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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

204 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/309–313 ]
रेखा,’—श्रील रघुनाथके वैराग्यकी विधि पत्थरके ऊपर
रेखाकी भाँति अत्यन्त दृढ़ थी॥ 309 ॥
प्रतिक्षण कृष्णभजन :—
साड़े सात प्रहर याय कीर्त्तन–स्मरणे।
सबे चारि–दण्ड आहार–निद्रा कोन दिने॥ 310 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके साढ़े सात प्रहर (साढ़े
बाइस घण्टे) कीर्तन और स्मरणमें ही व्यतीत होते।
किसी दिनमें कुल चार दण्डमें (डेढ़ घण्टेमें) ही उनके
आहार और निद्रा होते॥ 310 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—
“सार्द्धसप्तप्रहर याय स्मरण–कीर्त्तने।
आहार–निद्रा–चारि दण्ड, सेह नहे कोन दिने॥”
[अर्थात् “साढ़े सात प्रहर उनके स्मरण-कीर्तनमें
जाते। आहार-निद्राके लिये उन्हें केवल चार दण्डका
(डेढ़ घण्टेका) समय मिलता और कभी वह भी नहीं
मिलता॥”]॥ 310 ॥
छहों वेगोंको विजय करनेवाले गोस्वामी श्रीरघुनाथ :—
वैराग्येर कथा ताँर अद्भुत–कथन।
आजन्म ना दिला जिह्वाय रसेर स्पर्शन॥ 311 ॥
छिण्डा–कानि काँथा बिना ना परे वसन।
सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार पालन॥ 312 ॥
जिससे शरीरका निर्वाह हो, उतना ही स्वीकार करना :—
प्राण–रक्षा लागि’ येबा करेन भक्षण।
ताहा खाञा आपनाके करे निर्वेदन॥ 313 ॥
अनुवाद—उनके वैराग्यकी बात तो अद्भुत कथा
है। उन्होंने सम्पूर्ण जीवन अपनी जिह्वाको जड़ रसका
स्पर्श तक नहीं होने दिया। उन्होंने चिथड़े वस्त्रोंके
अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्त्र नहीं पहना। उन्होंने बड़ी
कठोरतासे महाप्रभुकी आज्ञाका पालन किया। वे अपने
प्राणोंकी रक्षाके लिये थोड़ासा कुछ खाते थे। उसे
खाकर उसके लिये भी स्वयंको धिक्कार देते॥ 311–313 ॥
अनुभाष्य—'निर्वेदन',—भर्त्सना, धिक्कार॥ 313 ॥
अमृतानुकणिका—श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी प्रभुमें
वैराग्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, वीर्य, यश, श्री—सभी स्वाभाविक
रूपसे रहकर धन्य हुए थे, किन्तु उन्होंने इनके लिये
कोई भी प्रयत्न नहीं किया। समस्त ऐश्वर्य, विभुता,
सिद्धि उनके हाथोंमें थी, किन्तु वे कर्मी–ज्ञानी–
योगी–तपस्वीके समान ऐश्वर्यके भिखारी या ऐश्वर्य–प्रदर्शनके
लोभी नहीं थे। कर्मी–ज्ञानी–योगी–तपस्वी कभी भी जिस
ऐश्वर्यके बिन्दु–मात्रको भी नहीं प्राप्त कर सकते, उस
प्रकारके अनन्त निखिल ऐश्वर्यके श्रील रघुनाथदास
गोस्वामी प्रभुके चरण–नखमें विराजित रहकर धन्य
होनेपर भी श्रील रघुनाथदास उन सब ऐश्वर्यके व्यापारी
नहीं थे। फल्गु मायावादियोंके जैसे उनकी वैराग्य–चेष्टा
भी नहीं थी। वे कर्मियों–ज्ञानियों–योगियोंके जैसे वैराग्यके
भिखारी भी नहीं थे। वैराग्य–सिद्धिकी सीमा उनको
प्राप्त करके धन्य हुई थी।
श्रील रघुनाथदासने इस प्रकारके वैराग्यादिके लिये
यत्न क्यों नहीं किया? जीव अपने प्रेयः के लिये
व्यस्त रहता है। प्रेयः बुरी वस्तु नहीं है यदि वह
श्रीकृष्णको केन्द्रीभूत करके हो। श्रीकृष्णको जो अपने
अपेक्षा सौ गुणा अधिक प्रेम करते हैं और श्रीकृष्णके
प्रियजनको हजार गुणा प्रेम करते हैं, उनका विचार इस
प्रकार होता है (विलापकुसुमाञ्जली 102)—
“आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित्
कालो मयातिगमितः किल साम्प्रतं हि।
त्वञ्चत् कृपां मयि विधास्यसि नैव किं मे
प्राणैर्व्रजेन च वरोरु बकारिणापि॥
“हे वरोरु राधे! मैं अमृतसिन्धुकी प्राप्तिकी प्रचुर
आशामें अभी अति कष्टसे काल व्यतीत कर रहा हूँ,
अभी यदि आप मेरे प्रति कृपा विधान नहीं करेंगी, तो
मेरे प्राण, व्रजवास, यहाँ तक कि मुझे कृष्णसे क्या
प्रयोजन है?”
इस प्रकार वैराग्य–सिद्धिकी पराकाष्ठाकी बात क्या
कभी किसीने सुनी है? श्रील रघुनाथदास गोस्वामी

[ 6/313-316 छठा अध्याय 205
राधा-दास्यके अतिरिक्त श्रीकृष्णको भी नहीं चाहते हैं।
इतने बड़े वैराग्यकी बात इस जगत्में सम्भव नहीं होती
है—श्रीस्वरूपकी कृपासे अभिषिक्त एकान्त व्यक्तिके
अतिरिक्त इस वैराग्यके आदर्शको अन्य कोई भी समझ
नहीं सकता। जो राधादास्यके अतिरिक्त कृष्ण तकको
भी नहीं चाहते हैं, वे क्या इस लोकके सामान्य वैराग्य,
यश, श्री, ऐश्वर्य, वीर्य, ज्ञानके लिये यत्न करेंगे?
कृष्णप्रेष्ठकी कहाँ तक सेवा करनेपर—कृष्णप्रेष्ठमें
कहाँ तक प्रीतिकी पराकाष्ठा रहती है—उसका इस
प्रकार विचार होता है। जैसे एक दिन श्रीचैतन्य मठमें
गान हुआ था,—
“तोमार गरवे गरविनी हाम,
रूपसी तोमार रूपे” आदि
प्राकृत सहजियागण भी ये गान गाते हैं, किन्तु
इसके तात्पर्यको नहीं समझ पाते। वे लोग राइ-कानुका
गान करते हैं, किन्तु उनके विचारमें त्रुटि कहाँ पर है?
राइ-कानुके गानका प्रचुर साहित्य है, वह अति
कर्णरसायन है, उसमें उनके मनका तर्पण हो जाता है।
इस प्रकार करनेसे उनको लगता है कि वे भगवद्भक्तिकी
कथाके बहुत निकट आ गये हैं, किन्तु उनका यही
दोष रहता है। वे अपने स्वरूप, श्रीकृष्णके स्वरूप,
श्रीकृष्णप्रेष्ठके स्वरूपकी कुछ भी उपलब्धि नहीं कर
सकते—वे केवल आत्मेन्द्रिय-तर्पणमें ही व्यस्त हैं। इन
सब गानोंसे उनकी सेवा-बुद्धि, सेव्यकी इन्द्रिय-तर्पण
करनेकी चेष्टा बढ़नेके स्थानपर गानेका साहित्य, काव्य,
सुर-तान-मान-लय ही इतना बढ़ जाता है कि वह
उनकी सुबुद्धिको डुबो देता है। मायाकी इसी प्रकार
छलना है। “गौड़ीय 39वीं संख्या” ॥313॥
दिव्यसम्बन्धज्ञानके उदित होनेसे देहात्मबुद्धिका ह्रास :—
श्रीमद्भागवत (7/15/40) में—
आत्मानञ्चेद्विजानीयात् परं ज्ञानधुताशयः।
किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः ॥314॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥314॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानके द्वारा भली-भाँति निर्मल
हुए चित्तवाले व्यक्ति आत्मतत्त्वको जान लेनेपर जब
सबकुछ ही प्राप्त करते हैं, तब वैसा नहीं करके पापी
व्यक्ति किस अभिप्रायसे, किस कारणसे केवल शरीरकी
पुष्टिके लिये प्रयत्न किया करते हैं? 314॥
अनुभाष्य—'किस विधिका अनुसरण करनेसे गृहस्थ
सहजमें मोक्ष प्राप्त करते हैं?'—धर्मराज युधिष्ठिरके इस
प्रश्नके उत्तरमें देवर्षि नारद मोक्षलक्षण
सर्ववर्णाश्रम-साधनसार-वर्णन प्रसङ्गमें चारों आश्रमोंकी
कथा बतलाकर अन्तमें कह रहे हैं,—
चेद् (यदि) आत्मनं परं ('ब्रह्म कृष्णं') विजानीयात्, तदा
ज्ञानधूताशयः (ज्ञानेन सम्बन्धज्ञानेन धूतः निरस्तः आशयः
विषयकामः यस्य सः) लम्पटः (जिह्वोपस्थ-परिचालनपरः सन्)
किं इच्छन् (किमर्थं) कस्य वा हेतोः देहं पुष्णाति (अनुसंचरेत्?
ज्ञानिनः लौल्यमेव न सम्भवतीत्यर्थः। तथा च श्रुतिः—“आत्मानं
चेद्विजानीयादयमस्मीति पुरुषः। किमिच्छन् कस्य कामाय
शरीरमनुसञ्चरेत्?” इति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ज्ञानीमें
विषयोंके प्रति ऐसा लोभ सम्भव नहीं है। श्रुतिमें भी
कहा गया है—“परब्रह्म श्रीकृष्णको जानकर भी यह
पुरुष किस इच्छासे और किस कामनासे शरीरके
पालनके प्रयत्न करता है?”॥314॥
दुकानदारोंके द्वारा नहीं बिकनेवाले सड़े हुए कीचड़से
सने प्रसाद-अन्नको धोकर श्रीकृष्णके उच्छिष्टको
चिद्वस्तु मानकर उसका सम्मान :—
प्रसादान्न पसारिर यत ना बिकाय।
दुइ-तिन दिन हैले भात सड़ि' याय॥315॥
सिंहद्वारे गाभी-आगे सेइ भात डारे।
सड़ा-गन्धे तैलङ्गी-गाइ खाइते ना पारे॥316॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथका महाप्रसादी चावल दुकानदार
बेचते हैं और जितना नहीं बिकता, वह बचा हुआ
भात दो-तीन दिनके बाद सड़ जाता है। दुकानदार
उस भातको सिंहद्वारके निकट तैलङ्गी गायोंके आगे

