भारतकोश
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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

सप्तदश पटल ] [ ४११ लोकपालान्यजेद्वाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् । एव यो भजते भक्त्या देवमुक्तेन वर्त्मना ।१०५ जपाद्या स्वस्थ बीज से रक्ता है और रक्त अनुलेपन वाली है। अरुण वर्ण के वस्त्र और पुष्प से आढ्य है। उनका मुख ताम्बूल से परि- पूरित रहता है। ये सब वल्लकी वाद्य के वादन करने में परायण हैं और मद तथा मन्मथ (कामदेव) से पीड़ित हैं ईशादि कोणों में बीजा- दिक दूतियों का क्रम से अभ्यर्चन करे ।१०१।१०२। दूतियों के नामों का परिगणन किया जाता है—दुर्भगा, सुभगा, कराली, मोहिनी—ये हैं। ये सब अपनी अंजलिपुटों को बाँधे हुए हैं और इनका मुख कमल नम्रता से कुछ नीचे की ओर हो रहा है ।१०३। ये सब देवी के ही समान भूषणों से समन्वित हैं। अब दूतियों के मन्त्रों को क्रम से जान लेवे। चार शाकादि वर्ण अर्थात् शषसह, अर्धेन्दु—बिन्दु से शेखरों वाली हैं ।१०४। बाहर लोकपालों का यजन करे तथा वज्र आदि उनके आयुधों का अर्चन करे। इस प्रकार से उक्त मार्ग के द्वारा जो भक्ति की भावना से देव का अर्चन किया करता है ।१०५। न तस्य दुर्लभं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते । वायुवह्निपरान्तस्थं बीजं स्मृत्वा जपेत्सुधीः ।१०६ ज्वरभूतमहारोगानश्यन्ति तेन तत्क्षणात् । क्रुद्धस्य हृदये ध्यात्वां जपेद्वीजमनन्यधीः ।१०७ स वश्यो जायते शीघ्रं मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । हृद्रोगे कामला रोगे विष्टम्भि श्वासकासयोः ।१०८ एतज्जप्तं जलं प्रातः पिबेत्तद्रोगशान्तये । कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं तत्र शोभनम् ।१०६ कलशांस्थापयेन्मन्त्री नव पूर्वोक्तलक्षणान् । मध्यदेवं यजेत्सम्यक् देवीः पूर्वांदिकुम्भगाः ।११० इष्ट्वा कोणस्थिता दूतीरभिषिञ्चेत्पतिव्रता । नारी सा लभते पुत्रं वन्ध्यापि किमुतापरा ।१११

४१२ ] [ श्री शारदा तिलक भूतकृत्याग्रहद्रोहशान्तिदः संपदावहः । अभिषेकोऽयमाख्यातो राज्ञां विजयवर्द्धनः ११२ उस पुरुष को तीनों लोकों में कुछ भी वस्तु अप्राप्य नहीं है। वायु वह्निपुर के अन्दर स्थित बीज को स्मरण करके अनन्य बुद्धि वाला होकर जप करे तो उसके ज्वर भूत महा रोग उसी क्षण में नष्ट हो जाया करते हैं। क्रुद्ध का हृदय में ध्यान करके अनन्य बुद्धि होकर बीज का जप करे ।१०६।१०७। इस मन्त्र के प्रभाव से वह शीघ्र ही वश्य हो जाता है। हृद्रोग में-कामला रोग में विष्टम्भ श्वास और कास में-इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में रोग की शान्ति के लिए पान करना चाहिए। नव पदों के स्वरूप वाले मंडल की रचना करके उसमें परम शोभन पूर्व में वर्णित नौ कलशों की मन्त्रधारी स्थापना करे। मध्य में देव का यजन करे और पूर्वादि कुम्भों में स्थित देवियों का अर्चन करे ।१०८।१०६।११०। कोणों में स्थित दूतियों का अर्चन करके पतिव्रता स्त्री अभिषिञ्चन करे ! वह नारी अवश्य ही पुत्र जन्म का लाभ किया करती है, चाहे वह वन्ध्या ही क्यों न हों औरों की तो बात ही क्या है ।१११। यह अभिषेक भूत-कृत्या द्रोह को शांति देने वाला होता है तथा सम्पदाओं का आवाहन किया करता है और राजाओं की विजय का वर्धन करने वाला है ।११२। अन्तर्बीजं स्वरगणलसत्केसरं तस्य बाह्ये । देवीदूतीमनुयुतदलं दिग्विधिक्षु क्रमेण ॥ काद्यैर्वर्णैर्वृतमथ वह्निभूमिगेहेन वीतम् । यन्त्रं प्रोक्तं सकलसुखदं रोगकृत्याग्रहघ्नम् ।११३ प्रणवो हृदयं पश्चात्तु ङेऽन्तं पशुपति पुनः । तारो नमोभूतपदं ततोऽधिपतये ध्रुवम् ।११४ नमो रुद्राय युगलं खड्गरावणशब्दतः । विरहद्वितयं पश्चात्सरनृत्ययुगं पृथक् ।११५

सप्तदश पटल ] [ ४१३ श्मशानभस्मार्चितान्ते शरीराय ततः परम्। घण्टाकपालमालावि धरायति पदं पुनः ।११६ व्याघ्रचर्मपदस्यान्ते परिधानाय तत्परम् । शशाङ्ककृतशब्दान्ते शेखराय ततः परम् ।११७ कृष्णसर्पपद पश्चात्ततो यज्ञोपवीतिने । चलयुग्मं वल्गुगमनिवर्तकपालिने ।११८ हनयुग्मं ततो भूतान त्रासयद्वितयं पुनः । भूयो मण्डलमध्ये स्यात् कट्टयुग्मं ततः परम् ।११९ रुद्राङ्कुशेन शमय प्रवेशययुगं तत । आवेशययुगं पश्चाच्चण्डासिपदमीरयेत् ।१२० धराधिपतिरुद्रोऽथ ज्ञापयत्यग्निसुन्दरी । खडगरावणमन्त्रोऽयं सप्तत्यूर्ध्वशताक्षरः ।१२१ अब मन्त्र बतलाया जाता है—आठ दलों से समन्वित कमल की रचना करके उसकी कर्णिका में मूल का लेखन करके दिशाओं के दलों में देवी के बीजों को तथा विदिशाओं में दूतों बीजों को लिखना चाहिए। क्रम से ही अर्थात् पूर्व की ही रीति से लिखे। ककार से आदि वर्णों के द्वारा उसे बीत करे तथा बाहर में भूपुर की रचना करके उससे परि- वीत करे। यह मन्त्र ऐसा ही बताया गया है जो समस्त सुखों का प्रदान करने वाला है और रोगों का तथा कृत्या के गृहों का विनाश करने वाला है ।११३। अब खङ्ग रावण मन्त्र बतलाया जाता है-प्रणव हृदय और इसके पीछे चतुर्थी विभक्ति जिसके अन्त में होवे ऐसा पशु- पति'-पद लिखे। फिर तार—प्रणव, फिर भूत अधिपति और ध्रुव अर्थात् प्रणव लिखे। इसके पीछे 'नमो रुद्राय' इसका युगल लिखे। खग रावण शब्द से 'विरहा' का युगल लिखें। फिर 'नृत्य' पद का युगल लिखे। इसके अनन्तर 'श्मशान भस्मार्चित शरीराय' - और 'घंटा कपाल माला धराय'-यह पद कहे। इसके पश्चात् 'व्याघ्र चर्म परिधानाय' और 'शशांक कृत शेखराय'-यह लिखे। इसके अनन्तर 'कृष्ण सर्प यज्ञोपवीतिने

