म ही स्वयं ब्रह्ममें तृप्त है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्थित है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्फुरित होता
है; अतः मैं भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ। क्योंकि घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, मैं भी ब्रह्म हूँ, यह विस्तृत जगत् भी ब्रह्मस्वरूप ही है, इसलिये यहाँ ब्रह्मके अतिरिक्त मिथ्या राग-वैराग्य आदिकी कल्पना ही नहीं हो सकती।
जिस प्रकार सुवर्णसे आभूषण और जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं हैं, वैसे ही प्रकृति ब्रह्ममें बिना हुए ही प्रतीत होती है, किंतु ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। यह जीवात्मा चेतन है और यह पदार्थ जड़ है—इस प्रकारका मोह अज्ञानियोंको ही होता है, ज्ञानीको कभी नहीं होता। जिस प्रकार अंधे मनुष्यको जगत् अन्धकाररूप और सुदृष्टिवालेको प्रकाशरूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार अज्ञानीको यह जगत् दुःखमय और ज्ञानीको सच्चिदानन्दमय प्रतीत होता है। सदा-सर्वदा सब ओर एकरस स्थित विज्ञानानन्दघन ब्रह्ममें न कोई मरता है और न कोई जीता है। जिस प्रकार महान् सागरके उल्लसित होनेपर भी उसमें तरङ्ग आदि न जन्मते हैं और न मरते हैं, उसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्ममें प्राणी न जन्मते हैं और न मरते हैं। जैसे जलमें तरङ्गोंके रूपमें प्रचुर जल ही स्थित है, वैसे ही अपने आपमें जगत्की शक्तिके रूपमें ब्रह्म ही स्थित है। जैसे जलमें जो कण, कणिका, वीचि, तरङ्ग, फेन और लहरी हैं, वे सब जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्ममें जो देह, मनका व्यापार, दृश्य, क्षय, क्षयका अभाव, भाव-रचना और अर्थ हैं, वे सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जिस प्रकार सुवर्णसे बनी आभूषणकी विभिन्न आकृति-रचनाएँ सुवर्णसे पृथक् नहीं होतीं, उसी प्रकार ब्रह्मसे उत्पन्न हुई चित्र-विचित्र देहादिकी आकृति-रचनाएँ भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकतीं। अज्ञानियोंको वृथा ही उसमें द्वित्वभावना होती है। मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ आदि सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं; अतः ब्रह्मसे भिन्न सुख और दुःखकी भी सत्ता नहीं है। ब्रह्मको ब्रह्म न जाननेसे अज्ञानीके लिये वह प्राप्त होते हुए भी अप्राप्त है, जिस तरह, सुवर्णका ज्ञान हुए बिना सुवर्ण प्राप्त हुआ