संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यत्कृतं तु मया किञ्चिज्ज्ञानादज्ञानतोऽपि वा।
प्रायश्चित्तकृते देव ममार्घ्यश्च प्रगृह्यताम्॥
'देव! मैंने जानकर या अनजानमें जो कुछ भी पापकर्म किया है, उसके प्रायश्चित्तके लिये मेरा अर्घ्य ग्रहण करें।'
इसके बाद गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदिके द्वारा ब्राह्मणका भलीभाँति पूजन करे। उसे भोजन देकर शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। फिर शरीरशुद्धिके लिये पंचगव्य पान करे और हाथ जोड़कर सूर्यदेवका दर्शन करे। दर्शनके पश्चात् नमस्कार करके निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव।
अविघ्नं सिद्धिमायातु प्रसादात्तव भास्कर॥
'देव! भास्कर! मैंने यह व्रत आपके सामने ग्रहण किया है, आपके प्रसादसे इसकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि प्राप्त हो।'
तत्पश्चात् फाल्गुन मास आनेपर उक्त विधिसे ही कुन्द पुष्पके द्वारा सूर्यदेवकी पूजा करे। गुग्गुलका धूप दे और भातका नैवेद्य निवेदन करे। उस दिन सब पापोंकी शुद्धिके लिये गोमयका भोजन बताया गया है। चैत्रमास आनेपर सुरभि (सुगन्धित पुष्प अथवा चम्पा, मौलसिरी या चमेली)-से सूर्यदेवकी पूजा करे। उस समय नैवेद्यके लिये गुड़ बताया गया है। सरजरस (राल)-का धूप निवेदन करे तथा कुशोदकका पान करे; इससे मनुष्य शारीरिक शुद्धिको प्राप्त होता है। वैशाखमासमें घृताहारी होकर पलाशके फूलोंसे सूर्यदेवकी पूजा करे और आमका नैवेद्य तथा जटामासीका धूप देवे। इस महीनेमें शरीरकी शुद्धिके लिये दहीका भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमें पाड़रके फूलसे सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। नैवेद्यके लिये सत्तू बताया गया है और समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये कपिला गायके घीका भोजन करना चाहिये। आषाढ़में अगस्तके फूलोंसे सूर्यकी पूजा करे। नैवेद्यके लिये खीरका विधान है और शरीरशुद्धिके लिये घीके साथ मधु पीना चाहिये। उस समय श्रद्धापूर्वक अगरुका धूप निवेदन करे। श्रावणमें कदम्बके फूलसे सूर्यदेवका पूजन करे, लड्डूका नैवेद्य भोग लगावे और तगरका धूप दे। तत्पश्चात् गोशृंगका जल ग्रहण करके मनुष्य सब पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। भाद्रपदमासमें जातिपुष्प (चमेली)-से भगवान् सूर्यकी पूजा करे, दूधका नैवेद्य भोग लगावे, रालका धूप दे और शरीरशुद्धिके लिये दूध पीये। आश्विनमासमें कमलके फूलोंसे पूजा करे, घीकी पूड़ीका नैवेद्य निवेदन करे, कुंकुमका धूप दे और शरीरशुद्धिके लिये कपूर खाय। कार्तिकमासमें तुलसीसे सूर्यदेवकी पूजा बतायी गयी है, खाँड़का नैवेद्य और कुसुमका धूप देना चाहिये। उस समय लवंगका भोजन सब पापोंका शोधक बताया गया है। अगहनमें भृंगराजपत्र (भँगरेया)-से पूजा करे, पूवाका नैवेद्य और गुड़का धूप निवेदन करे, उस समय सूर्यकी प्रसन्नताके लिये कंकोल (शीतलचीनी)-का भोजन करना चाहिये। पौषमें शतपत्री (गुलाब)-से सूर्यकी पूजा बतायी गयी है, नैवेद्यके लिये पूड़ी और धूपके लिये घीका विधान है। उस समय शरीर-शुद्धिके लिये पूर्वोक्त सभी वस्तुओंका भोजन करे। व्रतकी समाप्ति होनेपर सब पापोंकी शुद्धिके लिये घरकी वस्तुओंका छठा भाग ब्राह्मणको दान कर दे। तदनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार प्रिय पदार्थोंका ब्राह्मणवर्गको भोजन करावे। इस प्रकार जो सूर्यसप्तमीका व्रत करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो निर्मल हो जाता है।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११५९
चण्डशर्माके द्वारा सत्ताईस शिवलिंगोंका पूजन, शिवकृपाप्राप्ति, ऋचीक मुनिका गाधिपुत्रीके साथ विवाह और जमदग्निका जन्म
सूतजी कहते हैं—चण्डशर्मा नामक एक ब्राह्मण था, जिसे नागर ब्राह्मणोंने किसी कारणसे जातिच्युत घोषित करके चमत्कारपुरसे बाहर कर दिया था। चण्डशर्मा नगरसे बाहर सरस्वती नदीके तटपर कुटिया बनाकर रहने लगा। वह सरस्वतीमें स्नान करके पवित्र और एकाग्रचित्त हो षडक्षरमन्त्रका जप करता और सत्ताईस लिंगोंके पृथक्-पृथक् नामका नमस्कारान्त उच्चारण करके जपता था। पंककी मिट्टी लेकर पाँच अँगुलके सत्ताईस शिवलिंग बनाकर उनकी स्थापना करता और पुष्प-धूप एवं चन्दन आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक उन सबकी पूजा करता था। फिर परम श्रद्धापूर्वक प्राणरुद्रसम्बन्धी मन्त्रोंको जपता था। 'शिवलिंग अच्छी स्थितिमें हो या बुरी स्थितिमें, किसी भी दशामें उसको अपने स्थानसे विचलित न करे।' ऐसा मानकर द्विजश्रेष्ठ चण्डशर्मा उन शिवलिंगोंका कभी विसर्जन नहीं करता था। उनके ऊपर-ऊपर वह प्रतिदिन पंकमय सत्ताईस शिवलिंगोंको स्थापित करता जाता था। इस प्रकार दीर्घकालमें वहाँ पंकका पर्वत-सा खड़ा हो गया। तब उसकी भक्तिकी अधिकता देखकर महादेवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और धरतीको भेदकर उसे अपने दिव्यलिंगका दर्शन कराया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'चण्डशर्मन्! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे सिवा और दूसरा भी जो कोई इन सत्ताईस लिंगोंका इस प्रकार पूजन करेगा, वह भी कल्याणका भागी होगा।'
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। चण्डशर्माने भी उनके प्रत्यक्ष प्रकट हुए दिव्य लिंगमय स्वरूपका यथावत् पूजन किया और उसके लिये उत्तम मन्दिरका निर्माण कराया। उसीसे वह शिवलिंग नगरेश्वरके नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार शिवलिंगकी स्थापना करके विप्रवर चण्डशर्माने पुष्प, धूप और चन्दन आदिके द्वारा भगवान् शिवकी पूजा की। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् नगरेश्वरके प्रसादसे वह साक्षात् शिवधाममें चला गया। चण्डशर्माकी पत्नी शाकम्भरीने सरस्वती नदीके तटपर श्रीदुर्गादेवीको स्थापित किया तथा उत्तम भक्ति से दिन-रात उनकी आराधना की। तब उसपर प्रसन्न होकर दुर्गादेवीने कहा—'बेटी शाकम्भरी! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'
शाकम्भरी बोली—देवि! चमत्कारपुरमें जो प्रसिद्ध चौंसठ मातृकागण हैं, वे सब सन्तुष्ट हों।
देवीने कहा—जो आश्विन शुक्ला महानवमीके दिन मेरे आगे आकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, उसे पूर्ण फलकी प्राप्ति होगी। विशेषतः नागर ब्राह्मणकी की हुई पूजा अवश्य सफल होगी। यह सब मैंने सत्य कहा है।
ऐसा कहकर देवी दुर्गा अदृश्य हो गयीं। शाकम्भरीद्वारा स्थापित देवी दुर्गा उसीके नामसे प्रसिद्ध हुईं।
तबसे लेकर सरस्वतीके पुण्यतटपर बाह्य नागर ब्राह्मणोंका एक महान् स्थान बन गया। पुत्र-पौत्र तथा दौहित्र आदिसे युक्त होकर उन सबकी संख्या बहुत बढ़ गयी और विद्या तथा महान् वैभवकी दृष्टिसे वह स्थान चमत्कारपुरसे भी अधिक विख्यात हुआ। तदनन्तर किसी समय विश्वामित्रजीने क्रोध करके सरस्वतीको शाप दे रक्त बहानेवाली कर दिया। तब वे बाह्य नागर सरस्वती नदीको छोड़कर वहाँसे दूर चले गये और नर्मदाके पावन तटपर मार्कण्डेय मुनिके आश्रमके समीप निवास करने लगे।
ऋषियोंने पूछा—बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने सरस्वतीको किस कारण शाप दिया?
१९६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सूतजीने कहा—महर्षियो! प्राचीन कालमें भृगुके पुत्र महामुनि ऋचीक प्रसिद्ध महात्मा थे। वे व्रत-स्वाध्यायमें तत्पर, तपस्वी और महायशस्वी थे। एक समय मुनीश्वर ऋचीकजी तीर्थयात्राके प्रसंगसे घूमते हुए भोजकट नामक स्थानमें गये। वहाँ राजा गाधि राज्य करते थे। त्रिभुवनविख्यात कौशिकी नदी वहीं बहती है। ऋचीकजी वहाँ कौशिकी नदीमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण कर तटपर बैठे तथा ध्यानस्थ होकर जप करने लगे। इतनेमें ही वहाँ सर्वगुणसम्पन्ना राजकन्या आयी। उसे देखकर मुनिने निकटवर्ती मनुष्योंसे पूछा—'यह साध्वी कन्या किसकी पुत्री है और किसलिये यहाँ आयी है?'
लोगोंने कहा—यह महाराज गाधिकी त्रिभुवनसुन्दरी कन्या है, जो सर्वगुणसम्पन्न उत्तम पतिकी इच्छा रखती हुई यहाँ गौरीजीकी पूजाके लिये अन्तःपुरसे आयी है। इस नदीके तटपर यह जो बहुत बड़ा मन्दिर सुशोभित है, इसमें सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित उमादेवी निवास करती हैं। यह राजकन्या मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः पूजन करके भाँति-भाँतिके नैवेद्य भोग लगावेगी और वीणा बजाकर कानोंको सुख देनेवाला मधुर संगीत सुनावेगी। तत्पश्चात् जब सूर्यका ताप कुछ कम होगा, तब यह अपने महलमें पधारेगी।
उन मनुष्योंका यह वचन सुनकर ऋचीक मुनि राजा गाधिके घर गये। उन्हें सहसा अपने घरपर आया देख नृपश्रेष्ठ गाधि शीघ्र उनके सम्मुख गये और शास्त्रोक्त विधिसे उनका पूजन करके बोले—'विप्रवर! यद्यपि आप स्वभावसे ही निःस्पृह हैं, तथापि अपने आगमनका कारण बताइये।'
ऋचीकजीने कहा—राजेन्द्र! आपके एक सुन्दरी कन्या है, जो अब वरके योग्य हो गयी है। आप ब्राह्म-विवाहकी विधिसे वह कन्या मुझे दीजिये। पार्वतीजीके पूजनके निमित्त गयी हुई उस कन्याको मैंने देखा है।
यह सुनकर नृपश्रेष्ठ गाधि भयभीत हो गये। 'एक तो मुनि अपने समान वर्णके नहीं थे, दूसरे दरिद्र और बूढ़े थे, फिर भी कन्या न देनेपर उनसे शाप मिलनेका डर था।' यह सब सोचकर राजाने कहा—'विप्रवर! हमने कन्यादानके लिये शुल्क नियत कर रखा है। यदि वह आप दे सकेंगे तब निश्चय ही आपको अपनी कन्या दूँगा।'
ऋचीकजीने पूछा—नृपश्रेष्ठ! कन्याका शुल्क क्या है, यह आप मुझे बताइये।
गाधि बोले—द्विजेन्द्र! वायुके समान वेगवाले श्वेत रंगके सात सौ घोड़े, जिनका एक-एक कान श्याम रंगका हो, मेरी कन्याके शुल्करूपमें प्राप्त होने चाहिये।
'बहुत अच्छा' कहकर मुनिश्रेष्ठ ऋचीक कान्यकुब्ज देशमें गये और गंगाके किनारे बैठकर राजा गाधिके बताये अनुसार श्यामकर्ण घोड़ोंकी प्राप्तिके लिये विनियोगपूर्वक ऋषि, छन्द और देवताका स्मरण करके 'अश्वो वोलहा' इत्यादि चौंसठ ऋचाओंवाले सूक्तका जप करने लगे। तब वे अश्व गंगाजीके जलसे प्रकट हो गये। उन सबका रंग श्वेत और एक-एक कान श्याम था। वे सभी बड़े वेगशाली अश्व थे, उनके साथ उतने ही सवार भी थे। तबसे गंगाके शुभ पुण्यतटपर वह स्थान भूतलमें अश्वतीर्थके नामसे विख्यात हुआ।
उन विश्वासपात्र पुरुषोंके साथ सात सौ घोड़ोंको पाकर ऋचीक मुनि उस स्थानपर गये, जहाँ राजा गाधि रहते थे। वहाँ पहुँचकर मुनिने कन्याके लिये वे उत्तम अश्व राजाको समर्पित किये। तब राजा गाधिने उन घोड़ोंको ग्रहण करके गृह्यसूत्रोक्त विधिसे ब्राह्मण और अग्निकी साक्षितामें वह त्रिभुवनसुन्दरी कन्या ऋचीक मुनिको ब्याह दी। विवाह हो जानेपर ऋचीक मुनि अपनी स्त्रीकी ओरसे निष्काम हो गये और बोले—'सुन्दरी! मैं तपस्याके लिये वनमें जाऊँगा, तुम कोई वर माँगो!'
