श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
84 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/128-138 ]
मेरी नामसंख्या पूर्ण हो जायेगी, तब मैं तुम्हारी अभिलाषाको पूर्ण करूँगा॥"128॥
साधुसङ्गमें वेश्याका पश्चाताप एवं ठाकुरकी कृपाकी याचना :-
कीर्त्तन करिते ऐछे रात्रि शेष हैल।
ठाकुरेर सने वेश्यार मन फिरि' गेल॥ 129 ॥
अनुवाद—कीर्त्तन करते हुए पहलेकी भाँति वह रात्रि समाप्त हो गयी। श्रीहरिदास ठाकुरके सङ्गसे उस वेश्याका मन परिवर्तित हो गया॥ 129 ॥
दण्डवत् हञा पड़े ठाकुर-चरणे।
रामचन्द्र खाँनेर कथा कैल निवेदने॥ 130 ॥
“वेश्या हञा मुञि पाप करियाछौं अपार।
कृपा करि' कर मो-अधमे निस्तार॥"131 ॥
अनुवाद—वेश्या दण्डवत् होकर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर गयी और उसने श्रीहरिदास ठाकुरको बतलाया कि रामचन्द्र खाँनने उसे उन्हें पतित करनेके लिये भेजा था। उसने आगे कहा,—“वेश्या होनेके कारण मैंने असंख्य पाप किये हैं। आप कृपा करके मुझ अधमका उद्धार कीजिये॥"130-131॥
ईश्वर-द्वेषी खाँनके प्रति श्रीठाकुरकी उपेक्षापूर्ण उक्ति :-
ठाकुर कहे,—“खाँनेर कथा सब आमि जानि।
अज्ञ मूर्ख सेइ, ता'रे दुःख नाहि मानि॥ 132 ॥
वेश्याके प्रति कृपाका उदय :-
सेइदिन याइताम एस्थान छाड़िया।
तिन दिन रहिलाङ तोमार लागिया॥"133 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं रामचन्द्र खाँनके षड़यन्त्रके विषयमें सबकुछ जानता हूँ। वह अज्ञानी मूर्ख है, इसलिये मैं उसके किसी कार्यसे दुःखी नहीं होता। जिस दिन वह यह षड़यन्त्र रच रहा था, मैं तो उसी दिन ही चला जाता, किन्तु तुम्हारे कारण ही मैं तीन दिन तक यहाँ रुका रहा॥"132-133॥
वेश्याके द्वारा अपने उद्धारकी प्रार्थना :-
वेश्या कहे,—“कृपा करि' करह उपदेश।
कि मोर कर्त्तव्य, याते याय भवक्लेश॥"134 ॥
अनुवाद—वेश्याने कहा,—“आप कृपा करके मुझे मेरे कर्त्तव्यके विषयमें उपदेश कीजिये जिससे मेरा जन्म-मरणका क्लेश दूर हो जाय॥"134 ॥
वेश्याको संसार और सर्वस्व त्याग करनेका उपदेश :-
ठाकुर कहे,—“घरेर द्रव्य ब्राह्मणे कर दान।
एइ घरे आसि' तुमि करह विश्राम॥ 135 ॥
वैष्णवसेवा और निरन्तर कृष्णकीर्त्तनके फलसे ही जीवकी प्रयोजन-सिद्धि :-
निरन्तर नाम कर तुलसी-सेवन।
अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण॥"136 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“तुम अभी जाकर जो कुछ तुम्हारे घरमें धन, वस्त्र, आभूषण आदि सम्पत्ति है, उनको ब्राह्मणोंको दान कर दो। तब इस कुटियामें आकर सदाके लिये वास करो। निरन्तर भगवद्-नाम करो और तुलसीजीकी सेवा करो। ऐसा करनेसे तुम्हें अतिशीघ्र ही श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥"135-136॥
वेश्याको महामन्त्र-दीक्षा प्रदान :-
एत बलि' तारे 'नाम' उपदेश करि'।
उठिया चलिला ठाकुर बलि 'हरि' 'हरि'॥ 137 ॥
अनुवाद—इतना कहकर श्रीहरिदास ठाकुरने उसे 'हरे कृष्ण' महामन्त्रका अर्थ और जपकी विधिका उपदेश किया। तब 'हरि', 'हरि' बोलते हुए वे उठकर वहाँसे चले गये॥ 137 ॥
वेश्याके द्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन :-
तबे सेइ वेश्या गुरुर आज्ञा लइल।
गृहवित्त येबा छिल, ब्राह्मणेरे दिल॥ 138 ॥
अनुवाद—तब उस वेश्याने गुरु श्रीहरिदास ठाकुरकी
[ 3/138-144 तीसरा अध्याय 85
आज्ञाका पालन करते हुए घरमें एकत्रित समस्त
धन-सम्पत्तिको ब्राह्मणोंमें बाँट दिया॥138॥
अनुभाष्य—'गुरुर',—श्रीहरिदासकी; 'गृहवित्त',—पाठान्तरमें
'गृहवृत्ति'-शब्द भी देखा जाता है; किन्तु वह सङ्गत
नहीं है, क्योंकि उसकी वृत्ति अर्थात् वेश्यावृत्ति अवश्य
ही ब्राह्मणको बाँटी नहीं गयी, वेश्यावृत्तिसे सञ्चित
धन-सम्पत्ति ही ब्राह्मणोंको अर्पित हुई थी। शिष्यके
सर्वस्वके ऊपर गुरुदेवका अधिकार होनेपर भी वैष्णव-गुरु
शिष्यके गृह-धन आदि प्राकृत मलसमूहको स्वयं ग्रहण
नहीं करते। जो दक्षिणा ग्रहण करते हैं, वे दक्षिणा-मार्गके
द्वारा यमलोकमें पतित होते हैं; वैष्णव-गुरु वैसे
यमलोकके यात्री नहीं हैं, वे उत्तरा-मार्गके पथिक हैं।
इसलिये कर्मी-ब्राह्मणोंको प्राकृत वैभवसमूह आदि देनेकी
व्यवस्था है। वैष्णव-गुरु हरि-विमुखताको उत्पन्न करनेवाले
शिष्यके भोग्य विषय-वैभवको स्वयं ग्रहण करके
शिष्यका आनुगत्य अथवा उसके मुखकी अपेक्षा नहीं
करते; अपितु वैसे वैभवको हरिकी विमुखताको उत्पन्न
करनेवाला मानकर उसे अवश्य ही त्याग करते हैं।
शिष्यको प्राकृत-अभिमानसे मुक्त करना एवं उसके
द्वारा त्याग किये गये जागतिक मलको स्वयं ग्रहण नहीं
करना ही सदाचारी वैष्णव-गुरुका कर्त्तव्य है,—श्रीहरिदास
ठाकुरकी यही शिक्षा है॥138॥
गुरु-गृहमें वैराग्यके साथ निरन्तर नाम-कीर्तन-सेवा :—
माथा मुड़ि' एकवस्त्रे रहिल सेइ घरे।
रात्रिदिने तिन लक्ष नाम ग्रहण करे॥139॥
अनुवाद—वह अपने सिरको मुण्डवाकर तथा एक
वस्त्रको धारण करके उस कुटियामें रहने लगी। वह
अपने गुरुके निर्देशके अनुसार प्रतिदिन तीन लाख नाम
ग्रहण करने लगी॥139॥
नामसाधनके फलसे धैर्य, इन्द्रियजय और
सिद्धिलाभ अथवा प्रेमोदय :—
तुलसी सेवन करे, चर्वण, उपवास।
इन्द्रिय-दमन हैल, प्रेमेर प्रकाश॥140॥
अनुवाद—वह तुलसीजीकी सेवा करने लगी। भिक्षामें
जो कुछ चना आदि मिलता उसे चबा लेती और कभी
भिक्षामें कुछ नहीं मिलता तो उपवास कर लेती। इस
प्रकार उसकी समस्त इन्द्रियोंके वेगोंका दमन हो गया
और उसमें प्रेमका प्रकाश हो गया॥140॥
उसे वैष्णवी-प्रतिष्ठा और गुरुत्वकी प्राप्ति :—
प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम-महन्ती।
बड़ बड़ वैष्णव ताँर दर्शनेते यान्ति॥141॥
अनुवाद—वह एक परम-महान्ती प्रसिद्धा वैष्णवी
बन गयी। तब बड़े-बड़े वैष्णव भी उसके दर्शनके लिये
आने लगे॥141॥
पापसे शिष्यको उद्धारकी प्राप्ति और अप्राकृत
साधुचरित्रके दर्शनसे गुरुके माहात्म्यकी ख्याति :—
वेश्यार चरित्र देखि' लोके चमत्कार।
हरिदासेर महिमा कहे करि' नमस्कार॥142॥
अनुवाद—उस वेश्याके ऐसे परम पवित्र चरित्रको
देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते। वे श्रीहरिदास
ठाकुरकी महिमाका गान करके उनको प्रणाम करते॥142॥
पाखण्डी रामचन्द्र खाँनके भीषण वैष्णवापराधका फल :—
रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज कैल।
सेइ बीज वृक्ष हञा आगेते फलिल॥143॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने अपराधका बीज बोया,
वही बीज बादमें वृक्षका रूप धारण करके जब फलित
हुआ, तब उसको फल भोगना पड़ा॥143॥
महदपराधे हैल फल अद्भुत कथन।
प्रस्ताव पाञा कहि, शुन, भक्तगण॥144॥
अनुवाद—महान व्यक्तिके चरणोंमें अपराध करनेके
फलकी अद्भुत कथा है। हे भक्तों सुनो, मैं प्रसङ्गवश
उसका वर्णन कर रहा हूँ॥144॥
अनुभाष्य— 'प्रस्ताव',—प्रसङ्ग॥144॥
86 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/145–152 ]
अनादि बहिर्मुख रामचन्द्र-खाँनकी वैष्णवापराधके
फलसे वैष्णव-विद्वेषमें वृद्धि :-
सहजेइ अवैष्णव रामचन्द्र खाँन।
हरिदासेर अपराधे हैल असुर-समान ॥ 145 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँन स्वभावसे ही अवैष्णव
था। उसपर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें अपराध
करनेके कारण वह असुरके समान बन गया ॥ 145 ॥
अनुभाष्य—ब्राह्मणकुलमें जन्म ग्रहण करनेपर भी
विष्णुके चरणोंमें अपराधके प्रभावसे विश्वश्रवाका पुत्र
रावण 'असुर' कहलाया। भक्तके चरणोंमें अपराधी
बनकर रामचन्द्र (खाँन भी) 'असुरके समान' कहलाकर
समाजमें प्रचारित हुआ ॥ 145 ॥
वैष्णवधर्म निन्दा करे, वैष्णव-अपमान।
बहुदिनेर अपराधे पाइल परिणाम ॥ 146 ॥
अनुवाद—बहुत दिनों तक वैष्णवधर्मकी निन्दा
करने और वैष्णवोंका अपमान करनेपर अब रामचन्द्र
खाँनको अपने अपराधोंका फल मिला ॥ 146 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुका वृत्तान्त :-
नित्यानन्द-गोसाञि गौड़े यबे आइला।
प्रेम प्रचारिते तबे भ्रमिते लागिला ॥ 147 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु जब गौड़देशमें आये,
तब वे प्रेमका प्रचार करते हुए भ्रमण करने
लगे ॥ 147 ॥
गौरसर्वस्व श्रीनित्यानन्दके दो प्रकारके गौर-सेवन-कार्य :-
प्रेम-प्रचारण आर पाषण्डदलन।
