श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
बाइसवाँ अध्याय 22/164-165 ]
साधनभक्तिके श्रवणसे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अभिधेय-
अभिधेय साधनभक्ति सुने येइ जन। भक्तितत्त्वविचारो नाम द्वाविंशः परिच्छेदः।
अचिरात् पाय सेइ कृष्णप्रेमधन॥ 164॥ अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
अनुवाद-जो भी व्यक्ति इस अभिधेय साधनभक्तिके कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
विषयमें सुनता है, उसे अतिशीघ्र श्रीकृष्णप्रेमधनकी वर्णन कर रहा है॥ 165 ॥
प्राप्ति होती है॥ 164॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें अभिधेयभक्तितत्त्वविचार-
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 165 ॥ नामक बाइसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 375
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
376 ।
तेइसवाँ अध्याय
कथासार—महाप्रभुने इसके बाद श्रीसनातनसे भावके
लक्षण, प्रेमके और प्रेमके उत्पन्न होनेके लक्षण और
उदित-भाव (जिनमें भाव उदित हो गया है, ऐसे)
व्यक्तियोंके व्यवहार-लक्षण वर्णन करके प्रेम जिस
क्रमसे 'महाभाव' होता है, उसका तथा पाँच प्रकारकी
रतिकी व्याख्यासे उस-उस रसकी व्याख्या, रसकी
स्थिति और शृङ्गार रसका सर्वोत्कर्ष संस्थापन एवं
उसके स्वकीय-परकीय-भेदसे विविध होनेका वर्णन
किया। महाप्रभुने श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंकी व्याख्या,
राधिकाके पच्चीस गुणोंकी व्याख्या और श्रीकृष्णभक्तिरसके
अधिकारीका स्वरूप और अष्टाङ्ग-लक्षणोंका वर्णन
किया। महाप्रभुने श्रीसनातनको भागवतके गूढ़ सिद्धान्त,
हरिवंशमें लिखित गोलोककी नित्यलीला, केशावतारकी
विरुद्ध-व्याख्या और शुद्ध व्याख्या—इन समस्त शिक्षाओंको
प्रदान करके श्रीसनातनके मस्तकपर हस्त अर्पण करके
उनमें शक्तिका सञ्चार किया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
अनर्पितचर-नामप्रेमप्रदाता महावदान्य श्रीगौरको प्रणाम :—
चिरादत्तं निज-गुप्तवित्तं
स्वप्रेम-नामामृतमत्युदारः।
आपामरं यो विततार गौरः
कृष्णो जनेभ्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अपने प्रेमनामामृतरूपी गुप्त
धन,—जिसे इससे पूर्व और किसीको भी नहीं दिया
गया था, उसे ही—अति उदार स्वभाववाले जिन
श्रीगौरकृष्णने आ-पामर (पवित्रसे लेकर पतित तक,
सभी) व्यक्तियोंको वितरण किया था, उनके प्रति मैं
शरणागत होता हूँ॥1॥
अनुभाष्य—
अत्युदारः (महावदान्यः) यः गौरः कृष्णः चिरात् अदत्तम्
(अनर्पितचरं) निजगुप्तवित्तं (स्वकीय-गूढ़रहस्यात्मकधनं)
स्वप्रेमनामामृतम् आपामरं (साध्वसाध्वधिकार-निर्विशेषेण) जनेभ्यः
विततार (अर्पयामास), तं (गौरकृष्णम्) अहं प्रपद्ये (शरणं
यामि)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द
प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर-
भक्तोंकी जय हो॥2॥
श्रीसनातन-शिक्षा—(3) प्रयोजन (श्रीकृष्णप्रेम)-वर्णन :—
अभिधेय 'साधनभक्ति'के फलसे प्रयोजनरूप 'साध्य'-
प्रेमभक्ति :—
“एबे शुन भक्तिफल ‘प्रेम’ प्रयोजन।
याहार श्रवणे हय भक्तिरस-ज्ञान ॥ 3 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अब तुम
भक्तिके फल 'प्रेम'रूपी प्रयोजनके विषयमें सुनो। जिसे
सुननेसे भक्तिरसका ज्ञान होता है॥3॥
भाव अथवा रति—प्रेमकी तरल अथवा अङ्कुरावस्था; गाढ़
अथवा पक्व अवस्थामें वही 'प्रेम' :—
कृष्णे रति गाढ़ हैले 'प्रेम'-अभिधान।
कृष्णभक्ति-रसेर सेइ 'स्थायिभाव'-नाम ॥ 4 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति रतिके गाढ़ होनेपर वह
। 377
[ 23/4-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
‘प्रेम’ कहलाती है। उस प्रेमको श्रीकृष्णभक्ति रसका
‘स्थायीभाव’ कहते हैं॥4॥
भावकी संज्ञा; स्वरूप और तटस्थ-लक्षण :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/1)—
शुद्धसत्त्वविशेषात्मा प्रेम-सूर्यांशु-साम्यभाक्।
रुचिभिश्चित्तमासृण्यकृदसौ भाव उच्यते ॥5॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥5॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमसूर्यका (जो) किरण-स्थानीय
विशुद्धसत्त्वस्वरूप है, (और) रुचिके द्वारा चित्तको जो
तत्त्व द्रवीभूत करता है, उसको ही ‘भाव’ कहते
हैं॥5॥
अनुभाष्य—
शुद्धसत्त्वविशेषात्मा (भगवतः कृष्णस्य सर्वप्रकाशक-
संविदाख्य-स्वरूपशक्तिवृत्तिरूपः शुद्धसत्त्वविशेषः, स एव आत्मा
तन्नित्यप्रियजनाधिष्ठानतया नित्यसिद्धं स्वरूपं यस्य सः)
प्रेमसूर्यांशु-साम्यभाक् (प्रेमरूप-सूर्यकिरणसादृश्ययुक्तः—प्रेमणः अत्र
प्रथमच्छविरूपः) रुचिभिः (प्राप्त्यभिलाष-सकर्त्तृकानुकूल्याभिलाष-
सौहार्द्दाभिलाषैः) चित्तमासृण्यकृत् (चित्तार्द्रता-सम्पादकः) असौ
भावः (प्रेमाङ्कुररूपः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वप्रकाशक
संवित् नामक जो स्वरूपकी वृत्ति है, वह शुद्धसत्त्वविशेष
ही प्रेमाभक्तिका आश्रय या आत्मा है। यह प्रेम
श्रीकृष्णके नित्य प्रियजनोंमें स्थित रहता है, अतः प्रेमका
स्वरूप नित्यसिद्ध है। ऐसे प्रेमरूप सूर्यकी किरणोंके
समान भाव माना गया है। निष्कर्षतः भाव प्रेमकी प्रथम
छविरूप है। वह प्रियकी प्राप्तिकी अभिलाषा, उस प्राप्ति
हो जानेपर प्राप्तिसे उत्पन्न (सकर्त्तृक) आनुकूल्यकी
अभिलाषा और सौहार्दकी अभिलाषा, इन तीन रुचियोंसे
सामाजिकके चित्तमें आर्द्रता सम्पादित कर देता है, इसी
प्रेमाङ्कुरको भाव कहते हैं॥5॥
प्रेमके लक्षणका वर्णन :—
एइ दुइ,—भावेर 'स्वरूप', 'तटस्थ' लक्षण।
प्रेमेर लक्षण एबे शुन, सनातन ॥6॥
अनुवाद—भावके ये दो ‘स्वरूप’ और ‘तटस्थ’
लक्षण हैं। हे सनातन, अब तुम प्रेमके लक्षण
सुनो॥6॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धसत्त्वस्वरूप ही भावका
‘स्वरूप’-लक्षण है; रुचिके द्वारा चित्तको जो द्रवीभूत
करता है,—यह भावका ‘तटस्थ’-लक्षण है॥6॥
अनुभाष्य— ‘एइ दुइ’—श्लोकमें लिखित
(1) शुद्धसत्त्वविशेषात्मादि—भावका स्वरूप-लक्षण है,
(2) रुचिके द्वारा चित्तका द्रवीभूत होना—भावका
तटस्थ-लक्षण है।
'दुइ भावेर'—[भःरःसिः 1/3/6]—
'साधनाभिनिवेशेन कृष्ण-तद्भक्तयोस्तथा।
प्रसादेनातिधन्यानां भावो द्वेधाभिजायते॥”
[अर्थात् “महासौभाग्यशाली व्यक्तियोंमें दो प्रकारसे
भाव उत्पन्न होता है—] (1) साधनमें अभिनिवेशसे
उत्पन्न भाव, (2) श्रीकृष्ण और उनके भक्तोंकी कृपासे
उत्पन्न भाव।”]
और कोई-कोई उक्त दो भावोंके ‘केवला’ और
‘मिश्रा’ अर्थ करते हैं; किन्तु यह अर्थ यहाँ सङ्गत नहीं
है, पहले कहा गया अर्थ ही सङ्गत है॥6॥
प्रेमकी संज्ञा :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/1)—
सम्यङ्मसृणितस्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः।
भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥7॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥7॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जब वह भाव चित्तको सम्पूर्ण
रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममताके द्वारा जाना
जाता है और स्वयं गाढ़स्वरूप होता है, तब उसको
पण्डितगण ‘प्रेम’ कहकर बुलाते हैं॥7॥
अनुभाष्य—
सम्यक् मसृणितस्वान्तः (मसृणितः आर्दीकृतं स्वान्तं यस्मात्)
सः ममत्वातिशयाङ्कितः (ममत्वातिशययुक्तः—इति तटस्थ-
378 ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:
तेइसवाँ अध्याय [379] 23/7-13 ]
[बायाँ स्तम्भ]
लक्षणद्वय-विशिष्टः यः) सान्द्रात्मा (इति स्वरूपलक्षणयुक्त)
भावः स एव बुधैः 'प्रेमा' निगद्यते (कथ्यते)।
श्लोक-भावानुवाद-चित्तको सम्पूर्ण रूपसे द्रवीभूत
करके अत्यन्त ममतायुक्त-इन दो तटस्थ लक्षणोंसे
युक्त और स्वयं गाढ़स्वरूप-इस स्वरूप लक्षणयुक्त होता
है, तब उस भावको पण्डितगण 'प्रेम' कहते हैं॥7॥
पञ्चरात्रके मतानुसार प्रेमकी संज्ञा :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/2)में उद्धृत नारदपञ्चरात्र-वचन :-
अनन्यममता विष्णौ ममता प्रेमसङ्गता।
भक्तिरित्युच्यते भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः ॥8॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥
अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुमें अनन्य-ममता अर्थात्
विष्णु ही एकमात्र ममताके पात्र हैं, और कोई भी नहीं
है, ऐसी प्रेमसङ्गत ममताको भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और
नारद आदि वैष्णवगण (प्रेम) 'भक्ति' कहते हैं॥8॥