उनका वह वचन सुनकर राजकुमारी दुःखी होकर अपनी माताके पास गयी और मुनिने जो कुछ कहा था, वह सब कह सुनाया। उसे सुनकर माताने कहा—'बेटी! यदि तुम्हारे पति तुम्हें
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६१
मनोवांछित वर देते हैं तो उनसे अपने लिये ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र माँगो और मेरे लिये क्षत्रियोचित गुणोंसे युक्त एक पुत्रके लिये प्रार्थना करो।' माताकी बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली राजकुमारी ऋचीक मुनिके पास गयी और माताने जैसा कहा था, वह सब उनसे कहा। पत्नीका वह वचन सुनकर ऋचीक मुनिने विधिपूर्वक पुत्रेष्टि यज्ञ करके दो चरु तैयार किये। एकमें तो उन्होंने ब्राह्मणोचित तेज एवं सम्पूर्ण यशका आधान किया और दूसरेमें सम्पूर्ण क्षात्रतेज स्थापित कर दिया। तदनन्तर उन्होंने पहले अपनी पत्नीको उत्तम ब्राह्मतेजसे युक्त चरु प्रदान किया और कहा—'तुम इसे खा लो और खानेके बाद पीपलके वृक्षका आलिंगन करो। इससे तुम्हें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न उत्तम पुत्र प्राप्त होगा तथा यह जो दूसरा चरु है, इसे अपनी माताको दे दो। साथ ही उन्हें समझा दो कि वे इस चरुको खाकर बरगदके वृक्षका आलिंगन करें। ऐसा करनेसे उन्हें क्षत्रियतेजसे युक्त श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्ति होगी।' घरमें जाकर दोनों माँ-बेटी प्रसन्नचित्त होकर आपसमें बात करने लगीं कि मुनिका वचन अवश्य सत्य होगा।
तदनन्तर माताने पुत्रीसे कहा—संसारमें सब लोग अपने लिये उत्तम वस्तु चाहते हैं, अतः तुम्हारे लिये जो चरु है, उसमें अवश्य कोई-न-कोई विशेषता होगी, अतः अपना चरु मुझे दे दो और मेरा तुम ले लो।' माताके ऐसा कहनेपर पुत्रीने चरु और वृक्षमें अदला-बदली कर ली। तत्पश्चात् ऋतुस्नाता होनेपर दोनों स्त्रियोंने गर्भ धारण किया। त्रिभुवनसुन्दरी राजकन्या उस गर्भको प्राप्त होकर क्षत्रियतेजसे युक्त हो गयी। वह मन-ही-मन हाथी, घोड़ेपर चढ़ने तथा राज्य करनेकी बात सोचने लगी। देवताओं और असुरोंकी युद्धकथा बड़े रुचिके साथ सुनने लगी।
उसके क्षत्रियोचित कर्म देखकर मुनिने कुपित होकर पूछा—पापिनि! तुमने यह क्या किया? अवश्य ही चरु और वृक्षमें तुमने परिवर्तन कर लिया है। अतः इसमें सन्देह नहीं कि तुम्हारा पुत्र क्षत्रिय होगा और भाई ब्राह्मण। गर्भके चिह्नोंसे ऐसा ही प्रतीत होता है। शास्त्रचिन्तकोंने यह बात कही है कि गर्भिणी स्त्रीके मनमें जैसी अभिलाषा उत्पन्न होती है, वैसे ही गुणोंसे युक्त पुत्र उसके गर्भसे उत्पन्न होता है।
तब राजकुमारीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आपने जो कहा है, वह सत्य है। हमारे द्वारा चरु-परिवर्तनका अपराध हो गया है तथापि मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे मेरा पुत्र ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न हो।
ऋचीक बोले—जो कुछ भी ब्राह्मणोचित तेज और गुण है, वह सब मैंने तुम्हारे चरुमें स्थापित कर दिया था और तुम्हारी माताके चरुमें क्षत्रियोचित क्षत्रियतेजका आधान किया था। अतः मैं शास्त्रके विरुद्ध उसमें उलट-फेर कैसे कर सकता हूँ। तुम्हारी प्रार्थनासे इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारा पुत्र क्षत्रियोचित गुणसे युक्त न होकर पौत्र वैसे गुणोंसे विभूषित होगा। वह अपने क्षात्र-तेजके कारण युद्धमें शत्रुओंके लिये दुर्धर्ष होगा।
तत्पश्चात् मुनिके इस सत्य वरदानको पाकर सती साध्वी राजकुमारीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने अपनी मातासे पतिकी कही हुई सब बातें बतायीं। इसके बाद दसवें महीनेमें पुष्य नक्षत्र आनेपर राजकुमारीने बालसूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मतेजसे सुशोभित तपस्याके निधान और परम पवित्र पुत्रको जन्म दिया, जो तीनों लोकोंमें जमदग्निके नामसे विख्यात हुए। जमदग्निके ही पुत्र महायशस्वी परशुराम हुए, जिन्होंने पितामह ऋचीक मुनिके दिये हुए क्षात्रतेजके प्रभावसे इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य किया था।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
११६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
विश्वामित्रकी उत्पत्ति, राज्य-प्राप्ति, वसिष्ठ मुनिके आश्रमपर नन्दिनीद्वारा सेनासहित विश्वामित्रका सत्कार, नन्दिनीके कोपसे उनका पराभव तथा राज्य त्यागकर तप करनेका निश्चय
**सूतजी कहते हैं—**गाधिकी महारानीने भी मन्त्रसे सिद्ध किये हुए चरुका भक्षण करके उसी वर्षमें गर्भ धारण किया। गर्भवती होनेपर साध्वी रानी तीर्थयात्रामें तत्पर हुई और अनेक प्रकारके व्रतोंका पालन करने लगी। जहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि हो, वहाँ वे बड़े हर्षसे जातीं और सुनतीं। दसवाँ मास पूर्ण होनेपर उन्होंने भी उत्तम कान्तिसे युक्त पुत्र उत्पन्न किया, जो चराचर जगत्में विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जैसे शुक्ल पक्षका चन्द्रमा आकाशमें प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार महाभाग विश्वामित्र भी नित्यप्रति बढ़ने लगे। जब वे युवावस्थासे सम्पन्न एवं राज्य करनेमें समर्थ हुए, तब उनके पिता गाधिने उन्हें राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसके बाद राजा गाधि अपनी पत्नीके साथ वनमें चले गये।
राज्य-संचालनमें नियुक्त होकर भी विश्वामित्रजी प्रायः ब्राह्मणोंके स्वागत-सत्कार एवं सत्संगमें ही संलग्न रहते थे। एक समय उन्होंने वनमें प्रवेश किया और बहुत-से हिंसक पशुओंको मारा। फिर जेठकी तपती हुई दुपहरीमें भूख-प्याससे पीड़ित हो वे महात्मा वसिष्ठके आश्रमपर गये। वसिष्ठजीने भी नृपश्रेष्ठ विश्वामित्रको आया देख प्रसन्नतापूर्वक उनकी अगवानी की तथा उनके लिये अर्घ्य और मधुपर्क निवेदन करके कहा—'महीपाल! आपका स्वागत है! कहिये, मेरे आश्रमपर पधारे हुए आपका मैं कौन-सा अभीष्ट कार्य पूर्ण करूँ?'