४१४ ] [ श्री शारदा तिलक यह पद लिखे । इसके आगे 'चल-चल' और 'अनिवर्त्त कपालिने'-हन- हन-भूतान् त्रासय-यह लिखे । फिर मण्डप के मध्य में- 'फट्-फट्' और रुद्राङ्कुशेन 'शमय-प्रवेशाय' का युग्म लिखे । फिर 'खण्डासि' पद कहे । धराधिपति रुद्रो ज्ञापय-यह लिखकर 'स्वाहा लिखना चाहिए । यह खङ्ग रावण मन्त्र है जो एक सौ सत्तर अक्षरों वाला है । भूताधिपतये स्वाहा पूजामन्त्रोऽयमीरतः । सद्यादिपञ्चह्रस्वाड्यकान्तबीजादिकान्न्यसेत् ।१२२ ईशानाद्याः पञ्चमूर्तीर्देहे वक्त्रेषु च क्रमात् । षड्दीर्घविन्दुयुक्तेन मन्त्रे नाङ्गक्रिया मता ।१२३ घण्टाकपालसृणिमुण्डकृपाणखेटखट्वाङ्गशूलडमरूनभयन्दधानम् । रक्ताङ्गमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र पञ्चाननाब्जमरुणांशुकमीशमीडे । ॥१२४ अयुतद्वितयं मन्त्रं जपित्वा तद्दशांशतः । पायसेन घृता यक्तेन जुहुत्तस्यसिद्धये ।१२५ पञ्चाक्षरोदिते पीठे पूजयेत्खङ्गरावणम् । बीजेन मूर्तिक्लृप्तिः स्यात्तत्कान्तं मनुविन्दुमतू ।१२६ भूताधिपतये स्वाहा-यह पूजा मन्त्र कहा गया है। सद्य जिनके आदि में होवे ऐसे पंचह्रस्व से आढ्य कान्त बीजादिक का न्यास करे । ।१२२। ईशानाद्य पांच मूर्त्तियों का देह में और वक्त्रों में क्रम से षड्- दीर्घ विन्दु से युक्त मन्त्र से इसकी अङ्गों की क्रिया मानी गई ।१२३। अब ध्यान का प्रकार बतलाया जाता है-घण्टा, कपाल, सृणि-मुण्ड कृपाल, खेट, खट्वाङ्ग, शूल, डमरू और अभयदान को धारण करने वाले-रक्ताङ्ग और चन्द्रमा के खण्ड के आभरणों से अलंकृत-तीन नेत्रों से संयुत-पांच मुख कमलों से समन्वित-अरुण वर्ग के वस्त्रों को धारण करने वाले ईश का मैं स्तवन करता हूँ ।१२४। इस मन्त्र का दो अयुत अर्थात बीस सहस्र जप करे और फिर जप का दशांश भाग का

सप्तदश पटल ] [ ४१५ उसकी सिद्धि के लिए घृत से अक्त पायस से होम करना चाहिए । १२५। पंचाक्षर के उदित पीठ पर खङ्ग रावण का अर्चन करे । बीज के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसका कान्त मन्त्र से युक्त है । । १२६। अङ्गानि दलमूलेषु दूतीः पत्रेषु संयजेत् । चुलुकुण्डां प्रज्वलिनीं तृतीयां कृष्णपिङ्गलाम् । १२७ फल्गुनीं टिरिटिल्लीं च पञ्चमी मन्त्रमालिकाम् । सप्तमीं शंखिनीं पश्चाच्चन्द्राङ्कितजटामिमाः । १२८ पूर्वपत्रादि सव्येन खडगरावणवल्लभाः । ऐन्द्री कौमारिकी ब्राह्मी वाराहीं वैष्णवीं पुनः । १२६ वैनायकीं च चामुण्डां माहेशीं दिक्षु पूजयेत् । द्वारपालान्यजेद्दिक्षु द्वौ द्वौ प्रागादिदेशिकः । १३० अङ्गों का दलों के मूलों में और दूतियों का पत्रों में भली भाँति यजन करना चाहिए । अब उनके नामों का परिगणन करके बताया जाता है, चुलुकुण्डा, प्रज्वलिनी और तीसरी कृष्ण पिङ्गला है । १२७। फल्गुनी, टिरिटिल्ली पाँचवी और छठी मन्त्रमालिका है । सप्तमी शंखिनी—और चन्द्रांकित जटा है । ये पूर्व पत्रादि सव्य में खड्ग रावण की वल्लभायें हैं । इनके पश्चात् ऐन्द्री, कौमारिका, ब्राह्मी, वाराही, वैष्णवी, वैनायिकी, चामुण्डा और माहेशी का दिशाओं में अर्चन करना चाहिए । फिर आचार्य द्वारा पूर्व आदि दिशाओं में दो-दो द्वारपालों का यजन करना चाहिए । १२८-१३०। रौद्रपिङ्गलनामानौ द्वौ श्मशानविभीषणौ । दृढकर्ण भृङ्गिरीटिमुदीच्यामर्चयेत्पुनः । १३१ आमईकमहाकालौ कोणपालान्यजेत्पुनः । कुम्भकर्णमशोकाख्यं भल्लाटं च सिहारकम् । १३२ इन्द्रादिकाँल्लोकपालान्सायुधान्पूजयेत्ततः । धूपदीपादिभिर्देवं प्रीणयित्वा महेश्वरम् । १३३

