श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पन्द्रहवाँ अध्याय 15/222-234 ]
धोये। तब महाप्रभु भोजन करनेके लिये कमरेके अन्दर गये॥ 222-223 ॥
नैवेद्यको देखकर महाप्रभुका विस्मय और भोगकी प्रशंसा :-
अन्नादि देखिया प्रभु विस्मित हञा।
भट्टाचार्ये कहे किछु भङ्गी करिया॥ 224 ॥
“अलौकिक एइ सब अन्न-व्यञ्जन।
दुइ प्रहर भितरे केमने हैल रन्धन? ॥ 225 ॥
शत चुलाय शत जन पाक यदि करे।
तबु शीघ्र एत द्रव्य रान्धिते ना पारे॥ 226 ॥
अनुवाद-महाप्रभु इतने सारे अन्न-व्यञ्जनादिको देखकर बहुत विस्मित हुए और उनकी ओर सङ्केत करते हुए उन्होंने श्रीभट्टाचार्यसे कहा,-“ये सब अन्न-व्यञ्जन तो बहुत अलौकिक हैं। दो प्रहर (छः घण्टे)के समयमें इतने प्रकारके व्यञ्जन कैसे तैयार हो गये? सौ चूलहोंपर सौ व्यक्ति भी यदि रसोई बनायें, तब भी इतनी जल्दी इतने सारे व्यञ्जन नहीं बना सकते॥ 224-226 ॥
तुलसी-मञ्जरीके दर्शनसे श्रीकृष्णके भोगका अनुमान :-
कृष्णेर भोग लागाञाछ, — अनुमान करि।
उपरे देखिये याते तुलसी-मञ्जरी ॥ 227 ॥
भाग्यवान् तुमि, तोमार सफल उद्योग।
राधाकृष्णे लागाञाछ एतादृश भोग॥ 228 ॥
अन्नेर सौरभ्य, वर्ण—अति मनोरम।
राधाकृष्ण साक्षात् इँहा करयाछेन भोजन ॥ 229 ॥
अनुवाद-सभी व्यञ्जनोंपर तुलसी मञ्जरीको देखकर मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि आपने श्रीकृष्णको इनका भोग लगाया है। आप बहुत भाग्यवान् है, आपके द्वारा किया गया परिश्रम सफल है, क्योंकि आपने श्रीराधाकृष्णको ऐसा अद्भुत भोग लगाया है। अन्नकी सुगन्धि, वर्ण आदि अत्यन्त मनोरम हैं, इसलिये अवश्य ही श्रीराधाकृष्णने साक्षात् रूपसे इसको ग्रहण किया है॥ 227-229॥
अनुभाष्य-‘सौरभ्य'–सुगन्ध; ‘वर्ण'–सफेद वर्ण॥ 229 ॥
भोगकी प्रशंसाके बाद महाप्रभुके द्वारा अपने भाग्यकी प्रशंसा :-
तोमार बहुत भाग्य कत प्रशंसिब।
आमि-भाग्यवान्, इहार अवशेष पाब ॥ 230 ॥
अनुवाद-आपका भाग्य बहुत महान् है, उसकी कितनी प्रशंसा करूँगा? मैं भी बहुत भाग्यवान् हूँ जो कि इस भोगका अवशेष प्राप्त करूँगा॥ 230 ॥
श्रीकृष्णके आसनको उठाकर अलग पात्रमें प्रसादकी प्रार्थना :-
कृष्णेर आसन-पीठ राखह उठाञा।
मोरे प्रसाद देह' भिन्न पात्र करिया ॥ 231 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णके आसन-चौकीको उठाकर ले जाओ। तब मुझे अलग पात्रमें प्रसाद दो॥" 231 ॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी कृपाके प्रभावका वर्णन :-
भट्टाचार्य बले, — “प्रभु, ना करह विस्मय।
येइ खाबे, ताँर शक्त्ये भोग सिद्ध हय ॥ 232 ॥
उद्योग ना छिल मोर गृहिणीर रन्धने।
याँर शक्त्ये सिद्ध अन्न, सेइ ताहा जाने॥ 233 ॥
महाप्रभुको भोगका आसन अङ्गीकार करनेके लिये अनुरोध, महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके आसनके प्रति मर्यादा-बुद्धिके कारण उसे स्वीकार करनेमें असम्मति :-
एइ त' आसने बसि' करह भोजन।”
प्रभु कहे, — “पूज्य एइ कृष्णेर आसन ॥” 234 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा,-“हे प्रभु, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। जो भी इस भोजनको ग्रहण करेगा, उसकी शक्ति और कृपासे ही यह सम्भव हुआ है। मैंने और मेरी पत्नीने रसोई बनानेमें कोई विशेष
। 35
[ 15/232–237 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रयास नहीं किया। जिनकी कृपासे भोग बना है, वे सब
कुछ जानते हैं। आप इस आसनपर ही बैठकर भोजन
कीजिये।” परन्तु महाप्रभुने कहा,–“श्रीकृष्णका यह
आसन तो पूजनीय है॥” 232–234॥
श्रीकृष्णके द्वारा ग्रहण किया गया अन्न
और आसन—दोनों ही प्रसाद :—
भट्ट कहे,—“अन्न, पीठ,—समान प्रसाद।
अन्न खाबे, पीठे बसिते काँहा अपराध?॥” 235॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,–“अन्नके समान आसन
भी श्रीकृष्णका प्रसाद है। यदि अन्न खानेमें कोई
अपराध नहीं है, तो फिर आसनपर बैठनेमें अपराध
कैसे है?॥” 235॥
अनुभाष्य—अन्न और पीठ अथवा चौकी—दोनों ही
श्रीकृष्णके द्वारा भोग किये गये निर्मल प्रसाद हैं। भोगके
अन्नको ‘भगवान्का उच्छिष्ट’ जानकर भोजन करके
सम्मान और भगवान्के आसनके कार्यमें लगी हुई
जानकर चौकीको भी उनका अवशेष ‘प्रसाद’ समझकर
ग्रहण करनेसे किस प्रकारसे अपराध होगा?॥ 235॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यके सुसिद्धान्तकी
प्रशंसा और (आसन) अङ्गीकार :—
प्रभु कहे,—“भाल कैले, शास्त्र-आज्ञा हय।
कृष्णेर सकल शेष भृत्य आस्वादय॥ 236॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आपका विचार अति
सुन्दर है। शास्त्रकी भी आज्ञा है कि श्रीकृष्णके द्वारा
छोड़ी गयी सभी वस्तुओंका ही दास आस्वादन करता
है॥ 236॥
अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णप्रसादी समस्त वस्तुएँ भक्तके
लिये आस्वादनीय हैं, परन्तु मर्यादा और पूजनीयत्वकी
रक्षा करते हुए। ये वस्तुएँ बाह्येन्द्रियोंके द्वारा पूर्ण रूपसे
आस्वादनीय नहीं हैं, अन्तरेन्द्रियोंके द्वारा ही इनका पूर्ण
आस्वादन सम्भव है।
श्रीहरिभक्तिविलास (1/80)में श्रीगुरुसेवाविधिके प्रसङ्गमें
कूर्मपुराणमें श्रीव्यासगीतासे उद्धृत श्लोकमें कहा गया
है—
“नास्य निर्माल्यशयनं पादुकोपासनहावपि।
आक्रामेदासनं छायामासन्दीं वा कदाचन॥”
अर्थात् “शिष्यको श्रीगुरुदेवके निर्माल्य, काष्ठ-पादुका,
चर्म-पादुका, आसन, छाया और चौकीका कभी भी
लङ्घन नहीं करना चाहिये।” श्रीगुरुदेवकी पादुका शिष्यके
लिये पूजनीय वस्तु है, शिष्य कभी उसे अपनी
पादुकाके रूपमें स्वीकार नहीं करता है॥ 236॥
भगवान्के द्वारा भुक्त प्रसादको स्वीकार
करनेसे ही दुष्पार मायाकी जय :—
श्रीमद्भागवत (11/6/46)में—
त्वयोपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि॥ 237॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 237॥
अमृतप्रवाह भाष्य—आपको माला, गन्ध, वस्त्र,
अलङ्कार आदि जो कुछ अर्पित हुआ है, उससे
विभूषित होकर आपके दासस्वरूप हम आपके समस्त
उच्छिष्टका भोजन करते-करते ही आपकी मायाको
जय करनेमें निश्चय ही समर्थ होंगे॥ 237॥
अनुभाष्य—भगवान् और उद्धवके वार्तालाप अथवा
उद्धवगीताके आरम्भ होनेसे पूर्व भगवान्की इच्छासे
द्वारकामें महा उत्पात आरम्भ होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा
प्रपञ्चमें प्रकट-लीलाका सङ्गोपन और अप्रकट-लीलामें
प्रवेश करनेकी इच्छाको जानकर प्रियतम सेवक उद्धव
गाढ़ प्रीतिपूर्वक श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं—
त्वयोपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः (भवदुपभुक्त-माल्य-
सुरभिवस्त्रभूषणैः चर्चिताः अलंकृताः) उच्छिष्टभोजिनः (उच्छिष्टं
प्रसादान्नं भोक्तुं शीलं येषां ते) दासाः वयं (किङ्कराः) हि
(निश्चयार्थे) तव मायां (दुरत्ययां प्रकृतिं) जयेम (जेतुं शक्नुयाम)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 237॥
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पन्द्रहवाँ अध्याय [ 15/238–242 ]
महाप्रभुकी प्रचुर अन्न ग्रहण करनेमें आपत्ति;
श्रीभट्टाचार्यकी उनसे शिकायत :—
तथापि एतेक अन्न खाओन ना याय।”
भट्ट कहे,—“जानि, खाओ यतेक युयाय॥ २३८ ॥
नीलाचले भोजन तुमि कर बायान्न बार।
एक एक भोगेरे अन्न शत शत भार॥ २३९ ॥
अनुवाद—महाप्रभुने आगे कहा कि तो भी इतना अन्न नहीं खाया जा सकता।” श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“किन्तु मैं जानता हूँ कि आप कितना खा सकते हैं। नीलाचलमें (श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें) आप दिनमें बावन बार भोजन करते हैं और हर बार आप सैकड़ों पात्रोंमें भरे भोगको खाते हैं॥ २३८-२३९ ॥
महाप्रभुका द्वारका, मथुरा और ब्रजलीलामें भोजन-प्रकार :—
द्वारकाते षोल-सहस्र महिषीर घरे।
अष्टादश माता, आर यादवेर घरे॥ २४० ॥
