संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
६७० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इस तरह सर्वथा वासनाशून्य होकर वह शीघ्र ही निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो अनेक जन्मोंसे बद्धमूल अनेक शाखा-प्रशाखाओंसे सुशोभित तथा जन्म-मरणरूपी बन्धनमें डालनेवाली है, वह घोर वासना किस उपायसे पूर्णतः शान्त हो जाती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यथार्थ तत्त्वज्ञानसे जब यह भ्रममात्र दृश्यचक्र स्थूलरूपतासे रहित अनुभूत हो जाता है, तब क्रमशः उसकी वासनाका क्षय होने लगता है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जब दृश्यचक्र स्थूलाकारतासे रहित अनुभूत हो जाता है, तब और क्या होता है ? पूर्ण शान्ति कैसे होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! स्थूलाकारताका भ्रम मिट जानेपर जब जगत्की केवल चित्तमात्ररूपता अवगत हो जाती है और चित्तवृत्तियोंके निरोधसे जगत्में गौरवबुद्धि नहीं रहती है, तब जगत्के प्रति होनेवाली आस्था शान्त हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! चित्त कैसा है ? उसका विचार कैसे किया जाता है ? और उसके स्वरूपका भलीभाँति विचार कर लेनेपर क्या होता है ? यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! चेतनका चेतनीय विषयोंकी ओर उन्मुख होना ही चित्त कहलाता है। इस समय जो चर्चा चल रही है। यही इसका विचार है। इससे इसकी वासना शान्त हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चित्तके रहते हुए चेतनका अचेत्य परमात्माकी ओर उन्मुख होना कितनी देरके लिये सम्भव हो सकेगा ? (क्योंकि चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर ही परमात्मामें अटल स्थिति हो पाती है) अतः यह बताइये कि निर्वाण-पद प्रदान करनेवाली जो चित्तकी अचित्तता है, उसका उदय कैसे हो सकता है ? (दूसरे शब्दोंमें चित्तके नाशका ही उपाय बतानेकी कृपा करें।)
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जब चेत्य जगत्की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है, तब चितिशक्ति जीवात्मा कैसे और कहाँसे उसका चिन्तन या अनुभव करेगा ? चेत्यकी सत्ता न होनेसे चित्तकी सत्ता भी चिरकालसे ही नहीं है। फिर किसके नाशका उपाय बताया जाय ?
श्रीरामजीने पूछा—जिस चेत्यका सबको अनुभव होता है, उसका होना कैसे सम्भव नहीं है ? जिसका अनुभव हो रहा है, उसका इस तरह अपलाप, उसकी सत्ताको अस्वीकार कैसे किया जा रहा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अज्ञानीकी दृष्टिमें जो जगत्का स्वरूप है, वह सत्य नहीं है और ज्ञानीकी दृष्टिमें उसका जैसा स्वरूप है, वह अद्वितीय ब्रह्ममय होनेके कारण वाणीका विषय नहीं है। (अतः यहाँ अज्ञानियोंके ही जगत्की सत्ताका निराकरण किया गया है।)
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! अज्ञानियोंका त्रैलोक्य कैसा है और वह सत्य कैसे नहीं है तथा तत्त्वज्ञानियोंका जगत् जैसा है, वह वाणीका विषय कैसे नहीं हो सकता ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अज्ञानियोंका जो जगत् है, वह आदि-अन्तसे युक्त तथा द्वैतरूप है। परंतु तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह नहीं है। उनकी दृष्टिमें जगत्की सत्ता सम्भव ही नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही कभी उसकी उत्पत्ति नहीं हुई।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जो आदिकालसे ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसकी सत्ता कभी सम्भव नहीं है। वह असद्रूप और आभासशून्य है। यदि जगत्का भी यही स्वरूप है तो उसका अनुभव कैसे हो रहा है ?
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६७१
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जाग्रत्-जगत् स्वप्न जगत्के समान असत् होता हुआ ही सत्केतुल्य प्रतीत हो रहा है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई; क्योंकि उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। यह स्वप्नके तुल्य प्रकट होकर अर्थ-क्रियाकारी भी प्रतीत होता है।
श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! स्वप्न आदिमें और संकल्प एवं मनोरथ आदिमें जो दृश्यका अनुभव होता है, वह जाग्रत् व्यवहारके अनुभवसे उत्पन्न जाग्रत्-रूप संस्कारसे होता है। किंतु यह जाग्रत् किससे अनुभवमें आता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! यदि जाग्रतके संस्कारसे ही स्वप्नका भान होता है तो सपनेमें गिरा हुआ अपना घर कैसे प्रातःकाल जागनेपर सुरक्षितरूपसे उपलब्ध होता है।
श्रीरामजी बोले— भगवन् ! जाग्रत्-पदार्थका स्वप्नमें भान नहीं होता; किंतु अन्य पदार्थ ही स्वप्नमें भासित होता है। वह अन्य पदार्थ ब्रह्म ही है, यह बात मेरी समझमें आ गयी। अब इतना ही पूछना शेष है कि वह अन्य पदार्थरूप ब्रह्म अपूर्व जगत्के रूपमें कैसे भासित होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! सब कुछ अपूर्व-सा ही भासित होता हो, ऐसा नियम नहीं है। कोई पदार्थ जिसका पहले अनुभव नहीं हुआ है, चित्तमें अपूर्व प्रतीत होता है और कोई जिसका पहले अनुभव हो चुका है, अपूर्व नहीं प्रतीत होता। वह अनुभव सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें किये हुए अभ्यासके अनुसार ही भासित होता है।
श्रीरामजीने पूछा— ब्रह्मन् ! इस तरह आपके उपदेश-से यह बात तो समझमें आ गयी कि जाग्रत्-जगत् भी स्वप्नके समान ही है। किंतु यह स्वप्न-तुल्य प्रतीत होनेवाला जगद्रूपी यक्ष भी क्रूर ग्रहकी भाँति कष्ट देता है। अतः किस प्रकार इस रोगकी चिकित्सा की जाय?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! यह जो संसार-
रूपी स्वप्न है, इसका क्या कारण हो सकता है? कार्य-से कारण भिन्न नहीं है, यह बात सर्वत्र देखी गयी है। इस प्रकार इस विषयमें विचार करो।
श्रीरामजी बोले— स्वप्नकी उपलब्धिक कारण है चित्त। इसलिये स्वप्न-जगत् चित्तरूप ही है। इसी प्रकार आपके विचारसे यह जाग्रत्-जगत् भी जो आदि-अन्तसे रहित और असार है, चित्तरूप ही है। इस निश्चयसे जगत्-रूपी रोगकी चिकित्सा स्वतः सिद्ध है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— महामते ! मैं कह चुका हूँ कि चेतनका चेत्यकी ओर उन्मुख होना ही चित्त है। इस दृष्टिसे चित्त महान् चैतन्यघन ही है। वही जगत्के आकारमें स्थित है। अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्न, जाग्रत् आदि कुछ भी चिन्मय ब्रह्मसे भिन्न नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। इसलिये यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च अजर-अमर, शान्त, अजन्मा एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है।
श्रीरामचन्द्रजी बोले— भगवन् ! आपके सदुपदेशसे मैं यह मानता हूँ कि जीवात्माको भ्रान्तिके कारण द्रष्टापन और भोक्तापनके साथ सृष्टिके जन्म नाश आदि सारे भ्रम परमपद-स्वरूप परब्रह्ममें प्रतीत हो रहे हैं।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— राघवेन्द्र ! जो रससे भी रस-तत्त्वके ज्ञाता हैं— सारसे भी सार वस्तुको मथकर निकालने और जाननेमें समर्थ हैं, ऐसे विद्वानोंकी विचार-व्यापारसे युक्त जो कोई नवीन दृष्टि है, वह पहली है तथा समस्त विचारों और शास्त्रके श्रवण, मनन, निदिध्यासनके परिपाकसे परिनिष्ठित जो परम तत्त्वरूप अर्थ है, उसका अपरोक्ष अनुभव करानेवाली जो तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्माओंकी दृष्टि है, वह दूसरी है। उन्हीं दो दृष्टियोंका अवलम्बन करके मैंने सम्पूर्ण विश्वके स्वरूपपर तबतकके लिये इस प्रकार विचार किया और विचार करना आवश्यक समझा है, जबतक कि यह बोध न हो जाय
सं० यो० व० उ० २४-
६७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
कि जितनी भी दृष्टियाँ और उनके द्रष्टाके द्रष्टापन हैं, वे सब त्रिकालमें भी नहीं हैं। सारा जगत्-असत् है—शून्य है। उसकी प्रतीति भ्रममात्र है। वस्तुतः तो न
कोई शून्यता है और न भ्रम ही है। नित्य-निरन्तर, सर्वत्र एकमात्र अपरोक्ष परमानन्दस्वरूप परब्रह्म ही विराजमान है। (सर्ग १९०)
अज्ञानसे ब्रह्मका ही जगतरूपसे भान होता है। वास्तवमें जगत्का अत्यन्ताभाव है और एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है, इस तत्त्वका प्रतिपादन
श्रीरामजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! यदि ऐसी बात है तब तो यह सारा जगत् सदा सर्वपदार्थरूप परमार्थमय ब्रह्म ही है, जो न कभी उत्पन्न होता है और न कभी नष्ट ही होता है। जगत्की प्रतीतिका रूपमें यह भ्रान्ति ही भासित हो रही है। तात्त्विक दृष्टिसे तो वह भ्रान्ति भी नहीं है, केवल परब्रह्मकी ही सत्ता है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! दृश्यकी उत्पत्ति सम्भव न होनेके कारण न द्रष्टा है और न दृश्य ही है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन आदिकी त्रिपुटी कुछ नहीं है। केवल निर्विकार चिदाकाश ही है। जैसे स्वप्न आदिमें एक ही पुरुष द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीरूप होता है, वैसे ही जाग्रत्में भी एकमात्र वह जीवात्मा ही स्वयं द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीको धारण करके विराजमान होता है। अतः भासने योग्य पदार्थ, भान तथा भासक स्वयंप्रकाश चेतन ही है, सर्ग आदिमें सृष्टिके तुल्य स्फुरित होता हुआ वह स्वयं ही प्रकाशित होता है। अज्ञानी लोगोंको यह सृष्टि भले ही आश्चर्यके तुल्य प्रतीत
हो। परंतु ज्ञानी महात्माओंकी दृष्टिमें तो यह स्वभावभूत ब्रह्मरूप ही है। सृष्टिके आदिमें जब कि एक विशुद्ध चेतन ही विद्यमान है, तब उसमें संसारकी उत्पत्तिका क्या कारण हो सकता है? दृश्यकी सत्ता किसी तरह भी सम्भव न हो सकनेके कारण केवल ब्रह्म ही जगतरूपसे भासित हो रहा है। इस तरह चिदाकाशस्वरूप परमात्मा ही सृष्टिके आरम्भमें सृष्टिरूपसे स्फुरित होता है। अतः यह जो जगत् है, परमात्मा ही है। शून्यता और आकाशके भेदकी कल्पनाके समान जगत् और ब्रह्मके भेदकी कल्पना भी अज्ञानमात्र ही है। श्रीराम! इस तत्त्वको समझ लेनेपर भी जबतक यह सुन्दर अनुभवसे युक्त एवं दृढ़ न हो जाय, तबतक साधकको पाषाणकी भाँति मौन एवं निर्विकल्प होकर एकमात्र परमात्मामें ही स्थित रहना चाहिये। जिन विषयभोगोंको बार-बार भोगकर परम वैराग्यके कारण त्याग दिया गया है, उन्हें अज्ञानी पुरुषोंके कहनेपर भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। (सर्ग १९१)