अनुभाष्य-
विष्णौ (भगवति) [या] प्रेमसङ्गता (प्रेमयुक्ता) अनन्य-ममता
(ऐकान्तिकी सम्बन्धमयी) भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः (भक्तैः) [सा]
भक्तिः (भावः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥
प्रेमभक्ति-प्राप्तिका क्रम; सर्वप्रथम 'श्रद्धा' से 'आसक्ति'
तक अभिधेय 'साधनभक्ति' और बादमें रति
अथवा 'भावभक्ति'का उदय; रतिके घनीभूत
होनेपर प्रयोजन 'प्रेमभक्ति' :-
कोन भाग्ये कोन जीवेर 'श्रद्धा' यदि हय।
तबे सेइ जीव 'साधुसङ्ग' करय॥9॥
साधुसङ्ग हैते हय 'श्रवण-कीर्त्तन'।
साधनभक्त्ये हय 'सर्वानर्थनिवर्त्तन' ॥ 10 ॥
अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 'निष्ठा' हय।
निष्ठा हैते श्रवणाद्ये 'रुचि' उपजाय ॥11॥
रुचि हैते भक्ति हय 'आसक्ति' प्रचुर।
आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कुर ॥12॥
[दायाँ स्तम्भ]
सेइ 'रति' गाढ़ हैले धरे 'प्रेम'-नाम।
सेइ प्रेमा-'प्रयोजन' सर्वानन्द-धाम ॥ 13 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 9-13॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके
बलसे किसी जीवकी यदि अनन्य-भक्तिके प्रति श्रद्धा
उत्पन्न होती है, तब वह जीव शुद्धभक्तरूपी साधुका
सङ्ग करता है। उस साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्तन होता
है। श्रवण और कीर्तन जितने परिमाणमें होता है,
साधनभक्तिमें उसी परिमाणमें सब अनर्थ दूर होते रहते
हैं। श्रद्धाके उदयकालसे ही श्रवण और कीर्तनके द्वारा
स्थूल-स्थूल अनर्थोंके दूर होनेपर श्रद्धा ही अनन्यभक्तिके
प्रति 'निष्ठा'रूपमें उदित होती है; निष्ठा ही क्रमशः
'रुचि' हो जाती है। उस रुचिसे बादमें 'आसक्ति' उत्पन्न
होती है। आसक्तिके निर्मल होनेपर श्रीकृष्ण प्रीतिका
अङ्कुर-स्वरूप 'भाव' अथवा 'रति' होती है। वही रति
गाढ़ होनेपर ही 'प्रेम'-नाम प्राप्त करती है। वही प्रेम
ही सर्वानन्दधामस्वरूप 'प्रयोजन'-तत्त्व है॥9-13॥
अनुभाष्य- 'साधनभक्ति'-सर्वप्रथम साधककी श्रद्धा,
उसके फलसे साधुसङ्ग अथवा गुरुपादाश्रय, उसके
साथ-साथ भजनक्रिया, उसके फलसे अनर्थ-निवृत्ति,
उसके फलसे निष्ठा अथवा स्थिर-चित्तसे निरन्तर
भजन, उसके फलस्वरूप रुचि, उसके फलस्वरूप
आसक्ति अथवा स्वारसिकी रुचि। साधन-भक्तिसे
आसक्तिके फलस्वरूप जिस 'साध्य' रतिका उदय होता
है, वही 'भाव' कहलाती है।
'भावभक्ति'-प्रेमसूर्यकिरणसदृश और रुचिके द्वारा
चित्तको द्रवीभूत कर देनेवाली प्रेमकी प्रथम अङ्कुरावस्थाको
ही 'भावभक्ति' कहते हैं। प्रेमसे पूर्व 'भाव' कहलाती है
और बादमें उत्कृष्ट पक्व (पक जानेपर) अथवा
परिणत होनेपर 'प्रेमभक्ति' कहलाती है। इसलिये
'प्रेमसूर्याशुसाम्यभाक्'-शब्दमें 'भाव' और 'प्रेम' भक्तिका
तारतम्य लिखा है। जिसमें रति उत्पन्न हो गयी है, ऐसा
जातरति भक्त उत्कृष्ट होकर क्रमशः प्रेमभक्ति प्राप्त
। 379
[ 23/9-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करता है। रतिके गाढ़ होनेपर उसे 'प्रेम' कहते हैं। यह
प्रेम ही भक्तिका फल, प्रयोजन और परमानन्दमय
है॥ 9-13 ॥
शास्त्र प्रमाण :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/15-16)—
आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया।
ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥ 14 ॥
अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति।
साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः ॥ 15 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 14-15 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वप्रथम श्रद्धा, उससे साधुसङ्ग,
उससे भजनक्रिया, उससे अनर्थनिवृत्ति, उसके बाद
निष्ठा, उससे रुचि और आसक्ति, —यहाँ तक साधन
भक्ति होती है; उससे क्रमशः 'भाव' और अन्तमें 'प्रेम'
उदित होता है। साधकोंके प्रेमोदयका यही क्रम जानना
चाहिये॥ 14-15 ॥
अनुभाष्य—
आदौ श्रद्धा (असति परिणामशीले वस्तुनि शिथिलानुरागः
सन् अप्राकृते सच्चिदानन्दविग्रहे विष्णौ दृढ़विश्वासः), ततः
(लब्धविश्वासात्) साधुसङ्गः (अप्राकृतबुद्ध्या गुरुवैष्णवचरणाश्रयः
ततः कृष्णदीक्षादि-भजनरीतिशिक्षणं च), अथ (अतः श्रौतवर्त्मना
तेषामानुगत्येन गुरुचरणान्तिके) भजनक्रिया (कृष्ण-भजनानुष्ठान),
ततः (भजनानुष्ठानात्) अनर्थ-निवृत्तिः (परमार्थे प्रवृत्तौ तु
तदितरविषयभोगनिवृत्तिः) स्यात् (भवति); ततः
(विषयसङ्गत्यागादनन्तरं) निष्ठा ('शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इति
भगवद्वचनात् अविक्षेपेण सातत्यं), ततः रुचिः (रागः), अथ
(तदनन्तरं) आसक्तिः (स्वारसिकी रुचिः), ततः भावः (आदौ
प्रेमाङ्कुरः), ततः प्रेमा (चरम-प्रयोजनम्) अभ्युदञ्चति
(उदेति)—साधकानां प्रेम्णः प्रादुर्भावे (उदये) अयं क्रमः
भवेत्।
श्लोक-भावानुवाद—सर्वप्रथम श्रद्धा (अर्थात् असत्
परिणामशील वस्तुओंमें अनुरागकी शिथिलता और
अप्राकृत सच्चिदानन्दविग्रह विष्णुमें दृढ़ विश्वास), ऐसे
विश्वासके साथ साधुसङ्ग (अर्थात् गुरुवैष्णवमें अप्राकृत
बुद्धिसे उनका चरणाश्रय और फिर श्रीकृष्णदीक्षादि एवं
भजनरीतिकी शिक्षा), तब श्रौतपन्थके आनुगत्यमें
गुरुचरणोंमें रहकर भजनक्रिया (अर्थात् श्रीकृष्ण-
भजनानुष्ठान), तब उस भजनानुष्ठानसे अनर्थ-निवृत्ति
(अर्थात् परमार्थमें प्रवृत्ति और विषयभोगसे निवृत्ति)
होती है। तब विषयसङ्गत्यागसे निष्ठा (अर्थात् 'शमो
मन्निष्ठता बुद्धेः' इस भगवद्-वचनके अनुसार स्थिर-चित्तसे
निरन्तर भजन), तब रुचि और उसके बाद आसक्ति
(स्वारसिकी रुचि), तब भाव (प्रेमाङ्कुर), तब प्रेम
(चरम-प्रयोजन)का उदय होता है। साधकोंमें प्रेमके
उदय होनेका यह क्रम होता है॥ 14-15 ॥
श्रीभागवत-प्रमाण :—
श्रीमद्भागवत (3/25/25)में—
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धारतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥ 16 ॥
अनुवाद—साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण
लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है।
उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र
अपवर्ग पन्थरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति
और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥ 16 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 1/60 श्लोक देखें॥ 16 ॥
पूर्व अध्यायमें (1) साधन भक्तिके लक्षण वर्णित हुए;
अब (2) भावभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :—
याँहार हृदये एइ भावाङ्कुर हय।
ताँहाते एतेक चिह्न सर्वशास्त्रे कय॥ 17 ॥
अनुवाद—सभी शास्त्र ऐसा कहते हैं कि जिनके
हृदयमें यह भाव अङ्कुरित होता है, उनमें निम्नलिखित
लक्षण दिखलायी देते हैं॥ 17 ॥
अनुभाष्य—भावके अङ्कुरित होनेपर अर्थात् रतिके
उदित होनेपर नौ लक्षण साधकोंमें देखे जाते हैं॥ 17 ॥
380
तेइसवाँ अध्याय 23/18-21 ]
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/25-26)—
क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता।
आशाबन्धः समुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः ॥ 18 ॥
आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले।
इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने ॥ 19 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 18-19 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—क्षान्ति अर्थात् क्षमा, अव्यर्थ-
कालत्व अर्थात् काल वृथा न जाय—ऐसा प्रयत्न,
विरक्ति अर्थात् श्रीकृष्ण सम्बन्धविहीन अन्य वस्तुओंके
प्रति वैराग्य, मानशून्यता अर्थात् सम्मान पाने योग्य
होनेपर भी सम्मानकी इच्छा नहीं करना, आशाबन्ध,
समुत्कण्ठा, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, श्रीकृष्णके
गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति,—
इस प्रकार ये सभी अनुभाव भावाङ्कुरके उत्पन्न होनेपर
मनुष्यके स्वभावमें लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥
अनुभाष्य—
जातभावाङ्कुरे जने (जातरुचौ भक्ते) क्षान्तिः (क्षोभहेतौ
प्राप्ते सति अक्षुभितात्मता), अव्यर्थकालत्वं (कृष्ण-सम्बन्धवस्तुनि
एव केवलकालक्षेपः) विरक्तिः (कृष्णोतरवस्तुनि वीतस्पृहा),
मानशून्यता (उत्कृष्टत्वेऽपि अमानित्वम्), आशाबन्धः (भगवतः
दृढ़प्राप्ति-सम्भावना), समुत्कण्ठा (निजाभीष्टलाभाय गुरुलुब्धता),
नामगाने सदा रुचिः, तद्गुणाख्याने आसक्तिः, तद्वसतिस्थले
