श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 7/3-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद - इस प्रकार श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार
करनेके बाद महाप्रभुकी दक्षिण भारत जानेकी इच्छा
जाग्रत हुई। माघमासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण किया और फाल्गुन मासमें नीलाचलमें आकर
वास किया था। फाल्गुन मासके अन्तमें महाप्रभुने
डोलयात्राका दर्शन किया और प्रेमावेशमें अनेक प्रकारसे
नृत्य-गीत किया। चैत्रमासमें नीलाचलमें रहते हुए
महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार किया तथा
वैशाख मासके प्रारम्भमें उन्होंने दक्षिण भारत जानेका
निश्चय किया ॥ 3-6॥
भक्तोंके निकट कृतज्ञता-ज्ञापन और विदायी-माँगना :-
निजगण आनि' कहे विनय करिया।
आलिङ्गन करि' सबाय श्रीहस्ते धरिया॥ 7॥
“तोमा-सबा जानि आमि प्राणाधिक करि' ।
प्राण छाड़ा याय, तोमा-सबा छाड़िते ना पारि ॥ 8 ॥
तुमि-सब बन्धु मोर बन्धुकृत्य कैले।
इँहा आनि' मोरे जगन्नाथ देखाइले ॥ 9 ॥
एबे सबा-स्थाने मुञि मागों एक दाने।
सबे मेलि' आज्ञा देह, याइब दक्षिणे ॥ 10 ॥
बड़े भाई विश्वरूपको ढूँढ़नेके छलसे दक्षिण भारतके
लोगोंके उद्धारके लिये अकेले जानेकी इच्छा :-
विश्वरूप-उद्देशे अवश्य आमि याब।
एकाकी याइब, केहो सङ्गे ना लइब॥ 11 ॥
सेतुबन्ध हैते आमि ना आसि यावत्।
नीलाचले तुमि-सब रहिबे तावत् ॥" 12 ॥
अनुवाद - महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंको बुलाकर
उनका आलिङ्गन किया और उनके हाथोंको पकड़कर
विनीत भावसे कहने लगे, - "आप सब मुझे मेरे प्राणोंसे
भी अधिक प्रिय हैं। मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ,
परन्तु आप सबको नहीं। आप सब मेरे बन्धु हैं और
मुझे यहाँ लाकर श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराके वास्तवमें
बन्धुका कार्य ही किया है। अब मैं आप सबसे एक
दान माँगता हूँ, आप सभी मुझे दक्षिण भारत जानेकी
अनुमति प्रदान करो। मुझे अपने भाई श्रीविश्वरूपको
खोजनेके लिये अवश्य ही जाना है, परन्तु मैं अकेला
ही जाऊँगा और किसीको साथमें नहीं लूँगा। जब तक
मैं रामेश्वरम्से लौटकर नहीं आ जाता, तब तक आप
सब नीलाचलमें ही रहना ॥ "7-12 ॥
विश्वरूप-सिद्धि-प्राप्ति जानेन सकल।
दक्षिण-देश उद्धारिते करेन एइ छल ॥ 13 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु तो सर्वज्ञ हैं। विश्वरूपको
इससे पूर्व ही सिद्धिप्राप्ति हो चुकी है अर्थात् वे
अप्रकट हो चुके हैं, उसे महाप्रभु पूर्णरूपसे जानते थे,
परन्तु दक्षिण-भारतके लोगोंका उद्धार करनेके लिये
उन्होंने यह छल किया कि मैं विश्वरूपको खोजूँगा ॥ 13 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 9/299-300 संख्या देखें ॥ 13 ॥
भक्तोंका दुःख :-
शुनिया सबार मने हैल महादुःख।
निःशब्द हइला, सबार शुकाइल मुख ॥ 14 ॥
अनुवाद - महाप्रभुकी बातको सुनकर सभीके मनमें
इतना दुःख हुआ कि वे कुछ बोल ही नहीं पाये और
सबका मुख सूख गया ॥ 14 ॥
साथमें जानेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रार्थना :-
नित्यानन्दप्रभु कहे, - “ऐछे कैछे हय?
एकाकी याइबे तुमि, के इहा सहय? ॥ 15 ॥
दुइ-एक सङ्गे चलुक, ना पड़ हठ-रङ्गे।
यारे कह, सेइ दुइ चलुक् तोमार सङ्गे ॥ 16 ॥
दक्षिणेर तीर्थपथ आमि सब जानि।
आमि सङ्गे याइ, प्रभु, आज्ञा देह तुमि ॥ " 17 ॥
अनुवाद - श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ धैर्य धारण
212 ।
सातवाँ अध्याय 7/15-27 ]
करके कहा,—“ऐसा कैसे हो सकता है? आप अकेले
जायेंगे, इसे कौन सहन कर सकता है? हम दो-एक
व्यक्तियोंको अपने सङ्ग लेकर चलो, अन्यथा आप
किसी ठगके चङ्गुल पड़ जाओगे। आप जिन्हें कहेंगे,
वे दो व्यक्ति ही आपके साथ जायेंगे। मैं दक्षिणके सभी
तीर्थोंके मार्ग जानता हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा
दीजिये, मैं आपके साथ जाऊँगा॥”15-17॥
अनुभाष्य—'हठ-रङ्गे'—ठग या जुआ-चोरके
चङ्गुलमें॥16॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्द-जगदानन्द-दामोदर आदि
भक्तोंकी कृत्रिम निन्दाके छलसे गुणगान :—
प्रभु कहे,—“आमि नर्त्तक, तुमि—सूत्रधार।
तुमि यैछे नाचाओ, तैछे नर्त्तन आमार ॥ 18 ॥
संन्यास करिया आमि चलिलाङ वृन्दावन।
तुमि आमा लञा आइले अद्वैत-भवन ॥ 19 ॥
नीलाचल आसिते, पथे भाङ्गिला मोर दण्ड।
तोमा-सबार गाढ़-स्नेहे आमार कार्य-भङ्ग ॥ 20 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको लक्ष्य करके
कहा,—“मैं नर्तक हूँ और आप सूत्रधार हो। आप जैसे
मुझे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। संन्यास लेकर
जब मैं वृन्दावनकी ओर चला, तब आप मुझे
शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घर ले आये। नीलाचल
आते समय मार्गमें आपने मेरा संन्यास दण्ड तोड़ दिया।
आप सबके गाढ़-स्नेहसे मेरे कार्य बिगड़ रहे हैं॥18-20॥
जगदानन्द चाहे आमा विषय भुञाइते।
येइ कहे, सेइ भये चाहिये करिते ॥ 21 ॥
कभु यदि इँहार वाक्य करिये अन्यथा।
क्रोधे तिनदिन मोरे नाहि कहे कथा ॥ 22 ॥
अनुवाद—(महाप्रभुने श्रीजगदानन्दके विषयमें
कहा)—जगदानन्द तो मुझे विषय-भोग करवाना चाहता
है। वह जो भी कहता है, उसके भयसे मुझे वह करना
पड़ता है। यदि कभी मैं इसकी बात नहीं मानकर कुछ
और करता हूँ, तो यह क्रोधित होकर तीन दिन तक
मुझसे बात नहीं करता॥21-22॥
मुकुन्द हुयेन दुःखी देखि' संन्यास-धर्म।
तिनबारे शीते स्नान, भूमिते शयन ॥ 23 ॥
अन्तरे दुःखी मुकुन्द, नाहि कहे मुखे।
इहार दुःख देखि' मोर द्विगुण हुये दुःखे ॥ 24 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥23-24॥
अनुभाष्य—(महाप्रभुने श्रीमुकुन्दको लक्ष्य करके
कहा)—संन्यासधर्मका पालन करनेके लिये मैं शीतकालमें
भी तीन बार स्नान और बिना शय्याके भूमिपर शयन
करता हूँ, ऐसा देखकर मुकुन्द दुःखी होता है। मेरे
लिये मुकुन्दके मनमें दुःख होता है, ऐसा जानकर
उसके लिये मैं दुगना दुःखी होता हूँ॥23-24॥
दामोदर-ब्रह्मचारीकी निरपेक्षतापर महाप्रभुका कटाक्ष :—
आमि त'—संन्यासी, दामोदर—ब्रह्मचारी।
सदा रहे आमार उपर शिक्षा-दण्ड धरि' ॥ 25 ॥
इँहार आगे आमि ना जानि व्यवहार।
इँहारे ना भाय स्वतन्त्र चरित्र आमार ॥ 26 ॥
लोकापेक्षा नाहि इँहार कृष्णकृपा हैते।
आमि कभु लोकापेक्षा ना पारि छाड़िते ॥ 27 ॥
अनुवाद—(अब महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको
लक्ष्य करके कहा)—यद्यपि मैं संन्यासी हूँ और दामोदर
ब्रह्मचारी है, तथापि वह शिक्षा-दण्ड लेकर सदा ही मेरे
ऊपर शासन करता है, अर्थात् सदा मुझे उपदेश देता
रहता है। इसके विचारसे मैं लोक-व्यवहार नहीं
जानता, इसलिये इसे मेरा स्वतन्त्र व्यवहार अच्छा नहीं
लगता। इसपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये यह अपेक्षा
नहीं रखता कि लोग क्या कहेंगे, परन्तु मैं संन्यासी हूँ,
इसलिये कभी भी लोकापेक्षा नहीं छोड़ सकता॥25-27॥
। 213
[ 7/25-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य-दामोदर (ब्रह्मचारी) मुझे सदैव
इस प्रकार शिक्षादण्ड देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता
है कि इसके सामने मैं एक व्यवहार-ज्ञानशून्य व्यक्ति
हूँ। दामोदर पण्डित आदिके प्रति कृष्णकृपा अधिक
होनेके कारण, ये लोगोंकी अपेक्षा न करके मुझे
अनेक प्रकारके विषय-भोग कराना चाहते हैं। किन्तु
मैं दीन संन्यासी हूँ, लोकापेक्षाको नहीं छोड़ सकता,
इसलिये अपने संन्यास-धर्मके अनुसार व्यवहार करता
हूँ॥ 25-27॥
अनुभाष्य- 'संन्यासी' - ब्रह्मचारीके गुरु होते हैं, इसलिये
'ब्रह्मचारी' होकर संन्यासीको उपदेश देना अनुचित है।
'ना भाय'-अच्छा नहीं लगता ॥ 25-26 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीको अपने वापिस
लौटने तक पुरीमें रहनेका अनुरोध :-
अतएव तुमि-सब रह नीलाचले।
दिन-कत तीर्थ आमि भ्रमिब एकले॥"28॥
अनुवाद-इसलिये तुम सब नीलाचलमें रहो और
मैं कुछ दिन अकेले ही तीर्थ भ्रमण करूँगा॥"28॥
अपने भक्तोंके दोष-प्रदर्शनके छलसे गुण-वर्णन :-
इँहा-सबार वश प्रभु हुये ये-ये-गुणे।
दोषरूप-छले करे गुण आस्वादने ॥ 29 ॥
अनुवाद-महाप्रभु जिन-जिन गुणोंके कारण इन
सब भक्तोंके वशीभूत थे, दोषरूप-छलसे उन सभी
गुणोंका महाप्रभुने आस्वादन किया॥ 29 ॥
अनुभाष्य-पूर्वकथित भक्तोंके जिन-जिन गुणोंके
कारण महाप्रभु वशीभूत हुए थे, उन्हींको ही 'छलपूर्वक
दोष' कहकर उल्लेख करके उन्होंने भक्तोंकी महिमा
बतलायी ॥ 29 ॥
महाप्रभुका अनुपम भक्तवात्सल्य :-
चैतन्येर भक्तवात्सल्य-अकथ्य-कथन।
आपने वैराग्य-दुःख करेन सहन ॥ 30 ॥