श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे ज्ञानी महात्माकी स्थितिका एवं अपने परब्रह्मस्वरूपका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी बोले—मुने! यहाँ सब कुछ शान्त, आलम्बनरहित, विज्ञानस्वरूप, अनन्त, रागशून्य, कल्पना-रहित एवं विशुद्ध अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही है। उसके अतिरिक्त न यह दृश्य है न द्रष्टा है न सृष्टि है, न जगत् है, और न जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि ही है। यह जो कुछ दीखता है वह सब असत् ही
है। मुने! इस भ्रान्तिकी उत्पत्ति कहाँसे होती है? इस बातका विचार करना भी उचित नहीं है; क्योंकि भ्रान्तिके अभावका अनुभव हो जानेपर भ्रान्ति रहती ही नहीं, तब उसके कारणका विचार करना कहाँतक संगत हो सकता है? निर्विकार एवं ज्ञानस्वरूप परब्रह्ममें भ्रान्ति हो ही नहीं सकती। यह जो भ्रान्तिरूपताका ज्ञान है वह
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त स्थितिका वर्णन * ६७३
भी ब्रह्मरूप ही है। ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। जैसे मृगतृष्णामें जलका, गन्धर्वनगरका और नेत्रदोषके कारण उत्पन्न दो चन्द्रमाका भ्रम विचारसे उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार अविद्या नामक भ्रमकी भी विचारसे उपलब्धि नहीं होती। मुने ! वह भ्रान्ति कहाँसे आयी और क्यों आयी, यह प्रश्न भी यहाँ शोभा नहीं पाता है; क्योंकि जो वस्तु है, उसीपर विचार करनेसे लाभ होता है। जो है ही नहीं, उसपर विचार करनेसे क्या लाभ होगा ? इसलिये कभी कोई भ्रान्ति सम्भव नहीं है। यह आवरणरहित नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही सब ओर व्याप्त है। आज यहाँ जो कुछ भी जगत् भासित होता है, यह परब्रह्म ही है। निरतिशय आनन्दसे परिपूर्ण परब्रह्ममें यह पूर्ण परब्रह्म ही विराज रहा है। जन्मरहित, अमर, इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेके अयोग्य, श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सेवित, निर्विकार तथा सब ओरसे निर्दोष परमपदरूप परमात्मा ही सब ओर परिपूर्ण हो रहा है। वही 'अहम्' (मै) पदसे कहा गया है। फिर भी वह अहंकारसे सर्वथा रहित है। अनेक रूपसे प्रतीत होनेपर भी वह एक है तथा विशुद्ध एवं सदा प्रकाशमान है।
आदि, मध्य और अन्तसे रहित जिस परमपदको देवता तथा ऋषि भी नहीं जानते हैं, वही यह सर्वत्र प्रकाशित हो रहा है। कहाँ है जगत् और कहाँ उसकी दृश्यता ! द्वैत और अद्वैतकी भावनाको उभारने-वाले जो वाक्य संदेह और भ्रम हैं, उनसे हमारा क्या प्रयोजन है ? वास्तवमें सबका आदि, अनामयस्वरूप एक परम शान्त ब्रह्म ही परिपूर्ण है। अपरिच्छिन्न उदयवाले—सर्वव्यापी इस परब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर अज्ञानीकी दृष्टिमें स्फुरित होनेवाला संसाररूपी पिशाच तत्त्वज्ञकी दृष्टिमें नष्ट हो जाता है। वह जडकी भाँति व्यवहारमें लगा हो तो भी उस ज्ञानीकी पूर्वकी भेदबुद्धि उसी तरह गल जाती है, जैसे जलके भीतर कङ्कर नष्ट हो जाती है। यहाँ वास्तवमें न तो अज्ञान है, न भ्रम है, न दुःख है और न सुखका उदय ही है। विद्या-अविद्या, सुख-दुःख—सब कुछ निर्मल ब्रह्म ही है। जितना और जो भी यहाँ है, वह सब विशुद्ध सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। ब्रह्मन् ! वह ब्रह्म मैं ही हूँ। सदा ही सब कुछ एकमात्र मैं ही हूँ। मेरा कहीं अन्त नहीं है। मैं परम शान्त हूँ, सब कुछ हूँ, अथवा कुछ नहीं हूँ। एकमात्र सत्-स्वरूप ही हूँ अथवा वह भी नहीं हूँ, मैं ही परम आश्चर्यरूप निर्वाण नामक परमशान्ति-स्वरूप हूँ।
(सर्ग १९२-१९३)
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त एवं संकल्पशून्य स्थितिका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुने ! जिसको बोध प्राप्त हो गया है, वह ध्यानस्थ महात्मा केवल अपने चिल्लक्षभाव-में स्थित रहता है। वह न कुछ ग्रहण करता है और न कुछ त्याग ही करता है। समाधि या ध्यानसे उठनेपर भी वह सदा जैसे-का-तैसा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, जैसे दीपक प्रकाश फैलाता हुआ भी कुछ करता नहीं है, वैसे ही ज्ञानी सब कुछ देखता हुआ भी निष्क्रिय बना रहता है। वह मनके मननसे युक्त होनेपर भी कही आसक्त न होने-के कारण बाह्यरूपमें मन, अभिमान और मननसे रहित ही है। उस योगीको समाधिसे उठनेपर विश्वरूप नामक और समाधिकालमें ब्रह्म नामक चिन्मात्रस्वरूप परमार्थ सत्यका ही सर्वत्र दर्शन होता है। उसे सृष्टि और संहार सब चिन्मात्र ही प्रतीत होते हैं। संसार त्रिविध तापोंसे अत्यन्त संतप्त है और निर्वाण अत्यन्त शीतल है (क्योंकि उसमें समस्त तापोंकी शान्ति हो जाती है)। वास्तवमें अत्यन्त शीतल निर्वाण ही शाश्वत है। यह तप्त संसार तो तीनों कालोंमें है ही नहीं। जैसे स्वप्नमें अपने भाई-बन्धुके मरने या जीनेपर भी स्वप्नसे जागे हुए पुरुषकी उस स्वप्नगत
यो० वा० सं० ८५—
६७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ
वृत्तान्तमें सत्यता-बुद्धि नहीं होती (अतएव उसे वहाँकी घटनासे हर्ष और शोक नहीं होते हैं)। वैसे ही तत्त्वज्ञानी पुरुषको दृश्य पदार्थोंमें सत्यता-बुद्धि नहीं होती (इसलिये अनुकूल-प्रतिकूल घटनाओंसे उसे हर्ष-शोकका अनुभव नहीं होता।)। भगवन् ! सम्यक् ज्ञान होनेपर देहसे सम्बन्ध रखनेवाले भोगपदार्थों और उनकी प्राप्तिके उपायोंसे ज्ञानीको उसी तरह सर्वथा विरक्ति रहती है, जैसे स्वप्नसे जगे हुए पुरुषकी स्वप्नगत पदार्थोंमें ममता और आसक्ति नहीं रहती। वैराग्यसे बोधकी और बोधसे वैराग्यकी वृद्धि होती है। वे दीवाल और प्रकाशके समान एक-दूसरेसे अभिव्यक्त होते हैं। अन्धकारमें दीपक जलानेसे दीवाल अभिव्यक्त होती है और दीवालपर पड़नेसे प्रकाशकी विशेष अभिव्यक्ति होती है। जिस बोधसे वैराग्य सम्पन्न होता है, वस्तुतः उसीका नाम बोध है। जिससे धन, स्त्री, पुत्र आदिकी सुख-सुविधा-वृद्धि पहलेसे भी बढ़ जाती हो, वह बोध या बुद्धिमानीके रूपमें जड़ता ही स्थित है। बोधका बोधत्व इतना ही है कि उससे वैराग्यकी वृद्धि हुई अर्थात् वैराग्य होनेसे ही बोध सार्थक समझा जाता है। जिस पुरुषमें वैराग्य नहीं है, उसकी विद्वत्ता भी मूर्खता ही है। बोध और वैराग्यरूपी उत्कृष्ट सम्पत्ति ही मोक्ष कहलाती है। उस मोक्षरूप अनन्त शान्तपदमें स्थित हुए पुरुषको कभी शोक नहीं करना पड़ता। जो सदा अपने आत्मामें ही रम रहा है, शान्त, विरक्त एवं अहंकाररहित हो गया है, उस ज्ञानी पुरुषकी आकाशके समान संकल्प-रहित एवं निर्मल स्थिति हो जाती है। सहस्र-सहस्र प्रयत्न-शील पुरुषोंमेंसे कोई बिरला ही ऐसा बलवान् और उत्साही होता है, जो उठकर वासनाजालको उसी तरह छिन्न-भिन्न कर देता है, जैसे कोई-कोई सिंह पिंजड़ेको तोड़ डालता है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उस पुरुषके भीतर वासनाशून्य भाव प्रकट होनेपर उसे यह सुदृढ़ बोध प्राप्त हो जाता है कि सारा दृश्य ब्रह्म ही है। इससे उसकी बुद्धि एकमात्र निर्वाणरूप परब्रह्ममें ही सुस्थिर हो जाती है। तत्पश्चात् उसमें मोक्ष नामक अनन्त शान्तिका उदय होता है।
(सर्ग १९४)
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्की असत्ता एवं 'सर्वं ब्रह्म' के सिद्धान्तका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानवान् पुरुषकी समाधि-अवस्थामें अथवा व्यवहारकालमें जो शिलाके समान घनीभूत निश्चल स्थिति है, वह निर्मल मुक्ति कहलाती है। राघव ! पाप और दुःखका निवारण करनेवाले उस मोक्षपदमें स्थित होकर हमलोग समाधि और व्यवहारमें भी इसी तरह समभावसे रहते हैं।
श्रीराम बोले—ब्रह्मन् ! जैसे मृगतृष्णामें जल, समुद्र आदिके जलमें तरङ्ग और भँवर, सुवर्णमें कटक-कुण्डल आदि आभूषण तथा स्वप्न और संकल्पमें पर्वत—ये सब बिना हुए ही प्रतीत होते हैं, वैसे ब्रह्ममें यह जगत् कभी उत्पन्न नहीं हुआ, कभी प्रकाशमें नहीं आया। उसका आरम्भ भी नहीं हुआ और उसमें कोई आकार भी नहीं है। इस प्रकार सर्वथा असत् होकर भी वह अज्ञानियोंको भासित होता है। पहले ही यह कुछ भी कभी उत्पन्न नहीं हुआ; क्योंकि इसकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। इसलिये वन्ध्यापुत्रके समान इस जगत्की सत्ता केवल काल्पनिक है। कल्पनाके सिवा और किसी रूपमें इसकी सत्ता नहीं है। इस जगत्-भ्रान्तिका कारण ही क्या है, जिससे यह प्रकट होती ? कारणके बिना किसी भी कार्यका होना कहीं भी सम्भव नहीं है। वस्तुतः निर्विकार, अजर, अमर ब्रह्म भी इसका कारण नहीं हो सकता; क्योंकि पूर्वावस्थाका क्षय हुए बिना कोई भी वस्तु यहाँ कहीं भी सविकार नहीं हो सकती। यदि वाणीका अविषय ब्रह्म ही कारणरूपसे विद्यमान है तो कहाँ, किसको और किस प्रकार जगत् शब्दके अर्थकी प्रतीतियाँ होंगी। वास्तवमें यह जगत् आकाशके समान निर्मल, शिलाके समान घनीभूत
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्की असत्ताका प्रतिपादन * ६७५
और पाषाणके समान मौन, शान्त, अक्षय ब्रह्म ही है। यह परम समस्वरूप, एक, अनादि, अनन्त, शान्त ब्रह्म, महाकाश ही है। इसमें जगत्की बात ही कहाँ है ? जैसे जलमें लहरोंके उठने और शान्त होनेसे जलमें भिन्नता नहीं आती, उसी प्रकार ब्रह्ममें सृष्टि और प्रलयसे भी कोई भिन्नता नहीं आती। सारासार-तत्त्वके ज्ञाता कोई महात्मा पुरुष इस विशुद्ध परमपदमें उसी तरह एकताको प्राप्त हो जाते हैं, जैसे जलकी बूँद जलराशिमें मिलकर एक हो जाती है। परब्रह्म परमात्मामें परब्रह्मस्वरूप ही जो अपर जगत्—भासित होता है, वह विचार करनेसे परब्रह्म ही सिद्ध होता है; क्योंकि निर्मल, शान्त, परब्रह्ममें जगत् और उनके व्यवहारोंका होना सम्भव नहीं है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—रघुनन्दन ! यदि ऐसा मान लें कि यह दृश्य जगत् कारणभूत ब्रह्ममें उसी प्रकार स्थित है, जैसे बीजमें अङ्कुर तो यहाँ सृष्टि आदिकी सत्ता कैसे नहीं सिद्ध हो सकती ?
