भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( १६ )

3. The skilfulness in turning the brows, the casting of oblique glances, sweet talk, smiling with shyness, walking slowly by gestures and stopping at intervals ( these ) are the ornaments as well as the weapons for women.

कचित्सुभ्रभंगैः कचिदपि च लज्जापरिणेतैः कचिद्वातिवस्तैः कचिदपि च लीलाविलसितैः ॥ नवोदानाभैर्भिवदनकमलैर्नैत्रचलितैः

स्फुरन्नीलाञ्जानां प्रकरपरिपूर्णा इव दिशः ॥४॥

कामी पुरुषोंको, कभी सुन्दर भौंहोंसे कटाक्ष करने वाली, कभी शर्मसे सिर नीचा कर लेने वाली, कभी भयसे भीत होने वाली, कभी लीलामय विलास करने वाली, नवीन व्याही हुई कामिनियोंके मुखकमलोंकी खूबसूरती बढाने वाले नीलकमलोंके समान चञ्चल नेत्रोंसे दशों दिशाएँ पूर्ण दीखती हैं ॥४॥

हालकी व्याहो हुई नवबधुओंमें कमान सी भौंहों से कटाक्ष करना, कभी लाजके मारे सिर नीचा कर लेना, कभी भयसे भीत होना, कभी अन्य प्रकारके नखरे करना—ये सब स्वभाव से ही होते हैं । प्रथम तो इस उद्वेगमें सुन्दरता आप ही बढ़ जाती है ; फिर उनके नखरे और नीलकमलसे चञ्चल नेत्र उनकी खूबसूरतीको और भी बढ़ा देते हैं । कामी पुरुषोंको, जिनके मनमें इनके चञ्चल नेत्र अपना घर कर लेते हैं—हर ओर,

( १७ )

इनके चञ्चल नेत्र ही नेत्र दिखाई देते हैं ; अर्थात् उनका मन इनके नीलकमलवत् सुन्दर नेत्रोंमें ही जा बसता है । जिसमें जिसका दिल जा बसता है, उसे वही-वह दीखता है । वृ॒क्ति कामियोंकी आँखोंमें कमसिन अल्पवयस्का नवविवाहिता कामिनियाँ समा जाती हैं ; अतः उन्हें हर ओर, जहाँ तक उनकी दृष्टि जाती है, वही-वह दिखाई देती हैं ।

किसी ऐसी ही उठती जवानीकी कम-उम्र परीकी लुब-सुरती का चित्र महाकवि नज़ीरने क्या ही कारीगरीसे खींचा है :—

पलकों की रूपक, पुतली की फिरत, सुरमे की लगावट वैसी ही । ऐयार नजर, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही ॥१॥ वह अँखियाँ मस्त नशीली सौं, कुछ काली सौं, कुछ पीली सौं । चितवन की दगा, नज़रोंकी कपट, सीनोंकी लड़ावट वैसी ही ॥२॥ वह रात अँधेरी बालों सी, वह मँग चमकती बिजली सी । ज़ूलकों की खुलत, पड़ी की जमत, चोटी की गुँवावट वैसी ही ॥३॥ वह छोटी-छोटी सख्त कुँचै, वह कच्चे-कच्चे सेव गजब । अँगिया की भड़क, गोठोंकी चमक, बन्दों की कसावट वैसी ही ॥४॥ वह चन्द्रचल चाल जवानी की, ऊँची ऐड़ी नीचे पन्ने । कफ़शों की खटक, दामनकी भटक, ठोकरकी लगावट वैसी ही ॥५॥ कुछ हाथ हिलें, कुछ पाँव हिलें, फड़कें बाजू थिरकै सब तन । गाली वो बला, ताली वो सिद्धाम, उँगली की नचावट वैसी ही ॥६॥

( १८ )