भक्तोंके लिये महाप्रभुको कष्ट स्वीकार,
भक्तोंका उसमें दुःख :-
सेइ दुःख देखि' येइ भक्त दुःख पाय।
सेइ दुःख ताँर शक्त्ये सहन ना याय॥ 31 ॥
गुण-दोषोद्गार-छले सबा निषेधिया।
एकाकी भ्रमिबेन तीर्थ वैराग्य करिया ॥ 32 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके भक्तवात्सल्यको शब्दोंके द्वारा
व्यक्त नहीं किया जा सकता। अपने संन्यासके वैराग्य
दुःखको वे स्वयं सहन कर लेते थे। परन्तु महाप्रभुके
उस दुःखको देखकर भक्त दुःखी होते और महाप्रभुमें
अपने भक्तोंके इन दुःखोंको सहन करनेकी शक्ति नहीं
थी। उनके भक्तोंको कोई दुःख न हो, इसलिये महाप्रभुने
भक्तोंके गुणोंको भी दोष कहकर छलसे उनको अपने
साथ जानेके लिये मना किया, जिससे वे वैराग्ययुक्त
होकर अकेले तीर्थ-भ्रमण कर सकें ॥ 30-32 ॥
स्वतन्त्र ईश्वर महाप्रभु अपने सङ्कल्पपर अटल :-
तबे चारिजन बहु मिनति करिल।
स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु कभु ना मानिल ॥ 33 ॥
अनुवाद-तब उन चारोंने मिलकर बहुत प्रार्थना
की, परन्तु महाप्रभु तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उन्होंने
किसीकी भी बात नहीं मानी ॥ 33 ॥
श्रीनित्ताइकी अन्तिम प्रार्थना :-
तबे नित्यानन्द कहे, - "ये आज्ञा तोमार।
दुःख-सुख ये हउक्, कर्त्तव्य आमार ॥ 34 ॥
किन्तु एक निवेदन करों आर बार।
विचार करिया ताहा कर अङ्गीकार ॥ 35 ॥
कौपीन-बहिर्वास और जलपात्रको उठानेके लिये अपने
साथ किसीको ले जानेकी प्रार्थना :-
कौपीन, बहिर्वास आर जलपात्र।
आर किछु नाहि याबे, सबे एइ मात्र ॥ 36 ॥
214 ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
सातवाँ अध्याय 7/34–42 ]
महाप्रभुके द्वारा संख्या नाम-जप :-
तोमार दुइ हस्त बद्ध नाम-गणने।
जलपात्र-बहिर्वास वहिबे केमने ॥ 37 ॥
प्रेमावेशे पथे तुमि हबे अचेतन।
ए-सब सामग्री तोमार के करे रक्षण ॥ 38 ॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“आपकी
जैसी आज्ञा। उसका पालन करना हमारा कर्तव्य है,
चाहे हमें दुःख हो या सुख हो। परन्तु एक बार मैं
फिरसे कुछ निवेदन करता हूँ, कृपया उसपर विचार
करके उसे स्वीकार कीजिये। यदि और कुछ भी आप
साथ नहीं ले जायेंगे, तो भी कौपीन, बहिर्वास और
जलपात्र तो आप अवश्य ही साथ ले जायेंगे। आपके
दोनों हाथ तो नाम करने और संख्या गिननेमें बँधे
रहेंगे, फिर आप जलपात्र और बहिर्वास कैसे उठायेंगे?
प्रेमाविष्ट होकर जब आप मार्गमें अचेतन हो जायेंगे,
तब आपकी इन सब वस्तुओंकी रक्षा कौन
करेगा ? ॥ 34-38 ॥
अनुभाष्य—नाम-संख्या गिननेके लिये महाप्रभुके
दोनों हाथ बँधे रहते, इसलिये यदि कोई दूसरा व्यक्ति
कमण्डलु और बहिर्वासादिको (कौपीन-धोती आदिको)
नहीं उठायेगा, तो आवश्यकताके समय महाप्रभुको ये
व्यवहार करनेवाली वस्तुएँ नहीं मिलेंगी। प्रेमावेशमें
अचेतन होनेपर उस समय इन वस्तुओंकी रक्षाके लिये
किसी व्यक्तिकी आवश्यकता है। श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा
किये गये नाम-संख्याकी गणनाके सम्बन्धमें
श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें कहा गया है—“वध्नन् प्रेमभरप्रकम्पितकरो
ग्रन्थीन् कटीडोरकैः संख्यातुं निजलोकमङ्गल-हरेकृष्णेति
नाम्नां जपन्” अर्थात् “समस्त जगत्का मङ्गल करनेवाले
अपने पवित्र नाम—हरे कृष्ण महामन्त्रका जप करते हुए
नाम संख्या गणना करनेके लिये जब वे गाँठयुक्त
कटिडोरीका स्पर्श करते हैं, तो उनके हाथ प्रेमावेशमें
काँपते हैं।” आदि वाक्य, और स्तवमालामें—“हरे
कृष्णेत्युच्चैः स्फुरितरसनो नामगणनाकृत-ग्रन्थिश्रेणी-
सुभगकटिसूत्रोज्ज्वलकरः” अर्थात् “उच्च स्वरसे हरे
कृष्ण नाम उच्चारण करते हुए उनकी रसना नृत्य
करती है और उच्चारित नामकी गणनाके लिये गाँठयुक्त
कटि-सूत्रमें उनका सुन्दर बायाँ हाथ सुशोभित हो रहा
है॥” आदि चैतन्याष्टक श्लोक आलोच्य हैं॥ 37-38 ॥
कृष्णदास-ब्राह्मणको साथ लेनेके लिये अनुरोध :-
‘कृष्णदास’-नामे एइ सरल ब्राह्मण।
इँहो सङ्गे करि’ लह, धर निवेदन ॥ 39 ॥
जलपात्र-वस्त्र वहि’ तोमा-सङ्गे याबे।
ये तोमार इच्छा कर, किछु ना बलिबे ॥” 40 ॥
अनुवाद—'कृष्णदास'-नामका यह एक सरल ब्राह्मण
है। इसे अपने साथ ले जाइये, यही मेरी प्रार्थना है।
यह आपके जलपात्र और वस्त्र उठाकर आपके साथ
चलेगा। आपकी जैसी इच्छा हो वैसा ही करना, यह
आपको कुछ भी नहीं कहेगा॥” 39-40 ॥
अनुभाष्य—यह कालाकृष्णदास ब्राह्मण और आदिलीला
11/37 संख्यामें वर्णित नित्यसिद्ध व्रजसखा द्वादश
गोपालोंमें अन्यतम, श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके प्राण
स्वरूप हैं,—वे कालाकृष्णदास, ये दोनों पृथक् व्यक्ति हैं।
पहलेवाले ब्राह्मण बादमें गौड़देश (बङ्गालमें) गये थे,
इस विषयमें मध्यलीला 10/62-74 संख्या देखें॥ 39 ॥
महाप्रभुके द्वारा स्वीकार :-
तबे ताँर वाक्य प्रभु करि’ अङ्गीकारे।
ताहा-सबा लञा गेला सार्वभौम-घरे ॥ 41 ॥
श्रीसार्वभौमके घरमें गमन :-
नमस्करि’ सार्वभौम आसन निवेदिल।
सबाकारे मिलि’ तबे आसने बसिल ॥ 42 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको
मान लिया और उन सबको साथ लेकर वे श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके घर गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने प्रणाम
करके महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया
। 215
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ (Text) प्रस्तुत है:
[ 7/41–53 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और फिर बाकी सबको आसन देकर वे स्वयं भी बैठ
गये॥ 41-42॥
भट्टाचार्यसे विदायीकी याचना :—
नाना कृष्णवार्त्ता प्रभु कहिल ताँहारे।
“तोमार ठाञि आइलाङ आज्ञा मागिबारे॥ 43॥
विश्वरूपको ढूँढ़नेका छल :—
संन्यास करि' विश्वरूप गियाछे दक्षिणे।
अवश्य करिब आमि ताँर अन्वेषणे॥ 44॥
आज्ञा देह, अवश्य आमि दक्षिणे चलिब।
तोमार आज्ञाते शुभे लेउटि' आसिब॥”45॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौमके साथ बहुतसी
श्रीकृष्ण विषयक चर्चा की और तब उनसे कहा,—“मैं
आपके पास एक आज्ञा माँगने आया हूँ। मेरे ज्येष्ठ
भ्राता विश्वरूप संन्यास लेकर दक्षिण भारतमें गये थे,
मुझे उन्हें ढूँढ़ने अवश्य ही जाना है। आप मुझे आज्ञा
दीजिये कि मैं उन्हें ढूँढ़ने दक्षिण भारतमें जाऊँ।
आपकी आज्ञासे सफल होकर वापिस लौट
आऊँगा॥”43-45॥
अनुभाष्य—‘लेउटि'—पश्चिम भारतीय (हिन्दी भाषाका)
शब्द ‘लौटना’ या वापिस आना॥ 45॥
भट्टाचार्यकी विरह-दुःखपूर्ण उक्ति :—
शुनि' सार्वभौम हैला अत्यन्त कातर।
चरणे धरिया कहे विषाद-उत्तर॥ 46॥
“बहुजन्मरे पुण्यफले पाइ तोमार सङ्ग।
हेन-सङ्ग विधि मोर करितेक भङ्ग॥ 47॥
शिरे वज्र पड़े यदि, पुत्र मरि' याय।
ताहा सहि, तोमार विच्छेद सहन ना याय॥ 48॥
महाप्रभुको कुछ दिन रुकनेके लिये अनुरोध :—
स्वतन्त्र-ईश्वर तुमि करिबे गमन।
दिन-कथो रह, देखि तोमार चरण॥”49॥
अनुवाद—महाप्रभुकी बात सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
अत्यन्त दुःखी हुए और उनके चरण पकड़कर बड़े
दुःखसे कहने लगे,—“बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप
मुझे आपका सङ्ग प्राप्त हुआ है, परन्तु इस सङ्गको
विधाता अब भङ्ग कर रहे हैं। यदि मेरे मस्तकपर
वज्रपात हो अथवा मेरा पुत्र मर जाय, मैं उसे सहन
कर सकता हूँ, परन्तु आपका वियोग सहन नहीं कर
सकता। आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, इसलिये आपने
जानेका निश्चय किया है, तो आप अवश्य ही जायेंगे।
परन्तु कृपा करके आप कुछ दिन और यहाँ रुक
जाँय, जिससे मैं आपके चरणोंका दर्शन कर
सकूँ॥”46-49॥
महाप्रभुकी सम्मति :—
ताहार विनये प्रभुर शिथिल हैल मन।
रहिल दिवस-कथो, ना कैल गमन॥ 50॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी विनती सुनकर
महाप्रभुके मनका सङ्कल्प शिथिल हो गया और वे उसी
समय न जाकर कुछ दिनोंके लिये वहीं रह गये॥ 50॥
भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण और
उनकी गृहिणीके द्वारा रसोई बनाना :—
भट्टाचार्य आग्रह करि' करेन निमन्त्रण।
गृहे पाक करि' प्रभुके करा'न भोजन॥ 51॥
ताँहार ब्राह्मणी, ताँर नाम—‘षाठीर माता’।
रान्धि' भिक्षा देन तेंहो, आश्चर्य ताँर कथा॥ 52॥
आगे त' कहिब ताहा करिया विस्तार।
एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-समाचार॥ 53॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने आग्रह करके
महाप्रभुको अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया और तब
अपने घरमें ही रसोई बनाकर महाप्रभुको भोजन
कराया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पत्नी जिनको ‘षाठीकी
