भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२९

पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूटसे इस उज्जयिनी पुरीमें आये। यहाँ मुनिश्रेष्ठ परशुरामजीसे मिलकर उन्होंने पूछा— 'महामुने! यहाँ कौन-कौनसे पुण्यतीर्थ हैं और कौन-सा क्षेत्र है?' श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर विप्रवर परशुरामजीने कहा— 'रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले वीर श्रीराम! प्राचीन कालमें अवन्ति देशके अन्तर्गत जो कुशस्थली नामकी भूमि थी, वही इस समय उज्जयिनीके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर तुम अपने पिता दशरथजीको पिण्डदानसे तृप्त करो। उस पुरीमें देवताओं और दानवोंके गुरु भगवान् महाकाल निवास करते हैं। वहाँ जो ब्राह्मण और महाबली क्षत्रिय जाते हैं, उन्हें उस परम पदकी प्राप्ति होती है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं।'

यह सुनकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी, जहाँ पुण्यदायिनी शिप्रा नदी बहती है, उस अवन्ती पुरीमें आये। वहाँ स्नान करके उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् वे महाकालजीका दर्शन करनेके लिये चले। इसी समय आकाशवाणीके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीने कहा— 'रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो, तुम अपने नामसे यहाँ मेरी स्थापना करो।' यह आकाशवाणी सुनकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— 'सुमित्रानन्दन! भगवान् शिवने मुझपर अनुग्रह किया है, अतः इस तीर्थमें तुम रामेश्वर नामक शुभ शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करो।' यह आज्ञा पाकर लक्ष्मणने वहाँ भगवान् शंकरको स्थापित किया। फिर शिवजीका पूजन करके श्रीराम, लक्ष्मण तथा जानकीजीने वहाँसे यात्रा की। जो मनुष्य रामतीर्थमें स्नान करके रामेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको जाता है।


सौभाग्य आदि तीर्थोंकी महिमा, अर्जुनको इन्द्रसे सूर्यप्रतिमाकी प्राप्ति तथा अवन्तीमें उसकी स्थापना और उनके दर्शनका माहात्म्य

सनत्कुमारजी बोले—सौभाग्यतीर्थमें स्नान करके सौभाग्येश्वरका दर्शन करनेपर मनुष्य सब पापोंसे छूटकर परम सौभाग्य पाता है। घृततीर्थमें स्नान करके भगवान् शिवको घृतसे नहलावे और अग्निमें घृतकी आहुति दे। ऐसा करनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। देवताओं और दैत्योंसे वन्दित योगीश्वरी देवीका पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो जाता है और परम उत्तम योगको प्राप्त होता है। शृंखावार्त तीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे छूटा हुआ पुरुष धन-धान्यसे सम्पन्न हो निर्मल कुलमें जन्म लेता है। शुद्धोदकतीर्थमें चतुर्दशीको मुक्तिके लिये स्नान करनेवाला मनुष्य सुरेश्वर शिवका दर्शन करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अवन्तीमें पत्तनेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् महेश्वर दर्शनीय हैं। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प, धूप और दीप आदि मनोरम उपचारोंसे भाव-भक्तिके साथ उनकी विधिवत् पूजा करता है, उसके वंशका नाश नहीं होता है और अन्तमें वह शिवलोकको जाता है।

पूर्वकालमें भगवान् सूर्यदेवने शिप्रा नदीके तटपर दुर्धर्ष नामसे प्रसिद्ध तीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य सप्तमी, अष्टमी, रविवार और संक्रान्तिके दिन उसमें स्नान करके पवित्र हो तीन रात वहाँ उपवास करता है और शिप्रा नदीके तटपर स्थित भगवान् शिवका दर्शन एवं भक्ति-भावसे पूजन करता है, वह पिता-माताके वंशका भलीभाँति उद्धार करके भगवान् शिवके समीप जाता है। गोपीन्द्र नामसे प्रसिद्ध जो तीर्थ है, उसमें स्नान करके मनुष्य इन्द्रके तुल्य पराक्रमी होता और स्वर्गलोक प्राप्त करता है। जो उस तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे पुनः इस भूतलपर जन्म नहीं

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लेते। गंगातीर्थमें ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्नान करनेका विशेष फल बताया जाता है। जो मनुष्य गंगातीर्थमें स्नान करके पुष्करण्डकका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकमें सुखी होता है। उत्तरेश्वरतीर्थमें स्नान करके मानव शीघ्र ही अपने पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है और स्वयं भी स्वर्गलोकमें जाता है। भूतेश्वरमें स्नान करके मनुष्य भूतेश्वरजीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे पूजन करे। इससे मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकको जाता है। जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एकाग्रचित्त हो अम्बालिका देवीका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो गन्ध और पुष्पद्वारा देवेश्वर शिवका अर्चन करता है, उसे शिवलोकमें निवास प्राप्त होता है। जो मनुष्य पवित्र हो भगवान् पुण्येश्वरका दर्शन करता है, वह गणपतिपदको प्राप्त होता है। जो लुम्पेश्वरतीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरकी भलीभाँति पूजा करता है, वह नरकमें नहीं जाता, स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जो स्थविरविनायक तीर्थमें स्नान करके गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य, भोज्य आदि सामग्रियोंसे गणेशजीकी पूजा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। जो विद्वान् मानव नवनदीके समीप गन्ध, पुष्प, धूप आदिके द्वारा पार्वतीजीका पूजन करता है, वह अनुपम सौभाग्यका भागी होता है। प्रयागतीर्थमें स्नान करके जो प्रयागेश्वरका दर्शन करता है, वह सब लोकोंको लाँघकर भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

पूर्वकालमें भगवान् नर और नारायणने इस पृथ्वीपर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतार लिया था। श्रीकृष्णके अवतारका उद्देश्य कुछ और था और अर्जुन किसी अन्य हेतुसे ही प्रकट हुए थे। श्रीकृष्णने कंस आदि समस्त दानवोंका युद्धमें संहार कर डाला। तदनन्तर कुन्तीपुत्र अर्जुन इन्द्रसे अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये स्वर्गलोकमें गये। वहाँ अस्त्रविद्या प्राप्त कर लेनेपर वीरवर अर्जुनने देवराज इन्द्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये कहा। तब देवराज इन्द्रने कहा—‘अर्जुन! हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले जो निवातकवच नामक उग्र दानव हैं, उनका शीघ्र वध करो, यही मेरे लिये गुरुदक्षिणा होगी।’ तब अर्जुनने उन दुष्ट दानवोंके वधकी प्रतिज्ञा की और एक भयंकर रथपर आरूढ़ हो धनुष-बाण लेकर युद्धके लिये प्रस्थान किया। उन समस्त दानवोंका संहार करके पार्थने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम दिखाया और सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न किया। उस समय कृतकार्य हुए अर्जुनसे इन्द्रने कहा—‘वीर! तुम कोई उत्तम वर माँगो।’ तब अर्जुनने उन दो प्रतिमाओंको माँगा, जिनकी पूजा साक्षात् ब्रह्माजीने की थी।

यह सुनकर इन्द्र बोले—अर्जुन! इन दोनों प्रतिमाओंका महात्मा शंकरने लाल कमलके फूलोंद्वारा ब्रह्माके एक दिनतक पूजन किया है। इसी प्रकार पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंका पालन करनेके लिये सुगन्धित नीलकमलके फूलोंसे सहस्रों वर्षोंतक इनकी पूजा की है। प्रजापति ब्रह्माजीने भी सृष्टि-रचनाकी कामना लेकर एकाग्रचित्त हो लाल कमलके फूलोंसे इन युगल प्रतिमाओंका पूजन किया है। कुन्तीनन्दन! तुम इन्हें मृत्युलोकमें कैसे ले जाओगे। इन प्रतिमाओंके बिना तो यह स्वर्गलोक तिनकेके तुल्य हो जायगा।

अर्जुनने कहा—प्रभो! मैं तो इसी वरदानका अभिलाषी हूँ, मुझे दूसरी कोई वस्तु नहीं चाहिये।

तब इन्द्रने कहा—वीर! तुम इन प्रतिमाओंको लेकर कुशस्थली (उज्जयिनी पुरी)-में स्थापित करो। शिप्राके उत्तर तटपर भगवान् केशव समस्त पापोंका नाश करनेवाले केशवार्की स्थापना करेंगे। सदा आषाढ़ और कार्तिकमासमें वहाँकी यात्रा होगी, मैं भी उस समय दर्शन करनेके लिये आऊँगा। मेरे साथ पवन, मेघ और बिजलियाँ भी होंगी। इन्हीं लक्षणोंसे मनुष्य कहेंगे कि ‘देवराज इन्द्र आ गये।’ मैं ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा पूजित भगवान् सूर्यको नमस्कार करके पुनः लौट आऊँगा।

ऐसा कहकर इन्द्रने अर्जुनको वे दोनों प्रतिमाएँ

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३१

दे दीं और उन्हें अपने पुत्रके साथ मर्त्यलोकको भेज दिया। देवर्षि नारदजी भगवान् श्रीकृष्णको बुलानेके लिये द्वारकामें गये और वहाँ इन्द्रका रहस्ययुक्त वचन सुनाकर कहा—'श्रीकृष्ण! आप कुशस्थलीको चलिये और विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई पारिजात-निर्मित युगल प्रतिमाओंका पूजन कीजिये। इन्द्रने वे दोनों प्रतिमाएँ आप तथा अर्जुनके लिये भेंट की हैं।'

नारदजीका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण उज्जयिनी पुरीको गये और वहाँ पाण्डुनन्दन अर्जुनको हृदयसे लगाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनसे कहा—'पार्थ! आज मुझे अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई है, तुम पूर्व दिशाकी ओर जाकर एक प्रतिमाकी स्थापना करो। दिनके पूर्वाह्नकालमें ही अति मनोरम शुभलग्नका उदय होगा। तब मैं भी प्रतिमा-स्थापनके लिये नदीके उत्तर तटको जाऊँगा। जब मेरा शंख बजे, उसी समय तुम सूर्यदेवकी स्थापना करो।'

यह आदेश पाकर अर्जुनने पूर्वदिशाकी ओर जा प्रतिमा-स्थापनाके योग्य शुभ स्थानका निरीक्षण किया। वे मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि 'इस देवप्रतिमाका स्थापन कहाँ करूँ।' इतनेमें ही उस प्रतिमाने स्वयं ही कारणसहित उत्तम स्थान बता दिया और अपने तेजसे वह स्थान पार्थको दिखला भी दिया।

अर्जुन बोले—देव! यहाँ अनेक स्थान हैं, बताइये, कौन आपको अधिक पसंद है। गोपते! आप प्रजाजनोंके लिये सौम्य रूप और उत्तम दर्शनीय हो जाइये।

तब सूर्यदेवने अर्जुनसे कहा—पार्थ! तुम मेरे दर्शनसे भय न करो। ऐसा कहकर दाहिने हाथसे अभय प्रदान करते हुए उन्होंने आश्वासन दिया और सौम्य रूप धारण कर लिया। भगवान् प्रभाकरने उस समय अर्जुनको अपने तेजोमय स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'यही मेरा अविचल स्थान है।' इतनेमें ही लग्न आ गया और भगवान् श्रीकृष्णने अपने महान् शंखको बजाया। वह शंखनाद सुनकर नरावतार अर्जुनने देववन्दित सूर्यविग्रहको स्थापित कर दिया और इस प्रकार स्तवन किया।