चञ्चल अचपल, मटके चटके, सर खोले टैंके हँस-हँस के । क्रुह क्रुह की हँसावट और गुज्रव, ठठों की उड़ावट बेसी ही ॥७॥ हर वक्त फुन हर आन सजै, दम-दम में बदलै लाख सजै । बाहों की रूपक, घुँघट की अदा, जोबनकी दिखावट बेसी ही ॥८॥

पाठक ! मनचले पाठक ! आप ही बिचारिये, इस आनवान और खूबसूरती वालीकी कौन भूल सकता है ? जो इन स्त्री- रत्नों की कद्र जानने वाले हैं, उनकी नज़रोंसे इनके नीलकमल को आभा रखने वाले नीलमसे नेत्र कभी उतर ही नहीं सकते । उन्हें तो हर ओर नीलम या नील-कमल ही नील-कमल फूले दीखते हैं और वे मन-ही-मन उनकी अनुपम छटा को याद कर- करके प्रसन्न होते हैं ।

छप्पय ।

कबहुँ भौहको भंग, कबहुँ लज्जायुत दरसत ।

कबहुँक ससकत संकि, कबहुँ लीलारस बरषत ।

कबहुँक मुख मृदुहास, कबहुँ हित बचन उषारत ।

कबहुँक लोचन फेर, चपल चहुँ ओर निहारत ।

छिन-छिन सुचरित्र विचित्र करि, भरे कमल जिमि दशहुँदिशि ।

ऐसी अनूप नारी निरख, हरषत रहिये दिवस-निशि ॥४॥

सार—जिस तरह ब्रह्मज्ञानियोंको हर ओर ब्रह्म ही ब्रह्म दीखता है ; उसी तरह कामियों

( १६ )

को हर और नववधुओं के नीलकमलके समान चंचल नेत्र ही नेत्र दोखते हैं । जिसकी आँखों में जा समा जाता है, उसे वही वह दीखता है ।

4. What with the turning of her beautiful brows, what with her gentle bashfulness, what with her fearfulness and what with her playful gestures, the face of a young woman, having moving eyes with all the above qualifications, appears like a lotus ( with black bees hovering on it ).

वक्त्रं चन्द्रविकासि पङ्कजपरीहासत्वे लोचने वर्णः स्वर्णमपाकरिण्युरलिनीजिष्णुः कचानाञ्चयः ॥ वच्चोजाविभक्तुम्भसंश्रमहरीं गुर्वो नितम्बस्थली वाचो हारि च मार्दवं युवतिषु स्वाभाविकं मंडनम् ॥५॥

चन्द्रमाके समान प्रकाशमान मुख, कमलकी मसखरी करनेवाले दोनों नेत्र, सुवर्णकी दमकको फीकी करनेवाली शरीरकी कान्ति, मौरीके पुञ्जको जीतनेवाले केश, गजराजके गण्डस्थलकी शोभाका अपमान करनेवाली दोनों छातियाँ, विशाल नितम्ब—चूतड़, मनोहर वाणी और कोमलता—नजाकत—ये सब स्त्रियोंके स्वाभाविक भूषण हैं ॥५॥

खुलासा—चन्द्रमाके समान पुष्क, कमलको लजाने वाले नेत्र, कनककी आभाको मूढी करने वाली देहकी कान्ति, मौरी

( २० )

की पंक्तियोंको पराजित करने वाली अलके, गजराजके गण्ड-खलोंको लजाने वाले स्तनद्वय, फूलोंकी कोमलताको मात करने वाली नज़ाकत, मृगमदको नीचा दिखाने वाली मुखकी सुवास —ये सब स्त्रियोंके स्वाभाविक आभूषण या कुदरती ज़ेवर हैं। तात्पर्य यह है, कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही बड़ी सुन्दरी होती हैं। इनकी असाधारण सुन्दरता और अनूप रूप पर किसका मन लहालोट नहीं हो जाता ? इनकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर ही लोग इनके कीत-दास हो जाते और दुःख-सुखकी परवा न कर, दिन-रात इनके लिये परिश्रम करते हैं।