श्रीरामने कहा—मुने ! बीजमें अङ्कुर यदि अङ्कुररूपसे ही रहता तो उसमें ढूँढ़नेपर मिलता। किन्तु बीजको फोड़कर देखनेपर वह दिखायी नहीं देता है। यदि कहीं बीजके भीतर अवयवोंकी सूक्ष्म सत्ता है तो वह तो बीज ही है, अङ्कुर नहीं है। ब्रह्मके भीतर भी जगत्की सत्ता इसी तरह सिद्ध नहीं होती है। जो जगत्-सत्ता उपलब्ध होती है, वह यदि सूक्ष्मरूपसे ब्रह्ममें हो तो वह तो नित्य ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म अविकारी है। अतः ब्रह्मसे भिन्न जगत्की सत्ता कदापि सिद्ध नहीं होती है। यह जो कोई अनिर्वचनीय जगत् दीखता है, तत्त्वज्ञान हो जानेपर अनुभवमें ही नहीं आता है। अज्ञानावस्थामें भी प्रतीत होनेके कारण सत्, और वस्तुतः असत्तासे परिपुष्ट यह जगत् स्वानुभवैकगम्य होनेसे अनिर्वचनीय ही है। सारा प्रपञ्च परम शान्त, निष्क्रिय, अखण्ड, आभासशून्य, अनादि, अनन्त एवं स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही है। मुझे अपने उस परमात्मस्वरूपका यथार्थ अनुभव है, जो जन्म और मृत्युसे रहित, शान्त, अनादि, अनन्त, महान्, उपाधिशून्य और निराकार है। जो संवित् (चित्तवृत्ति) भीतर स्फुरित होती है, वही वाक्यरूपमें बाहर प्रकट होती है। जैसे जो बीज भूमिमें बोया गया है, वही अङ्कुररूपसे प्रकट होता है। यह जगत् अज्ञानीकी दृष्टिमें सत्य है और ज्ञानवान्की दृष्टिमें मिथ्या। जो इसे ब्रह्म-रूपमें देखता है, उसके लिये ब्रह्म है तथा जो शान्त महात्मा पुरुष हैं, उनके लिये यह शान्त होकर अन्तमें शून्यरूप ही रह जाता है। ब्रह्मन् ! मैं चिदाकाश हूँ। आप चिदाकाश हैं। चित् चिदाकाश है। जगत् चिदाकाश है और चिदाकाश स्वयं चिदाकाश है। आप एकमात्र चिदाकाश-भावको प्राप्त हो एकाकाशरूपतामें ही स्थित हैं। गुरुदेव ! आप मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और ब्रह्माकाशभावमें ही स्थित हैं। मैं अपने आकाशतुल्य विशुद्ध स्वरूपानुभवके द्वारा सर्वात्मक चिदाकाश-सदृश आपको ज्ञेय, पूर्णानन्द ब्रह्मसे अभिन्न जानकर प्रणाम करता हूँ। वास्तवमें चित्-स्वरूप होनेके कारण ही यह जगत् बिना किसी कारणके ही उसमें उत्पन्न और विलीन होता-सा भासित होता है। अतः यह निर्मल परमाकाशरूप ही है। सम्पूर्ण शास्त्रीय युक्तियों तथा समस्त पदोंसे अतीत जो निर्द्वन्द्व ब्रह्मपद है, उसीको पाकर आप ब्रह्माकाशस्वरूप हो गये हैं। समस्त शास्त्रोंके अर्थोंसे परे, चिह्न अथवा आकारसे रहित, नामरूपसे हीन, अनुभव-स्वरूप, शुद्ध, चिन्मय, एक, अजन्मा एवं सबका आदि निर्मल चिदाकाश ही यहाँ विराजमान है। उसमें किसी प्रकारके नामकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। उस ब्रह्ममें मलकी आशङ्का ही व्यर्थ है—वह नित्य निर्मल सच्चिदानन्दघन है।
(सर्ग १९५)
६७६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामचन्द्रजीके प्रश्नके अनुसार उत्तम बोधकी प्राप्तिमें शास्त्र आदि कैसे कारण बनते हैं, यह बतानेके लिये श्रीवसिष्ठजीका उन्हें कीरकोपाख्यान सुनाना—लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे कीरोंका सुखी होना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—दूसरोंको मान देनेवाले गुरुदेव ! जो यह सत्स्वरूप ब्रह्म केवल अपने अनुभवसे ही जानने योग्य है, बड़े-बड़े महापुरुषोंकी वाणी भी इसका यथार्थ निरूपण नहीं कर सकती। ऐसी अवस्थामें समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित जो परम ज्ञेय ब्रह्म स्वयं प्रकाशरूप है तथा जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंसे अतीत तुरीयरूपसे उपलब्ध होता है, वह अत्यन्त दुर्गम (दुर्बोध) हो गया है (क्योंकि गुरु और शास्त्र आदि जाग्रत् अवस्थाके ही अन्तर्गत हैं। उनसे) उस तुरीय पदका ज्ञान होना कठिन है। विकल्परूपी सारवाले शब्द-अर्थरूप शास्त्रोंसे ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर भ्रान्तिरूप अनर्थपरम्पराकी प्राप्तिके लिये गुरु, शास्त्र आदिकी कल्पना क्यों की गयी है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! गुरु और शास्त्र आदि जिस प्रकार उत्तम बोधके प्रति कारण होते हैं, वह संक्षेपसे बताता हूँ, सुनो—कभीकी बात है, कीरक देशमें कुछ ऐसे लोग थे, जो बहँगी ढोकर जीवन-निर्वाह करते थे। वे चिरकालसे दरिद्रता एवं दुर्भाग्यका सामना करते थे। दुःखसे वे इस तरह सूख गये थे, जैसे ग्रीष्मकी प्रचण्ड धूपसे पुराने पेड़ सूख जाते हैं। वे चिथड़ोंकी गुदड़ी सीकर उसे ओढ़ते थे। दुरन्त दरिद्रताके कारण उनका मुँह उदास और हृदय दुखी रहता था। जैसे तालाबका पानी निकल जानेसे कमल सूखने लगते हैं, उसी तरह वे भी क्षीण हो रहे थे। अपनी दुर्गतिसे संतप्त होकर उन लोगोंने आजीविकाके लिये विचार किया कि हम लोग किस युक्तिसे अपना पेट भर सकते हैं। इस विषयपर विधिपूर्वक सोच-विचारकर वे इस निश्चयपर पहुँचे कि हमलोग दिनभर सुबहसे शामतक लकड़ीका बोझ ढोयेंगे और उसीको बेचकर जीविका चलायेंगे। ऐसा निश्चय करके वे लकड़ी लानेके लिये वनके भीतर गये। वे जिस किसी युक्तिसे जीविका चलाते थे, वही आपत्तिमें पड़ जाती थी। वे जिस दिन जो कमाते, उसी दिन वह खा जाते थे। इस तरह प्रतिदिन जंगलमें जाकर वहाँसे लकड़ी लाने और उसे बेचकर किसी तरह जीवन-निर्वाह करने लगे। जिस वनके भीतर वे जाते थे, उसमें गुप्त और प्रकटरूपसे सब प्रकारके रत्न, उत्तमोत्तम काष्ठ और सुवर्ण भी थे। उन बोझ ढोनेवाले लकड़हारोंमेंसे कुछ लोग कुछ ही दिनोंमें उन सुवर्णों और रत्नोंको भी पा गये। मानद ! कुछ कीरकनिवासी चन्दनकी लकड़ियाँ, कुछ अच्छे-अच्छे फूल और फल ला-लाकर बेचते और चिरकालतक उनसे जीविका चलाते रहे। कुछ खोटी बुद्धिवाले भाग्यहीन लोग, जो वनकी गलियोंमें घूम-घूमकर जीविका चलानेवाले थे, कभी अच्छी चीजोंको न पाकर खराब लकड़ियाँ ही लाते और उन्हें बेचकर जीवन-निर्वाह करते थे। लकड़ी लानेके लिये उद्यत रहनेवाले वे सब लोग एक बार एक महान् जंगलमें पहुँच गये। वहाँ कुछ लोग उत्तमोत्तम रत्न आदि पाकर दरिद्रतारूपी ज्वरसे शीघ्र ही मुक्त हो गये। एक दिन उस वनके एक प्रदेशसे एक लकड़हारेको चिन्तामणि नामक मणि प्राप्त हो गयी। उस चिन्तामणिसे उन्हें सारे धन-वैभव मिल गये। और वे सभी वहाँ परम सुखी हो बड़े आनन्दसे रहने लगे। लकड़ी लानेके लिये उद्यत होकर वे वनमें जाते थे किन्तु सौभाग्यवश उन्हें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंको देनेवाली मणि मिल गयी और वे स्वर्गके देवताओंकी भाँति निर्द्वन्द्व हो सुखसे रहने लगे। लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे ही बहुमूल्य चिन्तामणि पाकर वे उसके द्वारा समस्त धन-वैभवके सार-सर्वस्वसे सम्पन्न हो महान्
निर्वाण प्रकरण उ०] * कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र-गुरुको कारण बताना * ६७७
बन गये। उनके दरिद्रताजनित भय, मोह, विषाद और दुःख सदाके लिये मिट गये और वे मन-ही-मन आनन्दमें मग्न रहकर दूसरी लाभ-हानिके विषयमें समताको प्राप्त हो गये। (सर्ग १९६)
कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना
श्रीरामचन्द्रजी बोले—दूसरोंको मान देनेवाले मुनिश्रेष्ठ ! ऐसी कृपा कीजिये जिससे बहँगी ढोनेवाले उन कीरकोंके इस प्रसंगका तात्पर्य भलीभाँति समझमें आ जाय और कोई संदेह न रह जाये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महातपस्वी श्रीराम ! ये जो भूमण्डलके मनुष्य हैं, ये ही वे बहँगी ढोनेवाले कीरक हैं और उनका जो दारिद्र्यजनित दुःख था, वह इन मनुष्योंका महान् अज्ञान है। जो महान् वन बताया गया है, वह सद्गुरु, सत्-शास्त्र आदिका क्रम है। वे जो आहार जुटानेके लिये उद्योगशील थे, उसके द्वारा इन भोगार्थी मनुष्योंकी ओर संकेत किया गया है। अत्यन्त कृपण मनुष्य अन्य सब कार्योंकी उपेक्षा करके मुझे भोगराशियाँ प्राप्त हों, इस उद्देश्यसे शास्त्र आदिमें—उनके बताये हुए उपायोंमें प्रवृत्त होता है। भोगपरवश होकर भोग-सामग्रीके लिये ही शास्त्रोंमें प्रवृत्त होनेपर भी जीव क्रमशः अभ्यास करके अपने लिये परम अभीष्ट आदिपद (परब्रह्म परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है। जैसे लकड़ीके लिये उद्यत हुए भारवाहकको मणि प्राप्त हो गय, वैसे ही भोग-संग्रहके लिये शास्त्रमें प्रवृत्त हुए मनुष्य भी निष्काम भावसे शास्त्रोक्त साधनोंका अनुष्ठान करके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई यह सोचकर कि 'देखूँ तो शास्त्र और विवेक-विचारसे क्या लाभ होता है' यों सन्देहयुक्त कौतूहलवश शास्त्रोंमें प्रवृत्त होता है। फिर तदनुकूल साधन करके उत्तम पदको प्राप्त कर लेता है। जिसे परब्रह्मरूप उत्तम तत्त्वका साक्षात्कार नहीं हुआ, वह पुरुष धन और भोगके लिये सन्देहपूर्वक शास्त्र आदिमें प्रवृत्त होता है (जब उसे अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे शास्त्र आदिपर पूरा विश्वास हो जाता है, तब तदनुकूल पारमार्थिक साधनोंका आश्रय लेकर) वह उस परमपदको प्राप्त कर लेता है। लोग अपनी वासनाके अनुसार किसी और ही प्रकारके फलकी आशासे शास्त्रोक्त साधनोंमें प्रवृत्त होते हैं, परन्तु बहँगी ढोनेवाले कीरकोंको जैसे मणि मिल गयी, वैसे ही उन्हें भी और ही उत्कृष्ट-फल (मोक्ष) की प्राप्ति हो जाती है।
