शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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और दुष्टोंका सा काम करने वाला है ; पर ध्यान रहे कि, वही कटाक्ष जितेन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं रखता। वह उनका कुछ भी नहीं कर सकता। न वह उनकी चित्तकी एकाग्रतामें खल-बली डाल सकता है और न उनकी समाधि ही भंग कर सकता है।
दोहा ।
तिय-कटाक्ष खल-सरिस है, करत समाधिहि भंग ।
श्राकृत जन संसर्ग रत, शठ-इव कुटिल भुजंग ॥६७॥
सार—खलोंके समान आचरण करनेवाले स्त्रियोंके कटाक्षका जोर केवल कामियों पर ही चलता है; जितेन्द्रियोंका वह कुछ भी नहीं कर सकता।
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मतेभकुम्भपरिणहिनि कुंकुमाई
कान्तापयोधरतटे रसखेदखिलः ।
वन्नोनिधाय भुजप जरमव्यवर्ती
धन्यः ज्पां ज्ञपयति ज्गलव्यनिद्रः ॥६८॥
जो पुरुष मैथुनके श्रमसे थककर, मतवाले हाथीके कुम्भोंके समान वित्तीर्थ और केशद्रसे भोंगे हुए स्त्रीके स्तनों पर अपनी छाती
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रखकर, उसके सुजा रूपी पञ्जरके बीचमें पड़ा हुआ, एक क्षण भी सोकर रात बिताता है, वह धन्य है ॥६॥
खुलासा—मैथुनके बाद पुरुष का बल क्षीण हो जाता है, मिनट दो मिनटके लिये उसमें उठनेको भी सामर्थ्य नहीं रहती ; तब वह खा को छातियों पर अपनी छाती रखे हुए, उसके दोनों हाथोंके बीचमें पड़ा हुआ, शान्ति की नींद-सी लेता या अपनी थकान दूर करता है । कवि महोदय कहते हैं, कि जो पुरुष क्षणभरके लिये भी, यह आनन्द उपभोग करता है वह भाग्यवान् है—उसने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं ।
छप्पय ।
कुंकुम-कंदम-युक्त, मत्तगज कुम्भ बने मनु । कान्ता कुचतट माहिं सने, रस-खेद खिन्न जनु । तेहि भुज-पंजर मध्य, रहैं सुख सों लिपटाने । क्षण इक निद्रा लहै, क्षण बीतत नहि जानें । इमि निज वक्षस्थल ताहि सों, जोरि रहे जे शुभग नर । हैं तेई यहि संसारमें, धन्यवाद के योग्य वर ॥६॥
—*—
सुधाभयोऽपि क्षयरोगशान्त्यै नासाध्रमुक्ताफलकच्छलेन । अरंगसञ्जीवनदृष्टिशक्तिमुखाभूतं ते प्रिवतीव चन्द्रः ॥६६॥
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हे प्यारी ! यह चंद्रमा अमृतमय, अतएव काम चेतन्य करने वाला होनेपर भी, अपने द्वाय रोगकी शान्तिके लिये, नाकके अगले हिस्सेमें लटकते हुए मोतीके मिससे, तेरे अधरामृतको पी रहा है ॥६६
कवि महोदय स्त्री को नाकके अग्रभागमें लटकते हुए मोती को पूर्ण चन्द्रमा मान कर कहते हैं, कि हे सुन्दरि ! यद्यपि चन्द्रमा स्वयं अमृतमय है और वह पुरुषोंके हृदयोंमें कामोद्दीपन करने की शक्ति और सामर्थ्य रखता है ; तथापि वह, अपने राज-रोग या क्षयके आराम करनेके लिये, बड़ेसे मोतीका रूप धरके, तेरी नाककी बुलाक या नथमें लटका हुआ, तेरे हाथोंके अमृत को पान कर रहा है । रसिक कवि कहते हैं :—
दोहा ।
प्रिये ! सुधाकर रोग निज, क्षयी-निवृत्ति-उपाय । चन्द पिवत मधु अधरको, नथ-मोती-मिस आय ॥
दोहा ।
मनसिज-नर्दक अमृतमय, क्षयी-हरण शशि जान । नाशा-मोती मिस किये, करे अधरामृत पान ॥६६॥
सार—स्त्रीका अधरामृत सुधाकरके अमृत से भी अच्छा है ।
99. O lady ! although the moon is full of nectar and the sight of moon gives rise to sexual desires yet he is unable to cure his
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own disease of phtisis and in order to cure himself of that disease, the moon has, as it were, transformed himself into a pearl pendant of your nose and is constantly tasting the nectar of your lips.