४१६ ] [ श्री शारदा तिलक पञ्चकूरान्धसा वाह्यै ततो भूतबलि हरेत् । एवं पूजादिभिः सिद्धै मन्त्रै मन्त्रविदाम्बरः ।१३४ नाशयेत्सकलान्भूतान्कृत्याग्रहमहाभयान् । आदेश तस्य कुर्वन्ति भूता भीता महात्मनः ।१३५ बहुना किमिहोक्तेन मन्त्रेणानेन भूतले । सदृशोनास्ति मन्त्रोऽन्योभूतनिग्रहसाधने ।१३६ रौद्र पिंगल नामों वाले दो और श्मशान विभीषण वाले दो दृढ़- कर्ण और भृंगि-रीटिका उत्तर में पुनः समर्चन करना चाहिये ।१३१। फिर इसके अनन्तर आमर्दक-महाकाल और फिर कोण पालों का यजन करे । कुम्भकर्ण—अशोक नामक भल्लाटक और सिहरक का अर्चन करना चाहिए ।१३२। इसके अनन्तर इन्द्रदेव आदि लोक पालों का जो अपने २ आयुधों के सहित होवें पूजन करे । धूप-दीप आदि पूजन के उपचारों के द्वारा देवेश्वर महेश्वर प्रभु का प्रीणन करना चाहिए ।१३३ बाहिर में पञ्च कूरान्ध से भूत बलि का पीछे आहरण करे । इस रीति से पूजादि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर मन्त्रों के ज्ञान रखने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष समस्त भूतों का तथा कृत्या के ग्रहों का और महान् पापों का विनाश कर दिया करता है । उस महान् आत्मा वाले पुरुष से फिर भीत होकर भूतगण आज्ञा का पालन करते हैं ।१३४- १३५। इस मन्त्र के विषय में यहाँ पर बहुत अधिक कहने का क्या प्रयोजन है बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि इस भू-मण्डल में इस मन्त्र की समानता रखने वाला भूतों के विग्रह करने के साधन में अन्य कोई दूसरा मन्त्र ही विद्यमान नहीं है ।१३६।

अष्टादश पटल ] [ ४१७ अष्टादश पटल ॥ अघोरास्त्रो वर्णन ॥ अथाभिधास्ते विधिवदघोरारास्रमनुत्तमम् । यस्य संस्मरणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।१ माया स्फुरद्वय भूयः प्रस्फुरद्वितयंततः । घोरघोररतरेत्यन्ते तनुरूपपदं पुनः ।२ चटयुग्मं तदन्तेस्यात्प्रचटद्वितयं ततः । कहयुग्मं वमद्वन्द्वं ततो बन्धयुगं पुनः ।३ घातयद्वितयं वर्म फडन्तः समुदाहृतः । एकपञ्चाशदक्षोऽयमघोरास्त्रमहामनुः ।४ अघोरारोऽस्य मुनिः प्रोक्तश्छन्दस्त्रिष्टुबुदाहृतम् । अघोररुद्रः संदिष्टो देवता मन्त्रवित्तमैः ।५ इसके अनन्तर परमोत्तम अघोरास्त्र के विषय में वर्णन करूँगा ' जिसके संस्मरण मात्र से ही सब उपद्रव नष्ट हो जाया करते हैं।१। मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता है—माया शक्ति बीज, दो बार 'स्फुट'—यह पद, इसके पश्चात् 'प्रस्फुट'—यह पद दो बार कहे, घोर घोरतर'—इस पद के पश्चात् 'तनुरूप'—यह पद कहे ।२। इसके अन- न्तर दो बार 'चट'—इस पद को बोले और इसके अनन्तर दो बार 'प्रचड'—इस पद का उच्चारण करना चाहिए । इसके उपरान्त दो बार 'कह'—यह पद और 'वम'—यह दो बार कहे। फिर 'बन्ध' को दो बार कहे और 'घातय' इसको दो बार कहे । फिर वर्म और फट् कहे । यह मन्त्र बताया गया है। यह अघोरास्त्र मन्त्र इक्यावन वर्णों का होतो है, जो यहाँ पर बताया गया है ।३-४। इस मन्त्र का ऋषि अघोर होता है और इसका छन्द अनुष्टुप गया है। मन्त्रों के शनि

४१८ ] [ श्रीशारदा तिलक रखने वाले पुरुषों के द्वारा इस मन्त्र का देवता अघोर रुद्र ही बताये गये हैं ।५। हृदय पञ्चभिः प्रोक्तं शिरः षड्भिरुदाहृतम् । शिखा दशभिराख्याता तावद्भि कवच मतम् ।६ वसुवर्णैः स्मृतं नेत्रं मासार्णैरस्त्रमीरितम् । मूर्द्धनेत्रास्य कण्ठेषु हृन्नाभ्यन्धूरुषु क्रमात् ।७ जानुजंघापदद्वन्दे रुद्राभिन्नाक्षरैर्न्यसेत् । पञ्चभिश्चपुनः षड्भिर्द्वाभ्यामष्टभिरक्षरैः ।८ चतुर्वर्णैः षडूर्णे श्च करणेः करणे पुनः । चतुर्भिः षड्भिरक्षिभ्यां वर्णभेदोऽयमीरितः ।६ सजलघनसभाभं भीमदंष्ट्रं त्रिनेत्रं भुजगधरमघोरं रक्तवस्त्रङ्गरागम् । परशुडमरुखड्गान्खेटक वाणचापौ त्रिशिखनरकपाले विभ्रतं भावयामि ।१० इसका हृदय पाँचों से बताया गया है और छै से इसका शिर कहा गया है । इसकी शिखा दश से बतायी गयी है और उतनी ही से इसका कवच माना गया है ।६। आठ वर्णों से इसका नेत्र कहा है और बाहर वर्णों के द्वारा इसका अस्त्र बताया गया है इसका न्यास क्रम से मूर्धा नेत्र-मुख-कण्ट-हृदय-नाभि--अन्धु-उरुओंमें-जानु-जंघा और दोनों चरणोंमें रुद्र से भिन्न अक्षरों के द्वारा करना चाहिए । फिर पाँचों से, छै से, दो से, आठ अक्षरों से, चार वर्णों से, छै वर्णों से और फिर चार करणों और छै अक्षियों करे । यह वर्ण भेद कहा गया है ।७।८।६। अब ध्यान करने की रीति बतलायी जाती है—ध्यान—जल के सहित मेघों की आभा के समान आभा से समन्वित—महान् भीषण दाढ़ों से युक्त—तीन नेत्रों वाले—सूर्योको अपने शरीर पर धारण करने वाले— रक्त वस्त्र के तुल्य अङ्गराग से संयुत—अपने कर कमलों में परशु—

