संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आश्रममें गंगेश्वरका दर्शन करके स्नान, दान और जप आदि करनेसे मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
उस आश्रमसे थोड़ी दूर उत्तर दिशामें सूर्यदेवने बाल्यावस्थामें तपस्या की है। इससे उनका नाम बालादित्य हुआ। रविवारको उनका दर्शन करनेसे मनुष्य कोढ़ी नहीं होता और बालकोंको रोग-व्याधि नहीं सताते।
वहाँसे दक्षिणमें दो कोसकी दूरीपर सब पातकोंका नाश करनेवाली पातालगामिनी गंगा हैं, जिन्हें विश्वामित्रजीने स्नान करनेके लिये बुलाया था। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँ गंगेश्वर, विश्वामित्रेश्वर तथा बालेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंकी प्राप्ति होती है।
शास्त्रज्ञान और शीलसे सम्पन्न धर्मात्मा कुबेरने न्यंकुमतीके पूर्व-तटपर एक शिवलिंग स्थापित किया, जो कुबेरेश्वरके नामसे विख्यात है। वहाँसे पश्चिम न्यंकुमतीके तटपर जो सोमनाथ महादेव हैं, उनकी पूजा करके कुबेरजीने इस प्रकार मेरा स्तवन किया—'जो यज्ञका मूल, तुम्बीके ऊँचे फलके समान आकृतिवाली तथा सौ कोटि ब्रह्माण्डोंमें स्थित है, ब्रह्माण्डवर्ती देवसमूह भी जिसका परिमाण नहीं जानते, महेश्वरकी वह कोई महामहिम लिंगमूर्ति सदा हमारी रक्षा करे। जो अजन्मा, पुराण, उपेन्द्र (विष्णु) के भी वन्दनीय तथा बड़े-बड़े राजाओंसे सेवित हैं, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके समान जिनके नेत्र हैं, जो अपनी ध्वजामें वृषभेन्द्र नन्दीका चिह्न धारण करनेवाले तथा प्रलय आदिके हेतु हैं, उन महादेवजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सबके एकमात्र ईश्वर, देवताओंके एक ही बन्धु, योगसे प्राप्त होनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके निवासस्थान, विस्मयके आधार, अनन्त शक्तिसम्पन्न, ज्ञानजनक तथा धैर्य आदि गुणोंके कारण सर्वोत्कृष्ट हैं अथवा जिनमें धैर्य आदि गुणोंकी अधिकता है, उन भगवान् शिवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके हाथोंमें पिनाक, पाश, अंकुश और त्रिशूल शोभा पाते हैं, जो मस्तकपर जटाजूट धारण करते हैं, जिनके शब्दोच्चारणकी ध्वनि मेघके समान गम्भीर है, जिनके सम्पूर्ण अंगोंकी कान्ति स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल तथा कण्ठमें नीला चिह्न है, जो सहस्रों मूर्ति धारण करनेवाले विशिष्ट पुरुष हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्हें संत पुरुष अक्षर, निर्गुण, अप्रमेय, ज्योतिर्मय, एक, दूरंगम (दूर गमन करनेवाले), जानने योग्य, अनिन्द्य, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान तथा परम पवित्र बतलाते हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वरूप तेज-पुंजके समान है, जिनके मस्तकपर बालचन्द्रमा शोभा पाते हैं, जिनका भयानक मुख स्फुरित होता रहता है, जो कालके भी काल, मनोवांछित फलोंके दाता, आसक्तिरहित, धर्मासनपर स्थित तथा परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंमें विराजमान हैं, उन भगवान् रुद्रदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो इन्द्रियातीत, विश्वपालक, शत्रुविजयी, तीनों गुणोंसे परे, अजन्मा, निरीह, तपोमय, वेदमय, प्रजापालक तथा अनेक नामोंवाले इन्द्ररूप हैं, उन्हीं आप महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भूत और भविष्यके ज्ञाता महेश्वर हैं, योगवेत्ता मुनीश्वर सदा जिनका ध्यान करते रहते हैं, जो संसारबन्धनके काटनेवाले तथा नित्य मुक्तस्वरूप हैं, उन महादेवजीको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। जिन परम पुरुष परमात्माके अनुपम मुख, बल, प्रभाव और स्वभाव आदिका ज्ञान देवताओंको भी नहीं होता, उन अचिन्तनीय महिमावाले भगवान् वामदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन उग्रमूर्ति भगवान् शिवकी आराधना करके अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया तथा राजा दिलीपने सम्पूर्ण मनोरथ प्राप्त कर लिये, उन विश्वयोनि भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। देवेन्द्रवन्द्य शम्भो! मुझ अनाथका उद्धार कीजिये। आप कृपालु एवं करुणामय हैं। उमेश! दुःखसागरमें डूबे हुए मुझ
- प्रभासखण्ड * | १३११ ---|---
दीनका उद्धार कीजिये। भव! आप सबका कल्याण करनेवाले हैं। मेरा भी कल्याण कीजिये। जिनकी पूजा करके ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता स्वर्गमें इच्छानुसार विहार करते हैं, उन वन्दनीय शिवकी शरणमें आकर मैं उन्हींकी स्तुति, उन्हींका गुणगान, उन्हींके नामका जप और उन्हींकी वन्दना करता हूँ।'
इस प्रकार स्तुति करके जब कुबेरजी चुप हुए, तब भगवान् शिवने उन्हें अपने मित्रका पद, दिक्पालका पद और देवताओंके धनाध्यक्षका पद—ये तीन वर प्रदान किये और कहा—'यह स्थान तुम्हारे ही नामपर कुबेरनगर कहलायेगा। तुमने इस स्थानसे पश्चिममें जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसका जो पुरुष श्रीपंचमीके दिन विधिपूर्वक पूजन करेगा, उसके यहाँ सात पीढ़ियोंतक लक्ष्मी बराबर बनी रहेगी।'
भद्रकाली, कुबेर, ऋषितोया नदी, शृगालेश्वर तथा गुप्त प्रयागका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! कुबेरस्थानसे उत्तर भागमें मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाली महादेवी भद्रकालीका स्थान है। जो चैत्रमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करता है, उसे सौभाग्य, विजय और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है।
कुबेरस्थानसे नैर्ऋत्य भागमें साक्षात् कुबेरजी विराजमान हैं। जो पंचमी तिथिको भक्तिभावसे गन्ध, पुष्प तथा चन्दन आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसे विघ्नरहित अनुपम निधिकी प्राप्ति होती है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका नाश हो जाता है। उसके पूर्वभागमें बालार्केश्वर लिंग तथा उत्तर भागमें गयाक्षेत्रसहित अम्बिका स्थान है। उन दोनोंके दर्शनसे मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता और समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुबेरस्थानसे दस कोसकी दूरीपर पुष्कर नामका तीर्थ है। उससे अग्निकोणमें चौदह कोस दूर देवकुल नामक स्थान है, जहाँ देवताओंका समागम हुआ है, उसके पश्चिम भागमें ऋषितोया नदी है, जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाली तथा ऋषियोंको प्रिय है। जो मनुष्य उसमें विधिवत् स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, वह सत्तर हजार वर्षोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है; इतना ही नहीं, उसे सात जन्मोंके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है।
परमपवित्र देवदारु-वनमें सहस्रों ऋषि निवास करते थे। वे सभी प्रतिदिन बावली, कुआँ और तड़ाग आदिमें स्नान करते थे। वहाँ रहते उन्हें बहुत वर्ष व्यतीत हो गये। उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या बढ़ गयी और वे दारुकवनमें सब ओर फैलकर रहने लगे। एक दिन उन सबने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमलोग ब्रह्मलोकमें चलकर ब्रह्माजीकी प्रार्थना करें, जिससे यहाँ कोई नदी प्रकट हो।' ऐसा निश्चय करके वे तपोधन मुनि ब्रह्मलोकमें गये और वहाँ ब्रह्माजीकी अनेक प्रकारसे स्तुति करने लगे।
**ऋषि बोले—**ॐकारस्वरूप आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है। समस्त संसारकी रक्षा करनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है और जगत्का संहार करनेवाले तथा ब्रह्मरूपधारी आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है। सुरज्येष्ठ! आपको नमस्कार है।
उन ऋषियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'विप्रवरो! तुम्हारा स्वागत है। मैं इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।'
**ऋषियोंने कहा—**सुरश्रेष्ठ! आप हमें स्नान
१३१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