व्रजे ज्येठा, खुड़ा, मामा, पिसादि गोपगण।
सखावृन्द सबार घरे द्विसन्ध्या-भोजन॥ २४१ ॥
अनुवाद—द्वारकामें सोलह हजार महिषियोंके घरोंमें, अठारह माताओं और यादवोंके घरोंमें एवं व्रजमें ताऊ, चाचा, मामा, फूफा आदि गोपों और सभी सखाओंके घरोंमें दोनों सन्ध्याओंमें आप भोजन करते हो॥ २४०-२४१ ॥
अनुभाष्य—'अष्टादश माता'—देवकी, रोहिणी आदि।
'व्रजे ज्येठा'—अर्थात् ताऊ। (श्रीरूपप्रभु कृत श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितुः”
अर्थात् 'उपनन्द' और 'अभिनन्द'—ये दोनों श्रीकृष्णके ताऊजी हैं।
'खुड़ा'—अर्थात् चाचा। (श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सत्रन्द-नन्दनौ”
अर्थात् 'सन्नन्द' और 'नन्दन' अथवा 'सुनन्द' और 'पाण्डव'—ये कृष्णके चाचा हैं।
'मामा'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“यशोधर-यशोदेव-सुदेवाद्यास्तु मातुलाः”
अर्थात् 'यशोधर', 'यशोदेव' और 'सुदेव' आदि श्रीकृष्णके मामा हैं।
'फूफा'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“महानीलः सुनीलश्च रमणावेतयोः क्रमात्”
अर्थात् 'महानील' और 'सुनील'—श्रीकृष्णके ये दो फूफा हैं, वे 'सानन्दा' और 'नन्दिनी'-नामक दो बुआओंके पति हैं।
'सखावृन्द'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकाके परिशिष्टमें)—
“विशाल-वृषभौर्जस्वि-देवप्रस्थ-वरुथपाः।
मन्दारः कुसुमापीडमणिबन्धकरास्तथाः॥
मन्दरश्चन्दनः कुन्दः कलिन्द-कुलिकादयः।
'कनिष्ठकल्पाः' सेवायां सखायो विपुलाग्रहाः॥ ”
“श्रीदामा दामा सुदामा वसुदाम तथैव च।
किङ्किणी-भद्रसेनांशु स्तोककृष्णाः विलासिनः।
पुण्डरीक-विटङ्काक्ष-कलविङ्क-प्रियङ्गराः।
एते 'प्रियसखाः' शान्ताः कृष्णप्राणसमा मताः॥ ”
“सुबलाज्जुन-गन्धर्व-वसन्तोज्ज्वल-कोकिलाः।
स-नन्दन-विदाग्धाद्याः प्रियनर्मसखा मताः॥ ”
[अर्थात् “विशाल, वृषभ, ओजस्वी, देवप्रस्थ, वरुथप, मन्दार, कुसुमापीड़, मणिबन्धकर, मन्दर, चन्दन, कुन्द, कलिन्द, कुलिक आदि अनेक श्रीकृष्णके 'सखा' हैं। ये श्रीकृष्णसे आयुमें छोटे हैं और सदा श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर रहते हैं। श्रीदाम, दाम, सुदाम, वसुदाम, किङ्किणी, भद्रसेन, अंशु, स्तोककृष्ण, विलासी, पुण्डरीक, विटङ्काक्ष, कलविङ्क, प्रियङ्कर—ये श्रीकृष्णके 'प्रियसखा' हैं और उनके समान आयुके हैं। सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, उज्ज्वल, कोकिल, सनन्दन और विदग्ध श्रीकृष्णके 'प्रियनर्मसखा' हैं।”] ॥ २४०-२४१ ॥
उस परिमाणकी तुलनामें श्रीभट्टाचार्यके द्वारा अर्पित अन्न तो अति अल्प :—
गोवर्धन-यज्ञे अन्न खाइला राशि राशि।
तार लेखाय एइ अन्न नहे एक ग्रासी॥ २४२ ॥
३७
[ 15/242-250 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—गोवर्धनके अन्नकूटमें भी आपने जितना
भोजन किया था, उसकी तुलनामें यह अन्न तो एक
ग्रास भी नहीं है॥ 242 ॥
अनुभाष्य—'तार लेखाय'—उसकी तुलनामें अथवा
अनुपातमें॥ 242 ॥
श्रीभट्टाचार्यका दैन्य :-
तुमि त' ईश्वर, मुञि-क्षुद्र जीव छार।
एक-ग्रास माधुकरी करह अङ्गीकार ॥" 243 ॥
अनुवाद—आप तो ईश्वर हैं और मैं एक अति
क्षुद्र जीव हूँ। कृपया मेरे घरमें इस एक ग्रासको
स्वीकार कीजिये॥" 243 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'माधुकरी'—मधुमक्खीकी वृत्तिके
द्वारा प्राप्त ग्रास॥ 243 ॥
श्रीभट्टाचार्यके वचन सुनकर महाप्रभुका प्रसाद-सेवन :-
एत शुनि' हासि' प्रभु बसिला भोजने।
जगन्नाथेर प्रसाद भट्ट देन हर्ष-मने ॥ 244 ॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु मुस्कुराये और
भोजन करनेके लिये बैठे। श्रीभट्टाचार्यने बड़े आनन्दसे
पहले उन्हें श्रीजगन्नाथका प्रसाद लाकर दिया॥ 244 ॥
श्रीभट्टाचार्यका दामाद-षाठीका पति
महाप्रभुका निन्दक 'अमोघ' :-
हेनकाले 'अमोघ', —भट्टाचार्येर जामाता।
कुलीन, निन्दक तैंहो षाठी-कन्यार भर्त्ता ॥ 245 ॥
अनुवाद—इसी समय श्रीभट्टाचार्यका दामाद अमोघ
जो उनकी पुत्री षाठीका पति था, वहाँ आ गया। यद्यपि
उसका जन्म उच्च ब्राह्मणकुलमें हुआ था, तथापि वह
दूसरोंके दोष देखता और निन्दा करता था॥ 245 ॥
श्रीभट्टाचार्यको हाथमें लाठी लिये
देखकर अमोघको भय :-
भोजन देखिते चाहे, आसिते ना पारे।
लाठी-हाते भट्टाचार्य आछेन दुआरे ॥ 246 ॥
अनुवाद—वह देखना चाहता था कि महाप्रभु क्या
खा रहे हैं, किन्तु वह भीतर आ नहीं सका, क्योंकि
श्रीभट्टाचार्य अपने हाथमें लाठी लेकर द्वारपर बैठे हुए
थे॥ 246 ॥
श्रीभट्टाचार्यका ध्यान बँटनेपर महाप्रभुके
पात्रमें बहुत अन्नको देखकर महाप्रभुकी निन्दा :-
तैंहो यदि प्रसाद दिते हैला आन-मन।
अमोघ आसि' अन्न देखि' करये निन्दन ॥ 247 ॥
“एइ अन्ने तृप्त हय दश बार जन।
एकेला संन्यासी करे एतेक भक्षण !” ॥ 248 ॥
अनुवाद—जैसे ही श्रीभट्टाचार्य महाप्रभुको भोजन
परोसने लगे और थोड़ा असावधान हो गये, उसी समय
अमोघ भीतर आ गया। इतनी सारी भोजन-सामग्रीको
देखकर वह निन्दा करने लगा, —“इतने भोजनसे तो
दस-बारह लोगोंका पेट भर सकता है और यहाँ केवल
एक ही संन्यासी इतना सब खा रहा है॥" 247-248 ॥
श्रीभट्टाचार्यके मुड़कर देखते ही
अमोघका वहाँसे भाग जाना :-
शुनि' भट्टाचार्य तबे उलटि' चाहिल।
ताँर अवधान देखि' अमोघ पलाइल ॥ 249 ॥
अनुवाद—अमोघकी बात सुनकर श्रीभट्टाचार्यने दृष्टि
घुमाकर उसे देखा। श्रीभट्टाचार्यको सावधान देखकर
अमोघ तुरन्त वहाँसे भाग गया॥ 249 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अवधान'—सावधान॥ 249 ॥
श्रीभट्टाचार्यका हाथमें लाठी लेकर उसके पीछे दौड़ना :-
भट्टाचार्य लाठि लञा मारिते धाइल।
पलाइल अमोघ, तार लाग ना पाइल ॥ 250 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्य लाठी लेकर उसे मारनेके
लिये दौड़े, किन्तु अमोघ इतनी तेजीसे भागा कि
श्रीभट्टाचार्य उसे पकड़ नहीं पाये॥ 250 ॥
38 ।
पन्द्रहवाँ अध्याय 15/251-260 ]
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभु-निन्दक अमोघकी
तीव्र निन्दा और शाप :-
तबे गालि, शाप दिते भट्टाचार्य आइला।
निन्दा शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला ॥ 251 ॥
अनुवाद-तब श्रीभट्टाचार्य उसे गाली निकालते हुए
और शाप देते हुए लौट आये। उनके मुखसे अमोघकी
निन्दाको सुनकर महाप्रभु हँसने लगे ॥ 251 ॥
महाप्रभुकी निन्दा सुनकर श्रीभट्टाचार्यकी पत्नीको दुःख :-
शुनि' षाठीर माता शिरे-बुके घात मारे।
'षाठी राण्डी हउक'-इहा बले बारे बारे ॥ 252 ॥
अनुवाद-इस घटनाको सुनकर षाठीकी माता
(श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी) अपने सिर और छातीको पीटने
लगी और बार-बार कहने लगीं,- 'षाठी विधवा हो
जाय ॥' 252 ॥
महाप्रभुके द्वारा दोनोंको सान्त्वना
देनेके बाद प्रसाद-सेवन :-
दुँहार दुःख देखि' प्रभु दुँहा प्रबोधिया।
दुँहार इच्छाते भोजन कैल तुष्ट हञा ॥ 253 ॥
अनुवाद-दोनोंको दुःखी देखकर महाप्रभुने उन
दोनोंको सान्त्वना प्रदान की। उन दोनोंकी इच्छासे
महाप्रभुने भोजन ग्रहण किया और वे सन्तुष्ट हुए ॥ 253 ॥
महाप्रभुका आचमन :-
आचमन कराञा भट्ट दिल मुखवास।
तुलसी-मञ्जरी, लवङ्ग, एलाचि रसवास ॥ 254 ॥
सर्वाङ्गे लेपिल प्रभुर सुगन्धि चन्दन।
दण्डवत् हञा बले सदैन्य वचन ॥ 255 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको आचमन करानेके बाद
श्रीभट्टाचार्यने उन्हें तुलसी-मञ्जरी, लौंग, सुगन्धित रसीली
इलायची आदि प्रस्तुत की। तब उन्होंने महाप्रभुके सभी
अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया और उन्हें दण्डवत् प्रणाम
करके दीनतापूर्वक कहने लगे ॥ 254-255 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'एलाचि रसवास' - रस और
सुगन्धयुक्त इलायची ॥ 254 ॥
अमोघके द्वारा की गयी निन्दाके लिये क्षमा-प्रार्थना :-
निन्दा कराइते तोमा आनिनु निज-घरे।