अष्टादश पटल ] [ ४१६ डमरू—खङ्ग—खेटक—वाणचाप—त्रिशिख—नर, कपाल को धारण करने वाले अघोर की भावना करता हूँ ॥१०॥ अभिचारे ग्रहध्वंसे कृष्णवर्णो भवेद्विभूः । वश्ये कुसुमभसङ्काशो मुक्तौ चन्द्रमप्रभः ॥११ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं घृत सक्तोस्तलंः शुभैः । तद्दशांशं प्रजुहुयान्मन्त्री मन्त्रस्य सिद्धये ॥१२ शैवे सम्पूजयेत्पीठे षट्कोणान्तः स्थपङ्कजे । अ गपूजां केसरेषु कृत्वा पत्रेषु तत्परम् ॥१३ परशुं डमरुं खड्गं खेट बाण च (णांश्च) कार्मुकम् । शूलं कपालां प्रयजदष्टास्त्राण्यस्य देशिकः ॥१४ दलाग्रेषु ततः पूज्या ब्राह्मयाद्याः प्रोक्तलक्षणा । लोकेशान्पूजयेत्पश्चादायुधैः स्वैः समन्वितान् ॥१५ अभिचार में-ग्रहों के ध्वंस में विभु का कृष्ण वर्ण होता है । वश्य के प्रयोग में विभु का वर्ण कुसुम्भ के सदृश हुआ करता है और मुक्ति में उसका वर्ण चन्द्र के समान प्रभा से संयुत होता है ॥११॥ इस मन्त्र का एक लाख जाप करना चाहिए और घृत सिद्ध परम शुभों तिलों से जप का दशांश भाग का होम करे ।। तभी मन्त्रधारी को मन्त्रकी सिद्धि होती है ॥१२। शैव पीठ पर षट्कोण के अन्दर स्थित कमल अच्छी तरह से यजन करना चाहिए । अङ्गों की पूजा केसरों में करके फिर पत्रों आयुधों का अर्चन करे जिनके नाम ये हैं—परशु, डमरू, खड्ग, खेट, बाण, कार्मुक, शूल, कपाल ॥१३॥१४। दलों के अग्रभागों में इसके अनन्तर ब्राह्म्यादि का यजन करना चाहिये जिनके लक्षण पूर्व में ही कह दिये गये हैं । इनके पश्चात् लोकपालों का अर्चन करे जो कि वज्रादि अपने-अपने आयुधों के सहित है ॥१५। इति पूजाविधिः सिद्धे मन्त्रेणानेन साधकः । इष्टान्नप्रयोगान्कुर्वीत सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः ॥१६

४२० ] [ श्रीशारदा तिलक क्रमात्सर्पिर्पामार्गतिलसर्षपपायसैः । साज्यैः सहस्रं प्रत्येकं यामिन्यां जुहुयात्सुधीः ।१७ होमोऽयं नाशयेत्सद्यो भूतकृत्याद्युपद्रवान् । सितकिंशुकनिर्गुण्डी होमाऽपामार्गसम्भवैः ।१८ समिद्वरैः कृतोहोमः पूर्ववद्भूतशान्तिदः । चपामार्गारग्वधयोः पञ्चगव्यसमुक्षिताः ।१६ समिधो जुहुयात्कृष्णपञ्चम्यां निशि संयतः । पृथक् सहस्रहोमेन भूतानां निग्रहो भवेत् ।२० इस प्रकार से अर्चना आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक इस मन्त्र के द्वारा अपने अभीष्ट प्रयोगों का समाचरण करे । वे सभी प्रयोग सिद्ध होते हैं-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१६। फिर क्रम से घृत- अपामार्ग-तिल- सरसों और पायस से प्रत्येक की घृत के साथ सहस्र आहुतियाँ देवे और सुधी पुरुष रात्रि में होम करे । यह किया हुआ होम तुरन्त ही भूतों और कृत्या आदि के उपद्रवों का विनाश कर दिया करता है । सफेद पलाश (ढाक) निर्गुण्डी के द्वारा किया हुआ होम तथा अपामार्ग से समुद्भूत श्रेष्ठ समिधाओं से किया गया होम पूर्व की ही तरह भूतों को शान्ति का देने वाला होता है । ।१७-१८। अपामार्ग और आरग्वध की समिधाएं जो पञ्चगव्यमें संभु- क्षित की गयी होवे ।१९। मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी में रात्रि के समय में संयत होकर हवन करे । पृथक् एक सहस्र होम से भूतों का निग्रह होता है ।२०। क्रमात्सर्पिरपामार्गं पञ्चगव्य दृविघूतैः । हुत्वा सहस्रं प्रत्येकं पात्रे संपा (१) नयेत्सुधीः ।२१ संपातसर्पिषा साध्यं भोजयेद्भूतशान्तये ।२२ मध्ये शक्तिं ससाध्यां स्वपगणसहितां केसरेष्वष्टवर्गा- न्पत्रान्तर्म्मन्त्रवर्णान् लिखिय गुणमितानग्रदेनेषु तद्वत् ।