—*—
दिश वनहरिणीभ्यो वंशकाण्डच्छवीनां
कवलमुपलकौटिच्छिन्नमूलं कुशानाम् ।
शुकयुवतिकपोलोपाण्डुतांबूलवल्ली-
यलमरुणनखायैः पाटितं वा वधूभ्यः ॥१००॥
हे पुरुषो ! या तो तुम वन-मृगियोंके लिये बाँसके दण्डेको समान छविवाली, पत्थरकी नोकसे कटी हुई मूलवाली, कुश नामक वासके प्राप्त दो अथवा सुन्दरी बहुओं के लिये लाल-लाल नाखुनोंसे तोड़े हुए सूई—तोतीके कपोलके समान, जरा-जरा पीले रंगके पान दो ॥१००॥
खुलासा—मनुष्यो ! दो में से एक काम करो :—(१) या तो घर-गृहस्थोंको मोह-ममता तोड़, बनमें जा, ईश्वराराधनमें मन लगाओ और पत्थरकी नोकसे कुश-वासकी जड़े काट-काट कर जड़ूली हिरनियोंको खुगाओ, अथवा घरमें रह कर सुन्दरी नवयुवतियोंको पके हुए पौले-पीले पानोंके बीड़े दो ।
दोहा ।
वन-मृगिनके देन को, हरे-हरे तृण लेहु ।
अथवा पीरे पान को, बीरा बूध्वन देहु ॥१००॥
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सार—दो में से एक काम करो :—(१) या तो बनमें जा ईश्वर-भजन करो, अथवा (२) घरमें रह नव-बधुओंको भोगो ।
100. O people, you are either to feed the wild deer with Kush grass cut by the sharp edges of stone resembling bamboo sticks or to offer betel of slight yellow color torn by red nails to beautiful wives.
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यदासीद्धानं स्मरतिभिरसंचारजनितां तदा सर्वं नारीभयमिदमशेषं जगदभूत् । इदानीमस्माकं पठुरविवेकाञ्जनदृशां समीभूता दृष्टिस्त्रिभुवनमपि ब्रह्म मनुते ॥१०१॥
जब तक मुझमें कामका अज्ञान-अन्धकार था, तब तक मुझे सारा संसार क्षीण्य दीखता था ; लेकिन अब मैंने आँखोंमें विवेक-अञ्जन लगाया है, इसलिये मेरी समदृष्टि हो गई है, मुझे त्रिलोकी ब्रह्मय दीखती है ॥१०१॥
खुलासा—जब तक मेरे ऊपर कामदेवका प्रभाव था, जब तक मेरे हृदयमें अज्ञानका अंधेरा था, जब तक मुझे सत्-असत् का ज्ञान नहीं था, जब तक मुझे स्त्रियों की असलियत मालूम नहीं थी, जब तक मुझे स्त्रियों की मुहब्बत सच्ची मालूम होती थी, तब तक मुझे सारे जगत्में स्त्रियाँ-ही-स्त्रियाँ दीखती थीं,
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मेरा मन हर समय उन्हींमें लगा रहता था और उनके साथ रमण करना ही मुझे अच्छा लगता था। मैं समझता था, कि इस जगत्में जन्म लेकर कामिनियोंको भोगना ही—पुरुष का परम कर्तव्य है। इसीसे उन दिनों स्त्रियोंके सिवा मुझे और किसी भी काममें आनन्द नहीं आता था ; लेकिन ज्योंही मैंने आँखोंमें विवेक-विचारका अज्ञान आँजा, मेरी आँखोंका अंधेरा दूर हो गया, मेरा अज्ञान नाश हो गया, मुझे सत्-असत् का ज्ञान हो गया, मुझे मालूम हो गया कि जगत् सारहीन है, संसार असार और मिथ्या तथा नाशमान् है, स्त्रियोंका रूप-यौवन और उनकी प्रीति अतित्य एवं सदा रहनेवाली नहीं है, इस जगत्में कोई किसीका नहीं है, सभी एक दूसरेको थोड़ा देकर अपना-अपना मतलब साध रहे हैं, सभी स्वार्थकी जड़ियोंमें बँधे हुए हैं, स्वार्थ बिना कोई किसीसे बात भी नहीं करता ; जिस में स्त्रियोंकी प्रीति तो बिल्कुल ही भूटी है। वे किसी काल और किसी दशामें भी विश्वास-योग्य नहीं। एकमात्र ब्रह्म—अपना आत्मा—ही सच्चा है। उसी की चिन्तामें कल्याण है। उस ब्रह्मके सुखके सामने त्रिलोकी के सभी सुख-भोग तुच्छ हैं। सब जगत्में, जगत्के प्राणिमात्रमें, एक पूर्ण ब्रह्म व्यापक है। इस ज्ञानके कारणसे, अब मुझे न कहीं स्त्री दीखती है, न पुरुष, न और ही कुछ ; सर्वत्र एक ब्रह्म ही दीखता है। अतः अब मैं उसी के ध्यानमें लौलीन रहता हूँ ; क्योंकि वेरायकी अग्निने संसारी भोग-विषयोंके खयालात जड़ले ही भस्म कर दिये हैं।