एइ अपराध, प्रभु, क्षमा कर मोरे ॥ 256 ॥
अनुवाद-मैंने आपकी निन्दा करवानेके लिये
आपको अपने घरपर बुलाया था। मुझसे यह बहुत
बड़ा अपराध हुआ है। हे प्रभो! कृपा करके आप मेरे
इस अपराधको क्षमा कीजिये ॥ 256 ॥
अदोषदर्शी महाप्रभु :-
प्रभु कहे, - "निन्दा नहे, 'सहज' कहिल।
इहाते तोमार तार कि अपराध हैल?" ॥ 257 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"अमोघने निन्दा नहीं
की, बल्कि 'सत्य' बात ही कही। इसमें तुम्हारा या
उसका क्या अपराध हुआ? ॥ " 257 ॥
महाप्रभुके पीछे-पीछे श्रीभट्टाचार्यका चलना :-
एत बलि' महाप्रभु चलिला भवने।
भट्टाचार्य ताँर घरे गेला ताँर सने ॥ 258 ॥
अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभु अपने वास-स्थानकी
ओर चल दिये। श्रीभट्टाचार्य भी उनके साथ उनके घर
तक गये ॥ 258 ॥
श्रीभट्टाचार्यका बहुत दैन्य और शरणागति :-
प्रभु-पदे बहु आत्मनिवेदन कैल।
ताँरे शान्त करि' प्रभु घरे पाठाइल ॥ 259 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणोंमें पड़कर
अनेक प्रकारसे अपने हृदयकी ग्लानिको व्यक्त किया।
तब महाप्रभुने उन्हें शान्त करके उनके घर वापिस
भेजा ॥ 259 ॥
घरमें पत्नीके साथ श्रीभट्टाचार्यकी गम्भीर खेद-उक्ति :-
घरे आसि' भट्टाचार्य षाठीर माता-सने।
आपना निन्दिया किछु बलेन वचने ॥ 260 ॥
। 39
[ 15/260-261 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीचैतन्य-निन्दकका वध ही उसके द्वारा
किये गये अपराधका प्रायश्चित :-
“चैतन्य-गोसाञिर निन्दा शुनि याहा हैते।
तारे वध कैले, हय पाप-प्रायश्चित्ते॥ 261 ॥
अनुवाद-घरमें लौटकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य अपनी
पत्नी, षाठीकी माताके साथ बैठकर अपनी निन्दा करने
लगे। तब उन्होंने कहा,-“श्रीचैतन्य गोसाईंकी निन्दा
जिसके मुखसे सुनी है, उसका वध करनेसे ही उसके
पापोंका प्रायश्चित हो सकता है॥ 260-261 ॥
अनुभाष्य - वैष्णव-निन्दाका फल'-(हःभःविः, 10वें
विः में उद्धृत स्कन्दपुराणके मार्कण्डेय-भगीरथ-संवादमें)-
“यो हि भागवतं लोकमुपहासं नृपोत्तम।
करोति तस्य नश्यन्ति अर्थधर्मयशःसुताः॥
निन्दां कुर्वन्ति ये मूढ़ा वैष्णवानां महात्मनाम्।
पतन्ति पितृभिः सार्द्धं महारौरवसंज्ञिते ॥
हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिनन्दति।
क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने 'पतनानि षट्' ॥”
(हःभःविः, 10वें विः में उद्धृत द्वारकामाहात्म्यमें
प्रह्लाद-बलि-संवादमें)-
“करपत्रैश्च फाल्यन्ते सुतीब्रैर्यमशासनैः।
निन्दां कुर्वन्ति ये पापाः वैष्णवानां महात्मनाम्॥”
[अर्थात् “हे नृपवर ! जो वैष्णवका उपहास करते
हैं, उनके अर्थ, धर्म, यश और सन्तान आदि विनष्ट
हो जाते हैं। जो सब मूढ़ व्यक्ति महात्मा वैष्णवोंकी
निन्दा करते हैं, वे पितृ-पुरुषों सहित महारौरव-नामक
नरकमें पतित होते हैं। वैष्णवपर प्रहार, उनकी निन्दा,
उनसे विद्वेष, प्रणामादिके द्वारा उनका अभिनन्दन नहीं
करना, वैष्णवके प्रति क्रोध प्रकाशित करना और
वैष्णवके दर्शनसे आनन्दित नहीं होना-ये छः पतनके
कारण हैं। जो समस्त पापी महात्मा वैष्णवोंकी निन्दा
करते हैं, वे यमके शासनके कारण अत्यन्त तीखे
आरेके जैसे अस्त्रके द्वारा खण्डित किये जाते हैं।”]
'विष्णुनिन्दा-फल'-(भक्तिसन्दर्भमें 314 संख्यामें उद्धृत
भाः 7/1/16, 22 श्लोककी टीका देखें)।
“ये निन्दन्ति हृषीकेशं तद्भक्तं पुण्यरूपिणम्।
शतजन्मार्जितं पुण्यं तेषां नश्यति निश्चितम्॥
ते पच्यन्ते महाघोरे कुम्भीपाके भयानके।
भक्षिताः कीटसङ्घेन यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
श्रीविष्णोरवमानाद् गुरुतरं श्रीवैष्णवोल्लङ्घनम्।
तदीयदूषकजनान् न पश्येत् पुरुषाधमान्।
तैः सार्द्धं वञ्चकजनैः सहवासं न कारयेत् ॥”
श्रीजीवप्रभु कृत 'भक्तिसन्दर्भमें' - नामपराधान्तर्गत
'साधुनिन्दा'-फल-वर्णन-प्रसङ्गमें 265 संख्यामें उद्धृत
(भाः 10/74/40)-
'निन्दां भगवतः शृण्वन् तत्परस्य जनस्य वा।
ततो नापैति यः सोऽपि यात्यधः सुकृताच्च्युतः ॥'
ततोऽपगमश्चासमर्थस्य एव; समर्थेन तु निन्दकजिह्वा छेत्तव्या;
तत्राप्यसमर्थेन स्वप्राणपरित्यागोऽपि कर्तव्यः।
यथोक्तं देव्या - (भाः 4/4/17)-
“कर्णौ पिधाय निरयात् यदकल्प ईशे
धर्मावितर्यशृणिभिर्नृभिरस्यमाने।
छिन्द्यात् प्रसह्य रुषतीमसतां प्रभुश्चे-
ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत् स धर्मः ॥” इति।
[अर्थात् “जो श्रीहृषीकेश एवं उनके पवित्र भक्तोंकी
निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंमें अर्जित पुण्य
निश्चित रूपसे विनष्ट हो जाते हैं। जब तक चन्द्र
और सूर्य विद्यमान रहते हैं, तब तक भयानक महाघोर
कुम्भीपाक नरकमें वे कीटोंके द्वारा खाये जाते हैं।
भगवान् श्रीविष्णुकी अवज्ञाकी अपेक्षा श्रीवैष्णवका उल्लङ्घन
अधिक भारी अपराध है। इसलिये विष्णुभक्तोंकी निन्दा
करनेवाले अधम पुरुषोंका दर्शन नहीं करना चाहिये
और ऐसे झूठे आक्षेप करनेवालोंके साथ एक स्थानपर
भी नहीं रहना चाहिये।” श्रीभक्तिसन्दर्भमें साधुनिन्दाके
फलके वर्णनके प्रसङ्गमें-“श्रीभगवान्की अथवा भगवद्भक्तकी
निन्दा सुनकर जो उस स्थानको छोड़कर नहीं चले
जाते, वे भी सुकृतिसे च्युत होकर अधोगतिको प्राप्त
करते हैं।”-यहाँ जो उस स्थानसे चले जानेका विधान
40 ।
पन्द्रहवाँ अध्याय 15/261-264 ]
है, वह केवल असमर्थ व्यक्तिके लिये है। किन्तु
सामर्थ्य होनेपर उक्त निन्दककी जिह्वा काट देनी
चाहिये। ऐसा करनेमें असमर्थ होनेपर अपने प्राणोंका
परित्याग करना ही कर्त्तव्य बन जाता है। जैसे,
श्रीपार्वतीने कहा,—“कोई दुस्साहसी व्यक्ति धर्मरक्षक
महापुरुषकी निन्दा करे और यदि उक्त निन्दकके
विनाश करनेमें अथवा अपने प्राणोंके त्यागमें कोई
समर्थ नहीं हो, तो उसके लिये दोनों कानोंको बन्द
करके उस स्थानसे चले जाना ही कर्तव्य है। समर्थ
होनेपर उस दुर्जनकी कटुभाषिणी जिह्वाको बलपूर्वक
काटकर (निन्दा श्रवणरूपी पापका प्रायश्चित करनेके
लिये) स्वयं प्राण त्याग करना चाहिये—यही धर्मके
रूपमें कहा गया है।”] ॥ 261 ॥
ऐसे करनेमें असमर्थ व्यक्तिके लिये प्राण-त्याग;
किन्तु स्वयं और दामाद, दोनों ही 'शौक्र-ब्राह्मण'
होनेके कारण हत्याके अयोग्य :—
किम्वा निज-प्राण यदि करि विमोचन।
दुइ योग्य नहे, दुइ—शरीर ब्राह्मण ॥ 262 ॥
हरि-गुरु-वैष्णवके निन्दकका सङ्ग सम्पूर्ण रूपसे परित्याग
करने योग्य, उनके मुखका दर्शन भी अनुचित :—
पुनः सेइ निन्दकेर मुख ना देखिब।
परित्याग कैलुँ, तार नाम ना लइब ॥ 263 ॥
अनुवाद—अथवा अपने प्राणोंका त्याग कर दूँ।
किन्तु ये दोनों कार्य ही उचित नहीं हैं, क्योंकि हम
दोनों ही शरीरसे ब्राह्मण हैं। मैं फिर कभी भी उस
निन्दकका मुख नहीं देखूँगा। मैं उसका सदाके लिये
परित्याग करता हूँ, आजके बाद मैं उसका नाम तक
भी नहीं लूँगा ॥ 262-263 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अमोघ-ब्राह्मण है, उसका वध
नहीं किया जा सकता; [श्रीभट्टाचार्य] स्वयं भी ब्राह्मण
हैं, आत्महत्या भी अनुचित हैं, दोनों कार्य ही करनेके
योग्य नहीं हैं। इसलिये उस निन्दकका मुख नहीं देखना
ही कर्त्तव्य है ॥ 262-263 ॥
अनुभाष्य—भाः 1/7/53 श्लोक—“ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य
आततायी वधार्हणः”—इसकी श्रीधरटीकामें उद्धृत स्मृतिके
वचनमें ब्रह्म-बन्धुके वध-समर्थनकी व्यवस्था—
“आततायिनमायान्तमपि वेदान्तपारगम्। जिघांसन्तं जिघांसीयान्न
तेन ब्रह्महा भवेत्।” पुनः (भाः 1/7/57 श्लोक)—“वपनं
द्रविणादानं स्थानान्निर्वापनं तथा। एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो
नान्योऽस्ति दैहिकः॥” [अर्थात् (भाः 1/7/53)—“ब्राह्मणके
अधम होनेपर भी उसे मारना उचित नहीं है, आततायी
वधके योग्य है।” इसकी श्रीधरपाद-कृत टीकामें,—“वध