छपय ।

करत चन्द्र इव विशद वदन, अद्भुत छवि छाजत । कमलन विहंसित नैन, रैन दिन प्रकलित राजत । करत कनक वृतिहीन, अंग-आभा अति उमगत । अलकन जीते भौर, कुचन करि-कुम्भ किये हत । मुहुता मरोर मारे सुमन, सुख-सुवास मृगमद कदन । ऐसो अनूप तिय रूप लखि, छाँहभूष नहि गिनत मन ॥५॥

सार—नाना प्रकारके हाव-भाव स्त्रियोंके नाना प्रकारके अस्त्र हैं। इनसे ही वे पुरुषों को अपने वशमें करतीं और अपना गुलाम बनाती हैं।

( २१ )

2. The natural ornaments of a woman are her face which puts to shame even the moon, her eyes which laugh at the lotuses, the colour of her body which dims even the lustre of gold, her hair which surpasses in beauty the swarm of bees, her breast that outstrips the beauty of the forehead of an elephant, the two big hips and the sweet voice which attracts the mind.

स्मितं किञ्चिद्भक्त्रे सरलतरलो दष्टिविभवः

परिष्यन्दो वाचामभिनवविलासोक्तिससः ॥

गतीनाभारम्भः किसलयितलीलापरिकरः

सृष्टशंत्यास्ताख्यं किमिह नहि रम्यं मृगद्वयः ॥६॥

उठती जवानीकी मृगनयनी सुन्दरियोंके कौन काम मनोगुणधर नहीं होते ? उनका मन्द-मन्द मुस्कराना, स्वाभाविक चञ्चल कटाक्ष, नवीन भोग-विलासकी उक्तिसे रसीली बातें करना और नखरेके साथ मन्द-मन्द चलना—ये सभी हाव-भाव कामियोंके मनको शीघ्र ही वशमें कर लेते हैं ॥६॥

जवानीमें क्रदम रखने वाली, उठती जवानीकी मृगनयनी सुन्दरियोंका धीरे-धीरे हँसना, स्वभावसे चञ्चल नेत्र चलाना, मीठी-मीठी रसीली बातें करना और नखरे एवं अजीब नाज़ों-अदा के साथ धीरे-धीरे क्रदम रखकर चलना—ये हाव-भाव कामी पुरुषोंके होश-हवास ख़ता कर, उनको इनका गुलाम बना देते हैं ; अर्थात् कामी पुरुष स्त्रियोंके इन हाव-भाव और नाज़ों-अदाओंको देख-देखकर, अप्ठनी सुध-दुध लो, पागलसे ही जाते

( २२ )

और इनकी इन अदाओं पर न्यौछावर होकर सदाको इनके क्रीत-दास हो जाते हैं ।

दोहा ।

मन्द हसन तीखे नयन, सरस वचन सविलास ।

गजगमनी रमणी निरख, को न करे अभिलाष ॥६॥

सार—नवीना युवतियोंके हृदयहारी हाव- भावों पर न मर मिटनेवाला पुरुष कोई विरली ही महतारी जनती है ।

6. Is not everything charming in a lotus-eyed woman just verging on her youth? Say the gentle smile on her face, the casting of her restless eyes, talking sweetly in different new charming modes, walking by gestures and with slow steps like that of new leaves.

