सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
( ११० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-
होगा अतएव उत्पत्ति विनाशरहित होनेसे अज और नित्य प्रकृतिवत् परिणामशील न होनेसे शाश्वत एव पुरातन हैं । इस कारण शरीरका नाश होनेपरभी आत्माका नाश नहीं होता है । यदि एतादृश नित्यत्व न माना जाय तो कृतप्रणाश अकृतका आगम ( प्राप्ति ) असङ्ग होगा अतएव रागद्वेषादि शून्यको जन्माभाव न्यायसूत्रका- रनेभी कहा है । अणुत्वभी श्रुतिसिद्ध है केशके अग्र भागके प्रथम सौ १०० टुकडे करके पश्चात् एक एकके सौ सौ टुकडे करनेसे एक भागका जो परिमाण हो वह जीवका परिमाण है वह जीव अनन्त ( असंख्य ) हैं । और जीवरूप पुरुष आरेकी अग्रके समान सूक्ष्म है । आत्मा ( जीव ) अणुपरिमाण चक्षुरादि इन्द्रियोंके अग्राह्य केवल मनसे जानने योग्य है ॥ ३४ ॥ अचिच्छब्दवाच्यं दृश्यं जडं जगत् त्रिविधं भोग्यभोगोपकर- णभोगायतनभेदात् । तस्य जगतः कर्त्तोपादानं चेश्वरपदार्थः पुरुषोत्तमो वासुदेवादिपदवेदनीयः । तदप्युक्तम्—"वासुदेवः परं ब्रह्म कल्याणगुणसंयुतः । भुवनानामुपादानं कर्त्ता जीवनि- यामक ॥" इति ॥ ३५ ॥ अचित्पदबोध्य दृश्य जडरूप जगत् तीन प्रकार हैं । भोग्य ( घटादि ) भोगोप करण ( इन्द्रियादि ) भोगस्थान ( शरीरादि ) भेद हैं एतादृश जगत्का कर्त्ता और उपादान ( समवाय ) कारण दोनों ईश्वर है । वह पुरुषोत्तम वासुदेव नारायणादि शब्दवाच्य है । सत्यकामत्वादि कल्याणगुणयुक्त वासुदेवही परब्रह्म हे वह जगत्का उपादान और कर्त्ता तथा जीवोंके अन्तर्यामी होकर नियमन करते हैं । इत्यादि पञ्च रात्रमें प्रसिद्ध है ॥ ३५ ॥ स एव वासुदेवः परमकारुणिको भक्तवत्सलः परमपुरुषस्तदुपा- सversionकानुगुणतत्तत्फलप्रदानाय स्वलीलावशादर्चाविभवव्यूहसू- क्ष्मान्तर्यामिभेदेन पञ्चधाऽवतिष्ठते । तत्रार्चा नाम प्रतिमादयः । रामाद्यवतारा विभव । व्यूहश्चतुर्विधः वासुदेवसङ्कर्षणप्रद्युम्ना- निरूद्धसंज्ञक । सूक्ष्मं सम्पूर्णं षड्गुणं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म । गुणा अपहतपाप्मत्वादयः । 'सोऽपहतपाप्मा विरजो विमृत्यु- र्विशोको विजिघत्सः सत्यकामः सत्यसङ्कल्प ' इति श्रुते ।
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १११ ) अन्तर्यामी सकलजीवनियामकः 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानम- न्तरोयमयति' इति श्रुतेः । तत्र पूर्वपूर्वमूर्त्युपासनया पुरुषार्थपरि- पन्थिदुरितनिचयक्षये सत्युत्तरोत्तरमूर्त्युपास्त्यधिकारः ॥ ३६ ॥ वही वासुदेव परम दयालु और भक्तवत्सल परमात्मा अपने उपासक भक्तोंकी उपासनाके अनुकूल फल देनेके लिये स्वकीय लीलासे पर, व्यूह, विभव, अर्चा और अन्तर्यामी इन पांच भेदोंसे अवस्थित है । अर्चा-दिव्यदेशादि मन्दिरोंकी प्रतिमा है, रामकृष्णादि अवतार विभव हैं, वासुदेव संकर्षण प्रद्युम्न और अनिरुद्ध इन भेदोंसे चतुर्विध व्यूह है । सूक्ष्म सम्पूर्ण षड ऐश्वर्य और षडगुणादि सम्पन्न वासुदेव परब्रह्म है । अपहत पाप्मा ( निष्पाप ) विरज विमृत्युत्वादि तथा सत्यकाम्त्वादि कल्याणगुण एवम् ज्ञान शक्ति बल ऐश्वर्य वीर्य्यतेजप्रभृति गुण हैं । सम्पूर्ण जीवोंके नियामक परमात्मा अन्तर्यामी है “जो परमात्मा आत्मामें रहकर आत्माको अन्त- र्यामी होकर नियमन करता है" इत्यादि श्रुति भी है पूर्वपूर्व मूर्त्तिकी उपासनासे परमपुरुषार्थ लक्षण मोक्ष विरोधी पापका क्षय होकर उत्तर उत्तर मूर्त्तिकी उपासनामें अधिकार होता है ॥ ३६ ॥ तदुक्तम्- “वासुदेवः स्वभक्तेषु वात्सल्यात् तत्तदीहितम् । अधिकार्यानुगुण्येन प्रयच्छति फलं बहु ॥ तदर्थं लीलया स्वीया पञ्च मूर्तीः करोति वै । प्रतिमादिकमर्चा स्यादवता- रास्तु वैभवाः ॥ सङ्कर्षणो वासुदेव प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः । व्यूहश्चतुर्विधो ज्ञेयः सूक्ष्मं सम्पूर्णषड्गुणम् ॥ तदेव वासुदेवा- ख्यं परं ब्रह्म निगद्यते ॥ अन्तर्यामी जीवसंस्थो जीवप्रेरकईरि- त ॥ य आत्मानीतिवेदा-तवाक्यजालैर्निरूपित ॥ अर्चापासनया क्षिप्ते कल्मषेऽधिकृतो भवेत् ॥ विभवोपासने पश्चाद्व्यूहोपास्तौ तत परम् । सूक्ष्मे तदनु शक्त स्यादन्त- र्यामिणमाश्रितुम् ॥" इति ॥ ३७ ॥ कहाभी है-वासुदेव भगवान् भक्तविषयक वात्सल्यसे अधिकारीके अनुगुण भक्तोंको अभिमत बहुविध फलको देते हैं ( इसीके लिये लीलापूर्वक अर्चादि पञ्चरूपसे स्वयं अवस्थित रहते हैं ) प्रतिमादि अर्चा अवतार विभव, संकर्षणादि व्यूह सम्पूर्ण छहों गुणोंसे युक्त परवासुदेव सूक्ष्म, जीवात्मामें स्थित और जीवोंको प्रेरक अन्तर्यामी है
( ११२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- यह सब "आत्मनि तिष्ठन् " इत्यादि वेदान्त वचनोंसे प्रतिपादित है। अर्चाकी उपासनासे पाप क्षीण होनेपर विभवकी उपासनाके अधिकारी होते हैं अनन्तर व्यूहोपासनाके, तदनन्तर सूक्ष्मोपासनाके, तदनन्तर अन्तर्यामीके साक्षात्कार करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ३७ ॥ तदुपासनञ्च पञ्चविधम्, अभिगमनमुपादानमिज्या स्वाध्यायो योग इति श्रीपञ्चरात्रेऽभिहितम् । तत्राभिगमन नाम देवता- स्थानमार्गस्य संमार्जनोपलेपनादि । उपादानं गन्धपुष्पादि- पूजासाधनसम्पादनम् । इज्या नाम देवतापूजनम् । स्वाध्या योनाम अर्थानुसन्धानपूर्वकं मन्त्रजपो वैष्णवसूक्तस्तोत्रपाठो नामसङ्कीर्तनं तत्त्वप्रतिपादकशास्त्राभ्यासश्च । योगो नाम देवतानुसन्धानम् । एवमुपासनाकर्मसमुचितेन विज्ञानेन द्रष्टृ दर्शने नष्टे भगवद्भक्तस्य तन्निष्ठस्य भक्तवत्सलः परमकारुणिकः पुरुषोत्तमः स्वयाथात्म्यानुभवानुगुणनिरवधिकानन्दरूपं पुनरावृत्तिरहितं स्वपदं प्रयच्छति । तथाच स्मृति -मामुपेत्य पुर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मान संसिद्धि परमां गता " इति॥ स्वभक्तं वासुदेवोऽपि संप्राप्यानन्दमक्षयम् । पुनरावृत्तिरहितं स्वीयं धाम प्रयच्छति॥" इति च ॥ ३८ ॥ उपासनाभी अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय और योग इन भेदोंसे पाँच प्रकार पाञ्चरात्रमें वर्णित है । मन्दिरोंमें तथा मन्दिरोंके मागोंमे मार्जन और लेप- नादि अभिगमन है। गन्ध पुष्पादि पूजासामग्री प्राप्त करना उपादान है। भगवत्पूजन इज्या है अर्थानुसन्धानपूर्वक अष्टाक्षर और द्वय मन्त्रादिका जप पुरुषसूक्त श्रीसूक्तादि स्तोत्रपाठ, भगवन्नामकीर्तन और तत्त्वप्रतिपादक वेदान्तादि शास्त्रोंका अभ्यास स्वाध्याय है और भगवत् स्वरूपका अनुसन्धान योग है उपासना रूप कर्मसहित ज्ञानसे द्रष्टृ दर्शनादि नष्ट होनेपर भगवद्विषयमें तैलधाराकी समान अविरत भक्तियुक्तको परम कारुणिक पुरुषोत्तम भगवान् स्वकीय स्वरूप और स्वभावको यथावत् अनु- भवके योग्य और निरवधिक आनन्दरूप पुनरावृत्तिरहित परमपद ( वैकुण्ठ ) प्राप्ति- रूप मोक्षको देते हैं ( भगवद्गीतामेंभी कहा है ।) भगवत् प्राप्तिरूप परम सिद्धि
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ११३ ) (मोक्ष) को प्राप्त पुरुष दुःखका आलयरूप नश्वर संसारको नहीं पाते । वासुदेव भगवान् स्वभक्तोंके परमानन्द युक्त अक्षय पुनरावृत्ति रहित स्वकीय लोकको देते हैं । इत्यादि ॥ ३८ ॥ तदेतत् सर्वं हृदि निधाय महोपनिषन्मतावलम्बनेन भगवद्बो- धायनाचार्यकृतां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं विस्तीर्णामालक्ष्य रामानुजः शारीरकमीमांसाभाष्यमकार्षीत् । तत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति प्रथमसूत्रस्यायमर्थ । अत्र अथशब्द पूर्वप्रवृत्तकर्माधिगमना- नन्तर्यार्थ । तदुक्तं वृत्तिकारेण-वृत्तात् कर्माधिगमादनन्तरं ब्रह्म विविदिषता " इति । अत शब्दो हेत्वर्थ. अधीतसा- ङ्गवेदस्याधिगततदर्थस्य विनश्वरफलात् कर्मणो विरक्तत्वाद्धेतोः स्थिरमोक्षाभिलाषुकस्य तदुपायभूतब्रह्मजिज्ञासा भवति । ब्रह्मशब्देन स्वभावतो निरस्तसमस्तदोषानवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणगण· पुरुषोत्तमोऽभिधीयते ॥ ३९ ॥ यह सब हृदयमें रखकर सम्पूर्ण उपनिषद्का अवलम्बन करके भगवद् बोधायनमहर्षिनिर्मित अतिविस्तृत ब्रह्मसूत्रवृत्तिको आधुनिक मनुष्योंको दुर्बोध जानकर भगवान् श्रीरामानुजाचार्यजीने शारीरकमीमांसाभाष्य निर्माण किया “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” यह प्रथम सूत्र है इसमें अथशब्द आनन्तर्य अर्थक है आनन्तर्य पूर्व अतीतकी अपेक्षा होता है अतीत कर्मज्ञान हे अत कर्मज्ञानके अन- न्तर यह अर्थ होता हे । वृत्तिकारनेभी कर्मज्ञानके अनन्तर ब्रह्मविचार कहा हे अतः शब्दका अर्थ हेतु हे अधीतसाङ्ग समस्त वेदवेदान्त पुरुषको कर्ममें अल्प ओर नश्वर- फलवत्त्व निश्चित होनेसे तद्विपरीत अनन्त और स्थिरफलक ब्रह्मजिज्ञासा उत्तर का- लमें होती हे ब्रह्मशब्दसे समस्तदोषरहित और अनवधिक असंख्यात कल्याणगुणों का सागर पुरुषोत्तम बोधित हे यद्यपि ब्रह्मशब्द सामान्यवाची हे तथापि पशुशब्द चतुष्पाद जन्तुवाचक होनेपरभी “पशुना यजेत” यहापर “छागो वा मन्त्रवर्णात्” इस न्यायसे जिस प्रकार छागरूप पशुका ग्रहण होता है तिसी प्रकार “सदेव” आत्मावेत्यादिमें प्रतिपादित सत्,ब्रह्म, आत्मादि शब्द भी ‘एको ह वै नारायण (अग्र) आसीत् न ब्रह्मा नेशान' इत्यादि नारायणानुवाकके बलसे नारायणरूप विशेषार्थका निर्णायक ब्रह्मशब्द है ॥ ३९ ॥
४ ११४) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- एवञ्च कर्मज्ञानस्य तदनुष्ठानस्य च वैराग्योत्पादनद्वारा चित्त- कल्मषापनयनद्वारा च ब्रह्मज्ञानं प्रति साधनत्वेन तयोः कार्य्य- कारणत्वेन पूर्वोत्तरमीमांसयोरेकशास्त्रत्वम् । अतएव वृत्तिका- रा एकमेवेदं शास्त्रं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेत्याहुः ॥ ४० ॥ (एवञ्चेति) कर्म ज्ञान ओर उसका अनुष्ठान यह दोना वैराग्य और कल्मषनिरसन द्वारा ब्रह्मज्ञानके साधन होनेसे कर्मज्ञान ओर ब्रह्मज्ञानके परस्पर कार्यकारणभाव हे अतः तत्प्रतिपादक पूर्वोत्तर मीमांसा दोनोंका एक शास्त्रत्व हे । अतएव वृत्तिकारनेभी षोडशलक्षणात्मक जैमानीय शास्त्रके साथ एक शास्त्रत्व वेदान्तको कहा है। यद्यपि जैमिनिकृत मीमासा द्वादशाध्यायात्मक है तथापि सङ्कर्षण प्रोक्त चतुर्ध्यायात्मक मिलाकर षोडशाध्याय होते हैं ॥ ४० ॥ कर्मफलस्य क्षयित्वं ब्रह्मज्ञानफलस्य चाक्षयित्वं 'परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन' इत्यादि- श्रुतिभिरनुमानार्थापत्त्युपबृंहिताभिः प्रत्यपादि । एकैकनिन्दया कर्मविशिष्टस्य ज्ञानस्य मोक्षसाधनत्वं दर्शयति श्रुतिः 'अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः । विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते" इत्यादि ॥ ४१ ॥ कर्म फलका क्षयित्व और ब्रह्मज्ञानका अनन्त अक्षय फलत्व श्रुति अनुमान अर्थापत्त्यादि प्रमाण सिद्ध है 'कृष्यादि कर्मसे सम्पादित सस्यादि फलके समान यागादि कर्मसे सम्पादित स्वर्गादि फलको भी नाशवान् जानकर त्रैवर्णिक वैराग्य प्राप्त करे क्योंकि कृत अनित्य कर्मसे अकृत (नित्य) मोक्ष नहीं होता है। अध्रुव (क्षणिक) कर्मसे ध्रुव (नित्य) मोक्ष नहीं मिलता इत्यादि श्रुति हे। जो कृतक हे वह अनित्य है इत्यादि अनुमान हे । केवल कर्म और केवल ज्ञानको निन्दित करके कर्म समुचित ज्ञानको मोक्षसाधनता श्रुति कहती है जो केवल कर्मका अनुष्ठान करते हैं वे घोर तमोगुण प्रधान प्रकृति (संसार) को प्राप्त होते हैं। एव जो केवल ज्ञाननिष्ठ हैं वे उसमेभी अधिक तमोगुणको प्राप्त होते हैं। जो कर्म जोग ज्ञानको युगपत अनुष्ठान करते हैं वे कर्मसे ज्ञानके विरोधी प्राचीन कर्मको विनाश कर्क विद्यासे (ज्ञान से) ब्रह्मस्वरूपको पाते हैं (कोई २ "अविद्यया मृत्यु तीत्वो" यहापर