करनेकी इच्छासे आनेवाले वेदान्तमें निपुण आततायीको
मारनेसे उसके द्वारा ब्रह्महत्या नहीं होती।” (भाः
1/7/57)—“सिरका मुण्डन, धन-छीन लेना और उसे
उसके स्थानसे निकाल देना—इस प्रकार ही अधम
ब्राह्मणोंका वध हुआ करता है; उनके लिये सिर
काटना आदि अन्य दैहिक वधका विधान नहीं
है।”] ॥ 262 ॥
हरि-गुरु-वैष्णव-द्वेषी पति-पत्नीके द्वारा
निश्चित रूपसे त्याग करने योग्य :—
षाठीरे कह—तारे छाड़ुक, से हइल 'पतित'।
'पतित' हइले भर्त्ता, त्यजिते उचित ॥ 264 ॥
अनुवाद—तब श्रीभट्टाचार्यने अपनी पत्नीसे कहा—तुम
षाठीसे कहो कि वह उसे छोड़ दे, क्योंकि वह पतित
हो गया है। पतिके पतित हो जानेपर उसे त्याग करना
ही उचित है ॥ 264 ॥
अनुभाष्य—(भाः 5/5/18)—“न पतिश्च स स्यात् न
मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्” अर्थात् जो स्वयं श्रीकृष्णभजन
नहीं करते, और न ही श्रीकृष्णविमुखता अथवा
श्रीकृष्ण-विस्मृतिरूपी निकट उपस्थित मृत्युके हाथसे
पत्नीकी रक्षा कर सकते हैं, वे पतित हैं, इसलिये वे
पति नहीं हैं। बाहरी दृष्टिकोणसे,—श्रीकृष्णके प्रति
समर्पित आत्मा पत्नीरूपी कोई भक्त यदि निष्कपटरूपसे
शुद्ध श्रीकृष्णभजनके उद्देश्यसे द्विजपत्नियोंकी भाँति
श्रीकृष्णके अभक्त अथवा विरोधी 'पति'-अभिमानी
। 41
[ 15/264–269 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
व्यक्तिके सङ्गको त्याग करके घरमें ही रहे, तो भी
उसके द्वारा किसी भी विधिका उल्लङ्घन नहीं होता।
स्वयं भगवान्ने ही इस विषयमें द्विजपत्नियोंसे कहा (भाः
10/23/31-32)—“मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पति, पिता, भाई,
पुत्र आदि कोई भी बन्धु-बान्धव तुमसे असूया (गुणमें
भी दोष-दर्शन) नहीं कर पायेंगे; मेरी आज्ञासे देवता
भी तुम्हारे आचरणका सदैव अनुमोदन करेंगे। वास्तवमें,
इस जगत्में केवल मेरा अङ्ग-सङ्ग ही मेरे प्रति
अनुरागकी उत्पत्तिका कारण नहीं होता। मुझमें शुद्ध
भावसे निरन्तर मनका संयोग करनेसे शीघ्र ही मेरी
प्राप्ति होती है॥” 264॥
स्मृति वचन :-
“पतिञ्च पतितं त्यजेत्॥”265॥
अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 265॥
अमृतप्रवाह भाष्य–पतित पतिका परित्याग करना
चाहिये।
(भा: 7/11/28)–
“सन्तुष्टालोलुपा दक्षा धर्मज्ञा प्रिय-सत्यवाक्।
अप्रमत्ता शुचिः स्निग्धा पतिं त्वपतितं भजेत्॥”
[अर्थात् “जो कुछ मिल जाय, पत्नी उसमें सन्तुष्ट
रहे, किसी वस्तुके लिये न ललचाये, सभी कार्योंमें
चतुर और धर्मज्ञ हो, सत्य और प्रिय बोले। अपने
कर्त्तव्यमें सावधान रहे। पवित्रता और स्नेहयुक्त होकर
यदि पति पतित न हो तो उसका सहवास करे।”] ॥ 265॥
अनुभाष्य–भा: 7/11/28 श्लोककी श्रीधरटीकामें
उद्धृत याज्ञवल्क्य-वाक्य–
“आशुद्धेः संप्रतीक्ष्यो हि महापातक-दूषितः।”
अर्थात् “महापातकसे दूषित पतिकी अन्य सेवाएँ
करते हुए भी जब तक उसकी शुद्धि न हो जाय, तब
तक पत्नीको उसके साथ सहवास करनेकी प्रतीक्षा
करनी चाहिये॥” 265॥
अमोघको हैजेका रोग :-
सेइ रात्रे अमोघ काँहा पालाञा राहिल।
प्रातःकाले तार विसूचिका-व्याधि हैल॥ 266॥
अनुवाद–उस रात अमोघ कहीं भाग गया। और
प्रातःकालमें ही उसे हैजेका रोग हो गया॥ 266॥
श्रीचैतन्यके विद्वेषीकी मृत्युकी सम्भावनाको
सुनकर श्रीभट्टाचार्यका हर्ष :-
अमोघ मरेन—शुनि' कहे भट्टाचार्य।
“सहाय हइल दैव, कैल मोर कार्य॥ 267॥
ईश्वर-अपराधका फल तत्क्षणात् दिखा :-
ईश्वरे त' अपराध फले ततक्षणे।
एत बलि' पड़े दुइ शास्त्रेर वचने॥ 268॥
अनुवाद–अमोघ हैजेसे मर रहा है, ऐसा सुनकर
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“विधाता मेरे अनुकूल हो
गये हैं। मैं जो करना चाहता था, वह कार्य वे स्वयं
कर रहे हैं। ईश्वरके प्रति किये गये अपराधका फल
तुरन्त मिलता है। यह कहकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
शास्त्रोंके दो श्लोक बोले॥ 267-268॥
महाभारतके वनपर्व (241/15)में :—
महता हि प्रयत्नेन हस्त्यश्वरथपत्तिभिः।
अस्माभिर्यदनुष्ठेयं गन्धर्वैस्तदनुष्ठितम्॥ 269॥
अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 269॥
अमृतप्रवाह भाष्य–हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिकोंका
प्रचुर रूपसे संग्रह करके बड़े प्रयाससे हमें जो करना
पड़ता, गन्धर्वोंने वह कर दिया है॥ 269॥
अनुभाष्य–दुर्योधन कर्णके द्वारा सञ्चालित अपनी
सेनाके साथ वनमें जा रहा था और गन्धर्वोंके साथ
उसका युद्ध हुआ। परन्तु गन्धर्वराज चित्रसेनकी सेना
अधिक बलशाली थी, इसलिये उसने सभी कौरवोंको
बन्दी बना लिया। उस समय पाण्डव उसी वनमें
अज्ञातवासमें रह रहे थे। दुर्योधनके मन्त्रियोंने वनवासी
42 ।
पन्द्रहवाँ अध्याय 15/269-275 ]
युधिष्ठिरसे सहायताकी प्रार्थना की। उस समय भीमसेनने
दुर्योधन आदिके पहले किये गये अत्याचारोंका स्मरण
करके प्रतिशोध लेनेके इच्छासे कहा-
महता (अतिशयेन) प्रयत्नेन (प्रयासेन) हस्त्यश्वरथपत्तिभिः
(गजराजिरथैः पत्तिभिः पदातिभिः; 'सन्नह्य गजराजिभिः' इति
पाठान्तरञ्च) यत् (दुर्योधनादि-कौरव-पराजयकार्यम्) अनुष्ठेयं
(सम्पादनीयम् अद्य) गन्धर्वैः (चित्रसेनचालितैः कर्तृभूतैः) तत्
अनुष्ठितं (सम्पादितं-कौरवादयः शत्रवः पराजिताः इत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-बहुत प्रयाससे हाथी, घोड़े, रथ,
पैदल सैनिकोंको हम एकत्रित करके युद्धमें दुर्योधनादि
कौरवोंको परास्त कर पाते, वह कार्य (कौरवोंकी
पराजय) चित्रसेनके सञ्चालनमें गन्धर्वोंकी सेनाने कर
दिया है॥ 269 ॥
विष्णु-वैष्णव-विद्वेषका फल :-
श्रीमद्भागवत (10/4/46)में-
आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च।
हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ *270 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 270॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मनुष्यके द्वारा महान् व्यक्तिका
अनादर करनेसे उसकी आयु, श्री (सम्पत्ति), यश, धर्म,
लोक-परलोक और आशीर्वाद-ये सब श्रेष्ठ वस्तुएँ
नाश हो जाती हैं॥ *270 ॥
पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-भोजराज कंस बहन देवकीकी कन्यारूपी
योगमायाको नहीं मार पाया और उसके मुखसे अपने
पूर्वशत्रु विष्णुके आविर्भावकी बातको सुना। तब कंसने
असुर स्वभाववाले विष्णु-वैष्णव-विद्वेषी मन्त्रियोंके साथ
परामर्श करनेके बाद विष्णुभक्त-साधुओं-ऋषियोंको मारनेके
लिये दानवोंको आज्ञा दी। श्रीशुकदेवने परीक्षितको
विष्णु-वैष्णव-विद्वेषके फलका वर्णन करते हुए कहा-
महदतिक्रमः (महतां विष्णुवैष्णवानाम् अतिक्रमः कायिक-
मानसिक-वाचनिकानादरः, अतः वैष्णवापराधः) पुंसः (नरस्य)
आयुः, श्रियं, यशः, धर्मं, लोकान् (धर्मसाध्यस्वर्गादीन्) आशिषः
(निजवाञ्छितानि एव) च सर्वाणि श्रेयांसि (साध्यसाधनानि
कल्याणानि) हन्ति (विनाशयति)।
श्लोक-भावानुवाद-विष्णु-वैष्णवोंका कायिक-
मानसिक-वाचिक अनादर करनेपर उस वैष्णवापराधके
फलस्वरूप मनुष्यकी आयु, सम्पत्ति, यश, धर्म, धर्मके
पालनसे इच्छित स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति और
साध्य-साधन-कल्याणका विनाश हो जाता है।
अन्त्यलीला 3/146 और 163 संख्या देखें ॥ 270 ॥
श्रीगोपीनाथसे महाप्रभुके द्वारा
श्रीभट्टाचार्यके बारेमें पूछना :-
गोपीनाथाचार्य गेला प्रभु-दरशने।
प्रभु ताँरे पुछिल भट्टाचार्य-विवरणे॥ 271 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य जब महाप्रभुके दर्शन
करनेके लिये गये, तब महाप्रभुने उनसे श्रीभट्टाचार्यके
विषयमें पूछा ॥ 271 ॥
श्रीगोपीनाथके मुखसे पत्नी-सहित श्रीभट्टाचार्यका
महाप्रभु-निन्दा श्रवण करनेके कारण उपवास और
अमोघकी मरणासन्न दशाका श्रवण :-
आचार्य कहे,- "उपवास कैल दुइजन।
विसूचिका-व्याधिते अमोघ छाड़िछे जीवन॥ *272 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,- "दोनों पति और