द्रष्टव्येषु किमुत्तमं मृगहशां प्रेमप्रसन्नं मुखं

घ्रातव्येष्वपि किं तदास्यपवनः श्राव्येषु किं तद्भ्रचः ॥

किं स्वाद्व्येषु तदोष्टपल्लवसः स्पर्शयेषु किं तत्तख-

ध्येयं किं नवयौवनं सुहृदयैः सर्वत्र तद्विश्रमः ॥७॥

रसिकोंके देखने-योग्य क्या है ? मृगनयनी कामिनियोंका प्रेमपूर्ण प्रसन्न मुख । सँवने-योग्य क्या है ? उनके सँहकी भाष । सुनने-योग्य क्या है ? "उनके वचन । स्वादिष्ट पदार्थ क्या है ? उनके ओष्ठपल्लवका रस । छूने-योग्य क्या है ? उनका कोमल

( २३ )

शरीर । ध्यान करने योग्य क्या है ? उनका नवयौवन और विलास ॥७॥

मनुष्यके पाँच इन्द्रियाँ होती हैं :—( १ ) आँख, ( २ ) नाक, ( ३ ) कान, ( ४ ) जीभ, और ( ५ ) त्वचा । आँखका काम देखना, नाकका सूँघना, कानका सुनना, जीभका चखना और त्वचाका स्पर्श करना है । आँख रूप देखना चाहती है, नाक सुगन्धित पदार्थ सूँघना, कान रसोलो बातें सुनना, जीभ सुस्वादु पदार्थ चखना और त्वचा कोमल वस्तु छूना चाहती है । कामी पुरुषोंकी पाँचों इन्द्रियोंकी सन्तुष्टिके लिये, भगवान् ने एक सुन्दरी नारी ही पैदा कर दी है । मतलब यह कि, रसिकोंकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंकी सन्तुष्टिके सामान एक कामिनीमें ही मौजूद हैं । भुगनयनियोंके सुन्दर मुख आँखोंके देखनेके लिये हैं । उनके मुँहकी सुगन्धित भाफ नाकके सूँघनेके लिये है । उनके मिश्रोत्से भी मीठे और मधुर बचन कानोंके सुननेके लिये हैं । उनके नीचले होठका अमृत-समान स्वादिष्ट रस जीभके चखनेके लिये है और चमड़ेको छूकर सुखी होनेके लिये उनका मल्लमलसे भी कोमल शरीर या उनके पैरोंके तलवे हैं तथा ध्यान करनेके लिये उनकी नयी जवानी और उनकी नाज़ी-अदा है । सारांश यह कि, सारे सुखं एक सुन्दरी ही में मौजूद हैं ।

अगर कोई यह कहे कि, नहीं जी, यह सब कवियोंकी लीला—उनके बढावे हैं, तो हम यही कहेंगे कि, आप उनसे

( २४ )

पूछिये, जिन्होंने इन सबका आनन्द अनुभव किया या इनका मज़ा उठाया है। जिसने उनका चन्द्रमाके समान प्रेमरससे पूर्ण मुख देखा है, वही कह सकता है कि, उनका मुख देखनेसे रूप देखनेको इच्छुक नेत्र-इन्द्रियकी तृप्ति होती है या नहीं। जिसने सुगमद—कस्तूरीको भी मात करनेवाली उनके मुखकी सुगन्धका मज़ा लिया है, वही कह सकता है कि, उस सुगन्ध से बढ़कर और भी कोई सुगन्ध नासिकाकी तृप्ति करनेवाली है या नहीं। जिसने उनके मञ्जुमलकी भी नरमीको मात करनेवाले शरीर या पैरोंके तल्लों पर हाथ फेरे हैं, वही कह सकता है कि, यह बात कहाँ तक सच है। जिसने उनकी मधुर और रसीली एवं कानोंमें अमृत ढालनेवाली बातें सुनी हैं, वही कह सकता है कि, उनकी मोटी-मोटी बातोंमें क्या मज़ा है। जिसने उनके रूप, यौवन और हाव-भाव तथा विलासोंका ध्यान किया है, वही कह सकता है कि, उनके ध्यानमें कैसा आनन्द है। जिसने ब्रह्मका ध्यान किया है, वही कह सकता है कि, ब्रह्मके ध्यानमें वह आनन्द है, जिसकी समता त्रिलोकीके और किसी आनन्दमें नहीं है। जिसने ब्रह्मका ध्यान ही नहीं किया, वह ब्रह्मानन्दके वर्णनातीत आनन्दकी बातको क्या जाने ? जिसने अनुपम सुन्दरी सुगनयनीके होठोंसे होठ लगाकर अमृत पिया है, वही कह सकता है कि, सुन्दरीके नीचले होठमें अमृत है या नहीं। महाकवि नज़ीर कहते हैं और ठीक ही कहते हैं :—