प्रीतिः—इत्यादयः 'अनुभावाः' स्युः (वर्त्तन्ते)।
श्लोक-भावानुवाद—जात-भावाङ्कुर भक्तमें क्षान्ति
अर्थात् क्षोभ उत्पन्न होनेका कारण होनेपर भी क्षुभित
नहीं होना, श्रीकृष्ण-सम्बन्धी वस्तुओंके लिये समस्त
काल व्यतीत करना, श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंकी स्पृहासे
विहीन, उत्कृष्ट होनेपर भी अमानी होना, भगवद्-
प्राप्तिकी दृढ़ आशा, निज-अभीष्ट प्राप्तिमें भारी लोभ,
श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, उनके गुणोंके वर्णनमें
आसक्ति, उनकी वास-स्थलीमें प्रीति आदि 'अनुभाव'
लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥
श्लोककी व्याख्या—(1) क्षान्ति अथवा क्षोभरहित्य :-
एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर चित्ते हय।
प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ नाहि हय ॥ 20 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 20 ॥
अनुभाष्य—पूर्वलिखित नौ प्रकारका प्रीतिका अङ्कुर
भाव जिसके चित्तमें उदित होता है, इस भौतिक
संसारमें उसके लिये किसी प्रकारकी असुविधाका विषय
उपस्थित होनेपर भी उसको वह कुछ भी मानता नहीं
है ॥ 20 ॥
श्रीमद्भागवत (1/19/15)—
तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा
गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे।
द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको
वा दशतवलं गायत विष्णुगाथाः ॥ 21 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे ब्राह्मणों ! अब मैंने अपने
चित्तको भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दिया है।
आपलोग और गङ्गादेवी शरणागत जानकर मुझपर कृपा
करें। अब ब्राह्मणकुमारके शापसे प्रेरित तक्षक ही हो
अथवा कोई दूसरा भी कपटसे तक्षकका रूप धारणकर
अपनी इच्छासे मुझे डस ले, इसकी मुझे तनिक भी
चिन्ता नहीं है। आपलोग भगवान् श्रीहरिकी रसमयी
कथाका गान कीजिये ॥ 21 ॥
अनुभाष्य—शमीक-ऋषिके पुत्र शृङ्गीके शापको
सुनकर गङ्गाके तटपर आमरण अनशनका सङ्कल्प
लेकर महाराज परीक्षित श्रीकृष्ण चिन्तामें रत हुए थे।
उस समय उनके निकट बहुतसे ऋषि आकर उपस्थित
हुए। महाराज परीक्षित उनका विधि-अनुसार सत्कार
करके, ब्राह्मणके शापको हरिकथाके श्रवणका सुयोग
प्रदान करनेवाले मङ्गलमय वरके रूपमें वर्णन करके
ऋषियोंसे सर्वक्षण हरिकथाका वर्णन करनेका अनुरोध
कर रहे हैं,-
। 381
[ 23/21–25 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
हे विप्राः [भवन्तः] देवी (देवतारूपा) गङ्गा च ईशे धृतचित्तम् (ईश्वरार्पितचित्तं) तं (तथाभूतं) मा (माम्) उपयातं (शरणागतं) प्रतियन्तु (जानन्तु); द्विजोपसृष्टः (द्विज-प्रेरितः) कुहकः तक्षकः वा अलं दशतु, विष्णुकथा (विष्णुकथाः) गायत (यूयं कीर्त्तयत)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥
(2) अव्यर्थकालत्व और (3) इन्द्रियतर्पण-विरक्ति :—
कृष्णसम्बन्ध बिना काल व्यर्थ नाहि याय।
भुक्ति, सिद्धि, इन्द्रियार्थ ताँरे नाहि भाय ॥ 22 ॥
**अनुवाद—**श्रीकृष्णसे सम्बन्धित क्रियाओंके अतिरिक्त जातरति भक्तोंका समय बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं जाता। भोग, सिद्धि और इन्द्रियोंके सुखकी कोई भी वस्तु उन्हें अच्छी नहीं लगती ॥ 22 ॥
**अनुभाष्य—**जातरति भक्तके लिये ऐहिक अर्थात् इस भौम-जगत्के और पारलौकिक भोग अर्थात् स्वर्गसे लेकर सत्यलोक तकके भोग, अणिमादि सिद्धियाँ और इन्द्रियतृप्ति आदि कोई आकर्षण नहीं रखते और उन्हें इन सबसे कोई प्रयोजन भी नहीं है ॥ 22 ॥
समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवा करनेपर भी भावभक्तोंकी चिन्मयी चमत्कारमयी अतृप्ति :—
हरिभक्तिसुधोदय (12/38)में—
वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा स्मरन्तस्तन्वा
नमन्तोऽप्यनिशं न तृप्ताः।
भक्ताः स्रवन्नेत्रजलाः
समग्रमायुर्हरेरेव समर्पयन्ति ॥ 23 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भक्तगण नेत्रोंमें अश्रुजलधाराके साथ-साथ वचनोंके द्वारा स्तव, मनके द्वारा स्मरण और शरीरके द्वारा नमस्कार करके भी तृप्त नहीं हो पाते। इस प्रकारकी क्रियाके द्वारा वे अपनी सम्पूर्ण आयु श्रीहरिमें समर्पण (अर्थात् उनके उद्देश्यसे व्यतीत) करते हैं ॥ 23 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य—
भक्ताः अनिशं (सर्वकालं) वाग्भिः स्तुवन्तः, मनसा स्मरन्तः, तन्वा नमन्तः अपि, न तृप्ताः [भवन्ति]; स्रवन्नेत्रजलाः (वाष्पविगलित-नयनाः सन्तः) समग्रम् आयुः हरेः (हरये) एव समर्पयन्ति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषय-भोगोंसे विरक्त भरतका दृष्टान्त :—
श्रीमद्भागवत (5/14/43)में—
यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः।
जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः ॥ 24 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 24 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है ॥ 24 ॥
**अनुभाष्य—**श्रील शुकदेव परीक्षितसे महाभागवत भरतके शुद्धहरिभजनके आचरणरूपी गुण-महिमाका वर्णन कर रहे हैं,—
यः (भरतः) उत्तमःश्लोकलालसः (उत्तमःश्लोके लालसा लम्पटत्वं यस्य सः कृष्णोत्कण्ठः सन्) हृदिस्पृशः (मनोज्ञान्) दुस्त्यजान् (दुष्परिहरान्) सुहृद्राज्यं (उभयोर्द्वन्द्वैक्यं) दारसुतान् युवैव मलवत् जहौ (परित्यक्तवान्) [तस्य आर्य्यभस्य अनुवर्त्म अन्यो नृपः नार्हतीति पूर्वेणान्वयः]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [पूर्व श्लोक (भाः 5/14/42)में वर्णित 'कोई भी राजा आज तक अपने मनके द्वारा भी ऋषभनन्दन राजर्षि भरतके मार्गका अनुसरण करनेमें समर्थ नहीं हुआ है।' वाक्यका इस श्लोकके साथ अन्वय करें।] ॥ 24 ॥
(4) मानशून्यता और (5) आशाबन्ध :—
'सर्वोत्तम' अपनाके 'हीन' करि' माने।
'कृष्ण कृपा करिबेन'—दृढ़ करि' माने ॥ 25 ॥
382
तेइसवाँ अध्याय 23/25-29 ]
अनुवाद—जातरति भक्त 'सर्वोत्तम' होनेपर भी
स्वयंको सबसे 'हीन' मानता है। 'श्रीकृष्ण अवश्य ही
कृपा करेंगे'—उसका यह दृढ़ विश्वास है॥25॥
अमानी होनेका दृष्टान्त :—
पद्मपुराण-वाक्य—
हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां शिखामणिः।
भिक्षामटन्नरिपुरे श्वपाकमपि वन्दते॥26॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हरिमें रतियुक्त होकर ये
राजशिरोमणि (सम्राट) शत्रुके राज्यमें भिक्षा करते हुए
चण्डालकी भी वन्दना कर रहे हैं॥26॥
अनुभाष्य—
नरेन्द्राणां शिखामणिः (नृपकुलचूड़ामणिः) एषः हरौ रतिं
वहन् (पोषयन्) अरिपुरे (शत्रुनिवासे) भिक्षां अटन् (तदर्थं
परिभ्रमन्) श्वपाकं (सुनीचम्) अपि वन्दते।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥
आशाबन्धयुक्तकी उक्ति :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/35)—
श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीसनातन-प्रभुका वाक्य—
न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि वा योगोऽथवा वैष्णवो
ज्ञानं वा शुभकर्म वा कियदहो सज्जातिरप्यस्ति वा।
हीनाथाधिकसाधके त्वयि तथाप्यच्छेद्यमूला सती
हे गोपीजनवल्लभ व्यथयते हा हा मदाशैव माम्॥27॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥27॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें प्रेम, श्रवणादि भक्ति,
विष्णु-भक्तियोग, ज्ञान अथवा शुभकर्म अथवा सद्जाति
कुछ भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ, आप अकिञ्चनके
ऊपर कृपा करनेवाले हैं, इसलिये मेरे हृदयमें सदा
आपके प्रति जो अटूट श्रद्धा आशा है, वह मुझे
निरन्तर व्यथित करती रहती है॥27॥
अनुभाष्य—
[मम] प्रेमा वा, श्रवणादिभक्तिः अपि, अथवा वैष्णवः
(विष्णुध्यानमयः) योगः (शुद्धभक्तियोगः), ज्ञानं (ब्रह्मनिष्ठं) वा,
शुभकर्म (दैववर्णाश्रमादिरूपं) वा, अहो (खेदे) कियत् सज्जातिः
(सद्वंशजातसम्मानम्) अपि वा न अस्ति, हे गोपीजनवल्लभ,
हीनाथाधिकसाधके (हीनजने योग्यतापरिमाणाधिकफलदातरि)
त्वयि अच्छेद्यमूला (सर्वथैव अविच्छेद्या) सती (शुद्धा) हा हा
मत् आशा (मम आशा) मां व्यथयते एव।
श्लोक-भावानुवाद—मुझमें प्रेम अथवा श्रवणादि
भक्ति अथवा विष्णुध्यानमय शुद्धभक्तियोग, या ब्रह्मनिष्ठ
ज्ञान अथवा दैववर्णाश्रमादिरूप शुभकर्म अथवा अहो !
सद्-वंशजात सम्मान भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ !
हीनजनोंको उनकी योग्यताके परिमाणसे भी अधिक
फल देनेवाले आपमें मेरी अटूट आशा है। हा ! हा !