206 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/315-324 ]
खानेके लिये डाल देते हैं, किन्तु सड़े भातकी दुर्गन्धके
कारण गायें उसे खा नहीं पाती ॥ 315-316 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘सड़ि’’, —सड़ जाना।
तैलङ्गी-गाई,—तैलङ्ग देशकी गायें ॥ 315-316 ॥
अनुभाष्य- ‘डारे’,-फेंक देते ॥ 316 ॥
सेइ भात रघुनाथ रात्रे घरे आनि’ ।
भात धुञा फेले घरे दिया बहु पानि ॥ 317 ॥
भितरेते दड़-भात माजि’ येइ पाय ।
लवण दिया रघुनाथ सेइ अन्न खाय ॥ 318 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास रात्रिमें उसी भातको
अपने घर ले आते और बहुत अधिक पानीसे उसे
अच्छेसे धो लेते। धोनेके बाद उसके भीतर जो सख्त
भात मिलता, वे उसमें नमक मिलाकर खा
लेते ॥ 317-318 ॥
अनुभाष्य—‘भितरेते दड़-भात माजि’’,-अध-पके
चावलके (भातके) भीतरके कठोर मध्य-भागको धोकर
अर्थात् साफ करके ॥ 318 ॥
एकदिन श्रीस्वरूपका आनन्दपूर्वक चिद्वस्तु समझकर उस
श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अंशको ग्रहण करना :-
एकदिन स्वरूप ताहा करिते देखिला ।
हासिया ताहार किछु मागिया खाइला ॥ 319 ॥
अनुवाद—एकदिन श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथ
दासको उन चावलोंको धोकर खाते हुए देखा। मुस्कुराते
हुए उन्होंने श्रीरघुनाथसे कुछ चावल माँगकर खा
लिये ॥ 319 ॥
श्रीगौरकृष्णके परमप्रिय श्रीरघुनाथके द्वारा ग्रहण
किया गया प्रसाद ही चिन्मय कृष्ण-भुक्तामृत :-
स्वरूप कहे,—“ऐछे अमृत खाओ निति निति ।
आमा-सबाय नाहि देह’, कि तोमार प्रकृति ? ?”320 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“तुम प्रतिदिन
ऐसा अमृत खाते हो, किन्तु हम सबको नहीं देते हो,
यह तुम्हारा कैसा स्वभाव है ?”320 ॥
श्रीगोविन्दसे सुनकर स्वयं महाप्रभुका भी उस
श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अंशको ग्रहण करना :-
गोविन्देर मुखे प्रभु से वार्त्ता शुनिला ।
आर दिन आसि’ प्रभु कहिते लागिला ॥ 321 ॥
“खासा वस्तु खाओ सबे, मोरे ना देह’ केने?”
एत बलि’ एक ग्रास करिला भक्षणे ॥ 322 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दके मुखसे उस वार्तालापको
सुना। अगले दिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे कहने
लगे,-“तुम सब उत्तम वस्तुएँ खाते हो, मुझे क्यों नहीं
देते हो?” यह कहकर महाप्रभुने भी उन चावलोंका
एक ग्रास खा लिया ॥ 321-322 ॥
साधकका स्वयं श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये वैराग्य-
आचरणका अभ्यास रहनेपर भी निखिल ऐश्वर्यशाली
हरि-गुरु-वैष्णवको एकमात्र प्रभु मानकर सर्वोत्कृष्ट
चित्-उपकरणके द्वारा पूजाकी कर्त्तव्यताकी शिक्षादान :-
आर ग्रास लैते स्वरूप हातेते धरिला ।
“तव योग्य नहे” बलि’ बले काड़ि’ निला ॥ 323 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा एक और ग्रास लेनेपर
श्रीस्वरूप दामोदरने उनका हाथ पकड़ लिया और
कहा,-“यह आपके योग्य नहीं है।” तब उन्होंने
बलपूर्वक उनके हाथसे चावल छीन लिये ॥ 323 ॥
महाप्रभुके द्वारा अपने प्रेष्ठ श्रीरघुनाथके द्वारा
ग्रहण किये प्रसादकी प्रशंसा :-
प्रभु बोले,—“निति निति नाना प्रसाद खाइ ।
ऐछे स्वाद आर कोन प्रसादे ना पाइ ॥”324 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,-“मैं प्रतिदिन अनेक
प्रकारका प्रसाद खाता हूँ, किन्तु मुझे ऐसा स्वाद किसी
और प्रसादको खानेसे नहीं मिला ॥”324 ॥

[ 6/325-329
छठा अध्याय
207
श्रीरघुनाथके कृष्णेन्द्रिय-प्रीति वाञ्छामय वैराग्य-दर्शनसे
महाप्रभुको आनन्द :-
एइमत महाप्रभु नाना लीला करे।
रघुनाथेर वैराग्य देखि' सन्तोष अन्तरे ॥ 325 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु अनेक प्रकारकी
लीलाएँ करते। श्रीरघुनाथ दासके वैराग्यको देखकर
उनके हृदयमें बहुत सन्तोष था ॥ 325 ॥
श्रीरघुनाथके द्वारा रचित स्तवमें
महाप्रभुकी करुणाका वर्णन :-
आपन-उद्धार एइ रघुनाथदास।
'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥ 326 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथने अपने उद्धारकी बातको स्वरचित
'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है ॥ 326 ॥
श्रीगौरकृपासे श्रीरघुनाथका श्रीदामोदर-आनुगत्य और
श्रीगान्धर्वा-गिरिधारीकी सेवाकी प्राप्ति :-
स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तव (11)—
महासम्पद्दारादपि पतितमुद्धृत्य कृपया
स्वरूपे यः स्वीये कुजनमपि मां न्यस्य मुदितः।
उरो गुञ्जाहारं प्रियमपि च गोवर्धनशिलां
ददौ मे गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ 327 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 327 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे महा-दुर्जन होनेपर भी
कृपापूर्वक जो मुझे पतित देखकर मेरा सम्पत्ति और
पत्नी (पाठान्तरमें विषयरूपी दावाग्नि)से उद्धार करके
मुझे श्रीस्वरूपको अर्पण करके आनन्दित हुए थे,
जिन्होंने मुझे अपने वक्षकी गुञ्जा-माला और गोवर्धन-शिला
प्रदान की थी, वे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे
मत्त करें ॥ 327 ॥
छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
यः (महाप्रभुः) कृपया कुजनम् अपि मां [स्वानुकम्पया]
महासम्पद्दारात् (महासम्पदश्च दाराश्च तेषां समाहारः, हिरण्ययोषित्-
संसर्गात्, महासम्पद्दावात् इति पाठे महासम्पदेव दावः तस्मात्
सकाशात्) उद्धृत्य स्वीये (निजजने) स्वरूपे (श्रीदामोदरस्वरूपे)
न्यस्य (समर्प्य) मुदितः (हृष्टः सन्) प्रियम् अपि उरोगुञ्जाहारं
(वक्षसः गुञ्जामालां) गोवर्धनशिलां च (गिरिधरविग्रहं) मे
(मह्यं) ददौ, सः (गौराङ्गः गौरहरिः) मे (मम) हृदये उदयन्
(प्रकटयन्) मां मदयति (हर्षयति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 327 ॥
छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभु और श्रीरघुनाथके मिलनके श्रवणसे
श्रीचैतन्यचरणकी प्राप्ति :-
एइ त' कहिलुँ रघुनाथेर मिलन।
इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 328 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ दासका महाप्रभुके
साथ मिलनका वर्णन किया है। इसे जो श्रवण करता
है, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती
है ॥ 328 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 329 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीरघुनाथदासमिलनं नाम
षष्ठः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 329 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीरघुनाथदासमिलन
नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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सातवाँ अध्याय
कथासार—इस अध्यायमें श्रीवल्लभ-भट्टका आगमन
और उनके प्रति अनेक प्रकारका परिहास, उनके सभी
सिद्धान्तोंका संशोधन, उनके द्वारा दिये गये निमन्त्रणको
ग्रहण करना एवं भट्टका श्रीगदाधर पण्डितके प्रति विशेष
आनुगत्य देखकर पण्डितके प्रति महाप्रभुकी छलनापूर्ण
उदासीनता,—यह समस्त वर्णित हुआ है। भट्टके अत्यन्त
अनुगत होनेपर तब महाप्रभुने उनके निमन्त्रणको
स्वीकार करके श्रीगदाधर पण्डितसे मन्त्रार्थ आदिकी
शिक्षा प्राप्त करनेकी आज्ञा दी और श्रीगदाधर पण्डितके
प्रति स्नेह प्रकाश किया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
स्पर्शमणि गौरभक्तोंकी वन्दना :-
चैतन्यचरणाम्भोजमकरन्दलिहो भजे।
येषां प्रसादमात्रेण पामरोऽप्यमरो भवेत्॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपामात्रसे पाखण्डी
व्यक्ति भी अमर हो जाता है, [मैं] उन्हीं श्रीचैतन्य
चरणकमलके मधुके लोभी भक्तोंका भजन करता
हूँ॥1॥
अनुभाष्य—
येषां (गौरपदाश्रित-भक्तानां) प्रसादमात्रेण (कृपालवेन) पामरः
(भक्तिरहितः पाषण्डः) अपि अमरः (अप्राकृत देहवान्) भवेत्,
[तान्] चैतन्यचरणाम्भोजमकरन्दलिहः (चैतन्यस्य भगवतः गौरस्य
चरणौ एव अम्भोजे तयोः मकरन्दान् लिहन्ति ये तान्
गौरभक्तान्) [अहं] भजे।
श्लोक-भावानुवाद—गौरपदाश्रित-भक्तोंकी लेशमात्र
कृपासे भक्तिरहित पाखण्डी भी अप्राकृत देहवान् हो
जाता है, [उन] भगवान् श्रीचैतन्यके चरणकमलोंके
मधुका पान करनेवाले गौरभक्तोंका [मैं] भजन करता
हूँ॥1॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो।
श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥
रथयात्रासे पहले गौड़ीय-भक्तोंका आगमन :-
वर्षान्तरे यत गौड़ेर भक्तगण आइला।
पूर्ववत् महाप्रभु सबारे मिलिला॥3॥
अनुवाद—अगले वर्ष श्रीगौड़देशसे जितने भक्त
नीलाचल आये, महाप्रभु पूर्व वर्षोंकी भाँति उन सबसे
मिले॥3॥
श्रीवल्लभभट्टका आगमन :-
एइमत विलास प्रभुर भक्तगण लञा।
हेनकाले वल्लभ-भट्ट मिलिल आसिया॥4॥
अनुवाद—महाप्रभु इस प्रकार अपने भक्तोंके साथ
विलास कर रहे थे। तभी श्रीवल्लभ भट्ट नीलाचलमें
आकर महाप्रभुसे मिले॥4॥
अनुभाष्य—'वल्लभ-भट्ट',—मध्यलीला 19/61 संख्याका
अनुभाष्य देखें॥4॥
श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, उन्हें वैष्णव
मानकर महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :-
आसिया वन्दिल भट्ट प्रभुर चरणे।
प्रभु 'भागवतबुद्ध्ये' कैला आलिङ्गने॥5॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने आकर महाप्रभुके चरणोंकी

