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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

तेइसवाँ अध्याय 23/78-86 ]
असाधारण गुण हैं। चार प्रकारके भेदसे अर्थात्
साधारण-जीव, शिवादि देवता, श्रीनारायणादि परमेश्वर-
स्वरूप और साक्षात् (स्वयंरूप) श्रीगोविन्दके भेदसे,
कुल मिलाकर चौंसठ गुण बतलाये गये हैं॥78-80॥
अनुभाष्य-
सर्वाद्भुतचमत्कार-लीला-कल्लोल-वारिधिः (सर्वेषाम् अद्भुतानां
चमत्कारः विस्मयोत्पादकः यतः एवम्भूता या लीलाकल्लोलानां
तरङ्गाणां वारिधिः, सकलविचित्रविस्मयकारिणी-लीलाश्रयः)
अतुल्यमधुरप्रेममण्डितप्रियमण्डलः (अतुल्येन मधुर-प्रेम्णा मण्डितः
प्रियजनसमूहः येन सः, अनुपम-मधुरप्रेमालङ्कृत निजप्रेष्ठजनः)
त्रिजगन्मानसाकर्षिमुरलीकल-कूजितः (गोलोक-परव्योम-देवीधामेति
त्रयाणां त्रिजगतां मानसानि आकृष्टं शीलमस्य तथाभूतं मुरल्याः
वंश्याः कलं मधुरास्फुटं कूजितं ध्वनिः यस्य सः),
असमानोध्र्वरूपश्रीविस्मापित-चराचरः (येन सह समं यतः
ऊर्ध्वं रूपम् अन्येषां नास्ति, तादृशाद्वितीय-सौन्दर्य-श्रिया विस्मापितं
कौतुहलोत्पादितं चराचरं स्थिर-जङ्गमं येन सः)। लीलाप्रेम्णा
प्रियाधिक्यं वेणुरूपयोः माधुर्यम् इति गोविन्दस्य असाधारणं
चतुष्टयं [लक्षणं] प्रोक्तम्-एवं चतुर्भेदाः गुणाः [सर्वसाकल्येन]
चतुःषष्टिः उदाहृताः।
श्लोक-भावानुवाद- अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥78-80॥
श्रीराधिकाके श्रीकृष्णको आकर्षित करनेवाले
पचीस गुणोंका वर्णन :-
अनन्त गुण श्रीराधिकार, पँचिश-प्रधान।
येइ गुणेर 'वश' हय कृष्ण भगवान्॥81॥
अनुवाद- श्रीमती राधिकाके भी अनन्त गुण हैं,
जिनमेंसे पचीस प्रधान गुण हैं। श्रीमती राधिकाके इन
गुणोंके द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण भी वशीभूत हो जाते
हैं॥81॥
उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीराधाप्रकरण (11-15)में :-
अथ वृन्दानेश्वर्याः कीर्त्यन्ते प्रवरा गुणाः।
मधुरेयं नववयाश्चलापाङ्गोज्ज्वलस्मिता॥82॥
चारु-सौभाग्यरेखाढ्या गन्धोन्मादितमाधवा।
सङ्गीतप्रसराभिज्ञा रम्यवाक् नर्मपण्डिता॥83॥
विनीता करुणापूर्णा विदग्धा पाटवान्विता।
लज्जाशीला सुमर्यादा धैर्या गाम्भीर्यशालिनी॥84॥
सुविलासा महाभावपरमोत्कर्षतर्षिणी।
गोकुलप्रेमवसतिर्जगच्छ
गुर्वर्पितगुरुस्नेहा सखीप्रणयितावशा।
कृष्णप्रियावलीमुख्या सन्तताश्रव-केशवा॥86॥
अनुवाद- अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥82-86॥
अमृतप्रवाह भाष्य- अब वृन्दानेश्वरी श्रीराधिकाके
प्रधान-प्रधान गुणोंका वर्णन किया जा रहा है,-
(1) माधुर्यवती, (2) नवीनवयसयुक्ता अर्थात् किशोरी,
(3) चञ्चल-नेत्रोंवाली, (4) उज्ज्वल-हास्यसे युक्त,
(5) सुन्दर-सौभाग्य रेखाओंसे युक्त, (6) अपनी सुगन्धसे
श्रीकृष्णको उन्मादित करनेवाली, (7) सङ्गीतके विस्तारमें
पारदर्शी, (8) रमणीय वाणीसे युक्त, (9) नर्म-परिहासादि
गुणोंमें पण्डिता, (10) विनीता, (11) करुणा-पूर्णा,
(12) चतुरा, (13) कर्त्तव्य-कुशला, (14) लज्जाशीला,
(15) सुमर्यादा पालनकारिनी, (16) धैर्ययुक्ता,
(17) गाम्भीर्यमयी, (18) सुविलासयुक्ता, (19) परमोत्कर्षमें
महाभावमयी, (20) गोकुलवासियोंके प्रेमकी आश्रय,
(21) अखिल ब्रह्माण्डमें यश-युक्ता, (22) गुरुजनोंमें
समर्पित गुरुस्नेहवती, (23) सखियोंके प्रणयके वशीभूत
रहनेवाली, (24) श्रीकृष्णप्रिया रमणियोंमें मुख्या,
(25) सदा श्रीकेशवको अपने अधीन करनेवाली॥82-86॥
अनुभाष्य-
अथ वृन्दानेश्वर्याः (श्रीराधिकायाः) प्रवराः (प्रधानाः)
गुणाः कीर्त्यन्ते,- इयं (श्रीराधिका) मधुरा (माधुर्यवती), नववयाः
(नवं वयः यस्याः सा, किशोरी), चलपाङ्गा (चलः चञ्चलः
अपाङ्गः यस्याः सा), चारुसौभाग्यरेखाढ्या (चारवः सौभाग्यरेखाः
ताभिः आढ्या युक्ता), गन्धोन्मादितमाधवा (गन्धेन स्वीयाङ्गसुरभिणा
उन्मादितः माधवो यया), सङ्गीत-प्रसराभिज्ञा (सङ्गीतस्य प्रसरे
विस्तारे अभिज्ञा पारदर्शिनी), रम्यवाक् (रम्या श्रुतिमनोज्ञा
वाक् यस्याः सा), नर्मपण्डिता (नर्मणि परिहासकर्मणि पण्डिता
। 395

अभिज्ञा), विनीता (नम्रा), करुणापूर्णा (स्वाश्रित गोपी-दुःखसहने
असमर्था, परम-दयामयी), विदग्धा (रतिकलाभिज्ञा) पाटवान्विता
(कर्त्तव्य-कुशला), लज्जाशीला (स्वप्रशंसायां वीतस्पृहा), सुमर्यादा
(कृष्ण-गौरविणी), धैर्या (धीरा) गाम्भीर्यशालिनी (अचञ्चला),
सुविलासा (लीलामयी), महाभावपरमोत्कर्षतर्षिणी (महाभावस्य
परमोत्कर्षविषये तृष्णान्विता), गोकुलप्रेमवसतिः (गोकुलवासिनां
प्रेमास्पदं), जगच्छ्र
लसन्ति यशांसि यस्याः सा), गुर्वर्पित-गुरुस्नेहा (गुरुजनानामधिक-
स्नेह पात्री), सखीप्रणयितावशा (सखीनां प्रणयितस्य प्रणयभावस्य
वशा वशीभूता), कृष्णप्रियावली-मुख्या (कृष्णप्रेष्ठा),
सन्तताश्रवकेशवा (सन्ततं अविरतम् आश्रवः वशंवदः केशवः
यस्याः सा)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 82-86 ॥

दो प्रकारके आलम्बन—(1) एकमात्र ‘विषय’ श्रीकृष्ण
और (2) बहुत प्रकारके ‘आश्रय’,
उनमेंसे श्रीराधाकी सर्वश्रेष्ठता :—
नायक-नायिका,—दुइ रसेर ‘आलम्बन’।
सेइ दुइ श्रेष्ठ,—राधा, व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 87 ॥

अनुवाद—नायक और नायिका,—ये दोनों रसके
आलम्बन हैं। श्रीराधा और श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही
सर्वश्रेष्ठ नायिका और नायक हैं॥ 87 ॥

शान्तके अतिरिक्त अन्य सेवकोंकी चार प्रकारके रसोंमें
श्रीकृष्णसेवाका वर्णन :—
एइमत दास्ये दास, सख्ये सखागण।
वात्सल्ये माता पिता आश्रयालम्बन ॥ 88 ॥
एइ रस अनुभावे यैछे भक्त-गण।
यैछे रस हय, शुन ताहार लक्षण ॥ 89 ॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 88-89 ॥
अनुभाष्य—जिस प्रकार व्रजेन्द्रनन्दन और वृषभानु-
कुमारी मधुर-रसमें दो श्रेष्ठ आलम्बन हैं, उसी प्रकार
दास्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और चित्रक, रक्तक, पत्रक
आदि एवं सख्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और श्रीदाम, सुदाम,
सुबलादि सखा और वात्सल्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और
नन्द-यशोदादि ही श्रेष्ठ ‘आलम्बन’ हैं॥ 88-89 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/7-10)—
भक्तिनिर्धूत-दोषाणां प्रसन्नोज्ज्वलचेतसाम्।
श्रीभागवतरक्तानां रसिकासङ्गरङ्गिणाम् ॥ 90 ॥
जीवनीभूत-गोविन्दपादभक्तिसुखाश्रियाम्।
प्रेमान्तरङ्गभूतानि कृत्यान्येवानुतिष्ठताम् ॥ 91 ॥
भक्तानां हृदि राजन्ती संस्कारयुग्लोज्ज्वला।
रतिरानन्दरूपैव नीयमाना तु रस्यताम् ॥ 92 ॥
कृष्णादिभिर्विभावाद्यैर्गतैरनुभवाध्वनि।
प्रौढानन्दचमत्कारकाष्ठामपद्यते पराम् ॥ 93 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 90-93 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो भक्तिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे
धोये गये दोषोंसे मुक्त, प्रसन्न और उज्ज्वलचित्त,
श्रीभागवतमें अनुरक्त, रसिकोंके सङ्गमें रङ्गयुक्त
(आनन्दित), श्रीगोविन्दचरणोंकी भक्तिसुखश्री ही जिनका
जीवनस्वरूप है, प्रेमके अन्तरङ्ग सभी कार्योंका अनुष्ठान
करनेवाले उन भक्तोंके हृदयमें प्राचीन और आधुनिक
संस्कारोंके द्वारा उज्ज्वला आनन्दरूपी रति रसता प्राप्त
करके विराजमान होती है। वह श्रीकृष्णादि विभावादिके
द्वारा अनुभवके पथपर प्रौढ़ानन्द-चमत्काररूपी
पराकाष्ठाको प्राप्त होती है॥ 90-93 ॥

अनुभाष्य—
भक्तिनिर्धूतदोषाणां (भक्त्या निर्धूताः क्षालिताः दोषाः येषां)
प्रसन्नोज्ज्वलचेतसां (प्रसन्नम् उज्ज्वलं चेतः येषां) श्रीभागवतरक्तानां
(श्रीभागवतार्थानां आस्वादने अनुरक्तानां) रसिकासङ्गरङ्गिणां
(रसिकैः सह रसास्वादन-तत्पराणां) जीवनीभूत-
गोविन्दपादभक्तिसुखश्रिया (जीवनीभूता गोविन्दपाद-भक्तिसुखश्रीः
कृष्णसेवामुखसम्पत्तिः येषां) प्रेमान्तरङ्गभूतानि (प्रेम्णः अन्तरङ्ग-
भूतानि) कृत्यानि (अनुष्ठानादीनि) अनुतिष्ठतां भक्तानां हृदि
संस्कारयुग्लोज्ज्वला आनन्दरूपा रतिः एव राजन्ती। तु