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101. So long as I was laboring under ignorance due to the darkness caused by Cupid, I could see nothing but woman in this whole world. Now, by applying the collyrium of better reasoning, my eye-sight has become normal and I find Brahma pervading the three worlds,
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वैराग्ये सञ्चरत्येको; नीतौ भूपति चापरः ।
शृंगारे रमते कश्चिद् भुवि भेदः परस्परम् ॥१०२॥
कोई वैराग्यको पसन्द करता है, कोई नीतिमें मस्त रहता है और कोई शृंगारमें मग्न रहता है । इस भूतल पर, मनुष्योंमें परस्पर इच्छाओंका भेदाभेद है ॥१०२॥
इस दुनियामें सबकी रुचि एक नहीं । किसीको एक चीज अच्छी लगती है, तो दूसरे को दूसरी और तीसरे को तीसरी । सबके मन और रुचि एक नहीं ; किसीको यह संसार बुरा लगता है ; अतः वह इसे मिथ्या और असार समझ, सबको त्याग, परम परमात्माको भजता है । किसी को नीतिशास्त्रों का अध्ययन ही अच्छा लगता है ; अतः वह रात-दिन नीति-ग्रन्थों का ही कीड़ा बना रहता है । किसीको न वैराग्य पसन्द है और न नीति ; उसे एकमात्र विषयोंका भोगना ही अच्छा लगता है ; अत वह इन्हींमें आनन्द समझता है, दिन-रात विषय-सुखों में ही मतवाला रहता है, स्त्रियोंको ही अपनी आराध्य देवी समझता है और उनकी तारीफोंसे भरे हुए शृङ्गार रसके ग्रन्थ देखनेमें ही लगा रहता है । सबकी रुचि भिन्न-भिन्न है, इसीसे भर्तृहरि महाराजने “वैराग्य शतक” “शृङ्गार शतक” और
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“नीतिशतक”—तीन शतक, तीनों प्रकारके लोगों' के लिये, लिखे हैं। जिसका दिल वैराग्यमें हो, वह “वैराग्य शतक” पढ़े; जिसे नीतिसे प्रेम हो, वह “नीति शतक” पढ़े और जिसे श्रद्धा से प्रेम हो, वह “श्रद्धा शतक” पढ़े।
दोहा।
काहूके वैराग्य-रुचि, काहूके रुचि नीति।
काहूके शृंगार रुचि, जुदी-जुदी परतीति ॥१०२॥
102. Some one feels pleasure in renunciation, some study morality and some take delight in love. So there is diversity of desires in this world.
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यद्यस्य नास्ति रुचिरं तस्मिंस्तस्याप्रहा मनोवेऽपि।
रमणीयेऽपि सुधांशौ न मनः कामः सोरजिन्याः ॥१०३॥
जिस चीज़में जिसकी रुचि नहीं होती, वह चाहे जैसी सुन्दर क्यों न हो, उसे वह अच्छी नहीं लगती। चन्द्रमा सुन्दर है, पर कमलिनी उसे नहीं चाहती ॥१०३॥
दोहा।
जो जाके मन भावतौ, ताको तासों काम।
कमल न चाहत चाँदनी, विकसत परसत घाम ॥१०३॥
103. A man has no inclination for the thing which he does not like, though it may be a very good one. The moon is beautiful yet she is not liked by the lotus.
