शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( २४६ )
कुण्डलिया ।
कान्ता उत्पल-लोचना, प्रिया क्रशोदरि बाल ।
घटस्तनी पंकजमुखी, कामिनि-अधर प्रवाल ॥
कामिनि-अधर प्रवाल, सुभु कहि-कहिके बोले ।
आनंद अधिक उद्वाह, मत्त बन परिणत डोले ॥
अशुचि-पूतरी नारि, ताहि मन जाने शान्ता ।
महा नरककी खान, मोह-बस मानै कान्ता ॥७२॥
अपनी और पराई रूपवती और कुरुपा सभी नारियाँ मलमूत्रकी खान और नरकद्वार की कुञ्जी हैं ; पर मोहान्ध होनेसे परिणतों और विचारवानोंको भी यह असली बात समझ नहीं पड़ती । इसीसे वे इन की प्रशंसाके पुल बाँधते हैं ।
72. How wonderful is the action of delusion because people at the sight of the woman who is impurity personified eagerly describe her thus.—“How beautiful is she”, “she is lotus-eyed”, “her hips are very big in size”, “her breasts are high and full-grown” “her lotus-like face is very handsome and her brows are very fascinating” at her sight they are charmed, become infatuated, constantly remember her and praise her.
—*—
( २४७ )
स्मृता भवति तापाय दृष्टा चोन्मादवर्द्धिनी ।
स्पृष्टा भवति मोहाय सा नाम दयिता कथम् ॥७३॥
जो स्त्री स्मरणमात्र करनेसे सन्ताप करती है, देखते ही उन्माद बढ़ाती है और छूते ही मोह उत्पन्न करती है, उसेन जाने क्यों प्राणप्यारी कहते हैं ॥७३॥
खुलासा—जिसके खाली याद आनेसे ही मनमें वेदना सी होने लगती है, जिसके देखनेसे मनुष्य मतवाला और पागल सा हो जाता है और जिसके छूनेसे ही विवेक और ज्ञानका नाश होकर, मोहकी बढ़ती होती है, ऐसी कदम-कदम पर दुःख देने-वाली स्त्रीको लोग प्यारी, प्राणप्यारी, प्रिया, कल्याणी, प्राणाधिका प्रभृति क्यों कहते हैं, यह बात समझमें नहीं आती ?
वास्तवमें स्त्री दुःख और आपदाओंकी खान है, पर लोगोंको यह बात मालूम नहीं होती । वजह यह है कि, हिम्रोटाइज़ करने वालोंकी तरह, स्त्री नज़र-से-नज़र मिलते ही, अपनी जादूमरी आँखोंसे, मदिरा की तरह, मोह पैदा कर देती है । उस मोहसे मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है । ज्ञान नष्ट हो जानेसे उसे कुछ-का-कुछ दीखने लगता है । जिस तरह मोहान्ध पुरुष अभक्ष्यको भक्ष्य, अकार्यको कार्य और दुर्गमको सुगम समझने लगता है ; उसी तरह, साक्षात् विष होने पर भी, मोहान्धको स्त्री विषसी न दीखकर अमृतसी दीखती है । अमृतसी दीखनेकी वजहसे ही कामान्ध पुरुष उसे “प्राणप्यारी” कहते हैं ।
( २४८ )
दोहा ।
सुधि आये सुधि-डुधि हरत, दरसन करत अचेत ।
परसत मन मोहित करत, यह प्यारी किहि हेत ॥७२॥
73. How can we call a woman "beloved" whose recollection even gives pain, whose very sight increases intoxication of mind and whose touch creates a great sensation in us.