तेइसवाँ अध्याय 23/90-99 ]
अनुभावाध्वनि (अनुभव-मार्गे) कृष्णादिभिः विभावाद्यैः गतैः
रस्यतां (रसत्वं) नीयमाना परां प्रौढ़ानन्दचमत्कारकाष्ठां
(सान्द्रानन्दपराकाष्ठाम्) आपद्यते (प्राप्नोति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 90-93॥
यह चिन्मय अप्राकृत रसास्वादन-अद्वयज्ञान-श्रीकृष्णसे
युक्त मुक्त श्रीकृष्ण-भक्तोंके लिये ही सम्भव,
जड़ीय कुरसिकोंके पक्षमें असम्भव :-
एइ रस आस्वाद नाहि अभक्तेर गणे।
कृष्णभक्तगण करे रस आस्वादने॥ 94॥
अनुवाद—इन रसोंका आस्वादन अभक्तगण नहीं
कर सकते, केवल श्रीकृष्णके शुद्धभक्त ही इन रसोंका
आस्वादन करते हैं॥ 94॥
शास्त्रप्रमाण :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/131)—
सर्वथैव दुरूहोऽयमभक्तैर्भगवद्रसः।
तत्पादाम्बुजसर्वस्वैर्भक्तैरेवानुरस्यते॥ 95॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अभक्तोंके लिये यह भगवद्-रस
सब प्रकारसे दुर्लभ है, श्रीकृष्ण-चरणकमल ही जिनके
सर्वस्व हैं, भक्तिरस—उन्हींको ही प्राप्त होता है॥ 95॥
अनुभाष्य—
अभक्तैः (भुक्तिमुक्तिपिपासुभिः हरिविमुखैः जनैः) अयं भगवद्रसः
सर्वथा एव दुरूहः (दुर्लभः), किन्तु तत्पादाम्बुजसर्वस्वैः
(ऐकान्तिकभक्तैः) एव अनुरुस्यते (आस्वाद्यः स्यात्)।
श्लोक-भावानुवाद—भुक्ति-मुक्ति-पिपासु हरिविमुख-
जनोंके लिये यह भगवद्-रस सर्वथा दुर्लभ है, किन्तु
श्रीकृष्णके ऐकान्तिक भक्त ही उसका आस्वादन करते
हैं॥ 95॥
प्रयोजन-तत्त्व-विचार संक्षेपमें वर्णित :-
संक्षेपे कहिलुँ एइ 'प्रयोजन'-विवरण।
पञ्चम-पुरुषार्थ—एइ 'कृष्णप्रेम' महाधन॥ 96॥
अनुवाद—मैंने 'प्रयोजन' तत्त्वका संक्षेपमें वर्णन
किया है। श्रीकृष्ण प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम-पुरुषार्थ
है॥ 96॥
पहले प्रयागमें दशाश्वमेध घाटपर श्रीरूपको
श्रीकृष्णरसकी शिक्षा-प्रदान :-
पूर्वे प्रयागे आमि रसेर विचारे।
तोमार भाइ रूपे कैलुँ शक्तिसञ्चारे॥ 97॥
अनुवाद—मैंने कुछ समय पूर्व प्रयागमें तुम्हारे भाई
रूपमें शक्तिका सञ्चार करके उसे रस-तत्त्वके विचारका
श्रवण कराया था॥ 97॥
महाप्रभुके द्वारा वैष्णवाचार्य श्रीसनातनको आचार्योचित चार
साम्प्रदायिक सेवाओंका दायित्व देना :-
तुमिह करिह भक्तिशास्त्रेर प्रचार।
मथुराय लुप्ततीर्थेर करिह उद्धार॥ 98॥
वृन्दावने कृष्णसेवा, वैष्णव-आचार।
भक्तिस्मृतिशास्त्र करि' करिह प्रचार॥ "99॥
अनुवाद—तुम भी भक्ति-शास्त्रोंका प्रचार करना
और मथुरामें लुप्त-तीर्थोंका उद्धार करना। वृन्दावनमें
श्रीकृष्णकी सेवाको प्रकाशित करना और वैष्णव-आचार
और भक्तिमूलक स्मृतिशास्त्रोंके द्वारा वैष्णवोंके लिये
उचित आचरणका प्रचार करना॥ "98-99॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भक्ति-स्मृतिशास्त्र'—
'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ॥ 99॥
अनुभाष्य—'भक्तिशास्त्रेर प्रचार'—श्रीदशम-स्कन्धकी
टिप्पणी 'बृहद्-वैष्णवतोषणी' और बृहद्भागवतामृतादि ग्रन्थ
प्रकाश करके (1) शुद्धभक्तिके सिद्धान्तका संस्थापन,
(2) लुप्त तीर्थोंका उद्धार—वृन्दावनके कुण्डादि और
अन्यअन्य स्थानोंका निरूपण, (3) वृन्दावनमें श्रीकृष्णसेवा—
श्रीमूर्तिको प्रकट करके सेवाका प्रकाश, (4) वैष्णव-
आचार—वैष्णव-स्मृतिग्रन्थका सङ्कलन करके वैष्णव-
सदाचारका प्रवर्तन और प्रचार एवं वैष्णव-समाजमें
। 397

[ 23/99-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
संस्थापन,—महाप्रभुने इन चार साम्प्रदायिक सेवाओंका
भार श्रीसनातन गोस्वामीको प्रदान किया॥99॥
युक्त-वैराग्य ही जीवका काम्य और साध्य
एवं फल्गु-वैराग्य-सब प्रकारसे त्यागने योग्य :-
युक्तवैराग्य स्थिति सब शिखाइल।
शुष्कवैराग्य-ज्ञान सब निषेधिल॥100॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको युक्त-
वैराग्यमें स्थित रहनेकी सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान की और
जिस ज्ञानसे शुष्क-वैराग्य होता है, उसका निषेध
किया॥100॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण-सम्बन्धसे जगत्‌को
व्यवहार करनेसे ही 'युक्त-वैराग्य' होता है, जगत्‌को
'तुच्छ' मानकर संन्यास ग्रहण करनेसे ही 'शुष्क-वैराग्य'
होता है॥100॥
अनुभाष्य-यहाँ पाठान्तरमें भक्तिरसामृतसिन्धुके
पूर्वविभागकी द्वितीय लहरीसे ये दो श्लोक उद्धृत हुए
हैं,—
“अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः।
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”
“प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि-वस्तुनः।
मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते॥”
[अर्थात् “कृष्णेतर विषयोंमें आसक्तिरहित होकर
और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध स्थापितकर, उनके
सेवानुकूल विषयमात्र ग्रहण करनेको ही युक्त वैराग्य
कहते हैं।” “मुमुक्षुगण शास्त्र, श्रीमूर्त्ति, नाम, महाप्रसाद,
गुरु आदि हरि सम्बन्धी वस्तुको भी प्राकृत समझकर
उनका परित्याग कर देते हैं, इसीको फल्गु वैराग्य कहते
हैं।”]॥100॥
गीतामें श्रीकृष्णप्रिय भक्तोंके तटस्थ-लक्षणोंका निर्देश :-
श्रीमद्भगवद्गीता (12/13-20)में—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥101॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥102॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥101-102॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो भक्त सभी प्राणियोंसे द्वेष-
रहित, मित्रतासे युक्त, करुण, ममता-रहित (उदासीन),
अहङ्कारशून्य, सुख और दुःखके प्रति समान बुद्धि
रखनेवाला, क्षमाशील, सदैव सन्तुष्ट, संयत स्वभाववाला,
दृढ़-निश्चयकारी, भक्ति-योगी और मुझमें मन और
बुद्धिको अर्पित करनेवाला होता है—वह मेरा प्रिय
है॥101-102॥
अनुभाष्य-
सर्वभूतानां (सकलजीवानाम्) अद्वेष्टा (हिंसारहितः), मैत्रः
(उत्तमेषु द्वेषशून्यः समेषु मित्रतया वर्त्तते यः सः), करुणः
(हीनेषु कृपालुः), निर्ममः (ममतारहितः, उदासीनः), निरहङ्कारः,
समदुःखसुख (सुखदुःखे तुल्यभावविशिष्टः), क्षमी
(अपराधसहनशीलः), सततं (लाभेऽलाभे च) सन्तुष्टः
(सुप्रसन्न-चित्तः), योगी (अप्रमत्तः), यतात्मा (संयतस्वभावः),
दृढनिश्चयः (मद्विषये निश्चयः यस्य सः), मयि अर्पितमनोबुद्धि
(अर्पिते मनोबुद्धी येन, एवम्भूतः) यः मद्भक्तः, सः मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-सभी जीवोंके प्रति हिंसारहित,
उत्तमसे द्वेषशून्य, समानसे मित्रता, हीनके प्रति कृपालु,
उदासीन, निरहङ्कार, सुख-दुःखमें समभावयुक्त, क्षमाशील
अर्थात् अपराधसहनशील, सदा लाभ-हानिमें सुप्रसन्न-
चित्त, अप्रमत्त, संयतस्वभाव, मेरे विषयमें दृढ़ निश्चयकारी,
मुझमें अर्पित मनोबुद्धि जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय
है॥101-102॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥103॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥103॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिससे किसीको उद्वेग नहीं
मिलता, जो किसीसे उद्वेगको नहीं प्राप्त होता और
हर्ष-क्रोध-भयरूप उद्वेगसे मुक्त है, वही मेरा प्रिय
है॥103॥
398 ।