अर्जुन बोले—किरणोंकी मालासे मण्डित, अत्यन्त प्रकाशमान एवं सात घोड़ोंके रथपर चलनेवाले उन भगवान् सूर्यकी जय हो, जिनका तेज समस्त भुवनोंमें व्याप्त है, जो पूर्व दिशाके अट्टहासकी-सी छवि धारण करते हैं तथा जिनके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे प्रचुर पाप-तापमय दोषोंसे ग्रस्त हुए मनुष्योंके अंग निष्पाप हो जाते हैं। उत्तम बुद्धिवाले प्रभो! ब्रह्मा आदि देवता और मुनि जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हीं भगवान् पतंग (सूर्य)-की मैं अपनी बुद्धिद्वारा भलीभाँति विचार करके स्पष्ट अर्थ एवं मधुर अक्षरोंके योगसे युक्त विचित्र पद्योंद्वारा स्तुति करूँगा। नाथ! लाल कमलके समान निर्मल मण्डलवाले आप जबतक अपनी किरणोंसे अन्धकारका नाश करते हुए उदय नहीं होते, तबतक सम्पूर्ण जगत् निश्चल-सा ही (जड़वत्) प्रतीत होता है तथा तबतक नाना प्रकारकी क्रियाएँ भी सिद्ध नहीं होतीं। भगवन्! जबतक आप अपनी परम उत्तम प्रभासे वृक्षोंके सोये हुए पुष्प-गुच्छोंको विकसित (जाग्रत्) नहीं कर देते, तबतक उनके नेत्र बंद होनेके कारण वृक्षोंकी शाखाएँ शोभा नहीं पातीं और न उनपर भ्रमर ही मड़राते हैं। जिस समय आप आकाशमें उदित होते हैं, उस समय समस्त देवताओं और सिद्धोंके समुदाय, ब्रह्मा आदि देवेश्वर, दैत्य, मुनि, किन्नर, नाग, यक्ष तथा ज्ञानी देवगण अपने झुके हुए मस्तकोंद्वारा तथा चमकती हुई मुकुटमणियोंकी उत्तम प्रभाओंसे आपकी अर्चना करते हैं। सदा सबको वर देनेवाले भगवन्! आपके अस्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् सो जाता है और आपके तपनेपर पुनः जाग्रत् हो उठता है, इस प्रकार एकमात्र आप ही समस्त विश्वका हित करनेके लिये अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। नाथ! उत्साह, शक्ति, नीति और शौर्य आदिसे सम्पन्न तथा सेवा-प्रयोग एवं निर्माणक्रियामें तत्पर पुरुषोंके

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भी कार्य जो फलद नहीं होते, उसमें निश्चय ही आपके प्रति उनकी भक्तिका न होना ही कारण है। शरणागतवत्सल! युद्धभूमिमें मनुष्य रथ, हाथी, भाला, शक्ति, नाराच, चक्र, बाण, तोमर तथा भयंकर खड्गोंद्वारा जो शीघ्र ही शत्रुओंको परास्त करके विजयी होकर लौटते हैं, वह सब आपकी ही दी हुई शक्तिका प्रभाव है। भयानक स्थानों, दुर्गम और ऊँची-नीची भूमियोंमें तथा रीछ, हाथी, सिंह, बहुत-से कण्टक तथा चोरोंके बीचमें पड़े हुए संकटग्रस्त एवं अतिशय शोकसे मोहित चित्तवाले मानव भी आपके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे मृत्युके भयसे छूट जाते हैं। तेजोराशे! सूर्य! इस संसारमें जो सब ओरसे दुःखी हैं, उन्हें आप ही शरण देनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्में आपके समान दयालु दूसरा कोई नहीं है। एकमात्र आपमें ही की हुई भक्ति पूर्णतः सफल होती है। आपकी शरणमें आ जानेपर मनुष्योंको रोग, व्याधिका कष्ट कैसे हो सकता है? देव! आप देखा करते हैं कि कौन कुष्ठरोगसे पीड़ित है, किसे शत्रु और रोग आदि सता रहे हैं, कौन पंगु, अन्ध और जड़ है, किनके पैर गल गये हैं और कौन निर्धन तथा निष्क्रिय हो गया है। इस प्रकार निरीक्षण करके आप कृपापूर्वक प्राणियोंकी उन-उन दोषोंसे रक्षा करते हैं। आपकी जैसी परोपकारपूर्ण चेष्टा देखी जाती है, वैसी और किसमें है? धर्म सेवित होनेपर परलोकमें फल देनेके लिये उपस्थित होता है। देवता उपासना करनेपर कालान्तरमें वरदान देते हैं। परंतु प्रणतवत्सल! आप कल्याणकामी पुरुषोंद्वारा सेवित होनेपर तत्काल ही उन्हें अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। यदि मनुष्योंने एक बार भी किसी प्रकार आपको मस्तक झुकाया है अथवा भुवनेश्वर! अन्तकालमें भी जिसने आपका चिन्तन किया है, वे संसारमें पापी होनेपर भी निष्पाप हो गये हैं और उन्होंने शुद्धचित्त होकर पुण्यात्माओंकी गति प्राप्त कर ली है। सुरश्रेष्ठ! जब आप उदय लेने लगते हैं, उस समय देवनदी गंगाके खिले हुए स्वर्णकमलोंसे निकले हुए झुंड-के-झुंड भ्रमर उनकी स्वर्णमयी धूलिसे अनुरंजित होकर उड़ते हैं। भगवन्! आप अपने किरणसमूहरूपी चरणोंके द्वारा समुद्रके मध्यमें स्थित होकर समस्त जीवोंके जीवनकी रक्षाके उद्देश्यसे तात्त्विक उपायका चिन्तन करनेके लिये मानो तपस्या करते हैं। तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कौन है? सदा वेदके मार्गमें तत्पर रहनेवाले उदारबुद्धि ऋषि-मुनियोंद्वारा भी आपके गुणोंकी स्तुति नहीं की जा सकती। आप ही विष्णु हैं, आप ही चन्द्रमा हैं, आप ही दैत्योंका मान मर्दन करनेवाले स्वामिकार्तिकेय हैं। आप ही धनाध्यक्ष कुबेर हैं, आप ही काल हैं। आप ही ब्रह्मा हैं और आप ही पर्वत, मिट्टी, जलके आश्रय तथा अग्नि हैं। आप ही ब्राह्मणोंके जपनेयोग्य ॐकार हैं। आप ही वहाँ समुद्र हैं। आप ही यम, रुद्र, इन्द्र और मेघ हैं। आप ही व्रत, यम तथा नियम हैं और आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। त्रिपुरमथन! गोपते! सुराधीश! भगवन्! आपका मुख कमलके समान सुन्दर है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं, तीनों लोकोंमें आपके समान गुणवान् कौन है? आदित्य! भास्कर! दिवाकर! सप्ताश्ववाहन! मार्तण्ड! सूर्य! हरिदश्व! पतंग! भानो! अश्रान्तवाहन! आकाशस्वरूप! अंशुमालिन्! लोकनाथ! यह दास आपकी शरणमें आया है। जगत्प्रदीप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्रह्मण्य! सत्य! शुभ! मंगल! लोकनाथ! आकाशकमल! ईश! मुनिसंस्तुत! विश्वमूर्ते! आर्तजनोंका शोक नाश करनेवाले! सेवकोंका पालन करनेवाले! भगवन्! आप अपनी शरणमें आये हुए मुझपर प्रसन्न होइये। देव! आज मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे हुए दोनों हाथोंसे नमस्कारपूर्वक बड़े भक्ति-भावसे आपका स्तवन किया है, इसलिये प्रभो! आप मेरे ऊपर सौम्य रूप हो जाइये और मेरी बुद्धिको धर्ममें लगाइये। जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, वेदत्रयीमय हैं अथवा त्रिभुवनस्वरूप हैं, त्रिगुणात्मक शरीर धारण करनेवाले हैं और समस्त विश्वकी उत्पत्ति, पालन तथा संहारके

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३३


हेतु हैं, उन ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार है।

सूर्यदेव बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अर्जुन! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे इस समय सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसकी पूर्तिके लिये यत्नपूर्वक वर दूँगा।

अर्जुनने कहा—प्रभो! मेरे लिये यही सबसे उत्तम वर है कि आप इस विग्रहमें सदा स्थित रहें। जो मनुष्य आपको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनको आप मनोवांछित वस्तु प्रदान करें।

सूर्यदेवने कहा—अर्जुन! जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करके इस स्तोत्रद्वारा मेरी स्तुति करेंगे, उनके पास कभी धन-सम्पत्तिकी कमी नहीं होगी।


भगवान् सूर्यकी अष्टोत्तरशतनामोंद्वारा स्तुति तथा अन्यान्य तीर्थोंकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णने भी शंख बजाकर सूर्यदेवकी भलीभाँति स्थापना करके एकाग्रचित्त हो इस प्रकार स्तवन किया—
(१) आदित्य, (२) भास्कर, (३) भानु, (४) रवि, (५) सूर्य, (६) दिवाकर, (७) प्रभाकर, (८) दिवानांथ, (९) तपन, (१०) तपनेवालोंमें श्रेष्ठ, (११) वरेण्य, (१२) वरद, (१३) विष्णु, (१४) अनघ, (१५) वासवानुज (इन्द्रके छोटे भाई), (१६) बल, (१७) वीर्य, (१८) सहस्रांशु, (१९) सहस्रकिरणद्युति, (२०) मयूखमाली, (२१) विश्व, (२२) मार्तण्ड, (२३) चण्डकिरण, (२४) सदागति, (२५) भास्वान्, (२६) सप्ताश्व, (२७) सुखोदय, (२८) देवदेव, (२९) अहिर्बुध्न्य, (३०) घामनिधि, (३१) अनुत्तम, (३२) तप, (३३) ब्रह्ममयालोक, (३४) लोकपाल, (३५) अपाम्पति, (३६) जगत्प्रबोधक, (३७) देव, (३८) जगद्दीप, (३९) जगत्प्रभु, (४०) अर्क, (४१) निःश्रेयसपर, (४२) कारण, (४३) श्रेयसापर, (४४) इन, (४५) प्रभावी, (४६) पुण्य, (४७) पतंग, (४८) पतंगेश्वर, (४९) मनोवांछितदाता, (५०) दृष्टफलप्रद, (५१) अदृष्टफलप्रद, (५२) ग्रह, (५३) ग्रहकर, (५४) हंस, (५५) हरिदश्व, (५६) हुताशन, (५७) मंगल्य, (५८) मंगल, (५९) मेध्य, (६०) ध्रुव, (६१) धर्मप्रबोधन, (६२) भव, (६३) सम्भावित, (६४) भाव, (६५) भूतभव्य, (६६) भवात्मक, (६७) दुर्गम, (६८) दुर्गतिहर, (६९) हरनेत्र, (७०) त्रयीमय, (७१) त्रैलोक्य-तिलक, (७२) तीर्थ, (७३) तरणि, (७४) सर्वतो-मुख, (७५) तेजोराशि, (७६) सुनिर्वाण, (७७) विश्वेश, (७८) शाश्वत, (७९) घाम, (८०) कल्प, (८१) कल्पानल, (८२) काल, (८३) कालचक्र, (८४) क्रतुप्रिय, (८५) भूषण, (८६) मरुत, (८७) सूर्य, (८८) मणिरत्न, (८९) सुलोचन, (९०) त्वष्टा, (९१) विष्टर, (९२) विश्व, (९३) सत्कर्मसाक्षी, (९४) असत्कर्म-साक्षी, (९५) सविता, (९६) सहस्राक्ष, (९७) प्रजापाल, (९८) अधोक्षज, (९९) ब्रह्मा, (१००) वासरारम्भ, (१०१) रक्तवर्ण, (१०२) महाद्युति, (१०३) शुक्ल, (१०४) मध्यन्दिन, (१०५) रुद्र, (१०६) श्याम, (१०७) विष्णु और (१०८) दिनान्त नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा कहे हुए इन एक सौ आठ दिव्य नामोंको जो मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसे कभी विपत्तियाँ नहीं प्राप्त होतीं तथा सर्वत्र शुभकी प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं; उसे धन, धान्य, सुख, पुत्र, तेज, प्रज्ञा, परम ज्ञान, विशुद्ध बुद्धि एवं परम पदकी प्राप्ति भी होती है।