**विश्वामित्रजी बोले—**मुनीश्वर! मेरी इन्द्रियाँ प्याससे व्याकुल हो रही थीं। मैं जल पीनेके लिये आपके आश्रमपर आया था सो यहाँ शीतल जल पी लिया। मेरी प्यास बुझ गयी है। अब आज्ञा दीजिये, जिससे अपने घरको जाऊँ।
**वसिष्ठजीने कहा—**राजन्! मध्याह्नकालमें सूर्य अत्यन्त तापदायक है। अतः इस समय मेरे आश्रममें ही भोजन करके अपराह्नकालमें जाइयेगा।
**विश्वामित्रजी बोले—**मुने! मैं चतुरंगिणी सेनाके साथ यहाँ आया था। आपके आश्रमके द्वारपर मेरी सेना भी स्थित है। जो स्वामी अपने सेवकोंके भूखे रहनेपर भी भोजन कर लेता है, वह भयंकर नरकमें जाता है। इसलिये मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दीजिये।
**वसिष्ठजीने कहा—**यदि आपके सेवक मेरे द्वारपर भूखे हैं, तो उन सबको बुलाइये; मैं सभीको भोजनसे तृप्त करूँगा।
यह सुनकर राजा विश्वामित्रने सम्पूर्ण सेनाको वहीं बुला लिया और स्नान, सन्ध्या, तर्पण तथा जप करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वे सिंहासनपर विराजमान हुए। इसी समय वसिष्ठजीने नन्दिनी नामक धेनुका आवाहन किया और वह विश्वामित्रके आगे जाकर खड़ी हो गयी। तब वसिष्ठजीने कहा—'तुम अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य तथा पेय आदि विविध खाद्य पदार्थोंके द्वारा सेनासहित महाराज विश्वामित्रको तृप्त करो। साथ ही इनके घोड़े और हाथी आदिके लिये भी चारे-दाने आदिकी व्यवस्था करो।'
'बहुत अच्छा' कहकर नन्दिनीने क्षणभरमें दस हजार सेवकोंको उत्पन्न किया। उन सबने सब प्रकारके भोज्य पदार्थोंको लेकर विश्वामित्रकी सेनाके प्रत्येक व्यक्तिको पृथक्-पृथक् भोजन परोसा। सेना, परिवार, हाथी, ऊँट, घोड़े और बैल आदिसहित महाराज विश्वामित्र पूर्णतः तृप्त हो गये। यह कौतुक देखकर मन्त्रियोंसहित विश्वामित्रने विचार किया कि 'इस उत्तम धेनुको अपने घर ले चलना चाहिये। ये ब्राह्मणदेवता इसे
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६३
रखकर क्या करेंगे।' ऐसा विचार करके विश्वामित्रने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! यह गौ मुझे दे दीजिये। इसके मूल्यके रूपमें मैं आपको उत्तम रथ, हाथी, घोड़े तथा अन्य मनोवांछित पदार्थ दूँगा।'
वसिष्ठजीने कहा—राजन्! यह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हमारी होमधेनु है। ब्राह्मणोंके लिये साधारण गौका विक्रय भी अनुचित है, फिर समस्त कामनाओंको देनेवाली नन्दिनीकी तो बात ही क्या है। महाराज! जो श्रेष्ठ ब्राह्मण गाय बेचकर उसका धन लेता है, उसे माताको बेचनेवाला चाण्डाल समझना चाहिये। इसलिये महामते! यह नन्दिनी मैं आपको नहीं दूँगा।
विश्वामित्र बोले—मुने! इस पृथ्वीपर जो कुछ भी रत्नभूत पदार्थ है; वह सब राजाका धन है, ऐसा नीतिज्ञ विद्वान् कहते हैं। अतः यह रत्नभूता नन्दिनी गाय मेरे द्वारा बलपूर्वक ले ली जा सकती है।
इतना कहकर उन्होंने नन्दिनीको बलपूर्वक ले जानेकी आज्ञा अपने सेवकोंको दे दी। उनके अनुचर नन्दिनीको डंडोंसे पीटते हुए ले जाने लगे। तब नन्दिनीने वसिष्ठजीसे पूछा—'मुने! क्या आपने मुझे इनको दे दिया है, जो ये मालिककी भाँति मुझे बलपूर्वक ले जाते हैं?' वसिष्ठजीने उत्तर दिया—'नहीं, मैं अपने प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी तुम्हें त्याग नहीं सकता। ये लोग अन्यायपूर्वक तुम्हें ले जाते हैं। तुम स्वयं ही इनसे आत्मरक्षा करो।' इतना सुनकर नन्दिनीने क्रोधपूर्वक हुंकार किया; हुंकार करते ही उसके शरीरसे असंख्य म्लेच्छ-सेना प्रकट हुई। इस सेनाने विश्वामित्रके समस्त सैनिकोंको यमलोक पहुँचा दिया। तब विश्वामित्रने स्वयं ही धनुष लेकर उस सेनाका सामना किया। नन्दिनीके इन सैनिकोंने विश्वामित्रके हाथी, घोड़े आदि सबका सफाया कर डाला और उन्हें भी मारनेके लिये सब ओरसे घेर लिया। उनके प्राणोंपर संकट देख वसिष्ठजीने कहा—नन्दिनी! राजा अवध्य होता है; इन्हें बचाओ। राजाके होनेसे ही सब लोक सुरक्षित रहकर सन्मार्गमें प्रवृत्त होते हैं और कुमार्गसे दूर रहते हैं।' यह सुनकर नन्दिनी ज्यों-ही अपने म्लेच्छ-सैनिकोंको मना करनेके लिये आयी त्यों-ही विश्वामित्रने तलवार उठाकर उसपर घातक प्रहार करनेका विचार किया। यह देख वसिष्ठजीने तलवारसहित उनकी बाँहको स्तम्भित कर दिया—उनकी वह बाँह हिल-डुल नहीं सकी।
राजा विश्वामित्र बड़ी बुरी दशामें पड़ गये। उन्होंने लज्जित होकर वसिष्ठजीसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इन भयंकर म्लेच्छोंके हाथसे मारे जाते हुए मुझ असहायकी अब आप ही रक्षा करें तथा मेरी इस बाँहको स्तम्भरहित (हिलने-डुलने लायक) कर दें। अब मैं घरको लौट जाऊँगा। युद्धसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। उद्दण्ड पुरुष विद्या, ऐश्वर्य तथा लक्ष्मीको पाकर मदोन्मत्त हो वैसे ही चिरकालतक उस स्थितिमें नहीं रह पाता, जैसे मैं राजमदसे उन्मत्त हो युद्धमें नहीं टिक सका।' उनके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजीने उनकी उस भुजाको स्तम्भदोषसे मुक्त कर दिया और हँसते हुए कहा—"राजन्! जाओ, मैंने तुम्हारी बाँह ठीक कर दी। अब कभी ब्राह्मणोंके साथ वैर न करना।'
वसिष्ठजीकी यह आज्ञा पाकर विश्वामित्रजी पैदल ही अपने महलको गये। सन्ध्याके समय नगरद्वारपर पहुँचकर वे अपने-आप ही कहने लगे—'क्षत्रियोंके बल, पराक्रम और जीवनको धिक्कार है! केवल ब्राह्मण-बल और ब्राह्मण-तेज ही प्रशंसाके योग्य है। अब मुझे ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे ब्राह्मण-बल प्राप्त हो। आजसे मैं अपना राज्य त्यागकर बड़ी भारी तपस्या करूँगा।' ऐसा निश्चय करके उन्होंने अपने पुत्र विश्वसहको राजपदपर स्थापित कर दिया और स्वयं तपस्याके लिये तपोवनको प्रस्थान किया।
१९६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
विश्वामित्रकी तपस्या, ब्राह्मणपदकी प्राप्ति, विश्वामित्रकी भेजी हुई शक्तिका वसिष्ठजीके द्वारा स्तम्भन और सरस्वतीके जलकी शुद्धि
सूतजी कहते हैं—द्विजवरो ! इस प्रकार अपना राज्य छोड़कर विश्वामित्रजीने हिमालयपर्वतपर जा अत्यन्त भयंकर तपस्या प्रारम्भ की। फल-मूलका भोजन करते हुए वे तीन सौ वर्षोंतक केवल परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहे। फिर उतने ही समयतक केवल वृक्षके सूखे पत्ते चबाकर रहे। उसके बाद एक हजार वर्षोंतक पानीमात्र पीकर रह गये। फिर सौ वर्षोंतक केवल वायु पीकर सन्तोष किया। विश्वामित्रजीकी उस तपःशक्तिको देखकर देवर्षियोंसहित साक्षात् ब्रह्माजी वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'विश्वामित्र ! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ, वर माँगो !'
विश्वामित्रजीने कहा—देव ! मुझे ब्राह्मणत्व प्रदान कीजिये।
ब्रह्माजी बोले—तुम तो क्षत्रियकी सन्तान हो, फिर तुममें ब्राह्मणत्व कैसे आ सकता है!
विश्वामित्रजीने कहा—देवदेवेश्वर ! आप परम उत्तम ब्रह्मलोकमें पधारिये। मैं या तो शरीर त्याग दूँगा अथवा ब्राह्मणकी ब्राह्मणता प्राप्त करूँगा।
तदनन्तर देवर्षियोंके मध्यमें खड़े हुए ऋचीक मुनि बोले—देव ! मैंने विश्वामित्रजीके जन्मके लिये जो चरु तैयार किया था, उसमें ब्राह्म-मन्त्रोंद्वारा अपरिमित ब्रह्मतेजकी स्थापना की थी। इस कारण ये क्षत्रिय-पुत्र होनेपर भी वास्तवमें ब्राह्मण हैं; इसलिये आप इन्हें 'ब्रह्मर्षि' कहिये, जिससे हमलोग भी इन्हें श्रेष्ठ द्विज कहें।
तब ब्रह्माजीने दीर्घकालतक विचार करके कहा—'विश्वामित्र ! तुम निःसन्देह ब्रह्मर्षि हो।' तत्पश्चात् ऋचीक आदि सब देवर्षियोंने भी उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया। इसके बाद उन सबके मध्यमें खड़े हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कहा—'पितामह ! विश्वामित्र क्षत्रियसे उत्पन्न हुए हैं, यह जानते हुए भी मैं इन्हें कदापि ब्राह्मण नहीं कहूँगा।' ऐसा कहकर वसिष्ठजी हाटकेश्वरक्षेत्रमें शंखतीर्थके समीप चले आये, जहाँ श्वेतद्वीपयुक्त पुण्यमयी ब्रह्मशिला विराजमान है। वहींपर सब पापोंको हरनेवाली शुभ सरस्वती नदी स्थित हैं। उसी सरस्वतीके तटपर आश्रम बनाकर वसिष्ठजी बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। विश्वामित्र भी उनका वध करनेके लिये वहीं आ पहुँचे और उनके आश्रमसे दूर दक्षिण दिशामें आश्रम बनाकर रहने लगे। वे प्रतिदिन उनके छिद्र ढूँढ़ा करते थे। बहुत दिनोंतक टिके रहनेपर भी उन्हें उनका कोई दोष नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वसिष्ठजीके ऊपर आभिचारिक प्रयोग (मारण आदि) प्रारम्भ किया। इससे एक भयंकर शक्ति प्रकट हुई और बोली—'विप्रवर ! आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ।'
विश्वामित्र बोले—मेरे महान् शत्रु वसिष्ठका वध करो।
विश्वामित्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर वह वसिष्ठजीके आश्रमपर जानेके लिये उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थित हुई। इसी समय वहाँ होनेवाले बड़े भारी उत्पातोंको देख महर्षि वसिष्ठने दिव्य दृष्टिसे सब कुछ जान लिया और अथर्ववेदके मन्त्रोंद्वारा उस कृत्याकी गतिको रोक दिया। तब वह शक्ति वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोली—'मुने ! सामवेद सब वेदोंमें प्रधान है। विश्वामित्रने सामवेदके मन्त्रोंद्वारा मेरी सृष्टि की है; अतः इसे अप्रामाणिक न होने दीजिये; मेरे प्रहारको सह लीजिये।'
वसिष्ठजीने कहा—शोभने ! यदि ऐसी बात है तो तुम केवल मेरा स्पर्शमात्र कर लो; परंतु मर्मस्थानको न छूना।
तब विश्वामित्रजीकी छोड़ी हुई वह भयंकर शक्ति वसिष्ठजीके अंगोंका स्पर्शमात्र करके गिर पड़ी। इससे सन्तुष्ट होकर वसिष्ठजीने कहा—'महाभागे ! जो मनुष्य परम श्रद्धासे युक्त होकर
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | १९६५ ---|---
चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको तुम्हारा पूजन करेंगे, वे वर्षभर नीरोग रहेंगे। अतः तुम्हें मेरे वचनसे सदा यहीं निवास करना चाहिये।' उनके इस प्रकार आदेश देनेपर वह शक्ति देवीके रूपमें वहीं स्थित हो नागर ब्राह्मणोंद्वारा पूजित होने लगी। उसका नाम धारा है, वह भक्तजनोंको सुख देनेवाली है।
जिस समय वसिष्ठजीने विश्वामित्रकी भेजी हुई शक्तिको स्तम्भित कर दिया, उस समय उसके अंगोंसे पसीना छूटने लगा। वह पसीना उसके पैरोंके मार्गसे प्रवाहित होकर शीतल जलके रूपमें परिणत हो गया और वहाँ उस जलसे भरा हुआ एक कुण्ड बन गया। वह जल परम पावन, स्वच्छ और निर्मल था। उसमें सब तीर्थोंसे सम्पन्न गंगाजी प्रत्यक्ष प्रकट हुईं। उनके जलसे भरे हुए शीतल कुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पुरुष धारादेवीका दर्शन करता है, उसे धन, धान्य, पुत्र तथा राज्यका समस्त सुख प्राप्त होता है। धारादेवी नागर ब्राह्मणोंके साढ़े साठ गोत्रोंकी कुलदेवी हैं। इसीलिये नागरोंको साथ रखनेसे ही वहाँकी यात्रा सफल होती है। नागरोंके बिना की हुई जो यात्रा है, उससे परमेश्वरी धारा सन्तुष्ट नहीं होतीं।
सरस्वती नदी वसिष्ठजीकी प्राण-रक्षामें सहायक हुई थी, इसलिये विश्वामित्रजीने कुपित होकर शाप दे दिया कि 'तुम्हारा जल रक्तमय हो जायगा।' तबसे उसका जल रक्तमय हो गया। चण्डशर्मा आदि जितने भी तपस्वी वहाँ ठहरे थे, वे सब-के-सब बहुत दूर चले गये। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ भी अर्बुदाचलपर चले गये। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र चमत्कारपुरमें गये और हाटकेश्वरक्षेत्रमें आश्रम बनाकर उन्होंने भयंकर तपस्या की। उस तपस्यासे उनमें सृष्टिरचनाकी शक्ति आ गयी, जिससे वे ब्रह्माजीके साथ होड़ करने लगे।
तदनन्तर किसी समय सरस्वती नदी अर्बुदाचलपर जाकर अत्यन्त दीन-दुःखी हो मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे बोली—'मुने! आपके ही लिये विश्वामित्रने क्रोधपूर्वक मुझे शाप दिया है, जिसके कारण मैं रक्त बहानेवाली नदी हो गयी और तपस्वीजनोंने मेरे तटपर रहना छोड़ दिया। अब मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे मेरे प्रवाहमें फिर जल हो और रक्तराशिका नाश हो जाय।'
वसिष्ठजी बोले—भद्रे! मैं ऐसा यत्न करूँगा, जिससे तुम्हारे प्रवाहमें पुनः जल हो जाय तथा रक्तका निवारण हो।
ऐसा कहकर वसिष्ठजी उस पाकरके वृक्षकी जड़के समीप गये, जहाँसे सरस्वती नदी निकली थीं। वहाँ समाधि लगाकर धरतीपर बैठ गये और ब्राह्ममन्त्रका उच्चारण करते हुए वहाँकी भूमिको देखने लगे। तब धरतीको छेदकर दो छिद्रोंसे जलकी धाराएँ बह निकलीं। जलका एक स्रोत तो वहींसे प्रकट हुआ, जहाँ सरस्वतीका उद्गम हुआ था। वृक्षकी जड़से निकले हुए उस जलप्रवाहने सम्पूर्ण रक्तको बहा दिया, जिससे महानदी सरस्वती परम निर्मल हो गयीं। दूसरा प्रवाह जो संभ्रमवश उत्पन्न हुआ था, उससे भ्रमती नामसे विख्यात नदी हुई। इस प्रकार सरस्वती नदी पुनः अपने पूर्वस्वरूपको प्राप्त हुई थी।
o
पंचपिण्डका गौरी-पूजासे अमाकी सौभाग्यवृद्धि, अमाके पूर्वजन्मका चरित्र
सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें जयसेन नामसे विख्यात एक राजा हो गये हैं, जो काशी प्रदेशके शासक थे। उनके एक सहस्र स्त्रियाँ थीं। इनके अतिरिक्त उन्हें मद्रराज विश्वक्सेनकी सुन्दरी कन्या अमा भी पत्नीरूपमें प्राप्त हुई। अमा उन्हें बहुत प्रिय थी। वह प्रातःकाल उठकर गंगाजीके शुभ तटपर जाती और वहाँकी भीगी मिट्टी लेकर उसीकी पंचपिण्डात्मिका गौरी-मूर्ति बनाकर पाँच मन्त्रोंसे पूजा करती थी। प्रतिदिन इसी प्रकार विधिवत् पूजा सम्पन्न करके वह राजमहलमें लौट आती
| १९६६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
थी। अमा जैसे-जैसे गौरीकी पूजा करती, वैसे-ही-वैसे उसके सौभाग्यकी वृद्धि होती जाती थी। प्रतिदिन उसीके सौभाग्यकी वृद्धि होती देख उसकी सौतोंको बड़ा दुःख होता था। वे कहती थीं—'इसने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं। उन्हींका यह फल है।' इस प्रकार दुःखमें पड़ी हुई उसकी सौतोंका बहुत समय व्यतीत हो गया।
एक दिन सब सौतें आपसमें सलाह करके गंगातटपर उसके समीप गयीं, जहाँ वह पंचपिण्डिका गौरीकी पूजा करती थी। उन सबको वहाँ आयी देख अमा गौरीजीकी पूजा छोड़कर उनके सम्मुख गयी और हाथ जोड़कर बोली—'महाभाग्यवती देवियो ! आपका बारंबार स्वागत है। आज्ञा दीजिये, मै आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?'