तेइसवाँ अध्याय 23/103-107 ]
अनुभाष्य-
यस्मात् (सकाशात्) लोकः न उद्विजते (भयशङ्कया संक्षोभं
ना प्राप्नोति), यः च लोकान् न उद्विजते, यः च हर्षामर्षभयोद्वेगैः
(हर्षः स्वस्य इष्टार्थलाभे उत्साहः, अमर्षः परस्य लाभे
अंसहनं, भयं त्रासः, उद्वेगः भयादिनिमित्तचित्तक्षोभः, एतैः) यः
मुक्तः स च मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-जिससे किसीको भय, शङ्का
अथवा क्षोभ नहीं होता, जो लोगोंसे उद्वेगको नहीं प्राप्त
करता, जो हर्ष (अर्थात् अपने वाञ्छित लाभमें
उत्साह), अमर्ष (अर्थात् दूसरोंके लाभमें असहनशील)
और भयादिसे चित्तमें क्षोभसे मुक्त है, वह मुझे प्रिय
है ॥ 103 ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ 104 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा जो भक्त-अपेक्षाशून्य,
पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथारहित, सर्वारम्भत्यागी है,
वह-मेरा प्रिय है ॥ 104 ॥
अनुभाष्य-
यः अनपेक्षः (अन्यापेक्षारहितः यदृच्छयोपस्थितेऽप्यर्थे निःस्पृहः),
शुचिः (बाह्याभ्यन्तर-शौचसम्पन्नः), दक्षः (अनलसः), उदासीनः
(पक्षपातरहितः), गतव्यथः (आधिशून्यः), सर्वारम्भपरित्यागी
(सर्वान् दृष्टादृष्टार्थान् आरम्भानुद्यमान् परित्यक्तु
एवम्भूतः भक्तः), स मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-जो अपेक्षाशून्य अर्थात् वञ्छित
वस्तु उपलब्ध होनेपर भी उसमें स्पृहाहीन, बाहर और
भीतरसे पवित्र, आलस्यशून्य, पक्षपातरहित, व्यथाशून्य,
सभी दृष्ट और अदृष्ट कार्यके आरम्भको त्यागनेका
स्वभाववाला है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है ॥ 104 ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ 105 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 105 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो-हर्ष, द्वेष, शोक और
आकाङ्क्षारहित है और जो शुभ-अशुभ फलत्यागी और
भक्तिमान् है, वह-मेरा प्रिय है ॥ 105 ॥
अनुभाष्य-
यः [प्रियं प्राप्य] न हृष्यति, [अप्रियं प्राप्य] न द्वेष्टि,
[इष्टार्थनाशे सति यः] न शोचति, [अप्राप्तमर्थं यः] न
काङ्क्षति, शुभाशुभपरित्यागी (शुभाशुभे पुण्यपापे परित्यक्तु
यस्य सः) [एवम्भूतः भूत्वा यः मयि] भक्तिमान् स मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-जो प्रिय वस्तुको प्राप्त करके
हर्षित नहीं होता, अप्रियकी प्राप्तिसे द्वेष नहीं करता,
इष्ट वस्तुके नाश होनेपर शोक नहीं करता, अप्राप्त
वस्तुके लिये कामना नहीं करता, पुण्य और पाप-
दोनोंको त्याग करनेवाला है, ऐसा वह भक्तिमान् मेरा
प्रिय है ॥ 105 ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 106 ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥ 107 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 106-107 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-शत्रु-मित्र और मान-अपमानमें
समबुद्धि, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखमें समबुद्धि,
आसक्तिरहित, निन्दा और स्तुतिमें एक जैसा विचार
रखनेवाला, मौनी (संयत वाणी), जैसे-तैसे जो प्राप्त हो
उसमें ही सन्तुष्ट, गृहरहित, स्थिरमतिवाला भक्तिमान्
व्यक्ति मेरा प्रिय है ॥ 106-107 ॥
अनुभाष्य-
शत्रौ मित्रे च तथा मानापमानयोः (सम्मानासम्मानेषु) अपि
समः (एकः तुल्यव्यवहारः इत्यर्थः), शीतोष्ण-सुखदुःखेषु
(शीतोष्णयोः सुखदुःखयोः च), समः (तुल्यः), सङ्गविवर्जितः
(क्वचिदप्यनासक्तः, अपरसहायहीनः वा), तुल्यनिन्दास्तुतिः (तुल्या
निन्दा स्तुतिश्च यस्य सः, प्रशंसा-निन्दा-सम-बुद्धिः इत्यर्थः)
मौनी (संयतवाक्), येन केनचित् (यथालब्धेन) सन्तुष्टः,
अनिकेतः (नियतवासशून्यः गृहवर्जितः इत्यर्थ), स्थिरमतिः
। 399

[ 23/106-111 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(व्यवस्थितचित्तः, एवम्भूतः यः मयि) भक्तिमान् नरः, सः मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106-107 ॥
ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ 108 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो इस (गीताके बारहवें अध्यायके श्लोक 2 से 19 तक वर्णित) धर्मामृतमें श्रद्धायुक्त और मेरे परायण होकर उपासना करते हैं, वे मेरे भक्त हैं और मुझे अतिशय प्रिय हैं॥ 108 ॥
अनुभाष्य—
ये (भक्ताः) यथोक्तं (उक्तप्रकारम्) इदं धर्मामृतं (धर्ममेवामृतम् अमृतसाधनत्वात्) पर्युपासते (अनुतिष्ठन्ति), श्रद्दधानाः (श्रद्धां कुर्वन्तः) मत्परमाः च (मन्निष्ठाः सन्तः) मद्भक्ताः ते मे अतीव प्रियाः [भवन्ति]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥
भक्तिके अनुगामी शुद्ध-वैराग्य-मूलक-वाक्य :—
श्रीमद्भागवत (2/2/5)में—
चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां
नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन्।
रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति नोपसन्नान्
कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान् ॥ 109 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अहो, क्या मार्गमें फटे-पुराने वस्त्र नहीं पड़े रहते, सभी वृक्ष क्या भिक्षा दान नहीं करते, क्या सब नदियाँ आदि सूख गयी हैं? गुफाएँ क्या बन्द हो गयी हैं? ईश्वर क्या शरणागत व्यक्तियोंका पालन नहीं करते? यदि ऐसा ही है, तो पण्डित लोग धनके दुर्मदमें अन्धे (नष्ट-विवेक) व्यक्तियोंका क्यों भजन करते हैं? ॥ 109 ॥
अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितको स्थूल-जगत्के धारणामय भोगके प्रति स्पृहाशून्य होकर अनासक्त भावसे जितनेमें निर्वाह हो जाय, उतनी ही वस्तुओंको ग्रहण करनेके युक्त-वैराग्यकी बात बतला रहे हैं,—
पथि चीराणि (छिन्नवस्त्रखण्डानि) किं न सन्ति (त्यक्तानि, न वर्तन्ते)? परभृतः (परान् बिभ्रति फलादिभिः पुष्णन्ति ये तथाभूताः) अङ्घ्रिपाः (वृक्षाः) भिक्षां न एव दिशन्ति (न दास्यन्ति किम्)? सरितः (सरांसि नद्यः) अपि अशुष्यन् (शुष्काः किम्)? गुहाः (गिरिदर्यः) रुद्धाः किम्? अजितः (विष्णुः) उपसन्नान् (शरणागतान्) किं न अवति (रक्षति)? [यद्येवं, तदा] कवयः (हरिरसविदः पण्डिताः) कस्मात् (केन हेतुना) धनदुर्मदान्धान् (धनेन यः दुर्मदः तेन अन्धान् नष्ट-विवेकान्) भजन्ति (अनुगच्छन्ति)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 109 ॥
श्रीसनातनके परिप्रश्नके उत्तरमें महाप्रभुके द्वारा भागवतके गूढ़ सिद्धान्तका वर्णन :—
तबे सनातन सब सिद्धान्त पुछिला।
भागवत-गूढ़सिद्धान्त प्रभु सकलि कहिला॥ 110 ॥
हरिवंशे कहियाछे गोलोके नित्यस्थिति।
इन्द्र आसिं करिल यबे श्रीकृष्णरे स्तुति॥ 111 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे इन सब विचारोंको श्रवण करनेके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने बहुतसे सिद्धान्तोंके विषयमें प्रश्न किये। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको श्रीमद्भागवतके समस्त गूढ़-सिद्धान्तोंका श्रवण कराया। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको हरिवंश नामक ग्रन्थमें इन्द्रके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते समय वर्णित गोलोककी नित्य स्थितिके विषयमें भी समझाया ॥ 110-111 ॥
अनुभाष्य—हरिवंशमें विष्णुपर्वके 19वें अध्यायमें—
“मनुष्यलोकादूर्ध्वं तु खगानां गतिरुच्यते।
आकाशस्योपरि रविर्द्वारं स्वर्गस्य भानुमान् ॥
स्वर्गादूर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगण-सेवितः।
तत्र सोमगतिश्चैव ज्योतिषाञ्च महात्मनाम् ॥
तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि।
स हि सर्वगतः कृष्णः महाकाशगतो महान्।
400 ।

उपर्युपरि तत्रापि गतिस्तव तपोमयी।
यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तोऽपि पितामहम् ॥
ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः।
गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः ॥
सः तु लोकस्त्वया कृष्ण सीदमानः कृतात्मना।
धृतो धृतिम्रता वीर निघ्नतोपद्रवान् गवाम् ॥"

अर्थात् गोवर्धन-धारणके बाद इन्द्रने श्रीकृष्णका इस
प्रकारसे स्तव किया था, — “मनुष्यलोकके उच्च भागमें
पक्षियोंकी गति है। आकाशके ऊपर स्वर्गका प्रकाशमान
सूर्यद्वार और स्वर्गके ऊपरी भागमें ब्रह्मर्षियोंके द्वारा
सेवित ब्रह्मलोक है। देवीधामके ऊपरमें स्थित उस
धाममें उमाके साथ शिव वर्तमान हैं; वह तेजःसम्पन्न
ब्रह्मादि मुक्तपुरुषोंका आवास-स्थान है। वैकुण्ठके ऊपर
गोलोक, वहाँ श्रीमती राधिकादि और नन्द-यशोदादि
साध्यगण पालन करते हैं। वैकुण्ठादि धाम-गोलोककी
तुलनामें स्वल्प-आकाश मात्र हैं; गोलोक ही महा-
आकाश है। हम ब्रह्मासे जिज्ञासा करके भी आपकी
तपोमयी गतिरूपा सर्वोपरि गोलोकपतिकी उपलब्धि नहीं
कर पाये। श्रीनारायणके दास्यसे ही वैकुण्ठ-प्राप्ति होती
है; किन्तु गो-गणोंके लोक उस गोलोक तक पहुँचना
अत्यन्त कठिन है। हे कृष्ण, उसी गोलोकके साथ आप
यहाँ अवतीर्ण हुए हो और मैंने जो उपद्रव किया है,
वह मेरी मूर्खताका ही परिणाम है, उसीको मैं स्तवके
द्वारा बतला रहा हूँ।"

इस स्थानपर नीलकण्ठने अपनी टीकामें लिखा
है,—
“तथा च मन्त्रवर्णः (ऋक् सं 1/21/154/6)-
“ता वां वास्तुन्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।
अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि” इति।
तानि वां युवयोः रामकृष्णयोर्वास्तूनि रम्यस्थानानि गमध्ये
गन्तुम् उश्मसि उश्मः कामयामहे, न तु तत्र गन्तुं प्रभव्रामः,
यत्र येषु वास्तुषु भूरिश्रृङ्गाः महाशृङ्गवत्यो गावः आयासः
सञ्चरन्ति। अत्र भूलोके अह निश्चितं तत् गोलोकाख्यं परमं पदं
भूरि अत्यन्तं मुख्यादपि विशिष्टम् अवभाति अत्यन्तं शोभते।
वृष्णः आनन्दवर्षकस्य उरुगायस्य महाकीर्त्तेरित्यर्थः।

[अर्थात् “उस विषयमें वैदिक मन्त्रवर्ण प्रमाण हैं,
जैसे ऋक्संहितामें “ता वां” आदि। आप दोनोंके अर्थात्
श्रीराम-कृष्णके उस रम्य स्थानसमूहमें गमन करनेकी
कामना की, किन्तु वहाँ जानेमें समर्थ नहीं हूँ। वहाँ
अर्थात् जिस भूमिसमूहमें बड़े-बड़े सींगोंवाली गायें
विचरण करती हैं। इस भूलोकमें निश्चितरूपसे वही
गोलोक-नामक परमपद मूलधामसे भी अत्यन्त विशिष्ट
रूपमें शोभित है। यह आनन्दवर्षण करनेवाले महाकीर्ति
श्रीकृष्णका परम पद है-यह अर्थ है।"] ॥ 111 ॥

कुछ असुरमोहिनी अनित्य प्राकृत घटनाएँ :-
मौषल-लीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान।
केशावतार, आर विरुद्ध व्याख्यान ॥ 112 ॥

महाप्रभुके द्वारा कही गयी मूसल-लीलादिके
सम्बन्धमें वास्तविक सिद्धान्त-व्याख्या :-
महिषी-हरण आदि, सब-मायामय।
व्याख्या शिखाइल यैछे सुसिद्धान्त हय ॥ 113 ॥

अनुवाद-मूसल-लीला, श्रीकृष्णका अन्तर्धान होना,
केशावतार और अन्यान्य विरुद्ध व्याख्यान, महिषी-
हरणादि, ये सब मायामय हैं, इन सबकी महाप्रभुने
व्याख्या करके श्रीसनातन गोस्वामीको सुसिद्धान्तकी
शिक्षा प्रदान की ॥ 112-113 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'काककृष्णकेश'-रूपी श्रीकृष्ण-
अवतार-यह जो विरुद्ध व्याख्यान हैं, उसे धिक्कार
देकर 'क+ईश=केश' अर्थात् श्रीकृष्ण- 'ब्रह्माके ईश्वर'
इस प्रकार शुद्ध व्याख्याकी शिक्षा दी ॥ 112 ॥

तेइसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।

अनुभाष्य-महाभारतकी मूसल-लीला, श्रीकृष्णके
अन्तर्धानकी लीला, केशावतार और महिषी-हरण आदि
आख्यान,-सभी मिथ्या हैं, नित्य अप्राकृतलीला नहीं
हैं। मूढ़मति प्रापञ्चिक विष्णुविद्वेषी असुर लोगोंके मोह
और भ्रमको उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे ही इन सबका
वर्णन हुआ है।

[ 23/111-113 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
'केशावतार'-(भा: 2/7/26 देखें); विष्णुपुराणमें-
“उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महाबल”
महाभारतमें-
“स चापि केशौ हरिरुच्चकर्त्त एकं शुक्लमपरञ्चापि कृष्णम्।
तौ चापि केशावाविशतां यदूनां कुले स्त्रियो रोहिणीं देवकीञ्च॥
तयोरेको बलभद्रो बभूवः योऽसौ श्वेतस्तस्य देवस्य केशः।
कृष्णो द्वितीयः केशवः संबभूव केशः योऽसौ वर्णतः कृष्ण
उक्त इति॥”
अर्थात् भागवत, विष्णुपुराण और महाभारतमें
केशावतारका इस प्रकार उल्लेख है, - “श्रीहरिने अपने
मस्तकसे शुक्लवर्ण (सफेद) और कृष्णवर्ण (काले)-दो
केशोंको तोड़ा था। दो केश यदुकुलकी स्त्रियों रोहिणी
और देवकीमें प्रविष्ट होनेपर पहले सफेद केशसे वर्णके
अनुसार 'बलदेव' और दूसरे काले-केशसे 'श्रीकृष्ण'
उत्पन्न हुए, ऐसा कहा जाता है। असुरोंके द्वारा रौंदी
हुई पृथ्‍वीके क्लेश नाशके लिये जो अंशके द्वारा
श्वेतकृष्ण हुए, वे हरि अवतीर्ण होकर अपनी महिमा
दिखलानेवाले कार्य करेंगे॥” इस स्थानपर लघुभागवतामृतमें
कृष्णामृत-नामक पूर्वखण्डकी 156-164 संख्यामें
“श्रीकृष्ण-क्षीरोदशायीके केशके अवतार' इस पूर्वपक्षके
खण्डनके लिये श्रीरूपप्रभुके और लघुभागवतामृतके
टीकाकार श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभुके विचार और
षट्-सन्दर्भके अन्तर्गत कृष्णसन्दर्भकी 29 संख्या और
सर्वसम्वादिनीमें श्रीजीवप्रभुके विचार आलोच्य हैं॥112-113॥
तेइसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
अमृताणुकणा- 'मौषललीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान'-
मूसललीला और श्रीकृष्णके देह-त्यागादिकी लीला जो
इन्द्रजालके समान भगवद्-मायाबलसे रचित है, यह
बात भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने स्वयं ही अपने सारथी
दारुकको बतलायी, (भा: 11/30/49)-
“त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।
मन्मायारचितामेतां विज्ञायोपशमं व्रज॥”
अर्थात् “अभी लोगोंके प्राकृत-नेत्रोंके सामने प्रकाशित
'मूसल' और 'देहत्यागादि' समस्त लीलाएँ ही जो
इन्द्रजालके समान मेरी मायाके द्वारा रचित हैं, इसे
विशेषरूपसे जानकर तुम उसके प्रति उपेक्षाशील
होवो।”
'तु'-शब्दसे यह कहा गया है कि मेरे विरोधी अन्य
प्राकृत लोग उससे मुग्ध होते हों, तो हों, किन्तु तुम्हारा
मोहित होना युक्तिसङ्गत नहीं है।'- (क्रमसन्दर्भ)। बादमें
श्रीशुकदेव गोस्वामीने भी महाराज परीक्षितको यह रहस्य
बतलाया। (भा: 11/31/11)-
“राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा,
मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।”
अर्थात् “हे राजन्! नट अर्थात् ऐन्द्रजालिक जिस
प्रकार रङ्गमञ्चपर सबके सामने काटने, जलाने, मूर्च्छा
आदिके द्वारा अपने शरीरको त्याग करना दिखाकर
सबका विश्वास उत्पन्न करता है, परन्तु नटका अपना
देह धारण ही जैसे सत्य है और उसका अपना
देहत्याग ही मिथ्या है, उसी प्रकार परतत्त्व श्रीकृष्णकी
आविर्भाव-तिरोभाव-लीलाको भी मायाका अभिनय मात्र
जानना होगा। अन्यथा वे यमलोकसे गुरुपुत्रको सशरीर
लेकर आये थे, ब्रह्मास्त्रसे तुम्हारी भी रक्षा की थी,
मृत्युञ्जय शङ्करको संग्राममें पराजित किया था और
व्याधको सशरीर स्वर्गमें भेजा था, तो वे श्रीकृष्ण क्या
अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं?”
मूसललीला और उसके बाद श्रीकृष्ण-अन्तर्धानादि
लीलाएँ किस प्रकार मायासे रचित हैं, उसे “एते घोराः”
(भा: 11/30/5)-श्लोककी टीकामें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती
ठाकुरने बतलाया है,-“कुरुक्षेत्र यात्रामें मुझसे (श्रीकृष्णसे)
मिलनेके लिये अनेक दिशाओंमें स्थित देशोंसे आये हुए
लोगोंके बीचमें अलक्षित रूपसे 'कलि' भी आया था
और उसने मुझसे कहा था,- 'प्रभो! पृथ्वीपर मेरा
अधिकार कब होगा?' उसके उत्तरमें मैंने कहा
था,- 'मेरी लीला-समाप्तिके बाद ही मेरे द्वारा दिये गये
अधिकारको प्राप्त करके तुम (कलि) पृथ्वीपर अधिकार
करोगे।' किन्तु मेरे अवतारमें अभी इस धर्म चार-पैररूपमें
ही है, यहाँ तक कि सत्ययुगकी अपेक्षा भी अधिकतर
402 |

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ]
उसकी वृद्धि हुई है। धर्मका ऐसी प्रबलता रहनेपर कलि
किस प्रकारसे अधिकार प्राप्त कर सकेगा? क्योंकि
धर्मका एक पैर मात्र बचनेपर ही कलिकी अधिकार
प्राप्त करनेकी योग्यता होती है, — ऐसा नियम है। (यदि
कहें,) 'कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश होता
है, इस न्यायके अनुसार जगत्में मेरे अप्रकट होनेपर
वह चार पैरवाला धर्म भी लुप्त हो जायेगा' — ऐसा नहीं
कहा जा सकता, क्योंकि मेरी सर्वजगत्-पावनी महाकीर्ति
सब समयके लिये जागरूक होकर वर्तमान रहती है।
और मेरे अनुकूल, प्रतिकूल और तटस्थ लोगोंमें-से
प्रतिकूल लोगोंका मेरे द्वारा संहार हुआ है। अब
श्रीरामावतारके जैसे ही सभी लोगोंके समक्ष अपने
धामवासियोंके साथ वैकुण्ठमें आरोहण करनेपर अनुकूल
लोग दोगुना भक्त होंगे, अति-अनुकूल लोग परम
उत्कण्ठायुक्त होकर सौगुना प्रेमवान् होंगे और तटस्थ
लोग परम-आश्चर्यके दर्शनसे भक्त होंगे — इसके द्वारा
धर्म अपितु और भी वृद्धि प्राप्त करेगा। ऐसा होनेपर
किस प्रकारसे कलिका लेशमात्र भी प्रभुत्व सम्भव
होगा? इसलिये धर्मको सङ्कुचित करनेके लिये अधर्म-
मतको किसी प्रकारसे ऊपर उठाऊँगा। यहाँपर यही
उपाय है, — मैं अपने निजलीला-परिकरों यदुगणोंके साथ
द्वारकामें पहलेके जैसे विराजमान होऊँगा, किन्तु सब
प्रापञ्चिक लोगोंके नेत्रोंके लिये अदृश्य रहूँगा। इधर
प्रद्युम्न, साम्बादि मेरे नित्य परिकरोंमें उनके-उनके
विभूति-स्वरूप कन्दर्प (कामदेव), कार्तिकेयादि जो
देवतागण प्रविष्ट हुए हैं, उनको योगबलके प्रभावसे
उन-उन देहोंसे अलक्षितरूपसे पृथक् करूँगा। तभी
प्रद्युम्नादि रूपमें अभिमानकारी उन देवताओंको उस
समय सभी लोगोंके सामने ही उन रूपोंमें ही प्रकाशित
करके अन्य द्वारकावासियोंके साथ प्रभासमें भेजकर
दान-ध्यान-मधुपानादि कराऊँगा। बादमें उन-उन
अधिकारिक देवताओंको स्वर्गमें उनके-उनके अधिकारमें
स्थापित करूँगा और मैं अपने नित्य परिकरोंके साथ
श्रीदशरथनन्द श्रीरामचन्द्रकी भाँति वैकुण्ठमें प्रस्थान
करूँगा। किन्तु लोगोंके नेत्रोंमें मायाका दोष प्रवेश
होनेके कारण वे इस प्रकार सोचेंगे, — ब्राह्मणके शापसे
ग्रस्त यदुवंशियोंने प्रभासमें जाकर मधुपान करके मत्त
होकर एक-दूसरेपर प्रहार करके देह-त्याग किया है
और परमेश्वर श्रीकृष्णने भी श्रीबलदेवके साथ मनुष्य
देह त्याग करके निजधाममें आरोहण किया है। इस
कारणसे कोई-कोई मुझको अनित्य और मायिक मनुष्य
शरीरवाला कहकर व्याख्या करेंगे। इस प्रकारसे अवज्ञा
करनेपर महा अपराध होगा, क्योंकि मैंने कहा है, (गीता
9/11) —
“अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्”
[“मेरे चिन्मय विग्रहको देखकर भी मूर्ख व्यक्ति
सोचते हैं कि मैंने यह प्राकृत मनुष्य शरीर धारण किया
है।”] अन्य कुछ लोग कहेंगे कि जिस प्रकार
कुरुवंशका विनाश हुआ है, उसी प्रकारसे श्रीकृष्ण
वंशसहित प्रभासमें विनाशको प्राप्त हुए हैं, — इस प्रकार
अधम, ज्ञानके अभिमानी दुर्जन लोगोंके कुमत सुनने,
बोलने, अनुमोदन करने और प्रचारके द्वारा धर्म तुरन्त
ही एक पैरका रह जायेगा। पित्तादि दोषयुक्त नेत्र जिस
प्रकार उज्ज्वल श्वेत शङ्खको भी पीला और मलिनरूपमें
देखते हैं, उसी प्रकार मायादोषसे दूषित मानव मेरी
सच्चिदानन्दमयी निर्याणलीलाको भी दुर्गति और प्राकृत-
रूपमें ही दर्शन करेंगे और मेरी भक्तिसे दूर होंगे।
केवल प्राकृत लोग ही नहीं, किन्तु मेरे अंशसे प्रकटित
अर्जुनादि भी और उसी प्रकारसे वैशम्पायन, पराशरादि
मुनिगण भी मेरी मायासे मोहित होकर अपनी-अपनी
संहितामें (यथाक्रमसे महाभारत, विष्णुपुराणमें) उसको
वर्णन करेंगे।' इत्यादि।
इसलिये देखा जाता है, (ब्रह्मपुराण) —
“अजात-जातवद्विष्णुरमृत-मृतवत् तथा।
मायया दर्शयेन्नित्यमज्ञानां मोहनाय च॥”
“भगवान् विष्णु मायाबलसे अज्ञानी व्यक्तियोंको
मोहित करनेके लिये अजन्मा होनेपर भी जन्म लिये
। 403