जो स्वभावसे ही निरन्तर परोपकारमें लगा होता है, वह साधु कहा गया है। उसकी चेष्टा, उसका आचार-व्यवहार सबके लिये प्रमाण होता है। साधु पुरुषोंके सदाचारसे प्रेरित होकर ही अज्ञानी लोग शास्त्रोक्त फलमें संदेह रहते हुए भी भोगप्राप्तिकी आशासे शास्त्र आदिमें प्रवृत्त होते हैं। भोगके लिये शास्त्रोक्त कर्ममें प्रवृत्त हुआ पुरुष उससे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है, जैसे लकड़ीकी इच्छा रखनेवाले कीरकको वनसे चिन्तामणि प्राप्त हो गयी थी। जिस प्रकार वनसे किसीको चन्दन काष्ठ, किसीको साधारण रत्न और किसीको चिन्तामणि मिल जाती है, उसी प्रकार शास्त्रसे कोई काम, कोई अर्थ, कोई धर्म, कोई धर्म-अर्थ-काम तीनों और कोई सम्पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। रघुनन्दन ! शास्त्र आदिमें त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का ही मुख्यरूपसे उपदेश है। ब्रह्मकी प्राप्ति तो वाणीका विषय ही नहीं है। इसलिये ब्रह्मका प्रतिपादन करने-वाले शास्त्रोंमें भी पद और वाक्योंकी मुख्य वृत्तिसे उसका निरूपण सम्भव नहीं हो सका है। जैसे वसन्त आदि ऋतुओंकी शोभा उनके लाये हुए फूल, फल और पल्लव आदिकी उत्पत्तिसे सूचित होती हुई स्वयं अपने अनुभवसे ही प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्मकी प्राप्ति
६७८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शास्त्रके सम्पूर्ण वाक्यार्थोंसे व्यञ्जनावृत्तिद्वारा ध्वनित होती हुई केवल अपने अनुभवसे ही जानी जाती है। जैसे सुन्दरी युवतीमें मणि, दर्पण और चन्द्रमा आदि सबसे बढ़कर लब्ध लावण्य उपलब्ध होता है, वैसे ही यद्यपि शास्त्रमें धर्म आदि तीनों वर्गोंसे उत्कृष्ट ब्रह्मज्ञान विद्यमान है, तथापि समस्त पदोंसे परे जो परम बोध है, यह अश्रद्धालु मनुष्यको न तो शास्त्रसे, न गुरुके उपदेश-वाक्यसे, न दानसे और न ईश्वरके पूजनसे ही प्राप्त होता है। रघुनन्दन ! ये शास्त्र आदि यद्यपि अश्रद्धालुको ब्रह्म-प्राप्ति करानेमें कारण नहीं हैं, तथापि श्रद्धालुको एकमात्र परमात्मामें विश्राम प्राप्त करानेके पूर्णतः कारण बन जाते हैं; कैसे ? सो बताया जाता है, सुनो। शास्त्रका बारंबार अभ्यास करनेसे श्रद्धालुका चित्त विशुद्ध हो जाता है, तब वह अनायास शीघ्र ही उस पावन परमपदका साक्षात्कार कर लेता है। सत्-शास्त्रसे अविद्याका सात्त्विक भाग उन्नत बनाया जाता है और उस सात्त्विक भागसे इसका तामसिक भाग क्षीण हो जाता है। सत्-शास्त्ररूपी उत्कृष्ट जलसे अविद्याजनित मलको धोनेवाला पुरुष अचिन्त्य वस्तु-शक्तिके प्रभावसे परम शुद्धिको प्राप्त कर लेता है। जैसे ईखके रससे अपने ही अनुभवसे स्वादिष्ट माधुर्यकी उपलब्धि होती है, उसी प्रकार सत्-शास्त्र और सद्गुरुके उपदेशरूप उपायसे 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यार्थका साररूप आत्मज्ञान प्राप्त होता है। जैसे आकाशमें आलोकके सब ओर फैले रहनेपर भी प्रभा और दीवालके संगसे ही वह सुस्पष्टरूपसे अनुभवमें आता है, उसी प्रकार महावाक्यके श्रवण और उसके अधिकारी पुरुषके योगसे ही आत्मज्ञानका अपरोक्ष अनुभव होता है। वही शास्त्रश्रवण सफल है, जिससे ज्ञान प्राप्त होता है, वही ज्ञान सफल है, जिससे समता प्राप्त होती है और वही समता सफल है, जिसके जाग्रत् होनेपर जाग्रत्में भी सुषुप्तिकी भाँति परमात्माके स्वरूपमें निर्विकल्प स्थिति हो जाती है। इस प्रकार यह सब कुछ सत्-शास्त्र एवं सद्गुरुके उपदेश आदिसे प्राप्त हो जाता है। इसलिये पूरा प्रयत्न करके सत्-शास्त्र आदिका अभ्यास करना चाहिये। श्रीराम ! शास्त्रोंके अर्थका विचार करनेसे, गुरुजनोंके उपदेश-वाक्यसे, सत्संगसे, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-शरण—इन नियमोंके पालनसे और मन एवं इन्द्रियोंको वशमें करनेसे वह सम्पूर्ण विश्वपदसे अतीत, सर्वेश्वर, सबका आदि, अनादि एवं सच्चिदानन्दमय परमपद प्राप्त होता है।*
(सर्ग १९७)
श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलतिलक राम ! बोधकी दृढ़ताके लिये मैं पुनः कुछ बातें बता रहा हूँ, सुनो। जो बात बार-बार कही जाती है, वह अज्ञानीके हृदयमें निश्चय ही बैठ जाती है। रघुनन्दन ! पहले मैंने स्थिति-प्रकरणका वर्णन किया था, जिससे यह बात भलीभाँति समझमें आ जाती है कि इस प्रकार उत्पन्न हुआ जगत् केवल भ्रममात्र है। तत्पश्चात् उपशमकी युक्तियोंद्वारा यह बात बतायी गयी थी कि इस जगत्में उत्पन्न हुए प्रत्येक पुरुषको उत्कृष्ट उपशमके गुणसे गौरवशाली होना चाहिये। उपशम प्रकरणमें कहे गये उपशमके क्रमिक साधनोंद्वारा मनुष्यका अत्यन्त उपशान्त होकर यहाँ संतापरहित हो जाना चाहिये। जिसने प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर लिया है, उस तत्त्वज्ञानी-को सांसारिक व्यवहारोंमें कैसे रहना चाहिये, यह थोड़ी-सी बात मेरे मुँहसे तुम्हें और सुननी है। जगत्में जन्म पाकर
* शास्त्रार्थभावनवशेन गिरा गुरूणां सत्सङ्गमेन नियमेन शमेन राम ।
तद्व्याप्यते सकलविश्वपदादतीतं सर्वेश्वरं परममाद्यमनादिधर्म ॥
(नि० उ० १९७। ३४)
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा * ६७९
मनुष्यको बाल्यावस्थामें ही जगत्की इस वास्तविक स्थिति- का ज्ञान प्राप्त करके यहाँ चिन्तारहित होकर रहना चाहिये। निष्पाप श्रीराम ! जो सबके साथ सौहार्द ( मैत्री ) को जन्म देनेवाली है और सबको आश्वासन प्रदान करती है, उस समताका पूर्णरूपसे आश्रय लेकर संसारमें विचरण करना चाहिये। समतारूपिणी सुन्दर लताका फल परम पवित्र होता है, जो सम्पूर्ण साधन-सम्पत्तियोंसे युक्त होनेके कारण सुन्दर तथा समग्र सौभाग्यकी वृद्धि करने- वाला है। रघुनन्दन ! जिनकी समग्र चेष्टाएँ समताके कारण सुन्दर होती हैं तथा जो न्यायसे प्राप्त वर्णाश्रम व्यवहारमें लगे रहते हैं, उन महापुरुषोंकी सेवामें यह सारी सांसारिक विभूति सेविकाकी भाँति उपस्थित हो जाती है। समतासे जो सारभूत अक्षय सुख प्राप्त होता है, वह न तो राज्यसे मिल सकता है और न प्रेयसी जनोंके समागमसे ही सुलभ हो सकता है। राघवेन्द्र ! तुम समताको सम्पूर्ण द्वन्द्वोंकी शान्तिकी चरम सीमा, रोषावेश तथा संशयरूपी रोगका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण दुःखरूपी आतप ( धूप ) के तापसे बचानेके लिये मेघ समझो। जो समतारूपी अमृतसे ओतप्रोत है, उसके लिये सारे शत्रु मित्र बन जाते हैं। वह यथार्थदर्शी होता है ऐसा मनुष्य तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। प्रबुद्ध हुए अपने चित्तरूपी चन्द्रमाके सारभूत अमृतसे भी बढ़े-चढ़े साम्यका अनुभव करते हुए ही जनक आदि समस्त तत्त्वज्ञ जीवन निर्वाह करते हैं। समताका अभ्यास करनेवाले जीवका क्रोध, लोभ आदि अपना दोष भी शान्ति एवं उदारताके रूपमें परिणत होकर गुण बन जाता है, दुःख भी नित्य- सुख हो जाता है और मृत्यु जीवन बन जाती है।