अष्टादश पटल ] [ ४२१ वर्म्मास्त्रोल्लासिकोणे दहनपुरयुगे कल्पिते भूपुरस्थे यन्त्रेऽस्मिन्प्राग्विधानात्कृतकलशविधिः सर्वदुःखापहारी ।२३ षट्कोणे शक्तिरन्तः स्फुरयुगलवृत्ता प्रस्फुरद्वन्द्वकोणे शिष्टैर्मन्त्रस्य वर्णै रसकरणचतुः षट् चतुर्वेदवेदैः । षडङ्गैः कॢप्ताष्टपत्रं दहनपुरयुगेनावृतं वर्म स्फुटः राजत्कोणेन वीतं (वाह्यं) धरणिपुरयुगं यन्त्रमाघोरमेतत् ।२४ क्षुद्रचोरग्रहव्यालभूतापस्मारनाशनम् । यन्त्रमेतत्समाख्यातं सर्वसिद्धिप्रदातृकम् ।२५ क्रमसे घृतःअपामार्ग, पंचगव्य-हवि और घृतसे प्रत्येककी एक सहस्र आहुतियां देवे और सुधी एक पात्रसे घृतका सम्पात करे।२१।उस सम्पात के घृतसे साध्य व्यक्ति को भूतोंकी शान्तिके लिये भोजन करावे।२२।अब एक मन्त्र बतलाया जाता है । इसका उद्धार इस तरहसे होता है-मध्यमें साध्य के सहित शक्ति को जो स्वरगणसे सहित होवे लिखे और केसरों में अष्ट वर्णों का लेखन करे तथा पत्रों के अन्दर मन्त्र के वर्णों को लिखे। उसी भाँति अग्रदेशों में गुणमितों को लिखे । वर्म और अस्त्र से शोभित कोण में लिखे । भूपुर में स्थित दहनयुगों के युग में जो कि कल्पित किया गया होवे । इस मन्त्र में पूर्वोक्त विधान से कलश की विधि को करे तो यह मन्त्र सब दुःखों का अपहरण करने वाला होता है ।२३। अब अन्य मन्त्र को बतलाया जाता है-षट्कोण में शक्ति है और अन्दर स्फुरित युगल से वृत हो । फिर प्रस्फुर द्वन्द कोणमें आवृता होव । मंत्र के शिष्ट वर्णों से छै-करण-चार-सौ चार वेद वेदोंसे षडङ्ग क्लृप्त अष्टपत्र को जो दहन पुरयुग से आवृत्त वर्म हो स्फुट से शोभित कोणसे परिवीत करे और इसमें दो भूपुर होते है-यही अघोर मन्त्र होता है ।२४। यह मन्त्र क्षुद्र चोर ग्रह-व्याल भूत-अपस्मार का नाश करने वाला है और यह सब सिद्धियों का प्रदान करने वाला कहा गया है ।२५। तारोवान्तोधरासंस्थो वामनेत्रेन्दुभूषितः । पार्श्वोवकः कर्णयुतो वर्म्माश्वान्तः षडक्षरः ।२६

४२२ ] [ श्रीशारदा तिलक मनुः पाशुपतास्त्राख्यो ग्रहक्षुद्रनिवारणः । षडभिर्वणैः षडङ्गानि हुंकडन्तैः सजातिभिः ।२७ मध्याह्नाकंसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्ज्वलम् । त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रुस्फुरन्मूर्द्धजम् । हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्ति दधानं विभुम् । दंष्ट्रोमिच्चतु' मुख' पशुपति दिव्यास्त्ररूप स्मरेत् ।२८ वर्णलक्षं जपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । गव्येन सर्पिषा मन्त्री संस्कृते हव्यवाहने ।२६ शैवे पीठे यजेद्देवं प्राङ्गैरष्टमातृभिः । इन्द्र दिभिर्लोकपालै र्थज्राद्यै रायधैस्ततः ३० अब पाशुपतास्त्र को बताते हैं तार-प्रणव व्यक्त-शकार, धरा-ल, उसमें स्थित वामनेत्र-ई, इन्दु-अनुस्वार त भूषित है। पार्श्व पः, वकः-- श, कर्णयुत-उकार से संयुत, वर्मास्त्रान्तः षट् अक्षरों वाला है ।२६। यह पाशुपत नामक मन्त्र ग्रहों और क्षुद्रों के निवारण करने वाला होता है । जिसके अन्त में हुँ फट् हो ऐसे सजाति छै वर्णों से छ अङ्गों को करना चाहिए ।२७। अब ध्यान बताया जाता है मध्याह्न काल के सूर्य के समान प्रभा से समन्वित-चन्द्रदेव को धारण करने वाले-परम भीषण अट्टाहास से समुज्ज्वल-तीन नेत्रों से युक्त- सर्पों के भूषणों से संयुत की शिखा के समान श्मश्रु तथा स्फुरित केशों से युक्त हस्त कमलों के द्वारा त्रिशिख सुन्दर-असि और शक्ति का धारण करने वाले विभु का जो दाढों के द्वारा परम भीषण चार मुखों वाले-दिव्य अस्त्र स्वरूप पशुपति प्रभु का स्मरण करना चाहिये ।२८। इस मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये । और जप के दशांश भाग का गाय के घृत से होम करे और मन्त्रधारी पुरुष को संस्कार किये हुये अग्नि में ही हवन करना चाहिये ।२६। शैव पीठ पर देव का यजन करे जो प्राक् अङ्ग, अष्ट मातृका-इत्यादि देवगण, लोकपाल और उनके वज्रादि आयुधों के

अष्टादश पटल ] [ ४२३ साथ ही यजन करे, तात्पर्य यह है कि सबका पूजन करना चाहिये।३०। अनेन मन्त्रितं तोय ग्रस्तस्य वदनेक्षिपेत् । सद्यस्तं मुञ्चति क्रन्दन् ग्रहो मन्त्रप्रभावतः ।३१ अमुना मन्त्रितान् बाणान् विमृजेद्युधि भूपतिः । जयेत्क्षणेन निखिलाञ् शत्रून्पार्थ इवापरः ।३२ वर्णान्त्यमोबिन्दुयुक्तं क्षेत्रपालाय हृन्मनः । ताराद्योवसुवर्णोऽयं क्षेत्रपालस्य कीर्तितः ।३३ षड् दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गान्यस्य योजयेत् । ऋषिर्ब्रह्मा भवेदस्य गायत्रं छन्द ईरितम् ।३४ क्षेत्रपालो देवता चलायेति शक्तिरीरितः ।३५ मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को जो भी ग्रस्त हो उसके मुख में डाल देवे। इस मन्त्र के प्रभाव से ग्रह तुरन्त ही रुदन करता हुआ उसका त्याग कर दिया करता है। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित किये हुये बाणों को राजा यदि युद्ध में छोड़े यो वह दूसरे अर्जुन को ही भाँति अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया करता है ।३१-३२। अब क्षेत्रपाल के मन्त्र का सोद्धार वर्णन किया जाता है-वर्णान्त्ये- अः, औ-स्वरूप, हृत्-नमः यह पद, औ बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त होता है। नमः इसके पूर्व क्षेत्रपालाय-यह पद होता है। इसके आदि में तार अर्थात् प्रणव होता है। यह क्षेत्रपाल का मन्त्र आठ वर्णों वाला होता है, ऐसा कीर्त्तित किया गया है।३३। इसके छै दीर्घों के भजन करने वाले बीज के अङ्ग को योजित करना चाहिये। इसका ऋषि ब्रह्मा है और इसका छन्द गायत्र कहा गया है।३४। इसका देवता क्षेत्र- पाल है और 'चलाय'-यह शक्ति कही गयी है ।३५। नीलाञ्जनाद्रिनिभमूर्द्ध्वपिशङ्गकेशं वृत्तोग्रलोचनमुपान्तगदाकपालम् । आशाम्बरं भुजगभूषणमुग्रदंष्ट्रं क्षेत्रेशमद्भुततनुं प्रणमामि देवम् ।३६

