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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

अठारहवाँ अध्याय 18/57-63 ] अनुभाष्य— 'नन्दीश्वर'—नन्दालय (नन्दभवन); भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें— “देख नन्दीश्वर चतुर्दिके कुण्डवन। कृष्णविलासेर स्थान भुवनपावन॥” [अर्थात् “इस स्थान नन्दीश्वरको देखो, यहाँ चारों ओर कुण्ड और वन हैं। ये श्रीकृष्णके विलासके स्थान हैं और इनके दर्शनसे ही समस्त लोक पवित्र हो जाते हैं।”]॥ 57॥ पावन-सरोवरमें स्नान, विग्रहके सम्बन्धमें जिज्ञासा :— 'पावनादि' सब कुण्डे स्नान करिया। लोकेरे पुछिल, पर्वत-उपरे याञा॥ 58 ॥ लोगोंसे गुफाके अन्दर विराजमान श्रीनन्द-यशोदा और श्रीकृष्णकी मूर्तिके अवस्थानके विषयमें श्रवण करना :— “किछु देवमूर्त्ति हय पर्वत-उपरे?” लोक कहे,—“मूर्त्ति हय गोफार भितरे ॥ 59 ॥ दुइदिके माता-पिता पुष्ट-कलेवर। मध्ये एक शिशु' हय त्रिभङ्गसुन्दर ॥”60 ॥ शुनि' महाप्रभु मने आनन्द पाञा। 'तिन' मूर्ति देखिला सेइ गोफा उघाड़िया ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पावन-सरोवरादि सभी कुण्डोंमें स्नान करके पर्वतके ऊपर जाकर लोगोंसे पूछा, —“क्या पर्वतके ऊपर भगवान्का कोई श्रीविग्रह है?” लोगोंने कहा,—“गुफाके अन्दर विग्रह हैं। दोनों तरफ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले माता और पिता हैं तथा बीचमें त्रिभङ्गसुन्दर एक बालक है।” इस बातको सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने गुफामें प्रवेश करके तीनों मूर्तियोंके दर्शन किये॥ 58-61 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनन्द-यशोदाकी वन्दना और श्रीकृष्ण-स्पर्शन :— व्रजेन्द्र-व्रजेश्वरीर कैल चरण वन्दन। प्रेमावेशे कृष्णेर कैल सर्वाङ्ग-स्पर्शन॥ 62 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने व्रजेन्द्र श्रीनन्द तथा व्रजेश्वरी श्रीयशोदाजीके चरणोंकी वन्दना की, उन्होंने प्रेमावेशमें श्रीकृष्णके सभी अङ्गोंका स्पर्श किया॥ 62 ॥ अनुभाष्य— 'पावन-सरोवर'—मथुरा-माहात्म्यमें— “पावने सरसि स्नात्वा कृष्णं नन्दीश्वरे गिरौ। दृष्ट्वा नन्दं यशोदाञ्च सर्वाभीष्टमवाप्नुयात् ॥” [अर्थात् “पावन-सरोवरमें स्नान करके नन्दीश्वर पर्वतपर (विराजमान) श्रीकृष्ण, श्रीनन्दमहाराज और श्रीयशोमती माताके दर्शन करनेसे सर्वाभीष्ट प्राप्त होता है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “ए पावन सरोवर कृष्णप्रिय अति ॥” “पर्वत-उपरे देख पुत्रेर सहिते। श्रीनन्दयशोदा शोभे अपूर्व-गोफाते ॥ ओहे श्रीनिवास, एथा श्रीचैतन्यराय। करिते दर्शन गिया प्रवेशे गोफाय ॥ श्रीनन्द-यशोदा-दुइदिके दुइजन। मध्ये कृष्णचन्द्रे देखि' प्रफुल्ल नयन ॥ श्रीनन्द-यशोदार चरण वन्दिया। कृष्णेर सर्वाङ्ग स्पर्श उल्लसित हञा॥ प्रेमेर आवेशे नृत्य-गीत आरम्भिल ॥” [अर्थात् “यह पावन सरोवर श्रीकृष्णको अति प्रिय है। पर्वतके ऊपर देखो—गुफामें पुत्रके सहित श्रीनन्द-यशोदाकी अपूर्व-शोभा है। ओहे श्रीनिवास, यहाँ श्रीचैतन्यरायने इनके दर्शन करनेके लिये गुफामें प्रवेश किया था। श्रीनन्द और श्रीयशोदाके मध्यमें श्रीकृष्णचन्द्रको देखकर उनके नयन प्रफुल्लित हो गये। उन्होंने श्रीनन्द और श्रीयशोदाके चरणोंकी वन्दना की। उल्लसित होकर उन्होंने श्रीकृष्णके सभी अङ्गोंको स्पर्श किया। प्रेमके आवेशमें उन्होंने वहाँ नृत्य-गीत करना आरम्भ कर दिया।”]॥ 58-62 ॥ सारा दिन नृत्य-गीतके बाद खदिरवनमें आगमन :— सब दिन प्रेमावेशे नृत्य-गीत कैला। ताँहा हैते महाप्रभु 'खदिर-वन' आइला ॥ 63 ॥ । 145

[ 18/63-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—प्रतिदिन महाप्रभु वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य तथा गान करते। बादमें वहाँसे महाप्रभु ‘खदिर-वन’में आ गये॥ 63॥ अनुभाष्य—‘खदिरवन’— ‘सप्तमन्तु वनं भूमौ खदिरं लोकविश्रुतम्॥’ [अर्थात् “द्वादश वनोंमें सातवाँ वन ‘खदिर-वन’ समस्त जगत्में विख्यात है।”] भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— “देखह खदिर वन विदित जगते। विष्णु-लोकप्राप्ति एथा गमन-मात्रेते॥” [अर्थात् “इस जगत्-विख्यात खदिर-वनको देखो। यहाँ जानेमात्रसे जीवको विष्णुलोककी प्राप्ति हो जाती है।”] ॥ 63॥ शेषशायी श्रीकृष्ण और लक्ष्मी-दर्शन :— लीलास्थल देखि’ ताँहा गेला ‘शेषशायी’। ‘लक्ष्मी’ देखि’ एइ श्लोक पड़ेन गोसाञि ॥ 64 ॥ अनुवाद—खदीरवनकी लीलास्थलियॉंको देखकर महाप्रभु वहाँसे ‘शेषशायी’ गये और वहाँपर लक्ष्मीको देखकर उन्होंने निम्नलिखित एक श्लोक पढ़ा— ॥ 64 ॥ अनुभाष्य—‘शेषशायी’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— ‘एइ ‘शेषशायी’ क्षीरसमुद्र एथाते। कौतुके शुइला कृष्ण अनन्तशय्याते॥ एइ शेषशायि-मूर्त्ति दर्शन करिते। श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र आइला एथाते॥ करिया दर्शन, महाकौतुक बाड़िल। से-प्रेमावेशे प्रभु अधैर्य हइल॥” [अर्थात् “ये ‘शेषशायी’ हैं और यहाँ क्षीरसमुद्र है। लीला करते हुए कौतुकवश श्रीकृष्ण अनन्त-शय्यापर लेट गये थे। इन शेषशायी विग्रहके दर्शन करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र यहाँ आये थे। दर्शन करके उनमें महाकौतुक बढ़ने लगा और प्रेमावेशमें महाप्रभु अधीर हो गये।”] ॥ 64 ॥ श्रीमद्भागवतमें (10/31/19) :— यत्ते सुजातचरणावरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायूषां नः ॥ 65 ॥ अनुवाद—गोपियों कहती हैं—हे प्रिय, हम तुम्हारे जिन सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करती हैं, अपने उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पथरादिके चुभनेसे अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन-स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ 65॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें॥ 