| करनेके लिये कोई पापनाशिनी नदी प्रदान कीजिये।<br><br>उनके यों कहनेपर ब्रह्माजीने वहाँ मूर्तिमती नदियोंकी ओर दृष्टिपात किया। उन्हें देखकर फिर कमण्डलुकी ओर दृष्टि डाली। तब वे सभी नदियाँ उनके कमण्डलुमें प्रवेश कर गयीं।<br><br>ब्रह्माजी बोले—महर्षियो! ये सब महापुण्यमयी नदियाँ कृपापूर्वक भूलोकमें जानेके लिये इस कमण्डलुमें प्रविष्ट हुई हैं। यदि इनमेंसे किसी एकको भेजूँ तो औरोंके मनमें क्रोध होगा; अतः इस कमण्डलुमें स्थित सभी नदियोंको मैं देवदारु-वनमें जानेके लिये छोड़ता हूँ।<br><br>यों कहकर ब्रह्माजीने उन सबको छोड़ दिया और कहा—'मैंने ऋषियोंकी प्रार्थनासे तोयरूपा इन नदियोंको स्नानके लिये दिया है, इसलिये इनसे प्रकट होनेवाली नदी ऋषितोया नामसे प्रसिद्ध होगी। इस प्रकार देवदारु-वनमें ऋषितोया नदीका आगमन हुआ है। पूर्ववाहिनी ऋषितोया नदी जहाँ समुद्रमें मिली हैं, वहाँ जो मनुष्य स्नान और जलपान करते हैं, वे धन्य हैं। वहाँ प्रातःकाल गंगा, पूर्वाह्न कालमें यमुना, मध्याह्नकालमें सहस्रों नदियोंके साथ सरस्वती, अपराह्नकालमें नर्मदा तथा सायाह्नकालमें सूर्यपुत्री तपती नदी बहती है। यों जानकर जो विद्वान् उसमें स्नान और विधिवत् श्राद्ध करता है, वह उसके फलका भागी होता है।<br><br>ऋषितोयाके पश्चिम दो कोस दूर शृगालेश्वर लिंग है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। वहाँ गुप्त प्रयाग, माधवदेव तथा गंगा, यमुना और सरस्वती हैं। वहाँ स्नान, जलस्पर्श तथा पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त | हो जाता है। वहाँ ब्रह्मकुण्ड, विष्णुकुण्ड तथा रुद्रकुण्ड हैं। इनके अतिरिक्त चौथा त्रिसंगम तीर्थ भी है, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनोंका संगम हुआ है। ब्रह्मकुण्डमें एक करोड़, वैष्णवकुण्डमें भी एक करोड़ और रुद्रकुण्डमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। पश्चिममें ब्रह्मकुण्ड, पूर्वमें वैष्णवकुण्ड और मध्यभागमें रुद्रकुण्ड है। जहाँ कुण्डके मध्यभागसे गंगाजी निकलकर सूर्यपुत्री यमुनासे मिली हैं, वहाँ संगम कहलाता है। इन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरमें गुप्त सरस्वतीकी स्थिति मानी गयी है। इनके पास ही तीर्थराज प्रयाग है। जो मनुष्य माघमासमें सूर्यके मकरराशिपर स्थित रहते समय प्रातःकाल सूर्योदयकालमें यहाँ आकर स्नान करता है, वह एक स्नानसे मानसिक, द्वितीय स्नानसे वाचिक और तृतीय स्नानसे शारीरिक पापको नष्ट कर देता है। चौथे स्नानसे सांसर्गिक पाप, पाँचवें स्नानसे गुप्त पाप और छठे स्नानसे उपपातकोंका नाश करता है। इन कुण्डोंमें सात बारके स्नानसे मनुष्य अपने महापातकोंका भी नाश कर देता है। जो पूरे एक मासतक गुप्त प्रयागमें स्नान करता है, उसके फलको ब्रह्मा आदि देवता कोटि कल्पोंमें भी नहीं बता सकते। प्रभासमें जो कोई भी तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा अत्यन्त प्रिय तथा सब पातकोंका नाश करनेवाला यही तीर्थ है। मैंने इस तीर्थकी रक्षाके लिये मातृकाओंको नियुक्त किया है। भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे यत्नपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको श्रद्धा-भक्तिके साथ वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, वह पितृवर्ग और मातृवर्ग दोनोंका उद्धार कर देता है। |
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- प्रभासखण्ड * १३१३
माधव, शृगालेश्वर, त्रिपथगा, गोपालस्वामी, उत्तरार्क, मरुद्देवी आदि विविध तीर्थ और देवविग्रहोंके सेवनकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! उसके दक्षिण भागमें थोड़ी ही दूरपर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् माधव विराजमान हैं। जो शुक्लपक्षकी एकादशीको स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर गन्ध, पुष्प और अनुलेपनके द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। जो विष्णुकुण्डमें स्नान करके माधवकी पूजा करता है, वह श्रीहरिके परमधाममें जाता है।
वहाँसे उत्तर दिशामें कुछ वायव्यकोणकी ओर शृगालेश्वर लिंग है। महातेजस्वी इन्द्र, वरुण, कुबेर, यमराज, अग्नि, आदित्य, वसु तथा समस्त लोकपालोंने उस महालिंगकी आराधना की है। जो शृगालेश्वरका पूजन करेंगे, उनके कुलमें कोई निर्धन नहीं होगा। जो मनुष्य अमावास्या तिथिको यहाँ आकर स्नान करके क्रोधरहित हो विधिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रलयकालतक तृप्त रहते हैं। इस क्षेत्रका विस्तार एक मीलतक है। उसमें जो मृत्युको प्राप्त होते हैं, उन्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। जो अनशन-व्रत ग्रहण करके इस तीर्थमें प्राणोंका त्याग करते हैं, वे परमेश्वरमें लीन हो जाते हैं।
शृगालेश्वरसे ईशानकोणमें सात धनुषकी दूरीपर त्रिपथगा गंगा हैं। उसके जलमें उत्पन्न होनेवाली मछलियाँ इस कलियुगमें भी तीन नेत्रोंवाली देखी जाती हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है।
चण्डीशसे पूर्व भागमें बीस धनुषपर गोपाल-स्वामीका स्थान है; जो माघमासमें गोपालस्वामी श्रीहरिका दर्शन, पूजन तथा वहाँ रात्रिमें जागरण करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। वहाँसे उत्तर दिशामें आठ धनुषपर वकुलस्वामी सूर्यदेवका स्थान है। जो मनुष्य रविवारयुक्त सप्तमीमें वहाँ जागरण करता है, वह सभी अभीष्ट वस्तुओंको पाता और स्वर्गलोकमें पूजित होता है।
वहाँसे वायव्यकोणमें सोलह धनुषपर उत्तरार्क नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्य विराजमान हैं। वहाँ रथसप्तमीको उपवास करके मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है। वहीं देवकुलसे आग्नेयकोणमें दो कोस दूर समुद्रके सुरम्य तटपर परम उत्तम ऋषितीर्थ है। वहाँ पत्थरकी आकृतिवाले ऋषिलोग आज भी देखे जाते हैं, जो सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं।
वहाँसे पश्चिम दिशामें आधे कोसपर मरुद्देवी हैं, जो मरुद्गणोंके द्वारा पूजित तथा समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। मनुष्यको चाहिये कि समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये महानवमी और सप्तमी तिथिको गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा यत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।
देवकुलसे पूर्वमें दस कोसपर शबरस्थानमें क्षेमादित्य नामसे प्रसिद्ध सूर्यदेवका स्थान है। उनका दर्शन करके मनुष्य क्षेम तथा अर्थसिद्धिका भागी होता है। रविवारयुक्त सप्तमीको पूजित होनेपर वे समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देते हैं।
देवकुण्डसे उत्तर और भास्करसे दक्षिण कण्टकशोधिनी देवीका स्थान है। जो मनुष्य अष्टमी तथा नवमीके दिन उनकी पूजा करता है, उसको राक्षसों और पिशाचोंसे भय नहीं होता और वह उत्तम सिद्धिको पाता है।
उससे पूर्वदिशामें थोड़ी ही दूरपर ब्राह्मणोंद्वारा स्थापित ब्रह्मेश्वर लिंग है। जो ऋषितोयाके जलमें स्नान करके उसका पूजन करता है, वह ब्राह्मण जडतासे रहित एवं वेदज्ञ होता है। भगवती चण्डीके गणोंद्वारा वह स्थान सुरक्षित है। मैंने सीमासहित वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया है।
१३१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्थलकेश्वरसे पूर्व दिशामें कुछ आग्नेयकोणकी ओर विश्वकर्माद्वारा स्थापित दो महापुण्यमय लिंग हैं। विश्वकर्मा जब नगरका निर्माण करनेके लिये वहाँ आये, उस समय उन्होंने पहले शिवलिंगकी स्थापना की। तत्पश्चात् पुनः नगर-निर्माणका कार्य प्रारम्भ किया। विवाह और गृहप्रतिष्ठा आदि प्रत्येक कार्यके आदि और अन्तमें उन दोनों लिंगोंकी पूजा करके मनुष्य तत्काल सिद्धिको पाता है।
वहाँसे दक्षिण भागमें समस्त पातकोंका नाश करनेवाले दुर्गादित्य नामक सूर्यदेवके समीप जाय। जो रविवारयुक्त सप्तमीमें उनका पूजन करता है, उसके सब दुःख और अनेक प्रकारके कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं।
वहाँसे दक्षिण भागमें ऋषितोयाके तटपर सोमेश्वरलिंग है, जिसका नाम पहले भूतेश्वर था। सोमेश्वरका दर्शन-पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँसे उत्तर भागमें कुछ वायव्यकोणकी ओर सिद्धिदायक विनायक विराजमान हैं। जिन कुबेरको मैंने अपना सखा बताया है, वे ही गणनाथरूपसे इस स्थानमें लोगोंको सिद्धि प्रदान करनेके लिये स्थित हैं। जो मंगलवारयुक्त चतुर्थीको लड्डूसहित नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, उसे निश्चय ही सिद्धि प्राप्त होती है।
तदनन्तर ऋषितोयाके तटपर स्थित सर्वविघ्न-नाशक विनायकका दर्शन करनेके लिये जाय। वे साक्षात् त्रिपुरान्तक शिव हैं और गजरूप धारण करके महाक्षेत्र प्रभासमें ऊँचे स्थानपर अपने कोटिगणोंके साथ स्थित हैं। अतः निर्विघ्नतापूर्वक यात्राकी सिद्धिके लिये गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन करना चाहिये। योगक्षेमकी सिद्धिके लिये उनकी यात्राका महोत्सव भी करना चाहिये। वहाँसे उत्तर महाकालेश्वरदेव हैं, जो उस पुरके अधिष्ठाता रौद्ररूपधारी भैरव हैं। पूर्णमासी और अमावास्याको इनकी महापूजा करनी चाहिये। जो महोदय तीर्थमें स्नान करके महाकालका दर्शन करता है, वह सात हजार जन्मोंतक संसारमें धनाढ्य होता है।
वहाँसे ईशानकोणमें महोदय तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसे प्रतिग्रहजनित दोषसे भय नहीं होता। उस तीर्थकी रक्षाके लिये महाकालके उत्तर भागमें मेरी प्रेरणासे मातृकाएँ रहती हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य पहले उन मातृकाओंकी ही पूजा करे। वहाँसे वायव्यकोणमें संगमेश्वर लिंग है और उससे भी पूर्वदिशामें पापनाशिनी कुण्डिका है, जहाँ बडवानलसहित सरस्वतीजी आयी हैं। जो कुण्डिकामें स्नान करके संगमेश्वरका पूजन करता है, उसका सहस्र जन्मोंतक लक्ष्मी, पुत्र तथा प्रियजनोंसे कभी वियोग नहीं होता। वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
उस स्थानसे तीन योजन उत्तर तप्तोदकस्वामी हैं, जहाँ भगवान् विष्णुने युद्ध करके दैत्यराज तलका वध किया था। जो मानव तप्तकुण्डमें स्नान करके तलस्वामीकी पूजा तथा स्नान करता है, वह करोड़ों यात्राओंका फल पाता है। उससे पूर्वदिशामें कालमेधलिंगरूपी क्षेत्रपाल हैं। अष्टमी और चतुर्दशीको विस्तारपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। वे कलियुगमें कल्पवृक्षके समान मनोवांछित फल देनेवाले हैं।