पत्नी उपवास कर रहे हैं। हैजेके कारण अमोघ
मरनेवाला है॥ *272 ॥
महाप्रभुका शीघ्रतासे जाना और
अमोघको सदुपदेश प्रदान करना :-
शुनि' कृपामय प्रभु आइला धाञा।
अमोघेरे कहे तार बुके हस्त दिया ॥ 273 ॥
महाप्रभुके द्वारा 'ब्राह्मण'की संज्ञाका निर्देश :-
"सहजे निर्मल एइ ब्राह्मण-हृदय।
कृष्णेर बसिते एइ योग्यस्थान हय॥ 274 ॥
'मात्सर्य'-चण्डाल केने इँहा बसाइला।
परम पवित्र स्थान अपवित्र कैला॥ 275 ॥
। 43
[ 15/273-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—यह सुनते ही कृपामय महाप्रभु दौड़कर
अमोघके पास पहुँचे और उसकी छातीपर हाथ रखकर
उससे कहने लगे, — “ब्राह्मणका हृदय तो स्वाभाविक
रूपसे निर्मल होता है, इसलिये श्रीकृष्णके वासके लिये
वह योग्य स्थान होता है। तुमने इसमें 'मात्सर्य' - रूपी
चण्डालको क्यों बैठाया है? तुमने परम पवित्र स्थानको
अपवित्र कर दिया है ॥ 273-275 ॥
'जाड्य' रूपी अपराधसे विमुक्त होनेपर
ही शुद्ध नामका उदय :—
सार्वभौम-सङ्गे तोमार 'कलुष' हैल क्षय।
'कल्मष' घुचिले जीव 'कृष्णनाम' लय ॥ 276 ॥
अमोघको श्रीकृष्णनाम-ग्रहण करनेकी आज्ञा :—
उठह, अमोघ, तुमि लओ कृष्णनाम।
अचिरे तोमारे कृपा करिबे भगवान् ॥ 277 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौमके सङ्गसे तुम्हारे हृदयकी कल्मष
अब दूर हो गयी है। कल्मषके दूर होनेपर जीवका
हृदय शुद्ध हो जाता है और वह श्रीकृष्णका नाम ले
पाता है। इसलिये अमोघ, उठो और श्रीकृष्णनामका
कीर्तन करो। ऐसा करनेसे शीघ्र ही भगवान् तुमपर
कृपा करेंगे॥” 276-277 ॥
अनुभाष्य—'ब्रह्म', 'परमात्मा' और 'भगवान्' अथवा
'विष्णु'—अद्वयज्ञानतत्त्वके ये तीन आविर्भाव हैं। ब्रह्मज्ञका
(ब्रह्मको जाननेवालेका) नाम 'ब्राह्मण' है और ब्रह्मज्ञ
भगवद्-उपासकका नाम ही 'वैष्णव' है। 'भगवान्'
पूर्ण-आविर्भाव तत्त्व हैं और 'ब्रह्म' असम्पूर्ण-आविर्भाव
तत्त्व है। जो केवल ब्राह्मण हैं, उनके मुखमें 'नामाभास'
[शुद्धनाम नहीं] उदित होते हैं। किन्तु जो ब्राह्मण
अद्वयज्ञान-तत्त्व विष्णुके साथ अपने सम्बन्धज्ञानको
जानकर भक्तिपूर्वक विष्णुसेवामें नियुक्त होते हैं, उनकी
उस सेवाको 'अभिधेय' कहते हैं। ऐसा भजन करनेसे
वे 'भागवत' अथवा 'वैष्णव' हो सकते हैं। तभी
अविद्यासे उत्पन्न 'कल्मष' अथवा 'अपराध' दूर होनेपर
उसके मुखमें शुद्धनाम उदित होते हैं।
निर्विशेषवादी विवर्त्तवादका अवलम्बन करके ब्रह्मकी
जिन पाँच प्रकारकी सगुण उपासनाकी कल्पना करते
हैं, वह कभी भी अद्वय-ज्ञानतत्त्वकी उपासना नहीं
होती। विवर्त्तवादी स्वयंमें 'ब्राह्मण' होनेका अभिमान
करके ऐसा मानते हैं कि सकाम अनुभूतिमें ही
'ब्राह्मणता' आबद्ध है, परन्तु जीवके स्वरूपमें 'ब्रह्मज्ञ'-धर्म
ही नित्य वर्तमान है। विष्णुकी कृपासे मायावादको छोड़
देनेपर ब्राह्मण ही 'शुद्ध ब्राह्मण' अथवा 'वैष्णव' बनता
है। इसलिये वैष्णवोंमें ब्राह्मणत्व नित्य ग्रथित है अर्थात्
वैष्णव स्वतः ही ब्राह्मण हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं।
गरुड़पुराणमें—
“ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।
सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः।
सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते ॥ ”
[अर्थात् “हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण
श्रेष्ठ है, सहस्र सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक
वेदान्तविद् ब्राह्मण श्रेष्ठ है, कोटि-कोटि वेदान्तविद्
ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णुभक्त श्रेष्ठ है।"]
इसलिये ब्राह्मण होनेकी योग्यताके बिना भक्तिपथमें
कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता।
वास्तविक ब्राह्मणके हृदयमें अद्वयज्ञान विद्यमान
रहनेके कारण उसकी नित्य-आराध्य विष्णु और
वैष्णवोंमें भेद बुद्धि नहीं होती। इसलिये उसमें अपनी
स्वार्थसिद्धि अथवा अपनी जड़ीय इन्द्रियोंके तर्पणकी
वाञ्छासे उत्पन्न मात्सर्य, ईर्ष्या अथवा द्वन्द्वभाव रह ही
नहीं सकता। जहाँ मात्सर्य आदि भाव विद्यमान होते
हैं, वहाँपर अच्युतात्माके अभावमें निश्चय ही (भाः
11/5/3)—“न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्-भ्रष्टाः पतन्त्यधः।”
अर्थात् अपने स्थानसे भ्रंश अथवा अधःपतन घटता
है॥ 274-277 ॥
अमोघकी उसी समय इह-रोग और भवरोगसे
मुक्ति और श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति :—
शुनि' 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' अमोघ उठिला।
प्रेमोन्मादे मत्त हञा नाचिते लागिला ॥ 278 ॥
44
पन्द्रहवाँ अध्याय 15/278-289 ]
अनुवाद—महाप्रभुकी बात सुनकर और उनके
स्पर्शसे अमोघ 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहते हुए उठ बैठा। वह
प्रेमोन्मादमें मत्त होकर नृत्य करने लगा॥ 278 ॥
अमोघके द्वारा महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा-प्रार्थना :-
कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद, स्वरभङ्ग।
प्रभु हासे देखि' तार प्रेमेर तरङ्ग ॥ 279 ॥
प्रभुर चरणे धरि' करये विनय।
“अपराध क्षम मोरे, प्रभु, दयामय ॥ 280 ॥
अपने द्वारा किये गये अपराधके स्मरणसे
अपने गालोंपर थप्पड़ मारना :-
एइ छार मुखे तोमार करिनु निन्दने।”
एत बलि' आपन गाले चड़ाय आपने ॥ 281 ॥
अनुवाद—नृत्य करते हुए अमोघमें कम्प, अश्रु,
पुलक, स्तम्भ, स्वेद और स्वरभङ्ग आदि सात्त्विक
भावोंको देखकर महाप्रभु हँसने लगे। अमोघ महाप्रभुके
चरणोंको पकड़कर दीनतापूर्वक कहने लगा,—“हे दयामय
प्रभो! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। इस घृणित मुखसे
मैंने आपकी निन्दा की है।” यह कहकर अमोघ अपने
हाथोंसे अपने गालोंपर थप्पड़ मारने लगा॥ 279-281 ॥
फूले हुए गालोंको देखकर श्रीगोपीनाथका उसे रोकना :-
चड़ाइते चड़ाइते गाल फुलाइल।
हाते धरि' गोपीनाथाचार्य निषेधिल ॥ 282 ॥
अनुवाद—थप्पड़ मारते-मारते अमोघने अपने गालोंको
फुला दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने उसका हाथ पकड़कर
उसे ऐसा करनेके लिये मना किया॥ 282 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसे सान्त्वना और श्रीभट्टाचार्यके
सम्बन्धके कारण स्नेह-आशीर्वाद :-
प्रभु आश्वासन करे स्पर्शि' तार गात्र।
“सार्वभौम-सम्बन्धे तुमि मोर स्नेहपात्र ॥ 283 ॥
शुद्धभक्त श्रीभट्टाचार्यके परिवारसे महाप्रभुकी प्रीति :-
सार्वभौम-गृहे दास-दासी, ये कुक्कुर।
सेह मोर प्रिय, अन्य जन रहु दूर ॥ 284 ॥
अमोघको श्रीकृष्णनाम लेनेका आदेश :-
अपराध नाहि तब, लओ कृष्णनाम।”
एत बलि' प्रभु आइला सार्वभौम-स्थान ॥ 285 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उसकी देहको स्पर्श करके उसे
आश्वासन दिया,—“सार्वभौमके सम्बन्धसे तुम मेरे स्नेहके
पात्र हो। जब सार्वभौमके घरके दास-दासी और यहाँ
तक कि जो कुत्ता है, वह भी मुझे प्रिय है, तब उनके
सम्बन्धियोंके विषयमें तो कहना ही क्या है। अब
तुम्हारा कोई अपराध नहीं रह गया, अब तुम
श्रीकृष्णके नामका कीर्तन करो।” यह कहकर महाप्रभु
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर आ गये॥ 283-285 ॥
श्रीभट्टाचार्यके निकट आकर महाप्रभुका बैठना :-
प्रभु देखि' सार्वभौम धरिला चरणे।
प्रभु ताँरे आलिङ्गिया बसिला आसने ॥ 286 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको देखकर श्रीसार्वभौमने उनके
चरण पकड़ लिये। तब महाप्रभुने उनका आलिङ्गन
किया और आसनपर बैठ गये ॥ 286 ॥
बालक तुल्य अमोघके अपराधके कारण
क्रोध अथवा उपवास अनावश्यक :-
प्रभु कहे,—“अमोघ शिशु, किवा तार दोष।
केने उपवास कर, केने कर रोष ॥ 287 ॥
भोजन करनेके लिये श्रीभट्टाचार्यसे अनुरोध :-
उठ, स्नान कर, देख जगन्नाथ-मुख।
शीघ्र आसि' भोजन कर, तबे मोर सुख ॥ 288 ॥