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ११६ ) “ समार प्राप्य ” ऐसा अर्थ करते हैं वह पाण्डित्यकी पराकाष्ठा वैदिक और लौकिक किसी कोशमें अथवा व्यवहारमें कहींभी प्राप्ति अर्थमें तृधातुका प्रयोग नहीं दृष्टि आता ॥ ४१ ॥ तदुक्तं पाञ्चरात्ररहस्ये-“स एव करुणासिन्धुर्भगवान् भक्तव- त्सलः । उपासकानुरोधेन भजते मूर्तिपञ्चकम् ॥ तदर्चाविभ- वव्यूहसूक्ष्मान्तर्यामिसंज्ञकम् । यदाश्रित्यैव चिद्वर्गस्तत्तज्ज्ञेयं प्रपद्यते ॥ पूर्वपूर्वोदितोपास्तिविशेषक्षीणकल्मषः । उत्तरोत्तर- मूर्तीनामुपास्त्याधिकृतो भवेत् ॥ एवं ह्यहरहः श्रौतस्मार्त्तध- र्म्मानुसारतः । उक्तोपासनया पुंसां वासुदेवः प्रसीदति ॥ प्रस- न्नात्मा हरिर्भक्त्या निदिध्यासनरूपया । अविद्यां कर्मसङ्घात- रूपां सद्यो निवर्त्तयेत् ॥ ततः स्वाभाविकाः पुंसां ते संसारा- त्तिरोहिता । आविर्भवन्ति कल्याणाः सर्वज्ञत्वादयो गुणाः ॥ ४२ ॥ अत एव पञ्चरात्रमें कहा है । भक्तप्रिय दयासागर भगवान् उपासकोंके अनु- रोधसे पाँच प्रकारके विग्रहको धारण करते हैं । जिन मूर्तियोंकी उपासना करके चेतनवर्ग तत्तत्प्राप्य वस्तुको प्राप्त करते हैं । पूर्व पूर्व मूर्तियोंकी उपासनासे क्षीण पाप पुरुष उत्तरोत्तर मूर्तिकी उपासनाके अधिकारी होते हैं इसीप्रकार प्रतिदिन श्रौतस्मार्त्तकर्मानुष्ठानयुक्तपूर्वोक्त उपासनासे वासुदेव भगवान् प्रसन्न होते हैं । निदिध्यासनरूप भक्तिसे प्रसन्न भगवान् कर्मसङ्गतक अविद्याको शीघ्र दूर करते हैं । तदनन्तर चेतनको संसारदशामे तिरोहित स्वाभाविक सर्वज्ञत्वादि कल्याणगु- णजात आविर्भूत होते हैं ॥ ४२ ॥ एवं गुणा समाना स्युर्मुक्तानामीश्वरस्य च । सर्वकर्तृत्वमेवैकं तेभ्यो देवे विशिष्यते ॥ मुक्तास्तु शेषिणि ब्रह्मण्यशेषे शेपरू- पिण । सर्वानश्नुवते कामान् सह तेन विपश्चिता”इति ॥ ४३ ॥ इस प्रकार अपहतपाप्मत्व, सर्वज्ञत्व, सत्यकामत्वादि कल्याण गुण यह सब मुक्त और ईश्वर दोनोंमें समान हैं केवल ईश्वरमें सृष्टिकर्तृत्व अधिक है सर्वशेषी ( स्वामी ) ब्रह्ममें शेषरूपयुक्त चेतन सम्पूर्ण कल्याण गुणको ब्रह्मके साथही अनुभव करते हैं ॥ ४३ ॥
(११६) सर्वदर्शनसंग्रह । [रामानुज- तस्मात्तापत्रयातुरैरमृतत्वाय पुरुषोत्तमादिपदवेदनीयं ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तं भवति । प्रकृतिप्रत्ययैः प्रत्ययार्थ प्राधा- न्येन सह ब्रूत इत स नोऽन्यत्रेति वचनबलादिच्छाया इष्यमा- णप्रधानत्त्वादिष्यमाणं ज्ञानमिह विधेयम् ॥ ४४ ॥ अतः आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिकादि दुःखत्रयसे पीडित चेतनोंको अमृत (मोक्ष) प्राप्तिके लिये पुरुषोत्तमादि शब्दवाच्य परब्रह्मविषयक जिज्ञासा करनी चाहिये । ब्रह्मजिज्ञासापद सन्प्रत्ययान्त है सन्प्रत्ययका अर्थ इच्छा और प्रकृतिका अर्थज्ञान है प्रकृति प्रत्ययार्थके मध्यमे प्रत्ययार्थ प्रधान होता है एवञ्च प्रत्ययार्थ इच्छाप्रधान होनेपरभी इच्छा पुरुषाधीन न होनेसे उसका विधान अस म्भव है धात्वर्थज्ञान इच्छामें विशेषणीभूत होनेसे उसकाभी विधान सम्भव है । इसी अभिप्रायसे कहते हैं प्रकृति प्रत्यय इत्यादि न्याय सन् प्रत्ययसे अन्यत्र लगता है । इसमें युक्ति यह है कि इच्छा विषयके परतन्त्र होती है । एवञ्च ज्ञानकी इच्छा ज्ञानके परतन्त्र होनेसे इच्छाका कर्मभूतज्ञान प्रधान होत इष्यमाण ज्ञानही विधेय है यही प्रकृति प्रत्यय इत्यादि विधेय पर्यन्त ग्रन्थका तात्पर्य है ॥ ४४ ॥ तच्च ध्यानोपासनादिशब्दवाच्यं वेदनम्, न तु वाक्यजन्यमापात- ज्ञानम् । पदसन्दर्भश्राविणो व्युत्पन्नस्य विधानमन्तरेणापि प्राप्त- त्वात् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्य श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्या- सितव्यः । आत्मेत्येवोपासीत विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत अनुविद्य विजानाति" इत्यादिश्रुतिभ्य । अत्र श्रोतव्य इत्यनुवाद । अध्य- यनविधिना साङ्गस्य ग्रहणे अधीतवेदस्य पुरुषस्य प्रयोजनव- दर्थदर्शनात्तन्निर्णयाय स्वरसत एव श्रवणे प्रवर्त्तमानतया तस्य प्राप्तत्वात् । मन्तव्य इति चानुवाद श्रवणप्रतिष्ठार्थत्वेन मनन- स्यापि प्राप्तत्वादप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात् । ध्यानञ्च तैल धारावदविच्छिन्नस्मृतिसन्तानरूपा ध्रुवा स्मृति स्मृतिप्रतिल- म्भेसर्वग्रन्थीना विप्रमोक्ष इति ध्रुवायाः स्मृतेरेव मोक्षोपायत्व- श्रवणात् । सा च स्मृतिर्दर्शनसमानाकारा ॥ ४५ ॥
६. नकुलीश पाशुपत व शैव दर्शन
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ११७ ) वह ज्ञान ध्यान और उपासनादि रूप है वाक्यमे जायमान आपात प्रतीत वाक्यार्थ ज्ञानरूप नहीं है क्योंकि व्याकरण काव्यकोशादि ज्ञानवान् व्युत्पन्न पुरुषको पदसमू- हरूप वाक्य श्रवणके अनन्तर विधिवाक्यके बिनाभी वाक्यार्थ ज्ञान होनेसे विधान व्यर्थ है । अतः वाक्यार्थज्ञानसे विलक्षण ध्यान ओर उपासनादिरूप ज्ञानही वेदान्तवाक्योंसे विधीयमान है क्योंकि 'आत्मा वाअरे द्रष्टव्य' इत्यादि वाक्य श्रवण मननादि पूर्वक निदिध्यासनका विधान करते हैं 'आत्मेत्येव उपासीत' यह वाक्यभी उपासनाका विधान करता है । विज्ञाय यहापरभी प्रज्ञापदसे उपासनाहीका ग्रहण है अत एव विज्ञाय ओर प्रज्ञा दोनो पद चरितार्थ होते हैं अन्यथा दोनों ज्ञान सामान्य वाची हो तो एकपद व्यर्थ होजायगा “अनुविद्यविजानाति” ध्यान ओर उपासनाही- का बोधक है तात्पर्य यह है वेदान्तवाक्योंमें वेदन ज्ञान उपासना ध्यानादि शब्द सब पर्याय है अत एव “ मनो ब्रह्मेत्युपासीत ” यहा उपासनासे उपक्रम करके “ य एव वेद ” यहा विदसे उपसहार किया है । न स वेद यहा वेदनसे उपक्रम करके “ आत्मेत्येवोपासीत ” इति उपासनासे उपसहार किया है । श्रीशंकरा- चार्यनेभी “ आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ” इस सूत्रके भाष्यमें इन बातोंको स्पष्ट किया है “ आत्मावाअरे द्रष्टव्य ” इत्यादिमें श्रवणका विधान नहीं हो सकता क्योकि “स्वाध्यायोऽध्येतव्य ” इति अध्ययन विधि साङ्ग समस्त वेदोंके अध्ययनका विधान करता है वह केवल शब्द पाठमात्रको नहीं बोध करता किन्तु अर्थज्ञान- पर्यन्तका बोधक है अतः अधीतवेदपुरुष प्रयोजनरूप अर्थके निर्णयके लिये स्वय प्रवृत्त होगा एवञ्च श्रवण स्वतः प्राप्त होनेसे उसका विधान नहीं होसकता । मन- नकाभी विधान नहीं होसकता क्योंकि श्रवणकी प्रतिष्ठाके लिये मनन होता है मन्तव्य यहभी अनुवाद है अत ध्यानमात्रका विधान होता है अप्राप्त अर्थके विधानमे शास्त्र सार्थक होता है तादृश ज्ञान “आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ” इत्यादि सूत्रसे प्रतिपादित विजातीयज्ञानरहित तैलधाराकी समान विच्छेद ( विराम ) शून्य स्मृतिपरम्परा है ध्रुव ( निश्चल ) स्मृति है स्मृति स्थिर होनेसे हृदयके रागादि समस्त ग्रन्थियाका विनाश होता है अत मोक्षका उपाय केवल स्मृति है वह स्मृति प्रत्यक्षकी समानाकार होती है ॥ ४५ ॥ “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे” इत्यनेनैकत्वात् । तथाच आत्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यानेनास्यादर्शनरूपता विधीयते । भवति च भावनाप्रकर्षात् स्मृतेर्दर्शनरूपत्वम् । वाक्यकारेणै- तत् सर्वं प्रपञ्चितं वेदनमुपासनं स्यात् इत्यादिना । तदेव ध्यानं
( ११८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- विशिनष्टि श्रुति -'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृ- णुते तनूं स्वाम्” इति । प्रियतम एव हि वरणीयो भवति यथायं प्रियतममात्मानं प्राप्नोति तथा स्वयमेव भगवान् प्रियतम इति भगवतैवाभिहितम् “तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥” इति । 'पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया' इति च ॥ ४६ ॥ (भिद्यते इति) परावर परमात्माके दर्शन (निरवच्छिन्न) स्मृतिसे हृदय मनके ग्रन्थि (रागादि) नष्ट होते हैं अथवा हृदयप्रदेशमें विद्यमान जीवकी प्रकृति सम्बन्ध रूप ग्रन्थिए नष्ट होती हैं और समस्त देहात्माभिमानादि अविद्यारूप संशय नष्ट होता है पुण्यपापरूप मोक्षविरोधी समस्त कर्म क्षीण होते हैं । इस श्रुतिके साथ एकवाक्यता होनेसे पूर्वोक्त ज्ञान वेदनादि सब प्रत्यक्षतापन्न स्मृतिपरक है । श्रीबोधायन महर्षिनेभी वेदनको उपासना कहा है “आत्मावाअरेद्रष्टव्य” यह वाक्यभी स्मृतिको दर्शनरूप प्रतिपादन करता है निरतिशय भावना वश स्मृतिभी प्रत्यक्ष समानाकार होती है । तादृश स्मृतिका विशेषण कहते हैं ( नायमा त्मेति ) प्रवचनशब्दकी मनन अर्थमें लक्षणा है क्योंकि प्रवचनका फलभी मनन है मेधाशब्दका अर्थ निदिध्यासन है तथाच केवल श्रवण मनन और निदिध्यासन मोक्षके लिये उपाय नहीं है इसका तात्पर्य यह नहीं कि श्रवणादिक उपायही नहीं किन्तु जैसे “न पृथिव्यामग्निश्चेतव्य” यहाँपर हिरण्यरहित पृथिवीका निषेध करता है तैसेही केवल श्रवणादिका निषेध करता है ( यमेवेति ) वह आत्मा जिसको स्वीकार करता है उन्हींको प्राप्त होता है जो अत्यन्त प्रिय हो वही स्वीकार योग्य होता है जिसको आत्मा ( ईश्वर ) निरतिशय प्रिय हो वही ईश्वरकाभी प्रिय होता है जिस प्रकार जीव प्रियतम ईश्वरको प्राप्त होता है उसको गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है । ( तेषामिति ) जो निरन्तर योगको कथन करनेवाले अनन्य भक्त हैं उनको मैं उस शुद्ध ज्ञानको प्रीतिपूर्वक देता हूं जिस ज्ञानसे वह मुझको प्राप्त होते हैं (पुरुष स परोति) परम पुरुष परमात्मा अनन्य भक्तिसे प्राप्त होते हैं ॥ ४६ ॥ भक्तिस्तु निरतिशयानन्दप्रियानन्यप्रयोजनसकलेतरवैतृष्ण्यव- ज्ज्ञानविशेष एव । तत्सिद्धिश्च विवेकादिभ्यो भवतीति वाक्य-
कारेणोक्तं 'तल्लब्धिर्विवेकविमोकाभ्यासक्रियाकल्याणानवसादा- नुद्धर्षेभ्यः सम्भवान्निर्वचनाच्च' इति । तत्र विवेको नामादुष्टान्नात् सत्त्वशुद्धिः, अत्र निर्वचनम्-आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति" इति । विमोकः कामानभिष्वङ्ग शान्त उपासी- तेति निर्वचनम् । पुनः पुनः संशीलनमभ्यासः । निर्वचनञ्च स्मार्त्तमुदाहृतं भाष्यकारेण-'सदा तद्भावभावितः' इति । श्रौत- स्मार्त्तकर्मानुष्ठानं शक्तितः क्रिया क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठ इति निर्वचनम् । सत्यार्जवदयादानादीनि कल्याणानि सत्येन लभ्य इत्यादि निर्वचनम् दैन्यविपर्ययोऽनवसाद नायमात्मा बलहीनेन लभ्यत इति निर्वचनम् । तद्विपर्ययजा तुष्टिरनुद्धर्षः शान्तो दान्त इति निर्वचनम् । तदेवमेवंविध नियमविशेषसमा- सादितपुरुषोत्तमप्रसादविध्वस्ततमःस्वान्तस्य अनन्यप्रयोजनान- वरतनिरतिशयप्रियवदात्मप्रत्ययावभासतापन्नध्यानरूपया भ- क्त्या पुरुषोत्तमपदं लभ्यत इति सिद्धम् ॥ ४७ ॥ (भक्तिस्तु इति) निरतिशय आनन्द प्रिय और अनन्यप्रयोजन तथा इतर समस्त विषयोंसे वैराग्यरूप ज्ञानविशेषा भक्ति है तादृश ध्रुवानुस्मृतिरूप भक्तिकी सिद्धि विवेकादिसे होती है विवेक, विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद, अनुद्धर्ष, यही विवेकादिक हैं जातिदुष्ट कलञ्जादि और आश्रयदुष्ट गणिकान्नादिमें ओर उच्छिष्ट या केशादिनिमित्तदुष्ट इन तीनों प्रकारके अन्नोंको छोडकर शुद्ध अन्नसे शरीरकी शुद्धिको विवेक कहते हैं क्योंकि आहारशुद्धिसे चित्तकी शुद्धि होती है ओर चित्तकी शुद्धिसे ध्रुव स्मृति होती है । कामादिमें आसक्तिके त्यागको विमोक कहते हैं क्योंकि शान्त अर्थात् रागद्वेषरहित होकर उपासना करें ऐसी श्रुति कहती है बारबार परिशीलनका नाम अभ्यास है । सदा परमात्मानुसन्धान करें इस प्रकार स्मृति कहती हे शक्तिके अनुसार पञ्चमहायज्ञादिका अनुष्ठान क्रिया है क्योंकि जो क्रियावान् है वह ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हे ऐसे श्रुति कहती है सत्य आर्जव दया ओर दानका नाम कल्याण हे सत्यसे ब्रह्मप्राप्ति होती है ऐसी श्रुति हे चित्तके अदेन्यको अनवसाद कहते हैं (नायमात्मेत्यादि) श्रुति इसका निर्वचन है चित्तके जो दैन्य है