सौतें बोलीं—हम सब लोग तुम्हारे सौभाग्यकी आगसे जली हुई हैं, इसलिये कौतूहलवश यहाँ आयी हैं। महाभागे ! तुम प्रतिदिन जो पाँच पिण्डोंकी पूजा करती हो, उसीसे तुम्हारे सौभाग्यकी वृद्धि हो रही है या इसका कोई दूसरा कारण है?
अमाने कहा—आप सब लोग मेरी बड़ी बहिनें हैं, आपके प्रति मेरे मनमें तनिक भी ईर्ष्या नहीं है। अतः गोपनीय बात भी आपके सामने प्रकट करती हूँ। पूर्वजन्ममें मैं कुसुमपुरके वैश्य-पुत्र वीरसेनकी पुत्री थी। उन्होंने विवाहके समय धर्मपूर्वक मेरा दान किया। साथ ही प्रेमपूर्वक कहा कि 'पुत्री ! जबतक तुम गौरीजीकी पूजा न कर लेना तबतक जल भी न पीना। इससे तुम्हें अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति होगी।' तब मैंने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की। ससुराल आनेपर मैं गौरीजीकी पूजामें तत्पर हुई। प्रतिदिन पंचपिण्ड बनाकर उनकी पूजा करती और उन पिण्डोंका जलमें विसर्जन कर देती थी। कुछ कालके अनन्तर मेरे पति वाणिज्यके लिये देशान्तरमें जाने लगे। उस समय स्नेहवश उन्होंने मुझे भी साथ ले लिया। जेठके सूर्य तप रहे थे। भयंकर गरमी पड़ रही थी। ऐसे समयमें वैश्योंका वह समूह निर्जल मरुप्रदेशमें जा पहुँचा। वहाँ एक वृक्षके नीचे सबने विश्राम किया। मैंने देखा सब ओर जल लहरा रहा है। सोचा, पास ही इतना अधिक जल है, स्नान करके गौरीजीकी पूजा कर लूँ, फिर स्वादिष्ट जल पीऊँगी। यह विचार कर मैं क्रमशः एक-एक पग आगे बढ़ती गयी। वहाँ जल कहाँ, मृगतृष्णा थी। जितना ही दूर जाती, उतना ही दूर वह मृगतृष्णा दिखायी देती थी। अन्तमें प्याससे पीड़ित होकर मैं उस बालूमें गिर पड़ी और मेरे सब अंगोंमें फफोले पड़ गये। इसी समय महाभारतका एक प्रसंग मुझे याद आ गया। मुनिवर त्रितने जैसे पूजा की थी, उसी प्रकार मैं भी क्यों न गौरीकी पूजा कर लूँ। ऐसा सोचकर बालूकी पाँच मूठी लेकर मैंने पाँच मन्त्रोंसे देवीका पूजन किया; उसके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। उसी पुण्यके प्रभावसे मैं दशार्ण देशके राजाके घर उत्पन्न हुई। इस जन्ममें भी मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति बनी हुई है। गौरीदेवीके प्रसादसे ही मैं आपलोगोंसे छोटी होकर भी सौभाग्यमें बड़ी हूँ। इसीलिये पंककी पंचपिण्डा गौरी बनाकर प्रतिदिन पूजा करती हूँ। यह गुप्त रहस्य है, जो मैंने आपलोगोंपर प्रकट किया है। इस सत्यके प्रभावसे गौरीदेवी मेरा अभीष्ट सिद्ध करें।
यह सुनकर सब सौतोंने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक प्रणाम करके कहा—बहिन ! हमपर भी कृपा करो और उन पाँचों मन्त्रोंको हमें भी बताओ, जिससे परमेश्वरी गौरी प्रसन्न होती हैं।
अमा बोली—मैं सब बताती हूँ, सुनिये और सुनकर उसीके अनुसार आपलोग भी कीजिये।
उसके ऐसा कहनेपर सब सौतें मन, वाणी और क्रियाद्वारा उसकी शिष्या हो गयीं। तब उसने उन पाँच मन्त्रोंका उपदेश किया—
(१) नमः पृथिव्यै क्षान्तीशि। (२) नमः आपोमये शुभे। (३) तेजस्विनि नमस्तुभ्यम्। (४) नमस्ते वायुरूपिणि। (५) आकाशरूप-सम्पन्ने पञ्चरूपे नमो नमः।
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६७
| (१) क्षमाकी अधीश्वरी देवि ! पृथिवीरूपमें आपको नमस्कार है। (२) शुभे ! आप ही जलरूपा हैं, आपको नमस्कार है। (३) तेजस्-तत्त्वकी स्वामिनि ! आपको नमस्कार है। (४) वायुस्वरूपा देवि ! आपको नमस्कार है। (५) आकाशरूपसे सम्पन्न पंचरूपा देवि ! आपको बार-बार नमस्कार है। | इस प्रकार इन मन्त्रोंका उपदेश देकर अमाने पूजा पूरी की। तत्पश्चात् उसने गौरीदेवीकी रत्नमयी प्रतिमा निर्माण की और उसे हाटकेश्वरक्षेत्रमें स्थापित किया। जो नारी उस गौरी-प्रतिमाका पूजन करती है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शीघ्र ही अपने पतिकी प्रिया होती है—उसे पूर्णतः पतिप्रेम उपलब्ध होता है। |
## पूर्वजन्ममें अमारूपा लक्ष्मीदेवीके द्वारा पंचपिण्डका गौरीकी उत्पत्ति एवं स्थापनाका वर्णन
| | |
|---|---|
| **लक्ष्मीजी (भगवान् विष्णुसे) कहती हैं—** प्रभो! इस प्रकार पूर्वजन्ममें 'अमा' होकर मैंने गौरी-पूजाके प्रभावसे राज्य तथा उस परम सौभाग्यको प्राप्त किया, जो सम्पूर्ण युवतियोंके लिये दुर्लभ वस्तु है। तथापि मुझे कोई सन्तान नहीं प्राप्त हुई। एक समय मुनिवर दुर्वासाजी चातुर्मास्य व्रत करनेके लिये आनर्त-नरेशके भवनमें आये। राजाने उनका पूजन किया और कहा—'मुनिश्रेष्ठ! संसारमें मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है, क्योंकि आपके युगल चरणारविन्दोंको मस्तकद्वारा स्पर्श करनेका सौभाग्य आज मुझे प्राप्त हुआ है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? | नहीं है, जिस व्रत-नियम, दान अथवा होमसे मुझे सन्तान प्राप्त हो, वह बतानेकी कृपा करें।' मेरी बात सुनकर मुनिने बहुत देरतक ध्यान किया, इसके बाद मुसकराते हुए कहा—बेटी ! पूर्वजन्ममें तपी हुई बालूसे तुमने पार्वतीजीका पूजन किया है। अतः भक्ति-भावसे राज्य पाकर भी तुम्हारे मनमें कुछ सन्ताप रह गया है। देवता न तो काठमें रहते हैं, न पत्थरमें और न मिट्टीमें ही रहते हैं, भावमें ही देवताका वास है। भावयुक्त मन्त्रके संयोगसे सर्वत्र देवताका सान्निध्य हो जाता है।\* तुमने भक्तिपूर्वक मन्त्र-प्रयोग किया इससे गौरीदेवी वहाँ आ गयीं। फिर तपी हुई बालूसे तुमने उनका पूजन किया, इससे वे तापयुक्त हुईं; |
| **दुर्वासा बोले—**राजन् ! मैं तुम्हारे यहाँ रहकर विधिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत सम्पन्न करूँगा। आप मेरी सेवा-शुश्रूषाकी व्यवस्था कर दें। | यही कारण है कि तुम्हें सर्वदा सन्ताप रहता है। अतः अब हाटकेश्वरमें जाकर ब्रह्म-रुद्रमयी गौरीदेवीकी पंचपिण्डी मूर्ति स्थापित करो। तत्पश्चात् |
| 'बहुत अच्छा' कहकर महाराजने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। सेवाका सारा भार मुझपर ही था। जैसे पुत्री पिताकी सेवा करती है, उसी प्रकार मुनिकी सेवाके योग्य जो कार्य था, वह सब मैंने स्वयं ही किया। चौमासा बीतनेपर जब मुनि जाने लगे, तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर कहा—'बेटी ! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा अभीष्ट कार्य सिद्ध करूँ?' तब मैंने उनके चरणोंमें बारम्बार प्रणाम करके कहा—'ब्रह्मन् ! मुझे कोई सन्तान | जब सूर्यदेव वृषराशिपर स्थित हों, उस समय ग्रीष्मकालमें गौरीजीके ऊपर दिन-रात जलधारा गिरनेकी व्यवस्था करो। इससे ज्यों-ज्यों गौरीजीको ठण्डक लगेगी और ताप कम होगा, त्यों-ही-त्यों तुम्हारा मानसिक सन्ताप भी कम होता जायगा। इसके बाद तुम्हें गर्भ रहेगा और तुम पुत्र प्राप्त करोगी। तुम्हारा वह पुत्र राज्यका भार वहन करनेमें समर्थ, शूरवीर तथा तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगा। दूसरी कोई भी जो स्त्री इस प्रकार ज्येष्ठमासमें |
---
\* न देवो विद्यते काष्ठे पाषाणे मृत्तिकासु च। भावेषु विद्यते देवो मन्त्रसंयोगसंयुतः ॥ (स्क० पु०, ना० खं १६८। १६-१७)
| १९६८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
गौरीदेवीकी पूजा करेगी, वह भी तुम्हारी ही भाँति उत्तम फलकी भागिनी होगी।'
लक्ष्मीदेवी कहती हैं—तदनन्तर मैंने मुनीश्वर दुर्वासाजीसे पुनः कहा—'ब्रह्मन्! ऐसा कोई व्रत बताइये, जिसके सम्यक् पालनसे भविष्यमें मनुष्य-योनिमें जन्म न होकर देवभावकी प्राप्ति हो।' तब वे बहुत देरतक ध्यान करके बोले—'बेटी! गौरीजीको सन्तुष्ट करनेवाला एक उत्तम व्रत है, जिसका भलीभाँति अनुष्ठान करनेसे स्त्री देवीस्वरूपा हो जाती है। तुम उसी व्रतका अनुष्ठान करो, इससे देवभावको प्राप्त हो जाओगी।' मैंने पूछा—'मुने! किस-किस समय और किस-किस विधिसे उस व्रतका पालन करना चाहिये?'