—*
तावेदेवामृतभयी यावलोचनगोवरा ।
चतुः पथाद्भगता विपाद्ध्यतिरिच्यते ॥७४॥
स्त्री जब तब आँखोंके सामने रहती है, तबतक अमृतसी मालूम होती है ; किन्तु आँखोंकी ओट होते ही, विषसे भी अधिक दुःखदायिनी हो जाती है ॥७४॥
खुलासा—स्त्री पुरुषके पास होनेसे निश्चय ही अमृत सी मालूम होती है ; क्योंकि वह अपने हाव-भाव, कटाक्ष और मधुर वचन तथा सेवा प्रभृतिसे पतिके चित्तको हार्यमें लिये रहती है ; पर अलग होते ही मनमें भारी विरह-वेदना करती है । वियोग-विकल पुरुषका खाना-पीना और नियमित समय पर सोना प्रभृति छूट जाता और साथ ही स्वास्थ्य तक नष्ट हो जाता है । स्त्रीका विरह पुरुषके शरीर पर जहरका काम करता है । उसके मर्ममें घोर सन्ताप होता है । इसीसे कहा है कि, स्त्री आँखोंके सामनेसे हटते ही विषवत् हो जाती है ।
श्रीमान्
रबी जन्म तक आर्यों के मानने रहती है, अस्सल मी मायूस होती है : आर्यों की छोट होने ही शिव ने भी अधिक दुखहायिनी हो जाती है। इन चित्रमें ऊपर पुरन कोंक मानने देटा हुआ नृत्य-मुद्रा पान कर रहा है, किन्तु नीचे जराडे में दुर्गा है यही भाव कियेया है।
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( २४६ )
ऐसी ही बात महाकवि कालिदासने “शृङ्गार-तिलक” में कही है :—
अपूर्वो दृश्यते वह्निः, कामिन्याः स्तनमण्डले ।
दूरतो दहते गानं, हृदि लभस्तु शीतलः ॥
कामिनीके स्तनमण्डलोंमें अपूर्व अग्नि है, जो दूरसे तो शरीर को जलाती है और हृदयसे लगाने पर शीतल हो जाती है ।
मतलब यह है कि, स्त्री स्मरण करनेसे सन्ताप करती, देखनेसे चित्तको हर लेती और मनुष्यको अन्ध्या बना देती, छूनेसे बल नाश करती, सम्भोग करनेसे वीर्यका नाश करती और नेत्रोंके सामनेसे हटने पर विरहाग्निमें जलाती है । स्त्री से किसी तरह भी पुरुषको सुख नहीं । स्मरण करनेमें सुख, न देखनेमें सुख ; छूनेमें सुख, न भोगनेमें सुख ; पास रहनेमें सुख, न अलग होनेमें सुख । फिर भी लोग स्त्री पर जान देते हैं, यह क्या कम आश्चर्यकी बात है ?
वियोगिण्योके सम्बन्धेम् उर्द्वं कवियोंकी उत्पत्तिः ।
प्राणप्यारी स्त्री अथवा आश्रानाकी जुदाईमें पुरुष पागल सा हो जाता है । उसके शरीरमें धून और मांसका नाम नहीं रहता —हुड़ोंका कड़ाल रह जाता है । जिन्दगी भार मालूम होती है । विरही पुरुष हर क्षण मौत को याद करता है ; पर मौत भी, उस विपत्तिके समयमें, उससे चैर सा कर लेती है । यहाँ
( २५० )
हम, अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ, उर्दू-कवियोंकी चन्द कवितायें देते हैं। पाठक देखें कि, विरही पुरुषोंकी क्या हालत होती है :—
वह मैं कि मुझे आलमे बालाकी खबर थी ।
ऐ बेखबरी ! खाक नहीं अपनी खबर आज ॥
एक दिन था कि, मुझे पृथ्वी ही नहीं—स्वर्ग तक की बात मालूम थी ; पर आज मुझे अपनी भी खबर नहीं कि हूँ या नहीं हूँ । बेखबरी ! तेरा भला हो । प्यारीकी जुदाई की वजहसे अजब बेखबरी—बेहोशी छाई हुई है ।
बेकसी सदमये हिज्राँकी मुझे ताव नहीं ।
काश दुश्मन ही चले आयें जो अहबाव नहीं ॥
एक तो विरहका दुःख और उस पर विजनता ; बताइये, किस तरह कोई दुःख उठाये । मैंने माना कि, मेरे मित्र नहीं हैं, जो आकर मुझे धीरज दें ; पर शत्रु तो हैं, वही चले आवे ; जिससे विजनता तो किसी तरह कम हो ।
सब्र आना तो मुहब्बतमें, बहुत मुश्किल है ।
मौत भी तो नहीं इसको, वह काफिर दिल है ॥
प्रेममें धीरज आना तो बहुत कठिन है । इस काफिर दिलको
आलमेबाला=स्वर्ग । बेकसी=मजबूरी । सदमये=तकलीफ । हिज्राँ=विशोग । काश=खुदा करे । अहबाव=मित्र ।
( २५१ )
मौत भी नहीं आती ! यह प्रेमकी आगमें तप कर ऐसा कटोर हो जाता है कि, मौत भी इसे शान्ति नहीं दे सकती । बेचारे धैर्यकी तो बात ही क्या ?