दुइकार्ये अवधूत करेन भ्रमण ॥ 148 ॥
अनुवाद—प्रेमका प्रचार तथा पाखण्डका दलन—इन
दो कार्योंको करनेके उद्देश्यसे अवधूत (श्रीनित्यानन्द
प्रभु) भ्रमण करने लगे ॥ 148 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें पाखण्डी रामचन्द्र-खाँनके
अपराधके वृत्तान्तका वर्णन :-
सर्वज्ञ नित्यानन्द आइला तार घरे।
आसिया बसिला दुर्गामण्डप-उपरे ॥ 149 ॥
अनुवाद—भ्रमण करते-करते सर्वज्ञ श्रीनित्यानन्द
प्रभु रामचन्द्र खाँनके घरपर आये और उसके घरके
दुर्गामण्डपमें बैठ गये ॥ 149 ॥
अनुभाष्य—'दुर्गा-मण्डप',—अवैष्णव सम्भ्रान्त-गृहस्थके
घरमें जिस स्थानपर दुर्गापूजा होती है, उस मण्डपको
'चण्डीमण्डप' अथवा 'दुर्गामण्डप' कहते हैं; शारदीय
अथवा वासन्ती पूजाके समयमें चार दिनोंके अतिरिक्त
अन्य समयमें वह मण्डप अतिथि और साधारण लोगोंके
द्वारा व्यवहार किया जाता है ॥ 149 ॥
अनेक लोकजन-सङ्गे अङ्गन भरिल।
भितर हैते रामचन्द्र सेवक पाठाइल ॥ 150 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ बहुत लोग थे,
इसलिये उन्हींसे घरका आङ्गन भर गया। उस समय
रामचन्द्र खाँन घरके भीतर था और वहींसे उसने अपने
एक सेवकको श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास भेजा ॥ 150 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अवज्ञा :-
सेवक बोले,—"गोसाञि, मोरे पाठाइल खाँन।
गृहस्थेर घरे तोमाय दिमु वासस्थान ॥ 151 ॥
गोयालार गोशाला हय अत्यन्त विस्तार।
इँहा सङ्कीर्ण-स्थल, तोमार मनुष्य—अपार ॥"152 ॥
अनुवाद—सेवकने कहा,—"हे गोसाईं, मुझे रामचन्द्र
खाँनने अन्य किसी गृहस्थके घरमें आप लोगोंको
रहनेका स्थान दिलवानेके लिये भेजा है। यह घर तो
बहुत छोटा है और आपके साथ लोग भी बहुत हैं।
क्योंकि गृहस्थ ग्वालोंकी गौशाला बहुत बड़ी होती है,
इसलिये आपकी वहीं रहने आदिकी व्यवस्था करवा
देते हैं॥" 151–152 ॥
[ 3/153–162 तीसरा अध्याय 87
श्रीनित्यानन्दका क्रोध :-
भितरे आछिला, शुनि' क्रोधे बाहिरिला।
अट्ट अट्ट हासि' गोसाञि कहिते लागिला ॥ 153 ॥
श्रीनित्यानन्दकी भविष्यवाणी :-
“सत्य कहे,—एइ घर मोर योग्य नय।
म्लेच्छ गो-वध करे, तार योग्य हय ॥” 154 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँन घरके भीतर है और स्वागतके लिये स्वयं न आकर सेवकके द्वारा उन्हें कहीं और जानेकी बात कहलवायी है, तो उसके ऐसे व्यवहारसे क्रोधित होकर श्रीनित्यानन्द प्रभु दुर्गामण्डपसे उठकर बाहर आ गये और अट्टहास करते हुए कहने लगे,—“रामचन्द्र खाँन ठीक ही कह रहा है। उसका यह घर मेरे रहने योग्य नहीं है। यह घर तो गायोंका वध करनेवाले म्लेच्छोंके ही वासके योग्य है।” 153–154 ॥
गणोंसहित श्रीनित्यानन्द प्रभुका विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीके स्थानका परित्याग :-
एत बलि' क्रोधे गोसाञि उठिया चलिला।
तारे दण्ड दिते से ग्रामे ना रहिला ॥ 155 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु क्रोधपूर्वक वहाँसे चल दिये। उसे दण्ड देनेके उद्देश्यसे वे उस ग्राम तकमें भी नहीं रहे ॥ 155 ॥
रामचन्द्र खाँनकी चूड़ान्त पाखण्डता :-
इँहा रामचन्द्र खाँन सेवके आज्ञा दिल।
गोसाञि याँहा बसिला, तार माटी खोदाइल ॥ 156 ॥
अनुवाद—इधर रामचन्द्र खाँनने अपने सेवकोंको आदेश दिया कि जहाँपर श्रीनित्यानन्द गोसाईं बैठे थे, उस स्थानकी मिट्टीको खुदवाकर बाहर फेंक दो ॥ 156 ॥
गोमय-जले लेपिला सब मन्दिर-प्राङ्गण।
तबु रामचन्द्रेर मन ना हैल परसन्न ॥ 157 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने सम्पूर्ण दुर्गामण्डप-मन्दिर और आङ्गनको गोबर-जलसे लिपवाया, तो भी उसका मन प्रसन्न नहीं हुआ ॥ 157 ॥
विष्णु-वैष्णव-विद्वेषका भीषण फल अथवा दण्डकी प्राप्ति :-
दस्युवृत्ति करे रामचन्द्र राजारे ना देय कर।
क्रुद्ध हञा म्लेच्छ उजिर आइल तार घर ॥ 158 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँन चोर जैसा कार्य करता था, वह राजाको कर नहीं देता था। क्रोधित होकर म्लेच्छ मन्त्री उसके घरमें आया ॥ 158 ॥
आसि' सेइ दुर्गामण्डपे वासा कैल।
अवध्य वध करि घरे मांस रान्धिल ॥ 159 ॥
अनुवाद—वह म्लेच्छ मन्त्री आकर उसी दुर्गामण्डपमें ठहरा। गायका वध नहीं करना चाहिये, परन्तु उसने रामचन्द्रके घरमें ही गायका वध करके उसके मांसको पकाया ॥ 159 ॥
स्त्री-पुत्र-सहित रामचन्द्रेरे बान्धिया।
तार घर-ग्राम लुटे तिनदिन रहिया ॥ 160 ॥
अनुवाद—उस म्लेच्छ मन्त्रीने रामचन्द्र खाँनको उसकी स्त्री और उसके पुत्र सहित बाँध दिया। उसने तीन दिन तक उस ग्राममें रहकर रामचन्द्र खाँनके घरके साथ-ही-साथ वहाँके सभी घरोंमें लूटपाट की ॥ 160 ॥
सेइ घरे तिनदिन अवध्य-रन्धन।
आरदिन सबा लञा करिला गमन ॥ 161 ॥
अनुवाद—उस म्लेच्छने रामचन्द्र खाँनके घरमें तीन दिन तक गायोंका मांस पकाया और अगले दिन वह अपने सभी साथियोंको लेकर वहाँसे चला गया ॥ 161 ॥
जाति-धन-जन खाँनेर सकल लइल।
बहुदिन पर्यन्त ग्राम उजाड़ रहिल ॥ 162 ॥
अनुवाद—उस म्लेच्छने रामचन्द्र खाँनके पद, धन
88 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/162-167 ]
और जन आदि सबकुछ हर लिया। बहुत दिनों तक
वह गाँव उजाड़ पड़ा रहा ॥ 162 ॥
विष्णु-वैष्णव-विद्वेषके फलसे दशा अथवा अवस्था :-
महान्तेर अपमान ये देश-ग्रामे हय।
एक जनार दोषे सब देश उजाड़य ॥ 163 ॥
अनुवाद—जिस देश अथवा ग्राममें महापुरुषका
अपमान होता है, एक व्यक्तिके दोषके कारण वह
सम्पूर्ण स्थान ही उजड़ जाता है॥ 163 ॥
अमृताणुकणिका—पतितपावन श्रीनित्यानन्द प्रभुने
जगाइ-मधाइ जैसे पापकी चरमसीमा तक पहुँचे दो
ब्राह्मण पुत्रोंको भी महाभागवत बना दिया। वे रामचन्द्र
खाँनके भी उद्धारके लिये स्वयं उसके घरमें जाकर
उपस्थित हुए, किन्तु वैष्णवापराधी रामचन्द्र खाँन पतितपावन
श्रीनित्यानन्दकी उस कृपाको ग्रहण नहीं कर सका।
अवधूत श्रीनित्यानन्दकी प्रेमकी बाढ़ने जगत्को डुबो
दिया, किन्तु वैष्णवापराधीका उद्धार नहीं हुआ।
वैष्णवापराधियोंके कानोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अयाचित
अर्थात् बिना माँगी हुई कृपा भी प्रविष्ट नहीं हुई।
पतितपावन श्रीनित्यानन्द पतित रामचन्द्र खाँनपर कृपा
करनेके लिये आये थे, किन्तु रामचन्द्र खाँनके द्वारा
कृपा ग्रहण करनेकी बात तो दूर रही, उसने श्रीनित्यानन्द
प्रभुको तो अपने घरमें रहनेका स्थान भी नहीं दिया।
अपितु जहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभु बैठे थे, उस स्थानको
अपवित्र जानकर गोबर आदिसे लेपकर पवित्र करनेके
प्रयाससे भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। यह भी उसका बहुत
बड़ा अपराध था। वैष्णवापराधका बीज क्रमशः अङ्कुरित,
पल्लवित और विस्तारित होकर वृक्षरूपमें परिणत हुआ
और उसने एक दिन अपना फल प्रदान किया।—'गौड़ीय
चतुर्थ खण्ड' ॥ 163 ॥
सप्तग्रामके अन्तर्गत चाँदपुरमें अनुगत बलराम आचार्यके
घरमें ठाकुर-श्रीहरिदास :-
हरिदास ठाकुर चलि' आइला चान्दपुरे।
आसिया रहिला बलराम-आचार्येर घरे ॥ 164 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर अपनी भजन कुटिया
छोड़कर चाँदपुर चले आये। वहाँ आकर वे श्रीबलराम
आचार्यके घरमें रहने लगे ॥ 164 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'चान्दपुर',—सप्तग्राम-त्रिवेणीमें हिरण्य
और गोवर्धनके घरकी पूर्वदिशामें 'चाँदपुर'-ग्राम है; वहाँ
हिरण्य-गोवर्धनके पुरोहित श्रीबलराम आचार्य और
श्रीयदुनन्दन आचार्यके घर थे॥ 164 ॥
अनुभाष्य— 'चान्दपुर',—हुगली जिलेके अन्तर्गत त्रिवेणीके
निकट यह ग्राम है; किसी-किसीके मतानुसार, परवर्तीकालमें
इस ग्रामका ही नाम 'कृष्णपुर' हुआ था ॥ 164 ॥
हिरण्य और गोवर्धन मजुमदारका और
श्रीबलराम आचार्यका परिचय :-
हिरण्य, गोवर्धन—मुलुकेर मजुमदार।
तार पुरोहित—'बलराम' नाम ताँर ॥ 165 ॥
अनुवाद—श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन मजुमदार चाँदपुर
नामक मुलुकके (प्रदेशके) जमींदार थे तथा उनके
पुरोहितका नाम श्रीबलराम था ॥ 165 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'मुलुक',—सप्तग्राम-मुलुक
(प्रदेश) ॥ 165 ॥
अनुभाष्य— 'मजुमदार',—'मज्मु-आदार'; नवाबके राज्यमें
राजस्वके हिसाब-रक्षक ॥ 165 ॥
हरिदासेर कृपापात्र, ताते भक्ति माने।