मेरी आशा मुझे व्यथित कर रही है॥27॥
(6) समुत्कण्ठा और (7) नामगानमें सदा रुचि :—
समुत्कण्ठा हय सदा लालसा-प्रधान।
नाम-गाने सदा रुचि, लय कृष्णनाम॥28॥
अनुवाद—जातरति भक्तकी श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त
करनेकी तीव्र लालसा उसकी समुत्कण्ठाका लक्षण है।
नाम-गानमें सदा रुचि रहनेके कारण वह सदैव
श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है॥28॥
समुत्कण्ठामें भक्तकी उक्ति :—
श्रीकृष्णकर्णामृत (32) में उद्धृत बिल्वमङ्गलवाक्य—
त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि
मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्।
तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि
मुग्धः मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम्॥29॥
अनुवाद—हे वंशीविलासी कृष्ण ! तुम्हारा शैशव
(कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको
तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं
जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे
मुखकमलके दर्शन करनेके लिये अब मैं
क्या करूँ ? ॥29॥
। 383
[ 23/29-35 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—मध्यलीला 2/61 संख्या देखें॥ 29 ॥
नामगानका दृष्टान्त :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/38)—
रोदनबिन्दुमकरन्दस्यन्दि-दृगिन्दीवराद्य गोविन्द।
तव मधुरस्वरकण्ठी गायति नामावलीं बाला॥ 30 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोविन्द, यह अति अल्प आयुवाली राधिका (या चन्द्रावली) आज अपने नयनकमलोंमें अश्रु भरकर मधुरकण्ठसे आपकी नामावलीका गान कर रही है॥ 30 ॥
अनुभाष्य—
हे गोविन्द, अद्य रोदनबिन्दुमकरन्द-स्यन्दि-दृगिन्दीवरा (रोदनबिन्दवः एव मकरन्दाः पुष्परसाः ते स्यन्दन्ति दृशौ इव इन्दीवरौ नीलपद्मनेत्राभ्यां यस्याः सा) मधुरस्वरकण्ठि (सौस्वर्यवती) बाला (राधिका) तव नामावलीं गायति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥
(8) श्रीकृष्णके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति और (9) श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति :—
कृष्णगुणाख्याने करे सर्वदा आसक्ति।
कृष्णलीला-स्थाने करे सर्वदा वसति॥ 31 ॥
अनुवाद—भावदशामें भक्त आसक्त होकर श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करता रहता है और वह सदा श्रीकृष्णकी लीला-स्थलियोमें वास करता है॥ 31 ॥
श्रीकृष्णके माधुर्यका वर्णन :—
श्रीकृष्णकर्णामृत (92)में बिल्वमङ्गलवाक्य—
मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो-
मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्।
मधुगन्धि मृदुस्मितमेतदहो
मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम्॥ 32 ॥
अनुवाद—इन श्रीकृष्णका शरीर मधुर है, इनका मुख भी मधुर है और इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य
और भी मधुर है; अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है॥ 32 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 21/136 संख्या देखें॥ 32 ॥
श्रीकृष्णके प्रिय वास-स्थानमें प्रीतिका दृष्टान्त :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/156)—
कदाहं यमुनातीरे नामानि तव कीर्त्तयन्।
उद्बाष्पः पुण्डरीकाक्ष रचयिष्यामि ताण्डवम् ॥ 33 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे पुण्डरीकाक्ष, मैं कब आपके नामका कीर्तन करते-करते अश्रुपूर्णनेत्रोंसे युक्त होकर यमुनाके तटपर नृत्य करूँगा॥ 33 ॥
अनुभाष्य—
हे पुण्डरीकाक्ष, कदा अहं यमुनातीरे (कालिन्दीतटे) तव नामानि कीर्त्तयन्, उद्बाष्पः (अश्रुपूर्णनेत्रः सन्) ताण्डवं [नृत्यं] रचयिष्यामि (करिष्यामि)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥
अब (3) प्रेमभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :—
कृष्णेर रतिर चिह्न एइ कैलुँ विवरण।
कृष्णप्रेमेर चिह्न एबे शुन, सनातन॥ 34 ॥
अनुवाद—हे सनातन, मैंने श्रीकृष्णके प्रति होनेवाली रतिके लक्षणोंके विषयमें बतलाया, अब तुम श्रीकृष्णप्रेमके लक्षणोंके विषयमें श्रवण करो॥ 34 ॥
श्रीकृष्णप्रेमिक वैष्णव अथवा शुद्धभक्त-प्राकृत सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्मदर्शी समालोचकोंके लिये भी दुर्बोध्य :—
याँर चित्ते कृष्णप्रेमा करये उदय।
ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय ॥ 35 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 35 ॥
अनुभाष्य—जातप्रेम भक्तके वचन, क्रिया और मुद्रा (भावभङ्गिमा)को विचक्षण (दक्ष) पण्डित भी समझनेमें समर्थ नहीं होते॥ 35 ॥
384 |
तेइसवाँ अध्याय 23/36-41 ]
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/17) :—
धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि।
अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा॥ 36॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस धन्य व्यक्तिके चित्तमें
नवप्रेम उदित होता है, उसकी समस्त क्रियाएँ और
भावभङ्गिमा अर्थात् समस्त लक्षण शास्त्रज्ञ पुरुष भी
नहीं समझ सकते॥ 36॥
अनुभाष्य—
यस्य धन्यस्य (सफलार्थस्य भक्तजनस्य) चेतसि (चित्ते)
नवप्रेमा उन्मीलति (प्रकटो भवति) [तस्य] अस्य मुद्रा (चेष्टा)
अन्तर्वाणिभिः (शास्त्रविद्भिः) अपि सुष्ठु सुदुर्गमा (बोद्धुम्
अतीव अशक्या)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36॥
प्रेमी भक्तोंके लक्षण और क्रिया-चेष्टा :—
श्रीमद्भागवत (11/2/40)में—
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति
गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥ 37॥
अनुवाद—श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त
होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है,
प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके
कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी
अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता,
कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य
करता है॥ 37॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 37॥
प्रेमकी गाढ़ताके तारतम्यका वैशिष्ट्य;
सबसे अन्तमें 'महाभाव' :—
प्रेमा क्रमे बाड़ि' हय स्नेह, मान, प्रणय।
राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय॥ 38॥
अनुवाद—प्रेम क्रमशः बढ़ते-बढ़ते स्नेह, मान,
प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव हो जाता
है॥ 38॥
उपमा :—
यैछे इक्षुरस-बीज—गुड़, खण्ड-सार।
शर्करा, सिता-मिछरि, शुद्धमिछरि आर॥ 39॥
बीजरूपी रति और प्रेमकी गाढ़-अवस्थाके समूहके
तारतम्यसे रसके आस्वादनकी अधिकताका तारतम्य :—
इँहा यैछे क्रमे क्रमे बाड़े निर्मल स्वाद।
रति-प्रेमादिर तैछे बाड़ये आस्वाद॥ 40॥
अनुवाद—जिस प्रकार गन्नेका बीज, गन्ना, रस, गुड़,
खाँड़, चीनी, सफेद मिश्री और शुद्ध-मिश्री एक ही
वस्तु होनेपर भी क्रमशः शुद्ध होनेपर उसका क्रमशः
स्वाद भी बढ़ता जाता है, उसी प्रकार रतिसे (जिसे
प्रेमका बीज कहा गया है, उससे) बढ़ते हुए प्रेमादिका
भी क्रमशः आस्वादन बढ़ता ही जाता है॥ 39-40॥
पाँच प्रकारकी रति :—
अधिकारी-भेदे रति—पञ्चप्रकार।
शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आर॥ 41॥
अनुवाद—जीवके अधिकारके भेदसे रति शान्त,
दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारकी
होती है॥ 41॥
अनुभाष्य—'रति'—(भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी)—
“व्यक्तं मसृणितेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्।
मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्ववेदेषा रतिर्न हि।
किन्तु बालचमत्कारकारी तच्चिह्नवीक्षया।
अभिज्ञेन सुबोधोऽयं रत्याभास प्रकीर्तितः॥”
अर्थात् “आन्तरिक द्रवीभूतता जहाँ प्रकाशित होती
है, वही रतिका लक्षण है, किन्तु मुक्तिकामी अथवा
भोगकामीमें दिखनेपर उसे कभी भी 'रति' नहीं कहा
जाता है। श्रीकृष्णसेवासे अतिरिक्त अन्य अभिलाषासे
युक्त इस रतिके लक्षणोंको देखकर अज्ञानी सरल
। 385
[ 23/41-46 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
व्यक्ति ही चमत्कृत होते हैं। किन्तु भक्ति-सिद्धान्तको
जाननेवाले व्यक्ति उसे 'रतिका आभास' कहते हैं॥41॥