माता’ भी कहते थे, महाप्रभुको भोजन बनाकर देती
थीं। उनकी भी एक आश्चर्यमय कथा है, जिसका मैं
216 ।
सातवाँ अध्याय 7/51-63 ]
बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा। अब मैं महाप्रभुकी महाप्रभुकी आलालनाथ होते हुए दक्षिणकी यात्रा :-
दक्षिण यात्राके विषयमें वर्णन करता हूँ॥ 51-53 ॥ समुद्र-तीरे-तीरे आलालनाथ-पथे।
सार्वभौम कहिलेन आचार्य-गोपीनाथे ॥ 59 ॥
पाँच दिनके बाद पुनः विदायीकी प्रार्थना :-
श्रीसार्वभौमका घरमें रखे चार कौपीन-बहिर्वास
दिन पाँच रहि' प्रभु भट्टाचार्य-स्थाने। श्रीगोपीनाथके द्वारा मँगवाकर महाप्रभुको प्रदान करना :-
चलिबार लागि' आज्ञा मागिला आपने ॥ 54 ॥ "चारि कोपीन-बहिर्वास राखियाछि घरे।
भट्टाचार्यकी सम्मति :- ताहा, प्रसादान्न, लञा आइस विप्रद्वारे ॥" 60 ॥
प्रभुर आग्रहे भट्ट सम्मत हइला।
अनुवाद-महाप्रभु समुद्रके तटके साथ-साथ
प्रभु ताँरे लञा जगन्नाथ-मन्दिरे गेला ॥ 55 ॥
आलालनाथ जानेवाले मार्गपर चले। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें पाँच दिन श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,-"घरमें चार कौपीन और
रहकर महाप्रभुने स्वयं उनसे चलनेकी आज्ञा माँगी। बहिर्वास रखे हैं, उसे और प्रसाद-अन्नको किसी
महाप्रभुके यात्रापर जानेका आग्रह करनेपर श्रीसार्वभौम ब्राह्मणकी सहायतासे ले आइये ॥" 59-60 ॥
भट्टाचार्य सहमत हो गये। तब महाप्रभु उनको साथ
अमृतप्रवाह भाष्य-समुद्रतटके साथ-साथ होते हुए
लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये ॥ 54-55 ॥
दक्षिणकी ओर जानेपर पुरीसे छह कोसकी दूरीपर
'आलालनाथ' ग्राम है। 'आलालनाथ'में-चतुर्भुज-वासुदेव-
महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जाकर उनसे यात्राकी
विग्रह है। वनके बीचमें एक छोटेसे गाँवमें उनका
आज्ञाकी याचना और प्रसादी-माला प्राप्तकर मन्दिरकी
मन्दिर है और उन्हें वहाँ बहुत ही उत्तम खीरका भोग
परिक्रमाकर यात्रा आरम्भ :-
लगता है। वहाँके पण्डे अभी भी (ठाकुरजीके अङ्गोंपर
दर्शन करि' ठाकुर-पाश आज्ञा मागिला।
पड़े) गर्म खीरके दाग श्रीविग्रहमें दिखलाते हैं॥ 59 ॥
पूजारी माला-प्रसाद प्रभुरे आनि' दिला ॥ 56 ॥
आज्ञा-माला पाञा हर्षे नमस्कार करि'। रायरामानन्दके साथ मिलनेके लिये श्रीसार्वभौमका
महाप्रभुसे अनुरोध :-
आनन्दे दक्षिण-देशे चले गौरहरि ॥ 57 ॥
तबे सार्वभौम कहे प्रभुर चरणे।
भट्टाचार्य-सङ्गे आर यत निजगण।
"अवश्य पालिबे, प्रभु, मोर निवेदने ॥ 61 ॥
जगन्नाथ प्रदक्षिण करि' करिला गमन ॥ 58 ॥
'रामानन्द राय' आछे गोदावरी-तीरे।
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका दर्शनकर उनसे अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे ॥ 62 ॥
जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी शूद्र विषयि-ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे।
माला और प्रसाद लाकर उन्हें प्रदान किया। मालाके आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥ 63 ॥
रूपमें श्रीजगन्नाथदेवकी आज्ञा पाकर महाप्रभुने हर्षित
अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे प्रार्थना
होकर उन्हें प्रणाम किया। तब महाप्रभु आनन्दसे
करते हुए कहा,-"मेरा एक निवेदन आप अवश्य ही
दक्षिण देशकी यात्राके लिये तत्पर हुए। महाप्रभु अपने
स्वीकार करना, गोदावरी-तटपर स्थित विद्यानगरके
भक्तों और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी अधिकारी 'रामानन्दराय' हैं। मेरी बात मानकर आप
प्रदक्षिणा करके यात्राके लिये चल दिये॥ 56-58 ॥
॥ 217
[ 7/61-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उनसे अवश्य ही मिलना, शूद्र और विषयी जानकर
आप उनकी उपेक्षा मत करना ॥ 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अधिकारी'—राजाका प्रधान
कर्मचारी। विद्यानगरको आजकल 'पोरबन्दर' कहते
हैं ॥ 62 ॥
अनुभाष्य—'शूद्र'—उत्कल देश (उड़ीसा)के समाजमें
करण-जातिको 'शौक्र-शूद्र' (जन्मके कारण शूद्र) कहा
जाता है। श्रीराम force? श्रीरामानन्द करण-जातिमें जन्में थे; इसलिये
लौकिक-दृष्टिसे वे शौक्रशूद्र होनेपर भी वास्तवमें
ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणोंके भी गुरु परमहंस-वैष्णव थे।
'विषयी'—स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें रत अथवा
बाह्य-रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श आदि विषयोंमें ज्ञानेन्द्रियोंको
युक्त करके उनमें प्रमत्त रहनेवालेको 'विषयी' कहते हैं।
श्रीरामानन्द बाहरी दृष्टिसे कौपीनधारी संन्यासी नहीं थे,
इसलिये लौकिक दृष्टिसे वे राजाके सेवक होनेके
कारण विषयी दिखते थे, किन्तु वास्तवमें वे परम
विद्वान अथवा नरोत्तम-संन्यासी थे।
सार्वभौम भट्टाचार्यने पहले स्वयं वैष्णव नहीं होनेपर
भी श्रीरामानन्द रायको वैष्णव जाना था। और फिर,
महाप्रभुकी कृपासे भक्त बननेके बाद श्रीरामानन्दकी
बातोंपर विचार करके उनको 'अधिकारी रसिकभक्त'के
रूपमें समझा था ॥ 63 ॥
राय-रामानन्दकी प्रशंसा :-
तोमार सङ्गेर योग्य तेंहो एकजन।
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम ॥ 64 ॥
पाण्डित्य आर भक्तिरस, —दुँहेर तेंहो सीमा।
सम्भाषिले जानिबे तुमि ताँहार महिमा ॥ 65 ॥
पहले वैष्णवोंको स्मार्त्त व्यक्तियोंकी अपेक्षा छोटा माननेके
कारण भट्टाचार्यके द्वारा उनका उपहास :-
अलौकिक वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया।
परिहास करियाछि ताँरे 'वैष्णव' जानिया ॥ 66 ॥
बादमें महाप्रभुकी कृपासे चिन्मय-वैष्णवकी
महिमाकी उपलब्धि :-
तोमार प्रसादे एबे जनिनु ताँर तत्त्व।
सम्भाषिले जानिबे ताँर येमन महत्त्व ॥ 67 ॥
अनुवाद—रामानन्दराय ही एकमात्र आपके सङ्ग
करने योग्य हैं, पृथ्वीपर उनके समान कोई भी रसिक
भक्त नहीं है। वे पाण्डित्य और भक्तिरस—दोनोंकी चरम
सीमा हैं। उनसे बातचीत करनेपर आप स्वयं ही उनकी
महिमा जान जायेंगे। मैं उनके अलौकिक वचनों और
क्रिया-कलापोंको समझ नहीं पाता था तथा मैं उन्हें
'वैष्णव' मानकर उनका उपहास करता था। अब
आपकी कृपासे मैं राय रामानन्दकी महिमाको समझ
सका हूँ। उनके साथ वार्त्तालाप करके आप भी उनकी
महिमाको जान पायेंगे ॥ 64-67 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभुसे विमुख प्रकृति-वादी ज्ञानी
और कर्मी लोग श्रीचैतन्याश्रित वैष्णवोंका ऐसे ही
उपहास किया करते हैं। महाप्रभुसे विमुख लोग—प्रत्यक्ष
और अनुमानको ही सर्वस्व माननेवाले जड़ेन्द्रियोंसे
प्राप्त ज्ञानमें ही मत्त तर्कपन्थी हैं। श्रीचैतन्याश्रित वैष्णव
शब्दप्रमाणको आश्रय माननेवाले अधोक्षज भगवान्के
सेवक और श्रौतपन्थी हैं ॥ 66 ॥
महाप्रभुके द्वारा उनके वाक्य-पालनकी सम्मति :-
अङ्गीकार करि' प्रभु ताँहार वचन।
ताँरे विदाय दिते ताँरे कैल आलिङ्गन ॥ 68 ॥
महाप्रभुके द्वारा गृहस्थ-वैष्णवको सम्मान :-
“घरे कृष्ण भजि' मोरे करिह आशीर्वादे।
नीलाचले आसिं येन तोमार प्रसादे ॥” 69 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बातको
मानकर उन्हें विदायी देनेके लिये उनका आलिङ्गन
करके कहा, —“घरमें श्रीकृष्णका भजन करते समय
आप मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहना, जिससे मैं
आपकी कृपासे पुनः नीलाचल लौट आऊँ ॥” 68-69 ॥
218 ।
सातवाँ अध्याय 7/69–77 ]
अनुभाष्य—श्रीकृष्णसेवक बाहरी दृष्टिसे गृहस्थ
आश्रमको अलङ्कृत (अर्थात् उसे स्वीकार करके उसकी
महिमा वर्धित) करनेपर भी, वास्तवमें इन्द्रियोंके दास
गृहव्रती या घर-परिवारमें ही आसक्त बुद्धिवाले गृहमेधी
व्यक्तियोंके समान नहीं है। “ये दिन गृहे भजन देखि,
गृहेते गोलोक भाय” (ठाकुर श्रील भक्तिविनोद द्वारा
रचित शरणागतिका कीर्तन)—गृहस्थ-वैष्णव ही इस
बातका तन-मन-वचनसे कीर्तन करनेके एकमात्र
अधिकारी हैं। इसलिये महाप्रभुके पदाश्रित यथार्थ
शुद्धवैष्णव-गृहस्थ संन्यासियोंके भी आदरणीय और गुरु
हैं। श्रीकृष्णभजनकी महिमाको नहीं जाननेवाले जीवोंको
शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने सार्वभौम भट्टाचार्यसे
आशीर्वादकी भिक्षा माँगकर इसे दिखलाया॥ 69 ॥
महाप्रभुकी यात्रा और श्रीसार्वभौमकी मूर्च्छा :—
एत बलि' महाप्रभु करिला गमन।
मूर्च्छित हञा ताँहा पड़िला सार्वभौम ॥ 70 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु आगे चल पड़े।
उनके विरहको सहन न कर पानेसे उसी समय
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े॥ 70 ॥
निरपेक्ष महाप्रभु :—
ताँरे उपेक्षिया कैल शीघ्र गमन।
के बुझिते पारे महाप्रभुर चित्त-मन ॥ 71 ॥
महानुभावेर चित्तेर स्वभाव एइ हय।