210 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/5-11 ]
वन्दना की, महाप्रभुने उन्हें भक्त-भागवत मानकर
उनका आलिङ्गन किया ॥ ५ ॥
श्रीभट्टकी सविनय-उक्ति-श्रीजगन्नाथके द्वारा
महाप्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षाकी पूर्ति :-
मान्य करि' प्रभु तारे निकटे बसाइला।
विनय करिया भट्ट कहिते लागिला ॥ ६॥
“बहुदिन मनोरथ तोमा देखिबारे।
जगन्नाथ पूर्ण कैला, देखिलुँ तोमारे ॥ ७॥
श्रीवल्लभकी महाप्रभुके प्रति भगवान्‌के समान बुद्धि और
गौरव-स्तुति, किन्तु शरणागतिका अभाव :-
तोमार दर्शन ये पाय, सेइ भाग्यवान्।
तोमाके देखिये,-येन साक्षात् भगवान् ॥ ८ ॥
महाप्रभुके दर्शनकी बात तो दूर, स्मरणसे ही पवित्रता :-
तोमारे ये स्मरण करे, से हय पवित्र।
दर्शने पवित्र हवे, —इथे कि विचित्र ? ? ९ ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको सम्मान देकर
अपने निकट बैठाया। श्रीवल्लभ भट्ट दैन्यपूर्वक कहने
लगे, - "बहुत दिनोंसे आपके दर्शन करनेकी अभिलाषा
थी, भगवान् श्रीजगन्नाथने उसे पूर्ण कर दिया कि अब
आपके दर्शन हुए हैं। जिसे आपके दर्शनोंकी प्राप्ति
होती है, वह सौभाग्यशाली है, क्योंकि आपको देखकर
ऐसा लगता है कि आप साक्षात् भगवान् हैं। यदि कोई
आपको स्मरण करनेसे ही पवित्र हो जाता है, तो वह
आपके दर्शन करके पवित्र हो जायेगा, -इसमें कौनसे
आश्चर्यकी बात है ? 6-9 ॥
शुद्धभक्तोंकी साक्षात् सेवाकी बात दूर रहे,
परोक्षमें स्मरणके प्रभावसे भी शुद्धि :-
श्रीमद्भागवत (1/19/33) में-
येषां संस्मरणात् पुंसां सद्यः शुद्ध्यन्ति वै गृहाः।
किं पुनर्दर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः ॥ 10 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्योंके
घर पवित्र होते हैं, उनके दर्शन, स्पर्श, चरण-प्रक्षालन
और उनको आसन आदि प्रदान करनेके द्वारा कितना
लाभ होता है, इसे कहा नहीं जा सकता ॥ 10 ॥
अनुभाष्य-प्रायोपवेशनमें रत राजा परीक्षितके द्वारा
एकत्रित ब्रह्मज्ञ ऋषियोंसे मृत्युके निकट व्यक्तिके
एकमात्र कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा करनेपर,
ब्रह्मशकुल-तिलक श्रीशुकदेवके वहाँ आगमनपर परीक्षित
दीनतासहित सभीको अभिनन्दनपूर्वक कह रहे हैं-
येषां (सज्जनानां) संस्मरणात् (सम्यग् मनोविषयीकरणात्
एव) पुंसां (मानवानां) गृहाः (प्राकृतभोगायचनाः अपि) सद्यः
(तत्क्षणात्) शुद्ध्यन्ति वै (पवित्रा भवन्ति एव), [तेषां]
दर्शनस्पर्शनपादशौचासनादिभिः किं पुनः?
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥
श्रीकृष्णकी स्वरूप-शक्ति ही नाम-कीर्तनकारी
आचार्यको प्रकाशित करनेवाली :-
कलिकालरे धर्म-कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ।
कृष्ण-शक्ति बिना नहे तार प्रवर्त्तन ॥ 11 ॥
अनुवाद-कलियुगका धर्म कृष्णनाम-सङ्कीर्तन है
और भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिके बिना उसका प्रचार
नहीं किया जा सकता ॥ 11 ॥
अनुभाष्य-श्रीमध्वके द्वारा उद्धृत श्रीनारायण-संहिता-
वचन-
“द्वापरीयैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः।
कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥"
[अर्थात् "द्वापर-युगीय मनुष्योंके द्वारा श्रीविष्णु
केवल पञ्चरात्रके द्वारा ही पूजित होते हैं, किन्तु
कलियुगमें भगवान् श्रीहरि केवलमात्र श्रीनामके द्वारा ही
पूजित होते हैं।"] श्रीकृष्णकी साक्षात् इच्छा अथवा
कृपाशक्तिके बिना कोई भी मनुष्य प्राकृत-मनोधर्मके
बलपर जगद्गुरु आचार्यरूपमें अप्राकृत वैकुण्ठ अधोक्षज
श्रीकृष्णसे अभिन्न शुद्धकृष्णनाम कीर्तनके द्वारा जगत्में
श्रीकृष्णके प्राकट्यको संस्थापित करके बद्धजीवोंके
चित्तरूपी दर्पणका मार्जन, भवमहादावाग्नि-निर्वापण और

[ 7/11-19 सातवाँ अध्याय 211
श्रेयःकैरवचन्द्रिकाके वितरणमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्णसे
अभिन्न उनके प्रकाश-विग्रह शुद्धनामैककीर्त्तननिष्ठ
आचार्य-साक्षात् श्रीकृष्णशक्तिके अवतार कृष्णलिङ्गित
विग्रह हैं; वे-चारों वर्णाश्रमियोंके गुरुदेव महाभागवत
परमहंसठाकुर हैं॥11॥
श्रीकृष्णनामके प्रवर्त्तनके कारण महाप्रभुको
स्वरूप-शक्तिमान् समझना :-
ताहा प्रवर्त्ताइला तुमि, —एइ त' 'प्रमाण'।
कृष्णशक्ति धर तुमि, —इथे नाहि आन॥12॥
अनुवाद-आपने कृष्णनाम सङ्कीर्त्तनका प्रवर्त्तन किया
है। इसलिये यह प्रमाणित होता है कि आप श्रीकृष्णकी
शक्तिको धारण करनेवाले हैं। इस विषयमें अन्य कोई
विचार नहीं हो सकता॥12॥
सेवोन्मुख व्यक्तिको श्रीकृष्णनाम प्रदान करनेवाले
श्रीगौरके दर्शनसे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :-
जगते करिला तुमि कृष्णनाम प्रकाशे।
येइ तोमा देखे, सेइ कृष्णप्रेमे भासे॥13॥
अनुवाद-आपने सम्पूर्ण जगत्‌में कृष्णनामको प्रकाशित
किया है। जो भी आपका दर्शन करता है, वही
कृष्णप्रेममें प्लावित हो जाता है॥13॥
स्वरूप-शक्तिके प्रभावसे श्रीकृष्णके द्वारा ही
श्रीकृष्णप्रेम-प्रकटित करनेका सामर्थ्य :-
प्रेम-परकाश नहे कृष्णशक्ति बिने।
'कृष्ण'—एक प्रेमदाता, शास्त्र-प्रमाणे॥14॥
अनुवाद-श्रीकृष्णकी शक्तिके बिना प्रेमको प्रकाशित
नहीं किया जा सकता। श्रीकृष्ण ही एकमात्र प्रेमदाता
हैं-शास्त्र इस विषयमें प्रमाण हैं॥14॥
लघुभागवतामृत (1/5/37)में बिल्वमङ्गल-वचन-
सन्त्ववतारा बहवः पङ्कजनाभस्य सर्वतोभद्राः।
कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति॥”15॥
अनुवाद-श्रीकृष्णके अंश पद्मनाभके सर्वमङ्गलमय
विभिन्न प्रकारके अवतार रहनेपर भी एकमात्र श्रीकृष्णके
अतिरिक्त और कौन हैं, जो लताओंको भी प्रेम प्रदान
कर सकें? अर्थात् अन्य कोई नहीं कर सकता॥”15॥
अनुभाष्य-आदिलीला 3/27 श्लोक देखें॥15॥
भगवान्‌की दीनता और छलनाकी चेष्टा :-
महाप्रभु कहे, —“शुन, भट्ट महामति।
मायावादी संन्यासी आमि, ना जानि कृष्णभक्ति॥16॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“हे वल्लभभट्ट, आप
बहुत बुद्धिमान हैं। सुनो! मैं मायावादी संन्यासी हूँ।
इसलिये मैं कृष्णभक्तिके विषयमें कुछ भी नहीं जानता
हूँ॥16॥
भगवान्‌के द्वारा भक्तके गुणोंका वर्णन;-(1) महाविष्णु
श्रीअद्वैताचार्यकी गुणावली :-
अद्वैताचार्य-गोसाञि-'साक्षात् ईश्वर'।
ताँर सङ्गे आमार मन हइल निर्मल॥17॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाई साक्षात् ईश्वर हैं,
उनके सङ्गसे ही मेरा मन निर्मल हुआ है॥17॥
'अद्वितीय भक्तिशास्त्राचार्य' नामकी सार्थकता :-
सर्वशास्त्रे कृष्णभक्त्ये नाहि याँर सम।
अतएव 'अद्वैत-आचार्य' ताँर नाम॥18॥
अनुवाद-उनके समान समस्त शास्त्रोंका ज्ञान और
श्रीकृष्णके प्रति भक्ति किसी अन्यकी नहीं है, इसलिये
उनका नाम 'अद्वैत-आचार्य' है॥18॥
स्वयं महाविष्णु होकर आचार्य-परम-कृपालु
और परम-वैष्णव :-
याँहार कृपाते म्लेच्छेर हय कृष्णभक्ति।
के कहिते पारे ताँर वैष्णवता-शक्ति??19॥
अनुवाद-जिनकी कृपासे म्लेच्छको भी कृष्णभक्ति
प्राप्त हो जाती है, उनकी वैष्णवताकी शक्तिका कौन
वर्णन कर सकता है?19॥