पाँच रसोंसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :—
एइ पञ्च स्थायिभावे हय पञ्च 'रस'।
ये-रसे भक्त 'सुखी', कृष्ण हय 'वश'॥42॥
अनुवाद—इन पाँच स्थायी भावोंमें पाँच रस होते
हैं। जिस रसमें भक्त सुखी होता है, श्रीकृष्ण भी उसी
रसमें ही उसके वशीभूत हो जाते हैं॥42॥
अनुभाष्य—'स्थायी भाव'—(भःरःसिः दःविः 5म लः
प्रथम श्लोक)—
“अविरुद्धान् विरुद्धांश्च भावान् यो वशतां नयन्।
सु-राजेव विराजेत स स्थायी भाव उच्यते॥
स्थायी भावोऽत्र स प्रोक्तः श्रीकृष्णविषया रतिः।”
अर्थात् “हास्यादि अविरुद्ध भाव और क्रोधादि
विरुद्ध भावसमूहको जो भाव वशीभूत करके उत्तम
राजाकी भाँति विराजित होता है, वही स्थायी भाव है।
इस स्थानपर श्रीकृष्ण-विषयक रतिको ही 'स्थायी भाव'
कहा जाता है॥”42॥
स्थायीभाव अथवा रतिके साथ सामग्रीके मिलनसे रसकी
उत्पत्ति; रति ही रसका 'मूल' :—
प्रेमादिक स्थायिभाव सामग्री-मिलने।
कृष्णभक्तिरसरूपे पाय परिणामे॥43॥
अनुवाद—प्रेमादि स्थायी-भावके साथ सामग्रीके
मिलनसे श्रीकृष्णभक्ति रसरूपमें परिणत हो जाती
है॥43॥
चार प्रकारकी सामग्री :—
विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी।
स्थायिभाव 'रस' हय एइ चारि मिलि'॥44॥
उपमा :—
दधि येन खण्ड-मरिच-कर्पूर-मिलने।
'रसालाख्य' रस हय अपूर्वास्वादने॥45॥
अनुवाद—दही जिस प्रकार चीनी, काली मिर्च और
कर्पूरके मिलानेपर अपूर्व आस्वादनीय 'रसाला' रूपी रस
बन जाती है, स्थायीभाव भी उसी प्रकार विभाव,
अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी—इन चारोंसे मिलकर
'रस' बन जाता है॥44-45॥
अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)—
“अथास्याः केशवरतेर्लक्षिताया निगद्यते।
सामग्रीपरिपोषेण परमा रसरूपता॥
विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः।
स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः।
एषा कृष्णरतिः स्थायी भावो भक्तिरसो भवेत्॥”
[अर्थात् “बादमें इस कृष्णरतिकी विभावादि सामग्रीके
द्वारा परिपोषणके कारण जो परम रसरूपता प्राप्त होती
है, उसे ही यहाँ कहा गया है। श्रवणादि साधनभक्तिके
अङ्गोंके द्वारा भक्तोंके हृदयमें यह श्रीकृष्णरति-रूप
स्थायी भाव—विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी
भावोंके द्वारा आस्वादनीय होनेपर भक्तिरसमें परिणत
होता है।”]॥43-44॥
रसके हेतु विभावके दो प्रकार—
(1) आलम्बन और (2) उद्दीपन :—
द्विविध 'विभाव',—आलम्बन, उद्दीपन।
वंशीस्वरादि-उद्दीपन, कृष्णादि-आलम्बन॥46॥
अनुवाद—विभाव दो प्रकारके होते हैं—आलम्बन
और उद्दीपन। श्रीकृष्णआदि आलम्बन और वंशीध्वनि
आदि उद्दीपन कहलाते हैं॥46॥
अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)—
“तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादन-हेतवः।
ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपनाः परे॥”
इस विषयमें अग्निपुराणमें—
“विभाव्यते हि रत्यादिर्यत्र येन विभाव्यते।
विभावो नाम स द्वेधालम्बनोद्दीपनात्मकः॥”
अर्थात् “श्रीकृष्णरतिके आस्वादनके कारणको 'विभाव'
कहते हैं; वह दो प्रकारका होता है—आलम्बन और
386 |
तेइसवाँ अध्याय 23/46-48 ]
उद्दीपन। जिससे और जिसके द्वारा रति आदि विभावित
होती है, वही अग्निपुराणादिमें 'विभाव' (आलम्बनमय
और उद्दीपनमय)के नामसे कहा गया है।"
'आलम्बन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)-
“कृष्णश्च कृष्णभक्ताश्च बुधैरालम्बना मताः।
रत्यादेर्विषयत्वेन तथाधारतयापि च॥”
अर्थात् “रति आदिके (अर्थात् गौण हास्यादि
रसके) विषयरूपमें 'श्रीकृष्ण' और आधार-स्वरूपमें
'श्रीकृष्णभक्त'-इन दोनोंको पण्डितगण 'आलम्बन' कहते
हैं।"
'उद्दीपन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)-
“उद्दीपनास्तु ते प्रोक्ता भावमुद्दीपयन्ति ये।
ते तु श्रीकृष्णचन्द्रस्य गुणाश्चेष्टाः प्रसाधनम्॥
स्मिताङ्गसौरभे वंशशृङ्गनूपुरकम्बरः।
पदाङ्क-क्षेत्र-तुलसी-भक्त-तद्वासरादयः॥”
अर्थात् “जो भाव प्रकाशित करते हैं, वे ही उद्दीपन
हैं। जैसे-श्रीकृष्णके गुण, चेष्टा और प्रसाधन (कंघे
आदिके द्वारा केश-सँवारना आदि देहकी सज्जाके
उपकरण) और स्मित (मृदुहास्य), अङ्गगन्ध, वंशी,
शृङ्ग, नूपुर, शङ्ख, पदचिह्न, क्षेत्र, तुलसी, भक्त, हरिवासरादि
एकादशी-व्रत ॥" 46॥
रसके 'कार्य' अनुभावके 13 प्रकारके भेद; आठ प्रकारके
सात्त्विक भी रसके 'कार्य' :-
‘अनुभाव’—स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर।
स्तम्भादि-‘सात्त्विक’ अनुभावेर भितर॥ 47 ॥
अनुवाद—मन्दहास्य, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर (देहके
विविध अङ्गोंमें प्रकट होनेवाले)—ये 'अनुभाव' हैं। और
स्तम्भादि 'सात्त्विक' भाव अनुभावके अन्तर्भुक्त ही
हैं॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उद्भास्वर'-विशेष आङ्गिक
अनुभाव हैं, (वे) पाँच प्रकारके हैं-वेशभूषाका ढीला
होना, शरीरको मोड़ना, जम्भाई, सांसका फूलना, सांस
छोड़ना और सांस भीतर लेना॥ 47 ॥
अनुभाष्य-‘अनुभाव’-(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी
प्रथम श्लोक)-
“अनुभावास्तु चित्तस्थभावानामवबोधकः।
ते बहिर्विक्रियाप्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्या ॥
नृत्यं विलुठितं गीतं क्रोशनं तनुमोटनम्।
हुङ्कारो जृम्भणं श्वासभूमा लोकानपेक्षिता।
लालास्रावोऽट्टहासश्च घूर्णा-हिक्कादयोऽपि च॥
ते शीताः क्षेपणाश्चेति यथाथ्र्याख्या द्विधोदिताः।
शीताः स्युर्गीतजृम्भाद्या नृत्याद्याः क्षेपणाभिधाः॥”
अर्थात् “चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक प्राय
बाह्य-विकार होकर जो 'उद्भास्वर'-नामसे प्रसिद्ध हैं, वे
ही 'अनुभाव' हैं। नृत्य, भूमिपर लोट-पोट, गान,
चिल्लाना, शरीरको मरोड़ना, हुङ्कार, जम्भाई लेना, लम्बी
सांसे लेना, लोगोंकी परवाह नहीं करना, लारका बहना,
अट्टहास, घूर्णा और हिचकी आदि। ये 'शीत' और
'क्षेपण'-इन दो नामोंसे जाने जाते हैं; इनमेंसे गीत
और जम्भाई आदिको 'शीत' और नृत्यादिको 'क्षेपण'
कहते हैं।"
‘उद्भास्वर’—
“उद्भासन्ते स्वधाम्नीति प्रोक्ता उद्भास्वरा बुधैः।
नीव्युत्तरीयधम्मिल्लशंसनं गात्रमोटनम्।
जृम्भा घ्राणस्य फुल्लत्वं निश्वासाद्याश्च ते मताः॥”
अर्थात् “भावयुक्त व्यक्तिके शरीरमें जो-जो प्रकाशित
होता है, पण्डितगण उसे 'उद्भास्वर' कहते हैं। ये नाड़े,
उत्तरीय-वस्त्र और जूड़ेका खुलना या ढीला होना,
शरीरको मोड़ना, जम्भाई, नाकको फुलाना, श्वास
छोड़ना, लोट-पोट खाना और हिचकी आदि पूर्वलिखित
बाह्य विकारसमूह हैं।"
'स्तम्भादि'-मध्यलीला 14/167 संख्या देखें ॥ 47 ॥
रसके 'सहायक' व्यभिचारी भाव-तैंतीस :-
निर्वेद-हर्षादि-तेत्रिश 'व्यभिचारी'।
सब मिलि' 'रस' हय चमत्कारकारी॥ 48 ॥
अनुवाद—निर्वेद-हर्षादि तैंतीस व्यभिचारी भाव हैं।
। 387
[ 23/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इन सबके मिलनेपर अत्यन्त चमत्कारी 'रस' बनता अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 50-51 ॥
है॥ 48 ॥ अनुभाष्य—शान्तरसमें 'रति'की बढ़ते हुए 'प्रेम'
अनुभाष्य—'निर्वेद-हर्षादि'—मध्यलीला 14/167 संख्या तक सीमा है। दास्यरसमें 'दास्यरति' स्नेह, मान, प्रणय
देखें। और राग तक वर्द्धित होती है। सख्यरसमें 'सख्यरति'
'व्यभिचारी'—(भःरःसिः दःविः चतुर्थ लहरी प्रथम स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग तक बढ़ती है।
श्लोक)— वात्सल्यरसमें 'वात्सल्यरति' स्नेह, मान, प्रणय, राग और
“त्रयस्त्रिंशद्भावाः ये व्यभिचारिणः। अनुराग तक वर्द्धित होती है। विशेषता यह है कि
विशेषेणाभिमुख्येन चरन्ति स्थायिनं प्रति। सख्यरसाश्रित होनेपर भी सुबलादिकी सख्यरति स्नेह,
वागङ्गसत्त्वसूच्या ये ज्ञेयास्ते व्यभिचारिणः॥ मान, प्रणय, राग, अनुराग और भाव तक वर्द्धित होती
सञ्चारयन्ति भावस्य गतिं सञ्चारिणोऽपि ते। है॥ 50-51 ॥
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति स्थायिन्यमृतवारिधौ।
ऊर्मिवद्वर्द्धयन्त्येनं यान्ति तद्रूपताञ्च ते॥” शान्तादि पाँच रसोंके भेदकी विचित्रता :—
अर्थात् “व्यभिचारी भावसमूह तैंतीस होते हैं। वे शान्तादि रसेर ‘योग’, ‘वियोग’—दुइ भेद।
विशेषतः प्रधानरूपमें स्थायी-भावोंके प्रति विचरण करते सख्य-वात्सल्ये योगादिर अनेक विभेद॥ 52 ॥
हैं। वाक्य, अङ्ग (भ्रू-नेत्रादि) और सत्त्वसे उत्पन्न
अनुभावके द्वारा व्यभिचारी भावसमूह भावकी गतिका अनुवाद—शान्तादि रसोंके दो भेद हैं—'योग' और