समाप्त।
शुद्धिपत्रक
संसार में सबकी कवि पकसी नहीं होती । किसी को शुद्धि पसन्द है, कामितियों का स्वर्गाय आतन्त्र लुटना पसन्द है; किसी को सिद्धी विष से भी घुरी लगती है, उन्हें वैराग्य पसन्द है और किसी को नीति का अध्ययन पसन्द है । इसी से महाराज भक्तहरि ने तीन तरह के मनुष्यों के लिये शुद्धि, वैराग्य और नीति पर तीन शतक लिखे ।
(पृ० २०)
Popular Press—Calcutta.
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मनुष्य भावके पास रहने योग्य
तीन अनमोल ग्रन्थरत्न ।
१ स्वास्थयरक्षा ।
भारतमें ऐसे हिन्दी-पढ़े-लिखे मनुष्य बहुत कम होंगे, जोंने बाबू हरिदास वैद्य-लिखित “स्वास्थयरक्षा” की कम-से-तारीफ़ न सुनी हो । आज तक इस ग्रन्थके पाँच-पाँच और तीन हजारके आठ संस्करण हो चुके । राजा-महाराजा, सेठ-कार, जज-वकील, प्रोफेसर-माधुर और विद्यार्थी, स्त्री और ल, बालक, जवान और बूढ़े, अमीर-उमरा और गरीब किसान के यहाँ यह अमूल्य ग्रन्थ जा पहुँचा है । देशका इस ग्रन्थने ना उपकार किया है, कितने जीवोंकी प्राणरक्षा की है, जने नौजवान उठती उमरके पढ़ोंको इसने कुराहसे हटाकर ह पर लगाया है, इसको हम अपनी क़लमसे लिखना अच्छा समझते । आप जिस हिन्दी-पढ़े-लिखेसे पूछियेगा, वही गा कि, “स्वास्थयरक्षा” वास्तवमें “स्वास्थयरक्षा” ही है । उसका नाम है, वैसे ही उसमें गुण हैं । अगर आप सदा निरोग रहना चाहते हैं, अगर आप पूर्ण भोगते हुए सुखसे जिन्दगीका बेड़ा पार करना चाहते हैं,
४ हरिदास एण्ड कंपनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
मछली एक साथ खाना ) से उन्माद रोग हो जाता है। अत्यन्त शोका-चिन्ता, क्रोध और मोह लोभसे मनुष्य की स्मरण-शक्ति नाश होकर भयंकर मृगो रोग हो जाता है। अत्यन्त स्त्री-प्रसंग करनेसे, बहुत जागनेसे, बहुत ही व्रत-उपवास करनेसे, मल-मूत्रके वेग रोकनेसे और बहुत ज़ियादा मिहनत करनेसे वायु कुपित हो जाता है, जिससे भयंकर वात रोग उत्पन्न हो जाते हैं, वह इन मिथ्या आहार विहारोंसे कैसे बच सकता है ?
ज़ियादा नमकीन और गरम पदार्थ खानेसे, पत्तोंका साग खानेसे, नियम-विरुद्ध और अत्यधिक दही खानेसे, अजीर्णमें भोजन करनेसे, दिनमें सोनेसे ; उड़दकी दाल, माटा और बैंगन-वगैरह : ज़ियादा खानेसे “वातरक्त” रोग हो जाता है, खून दूषित होकर शरीर सड़ने लगता है। बहुत ज़ियादा मैथुन करनेसे, बहुत ही शीतल पानी पीनेसे, मिण्डो-नवारकी फलों वगैरह : सुखे साग खानेसे और बहुत ही हँसने-बोलने वगैरह : से भयंकर “शूल” रोग हो जाता है। जो इन बातोंको नहीं जानता, वह इन कामोंसे कैसे बच सकता है ? जो जानता है कि क्रूर में क्रूढ़नेसे मर जाऊँगा, वही क्रूर में न क्रूढ़ेगा। जो जानता है कि, साँपका फन पकड़नेसे साँप डस लेगा और मेरी मौत हो जायगी, वही साँप से दूर रहेगा ; अनजान तो उसे मामूली जानवर या खिलौना सम्भ्रम कर पकड़ेगा और मरेगा। इस लिये जो निरोग रहना चाहें—और परमायु भोगना चाहें, उन्हें रोग होनेके कारण अवश्य जानने चाहिये। कारण
हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ५
जाननेसे ही वे गलतियाँ नहीं करेंगे और रोगोंके पञ्चोंमें भी न फँसेंगे।
रोगोंसे बचने और आरोग्य रहनेके तरीके कैसे मालूम हों ?