पुष्प-सम कोमल, कठिन वज्रमय ॥ 72 ॥
अनुवाद—महाप्रभु उसे अनदेखा करके शीघ्रतासे
वहाँसे चले गये। महाप्रभुके चित्त और मनके रहस्यको
कौन जान सकता है? महानुभाव व्यक्तियोंके चित्तका
स्वभाव ही ऐसा होता है, वे कभी पुष्पके समान कोमल
और कभी वज्रके समान कठोर होते हैं॥ 71-72 ॥
अनुभाष्य—'महाप्रभुकी निरपेक्षता'—मध्यलीला 3/212
संख्या देखें॥ 71-72 ॥
परस्पर विरुद्ध-धर्मके समाश्रय भगवान्की भाँति
भगवद्भक्त भी कोमल और कठोर :—
भवभूतिकृत 'उत्तर-रामचरित्र'के तृतीयांकमें 2/7-23वाँ श्लोक
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमीश्वरः ॥ 73 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अलौकिक पुरुषोंका चित्त वज्रसे
भी कठोर और कुसुमसे भी कोमल होता है; अन्य
लोग उसको समझनेके योग्य नहीं होते॥ 73 ॥
अनुभाष्य—
वज्रात् अपि कठोराणि, कुसुमात् (पुष्पात्) अपि मृदूनि
(कोमलानि); लोकोत्तराणां (असाधारणालौकिकानां) चेतांसि
(अन्तःकरणानि) विज्ञातुं (बोद्धुं) कः हि ईश्वरः (समर्थः)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥
श्रीनिताइके द्वारा श्रीसार्वभौमको घर भेजना :—
नित्यानन्दप्रभु भट्टाचार्ये उठाइल।
ताँर लोकसङ्गे ताँरे घरे पाठाइल ॥ 74 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको
उठाया और उनके लोगोंके साथ उन्हें घर भेज
दिया॥ 74 ॥
भक्तोंके साथ आलालनाथ-आगमन :—
भक्तगण शीघ्र आसि' लैल प्रभुर साथ।
वस्त्र-प्रसाद लञा तबे आइला गोपीनाथ ॥ 75 ॥
सबा-सङ्गे प्रभु तबे आलालनाथ आइला।
नमस्कार करि' तारे बहुस्तुति कैला ॥ 76 ॥
आलालनाथ नारायण-दर्शनसे महाप्रभुका
स्तव-नृत्य-गीत :—
प्रेमावेशे नृत्यगीत कैल কতক्षण।
देखिते आइला ताँहा कैसे यत जन ॥ 77 ॥
अनुवाद—सभी भक्त जल्दीसे आकर महाप्रभुके
साथ हो लिये। वस्त्र और प्रसाद लेकर श्रीगोपीनाथाचार्य
। 219
[ 7/75-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भी तब वहाँ आ पहुँचे। सबको साथ लेकर महाप्रभु
आलालनाथ आ गये और उनको प्रणाम करके उनकी
बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने कुछ देर
तक नृत्य-गीत किया और वहाँ रहनेवाले सभी लोग
उनके दर्शनके लिये आये॥ 75-77 ॥
अनुभाष्य—'साथ'—सङ्ग या साथ॥ 75॥
महाप्रभुके दर्शनोंके लिये बहुत लोगोंका
आगमन और हरि-सङ्कीर्तन :—
चौदिकेते सब लोक बले 'हरि' 'हरि'।
प्रेमावेशे मध्ये नृत्य करे गौरहरि ॥ 78 ॥
काञ्चन-सदृश देह, अरुण वसन।
पुलकाश्रु-कम्प-स्वेद ताहाते भूषण ॥ 79 ॥
देखिते लोकेर मने हैल चमत्कार।
यत लोक आइसे, केह नाहि याय घर ॥ 80 ॥
केह नाचे, केह गाय, 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल'।
प्रेमेते भासिल लोक, स्त्री-वृद्ध-आबाल ॥ 81 ॥
देखि' नित्यानन्द प्रभु कहे भक्तगणे।
“एइरूपे नृत्य आगे हबे ग्रामे ग्रामे ॥” 82 ॥
अनुवाद—चारों ओर सब लोक 'हरि' 'हरि' बोलने
लगे और उनके बीचमें श्रीगौरहरि प्रेमाविष्ट होकर नृत्य
कर रहे थे। स्वर्णके समान महाप्रभुकी देह और उसके
ऊपर अरुण वर्णके वस्त्र थे तथा पुलक, अश्रु, कम्प,
स्वेदादि अष्ट-सात्त्विकभाव उनके भूषणस्वरूप थे।
महाप्रभुके ऐसे अद्भुत रूप और भावोंको देखकर
लोगोंका मन चमत्कृत हो रहा था और कोई भी अपने
घर लौटना नहीं चाह रहा था। कुछ लोग नृत्य कर
रहे थे, कुछ लोग 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल' नामका सङ्कीर्तन
कर रहे थे। इस प्रकार बालक-स्त्री-वृद्ध, सभी प्रेममें
डूब रहे थे। यह देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने भक्तोंसे
कहा कि अब तो गाँव-गाँवमें जहाँ महाप्रभु जायेंगे, इसी
प्रकार नृत्य होगा॥” 78-82 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/25 संख्या देखें ॥ 81 ॥
महाप्रभुको छोड़नेकी लोगोंमें अनिच्छा देखकर प्रसाद
पवानेके छलसे महाप्रभुको वहाँसे हटाना :—
अतिकाल हैल, लोक छाड़िया ना याय।
तबे नित्यानन्द-गोसाञि सृजिल उपाय ॥ 83 ॥
मध्याह्न करिते गेला प्रभुके लञा।
ताहा देखि' लोक आइसे चौदिके धाञा ॥ 84 ॥
भक्तोंका मन्दिरके भीतर प्रवेश :—
मध्याह्न करिते आइला देवता-मन्दिरे।
निजगण प्रवेशि' कपाट दिल बहिर्द्वारे ॥ 85 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द गोसांईने देखा कि बहुत
समय हो गया है, तो उन्होंने एक उपाय निकाला
जिससे लोग महाप्रभुको छोड़ दें। वे महाप्रभुको
दोपहरका स्नान करानेके लिये ले चले, ऐसा देखकर
लोग चारों ओरसे दौड़कर उधर ही आने लगे।
दोपहरका स्नान करनेके बाद वे वापिस मन्दिरमें आ
गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपने साथ आये लोगोंको
प्रवेश करवाके बाहरका द्वार बन्द कर दिया ॥ 83-85 ॥
अनुभाष्य—'अतिकाल'—अधिक समय व्यतीत हो
जानेपर ॥ 83 ॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा प्रदान;
भक्तोंको महाप्रभुके अवशेषकी प्राप्ति :—
तबे दुइ प्रभुरे गोपीनाथ भिक्षा कराइल।
प्रभुर शेष प्रसादान्न सबे बाँटि' खाइल ॥ 86 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभु एवं
श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंको भोजन कराया और उनके
उच्छिष्ट अन्न-प्रसादको सब भक्तोंने बाँटकर खा
लिया ॥ 86 ॥
मन्दिरके बाहर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये
अनेक लोगोंका समागम :—
शुनि' शुनि' लोक-सब आसि' बहिर्द्वारे।
'हरि' 'हरि' बलि' लोक कलरव करे ॥ 87 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके आगमनकी बातको सुनकर
220 ।
सातवाँ अध्याय 7/87-96 ]
सब लोग मन्दिरके बाहिरी द्वारपर एकत्रित हो गये और
'हरि' 'हरि' बोलकर कोलाहल करने लगे॥ 87॥
मन्दिरके द्वारका खुलना और सभीको
महाप्रभुका दर्शन प्राप्त :—
तबे महाप्रभु द्वार कराइल मोचन।
आनन्दे आसिया लोक पाइल दरशन ॥ 88 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने मन्दिरका द्वार खुलवा
दिया और सभी लोगोंने आकर आनन्दपूर्वक महाप्रभुके
दर्शन किये॥ 88॥
सारा दिन लोगोंको महाप्रभुके दर्शनके
फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :—
एइमत सन्ध्या पर्यन्त लोक आसे, याय।
‘वैष्णव’ हइल लोक, सबे नाचे, गाय ॥ 89 ॥
अनुवाद—इस प्रकार सायंकाल तक लोग आते-जाते
रहे और महाप्रभुकी कृपासे सभी ‘वैष्णव’ भक्त बनकर
नाचने-गाने लगे॥ 89 ॥
आलालनाथमें भक्तोंके साथ रात्रिवास :—
एइरूपे सेइ ठाञि भक्तगण-सङ्गे।
सेइ रात्रि गोङाइल कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 90 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने वह रात वहीं
बितायी और सारी रात भक्तोंके साथ श्रीकृष्णकथाका
आनन्द लेते रहे॥ 90 ॥
प्रातः पुनः यात्रा :—
प्रातःकाले स्नान करि’ करिला गमन।
भक्तगणे विदाय दिला करि’ आलिङ्गन ॥ 91 ॥
अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने स्नान
करके सभी भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी ली और
दक्षिण भारतकी यात्रापर चल दिये॥ 91 ॥
महाप्रभुकी निरपेक्षता :—
मूर्च्छित हञा सबे भूमते पड़िला।
ताँहा-सबा पाने प्रभु फिरि’ ना चाहिला ॥ 92 ॥
अनुवाद—सभी भक्त मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर
पड़े, परन्तु महाप्रभुने उन्हें मुड़कर भी नहीं देखा और
अपनी यात्रापर अग्रसर हुए॥ 92 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 3/212 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥ 92 ॥
महाप्रभुके पीछे-पीछे जल-पात्रादि-वाहक कृष्णदास :—
विच्छेदे व्याकुल प्रभु चलिला दुःखी हञा।
पाछे कृष्णदास याय जलपात्र लञा ॥ 93 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णविरहमें व्याकुल महाप्रभु दुःखी
होकर चल रहे थे और उनका सेवक कृष्णदास
जलपात्रको हाथमें लेकर उनके पीछे-पीछे चल रहा
था॥ 93 ॥
उस दिन भक्तोंका उपवास और बादमें पुरी-गमन :—
भक्तगण उपवासी ताँहाइ रहिला।
आर दिने दुःखी हञा नीलाचले आइला ॥ 94 ॥
अनुवाद—उस दिन सभी भक्त वहीं आलालानाथमें
ही रहे और सबने उपवास किया। अगले दिन दुःखी
होकर सभी नीलाचल लौट आये॥ 94 ॥
मत्तसिंह-प्राय प्रभु करिला गमन।
प्रेमावेशे याय करि’ नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 95 ॥
अनुवाद—मत्तसिंहकी भाँति महाप्रभु यात्रामें चल
दिये। प्रेमाविष्ट होकर नाम-सङ्कीर्तन करते हुए वे चले
जा रहे थे॥ 95 ॥
श्रीमुख कीर्त्तित-श्लोक :—
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे।
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे॥
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! रक्ष माम्।
। 221
[ 7/96-103
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण!