( १२० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- उससे जायमान तेज हे उससे विपरीत तद्विपर्ययज सन्तोषको उद्धर्ष कहते हैं इससे विपरीत अनुद्धर्ष हे अत्यन्त सन्तोषभी विरोधी होता हे शान्तोदान्त इत्यादि श्रुति हे एतादृश नियमविशेषोंसे आराधित परमात्माके प्रसादसे जिनके चित्तके रागादिक नष्ट हो गये हो उनको निरतिशय प्रिय ओर प्रयोजनान्तर शून्य प्रत्यक्ष तापन्न भक्तिद्वारा परम पुरुष परमात्मा प्राप्त होते हैं ॥ ४७ ॥ तदुक्तं यामुनेन-“उभयपरिकर्मितस्वान्तस्यैकान्तिकात्यन्तिकभ- क्तियोगलभ्यः” इति।ज्ञानकर्मयोगसंस्कृतान्त करणस्येत्यर्थ ॥४८॥ श्रीयामुनाचार्यजीने कहा हे-ज्ञानयोग तथा कर्मयोगसे परिशुद्धान्त.करण पुरुषको अनन्य और निरतिशय भक्तिसे परमात्मा प्राप्त होते हैं ॥ ४८ ॥ किं पुनस्तद्ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्यपेक्षायां लक्षणमुक्तं 'जन्माद्यस्य यतः'इति' जन्मादीति सृष्टिस्थितिप्रलयं तद्गुणसंविज्ञानो बहु- व्रीहि अस्याचिन्त्यविचित्ररचनारच्यस्य नियतदेशकालभोग- ब्रह्मादिस्तम्बपर्य्यन्तक्षेत्रज्ञमिश्रस्य जगत यतो यस्मात् सर्व्वे- श्वरात् निखिलहेयप्रत्यनीकस्वरूपात् सत्यसङ्कल्पाद्यनवधिका- तिशयासंख्येयकल्याणगुणात् सर्व्वज्ञात् सर्व्वशक्त पुंस सृष्टिस्थि- तिप्रलया प्रवर्त्तन्त इति सूत्रार्थ ॥ ४९ ॥ ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिये ऐसा कहा है वह ब्रह्म किंरूप हे इस आशङ्कासे ब्रह्मस्व- रूप कहते हैं ( जन्माद्यस्येति ) जन्म है आदि जिसमें ऐसे तद्गुणसविज्ञान बहुव्रीहि- समाससे जन्म, स्थिति, लय गृहीत होते हैं अभिप्राय यह है कि बहुव्रीहि दो प्रकार है एक तद्गुणसंविज्ञान दूसरा अतद्गुणसविज्ञान । प्रथममें विग्रहवाक्यगत पदके अर्थ सहित अन्य पदार्थका ग्रहण होता है यथा लम्बकर्णको लाओ दूसरेमें विग्रह वाक्य- गत पदार्थका ग्रहण नही यथा समुद्रको जिसने देखा हो उसको लाओ। तद्वत् यहापर भी जन्मसहित अन्यपदार्थका ग्रहण होता है तथा च विचित्र रचनासे रचित देश, काल, भोगसे नियत ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्य्यन्त क्षेत्रज्ञयुक्त जिस सकल हेयगु- णरहित कल्याणगुणयुक्त सर्व्वेश्वर सर्व्वज्ञ सर्व्वशक्तिमान् पुरुषसे जगत्की सृष्टि स्थिति और प्रलय हो वही ब्रह्म है । यह सूत्रार्थ है ॥ ४९ ॥ इत्थम्भूते ब्रह्मणि किं प्रमाणमिति जिज्ञासायां शास्त्रमेव प्रमा- णमित्युक्तं 'शास्त्रयोनित्वात् इति' । शास्त्रं योनि कारणं प्रमाणं
[Header] दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२१ )
यस्य तच्छास्त्रयोनि तस्य भावस्तत्त्वं तस्माद् ब्रह्मज्ञानकारणा- त्मज्ञानकारणत्वात् शास्त्रस्य तद्योनित्वं ब्रह्मण इत्यर्थः । न च ब्रह्मणःप्रमाणान्तरगम्यत्वं शङ्कितुं शक्यमतीन्द्रियत्वेन प्रत्यक्ष- स्य तत्र प्रवृत्त्यनुपपत्ते नापि महार्णवादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत् इत्यनुमानस्य पूतिकूष्माण्डायमानत्वात् । तल्लक्षणं ब्रह्म, यतो वा इमानि भूतानीत्यादिवाक्यं प्रतिपादयतीति स्थितम् ॥ ५० ॥ एतादृश ब्रह्ममें प्रमाण क्या है ? ऐसी आशङ्का करके शास्त्रैक प्रमाण कहते हैं । ' शास्त्रही योनि ( कारण ) अर्थात् प्रमाण हो जिसमें वह शास्त्र योनि है ब्रह्मज्ञानका आत्मज्ञान कारण होनेसे ब्रह्मभी शास्त्र योनि हुआ वस्तुतः शास्त्रैक प्रमाण ब्रह्म है मनु आदि धर्मशास्त्रकारोंने प्रत्यक्ष अनुमान आगम ( शास्त्र ) तीन प्रमाण माने हैं ब्रह्ममे केवल शास्त्रही प्रमाण क्यों है? ऐसी शंकाका खण्डन करते हैं ब्रह्म अतीन्द्रिय होनेसे प्रत्यक्षका विषय नही, पृथिवी समुद्रादि कार्य होनेसे सकर्तृक है । अत जो कर्त्ता हो वह ब्रह्म है इत्यादि अनुमान भी सडी हुई कूष्मांडकी समान है । तात्पर्य- लोकमें जितने गृहमन्दिरादि महान् कार्य हैं उन सबको अनेक पुरुष मिलके करते हैं जब मही महार्णवादि कार्यभी अनेक पुरुष मिलके कृत सिद्ध होगा तो अभिमत ब्रह्मसिद्ध नही होगी 'यतोवा' इत्यादिश्रुतिसे एंव द्वितीय सूत्रसे ब्रह्मका लक्षण ओर तृतीय सूत्रसे ब्रह्ममें प्रमाण प्रतिपादन किया ॥ ५० ॥ यद्यपि ब्रह्म प्रमाणान्तरगोचरतां नावतरति तथापि प्रवृत्तिनि- वृत्तिपरत्वाभावासिद्धरूपं ब्रह्म न शास्त्रं प्रतिपादयितुं प्रभवतीति एतत्पर्यनुयोगपरिहारायोक्तं 'ततु समन्वयात्' डति । तुशब्दः प्रसक्ताशङ्काव्यावृत्त्यर्थः । तच्छास्त्रप्रमाणकत्वं ब्रह्मण सम्भ- वत्येवे कुत समन्वयात् परमपुरुषार्थभूतस्यैव ब्रह्मणोऽभिधेय- तयान्वयादित्यर्थः । न च प्रवृत्तिनिवृत्त्योरन्यतरविरहिणः प्रयो- जनशून्यत्वं स्वरूपपरेष्वपि पुत्रस्ते जातः नायं सर्प इत्यादिषु हर्षभयनिवृत्तिरूपप्रयोजनत्वं दृष्टमेवेति न किञ्चिदनुपपन्नम् ।
( १२२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । / [ पूर्णप्रज्ञ- दिङ्मात्रमत्र प्रदर्शितं विस्तरस्तनाकरादेवानगन्तव्य इति विस्तरभीरुणोदास्यत इति सर्वमनाकुलम् ॥ ५१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे रामानुजदर्शनं समाप्तम् ॥ ४ ॥ शंका-जैसे प्रत्यक्ष और अनुमानका विषय ब्रह्म नहीं वैसेही शास्त्रकाभी विषय नहीं हो सकता क्योंकि मीमांसक कहते हैं "आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमत- दर्थानाम् " विधिप्रत्यययुक्त क्रियापरक जो वेदवाक्य है वही प्रमाण है इससे विपरीत अनर्थक है अतः प्रवृत्ति निवृत्ति अन्यतर बोधकसे रहितवाक्य सिद्ध ब्रह्म- को शास्त्रप्रतिपादन नहीं कर सकता, ऐसी शंकाके परिहारार्थ चतुर्थ सूत्रका अवतार कहते हैं 'तुशब्द' प्रकृत शंकारनिरासक है ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक हो सकता है कारण परम पुरुषार्थ बोधनद्वारा ब्रह्म बोधक होनेसे वाचकतासम्बन्धसे अन्वित है यदि कहो प्रवृत्ति और निवृत्ति बोधनशून्य वाक्य निष्प्रयोजन होनेसे अनर्थक होगा यह नहीं 'तुम्हारे पुत्र हुआ यह सर्प नहीं है' इत्यादि सिद्धवस्तुबोधक वाक्यसे भी हर्ष तथा भयनिवृत्तिरूप प्रयोजन देख पड़ता है अतः सिद्धवस्तुबोधनमें कोई अनुपपत्ति नहीं है यह केवल दिक्दर्शन मैने किया अधिक जिज्ञासु श्रीभाष्यादि प्रबन्धसे जानलें ॥ ५१ ॥ सर्वदर्शनसंग्रहम श्रीरामानुज दर्शन समाप्त । अथ पूर्णप्रज्ञदर्शनम् ॥ ५ ॥ तदेतद्रामानुजमतं जीवाणुत्वदासत्ववेदापौरुषेयत्वसिद्धार्थबो- धकत्वस्वतःप्रमाणत्वप्रमाणत्रित्वपाञ्चरात्रोपजीव्यत्वप्रपञ्चभेद- सत्यतादिसाम्येऽपि परस्परविरुद्धभेदादिपक्षत्रयकक्षीकारेण क्षपणकपक्षनिक्षिप्तमित्युपेक्षमाणः स आत्मा तत्त्वमसीत्यादिवे- दान्तवाक्यजातस्य भङ्ग्यन्तरेणार्थान्तरपरत्वमुपपाद्य ब्रह्ममी- मांसाविवरणव्याजेनानन्दतीर्थः प्रस्थानान्तरमास्थितः। तन्मते हि द्विविधंतत्त्वं स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदात् । तदुक्तं तत्त्वविवेके । "स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिष्यते । स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुर्निर्दोषोऽशेषसद्गुणः ॥" इति ॥ १ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । , ( १२३ )
पूर्णप्रज्ञ ( मध्व ) सिद्धान्त ।
यद्यपि रामानुजीय मतमें कहे हुए जीवका अणुपरिमाणत्व वेदापौरुषेयत्व उपनि- दको सिद्ध ब्रह्म बोधकत्व प्रमाणका स्वतः प्रामाण्य "प्रत्यक्षमनुमानञ्च शास्त्र च त्रिवि- धागमम् " इत्यादि स्मृतिबलसे प्रत्यक्षादि प्रमाणत्रयत्व "पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् " इत्युक्त प्रकार पंचरात्रागमका प्राधान्यादि और प्रपंचसत्यत्वादि सिद्धान्त सम्मत है तथापि भेदश्रुति अभेदश्रुति घटकश्रुतिरूप त्रिविध श्रुति प्रतिपादित होनेपरभी शरीर शरीरीभावमे भेद अभेद और विशिष्टत्वादि पक्षत्रय मानना पूर्वोक्त जैनसिद्धान्तके समान है। अतः तत्त्वमस्यादिवेदान्तवाक्योंका प्रकारान्तरसे व्याख्यानके लिये ब्रह्मसूत्रविवरणव्याजसे प्रस्थानान्तर करते है ॥ माध्वमतमे संक्षेपतः स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र रूप दो तत्त्व हैं समस्तकल्याणगुणाकर हेयगुणरहित भगवान् विष्णु स्वतन्त्र तत्त्व है ॥ १ ॥ ननु सजातीयविजातीयस्वगतनानात्वशून्यं ब्रह्म तत्त्वमि- तिप्रतिपादकेषु वेदान्तेषु जागरूकेषु कथमशेषसद्गुणत्वं तस्य कथ्यत इति चेन्मैवम्, भेदप्रमापकबहुप्रमाणविरोधेन तेषां तत्र प्रामाण्यानुपपत्तेः । तथाहि प्रत्यक्षं तावदिदमस्माद्भिन्नमिति नीलपीतादेर्भेदध्यक्षयति ॥ २ ॥ प्रत्यक्ष श्रुतिविरुद्ध होनेसे उक्त विभागके असंगतत्वकी आशंका करते है(ननुज्ञेति) "सदेवसोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् " इस श्रुतिमें सत् पदसे असत्रूपकी व्या- वृत्ति है एवपदसे विजातीय अचेतन व्यावृत्ति और एकपदसे सजातीय जीवादि व्यावृत्ति है अद्वितीयपदसे स्वगत भेदकी व्यावृत्ति होती है। एवंच समस्त भेदशून्य निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप बोधक वेदान्तके रहते विविध भेद सत्यत्व मानना सर्वथा अप्रामाणिक है। परिहार करते है ( मैवमित्यादि)"पृथगात्मानं प्रेरितारञ्च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति " " नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विद- धाति कामान् " इत्यादि भेदप्रतिपादक अनेक श्रुतियोंके विरोध होनेसे सदेवेत्यादि श्रुतियोको वास्तवमें अभेदबोधकत्व नही हो सकता पूर्वापरवाक्यको बिना विचारे
१ तात्पर्य यह हे " यस्यात्मा शरीरम् " इत्यादि अन्तर्यामी ब्राह्मणसे शरीर शरीरिभाव सिद्ध है शरीर शरीरीका भेदाभेदभी लोकव्यवहारसिद्ध है अत उस मतमें तीनों प्रकारकी श्रुतियों की संगति होती है । केवल भेदवादीके मतमें अभेद श्रुति एव केवल अभेदवादीके मतमें भेद श्रुति तथा दोनोंके मतमें घटक श्रुति सर्वथा बाधितार्थ रहेगी यही विशेष है।
( १२४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- आपातत अभेदार्थ वर्णन करते हैं । उसीको उपपादन करते हैं ( तथाहीति ) नील पीतादिमे परस्पर भेद प्रत्यक्ष सिद्ध हे । प्रत्यक्षसिद्ध वस्तुका अपलाप प्रमाणान्तरसे नहीं कर सकता अन्यथा अग्निमें प्रत्यक्ष सिद्ध उष्णत्वादिका अनुमानादिसे बाध होने लगेगा ॥ २ ॥ अथ मन्येथाः किं प्रत्यक्षं भेदमेवावगाहते किं वा धर्मिप्रतियो- गिघटितम् । न प्रथमं, धर्मिप्रतियोगिप्रतिपत्तिमन्तरेण तत्सा- पेक्षस्य भेदस्याशक्याध्यवसायत्वात् । द्वितीयोऽपि धर्मिप्रति- योगिग्रहणपुरस्सरं भेदग्रहणमथवा युगपत् तत्सर्वग्रहणम् । न पूर्वं बुद्धेर्विरम्य व्यापाराभावात् अन्योन्याश्रयप्रसङ्गाच्च । नापि चरमं कार्य्यकारणबुद्ध्यौर्यौगपद्याभावात् । धर्मिप्रतीतिर्हि भेदप्रत्ययस्य कारणं सन्निहितेऽपि धर्मिणि व्यवहितप्रतियोगि- ज्ञानमन्तरेण भेदस्याज्ञातत्वेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्य्यकार- णभावावगमात् ॥ तस्मान्न भेदप्रत्यक्षं सुप्रसरम् ॥ ३ ॥ भेदके प्रत्यक्ष होनेसे अभेद श्रुतिको अर्थान्तर परत्व जो कहा सो तभी होसकता है जब प्रत्यक्षसे भेदका ग्रहण होता हो परन्तु प्रत्यक्षसे भेदका ग्रहणही असम्भव हे क्योंकि प्रत्यक्ष केवल भेदको ग्रहण करता है, या धर्मी प्रतियोगीसहित भेदको ग्रहण करता हे ? जिसमें भेद लाना हो वह धर्मी है जिसका भेद कहना हो वह प्रतियोगी है। यथा 'घटो न पट' यहापर घटका भेद पटमें कहना है तो पट धर्मी और घट प्रतियोगी है घट प्रतियोगिक भेदविशिष्ट पट ऐसा वाक्यार्थ है । ( न प्रथम इति ) किसी वस्तुमें अन्यवस्तुका भेद कहा जाता है भेद अन्योन्याभाव हे अभावज्ञानमें प्रतियोगीज्ञान कारण है तथाच धर्मी ज्ञान और प्रतियोगी ज्ञानके विना भेदज्ञान नही होसकता । द्वितीय पक्षकोभी विकल्प करके दूषित करते हैं ( द्वितीयोपीति ) प्रत्यक्ष धर्मी और प्रतियोगीको ग्रहण करके भेदको ग्रहण करता है, या एकही कालमें तीनोको ग्रहण करेगा ? चक्षुरादिके संयोगानन्तर भेद या प्रतियोगी एकको ग्रहण करके बुद्धिके व्यापारकी निवृत्ति होनेपर व्यापारान्तर न होनेसे दूसरेको नही ग्रहण कर सकते बुद्धिकाठैर ठैर कर व्यापार नहीं होता है। भेदके ग्रहणमे धर्मी और प्रतियोगीका ग्रहण होगा धर्मी और प्रतियोगीके ग्रहणमे भेदका ग्रहण होगा इस प्रकार अन्योन्याश्रयभी है अत प्रथमकिक्लप नही हो सकता। कार्य कारण दोनो ज्ञान एक कालमें बाधित