रोगोंसे बचने, आरोग्य रहने, अकाल मृत्युसे छुटकारा पाने और पूरी आयु भोगनेके तरीके “आयुर्वेद” में लिखे हैं। आयुर्वेद पढ़नेसे ही हरेक आदमी उपरोक्त बातोंको जान सकता है ; पर हमारा आयुर्वेद संस्कृत भाषामें है। आज-कल सभी भारतवासों संस्कृत नहीं जानते, इसलिए वे आयुर्वेद पढ़ नहीं सकते। बम्बई प्रभृतिमें आयुर्वेदका हिन्दी अनुवाद भी छप गया है, पर वह ऐसा कठिन है, कि वह बिना किसी गुरुके पढ़ाये समझमें नहीं आता। अब जो लोग वैद्यके धन्धेके सिवा और धन्धे करते हैं, जिनकी उम्र अब विद्या-योग्य पढ़ने नहीं रही है, अथवा जिनके बिना कमाये गुहस्थीका पालन नहीं हो सकता, वे अब आयुर्वेद कैसे पढ़ सकते हैं और गुरुकी फीस कहाँसे दे सकते हैं ?
लाखों आदमी नौकरी-चाकरी या दूसरा धन्धा करते हुए भी आयुर्वेद पढ़ना चाहते हैं, पर हिन्दीमें—बोलचालकी सरल हिन्दीमें—आयुर्वेद न होनेसे, इच्छा रहने पर भी, मन मार कर रह जाते हैं। इसीलिए हमारी कम्पनीके मुख्य सञ्चालक वयोवृद्ध, पूर्ण अनुभवी वैद्य बाबू हरिदासजीने, लोकोपकारार्थ, पहले “स्वास्थ्यरक्षा” नामक ग्रन्थ लिखा था। वह भारतके हर हिन्दी
६ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।
भाषाभाषी मनुष्यको इतना पसन्द आया, कि उसके पाँच २ और छे-छे हजारों आठ संस्करण हो गये । हजारों लोगोंने उससे लाभ उठाया और जीवनका सुधार किया । लेकिन “स्वास्थ्यरक्षा” पूर्ण आयुर्वेद नहीं है । वह तो आयुर्वेदका एक छोटासा अंश है । इसलिए बाबू साहबने इस बुढ़ापेमें, सब सुखोंको तिला-अलि-देकर, अपने स्वास्थ्यका बलिदान करके, चार हजार सफोंका “चिकित्साचन्द्रोदय” नामक ग्रन्थ लिखा है और उसे सात भागोंमें तकुसीम किया है, ताकि लोगोंको उठा कर पढ़नेमें ग्रन्थ भारी न मालूम हो और खरीदनेमें भी भारी न जान पड़े ।
बाबू साहबको लिखी “स्वास्थ्यरक्षा” का जैसा आदर हुआ, वैसा ही बलिक उससे भी बढ़ कर आदर पबलिकने इस “चिकित्साचन्द्रोदय”का किया है । काश्मीरसे कन्या कुमारी और अटकसे कटक या सिन्धसे आसाम तक इसका प्रचार दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ रहा है । हरेक सेठ-साहूकार, मुनीम-गुमाश्वते, वकील-मुहरिरे, बैरिष्टर-जज, तहसीलदार-डिप्टी कलेक्टर, रेलबाबू-तारबाबू, हिन्दू और मुसलमान, जौनी और ईसाई, आर्यसमाजी और ब्राह्मसमाजी—सभी इसे खरीद-खरीद कर पढ़ने लगे हैं । यह बड़ी ही खुशीकी बात है, पर अभी हरेक हिन्दी भाषाभाषीको इस ग्रन्थको खबर नहीं—क्योंकि भारत बहुत बड़ा देश है—जब सभीको इस महाग्रन्थकी खबर हो जायगी, सभी इसे पढ़ने लगेगे, तब
हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ७
आजके भारतमें और उस समयके भारतमें बड़ा फ़र्क हो जायगा। उस समयके स्त्री-पुरुष प्राचीन कालके स्त्री-पुरुषों-की तरह हृष्ट-पुष्ट बलवान और दीर्घजीवी होने लगेगे और देशमें बहुत कम रोगी नज़र आवेगे। बहुत क्या—हम प्रत्येक हिन्दी भाषा जानने वालेसे जोरके साथ सिफ़ारिश करते हैं, कि वह हजार जगहसे रुपये बचाकर अथवा दूसरोंसे उधार लेकर भी इस ग्रन्थ-रत्नको खरीदे और नित्य-प्रति नियमसे घण्टे-दो घण्टे नित्य पढ़े।