[ 23/111-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
हुए जीवके जैसे और अमर होनेपर भी मृत जीवके
जैसे अपनेको प्रदर्शन करते हैं और ऋषिगणोंको भी
उसी प्रकार तात्कालिक भावोंसे मोहित करके उनके
द्वारा शास्त्रोंमें मोहजनक वाक्यजालका विस्तार करके
अपने आपको शुद्धभक्तिरहित जीवोंसे गोपन रखते हैं।”
(भाः 11/22/4)—
“युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥”
“ऋषियोंने जिसको जिस रूपमें वर्णन किया है, वह
उस रूपमें सत्य है, क्योंकि मेरी (श्रीकृष्णकी) मायासे
मोहित होकर व्याख्या करनेवालोंके कोई भी वाक्य
असम्भव नहीं हैं।” किन्तु सुमेधागण (अति बुद्धिमान
व्यक्ति) उस प्रकारके वाक्योंसे भ्रमित नहीं होते हैं,
जैसा श्रीउद्धवने श्रीविदुरसे कहा, (भाः 3/2/10)—
“देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः।
भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युपाहृतात्मनो हरौ॥”
“जो भगवान्‌की मायासे मुग्ध हैं और अन्य जो
असत्-मतावलम्बी हैं, उनके वाक्योंसे परमात्मा श्रीहरिमें
जिनका चित्त निविष्ट है, ऐसे मानवोंकी बुद्धि भ्रान्त
नहीं होती है।” क्योंकि वे शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुण हैं।
शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर शुद्ध सिद्धान्त भी प्रकाशित हैं,
जैसे स्कन्दपुराणमें कहा गया है,—
“पृथिवीलोकसंत्‍यागो देहत्यागो हरेः स्मृतः।
नित्यानन्दस्वरूपत्वादत्रैवोपलभ्यते॥”
“श्रीहरिके ‘देहत्याग’-शब्दसे उनके पृथ्वीलोकके
त्यागको ही कहा गया है (‘यस्य पृथिवी शरीरम्’—इस
श्रुतिमें ही उसका प्रमाण है), क्योंकि वे नित्यानन्दस्वरूप
हैं, इसलिये उनकी अन्य प्रकारके अर्थके द्वारा
उपलब्धि नहीं होती।” इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यभागवतमें
आदिखण्डमें १४ अध्यायमें १०४ संख्यामें
श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-कृत
‘गौड़ीय-भाष्य’ भी देखें।
‘केशावतार’—(भाः 1/2/28 में)—“कृष्णस्तु भगवान्
स्वयम्”—इस प्रकारसे श्रीकृष्णकी स्वयं भगवत्ता प्रमाणित
हुई है। तथापि (भाः 2/7/26)—“भूमः सुरेतरवरूथ”
श्लोकमें “क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः” अर्थात्
श्वेत और कृष्णवर्ण केशवाले श्रीक्षीरोदशायी विष्णु
अंशरूपमें पृथ्वीके क्लेश नाश करनेके लिये आविर्भूत
होंगे, इस रूपसे इस ब्रह्मा-वाक्यमें जो आपातरूपसे
श्रीकृष्णका श्रीविष्णुके केशावतार होना दिखायी देता है,
वह मायाके द्वारा भ्रान्ति उत्पादन करके श्रीकृष्णकी
असमोर्ध्व-महिमाको सङ्गोपन करनेके लिये ही है।
किन्तु जैसा कृष्णसन्दर्भमें कहा है,—“यैस्तु यथाश्रुतमेवेदं
व्याख्यातं ते न सम्यक् परामृष्टवन्तः अर्थात् जो
श्लोकको जैसे सुना है, वैसे अर्थकी व्याख्या करते हैं,
वे सम्पूर्ण रूपसे विचारपरायण नहीं हैं।” जैसे, विष्णुपुराणमें
कहा गया है,—‘हे महामुने ! भगवान् परमेश्वरने अपने
श्वेत और कृष्ण दो केशोंको तोड़ा और देवताओंको
कहा,—मेरे ये दो केश पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर
पृथ्वीका भार हरण करेंगे।’ और महाभारतमें भी उसी
प्रकार कहा गया है,—‘उन श्रीविष्णुने दो केशोंको तोड़ा,
उनमेंसे एक श्वेत और दूसरा कृष्णवर्णका था; वे दो
केश ही यदुगणके कुलमें देवकी और रोहिणी—दो
स्त्रियोंमें प्रविष्ट हुए थे। उनमेंसे एक जो श्वेतवर्ण-केश
हैं, वे बलदेव हुए थे और दूसरे जो श्रीकृष्णवर्ण-केश
हैं, वे श्रीकेशव-‘श्रीकृष्ण’-नामसे कहे गये थे।’
उस-उस स्थानपर जो अर्थ आपात प्रकट हुए,
उनपर विचार करनेपर उनमें कोई सङ्गति दिखायी नहीं
देती। क्योंकि, इनके द्वारा त्रिगुणातीत, अविकारी,
चिदानन्दघन-विग्रह श्रीविष्णुकी आयुके परिणामस्वरूप सफेद
और काले केश होना समझना होगा। परन्तु शास्त्रमें
(भाः 3/28/17)—‘सन्तं वयसि कैशोरे’ इस रूपमें
उनकी नित्य किशोर अवस्था ही दिखायी देती है। और
फिर (भाः 1/3/28)—“कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”—इस
रूपसे श्रीकृष्णमें स्वयं भगवत्ता ही वर्णित है। इसलिये
विद्वान लोग उसकी इस प्रकारसे व्याख्या करते हैं,
जैसे, श्रीधरस्वामीपाद-कृत व्याख्या,—‘सितकृष्णकेशत्व’—
404 |

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ]
सफेद-काले केशोंका होना यह विष्णुकी शोभास्वरूप ही
है, आयुका कोई परिणाम नहीं है। ‘भारहरण-रूप
कार्यकी बात ही क्या, वह तो मेरे दो केश भी करनेमें
समर्थ हैं’– इस बातको प्रकाश करते हुए और उसके
साथ श्रीबलरामके और श्रीकृष्णके वर्णकी सूचना करते
हुए उन्होंने उक्त केशोंको तोड़ा था, ऐसा जानना होगा।
अन्यथा शास्त्रमें कहे गये पूर्व और बादके वाक्योंका
परस्परमें विरोध उपस्थित होता है एवं ‘कृष्णस्तु भगवान्
स्वयम्’– इस वाक्यसे भी विरोध होता है। इसलिये
‘सितकृष्णकेश’ (अर्थात् उज्ज्वलकृष्णकेश)– स्वयं भगवान्
ही हैं, वे अपने अंश श्रीबलरामके साथ जन्म ग्रहण
करते हैं। श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामि-कृत
व्याख्या,– ‘कलया सितकृष्णकेशः’ (भाः 2/7/26) ‘कलया’
अर्थात् शिल्पमें विशेष निपुणताके द्वारा ‘सित’– बद्ध जो
‘कृष्णकेश’ हैं अर्थात् अति सुन्दर श्यामवर्ण केशयुक्त
जो विग्रह वे ही श्रीकृष्ण हैं,–उनकी विशेष वैदग्धीके
कारण इस प्रकारसे कहा गया है। अथवा जो ‘कलया’
अर्थात् एक अंश रूपमें ‘सितकृष्णकेशः’ अर्थात्
श्वेतकृष्णकेश युक्त क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, वे लीला
पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही यदुवंशमें आविर्भूत हुए हैं।
सन्दर्भमें श्रील जीवगोस्वामि-कृत व्याख्या,–
“अंशवो ये प्रकाशन्ते मम ते केशसंज्ञिता।
सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्नामाहुर्मुनिसत्तम॥”
अर्थात् “हे मुनिश्रेष्ठतम! मेरा जो अंशसमूह
(ज्योतिसमूह) प्रकाशित हो रहा है उसको ‘केश’–नामसे
कहते हैं। इसलिये सर्वज्ञगण मुझको ‘केशव’ कहते
हैं–इस महाभारत-वाक्यके अनुसार मेरे (अर्थात्
क्षीरोकशायी विष्णुके) सिरपर धारण किये श्वेत और
कृष्णवर्णकी दो ज्योतिरूप दो प्रभु अवतरित होंगे’,
इसकी सूचना देनेके लिये ही (विष्णुपुराणमें) दो
केशोंकी बात कही गयी है।” और भी विष्णुपुराण,
महाभारतमें सब जगह ‘केश’-शब्दका ही मात्र प्रयोग
दिखायी देता है, किन्तु उसके समानार्थक ‘चिकुर’,
‘कुन्तल’ आदि किसी शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता।
इसलिये (भाः 11/21/35)– “परोक्षवादा ऋषयः परोक्षञ्च
मम प्रियः” अर्थात् “ऋषिगण परोक्षवादी हैं और परोक्ष
ही मुझे (श्रीकृष्णको) प्रिय हैं”–इस प्रकारसे भगवान्‌की
इच्छानुसार परोक्षवादी ऋषियोंके मनोभावको ही उन-उन
वाक्योंमें समझना होगा, उनके वाक्योंका बाह्य अर्थ
नहीं लेने होंगे आदि।’– (श्रीविश्वनाथ)
‘महिषीहरण’–(भाः 1/15/20)–
“अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन्
गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि॥”
श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेके बाद द्वारकापुरीसे वापिस
लौटे श्रीअर्जुन महाराज श्रीयुधिष्ठिरको श्रीकृष्णके विरहमें
अनेक प्रकारसे विलाप करते करते कहने
लगे,–“श्रीकृष्णविहीन होकर मैं इस प्रकार बलहीन हो
गया हूँ कि उनकी (आठ प्रधान महिषियोंके अतिरिक्त
अन्य) सोलह हजार स्त्रियोंकी रक्षा करते हुए जब मैं
आ रहा था, तब मार्गमें कुछ नीच गोपोंके द्वारा मैं
अबलाकी भाँति पराजित हो गया।” श्रीभगवान्‌के जो
सखा हैं, उन प्रबल-पराक्रमशाली श्रीअर्जुनके निकटसे
उनके सखाकी पत्नियोंका हरण नितान्त असम्भव है।
वहाँपर रहस्य यह है कि,–‘उन अपनी प्रेयसियोंको
(व्रजमें) अप्रकट-प्रकाशमें प्रवेश करानेके लिये उस-
उस रूपमें भगवान्‌ने उनका आकर्षण किया, क्योंकि
उनकी इस प्रकारसे अभिलाषा थी। जैसे (महिषियोंने
द्रौपदीसे कहा था), (भाः 10/83/43)–
“व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः।
गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः॥”
“जिस प्रकार गोचारणशील श्रीकृष्णकी चरणरजको
व्रजरमणियोंने, गोपगणोंने और यहाँतक कि तृण-लतासे
संलग्न उस चरणरजको उठाकर पुलिन्द-रमणियोंने भी
प्राप्त किया था, हमें भी उसकी चाह है।”
महिषियोंके इस प्रकारके वाक्योंमें व्रजस्त्रियोंके
द्वारा वाञ्छित भगवद्-स्वरूप ही (अर्थात् श्रीकृष्णका
गोपस्वरूप ही) है। उनके मनोरथको जानकर भगवान्‌ने
गोपरूपमें उनका आकर्षण किया था, अन्यथा वे
| 405