दर्शनम् ] भाषार्टीकासमेत । ( १२५ ) होनेसे द्वितीय पक्षभी नहीं होसकता । धर्मीज्ञान और प्रतियोगीज्ञान दोनों भेद- ज्ञानके कारण हैं क्योंकि पटादि धर्मी समीप दृष्ट होनेपरभी दूरवर्ती प्रतियोगीके ज्ञानके विना भेदज्ञान नहीं होता है अतः अन्वय व्यतिरेकसे दोनोंमें परस्पर कार्य कारणभाव निश्चित होता है । इस कारण भेद प्रत्यक्ष किसी प्रकारमे नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ इतिचेत् किं वस्तुस्वरूपभेदवादिनं प्रति इमानि दूषणान्यु- दुष्यन्ते किं धर्मिभेदवादिनं प्रति। प्रथमे चोरापराधान्माण्डव्य- निग्रह न्यायापात भवदभिधीयमानदूषणानां तद्विषयत्वात् ॥४॥ खण्डन-क्या स्वरूप भेदवादीके प्रति यह दोष देते हो, किंवा धर्मी भेदवादीके मत- में ? यदि स्वरूप भेदवादीके मतमें कहो तो सर्वथा विपरीत है ( चोरापराधेनेति ) यह क्या महाभारतकी है एक समय कोई चोरके भ्रमसे माण्डव्य ऋषिको पकड कर राजाके पास ले गये राजाने शूलीकी सजा दी शूलीमें चढनेके अनन्तर यम- लोकमें जाकर धर्मराजसे पूछा मैंने क्या अपराध किया जिससे मुझको शूलीपर चढना पडा धर्मराजने कहा आप बाल्यावस्थामें छोटे छोटे कीडोंको पकडकर कण्ट- कसे छेदा करते थे उस पापके फलसे आज आपको शूलीपर चढना पडा । इस बातको सुनकर माण्डव्य ऋषिने रुष्ट होकर धर्मराजको शाप दिया मैने अज्ञानसे बाल्यावस्थामें ऐसा कर्म किया था अज्ञानमें किये कर्मका पाप नही होता परन्तु तुमने इतना कडा दण्ड दिया इसलिये मर्त्यलोकमे शूद्रयोनिमे जन्म लोगे वही विदुर हुए उस दिनस बालकको कोई प्रकार पाप नही लगता पूर्वोक्त दूषण एकभी स्वरूप भेदके विषयमें नहीं लगता हे ॥ ४ ॥ ननु वस्तुस्वरूपस्यैव भेदत्वे प्रतियोगिसापेक्षत्वं न घटते घट- वत् प्रतियोगिसापेक्ष एव सर्वत्रभेद प्रथत इति चेन्न, प्रथमं सर्वतोविलक्षणतया वस्तुस्वरूपे ज्ञायमाने प्रतियोग्यपेक्षया विशिष्टव्यवहारोपपत्ते । तथाहि परिमाणघटितं वस्तुस्वरूपं प्रथममवगम्यते पश्चात् प्रतियोगिविशेषापेक्षया ह्रस्वं दीर्घमिति तदेव विशिष्य व्यवहारभाजनं भवति ॥ ५ ॥ शंका-यदि वस्तुके स्वरूपको ही भेद कहो तो प्रतियोगीके ग्रहणद्वारा ही भेदका ग्रहण होता है इस प्रकार भेदका प्रतियोगिसापेक्षत्व नियम है सो नहीं रहेगा यथा घट
( १२६ ) मार्त्तण्डप्रप्रद । पूर्वपक्ष- स्वरूपग्रहणम् प्रतियोगीकी अपेक्षा नही होती है । उत्तर ( इति चेन्नेति ) रूप भेद प्रथम घटादिवस्तु पटादिसे रूपभेद विलक्षण आकार गृहीत होता है अनन्तर पटभेवान् घट इत्यादि विशिष्ट व्यवहारके लिये प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है जिस प्रकार परी- माणगुणविशिष्ट वस्तुस्वरूपका ज्ञान प्रथम होता है पश्चात् किसी प्रतियोगी विशेषके प्रति ह्रस्वत्व दीर्घत्वादिरा ग्रहण होता है यहा प्रतियोगीकी अपेक्षा उत्तरकालमें होती ६ ॥ ५ ॥ तदुक्तं विष्णुत्तत्वनिर्णये-न च विशेषणविशेष्यतया भेदसिद्धि । विशेषणविशेष्यभावश्च भेदापेक्षधर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेद- सिद्धि भेदापेक्षश्च धर्मिप्रतियोगितामित्यन्योन्याश्रयतया भेद- स्यायमुक्ति , पदार्थस्वरूपत्वाद्भेदस्येत्यादिना । अतएव गवा- र्थिनो गवयदर्शनान्न प्रवर्त्तन्ते गोशब्दञ्च न स्मरन्ति ॥ ६ ॥ उक्त अर्थमें प्रमाण देते है ( तदुक्तमिति ) विशेष्य विशेषणभावसे भेद नहीं सिद्ध हो सकता कारण विशेषणविशेषणभावम भेदके लिये अपेक्षित धर्मी और प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है एव धर्मी ओर प्रतियोगीको भेदकी अपेक्षा होती है इसी प्रकारसे अन्योन्याश्रय होता हे अतः भेदसिद्धिमें युक्ति नही हे ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि भेदवस्तुका स्वरूपही हे भेद ओर वस्तुस्वरूप एक होनेपरभी घटादि शब्द कहनेपर प्रतियोगीकी अपेक्षा नहीं होती है भेद कहनेपर प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है यह शब्द शक्ति स्वभाव है । भेदवस्तु स्वरूप होनेहीसे गवार्थी गवयजन्तुको देखकर न गोको लानेके लिये प्रवृत्त होता हे न अयगो. ऐसा स्मरणही करता हे ॥ ६॥ नच नीरक्षीरादौ स्वरूपे गृह्यमाणे भेदप्रतिभासोऽपि स्यादिति भण- नीयम्, समानाभिहारादिप्रतिबन्धकबलाद्भेदभानव्यवहाराभावोप- पत्ते.। तदुक्तम्-"अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनव- स्थानात् । सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च" इति । अतिदूरात् गिरिशिखरवर्त्तितर्त्वादौ अतिसामीप्याल्लोचना- ज्ञनादौ इन्द्रियघाताद्विद्युदादौ मनोऽनवस्थानात् कामाद्युप- प्लुतमनस्कस्य स्फीतालोकवर्त्तिनि घटादौ सौक्ष्म्यात् परमा- ण्वादौ व्यवधानात् कुड्याद्यन्तर्हिते अभिभवात् दिवा प्रदीपप्र- भादौ समानाभिहारात् नीरक्षीरादौ यथावद् ग्रहणं नास्तीत्यर्थ ॥७॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२७ ) यदि कहो भेद वस्तुका स्वरूप है तो जलमिश्रित दूधमें परस्पर जल और दूधका भेदग्रहण होने लगेगा सोभी नहीं समान वस्तन्तरसे अभिभूत होनेसे परस्पर भेद- ग्रहण नही होता है । अत एव सांख्यतत्त्वकौमुदीमें कहा है ( अतिदूरादित्यादि ) अक्षरार्थ अत्यन्तदूर अत्यन्त समीप, इन्द्रियनाश, अत्यन्तसूक्ष्म, व्यवधान, प्रबल वस्तुसे पराभव होनेसे तथा सजातीयवस्तुमें मिल जानेसे उस वस्तुका ग्रहण नहीं होता है उसीको प्रत्येकके उदाहरणपूर्वक दिखाते हैं । अत्यन्त दूर होनेसे पर्वत शिखरवर्ति वृक्षादिका ग्रहण नहीं होता है अति समीप होनेसे नेत्रोंमें लगे हुए अञ्जनका ग्रहण नहीं होता है इन्द्रिय नष्ट होनेसे बिजली आदिका कामक्रोधादि वश विषयान्तरमें आसक्त चित्तको स्फुरत्प्रकाशमें वर्तमानघटका अतिसूक्ष्म होनेसे परमाणुका व्यवधान होनेसे घरके भीतरकी वस्तुका तथा अपनेसे अधिक तेजस्वीसे परिभूत होनेसे दिनमें दीपककी प्रभाका और सजातीय वस्तुमें सम्मिलित होनेसे जलमिश्रित दूधमे जल और दूधके यथार्थ स्वरूपका ग्रहण नहीं होता है ॥ ७ ॥ भवतु वा धर्मभेदवादस्तथापि न कश्चिद्दोषः धर्मिप्रतियो- गिग्रहणे धर्मभेदमानसम्भवात् । न च धर्मभेदवादे तस्य तस्य भेदस्य भेदान्तरभेद्यत्वेनानवस्था दुरवस्था स्यादित्या- स्थेयं भेदान्तरप्रसक्तौ मूलाभावात् भेदभेदिनौ भिन्नाविति व्यव- हारादर्शनात् ॥ ८ ॥ धर्मभेदपक्षमेंभी पूर्वोक्त आक्षेपका समाधान-(भवतु वेत्यादि) 'घटो न पट' यहा पर धर्मी भेदाश्रय पट और प्रतियोगी घटका ग्रहण होनेपर भेदका मानसग्रहण अवश्य होगा ( नचेति ) धर्म भेदपक्षमें भेदरूप धर्म स्वरूपसे भिन्न है तो उसमेंभी पुनः भेद मानना होगा उसमें भेदान्तर एव क्रमसे भेदपर भेद होजायगा अन्यथा प्रथम भेदभी व्यर्थ होगा तथाच अनवस्था दुष्परिहर होगी । उत्तर-( भेदान्तरेति ) घट पटका परस्पर भेदव्यवहार सिद्ध होनेसे धर्मरूपभेद व्यवहारमूलक है परन्तु भेदके ऊपर भेदान्तर माननेमे कोई युक्ति नहीं घट पट परस्पर भिन्न हे इस प्रकार भेद और भेदी परस्पर भिन्न हैं ऐसा व्यवहार नहीं होता है ॥ ८ ॥ न चैकभेदबलेनान्यभेदानुमानं दृष्टान्तभेदाविघातेनोत्थान- दोषाभावात् । सोऽयं पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारिकातै- लदातृत्वाभ्युपगम इव । दृष्टान्तभेदाविमर्द्दे त्वानुत्थानमेव । न
( १२८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पूर्णप्रज्ञ-
हि वरविघाताय कन्योद्वाह । तस्मान्मूलक्षयाभावानदनवस्था न दोषाय ॥ ९ ॥ यदि कहो 'घट पटाद्भिन्न कपालसमवेतत्वात्' इस प्रकार भेदकाभी पटादिमे भेदानुमान हो जायगा उस भेदकाभी पुनः भेदानुमान होगा यहभी नहीं घटभेदानु मानमें दृष्टान्त होनेपरभी भेदको भेदानुमान दृष्टान्त न होनेसे एतादृश अनुमानका उत्थानही नहीं हो सकता है अत एतादृश अनुमान पिण्याक (खरी) मांगनेवालेको पसेरीभर तेल मिलनेकी समान अतीव अभ्युदय है दृष्टान्तमें भेद न स्वीकार करेंगे तो भी उत्थान न होगा कोईभी वरविनाशके लिये कन्याका विवाह नहीं करताहै ॥९॥ अनुमानेनापि भेदोऽवसीयते । परमेश्वरो जीवाद्भिन्न , तं प्रति सेव्यत्वात् यो यं प्रति सेव्य स तस्माद्भिन्न यथा भृत्याद्राजा । न हि सुख मे स्याद् दुःख मे न मनागपि इति पुरुषार्थमर्थय- माना पुरुषाः स्वपतिपदं कामयमानाः सत्कारभाजो भवेयु प्रत्युत सर्वानर्थभाजन भवन्ति । यः स्वस्यात्मनो हीनत्वं परस्य गुणोत्कर्षञ्च कथयति स स्तुत्यः प्रीतः तावकस्य तस्मा अभीष्टं प्रयच्छति। तदाह-"घातयन्ति हि राजानो राजाहमिति वादिनः । ददत्यखिलमिष्टञ्च स्वगुणोत्कर्षवादिनाम्" इति ॥ १०॥ जीव और ईश्वरका परस्परभेदसाधक अनुमान कहते है-(परमेश्वरेति) 'परमेश्वर' पक्ष है "जीव भेद" साध्य है सेव्यत्व हेतु है जो जिसके सेव्य हो वह उससे भिन्न है यह व्याप्ति है यथा भृत्य ओर राजा (ओरभी) मुझे सुख प्राप्त हो किञ्चिदपि दुःख न हो इस प्रकार सुखरूप पुरुषार्थको चाहनेवाले मनुष्य यदि स्वामीके पदकी कामना करेंगे तो उनका सत्कार क्या होगा ? विपरीत अतीव दुःख (कारागारादि) के पात्र बनेंगे जो स्वामीके सन्निधिमे अपनेको हीनत्वका अनुसन्धान कर स्वामीके गुणकी स्तुति करते हैं उनपर स्वामी प्रसन्न होकर उनका मनोरथ सफल करते हैं नीतिकारोने कहाभी है अपनेको स्वय राजा कहनेवालोको राजालोग शूली आदि दण्डसे दंडित करते हैं ओर राजा अपने गुणके गान करने वालोंको अभिमत वस्तु देते हैं ॥ १० ॥ एवञ्च परमेश्वराभेदतृष्णाया विष्णोर्गुणोत्कर्षस्य मृगतृष्णिका समत्वाभिधानं विपुलकदलीफललिप्सया जिह्वाच्छेदन इवेति
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२९ ) एतादृशविष्णुविद्वेषणान्धतमसप्रवेशप्रसङ्गात् । तत्तत्प्रति- पादितं मध्यमन्दिरेण महाभारततात्पर्यनिर्णये-“ अनादि- द्वेषिणोदैत्या विष्णोर्द्वेषो विवर्द्धितः । तमस्यन्धे पातयति दैत्यानन्धे विनिश्चयात् ” ॥ इति ॥ ११ ॥ (एवञ्चेति) परमेश्वरके साथ स्वरूपकी ऐक्यरूप मुक्तिकी लालसासे जिन्होंने विष्णुके गुणोत्कर्षको मृगतृष्णाके समान कहा सो कदलीफलकी इच्छासे जिह्वाके काटनेके समान हैं इस प्रकार भगवद्वेषसे घोर नरकमें प्रवेश होता है इस बातको मध्यमन्दिर ( आनन्दतीर्थ ) जी ने प्रतिपादन किया है अनादि कालसे द्वेषस्वभाववाले दैत्योंने विष्णुके विषय द्वेषको बढाया अतः तादृश अज्ञानियोंको घोर नरकमें गिराते हैं ॥ ११ ॥ सा च सेवा अङ्कननामकरणभजनभेदात्त्रिविधा । तत्राङ्कनं नासयणायुधादीनां तद्रूपस्मरणार्थमपेक्षितार्थसिद्धार्थं च । तथाच शाकल्यसंहितापरिशिष्टम्-“चक्रं बिभर्त्ति पुरुषोभि- तप्तं बलंदेवानाममृतस्य विष्णो । स याति नाकं दुरिता विधूय विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥ १२ ॥ (सा च सेवेति) तप्तमुद्रा ( शंखचक्र ) धारण, नाम करण और भजन भेदसे तीन प्रकार हैं, शंखचक्ररूप भगवदायुधधारण अभीष्ट सिद्धिके लिये और भगवत्के रूपका सदा स्मरणके लियेभी है उक्त विषयमे श्रुतिप्रमाणभी देते हैं (चक्रं बिभर्तीति)देवानां देवतोंका, बलम् रक्षक, अभितस्य विष्णो'-व्यापक परमात्मा विष्णुका, अभितप्तम् चक्रम् अग्निसे सन्तप्त किये हुए श्रीसुदर्शनचक्रको, वपुषा-बाहुमूलमे, यो बिभर्ति-जो धारण करता है अर्थात् ( अङ्कित करता है ) स -तादृश चक्रधारी पुरुष, दुरिताः पुण्यपापको, विधूय-नष्ट करके, “ तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय ” इत्यादि श्रुति- स्वारस्यसे बन्धहेतुक पुण्य पाप दोनों दुरित पदार्थ हैं । नाकम् परमपदको ( श्रीवै- कुण्ठ ) को, याति-जाता है, यत्-जिस परमपदको वीतरागाः-भगवत्प्राप्तिव्यति- रिक्ताविषयमें इच्छा रहित, यतयः-यतिलोग, विशन्ति-जाते हैं ॥ १२ ॥ देवाश्च येन विधृतेन बाहुना सुदर्शनेन प्रयातास्तमायन् येनाङ्किता मनवो लोकसृष्टिं वितन्वन्ति ब्राह्मणास्तद्वहन्ति ॥