दो वरसमें घर बैठे पूर्ण वैद्य।
इस ग्रन्थमें ४००० सफे हैं। मन्दसे-मन्दा हिन्दी पढ़नेवाला दो घण्टेमें पाँच सफे अच्छी तरह समझ-समझकर पढ़ और याद कर सकता है। इस हिसाबसे ५×३० = १५० सफे वह हर महीने ख़तम कर सकता है और एक वरसमें ५×३०×१२ = १८०० सफे ख़तम कर सकता है और २ सालमें ३६०० सफे शेष कर सकता है। ऐसा कौन आदमी है, जो नित्य दो घण्टे का समय न निकाल सके ? ज़ियादा-से-ज़ियादा काम करनेवाले को भी २४ घण्टेमें २ घण्टे बच सकते हैं। समय या अवकाश न मिलनेकी शिकायत मूर्ख ही किया करते हैं। अमेरिकाके वे धनकुवेर जिनकी आमदनी हर दिन १ लाखसे भी ज़ियादा है, जिनकी दुनियामें चार-चार और पाँच-पाँच सौ दूकाने हैं,
८ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
प्रत्येक दिन दो तीन घण्टे दुनियाके अखबार और ग्रन्थ देखते हैं। हमारे देशके लाख दो लाखकी सालाना आमदनी वाले जब कहते हैं—“अजी समय तो मिलता ही नहीं”—तब हमें हँसी आ जाती है? हमें उनकी मूर्खता और टाइमकी पाबन्दी न जानने पर दया भी आने लगती है।
आप उपन्यास पढ़ना त्यागिये, पूरन मलके ख्याल, ढोला-मारू, निहालदे और लण्डन रहस्य प्रभृतिको दूर फेंकिये। इनके पढ़नेसे कोई लाभ नहीं। इनके पढ़नेसे विषयवासना जागती और आयु क्षीण होती है। “चिकित्सा-चन्द्रोदय”का पाठ बिछा नागा दो घण्टे या एक ही घण्टे रोज करनेसे रोग दूर भागते और उग्र बढ़ती है। इतना ही नहीं—लोक-परलोक भी बनते हैं। बिना शरीरके नीरोग रहे, आप न तो धनही कमा सकते हैं, न ईश्वर-भजन ही कर सकते हैं और न कामिनीको ही भोग सकते हैं। इससे मालूम होता है कि,
“चिकित्साचन्द्रोदय”
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों ही पदार्थोंकी मूल है। जो लोग निर्धन हैं, १०) २०) २५ की नौकरी करके, जने-जनेकी गालियाँ सुनकर और ठोकरे खाकर जीवनको बर्बाद करते हैं, अथवा नौकरीके लिए मारे-मारे फिरते हैं, वे दो बरसमें इस ग्रन्थको पढ़कर और एक साल किसी सदुद्देश्यके हाथके नीचे काम करके अपने गाँवमें ही—अपनी बुद्धि-अनुसार
हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । ६
कम-से-कम २००) रु० महीना और ऊपरमें १०००) रु० महीना तक कमा सकते हैं। कम और ज़ियादा कमाना अकू पर निर्भर है। पर १००) २००) महीना तो एक साधारण बुद्धिवालाभी पैदा कर सकता है और अपने ही गाँवमें देवताकी तरह पुज सकता है। इस तरह इस ग्रन्थसे अर्थ या धनकी प्राप्ति हो सकती है।
इसके पढ़नेवाला अगर अपने गाँववालोंको उनके रोग होनेपर, इस ग्रन्थसे रोगका निदान करके, कोई जड़लकी जड़ी या सस्तीसी एसारोकी दवा बता दे, तो रोगीकी जान बच सकता है। गरीबोंके लिए, इस ग्रन्थमें, हरेक रोगके नाश करने-को ऐसे-ऐसे नुसखे लिखे हैं, जिनसे भयंकर रोग आराम हो जायँ और पैसा भी खर्च न हो; और हो तो उतना हो, जितना एक गरीबसे गरीब भी खर्चकर सके। जैसे—