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भूतशक्तिक

जिसके गोरे-गोरे स्तनों पर मोतियों के हार भूल रहे हैं, नपुर-रूपी हंस जिसके त्वरण-कमलों में मधुर-मधुर शब्द कर रहे हैं—ऐसी मनोमोहिनी काम-मद से सत्काली नारी किसका मन वश में नहीं कर लेती ? [ पृष्ठ २७ ]

Popular Press=Calcutta.

( २५ )

सागिरके लबसे पूँछिये, इस लब की लज्जतें ।

किस वास्ते, कि खूब समझता है लब की लब ॥

उसके ओठोंका स्वाद प्यालेके ओठोंसे पूछिये ; क्योंकि ओठोंकी बात ओठ ही समझता है ।

छप्पय ।

कहा देखिये योग्य ? त्रियाको अति प्रसन्न मुख ।

कहा सँघिये सोधि ? श्वास सौगन्ध हरत दुख ।

कहा दीजिये कान ? प्राणप्यारी की बातन ।

कहा लीजिये स्वाद ? अघरके अमृत अघातन ।

परसिये कहा ? ताको सुबपु, ध्यान कहा ? जेवन सुखवि ।

सब भाँति सकल सुखको सदन, जान सुयश गावत सुकवि ॥७॥

सार—एक सुन्दरी कामिनीमें पुरुषकी सारी इन्द्रियोंकी तृप्तिका मसाला है ।

7, For lovers what is the best sight worth seeing ? The lovely and beautiful face of a lotus-eyed woman. What is the best thing worth smelling ? The vapour of her mouth. What is the best thing for hearing ? Her sweet voice. What object has the best taste ? The enjoyment of her leaf-like lips. What is best among the objects of touch ? Her body. And what is the best thing for meditation ? Her youth and the pleasure arising from it.

( २६ )

एताः स्वलङ्कलयसंहतिमेष्वलोत्य-

मंकारन्तुपुरवात्तदराजहंस्यः ॥

कुर्वन्ति कस्य न मनो विवशं तस्यो

विप्रस्तमुग्रहरिणीसदृशैः कटाक्षैः ॥८॥

चन्द्रचल कङ्कन, डीली कौधनी और पायजेबोंके घुँवरुओंकी मधुर मङ्ककारसे राजहंसोंको शरमानेवाली नवयुवती सुन्दरियाँ, भयभीत हिरनीके समान कटाक्ष करके, किसके मनको विवश नहीं कर देतीं ? ॥८॥

कर्धनी और पायजेब प्रभृति अलङ्कारोंके मधुर-मधुर शब्दों-से राजहंसनियोंका निरादर करनेवाली नवयुवतियाँ, जब भङ्गकी हुई भोली हिरनीकी तरह अपनी तीखी नज़रका तीर चलाती हैं, तब दड़े-बड़े बहादुर उनके वशीभूत होकर उनकी गुलामी करने लगते हैं । मनुष्य तो कौन बीज है, देवता तक ऐसो कामिनियोंके कटाक्ष-घाणोंसे पराजित हो जाते हैं । अब इनकी निगाहके तेज तौरसे जो परास्त न हो, अपनी रक्षा कर ले, उसे हम क्या कहें, सो हमारी समझमें नहीं आता । भोले-भाले पाठक ! इनके कटाक्षों की मारको मामूली मार न समझें । महाकवि दाग कहते हैं और ठीकहो कहते हैं :—