४२४ ] [ श्रीशारदा तिलक लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । चरूणा घृतसिक्तेन ततः क्षेत्रेशमर्चयेत् ।३७ धर्मादिकल्पिते पीठे पूर्वमङ्गानि पूजयेत् । अनलाख्यमग्निकेशं करालं तदनन्तरम् ।३८ घण्टारवम्महाकोपं पिशिताशनसंज्ञकम् । पिङ्गलाक्षमूर्ध्वकेशं पत्रेषु परितोयजेत् ।३६ प्रधानम॑तिप्रतिमान्नालङ्कारबन्धुरान् । लोकपालांस्तदस्त्राणि यथापूर्वं प्रपूजयेत् ।४० अब ध्यान कहा जाता है-नील अंजन के सदृश ऊपर की ओर पिशङ्ग वर्ण वाले केशों से युक्त, वृत्त और उग्रलोचनों से अन्वित-समीप में ही गदा कपाल वाले--दिशाओं के वस्त्र वाले अर्थात् नग्न--सर्पों के भूषणों से भूषित--उग्र दष्ट्राओं से युक्त--अद्भुत शरीर धारी देव क्षेत्रपाल के लिए मैं प्रणाम करता हूँ ।३६। इस मन्त्र का एक लाख जाप करे और जप का दशांश भाग घृतसे सिक्त चरुसे होम करना चाहिए । इसके अनन्तर क्षेत्रपाल का अर्चन करे ।३७। धर्मादि के द्वारा कल्पित किये हुए पीठ पर पहिले अङ्गों का यजन करना चाहिये । अनल नामक अग्नि केश कराल--घण्टारव महाकोप-पिशिताशन संज्ञा वाला पिङ्ग- लाक्ष-ऊर्ध्व केश का सब ओर पत्रों में यजन करना चाहिए ।३८-३६। प्रधान मूर्त्ति प्रतिमा--अनेक अलंकारों से बन्धुर--लोकपालों का तथा उनके वज्रादि आयुधों का पूर्व की ही भाँति पूजन करना चाहिए ।४०। तस्मै सपरिवाराय बलिमेतेन निर्हरेत् । पूर्वमेहि द्वयं पश्चाद्विदुषि स्यात्पुरुद्वयम् ।४१ भञ्जय द्वितय भूयोनर्नय द्वितयं पुनः । तत विघ्नपदद्वन्द्वं महाभैरवतत्परम् ।४२ क्षेत्रपाल बलिं गृहणद्वय पावकसुन्दरी । बलिंमन्त्रोऽयमाख्यातः सर्वकामफलप्रदः ।४३

अष्टादश पटल ] सोपदंशं बृहत्पिण्ड कृत्वा रात्रिषु साधकः ! स्मृत्वा यथोक्तं क्षेत्रेशं तस्य हस्ते बलिं हरेत् ।४४ बलिनानेन सन्तुष्टः क्षेत्रपाल प्रयच्छति । कान्तिमेधावला रोग्यतेजः पुष्टियशः श्रियः ।४५ परिवार के सहित उनके लिए इसके द्वारा वलि का निर्हरण करे । पूर्व में 'एहि'--इस पद को दो बार कहे पश्चात् विदुषी पुरु-इसको दो बार बोले । भञ्जय--इसको दो बार 'नर्त्तय'--इसको दो बार कहे । फिर विघ्न पद को दो बार कहे । इसके आगे महाभैरव'--यह पद कहे । इसके अनन्तर क्षेत्रपाल बलि 'गृह्ण' इस को दो बार कहकर अन्त में पावकसुन्दरी 'स्वाहा'--वह पद कहे । यह बलि देने का मन्त्र कहा गया है जो समस्त मनो कामनाओं के फलों का प्रदान करने वाला होता है । ।४१-४३। उपदंश अर्थात् व्यंजन के सहित का एक बहुत बड़ा पिण्ड बनाकर रात्रि के समय में साधक जैसा उनका स्वरूप बताया गया है वैसे ही स्वरूप वाले क्षेत्रपाल का स्मरण करके हाथ में बलि देवे ।४४। इस बलि से परम सन्तुष्ट होकर क्षेत्रपाल कान्ति, वन, आरोग्य तेज पुष्टि, यश और श्री को प्रदान किया करते हैं । ४५। उद्धरेद्वटुकं ङेऽन्तं आपदुद्धारणं तथा । कुरुद्वयं पुनर्ङेऽन्तं वटुक्रान्तं समुद्धरेत् ।४६ एकविंशत्यक्षरात्मा शक्ति ब्दो महामनुः । अभीष्टफलसंसिद्ध्यै कीर्तितः सुरपादपः ।४७ बृहदारण्यक ऋषिश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । आपदुद्धारणो देवो भैरवो देवता बुधैः ।४८ अङ्गुलीदेहवक्त्रेषु मूर्तीर्न्यस्येद्यथापुरा । सद्यादिपञ्चह्रस्वाढयशक्तिबीजपुरः सरम् ।४६ बकारं पञ्चह्रस्वाढयमीशानादिषु योजयेत् । षड्दीर्घयुक्तया शक्त्या वकारेण च तद्वता ।५०