दुर्वासा बोले—भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी तृतीया तिथिको प्रातःकाल उठकर दाँतून करो। फिर स्नान आदिसे शुद्ध हो श्रद्धापूर्ण हृदयसे गौरीजीका नाम लेकर उन्हींकी प्रसन्नताके लिये उपवास व्रत करनेका नियम ग्रहण करे। तदनन्तर रात्रि प्रारम्भ होनेपर मिट्टीकी चार गौरीकी मूर्तियाँ बनावे और एक-एक पहरमें एक-एक मूर्तिकी पूजा करे। पहली गौरी पूर्वोक्त प्रकारसे पंचपिण्डीमयी ही बनानी चाहिये और प्रथम प्रहरमें उनकी इस प्रकार पूजा करनी चाहिये—
आवाहन और नमस्कार
हिमाचलगृहे जाता देवि त्वं शंकरप्रिये।
मेनागर्भसमुद्भूता पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते॥
'शिवप्रिया देवी गौरी! तुम गिरिराज हिमालयके घरमें मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई हो, यह पूजा स्वीकार करो, तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार प्रार्थना करके श्रद्धापूर्वक कर्पूरयुक्त धूप निवेदन करे। लाल सूतकी बत्ती बनाकर उसे घीमें डुबो दे और उसीका दीपक अर्पण करे। तत्पश्चात् चमेलीके फूलोंसे पूजा करके लड्डूका नैवेद्य निवेदन करे। नैवेद्यको लाल वस्त्रसे ढककर रखे। उसके बाद देवीको अर्घ्य दे। अर्घ्यमें उसी वृक्षका फूल डाले, जिसका दन्तधावन किया गया हो। फूल, जल, अक्षत और गन्ध आदिसे युक्त मातुलिंग (बिजौरा नीबू) लेकर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए भक्तिपूर्वक अर्घ्य देना चाहिये—
शंकरस्य प्रिये देवि हिमाचलसुते शुभे।
अर्घ्यमेनं मया दत्तं प्रतिगृह्ण नमोऽस्तु ते॥
'भगवान् शंकरकी प्रियतमा तथा गिरिराज हिमवान्की पुत्री कल्याणमयी गौरीदेवी! मेरे द्वारा निवेदन किये हुए इस अर्घ्यको ग्रहण करो। तुम्हें सादर नमस्कार है।'
तदनन्तर शरीरशुद्धिके लिये मातुलिंग (बिजौरा नीबू)-का ही प्राशन (भोजन) करे। फिर दूसरे पहरके अन्तमें गौरीदेवीकी परम सुन्दर अर्धनारीश्वरकी मूर्तिकी निम्नांकित मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पूजा करे—
वामाङ्कार्धे शरीरस्य या हरस्य व्यवस्थिता।
सा मे पूजां प्रगृह्णातु तस्यै देव्यै नमोऽस्तु ते॥
'जो भगवान् शंकरके श्रीअंगमें वामार्ध भागमें विराज रही हैं, वे गौरीदेवी मेरी पूजा ग्रहण करें, उनको नमस्कार है।'
इस प्रकार अभ्यर्थना करके अगुरुसहित धूप निवेदन करे। फिर भलीभाँति पूजा करके गुड़का नैवेद्य भोग लगावे। तत्पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रको पढ़कर नारियलके फलसे अर्घ्य देना चाहिये तथा शरीरशुद्धिके लिये नारियल ही खाना चाहिये।
अर्घ्य-मन्त्र
अर्धनारीश्वरौ यौ च संस्थितौ परमेश्वरौ।
अर्घ्यो मे गृह्यतां देवौ स्यातां सर्वसुखप्रदौ॥
'अर्धनारीश्वररूपसे स्थित परमेश्वर शिव और पार्वती देवी! आप दोनों मेरे इस अर्घ्यको ग्रहण करें और सब प्रकारका सुख देनेवाले हों।'
तदनन्तर तीसरा पहर आनेपर शतपत्रीसे शिव-पार्वतीका पूजन करके प्रार्थना करे—
उमामहेश्वरौ देवौ यौ तौ सृष्टिलयान्वितौ।
तौ गृह्णीतामिमां पूजां मया दत्तां प्रभक्तितः॥
'सृष्टि और संहारकी शक्तिसे युक्त जो पार्वतीदेवी और महादेवजी हैं, वे भक्तिपूर्वक दी हुई मेरी इस पूजाको स्वीकार करें।'
इसके बाद गुग्गुलका धूप दे। नैवेद्य समर्पित
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६९
करे। चमेली और जलका अर्घ्य देकर उसीका प्राशन करे। अथवा नागरमोथाके चूर्णसे धूप और मैनफलसे अर्घ्य देना चाहिये और शरीर-शुद्धिके लिये उसीका आहार करना चाहिये।
अर्घ्य-मन्त्र
उमामहेश्वरौ देवौ सर्वकामसुखप्रदौ।
गृहीतामर्घ्यदानं मे दयां कृत्वा महत्तमाम्॥
'सम्पूर्ण कामनाओं और सुखोंको देनेवाले भगवान् शिव और पार्वतीदेवी मुझपर बड़ी भारी दया करके अर्घ्यदानको ग्रहण करें।'
चौथा पहर आनेपर निम्नांकित मन्त्रद्वारा भृंगराज-पुष्प (भँगरैयाके फूल)-से पंचपिण्डिका गौरीकी भक्तिपूर्वक पूजा करके इस प्रकार अभ्यर्थना करे—
पृथिव्यादीनि भूतानि यानि प्रोक्तानि पञ्च च।
यस्या रूपाणि देवेशि पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते॥
'देवेश्वरि! पृथ्वी आदि जो पाँच भूत बताये गये हैं, वे सब तुम्हारे स्वरूप हैं, तुम्हें नमस्कार है। इस पूजाको ग्रहण करो।'
इसके बाद निम्नांकित मन्त्रसे अर्घ्य दे—
पञ्चभूतमयी देवी पञ्चधा च व्यवस्थिता।
अर्घ्यमेनं मया दत्तं सा गृह्णातु सुरेश्वरी॥
'पंचभूतस्वरूपा गौरीदेवी पाँच मूर्तियोंमें स्थित हैं, वे देवेश्वरी मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको ग्रहण करें।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर गीत-वाद्य और कीर्तन आदिकी ध्वनिके साथ सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत करे। नींद न ले। फिर निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर स्नान करके ब्राह्मणदम्पतिका भक्तिपूर्वक पूजन करे। राजकुमारी! इसके बाद हथिनी या घोड़ी मँगाकर उसीपर चारों गौरी-विग्रहोंकी सवारी निकाले। साथ-साथ गीत, वाद्य, मंगल-ध्वनि तथा वेदमन्त्रोंका उच्चारण होता रहे। किसी नदी या तालाबके समीप ले जाकर उसीमें उन विग्रहोंका विसर्जन करे।
विसर्जन-मन्त्र
आहूतासि मया देवि पूजितासि मया शुभे।
मम सौभाग्यदानाय यथेष्टं गम्यतामिति॥
'कल्याणमयी देवि! मैंने आपका आवाहन और पूजन किया है, अब आप मुझे सौभाग्य प्रदान करनेके लिये इच्छानुसार पधारें।'
लक्ष्मीदेवी कहती हैं—प्रभो! इस प्रकार पूर्वजन्ममें मैंने भाद्रपद मासकी उस तृतीयाको भक्तिपूर्वक गौरीदेवीका व्रत किया और द्वितीय तथा तृतीय प्रहरमें जब मैंने उनके श्रीविग्रहकी ओर देखा, तब वे रत्नमयी हो गयी थीं। उनका श्रीविग्रह सब ओरसे प्रकाशपुंजसे परिपूर्ण हो रहा था। जब विसर्जन करनेके उद्देश्यसे मैं नदी-तटपर गयी, तब मेरे मनमें संकल्प-विकल्प होने लगा, विसर्जन करूँ या न करूँ?' इतनेमें सुरेश्वरी गौरीने प्रकट होकर कहा—'बेटी! तुम इस जलमें मेरी भावनामात्र कर लो, फिर इस विग्रहको ले चलकर हाटकेश्वरक्षेत्रमें स्थापित करो। इस समय तुम्हारे मनमें जो-जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।' मैंने कहा—'देवि! मैं मनुष्ययोनिमें किसी प्रकार जन्म न लूँ, भगवान् विष्णु मेरे पति हों।' तब 'तथास्तु' कहकर पार्वती देवी अन्तर्धान हो गयीं। इसके बाद मैंने हाटकेश्वर क्षेत्रमें चारों गौरी-विग्रहोंका स्थापन किया। उसीके प्रभावसे मुझे आप साक्षात् भगवान् ही पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं, जो कि सनातन, अविनाशी एवं सदा मेरे ऊपर स्नेहदृष्टि रखनेवाले हैं।
सूतजी कहते हैं—भगवती लक्ष्मीजीके मुखसे उनके पूर्वजन्मका यह वृत्तान्त सुनकर शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु बहुत प्रसन्न हुए। द्विजवरो! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस चरित्रको भक्ति-भावसे पढ़ता है, उसका कभी लक्ष्मीसे वियोग नहीं होता तथा कभी उसे दुर्भाग्यका दिन नहीं देखना पड़ता।
*
११७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
हाटकेश्वरक्षेत्रमें तीनों पुष्करतीर्थोंके आगमनका वृत्तान्त
ऋषियोंने पूछा— सूतजी ! सुना जाता है, त्रिभुवनविख्यात पुष्कर नामक तीर्थ साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित हुआ है। उसका प्रमाण एक योजन है। हम जानना चाहते हैं, हाटकेश्वरक्षेत्रमें उस तीर्थका प्रादुर्भाव कैसे हुआ ?
सूतजीने कहा— महर्षियो ! स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार करके मैं पुष्करके प्रादुर्भावका वृत्तान्त सुनाता हूँ। एक समयकी बात है, देवर्षि नारदजी तीनों लोकोंमें भ्रमण करके ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके समीप गये और उन्हें प्रणाम करके उनके आगे विनीतभावसे बैठे।
तब ब्रह्माजीने पूछा— वत्स ! इस समय तुम कहाँसे आये हो ?
नारदजीने कहा— प्रभो ! इस समय मर्त्यलोकसे आया हूँ।
ब्रह्माजीने पूछा— मर्त्यलोकका क्या समाचार है? वहाँके लोग क्या बातें करते हैं?