कौन गमख्वार इलाही शबेगम होता है ।
अब तो पहलूमें मेरे दर्द भी कम होता है ॥
दुःखकी रातमें कोई किसीका साथी नहीं होता । मुझे आज अत्यन्त दुःख है । शायद, इसीलिये, हज़रते दर्द भी मेरे दिलसे आज खिसक गये हैं । उनके होनेसे तथियत वहलती रहती थी । ( शायराना नाज़ुक खयाली का अन्त हो गया ) ।
अमीर महोदय कहते हैं—
पुतलियाँ तक भी तो फिर जाती हैं, देखो दम निज़ा !
वक्त पड़ता है, तो सब आँख चुरा जाते हैं ॥
जब चुरा समय आता है, तब पुतलियाँ तक फिर जाती हैं । अपने-बेगाने सब आँख चुरा जाते हैं : कोई काम नहीं आता ।
कोई और कवि कहता है :—
होता नहीं है, कोई चुरे वक्तमें शरीक ।
पत्ते भी भागते हैं, खिज़ौमें शजरसे दूर ॥
गमख्वार=गम खानेवाला दोस्त । शब=रात । शबेगम=रंजकी रात । खिज़ौ=पतकड़ । शजर=वृक्ष ।
( २५२ )
बुरे समयमें कोई साथी नहीं होता ; पतझड़में पत्ते भी वृक्ष को छोड़ भागते हैं ।
वियोगी कहता है, कि मेरा यार मेरे पास नहीं । उसकी जुदाईकी मुसीबतका पहाड़ मुझ पर फट पड़ा है । ऐसे वक्तमें मौत आकर मेरे दुःखोंका अन्त कर दे तो भला हो ; पर हाय ! वह भी ऐसे कठिन समयमें, बुलानसे भी, नहीं आती !
एक विरही कहता है :—
मैं जाग रहा हूँ हिज्रकी शब ।
पर मेरे नसीब सो रहे हैं ॥
इस वियोगकी रातमें मैं जाग रहा हूँ, पर मेरे नसीब सो रहे हैं ; यानी मेरा यार मेरे पास नहीं आता ।
हिज्रकी यह रात, कैसी रात है !