४२६ ] [ श्रीशारदा तिलक अङ्गानि जातियुक्तानि प्रणवाद्यानि कल्पयेत् । तस्य ध्यानं त्रिधा प्रोक्तं सात्विकादिविभेदतः ।५६ अब आपदुद्धारण मन्त्र बतलाया जाता है चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले वटुक' का उद्धार करे फिर आपदुद्धारण'-इस पद को कहे । फिर दो बार 'कुरु'-उस पद को कहे । फिर चतुर्थ्येन वटु कान्त का उद्धार करे ।४६। यह महामन्त्र शक्ति से रुद्ध इक्कीस अक्षरों वाला होता है। यह मन्त्र मनोभीप्सित फल की सिद्धि के लिये सुरपादप अर्थात् कल्पवृक्ष कहा गया है-कल्पवृक्ष का यह प्रभाव होता है कि उसके सामने जो भी व्यक्ति मन में सोचता है वही सिद्ध हो जाया करता है । ऐसा ही इस मन्त्र का प्रभाव होता है ।४७। इस मन्त्र का वृहदारण्यक ऋषि है और इसका छन्द अनुष्टुप् कहा गया है। बुधों के द्वारा इनका देवता आपदुद्धारण भैरव कहा गया है ।४८। पूर्व की तरह अङ्गुली-देह मुख के द्वारा इसकी मूर्त्तियों का न्यास करना चाहिये । सद्यादि पांच ह्रस्वों से आढ्य शक्ति बीज के पूर्वक पञ्चह्रस्वाढ्य वकार को ईशान आदि में योजित करे । षड् दीर्घों से युक्त शक्ति से और वैसे ही वकार से प्रणवाद्य जाति युक्त षट् अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये । सात्विक आदि भेदों से उसका ध्यान भी तीन प्रकार का कहा गया है ।४६-५१। वन्देबालं स्फटिकसदृशं कुन्तलोल्लासिवक्त्रम् । दिव्याकल्पैर्नवमणिमयैः किंकिणीनूराद्यैः । दीप्ताकारं विशदवसनं सुप्रसन्नं त्रिनेत्रम् । हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं शूलदण्डौ दधानम् ।५२ उद्यद्भास्करसन्निभं त्रिनयनं रक्ताङ्गरागस्रजम् । स्मेरास्यं वरदं कपालमभयं शूलं दधानं करैः । नीलग्रीवमुदारभूषणशतं शीतांशुचूडोज्ज्वलं बन्धूकारुणवाससं भयहरं देवं सदा भावये ।५३

अष्टादश पटल ] [ ४२७ ध्यायेन्नीलाद्रिकान्तं शशिशकलधरं मुण्डमालं महेश दिग्वस्त्रं पिङ्गकेशं डमरुमथशृणि खङ्गपाश शूलाऽभयानि नाग घण्टाङ्कपालं करसरसिरुहैर्बिभ्रतं भीमदंष्ट्रम् । सर्वाकल्पं त्रिनेत्रं मणिमयविलसत्किंकिणीनुपुराढ्यम् ।५४ सात्विकं ध्यानमाख्यात मयमृत्यु निवारणम् । आयुरारोग्यजनन मपवर्ग फलप्रदम् ।५५ अब क्रम से तीनों ध्यानों को बतलाया जाता है - स्फटिक के सदृश-केशों से शोभित मुख वाले नौरत्नों से परिपूर्ण दिव्य आभ- रणों से और किंकणी नूपुर आदि से भूषित-दीप्त आकार वाले- स्वच्छ एवं विशाल वस्त्रो से संयुक्त-परम प्रसन्न-तीन नेत्रों से युक्त कर कमलों के द्वारा शूल और दण्ड को धारण करने वाले वटुक की निरन्तर वन्दना करता हूं ।५२। उदीयमान भुवन भास्कर के समान प्रभा से समन्वित-तीन नेत्रों से युक्त-रक्त अंगराग और माला धारण करने वाले-हास्य युक्त मुख से अन्वित-वरदान दाता करों द्वारा कपाल-अभयदान और शूल को धारण करने वाले - नील ग्रीवा से युक्त-उत्तम सैकड़ों भूषणों से विभूषित-चन्द्र से समुज्ज्वल चूड़ा वाले-बन्धूक पुष्प के तुल्य अरुण वस्त्रों को पहिने हुये- भयके हरने वाले देवकी सदा भावना करता हूँ ।५३। नीलगिरिके समान कान्त चन्द्र के खण्ड को धारण करने वाले-मुण्डों की माला पहिने हुये-दिशाओं के वस्त्र वाले-पिङ्ग वर्ण के केशों से अन्वित-कर कमलों के द्वारा डमरू-शृणि खड्ग-पाश् अभयदान-नाग-घण्टा- कपाल को धारण करने वाले भीषण दाढोंसे युक्त-सर्पोंके भूषणों से भूषि-तीन नेत्रों से युक्त मणियों से पूर्ण एवं शोभित किंकिणी ओर नूपुरों से आढ्य महेश का ध्यान करना चाहिये ।५४। यह सात्विक ध्यान अपमृत्यु का निवारक कहा है और आयु तथा आरोग्य का जनम ओर अपवर्गके फल का होता है ।५५।

४२८ ] [ श्रीशारदा तिलक राजसन्ध्यानमाख्यातं धर्मकामार्थसिद्धिदम् । तामस शत्रुशमन कृत्याभूतग्रहा (गदा) पहम् ॥५६ वर्णलक्ष जपेन्मन्त्रं हविष्याशी जितेन्द्रियः । तद्दशांश प्रजुहुयात्तिलैर्मधुरसंयुतैः ॥५७ धर्माधर्मादिभिः कल्पते पीठे पङ्कज शोभिते। षट्कोणान्तस्त्रि कोणस्थव्योम पङ्कजसंयुते ॥५८ वटुक तजयेद्देवं मूर्ति मूलेन कल्पयेत् । सद्योजातेन मन्त्रेण देवमावाहयेत्ततः ॥५९ मूलादिवामदेवेन स्थापयेत्परमेश्वर । मूलमन्त्रेण कर्त्तव्यं सान्निध्यं तदनन्तरम् ।६० दूसरा राजस ध्यान है। यह धर्म--काम और अर्थ की सिद्धि का प्रदाता होता है, ऐसा कहा गया है। तीसरा तामस ध्यान है। यह शत्रुओं के शमन करने वाला होता है ओर कृत्या, भूत, महाग्रहों के अवहनन करने वाला है ।५६। इस मन्त्र में जितने वर्ण हैं उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये और जप करने वाले व्यक्ति को हविष्य का अशन करने बाला तथा इन्द्रियों को जीतकर रखने वाला होना चाहिए। जप का दशवां भाग मन्त्र द्वारा मधुरों से संयुत तिलों के द्वारा हवन करे। धर्माधर्मादि से कल्पत पर जो पंकजों से शोभित होवे और जो षट्कोण के अन्दर स्थित त्रिकोण में स्थित व्योम पंकजों से संयुत होवे । ५७-५८। उस पीठपर बटुक देव की पूजा करे और मूल मन्त्र के द्वारा ही मूर्त्ति की कल्पना कर लेनी चाहिए । फिर सद्योजात मन्त्र के द्वारा देव का आवाहन करे ।५६। मूलादि वामदेव के द्वारा परमेश्वर की स्थापना करनी चाहिए। इसके अनन्तर मूलमन्त्र से सान्निध्य करे ।६०। अघोरेण सुधीः कुर्यात्सन्निरोधमनन्तरम् । तुरुषाख्येन मनुना योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् । ६१