वहाँसे दक्षिण भागमें पचीस धनुषके अन्तरपर सब पापोंका नाश करनेवाली रुक्मिणीदेवी स्थित हैं। तप्तोदक कुण्डमें स्नान करके रुक्मिणीजीकी पूजा करे। इससे सात जन्मोंतक स्त्रियोंकी गृहस्थी भंग नहीं होती। बलभद्रसे पूर्वदिशामें एक श्रेष्ठ नदी है, जहाँ दुर्वासेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। जो अमावास्याको उस नदीमें स्नान करके पिण्ड देता है, वह सौ कोटि कल्पोंसे अधिक कालतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है। वहाँ दुर्वासेश्वर शिवका विधिपूर्वक पूजन करके
- प्रभासखण्ड * [ १३१५ ]
मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल तथा समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त कर लेता है। वहाँ ऋषियोंद्वारा स्थापित किये हुए बहुतसे शिवलिंग हैं। उनका दर्शन, स्पर्श और पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। जहाँ क्षेत्रकी परिधिरूप मधुमती नामक स्थान है, वहाँ समुद्र-तटपर लिंगेश्वरदेव तथा सप्तकूप हैं। वहाँ श्राद्ध करके मनुष्य गयासे कोटिगुना फल पाता है।
तलस्वामी, शंखावर्त तीर्थ और गोष्पद तीर्थकी महिमा, वहाँ श्राद्धकी विधि तथा राजा पृथुके द्वारा पृथ्वीका दोहन
महादेवजी कहते हैं—मनुष्यको चाहिये कि वह तलस्वामी विष्णुका स्मरण करे, फिर 'सहस्रशीर्षा' मन्त्रसे तर्पण आदि करे। विधिवत् स्नान करके श्रीविष्णुको अर्घ्य दे। गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अनुलेपन, मधु, इक्षुरस, कुंकुम, कपूर, खस तथा कस्तूरी आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे; फिर वस्त्रोंसे वेष्टित करके उत्तम नैवेद्य भोग लगाये। धर्मकथा-श्रवणपूर्वक रात्रिमें जागरण करे। वेदज्ञ श्रोत्रिय ब्राह्मणको सुवर्ण और दो वस्त्र दान करे। उस दिन उपवासपूर्वक श्रीविष्णुको नमस्कार करके रुक्मिणीजीका दर्शन करे। भक्तिभावसे यों करके मनुष्य अपने जन्मका फल पाता है। समस्त यज्ञों, दानों, तीर्थों और व्रतोंका भी फल पा लेता है। पितृवर्ग और मातृवर्गका भी उद्धार करता है तथा जन्मभरके किये हुए पापोंका नाश कर देता है।
वहाँसे पश्चिम न्यंकुमती नदीके उत्तम तटपर दक्षिण दिशाकी ओर शंखावर्त नामक तीर्थ है, जहाँ स्वयं प्रकट हुई अति उत्तम रक्तगर्भा 'चक्रांकित' शिला स्थित है। पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने वेदोंका अपहरण करनेवाले शंखासुरको जहाँ मारा है, वह विष्णुक्षेत्र कहा गया है। उसीको शंखोदक तीर्थ भी कहते हैं। वह शंखाकार दिखायी देता है। उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है तथा शूद्रको भी लगातार सात जन्मोंतक ब्राह्मणयोनि प्राप्त होती है।
तत्पश्चात् गोष्पद तीर्थको जाय, जहाँ श्राद्ध करके मनुष्य गयासे सातगुना अधिक फल पाता है। वहीं श्राद्ध करके वेननन्दन पृथुने अपने पिताको पाप-योनिसे मुक्त किया था।
न्यंकुमती नदी परम पवित्र और महासिद्ध है। वह इस क्षेत्रकी सीमाके लिये लायी गयी है। सब पापोंका नाश करनेवाली वह नदी पर्णादित्यसे दक्षिण भागमें स्थित है। नारायणगृहसे उत्तर दिशामें थोड़ी ही दूरपर उसकी स्थिति है। उसीके भीतर विख्यात गोष्पद नामक तीर्थ है। गोष्पदके समीप थोड़ी ही दूरपर नागराज अनन्त स्वतः प्रकट हुए हैं, जो पृथ्वीपर उस तीर्थकी रक्षाके लिये नियुक्त किये गये हैं। नरकसे अत्यन्त भयभीत होनेवाले पितर पुत्रप्राप्तिकी इच्छा रखते हैं और कहते हैं—'हमारे वंशजोंमेंसे जो गोष्पदतीर्थकी यात्रा करेगा, वही हमारा उद्धार करनेवाला होगा।' गोष्पदतीर्थमें पुत्रको देखकर पितरोंके यहाँ उत्सव मनाया जाता है। खीर, मधु, सत्तू, आटा, तिल और अक्षत आदिसे वहाँ श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें भेज देता है। उस तीर्थमें श्रेष्ठ पुरुष नास्तिकका संग न करे। सब सामग्रियोंके सहित श्रद्धालु पुरुष आस्तिक मनुष्यके साथ उस तीर्थमें जाय और वहाँ पहुँचकर मन-ही-मन यह भावना करे कि मैं गया तीर्थमें आया हूँ। इस प्रकार जो ब्राह्मण प्रतिग्रहरहित होकर वहाँकी यात्रा करता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहाँ न्यंकुमती नदीमें स्नान करके पितरोंकी मुक्तिके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध-तर्पण करे। तर्पणके समय इस प्रकार कहे—
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥
१३१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
‘ब्रह्माजीसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा माता और मातामह आदि समस्त पितर मेरे दिये हुए जलमें तृप्त हों।’
इस प्रकार विधिपूर्वक तर्पण करके मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे पिण्डयुक्त श्राद्ध करे। पहले शास्त्रके ज्ञाता निर्दोष ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके उन्हें अर्घ्य देकर इस प्रकार कहे—
कव्यवाडनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपाः पितृदेवताः॥
आगच्छन्तु महाभागाः युष्माभी रक्षितास्त्विह।
मदीयाः पितरो ये च कुले जाताः सनाभयः॥
तेषां पिण्डप्रदाताहमागतोऽस्मि पितामह॥
‘कव्यवाट् अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमप नामके पितृदेवताओ! आप सभी महाभाग यहाँ पधारें और आपके द्वारा सुरक्षित जो मेरे पितर, वंशज एवं सहोदर हों, वे भी यहाँ पदार्पण करें। पितामह! उन सबको पिण्डदान देनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ।’
यों कहकर फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
पिता पितामहश्चैव प्रपितामह एव तु।
माता पितामही चैव तथैव प्रपितामही॥
मातामहस्तत्पिता च प्रमातामहकादयः।
तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
ॐ नमो भगवते भर्त्रे सोमभौमेज्यरूपिणे।
‘पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह आदि जो पितर हैं, उनके लिये मेरे द्वारा दिया हुआ यह पिण्ड अक्षय्यरूपसे उपस्थित हो। सोम, मंगल और बृहस्पतिरूप भगवान् विश्वम्भरको नमस्कार है।’
इस प्रकार नमस्कार एवं पूजन करके गोष्पदके समीप अनाथ पितरोंके लिये पिण्डदान करे। उस समय निम्नांकित स्तुतिका पाठ करना चाहिये—
अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते।
रौरवे चान्धतामिस्रे कालसूत्रे च ये गताः॥
तेषामुद्धरणार्थाय इदं पिण्डं ददाम्यहम्।
अनन्तयातनासंस्थाः प्रेतलोकेषु ये गताः॥
पशुयोनिं गता ये च पक्षिकीटसरीसृपाः।
अथवा वृक्षयोनिस्थास्तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये केचित् प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
दिव्यन्तरिक्षभूमिस्थाः पितरो बान्धवादयः।
मृता असंस्कृता ये च तेषां पिण्डस्तु मुक्तये॥
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च।
गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः।
क्रियालोपगता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा॥
विरूपा आमगर्भाश्च ज्ञाताज्ञाताः कुले मम।
तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
प्रेतत्वात् पितरो मुक्ता भवन्तु मम शाश्वतम्।
यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्॥
अक्षय्यमुपतिष्ठेत् तत् त्वस्मिंस्तीर्थे तु गोष्पदे।
‘हमारे कुलमें जो लोग मरे हैं किंतु जिनकी सद्गति नहीं हुई है, जो रौरव, अन्धतामिस्र और कालसूत्र आदि नरकोंमें पड़े हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो अनन्त यातनाओंमें पड़े हैं, प्रेतलोकोंमें गये हुए हैं, पशु, पक्षी, कीट, सर्प अथवा वृक्षयोनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो हमारे बान्धव नहीं हैं, जो हमारे बान्धव हैं अथवा जो अन्य जन्मोंमें बान्धव रहे हैं, वे सब इस पिण्डदानसे सदा तृप्त रहें। मेरे जो पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इस पिण्डदानसे सदा तृप्त रहें। जो पितर तथा बान्धव आदि स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं भूलोकमें स्थित हैं, जिनका मरनेके बाद संस्कार नहीं हुआ है, यह पिण्ड उन सबको मुक्ति देनेवाला हो। जो मेरे पितृकुलमें, मातृकुलमें, गुरुकुल, श्वशुरकुल तथा बन्धुकुलमें रहे हैं तथा इनके अतिरिक्त भी जो बान्धव कहे
- प्रभासखण्ड * १३१७
गये हैं, मेरे कुलमें जिनके लिये पिण्डदान आदि क्रियाएँ नहीं हुई हैं, जो स्त्री और पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्ध आदि कर्मोंका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे, पंगु तथा विकृत रूपवाले रहे हैं, जो कच्चे गर्भकी अवस्थामें ही मर गये हैं—इस प्रकार मेरे कुलमें जो ज्ञात अथवा अज्ञात पूर्वज मृत्युको प्राप्त हुए हैं, उन सबके लिये मैंने यह पिण्ड दिया है। यह अक्षय होकर उन सबको प्राप्त हो। मेरे सभी पितर सदाके लिये प्रेतभावसे मुक्त हो जायें। इस गोष्पद तीर्थमें जो कुछ भी मधुमिश्रित गोदुग्ध, घृत और खीर आदि दिया गया है, वह सब पूर्वोक्त सभी पितरोंको अक्षय होकर प्राप्त हो।'
तदनन्तर श्राद्धकर्ता वहाँ वेदमन्त्रोंका स्वाध्याय करे। सब पुराण सुनाये। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा रुद्र-सम्बन्धी नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करे। ऐन्द्रसूक्त, सोमसूक्त, पवमानसूक्त, बृहत्साम, रथन्तरसाम, ज्येष्ठसाम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण तथा मण्डल-ब्राह्मणका भी यथासम्भव पाठ करे। ये सब स्तोत्र पितरोंको प्रसन्न करनेवाले हैं। इस प्रकार न्यंकुमती नदीमें स्नान करके उत्तम गोष्पद तीर्थमें विधिवत् पिण्डदान करनेके पश्चात् पुनः निम्नांकित मन्त्रका पाठ करे—
साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्माद्या ऋषिपुङ्गवाः।
मयेदं तीर्थमासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता॥
आगतोऽस्मि इदं तीर्थं पितृकार्ये सुरोत्तमाः।
भवन्तु साक्षिणः सर्वे मुक्तश्चाहमृणत्रयात्॥
'ब्रह्मा आदि देवता और श्रेष्ठ मुनिवर साक्षी रहें। मैंने इस तीर्थमें आकर पितरोंका ऋण चुकाया है। श्रेष्ठ देवताओ! मैं पितृकार्यके लिये इस तीर्थमें आया हूँ। आज मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया, इस बातके आप सभी लोग साक्षी रहें।'
इस प्रकार उत्तम गोष्पद तीर्थकी परिक्रमा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे और पिण्डोंका नदीमें विसर्जन कर दे। वृद्धि-श्राद्धमें मातासे आरम्भ करके और गयामें पितासे प्रारम्भ करके श्राद्ध करना चाहिये। इस तीर्थमें श्राद्ध और पिण्डदान करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको विष्णुलोकमें पहुँचा देता हैं। गोष्पद तीर्थमें जो एक ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन देनेका पुण्य मिलता है।
पूर्वकालमें वेन नामक राजा हो गया है। वह मृत्युकी कन्याका पुत्र था। अतः मातामहके दोषसे उसमें भी क्रूरतापूर्ण विचार आ गया। उसने अपने धर्मको पीछे छोड़कर पापमें मन लगाया। वेद-शास्त्रोंका उल्लंघन करके वह अधर्ममें तत्पर हो गया। उसका विनाशकाल उपस्थित था; इसलिये उसकी ऐसी बुद्धि हुई कि 'मैं ही सब यज्ञों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा स्तवन और पूजन करने योग्य हूँ।' इस निश्चयके द्वारा धर्मका उल्लंघन करके वह प्रजाजनोंको पीड़ा देने लगा। उसका यह बर्ताव देख मरीचि आदि महर्षि कुपित होकर बोले—'वेन! तुम अधर्म न करो। तुम जो कुछ करते हो, वह सनातन धर्म नहीं है। तुमने राजसिंहासनपर बैठते समय पहले यह प्रतिज्ञा की है कि 'मैं प्रजाजनोंका पालन करूँगा।' परंतु अब इसके विपरीत आचरण करते हो।'
महर्षियोंके यों कहनेपर दुर्बुद्धि वेन हँसकर बोला—'मेरे सिवा कौन धर्मकी सृष्टि करनेवाला है। पराक्रम, शास्त्रज्ञान, तपस्या और सत्यके द्वारा मेरी समानता करनेवाला इस भूतलपर कौन है। तुमलोग मुझे धर्मकी उत्पत्तिका स्थान समझो। मैं चाहूँ तो इस पृथ्वीको जला सकता हूँ, संसारकी सृष्टि कर सकता हूँ और सबका संहार भी कर सकता हूँ।'
गर्व और उद्दण्डतासे मोहित हुए वेनको जब वे किसी प्रकार समझानेमें सफल न हुए, तब सभी महर्षियोंने कुपित हो अथर्ववेदीय आभिचारिक मन्त्रके प्रयोगसे महाबली वेनको मारकर उसकी बायीं भुजाका मन्थन किया। उससे एक छोटा-सा काले रंगका पुरुष पैदा हुआ। वह भयभीत हो हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। उसकी
१३१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ओर देखकर मुनियोंने कहा—'निषीद (बैठ जाओ)।' इससे वह निषाद कहलाया और निषादवंशका प्रवर्तक हुआ। उससे तुम्बर और खस आदि अन्य जो धीवर जातियाँ उत्पन्न हुईं, उन्होंने विन्ध्यगिरिको अपना निवास स्थान बनाया; फिर उन महर्षियोंने वेनके दाहिने हाथको अरणीकी भाँति मथा। इससे सूर्य और अग्निकी भाँति पृथु पैदा हुए। उनका शरीर बड़ा तेजस्वी था। उन्होंने लोकरक्षाके लिये आजगव नामक धनुष, सर्पोंके समान बाण, खड्ग तथा कवच धारण किया। उनके प्रकट होनेपर सब प्राणी हर्षमें भर गये। वेन स्वर्गलोकको चला गया। तदनन्तर नदियाँ और समुद्र भाँति-भाँतिके रत्न लेकर राजा पृथुका अभिषेक करनेके लिये उपस्थित हुए। ऋषियों और देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजी भी आये। आंगिरस देवताओंने प्रतापी राजा पृथुको राजपदपर अभिषिक्त किया। उनके राज्यमें पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी। चिन्तन करनेमात्रसे ही मन्त्र सिद्ध हो जाते थे। सभी गौएँ कामधेनु थीं और वृक्षोंके एक-एक पत्तेसे मधुकी प्राप्ति होती थी। राजा पृथुको देखकर प्रसन्न हुए महर्षियोंने प्रजाजनोंसे कहा—'ये वेननन्दन राजा पृथु तुम सब लोगोंको जीविका प्रदान करेंगे।' यह सुनकर प्रजाओंने महाभाग पृथुका स्तवन किया और कहा—'आप महर्षियोंके कथनानुसार हमारे लिये आजीविकाकी व्यवस्था करें।' तब बलवान् राजा पृथुने प्रजाकी रक्षाकी इच्छासे धनुष-बाण लेकर पृथ्वीपर आक्रमण किया। पृथ्वी उनके भयसे थर्रा उठी और गायका रूप धारण करके भागी। पृथुने भी उसका पीछा किया। अन्तमें वह उन्हींकी शरणमें आयी और हाथ जोड़कर बोली—'राजन्! मेरे बिना तुम प्रजाको कैसे धारण करोगे? मेरे ऊपर ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं। मैं ही इस जगत्को धारण करती हूँ। मेरे बिना सारी प्रजा नष्ट हो जायगी। अतः तुम्हें मेरा वध नहीं करना चाहिये। महीपते! क्रोध छोड़ो। मैं तुम्हारी आज्ञाके अनुकूल चलूँगी। तुम्हें धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये।'
पृथ्वीकी यह बात सुनकर धर्मात्मा एवं उदार राजा पृथुने अपने क्रोधको रोका और इस प्रकार कहा—'जो अपने या पराये एकके हितके लिये स्वार्थवश बहुत-से प्राणियोंका वध करता है, उसे पाप लगता है। यदि किसी एकको मार देनेसे बहुत लोग सुखी हो जाते हों तो उसके मारनेपर पातक नहीं लगता। अतः वसुन्धरे! यदि तू मेरी आज्ञासे संसारका हित नहीं करेगी तो मैं प्रजाके लिये तेरा वध कर डालूँगा। मेरी आज्ञाके विपरीत चलनेवाली तुझ वसुधाको बाणोंसे मारकर मैं स्वयं अपने शरीरको विशाल बनाकर समस्त प्रजाको धारण करूँगा; अतः तू मेरी आज्ञासे समस्त प्रजाको जीविका प्रदान कर; क्योंकि ऐसा करनेमें तू समर्थ है।'
राजा पृथुके इस प्रकार कहनेपर पृथ्वीने उत्तर दिया—'राजन्! मैं यह सब करूँगी। तुम मेरे लिये बछड़ेकी कल्पना करो। जिसके प्रति वत्सल होकर मैं दूधके रूपमें अन्न प्रदान करूँ। इसके सिवा मुझे समतल बनाओ, जिससे मैं अपने दूधको सर्वत्र फैला सकूँ।'
तब राजा पृथुने धनुषकी कोटिसे पर्वतों और शिलाखण्डोंको उखाड़कर एक जगह किया और चाक्षुष मनुको बछड़ा बनाकर उन्होंने अपने हाथमें अन्नोंको दुहा। तदनन्तर चन्द्रमा बछड़ा हुए, बृहस्पति दुहनेवाले बने, गायत्री आदि छन्द दुग्धपात्र हुए और तपस्या एवं सनातन ब्रह्म उन्हें दुग्धरूपमें प्राप्त हुआ। फिर इन्द्र आदि देवताओंने सुवर्णमय पात्र लेकर इस पृथ्वीको दुहा। उस समय इन्द्र बछड़ा और सूर्य दुहनेवाले हुए। उनका दूध अमृतमय था। इसी प्रकार पितरोंने भी चाँदीके पात्रमें अपनी तृप्तिके लिये सुधारूप दुग्धका दोहन किया। उनके लिये वैवस्वत मनु बछड़ा और अन्तक दुहनेवाले थे। असुरोंने लोहेके पात्रमें मायाशक्तिका दोहन किया। उस समय दूध
- प्रभासखण्ड * | १३१९ ---|---:
दुहनेवाला द्विमूर्धा और बछड़ा विरोचन था। उस मायारूप दूधसे ही दैत्य आज भी मायावी हैं। नागोंने तक्षकको बछड़ा बनाकर तूँबेके पात्रमें विषरूपी दूध दुहा। उस समय वासुकि दोग्धा थे। इसीलिये सर्प बड़े विषैले होते हैं। यक्षों और पुण्यजनोंने कुबेरको बछड़ा बनाकर कच्चे पात्रमें अन्तर्धान-शक्तिका दोहन किया। उनके दोग्धा थे रजतनाग। राक्षसों और पिशाचोंने भी पृथ्वीसे कपालरूपी पात्रमें रक्तमय दूधका दोहन किया। उनकी ओरसे सुमाली बछड़ा था और ब्रह्मोपेत कुबेर दोग्धा। गन्धर्वों और अप्सराओंने चित्ररथको बछड़ा बनाकर कमलके पात्रमें उत्तम गन्धका दोहन किया। मुनिपुत्र रुचि उनकी ओरसे दोग्धा हुए थे। पर्वतोंने पृथ्वीसे मूर्तिमयी ओषधियों तथा भाँति-भाँतिके रत्नोंको दुहा। उनका बछड़ा हिमालय, दुहनेवाला मेरुगिरि तथा पात्र हिमालय था। वृक्ष और लता आदि वनस्पतियोंने पलाशका पात्र लेकर पृथ्वीको दुहा। कटनेपर पुनः अंकुरित हो जाना, यही उनका दूध था। खिला हुआ शालवृक्ष उनका दोग्धा और पाकड़का वृक्ष उनका बछड़ा था।
इस प्रकार समस्त लोकोंके हितके लिये राजा पृथुने सबका धारण-पोषण करनेवाली इस पृथ्वीका दोहन किया। उन्होंने धर्मसे भूतलवासियोंका रंजन किया, इसलिये उन्हें 'राजा' कहा गया। तभीसे इस पृथ्वीपर राजा शब्दकी प्रसिद्धि हुई।
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पृथुके गोष्पद तीर्थमें श्राद्ध-यज्ञ करनेसे वेनको स्वर्गप्राप्ति
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! राज्य पाकर राजा पृथुने सोचा, 'मेरे पिता बड़े अधर्मी थे, उन्होंने यज्ञ आदिका उच्छेद कर डाला था; अतः उन्हें किस लोककी प्राप्ति हुई है, इसका ज्ञान मुझे कैसे हो? वे ब्राह्मणोंके द्वारा मारे गये हैं। उनकी क्रिया किस प्रकार करनी चाहिये?' इस प्रकार सोच-विचारमें पड़े हुए राजा पृथुके समीप देवर्षि नारद आये। राजाने उन्हें आसन देकर प्रणाम किया और पूछा—'भगवन्! आप सब संसारके शुभ-अशुभको जानते हैं, मेरे पिता बड़े दुराचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंके निन्दक थे। उन्हें शुभ या अशुभ—किस स्थानकी प्राप्ति हुई है?'
उन्हें शुभ या अशुभ किस स्थानकी प्राप्ति हुई है, नारदजीने दिव्य दृष्टिसे यह जानकर कहा—'राजन्! जहाँ जल और वृक्षोंसे रहित मरुप्रदेश है, वहाँ म्लेच्छोंके बीचमें उत्पन्न होकर तुम्हारे पिता यक्ष्मा और कुष्ठ रोगसे पीड़ित हैं।'
नारदजीकी यह बात सुनकर राजा पृथुने विचार किया कि 'संसारमें पुत्र वही कहलाता है, जो पिताका उद्धार करे। मेरे द्वारा किस प्रकार पिताजी पापमुक्त हो सकेंगे?' यह सोचकर उन्होंने पुनः नारदजीसे पूछा—'भगवन्! किस कर्मसे मेरे पिताकी मुक्ति होगी?'