[ 23/111-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा महिषियाँ नीच व्यक्तिके स्पर्शके
पहले ही अन्तर्धान हो जातीं। इसलिये दूसरे शब्दोंमें
महिषियोंके द्वारा व्रजस्त्री रूपकी प्राप्ति ही जानना होगा।
विष्णुपुराणमें और ब्रह्मपुराणमें भी इस प्रकारके तात्पर्यसे
अवगत हुआ जाता है। जैसे, श्रीअर्जुनसे श्रीव्यासदेवने
कहा,–
“एवं तस्य मुनेः शापादष्टावक्रस्य केशवम्।
भर्त्तारं प्राप्य ता याता दस्युहन्ताः वराङ्गनाः॥”
“इस प्रकारसे उन अष्टावक्र मुनिके अभिशापसे वे
वराङ्गनाएँ (सुन्दर अङ्गोंवाली) केशवको पतिरूपमें प्राप्त
करके बादमें डाकुओंके हाथोंमें पड़ी थीं।”
पूर्वकालमें देवियोंने एक समय अष्टावक्र-मुनिका
स्तव करके उन्हें सन्तुष्ट किया और उन्होंने मुनिसे
यह वर प्राप्त किया कि विष्णु उनके पति होंगे। बादमें
मुनिवर जब उठे, तब उनके अङ्गोंको टेढ़ा देखकर वे
देवियाँ हँसने लगीं, उससे रुष्ट होकर मुनिने शाप भी
दिया कि ‘तुम डाकुओंके द्वारा अपहृत होगीगी।’ पुनः
उन्होंने मुनिको प्रसन्न करके उक्त शापसे मुक्ति प्राप्त की
थी। ऋषिवाक्य व्यर्थ नहीं होता, इसलिये उन्होंने
विष्णुको पतिरूपमें प्राप्त किया और बादमें वे डाकुओंके
द्वारा अपहृत हुई थीं। उनका डाकुओंके द्वारा अपहरण
होना और (पुनः) पतिको प्राप्त करना सिद्धान्तके
अनुसार ही हुआ था, क्योंकि उनके निजपति श्रीकृष्ण
ही डाकुरूपमें आये थे। इस बातको श्रीव्यासने पुनः
अन्य वाक्यके द्वारा बतलाया,—
“तत् त्वया न हि कर्तव्यः शोकोऽल्पोपि हि पाण्डव।
तेनाप्यखिलनाथेन सर्वं तदुपसंहतम्॥”
“हे पाण्डव! इसलिये तुम्हारे लिये सामान्य शोक
करना भी कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि उन अखिलनाथके
द्वारा ही (डाकुरूपमें) महिषियोंका अपहरण हुआ
था।”—यह व्याख्या जाननी होगी।’—(श्रीविश्वनाथ) अर्थात्
श्रीकृष्ण स्वयं ही गोप-डाकूके रूपमें उन महिषियोंका
हरण करके युगपत् (एक साथ ही) महिषियोंकी
अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये व्रजमें आकर्षण, ऋषिवाक्यकी
रक्षा और लोगोंकी आँखोंके सामने मायाजाल फैलाकर
अपनी लीलाकी महिमाके सर्वोत्कर्षको सङ्गोपन
करना—सबका एकसाथ उन्होंने साधन किया था।
गोप-डाकुरूपमें स्वयं श्रीकृष्ण ही आये थे, इसलिये
अमित बलशाली गाण्डीव धनुर्धारी श्रीअर्जुन निष्प्रभ
(निस्तेज) हो गये थे, अन्यथा उनकी बलहीनता
कल्पनासे परे है॥111-112॥
महाप्रभुके चरणोंमें श्रीसनातनका दैन्य और प्रार्थना :—
तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया।
निवेदन करे दन्ते तृण-गुच्छ लञा॥114॥
“नीचजाति, नीचसेवी, मुञि—सुपामर।
सिद्धान्त शिखाइला,—येह ब्रह्मार अगोचर॥115॥
तुमि ये कहिला, एइ सिद्धान्तामृत-सिन्धु।
मोर मन छुँइते नारे इहार एक बिन्दु॥116॥
अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके चरणोंको
पकड़कर दाँतोंमें तृणका गुच्छा लेकर उनसे निवेदन
करने लगे,—“हे प्रभो! मैं नीच जातिका हूँ, मैंने नीच
लोगोंकी ही सेवा की है और मैं अत्यन्त अधम हूँ,
किन्तु तब भी आपने मुझे उन सब सिद्धान्तोंकी शिक्षा
प्रदान की है, जो ब्रह्माके लिये भी अगोचर हैं। आपने
जो कुछ वर्णन किया है, वह तो सिद्धान्तरूपी अमृतका
सिन्धु है। मेरा मन तो इसके एक बिन्दुको भी नहीं
छू सकता॥114-116॥
पङ्गु नाचाइते यदि हय तोमार मन।
वर देह’ मोर माथे धरिया चरण॥117॥
उल्लिखित भक्तिसिद्धान्तवाणीकी स्फूर्तिकी प्राप्तिके लिये
महाप्रभुके निकट वरकी याचना :—
‘मुञि ये शिखाइ तोरे स्फुरुक सकल।’
एइ तोमार वर हैते हवे मोर बल॥”118॥
अनुवाद—यदि इस पङ्गुको (लँगड़ेको) नचानेकी
406 ।

तेइसवाँ अध्याय 23/117-122 ]
आपके मनमें इच्छा हो, तब आप मेरे सिरपर अपने
चरण रखकर मुझे यह वर प्रदान कीजिये कि 'मैंने
तुम्हें जो भी सिखाया है, वह सब तुम्हारे हृदयमें स्फुरित
हो।' आपके द्वारा दिये गये इस वरदानसे ही मुझे
बलकी प्राप्ति होगी जिससे मैं इसका वर्णन कर
सकूँगा॥" 117-118॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको वरदान :-
तबे महाप्रभु ताँर शिरे धरि' करे।
वर दिला—'एइ सब स्फुरुक तोमारे ॥' 119 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीके सिरपर
अपना हाथ रखकर वर दिया—'ये सब शिक्षाएँ तुममें
स्फुरित हों ॥' 119 ॥
श्रीकृष्णप्रेमरूपी प्रयोजनतत्त्व और महाप्रभुकी कृपाका
आख्यान संक्षेपमें वर्णित :-
संक्षेपे कहिलुँ—'प्रेम' प्रयोजन-संवाद।
विस्तारि' कहन ना याय प्रभुर प्रसाद ॥ 120 ॥
अनुवाद—श्रील कविराज गोस्वामी कह रहे हैं कि
मैंने महाप्रभु और श्रीसनातन गोस्वामीके बीच हुए 'प्रेम'
रूपी प्रयोजनके संवादका संक्षेपमें ही वर्णन किया है,
क्योंकि महाप्रभुकी कृपाका विस्तारसे वर्णन करना मेरे
लिये सम्भवपर नहीं है॥ 120॥
महाप्रभुके उपदेशामृतके श्रवणसे आत्माकी चिद्वृत्ति
श्रीकृष्णसेवाका ज्ञानोदय और प्रेमकी प्राप्ति :-
प्रभुर उपदेशामृत शुने येइ जन।
अचिरात् मिलये ताँरे कृष्णप्रेमधन ॥ 121 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीको दिये गये महाप्रभुके
इस उपदेशामृतका जो कोई भी श्रवण करता है, उसे
बहुत शीघ्र ही श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनकी प्राप्ति होती
है॥ 121॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 122 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे प्रेमप्रयोजन-
विचारो नाम त्रयोविंशः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 122॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें प्रेमप्रयोजन-विचार नामक
तेइसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
407

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
408 ।

चौबीसवाँ अध्याय
कथासार-श्रीसनातनकी प्रार्थनाके अनुसार महाप्रभुने “आत्मारामश्च मुनयः” इस श्लोकके 61 प्रकारके अर्थ किये। पृथक्-पृथक् पदोंकी व्याख्या करते हुए ‘च’ और ‘अपि’—इन दो शब्दोंके अर्थोंके संयोगसे ये सब अर्थ निष्पन्न किये। अन्तमें महाप्रभुने इस श्लोककी व्याख्यामें इस निश्चित अर्थको स्थिर कर दिया कि ज्ञानी, कर्मी और योगी, सभी अपने-अपने दोषोंका परित्याग करके साधुसङ्गमें श्रीकृष्णभजन करते हैं। व्याख्याके बीचमें श्रीनारद और व्याधके एक संवादमें साधुसङ्गके माहात्म्यका वर्णन किया। श्रीनारदने श्रीपर्वत मुनिको लाकर व्याधकी हरिभक्ति दिखलायी। इसके बाद महाप्रभुने श्रीसनातनका स्तव सुनकर श्रीमद्भागवतका तात्पर्य और माहात्म्य प्रकाशित किया। अन्तमें श्रीसनातनकी इच्छानुसार महाप्रभुने हरिभक्तिविलासके सूत्रोंको बतला दिया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
“आत्मारामश्च”-श्लोकमें कुतर्कका हरण करनेवाले श्रीगौरके आशीर्वादकी याचना :-
आत्मारामेति पद्यार्कस्यार्थांशून् यः प्रकाशयन्।
जगत्तमो जहाराव्यात् स चैतन्योदयाचलः ॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने “आत्मारामेति” पद्यरूपी सूर्यकी अर्थरूपी समस्त किरणोंको प्रकाशित करके जगत्के अन्धकारका हरण किया था, वे उदयाचल-श्रीचैतन्य जगत्का पालन करें ॥1॥
अनुभाष्य—
यः (श्रीचैतन्यदेवः) आत्मारामेति ('आत्मारामश्च' इति भागवतस्य) पद्यार्कस्य (श्लोकसूर्यस्य) अर्थांशून् (अर्थाः एव अंशवः किरणास्तान्) प्रकाशयन् (प्रकटयन्) जगत्तमः (कुसिद्धान्तान्धकारं) जहार (नाशयामास), स चैतन्योदयाचलः (श्रीकृष्णचैतन्य एव उदयाचलः, अर्कस्य उदयस्थलत्वात्) अव्यात् (अवतु)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो ॥2॥
श्रीसनातनकी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना :-
तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया।
पुनरपि कहे किछु विनय करिया ॥3॥
पहले सार्वभौमको सुनायी “आत्मारामश्च” श्लोककी अठारह प्रकारकी व्याख्या सुननेकी अभिलाषा :-
“पूर्वे शुनियाछौं, तुमि सार्वभौम-स्थाने।
एक श्लोकेर आठार अर्थ कैराछ व्याख्याने ॥4॥
अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर पुनः विनयपूर्वक कहा,—“मैंने सुना है कि आपने पहले श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको आत्माराम श्लोकके अठारह प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या करके सुनायी थी ॥3-4॥
श्रीमद्भागवत (1/7/10)—
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥5॥
अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि, जगत्के चित्तहारी हरिका एक ऐसा ही एक गुण है ॥5॥
। 409