एक मैं हूँ या खुदा की जात है ॥
वियोग—जुदाई की यह रात कैसी रात है कि, एक मैं हूँ या मेरा खुदा है ; दूसरा कोई नहीं ।
तारे ही गिनके काटते, रात फिराककी मगरे ।
निकला सितारह भी कहीं, कोई तो खाल-खालसा ॥
वियोगकी रातको हम तारे गिन-गिन कर ही काट देते, पर
हिज्र—वियाग । खाल-खालसा—दूरी पर—बहुत कम ।
( २५३ )
हमारा दुर्भाग्य तो देखिये कि, उस रातको तारे भी निकले तो बहुत ही कम निकले।
आशुक्को ज़रा सी जुदाई भी कैसी अखरती है, उसका भी नमूना देखिये :—
शबे वस्ल खिली चाँदनी।
वह धवराके बोले सहर हो गई ॥
मिलनकी रातको चाँदनी ऐसी खिली कि, दिन सा मालूम होने लगा। वह धवरा कर बोले—“हाय ! सवेरा हो गया, अब जुदाई के सदमे उठाने होंगे।
दी मुञ्ज्जनने शबे-वस्ल अजैँ पिछली रात।
हाय कम्बलतको किस वक्त खुदा याद आया ॥
मिलनेकी रातको, तड़का होनेसे कुछ पहले, मुल्लाने अजैँ दी, तो वह धवराके बोले—“हाय ! कम्बलतको किस वक्त खुदा याद आया। अब हम अलग-अलग हो जायँगे !”
किसी विरहीसे किसीने उसकी मिज़ाज-पुसों की—कुशल-प्रश्न किया ; तो आप कहने लगे :—
न प्रूछो कि दिल शाद है या हर्जी है।
ख़वर भी नहीं कि है या नहीं है ॥
शबेवस्ल—मुलाक़ान की रात। सहर—सवेरा। मुञ्ज्जन = मुल्ला जो मसजिदमें चार बड़ी रात रहे अज़ाँ देता है। उस समय दीनदार मुसलमान
( २५४ )
क्या पूछते हो हमारा दिल खुश है या नाखुश ? हमें तो यह भी खबर नहीं कि, वह है भी या नहीं।
बिरहकी रातका वर्णन उस्ताद जौफ़ने खूब किया है। उसका ज़रासा नमूना हम देते हैं ; जिन्हें सबका आनन्द लेना हो, वे हरिदास एण्ड कंपनी, कलकत्ता, से "उस्ताद जौफ़" मँगा देखें।
कहूँ क्या जौफ़ बहवाले शबे हिज्र।
कि थी एक-एक वडी सौ-सौ महीने ॥१॥
कहा जी ने मुझे यह हिज्र की रात।
यकी है सुबह तक देगी न जीने ॥२॥
दे जौफ़ ! बियोग-जुदाईकी रातका हाल क्या कहूँ ? एक-एक वडी सौ-सौ महीने सौ मालूम होती थी।
दिलने कहा कि, यह बियोग की रात है। निश्चय है, कि यह सबेरे तक ज़िन्दा न रहने देगी।
महाकवि नज़ीर की शायरीकी बानगी भी देख लीजिये—
किया जो यारने हमसे पयाम रखसतका।
तो दम निकल गया सुनते ही नाम रखसतका ॥
यारने जो हमसे विदाई की बात छेड़ी, तो विदाईका नाम सुनते ही हमारा दम निकल गया।
हाथ मुँह धोकर मसजिदमें जा नमाज़ पढ़ते हैं। अर्ज़ा—र्गा। ब्राद—खुश। इर्ज़ा—रुज्जीदा।
शबे हिज्र—बियोग की रात। पयाम—पैगाम। रखसत—विदाई, बुहो।
( २५५ )
अब जरा विरही की कमजोरीके नमूने भी मुलाहिजा फ़र- माइये :—
मुफ़्त जुल्फ़के मारेको ज़ज़ीर मत पिन्हाओ ।
काफ़ी है मेरी क़ैदको एक मकड़ीका जाला ।
मुफ़्त जुल्फ़के मारे को ज़ज़ीर मत पहनाओ । मेरे बदनमें जरा भी दम नहीं । मैं जुदाईके कष्ट उठाते-उठाते एकदम दुर्बल हो गया हूँ । मेरे क़ैद करनेके लिये एक मकड़ीका जाला ही काफ़ी है ।