तीर तेरा मिजुगोंसे बढ़कर नहीं ।

कुछ खटकते हैं, इसी ज़रतरेसे हम ॥

( २७ )

तेरी भौँहों में जो काट है, वह तेरे तीरमें नहीं। इसीलिये मुझे तीरसे तेरे भौँह रूप नशतरका हर सयय खटका लगा रहता है। मतलब यह कि, तीरकी मारका इलाज है; पर कामिनीके कटाक्ष-वाणका इलाज नहीं।

दोहा ।

नृपुर किंकन किंकिणी, बोलत अमृत बैन ।

काको मन नहि बस करत, मृगनैननिके नैन ॥८॥

सार—नाजिनियोंके निगाहे तीरसे न घायल होनेवाला करोड़ोंमें कोई एक होता हो, तो होता हो !

8. Which mind is there that does not go out of control by the casting of the eyes like that of a frightened hind of the young woman, the sounds of whose restless bracelets and the waistchain and the tinklings of whose anklets defeat the sweet sound of swans even.

कुकुमपंककलंकितदेहा गौरपयोधरकम्पितहारा ।

नृपुरहंसरणत्पदपद्मा कं न वशीकुरुते सुवि रामा ॥९॥

जिसकी देह पर केसर लगी है, जिसके गोर-गोर स्तनोंपर हार झूल रहा है और नृपुररूपी हंस जिसके चरणकमलोंमें मधुर-

( २८ )

मधुर शब्द कर रहे हैं,—ऐसी सुन्दरी इस पृथ्वी पर किसके मनको वशमें नहीं कर लेती ? ॥६॥

खुलासा—जिसकी देह पर केसर लगी है, जिसके सघन पीनपयोधरों पर मोतियोंका हार धीरे-धीरे हिल रहा है, जिसके कमल-जैसे चरणोंसे बाजेकी मधुर-मधुर झंकार निकल रही है, वह सुन्दरी इस जगत्में किसीको भी अपने अधीन किये बिना नहीं छोड़ती ; जो उसकी नज़रों तले आता है, वही उसका गुठाम हो जाता है । परन्तु जो पुरुष ऐसी मनो-मोहिनी नारीके वशमें नहीं होता, उसके रूपलावण्य और नाज़ो-अर्दा पर नहीं मर मिटता, वह सच्चा शूरवीर और मोक्ष का अधिकारी है ।

दोहा ।

हार हलें कुचकनक लग, केसर रंजित देह ।

नृपुरश्चनि पदकमलकी, केहि न करें बस येह ? ॥६॥

सार—जिनके गोरे-गोरे बदन पर केसर लगी है, जिनकी नारंगियोंसी सुगोल छातियों पर मोतियोंके हार हिल रहे हैं और जिनके चरणकमलोंकी पायज़ेवोंसे छमा-छमकी मीठी-मीठी मनोहारिणी आवाज़ें आती हैं, वे मृग-नयनों किते अपने वशमें नहीं कर लेतीं ?

( २६ )

9. Whose minds are not overpowered on this earth by such beautiful women whose body is decorated by saffron and sandal and on whose white breasts garlands are hung and in whose lotus-like feet anklets sound like swans ?

सूतं हि ते कविरा विपरीतबोधा

ये नित्यमाहुर्वला इति कामिनीनाम् ॥

याभिर्विलोलतरतारकदृष्टिपातैः

शकादयोऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः ॥१०॥

स्वियोंको “अबला” कहनेवाले श्रेष्ठ कवियोंकी बुद्धि निश्चय ही उल्टी है। भला, जो अपने नेत्रोंके चक्कल कटाक्षोंसे महाबली इन्द्रादिक देवताओंको भी मार लेती हैं, वे “अबला” किस तरह हो सकती हैं ? ॥१०॥