यत्न करि' ठाकुरेरे राखिला सेइ ग्रामे ॥ 166 ॥
अनुवाद—श्रीबलराम आचार्य श्रीहरिदास ठाकुरके
कृपापात्र थे और उनसे सम्भ्रम प्रीति करते थे। उन्होंने
श्रीहरिदास ठाकुरको उस ग्राममें रखा और वे उनकी
बड़े आदरके सहित सेवा करते थे ॥ 166 ॥
निर्जन पर्णशालाय करेन कीर्त्तन।
बलराम-आचार्य-गृहे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 167 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर गाँवमें निर्जनमें बनी
[ 3/167-176 तीसरा अध्याय 89
एक पर्णकुटीमें कीर्तन करते। वे अपनी देह-यात्रा हिरण्य और गोवर्धनके द्वारा श्रीठाकुरका
निर्वाहके लिये श्रीबलराम आचार्यके घरपर भिक्षा ग्रहण यथायोग्य आदर-सत्कार :-
करते थे॥ 167॥ ठाकुर देखि' दुइ भाइ कैला अभ्युत्थान।
पाय पड़ि' आसन दिला करिया सम्मान॥ 172॥
बाल्यकालमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको
श्रीहरिदासके सङ्गरूपी कृपाकी प्राप्ति :- अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरको देखकर दोनों भाई
रघुनाथदास बालक करेन अध्ययन। उठकर खड़े हो गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया।
हरिदास-ठाकुरेरे याइ' करेन दर्शन॥ 168॥ दोनों भाइयोंने सम्मानपूर्वक उन्हें आसन प्रदान किया॥ 172॥
साधुके सङ्ग और कृपाके फलसे ही श्रीचैतन्य-प्राप्ति :- अनेक पण्डित सभाय, ब्राह्मण, सज्जन।
हरिदास-कृपा करे ताँहार उपरे। दुइ भाइ महापण्डित-हिरण्य, गोवर्धन॥ 173॥
सेइ कृपा 'कारण' हैल चैतन्य पाइबारे॥ 169॥
अनुवाद-उस सभामें अनेक विद्वान्, ब्राह्मण और
अनुवाद-श्रीहिरण्य मजुमदारके पुत्र श्रीरघुनाथदास सज्जन व्यक्ति थे। स्वयं दोनों मजुमदार भाई भी बहुत
उस समय बालक थे और अध्ययन करते थे। वे विद्वान् थे॥ 173॥
श्रीहरिदास ठाकुरका दर्शन करने जाया करते थे।
श्रीहरिदास ठाकुर उनके प्रति कृपालु थे। उनकी वह श्रीहरिदासकी प्रशंसा सुनकर दोनों भाइयोंको सुख :-
कृपा ही बादमें श्रीरघुनाथदासके श्रीचैतन्य महाप्रभुका हरिदासेर गुण सबे कहे पञ्चमुखे।
चरणाश्रय प्राप्त करनेका कारण बनी॥ 168-169॥ शुनिया त' दुइ भाइ पाइला बड़ सुखे॥ 174॥
चाँदपुरमें हिरण्य-गोवर्धनकी सभामें अनुवाद-वहाँ सभी व्यक्ति श्रीहरिदासके गुणोंकी
श्रीहरिदासके वृत्तान्तका वर्णन :- महिमाका वर्णन करने लगे मानो उनके पाँच मुख हों।
ताँहा यैछे हैल हरिदासेर कथन। यह सुनकर श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन, दोनों भाइयोंको
व्याख्यान,-अद्भुत कथा शुन, भक्तगण॥ 170॥ बहुत आनन्द हुआ॥ 174॥
अनुवाद-श्रीहिरण्य-गोवर्धनकी सभामें श्रीहरिदास श्रीठाकुरको देखकर पण्डितोंके द्वारा
ठाकुरने नामकी महिमाका गान किया। हे भक्तों! अब नामतत्त्वका विचार :-
आप उस अद्भुत कथाको श्रवण करो॥ 170॥ तिन-लक्ष नाम ठाकुर करेन कीर्त्तन।
नामेर महिमा उठाइल पण्डितगण॥ 175॥
बलरामकी प्रार्थनासे एकदिन हिरण्य-गोवर्धनकी
सभामें श्रीठाकुरका गमन :- अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमा गाते हुए
एकदिन बलराम मिनति करिया। उस सभामें यह भी कहा गया कि वे प्रतिदिन तीन
मजुमदारेर सभाय आइला ठाकुरे लञा॥ 171॥ लाख नाम कीर्तन करते हैं। ऐसा सुनकर विद्वानोंने
नामकी महिमाका प्रसङ्ग उठाया॥ 175॥
अनुवाद-एकदिन श्रीबलराम आचार्यने श्रीहरिदास
ठाकुरसे श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन मजुमदारकी सभामें सभीके द्वारा नामाभासको ही शुद्धनाम मानना :-
चलनेका विनम्र निवेदन किया और उन्हें अपने साथ केह बोले,-'नाम हैते हय पापक्षय।'
लेकर आये॥ 171॥ केह बोले,-'नाम हैते जीवेर मोक्ष हय॥' 176॥
90 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/176-180 ]
अनुवाद-कुछ विद्वान् कहने लगे, —'नामसे पाप
क्षय होते हैं।' अन्य कुछ विद्वान् कहने लगे, —'नामसे
जीवोंको मुक्तिकी प्राप्ति होती है॥' 176॥
श्रीठाकुरके द्वारा शुद्धनामके फलका वर्णन :—
हरिदास कहेन, —"नामेर एइ दुइ फल नय।
नामेर फले कृष्णपदे प्रेम उपजाय॥ 177॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"नामके यह
दोनों फल नहीं हैं। नामका वास्तविक फल तो भगवान्
श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति प्रेम उत्पन्न होना ही है॥ 177॥
शास्त्र-प्रमाण :—
श्रीमद्भागवत (11/2/40) में—
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति गाय-
त्यन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥ 178॥
अनुवाद-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर
अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम
श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण
शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी
अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता,
कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य
करता है॥ 178॥
अनुभाष्य-आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 178॥
शुद्धनाम और उसके फलस्वरूप प्रेमोदयके बीचमें ही
नामाभास और उसका फल अनर्थ-निवृत्ति अन्तर्भुक्त :—
आनुषङ्गिक फल नामेर—'मुक्ति', 'पापनाश'।
ताहार दृष्टान्त यैछे सूर्येर प्रकाश॥ 179॥
अनुवाद-मुक्ति और पापोंका नाश तो नामका
आनुषङ्गिक फल हैं। सूर्यका प्रकाश ही उसका दृष्टान्त
है॥ 179॥
अनुभाष्य-नामसे गौणरूपसे संसारबन्धन-मोचन और
संसार-आसक्तिरूपी पाप ध्वंस होता है। नामसे युक्त
मन्त्रदीक्षाकी संज्ञामें ऐसा लिखा है—
"दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्।
तस्मात् दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥”
[अर्थात् "क्योंकि यह दिव्यज्ञान (सम्बन्धज्ञान)
प्रदान करता है एवं पापका (पाप, पापबीज और
अविद्या) जड़ सहित विनाश करता है, इसलिये
भगवत्तत्त्वविद् पण्डितगण इस अनुष्ठानको 'दीक्षा'के
नामसे पुकारते हैं।"]
उदाहरण-स्वरूप कहा जाता है कि सूर्योदयका
मुख्यफल स्वप्रकाश, परप्रकाश, आनन्द आदि है और
इसके अतिरिक्त गौण फलरूपमें अन्धकारका दूर होना
भी लक्षित होता है॥ 179॥
नामरूपी सूर्यके उदित होनेपर अज्ञानरूपी
अन्धकारका नाश :—
पद्यावलीमें उद्धृत श्रीलक्ष्मीधर-स्वामि-कृत
'नामकौमुदी'-श्लोक—
अंहः संहरदखिलं सकृदुदयादेव सकल-लोकस्य।
तरणिरिव तिमिरजलधिं जयति जगन्मङ्गलं हरेर्नाम॥ 180॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सूर्य जिस प्रकार उदित होकर
तिमिर-समुद्रका (गाढ़ अन्धकारका) नाश करते हैं,
उसी प्रकार जो हरिनाम एकबार भी उदित होनेपर
[सेवोन्मुख इन्द्रियोंपर प्रकट होकर कीर्तन-श्रवणादि
अनुष्ठानके द्वारा] समस्त लोकोंके पापोंका नाश करते
हैं, वे जगत्का मङ्गल करनेवाले हरिनाम जययुक्त
हों॥ 180॥
अनुभाष्य—
जगन्मङ्गलं (जगतां मङ्गलं प्रेमपर्यन्तमङ्गलप्रदं) हरेः नाम
(हरिनामप्रभुः) सकृत् (बारमेकम्) उदयात् (सेवोन्मुखे इन्द्रियादौ
प्राकट्येन कीर्त्तन-श्रवणाद्यनुष्ठानात्) एव तरणिः (सूर्यः)
तिमिर-जलधिं (गाढ़ान्धकारराशिम्) इव (यथा नाशयति तथा)
सकललोकस्य (सर्वजगतः) अखिलम् अंहः (संसार-हेतुकं
पापं) संहरत् (दूरीकुर्वत्) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180॥
[ 3/181–188 तीसरा अध्याय 91
विद्वानोंके अनुरोधसे श्रीठाकुरके
द्वारा श्लोककी व्याख्या :-
एइ श्लोकेर अर्थ कर पण्डितेर गण ॥"
सब कहे,—"तुमि कह अर्थ-विवरण ॥" 181 ॥
अनुवाद—श्लोक पढ़नेके बाद श्रीहरिदास ठाकुरने
कहा,—“हे पण्डितगण ! आप इस श्लोकका अर्थ
बतलाइये।” सभी विद्वानोंने कहा,—“आप ही इस
श्लोकके अर्थकी व्याख्या कीजिये ॥” 181 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शुद्धनाम और
नामाभास-तत्त्वकी व्याख्या :-
हरिदास कहेन,—“यैछे सूर्येर उदय।
उदय ना हैते आरम्भे तमेर हय क्षय ॥ 182 ॥
चौर-प्रेत-राक्षसादिर भय हय नाश।
उदय हैले धर्म-कर्म-आदि परकाश ॥ 183 ॥
नामके फलसे कृष्णप्रेमका उदय :-
ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय।
उदय कैले कृष्णपदे हय प्रेमोदय ॥ 184 ॥
नामाभासके फलसे ही मुक्ति :-
'मुक्ति' तुच्छ-फल हय नामाभास हैते।
ये मुक्ति भक्त ना लय, से कृष्ण चाहे दिते ॥" 185 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“जैसे सूर्य