कृष्ण! कृष्ण! पाहि माम्॥
राम! राघव! राम! राघव!
राम! राघव! रक्ष माम्।
कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव!
कृष्ण! केशव! पाहि माम् ॥96॥
अनुवाद—महाप्रभु इस प्रकार कीर्तन कर रहे थे—
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे।
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे॥
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरी रक्षा करो।
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरा पालन करो॥
राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! मेरी रक्षा करो।
कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! मेरा पालन करो॥96॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'रक्ष मां'—मेरी रक्षा करो; 'पाहि मां'—मेरा पालन करो॥96॥
लोगोंको हरिनाम दान :-
एइ श्लोक पथे पड़ि' चलिला गौरहरि।
लोक देखि' पथे कहे,—बल 'हरि' 'हरि' ॥97॥
महाप्रभुके मुखसे नाम-श्रवण करनेसे लोगोंके द्वारा हरिनाम-ग्रहण :-
सेइ लोक प्रेममत्त हञा बले 'हरि' 'कृष्ण'।
प्रभुर पाछे सङ्गे याय दर्शन-सतृष्ण ॥98॥
महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारसे उस वैष्णवके द्वारा उसके ग्राममें सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :-
कतक्षणे रहि' प्रभु तारे आलिङ्गिया।
विदाय करिल तारे शक्ति सञ्चारिया ॥99॥
सेइजन निज-ग्रामे करिया गमन।
'कृष्ण' बलि' हासे, कान्दे, नाचे अनुक्षण॥100॥
यारे देखे, तारे कहे,—कह कृष्णनाम।
एइमत 'वैष्णव' कैल सब निज-ग्राम ॥101॥
अनुवाद—इस श्लोकका उच्चारण करते-करते श्रीगौरहरि अपने मार्गपर चले जा रहे थे। मार्गमें जिस किसी व्यक्तिको देखते, उसे भी 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहते। महाप्रभुको 'हरि' 'हरि' बोलते सुनकर वह व्यक्ति भी प्रेममें उन्मत्त होकर 'हरि' 'कृष्ण' बोलने लगता। इस प्रकार महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित होकर वह उनके पीछे-पीछे चलने लगता। कुछ समयके बाद महाप्रभु उसका आलिङ्गन करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चार कर देते और उसे अपने घर जानेके लिये विदा कर देते। महाप्रभुसे शक्ति प्राप्तकर वह व्यक्ति अपने ग्राममें जाकर 'श्रीकृष्ण'-नामका कीर्तन करते हुए कभी हँसता, कभी रोता, तो कभी नृत्य करने लगता। वह जिसे भी देखता, उसे श्रीकृष्णनाम कहनेको कहता। इस प्रकार वह अपने सारे ग्रामवासियोंको वैष्णव बना देता॥97-101॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्ति सञ्चारिया'—ह्लादिनी-शक्तिका सारभाग और संवित्-शक्तिका सारभाग—दोनों मिलनेपर 'भक्ति-शक्ति' होती है। श्रीकृष्ण या भक्त कृपा करके उस शक्तिका जिसमें सञ्चार करते हैं, वह 'परमभक्त' बन जाता है। महाप्रभु जिसपर कृपा करते थे, उसमें वैसी शक्ति सञ्चार करके वैष्णवधर्मके प्रचारका भार अर्पण करते थे॥99॥
अन्य ग्रामवासियोंकी भी उस वैष्णव-दर्शनके कृपारूपी फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :-
ग्रामान्तर हैते देखिते आइल यत जन।
ताँर दर्शन-कृपाय हय ताँर सम ॥102॥
इस प्रकार सभी दक्षिण-भारतवासियोंका उद्धार और उन्हें वैष्णवताकी प्राप्ति :-
सेइ याइ' ग्रामेर लोक वैष्णव करय।
अन्यग्रामी आसि' ताँरे देखि' वैष्णव हय ॥103॥
222 ।
सातवाँ अध्याय [7/102-112 ]
सेइ याइ' अन्य ग्रामे करे उपदेश।
एइमत 'वैष्णव' हैल सब दक्षिण-देश॥ 104॥
**अनुवाद—**दूसरे गाँवोंसे भी जो लोग इन महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त वैष्णवके गाँवमें आते, वे भी इसके दर्शनरूपी कृपासे उसके समान वैष्णव बन जाते। जब ये वैष्णव अपने गाँवमें जाते, तो वे भी अपने गाँवके सभी लोगोंको वैष्णव बना देते। इसी प्रकार जब अन्य गाँवोंके लोग इनका दर्शन करने आते, तो वे भी वैष्णव बन जाते। इस प्रकार वैष्णव बन जानेके बाद वे दूसरे गाँवोंमें जाकर श्रीकृष्णनामका उपदेश करने लगते। इस प्रकार होते-होते समस्त दक्षिणवासी वैष्णव बन गये॥ 102-104॥
महाप्रभुके द्वारा बहुत भाग्यवान् जीवोंका उद्धार :-
एइमत पथे याइते शत शत जन।
'वैष्णव' करेन ताँरे करि' आलिङ्गन॥ 105॥
**अनुवाद—**इस प्रकार मार्गपर चलते-चलते महाप्रभुने सैकड़ों लोगोंको आलिङ्गन करके वैष्णव बना दिया था॥ 105॥
महाप्रभुको भिक्षा देनेवाले दाताओंके दर्शन करनेवालोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति और बादमें उनके द्वारा आचार्यरूपमें बहुत लोगोंका उद्धार :-
येइ ग्रामे रहि' भिक्षा करेन याँर घरे।
सेइ ग्रामेर यत लोक आइसे देखिबारे॥ 106॥
प्रभुर कृपाय हय महाभागवत।
सेइसब आचार्य हञा तारिल जगत्॥ 107॥
इस प्रकार समस्त दक्षिणदेशका उद्धार :-
एइमत कैला यावत् गेला सेतुबन्धे।
सर्वदेश 'वैष्णव' हैल प्रभुर सम्बन्धे॥ 108॥
**अनुवाद—**महाप्रभु जिस गाँवमें रहकर भिक्षा ग्रहण करते, उस गाँवके जितने लोग उनका दर्शन करने आते, महाप्रभुकी कृपासे वे सब महाभागवत बन जाते। बादमें उन सबने आचार्य बनकर जगत्का उद्धार किया। इस प्रकार सबपर कृपा करते हुए महाप्रभु सेतुबन्ध तक गये और उनके प्रभावसे सम्पूर्ण दक्षिण-देशवासी वैष्णव बन गये॥ 106-108॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'सेतुबन्ध'—सेतुबन्ध-रामेश्वर, समुद्रके तटपर, 'राम-नद' की दूसरी ओर भारतवर्षके दक्षिण प्रान्तमें है॥ 108॥
महाप्रभुकी कृपा-महिमा नवद्वीपकी अपेक्षा दक्षिणदेशमें अधिक प्रकाशित :-
नवद्वीप येइ शक्ति ना कैला प्रकाशे।
सेइ शक्ति प्रकाशि' निस्तारिल दक्षिणदेशे॥ 109॥
**अनुवाद—**नवद्वीपमें भी जिस शक्तिको प्रकाशित नहीं किया था, उस शक्तिको प्रकाशित करके महाप्रभुने दक्षिण भारतका उद्धार किया॥ 109॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'नवद्वीप' धाम होनेपर भी वहाँ उस समय न्याय और स्मृति-शास्त्रोंकी विशेष प्रबलता थी। उन-उन शास्त्रोंके अध्यापकोंमें अनेक तो बहिर्मुख लोग थे, परन्तु उनका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने किसी विशेष शक्तिका प्रकाश नहीं किया, इसलिये ग्रन्थकारने ऐसा कहा है॥ 109॥
श्रीचैतन्य-भक्तोंको ही भगवद्-कृपाशक्तिमें विश्वास :-
प्रभुके ये भजे, तारे ताँर कृपा हय।
सेइ से ए-सब लीला सत्य करि' लय॥ 110॥
अप्राकृत-लीलामें विश्वासके फलस्वरूप ही नित्यकल्याणकी प्राप्ति, अन्यथा अक्षज-ज्ञानके द्वारा सर्वनाश :-
अलौकिक-लीलाय यार ना हय विश्वास।
इहलोक, परलोक तार हय नाश॥ 111॥
प्रथमेइ कहिल प्रभुर येरूपे गमन।
एइमत जानिह यावत् दक्षिण-भ्रमण॥ 112॥
**अनुवाद—**जो व्यक्ति महाप्रभुका भजन करता है, उसीपर उनकी कृपा होती है और वही उनकी इन सब लीलाओंपर विश्वास करता है। महाप्रभुकी इन अलौकिक
। 223
[ 7/110-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
लीलाओंपर जिसे विश्वास नहीं होता, उसका इस लोक
और परलोक—दोनोंका ही नाश हो जाता है। ऐसा ही
जानो कि महाप्रभुने यात्राके प्रारम्भमें जैसे सर्वत्र कृपाका
वितरण किया, वैसे ही उन्होंने सम्पूर्ण दक्षिण-भारतका
भ्रमण करते हुए किया था॥110-112॥
अनुभाष्य— श्रीकृष्णचैतन्यकी अलौकिक लीला—
छलरहित, निरस्तकुहक अर्थात् माया और मायाकी