(१) श्रीठेके पिसे-छने चूर्णाकी नास लेनेसे मृगी आराम हो जाती है। कड़वी तोरई' को पानीमें पीसकर, एक कपड़ेमें रख लेने और वेहोश मृगी-रोगीकी नाकमें दो चार बूँद टपकानेसे फौरन ही रोगी होशमें आ जाता है। सफेद प्याज़का रस नाकमें टपकाने से मृगी रोग जाता रहता है। (चिकित्साचन्द्रोदय-सातवाँ भाग)
(२) तुलसीके स्वरसमें “घी और कालीमिर्च” मिलाकर सेवन करनेसे वायु रोग नाश हो जाते हैं।
(३) त्रिभलेका-चूर्ण १ तोले, शुद्ध शिलाजीत २ माशे और शहद १ तोले मिलाकर चाटनेसे समस्त प्रमेह नाश हो जाते हैं।
(४) एक तोले विदारीफन्द, एक तोले घी और दो तोले मिर्ची
१० हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता ।
मिलाकर चार महीने खानेसे बूढ़ा भी जवानकी तरह स्त्री-भोग कर सकता है ।
(५) विच्छूके काटे स्थान पर आकका दूध मलनेसे विच्छूका जहर उतर जाता है ।
(६) नीबूके रसमें जमालगोटा विसकर, आँखोंमें आँजनेसे साँपका जहर उतरे जाता है ।
पेसे-पेसे हज़ारों अमीरी और गरीबी नुसखे “चिकित्सा-चन्द्रोदय”में लिखे हैं । दूसरोंका भला करनेसे पुण्य होता है । “चिकित्साचन्द्रोदय” पढ़ने वाला निश्चय ही परोपकार करके पुण्य सञ्चय कर सकता है ।
जो पुरुष हर शीतकालमें बाजीकरण औषधियाँ सेवन करता है, उसमें स्त्री-भोगकी सामर्थ्य घोट्टेके समान हो जाती है । जो बाजीकरण औषधियाँ सेवन नहीं करता, केवल रोटी-दालके बल पर स्त्री भोगना चाहता है, वह तो भारी ग़लती करता है । “चिकित्साचन्द्रोदय”के चौथे भागमें बाजीकरण औषधियोंका खज़ाना है ।
यद्यपि स्त्रीमें पुरुषसे अठगुना काम रहता है, तो भी वह पुरुषके बाद.....होती है । जब तक स्त्री.....नहीं होती, वह सन्तुष्ट नहीं होती ; इसलिये पहले बाजीकरण औषधियाँ खाकर बल-बीर्य बढ़ाना चाहिये । फिर समय पर स्तम्भनकारक औषधियाँ की सहायता लेनी चाहिये, तभी स्त्री-भोगका आनन्द मिलता है । “चिकित्सा चन्द्रोदय”में अनेक तरहके लेप, गोली, तिले,
हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । ११
और मोदक प्रभृति लिखे हैं। जिन दवाओंको खाकर श्रोत्रुण भगवान् १६१०८ रानियोंको राजी करते थे, वे भी इस ग्रन्थमें लिखी हैं। बहुत क्या—काम की प्राप्ति भी “चिकित्सा-चन्द्रोदय”से ही हो सकती है।
अब रही मोक्ष ; बिना शरीरके निरोग रहे, ईश्वरका नाम भी लेना कठिन है। जो रोगार्स है, रोग-पीड़ित है, उसका मन ईश्वर में नहीं लगता। लेकिन “चिकित्साचन्द्रोदय”का पाठ करने वाले और उसमें लिखी बातों पर अमल करने वालेको रोग सता नहीं सकते ; अतः वह मन लगाकर भगवान्का भजन कर सकता और स्वर्ग या मोक्ष लाभ कर सकता है।
जो ग्रन्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थोंका देने वाला है, उसे कौन खरीदना न चाहेगा ?
चिकित्साचन्द्रोदयका मूल्य ।
| भाग | सजिल्दका दाम | अजिल्दका दाम |
|---|---|---|
| पहला भाग | ३॥॥ | ३) |
| दूसरा भाग | ५॥॥ | ५) |
| तीसरा भाग | ५) | ४॥ |
| चौथा भाग | ४॥ | ३॥॥ |
| पाँचवाँ भाग | ५॥॥ | ५) |
| छठा भाग | ४) | ३॥ |
| सातवाँ भाग | १११॥ | १०॥ |
४०) |
३५)