और भी :—
ये नातवाँ कि आया जो यार मिलनेको ।
तो सूरत उसकी, उठाकर पलक न देख सका ।
यार की जुदाईमें ऐसा कमज़ोर हो गया हूँ कि, जब यार मुफ़्त से मिलनेकी आया, तो मैं पलक उठाकर उसकी सूरत तक न देख सका ।
कहिये पाठक ! अब तो आप न देख लिया कि, प्यारीकी जुदाईमें वियोगी पुरुषोंकी क्या दुर्दशा होती है । जब तक स्त्रियाँ सामने रहती हैं, तभी तक सामने स्वर्ग दीखता है ; उनके नज़रोंकी ओट होते ही प्राण निकलने लगते हैं—मृत्यु- कालसे भी अधिक वेदना होती है ।
कुलुक—लट ।
सुवना—यदि ऐसी-ऐसी शेरों और गज़लोंका आनन्द लूटना चाहते हैं ; तो श्रीमाल पण्डित ज्वालादेवजी शर्मा कृत “उस्ताद ज़ौक”, “महाकवि
( २५६ )
दोहा ।
जौलों सन्मुख नयनके, श्रबला श्रमृत-रूप ।
दूर भये ते सहज ही, होय यही विष-कूप ॥७४॥
सार—स्त्री सामने हो तो श्रमृत है, पर दूर हो तो विष है ।
74. A woman is like nectar so long as she is in front of the eyes. She becomes more painful than poison when removed from before the eyes.
दाग" और "महाकवि गालिब" हरिदास पगड कम्पनी, कलकत्ते से मांगावे । पयित्तजी उर्दू-कवियों पर आशोचनात्मक लेख मिलनेमें सिद्धहस्त हैं । हमने ये कविताएँ आपही की पुस्तकोंसे उद्धृत की हैं । बाबू रघुराज सिंह जी-५० के लिये महाकवि नज़ीर से भी हमने कुछ शेर ली हैं । उर्दू कवि-वचन-मालाके ये चारों दाने प्रत्येक हिन्दी जाननेवालेके देखनेकी चीज़ हैं । इन कवियोंकी एक-एक कविता ब्राह्मों रुपयेमें भी सस्ती है । लेखक महा- शयोने उर्दू न जानने वालोंके उभौतेके लिये, प्रत्येक कविताका हिन्दी अनु- वाद भी साथ-साथ कर दिया है । इन पुस्तकोंकी पबलिक ने अच्छी कदमी है । जिन हिन्दी-प्रसियोंने ये पुस्तके नहीं देखी हैं, वे इनके लिये ३१) मूल्य और ॥१॥ पोर्टेज—कुल ४ ) का लोभ न करें । ये सब आवेहयात या सुधारस का आनन्द देने वाली पुस्तके हैं । वहमी सज्जन वहममें गोते न लगावे, सूचनाको भूटी न समझें, इसीसे नीति, वैराग्य और श्रद्धा—इन तीनों शतकोंमें ही हमने मौके-मौकैसे इनके अधिक नमूने दिये हैं । जिन्होंने किसी मित्रके पास "नीतिपातक" और "वैराग्यपातक" देखे, उन्होंने जी जानसे मुग्ध होकर ये दोनों शतक तो माँगाये ही ; पर साथ ही "दाग" "गालिब" "ज़ौक" और "नज़ीर" भी माँगाये बिना न रहे ।
( २५७ )
नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।
मैवामृतलता रक्ता विरक्ता विषवल्ली ॥७५॥
मुन्दरी नितम्बिनीका छोड़कर न और अमृत है न विष । स्त्री अगर अपने प्यारको चाहे तो अमृतलता है और जब वह उसे न चाहे, तो निश्चय ही विषकी मन्जरी है ॥७५॥