श्रीभट्टाचार्यके प्रसाद-सम्मान तक प्रतीक्षाकी प्रतिज्ञा :-
तावत् रहिब आमि एथाय बसिया।
यावत् ना पाइबा तुमि प्रसाद आसिया ॥” 289 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अमोघ तो बालक है,
इसमें उसका क्या दोष है? आप उपवास क्यों कर
रहे हैं? और आप क्रोध क्यों कर रहे हैं? अब उठो,
स्नान करो और जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथके मुखका
दर्शन करो। जल्दीसे लौटकर भोजन करो, तभी मैं
। 45
[ 15/287-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रसन्न होऊँगा। जब तक आप लौटकर प्रसाद पा नहीं
लेते, तब तक मैं यहींपर ही बैठा रहूँगा॥" 287-289॥
श्रीभट्टाचार्यका अमोघके लिये क्रोध-प्रदर्शन :-
प्रभु-पद धरि' भट्ट कहिते लागिला।
“मरित' अमोघ, तारे केने जीयाइला॥" 290॥
अनुवाद—महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर श्रीभट्टाचार्य
कहने लगे,—"अमोघ मर जाता तो अच्छा होता,
आपने उसे जीवित क्यों किया? ॥" 290॥
बालक-समझकर अमोघको क्षमा-करनेका उपदेश :-
प्रभु कहे,—"अमोघ शिशु, तोमार बालक।
बालक-दोष ना लय पिता, ताहाते पालक ॥ 291॥
अमोघके अपराध दूर होनेपर वैष्णवता-हेतु
श्रीभट्टाचार्यको प्रसन्न होनेके लिये अनुरोध :-
एबे 'वैष्णव' हैल, तार गेल 'अपराध'।
ताहार उपरे एबे करह प्रसाद॥" 292॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"अमोघ बालक है, और
आपका पुत्र भी है। पिता पुत्रके दोषको नहीं लेते,
क्योंकि वे तो पुत्रका पालन करनेवाले होते हैं। अब
अमोघ 'वैष्णव' बन गया है और उसका 'अपराध' दूर
हो गया है। अब आप निश्चिन्त होकर उसपर कृपा
कर सकते हैं॥" 291-292॥
श्रीभट्टाचार्यका क्रोध त्याग :-
भट्ट कहे,—"चल, प्रभु, ईश्वर-दरशने।
स्नान करि' हेथा मुञि आसिलाङ एखने॥" 293॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—"प्रभो, आप जाकर
श्रीजगन्नाथका दर्शन कीजिये। मैं भी अभी स्नान करके
वहाँ दर्शन करके वापिस आता हूँ॥" 293॥
श्रीभट्टाचार्यकी प्रसाद सेवाके दर्शनके लिये
श्रीगोपीनाथको प्रतीक्षा करनेके लिये आदेश :-
प्रभु कहे,—"गोपीनाथ, इहाञि रहिबा।
इँहो प्रसाद पाइले, वार्त्ता आमाके कहिबा ॥" 294॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"गोपीनाथजी, आप यहाँ
रहिये और श्रीसार्वभौमके प्रसाद पानेपर मुझे आकर
बता देना॥" 294॥
अनुभाष्य— इँहो'—सार्वभौम भट्टाचार्य ॥ 294॥
श्रीभट्टाचार्यका प्रसाद-सेवन :-
एत बलि' प्रभु गेला ईश्वर-दरशने।
भट्ट स्नान-स्मरण करि' करिला भोजने ॥ 295॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन
करनेके लिये चले गये। श्रीभट्टाचार्यने स्नान और
श्रीजगन्नाथका स्मरण किया तथा उसके बाद भोजन
ग्रहण किया ॥ 295॥
महाप्रभुके ऐकान्तिक भक्त महाशान्त-प्रकृति अमोघ :-
सेइ अमोघ हैल प्रभुर भक्त 'एकान्त'।
प्रेमे नाचे, कृष्णनाम लय महाशान्त ॥ 296॥
अनुवाद—वे अमोघ अब महाप्रभुके 'ऐकान्तिक'
भक्त हो गये, अब वे सब समय प्रेममें नृत्य करते और
शान्तिपूर्वक श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते॥ 296॥
अनुभाष्य—शाखा-निर्णयामृतमें—
“अमोघपण्डितं वन्दे श्रीगौरेणात्मसात्कृतम्।
प्रेमाद्गदसान्द्राङ्गं पुलकाकुलविग्रहम्॥”
[अर्थात् “मैं अमोघ पण्डितकी वन्दना करता हूँ
जिन्हें महाप्रभुने आत्मसात् किया था। महाप्रभुके द्वारा
स्वीकार किये जानेपर वे सदा ही प्रेममें डूबे रहते और
उसके कारण उनका कण्ठ गद्गद होना, शरीर पुलकित
होना आदि सात्त्विक विकार प्रकाशित होते थे।”] ॥ 296॥
महाप्रभुकी इस प्रकारकी लीला :-
ऐछे चित्र लीला करे शचीर नन्दन।
येइ देखे, सुने, ताँर विस्मय हय मन ॥ 297॥
अनुवाद—श्रीशचीनन्दन ऐसी विचित्र लीलाएँ करते
हैं। जो भी उनकी लीलाओंको देखता अथवा सुनता
है, वह आश्चर्यचकित हो जाता है॥ 297॥
46 ।
पन्द्रहवाँ अध्याय 15/298-302 ]
श्रीभट्टाचार्यके घरमें महाप्रभुका भोजन
और श्रीभट्टाचार्यकी महाप्रभुके प्रति प्रीति :-
ऐछे भट्ट-गृहे करे भोजन-विलास।
तार मध्ये नाना चित्र-चरित्र-प्रकाश ॥ 298 ॥
सार्वभौम-घरे एइ भोजन-चरित।
सार्वभौम-प्रेम याँहा हइला विदित ॥ 299 ॥
श्रीभट्टाचार्यकी पत्नीकी महाप्रभुके प्रति प्रीति,
भक्तके सम्बन्धसे अपराध-क्षमा :-
षाठीर मातार प्रेम, आर प्रभुर प्रसाद।
भक्त-सम्बन्धे याहा क्षमिल अपराध ॥ 300 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार श्रीभट्टाचार्यके घरपर
भोजनका आनन्द लिया। उस एक लीलामें उनकी
अनेक अद्भुत लीलाएँ प्रकाशित हुईं। श्रीभट्टाचार्यके
घरमें यह जो भोजन-लीला है, इसमें श्रीसार्वभौमका
श्रीकृष्णप्रेम जगत्में प्रकाशित हुआ। और भी इसके
द्वारा षाठीकी माताका प्रेम और अमोघको क्षमादान
देनेसे महाप्रभुकी कृपा प्रकाशित हुई है। भक्तके
सम्बन्धसे अमोघके अपराधके लिये क्षमा करनेसे
उनकी भक्तवत्सलता प्रकाशित हुई है ॥ 298-300 ॥
अनुभाष्य—अमोघ महाप्रभुकी निन्दा करनेपर
अपराधी हुआ था। अपराधके फलसे उसे प्राण
हरनेवाला हैजाका रोग हुआ था। रोगग्रस्त होनेके बाद
अमोघको अपराध दूर करनेका सुयोग प्राप्त नहीं हुआ।
श्रीसार्वभौम और उनकी पत्नी महाप्रभुकी अत्यन्त
कृपाके पात्र थे। उनके सम्बन्धसे महाप्रभुने इस
अपराधी अमोघको दण्ड देनेके बदले उसके अपराधको
क्षमा किया और उसके प्राणोंकी रक्षा करके श्रीकृष्णभक्ति
प्रदान की। महाप्रभुके प्रति श्रीसार्वभौमकी पत्नीका
प्रगाढ़ भक्तिपूर्ण सम्बन्ध था। बाहरी दृष्टिसे श्रीसार्वभौम
अपने दामाद अमोघके पालन करनेवाले थे; इसलिये
अमोघके अपराधको क्षमा न करनेपर उसके पालक
श्रीसार्वभौमको ही गौण रूपसे दण्ड देना हो जाता। इसी
कारणसे उसे क्षमा करके महाप्रभुने अपने ऐश्वर्य,
गाम्भीर्य और औदार्यको प्रकाशित किया ॥ 300 ॥
पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीभट्टाचार्यके घरमें भोजन लीलाके
श्रवणसे श्रीचैतन्यकी प्राप्ति :-
श्रद्धा करि' एइ लीला सुने येइ जन।
अचिरात् पाय से चैतन्य-चरण ॥ 301 ॥
अनुवाद—जो कोई भी श्रद्धापूर्वक इस लीलाका
श्रवण करता है, उसे तत्क्षणात् ही श्रीचैतन्य-चरणोंकी
प्राप्ति हो जाती है ॥ 301 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 302 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सार्वभौमगृहे भोजनविलासो
नाम पञ्चदश-परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 302 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें सार्वभौमगृहमें
भोजन-विलास नामक पन्द्रहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 47
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
48 ।
सोलहवाँ अध्याय
कथासार—महाप्रभुके द्वारा वृन्दावन जानेकी इच्छा
करनेपर श्रीरामानन्द और श्रीसार्वभौम अनेक प्रकारकी
बाधाएँ उत्पन्न करने लगे। क्रमशः गौड़ीय-भक्त तीसरे
वर्ष नीलाचल आये। इस बार वैष्णवोंकी पत्नियाँ
श्रीमन्महाप्रभुको अपने वासस्थानपर निमन्त्रण करनेके
लिये उनकी प्रिय बहुत सी खाद्य-वस्तुओंको बङ्गालसे
लायी थीं। उन सबके श्रीक्षेत्रमें पहुँचनेपर महाप्रभुने
मालायें भेजकर उनका सम्मान किया। उस वर्ष भी
गुण्डिचा मन्दिरमें सफाईका कार्य पहलेकी भाँति हुआ।
चातुर्मास्यके सम्पूर्ण होनेपर भक्तगण बङ्गाल जाने लगे।
महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रत्येक वर्ष नीलाचलमें
आनेसे मना किया। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नानुसार
उन्होंने पुनः वैष्णवके लक्षणके विषयमें बतलाया। इस
वर्ष श्रीविद्यानिधिने नीलाचलमें रहकर 'ओड़नषष्ठी'का
दर्शन किया। भक्तोंके विदा होनेपर महाप्रभुने वृन्दावन
जानेकी दृढ़ता प्रकाशित की और विजया-दशमीके दिन
प्रस्थान किया। राजा प्रतापरुद्रने महाप्रभुके जानेवाले
मार्गमें अनेक प्रकारकी व्यवस्था की थी। चित्रोत्पला
नदी पार होनेपर श्रीरामानन्द, मङ्गराज (मरदराज ?)