समतारूपी सौन्दर्यसे सुन्दर लगनेवाले महात्मा- पुरुषको योगशास्त्रवर्णित सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्माके प्रति क्रमसे मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षारूपिणी महिलाएँ सदा गले लगाती हैं। उसके प्रति वे आसक्त-सी रहती हैं। समतासे युक्त पुरुष सदा अभ्युदयशील होता है। समतायुक्त पुरुषके चित्तमें कभी चिन्ताका उदय नहीं होता तथा इस जगत्में ऐसी कोई सम्पत्तियाँ नहीं हैं, जो समतासम्पन्न पुरुषको प्राप्त न हुई हों। जो अपने और पराये सभीके कार्योंमें समभाव रखने- वाला है, साधुस्वभाव (अपराधियोंको भी क्षमा करनेवाला) है, जिसका सबके प्रति उत्तम व्यवहार है तथा जो चिन्तामणिके समान उदार है, ऐसे पुरुषको मनुष्य और देवता सभी चाहते हैं। श्रीराम ! जो सदाचारसम्पन्न और सबका हित करनेवाला है, अत्यन्त प्रसन्न रहता है तथा जिसका चित्त सबके प्रति समान है, ऐसे मनुष्यको न तो आग जलाती है और न जल ही डुबाता या गलाता है। जो पुरुष आनन्द और उद्वेगसे रहित होकर जो कार्य जैसे होना चाहिये, उसे उसी तरह करता है तथा सबको समान दृष्टिसे देखता है, उसकी तुलना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? सदाचारसम्पन्न और सबका हित करनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषपर मित्र, बन्धु, शत्रु, राजा, व्यवहारपरायण मनुष्य तथा बड़े-बड़े बुद्धिमान् लोग भी विश्वास करते हैं। तत्त्वज्ञानसम्पन्न समदर्शी पुरुष अपने न्यायप्राप्त स्वाभाविक कर्मकी परम्पराओंमें लगे हुए न तो अनिष्टकी प्राप्तिसे भागते हैं और न इष्टकी प्राप्तिसे सन्तुष्ट होते हैं। समतासे प्रसन्नचित्तवाले महात्मा पुरुष समस्त देवताओं- द्वारा पूजे जाते हैं। समदर्शी पुरुष जो कुछ करता है, जो भोजन करता है, न्यायप्राप्त होनेसे जिसपर आक्रमण करता है और अनुचित जानकर जिसकी निन्दा करता है, उसके उन सब कार्योंकी सारी जनता सदा प्रशंसा करती है। समदर्शी पुरुषद्वारा किया गया कार्य शुभ दिखायी दे या अशुभ, देरसे पूरा हुआ हो या आज ही तत्काल हो गया हो, उसे सब लोग उत्तम मानकर उसका अभिनन्दन करते हैं।
लगातार बड़े भयानक सुख-दुःख उपस्थित होनेपर भी समदर्शी पुरुष उनसे थोड़ा-सा भी उद्विग्न नहीं होते हैं। राजा शिबिने अपनी इस समदर्शिताके ही कारण शरणमें
६८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आये हुए कबूतरकी रक्षाके लिये प्रसन्नचित्तसे अपना शरीर काटकर निकाला हुआ मांस दे दिया था। प्रिय रघुनन्दन ! समतायुक्त हृदयवाले एक भूपाल (शिखिध्वज) प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा भार्याको अपने सामने ही परपुरुषके द्वारा आक्रान्त हुई देख क्षुब्ध नहीं हुए थे। त्रिगर्त देशके राजाने सैकड़ों मनोरथोंसे प्राप्त हुए इकलौते पुत्रको, जो दावमें हारा गया था, अपनी समबुद्धिके ही कारण बिना किसी घबराहटके राक्षसके हाथमें सौंप दिया। राजाओंमें श्रेष्ठ भूपाल जनक उत्सवके लिये सजायी गयी अपनी मिथिलानगरीमें आग लग जानेपर समभावसे ही उसे देखते रहे (उनके मनमें विषाद नहीं हुआ)। समदर्शी शाल्वराजाने न्यायतः बेचे गये अपने ही मस्तकको कमलदलकी भाँति तत्काल काट डाला था। सौवीरनरेशने कुन्दपुष्पोंकी राशिके समान कान्तिमान् तथा श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीको, जो उन्होंने इन्द्रसे जीता था, यज्ञमें ऋत्विजोंके कहनेसे सूखे तिनकेकी भाँति त्याग दिया—इन्द्रको वापस लौटा दिया। ऐसा उन्होंने अपनी समतायुक्त बुद्धिसे ही प्रेरित होकर किया था। समबुद्धिसे ही अपनी जीविकाके लिये काम-धंधा करनेवाले कुण्डप नामक एक चाण्डालने एक गौको मजदूरीमें लेनेकी शर्त ठहराकर एक ब्राह्मणकी पाँच गौओंको, जो कीचड़में फँस गयी थीं, निकाला और मजदूरीमें मिली हुई उस एक गायको पुष्करतीर्थमें उसी ब्राह्मणके हाथोंमें दान कर दिया था। इससे तत्काल आये हुए विमानपर चढ़कर वह देवलोकको चला गया। समताका भरपूर अभ्यास करनेवाले कदम्बवनवासी एक राक्षसने समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली अपनी राक्षसी वृत्तिका त्याग कर दिया। बालचन्द्रमाके समान सुन्दर जडभरतने अपनी समबुद्धिताके कारण ही भिक्षामें मिले हुए आगके अङ्गारोंको गुड़के लड्डुकी भाँति खा लिया था। ऋषि-मुनि और सिद्ध, जो देवताओंद्वारा सम्मानित हुए हैं, वे व्रत एवं तपस्याकी समृद्धिका संचय करते समय समदर्शिताके ही कारण उद्विग्न नहीं हुए थे। रन्तिदेव आदि राजा तथा धर्मव्याध आदि दूसरे साधारण मनुष्य भी समदर्शिताका दृढ़ अभ्यास करनेसे महापुरुषोंके भी पूजनीय हो गये थे। इहलोक और परलोकमें सुखकी सिद्धिके लिये और मोक्षरूप पुरुषार्थमें प्रवृत्तिके लिये भी उत्तम बुद्धिवाले पुरुष सदा समदर्शितासे ही व्यवहार करते हैं। किसीको भी किसी तरहकी पीड़ा न देता हुआ पुरुष न मरणकी इच्छा करे न जीवनकी। न्यायसे जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसका समतापूर्वक आचरण करता हुआ विचरे। जो समतावश गुण और दोषोंको एक-सा जानता है, जिसकी दृष्टिमें सुख-दुःख और छोटे-बड़े समान हैं, जो मान और अपमानको एक-सा समझता है और प्राप्त व्यवहारोंका भी सुचारुरूपसे सम्पादन करके पवित्र हो गया है। समतासे सुशोभित होनेवाला वह पुरुष सर्वत्र निर्द्वन्द्वभावसे विचरण करता है। (सर्ग १९८)
कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए भी जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्वभावतः सत्कर्मोंमें ही प्रवृत्तिका प्रतिपादन
श्रीरामने पूछा—मुने ! जीवन्मुक्त पुरुष सदा एकमात्र ज्ञानमें ही स्थित रहते और आत्मामें ही रमते हैं। ऐसी दशामें वे कर्मोंका परित्याग क्यों नहीं कर देते हैं? क्योंकि उन्हें कर्मसे कोई प्रयोजन नहीं है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी हेय दृष्टि और उपादेय दृष्टि अर्थात् अमुक कर्म त्याज्य है और अमुक ग्राह्य है—ये दोनों दृष्टियाँ क्षीण हो गयी हैं, उसे कर्मका त्याग करनेसे क्या प्रयोजन है? अथवा कर्मका आश्रय लेनेकी भी क्या आवश्यकता है? ज्ञानीके लिये इस जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो उद्वेगकारक होनेके कारण त्याज्य हो अथवा ऐसा कर्म भी नहीं है, जो तत्त्वज्ञानके लिये अवश्य करने योग्य होनेसे उपादेय हो। तत्त्वज्ञ
निर्वाण-प्रकरण उ०] * कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए जीवन्मुक्तकी सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति * ६८१
पुरुषको न तो कर्मोंके त्यागसे कोई प्रयोजन है और न कर्मों-का आश्रय लेनेसे । इसलिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जो कर्म जैसे होता आ रहा है, उसे वह उसी प्रकार करता रहता है । श्रीराम ! जबतक आयु है, तबतक यह शरीर निश्चितरूपसे चेष्टा करता रहता है, अतः वह शान्तभावसे यथाप्राप्त चेष्टा करे । उसका त्याग करनेकी क्या आवश्यकता है ? श्रीराम ! सदा निर्विकार रहनेवाली समतायुक्त निर्मल बुद्धिसे जो कर्म जैसे किया जाता है, वह सदा निर्दोष ही होता है ।
इस भूतलपर कितने ही गृहस्थ जीवन्मुक्त हैं, जो असङ्ग बुद्धिसे यथाप्राप्त वर्णाश्रम-धर्मका अनुसरण करते हैं । उनके सिवा दूसरे राजा जनक-जैसे तत्त्वज्ञ राजर्षि तथा अन्य वीतराग पुरुष भी हैं, जो अनासक्तचित्त एवं चिन्तारहित होकर तुम्हारे सदृश राज्य करते हैं। कुछ लोग वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त वेदोक्त व्यवहारका अनुसरण करते हुए सदा अग्निहोत्रमें लगे रहते हैं और पञ्च-महायज्ञों-से अवशिष्ट अमृतमय अन्नका भोजन करते हैं । चारों वर्णोंमेंसे कुछ लोग सदा ध्यान और देव-पूजन आदि स्वकर्मका अनुष्ठान करते हुए नाना प्रकारकी चेष्टाओं एवं प्रयत्नोंमें लगे रहते हैं । कुछ महान् आशयवाले महापुरुष अपने अन्तःकरणमें सम्पूर्ण फलोंकी आसक्तियोंका त्यागकर सब प्रकारके नित्य-नैमित्तिक कर्म करते हुए तत्त्वज्ञानी होकर भी अज्ञानीकी भाँति स्थित रहते हैं । कुछ लोग उन सूनी वनस्थलियोँमें ध्यान लगाते हैं, जहाँ सपनेमें भी मनुष्योंके दर्शन नहीं होते और भोले-भाले मृगछौने भरे रहते हैं । कुछ लोग उन पुण्यतीर्थों, आश्रमों या देवालयोंमें रहते हैं, जो पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, जहाँ सदा पुण्यात्मा पुरुष निवास करते हैं तथा जहाँका सदाचार मन और इन्द्रियोंके निग्रहसे सुशोभित होता है । कुछ समता-पूर्ण हृदयवाले पुरुष राग-द्वेषका परित्याग करनेके लिये शत्रु-मित्रोंसे भरे हुए अपने देशको छोड़कर अन्य देशमें चले जाते और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगते हैं ।