खुलासा—इस जगत्में स्त्री ही अमृत है और स्त्री ही विष है । जब वह अपने आशिकको चाहती है, तब तो अमृत सी दीखती है और वही जब अपने आशिक से नाराज़ हो, उसे नहीं चाहती, तब विष हो जाती है । इस बातको पुरुषमात्र आसानी से समझ सकते हैं । स्त्री जब अपने प्यारको प्यार करती है, तब उसका प्यारा उसपर जी-जान निछावर करता है ; उसके इशारेपर कठपुतलीकी तरह नाचता है ; पर ज्योंही वह अपने चञ्चल स्वभाव-अनुसार उसे छोड़ दूसरेको चाहने लगती है ; त्योंही उसका वही प्यारा, उसे विषसी समझ कर, उसके प्राण-नाश पर भी उतारू हो जाता और अपनी भी जान दे देता है ।
“पञ्चतन्त्र”में भी लिखा है :—
• नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।
यस्याः संगेन जीव्येत द्वियेत च वियेगगतः ॥
स्त्रीके सिवा अमृत और विष दूसरी कोई चीज़ नहीं है ;
१७
( २५८ )
क्योंकि उसके सङ्गसे प्राणी जीता और उसके वियोगसे मरता है।
“भामिनी-विलास”में भी लिखा है :—
श्यामं सितं च सुदृशो न दृशोः स्वरूपं
किं तु स्फुटं गरलमेतदधामृतं च ॥
नो चेतकथं निपतनादनयोस्तदैव
मोहं मुदं च नितरां दधते युवानः ॥
सुलोचना स्त्रीकी आँखोंमें जो श्यामता और शुभ्रता—कलाई और सफेदी दीखती है, वह कलाई और सफेदी नहीं है ; किन्तु विष और अमृत है। यदि यह बात न होती, तो युवा पुरुष उसकी नज़र-से-नज़र मिलते ही मोहित और आनन्दित न होते।
स्त्रीकी आँखोंमें जो श्यामता या कलाई है, वह विष है और जो शुभ्रता या सफेदी है, वह अमृत है। जिसे वह खूब होकर अमृत की नज़रसे देखती है, उसे परम आनन्द होता है और जिसे वह नाराज़ होकर विषकी नज़रसे देखती है, उसे मोह या दुःख होता है। क्या खूब कहा है ! वाह ! पण्डितराज वाह !
दाहा ।
नहीं विष नहीं अमृत कहूँ, एक तिया तू जान ।
मिलवे में अमृत-नदी, विछुरे विषकी खान ॥७५॥
( २५६ )
सांर—स्त्रीही अमृत और स्त्री हो विष है । जब वह चाहे तब तो अमृत है और जब न चाहे तब विष है ।
75. There is no better nectar than a woman and no worse poison than a woman also. If she is loving, she is a creeper of nectar, but if she forsakes, she is verily a creeper of poison.
—*—
आवर्तः संशयानामविनयभवनं पतनं साहसानाम् ।
दोषाणां सन्निधानं कपटशतमयं क्षेत्रमग्रत्वयानाम् ॥
स्वर्गद्वारस्य विघ्नो नरकपुरमुखं सर्वभायाकरगडम् ।
स्त्रीयन्वं केन सृष्टं विषममृतमयं प्राणिनां मोहपाशः ॥७६॥
सन्देहोंका भँवर, अविनयका घर, साहसोंका नगर, पाप- दोषोंका खजाना, सैकड़ों तरहके कपट और अविश्ववासका क्षेत्र, स्वर्ग-द्वारका विघ्न, नरक-नगरका द्वार, सारी मायाओंका पिठारा, अमृतके रूपमें विष और पुरुषोंको मोह-जालमें फँसाने वाला स्त्री- यन्त्र न जाने किसने बनाया ?