उदित होनेके समय, किन्तु अभी सूर्य उदित नहीं हुआ
है, अन्धकारका नाश होना आरम्भ हो जाता है। चोर,
प्रेत, राक्षस आदिका भय समाप्त हो जाता है। जब
सूर्य उदित हो जाता है, तब सब कुछ प्रकाशित हो
जाता है और सभी अपने धर्म-कर्म आदिमें लग जाते
हैं। इसी प्रकार नाम उदित होनेके आरम्भमें (अर्थात्
अपराधरहित नामाभास) ही समस्त पापोंका तुरन्त नाश
कर देता है। और नामके सम्पूर्ण रूपसे उदित होनेपर
श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय होता है। नामाभाससे
ही 'मुक्ति'रूपी तुच्छ फल प्राप्त हो जाता है। श्रीकृष्णके
द्वारा मुक्ति देनेकी इच्छा करनेपर भी भक्त उसे ग्रहण
नहीं करते ॥” 182-185 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धभक्तको श्रीकृष्ण मुक्ति देना
चाहनेपर भी वे उसे नहीं लेते ॥ 185 ॥
श्रीमद्भागवत (6/2/49) में—
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम्।
अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ 186 ॥
अनुवाद—पुत्रको लक्ष्य करके हरिनाम ग्रहण करके
ही मरणोन्मुख अजामिलने जब वैकुण्ठधाममें गमन
किया, तब श्रद्धापूर्वक नाम लेनेसे क्या होगा, उसे कहा
नहीं जा सकता (वैकुण्ठगमनकी तो बात ही नहीं) ॥ 186 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला 3/63 संख्या देखें ॥ 186 ॥
श्रीमद्भागवत (3/29/13) में—
सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 187 ॥
अनुवाद—(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि
(ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य
(निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति)
प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं,
क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी
अभिलाषा नहीं है ॥ 187 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 187 ॥
नाममें अर्थवादी पाखण्डी गोपाल-चक्रवर्त्तीका वृत्तान्त :-
गोपाल-चक्रवर्त्ती नाम एकजन।
मजुमदारेर घरे सेइ आरिन्दा-ब्राह्मण ॥ 188 ॥
अनुवाद—गोपाल चक्रवर्त्ती नामक एक व्यक्ति
श्रीहिरण्य एवं श्रीगोवर्धन मजुमदारके घरपर एक प्रधान
आरिन्दा (कर-संग्रहकारी) पदपर नियुक्त था ॥ 188 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘आरिन्दा',—तहसील-संग्रहकारी
पैदल-सिपाही (पत्र और राजकर-वाहक पैदल-
सिपाही) ॥ 188 ॥
92 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/189-196 ]
गौड़े रहिं पात्साहा-आगे आरिन्दागिरि करे।
बार-लक्ष मुद्रा सेइ पात्साहारे भरे ॥ 189 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती गौड़देशमें रहता था
और बादशाहके लिये वहाँसे कर-संग्रह करता था।
प्रतिवर्ष बारह लाख मुद्राएँ ले जाकर गौड़देशके
बादशाहके कोषमें जमा करवाना उसका दायित्व था ॥ 189 ॥
परम-सुन्दर, पण्डित, नूतन यौवन।
नामाभासे 'मुक्ति' शुनि' ना हइल सहन ॥ 190 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती परम सुन्दर, विद्वान
तथा नवयुवक था। 'नामाभाससे ही मुक्तिकी प्राप्ति होती
हैं'-श्रीहरिदासके ये वचन सुनकर वह उसे सहन नहीं
कर पाया ॥ 190 ॥
क्रोधसे भरकर श्रीठाकुरके प्रति अवज्ञापूर्ण उक्ति :-
क्रुद्ध हञा बले सेइ सरोष वचन।
“भावुकेर सिद्धान्त शुन, पण्डितेर गण ॥ 191 ॥
पाखण्डीका नाममें अर्थवाद :-
कोटि-जन्मे ब्रह्मज्ञाने येइ 'मुक्ति' नय।
एइ कहे, -नामाभास-मात्रे सेइ 'मुक्ति' हय ॥" 192 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती क्रोधित हो गया और
रोषपूर्वक कहने लगा, - "हे विद्वानों, इस भावुक व्यक्तिका
सिद्धान्त सुनो। करोड़ों जन्मों तक ब्रह्मज्ञानका अनुशीलन
करनेसे जो मुक्ति सहज नहीं है, यह कह रहा है कि
नामाभास मात्रसे ही वह मुक्ति प्राप्त हो जाती
है ॥" 191-192 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शास्त्र-प्रमाण उद्धृत करना और प्रेमभक्ति
परायणके लिये मुक्तिकी तुच्छताका वर्णन :-
हरिदास कहेन, - "केने करह संशय?
शास्त्रे कहे, - नामाभास-मात्रे 'मुक्ति' हय ॥ 193 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "आप संशय
क्यों कर रहे हैं? शास्त्रोंमें कहा गया है, - नामाभास
मात्रसे ही 'मुक्ति' हो जाती है ॥ 193 ॥
भक्तिसुख-आगे 'मुक्ति' अति-तुच्छ हय।
अतएव भक्तगण 'मुक्ति' नाहि लय ॥ 194 ॥
अनुवाद-भक्तिके सुखके आगे मुक्ति अति तुच्छ
है। अतएव भक्तगण दिये जानेपर भी मुक्ति नहीं
लेते ॥ 194 ॥
हरिभक्तिसुधोदयेमें-
त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे ।
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो ॥ 195 ॥
अनुवाद- हे जगद्गुरो ! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार
पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ
और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे
हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है,
वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे
जो गड्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता
है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है ॥ 195 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें ॥ 195 ॥
श्रीठाकुरको शपथ-प्रदान :-
विप्र कहे, - "नामाभासे यदि 'मुक्ति' नय।
तबे तोमार नाक काटि' करह निश्चय ॥" 196 ॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीने कहा, - "यदि नामाभाससे
मुक्ति नहीं होती हो, तो मैं अवश्य ही तुम्हारी नाक
काट दूँगा ॥" 196 ॥
अमृताणुकणिका-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थमें
यह बात लिखी है (चैः भाः आदिखण्ड 16/300)-
"कलियुगे राक्षस-सकल विप्र-घरे।
जन्मिबेक सुजनेर हिंसा करिवारे ॥"
"सज्जन लोगोंके साथ हिंसा-द्वेष करनेके लिये
कलियुगमें सभी राक्षस ब्राह्मण-घरमें जन्म ग्रहण करेंगे।"
'भक्तिरत्नाकर', 'नरोत्तमविलास', 'रसिकमङ्गल' आदि
ग्रन्थोंकी आलोचना करनेसे भी यह जाना जाता है कि
पाखण्डी लोगोंने श्रील नरोत्तम ठाकुर, श्रीश्यामानन्द प्रभु
[ 3/196–204 तीसरा अध्याय 93
आदि आचार्योंके प्रति किस प्रकारसे विद्वेष किया है।
इसलिये जिस प्रकार प्रपञ्चमें भगवान्के आविर्भावके
साथ-साथ रावण, जरासन्ध, शिशुपाल, दन्तवक्र, कंस,
पूतना, अघासुर, बकासुर आदि लीलापोषणकारी असुर
जन्म ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार युग-युगमें आचार्यगणोंके
आविर्भूत होनेपर उनकी लीलापुष्टि करनेके लिये असुर
स्वभाववाले व्यक्तियोंकी भी वृद्धि होती है। चिरकालसे
यह जगत्की एक प्रथा है। श्रीविष्णुस्वामी, श्रीरामानुज,
श्रीमध्व, श्रीनिम्बार्क आदि आचार्योंकी जीवनीकी आलोचना
करनेपर भी इस बातकी साक्षी पद-पदमैं देखी जाती
है। जब आचार्यके विरुद्धमें समस्त अनाचारी समाज
विद्वेष करके अन्धतामिस्रमें प्रवेश करनेके लिये कृतसङ्कल्प
होता है, तब भी आचार्य सत्यकी सुदृढ़ नींवपर दृढ़तासे
खड़े रहकर उच्च स्वरसे सनातनी वाणीकी घोषणा
करनेमें एक पद भी पीछे नहीं हटते हैं। इसके द्वारा
ही आचार्यका आचार्यत्व प्रमाणित होता है।—“गौड़ीय
चतुर्थ खण्ड” ॥ 196 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शपथको स्वीकार करना :—
हरिदास कहेन,—“यदि नामाभासे 'मुक्ति' नय।
तबे आमार नाक काटिमु,—एइ सुनिश्चय ॥”197 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“यदि नामाभाससे
मुक्ति नहीं होती हो, तो निश्चय ही मैं अपनी नाक
काट दूँगा ॥”197 ॥
सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा ब्रह्मबन्धुको धिक्कार-देना :—
शुनि' सभासद् उठे करि' हाहाकार।
मजुमदार सेइ विप्रे करिल धिक्कार ॥ 198 ॥
अनुवाद—इस प्रकार गोपाल-चक्रवर्त्तीकी चुनौतीकी
बात सुनकर सभामें उपस्थित सभी व्यक्ति उठकर खड़े
हो गये और हाहाकार करने लगे। श्रीहिरण्य तथा
श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस ब्राह्मण अर्थात् गोपाल-चक्रवर्त्तीको
धिक्कार दिया ॥ 198 ॥
उसे नास्तिक हेतुवादी जानकर बलराम आचार्यके द्वारा
तिरस्कार और अभिशाप देना :—
बलाइ पुरोहित तारे करिला भर्त्सन ।
“घट-पटिया मूर्ख तुमि, भक्ति काँहा जान ?199 ॥
हरिदास ठाकुरे तुञ्जि कैलि अपमान !