सञ्चार करते हैं, इसलिये उन्हें 'सञ्चारी' कहा जाता 'वियोग'। सख्य और वात्सल्य रसमें योग-वियोगके
है। ये स्थायी-भावरूपी अमृत-सागरमें निमग्न होकर अनेक भेद हैं॥ 52 ॥
तरङ्गकी भाँति उसे वर्द्धित कराके स्थायी-भावरूपताको अनुभाष्य—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी 41
प्राप्त करते हैं॥”48॥ श्लोक)—
पाँच प्रकारके रसोंका वर्णन :— “अयोगयोगावेतस्य प्रभेदौ कथितावुभौ”
पञ्चविध रस—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य। अर्थात् “इस प्रीतिभक्तिरसके ‘अयोग और योग’—ये
मधुर-रस शृङ्गार-भावेते प्राबल्य॥ 49 ॥ दो भेद कहे गये हैं।”
अनुवाद—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और ‘अयोग’—
मधुर—ये पाँच प्रकारके रस हैं। इन सबमेंसे शृङ्गारभाव “सङ्गाभावो हरेर्धीरेरयोग इति कथ्यते।
ही प्रबल है॥ 49 ॥ अयोगे तन्मनस्कत्वं तद्गुणाद्यनुसन्धयः।
'प्रेम' तक शान्तरसके और 'राग' तत्प्राप्त्युपायचिन्ताद्याः सर्वेषां कथिताः क्रियाः॥”
तक दास्यरसकी सीमा :— अर्थात् “पण्डितगण भगवान्के साथ सङ्गके अभावको
शान्तरसे शान्ति-रति ‘प्रेम’ पर्यन्त हय। ‘अयोग’ कहते हैं। अयोगमें हरिमनस्कता अर्थात् हरिमें
दास्य-रति ‘राग’ पर्यन्त क्रमेते बाड़य॥ 50 ॥ मनका समर्पण और हरिके गुणों आदिका अनुसन्धान
‘अनुराग’ तक सख्य और वात्सल्यकी सीमा; उनमेंसे किया जाता है। श्रीकृष्ण प्राप्तिके उपायका चिन्तनादि
सुबलादि प्रियनर्म सखाओंकी भी ‘भाव’ तक सीमा :— दासादि सभी भक्तोंकी क्रिया कही जाती है।”
सख्य-वात्सल्य-रति पाय ‘अनुराग’-सीमा। ‘योग’—
सुबलाद्येर ‘भाव’ पर्यन्त प्रेमेर महिमा॥ 51 ॥ “कृष्णेन सङ्गमो यस्तु स योग इति कीर्त्त्यते”
388 ।
तेइसवाँ अध्याय 23/52-57 ]
अर्थात् “श्रीकृष्णके साथ मिलनको 'योग' कहते हैं। द्वारकामें 'रूढ़' और गोकुलमें ही केवल 'अधिरूढ़'-
हैं।” भाव देखा जाता है ॥ 53 ॥
'शान्तादि रसेर'- शान्त और दास्यमें 'योग और अधिरूढ़-महाभाव भी दो प्रकार का-(1) सम्भोगमें
वियोग', ये दो प्रकारके भेद हैं; उनमें योग और 'मादन'-संज्ञा, (2) विप्रलम्भमें 'मोहन'-संज्ञा :-
अयोगके अनेक भेद नहीं हैं। यद्यपि पाँच प्रकारके अधिरूढ़-महाभाव-दुइ त' प्रकार।
रसोंमें ही योग और अयोगका भेद है, किन्तु सख्य सम्भोगे 'मादन', विरहे 'मोहन' नाम तार ॥ 54 ॥
और वात्सल्यमें बहुतसे विभेद हैं।
'योगविभेद'- अनुवाद-अधिरूढ़ महाभाव दो प्रकारका होता
“योगोऽपि कथितः सिद्धिस्तुष्टिस्थितिरिति त्रिधा" है-सम्भोगमें उसका नाम 'मादन' और विरहमें उसका
अर्थात् “योगके तीन प्रकारके भेद हैं-सिद्धि, तुष्टि नाम 'मोहन' होता है ॥ 54 ॥
और स्थिति।” सम्भोगमय 'मादन' और विप्रलम्भमय 'मोहन'में अनेक
'अयोगविभेद'- प्रकारके भाव-भेदका वैचित्र्य :-
“उत्कण्ठत्वं वियोगश्चेत्ययोगोऽपि द्विधोच्यते” 'मादने'- चुम्बनादि हय अनन्त विभेद ।
अर्थात् “'अयोग' दो प्रकारका होता है- 'उत्कण्ठित' 'उद्घूर्णा', 'चित्रजल्प' - 'मोहने' दुइ भेद ॥ 55 ॥
और 'वियोग' ॥" 52 ॥ अनुवाद- 'मादन'में चुम्बनादि अनन्त भेद हैं।
'मोहन'में 'उद्घूर्णा' और 'चित्रजल्प'-ये दो भेद होते
द्वारकामें ऐश्वर्यमयी स्वकीया मधुर-रतिमें हैं ॥ 55 ॥
'रूढ़-महाभाव' और वृन्दावनमें माधुर्यमयी केवला
पारकीया मधुर-रतिमें 'अधिरूढ़-महाभाव' :- भाः 10/47 अध्याय - भ्रमर-गीतमें विप्रलम्भमें श्रीराधिकादि
'रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव- केवल 'मधुरे'। गोपियोंका दिव्योन्माद :-
महिषीगणेरे 'रूढ़', 'अधिरूढ़' गोपिका-निकरे ॥ 53 ॥ चित्रजल्पेर दश अङ्ग- प्रजल्पादि-नाम।
'भ्रमर-गीता'र दश श्लोक ताहाते प्रमाण ॥ 56 ॥
अनुवाद-रूढ़ और अधिरूढ़ महाभाव तो केवल अनुवाद-प्रजल्पादि चित्रजल्पके दस अङ्ग हैं।
मधुररसमें हैं। महिषियोंमें 'रूढ़' महाभाव और व्रजगोपियोंमें भ्रमर-गीताके दस श्लोक इसके प्रमाण हैं ॥ 56 ॥
'अधिरूढ़' महाभाव रहता है ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चित्रजल्प दस प्रकारका है-
अनुभाष्य- 'अधिरूढ़'- (उःनीः स्थायिभाव-प्रः 170)- प्रजल्प, परिजल्प, विजल्प, उज्जल्प, संजल्प, अवजल्प,
“रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम् । अभिजल्प, आजल्प, प्रतिजल्प और सुजल्प। 'भ्रमर-गीता'—
यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥” श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके 47वें अध्यायमें है ॥ 56 ॥
[अर्थात् “जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें विप्रलम्भमें दिव्योन्मादकी चरम अवस्था - अप्राकृत-
कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको श्रीकृष्णसेवामयी परम-चमत्कारिणी सर्वोत्तमावस्था :-
प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं।”] उद्घूर्णा, विरह-चेष्टा - दिव्योन्माद-नाम।
मधुररसमें मधुर-रति स्नेह, मान, प्रणय, राग, विरहे कृष्णस्फूर्त्ति, आपनाके 'कृष्ण' ज्ञान ॥ 57 ॥
अनुराग, भाव और महाभाव तक वर्धित होती है। रूढ़
और अधिरूढ़-महाभाव केवलमात्र मधुर-रसमें ही विद्यमान अनुवाद-उद्घूर्णा और विरहमें भ्रममय चेष्टाओंका
। 389
[ 23/57-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नाम दिव्योन्माद है। इसमें विरहमें श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति
होती है और भक्त स्वयंको ही 'कृष्ण' मानने लगता
है॥ 57 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 1/87 संख्या देखें॥ 54-57 ॥
दो प्रकारके शृङ्गार-रस-(1) सम्भोग और
(2) विप्रलम्भ; सम्भोग असंख्य प्रकारका :-
'सम्भोग'-'विप्रलम्भ'-भेदे द्विविध शृङ्गार।
'सम्भोगे'र अनन्त अङ्ग, नाहि अन्त तार॥ 58 ॥
अनुवाद-'सम्भोग' और 'विप्रलम्भ'के भेदसे शृङ्गार
रस दो प्रकारका होता है। 'सम्भोग'के अनन्त अङ्ग हैं,
उनका अन्त नहीं है॥ 58 ॥
अनुभाष्य- 'विप्रलम्भ'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरणमें
2-3 श्लोक)-
“यूनोरयुक्तयोर्भावो युक्तयोर्वाथ यो मिथः।
अभीष्टालिङ्गनादीनामनाप्तौ प्रकृष्यते।
स विप्रलम्भो विज्ञेयः सम्भोगोन्नतिकारकः॥”
“न विना विप्रलम्भेन सम्भोगः पुष्टिमश्नुते।”
अर्थात् “नायक-नायिकाके प्रथम मिलनसे पहले
अयुक्त, मिलन होनेके बाद युक्त-इन दोनों समयमें
परस्पर अभीष्ट आलिङ्गनादिकी अप्राप्तिसे जो भाव
होता है, उसे 'विप्रलम्भ' कहते हैं; वह सम्भोगका
पुष्टिकारक है।”
'सम्भोग'-
“दर्शनालिङ्गनादीनामानुकूल्यान्निषेवया।
यूनोरुल्लासमारोहन् भावः सम्भोग ईर्यते॥”
अर्थात् “दर्शन और आलिङ्गनादिके परस्पर
सुख-तात्पर्यमूलक व्यवहारके द्वारा नायक और नायिकाके
उल्लास-प्राप्त भावको 'सम्भोग' कहते हैं।”
इस श्लोककी (1) श्रीजीव-प्रभुकृत-टीका-
'आनुकूल्यादिति काममयः सम्भोगो व्यावृतः।'
अर्थात् “आनुकूल्य कहनेसे काममय अथवा
यथेच्छाचारको पृथक् किया है।”
(2) श्रीचक्रवर्त्ति-टीका-
'पशुवच्छृङ्गारो व्यावृतः।'
अर्थात् “यहाँपर शास्त्रोक्त रीतिसे आचरण-दर्शनादिका
सेवन कहकर पशुवत् शृङ्गारका स्थान नहीं है।”
जाग्रत-अवस्थामें मुख्य-सम्भोग चार प्रकारका है
(1) पूर्वरागके बाद 'संक्षिप्त', (2) मानके बाद 'सङ्कीर्ण',
(3) अल्प दूर प्रवासके बाद 'सम्पन्न' और (4) सुदूर
प्रवासके बाद 'समृद्धिमान्'। स्वप्नावस्थामें गौण-सम्भोग
भी पहलेकी भाँति चार प्रकारका है॥ 58 ॥
चार प्रकारका विप्रलम्भ :-
'विप्रलम्भ' चतुर्विध-पूर्वराग, मान।
प्रवासाख्य, आर प्रेमवैचित्त्य-आख्यान॥ 59 ॥
अनुवाद-'विप्रलम्भ' पूर्वराग, मान, प्रवास और
प्रेम-वैचित्त्यके भेदसे चार प्रकारका है॥ 59 ॥
अनुभाष्य- 'पूर्वराग'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरण पाँचवाँ
श्लोक)-
“रतिर्या सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा॥
तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥”
अर्थात् “जो रति सङ्गमसे पहले दर्शन-श्रवणादिसे
उत्पन्न होकर दोनोंके विभावादिके मिश्रणसे आस्वादमयी
होती है, वही 'पूर्वराग' है।”
'मान'-
“दम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः।
स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥”
अर्थात् “परस्पर अनुरक्त एकत्र अवस्थित अथवा
भिन्न स्थानपर स्थित नायक और नायिकाके अपने
अभीष्टके दर्शन और आलिङ्गनादिका निरोध करनेवाले
भावको 'मान' कहते हैं।”
'प्रवास'-
“पूर्वसङ्गतयोर्यूनोर्भवेद्देशान्तरादिभिः।