इस प्रकार स्तुति सुनकर जगदीश्वर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। केशवादित्यके मुखारविन्दका

९३४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हुआ मनुष्य सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—असुरोंके स्वामी तारकका वध करके महाबलवान् स्वामिकार्तिकेयजीने अपनी शक्तिको शिप्रा नदीके जलमें फेंक दिया। उस शक्तिने पातालतककी भूमिको विदीर्ण कर डाला। उसी मार्गसे भगवती गंगा ऊपर निकल आयीं, जो समस्त तपस्वी मुनियों और देवताओंके द्वारा वन्दनीय हैं। कोटितीर्थ तीनों लोकोंमें पवित्र कहा गया है, वहाँ ब्रह्माजीने कोटितीर्थेश्वर शिवकी स्थापना की है। कोटितीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् कोटिश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुने! जो वहाँ श्राद्ध करता है, उसे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो पूर्णिमा तथा अमावास्याको शस्त्रधारी कार्तिकेयका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंतक पुत्रहीन, निर्धन तथा रोगी नहीं होता। जो मनुष्य उस तीर्थके उत्तम जलमें प्रवेश करता है, वह दिव्य लोकमें तबतक अक्षय सुखका उपभोग करता है, जबतक कि सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता बनी रहती है।


स्वर्णक्षुर आदिकी महिमा, अन्धकासुरका युद्ध, नरदीप एवं शंखोद्धार आदिका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—जो मनुष्य स्वर्णक्षुर नामक तीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करता है, उसे सौ कपिलादानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है। जो जितेन्द्रिय पुरुष ब्रह्माजीकी वापी (बावली या कुण्ड)-में स्नान करता है, वह हंसयुक्त विमानद्वारा ब्रह्मलोकको जाता है। जो मनुष्य चैत्र या फाल्गुनमासमें विष्णुवापीमें स्नान करके जितेन्द्रिय हो उपवासपूर्वक रात्रिमें जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो मनको संयममें रखकर भक्तिपूर्वक अभयेश्वर देवके पट्टबन्धका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकको जाता है। मुने! जो मनुष्य एकचित्त होकर अगस्त्येश्वरके समीप जाता है और अगस्त्योदयके समय उनका दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

काशपुष्पप्रतीकाश वह्निमारुतसंभव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥

‘काश-पुष्पके समान गौरवर्ण, अग्नि और वायु (अग्नीषोम)-से प्रकट मित्रावरुण-पुत्र कुम्भयोने! आपको नमस्कार है।’

इस मन्त्रसे अगस्त्यजीको अर्घ्य देनेवाला मानव पुत्रवान् और धनवान् होता है। मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकमें जाता है और स्वर्गभोगके अनन्तर पुनः इस मर्त्यलोकमें आकर पवित्र धनवानोंके घरमें जन्म लेता है अथवा महान् योगीश्वर होता है।

व्यास ! उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाली दिव्य पुरी उज्जयिनी प्रथम कल्पमें स्वर्णशृंगा कहलाती है, दूसरेमें इसका नाम कुशस्थली होता है। तीसरेमें इसे अवन्तिका कहते हैं। चतुर्थ कल्पमें इसका नाम अमरावती होता है। पंचम कल्पमें चूडामणि, छठेमें पद्मावती और सातवेंमें इसका नाम उज्जयिनी जानना चाहिये।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह निःसन्देह सात जन्मोंके पापसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन कालकी बात है। उज्जयिनीपुरीमें अन्धक नामसे प्रसिद्ध दैत्य राज्य करता था। उसके महापराक्रमी पुत्रका नाम कनकदानव था। एक बार उस महाशक्तिशाली वीरने युद्धके लिये इन्द्रको ललकारा, तब इन्द्रने क्रोधपूर्वक उसके साथ युद्ध करके उसे मार गिराया। उस दानवको मारकर वे अन्धकासुरके भयसे भगवान् शंकरको ढूँढ़ते हुए कैलास पर्वतपर चले गये। वहाँ देवताओंके स्वामी इन्द्रने भगवान् चन्द्रशेखरका दर्शन करके अपनी अवस्था उन्हें

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३५

बतायी और प्रार्थना की—'भगवन्! मुझे अन्धकासुरसे अभय दीजिये।'

इन्द्रका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल शिवने अभय देते हुए कहा—'इन्द्र! तुम अन्धकासुरसे भय न करो।' इस प्रकार सान्त्वना देकर भगवान् शिवने महाभयानक रौद्र रूप धारण किया और वे एक चरणसे पृथ्वीपर उतरे। जहाँ उनका पैर पड़ा, उसी स्थानपर सर्वदेववन्दित एक कुण्ड प्रकट हो गया। भगवान् शिवने वहाँ पैर रखा था, इसलिये उस कुण्डका नाम 'शिवपद' प्रसिद्ध हो गया। सर्वप्रथम श्रीशंकरके चरणांगुष्ठकी कोटि (कोना) वहाँ पड़ी थी, इसलिये वह तीर्थ सर्वपापनाशक कोटितीर्थके नामसे भी विख्यात हुआ। वहीं भगवान् अगस्त्यने करोड़ों तीर्थोंका स्थापन किया था, इस कारणसे भी लोकमें उसका 'कोटितीर्थ' नाम पड़ गया। उस तीर्थका दर्शन करके सब देवताओंने अपने हितकी इच्छासे उसमें स्नान किया। महाकालमय स्वरूप धारण करके भगवान् शिवका वहाँ आगमन हुआ था, इसीलिये वे उस तीर्थमें महाकालके नामसे प्रसिद्ध हुए हैं।

दानव अन्धकासुरने जब इन्द्रके द्वारा अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुना, तब महान् क्रोधमें भरकर उसने रणके बाजे बजवाये और सेनासहित उस स्थानपर आया, जहाँ सब देवता मौजूद थे। रथ, हाथी आदिसे युक्त विशाल सेनाके साथ महायुद्धके लिये उद्यत हुए दानवोंको आते देख देवतालोग भगवान् शिवकी शरणमें गये। तब वे त्रिनेत्रधारी भगवान् महाकाल 'देवताओ! निर्भय रहो।' ऐसा कहकर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े हो गये। दैत्योंपर भगवान् रुद्रका कोप होते ही सारा आकाश-मण्डल प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त हो गया। अन्धकासुरने क्रोधमें भरकर देवताओंके विनाशके लिये करोड़ों दुःसह बाणोंकी झड़ी लगा दी। पिनाकधारी महाकालने आगकी चिनगारियों और ज्वालाओंको छोड़ते हुए उस दानवके अस्त्र-शस्त्रोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। साथ ही अन्धकासुरको भी अनेक बाणोंसे घायल किया। जैसे भ्रमर कमलके फूलपर छा जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् शंकरके बाणोंने अन्धकको सब ओरसे आच्छादित कर दिया। अन्धकासुर युद्धमें स्थित होनेपर भी अत्यन्त शिथिल हो गया, उसके अस्त्र-शस्त्र भी शिथिल हो गये। भगवान् शिवके गण भी बड़े भारी योद्धा थे, साथ ही उन्हें भगवान् शंकरका सामीप्य भी प्राप्त था; इसलिये उन्होंने युद्धमें उत्साहपूर्वक लड़कर अन्धकासुरकी सेनाको मार डाला।

अपनी सेनाको देवताओंद्वारा छिन्न-भिन्न की हुई देख और अपनेको भी महेश्वरके बाणोंसे क्षत-विक्षत हुआ पाकर अन्धकासुर विकल शरीरसे भयभीत हो उठा। तब उसने तामसी माया फैलायी। उस मायासे उसका शरीर अदृश्य हो गया और वह उत्तर दिशाकी ओर चल दिया। अन्धकासुर जिस-जिस मार्गसे गया, उसी-उसीसे शंकरजीने भी उसका पीछा किया। एक स्थानपर पहुँचकर अन्धकासुर बोला। फिर भगवान् शिव भी उसी प्रकार बोले। तबसे वहाँ वागन्धक नामसे विख्यात तीर्थ प्रकट हो गया। अगहन सुदी नवमीको वहाँ स्नान करके पवित्र हो जो श्रद्धापूर्वक शक्करसहित अन्नदान करता है, उसका वह सब पुण्य अक्षय होता है तथा दाता शिवलोकमें जाता है।

इसी समय अपने तेजसे दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए (अर्जुनद्वारा स्थापित) भगवान् नरादित्य मनुष्यका रूप धारण करके उठे। उनके द्वारा अन्धकार नष्ट होनेपर प्रकाशमें जब वह दैत्य स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा नररूपधारी सूर्यनारायणका स्तवन किया और उनका नाम 'नरदीप' रख दिया। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक नरदीप नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य षष्ठी या सप्तमी तिथिको रविवारके दिन उपवास करके दिनक्षय, संक्रान्ति, ग्रहण तथा विषुवयोगपर कुण्डमें स्नान करके पवित्र हो मनको संयममें रखता और जप करते हुए स्तुति,

९३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वाद्य और मंगलगीतके साथ भगवान् नरदीपका दर्शन करता है तथा पूजन और साष्टांग प्रणाम करके प्रातःकाल, मध्याह्न एवं अपराह्नमें सूर्यदेवकी परिक्रमा करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। पूर्वकालमें नरावतार अर्जुनने इन्द्रसे सूर्य-प्रतिमाको प्राप्त करके उसे प्रसन्नतापूर्वक इस तीर्थमें स्थापित किया है, इस कारणसे ये भगवान् सूर्य नरदीप कहे गये हैं।

ज्येष्ठ व्यतीत होनेपर भगवान् सूर्यको रथपर विराजमान करके श्रेष्ठ द्विज अपनी भुजाएँ लगाकर उस रथको कुशस्थलीमें पहुँचाते हैं। उस समय उत्तर दिशाको आते हुए भगवान् सूर्यका जो दर्शन करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका पूरा फल प्राप्त होता है। जो केशवादित्यके स्थानसे लौटे हुए रथका दर्शन करता है अथवा रस्सी पकड़कर स्वयं भी उस रथको खींचता है, वह अपने कुलका एवं पिता-पितामह आदि पितरोंका उद्धार कर देता है। जो दक्षिण दिशामें नरदीप देवका संयमपूर्वक दर्शन करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रीसूर्यदेवकी परिक्रमा करते हैं, उनके द्वारा सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा हो जाती है। प्रातःकाल उठकर मौन हो भक्तिभावसे भगवान् सूर्यके समीप जाय; पूर्वद्वारसे दर्शन और नमस्कार कर, दक्षिणद्वारसे प्रवेश करके रथचक्रकी पूजा करे। तदनन्तर उसी द्वारसे निकलकर प्रणामपूर्वक आगे जाय और पश्चिम द्वारका आश्रय ले रथमें स्थित हुए सूर्यदेवका अर्चन करे। जो मनुष्य इस प्रकार नरदीपजीकी रथ-यात्रा करता है, वह अपनी रुचिके अनुसार इन्द्रलोक, सूर्यलोक, शिवलोक तथा गोलोकका सुख पाता है। जो मनुष्य भगवान् सूर्यनारायणके अग्रभागमें स्थित वापीमें एक मासतक प्रतिदिन अवगाहन करके नरदीपजीका दर्शन करता है, उसके दुःस्वप्नका नाश हो जाता है।