नारदजीने कहा— सुरश्रेष्ठ ! इस समय मर्त्यलोकमें कलिका राज्य है। वहाँके राजा सन्मार्ग त्यागकर लोभके वशीभूत हो गये हैं और धनके लिये अत्यन्त निर्दयतापूर्वक प्रजाको पीड़ा देते हैं। उनमें शूरता-वीरताका तो नाम नहीं है। सब परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करते हैं। वे ब्राह्मण, गुरु, देवता तथा पितरोंका भी पूजन नहीं करते। ब्राह्मण भी शौचाचारसे रहित हो वेद बेचते, दूसरोंसे दान लेनेमें आसक्त रहते, सन्ध्या नहीं करते, दयाहीन बर्ताव करते तथा वैश्योंकी भाँति सदा कृषिकर्म और पशुपालनमें संलग्न रहते हैं। भूतलपर सब वैश्योंका उच्छेद हो गया है। शूद्र सदा धर्मानुष्ठानकी कामना रखते और तपस्यामें तत्पर रहते हैं। जिसके घरमें धन है, युवती स्त्रियाँ हैं, उसीके साथ सब लोग मित्रता करते हैं। समस्त तीर्थ और आश्रम कलियुगके भयसे दसों दिशाओंमें भागते हैं। स्त्रियाँ अपने पतिके साथ विवाद करती हैं, पतिकी सेवा आदि छोड़कर मनमाने व्रत करती हैं। इस समय मर्त्यलोकमें मैंने सास-पतोहू, पिता-पुत्र, भाई-भाई, स्वामी-सेवक, चोर-राजा तथा पति-पत्नीमें कलह होते देखे हैं। मेघ थोड़ा जल बरसाते हैं। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत कम हो गयी है। गौएँ बहुत थोड़ा दूध देने लगी हैं और उनके दूधमें घीका सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार वहाँका कलह देखते-देखते मेरा चित्त उद्भ्रान्त-सा हो उठा था, इसलिये मैं यहाँ आया; अब फिर वहीं जानेका विचार हो रहा है।
नारदजीकी यह बात सुनकर ब्रह्माजी यह विचार करने लगे कि—'मर्त्यलोकमें मेरा पुष्कर नामक तीर्थ भी है, जो कलिकालसे व्याप्त होकर नष्ट हो जायगा, अतः मैं उसे किसी दूसरे तीर्थमें ले जाऊँगा, जहाँ कलियुगका प्रवेश नहीं होता।' ऐसा निश्चय करके पितामहने कमल हाथमें लेकर कहा—'हे पद्म ! तुम पृथ्वीपर उस स्थानमें गिरो जहाँ कलियुग न हो।' ब्रह्माजीसे प्रेरित हुआ कमल समूची पृथ्वीपर घूमकर हाटकेश्वरक्षेत्रमें गिरा। जहाँ पहले गिरा, वहाँसे उछलकर वह दूसरे स्थानपर गिरा और फिर वहाँसे भी उछलकर तीसरे स्थानपर जा गिरा। अतः उन तीनों स्थानोंपर तीन कुण्ड हो गये। उन तीनों कुण्डोंमें स्फटिक-मणिके समान स्वच्छ जल भर गया। इसी समय साक्षात् पितामह ब्रह्माजी भी वहाँ आ पहुँचे। हाटकेश्वरक्षेत्रका दर्शन करके वे भूतलपर बैठे और बहुत समयतक ध्यान करके ज्येष्ठ, मध्य तथा कनिष्ठ तीनों पुष्करोंको वहाँ ले आये। तत्पश्चात् वे प्रसन्नचित्त होकर बोले—'मैं कलिकालके भयसे इन तीनों पुष्करोंको यहाँ लाया हूँ। जो मनुष्य परम श्रद्धापूर्वक यहाँ स्नान करेंगे, वे अविनाशिनी उत्तम सिद्धिको प्राप्त होंगे। जो लोग एकाग्रचित्त हो यहाँ कार्तिककी पूर्णिमाको स्नान और गयाशीर्षमें श्राद्ध करेंगे, उनको बड़ा भारी पुण्य प्राप्त होगा।'
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७१
अतिथि-सत्कारका माहात्म्य
ऋषि बोले—महाभाग सूतजी! आप हमें अतिथिसत्कारका उत्तम माहात्म्य विस्तारपूर्वक बताइये।
सूतजीने कहा—मुनीश्वरो! आप सब लोग इस उत्तम माहात्म्यको श्रवण करें। गृहस्थोंके लिये अतिथि-सत्कारसे बढ़कर दूसरा कोई महान् धर्म नहीं है। अतिथिसे महान् कोई देवता नहीं है; अतिथिके उल्लंघनसे बड़ा भारी पाप होता है। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसे वह अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चल देता है। जो अतिथिका आदर नहीं करता, उसके सौ वर्षोंके सत्य, तप, स्वाध्याय, दान और यज्ञ आदि सभी सत्कर्म नष्ट हो जाते हैं। जिसके घरपर दूरसे प्रसन्नतापूर्वक अतिथि आते हैं, वही गृहस्थ कहा गया है; शेष सब लोग तो गृहके रक्षकमात्र हैं*। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं, उन्हीं मनुष्योंके यहाँ इस पृथ्वीपर श्राद्ध, दान और अतिथिके लिये मधुर वचन—ये तीन प्रकारके सत्कर्म होते हैं। अतिथिको सन्तुष्ट करनेसे गृहस्थके ऊपर सब देवता सन्तुष्ट रहते हैं और अतिथिके विमुख होनेपर सम्पूर्ण देवता भी विमुख हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। इसलिये गृहस्थको चाहिये कि वह सदा अतिथिको सन्तुष्ट करे। यदि वह अपने लिये पुण्य चाहता है तो आत्मदान करके भी अतिथिको प्रसन्न रखे। द्विजवरो! गृहस्थके लिये तीन प्रकारके अतिथि बताये गये हैं—श्राद्धीय, वैश्वदेवीय तथा सूर्योढ। पितरोंके लिये श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजनका संकल्प हो जानेपर जो श्राद्धकालमें स्वतः आ जाता है, उसे श्राद्धीय अतिथि कहते हैं। जो दूरका रास्ता तै करके थका-माँदा बलिवैश्वदेवकर्मके समय (मध्याह्नकालमें) आता है, उस अभ्यागतको वैश्वदेवीय अतिथि जानना चाहिये। पहलेका आया हुआ 'वैश्वदेवीय' अतिथि नहीं कहलाता। प्रिय हो या द्वेषपात्र, मूर्ख हो या पण्डित, यदि वैश्वदेवकालमें आया है, तो वह स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला अतिथि है। उसके गोत्र, चरण (शाखा), स्थान और वेद आदिके विषयमें न पूछे। केवल यज्ञोपवीत देखकर भक्तिपूर्वक भोजन करावे। तीसरा अतिथि सूर्योढ वह है, जो दिनमें या रातमें भोजनके बाद घरपर आता है। उसके लिये भी गृहस्थको यथाशक्ति अन्नदान करना चाहिये। जिसके घरपर आया हुआ सूर्योढ अतिथि सत्कार प्राप्त किये बिना निराश लौट जाता है, वह उसे अपना पातक देकर चला जाता है। तृण, भूमि, जल और चौथा मीठा वचन—ये सब वस्तुएँ सत्पुरुषोंके घरमें कभी समाप्त नहीं होतीं। अतिथिका स्वागत करनेसे गृहस्थको सदा तृप्ति बनी रहती है। उसे आसन देनेसे स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं। अर्घ्य प्रदान करनेसे शिवजी सन्तुष्ट होते हैं। पाद्य देनेसे इन्द्र आदि देवता प्रसन्न रहते हैं तथा उसे भोजन देनेसे भगवान् विष्णु सन्तुष्ट होते हैं। अतिथि सम्पूर्ण देवताओंका स्वरूप होता है; अतः सदा उसका पूजन करना और विशेषतः उसे भोजन देना चाहिये। अतिथि न मिले तो अतिथिके नामसे किसी दूसरे ब्राह्मणको ही गृहस्थ पुरुष भोजन करावे।
* अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
सत्यं तथा तपोऽधीतं दत्तमिष्टं शतं समाः। तस्य सर्वमिदं नष्टमतिथिं यो न पूजयेत्॥
दूरादतिथयो यस्य गृहमायान्ति निर्वृताः। स गृहस्थ इति प्रोक्तः शेषाश्च गृहरक्षिणः॥
(स्क० पु०, ना० उ० १७६। ४—७)
११७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
हाटकेश्वरक्षेत्रमें पुष्करके प्राकट्यका वार्षिक समय, उसकी महिमा तथा ब्रह्मज्ञानसाधक दो तीर्थोंका माहात्म्य
ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! पृथ्वीपर नैमिषारण्य, अन्तरिक्षमें पुष्कर और तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्रकी विशेष स्थिति मानी गयी है। मेरे आदेशसे पाँच रातके लिये पुष्कर क्षेत्र इस पृथ्वीपर अवश्य आवेगा। कार्तिक शुक्ल पक्षमें एकादशीसे लेकर पूर्णिमातक पाँच राततक यहाँ पुष्करतीर्थका वास होगा। इन पाँच रात्रियोंमें जो स्नान करेगा अथवा श्रद्धापूर्वक श्राद्धका अनुष्ठान करेगा, उसका वह पुण्यकर्म अक्षय होगा। मैं भी उस समय ब्रह्मलोकसे आकर पाँच राततक इस तीर्थमें निवास करूँगा।
ब्राह्मणोंने कहा— प्रपितामह! हम इस स्थानमें आपकी मूर्ति स्थापित करेंगे। अतः प्रभो! आपको सदा यहाँ शुभागमन करना चाहिये। साथ ही आपका पुष्करतीर्थ भी सदाके लिये यहाँ आकाशसे उतर आवे। समस्त लोकोंके पापोंका नाश करनेके लिये उस स्वयंनिर्मित तीर्थको आप अवश्य यहाँ ले आवें।
ब्रह्माजी बोले— मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहन करनेपर वह श्रेष्ठ पुष्करतीर्थ आकाशमार्गसे हाटकेश्वरक्षेत्रमें उतर आवेगा। जो द्विज इस तीर्थमें आकर स्नानपूर्वक मेरी मूर्तिके आगे बैठकर पैल और मैत्रेयका स्मरण करके चारों समय अघमर्षण मन्त्रका जप करेगा, उसके उस जप और मन्त्र-पाठको मैं ब्रह्मलोकसे आकर सुनूँगा।
ऋषियोंने पूछा— सूतनन्दन! मरणधर्मा मनुष्योंको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति कैसे होगी?'
सूतजीने कहा— ब्रह्मर्षियो! मुझमें ऐसी क्या शक्ति है, जो इस विषयका वर्णन कर सकूँ। परंतु हाटकेश्वरक्षेत्रमें दो शुभ तीर्थ हैं, जो मनुष्योंको ब्रह्मज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। शूद्री और ब्राह्मणी दो कुमारियोंने उन दोनों तीर्थोंको प्रकट किया है। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको उन दोनों तीर्थोंमें स्नान करता है, फिर भक्तिपूर्वक कुमारीद्वारा पूजित और कुण्डके भीतर स्थित युगल पादुकाओंका पूजन करता है, उसे एक वर्ष बीतनेपर ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। वे पादुकाएँ मोक्षकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको ब्रह्मज्ञानका सुख देनेवाली हैं और आत्मज्ञानकी पुष्टिके लिये शक्तिसे स्थापित की गयी हैं। मेरे पिताजी उस तीर्थमें गये और ज्ञानवान् हो गये। उन्हींकी आज्ञासे मैंने भी वहाँ जाकर एक वर्षतक निवास और पादुकाओंका पूजन किया, इससे मुझे ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। लोकमें पुराणसम्बन्धी जितना भी साहित्य है, सबका मुझे ज्ञान है। यदि आपलोगोंको भी मोक्ष पानेकी इच्छा हो, तो वहीं जाइये। पुनरागमनके चक्रमें डालनेवाले इन स्वर्गसाधक यज्ञोंसे क्या लेना है? आपलोग वहीं जाकर मनुष्योंको सिद्धि प्रदान करनेवाली उन पादुकाओंकी आराधना करें, जिससे वर्षके अन्तमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाय।
ऋषि बोले— महाभाग सूतजी! आपको धन्यवाद। आपने आज बहुत अच्छा उपदेश दिया; इसके द्वारा हमें संसार-सागरसे तार दिया। हमारा यह यज्ञ बारह वर्षोंतक चलनेवाला है, इसके समाप्त होते ही हम सब लोग वहाँ जायँगे, इस बातका हमने भलीभाँति निश्चय कर लिया है।
~~ ० ~~
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७३
ब्राह्मणकन्या और राजकन्याका अनुपम प्रेम, राजकुमारीका दशार्णराजके साथ विवाहका निश्चय
ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! आपने हाटकेश्वरक्षेत्रमें जिन दो शूद्रीतीर्थ और ब्राह्मणीतीर्थकी चर्चा की है, उनका निर्माण किसके द्वारा हुआ ?