65 ॥ खेलातीर्थ, भाण्डीरवन और भद्रवनमें आगमन :— तबे ‘खेला-तीर्थ’ देखि’ ‘भाण्डीरवन’ आइला। यमुना पार हञा ‘भद्रवन’ गेला ॥ 66 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु ‘खेला-तीर्थ’ (खेलनवन)के दर्शन करके भाण्डीरवन आ गये। फिर यमुना पार करके वे भद्रवनमें गये॥ 66॥ अनुभाष्य—‘खेलातीर्थ’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— “देखह खेलनवन, एथा दुइ भाइ। सखासह खेले भक्षणेर चेष्टा नाइ॥ मायेर यत्नेते भुञे कृष्ण-बलराम। ए खेलनवटेर श्रीखेलातीर्थ नाम॥” [अर्थात् “इस खेलनवनको देखो, यहाँ दोनों भाई (श्रीकृष्ण और श्रीबलराम) सखाओंके साथ खेलते थे। खेलनेमें वे इतने आविष्ट हो जाते थे कि खाना आदि सब भूल जाते थे। माता यशोदाको उन्हें बड़े यत्नसे बुलाकर घर लाना पड़ता कि वे स्नान और भोजन कर लें। इस खेलनवटका नाम श्रीखेलातीर्थ है।”] ‘भाण्डीर-वन’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— 146

अठारहवाँ अध्याय 18/66-67 ]

“चलये भाण्डीर-पथे उल्लास अन्तरे। एबे लोक कहय ‘अक्षयवट’ तारे॥ बलराम कौतुके प्रलम्बवध कैला। सखासह भाण्डीरे कृष्णेर नाना लीला॥” [अर्थात् “उल्लाससे भरे हृदयसे महाप्रभु भाण्डीर-वनके मार्गपर चले। अब लोग उसे ‘अक्षयवट’ के नामसे बुलाते हैं। यहाँ खेल-ही-खेलमें श्रीबलरामने प्रलम्बासुरका वध किया था। सखाओंके साथ भाण्डीर-वनमें श्रीकृष्णकी अनेक लीलाएँ हुई थीं।”] स्तवावलीके व्रजविलास-स्तवमें— “मल्लीकृत्य निजाः सखीः प्रियतमागर्वेण सम्भाविता मल्लीभूय मदीश्वरी रसमयी मल्लत्वमुत्कण्ठया। यस्मिन् सम्यगुपेयुषा वकभिदा राधानियोद्धुं मुदा कुर्वाणा मदनस्य तोषमतनोद्भाण्डीरकं तं भजे॥” [अर्थात् “जहाँ मेरी अधीश्वरी श्रीकृष्ण प्रियतमा श्रीराधिका मल्लयुद्धके कौतुकवश स्वयं मल्लवेशमें सुसज्जित होकर अपनी सखियोंको भी मल्लवेशमें सजाकर गर्वित हुई थी और मल्लवेशधारी बकारि श्रीकृष्णके साथ आनन्दपूर्वक मल्लयुद्ध करके मदनका आनन्दवर्धन किया था, मैं उस भाण्डीर-वनका भजन करता हूँ।”] 'भद्रवन'— “अस्ति भद्रवनं नाम षष्ठञ्च वनमुत्तमम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें उत्तम यह छठा वन भद्रवन है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “कृष्णप्रिय हय भद्रवन-गमनेते॥” [अर्थात् “जो भद्रवनमें गमन करता है, वह श्रीकृष्णका प्रिय हो जाता है।”] ॥ 66 ॥ श्रीवन, लोहवन और श्रीकृष्णजन्मभूमि गोकुल दर्शन :— ‘श्रीवन’ देखि’ पुनः गेला ‘लोह-वन’। ‘महावन’ गिया कैला जन्मस्थान-दरशन॥ 67 ॥ अनुवाद—श्रीवन (बिल्ववन)के दर्शन करके महाप्रभु पुनः लोह-वनमें गये और फिर महावनमें जाकर उन्होंने श्रीकृष्णके जन्मस्थानका दर्शन किया॥ 67 ॥ अनुभाष्य—‘श्रीवन’— “वनं बिल्ववनं नाम दशमं देवपूजितम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें दसवें वनका नाम बिल्ववन (बेलवन) है और देवता भी इस वनकी पूजा करते हैं।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देवता-पूजित बिल्ववन शोभामय।” [अर्थात् “अति शोभायुक्त बिल्ववनकी सभी देवता पूजा करते हैं।”] 'लोहवन'— “लौहजङ्ग-वनं नाम लोहजङ्गेन रक्षितम्। नवमन्तु वनं देवि सर्वपातकनाशनम्॥” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें नौवाँ वन लौहजङ्ग-वन है। लौहजङ्गा नामक एक असुर इसकी रक्षा करता था। हे देवि! यह वन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “लोहवने कृष्णेर अद्भुत गो-चारण। एथा लोहजङ्गासुरे वधे भगवान्॥” [अर्थात् “लौहवनमें श्रीकृष्ण गोचारण कराते थे। यहीं श्रीकृष्णने लौहजङ्घा नामक असुरका वध किया था।”] 'महावन'— “महावनं चाष्टमन्तु सदैव तु मम प्रियम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें आठवाँ वन महावन मेरा सदा अति प्रिय है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देख, नन्द-यशोदा-आलय महावने। ×× एइ देख श्रीकृष्णचन्द्रेर जन्मस्थल। ×× श्रीगोकुल, महावन—दुइ ‘एक’ हय॥” [अर्थात् “महावनमें श्रीनन्द और यशोदाके भवनका दर्शन करो। यहाँ श्रीकृष्णके जन्मस्थानको देखो। | 147

[ 18/67-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महावन और श्रीकृष्णका जन्मस्थान गोकुल, दोनों ही वहाँसे अक्रूर-तीर्थ आ गये। वहाँ आकर वे एकान्त एक और अभिन्न हैं।"] ॥ 67 ॥ स्थानमें रहने लगे ॥ 70 ॥ यमलार्जुन-भञ्जनस्थलके दर्शनसे प्रेमावेश :- अनुभाष्य- 'अक्रूरतीर्थ'- यमलार्जुनभङ्गादि देखिल सेइ 'स्थल'। “अक्रूरतीर्थमत्यर्थमस्ति प्रियवरं हरेः। प्रेमावेशे प्रभुर मन हैल टलमल ॥ 68 ॥ तीर्थराजः हि चाक्रूरं गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्॥ ” अनुवाद-यमलार्जुन-भञ्जनादि लीलास्थलीको देखकर [अर्थात् “अक्रूरतीर्थ श्रीहरिका अति प्रियतम है। वहाँ प्रेमावेशमें महाप्रभुका मन अस्थिर हो गया ॥ 68 ॥ यह तीर्थोंका राजा है और गुह्यसे भी अति गुह्यतम धाम अनुभाष्य- 'यमलार्जुन'- है।"] “यमलार्जुनतीर्थञ्च कुण्डं तत्र च वर्त्तते।” (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- [अर्थात् “उस स्थानपर यमलार्जुन-तीर्थ और “देख, श्रीनिवास, एइ अक्रूर ग्रामेते। यमलार्जुन-कुण्ड हैं।"] श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु छिलेन निभृते॥ ” (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- [अर्थात् “हे श्रीनिवास, देखो इस अक्रूर ग्राममें “एइ यमलार्जुन-भञ्जन तीर्थस्थल। श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु एकान्त स्थानमें रहे थे।"] ॥ 70 ॥ एथा उदूखले कृष्णे यशोदा बाँधिला। वृन्दावनके दर्शनके लिये आगमन एवं कालीय-ह्रद और बन्धन-स्वीकार कृष्ण कौतुके करिला॥ ” प्रस्कन्दन-क्षेत्रमें स्नान :- [अर्थात् “यह यमलार्जुन-भञ्जन तीर्थस्थल है। यहाँ आर दिन आइला प्रभु देखिते वृन्दावन। यशोदा माताने श्रीकृष्णको ऊखलसे बाँधा था। श्रीकृष्णने 'कालीय-ह्रदे' स्नान कैला आर प्रस्कन्दन ॥ 71 ॥ माताके प्रेमके कारण बन्धन स्वीकार किया था] ॥ 68 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु वृन्दावनके दर्शनके उसके बाद मथुरामें योगपीठका दर्शन और लिये आये। उन्होंने कालीय-ह्रद और प्रस्कन्दन तीर्थमें माधवेन्द्रपुरीके शिष्यके घरमें अवस्थान :- स्नान किया ॥ 71 ॥ 'गोकुल' देखिया आइला 'मथुरा'-नगरे। अनुभाष्य- 'वृन्दावन'- 'जन्मस्थान' देखि' रहे सेइ विप्र-घरे ॥ 69 ॥ “अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः।” अनुवाद-महाप्रभु गोकुलका दर्शन करके 'मथुरा'- “वृन्दावनं द्वादशमं वृन्दया परिरक्षितम्॥ ” नगरीमें आये और उन्होंने वहाँ श्रीकृष्ण जन्मस्थानके [अर्थात् “अहो ! वृन्दावन अति रमणीय स्थान है, दर्शन किये। मथुरामें वे उन सनोड़िया ब्राह्मणके घरमें जहाँ गिरिराज गोवर्धन हैं। बारह वनोंमें यह बारहवाँ वन रहे ॥ 69 ॥ है और वृन्दादेवीके द्वारा यह सभी प्रकारसे सुरक्षित लोगोंकी भीड़के कारण वहाँसे है।"] जाकर अक्रूरतीर्थमें रहना :- (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- लोकेर संघट्ट देखि' मथुरा छाड़िया। “कृष्णेर परमप्रिय धाम-वृन्दावन। एकान्ते 'अक्रूर-तीर्थे' रहिला आसिया ॥ 70 ॥ कृष्णदेहरूप 'पञ्चयोजन' एइ वन। अनुवाद-मथुरामें लोगोंकी भीड़को देखकर महाप्रभु ×× वृन्दावन-षोलक्रोश, लोके इहा प्रचार ॥ ” [अर्थात् “यह वृन्दावन-धाम श्रीकृष्णका परम प्रिय 148 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/71-72 ] स्थान है। यह श्रीकृष्णकी देह स्वरूप है और इसका परिमाण पाँच योजन है। लोगोंमें इस बातका भी प्रचार है कि वृन्दावन सोलह कोस परिमाणका है।"] 'कालीयह्रद'— “कालीयह्रदपूर्वेण कदम्बो महितो द्रुमः। ततः कालीयतीर्थाख्यं तीर्थमघविनाशनम्॥ अनृत्यद्यत्र भगवान् बालः कालीय-मस्तके ॥” [अर्थात् “कालीय-ह्रदके पूर्वमें एक विशाल कदम्बका वृक्ष है। वहाँ कालीय-तीर्थ नामक एक तीर्थ है, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने अपनी बाल्य-लीला करते हुए कालीयके मस्तकपर नृत्य किया था।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “ए कालीय-तीर्थ पाप विनाशय। कालीय-तीर्थस्थाने बहु कार्यसिद्धि हय॥” [अर्थात् “इस कालीय-तीर्थमें स्नान करनेसे समस्त पापोंका विनाश हो जाता है। इसमें स्नान करनेसे अनेक लौकिक कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।"] 