सर्वनाश हबे तोर, ना हबे कल्याण ॥”200 ॥
अनुवाद—श्रीबलराम आचार्यने भी गोपाल चक्रवर्त्तीकी
भर्त्सना करते हुए कहा,—“तुम घट और पटको लेकर
तर्क करनेवाले मूर्ख हो, भक्तिके विषयमें तुम्हें क्या
ज्ञान है? तुमने श्रीहरिदास ठाकुरका अपमान किया है,
तुम्हारा सर्वनाश होगा, कभी कल्याण नहीं होगा ॥”199–200 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'घटपटिया',—घट और पटको
लेकर वृथा तर्क करनेवाले नैयायिक ॥ 199 ॥
नाममें अर्थवाद करनेवालेके सङ्गका परित्याग :—
शुनि' हरिदास तबे उठिया चलिला।
मजुमदार सेइ विप्रे त्याग करिला ॥ 201 ॥
अनुवाद—यह सब सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर उठकर
चलने लगे। श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस
ब्राह्मणका त्याग कर दिया अर्थात् उसे आरिन्दाके पदसे
निष्कासित कर दिया ॥ 201 ॥
सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा श्रीठाकुरके
चरणोंमें क्षमा-प्रार्थना :—
सभा-सहिते हरिदासेर पड़िला चरणे।
हरिदास हासि' कहे मधुर-वचने ॥ 202 ॥
अदोषदर्शी श्रीठाकुरके द्वारा क्षमा :—
“तोमा सबार दोष नाहि, एइ अज्ञ ब्राह्मण।
तार दोष नाहि, तार तर्कनिष्ठ मन ॥ 203 ॥
अचिन्त्य-स्वभाव अधोक्षज नामप्रभु—जड़ीय
युक्ति और तर्कसे अतीत :—
तर्केर गोचर नहे नामेर महत्त्व।
कोथा हैते जानिबे से एइ सब तत्त्व ? ?204 ॥
94 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/202-212 ]
श्रीकृष्णसे सभीकी कुशल-याचना :-
याह घर, कृष्ण करुन कुशल सबार।
आमार सम्बन्धे दुःख ना हउक काहार॥" 205॥
अनुवाद-श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदार सभाके
सभी सदस्यों सहित श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर
गये। श्रीहरिदास ठाकुरने मुस्कुराते हुए मधुर वचन
कहे,-"आप सबका कोई दोष नहीं है, यह ब्राह्मण
अज्ञानी है, इसमें इसका भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि
इसका मन तर्कनिष्ठ है। नामका माहात्म्य तो तर्कके
द्वारा नहीं समझा जा सकता। तर्कनिष्ठ होनेके कारण
यह ब्राह्मण इन सब तत्त्वोंको कहाँसे जानेगा? आप
सभी अपने घर जाइये। श्रीकृष्ण आप सबका मङ्गल
करें। मेरे अपमानके विषयमें आप कुछ भी दुःख मत
कीजिये॥" 202-205॥
हिरण्य-गोवर्धनका पाखण्डी ब्रह्मबन्धुके सङ्गका वर्जन :-
तबे से हिरण्यदास निज-घरे आइल।
सेइ ब्राह्मणे निज-द्वार माना कैल॥ 206॥
अनुवाद-तब श्रीहिरण्यदास मजुमदार अपने घर
लौट आये और उन्होंने उस ब्राह्मण गोपाल-चक्रवर्त्तीको
अपने घरके द्वारके भीतर आनेसे मना कर दिया॥ 206॥
नाममें अर्थवाद और वैष्णव-अवज्ञाका
भीषण फल अथवा दण्ड :-
तिन दिन रहि' सेइ विप्रेर 'कुष्ठ' हैल।
अति उच्च-नासा तार गलिया पड़िला॥ 207॥
अनुवाद-तीन दिनोंमें ही उस ब्राह्मण गोपाल
चक्रवर्त्तीको कोढ़का रोग हो गया और उसके परिणामस्वरूप
उसकी अति ऊँची नाक गलकर गिर गयी॥ 207॥
चम्पक-कलि-सम हस्त-पदाङ्गुलि।
कौँकड़ हइल सब, कुष्ठे गेल गलि'॥ 208॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीके हाथ तथा पैरोंकी
अँगुलियाँ चम्पकपुष्पकी कलीके समान सुन्दर थी,
किन्तु कोढ़के रोगके कारण वे मुड़ गयीं और धीरे-धीरे
गल गयीं॥ 208॥
ठाकुरके ऐश्वर्यके दर्शनसे सभीके द्वारा उनकी स्तुति :-
देखिया सकल लोक हैल चमत्कार।
हरिदासे प्रशंसि' ताँरे करे नमस्कार॥ 209॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीकी ऐसी अवस्था देखकर
सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभीने श्रीहरिदास
ठाकुरके प्रभावकी प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रणाम
किया॥ 209॥
भगवान् और भक्त (विष्णु और वैष्णवों)का स्वभाव :-
यद्यपि हरिदास विप्रेर दोष ना लइला।
तथापि ईश्वर तारे फल भुआइला॥ 210॥
अनुवाद-यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरने गोपाल चक्रवर्त्तीका
कोई अपराध नहीं लिया, तथापि भगवान्से यह सहन
नहीं हुआ और उन्होंने उसे उसके अपराधका फल
भुगवाया॥ 210॥
भक्त-स्वभाव, -अज्ञ-दोष क्षमा करे।
कृष्ण-स्वभाव, -भक्त-निन्दा सहिते ना पारे॥ 211॥
अनुवाद-भक्त स्वभावतः ही अज्ञानी व्यक्तिके
अपराधोंको क्षमा कर देते हैं। किन्तु श्रीकृष्णका स्वभाव
ऐसा है कि वे अपने भक्तकी निन्दाको सहन नहीं कर
पाते॥ 211॥
ब्रह्मबन्धुके क्लेशका श्रवण करके स्थान-त्याग
और शान्तिपुरमें आगमन :-
विप्र-दुःख शुनि' हरिदास मने दुःखी हैला।
बलाइ-पुरोहिते कहि' शान्तिपुर आइला॥ 212॥
अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती कोढ़से कष्ट भोग रहा
है, यह सुनकर श्रीहरिदास ठाकुरका मन बहुत दुःखी
हुआ। श्रीहरिदास ठाकुर पुरोहित श्रीबलराम आचार्यको
बतलाकर शान्तिपुर आ गये॥ 212॥
[ 3/213-220 तीसरा अध्याय 95
[बायाँ स्तम्भ]
श्रीअद्वैताचार्यके साथ मिलन :-
आचार्ये मिलिया कैला दण्डवत् प्रणाम।
अद्वैत आलिङ्गन करि' करिला सम्मान ॥ 213 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यसे
मिलकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्यने
उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया॥ 213 ॥
आचार्यके द्वारा श्रीठाकुरका आनुकूल्य-विधान
और गीता-भागवत-कीर्तन :-
गङ्गातीरे गोफा करि' निर्जने ताँरे दिला।
भागवत-गीतार भक्ति-अर्थ शुनाइला ॥ 214 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने गङ्गाके तटपर निर्जन
स्थानपर एक गुफा बनाकर श्रीहरिदास ठाकुरको रहनेके
लिये दे दी और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरको भागवत
तथा गीताके भक्तिपरक अर्थोंका श्रवण कराया॥ 214 ॥
दोनोंका नित्य कृष्णकथा-संलाप :-
आचार्येर घरे नित्य भिक्षा-निर्वाहण।
दुइ जना मेलि' कृष्ण-कथा-आस्वादन ॥ 215 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके घरपर नित्य श्रीहरिदास
ठाकुर भोजन ग्रहण करते और दोनों मिलकर
श्रीकृष्ण-कथाका आस्वादन करते॥ 215 ॥
श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
हरिदास कहे, — “गोसाञि, करि निवेदने।
मोरे प्रत्यह अन्न देह' कोन् प्रयोजने ? ? 216 ॥
महा-महा विप्र एथा कुलीन-समाज।
आमारे आदर कर, ना वासह लाज ! ! 217 ॥
अलौकिक आचार तोमार, कहिते पाइ भय।
सेइ कृपा करिबा, —याते तोमार रक्षा हय ॥" 218 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, — “हे गोसाईं, मैं
आपसे एक निवेदन कर रहा हूँ। आप प्रतिदिन मुझे
किस उद्देश्यसे भोजन कराते हैं? यहाँ शान्तिपुरमें
बड़े-बड़े ब्राह्मण वास करते हैं और कुलीन समाज है।
[दायाँ स्तम्भ]
यद्यपि मैं तो नीचकुलका हूँ, तथापि आप लज्जाका
भय नहीं करके मुझे इतना आदर देते हैं। आपका
आचरण अलौकिक अर्थात् संसारकी मर्यादासे परे है।
यद्यपि आपको यह सब कहते हुए मुझे भय लगता
है, तथापि आप मुझपर ऐसी कृपा करना जिससे
आपकी समाजमें निन्दासे रक्षा हो ॥” 216-218 ॥
अनुभाष्य— 'रक्षा'- व्यवहारिक लोकसमाज रक्षा अथवा
सामाजिक लज्जा-निन्दादिसे रक्षा ॥ 218 ॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक श्रीअद्वैताचार्यके निरपेक्ष
सात्वत-शास्त्र-सम्मत वचन :-
आचार्य कहेन, — “तुमि ना करिह भय।
सेइ आचरिब, येइ शास्त्रमत हय ॥ 219 ॥
तुमि खाइले हय कोटि ब्राह्मण-भोजन।”
एत बलि' श्राद्धपात्र कराइला भोजन ॥ 220 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “हे हरिदास ठाकुर !