व्यवधानस्तु यत्प्राज्ञैः स प्रवास इतीर्यते॥”
अर्थात् “पूर्व-सङ्गमसे युक्त दम्पत्तिकी देशान्तरमें
390 |
तेइसवाँ अध्याय 23/59–63 ]
(दूसरे स्थानमें) गमनादिके कारण उत्पन्न हुई बाधाको
बुद्धिमान् जन 'प्रवास' कहते हैं।”
'प्रेमवैचित्य'—
“प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्षस्वभावतः।
या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्यमुच्यते॥”
अर्थात् “प्रेमोत्कर्ष-स्वभावसे प्रियके सङ्गमें रहनेपर
भी उसके साथ विरहके भयसे जो आर्त्ति उपस्थित होती
है, वही 'प्रेमवैचित्य' है॥”59॥
अनुभाष्य—द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण लीलाविलासके
द्वारा महिषियोंके चित्तका हरण करनेपर वे उनमें
आविष्ट होनेके कारण अति निकट होनेपर भी सदैव
'अभी खो बैठेंगी' 'अभी खो बैठेंगी' भावसे युक्त होकर
उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहती थीं, —
हे कुररि, ईश्वरः (कृष्णः) रात्र्यां गुप्तबोधः (सुप्तचेतनः
इव) स्वपिति (शेते); त्वं तु जगति [एका] वीतनिद्रा [सती]
न शेषे (न स्वपिषि, शयनेच्छामपि न कुरुषे, परन्तु निद्राभङ्गं
कुर्वती) विलपसि (तदनुचितमित्यर्थः)। हे सखि, [अथवा
नापराधस्तव, यतः] वयं इव त्वं नलिन-नयनहासोदारलीलेक्षितेन
(पद्मलोचनस्य भगवतः हासेन सहितम् उदारं यत् लीलेक्षितं
तेन अकुण्ठितस्मितकटाक्षेण) कच्चित् गाढ़-निर्व्विद्धचेता (अतिशयेन
आकृष्टचित्ता)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥
ब्रजमें राधिकादि गोपियों और द्वारकाकी महिषियोंके
विप्रलम्भ भावकी विचित्रता :—
राधिकाद्ये 'पूर्वराग' प्रसिद्ध 'प्रवास', 'माने'।
'प्रेमवैचित्य' श्रीदशमे महिषीगणे॥60॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥
श्रीकृष्ण—नायक-शिरोमणि, श्रीराधा-नायिका-शिरोमणि :—
व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण—नायक-शिरोमणि।
नायिकार शिरोमणि—राधा-ठाकुराणी ॥ 62 ॥
अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण नायक शिरोमणि
और श्रीमती राधा ठाकुरानी नायिकाओंमें शिरोमणि
हैं॥62॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चार प्रकारके विप्रलम्भमेंसे
राधिकादि गोपियोंके 'पूर्वराग', 'प्रवास' और 'मान'—ये
तीन प्रसिद्ध हैं; [भागवत दशम स्कन्धमें] द्वारकामें
महिषियोंमें 'प्रेमवैचित्य' प्रसिद्ध है॥60॥
महिषियोंको श्रीकृष्णवियोगकी आशङ्का :—
श्रीमद्भागवत (10/90/15)—
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोधः।
वयमिव सखि कच्चिद्गाढ़निर्व्विद्धचेता
नलिन-नयन-हासोदार-लीलेक्षितेन॥61॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥
प्रमाण :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/17)—
नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते महागुणाः ॥ 63 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥
अमृतप्रवाह भाष्य—स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही
नायकोंके चूड़ामणि हैं; उन श्रीकृष्णमें सभी महान् गुण
नित्यरूपमें विराजमान हैं॥63॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, कुररि, देखो ! इस
रात्रिकालमें सुप्तचेतनके जैसे ईश्वर श्रीकृष्ण सो रहे हैं
और तुम्हें निद्रा नहीं आनेके कारण तुम सो नहीं रही
हो, केवल विलाप [करके निद्रा भङ्ग] कर रही हो [यह
अनुचित है]। अथवा [तुम्हारा भी अपराध नहीं है]
कमलनयन श्रीकृष्णके हास्य और उदारलीलाके दर्शनसे
हमारी भाँति क्या तुम्हारा चित्त भी अतिशय आकृष्ट
होनेसे ऐसा कर रही हो?॥61॥
अनुभाष्य—
नायकानां मध्ये स्वयं भगवान् कृष्णस्तु शिरोरत्नं (चूड़ामणिः);
यत्र (कृष्णे) सर्वे महागुणाः नित्यतया विराजन्ते (शोभन्ते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥
। 391
[ 23/64–72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ]
[बायाँ स्तम्भ]
श्रीराधिकाके आठ विशेषण :—
बृहद्-गौतमीय तन्त्र-वाक्य—
देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता।
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ॥ 64 ॥
**अनुवाद—**श्रीराधा 'देवी', 'साक्षात्कृष्णमयी', 'राधिका', 'परदेवता', 'सर्वलक्ष्मीमयी', 'सर्वकान्ति', 'कृष्णसम्मोहिनी' और 'पराशक्ति' नामसे कही गयी हैं॥64॥
**अनुभाष्य—**आदिलीला 4/83 संख्या देखें ॥ 64 ॥
श्रीकृष्णके असंख्य सद्गुणोंमेंसे चौंसठ प्रधान गुण :—
अनन्त कृष्णेर गुण, चौषष्टि—प्रधान।
एक एक गुण शुनि' जुड़ाय भक्त-काण ॥ 65 ॥
**अनुवाद—**श्रीकृष्णके अनन्त गुणोंमेंसे उनके चौंसठ प्रधान गुण हैं। उन असंख्य गुणोंमेंसे एक-एक गुणके विषयमें सुनकर भक्तोंके कान तृप्त होते हैं॥65॥
चौंसठ गुणोंकी तालिका; पहले पचास गुणोंका वर्णन :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/23-29)—
अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः।
रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् वयसान्वितः ॥ 66 ॥
विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदः।
वावदूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः ॥ 67 ॥
विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः सुदृढ़व्रतः।
देशकाल-सुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिर्वशी ॥ 68 ॥
स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो गम्भीरो धृतिमान् समः।
वदान्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत् ॥ 69 ॥
दक्षिणो विनयी ह्रीमान् शरणागतपालकः।
सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः सर्वशुभङ्करः ॥ 70 ॥
प्रतापी कीर्त्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः।
नारीगण-मनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान् ॥ 71 ॥
वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्यानुकीर्त्तिताः॥
समुद्रा इव पञ्चाशद्दुर्विगाहा हरेरमी ॥ 72 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 66-72 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**ये नायकरूपी श्रीकृष्ण—1) परम रमणीय अङ्गोंसे युक्त, 2) सब प्रकारके सुलक्षणोंसे युक्त, 3) सुन्दर, 4) महातेजवान्, 5) बलवान्, 6) किशोर अवस्थासे युक्त, 7) विविध अद्भुत भाषाओंको जाननेवाले, 8) सत्यवचन, 9) प्रियवचनोंसे युक्त, 10) वाक्पटु (बात करनेमें निपुण), 11) सुपाण्डित, 12) बुद्धिमान्, 13) प्रतिभायुक्त, 14) विदग्ध (निपुण), 15) चतुर, 16) दक्ष, 17) कृतज्ञ, 18) सुदृढ़व्रत, 19) देश-काल और पात्रको जाननेवाले, 20) शास्त्र दृष्टियुक्त, 21) शुचि (पवित्र), 22) स्वयंको वशमें रखनेवाले, 23) स्थिर, 24) दमनशील, 25) क्षमाशील, 26) गम्भीर, 27) धृतिमान्, 28) समसौम्यचरित्र, 29) वदान्य, 30) धार्मिक, 31) शूर, 32) करुण, 33) मान देनेवाले, 34) दक्षिण, 35) विनयी, 36) लज्जायुक्त, 37) शरणागतपालक, 38) सुखी, 39) भक्तबन्धु, 40) प्रेमवश्य, 41) सर्वशुभकारी, 42) प्रतापी, 43) कीर्त्तिमान्, 44) लोकानुरक्त, 45) साधुओंके समाश्रय, 46) नारीके मनका हरण करनेवाले, 47) सर्वाराध्य, 48) समृद्धिमान्, 49) श्रेष्ठ और 50) ऐश्वर्ययुक्त—इन पचास गुणोंसे युक्त हैं॥66-72॥
अनुभाष्य—
अयं नेता (नायकः कृष्णः) सुरम्याङ्गः (परम-रमणीयाङ्ग-सन्निवेशयुक्तः) सर्वसल्लक्षणान्वितः (सामुद्रिक-शास्त्रोक्त-गुणोत्थद्वात्रिंशच्छुभचिह्नयुक्तः अङ्गोत्थषोडशरेखासमन्वितश्च) रुचिरः (लोचनानन्दिसौन्दर्यविशिष्टः) तेजसायुक्तः (तेजस्वी,) बलीयान् (बली), वयसान्वितः (नित्यकिशोरवयः) विविधाद्भुतभाषावित् (नानापूर्व-भावभाषाकुशलः) सत्यवाक्यः (ऋतगीः), प्रियम्वदः, वावदूकः (श्रुतिमधुररसालङ्कारादियुक्तवचन-प्रयोगक्षमः), सुपाण्डित्यः (अप्राकृतविद्यानिपुणः) प्रतिभान्वितः (नवनवप्रकाश-शालिनीबुद्धियुक्तः), विदग्धः (कलाविलासकुशलः), चतुरः (धीमान्), दक्षः (निपुणः), कृतज्ञः (भक्तप्रेमप्रतिदानकारी), सुदृढ़व्रतः (सत्यसन्धः), देशकालसुपात्रज्ञः (देशकालपात्रवित्), शास्त्रचक्षुः (वेददृक्), शुचिः, वशी (आत्मवशः), स्थिरः (अचलः आफलोदयकर्मकृत्), दान्तः (क्लेशसहिष्णुः), क्षमाशीलः
392 |
तेइसवाँ अध्याय 23/66-75 ]
(पराधसहिष्णुः), गम्भीरः, धृतिमान् (अवरुद्धसौरतः, जितेन्द्रियः), पचास गुण बूँद-बूँदरूपमें सभी जीवोंमें विद्यमान :-