[ 24/5-15
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य-मध्यलीला 6/186 संख्या देखें॥5॥
आश्चर्य शुनिया मोर उत्कण्ठित मन।
कृपा करि' कह यदि, जुड़ाय श्रवण॥” 6॥
अनुवाद-यह सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था और उन अर्थोंको सुननेके लिये मेरा मन भी उत्कण्ठित हो रहा है। यदि आप कृपा करके मुझे उस श्लोककी व्याख्या सुनायें तो मेरे कानोंको आनन्द मिलेगा॥”6॥
महाप्रभुके द्वारा स्वयंकी अप्राकृत पागल-कहकर दैन्यके आवरणमें आत्मगोपनकी चेष्टा :-
प्रभु कहे,—“आमि वातुल, आमार वचने।
सार्वभौम वातुलता सत्य करि' माने॥7॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“मैं एक पागल हूँ और सार्वभौम भट्टाचार्य दूसरे पागल हैं, इसलिये वे मेरी बातोंको सत्य मानते हैं॥7॥
कीर्तनकारी महाप्रभुका उपयुक्त श्रोता श्रीसनातनको आदर देते हुए पहलेवाले अठारह प्रकारके अर्थोंको छोड़कर नयी व्याख्या करना :-
किवा प्रलापिलाङ, तार नाहि किछु मने।
तोमार सङ्ग-बले यदि किछु हय मने॥8॥
सहजे आमार किछु अर्थ नाहि भासे।
तोमा-सबार सङ्ग-बले ये किछु प्रकाशे॥9॥
अनुवाद-मैंने तब क्या कहा था, मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है, किन्तु यदि तुम्हारे सङ्गके प्रभावसे मुझे कुछ स्मरण आयेगा, तो मैं वह कहूँगा। प्रायः मैं अपने आपसे कोई व्याख्या नहीं कर पाता, किन्तु आप लोगोंके सङ्गके प्रभावसे मेरे मनमें कुछ प्रकाशित हो सकता है॥8-9॥
“आत्मारामश्च” श्लोकमें कुल ग्यारह पद :-
एकादश पद एइ श्लोके सुनिर्मल।
पृथक् पृथक् नाना अर्थ पदे करे झलमल॥10॥
अनुवाद-इस श्लोकमें ग्यारह पद तो स्पष्ट हैं, किन्तु अलग-अलग विचार करनेपर सभी पदोंके अनेक अर्थ जगमगाते हैं॥10॥
अनुभाष्य-‘एकादश पद'-(1) आत्मारामः, (2) च, (3) मुनयः, 4) निर्ग्रन्थाः, (5) अपि, (6) उरुक्रमे, (7) कुर्वन्ति, (8) अहैतुकीं, (9) भक्तिं, (10) इत्थम्भूतगुणः, (11) हरिः॥10॥
(1) 'आत्मा'-शब्दके सात अर्थ :-
'आत्मा'-शब्दे ब्रह्म, देह, मन, यत्न, धृति।
बुद्धि, स्वभाव,-एइ सात अर्थ-प्राप्ति॥11॥
अनुवाद-‘आत्मा'-शब्दके-ब्रह्म, देह, मन, यत्न, धृति, बुद्धि और स्वभाव-ये सात अर्थ प्राप्त होते हैं॥11॥
प्रमाण :-
विश्वप्रकाश-कोशमें-
“आत्मा देहमनोब्रह्मस्वभावधृतिबुद्धिषु।
प्रयत्न चे" इति॥12॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥12॥
अमृतप्रवाह भाष्य-‘आत्म'-शब्दसे-देह, मन, ब्रह्म, स्वभाव, धृति, बुद्धि और यत्नको समझना चाहिये॥12॥
'आत्मा'-शब्दके अर्थको लेकर सात प्रकारके आत्माराम :-
एइ साते रमे येइ, सेइ आत्मारामगण।
आत्मारामगणेर आगे करिये गणन॥13॥
अनुवाद-इन सातोंमें जो रमण करते हैं, वे आत्मारामगण हैं। आत्मारामोंकी बादमें गणना करूँगा॥13॥
(2) ‘मुनि'-शब्दके सात अर्थ :-
'मुनि'-आदि शब्देर अर्थ शुन, सनातन।
पृथक् पृथक् अर्थ करि, पाछे करिब मिलन॥14॥
'मुनि'-शब्दे मननशील, आर कहे मौनी।
तपस्वी, व्रती, यति, आर ऋषि, मुनि॥15॥
410 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/14-21 ]
अनुवाद—हे सनातन, अब तुम 'मुनि'-आदि शब्दोंके
अर्थ सुनो। पहले मैं इन सबके पृथक्-पृथक् अर्थ
बतला रहा हूँ, बादमें इनको मिलाकर अर्थ बतलाऊँगा।
मुनि शब्दके मननशील, मौनी, तपस्वी, व्रती, यति
(संन्यासी), ऋषि और मुनि—ये सात अर्थ होते
हैं॥14-15॥
(3) 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके अर्थ :—
'निर्ग्रन्थ'-शब्दे कहे, अविद्या-ग्रन्थि-हीन।
विधि-निषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादि-विहीन॥ 16॥
मूर्ख, नीच, म्लेच्छ आदि शास्त्ररिक्तगण।
धनसञ्चयी—निर्ग्रन्थ, आर ये निर्धन॥17॥
अनुवाद—'निर्ग्रन्थ'-शब्दका एक तात्पर्य उस व्यक्तिसे
है जो अविद्याकी ग्रन्थियोंसे मुक्त है। निर्ग्रन्थका दूसरा
तात्पर्य उस व्यक्तिसे है जो वेदशास्त्रोंके नियम अर्थात्
विधि-निषेधको नहीं मानता है। जो ज्ञान-विहीन है, उसे
भी निर्ग्रन्थ कहा जाता है। इनके अतिरिक्त निर्ग्रन्थ-शब्दसे
मूर्ख, नीच, म्लेच्छादि शास्त्र-ज्ञानरहित, धनका सञ्चय
करनेवाले और निर्धनको समझना चाहिये॥16-17॥
'निर्' उपसर्ग और 'ग्रन्थ'-शब्दके अर्थोंका प्रमाण :—
विश्वप्रकाश-कोशमें—
निर्निश्चये निष्क्रमार्थे विनिर्माण-निषेधयोः।
ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे वर्णसंग्रहणेऽपि च॥18॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥18॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्' उपसर्गका निश्चयमें,
क्रम-अर्थमें, निर्माणमें, निषेधमें व्यवहार होता है।
'ग्रन्थ'-शब्दके अर्थ धन-सम्पत्ति, सन्दर्भ, वर्ण-संग्रह
(अक्षर-योजन) हैं॥18॥
(4) 'उरुक्रम' (उरु+क्रम) शब्दका अर्थ :—
'उरुक्रम'-शब्दे कहे, बड़ याँर क्रम।
'क्रम'-शब्दे कहे, एइ पादविक्षेपण॥19॥
शक्ति कम्पयुक्त परिपाट्ये आक्रमण।
चरण-चालने काँपाइल त्रिभुवन॥20॥
अनुवाद—'उरुक्रम'-शब्दसे उसे लक्ष्य करते हैं
जिसका क्रम बड़ा है। 'क्रम'-शब्दके अर्थ—एक पगका
माप, शक्ति, कम्पनयुक्त, परिपाटी (पद्धति) और आक्रमण
हैं। इसलिये 'उरुक्रम'-शब्दका मुख्य अर्थ है—श्रीवामन
भगवान् जिन्होंने अपने चरणोंको बढ़ाकर त्रिभुवनको
कँपा दिया था॥19-20॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उरुक्रम'-शब्दके 'उरु'-शब्दसे
बड़े-बड़े और 'क्रम'-शब्दसे—पग धरना एवं (शक्ति
आदिके कारण-भूत) कम्पनादि। इसलिये उरुक्रम-शब्दसे
वामन-आकारके विष्णुको समझना है, क्योंकि बड़े-बड़े
चरणोंके पगके द्वारा उन्होंने ही जगतको कँपा दिया
था॥19-20॥
प्राकृत सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्मतम परमाणुको गिननेवालेके लिये भी
श्रीवामनके वीर्यको मापना असम्भव :—
श्रीमद्भागवत (2/7/40) में—
विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह
यः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि।
चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता त्रिपृष्ठं
यस्मात् त्रिसाम्यसदनादुरु कम्पयानम्॥ 21॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥21॥
अमृतप्रवाह भाष्य—पृथ्नीके धूलिकणोंकी गणना
करना सम्भव हो सकता है, किन्तु विष्णुके पराक्रमोंकी
कौन गणना कर सकता है? उन्होंने वामनरूपमें अपने
चरणोंके प्रबल वेगसे त्रिगुणमयी प्रकृतिके मूलसे सत्यलोक
तकको कम्पित करके धारण किया था॥21॥
अनुभाष्य—ब्रह्मा अपने शिष्य देवर्षि नारदको भगवान्
विष्णुके लीलावतार-समूहकी चेष्टा, प्रयोजन और विभूतिकी
कथाका वर्णन करके भगवान् वामनदेवके अपरिमेय
(असीम) पराक्रमकी महिमाका वर्णन कर रहे हैं,—
इह (अस्मिन् संसारे) यः कविः (पण्डितः) पार्थिवानि
रजांसि (पृथिव्यां परमाणून् अपि) विममे (विगणितवान्,
तादृशः अपि) कतमः नु (प्रश्ने) विष्णोः वीर्यगणनां [कर्त्तुं]
अर्हति (समर्थो भवति?—न कोऽपीत्यर्थः), यः (विष्णुः)
। 411

[ 24/21-28 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
यस्मात् [कारणात् त्रिविक्रमावतारे] अस्खलता (प्रतिघातशून्येन)
स्वरंहसा (स्वपादवेगेन) त्रिसाम्यसदनात् (त्रिगुणसाम्यरूपं सदनम्
अधिष्ठानं प्रधानं तस्मात् आरभ्य) उरुकम्पयानम् (अधिककम्पमानं)
त्रिपृष्ठं (सत्यलोकं) चस्कम्भ (धृतवान्)।-मन्त्रः (ऋग्वेदे
प्रथम मः 154 सूः प्रथम श्लोक)-“ॐ विष्णोर्नु वीर्याणि कं
प्रावोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि। योऽस्कम्भयदुत्तरं सधस्थं
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः” इति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (ऋग्वेद
मन्त्र)-जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोकको बनानेवाले
हैं, जो देवताओंके निवास स्थान द्युलोकको स्थिर कर
देते हैं, जो तीन पगोंसे तीनों लोकोंमें विचरण करनेवाले
हैं (अथवा उन्हें मापनेवाले हैं), उन विष्णुके वीरतापूर्ण
कार्योंका कहाँ तक वर्णन करें?॥21॥
स्वरूप और माया-शक्तिवैभव-तीनों धामोंमें शक्ति अथवा
पराक्रमका विभिन्न परिचय :-
विभूरूपे व्यापे, शक्त्ये धारण-पोषण।
माधुर्यशक्त्ये गोलोक, ऐश्वर्ये परव्योम॥22॥
मायाशक्त्ये ब्रह्माण्डादि-परिपाटी-सृजन।
‘उरुक्रम’-शब्देर एइ अर्थ निरूपण॥23॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें। भगवान् ‘उरुक्रम’-शब्दका
यही अर्थ है॥22-23॥
अनुभाष्य-भगवान् विभूरूपमें त्रिभुवनमें व्याप्त रहते
हैं और शक्तिके द्वारा उन्हें धारण तथा उनका पोषण
करते हैं। वे माधुर्यशक्तिके द्वारा गोलोकको धारण और
पोषण करते हैं। ऐश्वर्यशक्तिके द्वारा परव्योमको धारण
और पोषण करते हैं। और मायाशक्तिके द्वारा
ब्रह्माण्डादिका परिपाटीरूपसे सृजन करते हैं॥22-23॥
क्रमशब्दका समानार्थक शब्द :-
विश्वप्रकाशमें-
“क्रमः शक्तौ परिपाट्यां क्रमचालनकम्पयोः॥”24॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥24॥
अमृतप्रवाह भाष्य-क्रम-शब्दका अर्थ-शक्ति, परिपाटी,
चालन और कम्पन है॥24॥
(5) ‘कुर्वन्ति’-क्रियाके परस्मैपदका कारण :-
‘कुर्वन्ति’-पद-एइ परस्मैपद हय।
कृष्णसुखनिमित्त भजने तात्पर्य कहय॥25॥
अनुवाद-‘कुर्वन्ति’-पद परस्मैपदरूपमें व्यवहार किया
गया है। वे श्रीकृष्णके सुखके लिये ही भजन करते
हैं, इसलिये परस्मैपद व्यवहार करनेका यही तात्पर्य
है॥25॥
अनुभाष्य-‘कुर्वन्ति’-पद-परस्मैपद रूपमें प्रयोग किया
गया है; (फलकी प्राप्ति) कर्त्ताका अभिप्राय होनेपर
‘आत्मनेपद’का प्रयोग होता है। किन्तु यहाँपर श्रीकृष्णके
सुखके लिये वे भजन करते हैं, ऐसा तात्पर्य व्यवहार
हुआ है, इसलिये यहाँपर ‘कुर्वन्ति’का परस्मैपदीय प्रयोग
है॥25॥
प्रमाण :-
पाणिनिमें 1/3/72; सिद्धान्त-कौमुदीमें भ्वादि-प्रकरणमें-
“स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले॥”26॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥
अमृतप्रवाह भाष्य-उभयपदी (दो पदवाली) धातुका
उच्चरित स्वर और ञ ‘इत’ होता है। क्रियाका फल
यदि कर्त्ताका अभिप्राय होता है, तब वहाँ ‘आत्मनेपद’
होता है। इस स्थानपर ऐसा नहीं होनेके कारण
‘परस्मैपद’का प्रयोग हुआ है॥26॥
(6) ‘अहैतुकी’-शब्दके अन्तर्गत ‘हेतु’-शब्दके
तीन प्रकारके दार्शनिक अर्थ :-
हेतु’-शब्दे कहे-भुक्ति-आदि वाञ्छान्तरे।
भुक्ति, सिद्धि, मुक्ति-मुख्य एइ तिन प्रकारे॥27॥
भुक्ति, सिद्धि और मुक्तिमें अन्तर :-
एक भुक्ति कहे, भोग-अनन्त प्रकार।
सिद्धि-अष्टादश, मुक्ति-पञ्चविधाकार॥28॥
अनुवाद-‘हेतु’-शब्दसे भुक्ति आदिकी इच्छाओंको
कहा जाता है। मुख्य रूपसे ये इच्छाएँ भुक्ति, सिद्धि
412 ।