212 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/20-27 ]
(2) श्रीनित्यानन्द-गुणावली; श्रीकृष्णके स्वरूप-प्रकाश
होनेपर भी कृष्णप्रेमसिन्धु सेवक-विग्रह :-
नित्यानन्द-अवधूत-'साक्षात् ईश्वर'।
भावोन्मादे मत्त कृष्णप्रेमेर सागर ॥ 20 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द अवधूतके समान दिखते हैं,
परन्तु वे साक्षात् ईश्वर हैं। वे सदा भावके उन्मादमें
मत्त रहते हैं और कृष्णप्रेमके सागर हैं॥ 20 ॥
(3) श्रीवासुदेव-सार्वभौमकी गुणावली :-
षड्दर्शन-वेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम।
षड्दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम ॥ 21 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य षड्दर्शनके सम्पूर्ण
ज्ञाता हैं, वे षड्दर्शनमें जगद्गुरु और भक्तोंमें उत्तम
हैं॥ 21 ॥
तेंह देखाइला मोरे भक्तियोग-पार।
ताँर प्रसादे जानिलुँ 'कृष्णभक्तियोग' सार ॥ 22 ॥
अनुवाद-उन्होंने ही मुझे भक्तियोगकी चरम सीमाका
दर्शन करवाया है। उन्हींकी कृपासे मैंने कृष्णभक्तियोगके
सारको जाना है॥ 22 ॥
(4) श्रीराम-रायकी गुणावली; रसिकभक्तोंमें मुकुटमणि
और (क) 'सम्बन्ध' तत्त्व-वेत्ता :-
रामानन्द-राय-कृष्ण-रसेर 'निधान'।
तेंह जानाइला, कृष्ण-स्वयं भगवान् ॥ 23 ॥
अनुवाद-रामानन्द राय कृष्णरसकी निधि हैं, उन्होंने
ही मुझे जनाया है कि श्रीकृष्ण-स्वयं भगवान् हैं॥ 23 ॥
(ख) 'प्रयोजन'-तत्त्ववेत्ता, (ग) 'अभिधेय'-तत्त्ववेत्ता :-
ताते प्रेमभक्ति-'पुरुषार्थ-शिरोमणि'।
रागमार्गे कृष्णभक्ति-'सर्वाधिक' जानि ॥ 24 ॥
अनुवाद-उनसे ही मैंने जाना है कि श्रीकृष्ण-प्रेमभक्ति
ही सभी पुरुषार्थोंका शिरोमणि है। रागमार्गमें प्रेमभक्ति ही
सर्वश्रेष्ठ है॥ 24 ॥
अनुभाष्य-'पुरुषार्थ' कहनेसे धर्म, अर्थ, काम और
मोक्ष,-इन चारोंको समझा जाता है। इन चारों पुरुषार्थोंकी
अपेक्षा प्रेमभक्ति-सर्वश्रेष्ठ परमपुरुषार्थ अथवा पुरुषार्थ-
शिरोमणि है। विधिमार्गमें श्रीकृष्णकी पूजाकी अपेक्षा
रागाणुगामार्गमें की गयी भक्ति अथवा सेवा-श्रेष्ठ है॥ 24 ॥
(घ) 'रस' तत्त्ववेत्ता; कृष्णप्रेमकी अधिकताके कारण
मधुररसकी सर्वश्रेष्ठता :-
दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार।
दास, सखा, गुरु, कान्ता, - 'आश्रय' याहार ॥ 25 ॥
मधुररसमें दो प्रकारकी वृत्ति,-(क) पुरमें 'ऐश्वर्य्यमिश्रा',
(ख) व्रजमें 'केवला'; यशोदानन्दन व्रजकी
पारकीया केवलावृत्तिके द्वारा ही प्राप्य,
स्वकीया 'ऐश्वर्य्यमिश्रा'से नहीं :-
'ऐश्वर्य्यज्ञानयुक्त', 'केवल'-भाव आर।
ऐश्वर्य्य-ज्ञाने ना पाइ व्रजेन्द्रकुमार ॥ 26 ॥
अनुवाद-मैंने इन्हींसे जाना है कि दास, सखा,
गुरुजन (माता-पिता, उनके समवयस्क, गुरु आदि) और
कान्ताएँ क्रमशः दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा शृङ्गार
(मधुर) रसके आश्रय हैं। मधुररस भी 'ऐश्वर्य्यज्ञानयुक्त'
और 'केवल'-भावके भेदसे दो प्रकारका है। ऐश्वर्य्य-ज्ञानसे
व्रजेन्द्रनन्दन कृष्णको प्राप्त नहीं किया जा सकता॥ 25-26 ॥
अनुभाष्य-'ऐश्वर्य्यज्ञान युक्त' और 'केवल' अथवा
'शुद्ध'-भेदसे भाव-दो प्रकारका है। ऐश्वर्य्यज्ञानयुक्त
भावसे व्रजेन्द्रनन्दनकी परम महिमाको जाना नहीं जा
सकता। मध्यलीला 19/192 संख्या देखें॥ 26 ॥
श्रीमद्भागवत (10/9/21) में-
नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः।
ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 27 ॥
अनुवाद-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान्
देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत
ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 27 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/226 संख्या देखें॥ 27 ॥

[ 7/28-33 सातवाँ अध्याय 213
श्लोकका शब्दार्थ; रासक्रीड़ामें लक्ष्मीका अनधिकार :-
'आत्मभूत'-शब्दे कहे 'पारिषदगण'।
ऐश्वर्यज्ञाने लक्ष्मी ना पाइला व्रजेन्द्रनन्दन ॥ २८ ॥
अनुवाद—'आत्मभूत' शब्दका अर्थ 'पार्षद' है।
ऐश्वर्यज्ञानसे लक्ष्मी पार्षद होनेपर भी व्रजेन्द्रनन्दन
श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर पायीं॥ २८॥
अनुभाष्य—लक्ष्मी ऐश्वर्यज्ञानमयी होनेपर भी
व्रजेन्द्रकुमारकी सेवाको प्राप्त नहीं कर पायीं। लक्ष्मीदेवी
और आत्मभूत पार्षदोंका श्रीकृष्णके साथ अभिन्न-शक्ति
होनेपर भी, ऐश्वर्यभावसे युक्त लक्ष्मीदेवीको व्रजेन्द्रनन्दनकी
मधुर सेवाधिकारकी प्राप्ति नहीं हुई॥ २८॥
शास्त्र-प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (10/47/60) में—
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीत कण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ २९ ॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके
द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो
कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित
लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको
भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे
कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी
कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो
क्या कहूँ?॥ २९ ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ २९॥
व्रजवासियोंके सख्य और वात्सल्यरसमें केवला या शुद्धा
रागात्मिका भक्ति :-
शुद्धभावे सखा करे स्कन्ध-आरोहण।
शुद्धभावे व्रजेश्वरी करेन बन्धन॥ ३०॥
अनुवाद—शुद्ध अथवा केवला भावसे सखा श्रीकृष्णके
कन्धेपर चढ़ते हैं और व्रजेश्वरी श्रीयशोदा श्रीकृष्णको
बाँधती हैं॥ ३०॥
अनुभाष्य—'शुद्धभावे',—ऐश्वर्यज्ञानसे मुग्ध अथवा
बाध्य नहीं होकर निर्मला अथवा केवला रतिके
वशीभूत होकर॥ ३०॥
'मोर सखा', 'मोर पुत्र',—एइ 'शुद्ध' मन।
अतएव शुक-व्यास करे प्रशंसन॥ ३१॥
अनुवाद—'कृष्ण मेरे सखा हैं', 'कृष्ण मेरे पुत्र
हैं'—यही शुद्ध अर्थात् ऐश्वर्यज्ञानहीन मनका भाव है।
इसलिये श्रीशुकदेव गोस्वामी और श्रीवेदव्यास इन
भक्तोंकी प्रशंसा करते हैं॥ ३१॥
शास्त्र प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (10/12/11) में—
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन।
मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः॥ ३२॥
अनुवाद—श्रीभागवतमें कहा गया है,—जो ज्ञानमार्गमें
ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूपमें, दास्यरसके भक्तोंको परदेवतारूपमें
एवं मायाश्रित व्यक्तियोंको नरबालकके रूपमें प्रतीत होते
हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ व्रजके गोपबालकोंने
बहुत सुकृतिके फलस्वरूप सख्यरसमें विहार किया
था॥ ३२॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/75 संख्या देखें॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत (10/8/45) में—
त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः।
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं साऽमन्यतात्मजम्॥ ३३॥
अनुवाद—तीनों वेदों, उपनिषद्-समूह, सांख्ययोग
और भक्तिशास्त्रोंके द्वारा जिनके माहात्म्यका गान किया
जाता है, उन श्रीकृष्णको यशोदा अपना 'पुत्र' समझती
हैं॥ ३३॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 19/204 संख्या देखें॥ ३३॥

214 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/34-40 ]
श्रीमद्भागवत (10/8/46) में—
नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्।
यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः॥ 34 ॥
अनुवाद—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था?॥ 34 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/77 संख्या देखें॥ 34 ॥
व्रजके 'केवल'-भावमें ऐश्वर्यज्ञानका अभाव, इसलिये 'केवल'-भावका सर्वश्रेष्ठ होना :—
ऐश्वर्य देखिलेह 'शुद्धेर' नहे ऐश्वर्य ज्ञान।
अतएव ऐश्वर्य हइते 'केवल'-भाव प्रधान॥ 35 ॥
अनुवाद—ऐश्वर्य देखनेपर भी 'शुद्ध'-भाववाले भक्त उस ऐश्वर्यको नहीं मानते। इसलिये 'केवल'-भाव ऐश्वर्य-भावसे श्रेष्ठ है॥ 35 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरायका अपने शिक्षागुरुके रूपमें प्रचार :—
ए-सब शिखाइला मोरे राय-रामानन्द।
से-सब शुनिते हय परम आनन्द॥ 36 ॥
अनुवाद—यह सब कुछ राय रामानन्दने ही मुझे सिखलाया है। इन सबको सुननेसे ही हृदयमें परम आनन्द होता है॥ 36 ॥
अनुभाष्य—यहाँपर किसी विशेष पाठमें, “अनर्गल रसवेत्ता प्रेम सुखानन्द” [अर्थात् “रामानन्द राय रसतत्त्वके पूर्ण ज्ञाता और नित्य प्रेमके सुखानन्दमें निमग्न रहनेवाले हैं।”] दिखलायी पड़ता है॥ 36 ॥
श्रीरामानन्दके गुण :—
कहन ना याय रामानन्देर प्रभाव।
राय-प्रसादे जानिनुँ व्रजेर 'शुद्ध' भाव॥ 37 ॥
अनुवाद—राय रामानन्दके प्रभावका वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि राय रामानन्दकी कृपासे ही मैंने व्रजके शुद्धभावको जाना है॥ 37 ॥
(5) श्रीदामोदर-स्वरूपकी गुणावली; प्रेमरसविग्रह और गोपीतत्त्व-माहात्म्यवेत्ता या व्रज-माधुर्य-रस-तत्त्वाचार्य :—
दामोदर-स्वरूप—'प्रेमरस' मूर्त्तिमान्।
याँर सङ्गे हैल व्रज-मधुर-रस-ज्ञान॥ 38 ॥
अनुवाद—स्वरूप दामोदर प्रेमरसके साक्षात् मूर्त्तिमान् रूप हैं। उन्हींके सङ्गसे मुझे व्रजके मधुररसका ज्ञान हुआ है॥ 38 ॥
श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंको सन्तुष्ट करनेवाली गोपियोंका माहात्म्य :—
'शुद्धप्रेम' व्रजदेवीरे—कामगन्धहीन।
'कृष्णसुखतात्पर्य',—एइ तार चिह्न॥ 39 ॥
अनुवाद—व्रजदेवियोंके शुद्धप्रेममें कामकी अर्थात् अपने सुखकी अभिलाषाकी गन्ध भी नहीं है। श्रीकृष्णको सुखी करनेका तात्पर्य ही उस शुद्धप्रेमका लक्षण है॥ 39 ॥
शास्त्र प्रमाण :—
श्रीमद्भागवत (10/31/19) में—
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ 40 ॥
अनुवाद—गोपियाँ बोलीं—“हे प्रिय! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ 40 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें॥ 40 ॥