कपटतासे मुक्त, अप्राकृत चिदैश्वर्यमयी—जीवोंके नित्य
चरम कल्याणको प्रदान करनेवाली है, इसलिये वह
वास्तव वस्तु है। वह मायाबद्ध वञ्चक और वञ्चित
जीवोंकी गुणमय-धारणासे उत्पन्न ईर्ष्यामूलक कपटता
नहीं है। कपटता या ठगीके द्वारा, वञ्चक और वञ्चित
दोनोंका ही श्रीकृष्णसेवासे दूर होनेके फलस्वरूप सर्वनाश
होता है॥111॥
श्रीकूर्म स्थानमें जाना और विग्रह-दर्शनकर नृत्य-गीत :—
एइमत याइते याइते गेला कूर्मस्थाने।
कूर्म देखि' कैल ताँरे स्तवन-प्रणामे॥113॥
अनुवाद— इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु कूर्मस्थानमें
पहुँचे। उन्होंने कूर्मदेवके दर्शन करके उन्हें प्रणाम
करके उनकी स्तव-स्तुति की॥113॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'कूर्मस्थान'—यह एक तीर्थ है।
वहाँ कूर्मदेवका मन्दिर है। 'प्रपन्नामृत'-ग्रन्थमें कहा गया
है कि श्रीजगन्नाथदेवने श्रीरामानुज-स्वामीको रात्रिमें
श्रीपुरुषोत्तमसे कूर्मतीर्थमें उठाकर फेंक दिया था॥113॥
अनुभाष्य— 'कूर्मस्थान'—गञ्जाम जिलेमें 'चिकाकोल
रोड़' स्टेशनसे आठ मील पूर्वकी ओर 'कूर्माचल'
अथवा 'श्रीकूर्मम्' हैं; यह तेलगु भाषी लोगोंका सबसे
श्रेष्ठ तीर्थ है ('गञ्जाम म्यानुयेल')। वहाँ कूर्ममूर्ति
विराजमान है। श्रीरामानुजाचार्य ग्यारहवीं शक-शताब्दीमें
जब श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा कूर्माचलमें फेंके गये, तब
उस कूर्ममूर्तिको शिवमूर्त्ति समझकर उन्होंने उपवास
किया, बादमें उसे विष्णु-मूर्ति जानकर उन्होंने कूर्मदेवकी
सेवाका प्रकाश किया। जैसा, प्रपन्नामृतके छत्तीसवें
अध्यायमें लिखा है—
“तद्रात्रावेव योगीन्द्रं प्रापयामास सत्वरम्।
श्रीकूर्मे लक्ष्मणाचार्यं श्रीहरिर्योगमायया॥
प्रभातायां तु शर्वय्यां तस्यां लक्ष्मणदेशिकः।
उत्थाय सहसा धीमान् हरिर्हरिरितीरयन्॥
दृष्ट्वा दशदिशः सम्यक् चिन्ता-व्याकुलमानसः।
श्रीकूर्ममिति तत्क्षेत्रं ज्ञात्वा विस्मयमागतः।
श्रीकूर्मनायकं मत्वा शिवलिङ्गमितीरितम्।
उपवासेन तत्रैकं वासरं स्थितवान् गुरुः॥xx
स्वप्ने प्रसन्नो भगवान् तस्य श्रीकूर्मनाथकः।
व्याजहार शुभं वाक्यं कृपया यति-भूपतिम्॥
यतीन्द्राज्ञान-दोषेण शिवलिङ्गं जना इति।
मां वदन्ति मृषा सर्वे मायान्धीकृतलोचनाः॥
वत्स्याम्यत्र स्वरूपेण शङ्खचक्रगदाधरः।
लक्ष्मणार्याधुना शीघ्रं त्वं मां सम्यग् विलोकय॥xx
अत्रैव पूजयन् मां त्वं दिनानि कतिचिद् वस॥
ततः स्वप्नात् समुत्थाय सन्तुष्टो विस्मयान्वितः।
तथा विधाय योगीन्द्रस्तेनोक्तेनैव वर्त्मना॥
कूर्मनाथं समाराध्य तन्निवेदित-भोजनम्।
विधाय तस्य पादाग्रे सुखं तत्रावसत्तदा॥
तदा प्रभृति सर्वत्र यतीन्द्रागम-वैभवात्।
विष्णुस्थलमिति ख्यासीत् श्रीकूर्मं विदितं महत्॥”
अर्थात् “उसी रात्रिमें ही श्रीहरिने योगमायाके द्वारा
योगीन्द्र श्रीलक्ष्मणाचार्य (श्रीरामानुजाचार्य) को श्रीकूर्मक्षेत्रमें
स्थानान्तर करवाया। उस रात्रिके बाद प्रभात होनेपर
श्रीमान् लक्ष्मणदेशिक (श्रीरामानुजाचार्य) 'हरि' 'हरि'
बोलते-बोलते सहसा जाग्रत होकर दसों दिशाओंमें
देखते हुए विशेष चिन्तित और व्याकुल हुए। उस
स्थानको 'कूर्मक्षेत्र' जानकर वे विस्मित हुए। भगवान्
श्रीकूर्मको (श्रीमूर्तिको) वहाँके लोगोंकी मान्यताके अनुसार
'शिवलिङ्ग' मानकर गुरु लक्ष्मणदेशिकने उस स्थानपर
एक दिन उपवास किया। क्षेत्रनाथ भगवान् श्रीकूर्मने
उनके प्रति प्रसन्न होकर कृपापूर्वक यतिराजको स्वप्नमें
मधुर-वाक्य बोले,—“यतीन्द्र! स्थानीय लोग सभी आँखें
होते हुए भी अन्धेके समान मायाके द्वारा मुझे मिथ्या
224 ।
सातवाँ अध्याय 7/113-117 ]
ही 'शिवलिङ्ग'- रूपमें कहते हैं। किन्तु इस स्थानपर
मैं अपने 'शङ्ख-चक्र-गदाधर' रूपमें ही वास कर रहा
हूँ। आर्य लक्ष्मण ! तुम शीघ्र ही मेरा दर्शन करो और
इसी स्थानपर मेरी पूजा करते हुए कुछ दिन वास
करो।" ऐसा सुनकर विस्मित और सन्तुष्ट हुए योगीराजने
उठकर स्वप्नमें कहे गये उपायके अनुसार श्रीकृष्णनाथकी
सभी प्रकारसे आराधना की और उनको निवेदित
खाद्य-द्रव्यका भोजन किया। उन्होंने उस स्थानपर
उनके चरणकमलोंके सान्निध्यमें सुखपूर्वक कुछ दिन
वास किया। तबसे उक्त क्षेत्र यतीन्द्रके आगमनकी
महिमाके प्रभावसे 'श्रीकूर्मक्षेत्र'-नामक विष्णुस्थल-रूपमें
सर्वत्र विशेषरूपसे जाना जाता है।"
बादमें यह मन्दिर श्रीमाध्व-मठकी देख-रेखमें
विजयनगरके राजाके अधिकारमें था। उस मन्दिरमें एक
पत्थरके पटलके ऊपर लिखित नौ श्लोक लिखे पाये
गये हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्रीमध्वसम्प्रदायकी
गुरु-परम्परामें 1203 शकमें उस समयके गुरु श्रीनरहरि
तीर्थके द्वारा वे लिखे गये हैं। उनका हिन्दी-अनुवाद
इस प्रकार है-
पहला श्लोक-पुण्यश्लोक श्रीपुरुषोत्तम यतिने अनेक
विद्वानोंके उपदेष्टाके रूपमें जन्म ग्रहण किया। वे
भगवान् विष्णुको बहुत प्रिय थे।
दूसरा श्लोक-उनके उपदेशोंको समस्त जगत्में
आदरपूर्वक ग्रहण किया गया था। सिंह जैसे हाथीको
परास्त कर देता है, वैसे ही उन्होंने अपने सुसिद्धान्तपूर्ण
युक्तियोंसे विवाद करनेवालोंके सभी तर्कोंको परास्त कर
दिया था।
तीसरा श्लोक-उन्होंने आनन्दतीर्थको दीक्षा प्रदान
की। अपने द्वारा ग्रहण किये गये संन्यास-दण्डके द्वारा
शासन करके व्यासके विपथगामी मूर्ख शिष्योंको वे
सुपथपर लाये, अर्थात् उन्हें भी संन्यास प्रदान किया।
चौथा श्लोक-उनकी कथाएँ विष्णुको विशेष प्रिय
और वैकुण्ठसिद्धि-प्रदान करनेमें समर्थ थीं।
पाँचवाँ श्लोक-उनकी भक्तिकी शिक्षाएँ मनुष्योंको
भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंको प्रदान करनेमें समर्थ
हैं।
छठा श्लोक-नरहरितीर्थने उनसे ही दीक्षा ग्रहण
की और नरहरितीर्थने कलिङ्ग प्रदेशपर राज्य किया।
सातवाँ श्लोक-नरहरितीर्थने शबरोंके साथ युद्ध
करके श्रीकूर्म-मन्दिरकी रक्षाकी।
आठवाँ श्लोक-नरहरितीर्थ बहुत धार्मिक और
शक्तिशाली राजा थे।
नौवाँ श्लोक-श्रीमन्दिरके निर्माण और उसे समस्त
कल्याणदाता योगानन्द नृसिंहदेवको समर्पित करनेके
बाद शुभ 1203 शकके वैशाख मासकी शुक्लपक्षीय
एकादशी तिथिपर बुधवारको उन्होंने कामतदेवके सम्मुख
आनन्दपूर्वक देह-त्याग किया था। (अध्यापक किल्हूर्णके
अनुसार वह दिन) शनिवार 29 मार्च, 1281 ईसवी
था॥ 113 ॥
महाप्रभुके नृत्य-गीतके दर्शनसे लोगोंमें चमत्कार :-
प्रेमावेशे हासि' कान्दि' नृत्य-गीत कैल।
देखि' सर्व लोकेर चित्ते चमत्कार हैल ॥ 114 ॥
आश्चर्य शुनिया लोक आइल देखिবারে।
प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हैला चमत्कारे ॥ 115 ॥
अनुवाद-कूर्मदेवके दर्शनकर प्रेममें आविष्ट होकर
महाप्रभुने कभी हँसते, तो कभी रोते हुए नृत्य-गान
किया। जिसे देखकर सब लोगोंके हृदयमें चमत्कार
हुआ। इस आश्चर्यको सुनकर बहुतसे लोग महाप्रभुके
दर्शन करनेके लिये आये और महाप्रभुके मनमोहक
रूप और अद्भुत श्रीकृष्णप्रेमको देखकर वे भी चमत्कृत
हो गये॥ 114-115 ॥
महाप्रभुके दर्शनोंसे लोगोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :-
दर्शने 'वैष्णव' हैल, बले 'कृष्ण' 'हरि'।
प्रेमावेशे नाचे लोक ऊर्ध्वबाहु करि' ॥ 116 ॥
उन्हीं लोगोंके द्वारा उस देशका उद्धार :-
कृष्णनाम लोकमुखे शुनि' अविराम।
सेइ लोक 'वैष्णव' कैल अन्य सब ग्राम ॥ 117 ॥