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चौबीसवाँ अध्याय 24/27-37 ]
[बायाँ स्तम्भ]
और मुक्ति—इन तीन प्रकारकी होती हैं। पहली है भुक्ति
जो अनन्त प्रकारकी है। सांसारिक भोगोंको ही भुक्ति
कहते हैं। सिद्धि—ये अठारह प्रकारकी और मुक्ति—पाँच
प्रकारकी होती है॥ 27-28॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'सिद्धि'—अणिमादि अठारह
प्रकारकी सिद्धियाँ (भा: 11/15 अध्याय देखें)॥ 28॥
'अहैतुकी'-शब्दका अर्थ :—
एइ याँहा नाहि, सेइ भक्ति—'अहैतुकी'।
याहा हैते वश हय श्रीकृष्ण कौतुकी॥ 29॥
अनुवाद—भुक्ति, सिद्धि और मुक्ति—इन तीनोंकी
कामना जहाँपर नहीं है, उस भक्तिको 'अहैतुकी' कहते
हैं, जिसके द्वारा लीलामय श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते
हैं॥ 29॥
(7) 'भक्ति'-शब्दका अर्थ; दस प्रकारके भेद :—
'भक्ति'-शब्देर अर्थ हय दशविधाकार।
एक—'साधन', 'प्रेमभक्ति'—नव प्रकार॥ 30॥
'रति'-लक्षणा, 'प्रेम'-लक्षणा, इत्यादि प्रचार।
भावरूपा, महाभाव-लक्षणरूपा आर॥ 31॥
अनुवाद—'भक्ति'-शब्दका अर्थ दस प्रकारका होता
है। साधनभक्ति एक प्रकारकी और प्रेमभक्ति नौ
प्रकारकी होती है। नौ प्रकारकी प्रेमभक्ति 'रति'-लक्षणासे
आरम्भ करके 'प्रेम'-लक्षणा आदिसे बढ़ती हुई भावरूपा
और महाभाव-लक्षणरूपा भक्ति तक बढ़ती है॥ 30-31॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमभक्ति—नव प्रकार'—रति, प्रेम,
स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव—ये नौ
प्रकारकी प्रेमभक्ति है॥ 30॥
अनुभाष्य—साधन भक्तिका एक प्रकारका लक्षण
और प्रेम-भक्तिके नौ प्रकारके लक्षण हैं, जैसे रति
(भावभक्ति)-लक्षणा, प्रेम-लक्षणा, स्नेह-लक्षणा, मान-
लक्षणा, प्रणय-लक्षणा, राग-लक्षणा, अनुराग-लक्षणा,
भाव-लक्षणा और महाभाव-लक्षणा॥ 30-31॥
[दायाँ स्तम्भ]
शान्त और दास्यरसमें भक्तिकी सीमा :—
शान्त-भक्तेर रति बाड़े 'प्रेम' पर्यन्त।
दास्य-भक्तेर रति हय 'राग'दशा-अन्त॥ 32॥
सख्य और वात्सल्य-रसमें भक्तिकी सीमा :—
सखागणेर रति हय 'अनुराग' पर्यन्त।
पितृ-मातृ-स्नेह आदि 'अनुराग'-अन्त॥ 33॥
मधुररसमें भक्तिकी सीमा :—
कान्तागणेर रति पाय 'महाभाव'-सीमा।
'भक्ति'-शब्दे कहिलूँ एइ अर्थेर महिमा॥ 34॥
अनुवाद—शान्तरसके भक्तोंकी रति 'प्रेम' तक ही
बढ़ती है। दास्यरसके भक्तोंकी रति 'राग'-दशा तक
बढ़ती है। सखाओंकी रति 'अनुराग' तक बढ़ती है।
पिता-माताका स्नेहादि 'अनुराग'की अन्तिम सीमा तक
बढ़ता है। व्रजगोपियोंकी रति 'महाभाव' तक बढ़ती है।
ये कुछ 'भक्ति'-शब्दके महिमामय अर्थ हैं॥ 32-34॥
(8) 'इत्थम्भूतगुण' (इत्थम्भूत + गुण)
शब्दके अर्थकी व्याख्या :—
'इत्थम्भूतगुणः'-शब्देर शुनह व्याख्यान।
'इत्थम्भूत'-शब्देर भिन्न अर्थ, 'गुण'-शब्देर आन॥ 35॥
'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ :—
'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ—पूर्णानन्दमय।
याँर आगे ब्रह्मानन्द तृणप्राय हय॥ 36॥
अनुवाद—अब 'इत्थम्भूतगुणः' शब्दकी व्याख्या श्रवण
करो। इसमेंसे 'इत्थम्भूत'-शब्दके अर्थ 'गुण'-शब्दके
अर्थसे भिन्न हैं। 'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ पूर्णानन्दमय
है, जिसके आगे ब्रह्मानन्द तृणकी भाँति प्रतीत होता
है॥ 35-36॥
हरिभक्तिसुधोदय (14/36)में—
त्वत्साक्षात्कारणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे।
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो॥ 37॥
अनुवाद—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार
। 413

[ 24/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ
और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे
हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है,
वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे
जो गड़्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता
है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥ ३७॥
अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें॥ ३७॥
अपने रूपमाधुर्यके द्वारा सभीको बलपूर्वक
वशमें करनेवाले :-
सर्वार्कषक, सर्वाह्वादक, महारसायन।
आपनार बले करे सर्वविस्मरण॥ ३८॥
अनुवाद-पूर्णानन्दमय भगवान् सभीको आकर्षित
करनेवाले, सभीको आनन्दित करनेवाले, महारसायन
अर्थात् समस्त चिन्मय रसोंके आश्रय हैं। वे अपने
बलसे सबके अन्य सभी सुखोंको भुला देनेवाले
हैं॥ ३८॥
श्रीकृष्णकृपाके प्रभावसे कैतव-नाश :-
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-सुख छाड़य यार गन्धे।
अलौकिक शक्ति-गुणे श्रीकृष्णकृपाय बान्धे॥ ३९॥
शास्त्रयुक्ति नाहि इँहा सिद्धान्त-विचार।
एड स्वभाव-गुणे, याते माधुर्येर सार॥ ४०॥
अनुवाद-शुद्धभक्तिकी गन्धमात्रके प्रभावसे भुक्ति,
मुक्ति और सिद्धिके सुखोंकी वासना दूर हो जाती है।
शुद्धभक्त श्रीकृष्णकी अलौकिक शक्ति, गुणों और
कृपासे बँध जाते हैं। शुद्धभक्तको शास्त्रयुक्ति और
सिद्धान्तके विचारकी अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि श्रीकृष्णका
स्वाभाविक गुण ही माधुर्यका सार है॥ ३९-४०॥
'गुण' शब्दके अर्थ; श्रीकृष्णके अनन्तगुणोंका
अतुलनीय अमोघ प्रभाव :-
'गुण'-शब्देर अर्थ-कृष्णेर गुण अनन्त।
सच्चिद्रूप-गुण सर्व-पूर्णानन्द॥ ४१॥
ऐश्वर्य-माधुर्य-कारुण्ये स्वरूप-पूर्णता।
भक्तवात्सल्य, आत्मा पर्यन्त वदान्यता॥ ४२॥
अनुवाद-'गुण'-शब्दका तात्पर्य श्रीकृष्णके अनन्त
गुणोंसे है। श्रीकृष्णके गुण नित्य और चिन्मय हैं और
सभी गुण पूर्णानन्द-स्वरूप हैं। श्रीकृष्णके ऐश्वर्य,
माधुर्य, कारुण्यादि चिन्मय गुण स्वरूपतः पूर्ण हैं।
श्रीकृष्णका भक्त-वात्सल्य ऐसा है कि वे स्वयं तकको
भी भक्तको दान करनेवाले दयालु हैं॥ ४१-४२॥
एक-एक गुण एक-एक विशेष
भक्तको वशीभूत करनेवाला :-
अलौकिक रूप, रस, सौरभादि गुण।
कारो मन कोन गुणे करे आकर्षण॥ ४३॥
चरणकमलोंकी सुगन्धसे चतुःसनको और लीला-माधुर्यसे
शुकदेवको आकर्षित करना :-
सनकादिर मन हरिल सौरभादि गुणे।
शुकदेवेर मन हरिल लीला-श्रवणे॥ ४४॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण अपने अलौकिक रूप, रस,
सुगन्धादि गुणोंसे भक्तोंके मनको आकर्षित करते हैं। वे
भक्त भिन्न-भिन्न रसोंमें स्थित होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण
सर्वाकर्षक हैं। श्रीकृष्णने अपने श्रीचरणोंमें अर्पित
तुलसीकी सुगन्धसे चतुःसनके (सनक, सनन्दन, सनातन
ओर सनत्के) मनका हरण किया था। अपनी लीलाका
श्रवण कराके उन्होंने शुकदेव गोस्वामीके मनका हरण
किया था॥ ४३-४४॥
श्रीमद्भागवत (3/15/43)में-
तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-
किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकन्दवायुः।
अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां
संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ ४५॥
अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्‌के पदकमलोंकी
पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि

414 ।