[ 7/41-45 सातवाँ अध्याय 215
श्रीमद्भागवत (10/31/16) में—
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान्
अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव
योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ 41 ॥
अनुवाद—हे कृष्ण, हम अपने पति, पुत्र, अन्वय (पतिके सम्बन्धसे जो पुत्रके समान हैं), भाई और बन्धुओं, सभीका परित्याग करके तुम्हारे पास आयी हैं; हमारे आनेका कारण तुम जानते हो, —तुम्हारे गीतसे मोहित होकर हम आयी हैं। हे धूर्त, रात्रिकालमें स्त्रियोंका [तुम्हारे अतिरिक्त] कौन इस प्रकार परित्याग करता है? ॥ 41 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 19/209 संख्या देखें; पाठान्तरमें, —
“गोपीगणेर शुद्धप्रेम—ऐश्वर्यज्ञानहीन।
प्रेमेते भर्त्सना करे एइ तार चिह्न॥”
[अर्थात् “गोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति शुद्धप्रेम है और वे श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानती नहीं हैं, इसलिये कभी श्रीकृष्णकी प्रेमसे भर्त्सना भी कर देती हैं। शुद्धप्रेमका यही लक्षण है।”] ॥ 41 ॥
गोपीप्रेमके निकट श्रीकृष्णका ऋण :—
‘सर्वोत्तम भजन एइ सर्वभक्ति जिनि’।
अतएव कृष्ण कहे, —‘आमि तोमार ऋणी’ ॥ 42 ॥
अनुवाद—गोपियोंका मधुररसमें श्रीकृष्ण-भजन अन्य सभी प्रकारकी भक्तिके भावोंको पराभूत करता है। इसलिये श्रीकृष्ण गोपियोंसे कहते हैं, —‘मैं तुम्हारा सदाके लिये ऋणी हूँ।’ ॥ 42 ॥
श्रीमद्भागवत (10/32/22) में—
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां
स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माऽभजन् दुर्जयगेहशृंखलाः
संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ 43 ॥
अनुवाद—हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन निर्मल है। अनेक जन्मोंमें भी मैं अपने सत्कार्योंके द्वारा तुम्हारे प्रति कर्तव्यानुष्ठान नहीं कर सकता, क्योंकि तुम लोगोंने मेरी प्राप्तिके लिये अति कठिन संसार-शृङ्खलाको सम्पूर्णरूपसे तोड़कर मेरा अन्वेषण किया है। मैं तुम लोगोंके इस ऋणका परिशोधन करनेमें सक्षम नहीं हूँ। इसलिये तुम लोग अपने साधु कार्योंके द्वारा ही परितुष्ट होओ ॥ 43 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/180 संख्या देखें ॥ 43 ॥
व्रजके शुद्ध केवलभावकी श्रेष्ठता, उसके विषयमें श्रीउद्धवकी प्रार्थना ही प्रमाण :—
ऐश्वर्यज्ञान हैते केवल-भाव—प्रधान।
पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव-समान ॥ 44 ॥
तैँह याँर पदधूलि करेन प्रार्थन।
स्वरूपेर सङ्गे पाइलुँ ए सब शिक्षण ॥ 45 ॥
अनुवाद—ऐश्वर्यज्ञानसे ‘केवल’-भाव श्रेष्ठ है। पृथ्वीपर उद्धवके समान कोई भक्त नहीं है, किन्तु वे भी उन व्रजगोपियोंके चरणोंकी धूलिकी प्रार्थना करते हैं। स्वरूप दामोदरके सङ्गमें ही मुझे यह सब शिक्षा मिली है ॥ 44–45 ॥
अनुभाष्य—इस स्थानपर पाठान्तरमें—(भाः 10/47/61) श्लोक उद्धृत हुआ देखा जाता है—
“आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥”
श्रीकृष्णके द्वारा भेजे जानेपर उद्धव व्रजमें आकर कुछ मास तक वहाँ रहे। उन्होंने श्रीकृष्णकथाको सुनाकर व्रजवासियोंका हर्ष उत्पादन किया, तो भी श्रीकृष्णविरहमें तप्त गोपियोंके श्रीकृष्णके द्वारा हरण किये गये चित्तकी विकलताका दर्शन करके उनके ऐश्वर्यज्ञानहीन गाढ़तम श्रीकृष्णप्रेमको आदर्श जानकर

216 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/44-53 ]
उसका आदर करते हुए इस श्लोकमें उनके चिरदास्यकी
प्रार्थना कर रहे हैं,-
याः (गोप्यः) [कृष्णभजनाय] स्वजनं (पतिपुत्रादीन् आत्मीयान्)
दुस्त्यजं (दुष्परिहरम्) आर्यपथम् (आर्याणां मार्गं धर्मं पातिव्रत्यमिति
यावत्) च हित्वा (परित्यज्य) श्रुतिभिः (वेदैः) विमृग्याम्
(अन्वेष्टव्याम् उपास्यां) मुकुन्दपदवीं (कृष्णसरणीं) भेजुः
(अन्वगच्छन्), अहो (भाग्यवर्णने) वृन्दावने (अस्मिन् व्रजे)
आसां (तासां) चरणरेणुजुषां (पदररेणुभाजां) गुल्मलताौषधीनां
(गुल्मादीनां मध्ये यत्) किमपि अहं स्यां (भवेयमित्याशंसा)।
अर्थात् “जिन्होंने अति कठिनाईसे त्यागे जानेवाले
पति-पुत्रादि निजजन और आर्यपथका परित्याग करके
वेदोंके द्वारा खोजे जा रहे मुकुन्दके चरणकमलोंका
भजन किया है, इस वृन्दावनमें स्थित समस्त गुल्म,
लता और औषधियाँ उन गोपियोंकी चरणरेणुकी सेवामें
नियुक्त हैं, अहो! मैं (महासौभाग्यशाली होकर) उनमेंसे
कोई एक बन सकूँ॥”44-45॥
(6) महाभागवत आचार्य ठाकुर
श्रीहरिदासकी गुणावली :-
हरिदास ठाकुर-महाभागवत-प्रधान।
प्रतिदिन लय तैं ह तिनलक्ष नाम ॥ 46 ॥
नामेर महिमा आमि ताँर ठाञि शिखिलुँ।
ताँर प्रसादे नामेर महिमा जानिलुँ ॥ 47 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर महाभागवतोंमें प्रधान हैं,
वे प्रतिदिन तीन लाख नाम ग्रहण करते हैं। मैंने उनसे
ही नामकी महिमाको सीखा है और उनकी कृपासे ही
मैंने नामकी महिमाको जाना है॥ 46-47॥
अन्यान्य नाम-प्रेम-प्रचारक गौरभक्तगण :-
आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, पण्डित-गदाधर।
जगदानन्द, दामोदर, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥ 48 ॥
काशीश्वर, मुकुन्द, वासुदेव, मुरारि।
आर यत भक्तगण गौड़े अवतरि' ॥ 49 ॥
शुद्धभक्तिका आचार और प्रचार करनेवाले साधुओंके
सङ्गसे ही जीवको कृष्णभक्तिकी प्राप्ति :-
कृष्ण-नाम-प्रेम कैला जगते प्रचार।
इँहा सबार सङ्गे कृष्णभक्ति ये आमार ॥ ”50 ॥
अनुवाद-आचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर), आचार्यनिधि
(पुण्डरीक विद्यानिधि), गदाधर पण्डित, जगदानन्द पण्डित,
दामोदर पण्डित, शङ्कर पण्डित, वक्रेश्वर पण्डित,
काशीश्वर पण्डित, मुकुन्द दत्त, वासुदेव दत्त और
मुरारि गुप्त आदि जो सब भक्त गौड़देशमें अवतरित हुए
हैं, उन्होंने ही जगत्में कृष्णनामके द्वारा कृष्णप्रेमका
प्रचार किया है। इन सबके सङ्गसे ही मुझमें कृष्णभक्ति
उत्पन्न हुई है॥”48-50॥
श्रीवल्लभके गर्वका हरण करनेके लिये
महाप्रभुके द्वारा उनकी अपेक्षा अधिक
गुण-सम्पन्न भक्तोंके गुणोंका वर्णन :-
भट्टेर् हृदये दृढ़ अभिमान जानि'।
भङ्गी करि' महाप्रभु कहे एत वाणी ॥ 51 ॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके हृदयमें दृढ़
अभिमानको जानते थे, इसलिये उसे इङ्गित करते हुए
उन्होंने यह सब कहा॥ 51 ॥
अधोक्षजके विषयमें अक्षज-ज्ञानी श्रीवल्लभकी प्राकृत
अहङ्कार-चेष्टा; भागवतके आनुगत्यको त्यागकर
श्रीवल्लभके द्वारा भागवतकी टीकाकी रचना :-
“आमि से ‘वैष्णव',-भक्तिसिद्धान्त सब जानि।
आमि से भागवत-अर्थ उत्तम बाखानि ॥”52 ॥
महाप्रभुकी कृपासे श्रीवल्लभका अहङ्कार-चूर्ण :-
भट्टेर् मनेते एइ छिल दीर्घ गर्व।
प्रभुर वचन शुनि' से हइल खर्व ॥ 53 ॥
अनुवाद-“मैं उन्नत वैष्णव हूँ, मैं समस्त
भक्तिसिद्धान्तोंको जानता हूँ, मैं भागवतके अर्थोंको