अन्धकार नष्ट होनेपर जब सब ओर उत्तम प्रकाश छा गया, तब भगवान् महेश्वरने तीन शिखाओंवाले त्रिशूलसे अन्धकासुरको विदीर्ण कर डाला। इससे ब्रह्मा और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भगवान् विष्णुने देवताओंके हितकी इच्छासे शंखनाद किया। जहाँ उन्होंने शंख बजाया, वहाँ शंखोद्धारण नामसे प्रसिद्ध तीर्थ हो गया। वहाँ भगवान् विष्णु सदा निवास करते हैं। वहीं अनादि चतुर्मुख लिंग भी है। उस लिंगके समीप ही विष्णुदेवके दक्षिण भागमें त्रिशूलसे लक्षित होनेवाले भगवान् शिव विराजमान हैं। जो जितेन्द्रिय पुरुष चतुर्दशी और अष्टमीको इन सबका दर्शन करते हैं, वे समस्त पापराशिके क्षीण हो जानेसे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो वहाँ स्नान और एकादशीका व्रत करके शंखधारी भगवान् जनार्दनका दर्शन करता है, वह अच्युतपद (वैकुण्ठधाम)-को प्राप्त होता है।


## ॐकारेश्वर आदिका महत्त्व तथा अन्धकासुरको शिवगणोंमें श्रेष्ठ स्थानकी प्राप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं—भगवान् रुद्रके त्रिशूलसे अन्धकासुरके विदीर्ण होनेपर वहाँ एक विशेष प्रकारकी ध्वनि प्रकट हुई। उसी स्थानपर ॐकारेश्वर महादेवका अविर्भाव हुआ। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र हो समाधि तथा नियमसे जो ॐकारस्वरूप महादेवका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अन्धकासुरको घायल करके वह त्रिशूल पातालगंगाके जलमें चला गया। पातालनिवासी भगवान् हाटकेश्वर उसी शूलके मार्गसे ऊपर निकले। इसीलिये उन्हें शूलेश्वर कहा गया है। उनके उत्तर भागमें धूतपाप नामक तीर्थ है। वहीं वह पापात्मा एवं पराक्रमी दैत्यराज त्रिशूलसे गिराया गया था।
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९३७ ---|---

इसीलिये उस तीर्थको धूतपाप कहते हैं। जो जितेन्द्रिय शिवभक्त अष्टमी, पूर्णिमा, चतुर्दशी तथा शनिवारको एक रात उपवास करके धूतपाप नामक महेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य पौषके महीनेमें वहाँ स्नान करके शिवजीका दर्शन करता है, वह शूलेश्वरके प्रभावसे ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है और मृत्युके पश्चात् परम पदको प्राप्त होता है।

इस प्रकार अन्धकासुरको विदीर्ण करके भगवान् शिवका त्रिशूल ज्यों-ही पातालगंगाको गया, त्यों-ही अन्धकासुरके रक्तसे उत्पन्न सहस्रों भयंकर दैत्य वहाँ युद्धके लिये खड़े हो गये। तब महादेवजीने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। उस भयंकर गर्जनासे मूर्च्छित होकर वे पापी दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। उस महावनमें जहाँ भगवान् शंकरने सिंहनाद किया था, वहाँ समस्त पापोंका नाश करनेवाले सिंहेश्वरदेव विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सिंहके समान बलवान् होता है। सिंहनाद करनेपर जहाँ भगवान्‌का श्री-विग्रह रौद्ररससे कण्टकित (रोमांचित) हो गया था, वहाँ वे कण्टकेश्वरदेवके नामसे विद्यमान हैं, जो भक्तोंको सदा सब कुछ देनेवाले हैं। जो मानव उस तीर्थमें स्नान करके कण्टकेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह कहीं भयको नहीं प्राप्त होता। जहाँ शंकरजीने इन्द्रको अभयदान दिया था, वहाँ अभयेश्वर नामक उत्तम लिंग प्रकट हुआ। वहाँ स्नानसे पवित्र हो उपवास करके जो जितेन्द्रिय पुरुष देवदेवेश्वर शिवका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञके फलको प्राप्त होता है। उस समय भगवान् शिवके मस्तकसे पृथ्वीपर जो पसीनेकी बूँद गिरी, उससे अंगारके समान लाल अंगवाले भूमिपुत्र मंगल उत्पन्न हुए। अंगारक, रक्ताक्ष तथा महादेव-पुत्र इन नामोंसे स्तुति करके ब्राह्मणोंने उन्हें ग्रहोंके मध्यमें प्रतिष्ठित किया। तत्पश्चात् उसी स्थानपर ब्रह्माजीने अंगारकेश्वर नामक उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। जो पवित्रात्मा मनुष्य मंगलवारको उस तीर्थमें स्नान तथा अंगारकेश्वरका दर्शन करता है, वह समस्त पातकोंसे छूट जाता है। मंगलवारको चतुर्थी तिथिमें रात्रिके समय अर्घ्य देना चाहिये। जबतक चार चतुर्थी पूरी न हो जाय, तबतक प्रयत्नपूर्वक यह अर्घ्यदानका नियम चलाते रहना चाहिये।

इस प्रकार त्रिशूलसे आहत होनेके बाद अन्धकासुरको बड़ा भय हुआ। वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न करने लगा। संसारमें जीवन-रक्षाका दूसरा कोई उपाय न देखकर उसने भगवान् शंकरका ही स्तवन प्रारम्भ किया। वह बोला— 'जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के कर्ता और इसे अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार सुख-दुःख देनेवाले हैं, जो संसारकी उत्पत्तिके हेतु तथा उसका अन्तकाल भी स्वयं ही हैं, सबको शरण देनेवाले उन्हीं भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके मोह, तमोगुण और रजोगुण दूर हो गये हैं, वे योगीजन, भक्तिसे मनको एकाग्र रखनेवाले निष्काम भक्त तथा अपरिच्छिन्न बुद्धिवाले ज्ञानी भी जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन अनन्त दिव्यस्वरूप शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सुशोभित किरणोंवाले निर्मल अर्धचन्द्रका मुकुट बाँध सदा अपने मस्तकपर गंगाजीको धारण करते हैं और जिन्होंने अपने वामांग भागमें गिरिराजकिशोरी उमाको धारण कर रखा है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। सिद्ध और चारण जिनके चरणारविन्दोंकी सेवा करते रहते हैं और जिन्होंने आकाशसे ऊँची-ऊँची उत्ताल तरंगोंके साथ विषम वेगसे गिरती हुई त्रिभुवनपावनी गंगाको अपने मस्तकपर पुष्पमालाकी भाँति धारण कर लिया था, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिसके भारसे कैलासपर्वतका शिखर हिलने लगता था, उस कैलास शृंगके सदृश विशालकाय दशाननने भी जिनके युगलचरणारविन्दोंकी सेवा की है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। महेश्वर! जो मूढ़ पुरुष चराचर जगत्के गुरु

९३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपको नहीं जानते हैं, वे ऐश्वर्यका अहंकार नष्ट होनेपर मेरी ही भाँति पश्चात्ताप करते और दुस्सह यातना भोगते हैं।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए अन्धकासुरसे सबका कल्याण करनेवाले शूलपाणि भगवान् शिव प्रसन्न होकर बोले—वत्स! मैं प्रसन्न हूँ, अब तुम शुद्ध-निर्मल हो गये हो। अतः तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ, निश्चिन्त होकर मेरी ओर देखो। दानवश्रेष्ठ! तुम्हारे मनमें जो कोई भी आकांक्षा हो, उसे माँगो; मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा।

अन्धकासुर बोला—देवेश्वर! मुझे गणपतिपद प्रदान कीजिये, क्योंकि वह सदा अक्षय है।

भगवान् शिव बोले—वत्स! तुम मेरे गणोंके अध्यक्ष होकर रहो। तुम्हें अणिमा आदि समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और सदैव तुम मेरे प्रिय बने रहोगे।

सनत्कुमारजी कहते हैं—इस प्रकार दुर्लभ वरदान पाकर वह अन्धक महादेवजीका मुख्य गण होकर वहीं अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर भगवान् शिव कैलासपर्वतपर चले गये।


उज्जयिनीपुरीके कनकश्शृंगा आदि नाम पड़नेका कारण

व्यासजीने पूछा—भगवन्! इस महाकाल वनमें कितने तीर्थ और शिवलिंग हैं, यह बतानेकी कृपा करें।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! महाकाल वनमें साठ कोटि सहस्र और साठ कोटि शत तीर्थ हैं तथा शिवलिंगोंकी तो कोई संख्या ही नहीं है। सकाम या निष्कामभाव रखनेवाला जो मनुष्य इस सुन्दर महाकाल वनमें जन्म लेता है, वह भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। ब्रह्मन्! सभी तीर्थ और सभी सिद्ध क्षेत्र सब ओरसे पवित्र एवं पुण्यजनक हैं। उन सबमें इस महाकालतीर्थ और क्षेत्रको मुख्य जानो।

व्यासजीने पूछा—मुने! उज्जयिनीपुरीका नाम पहले कनकश्शृंगा क्यों हुआ? फिर उसका कुशस्थली नाम कैसे हुआ? आगे चलकर अवन्ती नाम कैसे पड़ा? पद्मावती और उज्जयिनी नामोंका भी हेतु क्या है? यह सब बतावें।

सनत्कुमारजीने कहा—एक समय महादेवजी तथा ब्रह्माजी सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त अद्भुत पुरीका दर्शन करनेके लिये भूतलपर आये। यहाँ आकर उन्होंने सम्पूर्ण विश्वके स्वामी भगवान् विष्णुरूपको नमस्कार किया। विष्णुरूपने भी विधि और आदरके साथ सेवकोंसहित उन दोनोंका स्वागत-सत्कार किया और पूछा—'महेश्वर! तथा ब्रह्माजी! आप दोनों अपने अनुगामियोंसहित देवलोकसे पृथ्वीपर कैसे पधारे हैं!' यह सुनकर ब्रह्मा और महादेवजी बोले—'प्रभो! जहाँ आप विराजमान हैं, वहीं हम दोनोंका भी स्नेह है। आपके बिना हमें स्वर्ग, पृथ्वी अथवा पातालमें भी सुख नहीं है। भगवन्! आपने यह सुवर्णमय शिखरवाली विचित्र पुरी कब बसायी है? जगदीश्वर! आप यहाँ हमें भी स्थान दें।'

यह सुनकर विश्वरूपमय विष्णुने प्रसन्नचित्त होकर कहा—मैं आप दोनोंको अभीष्ट स्थान देता हूँ। प्रजापते! इस पुरीके उत्तर भागमें आपका स्थान है और महेश्वर! आपके लिये दक्षिण भागमें स्थान दिया गया है। अतः आप वहीं पधारें। आप दोनोंने इस पुरीको सुवर्णमय शिखरवाली बताया है, इसलिये यह संसारमें 'कनकश्शृंगा' नामसे विख्यात होगी।

इस प्रकार इस पुरीका प्रथम नाम कनकश्शृंगा बताया जाता है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी तीनों रहकर प्रसन्नताका अनुभव करते हैं और अपने भक्तोंको समस्त मनोवांछित फल देते हैं।


* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३९


व्यास! अब इस पुरीके कुशस्थली नाम होनेका कारण बताया जाता है, उसे सुनो। एक समय सृष्टिकी रचना करके ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुका ध्यान किया। उनके ध्यान करनेपर विश्वरूपधारी भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आपने मेरा उत्तम रीतिसे ध्यान किया है, इसलिये मैं आपके पास आया हूँ। समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये उद्यत हुए मुझको देखिये।' भगवान्‌का यह वचन सुनकर ब्रह्माजी सहसा उठकर खड़े हो गये और अनन्यचित्तसे सामने खड़े हुए श्रीहरिका पूजन करते हुए उन्हें नमस्कार किया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा—'देवदेव! जगन्नाथ! इस जगत्‌की सृष्टि तो मैंने कर दी है, परंतु आपके कृपापूर्ण सहयोगके बिना इसका स्थिर रहना असम्भव है। आप ही इस संसारके शास्ता एवं पालक हैं। अतः आप ही इसको अपने अनुशासनमें रखें। यक्ष, नाग, राक्षस, देवता, दानव, गन्धर्व—ये परस्पर एक-दूसरेको मारते हैं। इन सबकी रक्षा करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं। आप सबमें प्रवेश करनेवाले और सर्वत्र व्यापक हैं, इसीलिये मुनीश्वरोंने आपको 'विष्णु' कहा है। आपने ही अपनेमें इस सम्पूर्ण विश्वको बसाया है, इसलिये आप 'वासुदेव' कहलाते हैं। समस्त संसार आपका अनुगामी है, आप विभु हैं, सम्पूर्ण जगत्‌के राजा हैं। अखिल विश्व आपके लिये सेनाके सदृश है, इसीलिये आप 'विश्वसेन' कहे गये हैं। इस चराचर जगत्‌को अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण आपको लोग 'श्रीकृष्ण' कहते हैं। देव! आपने तीनों लोकोंको जीत लिया है, अतः आप 'जिष्णु' हैं। आप ही इस सम्पूर्ण जगत्‌के आदि राजा हों, आपका सिंहासन अद्वितीय हो। आपके हाथमें दक्षिणावर्त शंख है, इस कारण आप पुरुषोत्तम हैं। आपके पास सदा सुदर्शन नामक चक्र विद्यमान रहता है, अतः आप ही चक्री हैं। आपकी ध्वजा गरुड़से सेवित है तथा सुवर्णकी-सी पाँखवाले गरुड़जी आपके वाहन हैं। किरीट, पदक, भुजबन्द, कर्णपुष्प, केयूर, हार, उत्तम सुवर्णसूत्र, विचित्र वस्त्र, उत्तरीय तथा लाल रंगकी मालाओंसे आप विभूषित होइये। लक्ष्मी कभी आपका साथ नहीं छोड़तीं। आपका ऐश्वर्य अनन्त है। मुकुन्द! इस जगत्‌में साधुपुरुषोंकी आपमें भक्ति हो। आप भक्तके ऊपर प्रसन्न होइये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो देवताओंके बीचमें इस प्रकार बोले—'विरंचि! मुझे कोई शुद्ध मण्डल दिखाइये, जो आपसे पृथक् न हो और जहाँ स्थिरतापूर्वक स्थित होकर मैं जगत्‌की रक्षा कर सकूँ।' तदनन्तर ब्रह्माजीने कुशकी एक मूठी ली और एक अत्यन्त उन्नत स्थल भूमिपर बिछाकर भगवान् विष्णुसे कहा—'देव! आपके लिये यही पवित्र मण्डल है, देवताओंसे पूजित होकर आप सदा यहीं विराजमान होइये। इन कुशोंपर बैठनेके कारण आप विष्टरश्रवा एवं कुशेश्वर होंगे।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ कुशके आसनपर आसीन हुए। तदनन्तर विश्वविधाता ब्रह्मा और भगवान् पुराण-पुरुषोत्तम दोनोंने उस पुरीका नाम कुशस्थली रख दिया। उस पुरीमें रहकर सम्पूर्ण विश्वके पालक, सर्वत्र व्यापक, विश्वेश्वर, विश्वस्रष्टा, विश्वात्मा एवं सर्वविश्वनियन्ता श्रीमान् विष्णुने समस्त संसारका पालन किया। इस प्रकार पहले जिसका नाम कनकभृंगा था, वही पुरी कुशस्थलीके नामसे प्रसिद्ध हुई।

प्राचीन कालकी बात है। दैत्योंसे पराजित होकर सम्पूर्ण देवताओंने मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर वहाँके वन, कुंज और गुफा आदिकी शरण ली। वहाँ पहुँचकर उन्होंने परस्पर सलाह की और उस स्थानपर गये, जहाँ प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान थे। देवताओंने अपने आगमनका सब कारण उनसे निवेदन किया। तब ब्रह्माजी देवताओंके साथ देवाधिदेव भगवान् महेश्वरके समीप गये। फिर महादेवजी भी उन सबके साथ वैकुण्ठधाममें भगवान् विष्णुके समीप गये और उन देवदेव जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।

९४०

* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

**देवता बोले—**सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले भगवान् अनन्तको नमस्कार है। कूर्मरूपधारी श्रीहरिको बार-बार नमस्कार है। भयंकर नृसिंह और वाराह रूप धारण करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार है। रघुनन्दन रामको एवं अनन्त शक्तिसम्पन्न ब्रह्मको नमस्कार है। परम शान्त वासुदेवको नमस्कार है। अज्ञानी जीवोंका भी पालन करनेवाले पशुपति, शुद्ध-बुद्धस्वरूप एवं म्लेच्छान्तकारी कल्किदेवको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुतिमें लगे हुए देवताओंको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—देवगण! तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो। ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित परम सुन्दर जो महाकाल वन है, वहाँ समस्त कामनाओं और फलोंको देनेवाली एक पवित्र पुरी है, जो बड़ी ही मनोरम और कुशस्थली नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ सिद्ध और गन्धर्व निवास करते हैं, वहीं महादेवजी सदा निवास करते हैं। कल्पान्तकालमें जब समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, सब तीर्थ, समस्त पुण्य मन्दिर, नदी, समुद्र, सरोवर, उपवन, ओषधि, वृक्ष, लता, यन्त्र, मन्त्र, शुभ, अशुभ, नक्षत्र और सूर्य, चन्द्र आदि जगत्‌का अभाव हो जाता है, उस समय सबके बीज, पुण्य, जीव, कर्म तथा आशय (कर्मोंके संस्कार) सबको लेकर भगवान् शिव उस पुरीमें स्थित होते हैं। अतः कुशस्थलीपुरी सबके लिये परम हितकारिणी है। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया हुआ थोड़ा-सा भी दान अनन्तानन्तगुना हो जाता है। तुम सब लोग यत्नपूर्वक वहीं जाओ। उस तीर्थमें जाकर तुम सब लोग उत्तम विधिसे स्नान, दान आदि शुभकर्म करो। उस पुण्यके बलसे तुम्हें पुनः स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी।

वह आकाशवाणी सुनकर ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता मस्तक झुकाकर भगवान्‌को प्रणाम करके उसी स्थानपर गये। वहाँ उस पुरीको देखकर देवता बहुत प्रसन्न हुए। कुशस्थलीमें पैशाचमोचन नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। उसमें स्नान, जप, होम और दान करनेसे देवताओंको अक्षय पुण्य प्राप्त हुआ। उसके बलसे वे दानवोंको जीतकर पुनः स्वर्गलोकमें अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित हो गये। जहाँ प्रत्येक कल्पमें देवता, तीर्थ, ओषधि, बीज तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन होता है, वह पुरी सबका अवन (रक्षण) करनेके कारण 'अवन्ती' है। आजसे इस कुशस्थलीका नाम अवन्तीपुरी होगा। ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। द्विजश्रेष्ठ! तभीसे भूतलपर वह पुरी अवन्तीके नामसे विख्यात हुई है।

व्यासजी! अब मैं यह बतलाऊँगा कि अवन्तीपुरीका नाम उज्जयिनी कैसे हुआ। एक समय सब दैत्योंके राजा महादैत्य त्रिपुरने ब्रह्माजीके सन्तोषके लिये बड़ी घोर तपस्या की। एक सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे बोले—'असुरश्रेष्ठ! तुम मुझसे अपना मनोवांछित वर माँगो।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर त्रिपुर दैत्य बोला—'ब्रह्मन्! मैं देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस सबके द्वारा अवध्य हो जाऊँ।'

**ब्रह्माजी बोले—**वत्स! ऐसा ही होगा। तुम निर्भय होकर विचरो।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तबसे लेकर उस दैत्यने पहलेके वैरका स्मरण करके देवताओंका महान् विनाश आरम्भ किया। उससे परास्त हुए देवता आपसमें सलाह करके ब्रह्माजीके पास गये और उनसे अपनी विपत्तिका सब समाचार कह सुनाया। यह सुनकर ब्रह्माजी सहसा उठे और देवताओंके साथ महाकाल वनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने समस्त देवताओंके साथ रुद्रसरोवरमें स्नान, दान, जप और होम किया। तत्पश्चात् महाकालजीकी पूजा करके श्रीब्रह्माजी बोले—'भक्तोंको अभय दान देनेवाले देवदेव महादेव! दैत्यराज त्रिपुर देवताओंका बड़ा भारी संहार कर रहा है। उसने कितने ही द्वीप, ग्राम और नगर उजाड़ दिये। ऋषियों और संन्यासियोंके आश्रम

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४१

फूँक दिये। अतः आप यत्नपूर्वक उसके वधका कोई उपाय सोचिये।'

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर महादेवजीने कुछ सोच-विचारकर कहा—देवताओ! उस दुरात्मा दैत्यको जीतनेका कोई उपाय करूँगा। तबतक तुमलोग तपस्या करो। अवन्तीपुरीमें जो होम, दान आदि पुण्य कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। सब देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।

तदनन्तर उस दैत्यका विनाश करनेके लिये भगवान् शंकरने महापाशुपत नामक शस्त्र अपने हाथमें लिया। उस समय वे महान् आडम्बर धारण करके समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर प्रतीत होने लगे। देवता उनकी स्तुति और जय-जयकार करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। महादेवजीने एक ही बाणसे उस महामायावी असुरको मार डाला और मायायुद्धसे उसके तीन टुकड़े कर डाले। तत्पश्चात् वे देवसेवित अवन्तीपुरीमें लौट आये। उस समय ऋषि, सिद्ध और चारण अत्यन्त प्रसन्न हो जय-जयकारके साथ भगवान् सदाशिवकी स्तुति करने लगे। देवताओंको पुनः अपना स्थान प्राप्त हुआ। वहाँ त्रिपुर नामक दानवको उत्कर्षपूर्वक जीता गया था। इसलिये सब ऋषि-महर्षियोंने उसका नाम 'उज्जयिनी' रख दिया। तभीसे अवन्तीपुरीका नाम उज्जयिनी-पुरी हुआ। जो मानव उस पुरीमें स्नान, दान आदि करते हैं, उनके शरीरमें कोई पाप नहीं ठहर पाता। उज्जयिनीपुरीमें विद्याकी इच्छा रखनेवाला महादेवजीकी, धनार्थी पुरुष धनाध्यक्ष कुबेरकी, पुत्रार्थी सुरेश्वर इन्द्रकी, सुखार्थी मानव दिनेश्वर सूर्यकी, उत्तम बुद्धि चाहनेवाला गणेशकी तथा प्रिय वस्तुकी इच्छा रखनेवाला भगवान् शेषकी स्तोत्रमयी वाणीद्वारा आराधना करते हुए निवास करे। जो सौभाग्यशाली मानव सदा उज्जयिनीपुरीमें निवास करता है, वह मनोवांछित कामनाओंका उपभोग करके मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके धाममें जाता है।