। 225
[ 7/116–129 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इस प्रकार समस्त देशका उद्धार :-
एइमत परम्पराय देश 'वैष्णव' हैल।
कृष्णनामामृत-वन्याय देश भासाइल॥ 118 ॥
अनुवाद—महाप्रभुका दर्शनकर लोग वैष्णव बन
गये। वे भी 'कृष्ण' 'हरि' नामका कीर्तन करते-करते
प्रेमाविष्ट होकर अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर नृत्य
करने लगे। इन लोगोंके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनामको
सुननेवाले व्यक्ति भी 'वैष्णव' बन गये। वे भी अपने
गाँवमें जाकर कीर्तन करने लगे और उनके मुखसे
नाम सुनकर अन्यान्य सब गाँवके लोगोंको भी वैष्णव
बन गये। इस प्रकार परम्परासे सम्पूर्ण दक्षिण भारत
'वैष्णव' हो गया और श्रीकृष्णनामरूपी अमृतकी बाढ़में
सारा दक्षिण भारत डूब गया॥ 116-118॥
विग्रहके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुका सम्मान :-
कतक्षणे प्रभु यदि बाह्य प्रकाशिला।
कूर्मेर सेवक बहु सम्मान करिला॥ 119 ॥
अनुवाद—कुछ समयके बाद जब महाप्रभुने अपनी
बाहरी चेतनाको प्रकाशित किया, तब श्रीकूर्मदेवके
सेवकोंने उनका बहुत सम्मान किया॥ 119 ॥
सभी ग्रामोंमें जाकर महाप्रभुके द्वारा लोगोंका उद्धार :-
येइ ग्रामे याय ताँहा एइ व्यवहार।
एक ठाञि कहिल, ना कहिब आर बार॥ 120 ॥
अनुवाद—महाप्रभु जिस-जिस गाँवमें जाते, वहाँ भी
ऐसा ही होता। (ग्रन्थकार कविराज गोस्वामी कह रहे
हैं—) एकबार मैंने इसका वर्णन किया है, अब इसे
बार-बार नहीं कहूँगा॥ 120 ॥
'कूर्म' नामक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :-
'कूर्म'-नामे सेइ ग्रामे वैदिक ब्राह्मण।
बहु श्रद्धा-भक्त्ये कैल प्रभुर निमन्त्रण॥ 121 ॥
घरे आनि' प्रभुर कैल पाद-प्रक्षालन।
सेइ जल वंश-सहित करिल भक्षण॥ 122 ॥
अनेकप्रकार स्नेहे भिक्षा कराइल।
गोसाञिर प्रसादान्न सवंशे खाइल॥ 123 ॥
“येइ पादपद्म तोमार ब्रह्मा ध्यान करे।
सेइ पादपद्म साक्षात् आइल मोर घरे॥ 124 ॥
मोर भाग्येरे सीमा ना याय कहन।
आजि मोर श्लाघ्य हैल जन्म-कुल-धन॥ 125 ॥
महाप्रभुके साथ जानेकी कूर्म ब्राह्मणकी प्रार्थना :-
कृपा कर, प्रभु, मोरे, याङ तोमा-सङ्गे।
सहिते नारिमु तोमार विरह-तरङ्गे॥" 126 ॥
अनुवाद—कूर्म-नामक एक वैदिक ब्राह्मण उस
गाँवमें रहते थे, उन्होंने बहुत श्रद्धा और भक्तिसे
महाप्रभुको अपने घरपर निमन्त्रित किया। महाप्रभुको
अपने घरमें लाकर उन ब्राह्मणने उनके श्रीचरणोंको
धोया और उस चरणामृतका उसने अपने परिवार सहित
पान किया। उन ब्राह्मणने बहुत स्नेहसे महाप्रभुको
अनेक प्रकारका भोजन कराया और बादमें महाप्रभुके
उच्छिष्ट प्रसादको अपने परिवार सहित ग्रहण किया।
महाप्रभुकी वन्दना करते हुए वे ब्राह्मण कहने लगे,—
“आपके जिन श्रीचरणकमलोंका ब्रह्मा ध्यान करते हैं,
वे श्रीचरणकमल आज साक्षात् मेरे घरमें आये हैं। मेरे
भाग्यकी सीमा कही नहीं जा सकती। आज मेरा जन्म,
कुल और धन, सब कुछ धन्य हो गया है। हे प्रभो!
कृपा करके आप मुझे अपने साथ ले चलिये। मैं
आपके विरहके तापको सहन नहीं कर पाऊँगा॥” 121-126 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीको ही आचार्यरूपसे
कृष्णनाम-भक्ति प्रचार करनेका आदेश :-
प्रभु कहे,—“ऐछे बात् कभु ना कहिबा।
गृहे रहि' कृष्णनाम निरन्तर लैबा॥ 127 ॥
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश।
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥ 128 ॥
कभु ना बाधिबे तोमार विषय-तरङ्ग।
पुनरपि एइ ठाञि पाबे मोर सङ्ग॥” 129 ॥
226 ।
सातवाँ अध्याय 7/127–135 ]
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—“ऐसी बात
कभी नहीं कहना। घरमें रहकर ही निरन्तर श्रीकृष्णनाम
करो। जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्णनाम करनेका उपदेश
दो। मेरी आज्ञासे गुरु बनकर तुम इस देशका उद्धार
करो। घरमें रहते हुए भी सांसारिक विषय कभी तुम्हारी
भक्तिमें बाधा नहीं देंगे और यहीं तुम्हें पुनः मेरा सङ्ग
प्राप्त होगा॥” 127–129 ॥
एइ मत याँर घरे करे प्रभु भिक्षा।
सेइ ऐछे कहे, ताँरे कराय एइ शिक्षा॥ 130 ॥
अनुवाद—इस प्रकार जिसके घरमें महाप्रभु भिक्षा
ग्रहण करते, वह भी इसी प्रकार कहता और महाप्रभु
उसे भी यही शिक्षा देते॥ 130 ॥
अनुभाष्य—जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागकर एकान्तिक
रूपसे श्रीमन्महाप्रभुका आश्रय लेकर सेवा करनेका
सङ्कल्प किया है, भगवान् श्रीगौरसुन्दरने उनके भजनको
स्वीकार करके यह शिक्षा दी है—
“अपनेमें गृहत्यागियोंके जैसे ‘श्रेष्ठ भजनपरायण’
होनेका अभिमान त्यागकर गृहवासरूपी दीनताके साथ
निरन्तर श्रीकृष्णनाम कीर्तन करते हुए शुद्धकृष्णनाम-
भजनका प्रचार करो। ‘मैं सर्वोत्तम वैष्णव हूँ, शिष्य
करनेसे मेरा भजन नष्ट हो जायेगा’—ऐसा बड़े भक्त
होनेका अभिमान त्यागकर दीनतापूर्वक शुद्धनाम-ग्रहणका
आचरण और शुद्धनाम-प्रचाररूपी गुरुका कार्य करनेसे
जड़-प्रतिष्ठारूपी विषय-तरङ्ग प्रबल नहीं हो पाती।
श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीजीव और श्रीरघुनाथदास आदि
पार्षद-महात्माओंने ग्रन्थ लिखकर लोगोंको उपदेश दिया
तथा श्रीमन् नरोत्तम, श्रीमध्व-रामानुज आदिने बहुतसे
शिष्योंको ग्रहण किया। अनेक मूर्ख लोग उनके ऐसे
कार्यको भक्तिके अङ्गोंका बाधक और विषय-तरङ्ग
समझनेकी कल्पना करके वास्तविक अकिञ्चन भक्तोंके
चरणोंमें अपराधी होते हैं। जगद्गुरु आचार्यके रूपमें
श्रीगौराङ्गने यह शिक्षा इसलिये प्रदान की है कि वे
गृहस्थ भक्त भलीभाँति विचार करके अपने मिथ्या
दीन-अभिमानको परित्याग कर दें और हरि-विमुख
व्यक्तियोंके प्रति प्रतिशोधकी भावना भी नहीं रखें, इस
प्रकार महाप्रभुके आनुगत्यमें अपने भजनकी वृद्धि
करें॥ 130 ॥
पुरीमें लौटने तक महाप्रभुके द्वारा सभीको आचार्यरूपमें
भक्ति-प्रचार करनेका आदेश :–
पथे याइते देवालये रहे येइ ग्रामे।
याँर घरे भिक्षा करे, सेइ महाजने॥ 131 ॥
कूर्मे यैछे रीति, तैछे कैल सर्वठानि।
नीलाचले पुनः यावत् ना आइला गोसाञि॥ 132 ॥
अतएव इँहा कहिलाङ करिया विस्तार।
एइमत जानिबे प्रभुर सर्वत्र व्यवहार॥ 133 ॥
अनुवाद—मार्गमें जाते हुए महाप्रभु जिस गाँवके
देवालयमें रहते वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य-गान करते तथा
जिसके घरमें भिक्षा ग्रहण करते, उस महाजनको, कूर्म
ब्राह्मणकी भाँति ही उपदेश प्रदान करते। नीलाचल
लौटकर आने तक उन्होंने सर्वत्र यही उपदेश दिया।
इसलिये मैंने कूर्म ब्राह्मणकी कथाको विस्तारपूर्वक कहा
है। ऐसा ही समझो कि महाप्रभुने भ्रमण करते समय
सर्वत्र ऐसा ही किया था॥ 131–133 ॥
उस रात कूर्मगृहमें वास :–
एइमत सेइ रात्रि ताँहाइ रहिला।
प्रातःकाले प्रभु स्नान करिया चलिला॥ 134 ॥
प्रातःकाल फिरसे यात्रा :–
प्रभुर अनुव्रजि’ कूर्म बहु दूर आइला।
प्रभु ताँरे यत्न करि’ घरे पाठाइला॥ 135 ॥
अनुवाद—इस प्रकार उस रात महाप्रभु वहीं रहे
और अगले दिन प्रातःकालमें स्नान करके वे वहाँसे
चल दिये। कूर्म ब्राह्मण बहुत दूर तक महाप्रभुके
पीछे-पीछे आये। अन्तमें महाप्रभुने उन्हें बहुत
समझा-बुझाकर घर वापिस भेजा॥ 134–135 ॥
। 227
[ 7/136-146 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कुष्ठरोगी वासुदेव-ब्राह्मणका महाप्रभुके दर्शनोंके लिये