[ 7/52-62 सातवाँ अध्याय 217
भली-भाँति जानकर उत्तमरूपसे व्याख्या करता
हूँ”—श्रीवल्लभ भट्टके मनमें यह बहुत बड़ा गर्व था,
किन्तु महाप्रभुके वचनोंको सुनकर वह खण्डित हो
गया ॥ 52-53 ॥
अनुभाष्य—‘दीर्घ गर्व’,–अति पुष्ट, अति उच्च
अभिमान ॥ 53 ॥
महाप्रभुके मुखसे सुने गौरभक्त
वैष्णवोंके दर्शनकी इच्छा :—
प्रभुर मुखे वैष्णवता शुनिया सबार।
भट्टेर इच्छा हैल सबारे देखिबार॥ 54॥
अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे सब भक्तोंकी वैष्णवताके
विषयमें सुनकर श्रीवल्लभ भट्टके मनमें उन सबके
दर्शनकी इच्छा जाग्रत हुई॥ 54॥
भट्ट कहे,—“ए सब वैष्णव रहे कोन् स्थाने?
कोन् प्रकारे पाइमु इँहा-सबार दर्शने??”55॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“ये सब वैष्णव
कहाँ रहते हैं? किस प्रकार मुझे इन सबके दर्शन प्राप्त
होंगे?” 55॥
महाप्रभुके द्वारा उनके अवस्थानका वर्णन :—
प्रभु कहे,—“केह गौड़े, केह देशान्तरे।
सब आसियाछे रथयात्रा देखिबारे॥ 56॥
श्रीभट्टको भक्तोंके दर्शनके लिये प्रतीक्षाके
लिये आश्वासन देना :—
इँहाइ रहेन सबे, वासा—नाना—स्थाने।
इँहाइ पाइबा तुमि सबार दर्शने॥”57॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“कुछ तो गौड़देशमें
और कुछ अन्य स्थानोंपर रहते हैं, किन्तु अभी सभी
रथयात्राके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये हुए हैं।
सभी भक्त यहाँपर ही भिन्न-भिन्न स्थानोंपर रह रहे हैं।
आपको यहींपर सभी भक्तोंके दर्शन प्राप्त होंगे॥” 56-57॥
श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :—
तबे भट्ट कहे बहु विनय वचन।
बहु यत्न करि’ प्रभुरे कैल निमन्त्रण॥ 58॥
अनुवाद—तब श्रीवल्लभभट्टने बहुत विनीत वचन
कहे और बहुत आग्रह करके महाप्रभुको निमन्त्रित
किया॥ 58॥
महाप्रभुके निकट भक्तोंका आगमन और
श्रीभट्टके साथ मिलन :—
आर दिन सब वैष्णव प्रभुस्थाने आइला।
सबा—सने महाप्रभु भट्टे मिलाइला॥ 59॥
अनुवाद—अगले दिन जब सब भक्त महाप्रभुके
स्थानपर आये, तब महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको उन
सबसे मिलवाया॥ 59॥
दीप्त सूर्यके आगे निस्तेज जुगनूकी भाँति
गौरभक्तोंके सामने श्रीवल्लभभट्ट :—
‘वैष्णवेर’ तेज देखि’ भट्टेर चमत्कार।
ताँ—सबार आगे भट्ट—खद्योत—आकार॥ 60॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट वैष्णवोंके तेजको देखकर
आश्चर्यचकित हो गये। उन सबके आगे श्रीवल्लभ भट्ट
जुगनूकी भाँति प्रतीत होने लगे॥ 60॥
श्रीभट्टके द्वारा सपरिकर महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :—
तबे भट्ट बहु महाप्रसाद आनाइल।
गण—सह महाप्रभुरे भोजन कराइल॥ 61॥
अनुवाद—तब श्रीवल्लभ भट्टने श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे
बहुत-सा महाप्रसाद मँगवाया और महाप्रभुको उनके
भक्तों सहित भोजन करवाया॥ 61॥
श्रीपरमानन्दपुरीके सङ्गमें संन्यासी-भक्तोंका
एक पंक्तिमें बैठना :—
परमानन्द पुरी—सङ्गे संन्यासीर गण।
एकदिके कैसे सब करिते भोजन॥ 62॥

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218 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/62-72 ]

[बायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—एक ओर श्रीपरमानन्दपुरीके साथ बहुतसे
संन्यासी भोजन करनेके लिये बैठे ॥ ६२ ॥
महाप्रभुके दोनों ओर दो प्रभु :—
अद्वैत, नित्यानन्द-राय—पार्श्वे दुइजन।
मध्ये महाप्रभु बसिला, आगे-पाछे भक्तगण ॥ ६३ ॥
अनुवाद—महाप्रभु भक्तोंके बीचमें बैठे, महाप्रभुके
दोनों ओर श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु बैठे
और उनके आगे-पीछे अन्यान्य समस्त भक्त बैठ
गये ॥ ६३ ॥
गौड़ीय भक्तोंका श्रेणीबद्धरूपमें बैठना :—
गौड़ेर भक्त यत कहिते ना पारि।
अङ्गने बसिला सब हञा सारि सारि ॥ ६४ ॥
अनुवाद—श्रीगौड़देशके कितने भक्त थे, इस विषयमें
मैं (ग्रन्थकार) कह नहीं सकता, वे सभी आङ्गनमें पंक्ति
बनाकर बैठ गये ॥ ६४ ॥
गौरभक्तोंको देखकर श्रीभट्टके द्वारा प्रणाम :—
प्रभुर भक्तगण देखि' भट्टेर चमत्कार।
प्रत्यक्षे सबार पदे कैल नमस्कार ॥ ६५ ॥
अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंको देखकर श्रीवल्लभ
भट्ट आश्चर्यचकित रह गये, उन्होंने प्रत्यक्ष रूपसे
सभीके चरणोंमें नमस्कार किया ॥ ६५ ॥
छह भक्तोंके द्वारा प्रसाद वितरण :—
स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर।
परिवेशना करे, आर राघव, दामोदर ॥ ६६ ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित,
श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीराघव पण्डित
और श्रीदामोदर पण्डित—ये प्रसाद परोस रहे थे ॥ ६६ ॥
श्रीवल्लभ-भट्टके द्वारा भक्तों सहित महाप्रभुको
प्रसादके द्वारा सन्तुष्ट करना :—
महाप्रसाद वल्लभ-भट्ट बहु आनाइल।
प्रभु-सह संन्यासिगण भोजने बसिल ॥ ६७ ॥

[दायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने बहुत अधिक मात्रामें
महाप्रसाद मँगवाया था। सभी संन्यासी महाप्रभुके साथ
भोजन करनेके लिये बैठे ॥ ६७ ॥
सभीके द्वारा एकसाथ हरिध्वनि :—
प्रसाद पाय वैष्णवगण बोले, 'हरि' 'हरि'।
हरिध्वनि उठिल सब ब्रह्माण्ड भरि' ॥ ६८ ॥
अनुवाद—सभी वैष्णव प्रसाद ग्रहण करते समय
'हरि', 'हरि' बोल रहे थे। उस हरिध्वनिसे सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड भर गया ॥ ६८ ॥
आचमनके बाद सभीको अभिनन्दन :—
माला, चन्दन, गुवाक, पान अनेक आनिल।
सबा' पूजा करि' भट्ट आनन्दित हैल ॥ ६९ ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट बहुत-सी माला, चन्दन,
सुपारी और पान लेकर आये। ये सब सामग्री सभीको
भेंट करके उनकी पूजा करके श्रीवल्लभ भट्ट बहुत
आनन्दित हुए ॥ ६९ ॥
रथयात्राके समय सात मण्डलियोंके कीर्तनका वर्णन :—
रथयात्रादिने प्रभु कीर्त्तन आरम्भिला।
पूर्ववत् सातसम्प्रदाय पृथक् करिला ॥ ७० ॥
अनुवाद—रथयात्राके दिन महाप्रभुने कीर्तन आरम्भ
किया। पूर्व वर्षोंकी भाँति उन्होंने सात पृथक् मण्डलियाँ
बनायीं ॥ ७० ॥
सात मण्डलियोंमें सात कीर्तन करनेवाले :—
अद्वैत, नित्यानन्द, हरिदास, वक्रेश्वर।
श्रीवास, राघव, पण्डित-गदाधर ॥ ७१ ॥
अलातचक्रकी भाँति महाप्रभुके द्वारा कीर्तनमें भ्रमण :—
सातजन सात ठाञि करेन नर्त्तन।
'हरिबोल' बलि' प्रभु करेन भ्रमण ॥ ७२ ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीहरिदास
ठाकुर, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवास पण्डित, श्रीराघव

[ 7/71-80 सातवाँ अध्याय 219
पण्डित और श्रीगदाधर पण्डित—ये सात भक्त पृथक्-पृथक्
सात मण्डलियोंमें जाकर नृत्य करने लगे और महाप्रभु
'हरिबोल' बोलते हुए इन सात मण्डलियोंमें भ्रमण करने
लगे॥ 71-72॥
चौदह मृदङ्ग :—
चौद्द मादल बाजे उच्च सङ्कीर्त्तन।
एक एक नर्त्तकेर प्रेमे भासिल भुवन ॥ 73 ॥
अनुवाद—चौदह मृदङ्ग बज रहे थे, उच्च स्वरमें
हरिनाम सङ्कीर्त्तन हो रहा था, प्रत्येक मण्डलीमें एक-एक
नर्तकके प्रेमसे सम्पूर्ण जगत् आप्लावित हो गया ॥ 73 ॥
श्रीवल्लभका विस्मय और परमानन्द :—
देखि' वल्लभ-भट्टेरे हैल चमत्कार।
आनन्दे विह्वल, नाहि आपन-साम्भाल ॥ 74 ॥
अनुवाद—यह सब देखकर श्रीवल्लभ भट्ट अत्यन्त
आश्चर्यचकित हुए। वे आनन्दमें विह्वल होनेके कारण
स्वयंको सम्भाल भी नहीं पा रहे थे ॥ 74 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'साम्भाल',—सम्भालना ॥ 74 ॥
नृत्य-कीर्त्तनके बाद महाप्रभुके प्रेम-वैभवको देखकर
श्रीवल्लभको विस्मय :—
तबे महाप्रभु सबार नृत्य राखिल।
प्रभुर चरित्रे भट्टेर चमत्कार हैल ॥ 75 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंसे नृत्यको
विराम देनेके लिये कहा। महाप्रभुकी लीलाको देखकर
श्रीवल्लभ भट्टके हृदयमें चमत्कार हुआ ॥ 75 ॥
महाप्रभुसे श्रीवल्लभका निवेदन :—
यात्रान्तरे भट्ट याय महाप्रभु-स्थाने।
प्रभु-चरणे किछु कैल निवेदने ॥ 76 ॥
अपने द्वारा पूर्नलिखित टीकाके श्रवणके
लिये महाप्रभुसे प्रार्थना :—
“भागवतेर टीका किछु करियाछि लिखन।
आपने महाप्रभु यदि करेन श्रवण ॥ ”77॥
अनुवाद—श्रीरथयात्राके समाप्त होनेके बाद एक
दिन श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुके वासस्थानपर गये और
उन्होंने महाप्रभुके चरणकमलोंमें कुछ निवेदन किया,—“मैंने
भागवतकी कुछ टीका लिखी है। हे महाप्रभु! आप
कृपापूर्वक उसे श्रवण करें ॥ ”76-77 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'यात्रान्तरे',—अन्य यात्रामें, अन्य
दिनमें ॥ 76 ॥
स्वयंको अनधिकारी मानकर महाप्रभुका दैन्य और छलपूर्ण
उक्ति; कृष्ण-कार्ष्णके सुख-तात्पर्यके अतिरिक्त जड़विद्या
और पाण्डित्यसे भागवतके अर्थ दुर्बोध्य :—
प्रभु कहे,—“भागवतार्थ बुझिते ना पारि।
भागवतार्थ शुनिते आमि नहि अधिकारी ॥ 78 ॥
थकानरहित निरन्तर शुद्धकृष्णनाम ग्रहण करनेमें
निष्ठा और रुचिसे ही भागवत-पाठ श्रवण
करनेकी सफलता, इन्द्रिय-तर्पण परायण
जड़ीय विद्या और पाण्डित्यको प्रदर्शित करनेके
उद्देश्यसे श्रवण-पठनादि वृथा समय व्ययमात्र :—
बसि' कृष्णनाम मात्र करिये ग्रहणे।
संख्या-नाम पूर्ण मोर नहे रात्रि-दिने ॥ ”79 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं भागवतके अर्थोंको
समझ नहीं पाता। मैं भागवतके अर्थको सुननेका
अधिकारी भी नहीं हूँ। मैं तो बैठकर केवल कृष्णनामका
कीर्त्तन करता हूँ। दिन-रात नाम कीर्त्तन करनेपर भी
मेरी नाम-संख्या पूर्ण नहीं होती ॥ ”78-79 ॥
श्रीवल्लभभट्टके द्वारा स्वरचित श्रीकृष्णनामकी व्याख्याके
श्रवण हेतु महाप्रभुसे अनुरोध :—
भट्ट कहे,—“कृष्णनामेर अर्थ-व्याख्याने।
विस्तार करियाछि, ताहा करह श्रवणे ॥ ”80 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“मैंने कृष्णनामके
अर्थकी व्याख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उस
व्याख्याको आप श्रवण कीजिये ॥ ”80 ॥