सूतजीने कहा—छान्दोग्य नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। जो सामवेदके ज्ञाता होनेके साथ ही गृहस्थाश्रम-धर्मके पालनमें तत्पर रहते थे। उनके बुढ़ापेमें एक कन्या उत्पन्न हुई, जो विशाल नेत्रोंवाली और मनुष्योंका मन मोहनेवाली थी। जिस दिन महात्मा छान्दोग्यके कन्या हुई, उसी दिन आनर्त देशके शूद्र जातीय नरेशके घरमें भी एक कन्याका जन्म हुआ। वह भी ब्राह्मण-कन्याकी ही भाँति परम सुन्दरी थी। यद्यपि उसका जन्म रातमें हुआ, तथापि उसने अपनी अंगकान्तिसे सम्पूर्ण सूतिकागृहको प्रकाशित कर दिया, मानो रत्नराशिकी प्रभासे सारा घर उद्भासित हो उठा हो। इसीलिये राजकुमारीके पिताने उसका नाम रत्नवती रखा। उस राजकन्या और ब्राह्मणकुमारीमें सखीका सम्बन्ध हुआ। वे निरन्तर साथ-साथ रहती थीं, कभी उनमें वियोग नहीं होता था। एक आसन, एक शय्या और एक-से अन्नका भोजन उन दोनोंको साथ-साथ प्राप्त होता था।
ब्राह्मण-कन्याकी आयु जब आठ वर्षकी हुई, तब उनके पिताने उसके विवाहके लिये वर ढूँढ़ना प्रारम्भ किया। पिताका यह प्रयत्न देखकर कन्याको दुःख हुआ। सखीसे वियोग न हो जाय, इस डरसे उसने सब बात रत्नवतीसे कही—'सखी ! अब पिताजी मेरा विवाह करेंगे। विवाह हो जानेपर मेरा-तुम्हारा साथ कभी नहीं होगा।' राजकुमारी यह वज्रपातके समान दुःसह वचन सुनकर सखीके गलेसे लिपट गयी और स्नेहसे विकल होकर रोने लगी।
पुत्रीका रुदन सुनकर उसकी माता मृगावती सहसा वहाँ आयी और बोली—बेटी ! क्यों रोती हो। किसने तुम्हारा दिल दुखाया है?
रत्नवती बोली—मा ! यह ब्राह्मण-कन्या मुझे प्राणोंके समान अत्यन्त प्रिय है। अतः इसका विवाह होगा और यह कल्याणी अपने पतिके घर चली जायगी। इससे अलग होकर मैं किसी प्रकार जीवित नहीं रह सकती। देवि ! इसी कारणसे मैं दुःखी होकर रोती हूँ।
मृगावतीने कहा—बेटी ! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारी इस प्रिय सखीका विवाह वहीं करूँगी, जिससे इसके साथ तुम्हारा मिलना-जुलना हो सके।
ऐसा कहकर रानी मृगावतीने द्विजश्रेष्ठ छान्दोग्यको बुलवाकर विनयपूर्वक प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन् ! आपकी पुत्री मेरी राजकुमारी रत्नवतीको अत्यन्त प्यारी है, इसलिये मेरी कन्या जब किसी राजाके साथ ब्याही जाय, उस समय उसके पुरोहितसे आप अपनी कन्याका विवाह कर दें, जिससे ये दोनों एक-दूसरीसे विलग न हों; एक स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रह सकें।'
छान्दोग्य बोले—देवि ! नागर ब्राह्मणोंने यह मर्यादा बाँध रखी है कि जो नागर, नागर ब्राह्मणके सिवा दूसरे किसी ब्राह्मणको कन्या देता है अथवा नागरके अतिरिक्त अन्य किसी ब्राह्मणकी कन्या ग्रहण करता है, वह पंक्तिदूषक है। इस पापके कारण उसे यहाँ निवास करनेका अधिकार नहीं है। अतः मैं अपनी कन्या नागरको छोड़कर किसी दूसरे ब्राह्मणको नहीं दूँगा।
यह सुनकर ब्राह्मणकन्याने कहा—पिताजी ! यदि ऐसी बात है तो मैं कुमारी एवं ब्रह्मचारिणी रहूँगी। विवाहके लिये घर नहीं चलूँगी। जहाँ मेरी प्यारी सखी ब्याही जायगी, वहीं इसके साथ जाऊँगी। यदि आप बलपूर्वक हठसे मेरा विवाह करेंगे तो विष खा लूँगी अथवा आगमें जल मरूँगी। मेरे इस निश्चयको जानकर आपको जो उचित प्रतीत हो, वह कीजिये।
१९७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कन्याका यह निश्चय जानकर ब्राह्मण दुःखी हो उसे वहीं छोड़कर घर लौट गये। वह पिताका स्नेह त्यागकर राजकुमारीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने और क्रीडा करने लगी। इधर आनर्तनरेशने भी अपनी पुत्रीको विवाहके योग्य हुई जानकर मन-ही-मन कहा—अब मैं अपनी पुत्रीका योग्य वरके साथ विवाह करूँगा। जो किसी कार्य-कारणसे या लोभवश अयोग्य वरके साथ अपनी कन्याका विवाह कर देता है, वह नरकमें जाता है*। इस प्रकार योग्य वरका अनुसन्धान करते हुए उनका बहुत समय व्यतीत हो गया, तथापि उन्हें अपनी कन्याके योग्य उत्तम वर नहीं दिखायी दिया। तब राजाने विश्वविख्यात चित्रकारोंको बुलवाया और उन्हें भेजते हुए कहा—'तुमलोग मेरे आदेशसे जाओ और भूतलके समस्त राजाओंका चित्रपट तैयार करके ले आओ। वे सब चित्र मेरी पुत्रीको दिखाओ, जिससे वह उन्हींमेंसे किसी अभीष्ट पतिका चुनाव स्वयं कर ले, इससे मुझे दोष नहीं लगेगा।'
राजाका यह वचन सुनकर सब चित्रकार पृथ्वीपर रहनेवाले सम्पूर्ण राजाओंके घर गये। जो राजा तरुण, रूप, उदारता आदि गुणोंसे युक्त एवं योग्य थे, उन सबका चित्र बनाकर ले आये। उन सब चित्रोंको क्रमशः उन्होंने रत्नवतीके आगे रखकर दिखाया। रत्नवतीने उन सब चित्रोंमेंसे राजा बृहद्बलको पसंद किया और कहा—'मैंने दशार्णराज बृहद्बलको पति बनानेके लिये वरण किया।' यह सुनकर आनर्तनरेश बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने दशार्णराजके यहाँ दूतोंको भेजा और उनसे कहा—तुम सब लोग राजा बृहद्बलसे विनयपूर्वक कहना—राजन्! आप विवाहके लिये आनर्तनरेशके यहाँ चलें, वे आपके साथ अपनी त्रिभुवनसुन्दरी कन्या रत्नवतीका विवाह करेंगे।'
राजाका यह आदेश पाकर दूत शीघ्र ही दशार्णराजके यहाँ गये और आनर्तनरेशका सन्देश कह सुनाया। सुनकर राजा बृहद्बलको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपनी विशाल सेना साथ ले आनर्त-राजधानीकी ओर प्रयाण किया।
परावसुके द्वारा मद्यपानका प्रायश्चित्त, राजकन्या रत्नवती और परावसुका सुदृढ़ आत्मसंयम
सूतजी कहते हैं—उन्हीं दिनों चमत्कारपुरमें विश्वावसु नामसे प्रसिद्ध एक नागर थे, जो वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्हें प्रौढ़ावस्थामें एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो प्राणोंके समान प्रिय था। उसका नाम परावसु था। वह युवावस्था प्राप्त होनेपर इष्ट-मित्रोंके साथ वेदोंका स्वाध्याय करने लगा। किसी समय माघमास आनेपर परावसु अपने अध्यापकके घर अध्ययन करता था। वह रातको भी वहीं रहता था। एक दिन आधी रातको वह चुपकेसे उठा और अपने सहपाठियोंसे छिपकर वेश्याके घरमें जा उसीके साथ सो गया। जब थोड़ी-सी रात बाकी रही, तब उसे बड़े जोरकी प्यास लगी। नींदके आलस्यमें ही उठकर उसने चारपाईके नीचे रखे हुए वेश्याके मदिरापात्रको उठा लिया और पानीके भ्रमसे मदिराको ही पी लिया। मुँहमें पड़ते ही उसे मद्यका ज्ञान हो गया और उस पात्रको फेंककर वह बहुत दुःखी हुआ। उसके मनमें बड़ी घृणा उत्पन्न हुई और वह इस प्रकार पश्चात्ताप करने लगा—अहो! मैंने नींदके आलस्यमें यह कैसा अपकर्म कर डाला; जलके धोखेमें अत्यन्त निन्दित मद्यको ही मुँहमें डाल लिया। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरी शुद्धि होगी? अब मैं इसके लिये अत्यन्त दुष्कर प्रायश्चित्त भी करूँगा।'
* अनर्हाय च यो दद्याद्वप्राय निजकन्यकाम्। कार्यकारणलोभेन नरकं स प्रगच्छति॥ (स्क० पु०, ना० उ० १८६। २-३)
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | ११७५ ---|---
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके प्रातःकाल उसने शंखतीर्थमें जाकर शिखासहित मुण्डन कराया और स्नान किया। इसके बाद शीघ्र ही उस स्थानपर गया, जहाँ वेद-विद्यालयमें शिष्योंसहित उपाध्याय वेदमन्त्रोंका पाठ कर रहे थे। वहाँ पहुँचकर परावसु दूर ही बैठा। उसके सहपाठियोंने जब उसे दाढ़ी-मूंछसे रहित देखा, तब वे हँसी करते हुए हाथोंसे बार-बार उसके मस्तकपर ठोंकने लगे। उपाध्यायने उसे इस दशामें देखकर आदरपूर्वक पूछा—‘वत्स! तुम ऐसे क्यों हो रहे हो? आओ मेरे निकट बैठो, बताओ, किसने तुम्हारा अपमान किया है।’
परावसु बोला—गुरुदेव! अब मैं आपकी सेवाके योग्य नहीं रहा। वेश्याके घरमें गया था। वहाँ अपना कमण्डलु समझकर उसके मदिरापात्रको मुँहमें लगा लिया। अतः मेरी शुद्धिके लिये मद्यपानका प्रायश्चित्त बताइये।
तब गुरुके समीप बैठे हुए धृष्ट छात्रोंने उसकी हँसी उड़ाते हुए कहा—‘राजकन्या रत्नवतीके स्तन पकड़कर जब उसके अधर पान करोगे, तब शुद्धि होगी, अन्यथा नहीं।’
परावसु बोला—मित्रो! मैं संकटमें पड़ा हूँ। यह मेरे साथ परिहासका समय नहीं है। यदि तुम्हारा मुझपर स्नेह हो तो अन्य ब्राह्मणोंको बुलाकर मेरे लिये कोई प्रायश्चित्त बताओ।
तब वे मित्र परिहास छोड़कर उसके दुःखसे दुःखी हुए और विश्वावसुके समीप जाकर उन्होंने सब बातें बतायीं। यह सुनकर विश्वावसु अपनी पत्नीके साथ वहाँ आये और शोकसे व्याकुल होकर बोले—‘हाय! बेटा! तुमने यह क्या किया? परावसुने अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया और अपना विचार प्रकट किया—‘मैं अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करूँगा।’ तब विश्वावसुने वेदों तथा धर्मशास्त्रोंके विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलवाया। परावसुने हाथ जोड़कर खड़े हो आदिसे ही अपना सब वृत्तान्त उनको बताया—‘मैंने रातमें अपना कमण्डलु समझकर वेश्याके मदिरापात्रको मुँहसे लगा लिया; अतः मुझे यथायोग्य प्रायश्चित्त दें, जिससे मेरी शुद्धि हो।’ यह सुनकर स्मृतिके ज्ञाता विद्वानोंने धर्मशास्त्र देखकर कहा—जो ब्राह्मण जान-बूझकर मदिरापान करता है, वह उस मदिराके बराबर सुवर्णको आगमें तपाकर पी जाय, तब शुद्ध होता है और यदि अनजानमें वह मदिरा पी लेता है, तब उतना ही घी आगमें खूब तपाकर पी ले तभी उसकी शुद्धि होती है। यही प्रायश्चित्त है। यदि तुम कर सको तो करो।’