अष्टादश पटल ] [ ४२६ देवाय वन्दन कुर्यादीशानेन समाहितः । एतत्सर्वं विधातव्यं तत्तन्मुद्राभिरादरात् ।६२ ईशानादीन्यजेद्देवान्न्यासमार्गेण देशिकः । सकलीकरणं कृत्वा यजेन्मूर्तीर्यथापुरा ।६३ व्योमपद्मदलेष्वर्चे दमसिताङ्गादिभैरवान् । असिताङ्गं रुरुं चण्डं क्रोधमुन्मत्तभैरवम् ।६४ कपालिनं भीषणाख्यं संहारं च क्रमादमन् । षट् कोणेषु षडङ्गानि क्रमादभ्यर्चयेत्सुधीः ।६५ सुधी को चाहिए कि वह अघोर मन्त्र से इसके अनन्तर सन्निरोध करे । पुरुषाख्य मन्त्र के द्वारा योनि मुद्रा को प्रदर्शित करे ।६१। फिर परम सावधान होकर ईशान के द्वारा देव के लिए वन्दना करनी चाहिए । यह सभी कुछ बड़े आदर के साथ उस-उस मुद्रा के द्वारा ही करना चाहिए ।६२। आचार्य ईशान आदि देवों का न्यास के मार्ग द्वारा यजन करे । सकलीकरण करके पूर्व की ही तरह से मूर्त्तियों का अभ्यर्चन करे ।६३। व्योम पद्म दलों में असिताङ्गादि भैरवों का- अर्चन करना चाहिये । अब उन भैरवों का नामों का परिगणन करके- बताया जाता है—असिताङ्ग—रुद्र—चण्ड—क्रोध—उन्मत्त भैरव— कपाली—भीषण और संहार—इनका क्रम से ही अर्चन करना चाहिए यह सुधी का कर्त्तव्य है । षट्कोणों में क्रम से छै अङ्गों का अर्चन करे ।६४।६५। पूर्वादीशामनपर्यन्तं तद्बहिः पूजयेदिमान् । डाकिनीपुत्रकान्पूर्वं राकिनीपुत्रकांस्ततः ।६६ लाकिनीपुत्रकान्पश्चात्काकिनीपुत्रकास्ततः । शाकिनीपुत्रकान्भूयो हाकिनीपुत्रकान्पुनः ।६७ मालिनीपुत्रकान्पश्चाद्देवीपुत्रांस्ततः परम् । अथोमारुद्रमातृणां पुत्रान्दक्षिणतोयजेत् ।६८

४३० ] [ श्रीशारदा तिलक ऊर्ध्वमुख्याः सुतानूर्ध्वमधोमुख्याः सुतानधः । इति सम्पूजयेन्मन्त्री पुत्रवर्गा स्त्रयोदशः ।६६ तद्वहिः पद्मपत्रेषु लोकेशवटुकान्यजेत् । ब्रह्माणपुत्रकं पूर्वे माहेशीपुत्रमैश्वरे ।७० पूर्व दिशा में ईशान पर्यन्त उनके बाहर इनका पूजन करना चाहिये-पूर्व में डाकिनी पुत्रों का-फिर डाकिनी पुत्रों का-पीछे लाकिनी पुत्रों का--इनके अनन्तर काकिनी के पुत्रों का, शाकिनी के पुत्रों का, फिर हाकिनी के पुत्रों का फिर मालिनी के पुत्रों का । इसके अनन्तर देवों के पुत्रों का--इसके उपरान्त उमा रुद्र मातृकायों के पुत्रों का दक्षिण की ओर यजन करना चाहिये ।६६-६८। ऊर्ध्व में मुख सुतो का ऊर्ध्व में और अधोमुख्य सुतों का अधोभाग में इस तरह से मन्त्रधारी को इन तेरह पुत्र वर्गों का अच्छी तरह से पूजन करना चाहिये ।६६। इनके बाहरी भागों में पद्म के पत्रों में लोकों के ईश वटुकों का यजन करना चाहिये । पूर्व दिशा में ब्राह्मणी पुत्र का अर्चन करे ओर ईश्वर की दिशा मे माहेशी के पुत्रों का अर्चन करना चाहिये ।७०। वैष्णवीपुत्रक सौम्ये कौमारीपुत्रमानिले । इन्द्राणीपुत्रकं भूयः पूजयेत्पश्चिमे तमः ।७१ महालक्ष्मीसुतं पश्चाद्रक्षोदिशि समर्चेयेत् । वाराहीपुत्रकं याम्ये चामुण्डासुतमानले ।७२ वटुकान्दशदिक्ष्वर्चेद्धेतुक त्रिपुरान्तकम् । बेताल वह्निजिह्वाख्यं कालान्ताख्य करालकम् ।७३ एकपादं भीम दंष्ट्रमचल हाटकेश्वरम् । दिग्वि दिक्ष्वन्तरालेषु श्रीकण्ठान्-जेत्पुनः ।७४ क्रोधीशवरादीनव्वृवन्तांस्तद्वद्बाह्ये समर्चेयेत् । ततस्त्रीन्नकुलीशाद्यान्दक्षिणे पूजयेत्सुधीः ।७५