नारदजीने कहा—राजन्! प्रधान-प्रधान तीर्थोंकी यात्रा करो। इससे तुम्हारे पिताका मोक्ष होगा।
नारदजीका यह वचन सुनकर राजा पृथुने राज्यका सारा भार मन्त्रीके ऊपर रख दिया और स्वयं तीर्थसेवनके लिये निकले। अनेक तीर्थोंकी यात्रा करके वे प्रभासक्षेत्रमें आये। उस तीर्थका माहात्म्य जाननेवाले ब्राह्मणोंको आगे करके महाराज पृथु न्यंकुमती नदीके समीप गये। वहाँ ब्राह्मणोंने उन्हें प्रेतशिलामें स्थित पदरूप तीर्थका दर्शन कराया। उस विमल तीर्थका दर्शन करके राजाके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने यज्ञोंकी सिद्धिके लिये कुण्डों, वेदियों तथा मण्डपोंका निर्माण किया। तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणावाला यज्ञ विधिपूर्वक प्रारम्भ हुआ। राजा पृथुको तेजस्वी पितरोंने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और श्राद्ध ग्रहण करके सन्तुष्ट होकर कहा—'राजन्! तुम धन्य हो, पुण्यस्वरूप हो और हम तीनों—तुम्हारे
१३२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पिता, पितामह और प्रपितामह भी परम धन्य हैं, जिन्हें इस गोष्पद तीर्थमें श्राद्ध करके तुमने तार दिया।' यों कहकर वेनसहित सब पितर विमानपर बैठे और स्वर्गलोकको चले। जाते समय वेनने कहा—'राजन्! इधर मैं चार जन्म ले चुका। पहले जन्ममें कोढ़ी था, दूसरेमें पापी हुआ, तीसरेमें भी दुराचारी ही था और चौथेमें उच्छिष्ट-भोजी चाण्डाल हुआ। आज मैं सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको जाता हूँ। महाभाग! अब तुम जाओ और चिरकालतक राज्य भोगो। पुत्रके द्वारा पितरोंके लिये जो कुछ किया जाता है, वह सब तुमने सफल कर दिया।'
पिताकी यह बात सुनकर राजा पृथु कुटुम्बियोंसहित बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भूमि और सुवर्ण आदि दान देकर ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट किया। संसारमें कोई ऐसी देने योग्य वस्तु नहीं, जिसका उन्होंने वहाँ दान न किया हो। इस प्रकार पितरोंका प्रत्यक्ष दर्शन करानेवाला उस तीर्थका प्रभाव देखकर राजा अपनी राजधानीको चले गये। सारी पृथ्वीका राज्य भोगकर देहत्यागके पश्चात् उन्होंने दिव्य लोक प्राप्त किया।
गोष्पद तीर्थमें स्नान करके यत्नपूर्वक वेदज्ञ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और विधिपूर्वक श्राद्धमें उन्हें भोजन कराये। पितरोंकी तृप्ति चाहनेवाले पुरुषको वहाँ पिताका श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। इसके लिये वहाँ किसी तिथि, नक्षत्र, पर्व और मास आदिका नियम नहीं है। वहाँ सदा श्रद्धायुक्त चित्तसे यात्रा करनी चाहिये। किसी विशेष कालका वहाँके लिये नियम नहीं है।
नारायणगृह तथा जालेश्वरलिंगकी महिमा, आपस्तम्ब और नाभागकी कथा, गौओं और संतोंका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! गोष्पदके दक्षिण समुद्रतटपर नारायणगृह है, जिसमें साक्षात् विष्णु निवास करते हैं। वे सत्ययुगमें सुवर्णमय, त्रेतामें रत्नमय, द्वापरमें रजतमय और कलियुगमें प्रस्तरमय विग्रहमें रहते हैं। सरस्वतीके पश्चिम तटपर स्वयं श्रीहरिके द्वारा निर्मित चक्रतीर्थ है। उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्याका नाश कर देता है। भगवान् विष्णु जब दैत्योंका विनाश करते हैं, तब विश्रामके लिये उस घरमें स्थित होते हैं। इसलिये इस भूतलपर वह नारायणगृहके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ सत्ययुगमें भगवान् जनार्दनके नामसे प्रसिद्ध होते हैं, त्रेतामें उनका नाम मधुसूदन होता है, द्वापरमें उन्हें पुण्डरीकाक्ष कहते हैं और कलियुगमें वे नारायण कहलाते हैं। इस प्रकार चारों युगोंमें श्रीविष्णु धर्मकी स्थापना करके उस स्थानपर आते हैं। जो एकादशीको निराहार रहकर उन नारायणदेवका दर्शन करता है, वह मृत्युके पश्चात् उनके आनन्दमय अविनाशी धामको प्राप्त होता है।
न्यंकुमतीके किनारे उत्तम कुबेरनगर है। उससे अग्निकोणमें कोटीश्वरलिंग है। कुबेरसे पूर्व दिशामें बालार्केश्वर हैं और उत्तर दिशामें अम्बिकास्थान है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्याका नाश होता है। बालार्केश्वर और अम्बिकाके दर्शनसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। कुबेरनगरमें सैकड़ों तीर्थ और शिवलिंग हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
देविका नदीके तटपर जालेश्वरलिंग है, जिसके दर्शनसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। पूर्वकालमें आपस्तम्ब नामके एक श्रेष्ठ महर्षि हो गये हैं। वे प्रभासक्षेत्रमें जाकर देविका नदीके जलके भीतर रहने लगे और वहाँ भगवान् शिवका ध्यान करते हुए काष्ठकी भाँति स्थित हो गये।
- प्रभासखण्ड * १३२१
तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले धीवर वहाँ आये। उन्होंने वहाँ एक महाजाल बिछाकर उसे बलपूर्वक बाहरकी ओर खींचा। जालके साथ आपस्तम्बजी भी खिंच आये। तपस्यासे उद्दीप्त उन महर्षिको देखकर सब केवट भयसे व्याकुल हो उठे और चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम करके बोले—'मुने ! हमने अनजानमें यह पाप कर डाला है; आप कृपा करके हमें क्षमा कर दें और इस समय आपका जो प्रिय कार्य हो, उसे करनेके लिये आज्ञा दीजिये।' मुनिने देखा अज्ञानवश यहाँ बहुत बड़ा संहार किया गया है; तथापि वे बड़े भारी क्षमाशील थे। उन्होंने दुखी होकर कहा—'यदि ज्ञानियोंका भी चित्त केवल अपने ही लाभमें रत है, ज्ञानी भी यदि स्वार्थका आश्रय लेकर ही ध्यान करते हैं, तब इस संसारके दुःखातुर प्राणी कहाँ सुख पायेंगे। जो मनुष्य एकान्ततः दुःख भोगना चाहता है, उसे मुमुक्षु पुरुष पापीसे भी पापी कहते हैं। मैं कौन-सा ऐसा उपाय करूँ, जिससे समस्त दुःखी प्राणियोंके अन्तःकरणमें प्रविष्ट होकर उनके सब दुःखोंको अकेला ही भोगूँ? यदि मेरा कोई शुभकर्म है तो वह दीन-दुःखी प्राणियोंको प्राप्त हो और उन सबने जो दुष्कर्म किया हो, वह सब-का-सब मुझे मिल जाय। संसारके अंधे, दीन-दुखी, अंगहीन, अनाथ तथा रोगी मनुष्योंको देखकर जिसके हृदयमें दया नहीं आती, वह मेरे विचारसे राक्षस है। जो समर्थ होकर भी प्राण-संकटमें पड़े हुए भयविह्वल प्राणियोंकी रक्षा नहीं करता, वह पाप भोगता है। अतः मैं इन दीन-दुःखी भयभीत जन्तुओंको छोड़कर एक पग भी कहीं नहीं जाऊँगा। फिर स्वर्गलोककी तो बात ही क्या है।'
महर्षिकी यह बात सुनकर वे मल्लाह बहुत घबराये। उन्होंने वहाँका सब वृत्तान्त राजा नाभागसे जाकर कहा। नाभाग भी यह समाचार सुनकर ब्रह्मनन्दन आपस्तम्बजीको देखनेके लिये तुरंत वहाँ आये। उनके साथ मन्त्री और पुरोहित भी थे। उन देवकल्प मुनिका भलीभाँति पूजन करके राजाने कहा—'भगवन् ! बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?'
आपस्तम्बजीने कहा—ये दुःखसे जीविका चलानेवाले केवट मुझको और इन जलजन्तुओंको जलसे निकालनेके कारण बड़े भारी परिश्रमसे थक गये हैं। इनके परिश्रमका जो उचित मूल्य समझो, वह दे दो।
नाभाग बोले—भगवन् ! मैं निषादोंको इनके परिश्रमका मूल्य एक लाख स्वर्णमुद्रा दूँगा।
आपस्तम्बने कहा—राजन् ! तुम्हें मुझे एक लाखके मूल्यसे नहीं बाँधना चाहिये। मेरे योग्य जो मूल्य हो, वह दो। अपने मन्त्रियोंके साथ सलाह कर लो।
नाभाग बोले—द्विजश्रेष्ठ ! इन निषादोंको एक करोड़ मूल्य दे दिया जाय। यदि यह भी उचित मूल्य न हो तो और भी दिया जा सकता है।
आपस्तम्बने कहा—राजन् ! मैं एक करोड़ या इससे अधिक मूल्यमें बेचनेयोग्य नहीं हूँ। मेरे योग्य मूल्य दो। जाओ, ब्राह्मणोंके साथ सलाह कर लो।
नाभाग बोले—मेरा आधा या समूचा राज्य निषादोंको दे दिया जाय। मैं इसे ठीक मूल्य समझता हूँ। आपकी क्या राय है ?
आपस्तम्बने कहा—भूपाल ! तुम्हारा आधा या समूचा राज्य भी मेरे योग्य नहीं है। मेरे योग्य मूल्य दो। समझमें न आये तो ऋषियोंके साथ विचार करो।
आपस्तम्बजीका यह वचन सुनकर राजा नाभाग अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ दुःखसे आतुर एवं चिन्तित हो गये। इसी समय महातपस्वी महर्षि लोमश वहाँ आ गये और राजा नाभागसे बोले—'तुम डरो मत, मैं मुनिको सन्तुष्ट कर लूँगा।'
नाभाग बोले—महाभाग ! इन महात्मा मुनिका मूल्य बताइये और कुल, कुटुम्ब एवं बन्धु-
१३२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बान्धवोंसहित मुझ सेवककी इनके कोपसे रक्षा कीजिये। ये साक्षात् भगवान् रुद्र हैं। चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको भस्म कर सकते हैं। फिर मुझ विषयासक्त मानवकी तो बिसात ही क्या है।
लोमशजीने कहा—महाराज! तुम तो स्तुत्य हो, ये द्विजश्रेष्ठ भी सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय हैं और गौएँ दिव्य होती हैं; अतः इनके मूल्यमें एक गौ दे दो।
यह सुनकर राजा नाभाग मन्त्री और पुरोहितोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और आपस्तम्ब मुनिसे बोले—'भगवन्! उठिये, उठिये। अब मैंने निस्सन्देह आपको खरीद लिया। मुनिश्रेष्ठ! यह गौ ही आपका योग्यतम मूल्य है।'
आपस्तम्बने कहा—राजन्! लो, अब मैं अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उठता हूँ। अबकी बार तुमने ठीक मूल्यपर मुझे खरीदा है। मैं गौओंसे बढ़कर परम पवित्र मूल्य दूसरा कुछ नहीं देखता। गौओंकी परिक्रमा तथा निरन्तर पूजा करनी चाहिये। वे मंगल-निकेतन हैं, स्वयम्भू ब्रह्माजीने इन गौओंकी दिव्य सृष्टि की है। ब्राह्मणोंके स्थान, गृह तथा देवताओंके मन्दिर भी जिनके गोबरसे शुद्ध होते हैं, उन गौओंसे बढ़कर दूसरा कौन प्राणी है। गौओंका मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी—ये पाँचों पवित्र हैं और सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करते हैं।
निम्नांकित मन्त्रका सदा जप करना चाहिये—
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे हृदये चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