कितने ही विद्वान् संसार-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये एक वनसे दूसरे वनमें, एक गाँवसे दूसरे गाँवमें, एक स्थानसे दूसरे स्थानमें तथा एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर घूमते फिरते हैं । महापुरी वाराणसीमें, परम पावन तीर्थराज प्रयागमें, श्रीपर्वतपर, सिद्धपुरमें, बदरिकाश्रममें, परम-पुण्यमय शालग्राम तीर्थमें, कल्पोपग्रामकी गुफामें, पुण्यमयी मथुरापुरीमें, कालञ्जर पर्वतपर, महेन्द्र वनकी झाड़ियोंमें, गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दर्दर पर्वतकी चोटियोंपर, सह्य गिरिके भूभागोंमें, विन्ध्यगिरिके कछारोंमें, मलय पर्वतके मध्यभागमें, कैलासके वनसमूहोंमें तथा ऋक्षवान् पर्वतकी गुफाओंमें —इन सबमें, अन्य पर्वतोंपर एवं अन्यान्य वनों और आश्रमोंमें अनेक बहुदर्शी तपस्वी रहते हैं । इनमेंसे कुछ लोगोंने विधिपूर्वक संन्यास लेकर अपने पूर्व-आश्रमके कर्मोंका त्याग कर दिया है । कोई क्रमशः ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंमें स्थित हैं । किन्हींकी बुद्धि तत्त्व-ज्ञानसे प्रबुद्ध है और कितने ही नित्य उन्मत्तों-सी चेष्टा करते हैं । कोई स्वदेशसे दूर चले गये हैं । कितने ही अपना घर-द्वार छोड़ चुके हैं । कुछ लोग एक ही स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं और कुछ लोग रमते राम होकर भ्रमण करते है । महामते ! आकाश और पातालमें निवास करनेवाले इन देवता, दैत्य आदि महापुरुषोंमेंसे किन्हींकी बुद्धि प्रबुद्ध होती है, वे लोक-रहस्यके ज्ञाता, सम्यग् ज्ञानसे निर्मल तथा निर्गुण-सगुण तत्त्वका साक्षात्कार किये होते हैं । कुछ लोगोंकी बुद्धि सर्वथा प्रबुद्ध नहीं होती है, इसलिये उनका चित्त संशयके झूलेमें झूलता रहता है । वे पापाचारसे निवृत्त होकर सत्पुरुषोंका अनुसरण करते हैं । कुछ लोगोंकी बुद्धि आधी प्रबुद्ध होती है, वे ज्ञानके अभिमानमें आकर शास्त्रोक्त कर्म और आचारको त्याग देते हैं और लोक-परलोक दोनोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं ।
श्रीराम ! इस प्रकार इस जनसमुदायमें जन्म-मरणरूप संसारसे छुटकारा पानेकी इच्छावाले बहुत-से लोग नाना
६८२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रकारसे व्यवहार करते हुए स्थित हैं। उनकी दृष्टियों बहुविध प्रारब्ध-भोगके अनुकूल होती हैं । संसार-सागरसे पार होनेमें न तो वनवास कारण है, न अपने देशमें ही रहना कारण है और न कष्टसाध्य तपस्या ही कारण है। कर्मका परित्याग करना अथवा कर्मोंका आश्रय लेना भी संसारकी निवृत्तिमें कारण नहीं है। सत्कर्मोंके आचरणोंसे जो ख्याति- लाभ और ऐश्वर्य आदि विचित्र फलसमूह प्राप्त होते हैं, वे भी संसार-बन्धनसे छुटकारा दिलानेमें कारण नहीं हैं। संसार-सागरसे उद्धार पानेके लिये तो एकमात्र अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थिति ही कारण है । जिसका मन कहीं भी आसक्त नहीं है, वह भवसागरसे पार हो जाता है । जिसका मन आसक्तिसे रहित है, वह मुनि नित्य शुभ कर्मोंका अनुष्ठान और अशुभ कर्मोंका त्याग करता हुआ फिर संसार-बन्धनमें नहीं आता । जिसकी बुद्धि खोटी—विषयोंमें आसक्त है, जिसने अपने मनको विषयोंमें खुला छोड़ रखा है, वह शठ संसार-समुद्रमें डूबता ही है। जिसकी बुद्धिने विषयोंमें रसानुभव किया है, उसकी वह बुद्धि दुःखपर दुःख देनेवाली है। शहदके घड़ेमे घुसी हुई मक्खीकी तरह उसे न तो वहाँसे हटाया जा सकता है और न मारा ही जा सकता है । काकतालीय संयोगसे कदाचित् मोक्षकी सिद्धिके लिये अपने चित्तकी स्वयं ही परमात्मसाक्षात्कारकी ओर प्रवृत्ति हो जाती है । परमात्माका साक्षात्कार होनेपर तत्त्वकी उपलब्धि करके निर्मलताको प्राप्त हुआ चित्त निर्द्वन्द्व, अनासक्त एवं निर्विकार ब्रह्म ही हो जाता है ।
महात्मन् ! रघुनन्दन ! तुम स्वभावसे ही परमार्थ- स्वरूप और राग आदि दोषसे रहित हो । तुम्हारी बुद्धि सम है। तुम्हारा स्वरूपानुभव नित्य उदित है । तुम महात्मा हो । अतः शोक और शङ्कासे रहित एकाकी रहो । जन्म और मरणसे मुक्त जो पावन परमपद है, वह तुम्हीं हो । विशुद्ध चिन्मय ब्रह्मरूप जगत्में प्रकृति, मल, विकार, उपाधि, उपाधिका बोध आदि कहीं किञ्चिन्मात्र भी नहीं हैं । सुस्पष्टरूपसे नित्य चैतन्यनाम ब्रह्म ही विराज रहा है । 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ' ऐसा समझकर निःशङ्कभावसे एकाकी रहो ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब मुनीश्वर वसिष्ठजी ऐसा उपदेश दे चुके, तब उस सभाके सभी सदस्य समस्त एषणाओंसे रहित और ध्यानमें एकाग्र हो अपनी निर्मल बुद्धिके द्वारा ब्रह्मपदको प्राप्त हो गये । साथ ही वे मुनि भी मौन हो ब्रह्मानन्दके सहज अपरोक्ष अनुभूतिमें प्रवृत्त हो गये । ठीक उसी तरह, जैसे कमलोंकी राशिमें गुनगुनाता हुआ भ्रमर चुप होकर मकरन्दका पान करने लगा हो । (सर्ग १९९)
सिद्धों और सभासदोंद्वारा श्रीवसिष्ठजीको साधुवाद, देव-दुन्दुभियोंका नाद, दिव्य पुष्पोंकी वर्षा, गुरुपूजनमहोत्सव, श्रीदशरथजी और श्रीरामजीके द्वारा गुरुदेवका सत्कार, सभ्यों और सिद्धोंद्वारा पुनः श्रीवसिष्ठजीकी स्तुति
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! निर्वाणसम्बन्धी वाक्यसंदर्भ ( उपदेश ) की समाप्ति होनेपर मुनीश्वर वसिष्ठजीने जब क्रमशः प्राप्त हुए अन्तिम वाक्यका विराम कर दिया, जब समस्त सभासद् तथा आकाशचारी देवना भी मुनिके वचनोंके श्रवणसे शान्त एवं विशुद्ध मनोवृत्तिसे युक्त होकर निर्विकल्प समाधिके समान ब्रह्मैकरसताको प्राप्त हो गये तथा जब शास्त्रज्ञानसे सुशोभित होनेवाले उन सब लोगोंका अन्तरात्मा सत्त्वकी पराकाष्ठाको पहुँचकर परम पावन हो गया, तब गगनगुफामें वास करनेवाले सिद्धोंके मुखसे शीघ्र ही ऐसा साधुवाद निकला, जो आकाशमें गूँज उठा । इसी तरह सभामें बैठे हुए भावितात्मा मुनि विश्वामित्र आदिके द्वारा
कल्याण
गन्धर्वों और विद्याधरियोंके द्वारा भोगोंका प्रलोभन देनेपर भी उद्दालकका उनकी ओर ध्यान न देना
(उपशम-प्रकरण सर्ग ५४)
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निर्वाण-प्रकरण उ०] * सिद्धों और सभासदोंद्वारा श्रीवसिष्ठजीको साधुवाद * ६८३
उच्चस्वरसे दिये गये साधुवादकी ध्वनि भी वहाँ गूँजने लगी । इन सबसे ऐसा महान् कोलाहल प्रकट हुआ, जिसने सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया । वह कोलाहल वायुपूरित छिद्रवाले कीचकोंकी मुरली-जैसी ध्वनिके समान मधुर था । सिद्धोंके साधुवादके साथ ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ भी बजने लगीं, जिनकी प्रतिध्वनिसे समस्त पर्वत व्याप्त हो गये । देवताओंकी दुन्दुभियोंके बजनेके साथ ही दिशाओंकी ओरसे फूलोंकी वर्षा होने लगी, जो हिमकी धारावाहिक वृष्टिके समान मनोहर जान पड़ती थी । उसने सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको आच्छादित कर दिया । साधुवादके शब्दोंके साथ देववाद्योंकी ध्वनि तथा पुष्पवृष्टिके घोषका वह मिश्रित शब्द-समुदाय वहाँ बड़ी शोभा पाने लगा । सारा भुवन भारी कोलाहलसे भरकर अद्भुत शोभा पाने लगा । उत्सवसे मतवाला हो उठा । देवताओं और चारणोंसे भर गया तथा भाँति-भाँतिके फूलोंसे अलंकृत होकर राजभवनके समान ही शोभा पाने लगा । धीरे-धीरे दुन्दुभियोंकी तुमुल ध्वनि, सिद्धसमूहोंके साधुवादजनित कोलाहल और पुष्पराशियों एक साथ ही द्युलोक और भूलोकके अन्तरालमें उसी तरह फैलने लगीं, जैसे सागरमें उठी हुई उत्ताल तरङ्गैं तटवर्ती पर्वतके पास पहुँच जाता हैं । देवताओंका वह कोलाहलपूर्ण समारम्भ जब क्षणभरमें शान्त हो गया, तब सिद्धोंके ये वचन कानोंमें सुनायी देने लगे ।
सिद्ध बोले—कल्पपर्यन्त सिद्धपुरुषोंकी अनेकानेक सभाओंमें मोक्षके उपायोंकी सहस्रों बार व्याख्याएँ हुईं और सुनी गयीं, परंतु उनमें जो मोक्षके उपाय बताये गये, वे कोई भी ऐसे नहीं थे । मुनिके इस वाक्य विलाससे—इस महारामायणके श्रद्धाप्रेमपूर्वक श्रवणसे तिर्यग्यो-निके जीव, स्त्रियाँ, बालक और सर्प भी परमानन्दको प्राप्त हुए हैं, इसमें संशय नहीं है । श्रीवसिष्ठजीने नाना प्रकारके दृष्टान्तों, हेतुओं और युक्तियोंद्वारा जैसे श्रीरामचन्द्रजीके प्रति परमात्म-तत्त्वके ज्ञानका वर्णन किया है, वैसे ये साक्षात् अपनी धर्मपत्नी अरुन्धतीजीके प्रति भी करते हैं या नहीं, इसमें संशय है । मुनिवर्णित मोक्ष-उपायके अनुष्ठानसे तिर्यग्यो निके जीव भी दुःख-शोकसे मुक्त हो गये हैं । फिर इस भूतलपर कौन-से ऐसे मनुष्य हैं, जो इसके अनुष्ठानसे मुक्त न होंगे । हम लोग अपने कानोंकी अञ्जलिसे इस ज्ञानामृतका पान करके परम उत्कृष्ट बोध-श्रीको प्राप्त हुए हैं । हमारी सिद्धियों पूर्ण तथा नवीन हो गयी हैं ।