आप भय मत कीजिये। मैं शास्त्रोंके मतके अनुसार
ही आचरण करूँगा। आपको भोजन करानेसे करोड़ों
ब्राह्मणोंको भोजन कराना हो जाता है।” यह कहकर
श्रीअद्वैताचार्यने श्रीहरिदास ठाकुरको श्राद्ध-पात्रका भोजन
कराया॥ 219-220 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'श्राद्धपात्र', -श्राद्धके दिन
गृहस्थ-वैष्णवोंको भगवान्को निवेदन करके सब प्रकारकी
खाद्य वस्तुओंको वैष्णवों और ब्राह्मणोंको भोजन
करानेका विधान है। श्रीअद्वैतप्रभुने संसारमें उस प्रकारके
श्राद्धदिवसके उपस्थित होनेपर श्रीहरिदासको श्राद्धपात्र
(अप्राकृत ब्राह्मण गुरु मानकर) खिलाया ॥ 220 ॥
तीसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—भक्तिसन्दर्भकी 177 संख्यामें उद्धृत
गरुड़पुराण वचन, —
“ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।
सत्रयाजि सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः ॥
सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते।
वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते ॥”
96 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/220-226 ]
[अर्थात् “हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक याज्ञिक अधिकांश अवैष्णव हैं, इनका संसार-मोचन किस
पुरुष श्रेष्ठ है, हजारों याज्ञिक ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक प्रकार होगा? इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने श्रीकृष्णको अवतरित
सर्ववेदान्त-शास्त्रज्ञ पुरुष श्रेष्ठ है, करोड़ों सर्ववेदान्त- करानेकी प्रतिज्ञा की और वे जल एवं तुलसी
शास्त्रज्ञोंकी अपेक्षा एक वैष्णव श्रेष्ठ है और हजारों अर्पणकर श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे॥ 221-222 ॥
वैष्णवोंकी अपेक्षा एक एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है।”]
श्रीहरिदासके द्वारा नाम कीर्तन :-
भक्तिसन्दर्भकी 247 संख्यामें उद्धृत गरुड़पुराण वचन,- हरिदास करे गोफाय नाम-सङ्कीर्त्तन।
“भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। कृष्ण अवतीर्ण हबेन, -एइ ताँर मन ॥ 223 ॥
स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हरिः॥” अनुवाद-इसी प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें
बैठकर नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे। उनके मनमें भी यही
[अर्थात् “(भगवद्भक्तोंके प्रति वात्सल्य, पूजा-विषयमें भाव था कि नाम-सङ्कीर्त्तनके द्वारा श्रीकृष्ण अवश्य ही
अनुमोदन, भगवत् कथाके श्रवणमें प्रीति, स्वर-नेत्रादिका अवतरित होंगे॥ 223 ॥
विकार, भगवत् प्रीतिके लिये नृत्य, दम्भ परित्याग, स्वयं
अर्चन और विष्णुको जीविका नहीं बनाना)—यह आठ दोनोंके आह्वानसे जीवोंके उद्धारके लिये
प्रकारकी भक्ति यदि किसी म्लेच्छमें भी विद्यमान हो, श्रीकृष्णचैतन्य अवतार और नामप्रेमके
वितरणके द्वारा समस्त जगत्का उद्धार :-
तो उस व्यक्तिकी ब्राह्मणश्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ, पण्डित, ज्ञानीमें
दुइजनेर भक्त्ये चैतन्य कैला अवतार।
गणना होती है, उसे दान करेंगे, उसका अवशेष ग्रहण
नाम-प्रेम प्रचार कैला जगत् उद्धार ॥ 224 ॥
करेंगे एवं श्रीहरिकी भाँति उसकी पूजा करेंगे।”]
अनुवाद-इन दोनोंकी भक्तिके प्रभावसे श्रीचैतन्य
हःभःविः 10/91,-
“न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। महाप्रभु अवतरित हुए। महाप्रभुने हरिनामके द्वारा प्रेमका
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” प्रचार करके जगत्का उद्धार किया॥ 224 ॥
[अर्थात् “चारों वेदोंको जाननेपर भी यदि कोई मेरा
श्रीठाकुरके अप्राकृत चरित्रका वर्णन :-
अभक्त हो तो वह मुझे प्रिय नहीं है, परन्तु चण्डाल
आर अलौकिक एक चरित्र ताँहार।
भी भक्त होनेपर मुझे प्रिय है, उसे दान करना चाहिये,
याहार श्रवणे लोके हय चमत्कार ॥ 225 ॥
उसका उच्छिष्ट ग्रहण करना चाहिये और वह मेरी
श्रौतपन्थामें अप्राकृत अनुभूति,
भाँति ही पूज्य है।]॥ 220 ॥
तर्कपन्थामें वह असम्भव :-
श्रीअद्वैताचार्यकी जीवोंके प्रति अतुलनीय कृपा :- तर्क ना करिह, तर्कागोचर ताँर रीति।
जगत्-निस्तार लागि' करेन चिन्तन। विश्वास करिया शुन करिया प्रतीति ॥ 226 ॥
अवैष्णव-जगत् केमने हइबे मोचन ? ? 221 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके जीवनकी अन्य एक
आचार्यके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना :-
अलौकिक घटना है जिसे सुनकर लोग आश्चर्यचकित
कृष्णे अवतारिते अद्वैत प्रतिज्ञा करिला।
हो जाते हैं। इस विषयमें किसी प्रकारका तर्क मत
जल-तुलसी दिया पूजा करिते लागिला ॥ 222 ॥
करना, क्योंकि उनकी रीति तर्कसे परे है। आप सभी
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के उद्धारके लिये सदा श्रद्धापूर्वक विश्वासके साथ इन कथाओंको श्रवण
चिन्तन करते थे। उन्होंने विचार किया कि जगत्में कीजिये॥ 225-226 ॥
[ 3/227–240 तीसरा अध्याय 97
ठाकुर श्रीहरिदास और मायादेवीके उद्धारके वृत्तान्तका वर्णन :—
एकदिन हरिदास गोफाते बसिया।
नाम-सङ्कीर्त्तन करेन उच्च करिया॥227॥
**अनुवाद—**एकदिन श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें बैठकर उच्च स्वरसे नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे॥227॥
ज्योत्स्नावती रात्रि, दश दिक् सुनिर्मल।
गङ्गार लहरी ज्योत्स्नाय करे झलमल॥228॥
**अनुवाद—**चाँदनी रात थी और चन्द्रमाकी किरणोंसे गङ्गाजीकी लहरें झलमल कर रही थीं। दसों दिशाएँ सुनिर्मल थीं॥228॥
द्वारे तुलसी-लेपा-पिण्डिर उपर।
गोफार शोभा देखि' लोकेर जुड़ाय अन्तर॥229॥
**अनुवाद—**गुफाके द्वारपर एक लिपे हुए मञ्चके ऊपर तुलसीजी विराजमान थीं। गुफाकी शोभाको देखकर लोगोंका हृदय शीतल हो जाता था॥229॥
हेनकाले एक नारी अङ्गने आइल।
ताँर अङ्गकान्त्ये स्थान पीतवर्ण हइल॥230॥
ताँर अङ्ग-गन्धे दश दिक् आमोदित।
भूषण-ध्वनिते कर्ण हय चमकित॥231॥
आसिया तुलसीरे सेइ कैला नमस्कार।
तुलसी परिक्रमा करि' गेला गोफा-द्वार॥232॥
**अनुवाद—**उसी समय एक नारी गुफाके बाहर आङ्गनमें आयी। उसकी अङ्गकान्तिसे सम्पूर्ण स्थान पीतवर्णका हो गया। उसके अङ्गोंकी गन्धसे दसों दिशाएँ सुगन्धसे भर गयीं, उसके आभूषणोंकी मधुर झङ्कार कानोंको आश्चर्यचकित कर रही थी। उसने आकर तुलसीको प्रणाम किया और वह तुलसीकी परिक्रमा करके गुफाके द्वारपर चली गयी॥230-232॥
योड़-हाते हरिदासेर वन्दिला चरण।
द्वारे बसि' कहे किछु मधुर वचन॥233॥
जीवमोहिनी मायाके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरकी परीक्षा :—
“जगतेर बन्धु तुमि रूपगुणवान्।
तव सङ्ग लागि' मोर एथाके प्रयाण॥234॥
मोरे अङ्गीकार कर हञा सदय।
दीने दया करे,—एइ साधु-स्वभाव हय॥” 235॥
**अनुवाद—**उसने हाथ जोड़कर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। तब वह द्वारपर बैठकर ऐसे मधुर वचन कहने लगी,—“आप सम्पूर्ण जगत्के बन्धु हैं और अत्यन्त रूपवान् और गुणवान् हैं। आपके सङ्गके लिये ही मैं यहाँ आयी हूँ। आप कृपा करके मुझे अङ्गीकार कीजिये। दीन व्यक्तियोंपर कृपा करना ही साधुका स्वभाव होता है॥” 233-235॥
एत बलि' नाना-भाव करये प्रकाश।
याहार दर्शने मुनिर हय धैर्यनाश॥236॥
**अनुवाद—**यह कहकर वह अनेक प्रकारके भाव प्रकाशित करने लगी, जिन्हें देखकर मुनियोंके धैर्यका भी नाश हो जाता है॥236॥
निर्विकार हरिदास गम्भीर-आशय।
बलिते लागिला ताँरे हञा सदय॥237॥
ठाकुर श्रीहरिदासकी संख्या नामकीर्तन-यज्ञमें दीक्षा और निष्ठा :—
“संख्या-नाम-सङ्कीर्त्तन—एइ ‘महायज्ञ’ मन्ये।
ताहाते दीक्षित आमि हइ प्रतिदिने॥238॥
यावत् कीर्त्तन समाप्त नहे, ना करि अन्यकाम।
कीर्त्तन समाप्त हैले, हय दीक्षार विश्राम॥239॥
द्वारे बसि' शुन तुमि नाम-सङ्कीर्त्तन।
नाम समाप्त हैले करिमु तव प्रीति-आचरण॥” 240॥
**अनुवाद—**किन्तु गम्भीर हृदयवाले श्रीहरिदास ठाकुर
98 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/237–249 ]
निर्विकार होकर बैठे रहे। वे उसके प्रति दयासे युक्त
होकर कहने लगे,–“संख्यापूर्वक नाम-सङ्कीर्तनको मैं
'महायज्ञ' मानता हूँ। मैं प्रतिदिन उसमें दीक्षित होता हूँ
अर्थात् उसका नियमपूर्वक पालन करता हूँ। जब तक
कीर्तन समाप्त नहीं होता, तब तक मैं अन्य कोई काम
नहीं करता। कीर्तनके समाप्त होनेपर ही दीक्षाका
विश्राम होता है। आप द्वारपर बैठकर नाम-सङ्कीर्तन
श्रवण करो। नामके समाप्त होनेपर मैं आपको सन्तुष्ट
करनेवाला आचरण करूँगा॥”237-240 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरका मन तो सदैव श्रीकृष्णनाममें ही आविष्ट रहता था। इसलिये उस नारीके भाव निर्जन वनमें क्रन्दनके समान व्यर्थ हो गये॥ 244 ॥
अनुभाष्य—श्रीहरिदासका मन हरिनाम ग्रहणके समय सर्वदा श्रीकृष्णनाममें आविष्ट रहनेके कारण मायादेवीकी पुरुषोंको आकर्षित करनेवाली इन्द्रजाल जैसी बद्धजीव-मोहिनी स्त्रीभाव-माला निर्जन वनमें क्रन्दन करनेकी भाँति विफल हो गयी॥ 244 ॥
एत बलि' करेन तेंहो नाम-सङ्कीर्त्तन।
सेइ नारी बसि' करे श्रीनाम-श्रवण॥ 241 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीहरिदास ठाकुर नाम-सङ्कीर्तन करने लगे। वह नारी बैठकर श्रीनाम-श्रवण करने लगी॥ 241 ॥
कीर्त्तन करिते आसि' प्रातःकाल हैल।
प्रातःकाल देखि' नारी उठिया चलिल॥ 242 ॥
अनुवाद—कीर्तन करते करते ही प्रातःकाल हो गया। प्रातःकाल देखकर वह नारी वहाँसे उठकर चली गयी॥ 242 ॥
तृतीय दिवसेर रात्रि-शेष यबे हैल।
ठाकुरेर स्थाने नारी कहिते लागिल॥ 245 ॥
“तिन दिन वञ्चिला आमा करि' आश्वासन।
रात्रि-दिने नहे तोमार नाम-समापन॥” 246 ॥
अनुवाद—तीसरे दिन जब रात्रि समाप्त हुई, तब वह नारी श्रीहरिदास ठाकुरसे कहने लगी,–“आपने आश्वासन देकर भी तीन दिन तक मेरी वञ्चना की है। रात-दिन आपका नाम करना ही समाप्त नहीं होता॥”245-246 ॥
श्रीठाकुरकी अपने नियमानुसार सेवा :—
हरिदास ठाकुर कहेन,—“आमि कि करिमु?