'गौएँ मेरे आगे रहें। गौएँ सदा मेरे पीछे भी रहें। गौएँ मेरे हृदयमें रहें। मैं सदा गौओंके बीचमें निवास करूँ।'
जो मनुष्य पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर इस विशुद्ध मन्त्रका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और स्वर्गलोकमें जाता है। प्रतिदिन गौओंको भक्तिपूर्वक ग्रास समर्पित करना चाहिये। जो उन्हें गोग्रास दिये बिना स्वयं भोजन करता है, वह दुर्गति को प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन गोग्रास देता है, वह उतनेसे ही अग्निहोत्र, पितृतर्पण और देवपूजन—सब कुछ कर लेता है। गोग्रास देनेका मन्त्र इस प्रकार है—
सौरभेयी जगत्पूज्या देवी विष्णुपदे स्थिता।
सर्वमेतन्मया दत्तं मया दत्तं प्रतीच्छतु॥
'सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय सौरभेयी देवी भगवान् विष्णुके गोलोकधाममें स्थित हैं। मैंने यह सब अन्न उनकी सेवामें समर्पित किया है। मेरे दिये हुए इस आहारको वे ग्रहण करें।'
गोपुत्रों (बैलों)-की रक्षा करनेसे, गौओंको सहलाने और खुजलानेसे तथा दुर्बल एवं पीड़ितोंकी रक्षा करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। आदि, मध्य और अन्त—तीनों कालोंमें गौओंकी स्थिति बतायी गयी है। वे देवताओंके दूध, घी एवं अमृतकी सदा रक्षा करती हैं; इसलिये उनका दान करना चाहिये। उनकी नित्य पूजा करनी चाहिये। वे स्वर्गमें पहुँचानेके लिये सीढ़ीके तुल्य बतायी गयी हैं।
इस प्रकार गौओंका उत्तम माहात्म्य सुनकर वे निषाद महात्मा आपस्तम्बके चरणोंमें प्रणाम करके बोले—'संतोंका वार्तालाप, दर्शन, स्पर्श, कीर्तन तथा स्मरण—ये सभी निश्चय ही पवित्र करनेवाले हैं—ऐसी बात सुनी गयी है। मुने! हमारे साथ आपने सम्भाषण किया और हमें आपका दर्शन प्राप्त हुआ। अब हमपर अनुग्रह कीजिये और हमारी दी हुई यह गौ ग्रहण कीजिये।'
आपस्तम्ब बोले—निषादो! यह मैं तुमसे गोदान लेता हूँ। तुम पापरहित होकर जलसे निकाले हुए इन मत्स्योंके साथ ही स्वर्गलोकको जाओ। प्रतिग्रहरूप निन्दित कर्मसे भी दूसरे प्राणियोंकी प्रसन्नताका कार्य करके यदि मैं नरकमें पडूँगा तो उसे भी स्वर्ग ही समझूँगा। मैंने मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा जो कुछ भी पुण्यकर्म किया हो, उससे समस्त दुःखातुर प्राणी शुभ गतिको प्राप्त हों।
- प्रभासखण्ड * । १३२३
तदनन्तर उन विशुद्ध चित्तवाले महर्षिके प्रसादसे वे निषाद उनकी बात पूरी होते ही मत्स्योंसहित स्वर्गलोकमें चले गये। मछलियों और मछलीमारोंको इस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते देख मन्त्रियों और सेवकोंसहित राजा नाभाग विस्मित होकर बोले—'कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदैव संतोकी सेवा करनी चाहिये। साधु पुरुष पुण्यतीर्थोंके जलके समान होते हैं। इस लोकमें यदि क्षणभर भी उनकी उपासना की जाय तो वह निष्फल नहीं होती। संतोंके साथ बैठना चाहिये। संतोंके साथ उत्तम कथा-वार्ता करनी चाहिये। जिस सभामें संत बैठे हों, वहाँ बैठना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। संत समागमसे ही ये मत्स्य और मल्लाह पुण्यात्मा मनुष्योंकी भाँति स्वर्गलोकमें चले गये।'
तदनन्तर मुनिवर आपस्तम्ब और महामुनि लोमश राजा नाभागको नाना प्रकारके अभीष्ट वर माँगनेके लिये प्रेरित करने लगे। तब राजाने अत्यन्त दुर्लभ धर्मबुद्धिको वरण किया, अर्थात् यह वर माँगा कि मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे। वे दोनों मुनि 'तथास्तु' कहकर प्रसन्नतापूर्वक राजाकी प्रशंसा करते हुए बोले—'राजेन्द्र ! तुम धन्य हो, जो तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी है। मनुष्यमात्रके लिये धर्म अत्यन्त दुर्लभ है। विशेषतः राजाओंके लिये तो वह परम दुर्लभ है। यदि राजा मदोन्मत्त होकर स्वधर्मका परित्याग न करे तो संसारमें उससे श्रेष्ठ कौन पुरुष होगा। राजाओंको सदा जन्म लेना पड़ता है—यह ध्रुव है। उन्हें सदा मोह होता—यह भी ध्रुव है और मोहसे नरककी प्राप्ति भी ध्रुव है। अतएव बुद्धिमान् पुरुष राज्यकी निन्दा करते हैं। विषय-लोलुप मनुष्य राज्यको अधिक महत्त्व देते हैं; किंतु मनीषी मानव उसीको नरकके समान देखते हैं, अतः महाराज ! यदि तुम अपने लिये सनातन गति चाहते हो तो कभी मद न करना; क्योंकि वह लोक-परलोक दोनोंका नाश करनेवाला है।'
यों कहकर वें दोनों महात्मा अपने-अपने आश्रमको चले गये। नाभागने भी वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश किया। पार्वती ! इस प्रकार देविका नदीका प्रभाव बताया गया। मुनीश्वर आपस्तम्बने वहाँ शिवलिंगकी स्थापना की। वे निषादोंके जालमें पड़े थे, इसलिये उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका नाम जालेश्वर हुआ। चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको जो वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान करता है, उसके उस श्राद्धका कभी अन्त नहीं होता।
चन्द्रेश्वर, कपिलेश्वर तथा नलेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! आशापुर विघ्नराजके स्थानसे दक्षिण एवं नैर्ऋत्यकोणमें थोड़ी ही दूरपर एक पापहारक चन्द्रेशलिंग है। वहीं अमृतकुण्ड और कुलकुण्ड भी हैं। जो उन कुण्डोंमें स्नान करके चन्द्रेश्वरकी पूजा करेगा, वह सहस्र वर्षोंतक तपस्या करनेका फल पायेगा। वहीं चन्द्रतड़ाग है, जिसका विस्तार सोलह धनुषका है।
वहाँसे परम उत्तम कपिलेश्वरलिंगका दर्शन करनेके लिये जाय। वह स्थान शशिभूषणसे पूर्व, कोटितीर्थसे पश्चिम, जरद्गवसे दक्षिण तथा समुद्रसे उत्तर है। यह कपिलक्षेत्र पुण्यहीन पुरुषोंके लिये दुर्लभ है। पूर्वकालमें महर्षि कपिलने वहाँ महेश्वरकी स्थापना करके दस हजार वर्षोंसे अधिक कालतक बड़ी भारी तपस्या की थी। उनके द्वारा वहाँ कपिलधारा नामकी दिव्य महानदी लायी गयी है। समुद्रमें आज भी उसका दर्शन होता है। जो कपिला नदीमें नहाकर कपिला गायका दान करता है, वह कोटि गोदानके फलका भागी होता है। यह सभी पापोंका एकमात्र प्रायश्चित्त बताया
१३२४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गया है। भादोंमासके कृष्णपक्षमें षष्ठी तिथिको यदि मंगलवार, रोहिणी नक्षत्र तथा व्यतीपात योग हो तो वह कपिला-षष्ठी कही जाती है। उस दिन कपिलक्षेत्रमें, अर्कस्थलमें तथा शुभ कपिलासंगममें मिट्टी और तिलोंके द्वारा स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं जपके पश्चात् मनुष्य रक्तचन्दनमिश्रित जल एवं कनेरके फूलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
नमस्त्रैलोक्यनाथाय उद्भासितजगत्त्रय।
तेजोरश्मे नमस्तुभ्यं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
‘त्रिलोकीनाथ भगवान् सूर्यको नमस्कार है। तीनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाले तेजोरश्मे! आपको नमस्कार है। बार-बार नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।’
तत्पश्चात् सूर्यदेवकी परिक्रमा करके कपिलेश्वरजीकी पूजा करे।
कपिलेश्वरसे ईशान तथा उत्तर दिशामें जरद्गवके द्वारा स्थापित जरद्गवेश्वरलिंग है। वहीं देवनदी अंशुमती बहती है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पिण्डदान देता है, वह सौ कोटिसे भी अधिक वर्षोंतक पितरोंको तृप्त रखता है। चन्दन, पुष्प, पंचामृत तथा गुग्गुलकी धूपसे जरद्गवेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें दण्डवत्-प्रणाम तथा उनकी स्तुति भी करनी चाहिये। उनके समीप नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मण-भोजन करानेका पुण्य होता है।
जरद्गवसे पूर्वदिशामें एक सौ अस्सी धनुषकी दूरीपर हाटकेश्वरलिंग है। वहीं दमयन्तीके पति राजा नलने नलेश्वर शिवकी स्थापना की है। उसका दर्शन और विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य कलिदोषसे छुटकारा पाता और युद्धमें विजयी होता है।
राजा गज और भद्रमुनिका संवाद, विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और दामोदर-माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जिनके देवदुर्लभ दिव्य जलका सेवन करते हैं, उन गंगाजीके मुनिजनसेवित परममनोहर पवित्र तटपर गज नामके एक बलवान् राजा राज-काज छोड़कर स्नानके लिये आये। उनकी सती-साध्वी पतिव्रता पत्नी भी उनके साथ वहाँ आयी। दोनों दम्पति गंगाजीके किनारे रहने लगे। इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनके दस हजार वर्ष बीत गये। तदनन्तर महायशस्वी भद्रमुनि जप-होमपरायण अनेक ब्राह्मणोंके साथ वहाँ आये। उन्होंने गंगाजीमें स्नान करके अपने शरीरका मल नष्ट किया, फिर समस्त भूत-प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जल देकर भगवान् जनार्दनकी पूजा की। फिर ज्यों ही वे नदीके तटपर डेरा डालने लगे, त्यों ही उनकी दृष्टि राजा गजपर पड़ी। राजाने भी उन सबको देखा और आगे जाकर कहा—‘पूजनीय महर्षियो! आपलोग मेरे घर पधारें। मेरी यशस्विनी पत्नी संगताके हाथसे पूजा ग्रहण करके जहाँ आपकी इच्छा हो, उस पुण्य पथपर जाइयेगा।’
राजाके इस प्रकार अनुरोध करनेपर वे महर्षि उनके भवनमें पधारे। उनको विचित्र आसन देकर राजाने उनके आगे हाथ जोड़े और भद्र मुनिसे कहा—‘मुने! यह पृथ्वी धन-धान्यसे परिपूर्ण है, नगरी, पुरी, पर्वत, समुद्र, सरिता, सरोवर, ग्राम, गोकुल, श्रेष्ठ मनुष्य, रत्न तथा आकर आदिसे सुशोभित है। भोगमें आसक्त होकर परम ज्ञानसे विमुख रहनेवाले पुरुषोंके लिये इसका त्याग कठिन है। भोग-सम्पन्न पृथ्वी ही महाभयानक संसारमें पुनरावृत्ति करानेवाली
- प्रभासखण्ड * १३२५
है। यहीं बार-बार पुरुष गिरते हैं। अतः जिस दान और तपस्याके अनुष्ठानसे मनुष्य निर्मल स्वर्गलोकको पाता है, उसका उपदेश कीजिये।'