और हरिचन्दन महाप्रभुको साथ लेकर चले। महाप्रभुने
श्रीगदाधर पण्डितको नीलाचल लौट जानेका अनुरोध
किया, परन्तु उन्होंने वह सुना नहीं। कटकसे महाप्रभुने
श्रीपण्डित गोस्वामीको शपथ देकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें
भेजा और भद्रकसे श्रीरामानन्दको विदायी दी। (उसके
बाद) उड़ीसाकी सीमापर पहुँचकर महाप्रभु नौकाके द्वारा
यवन अधिकारीकी सहायतासे पाणिहाटि तक गये।
उसके बाद महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरसे कुमारहट्ट
होकर कुलिया-ग्राममें आये। महाप्रभुने वहाँ अनेक
लोगोंके अपराधोंको दूर किया। वहाँसे रामकेलिमें
जाकर श्रीरूप और श्रीसनातनको अङ्गीकार किया।
रामकेलिसे लौटकर श्रीरघुनाथदासको शिक्षा देकर वापिस
घरमें भेजा। पुनः नीलाचलमें आकर महाप्रभु अकेले
वृन्दावन जानेका परामर्श करने लगे।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गौड़देशमें जाकर लोगोंके उद्धारमें रत श्रीगौरसुन्दर :-
गौड़ोद्यानं गौरमेघः सिञ्चन् स्वालोकनामृतैः।
भवाग्निदग्धजनता-वीरुधः समजीवयत्॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़देशरूपी उद्यानमें गौररूप
मेघने अपनी दर्शनामृतरूपी वर्षाके द्वारा भवाग्निमें दग्ध
जनतारूपी लताको जीवित किया था॥1॥
अनुभाष्य—
गौरमेघः (श्रीगौरजलधरः) स्वालोकनामृतैः (निजदर्शनसुधाभिः)
गौड़ोद्यानं (गौड़देशरूपम् उद्यानं) सिञ्चन् (वर्षन्) भवाग्निदग्धजनता-
वीरुधः (संसारदाव-वह्निना दग्धाः याः जनताः लोकपुञ्जाः ता
एव वीरुधः लताः ताः) समजीवयत् (जीवयामास)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥
अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी
जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय
हो॥2॥
महाप्रभुकी वृन्दावन जानेकी इच्छा; राजाका विषाद :-
प्रभुर हइल इच्छा याइते वृन्दावन।
शुनिया प्रतापरुद्र हइला विमन॥3॥
अनुवाद—महाप्रभुकी वृन्दावन जानेकी इच्छा हुई
है, इसे सुनकर राजा प्रतापरुद्रका मन उदास हो
गया॥3॥
। 49
[ 16/4-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायको बुलाकर महाप्रभुको
नहीं जाने देनेके लिये प्रार्थना :-
सार्वभौम, रामानन्द, आनि' दुइ जन।
दुँहाके कहेन राजा विनय-वचन ॥ 4 ॥
“नीलाद्रि छाड़ि' प्रभुर मन अन्यत्र याइते।
तोमरा करह यत्न ताँहारे राखिते ॥ 5 ॥
ताँहा बिना एइ राज्य मोर नाहि भाय।
गोसाञि राखिते करह नाना उपाय॥” 6 ॥
अनुवाद-राजाने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द
राय, इन दोनोंको अपने पास बुलवाकर दीनतापूर्वक
कहा,-“महाप्रभुका मन नीलाचलको छोड़कर कहीं
और जानेका है। आप दोनों कृपया उन्हें यहींपर ही
रखनेका प्रयास कीजिये। महाप्रभुके बिना यह राज्य
मुझे नहीं सुहाता, इसलिये श्रीचैतन्य गोसाईंको यहींपर
रखनेका सब प्रकारके उपाय कीजिये॥” 4-6 ॥
महाप्रभुका वृन्दावन जानेके लिये श्रीराय और
श्रीभट्टाचार्यके साथ परामर्श :-
रामानन्द, सार्वभौम, दुइजना-स्थाने।
तबे युक्ति करे प्रभु, -'याब वृन्दावने' ॥ 7 ॥
अनुवाद-इसके बाद स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द
और श्रीसार्वभौमके साथ परामर्श करते हुए कहा,-'मैं
वृन्दावन जाऊँगा॥' 7 ॥
वियोगके भयसे दोनोंका महाप्रभुको वृन्दावनकी
बात भुलाकर वहाँ जानेसे मना करना :-
दुँहे कहे,-“रथयात्रा कर दरशन।
कार्त्तिक आइले, तबे करिह गमन ॥” 8 ॥
कार्त्तिक आइले कहे, - “एबे महा-शीत।
दोलयात्रा देखि' याओ-एइ भाल रीत।” 9 ॥
आजि-कालि करि' उठाय विविध उपाय।
याइते सम्मति ना देय विच्छेदेर भय ॥ 10 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द
राय, दोनोंने कहा, -“आप अभी यहीं रहकर रथ-यात्राका
दर्शन कीजिये। कार्तिक मासके आनेपर ही वृन्दावन
जाना।” जब कार्तिक मास आया, तब उन्होंने कहा,-
“अभी तो बहुत अधिक सर्दी है, आप दोलयात्राके
दर्शन करके जाना। यही अच्छा होगा।” आज-कल
करके वे बहुत प्रकारके उपाय निकालते और वियोगके
भयसे महाप्रभुको जानेकी सम्मति नहीं देते ॥ 8-10 ॥
भगवान् स्वतन्त्र होनेपर भी भक्तके वशीभूत :-
यद्यपि स्वतन्त्र प्रभु, नहे निवारण।
भक्त-इच्छा बिना प्रभु ना करे गमन ॥ 11 ॥
अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु स्वतन्त्र हैं, उन्हें कोई
रोक नहीं सकता, तो भी भक्तकी इच्छाके बिना वे
कभी नहीं जाते॥ 11 ॥
तीसरे वर्ष गौड़ीय भक्तोंकी महाप्रभुके
दर्शन करनेकी इच्छा :-
तृतीय वत्सरे सब गौड़ेर भक्तगण।
नीलाचले चलिते सबार हैल मन ॥ 12 ॥
अनुवाद-तीसरे वर्ष भी गौड़देशके सभी भक्तोंका
नीलाचल जानेका मन हुआ ॥ 12 ॥
सभीका श्रीअद्वैताचार्यके पास
जाना और श्रीअद्वैतकी पुरी-यात्रा :-
सबे मेलि' गेला अद्वैत-आचार्येर पाशे।
प्रभु देखिते आचार्य चलिला उल्लासे ॥ 13 ॥
अनुवाद-सभी भक्त मिलकर श्रीअद्वैताचार्यके पास
गये और श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके दर्शनके लिये उल्लसित
होकर चल पड़े॥ 13 ॥
महाप्रभुके मना करनेपर भी महाप्रभु-प्रेमिक
श्रीनिताइकी महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरी-यात्रा :-
यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़ेते रहिते।
नित्यानन्द-प्रभुके प्रेमभक्ति प्रकाशिते ॥ 14 ॥
50 ।
सोलहवाँ अध्याय 16/14-23 ]
तथापि चलिला महाप्रभुरे देखिते।
नित्यानन्देर प्रेम-चेष्टा के पारे बुझिते ॥ 15 ॥
अनुवाद- यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको
प्रेमभक्तिका प्रचार करनेके लिये बङ्गालमें रहनेकी ही
आज्ञा दी थी, तथापि वे महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल
पड़े। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रेममयी चेष्टाओंको कौन
समझ सकता है? ॥ 14-15 ॥
गौड़ीय-भक्तोंकी यात्रा :-
आचार्यरत्न, विद्यानिधि, श्रीवास, रामाइ।
वासुदेव, मुरारि, गोविन्दादि तीन भाइ ॥ 16 ॥
पाणिहाटीके श्रीराघव, कुलीनग्रामके
श्रीसत्यराजादिका गमन :-
राघव-पण्डित निज-झालि साजाञा।
कुलीन-ग्रामवासी चले पट्टडोरी लञा ॥ 17 ॥
खण्डसे श्रीनरहरि आदिकी यात्रा :-
खण्डवासी नरहरि, श्रीरघुनन्दन।
सर्वभक्त चले, तार के करे गणन ॥ 18 ॥
अनुवाद- श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि, श्रीवास, श्रीरामार्इ,
श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि, श्रीगोविन्दादि (श्रीगोविन्द, श्रीमाधव
और श्रीवासुदेव) - ये तीनों भाई, श्रीराघव पण्डित
महाप्रभुके लिये खानेकी बहुतसी वस्तुओंको झोलियोंमें
भरकर और कुलीन-ग्रामवासी रेशमी रस्सियोंको लेकर
चल दिये। खण्डवासी श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन तथा
अन्य सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये चलने लगे।
कौन उन सबकी गणना कर सकता है? ॥ 16-18 ॥
पथको जाननेवाले श्रीशिवानन्द-सेन सभीके संरक्षक और
परिचालकके रूपमें :-
शिवानन्द-सेन करे घाटि समाधान।
सबारे पालन करि' सुखे लञा यान ॥ 19 ॥
सबार सर्वकार्य करेन, देन वासा-स्थान।
शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥ 20 ॥
अनुवाद- श्रीशिवानन्द सेनने मार्गके और नदी पार
करनेके सब शुल्कका भुगतान किया। सभीकी
सुख-सुविधाका ध्यान रखते हुए आनन्दसे उनको ले
जा रहे थे। वे सभीके समस्त कार्योंको कर देते और
उन्हें रहनेका स्थान प्रदान करते। वे उड़ीसाके मार्गके
विषयमें सब कुछ जानते थे ॥ 19-20 ॥
अनुभाष्य - 'घाटी-समाधान' - धनकी कमीकी पूर्ति
अथवा निर्दिष्ट पथ और नदीघाटको पार करनेके लिये
यात्रियोंके द्वारा दिये जानेवाले शुल्कको चुकाना ॥ 19 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये वैष्णव-गृहिणियोंका गमन :-
(1) श्रीअद्वैतपत्नीकी यात्रा :-
से वत्सर प्रभु देखिते सब ठाकुराणी।
चलिला आचार्य-सङ्गे अच्युत-जननी ॥ 21 ॥
अनुवाद- उस वर्ष महाप्रभुके दर्शनके लिये सभी
भक्तोंकी पत्नियाँ भी उनके साथ आयीं। श्रीअद्वैताचार्यके
साथ उनकी पत्नी सीतादेवी, अच्युतकी माता, भी चल
पड़ीं ॥ 21 ॥
(2) श्रीवासकी पत्नी और
(3) श्रीशिवानन्दकी पत्नीकी यात्रा :-
श्रीवास-पण्डित-सङ्गे चलिला मालिनी।
शिवानन्द-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी ॥ 22 ॥
अनुवाद- श्रीवास पण्डितके साथ उनकी पत्नी
श्रीमालिनी और श्रीशिवानन्द सेनके साथ उनकी पत्नी
भी चलने लगीं ॥ 22 ॥
शिवानन्दके पुत्र श्रीचैतन्यदासकी यात्रा :-
शिवानन्देर बालक, नाम-चैतन्यदास।
तैँहो चलियाछे प्रभुरे देखिते उल्लास ॥ 23 ॥
अनुवाद- श्रीशिवानन्द सेनके पुत्र, जिनका नाम
चैतन्यदास था, वे भी बड़े उल्लाससे महाप्रभुके दर्शनके
लिये चल पड़े ॥ 23 ॥
। 51
[ 16/24-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(4) श्रीचन्द्रशेखरकी पत्नीकी यात्रा :-
आचार्यरत्न-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी।
ताँहार प्रेमेर कथा कहिते ना जानि ॥ 24 ॥
अनुवाद—श्रीआचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर)के साथ उनकी
पत्नी भी चल रही थीं। महाप्रभुके प्रति श्रीचन्द्रशेखरके
प्रेमकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 24 ॥
महाप्रभुकी सेवाके उद्देश्यसे साथमें उनको
प्रिय लगनेवाली वस्तुओंको लेना :-
सब ठाकुरानी महाप्रभुके भिक्षा दिते।
प्रभुर नाना प्रिय द्रव्य निल घर हैते ॥ 25 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंकी पत्नियोंने महाप्रभुको खानेमें
प्रिय लगनेवाली बहुतसी वस्तुओंको अपने घरसे ले
लिया ॥ 25 ॥
श्रीशिवानन्दके द्वारा सभी कार्योंका सम्पादन :-