220 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/81-86 ]
अभिन्न-चिद्विलासी वाचक कृष्णनाम और स्व-सुखपरक जड़विद्या, बुद्धि या मेधाकी सहायतासे
वाच्य गोकुलपति श्रीकृष्ण-विग्रह :- श्रीकृष्णनाम और श्रीकृष्ण-अभिन्न भागवत-व्याख्यादिमें
प्रभु कहे,-'कृष्णनामेर बहु अर्थ ना मानि। श्रीकृष्णसुखके अभावको जानकर महाप्रभुकी घृणा :-
'श्यामसुन्दर' 'यशोदानन्दन', -एइमात्र जानि ॥ 81 ॥ फल्गुप्राय भट्टेर नामादि सब व्याख्या।
सर्वज्ञ प्रभु जानि' तारे करेन उपेक्षा ॥ 84 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैं कृष्णनामके बहुतसे अनुवाद-महाप्रभु सर्वज्ञ हैं, इसलिये वे जानते थे
अर्थोंको नहीं मानता, कृष्ण 'श्यामसुन्दर' और 'यशोदानन्दन' कि श्रीवल्लभ भट्टके द्वारा की गयी कृष्णनाम और
हैं-मैं केवल इतना ही जानता हूँ॥ 81 ॥ भागवतकी समस्त व्याख्याएँ निस्सार और निरर्थक हैं।
कृष्णनामका 'रूढ़ि' अर्थ :- इसलिये महाप्रभु उन व्याख्याओंकी उपेक्षा कर रहे
कृष्णसन्दर्भमें उद्धृत श्रीलक्ष्मीधर-कृत नामकौमुदी-श्लोक- थे॥ 84 ॥
तमालश्यामलत्विषि श्रीयशोदास्तनन्धये। अमृतप्रवाह भाष्य-'फल्गुप्राय', -तुच्छप्राय ॥ 84 ॥
कृष्णनाम्नो रूढिरिति सर्वशास्त्र-विनिर्णयः ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें- 'फल्गु वलुप्राय' एवं 'फल्गु
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 82 ॥ वलानप्राय'; 'फल्गु',-तुच्छ; 'वलान अथवा वलु',-
अमृतप्रवाह भाष्य-तमाल-श्यामलवर्ण और यशोदा- वाक्-आडम्बर ॥ 84 ॥
स्तनपायी, -इन दो कृष्णनामोंमें समस्त शास्त्रोंमें विनिर्णीत दुःखी मनसे श्रीभट्टका प्रस्थान और गर्वके नष्ट होनेके
रूढ़ि अर्थात् मुख्य अर्थ विद्यमान है ॥ 82 ॥ कारण महाप्रभुके प्रति भक्तिकी कमी :-
अनुभाष्य- विमना हञा भट्ट गेला निज घर।
तमाल-श्यामल-त्विषि (तमालवृक्षवत् श्यामला त्विट् कान्तिः प्रभु-विषये भक्ति किछु हइल अन्तर ॥ 85 ॥
यस्य तस्मिन्) श्रीयशोदास्तनन्धये (श्रीयशोदायाः स्तनन्धये अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट दुःखी मनसे अपने घर
स्तनपायिनि शिशुस्वरूपे) कृष्णनाम्नः (कृष्णोति नाम, तस्य) लौट गये। महाप्रभुके प्रति उनकी भक्तिमें कुछ कमी
रूढ़िः (मुख्या, प्रसिद्धा वृत्तिः) इति सर्वशास्त्रविनिर्णयः (सर्वेषां आ गयी ॥ 85 ॥
शास्त्राणां विशेषेण निर्णयः सकलशास्त्रसिद्धान्तः इत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विषयमें उनकी जो
रूढ़िः-प्रकृति-प्रत्ययके अर्थकी अपेक्षा नहीं करके भक्ति थी, वह कुछ दूर हो गयी ॥ 85 ॥
समुदायके अर्थका बोध करानेवाली शब्द-शक्ति ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुके चरणकमलोंमें उनकी गाढ़
'रूढ़ि' अर्थ ही सिद्ध और स्वीकार्य; भक्तिका ह्रास हो गया ॥ 85 ॥
अन्य अर्थ अस्वीकार्य :- श्रीगदाधरकी चाटुता आरम्भ :-
एइ अर्थ आमि मात्र जानिये निर्द्धार। तबे भट्ट गेला पण्डित-गोसाञिर ठाञि।
आर सर्व-अर्थे मोर नाहि अधिकार ॥" 83 ॥ नाना मते प्रीति करि' करे आसि-याइ ॥ 86 ॥
अनुवाद-मैं कृष्णनामके श्यामसुन्दर और अनुवाद-तब श्रीवल्लभभट्ट श्रीगदाधर पण्डितके
यशोदानन्दन-केवल इन्हीं अर्थोंको ही शास्त्रके द्वारा वासस्थानपर गये। वे अनेक प्रकारसे उनसे प्रीति
निर्धारित मानता हूँ, अन्य सभी अर्थोंमें मेरा अधिकार दिखाकर उनके पास आना-जाना करके उनसे सम्बन्ध
नहीं है ॥" 83 ॥ बनाये रखने लगे ॥ 86 ॥

[ 7/86-94 सातवाँ अध्याय 221

अनुभाष्य—'पण्डित-गोसाञि'—श्रीगदाधर पण्डित
गोस्वामी ॥ 86 ॥
महाप्रभुके द्वारा उपेक्षा करनेके कारण भक्तोंकी उनके
द्वारा की गयी व्याख्याके प्रति उदासीनता :-
प्रभुर उपेक्षाय सब नीलाचलेर जन।
भट्टेर व्याख्यान किछु ना करे श्रवण ॥ 87 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा उपेक्षा किये जानेके
कारण नीलाचलका कोई भी व्यक्ति श्रीवल्लभ भट्टकी
किसी भी व्याख्याको श्रवण नहीं करता था॥ 87 ॥
श्रीभट्टका लज्जित होना और श्रीगदाधरकी चाटुकारी :-
लज्जित हैल भट्ट, हैल अपमाने।
दुःखित हञा गेल पण्डितेर स्थाने ॥ 88 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट लज्जित, अपमानित और
दुःखी होकर श्रीगदाधर पण्डितके पास गये ॥ 88 ॥
दैन्य करि' कहे,—“निलुँ तोमार शरण।
तुमि कृपा करि' राख आमार जीवन ॥ 89 ॥
श्रीगदाधरको स्वरचित कृष्णनाम-व्याख्याके
श्रवणके लिये प्रार्थना करना :-
कृष्णनाम व्याख्या यदि करह श्रवण।
तबे मोर लज्जा-पङ्क हय प्रक्षालन ॥” 90 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट बड़ी दीनतासे कहने
लगे,—“मैंने आपकी शरण ग्रहण की है। आप कृपा
करके मेरे जीवनकी रक्षा कीजिये। यदि आप मेरे द्वारा
की गयी कृष्णनामकी व्याख्याका श्रवण करेंगे, तभी
मुझपर लगा लज्जारूपी कीचड़ धुलेगा॥” 89–90 ॥
अनुभाष्य—'निलुँ',—पाठान्तरमें 'लैलूँ' ॥ 89 ॥
श्रीगदाधरका दोनों ओर सङ्कट :-
सङ्कटे पड़िला पण्डित, करये संशय।
कि करिबेन,—इहा करिते नारेन निश्चय ॥ 91 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित दुविधामें पड़ गये। उन्हें
संशय होने लगा कि मैं क्या करूँ—इसका वे निश्चय
नहीं कर पा रहे थे ॥ 91 ॥
अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने वल्लभभट्टकी उपेक्षा की
है, फिर यदि मैं उनसे (वल्लभभट्टसे) नामव्याख्या-मूलक
रचना आदि श्रवण करूँ, तो महाप्रभुके मनमें क्लेश
होगा। इन दोनोंमें-से किस पक्षकी रक्षा करूँ, यही
चिन्ता करके पण्डित गोस्वामी दुविधामें पड़ गये ॥ 91 ॥
श्रीगदाधरकी पहले श्रीवल्लभरचित व्याख्याका श्रवण
करनेमें असम्मति; तथापि श्रीभट्टका अनुरोध :-
यद्यपि पण्डित ना कैला अङ्गीकार।
भट्ट याइ, तबु पड़े करि' बलात्कार ॥ 92 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीगदाधर पण्डित सुनना नहीं
चाहते थे, तथापि श्रीवल्लभ भट्ट हठपूर्वक उन्हें स्वरचित
कृष्णनामकी व्याख्याको पढ़कर सुनाने लगे ॥ 92 ॥
अनुभाष्य—पण्डित गोस्वामीने प्रकटरूपसे श्रीवल्लभकी
रचना सुननेकी इच्छा प्रकाशित नहीं की, तो भी
श्रीवल्लभ उनके साथ प्रीतिकी डोरकी कल्पना करके
उनके नहीं माननेपर भी उनके सामने पाठ करने
लगे ॥ 92 ॥
सबको मान देनेवाले और उद्वेग देनेमें
अनिच्छुक श्रीगदाधरका दोनों ओर सङ्कट
देखकर श्रीकृष्णकृपाकी याचना :-
आभिजात्ये पण्डित करिते नारे निषेधन।
“ए सङ्कटे कृष्ण राख, लइलाङ शरण ॥ 93 ॥
भीतरमें अनिच्छुक होनेपर भी श्रीभट्टकी मर्यादाको देखते
हुए महाप्रभुके द्वारा उपेक्षित व्याख्याके श्रवण-हेतु
अन्तर्यामी महाप्रभुके विचारमें पण्डितका विश्वास, किन्तु
महाप्रभुके भक्तोंसे आशङ्का :-
अन्तर्यामी प्रभु जानिबेन मोर मन।
ताँरे भय नाहि किछु, 'विषम' ताँर गण ॥” 94 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट समाजमें सम्मानित होनेके
कारण श्रीगदाधर पण्डित उन्हें बलपूर्वक सुनानेसे मना
नहीं कर पाये। इसलिये वे भगवान् श्रीकृष्णसे मन-ही-मनमें
प्रार्थना करने लगे,—“हे कृष्ण! इस सङ्कटमें आप मेरी