सुन्दरी स्त्रियाँ ऊपरसे गोरी पर भीतरसे काली होती हैं । इनका शरीर फूलकी तरह कोमल और कमनीय होता है, पर इनका हृदय वज्रवत् कठोर होता है । ये दान, मान, सेवा, अस्त्र और शस्त्र किसीसे भी वशमें नहीं होतीं । न कोई इनको
( २६० )
प्यारा है और न कोई कुप्यारा । इनका स्वभाव है कि, ये नये-नये पुरुषोंकी अभिलाषा किया करती हैं । लज्जा, नीति, चतुराई और भयके कारणसे ये सती नहीं बनी रहतीं, केवल चाहने वाला न मिलने या मौका हाथ न आनेसे ही ये सती बनी रहती हैं । असत्य, साहस, माया, मत्सरता और लोभ,—इनमें स्वभावसे ही होते हैं । पुरुषोंसे इनमें दूनी श्रुधा, चोगुनी शर्म, छेगुनी हिम्मत या बुद्धि होती है और कामदेव तो अठ गुना होता है । जब ये अपनी बराबर बालियोंके साथ एकान्तमें बैठती हैं, तब कहा करती हैं :—“अहो, वेश्याए बड़ा आनन्द करती हैं ; वे स्वतन्त्रता-पूर्वक नये-नये पुरुषोंको भोगतीं और इच्छानुसार उनका धन खर्च करती हैं ।” अथवा कोई-कोई कहती हैं :—“मेरा मर्द तो पशु है । भोग-विलासकी बातें तो जानता ही नहीं । संभा होते ही भैंसकी तरह पड़ जाता है । मैंने इसका हाथ पकड़ कर कुछ भी सुख न पाया । देख ! फलानीका पति कैसा छेल छबीला नटनागर है इत्यादि ।” जो पुरुष इनकी खूब श्रुधामद करता है, इनकी फरमायशोंको ज्वान से निकलते ही पूरी करता है—साथ ही रूपवान, विद्वान, धनवान और गुणवान होता है, उसे छोड़ कर ये महा धूर्ता नीच और अधमके साथ चली जाती हैं । कोई पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं :—“A woman in love is very poor judge of character.” ली जिसे चाहती है या जिससे आशनाई करती है, उसके चरित्र की परख नहीं करती । कहा है—
( २६१ )
गुणाश्रयं कीर्तयितुं च कान्तं, पतिरतिष्ठि सधने युवानम् ।
विहाय शीघ्रं वनिता ब्रजन्ति, नरान्तरं शीलगुणादिहीनम् ॥
गुणाधार, कीर्तिमान्, सुन्दर, रतिक्रीड़ा-कुशल, धनवान् और जवान पुरुष को भी त्यागकर स्त्रियाँ नीच, निर्गुण और कुरूपके साथ चली जाती हैं ।
दुष्टा स्त्रियाँ मिथ्या विलास-चिह्न दिखाकर अपने पतिको पागल रखती हैं और उससे पैर तक दबवाती हैं । एकको नेत्र-विकारोंसे रिभाती हैं ; दूसरेके साथ बचन-विलास करती हैं, तीसरेको चेष्टाओंसे प्रसन्न करती हैं और चौथेको मोहमें फँसाती हैं । स्त्रियाँ बहुलपिणी हैं । जब यह कामवती होती है और पर-पुरुषसे मिलती है, तब ऐसे-ऐसे छलबल और कौशल करती है, कि चतुर-से-चतुर पुरुषकी भी अकूल काम नहीं करती । उस समय, ज़रूरत होनेसे, ये अपने पति-पुत्र और पिता-माता तक की हत्या कर सकती* हैं । खीके मनमें क्या है, वह कब क्या करेंगी,
ॐ संसारमें ऐसा कौनसा नीचे-से-नीचा काम है, जो इस प्रेमके कारब नहीं करना पड़ता ? प्रेम-पत्न्य के पथिकों को ज्ञात-पति तो क्या बीज़ है, अपने प्यारे माता-पिता, बहन-भाई और अपनी झीलाइं तकसे मुँह मोड़ना और माता तोड़ना पड़ता है । अभी हाल ही में सुना है कि, हमारे एक परिचितकी बेवा बहन अपने प्यारे, ब्यांखीके तारे, पासे-पनासे दो पुत्र-खलोंको छोड़, एक यवनके साथ भाग गई । किसीने ठीक ही कहा है :—
Cruel love ! what is there to which thou dost not drive mortal
( ३६२ )
इन बातोंका जानना बड़ा कठिन है। लोकमें कहावत भी मशहूर है—“त्रिया चरित्र जाने नहीं कोई, खसम मार कर सती होई।” शास्त्रोंमें भी कहा है—
रूपस्य चित्तं कृपणस्य चित्तं, मनोरथं दुर्जनमानवानाम् ।
स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥
राजाके चित्त, स्रमके धन, दुर्जनके मनोरथ, स्त्रीके चरित्र और पुरुषके भाग्य की बात, देवता भी नहीं जानते, मनुष्य बेचारा कौन चीज़ है ?