अब उज्जयिनीपुरीका पद्मावती नाम पड़नेका कारण बतलाऊँगा। एक समय दुष्टात्मा दानवोंके द्वारा धर्मको बड़ी भारी हानि पहुँची। तब समस्त देवताओंने दैत्योंसे मिलकर समुद्रका मन्थन किया। उस समय समुद्रसे महालक्ष्मी प्रकट हुईं। वे उज्जयिनीके महाकाल वनमें रहने लगीं। तदनन्तर कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, वारुणी मदिरा, धन्वन्तरि वैद्य, चन्द्रमा, कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, अमृत-कलश, रम्भा अप्सरा, शार्ङ्ग धनुष, पांचजन्य शंख, महापद्म निधि और हालाहल विष—ये नाना प्रकारके चौदह रत्न प्राप्त हुए। इन सबको लेकर देवता और दैत्य माहेश्वर वनमें आये और वहाँ बैठकर अमृत पीनेके विषयमें विचार करने लगे। वे सभी 'पहले मैं, पहले मैं' ऐसा कहते हुए विवाद करने लगे। इसके कारण वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया। इसी समय वहाँ देवर्षि नारद आये। उन्होंने दोनों दलोंका वह कलह देखकर भगवान् विष्णुकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि सबके मनको मोहनेवाली नारीका रूप धारण करके वहाँ आये। उस सुन्दरीको देखकर वे महादैत्य कामदेवके वशीभूत हो गये। इसी समय श्रीहरिने अपने हाथका कौशल दिखाते हुए दैत्योंको मदिरा और देवताओंको अमृतका कलश दे दिया। राहु नामक दैत्य देवताओंका-सा रूप धारण करके उन्हींके बीचमें बैठकर वह उत्तम अमृत पीने लगा। यह जानकर भगवान् विष्णुने तुरंत ही चक्रसे उसका मस्तक काट डाला। परंतु अमृतका स्पर्श हो जानेके कारण उस असुरकी मृत्यु नहीं हुई। वही इस महाकाल क्षेत्रमें राहु और केतुके नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् महाकाल वनमें देवताओंने उन रत्नोंको परस्पर बाँट लिया, जिससे वे रत्नभोगी हुए। मोहिनी देवीने कौस्तुभ मणि, लक्ष्मी, शार्ङ्ग-धनुष तथा पांचजन्य शंख—ये चार वस्तुएँ भगवान् विष्णुको दीं। उच्चैःश्रवा घोड़ा सूर्यको दिया, गजश्रेष्ठ ऐरावत इन्द्रको समर्पित किया। देवताओंको अमृत और शिवजीको चन्द्रमा प्रदान किया। वृक्षोंमें

१५. अवन्तीखण्ड (अवन्तीक्षेत्र व चतुरशीतिलिंग)

९४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रेष्ठ पारिजात तथा रम्भा अप्सराको इन्द्रके क्रीड़ा-कानन नन्दनवनमें भेज दिया। देवताओंको अपना खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त हो गया। कामधेनु गौको यज्ञकी सिद्धिके लिये ऋषियोंके अधीन किया। महापद्म नामकी निधि कुबेरके भवनमें गयी; परंतु उस हालाहल विषका किसीने भी आदर नहीं किया। भगवान् शंकरने जगत्के हितकी इच्छासे स्वयं ही उस विषको पीकर कण्ठमें धारण कर लिया। तभीसे महादेवजीका नाम नीलकण्ठ हुआ। जहाँ रत्नोंका बँटवारा हुआ, उस रत्नकुण्डमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् नीलकण्ठका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर सब रत्नोंका भोगी होता है तथा अन्तमें शिवलोकको जाता है। उस समय हर्षमें भरे हुए ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता कहने लगे—‘इस उज्जयिनी-पुरीमें आकर हम सब लोग रत्नोंके भोगी हुए हैं तथा यहाँ सब समय भगवती पद्मा (लक्ष्मी) निश्चलरूपसे निवास करती हैं, अतः आजसे इस पुरीका नाम ‘पद्मावती’ होगा। जो महाभाग मानव इस पुरीमें स्नान, दान, पूजन तथा देवताओं, पितरोंका तर्पण करता है, उसके शरीरमें किंचिन्मात्र भी पाप नहीं रह जाता तथा उसे दरिद्रता और दुर्गंतिकी भी प्राप्ति नहीं होती।

सनत्कुमारजी कहते हैं—‘व्यासजी! एक समय महर्षि लोमशने अपना अनुभव इस प्रकार सुनाया था।’

लोमशजी बोले—एक बार मैं तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुशस्थलीपुरीमें गया था। वहाँ भगवान् महेश्वरके दर्शनमात्रसे मेरे सारे रोग, सारी चिन्ताएँ मिट गयीं और मैं निर्मल हो गया। वहीं दीर्घकालतक तपस्या करके मैं जरा और रोगसे रहित दीर्घायु हुआ। मैंने वहाँके सब तीर्थोंमें स्नान किया और पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो समस्त पापोंसे रहित हो गया। उस तीर्थमें पार्वतीजीके साथ भगवान् शंकर सदा निवास करते हैं। उनका श्रीअंग चन्द्रमाके मुकुटसे सुशोभित है। उनके अंगोंमें चिताका भस्म लगा रहता है। वे सब ओर चन्द्रकलाकी चटकीली चाँदनी छिटकाते हुए शोभा पाते हैं और इसीलिये वहाँपर कृष्णपक्ष, अमावास्या तिथि और अन्धकार कभी नहीं हुआ। वहाँकी नदियाँ, सरोवर, बावली तथा पल्वल आदि सभी जलाशय कुमुदिनीसे व्याप्त होते हैं और उनसे आच्छादित हुई पृथ्वी चाँदनीमें डूबी हुई-सी प्रतीत होती है। वहाँ सब समय कुमुद्वती (कुमुदिनी) खिली रहती है। इसलिये उस पद्मावतीपुरीका नाम कुमुद्वती हो गया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो कुमुद्वतीपुरीमें श्राद्ध करते हैं, उनके पितर कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते। वहाँका श्राद्ध अक्षय होता है।

व्यास! यह कुशस्थलीपुरी किस प्रकार अमरावती नामसे प्रसिद्ध हुई, वह प्रसंग सुनो। एक समय मुनिश्रेष्ठ मरीचिनन्दन कश्यपजीने अपनी पत्नीके साथ परम सुन्दर महाकाल वनमें बड़ी कठोर तपस्या की। तपस्या करते-करते जब एक सहस्र वर्ष पूरे हो गये, तब आकाशवाणी हुई—‘द्विजश्रेष्ठ! तुमने फलकी इच्छासे यह तीव्र तपस्या की है, इसलिये जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे तबतक इस पृथ्वीपर तुम्हारी सन्तति बनी रहेगी। तुम्हारी पतिव्रता पत्नी अदितिने भी तुम्हारे साथ रहकर तप किया है, इसलिये यह यशस्विनी देवी सदा छायाकी भाँति तुम्हारे साथ रहेगी। श्रीविष्णु (वामन) और चन्द्रमा आदि सब देवता जो तुम्हारे पुत्र हैं, देवलोकमें अजर-अमररूपमें विख्यात होंगे। ऋषिश्रेष्ठ! तुम भी मेरे वचनसे पापरहित प्रजापति होओगे।’

तभीसे महर्षि कश्यप अदिति और अग्निके साथ कुशस्थलीपुरीमें सदा निवास करते हैं। इसीलिये देवता, असुर और मानवरूप उनकी समस्त प्रजा सदा वृद्धिको प्राप्त होती है। व्यास! देवताओंने महाकाल वनमें ही अमृत-पान किया था, इसलिये वे अमर हो गये। उत्तम महाकाल वनमें ही जो नन्दनवन है, वहीं सब मनोरथों एवं वरोंको देनेवाली कामधेनुका निवास बताया गया है। समस्त ब्रह्माण्डमें जो दिव्य वस्तुएँ हैं, वे सब उत्तम महाकाल वनमें स्थित हैं। यहाँ अमरोंकी स्थिति है, इस कारण

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९४३

इस पुरीका नाम अमरावती हुआ। जो इस पुरीमें स्नान, दान आदि करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करता है, उसके लिये पुत्र या धन आदि कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। वह समस्त भोगोंको पाता है और मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके धाममें जाता है।

महाभाग व्यास! यह अमरावतीपुरी जिस प्रकार विशाला नामसे विख्यात हुई, वह प्रसंग भी सुनो। एक समय भगवती उमाने शिवजीसे कहा—'समस्त जगत्को धारण करनेवाले देवदेव जगदीश्वर ! आप मेरे निवासके लिये समस्त कामनाओंको देनेवाली पुरीका निर्माण कीजिये।' पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने सबके मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर पुरीका निर्माण किया, जो बहुत ही विशाल, विस्तृत, पुण्यमयी तथा पुण्यात्माओंका आश्रय थी। विशाल होनेके कारण ही उस सदा रहनेवाली पुरीका नाम 'विशाला' हुआ। जहाँ कहीं किसी भी अवस्थामें रहकर भी जो नित्य विशाला नामका उच्चारण करता है, वह मनुष्य भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। व्यास ! इस समस्त पृथ्वीपर या सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें विशालाके समान भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली दूसरी कोई पुरी नहीं है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें पितरोंके उद्देश्यसे यहाँ दान करते हैं, उनका वह सब दान अक्षय होता है। जिन्होंने कभी दूसरे कार्यके प्रसंगसे भी विशालापुरीमें आकर स्नान, दान आदि पुण्यकार्य किया है, वे जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त होनेपर भगवान् शिवके ही धाममें जाते हैं। व्यासजी ! इस प्रकार इस कुशस्थली-पुरीका नाम विशाला हुआ है।


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काष्ठा, कला आदि कालमान, युग और कल्पभेद तथा प्रतिकल्पपुरीका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है, तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात होता है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। चन्द्रमा और सूर्यकी गति भी बतायी जाती है। सूर्यकी गतिविशेषसे मनुष्योंका दिन तथा रात्रि होती है। पंद्रह दिन-रातका एक पक्ष होता है। दो पक्षोंका मास और दो मासकी ऋतु कही जाती है। तीन ऋतुओंका एक अयन होता है। दो अयन मिलाकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन और उत्तरायण यही दो अयन हैं। इस मानके अनुसार जो दो पक्षोंका मास होता है, वही पितरोंका दिन-रात है। शुक्ल पक्ष उनका दिन और कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि है। इसीसे पितरोंका श्राद्ध कृष्ण पक्षमें किया जाता है। मनुष्योंके कालमानके अनुसार जो एक वर्ष होता है, वही देवताओंका दिन-रात है। उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन रात्रि। देवताओंके चार हजार वर्षका एक सत्ययुग होता है। उतने ही सौ वर्षोंकी उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांश है। देवताओंके तीन हजार वर्षका त्रेता और तीन-तीन सौ वर्षके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश होते हैं। दो हजार वर्षोंका द्वापर बताया गया है और दो-दो सौ वर्षोंके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश हैं। एक सहस्र दिव्य वर्षोंका कलियुग होता है और सौ-सौ वर्षके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश कहे गये हैं। इस प्रकार चारों युगोंकी वर्ष-संख्या दिव्यमानसे बारह हजार बतायी गयी है। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको एक चतुर्युग कहते हैं। इकहत्तर चतुर्युगका एक मन्वन्तर बताया गया है। एक सहस्र युगका ब्रह्माजीका एक दिन बताया गया है। उसीको कल्प कहते हैं। उतने ही युगोंकी ब्रह्माजीकी रात्रि भी बतायी जाती है। ब्रह्माकी उस रात्रिमें पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी जलमें डूब जाती है।

९४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रात्रिके सहस्र युग पूर्ण हो जानेपर पुनः ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता है। उनके पूरे एक दिनके समयको पूर्णतः एक कल्प कहते हैं। पूर्वोक्त इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक समय बीतनेपर एक मन्वन्तर पूरा होता है। इन मनुओंकी संख्या चौदह बतायी गयी है। ये मनु अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। समस्त वेदों और पुराणोंमें ये प्रभावशाली तथा समस्त प्रजाओंके पालक बताये गये हैं। इन सबका कीर्तन धन्य है। एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका समय समाप्त हो जाता है। उसमें सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे सम्पूर्ण प्राणी दग्ध हो जाते हैं। ब्रह्मर्षिगण द्वादश आदित्योंके साथ ब्रह्माजीको आगे करके सुरश्रेष्ठ भगवान् नारायणमें प्रवेश कर जाते हैं। वे अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि ही ब्रह्मा आदिके रूपमें प्रत्येक कल्पमें बार-बार समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींका है। वे ही परमेश्वर परम सुन्दर महाकाल वनमें ब्रह्मा और महादेवजीके साथ निवास करते हैं। उत्तम महाकाल वनमें प्रलयकाल भी बाधा नहीं पहुँचाता। यह कुशस्थली-पुरी कल्प-कल्पमें अत्यन्त मनोहर होती जाती है। युग-युगमें पाप-तापसे रहित निर्भय और निर्विकार होती है।