सिद्धोंकी इस बातको सुनते हुए वहाँके लोगोंने आश्चर्यसे चकितनेत्र होकर देखा कि सभाकी भूमि कमल, पारिभद्र, पारिजात, सन्तानक और हरिचन्दन आदि फूलोंकी धारावाहिक वर्षासे भर गयी है । फूलोंके भारसे वहाँका विशाल चँदोवा इस तरह लटक रहा था, मानो जलसे भरा हुआ बादल नीचे झुक आया हो । इस प्रकार उस सभाकी अपूर्व शोभाका दर्शन करते हुए सभासदोंने उस समयके अनुरूप भूरि-भूरि प्रशंसापूर्ण साधुवाद देकर सर्वथा उद्यत हो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा साष्टाङ्ग प्रणाम करके नमस्कारयुक्त कुसुमाञ्जलिसे वसिष्ठजीका पूजन किया । सभामें आये हुए राजाओंकी प्रणामपरम्परा जब कुछ शान्त हुई, तब हाथमें अर्घ्यपात्र लेकर राजा दशरथने मुनिकी पूजा करते हुए कहा—
राजा दशरथ बोले—अरुन्धतीनाथ ! गुरुदेव ! आपके सदुपदेशसे प्राप्त हुए बोधस्वरूप, क्षय-वृद्धिरहित, सर्वोत्कृष्ट निरतिशयानन्दमय आत्मवस्तुसे मेरे भीतर परम पूर्णता प्रकट हो गयी है । ब्रह्मन् ! इस भूतलपर तथा स्वर्गमें देवताओंके यहाँ भी ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं है, जो आप पूज्य महापुरुषको कभी पूजनके रूपमें प्राप्त न हुई हो, तथापि मैं अपने लिये अवश्यकर्तव्य इस गुरुपूजनकी विधिको सफल बनानेके लिये अवसरके अनुरूप कुछ प्रार्थना करता हूँ । आप क्षमा करेंगे । मैं पत्नियोंसहित अपने इस शरीरसे, लौकिक और पारलौकिक सुखके लिये संचित किये गये शुभ कर्मसे
६८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तथा समस्त भृत्यों और सामन्तोंसहित इस विशाल राज्यसे आपकी पूजा करता हूँ । प्रभो ! ये सारी वस्तुएँ निजी आश्रमकी भाँति ही आपके अधीन हैं। आप अपनी अभीष्ट इच्छाके अनुसार मुझे अपनी आज्ञाके पालनमें नियुक्त करें।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—भूपाल ! हम ब्राह्मणलोग प्रणाममात्रसे ही संतुष्ट हैं। केवल प्रणामसे ही हम प्रसन्न हो जाते हैं। वह प्रणाम आपने किया ही है। राज्यका पालन करना आप ही जानते है, यह आपको ही शोभा देता है । अतः यह सब राज्य यहाँ आपके ही अधिकारमें रहे । ब्राह्मण कहाँ भूमण्डलके पालनका भार उठाते हैं ?
राजा दशरथ बोले—मुने ! आपके इस गौरवपूर्ण उपदेशके सामने यह राज्य है ही कितना ! इस तुच्छ वस्तुको अर्पित करते हुए हम विशेष लज्जित हो रहे हैं । अतः भगवन् ! आप जैसा उचित समझें वही करें ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब महाराज दशरथ इस प्रकार कह चुके, तब श्रीराम उन महागुरुके चरणारविन्दोंमें पुष्पाञ्जलि अर्पित करनेके लिये उनके सामने खड़े हुए और नतमस्तक होकर बोले—'ब्रह्मन् ! आपने महाराजको निरुत्तर कर दिया है । प्रभो ! मेरे पास तो प्रणामके सिवा दूसरी कोई सार वस्तु है ही नहीं । अतः मैं यही लेकर आपके इन दोनों चरणोंकी वन्दना करता हूँ' यों कहकर श्रीरामने गुरुके चरणोंमें मस्तक रखकर वन्दना की और अपनी अञ्जलिके फूल उसी प्रकार चढ़ाये, जैसे वन पर्वतके चरणप्रान्तमें अपने पल्लवोंसे ओसके कण समर्पित करता है। उस समय उनके दोनों नेत्र आनन्दके आँसुओंसे भरे हुए थे। व्यवहारनीतिके ज्ञाता सुग्रीवने बड़ी भक्तिके साथ गुरुदेवको वारंवार प्रणाम किया । शत्रुघ्न, लक्ष्मण तथा उन्हींकी तुलनामें आनेवाले जो श्रीरामके दूसरे-दूसरे सखा निकट खड़े थे, उन सबने भी उन्हींकी भाँति शीघ्रतापूर्वक उन मुनीश्वरको प्रणाम किया । दूर खड़े हुए राजाओं, राजकुमारों और मुनियोंने दूरसे ही पुष्पाञ्जलि समर्पण एवं प्रणाम करते हुए वसिष्ठजीकी वन्दना की। उस अवसरपर वहाँ की गयी पुष्पाञ्जलियोंकी वर्षासे आच्छादित मुनिवर वसिष्ठजी उसी तरह दिखायी नहीं देते थे, जैसे हिमकी वृष्टिसे आच्छन्न हो गिरिराज हिमालय दिखायी नहीं देता है।
जब सिद्धोंकी बातें बंद हुईं, नगाड़ोंकी गड़गड़ाहट शान्त हुई, आकाशसे फूलोंकी वर्षा थम गयी और सभाका कोलाहल कम हो गया तथा प्रणाम करनेके अनन्तर श्रीराम आदिके साथ पूजा करनेवाले सभासद् जब शान्त वायुवाले मेघकी भाँति सौम्यभावको प्राप्त हो गये, तब सबका साधुवाद सुनते हुए अनिन्द्यात्मा मुनिनायक वसिष्ठ विश्वामित्र आदिको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें बोले— 'गाधिकुलकमल मुनिवर विश्वामित्र, वामदेव, निमि, ऋतु, भरद्वाज,पुलस्त्य, अत्रि, धृष्टि, नारद, शाण्डिलि,भास, भृगु, भारण्ड, वत्स और वात्स्यायन आदि मुनियो ! आपलोगोंने जो मेरा यह तुच्छ भाषण सुना है, इसमें जो कोई बात स्पष्ट नहीं कही गयी हो, दूषित अर्थसे युक्त हो अथवा निरर्थक हो, उसेइस समय कृपा करके आप मुझे बतावें ।'
सभासद् बोले—ब्रह्मन् ! एकमात्र परमार्थ-तत्त्वसे सुशोभित होनेवाले आपके वचनमें कोई दूषित या अनुचित अर्थ होगा, यह आज नयी ही बात हमारे सुननेमें आयी है। अनन्त जन्मदोषसे हमारा जो पाप या मल संचित था, उसे आपने आज यहाँ उसी तरह धो डाला है, जैसे आग सुवर्णके दोषको दग्ध कर देती है । प्रभो ! जैसे आकाशमें फैली हुई शीतल चन्द्रमाकी दीप्तिसे कुमुद विकसित होते हैं, उसी तरह परब्रह्मकी व्याख्या करनेवाली और परमानन्दमयी शीतल आपकी वाणीद्वारा हम सब लोग विकासको प्राप्त हुए हैं । समस्त प्राणियोंको महान् बोध प्रदान करनेवाले, एकमात्र गुरु आप मुनिनायकको ये हम सब लोग प्रणाम करते हैं ।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका अपनी परमानन्दमयी स्थिति बताना * ६८५
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—तदनन्तर उन सबने पुनः मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर तथा ऊँची आवाजमें एक साथ 'आप मुनिनाथको नमस्कार है' यह कहकर आकाशसे सिद्धोंद्वारा छोडे गये नवीन पुष्पाञ्जलि-समूहोंसे वसिष्ठजीको उसी तरह आच्छादित कर दिया, जैसे बादल हिमकी वर्षासे पर्वतको ढक देते हैं । इसी प्रकार रघुनाथजीके अवतारका वृत्तान्त जाननेवाले उन सिद्धोंने राजा दशरथकी तथा चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए लक्ष्मीपति नारायणके अवतार श्रीरामकी भी प्रशंसा की ।
सिद्ध बोले—हमलोग चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए भाइयोंसहित नित्यमुक्त राजकुमार श्रीरामको, जो दूसरे नारायणके समान विराज रहे हैं, नमस्कार करते हैं । चारों समुद्र जिसके लिये खाईके समान हैं, उस सम्पूर्ण भूमण्डलके पालक तथा भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालमें भी कभी नष्ट न होनेवाले राजचिह्नोंसे सुशोभित महाराज दशरथको भी हम सिर झुकाते हैं । मुनिसेनाके स्वामी, भूमण्डलके पालक, भगवान् भास्करके समान भूरि तेजस्वी एवं उत्तम यशसे सम्पन्न मुनिवर वसिष्ठको तथा तपोनिधि विश्वामित्रको भी हम प्रणाम करते हैं; क्योंकि इन्हींके प्रभावसे हम सबने भ्रान्तिके विस्तारको भगानेवाली इस परम उत्तम ज्ञानयुक्तिको सुना है ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—ऐसा कहकर आकाशसे सिद्धोंने पुनः फूलोंकी वर्षा की और प्रसन्नचित्त होकर पुनः चुपचाप सभामें बैठ गये । इसी प्रकार आकाशगामी सिद्धोंने वहाँ उपस्थित हुए जनसमुदायकी पुनः प्रशंसा की तथा सभासदोंने भी प्रचुर स्तुति करते हुए वहाँ उन सब सिद्धोंका पूजन किया । आकाशमें विचरनेवाले मुनीश्वरों, महर्षियों एवं देवताओंने और पृथ्वीपर विचरनेवाले ब्राह्मणों तथा राजाओंने भी पुष्पयुक्त अर्घ्यदानके साथ उच्चवाणीद्वारा वेगपूर्वक वहाँ उपस्थित जनसमुदायकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।
( सर्ग २०० )
गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका पुनः अपनी परमानन्दमयी स्थितिको बताना तथा वसिष्ठजीका उन्हें कृतकृत्य बताकर विश्वामित्रजीकी आज्ञा एवं भूमण्डलके पालनके लिये कहना, श्रीरामद्वारा अपनी कृतार्थताका प्रकाशन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—तदनन्तर सभामें धीरे-धीरे साधुवादकी ध्वनि शान्त हो गयी, ज्ञानोपदेश पाकर राजालोग अत्यन्त उल्लसित-से दिखायी देने लगे । सब लोगोंका संसारभ्रम दूर हो गया और सभी लोग सत्यका अनुसरण करनेवाले चित्तके द्वारा अपने पूर्व चरित्रका, जो अज्ञानसे कलुषित था, स्वयं ही उपहास करने लगे । सभामें बैठे हुए विवेकी पुरुष चित्तवृत्तिको अन्तर्मुखी करके ज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके अनुभवमें तत्पर हो ध्यानमग्नकी भाँति परम शान्त हो गये । भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी गुरुके आगे उन्हींके दीप्तिमान् मुखपर दृष्टि लगाये हाथ जोडे पद्मासन बाँधे बैठ गये तथा महाराज दशरथ ध्यानस्थ-से होकर अपने भीतर आदि, मध्य और अन्तमें पवित्रता बढ़ानेवाली जीवन्मुक्तकी अलौकिक स्थितिका अनुभव करने लगे ।