नियम करियाछि, ताहा केमने छाड़िमु?? 247 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं क्या करूँ? मैंने जो व्रत लिया है, उसे कैसे त्याग दूँ?” 247 ॥
तीन दिन तक मायाके द्वारा कठोर परीक्षा :—
एइमत तिनदिन करे आगमन।
नाना भाव देखाय, याते ब्रह्मार हरे मन॥ 243 ॥
अनुवाद—इसी प्रकार वह नारी तीन दिन तक श्रीहरिदास ठाकुरके पास आती-जाती रही। वह ऐसे-ऐसे अनेक भाव दिखाती थी जिससे वह ब्रह्माका मन भी हर सकती थी॥ 243 ॥
मायाके द्वारा अपना परिचय देना :—
तबे नारी कहे ताँरे करि' नमस्कार।
“आमि—माया, करिते आइलाङ परीक्षा तोमार॥ 248 ॥
अपनी पराजय-स्वीकार :—
ब्रह्मादि जीव, आमि सबारे मोहिलुँ।
एकेला तोमारे आमि मोहिते नारिलुँ॥ 249 ॥
अद्वयज्ञान नामप्रभुके एकान्तिक सेवक द्वितीय-अभिनिवेशयुक्त भोक्ताभावसे रहित श्रीठाकुरके निकट मायाकी पराजय :—
कृष्णे नामाविष्ट-मना सदा हरिदास।
अरण्ये रोदित हैल स्त्रीभाव-प्रकाश॥ 244 ॥
अनुवाद—तब उस नारीने श्रीहरिदास ठाकुरको
[ 3/248–256 तीसरा अध्याय 99
प्रणाम करके उनसे कहा, — “मैं मायादेवी हूँ। मैं आपकी
परीक्षा लेनेके लिये आयी थी। ब्रह्मादि तक समस्त
जीवोंको मैंने मोहित किया है, मैं एकमात्र आपको ही
मोहित नहीं कर पायी ॥ 248–249 ॥
अनुभाष्य—आब्रह्मस्तम्ब अर्थात् ब्रह्मासे आरम्भ
करके देव-नर-पशु-पक्षी-तिर्यग्-स्थावर आदि तक
समस्त श्रेणियोंके सभी प्राणियोंको मायादेवी अपने
‘भोक्ता’ एवं स्वयंको ‘भोग्या’के रूपमें उपलब्धि करवाकर
मोहित करती है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवा करके
श्रीकृष्णेन्द्रियोंको ही तृप्त करनेका श्रीहरिदासका हृदयगत
भाव किसी भी प्रकारसे मायाके छलनेवाले प्रलोभनसे
वशीभूत नहीं हुआ। श्रीहरिदासकी भाँति समस्त शुद्ध
वैष्णवोंकी यही वैदान्तिक धारणा है कि शुद्धभक्त नित्य
श्रीकृष्णसेवक हैं और वे कभी भी मायाके भोक्ता नहीं
हैं। भगवान् नित्य, वैकुण्ठ, अधोक्षज, गुणातीत अथवा
अप्राकृत वस्तु हैं। जीव देहात्मबुद्धिको छोड़कर स्वयंको
कृष्णदास अथवा वैष्णव समझनेसे अर्थात् अधोक्षज
श्रीकृष्णकी सेवाके फलसे ही मायाके विक्रम अथवा
अनर्थसे पूर्णतया मुक्त हो सकता है ॥ 249 ॥
श्रीठाकुरकी प्रशंसा और स्तुति :-
महाभागवत तुमि,—तोमार दर्शने।
तोमार कृष्णनाम-कीर्त्तन-श्रवणे ॥ 250 ॥
श्रीठाकुरसे कृपा-याचना :-
चित्त शुद्ध हैल, चाहे कृष्णनाम लैते।
कृष्णनाम उपदेशि' कृपा करह आमाते ॥ 251 ॥
अनुवाद—आप महाभागवत हैं। आपके दर्शन
करने और आपके द्वारा किये गये श्रीकृष्णनाम-कीर्तनके
श्रवणसे मेरा चित्त शुद्ध हो गया है। अब मेरी भी
श्रीकृष्णनाम-कीर्तन करनेकी अभिलाषा हो गयी है।
आप श्रीकृष्णनामका उपदेश प्रदानकर मुझपर कृपा
कीजिये ॥ 250–251 ॥
अहैतुक-कृपा-अवतीर्ण श्रीचैतन्यके आश्रयमें कृष्णभक्तिके
अनुशीलनके बिना जीव जड़तुल्य :-
चैतन्यावतारे बहे प्रेमामृत-वन्या।
सब जीव प्रेमे भासे, पृथिवी हैल धन्या ॥ 252 ॥
अनुवाद—चैतन्य महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे प्रेमामृतकी
बाढ़ आ गयी है, समस्त जीव प्रेममें निमग्न हो रहे
हैं और पृथिवी धन्य हो गयी है ॥ 252 ॥
ए-वन्याय ये ना भासे, सेइ जीव—छार।
कोटिकल्पे तबे तार नाहिक निस्तार ॥ 253 ॥
अनुवाद—इस प्रेमकी बाढ़में जो निमग्न नहीं हुआ,
वह जीव अति निन्दनीय है। करोड़ों कल्पों तक भी
उसका उद्धार नहीं होगा ॥ 253 ॥
अनुभाष्य—तैंतालीस लाख बीस हजार (43,20,000)
सौरवर्षोंमें एक महायुग होता है, एक हजार महायुगोंका
एक कल्प होता है; उसके (कल्पके) भी करोड़ों गुणा
जितना समय ॥ 253 ॥
तीसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
पहले मदनको जय करनेवाले शम्भुसे
तारकब्रह्म रामनामकी प्राप्ति :-
पूर्वे आमि 'रामनाम' पाञाछि शिव हैते।
तोमार सङ्गे लोभ हैल 'कृष्णनाम' लैते ॥ 254 ॥
'रामनाम' और 'कृष्णनाम'के माहात्म्यका वैशिष्ट्य :-
मुक्ति-हेतु तारक हय 'रामनाम'।
'कृष्णनाम' पारक हञा करे प्रेमदान ॥ 255 ॥
कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा और कृष्णप्रेमकी याचना :-
कृष्णनाम देह' तुमि मोरे कर धन्या।
आमारे भासाओ तैछे एइ प्रेमवन्या ॥ 256 ॥
अनुवाद—पहले मैंने शिवजीसे 'रामनाम' प्राप्त
किया था, किन्तु अब आपके सङ्गसे मुझे कृष्णनाम
ग्रहण करनेका लोभ हो गया है। मुक्ति प्रदान करनेके
कारण 'रामनाम' तारकब्रह्म कहलाता है। किन्तु 'कृष्णनाम'
100 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/254-265 ]
भवसागरसे पार करवाकर अर्थात् पारक बनकर प्रेमदान
करते हैं। आप मुझे कृष्णनाम प्रदान करके धन्य कर
दीजिये जिसके द्वारा मैं भी प्रेमकी बाढ़में निमग्न हो
जाऊँ॥" 254-256 ॥
मायादेवीके द्वारा श्रीठाकुरके शरणागत
होना और श्रीठाकुरके द्वारा उसे
कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा प्रदान :-
एत बलि' वन्दि'ला हरिदासेर चरण।
हरिदास कहे,-“कर कृष्ण-सङ्कीर्त्तन ॥” 257 ॥
अनुवाद-यह कहकर मायादेवीने श्रीहरिदास ठाकुरके
चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - “आप
बस श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करो॥" 257 ॥
मायाका अन्तर्धान होना :-
उपदेश पाञा माया चलिला हञा प्रीत।
ए-सब कथाते कारो ना जन्मे प्रतीत ॥ 258 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरसे उपदेश प्राप्त करके
मायादेवी प्रसन्नतापूर्वक अन्तर्धान हो गयीं। किसी
दुर्भागेको इन सब बातोंमें विश्वास नहीं होता ॥ 258 ॥
अप्राकृत विश्वास ही श्रेयका कारण :-
प्रतीत करिते कहि कारण इहार।
याहार श्रवणे हय विश्वास सबार ॥ 259 ॥
अनुवाद-इन बातोंमें सबको विश्वास हो, इसलिये
मैं इसका कारण बतलाता हूँ, जिसे श्रवण करनेसे
सभीको विश्वास हो जायेगा ॥ 259 ॥
कृष्णप्रेमप्रदाता श्रीचैतन्यके अवतारमें कृष्णप्रेमकी प्राप्तिके
लिये देव-ऋषि आदि सभीका नररूपमें जन्मग्रहण :-
चैतन्यावतारे कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा।
ब्रह्मा-शिव-सनकादि पृथिवीते जन्मिया ॥ 260 ॥
कृष्णनाम लञा नाचे, प्रेमवन्याय भासे।
नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य-प्रकाशे ॥ 261 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके समय
श्रीकृष्णप्रेमके लिये लालायित होकर ब्रह्मा-शिव-सनकादिने
भी पृथ्वीपर जन्म ग्रहण किया। वे सब श्रीकृष्णनामका
उच्चारण करते हुए नृत्य करते हैं, प्रेमकी बाढ़में
निमग्न हो जाते हैं। इसी लोभसे श्रीनारद-प्रह्लाद आदि
भी मनुष्यका रूप धारण करके इस धराधामपर आते
हैं॥ 260-261 ॥
लक्ष्मी आदिका भी मनुष्यरूपमें कृष्ण-प्रेमास्वादन :-
लक्ष्मी-आदि करि' कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा।
नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये जन्मिया ॥ 262 ॥
अनुवाद-लक्ष्मी आदिने भी श्रीकृष्णप्रेमके प्रति
लोभयुक्त होकर मनुष्यके रूपमें जन्म ग्रहण करके
नाम-प्रेमका आस्वादन किया ॥ 262 ॥
स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा अपने माधुर्य-प्रेमका आस्वादन :-
अन्येर का कथा, आपने व्रजेन्द्रनन्दन।
अवतरि' करेन प्रेम-नाम आस्वादन ॥ 263 ॥
अनुवाद-अन्योंकी तो बात ही क्या, स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन
भी अवतरित होकर प्रेम-नामका आस्वादन करते
हैं॥ 263 ॥
मायादेवीका भी कृष्णप्रेमास्वादनके प्रति लोभ;
एकमात्र शुद्धनाम और शुद्धकीर्तनकारीकी
कृपासे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
माया-दासी 'प्रेम' मागे,-इथे कि विस्मय ?