जो कोमलाङ्गी कामिनियाँ, बिना अस्त्र-शस्त्रोंके, अपनी दृष्टिमात्रसे, जगत्-विजयो योद्धाओंको तो बात ही क्या है, त्रिलोकीका पलक मारते संहार कर डालनेकी शक्ति रखने वाले शङ्कर और महाबली इन्द्रादिक देवताओंको भी अपने वशमें करके, मनमाने नाच नचानेको शक्ति रखती हैं, और उन्हें अपने इशारोंपर नचाती हैं, उन्हें “अबला” कहनेवाले कवि निश्चय ही पागल हैं—उनकी मति मारी गई है। सबलाओंको अबला कहने वाले यदि मूर्ख नहीं, तो क्या अहम्भन्द् हैं ?

( ३० )

दोहा ।

कामिनिको अबला कहत, ते नर मूढ़ अचेत ।

इन्द्रादिक जीते हगन, सो अबला किहि हैत ? ॥१०॥

सा—स्त्रियाँ अपनी एक नजरसे भूतलके ज्वर्दस्त-से-ज्वर्दस्त योद्धाको पराजित कर सकती हैं, इसलिये उन्हें “अबला” कहना भूल है ।

10. Those great poets who have called women powerless have surely thought just in the opposite way. How can they be said to be so whose casting of the moving eye-lids subdues even Indra and others.

नृतमाहाकरस्तस्याः सुश्रुवो मकरञ्जः ।

यतस्तन्नेवर्षचारसूचितेषु प्रवर्तते ॥११॥

कामदेव निश्चय ही सुन्दर भौहवाली स्त्रियोंकी आज्ञा पालन करनेवाला चाकर है ; क्योंकि जिनपर उनके कटाक्ष पड़ते हैं, उन्हींको वह जा दवाता है ॥११॥

खुलासा—निस्सन्देह, कामदेव सुन्दर भौहवाली स्त्रियोंकी आज्ञाके अशक्ती होकर चलने वाला सेवक है। वह उनके इशारों पर चलता है। जिसकी ओर वे सेन कर देती हैं; वह उन्हींको जा मारता है। अबल, तो स्त्रियाँ स्वयं ही बल-चती होती हैं। अपने ही कटाक्षोंसे बड़े-बड़े शूरवीरोंके डकके

३१ )

छुड़ा सकती हैं ; फिर कामदेव उनके हुकममें है, यह और भी राजवकी है। वे प्रेसी स्त्रियोंसे कौन अपनी रक्षा कर सकता है ? केवल वही उनसे बच कर रह सकता है, जो उनके दृष्टिपथमें न आवे । शायद इसीलिए, मोक्ष-कामी पुरुष मनुष्यों की बस्तियाँ छोड़ कर, निर्जन बनमें जाकर, आत्मोद्धारकी चेष्टा करते हैं ; क्योंकि बनमें न कामिनी होंगी और न वे अपने सेवक कामदेवको पश्चशर चलाकर अपना शिकार मारनेका हुकम देंगी ।

दोहा ।

कामिनि हुक्मी काम यह, नैन सैन प्रगटात ।

तीन लोक जीव्यौ मदन, ताहि करत निज हात ॥११॥

सार—कामदेव स्त्रियोंका सेवक है ।

11. Surely Kamdev ( Cupid ) is the obedient servant of women, because he, at once overpowers that man who is made their mark.