ल्लियोके संशयोंका भँवर, साहसोंका नगर और नाना प्रकार की माया और अविश्वासका पिटारा होनेमें ज़रा भी सन्देह नहीं। जो इनका विश्वास करते हैं, वे बुरी तरह मारे जाते हैं। इसलिये बहुत पुरुषोंको ल्लियोका विश्वास भूल कर भी न करना चाहिये। इनसे सदा सावधान और सतर्क रहना चाहिये। जितनी विद्या
hearts.” ऐ निदयी प्रेम ! संसारमें ऐसा क्या है, जिसे करने पर तु मनुष्यों को विषय नहीं करता ?
† धेकरने कहा है :—“I think women have an instinct of dissimulation ; they know by nature how to disguise their emotions far better the most than the most consummate male courtiers can do. मेरे बिचार में, स्त्रियों में कपटाचार स्वाभाविक होता है। नितान्त काव्य-कुशल राज-सभासदोंको अपेक्षा भी वे अपने भावोंको अधिक उत्तमताने छिपा सकती हैं। स्त्रियाँ अपनी बातको जितनी श्रद्धा सह छिपा सकती हैं, और कोई नहीं छिपा सकता।
( २६३ )
शुक्र और बृहस्पतिमें है, उतनी तो इनमें सम्भावसे ही होती है॥
शास्त्रकारोंने कहा है :—
नदीनांच नखीनांच, शृंगिणां शत्रुपाणिनाम् ।
विश्ववासो नेव कर्तव्यः, व्रीणु राजकुलेषु च ॥
नदीका, नाखु नवाले जानवरोंका, सींग वाले पशुओंका, हथियार बाँधनेवालों का, स्त्री का और राजा का विश्वास कभी न करना चाहिये ।
“श्री शङ्कराचार्यजी ने अपनी” “प्रश्नोत्तर मालामें” भी कहा है—विश्वासपात्र न किमस्ति ? नारी । अर्थात् कौन विश्वासयोग्य नहीं है ? स्त्री । इतने सब औगुणोंके सिवा; यह पुरुषकी मोक्ष-प्रतिमें भी वाध्यास्वरूप है । इसकी तिरछी नज़रके तले पड़नेसे ही पुरुष इसका दास हो जाता है और ऐसा दास हो जाता है कि, फिर पीछा नहीं छूटता । जवानीमें तो इसे छोड़नेका आप ही जी नहीं चाहता । जब कुछ बिरक्ति होने लगती है, तब इसकी ओलाहमें मन फँस जाता है । ज्ञानका उदय होने पर भी, पुरुष विचारने लगता है, अगर मैं स्त्री-बालकोंको छोड़ कर वनमें
† लेखिन्न महोदय कहते हैं :—“There are certain things in which a woman's vision is sharper than a hundred eyes of the males.” कुछ ऐसी भी बातें हैं, जिनमें स्त्री की नज़र पुरुषोंकी सौ आँखोंसे तेज़ होती है ।