परावसु बोला—मैंने एक कुल्ला मदिरा पी लिया है, अतः उतना ही घृत आगमें अच्छी तरह तपाकर पी लूँगा।
यह सुनकर विश्वावसु अत्यन्त दुःखित हो ब्राह्मणोंसे बोले—ब्राह्मणो! मैं इस पुत्रकी शुद्धिके लिये सर्वस्व दे दूँगा, परंतु ऐसा प्रायश्चित्त किसी प्रकार भी करने न दूँगा।
पिताका यह वचन सुनकर पुत्रने कहा—पिताजी! स्नेह छोड़िये, मेरे प्रायश्चित्तमें विघ्न न डालिये। मैंने निश्चय कर लिया है कि प्रायश्चित्त करूँगा।
तब परावसुकी माता बोली—बेटा! यदि तुम्हें अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना ही है तो मैं ही पहले पतिदेवके साथ तुम्हारे सामने अग्निमें प्रवेश करूँगी। तुम्हें अग्निके समान खौलते हुए घी पीकर मरते नहीं देख सकूँगी।
पिताने भी कहा—बेटा! तुम्हारी माताने जो कुछ कहा है, वही मैं भी चाहता हूँ।
सूतजी कहते हैं—यह सब वृत्तान्त सुनकर उनके हितैषी लोग आये और परावसुको प्रायश्चित्तसे निवृत्त होनेके लिये समझाने लगे। जब वे पिता-पुत्रोंमेंसे किसीको भी प्राण त्यागके निश्चयसे न डिगा सके तब वास्तुपदतीर्थमें सर्वज्ञ भर्तृयज्ञके समीप गये और परावसुका सारा हाल सुनाकर बोले—‘महाभाग! यदि इस ब्राह्मणकी शुद्धिके लिये मद्यपानका कोई दूसरा प्रायश्चित्त हो तो वही बताइये; क्योंकि आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।’
भर्तृयज्ञ बोले—ब्राह्मण और उनमें भी विशेषतः
१९७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नागर ब्राह्मण जो वचन कहते हैं, वह वैसा ही होता है; अन्यथा नहीं होता। वेद-विद्यालयमें बैठे हुए नागर ब्राह्मणोंने (परिहासमें) जो कुछ कहा है, वह किसी प्रकार अन्यथा नहीं किया जा सकता। परावसुके मित्रोंने हँसीमें उससे कहा था कि 'रत्नवतीके स्तनोंको हाथमें लेकर जब तुम उसके अधरका आस्वादन करोगे तभी मद्यपानसम्बन्धी अशुद्धि दूर होकर तुम्हें शुद्धि प्राप्त होगी।' वही उपाय इस ब्राह्मणके लिये सुखद होगा। महर्षि पराशरके मतसे ब्राह्मणवचनको आदर देकर यदि उक्त प्रायश्चित्त वह करेगा, तो उसकी शुद्धि हो जायगी।
ब्राह्मण बोले— यदि यह बात राजाके कानोंमें पड़ जाय तो वे क्रोधमें आकर समस्त ब्राह्मणोंका वध कर डालेंगे।
भर्तृयज्ञने कहा— आनर्तनरेश बड़े नीतिमान्, विज्ञ, धर्मात्मा, सर्वशास्त्रनिपुण तथा देव-ब्राह्मणोंके भक्त हैं। अतः सब नागर मेरे साथ उनके घर चलें। किसी मध्यवर्ती पुरुषको आगे रखकर उसीके मुखसे परावसुके मद्यपानका वृत्तान्त, उसके मित्रोंकी हास्यमिश्रित वार्ता तथा पराशर-स्मृतिका वचन आदि कहलावें। यह सब सुनकर यदि राजा ईर्ष्या और रोषके वशीभूत हो जायँगे, तब उनको मैं राहपर लाऊँगा।
भर्तृयज्ञकी यह बात सुनकर सब नागर बड़े सन्तुष्ट हुए और उनकी प्रशंसा करके परम सुहृद् हरिभद्र और भर्तृयज्ञको आगे रखकर माता-पितासहित परावसुको साथ ले राजद्वारके समीप आये। द्वारपालने जाकर राजाको उन सबके आगमनकी सूचना दी। राजद्वारपर ब्राह्मणोंका शुभागमन सुनकर आनर्तनरेशने पुरोहितके साथ आगे आ उनकी अगवानी की। तत्पश्चात् भर्तृयज्ञ, हरिभद्र तथा अन्य चार हजार ब्राह्मणोंके लिये क्रमशः अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और विष्टर आदि निवेदन किये। फिर उन सबके शुभाशीर्वाद प्राप्तकर सभामण्डपमें आये तथा सबको क्रमशः सोनेके सिंहासनोंपर बिठाया। सबके बैठ जानेपर राजा स्वयं भूमिपर बैठे और हाथ जोड़कर बोले—'मैं धन्य हूँ, मुझपर आपलोगोंकी बड़ी कृपा है, जिससे आज मेरे घरपर समस्त नागर ब्राह्मणोंका समुदाय उपस्थित हुआ है। आपलोग इस सेवकको आज्ञा दें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?'
तब हरिभद्रने जिस प्रकार उसने मदिरापान किया, जैसा उसके मित्रोंने परिहासमें कहा, जिस प्रकार तपाये हुए घृत पीनेको प्रायश्चित्त बताया गया और जिस तरह सान्त्वना देकर भर्तृयज्ञ सबको राजाके पास ले आये, इत्यादि परावसुका सब वृत्तान्त राजासे आदरपूर्वक कह सुनाया। सब बातें सुनकर राजा बड़े प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर बोले—'मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, जिसके ऊपर तीन ब्राह्मणोंकी प्राणरक्षाका भार रखकर नागर ब्राह्मणोंने महान् अनुग्रह किया है। धन्य है मेरी पुत्री, जो मरणका निश्चय किये हुए तीन ब्राह्मणोंके प्राणोंकी रक्षा करेगी।'
यह कहकर राजाने उसी समय कन्याको बुलाया और कहा—'विप्रवरो! आपके आदेशसे मैंने अपनी इस कन्याको बुला दिया है, अब परावसु भर्तृयज्ञके बताये अनुसार कार्य करें।' तब भर्तृयज्ञने परावसुको बुलाकर उस कन्याके सामने कहा—'यदि तुम इस कन्याके अधरका स्पर्श करते हुए अपने मनमें इसे माता मानोगे तो अवश्य तुम्हारी शुद्धि हो जायगी। यदि आसक्त होकर अधरपान करोगे, तो तुम्हारे मुँहमें खून भर जायगा और यदि तुम्हारा भाव शुद्ध होगा तो मुँहमें दूध आ जायगा। इसमें सन्देह नहीं है। यदि तुम्हारे पीनेपर इसके स्तनोंमें दूध उतर आये तो तुम्हारी शुद्धि मानी जायगी। यदि रक्त निकला तो शुद्धि नहीं मानी जायगी।'
परावसुसे ऐसा कहकर भर्तृयज्ञने राजकुमारीसे कहा— बेटी! तुम इसे पुत्रकी भाँति देखो, जिससे तुम्हारे ओष्ठका स्पर्श करके यह शुद्ध हो जाय। तुम्हारे स्तनोंके स्पर्शसे इसके सखाओंने शुद्धि बतायी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसकी मृत्यु हो जायगी।
'बहुत अच्छा' कहकर राजकन्याने लजाते
* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७७
हुए परावसुसे कहा—बेटा! आओ और मातृत्वका आश्रय लेकर आत्म-शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करो। मैंने तुम्हें अपना पुत्र मान लिया।
परावसुने भी रत्नवतीको अपनी माता मानकर उसके समीप आ सबके देखते-देखते उसके स्तनोंका स्पर्श किया। स्पर्श करते ही उन स्तनोंसे दूधकी दो धाराएँ बह निकलीं। फिर ज्यों ही उसके ओष्ठका स्पर्श किया त्यों ही वहाँसे भी दूध प्रकट हो गया। यह देख सब ब्राह्मण प्रसन्न होकर बोले—‘अब यह ब्राह्मण शुद्ध हो गया।’ परावसुने भी रत्नवतीकी परिक्रमा करके कहा—‘मा! तुम पुत्रवत्सला माता हो।’ यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर आनर्तनरेशको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने प्रायश्चित्त देनेवाले भर्तृयज्ञकी प्रशंसा करते हुए कहा—‘अहो! मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूँ, जिसके घरपर ऐसे महान् नागर ब्राह्मण पधारे हुए हैं तथा मेरी आज्ञाके अधीन रहनेवाली यह मेरी पुत्री भी महासती, परम सौभाग्यशालिनी एवं सत्य तथा सदाचारसे सम्पन्न है। ये परावसु भी साधारण ब्राह्मण नहीं हैं, जो ऐसी कन्याका स्पर्श करके भी विकारको नहीं प्राप्त हुए।’
ऐसा कहकर राजाने सब ब्राह्मणोंको विदा कर दिया और स्वयं अपनी पुत्रीके साथ राजमहलमें पदार्पण किया।
ब्राह्मणकन्या और शूद्रराजकन्याकी तपस्या, भगवान् शिवका वरदान तथा उनके नामसे दो प्रसिद्ध तीर्थोंका प्रादुर्भाव
सूतजी कहते हैं—इसी समय दशार्णराज बृहद्बल रत्नवतीसे विवाह करनेके लिये उस नगरमें आये। यहाँ आनेपर जब उन्होंने रत्नवती और परावसुका वृत्तान्त सुना तो उनके मनमें बड़ी विरक्ति हुई और वे अपनी राजधानीकी ओर लौट गये। यह सुनकर आनर्तनरेश उन्हें वापस लानेके लिये उनके पीछे-पीछे गये और निकट जाकर बोले—‘राजन्! मेरी कन्याका पाणिग्रहण किये बिना ही तुम क्यों लौटे जाते हो?’
दशार्णनरेशने कहा—‘महाराज! आपके जीते-जी ही आपकी कन्याके अधरों और स्तनोंका स्पर्श पराये पुरुषने कर लिया है, अतः यह पुनर्भू (द्वितीय पतिवाली) हो चुकी है। पुनर्भू स्त्री यदि किसी प्रकार किसी पुत्रको उत्पन्न करे तो वह पुत्र दस पीढ़ी पहलेतकके पूर्वजोंको, दस पीढ़ी बादतककी सन्तानपरम्पराको तथा इक्कीसवें अपने-आपको भी निस्सन्देह नरकमें डाल देता है। इस कारण मैं आपकी कन्याका पाणिग्रहण नहीं करूँगा।
ऐसा कहकर राजा बृहद्बल अपने नगरको चले गये। आनर्तनरेश भी दुःखसे व्याकुल हो घर आये और अपनी पत्नी मृगावती तथा पुत्री रत्नवतीसे सब हाल कह सुनाया। यह सब बात सुनकर मन्त्रियोंको भी बड़ा दुःख हुआ और वे राजाको आश्वासन देते हुए बोले—‘महाराज! पृथ्वीपर असंख्य राजा हैं, उन्हींमेंसे किसीको अपनी कन्या ब्याह दीजिये।’ तब आनर्तनरेशने वहाँ बैठी हुई अपनी कन्यासे कहा—‘बेटी! तुमने चित्रपटमें सब राजाओंको देखा है, उन्हींमेंसे किसीका वरण करो!’
रत्नवती बोली—पिताजी! मैं दशार्णराजको छोड़कर दूसरे किसीको किसी तरह भी पति नहीं बनाऊँगी; क्योंकि राजा एक बार कोई बात कहते हैं, ब्राह्मण भी एक ही बार कहते हैं और कन्या भी एक ही बार किसीको दी जाती है। ये तीन बातें एक-एक बार ही होती हैं। इन्हें बदला नहीं जाता*। तात! ऐसा जानकर आप मुझे दूसरे किसी राजाको न दें; क्योंकि यह कार्य शास्त्रदृष्टिसे धर्म नहीं माना जा सकता।
* सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति च द्विजाः। सकृत् कन्या प्रदीयते त्रीण्येतानि सकृत् सकृत्॥
(स्क० पु०, ना० उ० १८८। १७-१८)