कूर्म्मब्राह्मणके गृहमें आगमन :-
'वासुदेव'-नाम एक द्विज महाशय।
सर्वाङ्गे गलित कुष्ठ, ताते कीड़ामय ॥ 136 ॥
अङ्ग हैते येइ कीड़ा खसिया पड़य।
उठाञा सेइ कीड़ा राखे सेइ ठाञ ॥ 137 ॥
रात्रिते शुनिला तेंहो गोसाञिर आगमन।
देखिबारे आइला प्रभाते कूर्मेर भवन ॥ 138 ॥
अनुवाद—कूर्म्म स्थानमें एक ब्राह्मण थे जिनका
नाम वासुदेव था, वे बड़े महात्मा थे, परन्तु उनके
शरीरमें कोढ़का रोग था। रोगसे उनके अङ्ग गल रहे
थे और उनमें भी कीड़े पड़ गये थे। यदि उनके किसी
अङ्गसे कोई कीड़ा नीचे गिर जाता, तो वे उसे उठाकर
फिर अपने उसी अङ्गमें रख देते। रात्रिमें उन्होंने
महाप्रभुके आगमनके बारेमें सुना, सुबह होते ही वे कूर्म्म
ब्राह्मणके घर महाप्रभुके दर्शन करने आये॥ 136-138॥
महाप्रभुके कूर्म्मक्षेत्रसे चले जानेकी बातको
सुनकर वासुदेवको दुःख और विलापके
कारण महाप्रभुका वहाँ आविर्भाव :-
प्रभुर गमन कूर्म्म-मुखेते शुनिञा।
भूमिते पड़िला दुःखे मूर्च्छित हञा ॥ 139 ॥
अनेकप्रकार विलाप करिते लागिला।
सेइक्षणे आसि' प्रभु ताँरे आलिङ्गिला ॥ 140 ॥
महाप्रभुका उनको आलिङ्गन-दान, उसके फलस्वरूप
ब्राह्मणकी कुष्ठरोगसे मुक्ति और सौन्दर्य-प्राप्ति :-
प्रभु-स्पर्शे दुःख-सङ्गे कुष्ठ दूरे गेल।
आनन्द सहित अङ्ग सुन्दर हइल ॥ 141 ॥
अनुवाद—कूर्म्म ब्राह्मणके मुखसे महाप्रभुके चले
जानेकी बात सुनकर वे दुःखसे मूर्च्छित होकर भूमिपर
गिर पड़े। फिर चेतना लौटनेपर वे बहुत प्रकारसे
विलाप करने लगे। तभी महाप्रभुने वहाँ आकर उनका
आलिङ्गन किया। महाप्रभुका स्पर्श पाते ही उनके
दुःखके साथ-साथ उनका कोढ़का रोग भी दूर हो गया।
उनके सभी अङ्ग सुन्दर हो गये और उनके हृदयमें
आनन्दका सञ्चार हुआ॥ 139-141॥
महाप्रभुकी दयाका दर्शनकर वासुदेवका स्तव :-
प्रभुर कृपा देखि' ताँर विस्मय हैल मन।
श्लोक पड़ि' पाये धरि', करये स्तवन ॥ 142 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी ऐसी कृपाको देखकर उनके
मनमें बहुत आश्चर्य हुआ और वे उनके चरणकमलोंको
पकड़कर एक श्लोकके द्वारा उनका स्तव करने
लगे॥ 142॥
श्रीमद्भागवत (10/81/16) :-
क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः।
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥ 143 ॥
अनुवाद—(सुदामाजीके वचन—) कहाँ मैं अति
पापी दरिद्र, कहाँ श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके निवासस्थान)
श्रीकृष्ण! उन्होंने मुझे अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र जानकर मेरा
आलिङ्गन किया,—यह अति आश्चर्यका विषय है॥ 143॥
अनुभाष्य—आदिलीला 17/78 संख्या देखें॥ 143॥
बहु स्तुति करि' कहे, —"शुन, दयामय।
जीवे एइ गुण नाहि, तोमाते एइ हय ॥ 144 ॥
मोरे देखि' मोर गन्धे पलाय पामर।
हेन-मोरे स्पर्श' तुमि,—स्वतन्त्र ईश्वर ॥ 145 ॥
किन्तु आछिलाङ भाल अधम हञा।
एबे अहङ्कार मोर जन्मिबे आसिया ॥" 146 ॥
अनुवाद—वासुदेव ब्राह्मणने महाप्रभुकी बहुत स्तुति
की और फिर कहने लगे,—"सुनो हे दयामय! जीवोंमें
ऐसी कृपाका गुण नहीं हो सकता, जो आपमें है। मुझे
देखकर, मेरे शरीरकी दुर्गन्धसे अत्यन्त पापी व्यक्ति भी
मुझसे दूर भागते हैं और आपने मेरे जैसे व्यक्तिको
स्पर्श किया—आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। किन्तु मैं उस
228 ।
सातवाँ अध्याय 7/144-154 ]
अधम अवस्थामें ही अच्छा था, क्योंकि अब मुझमें
सुन्दर शरीरका अभिमान आ जायेगा॥"144-146 ॥
महाप्रभुके द्वारा वासुदेवको आचार्य होकर श्रीकृष्णनामका
उपदेश करते हुए जीवोंके उद्धार करनेका आदेश :—
प्रभु कहे,—"कभु तोमार ना हबे अभिमान।
निरन्तर कह तुमि 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम ॥ 147 ॥
कृष्ण उपदेशि' कर जीवेर निस्तार।
अचिराते कृष्ण तोमा करिबेन अङ्गीकार ॥"148 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"तुम निरन्तर 'कृष्ण'
'कृष्ण' नामका कीर्तन करना, तब तुम्हें कभी भी
अभिमान नहीं होगा। सभी जीवोंको श्रीकृष्णनामका
उपदेश देकर उनका उद्धार करना, श्रीकृष्ण तुम्हें शीघ्र
ही अङ्गीकार करेंगे॥"147-148 ॥
महाप्रभुकी कृपाको स्मरण करके
कूर्म और वासुदेवका क्रन्दन :—
एतेक कहिया प्रभु कैल अन्तर्धाने।
दुइ विप्र गलागलि कान्दे प्रभुर गुणे ॥ 149 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु वहाँसे अन्तर्धान
हो गये। तब कूर्म एवं वासुदेव ब्राह्मण परस्पर
आलिङ्गन करके महाप्रभुके गुणोंका गान करते हुए रोने
लगे॥ 149 ॥
इस आख्यानका नाम—वासुदेवका उद्धार,
महाप्रभुका नाम—'वासुदेवामृतप्रद' :—
'वासुदेवोद्धार' एइ कहिल आख्यान।
'वासुदेवामृतप्रद' हैल प्रभुर नाम ॥ 150 ॥
एइ त' कहिल प्रभुर प्रथम आगमन।
कूर्म-दरशन, वासुदेव-विमोचन ॥ 151 ॥
चैतन्यलीला-श्रवण करनेसे अचैतन्य-सेवकको
चैतन्यकी प्राप्ति :—
श्रद्धा करि' एइ लीला ये करे श्रवण।
अचिराते मिलये तारे चैतन्य-चरण ॥ 152 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकारने) 'वासुदेव-
उद्धार' नामक कथाका वर्णन किया है और इस कारण
महाप्रभुका एक नाम 'वासुदेवामृतप्रद' हो गया। यह मैंने
महाप्रभुके द्वारा प्रथम यात्राके समय किये गये श्रीकृष्णदेवके
दर्शन और वासुदेवके उद्धारका वर्णन किया। जो
श्रद्धापूर्वक महाप्रभुकी इन लीलाओंका श्रवण करता है,
उसे शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति
होती है॥ 150-152 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम-कृत महाप्रभुके सौ
नामोंमें यह नाम भी है॥ 150 ॥
सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—'एइ लीला'—श्रीकृष्णचैतन्यके द्वारा भक्तिहीन
जीवोंको भक्ति दिये जानेपर वे सब श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख
जीव, पुनः आचार्यके रूपमें अन्य भक्तिहीन जीवोंको
भक्ति प्रदान करके उन्हें श्रीकृष्णसेवाोन्मुख कराते रहते
हैं। इस प्रकार अच्युत-गोत्रकी वृद्धि अर्थात् श्रौत-पन्था
प्रसारके द्वारा यह श्रीगौरसुन्दरकी अवतारवाद-माहात्म्य-
प्रदर्शन-लीला है॥ 152 ॥
सातवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
गुरुमुखसे श्रवणके फलस्वरूप अथवा
श्रौतपन्थासे ही श्रीचैतन्य-सेवा :—
चैतन्यलीलार आदि-अन्त नाहि जानि।
सेइ लिखि, येइ महान्तेर मुखे शुनि ॥ 153 ॥
शुद्धभक्तके चरणोंमें शरणागति ही
श्रीचैतन्यकी प्राप्तिका उपाय :—
इथे अपराध मोर ना लइओ, भक्तगण।
तोमा-सबार चरण—मोर एकान्त शरण ॥ 154 ॥
अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके
आदि-अन्तको नहीं जानता हूँ। मैं तो केवल वही
लिख रहा हूँ, जो मैंने महाजनोंके मुखसे श्रवण किया
है। इसलिये हे भक्तों! मेरा अपराध मत लेना, आप
सभीके चरणकमल ही मेरा एकमात्र आश्रय हैं॥ 153-154॥
। 229
[ 7/155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 155 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 155 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे दक्षिणयात्रायां
'वासुदेवोद्धारो' नाम सप्तम-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डके अन्तर्गत दक्षिणयात्रामें
'वासुदेव-उद्धार' नामक सातवाँ अध्याय समाप्त।
230 ।
। 231