222 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/93–100 ]
रक्षा करो, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। अन्तर्यामी
होनेके कारण महाप्रभु अवश्य ही मेरे मनकी स्थितिको
समझ लेंगे, मुझे उनसे कोई भय नहीं है, किन्तु उनके
पार्षद 'विषम' हैं अर्थात् उन्हें अपने मनकी बात
समझाना कठिन होगा॥" 93-94 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आभिजात्ये', -कुलीनताके कारण
अर्थात् पण्डितकुलमें श्रीवल्लभ भट्टका सम्मान होनेके
कारण ॥ 93 ॥
अनुभाष्य- 'आभिजात्ये', - (1) लज्जाके कारण,
(2) नितान्त भक्तिविरोधी पाण्डित्य नहीं होनेके कारण
और (3) सामाजिक-सम्मानके कारण।
स्वयं भगवान् श्रीमहाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको
जाननेवाले हैं; गदाधर पण्डितगोस्वामी किस प्रकारकी
अवस्थामें श्रीवल्लभके साथ किस प्रकारका व्यवहार
करनेके लिये बाध्य हुए हैं, वह भगवान् गौरसुन्दरके
लिये अज्ञात नहीं है। इसलिये महाप्रभुके विरागके पात्र
होनेके सम्बन्धमें उन्हें कोई आशङ्का नहीं थी; परन्तु
महाप्रभुके आश्रित वैष्णवोंमें-से कोई-कोई भीतरकी सब
बातोंको नहीं समझकर बादमें 'वल्लभके सङ्गकारी'
कहकर पण्डित गोस्वामीके प्रतिकूल कोई अभिप्राय
प्रकाशित करें, - यही आशङ्काका विषय है॥ 93-94 ॥
श्रीवल्लभ-रचित व्याख्याके श्रवणसे अन्याय नहीं होनेपर
भी श्रीपण्डितके साथ महाप्रभुके भक्तोंका प्रेम-कलह :-
यद्यपि विचारे पण्डितेर नाहि दोष।
तथापि प्रभुर गण करे प्रणय-रोष ॥ 95 ॥
अनुवाद-इस विषयमें विचार करनेपर यद्यपि श्रीगदाधर
पण्डितका कोई दोष नहीं था, तथापि महाप्रभुके भक्त
उनके प्रति प्रणय-रोष करने लगे ॥ 95 ॥
श्रीअद्वैताचार्य आदिके साथ श्रीवल्लभभट्टका कुतर्क :-
प्रत्यह वल्लभ-भट्ट आइसे प्रभु-स्थाने।
'उद्ग्राहादि' प्राय करे आचार्यादि-सने ॥ 96 ॥
अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट प्रतिदिन महाप्रभुके वासस्थानपर
आते और श्रीअद्वैताचार्य आदिसे वितर्क करते ॥ 96 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'उद्ग्राहादि' - वितर्कादि ॥ 96 ॥
अनुभाष्य - 'उद्ग्राहादि प्राय',- आक्रमणके जैसे अर्थात्
विद्याविचार-जैसे तर्कोंका प्रदर्शन। 'आचार्यादि',-
श्रीअद्वैताचार्य अथवा आचार्य दामोदरस्वरूप आदिके
साथ ॥ 96 ॥
श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीवल्लभके समस्त
अभक्तिसिद्धान्तोंका खण्डन :-
येइ किछु करे भट्ट 'सिद्धान्त' स्थापन।
शुनितेइ आचार्य ताहा करेन खण्डन ॥ 97 ॥
अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट जिस किसी भी सिद्धान्तको
स्थापित करते, श्रीअद्वैताचार्य सुनते ही उसका खण्डन
कर देते ॥ 97 ॥
गौरभक्तोंके मध्य श्रीभट्ट-जैसे हंसोंके मध्य बगुला :-
आचार्यादि-आगे भट्ट यबे यबे याय।
राजहंस-मध्ये येन रहे बकप्राय ॥ 98 ॥
अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट जब-जब श्रीअद्वैताचार्य
आदिके बीचमें जाते, वे राजहंसोंके मध्य बगुलेकी भाँति
ही होते ॥ 98 ॥
प्रकृतिरूपी जीवके लिये उनके नित्य पति
श्रीकृष्णके नामोंके उच्चारण करनेके अधिकारमें
श्रीवल्लभके द्वारा आपत्ति जतलाना :-
एकदिन भट्ट पुछिल आचार्येरे।
“जीव-‘प्रकृति’ ‘पति’ करि’ मानये कृष्णेरे ॥ 99 ॥
पतिव्रता हञा पतिर नाम नाहि लय।
तोमरा कृष्णनाम-लह, - कोन् धर्म हय?? ” 100 ॥
अनुवाद-एकदिन श्रीवल्लभ भट्टने श्रीअद्वैताचार्यसे
पूछा,- “जीव प्रकृति अर्थात् स्त्री है और श्रीकृष्णको
पति मानती है। पतिव्रता होनेके कारण पत्नी अपने
पतिके नामका उच्चारण नहीं करती, किन्तु आप लोग

[ 7/99-109 सातवाँ अध्याय 223

तो कृष्णका नाम लेते हैं—यह क्या कोई धर्म
है?"99-100 ॥
मीमांसाके लिये श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा साक्षात्
धर्मके विग्रह महाप्रभुको दिखाना :-
आचार्य कहे,—“आगे तोमार 'धर्म' मूर्त्तिमान्।
इँहारे पुछह, इँह करिबेन प्रमाण॥” 101 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आपके सामने
मूर्त्तिमान 'धर्म' (महाप्रभु) विराजमान हैं। आप इन्हींसे
पूछिये, ये ही आपको इसका प्रमाण देंगे॥” 101 ॥
श्रीवल्लभके ऊपर कृपा और नित्य-मङ्गलका प्रदर्शन
करनेके लिये ही महाप्रभुके द्वारा बहुत कठोर
किन्तु सत्य उत्तर देना; पतिरूपी श्रीकृष्णके
उद्देश्यसे ही प्रकृतिरूपी जीवके लिये सदैव
श्रीकृष्णनामको ग्रहण करनेकी विधि :-
प्रभु कहेन,—“तुमि ना जानह धर्माधर्म।
स्वामी-आज्ञा पाले,—एइ पतिव्रता-धर्म॥ 102 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम धर्म-अधर्मके विषयमें
नहीं जानते हो। पतिकी आज्ञाका पालन करना ही
पतिव्रता स्त्रीका धर्म होता है॥ 102 ॥
पतिर आज्ञा,—निरन्तर ताँर नाम लइते।
पतिर आज्ञा पतिव्रता ना पारे लङ्घिते॥ 103 ॥
अनुवाद—उनका निरन्तर नाम ग्रहण करना ही
पतिकी (कृष्णकी) आज्ञा है। इसलिये पतिव्रता स्त्रीको
(जीवको) निरन्तर नाम कीर्तन करना चाहिये, क्योंकि
वह अपने पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर
सकती॥ 103 ॥
पतिरूपी श्रीकृष्णनाम उच्चारणके फलसे
श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय :-
अतएव नाम लय, नामेर 'फल' पाय।
नामेर फले कृष्णपदे 'प्रेम' उपजाय॥” 104 ॥
अनुवाद—इसलिये [भक्त] जीव कृष्णनामका सदा
कीर्तन करके नामके फलको प्राप्त करता है। नामके
फलस्वरूप उसका कृष्णके चरणोंमें प्रेम उत्पन्न होता
है॥” 104 ॥
प्रतिष्ठाके क्षय होनेपर श्रीवल्लभ-भट्ट
अवाक् और चिन्तासे व्याकुल :-
शुनिया वल्लभभट्ट हैल निर्वचन।
घरे याइ' मने दुःखे करेन चिन्तन॥ 105 ॥
भविष्यमें जयकी आशाकी कल्पनासे प्रतिष्ठाशा-प्रिय
श्रीवल्लभका हर्ष-स्वप्न :-
'नित्य आमार एइ सभाय हय कक्षा-पात।
एकदिन उपरे यदि हय मोर बात्॥ 106 ॥
तबे सुख हय, आर सब लज्जा याय।
स्व-वचन स्थापिते आमि कि करि उपाय??' 107 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीवल्लभ भट्ट मौन हो गये।
वे मनमें दुःखी होकर घर गये और विचार करने
लगे,—'प्रतिदिन इस सभामें मेरी पराजय होती है,
एकदिन भी यदि मेरी बात सबकी बातके ऊपर स्थापित
हो जाय, तभी मुझे प्रसन्नता होगी और मेरी समस्त
लज्जा दूर होगी। परन्तु मैं अपने वचनोंको स्थापित
करनेके लिये क्या करूँ?' 105-107 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कक्षा-पात',—पराजय॥ 106 ॥
अनुभाष्य—'कक्षा-पात',—कक्षा (प्रतियोगिता)+पात
(नाश), पराजय; 'उपरे हय',—सभीकी उक्तियोंका खण्डन
करके स्थापित हो॥ 106 ॥
एकदिन सभामें सपरिकर महाप्रभुके सामने
श्रीवल्लभके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा :-
आर दिन आसि' बसिला प्रभुरे नमस्करि'।
सभाते कहेन किछु मने गर्व करि'॥ 108 ॥
“भागवते स्वामीर व्याख्यान करियाछि खण्डन।
लइते ना पारि ताँर व्याख्यान-वचन॥ 109 ॥