केशा संयमिनः श्रुतेरपि परं पांगते लोचने

चान्तर्वकृत्रमपि स्वभावशुचिभिः कीर्णं द्विजानां गणैः ॥

मुक्तानां सतताधिवासस्चिरं वचोजकुम्भद्वयं

चेत्थं तन्वि वपुः प्रशांतमपि ते श्लोभं करोत्येव न ॥१२॥

ऐ कृशाङ्गि ! हे, नाजनी ! तेरे बाल साफ-सुधरे और सँवारे हुए हैं, तेरी आँखें बड़ी-बड़ी और कानोंतक हैं, तेरा मुख इमभाव

( ३२ )

से ही स्वच्छ और सफेद दन्तपंक्तिसे शोभायमान है, तेरे कुचोंपर मोतियोंके हार मूल रहे हैं ; पर तेरा ऐसा शीतल और शान्तिमय शरीर भी मेरे मनमें तो विकार ही उत्पन्न करता है, यह अचम्भे की बात है ! ॥१२॥

नोट—इस श्लोकमें जो “संयमिन, अतुरपि, द्विजानां और मुकानां” शब्द आये हैं, उनके दो-दो अर्थ हैं। उनके इस्तेमालसे कवि महोदयने अर्थ वसत्कार दिखाया है। इसीसे इस श्लोकके दो अर्थ हो गये हैं। एक अर्थ ऊपर लिखा ही है, और दूसरा नीचे लिखते हैं ; पर पहले उन शब्दोंके दो-दो अर्थ बताने देना उचित समझते हैं :—संयमिन=धैर्य और जितेन्द्रिय। अतुरपि=कानों तक पहुँचे हुए और वेदशास्त्र पारङ्गत, काननचारी और बनचारी। द्विजानां=दांत, ब्राह्मण। मुकानां=मोती और मुक्त पुरुष।

दूसरा अर्थ।

हे कृष्ण ! ये नाजनी ! तेरे बाल जितेन्द्रिय हैं, तेरे नेत्र वेदशास्त्र-पारङ्गत और काननचारी हैं, तेरा मुख पवित्र है और उसमें ब्राह्मणों का निवास है, तेरी छातियों पर मुक्त पुरुषों का निवास है ; इसलिये तेरा शरीर सतोगुणका धाम है ; अतः उसे शीतल और शान्तिमय होना चाहिये ; पर, है उल्टी बात । तेरे सतोगुणी शरीरसे मुझे शान्ति मिलनी चाहिये ; पर उससे मेरे मनमें उल्टी अशान्ति यः शोभ अथवा अनुराग उत्पन्न होता है, यह आश्चर्य की बात है !

( ३३ )

व्यप्य ।

संयम राखत केश, नयनहूँ काननचारी ।

मुख भाँहि पवित्र रहत, द्विजगन सुखकारी ।

उस पर मुक्ताहार, रहत निशिदिन छवि छायो ।

आनन चन्द-उजास, रूप उज्ज्वल दसायो ।

तेरो तन तरुणी ! मृदुल अति, चलत चाल धीरज-सहित ।

सब भाँति सतोगुणको सदन, तज्ज करत अतुराग चित ॥१२॥

नोट—इस कवितासे भी दूसरा अर्थ साफ समझमें आता है । तेरे बाल संयमी हैं, नेत्र काननचारी हैं, मुखमें पवित्र सुखकारी ब्राह्मणोंका निवास है, छातिरों पर मुक्त पुरुषोंका हार है, मुख चन्द्रमाके समान है, शरीर नाजुक है, तू धीमी-धीमी चाल चलती है,—इन सब लक्षणोंसे तेरा शरीर सतोगुणका घर है । सतोगुणी शरीरसे विकार या क्षोभ उत्पन्न हो नहीं सकता ; फिर भी, तेरा शरीर अतुराग पैदा करता है, यह अचम्भे को ही बात है ।

सार—स्त्रीका शरीर, सब तरहसे सतो-गुणी, शीतल और शान्तिमय होनेपर भी, पुरुष के मनमें दाभ ही करता है ।

12, O women, of slender constitution, ( you ) whose hair is well controlled, whose eyes are outstretched up to ears, whose mouth is filled with naturally clean teeth and on whose breasts pearls are always shining, though your this frame is full of calmness yet it disturbs us. *

  • The reference in this shloka have double meanings. Sanyami—means controlled as well as bound ; Shruti—means Vedas as well