शिवासेन-सेन करे सब समाधान।
घाटियाल प्रबोधि' देन सबारे वासा-स्थान ॥ 26 ॥
भक्ष्य दिया करेन सबार सर्वत्र पालने।
परम आनन्दे यान प्रभुर दरशने ॥ 27 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन मार्गका शुल्क लेनेवालोंको
मधुर वचन बोलकर प्रसन्न करते और सभी भक्तोंके
रहनेके स्थानकी व्यवस्था करते। पूरी यात्रामें सबको
भोजन करवाते और उनका ध्यान रखते हुए वे
परमानन्दसे महाप्रभुके दर्शनोंके लिये जा रहे थे॥ 26-27 ॥
अनुभाष्य—'घाटियाल'—मार्गदर्शक; ये यात्रियोंसे
अन्यायपूर्वक अवैध रूपसे अधिक धन संग्रह करते थे;
शिवानन्द उनसे वैध शुल्कसे अधिक धन न लेनेका
अनुरोध करते ॥ 26 ॥
रेमुणामें सभीका श्रीगोपीनाथ-दर्शन, श्रीमाधवपुरीके
अनुसरणमें श्रीअद्वैतका नृत्य-कीर्तन :-
रेमुणाय आसिया कैल गोपीनाथ-दरशन।
आचार्य करिल ताँहा कीर्त्तन, नर्त्तन ॥ 28 ॥
अनुवाद—रेमुणामें आकर सभीने श्रीक्षीरचोरा-
गोपीनाथका दर्शन किया। श्रीअद्वैताचार्यने वहाँ कीर्तन
और नृत्य किया ॥ 28 ॥
पूर्व परिचयके कारण सेवकोंके द्वारा
श्रीनित्यानन्दका अभिनन्दन :-
नित्यानन्देर परिचय सब लोक-सने।
बहुत सम्मान आसि' कैल सेवकगणे ॥ 29 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुका वहाँके सभी लोगोंके
साथ पहलेका परिचय था, श्रीगोपीनाथके सेवकोंने
आकर उनका बहुत सम्मान किया ॥ 29 ॥
सभीका वहाँ रात्रि व्यतीत करना
और खीर प्रसादका सम्मान करना :-
सेइ रात्रि सब महान्त ताहारि रहिला।
बार क्षीर आनि' आगे सेवक धरिला ॥ 30 ॥
क्षीर बाँटि' सबारे दिल प्रभु-नित्यानन्द।
क्षीर-प्रसाद पाञा सबार बाड़िल आनन्द ॥ 31 ॥
अनुवाद—उस रात्रि सभी महान् भक्त वहीं मन्दिरमें
ही रहे। श्रीगोपीनाथके सेवकोंने बारह खीरके कुल्हड़
लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आगे रख दिये। श्रीनित्यानन्द
प्रभुने उस खीरको सभीमें बाँट दिया। खीर प्रसाद
पाकर सभीका आनन्द बढ़ गया ॥ 30-31 ॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीगोपालका और
श्रीगोपीनाथके आगमनके वृत्तान्तका वर्णन :-
माधवपुरीत कथा, गोपाल-स्थापन।
ताँहारे गोपाल यैछे मागिल चन्दन ॥ 32 ॥
पिछली यात्रामें महाप्रभुके श्रीमुखसे सुनी
कथाका वर्णन; भक्तोंको हर्ष :-
ताँर लागि' गोपीनाथ क्षीर चुरि कैल।
महाप्रभुर मुखे आगे ए कथा शुनिल ॥ 33 ॥
सेइ कथा सबार मध्ये कहे नित्यानन्द।
शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥ 34 ॥
52 ।
सोलहवाँ अध्याय 16/32-41]
अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कथा, उनके द्वारा
गोवर्धनमें श्रीगोपालकी स्थापना, श्रीगोपालके द्वारा उनसे
चन्दन माँगना और उनके लिये श्रीगोपीनाथके द्वारा
खीरकी चोरी करना—ये सब कथाएँ जो श्रीनित्यानन्द
प्रभुने पहले महाप्रभुके मुखसे सुनी थीं, उन्होंने सभी
भक्तोंको उन कथाओंका श्रवण कराया। इन कथाओंको
सुनकर वैष्णवोंके मनमें आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 32-34 ॥
अनुभाष्य—'महाप्रभु मुखे'—महाप्रभुने पहले श्रीपाद
ईश्वरीपुरीके मुखसे श्रवण किया था (मध्यलीला 4/18
संख्या); [संन्यास लेनेके बाद] शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके
घरपर कुछ दिन रहनेके पश्चात् महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द,
श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्दके साथ
नीलाचल जानेके मार्गमें रेमुणा आकर उन्हें—श्रीमाधवेन्द्रपुरी,
वृन्दावनके श्रीगिरिधारी-गोपाल और रेमुणाके श्रीक्षीरचोरा-
गोपीनाथके उपाख्यानका वर्णन किया था। (मध्यलीला
4/19-190 संख्या देखें) ॥ 32-34 ॥
सभीका कटकमें आगमन, साक्षिगोपाल-दर्शन और
श्रीनिताइके द्वारा साक्षिगोपालकी कहानीका वर्णन :-
एइमत चलि' चलि' कटक आइला।
साक्षिगोपाल देखि' सबे से दिन रहिला ॥ 35 ॥
साक्षिगोपालेर कथा कहे नित्यानन्द।
शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥ 36 ॥
अनुवाद—इस प्रकार चलते-चलते सभी भक्त
कटक आ पहुँचे और वहाँ श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन
करके वे उस दिन वहीं रहे। श्रीनित्यानन्द प्रभुने
श्रीसाक्षिगोपालकी कथा सुनायी, जिसे सुनकर वैष्णवोंके
मनका आनन्द और बढ़ गया ॥ 35-36 ॥
अनुभाष्य—'साक्षिगोपालकी कथा'—मध्यलीला 5/8-138
संख्या देखें ॥ 36 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये व्यग्र सभीका
द्रुत-गतिसे पुरीमें आगमन :-
प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठा अन्तर।
शीघ्र करि' आइला सबे श्रीनीलाचल ॥ 37 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंके हृदयमें महाप्रभुसे मिलनेकी
उत्कण्ठा थी, इसलिये वे शीघ्रतासे श्रीनीलाचल पहुँच
गये ॥ 37 ॥
गौड़ीय-भक्तोंके आठारनालामें आगमनके संवादको
सुनकर भक्तोंकी अगवानीके लिये महाप्रभुके द्वारा
श्रीगोविन्दके हाथसे मालायें भेजना :-
आठारनालाके आइला गोसाञि शुनिया।
दुइ माला पाठाइला गोविन्द-हस्त दिया ॥ 38 ॥
अनुवाद—जब श्रीचैतन्य गोसाईंने सुना कि भक्त
आठारनाला आ पहुँचे हैं, तब उन्होंने श्रीगोविन्दके
हाथसे दो मालायें भिजवायीं ॥ 38 ॥
अनुभाष्य—'आठारनाला'—श्रीपुरुषोत्तम-नगरकी एक
सीमापर विशेष पुल ॥ 38 ॥
श्रीनिताइ और श्रीअद्वैतका माला ग्रहण करना :-
दुइ माला गोविन्द दुइजने पराइल।
अद्वैत, अवधूत-गोसाञि बड़ सुख पाइल ॥ 39 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने वे दो मालाएँ श्रीअद्वैताचार्य
और श्रीनित्यानन्द प्रभुके गलेमें पहनायीं और वे दोनों
बहुत प्रसन्न हुए ॥ 39 ॥
सभीका वहींसे चलते हुए नृत्य-कीर्तन-आरम्भ :-
ताहानि आरम्भ कैल कृष्ण-सङ्कीर्त्तन।
नाचिते नाचिते चलि' आइला दुइजन ॥ 40 ॥
अनुवाद—वहींसे ही सभीने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन करना
आरम्भ कर दिया। श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द
प्रभु, दोनों नाचते-नाचते हुए चलने लगे ॥ 40 ॥
श्रीस्वरूपादिके द्वारा महाप्रभुका फिरसे मालायें भेजना :-
पुनः माला दिया स्वरूपादि निजगुणे।
आगु बाड़ि' पाठाइल शचीर नन्दने ॥ 41 ॥
अनुवाद—श्रीशचीनन्दनने भक्तोंके स्वागतके लिये
पुनः श्रीस्वरूपादि निजगणोंको मालायें देकर आगे
भेजा ॥ 41 ॥
। 53
[ 16/42–50 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नरेन्द्र सरोवरपर मिलकर सभीको माला देना :—
नरेन्द्र आसिया, ताँहा सबारे मिलिला।
महाप्रभुर दत्त माला सबारे पराइला॥ 42॥
अनुवाद—वे नरेन्द्र सरोवरपर गौड़देशसे आनेवाले
सभी भक्तोंसे मिले और उन्होंने उन सबको महाप्रभुके
द्वारा भेजी मालायें पहनायीं॥ 42॥
स्वयं सिंहद्वारपर आकर सभी
भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन :—
सिंहद्वार-निकटे आइला शुनि' गौरराय।
आपने आसिया प्रभु मिलिला सबाय॥ 43॥
अनुवाद—'भक्तजन सिंहद्वारके निकट आ गये
हैं'—ऐसा सुनकर श्रीगौरराय स्वयं आकर सभी भक्तोंसे
मिले॥ 43॥
जगन्नाथ-दर्शनके बाद सभी भक्तोंके
साथ वासस्थानपर आगमन :—
सबा लञा कैल जगन्नाथ-दरशन।
सबा लञा आइला पुनः आपन-भवन॥ 44॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सभीको अपने साथ लेकर
श्रीजगन्नाथके दर्शन किये। उसके बाद सभी भक्तोंको
साथमें लेकर वे अपने वासस्थानपर आये॥ 44॥
सभीको श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्रके
द्वारा लाया गया प्रसाद खिलाना :—
वाणीनाथ, काशीमिश्र प्रसाद आनिल।
स्वहस्ते सबारे प्रभु प्रसाद खाओयाइल॥ 45॥
अनुवाद—श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्र भगवान्
श्रीजगन्नाथका प्रसाद लेकर आये और महाप्रभुने स्वयं
अपने हाथोंसे सभीको प्रसाद परोसा॥ 45॥
सभीको पूर्ववर्षकी भाँति, निर्दिष्ट वास-स्थानादि देना :—
पूर्व-वत्सरे याँर येइ वासा-स्थान।
ताँहा सबा पाठाञा कराइल विश्राम॥ 46॥
अनुवाद—पिछले वर्ष जिस भक्तका जो वासस्थान
था, इस वर्ष भी महाप्रभुने उसे वही स्थान दिया। तब
महाप्रभुने सबको वहाँ विश्राम करनेके लिये भेज
दिया॥ 46॥
भक्तोंका महाप्रभुके साथ पुरीमें चार मास रहना :—
एइमत भक्तगण रहिला चारिमास।
प्रभुर सहित करे कीर्त्तन-विलास॥ 47॥
अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंने चार मास तक
वहीं रहकर महाप्रभुके साथ कीर्त्तनका आनन्द लिया॥ 47॥
रथयात्राके समय सभीके द्वारा गुण्डिचा-मार्जन :—
पूर्ववत् रथयात्रा-काल यबे आइल।
सबा लञा गुण्डिचा-मन्दिर प्रक्षालिल॥ 48॥
अनुवाद—पहलेकी भाँति जब रथयात्राका समय
आया, तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर
गुण्डिचा-मन्दिरकी धुलाई की॥ 48॥
महाप्रभुके आदेशानुसार श्रीसत्यराजादिका
श्रीजगन्नाथके लिये रेशमी रस्सियाँ देना :—
कुलीनग्रामी पट्टडोरी जगन्नाथे दिल।
पूर्ववत् रथ-अग्रे नर्त्तन करिल॥ 49॥
अनुवाद—कुलीनग्रामवासी भक्तोंने अपने साथ लायी
हुई रेशमी रस्सियाँ श्रीजगन्नाथके लिये दीं। पहलेकी भाँति
सभीने रथके आगे नृत्य किया॥ 49॥
रथके आगे नृत्यके बाद सभीका उपवनमें विश्राम :—
बहु नृत्य करि' पुनः चलिल उद्याने।
वापी-तीरे ताँहा याइ' करिल विश्रामे॥ 50॥
अनुवाद—बहुत नृत्य करनेके बाद सभी उद्यानमें
चले गये। वहाँ सरोवरके तटपर पहुँचकर सबने विश्राम
किया॥ 50॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'वापी'—कुआँ (?), जलाशय॥ 50॥
अनुभाष्य—'उद्याने'—जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें;
'वापी-तीरे'—नरेन्द्र सरोवरके तटपर॥ 50॥
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