भद्र बोले-राजेन्द्र ! जो अपने भीतर विराजमान सच्चिदानन्दघन परमात्माको नहीं देखते, उनके लिये बाह्य तीर्थ जलसे भरे हुए जलाशयमात्र हैं और देवता पत्थर एवं मिट्टीकी मूर्तिमात्र हैं। यदि परमात्मतत्त्वका ज्ञान है, तभी तीर्थों और देवताओंके चिन्मय स्वरूपका दर्शन होता है। इस भूतलपर अनेक तीर्थ हैं, बहुत-से पुण्यमय देवमन्दिर हैं, बहुतेरी पुण्यसलिला पवित्र नदियाँ तथा पावन जलवाले समुद्र हैं। यह पृथ्वी स्थान-स्थानमें पग-पगपर बहुत पुण्य देनेवाली है। कृष्ण, विष्णु, हृषीकेश, शंखी, गदी, चतुर्भुज, महाबाहु, प्रभासवासी, दैत्यसूदन, वाराह, वामन, नरसिंह, बल, अर्जुन, श्रीराम, परशुराम, बलराम, पुरुषोत्तम, पुण्डरीकाक्ष, गदापाणि, राघव, शत्रुदमन, गोविन्द, जय, भूधर, जनार्दन, सुरेश, श्रीधर, हरि, योगीश्वर, कपिलेश्वरनाथ, श्वेतद्वीपपति, बदरिकाश्रमवासी नर-नारायण, पद्मनाभ, सुनाभ, हयग्रीव, द्विजनाथ, धरानाथ, शार्ङ्गपाणि, दामोदर, जगन्नाथ तथा सर्वपापहारी हरि—ये ही देवाधिदेव श्रीविष्णुके स्थान हैं। इनमेंसे जहाँ भी मनुष्य जाते हैं, वहीं सब पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, शतद्रु, विन्ध्या, पयोधा, वरदा, चर्मण्वती, सरयू, गण्डकी, चन्द्रभागा, विपाशा, तथा शोणा—ये और दूसरी भी बहुत-सी सरिताएँ पुण्यमयी हैं। हिमवान् पर्वत भी पुण्य तीर्थ है। इन सबके नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे समस्त पाप रसातलको चले जाते हैं। अगहनमें कान्यकुब्ज तीर्थमें निवास करके स्त्री और पुरुष शोकमुक्त होते हैं तथा स्वर्गलोकमें जाते हैं। यदि पौषमासकी पूर्णमासीको अर्बुदाचल (आबू)-में निवास करे तो मनुष्य पितरोंके साथ अरबों वर्षोंतक स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है। यदि गयामें माघमासकी पूर्णिमाको मनुष्य पितरोंका श्राद्ध करे तो वह भगवान् विष्णुके परमधाममें जाता है। जो फाल्गुनकी पूर्णिमाको एक रात हिमालयपर निवास करता है, वह श्रीहरिके उत्तम लोकमें जाता है। जो मनीषी पुरुष चैत्रकी पूर्णिमाको प्रभासक्षेत्रमें श्राद्ध करते हैं, वे अपने कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषोंके साथ इस मर्त्यलोकमें जन्म नहीं लेते—मुक्त हो जाते हैं। जो वैशाखकी पूर्णिमाको अवन्तीपुरीके जलप्रिय तीर्थमें जल पीते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो ज्येष्ठकी पूर्णिमाको त्रिकूपमें श्राद्ध करते हैं, वे वैकुण्ठमें जाते हैं। श्रावणकी अमावास्या तथा पूर्णिमाको पूर्वसागरमें स्नान, दान, तप और श्राद्ध करनेवाला पुरुष शोकमुक्त हो जाता है। जो भाद्रपदमासमें प्रभासमें शशिभूषणका पूजन करता है, वह देवस्वरूप हो जाता है। जो आश्विनमासमें चन्द्रभागाके तटपर श्राद्ध और स्नान करता है, वह स्वर्गलोकमें निवास पाता है। जो अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का जप करते हुए चार भुजाधारी नारायणका ध्यान करता है, वह वैकुण्ठधाममें जाता है। सब महीनोंमें कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकमें भी भीष्मपंचक श्रेष्ठ है, उसमें भी दामोदर-तीर्थके जलमें द्वादशी तिथिका स्नान और भी श्रेष्ठ है। दामोदरमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दामोदर-तीर्थमें जिनकी जहाँ कहीं भी मृत्यु हो गयी है, वे श्रीहरिके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं, संसारमें कभी जन्म नहीं लेते। सोमनाथके समीप उदयान्त नामक महान् पर्वत है; उसके पश्चिम भागमें रैवत पर्वत है, जहाँ कांचनशेखरा नदी बहती है। उस पर्वतमें लाल, सफेद, नील और कृष्ण धातुएँ हैं। उसमें कुछ पत्थर हाथीके समान आकारवाले हैं और दूसरे सुवर्णके सदृश हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा शूद्रोंके सेवक उस पर्वतका सदा सेवन करते हैं। बहुत-से पक्षी वहाँ चहकते रहते हैं। पशु-पक्षी, सर्प तथा कीट, पतंग आदि जो भी जीव वहाँ कालवश मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे उत्तम विमानपर आरूढ़ हो
१३२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भगवान् विष्णुके धामको जाते हैं। उपर्युक्त नदी धरती फोड़कर पातालसे आयी है। इन्द्रने भी स्वर्गसे यहाँ आकर उत्तम यज्ञ किया और अतिशय उत्तम पद पाकर व्याधिहीन स्वर्गलोककी उपलब्धि की। कार्तिकमें राजा बलिने भी वहाँ आकर बहुत-से दान दिये हैं। हरिश्चन्द्र, शिबि, नल, नहुष, नाभाग तथा अम्बरीष आदिने भी वहाँ दुष्कर कर्म किये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके वस्त्र, छत्र तथा रसमिश्रित अन्न दान करके वे विष्णुलोकमें गये, जहाँसे फिर इस मर्त्यलोकमें पुनरावृत्ति नहीं होती। जो उस तीर्थमें ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक पत्र, पुष्प, फल और जल दान करता है, वह जलशायी भगवान् श्रीहरिको प्राप्त होता है। जो भूखसे पीड़ित मनुष्यके लिये वहाँ एक पसर या मुट्ठीभर भी अन्न देता है, वह श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर चन्द्रलोकसे भी ऊपर जाता है। दामोदरके आगे एक मासतक उपवास करनेपर मनुष्य दामोदरनगर (वैकुण्ठधाम)-को जाता है, जहाँसे फिर नहीं लौटता। जो दामोदरके आगे पाँच पत्थरका मन्दिर बनवाता है, वह भगवान् श्रीहरिके धाममें जाता है। जो स्त्री भगवान्का सुन्दर मन्दिर बनवाती है, वह विष्णुधामको जाती है। जो एक हजार पत्थरोंका बहुत सुन्दर मन्दिर बनवाता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो दामोदर-मन्दिरपर पचरंगी ध्वजा फहराता है, वह उसके तन्तुओंके बराबर दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वहाँसे दो कोसपर वस्त्रपथ नामक उत्तम क्षेत्र है, जिसका दर्शन करनेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं और पुनरावृत्तिरहित परम धामकी प्राप्ति होती है। स्त्री या पुरुष, जो भी संसारबन्धनका नाश करनेवाले शिवका पूजन करते हैं, वे शिवलोकमें पूजित होते हैं।
भद्रकी यह बात सुनकर राजा गज कार्तिककी पूर्णिमाका तीर्थकृत्य करनेके लिये ऋग्, यजु और सामवेदके ज्ञाता ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, क्षात्रधर्मपरायण क्षत्रियों, दानपरायण वैश्यों तथा सेवाकुशल शूद्रोंको साथ लेकर उस तीर्थमें आये और अनेक प्रकारके दान दे अग्निमें होम करके अग्निष्टोम तथा अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस तीर्थमें कितने ही पुरुष गायत्री-मन्त्रका जप करते और कुछ लोग मन-ही-मन सावित्री एवं सरस्वतीका ध्यान करते थे। कितने ही ब्राह्मण ब्रह्माजीके द्वारा संकलित पवित्र वैदिक सूक्तोंका पाठ करते और दूसरे लोग द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रका जप करते थे। सब शास्त्रोंको देखकर और बार-बार उनपर विचार करके एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।^१ महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो गिरते हुएकी रक्षा करे। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह बार-बार जाकर लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर मन्त्रका चिन्तन करनेवाले भक्तजन आज भी नहीं लौटते।^२ जिसने 'हरि' इन दो अक्षरोंका एक बार भी उच्चारण कर लिया, उसने मोक्षधामतक पहुँचनेके लिये मानो कमर कस ली है।^३ एकभक्त व्रत, नक्तव्रत, अयाचितव्रत और उपवासव्रत—ये तथा और भी जो व्रत हैं, उनका भगवान् दामोदरके आगे अनुष्ठान करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाते हैं। राजा गज ऋषियोंके साथ वहाँ बैठे हुए वार्तालाप कर ही रहे थे कि इतनेमें वहाँ सहस्रों विमान आ गये। वे पत्नी तथा देशवासियोंसहित विमानपर आरूढ़ हो अनामय पदको प्राप्त हुए। जो मानव सदा इस प्रसंगको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुधामको जाता है।
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१- आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः। इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १४)
२- गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १६)
३- सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १८)
* प्रभासखण्ड * । १३२७
तीर्थमें पूजन, श्राद्ध और दानकी महिमा; गृहस्थके लिये आचरणीय शिष्टाचार, दान एवं श्राद्धका उपदेश
सारस्वत मुनि कहते हैं—जो गंगाजल, मधु, घृत, कुंकुम, अगर, चन्दन, गुग्गल, बिल्वपत्र, गूमका फूल आदि आवश्यक वस्तुओंका भार कंधेपर रखकर पैदल तीर्थयात्रा करता है और तीर्थमें स्नान करके शिव, विष्णु तथा ब्रह्माजीका दर्शन करता एवं उन्हें पूजा चढ़ाता है, वह सब बन्धनोंसे मुक्त हो प्रलयकालपर्यन्त भगवान् शिवका पार्षद बना रहता है। जो स्त्री, पुत्र, मित्र, भाई तथा सज्जन पुरुषोंके साथ तीर्थयात्रा करता है तथा तीर्थमें वहाँके प्रधान देवताका चिन्तन करता है, वह उत्तम गतिको पाता है। सुन्दर देवमूर्तिका निर्माण करके उसे रथपर स्थापित करे। फिर चन्दन, अगर, कपूर, कुंकुम, भाँति-भाँतिके पुष्प, धूप, दीप, गीत, नृत्य और वाद्य आदिके द्वारा उसकी पूजा करे। जो यों करता है, वह जन्मभरके पापोंको भस्म करके तेजोमय, सर्वव्यापी तथा विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् पुराणपुरुषका दर्शन करता और मुक्त हो जाता है। तीर्थमें स्नान करके सन्ध्यावन्दन, श्राद्ध-तर्पण आदि करनेके विषयमें ब्राह्मणकी आज्ञा लेनी चाहिये और उसकी बात माननी चाहिये। तदनन्तर दर्भ, तिल और हविष्यान्नका श्रद्धापूर्वक प्रयोग करना चाहिये। तीर्थमें अगस्त्य, भृंगराज एवं कमलके पुष्प, कपूर, अगर, चन्दन, कुंकुम और तुलसीदल आदिको संकल्पपूर्वक चढ़ानेपर अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। तीर्थभूमिमें ताम्बूल, फल, नैवेद्य, तिल, कुशा और जलके साथ बिल्वके बराबर पिण्ड देना चाहिये। अमावास्या, पूर्णिमा, माता-पिताकी निधन-तिथि, गजच्छाया और त्रयोदशी तिथिको एवं श्राद्धयोग्य द्रव्य और श्रेष्ठ ब्राह्मण प्राप्त होनेपर पितरोंके ऋणसे मुक्त होनेके लिये घरपर श्राद्ध करना चाहिये। सागरगामिनी नदीके तटपर श्राद्ध किया जाय तो घरसे सौगुना अधिक फल होता है। मनुष्य यदि प्रभास, पुष्कर, गया, पिण्डतारक प्रयाग, गोमती, भव तथा दामोदरके सम्मुख एवं नर्मदा आदि तीर्थोंमें श्राद्ध करे तो उसके पितर सब पापोंसे मुक्त हो उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं और श्राद्धकर्ता भी उत्तम सन्तान पाकर तथा उत्तम भोग भोगकर अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको जाता है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि, माया, मात्सर्य, चुगली, अविवेक, अविचार, अहंकार, स्वच्छन्दता, चपलता, लोलुपता, अन्यायसाधन, आयास, प्रमाद, द्रोह, दुस्साहस, आलस्य, दीर्घसूत्रता, परस्त्रीगमन, अत्यधिक आहार, सर्वथा आहारका त्याग, शोक तथा चोरी इत्यादि दोषोंको त्यागकर जो घरमें सदाचारपूर्वक रहता है, वह मनुष्य इस भूमिका, देशका तथा नगरका भूषण है। वह श्रीमान्, विद्वान् तथा कुलीन है और वही सब पुरुषोंसे श्रेष्ठ है। काम आदिके कारण कोई भी घरमें दोषोंका त्याग नहीं कर पाता। जिसने दोषोंका परित्याग कर दिया है, उसीके द्वारा स्नान, सन्ध्या, जप, होम, श्राद्ध-तर्पण तथा देवपूजा आदि सत्कर्म सम्पन्न होते हैं। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सरस्वती नदी, समुद्र, गया, रुद्रपद, नर-नारायणका आश्रम, प्रभास, पुष्कर, कृष्ण-गोमती, पिण्डतारक, वस्त्रापथ, पुण्यगिरि, दामोदर, भीमेश्वरी, नर्मदा, स्कन्दतीर्थ, रामेश्वर आदि, उज्जयिनी, महाकाल, काशी, कलिंग और मथुरा—इन तीर्थोंकी मनुष्य यदि एक बार भी यात्रा कर लेता है तो वह ब्रह्महत्या आदि समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। गंगा आदि नदियाँ जो समुद्रमें मिली हैं, उनमें पग-पगपर पुण्यकी निधिरूप अनेक तीर्थ हैं, जिनके स्मरणमात्रसे ही सब पापोंका नाश हो जाता है। कामभोगमें आसक्त चित्तवाले जो मूढ़ मानव स्त्रियोंमें रमते रहते हैं,
१३२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उनकी यह विपरीत धारणा है कि सुन्दरी स्त्रियोंका शरीर अपने अपवित्र शरीरसे कोई भिन्न वस्तु है। वे मुक्ति-मार्गसे भ्रष्ट होकर पशुयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मानव पुष्ट शरीर और नीरोग युवावस्था पाकर गंगा आदि तीर्थोंमें नहीं जाते, वे ज्ञानशून्य खल जीते-जी भी मरे हुएके समान हैं। पहले शुभ और अशुभ कर्मोंका बन्धन काटकर फिर कल्याणमय मोक्ष पानेकी इच्छा करे। यदि ऐसा न हो सके तो मनुष्योंको सदा शुभ कर्म ही करना चाहिये। प्रतिदिन उठकर स्नान करे। उसके बाद भगवान् विष्णु और शिवकी पूजामें संलग्न हो। सदा सच बोले। सबका हित करे। अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। परनिन्दासे डरे। परायी स्त्रियोंसे दूर रहे। सुवर्णकी चोरी, पृथ्वीका अपहरण और ब्राह्मणके धनका त्याग करे। ब्राह्मण, स्त्री, राजा, बालक, वृद्ध, तपस्वी, पिता-माता तथा गुरुजन—इनका मनसे भी कभी अप्रिय न करे। देश-कालका ज्ञान तथा पात्र और अपात्रका विवेक रखना चाहिये। गृहस्थ पुरुष याचकोंको छाया, तृण, अन्न, वस्त्र, मट्ठा, अग्नि, ईंधन, काँजी, औषध और शाक दे। एकादशी, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, व्यतीपात, संक्रान्ति, ग्रहण, वैधृति, पिता-माताकी निधन-तिथि, युगादि-तिथि और मन्वादि तिथिको अपने घरमें श्राद्ध, दान एवं कीर्तन आदिका उत्सव मनाना चाहिये। अथवा उक्त तिथियोंको तीर्थमें जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ घरसे सौ गुना फल होता है। गृहस्थ पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करे। मदिरा पीना और जूआ खेलना छोड़ दे। विवादमें जाना और युद्ध करना यत्नपूर्वक त्याग दे। स्नान, दान, जप, होम, देवपूजन और ब्राह्मणभोजन आदि पुण्यकर्म यदि उक्त तिथियोंमें विधिपूर्वक किये जायें तो वे सब अक्षय होते हैं। किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक भी गौ अवश्य दान करे, जो वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित, दूध देनेवाली, बछड़ेवाली और तरुणी (नयी) हो। जो एक भी गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जब यमदूत किसी पुरुषको बाँधकर उसे यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं, उस समय दानमें दी हुई नन्दा गौ वहाँ आकर उसे अपने पुत्रकी भाँति देखती है और यमदूतोंको अपने हुंकारसे जीतकर दाताको साथ ले शिवलोकमें पहुँचा देती है। यदि अपने आहारमेंसे चौथाई भाग सिद्धान्न निकालकर दान किया जाता है तो दाता पुरुष निश्चय ही ध्रुवलोकमें जाता है। यदि प्रतिदिन अपने आहारके बराबर अन्न गौओंको गोग्रासके रूपमें दिया जाता है, उसे देनेवाला पुरुष शिवलोकमें जाता है। ओखली, चक्की, चूल्हा और झाडू आदिके द्वारा जो पाप बन जाता है, उस पापको गृहस्थ पुरुष प्रतिदिन भिक्षा देकर धोता है। एक ग्रास अन्नकी भिक्षा होती है। जहाँ उतनी भिक्षा प्रतिदिन दी जाती है, उसी घरको घर समझना चाहिये। दूसरा घर श्मशान-सा दिखायी देता है। घर, अन्न, जल सिद्धान्न, छाता, जूता, कमण्डलु, अँगूठी और वस्त्र दान करके मनुष्य स्वर्गमें जाता है। जो थके हुएको सवारी देता, प्यासेको पानी पिलाता और भूखसे पीड़ित मनुष्यको अन्न देता है, वह विमानद्वारा स्वर्गलोकमें जाता है। अपनी शक्तिके अनुसार सदा घृतयुक्त भोजन देना चाहिये; क्योंकि प्राण अन्नमय है, अतः उसे पाकर प्राणी सन्तुष्ट होते हैं। संसारमें भूखकी पीड़ा ही सबसे बड़ी पीड़ा है। उसकी दवा है अन्न। अन्नसे ही वह पीड़ा शान्त होती है। इसलिये अन्नदान उत्तम है। अन्न, वस्त्र, फल, जल, मट्ठा, शाक, घृत, मधु, पत्र, पुष्प, जूता, गुदड़ी, छड़ी, कमण्डलु, छाता, पात्र, विद्या, पुस्तक, देवपूजा, कन्या, कुश, यज्ञोपवीत, बीज, ओषधि, गृह, रत्न, क्षेत्र, यज्ञपात्र, योगपट्ट, पादुका, काला मृगचर्म, बुद्धिदान, धर्मोपदेश तथा धर्मकथा—इन सबके द्वारा सदैव दान करते रहना चाहिये। उससे महान् कल्याण होता है और दाता सब पापोंका नाश करके शिवलोकमें जाता है। श्राद्धमें
* प्रभासखण्ड *
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कुलीन, वेदज्ञ, क्रोधरहित, स्नानशील तथा अपने देशके अनुकूल सदाचारमें तत्पर गृहस्थ ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। श्राद्धके एक दिन पहले निष्काम, लोभरहित एवं नीरोग ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देना चाहिये; किंतु गाँवभरकी पुरोहिती करते हों, उनको नहीं। उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके आगे विधिपूर्वक पिण्डदान करना चाहिये। बिना श्रद्धाके किया हुआ श्राद्ध दूसरेके किये हुएके समान निष्फल होता है। अतः क्रोध त्यागकर श्रद्धापूर्वक श्राद्धका अनुष्ठान करना चाहिये। श्राद्धकर्ममें बलिवैश्वदेवके अन्तमें वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, पथिक एवं तीर्थसेवी अतिथिका सत्कार करना चाहिये। गृहस्थोंको चाहिये कि वे अपनी शक्तिके अनुसार संन्यासियोंका सदा ही पूजन करें।
राजा बलिके राज्यकी प्रशंसा, नारदजीका बलिको राजाके कर्तव्यका उपदेश, उत्पात-शान्तिके लिये बलिके द्वारा यज्ञका प्रारम्भ
महाबलवान् भगवान् नृसिंहने हिरण्यकशिपुको मारकर त्रिलोकीका राज्य इन्द्रको दे दिया। हिरण्यकशिपुके कुलमें बलि पैदा हुए। वे बड़े बलवान् थे। उन्होंने इस पृथ्वीका एकछत्र शासन किया। उनके राज्यमें सारी पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित होती थी। वृक्षोंमें सुगन्धित पुष्प और रसीले फल लगते थे। वृक्षोंमें तनेके ऊपरतककी डालियोंमें फल लगते थे। उनके पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था। सभी ब्राह्मण चारों वेदोंके ज्ञाता होते थे। क्षत्रिय युद्धकलामें कुशल, वैश्य गोसेवापरायण तथा शूद्र द्विजमात्रकी सेवामें तत्पर होते थे। सब लोग दरिद्रता, दुःख और अकालमृत्युके भयसे मुक्त हो दीर्घजीवी होते थे। रातमें प्रत्येक भूभागमें दीपकोंका इतना प्रकाश होता कि रात्रि भी दिनके समान जान पड़ती थी। जैसे देवता देवलोकमें सुखपूर्वक विहार करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भूलोकमें सानन्द विचरण करते थे। पृथ्वी स्वर्गरूप हो गयी थी और वहीं राजा बलि राज्य करते थे। देवताओं और दानवोंमें परस्पर युद्ध नहीं होता था।
एक समयकी बात है नारदजी राजा बलिके भवनमें पधारे। बलिने उन्हें आसन, पाद्य और अर्घ्य देकर उनका पूजन किया, फिर सब दैत्य और दानव बैठे। उस समय शुक्राचार्यसहित बलिने नारदजीसे कहा—'देवर्षे ! यह राज्य, यह पत्नी, ये मेरे पुत्र और मैं बलि सब आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। इनमें जिससे आपका जो कार्य हो, उसे कहिये।'
नारदजीने कहा—राजन् ! जो ब्राह्मण यजमानकी भक्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे 'भूमिदेव' कहे गये हैं। तुमने मेरा भलीभाँति पूजन किया, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मुझे धनसे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तुम्हारे राज्यसे, तुम्हारे, यज्ञ, दान और व्रतोंसे परम सन्तुष्ट हूँ। बले ! मैं देखता हूँ, देवताओंद्वारा तुम्हारा कुछ अप्रिय कार्य किया गया है। तुमसे भलीभाँति पूजित होनेपर भी देवराज इन्द्र सन्तुष्ट नहीं हो रहे हैं। मैंने सुना है, देवताओंके प्रयत्नसे भूतलपर तुम्हारे राज्यका उच्छेद होगा। यह सुनकर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह शीघ्र करो।
राजा बलिने पूछा—प्रभो ! राजा किन गुणोंसे राज्य करता है, यह बताइये। दान सत्पात्रको देना चाहिये या अपात्रको?
नारदजीने कहा—जो राजा छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होकर राज्य करता है, वही राज्यका फल पाता है। राजा पापरहित हो सब धर्मोंका प्रेमपूर्वक अनुष्ठान करते हुए आस्तिक बना रहे। गुप्तरूपसे अर्थका साधन करे, कामनाओंको त्याग दे और उद्दण्डतासे दूर रहे। प्रिय वचन बोले, किंतु कभी दीन न हो। शूरवीर होकर रहे, परंतु डींग न