व्यास! पूर्वकालसे ही इसी प्रकार प्रत्येक कल्पमें सृष्टिका आरम्भ होता है। वाराह, वामन, विष्णु और पितरोंके जो भिन्न-भिन्न कल्प बताये गये हैं, वे सभी इस कल्पान्तमें महाकाल वनमें ही प्रारम्भ हुए हैं। इस वनमें चौरासी कल्प व्यतीत हो गये। अतः उतने ही ज्योतिर्लिंग इस वनमें विराजमान हैं। पृथ्वी, समुद्र और पर्वत बार-बार उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। भविष्यमें भी वे इसी प्रकार उत्पन्न और नष्ट होंगे। परंतु यह पुरी अचल मानी गयी है। इसीलिये सब समय और सब लोकोंमें इसकी महिमाका गान किया जाता है। यह प्रतिकल्पमें अचल रहती है। इसलिये इस पृथ्वीपर यह 'प्रतिकल्पा' नामसे विख्यात होगी।

वैशाखकी पूर्णिमाको प्रतिकल्पापुरीमें जाकर भगवान् महेश्वरका दर्शन करे और एक दिन उन्हें स्नान करावे। जो मानव किसी दूसरे प्रसंगसे भी शिप्रा नदीके जलमें स्नान करता है, उसके भीतर किंचिन्मात्र भी पाप शेष नहीं रहता और वह विष्णुलोकको जाता है। प्रत्येक कल्प और कल्पान्तमें यह पुरी अपने पूर्वरूपमें ही बनी रहती है। इसलिये सब लोगोंमें यह 'प्रतिकल्पा' के नामसे विख्यात है। जो मनुष्य इस पुरीके प्रति प्रेम रखते हैं, उनके लिये यह कल्पभेद नहीं होता।

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शिप्राका माहात्म्य, उसके 'ज्वरघ्नी' और 'अमृतोद्भवा' आदि नाम पड़नेका कारण

सनत्कुमारजी कहते हैं—महाभाग व्यास! इस पृथ्वीपर शिप्रा नदीके समान दूसरी कोई नदी नहीं है। जिसके तटका दर्शन करनेमात्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है, फिर दीर्घकालतक सेवन करनेसे तो कहना ही क्या है। वैकुण्ठमें इसका नाम 'शिप्रा' है, देवलोकमें यह 'ज्वरघ्नी' कहलाती है, यमद्वारमें 'पापघ्नी' के नामसे प्रसिद्ध है, पातालमें इसे 'अमृत-सम्भवा' कहते हैं और वाराहकल्पमें इसका नाम 'विष्णुदेहा' कहा गया है। अवन्तीपुरीमें भी 'शिप्रा' के नामसे ही इसकी ख्याति है। यह नदी साक्षात् कामधेनुसे प्रकट हुई है। वैकुण्ठलोकसे उत्पन्न होकर शिप्रा नदी तीनों लोकोंमें विख्यात हुई है। व्यास! शिप्राका नाम ज्वरघ्नी क्यों हुआ, यह बताता हूँ, सुनो। अनिरुद्धसे अपमानित होकर दैत्यराज बाणासुरने जब भगवान् श्रीकृष्णके साथ अपनी सहस्रों भुजाओंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध किया, तब वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने क्षुरप्र नामक शीघ्रगामी बाणके द्वारा शीघ्रतापूर्वक

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४५

उसकी सहस्र भुजाओंको काट डाला (केवल दो भुजाएँ शेष छोड़ दीं)। भुजाएँ कट जानेसे बाणासुरका उत्साह भंग हो गया। वह उस युद्धसे पीड़ित हो भगवान् शंकरकी शरणमें गया। अपने समीप आये हुए भयविह्वल बाणासुरको देखकर भगवान् शिवको बड़ी दया आयी। वे, युद्धमें जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अविचलभावसे खड़े थे, वहाँ गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्होंने श्रीकृष्णको आगे बढ़नेसे रोका। फिर तो दोनोंमें बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ गया। भगवान् शिवने माहेश्वर ज्वरको प्रकट किया। यह देख श्रीकृष्णने भी वैष्णव ज्वरकी सृष्टि की। फिर वे दोनों ज्वर एक-दूसरेसे भयंकर युद्ध करने लगे। अन्तमें माहेश्वर ज्वर भाग खड़ा हुआ। वह सब लोकोंमें घूमता फिरा, पर कहीं भी उसे शान्ति नहीं मिली। अन्तमें वह महाकाल वनमें आया और वैष्णव ज्वरसे पीड़ित हो शिप्रा नदीके जलमें कूद पड़ा। इससे उसको बड़ी शान्ति मिली। माहेश्वर ज्वरको शान्त हुआ देख वैष्णव ज्वरने भी वहाँ पहुँचकर शिप्राके जलमें स्नान किया। उस जलके प्रभावसे विष्णु और शिव दोनोंके ही ज्वर शान्त एवं विनष्ट हो गये। इसलिये शिप्रा नदी सब समयमें ज्वरका तत्क्षण नाश करनेवाली मानी गयी है। ज्वरसे पीड़ित एवं परम दुःखित हुए जो मानव एकाग्रचित्त हो शिप्रामें गोता लगाते और उसके तटपर निवास करते हैं, उन्हें ज्वरजनित पीड़ा कभी कष्ट नहीं देती है।

महामते व्यास ! एक समयकी बात है। भगवान् शिव हाथमें कपाल लेकर नागलोककी भोगवती-पुरीमें भिक्षाके लिये गये और घर-घर घूमकर उन्होंने 'भिक्षां देहि' (भिक्षा दो) की रट लगायी। किंतु उन भूखे भगवान् शिवको किसीने भी भिक्षा नहीं दी। तब वे पुरीसे बाहर निकले और उस स्थानपर गये, जहाँ नागलोकके संरक्षणमें अमृतके इक्कीस कुण्ड भरे हुए थे। वहाँ पहुँचकर सर्वान्तर्यामी भगवान् शंकरने अपने तृतीय नेत्रके मार्गसे अमृतके समस्त कुण्डोंको पी लिया और फिर वहाँसे उठकर चल दिये। यह सब देख-सुनकर समस्त नागलोक काँप उठा और सब एक-दूसरेसे पूछने लगे, 'यह किसका कर्म है? किसने क्या कर दिया है, जिससे इन कुण्डोंका अमृत यहाँसे चला गया?'

परस्पर ऐसा कहकर वासुकि आदि सभी नाग किसी महात्माका अपराध हो जानेकी आशंकासे नगर छोड़कर बाहर निकले और 'क्या करें, कहाँ जायँ? अब हमारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा?' इत्यादि रूपसे चिन्ता प्रकट करते हुए स्त्री-बालकोंके साथ वे मन-ही-मन भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। तब उनपर अनुग्रह करनेके लिये आकाशवाणी हुई—'नागगण! तुमलोगोंने घरपर आये हुए देवताका अपमान किया, अतिथिसत्कारका समय जानकर हाथमें कपाल लिये भिक्षुके वेषमें भिक्षा लेनेके लिये साक्षात् भगवान् शंकर तुम्हारे द्वारपर आये थे। परंतु भोगवतीपुरीमें किसीने भी उनको भिक्षा नहीं दी, तब वे बाहर चले गये हैं। इसी व्यतिक्रमके कारण तुम्हारे कुण्डोंका सम्पूर्ण अमृत नष्ट हो गया है। अब तुमलोग पातालसे निकलकर उत्तम महाकाल वनमें जाओ। वहाँ तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली श्रेष्ठ नदी शिप्रा बहती है, जो समस्त कामनाओं और फलोंको देनेवाली है। वहाँ जाकर तुम सब लोग विधिपूर्वक स्नान और देवाधिदेव भगवान् शिवका भजन करो। ऐसा करनेपर नागलोकमें तुम्हारी नष्ट हुई अमृतराशि पुनः प्राप्त हो जायगी।'

इस आकाशवाणीको सुनकर सब नाग स्त्री-बालक और वृद्धोंके साथ महाकाल वनमें गये। उन्होंने उस त्रिभुवनवन्दिता शिप्रा नदीका दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और वहाँ स्नान-दानादि करके उन्होंने महादेवजीकी आराधना की। कभी मलिन न होनेवाली कमलपुष्पोंकी माला, नाना प्रकारके फूल, अक्षत, वस्त्र, पुष्पहार, अनुलेपन, चन्दन, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा और कपूरकी आरती आदि पूजनसामग्री लेकर वे सब-के-सब महादेवजीकी सेवामें उपस्थित

९४६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हुए। उस समय अमृतकी इच्छा रखनेवाले नागोंने भगवान् शिवकी पूजा करके इस प्रकार उनका स्तवन किया।

नाग बोले— जिनका कहीं अन्त नहीं है, ऐसे ब्रह्मस्वरूप शिवको नमस्कार है। सर्वदेवमय शिव! आपको बार-बार नमस्कार है। चन्द्रचूड! जटाका मुकुट धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। शंकरात्मन्! आपको नमस्कार है। सबके साक्षी शंकर! आपको नमस्कार है। समस्त बीजोंकी उत्पत्तिके कारणभूत महादेव! आपको नमस्कार है। अमृतका स्रोत बहानेवाले ईश्वर! आपको नमस्कार है। कमनीय कामस्वरूप आपको नमस्कार है। सर्वकामवरप्रद! आपको नमस्कार है। शान्तस्वरूप शिवको नमस्कार है। पशुओं (अज्ञानी जीवों)-का पालन करनेवाले भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। मृड (सुखस्वरूप), दान्त (मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले) और शान्तरूप आपको नमस्कार है।

नागोंके द्वारा इस प्रकार स्तुतिसे प्रसन्न किये हुए भगवान् शंकर प्रत्यक्ष दर्शन देकर बोले— नागगण! किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे तुम सब लोग नागलोक छोड़कर इस उत्तम महाकाल वनमें आये हो और बालकों, वृद्धों तथा स्त्रियोंके साथ तुमने सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्राका दर्शन किया है। तुम सब श्रेष्ठ नागोंने शिप्रामें स्नान किया है। अतः उसके पुण्यप्रभावसे तुम्हारे घर-घरमें अमृत प्राप्त होगा। तुम शिप्राका जल ले जाकर अपने अमृत-कुण्डोंमें छिड़क दो। उससे वे इक्कीसौं कुण्ड अमृतसे भर जायँगे और स्थिर रहेंगे।

तब उन नागोंने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् महेश्वरको प्रणाम किया और अपने हाथोंमें शिप्रा नदीका जल लेकर वे नागलोकमें लौट गये। तबसे नागलोकमें शिप्राका नाम अमृतोद्भवा (या अमृतसम्भवा) प्रसिद्ध हुआ। जो मनुष्य इसमें स्नान-दानादि पुण्यकर्म करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रहता तथा उन्हें कभी आपत्ति और दुर्गति नहीं देखनी पड़ती।


जय-विजयको सनकादिका शाप, भगवान्का वाराहावतार, वाराहके हृदयसे शिप्राकी उत्पत्ति तथा उसका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं— महाभाग! शिप्रा नदी सर्वत्र पुण्यदायिनी, अतिशय पवित्र तथा पापहारिणी है। परंतु अवन्तीपुरीमें उसका यह महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। पूर्वकालमें अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुके मनोहर वैकुण्ठधाममें जय और विजय नामवाले दो द्वारपाल थे। दोनों ही बड़े पराक्रमी थे और सदा हाथमें डंडा लिये वैकुण्ठके द्वारपर खड़े रहते थे। मुनिश्रेष्ठ! एक समय ब्रह्माजीके मानसपुत्र सनकादि स्वेच्छासे सब लोकोंमें भ्रमण करते हुए भगवान् विष्णुके परम धाममें आये। उनके मनमें श्रीविष्णुके दर्शनकी बड़ी लालसा थी। द्वारपर आते ही द्वारपालोंने उन्हें सहसा रोक दिया। उनके धक्के खाकर वे चारों कुमार वहाँकी भूमिपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। द्वारपालोंके इस बर्तावसे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। इतनेमें ही कमलके समान नेत्रवाले महाबाहु भगवान् विष्णु भी वहाँ आ गये। उन्होंने पृथ्वीपर दुःखित होकर पड़े हुए उन कुमारोंको ज्यों ही देखा, सहसा आगे बढ़कर उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया। मधुसूदनने उन कुमारोंका मस्तक सूँघा और भुजाओंमें कसकर छातीसे चिपका लिया। तदनन्तर पूछा—'महात्माओ! आपको यह मूर्च्छा कैसे आ गयी। किसने आपलोगोंको इस भारी दुःखमें डाला है?'