समः (रागद्वेषविहीनः), वदान्यः (उदारः), धार्मिकः, शूरः भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/30)—
(समरे उत्साहान्वितः), करुणः (दयालु), मान्यमानकृत् जीवष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दुबिन्दुतया क्वचित्।
(माननीयजनेषु पूजकः), दक्षिणः (सरलोदारः), विनयी (अमानी), परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे॥73॥
ह्रीमान् (आत्मप्रशंसायां लज्जाशीलः), शरणागतपालकः
(प्रपन्नरक्षकः), सुखी (नित्यामोदी), भक्तसुहृत् (सेवकबन्धुः), अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥73॥
प्रेमवश्यः (प्रेमबाध्यः), सर्वशुभङ्करः (सर्वेषां हितकारी), प्रतापी अमृतप्रवाह भाष्य—ये पचास गुण बिन्दु-बिन्दुरूपमें
(प्रभावशाली), कीर्त्तिमान् (सुभद्रश्रवाः), लोक-रक्तः सभी जीवोंमें हैं, किन्तु परिपूर्ण-समुद्ररूपमें पुरुषोत्तम
(लोकानुरागभाक्), साधुसमाश्रयः (जगति सज्जनपक्षाश्रितः), श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं॥73॥
नारीगणमनोहारी (भुवनमनोमोहनः), सर्वाराध्यः (सर्वेश्वरः), समृद्धिमान्
(वैभवशाली), वरीयान् (श्रेष्ठः), ईश्वरः (प्रभुः) च-इति अमी अनुभाष्य—
पञ्चाशत् गुणाः समुद्राः (पाररहिताः सिन्धवः) इव दुर्विगाहाः एते गुणाः बिन्दुबिन्दुतया क्वचित् जीवेषु वसन्तः अपि
(सम्यक् ज्ञातुम अशक्याः अगाधाः इत्यर्थः)। तत्रैव पुरुषोत्तमे परिपूर्णतया भान्ति।
श्लोक-भावानुवाद—ये नायकरूपी श्रीकृष्ण—परमरमणीय श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥73॥
अङ्गोंसे युक्त, सामुद्रिक-शास्त्रमें कहे गये गुणोंसे उत्पन्न और भी पाँच अधिक गुणोंका वर्णन;
बत्तीस शुभ चिह्नोंसे और अङ्गोंसे उत्पन्न सोलह रुद्रादि श्रेष्ठ-जीवोंमें ये पचपन गुण आंशिकरूपमें
रेखाओंसे युक्त, नेत्रोंको आनन्द देनेवाले सौन्दर्यसे युक्त, और विष्णुमें पूर्णरूपमें नित्य विद्यमान :-
तेजस्वी, बलवान्, नित्यकिशोर अवस्थाके, नाना अपूर्व भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/37-38)—
भाव-भाषामें कुशल, सत्यवचन, प्रिय वचन कहनेवाले, अथ पञ्चगुणा ये स्युरंशेन गिरिशादिषु।
सुननेमें मधुर रस-अलङ्कारादियुक्त वचनोंके प्रयोग करनेमें सदा स्वरूपसम्प्राप्तः सर्वज्ञो नित्यनूतनः ॥74॥
सक्षम, अप्राकृतविद्यामें निपुण, नव-नव प्रकाशशालिनी सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गश्चिदानन्दघनाकृतिः।
बुद्धिसे युक्त, कलाविलासमें कुशल, चतुर, निपुण,
भक्तके प्रेमके प्रतिदानकारी, सुदृढ़व्रत, देश-काल-पात्रको स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् सर्वसिद्धिनिषेवितः ॥75॥
जाननेवाले, वेद-शास्त्रोंके पूर्ण ज्ञाता, पवित्र, आत्मवशकारी, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥74-75॥
फलोदय होने तक कर्म करनेमें अटल, क्लेश सहनेमें अमृतप्रवाह भाष्य—उपरोक्त पचास गुणोंके ऊपर
सहिष्णु, दूसरोंके अपराधके प्रति सहनशील, गम्भीर, और भी पाँच महागुण परिपूर्ण मात्रामें श्रीकृष्णमें
जितेन्द्रिय, रागद्वेषविहीन, उदार, धार्मिक, युद्धमें उत्साहयुक्त, (विष्णुमें) और आंशिक रूपमें शिवादि-देवताओंमें
दयालु, माननीयजनोंके पूजक, सरल और उदार, अपने विद्यमान हैं—(1) सदैव स्वरूपमें स्थित, (2) सर्वज्ञ,
मानकी इच्छा नहीं करनेवाले, आत्मप्रशंसामें लज्जाशील, (3) नित्य-नवीन, (4) सच्चिदानन्दघनीभूतस्वरूप,
शरणागतपालक, नित्य-आमोदी, सेवकबन्धु, प्रेमके वशीभूत, (5) समस्त प्रकारकी सिद्धियोंको वशमें रखनेवाले,
सबके हितकारी, प्रभावशाली, कीर्तिमान्, लोगोंके अनुरागके इसलिये सभी सिद्धियोंके द्वारा भलीभाँति सेवित॥74-75॥
पात्र, साधुजनोंके आश्रय, त्रिभुवनके मनको मोहन
करनेवाले, सर्वेश्वर, वैभवशाली, श्रेष्ठ, और प्रभु हैं। अनुभाष्य—
उनके ये पचास गुण अपार सिन्धुके समान हैं जिन्हें अथ गिरिशादिषु (शिवादिषु) ये पञ्चगुणाः अंशेन (अपूर्णभावेन)
सम्पूर्ण रूपसे जाननेमें कोई भी सक्षम नहीं है-यह स्युः (वर्त्तन्ते, ते उच्यन्ते);-सदास्वरूप-सम्प्राप्तः (मायया
अर्थ है॥66-72॥ अनभिभाव्यानुभूतिविशिष्टः), सर्वज्ञः (अभिज्ञः, भूतभविष्यद्वर्त्तमानेति
। 393
[ 23/74-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
त्रिकालज्ञः), नित्यनूतनः (स्वमाधुरीभिः अननुभूतः इव
नवनवायमानः), सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गश्चिदानन्दघनाकृतिः (घन-
सच्चिदानन्दविग्रहाकारः) सर्वसिद्धिनिषेवितः (सर्वैः प्राप्यफलैरर्चित-
चरणः) स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् [पाठान्तरे, स्ववशेत्यादि-
शेषद्विचरणयोरभावः]।
श्लोक-भावानुवाद—[श्रीकृष्णमें (विष्णुमें) परिपूर्ण
मात्रामें] अन्य पाँच महागुण आंशिक रूपमें
शिवादि-देवताओंमें विद्यमान हैं—(1) मायाकार्यके वशीभूत
नहीं हैं, (2) सर्वज्ञ अर्थात् भूत-वर्तमान-भविष्य-तीनों
कालोंको जाननेवाले, (3) नित्य-नवीन अर्थात् जो
अननुभूतके समान अपनी माधुरीके द्वारा चमत्कारिता
सम्पादन करते हैं, (4) सच्चिदानन्दघनीभूतस्वरूप,
(5) समस्त प्रकारकी सिद्धियाँ जिनकी सदा सेवा करती
हैं, इसलिये वे समस्त सिद्धियोंको वशमें रखनेवाले हैं।
[पाठान्तरमें—श्लोकमें स्ववशादि दो चरण नहीं हैं] ॥ 74-75 ॥
श्रीनारायणमें और भी पाँच अधिक गुण अर्थात्
साठ गुण परिपूर्ण रूपमें अवस्थित :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/39-40)—
अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च ये लक्ष्मिशादि-वर्त्तिनः।
अविचिन्त्यमहाशक्तिः कोटिब्रह्माण्डविग्रहः॥ 76 ॥
अवतारावलीबीजं हतारिगतिदायकः।
आत्मारामगणाकर्षीत्यमी कृष्णे किलाद्भुताः॥ 77 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 76-77 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—परव्योमनाथ श्रीनारायणादिमें और
भी पाँच गुण विद्यमान हैं। वे श्रीकृष्णमें भी परिपूर्ण
मात्रामें रहते हैं, किन्तु शिवादि देवताओं अथवा जीवोंमें
नहीं हैं। (1) असीम महाशक्तिशाली, (2) करोड़ों
ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त विग्रहवाले, (3) सब अवतारोंके बीज
स्वरूप, (4) मारे गये शत्रुओंको भी सुगति प्रदान
करनेवाले, (5) आत्मारामजनोंको (ब्रह्मभूत मुक्त
परमहंसजनोंको) भी आकर्षित करनेवाले—ये पाँच गुण
श्रीनारायणादिमें होनेपर भी श्रीकृष्णमें अद्भुतरूपमें
विराजमान हैं॥ 76-77 ॥
अनुभाष्य—
अथ लक्ष्मिशादिवर्त्तिनः (लक्ष्मीपति-नारायणादि-विग्रहे
वर्त्तमानाः) ये पञ्चगुणाः, ते उच्यन्ते—अविचिन्त्य-महाशक्तिः
(अपरिमेय-महाशक्तिशाली), कोटिब्रह्माण्डविग्रहः (कोटिब्रह्माण्ड-
व्यापी विग्रहो यस्य सः), अवतारावलीबीजं (निखिलावतार-कारणं),
हतारिगतिदायकः (निहतशत्रूणामपि मुक्तिदाता), आत्मारामगणाकर्षी
(ब्रह्मभूतमुक्तपरमहंसानामपि आकर्षकः) इति अमी (गुणाः)
कृष्णे अद्भुताः किल।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 76-77 ॥
स्वयं श्रीकृष्णमें श्रीनारायणकी अपेक्षा और भी
चार निजी अधिक गुण अर्थात् कुल चौंसठ
गुण परिपूर्णमात्रामें नित्य-विद्यमान :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/41-44)—
सर्वाद्भुतचमत्कार-लीलाकल्लोलवारिधिः।
अतुल्यमधुरप्रेम-मण्डितप्रियमण्डलः॥ 78 ॥
त्रिजगन्मानसाकर्षि-मुरलीकलकूजितः।
असमानोर्ध्वरूपश्री-विस्मापितचराचरः॥ 79 ॥
लीला-प्रेम्णा प्रियाधिक्यं माधुर्यं वेणुरूपयोः।
इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्दस्य चतुष्टयम्।
एवं गुणाश्चतुर्भेदाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः॥ 80 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78-80 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इन साठ गुणोंके अतिरिक्त और
भी चार गुण श्रीकृष्णमें प्रकाशित है; वे श्रीनारायणमें भी
प्रकाशित नहीं हैं—(1) सभी लोगोंको चमत्कृत कर
देनेवाली लीलाओंका कल्लोल-समुद्र, (2) शृङ्गाररसके
अतुलनीय प्रेमकी शोभासे युक्त प्रियाओंके द्वारा सदा
परिवेष्टित, (3) [गोलोक, परव्योम और देवीधाम, इन]
तीनों लोकोंके चित्तको आकर्षित करनेवाली मुरलीके
गीतका गान करनेवाले, (4) जिनके समान और जिनसे
श्रेष्ठ कोई नहीं है और जो चराचरको अपने सौन्दर्यसे
विस्मित करते हैं। इस प्रकारकी (प्रेममयी) लीला, अति
उत्कृष्ट प्रियाका सङ्ग (अर्थात् प्रेमिक-प्रियजनोंके प्रति
वात्सल्य), रूपमाधुर्य और वेणुमाधुर्य—ये चार श्रीकृष्णके
394 ।