'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' ना जन्माय ॥ 264 ॥
अनुवाद-तब श्रीकृष्णकी दासी माया यदि 'प्रेम'
माँगती हैं तो उसमें कैसा विस्मय ? वास्तवमें 'साधुकृपा'
और 'नाम'के बिना प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 264 ॥
चैतन्यावतारमें जगत्-जीवोंको कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
चैतन्य-गोसाञिर लीलार एइ त' स्वभाव।
त्रिभुवन नाचे, गाय, पाञा प्रेमभाव ॥ 265 ॥
[ 3/265-270 तीसरा अध्याय 101
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका यही तो उन सब लीलाओंको मैंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके
स्वभाव है कि तीनों लोकोंके वासी प्रेमभावको प्राप्त मुखसे श्रवण किया है। इन सब लीलाओंको मैंने
करके नृत्य एवं गान करते हैं॥ 265 ॥ संक्षेपमें कहा है। क्षुद्रजीव होनेपर भी मैं श्रीचैतन्य
महाप्रभुकी कृपासे इन सब लीलाओंका वर्णन कर रहा
स्वयं भगवान् श्रीकृष्णादि समस्त ईश्वरतत्त्व हूँ॥ 267-268 ॥
और स्थावर-जङ्गमादि जीवोंकी
कृष्णकीर्तनके प्रभावसे कृष्णप्रेममें मत्तता :— नामाचार्य श्रीठाकुरके माहात्म्यके
कृष्ण-आदि, आर यत स्थावर-जङ्गमे। श्रवणसे शुद्धभक्तोंको आनन्द :—
कृष्णप्रेमे मत्त करे कृष्ण-सङ्कीर्तने॥ 266 ॥ हरिदास ठाकुरेर कहिलुँ महिमार कण।
याहार श्रवणे भक्तेर जुड़ाय श्रवण ॥ 269 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णनाम इतना आकर्षक और प्रभावशाली
है कि उसका सङ्कीर्तन सभी स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको अनुवाद—मैंने श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमाके एक
और यहाँ तक श्रीकृष्णको भी कृष्णप्रेममें मत्त कर देता कणका ही वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे भक्तोंके
है॥ 266 ॥ कानोंको आनन्द प्राप्त होता है॥ 269 ॥
श्रौतपन्थामें गुरुमुखसे ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
इन सब लीलाओंका वर्णन :— चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 270 ॥
स्वरूप-गोसाञि कड़चाय ये लीला लिखिल।
रघुनाथदास-मुखे ये-सब शुनिल ॥ 267 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास-
स्वयं ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :— ठाकुर-महिमा-कथनं नाम तृतीयः परिच्छेदः।
सेइ सब लीला कहि संक्षेप करिया। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
चैतन्य-कृपाते लिखि क्षुद्रजीव हञा ॥ 268 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 270 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुकी
जिन लीलाओंको कालक्रमसे लिपिबद्ध किया था श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-ठाकुर-
[श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उन्हें कण्ठस्थ कर लिया था], महिमा-कथन नामक तीसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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चौथा अध्याय
कथासार—श्रीसनातन गोस्वामी मथुरामण्डलसे अकेले
झारिखण्डके वनमार्गसे पुरुषोत्तम क्षेत्र (श्रीजगन्नाथपुरी)में
आये। मार्गमें गन्दे जल और उपवासके कारण उनके
शरीरमें पीब निकलनेवाली खाजका रोग हो गया।
खाजकी यातनासे उन्होंने मनमें विचार किया,—“मैं
महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथके रथके पहियेके नीचे
इस शरीरका परित्याग करूँगा।” पुरुषोत्तममें आकर वे
श्रीहरिदासके वासस्थानपर रहे। महाप्रभु श्रीसनातनको
देखकर बड़े हर्षित हुए। बादमें महाप्रभुने श्रीसनातन
गोस्वामीको अनुपमकी गङ्गाप्राप्तिकी बात और श्रीरामके
चरणोंके प्रति उनकी निष्ठाकी बात बतलायी। एकदिन
महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा,—“देहत्याग आदि तामसिक
धर्म हैं,—देहत्यागके द्वारा कृष्णप्रेम प्राप्त नहीं किया जा
सकता; तुम इस तमोबुद्धिका परित्याग करो। तुम्हारा
शरीर तुमने मुझे अर्पित किया है, इसलिये तुम्हें इस
शरीरको परित्याग करनेका कोई अधिकार नहीं है।
तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं अनेक भक्तिशास्त्रोंका प्रचार
और वृन्दावनमें लुप्त तीर्थोंका उद्धार करूँगा।” महाप्रभुके
उठकर चले जानेपर श्रीहरिदास और श्रीसनातनमें बहुत
बातचीत हुई। एकदिन महाप्रभुने श्रीसनातनको यमेश्वर
तोटामें बुला भेजा, श्रीसनातन समुद्रके पथसे वहाँ गये।
महाप्रभुके द्वारा पूछनेपर श्रीसनातनने कहा,—“सिंहद्वारके
मार्गसे श्रीजगन्नाथके सेवक आते-जाते हैं, इसलिये मैं
बालूके मार्गसे आया हूँ। मेरे पैरोंमें जो फफोले पड़ गये
हैं, मुझे उसका पता ही नहीं चला।” श्रीसनातनके इन
मर्यादा-स्थापक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए।
पीब महाप्रभुके शरीरमें लगेगी, इसी कारण श्रीसनातन
महाप्रभुसे दूर-दूर रहते, किन्तु महाप्रभु बलपूर्वक उनका
आलिङ्गन करते। इस बातसे श्रीसनातनने बहुत दुःखी
होकर श्रीजगदानन्द पण्डितसे परामर्श किया, तो श्रीजगदानन्द
पण्डितने उन्हें रथयात्राके बाद वृन्दावन जानेका उपदेश
दिया। महाप्रभुने यह सुनकर श्रीजगदानन्दका कुछ
तिरस्कार किया और उनकी अपेक्षा श्रीसनातनके
श्रेष्ठत्वको दिखलाया। महाप्रभुने और भी कहा,—“तुम
शुद्धभक्त हो, तुम्हारी देहका भद्र या अभद्र होना, यह
विचार करने योग्य नहीं है। विशेषतः मैं संन्यासी हूँ,
मेरे द्वारा वैसा विचार करना उचित नहीं है।” अन्तमें
उन्होंने कहा,—“तुम मेरे लालनीय हो एवं मैं लालक
[प्यार करनेवाला] हूँ, इसलिये तुम्हारी पीबके प्रति मेरी
घृणा नहीं है।” इन सब प्रसङ्गोंके बाद महाप्रभुके द्वारा
श्रीसनातनको आलिङ्गन करनेसे ही श्रीसनातनके अङ्गोंसे
पीब-खाज आदि सब कुछ दूर हो गये। उस वर्ष
श्रीसनातनको पुरीमें ही रखकर महाप्रभुने (अगले वर्ष
उन्हें) श्रीवृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। श्रीसनातन भी
उनकी आज्ञानुसार वनपथसे होते हुए वृन्दावन चले
गये। इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंसे
विदायी लेकर, गौड़देशमें एक वर्ष तक रहकर कुटुम्ब,
ब्राह्मण और देवालयमें सम्पूर्ण धनको बाँटनेके बाद
वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनसे मिले। इसके पश्चात्
श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव
गोस्वामी द्वारा रचित ग्रन्थोंके नामोंका उल्लेख किया है।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीसनातनकी देहत्यागके सङ्कल्पसे रक्षा
करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :—
वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं श्रीगौरः श्रीसनातनम्।
देहपातादवन् स्नेहात् शुद्धं चक्रे परीक्षया ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरचन्द्रने वृन्दावनसे आये
श्रीसनातनको स्नेहवशतः देहत्यागसे उद्धार करके परीक्षा
लेकर शुद्ध किया था ॥ 1 ॥