कुमार बोले— महाराज! हम आपके दर्शनकी अभिलाषासे वैकुण्ठधामके भीतर आ रहे थे कि सहसा इन बलोन्मत्त द्वारपालोंने हमें रोक दिया, इसीसे हमें यह दशा प्राप्त हुई है। अतः आजसे इस स्थानपर इनकी सनातन स्थिति न हो, ये दोनों असुरयोनिको प्राप्त हो जायँ।

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४७

सनकादि कुमारोंके इतना कहते ही वे दोनों जय और विजय तत्काल आसुरी योनिमें चले गये। वे दोनों प्रथम जन्ममें 'हिरण्यकशिपु' और 'हिरण्याक्ष', दूसरे जन्ममें 'कुम्भकर्ण' तथा 'रावण' और तीसरे जन्ममें 'दन्तवक्र' एवं 'शिशुपाल' कहलाये। हिरण्याक्ष नामक दैत्य बड़ा बलवान् था। वह सब देवताओंको जीतकर स्वयं ही उनके लोकोंका अधिकारी बन बैठा। राज्यभ्रष्ट देवता पराजित होकर स्वर्गसे निकाल दिये गये। उस समय सब लोग पाखण्डी, पराक्रमशून्य तथा धर्मविमुख हो गये। 'सब कुछ ब्रह्म ही है' ऐसा कहते हुए दम्भी दैत्य पशुओंके समान आचरणवाले हो गये थे।

संसारकी ऐसी दुरवस्था देख भगवान् महाविष्णुने विचार किया कि जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने-आपको संसारमें प्रकट करता हूँ।* अतः अब मुझे अवतार ग्रहण करना चाहिये। ऐसा सोचकर उन्होंने लीलासे ही श्वेतद्वीपके समान परम उज्ज्वल मंगलमय दिव्य वाराहशरीर धारण किया, जो पूर्णतः यज्ञमय था। यूप (यज्ञस्तम्भ) ही उनकी दाढ़ें थीं, हविष्यकी गन्ध ही उनके शरीरकी दिव्य गन्ध थी, बीज और ओषधियाँ ही उनकी रोमावलि थीं और चारों वेद ही उनके चार चरण थे। साक्षात् आदिपुरुष परमेश्वर ही, जिनके अनेकों नाम हैं और वेदोंमें जिनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की गयी है, वाराहरूपसे प्रकट हुए थे। उन्होंने बड़ा भारी संग्राम करके उस दुर्धर्ष दैत्य हिरण्याक्षको मार डाला। उससे पीड़ित हुई यह पृथ्वी रसातलको चली गयी थी। उसे भगवान् वाराह अपनी दाढ़से उठाकर ऊपर ले आये। हिरण्याक्षके अनुगामी बहुतसे दैत्य मारे गये। शेष सभी भागकर पातालमें चले आये। उस समय पवित्र वायु चलने लगी। सूर्य उत्तम प्रभासे परिपूर्ण हो गये। अग्निकुण्डोंकी बुझी हुई अग्नियाँ पुनः प्रज्वलित हो उठीं और दिशाओंमें जो कोलाहल होते रहते थे, वे सब शान्त हो गये।

भगवान् वाराहमूर्ति सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंको देनेवाले हैं। वे आनन्दसे परिपूर्ण दैव, दैत्योंका संहार करनेवाले तथा भक्तोंको वर देनेवाले हैं। उन्हींके हृदयसे यह सनातन नदी शिप्रा प्रकट हुई है, जो आनन्दमय जलसे परिपूर्ण तथा आनन्ददायक वर देनेवाली है। रमणीय महाकाल वनमें परम सुन्दर पद्मावतीपुरी है। उस पुरीमें सुन्दर कुण्ड परम रम्य प्राचीन और शुभ है। उसमें स्नान करके सब मनुष्य सनातन शिवलोकको जाते हैं। व्यास! उसी सुन्दर वनमें लोकपावनी शिप्रा लीन हुई है। भगवान् वाराहने समस्त दुष्ट दैत्योंका संहार करके देवताओंको निर्भय कर दिया। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने हाथ जोड़कर उन महाविष्णुको नमस्कार किया और सामने खड़े होकर इस प्रकार पूछा।

देवता बोले—देवदेव! जगन्नाथ! आपके गुणोंका श्रवण और कीर्तन परम पुण्यमय है। कृपया यह बताइये कि किस पुण्यके प्रभावसे हमें स्वर्गलोक प्राप्त हो सकता है?

भगवान् वाराह बोले—देवताओ! महाकाल वनमें तुम्हारी मनोरथसिद्धिका कारणभूत गुह्यसे भी गुह्य पुण्य-स्थान है। जहाँ मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई शिप्रा नदी लीन हुई है, वह स्थान लीनगंगाके नामसे विख्यात है। जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ लीनगंगा, प्राची, सरस्वती, पुष्कर, गयातीर्थ तथा शुभ पुरुषोत्तम सरोवर है, उस शिप्रा नदीको जाओ।

देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् वाराहका यह वचन सुनकर ब्रह्मा, इन्द्रादि सब देवता परम सुन्दर महाकाल वनमें, जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्रा बहती हैं, गये। वहाँ स्नान-दानादि शुभकर्म करके उस पुण्यके प्रभावसे वे अपने-अपने लोकको प्राप्त हुए। व्यासजी! इस प्रकार शिप्रा नदी सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली बतायी गयी है।


* यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥ (स्क० पु०, आ० अव० मा० ६३।४०)

९४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

क्षातासंगम तथा उसके निकटवर्ती तीर्थोंकी महिमा, राजा युगादिदेवके धर्ममय राज्यकी प्रशंसा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! अब क्षाता नदीके संगमसे प्रकट हुए एक अन्य तीर्थका माहात्म्य बताया जाता है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य महान् पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जब अमावास्या और शनिवारका योग हो, तब मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पितरोंके उद्देश्यसे श्राद्ध तथा तिल और जलसे तर्पण करे। तत्पश्चात् स्थावर लिंगके रूपमें प्रतिष्ठित उत्तम शनैश्चर देवका दर्शन करे। जो ऐसा करता है, उसे कभी शनैश्चर ग्रहसे पीड़ा नहीं होती। नर्मदा, चर्मण्वती और क्षाता—ये तीन नदियाँ पूर्वकालमें अमरकण्टक पर्वतसे पृथ्वीपर प्रकट हुईं। ये तीनों ही तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। क्षाता नर्मदा नदीका साथ छोड़कर उत्तम विन्ध्यगिरिका भेदन करती हुई परम सुन्दर महाकाल वनमें चली आयी, जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्रा तथा परम पुण्यमयी यह अमरावतीपुरी है। यहाँ आकर क्षाता नदी पूर्वकालमें जहाँ शिप्राके साथ मिली थी, वहाँ 'क्षातासंगम' नामक उत्तम तीर्थ प्रकट हो गया।

यज्ञकुण्डसे उत्तर भागमें, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्जी विराजमान हैं, 'धर्मसरोवर' नामसे विख्यात एक उत्तम तीर्थ है। पवनकुमार हनुमान्जीने वहीं तपस्याके द्वारा उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके काँसेका पात्र दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो श्रावणमासके शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको उत्तम आचारका पालन करते हुए धर्मतीर्थमें स्नान और दानादि सत्कर्म करता है, उसे सनातन विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। च्यवनजीके आश्रममें स्नान करके मनुष्य च्यवनेश्वर शिवका दर्शन करे, जहाँ वैद्योंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। च्यवन मुनिकी कृपासे ही अश्विनीकुमारोंने देवताओंकी पंक्तिमें स्थान प्राप्त किया था और च्यवनने भी वहीं अश्विनीकुमारोंकी चिकित्सासे खोयी हुई दृष्टि प्राप्त की थी। द्विजश्रेष्ठ ! उस तीर्थमें मनुष्य दिव्य दृष्टि प्राप्त करता है। वहीं भगवान् सूर्यने अग्निहोत्रसहित उत्तम आसन प्राप्त किया है। उसी तीर्थके प्रभावसे महाभागा संज्ञा और विश्वविख्यात सावित्रीने सूर्यलोकमें जाकर विपुल ऐश्वर्यका उपभोग किया है। अतः क्षातासंगमतीर्थ बहुत उत्तम, सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यवर्धक तथा समस्त कामनाओं एवं वरोंको देनेवाला है।

व्यासजी ! प्राचीन कालकी बात है। पुण्यमय सत्ययुगमें युगादिदेव नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े धर्मात्मा थे। उनके गुणोंका श्रवण और कीर्तन भी पुण्यजनक माना गया है। वे प्रजाको अपने सगे पुत्रोंकी भाँति मानकर उसका भलीभाँति पालन करते थे। उनकी प्रजा सब साधनोंसे सम्पन्न तथा सब ओरसे सदैव उन्नतिशील थी। उनके शासनकालमें धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त था। सदा समयपर वर्षा होती और सब ऋतुएँ अपने अंगोंसे सम्पन्न होकर आती थीं। पृथ्वीपर अनाज और फल अधिक पैदा होता था। उस राजाके राज्यमें कोई भी मनुष्य आधि-व्याधिसे पीड़ित नहीं दिखायी देते थे। स्त्रियाँ भी दुःशीला, दुर्भगा और विधवा नहीं देखी जाती थीं। उनमें बहुत पुत्रोंवाली, थोड़े पुत्रोंवाली, मरे पुत्रोंवाली अथवा वन्ध्या भी कोई दृष्टिगोचर नहीं होती थीं। सभी रूपवती, सुशीला, गुणवती तथा पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली थीं। राह-बाटमें शत्रुओंका आक्रमण नहीं होता था। चोर-डाकुओंका भी भय नहीं रहता था। घर-घरमें सदा यही शब्द सुनायी पड़ता था कि होम करो, भोजन कराओ और सदा दान देते रहो। जप, दान, तप, होम, स्तुति और यज्ञकर्मोंमें लगे हुए मनुष्य ही सर्वत्र दिखायी देते थे। वे सब धर्मोंका पालन करते थे। धर्म अपने चारों पैरोंसे चलता था, परंतु अधर्मका एक ही पाद था। राजा युगादिदेव ऐसे धर्मात्मा थे। उन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन किया और अपनी प्रजाको बढ़ाया। व्यासजी ! अवन्तीपुरीमें भी राजा युगादिदेवने करोड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।


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