उस समय लोगोंके मनोरथका आदर करते हुए मुनिवर वसिष्ठजी अपने भक्त राजा आदिके द्वारा की जानेवाली पूजा ग्रहण करनेके लिये क्षणभर चुपचाप बैठे रहकर फिर शान्त वाणीमें बोले—'कमलनयन श्रीराम ! तुम रघुकुलके आकाशमें चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हो । बताओ, अब अपनी इच्छाके अनुसार और क्या सुनना चाहते हो ? आज कैसी स्थितिका तुम स्वयं अनुभव करते हो ? यह स्पष्ट-रूपसे कहो । मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार आदेश देनेपर राजकुमार श्रीराम गुरुदेवके मुखकी ओर देखते हुए शान्त, मधुर एवं सुस्पष्ट वाणीमें बोले—
६८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामने कहा—प्रभो ! मैं आपके कृपाप्रसादसे परम निर्मल हूँ। मुने ! मैं अपने-आपमें ही विश्राम-सुखका अनुभव करता हूँ। बाह्य इन्द्रियोंकी दृष्टिसे परे हूँ। मनकी भी मुझतक पहुँच होनी कठिन है। मैं सर्वथा निर्विकार हूँ। जैसे आकाशको मुट्ठियोंसे नहीं बाँधा जा सकता, उसी प्रकार आशाएँ मुझे बाँध नहीं सकती हैं। जैसे सुगन्ध वृक्षगत पुष्पसे ऊपर उठकर आकाशमें पहुँचकर उस पुष्पसे परे हो जाती है, उसी प्रकार मैं देहातीत और सर्वत्र समभावसे स्थित हूँ। जैसे अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध सभी राजा बहुत काम-धन्धेवाले राज्योंमें सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार मैं हर्ष, विषाद और आशासे रहित, स्थिर, एक तथा समतापूर्ण दृष्टिसे सम्पन्न एवं आत्मनिष्ठ होनेके कारण सर्वत्र निःशङ्क होकर विचरता हूँ। प्रभो ! मैं सर्वोपरि सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ। मुझमें विषयसुखकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। मुझे अपनी इच्छाके अनुसार आज्ञा-पालनके कार्यमें नियुक्त कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे आकाश शान्त आकाशमें विश्राम प्राप्त करता है, उसी प्रकार तुम्हें अत्यन्त सम एवं शीतल आत्मामें पूर्ण विश्राम प्राप्त है। वत्स ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि ज्ञानस्वरूप तुमने अपने बोधके द्वारा रघुकुलकी भूत, भविष्य और वर्तमान परम्पराको पवित्र कर दिया है। राघवेन्द्र ! अब तुम मुनीश्वर विश्वामित्रजीकी याचना पूर्ण करके पिताके साथ इस पृथ्वीका पालन करते हुए सुखसे रहो। सौभाग्यशाली राजकुमार ! तुम-जैसे महापुरुषके साथ रहकर पुत्र, भृत्य, बन्धु-बान्धव, पैदल, रथ, हाथी और अश्वमण्डलसहित समस्त रघुवंशी शरीरसे नीरोग, मनसे निर्भय तथा घरोंमें सुस्थिर लक्ष्मीसे सम्पन्न हो सदा अभ्युदयशाली बने रहें।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—सभामें वसिष्ठजीकी यह बात सुनकर सब राजा तथा अन्य लोग अमृतकी धारासे सींचे हुएकी भाँति मनमें अत्यन्त शीतलता एवं शान्तिका अनुभव करने लगे। कमलनयन श्रीराम अपने मनोहर मुखचन्द्रसे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे सुधा-भरे चारु चन्द्रमाके उदयसे सम्पूर्ण क्षीरसागर उल्लसित हो उठता है। तत्त्वज्ञानविशारद वामदेव आदि मुनि बड़े आदरसे बोले—'अहो ! भगवान् वसिष्ठने अद्भुत ज्ञानका वर्णन किया'। शान्त अन्तःकरणवाले राजा दशरथ भी प्रसन्नतासे प्रकाशित हो रहे थे। उनके सारे अङ्ग संतोषसे ही हृष्ट-पुष्ट हो गये थे। उनपर ज्ञानकी नयी दीप्ति छा रही थी।
तत्पश्चात् श्रीराम बोले—मुने ! मैं ऐसे परमानन्दमें सदा निमग्न हूँ, जिसके प्राप्त होनेपर फिर किसीको कभी खेद नहीं हो सकता। मैं चिरसुखी हूँ। सदा उदित हूँ एवं सनातन पुरुषार्थस्वरूप हूँ।
(सर्ग २०१-२०२)
मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना और दूसरे दिन प्रातःकाल सबके सभामें आनेपर श्रीरामका गुरुके समक्ष अपनी कृतकृत्यता प्रकट करना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब इस प्रकार मुनिवर वसिष्ठ तथा श्रीरामचन्द्रजी परस्पर विचार कर रहे थे, उस समय मानो उन दोनोंका संवाद सुननेके लिये भगवान् भास्कर आकाशके मध्यभागमें आ पहुँचे। तुरत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें पदार्थसमूहोंको प्रकाशित करनेके लिये श्रीरामकी महामतिके समान धूप तेज हो गयी। कमलोंसे भरे हुए सरोवर उस सभामें बैठे हुए हृदयकमलके खिल जानेसे विकसित आकारसे सुशोभित राजाओंके समान बड़ी शोभा पाने लगे। इतनेहीमें मध्याह्नकालकी सूचना देनेवाले शङ्ख, मुखोंकी स्निग्ध
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना * ६८७
उद्दाम वायुसे पूरित हो प्रलयकालकी प्रचण्ड वायुसे व्याप्त हुए महासागरोंके समान गम्भीर घोष करते हुए बज उठे। उस समय निदाघकी ज्वालाको शान्त करनेके लिये सौभाग्यवती स्त्रियोंद्वारा छिड़के गये कर्पूरमिश्रित जलसे वहाँ नूतन जलदमाला-सी छा गयी। फिर महाराज दशरथ समस्त सामन्तों, भूपालों, परिजनों एवं अङ्गरक्षक सेवकों आदिके साथ सभासे उठे। मुनिवर वसिष्ठ, श्रीराम तथा संसद्के अन्य सदस्य भी उठ गये। राजा, राजकुमार, मन्त्री और मुनि परस्पर एक-दूसरेसे सम्मानित हो बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने निवासस्थानको गये। तत्पश्चात् जब मध्याह्नकालके वाद्योंकी ध्वनि दीवालोंसे टकराकर प्रति-ध्वनित हुई, तब वाक्यप्रयोगमें निपुण मुनिवर वसिष्ठने यह बात कही—'रघुनन्दन ! तुमने सुननेयोग्य सब बातें सुन लीं, ज्ञेय तत्त्वोपदेशको पूर्णरूपसे जान लिया। अब तुम्हारे लिये दूसरी कोई जाननेयोग्य उत्तम बात शेष नहीं है। जैसा मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, जैसा तुम शास्त्रोंसे देखते हो और जैसा स्वयं अनुभव करते हो, उन सबकी एकवाक्यता कर लो। महामते ! अब समयोचित कार्य करनेके लिये उठो। हमलोग भी स्नान करनेके लिये जा रहे हैं। यह हमारे मध्याह्न-कालिक उपासनाका समय व्यतीत हो रहा है। भद्र ! यदि तुम्हें कोई और शुभ प्रश्न पूछना हो तो उसे कल प्रातःकाल पुनः पूछ लेना।'
मुनिनाथ वसिष्ठके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने उस सभामें आये हुए समस्त साधुपुरुषों, मुनियों, ब्राह्मणों, राजाओं तथा आकाशचारी देवताओंका भी वसिष्ठ आदिकी बतायी हुई विधिसे श्रीरामके साथ पूजन किया। मणियों और मुक्ताओंकी राशियाँ भेंट कीं, दिव्य पुष्प अर्पण किये, नाना प्रकारके रत्न प्रदान किये, मोतियोंके हार समर्पित किये, प्रेमपूर्वक प्रणाम किया, धन दिया, वस्त्र, आसन, अन्नपान, सुवर्ण, भूमि, धूप, गन्ध और पुष्पमालाएँ प्रदान कीं। इस प्रकार उन प्रशंसनीय भूपालने शास्त्रोक्त रीतिसे उन सभीका पूजन किया। तदनन्तर दूसरोंको मान देनेवाले वे नरेश वसिष्ठ आदि देवर्षियों तथा सभासदोंके साथ उस सभासे उसी प्रकार उठे, जैसे सायंकाल चन्द्रमा आकाशसे उदित होते हैं। मधुर वाणी बोलनेवाले वे दशरथ आदि सब राजा और साधु-मुनि एक दूसरेसे सम्मानित हो परस्पर विदा ले स्नेहयुक्त संतुष्ट हृदयसे अपने-अपने आश्रमोंको गये, मानो सातो लोकोंके निवासी देवता इन्द्रपुरीसे अपने-अपने धाममें जा रहे हों। एक दूसरेका क्रमशः प्रेमपूर्वक समादर करके सब विदा ले अपने-अपने घरमें आये और दिनके आवश्यक कार्यमें लग गये। वसिष्ठ आदि समस्त मुनियों तथा दशरथ आदि राजाओंने दिनके आवश्यक कार्य पूर्ण किये। जब वे सब लोग न्यायसे प्राप्त दैनिक कार्य सम्पन्न कर चुके, तब आकाशपथिक सूर्यदेव क्रमशः आगे बढ़ते हुए अस्ताचलको जा पहुँचे। महामति श्रीराम तथा अन्य लोग रातमें भी वैसी ही ज्ञान-चर्चा करते रहे; इसलिये उनकी वह रात शीघ्र ही व्यतीत हो गयी। फिर अन्धकाररूपी धूल और तारारूपी पुष्पराशियोंके कूड़े-करकटको हटाकर जगत्-रूपी भवनको घरकी तरह साफ-सुथरा बनाते हुए सूर्यदेवका शुभागमन हुआ। तत्पश्चात् राजा, राजकुमार, मन्त्री और वसिष्ठ आदि मुनि फिर राजा दशरथकी सभामें आये, उस समय जब दशरथ आदि नरेश और सुमन्त्र आदि सचिव आसनपर विराजमान मुनिवर वसिष्ठकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे, कमलनयन बुद्धिमान् श्रीराम गुरु और पिताके सामने उपस्थित हो कोमल वाणीमें इस प्रकार बोले—
श्रीरामने कहा—ब्रह्मन् ! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही मैं भी मानता हूँ कि मेरी बुद्धि कृतकृत्य हो रही है। मैं परम निर्वाणस्वरूप एवं शान्त हूँ। मुझे किसी बातकी आकाङ्क्षा नहीं है। जो कुछ