'प्रस्कन्दन'— “क्षेत्रं प्रस्कन्दनं नाम सर्वपापहरं शुभम्। तस्मिन् स्नातस्तु मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥” [अर्थात् “प्रस्कन्दन नामक क्षेत्र सभी पापोंको हरकर शुभ प्रदान करनेवाला है। इसमें स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देख 'प्रस्कन्दन'-क्षेत्र-स्नाने पाप याय। प्राणत्याग हइलेइ विष्णुलोक पाय॥ ओहे श्रीनिवास, सूर्य्यगणेर तापेते। दूरे गेल शीत, घर्म्म हइल देहेते॥ सेइ घर्म्मजल सूर्य्यकन्याय मिलिल। एइ हेतु 'प्रस्कन्दन'-नाम तीर्थ हैल॥ श्रीकृष्णचैतन्याभिन्न श्रीअद्वैत ईश्वर। कतदिन छिला एइ वनेर भितर॥” [अर्थात् “ओहे श्रीनिवास! इस 'प्रस्कन्दन'-क्षेत्रको देखो, यहाँ स्नान करनेसे पाप दूर हो जाते हैं। यहाँ कोई प्राण त्याग करता है, तो उसी समय वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (कालीय ह्रदमें कालीय दमनके समय श्रीकृष्णको जलमें अधिक समय रहनेके कारण सर्दी लग रही थी) तब श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सूर्य बारह कलाओंके साथ ताप देने लगे। उस तापसे श्रीकृष्णके शरीरसे शीत दूर हो गया और देहसे पसीना आने लगा। वह पसीना यमुनासे जाकर मिल गया, इस लिये इसका नाम 'प्रस्कन्दन'-तीर्थ हुआ। श्रीकृष्णचैतन्यसे अभिन्न श्रीअद्वैत प्रभु कुछ दिन तक इस वनके भीतर रहे थे।"] ॥ 71 ॥ द्वादश-आदित्यसे केशीतीर्थमें रासस्थली-दर्शनसे मूर्च्छा :- 'द्वादश-आदित्य' हैते 'केशीतीर्थे' आइला। रासस्थली देखि' प्रेमे मूर्च्छित हइला ॥ 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रस्कन्दनमें स्नान करके 'द्वादश-आदित्य' तीर्थमें आये। वहाँसे वे केशीतीर्थपर आये और जब उन्होंने रासस्थलीको देखा तो वे प्रेमावेशमें मूर्च्छित हो गये ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-'द्वादश-आदित्य'- “द्वादशादित्य-तीर्थाख्यं तीर्थं तदनुपावनम्। तस्य दर्शनमात्रेण नृणामघो विनश्यति ॥” [अर्थात् “द्वादश-आदित्य-तीर्थ तीर्थोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसके दर्शनमात्रसे ही मनुष्यके पापोंका विनाश हो जाता है।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देखह द्वादशादित्य तीर्थ एइखाने॥” [अर्थात् “इस स्थानपर द्वादशादित्य तीर्थको देखो।"] 'केशीतीर्थ'-आदि-वाराहमें- “गङ्गा शतगुणं पुण्यं यत्र केशी निपातितः।” [अर्थात् “जहाँ केशी दैत्यका वध हुआ था (वह केशीतीर्थ) गङ्गासे सैंकड़ों गुणा अधिक पुण्य स्थान है।"] । 149

[ 18/72–81 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “केशीवध कैल कृष्ण परम-कौतुके॥” [अर्थात् “खेल-ही-खेलमें श्रीकृष्णने केशी दैत्यका वध कर दिया था।”] ॥ 72 ॥ सारा दिन प्रेमाविष्ट महाप्रभुकी पागलों जैसी चेष्टाएँ :— चेतन पाञा पुनः गड़ागड़ि याय। हासे, कान्दे, नाचे, पड़े, उच्चैःस्वरे गाय ॥ 73 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब पुनः चेतन हुए, तब वे भूमिपर लोट-पोट खाने लगे। महाप्रभु कभी तो हँसते, कभी रोते, कभी नृत्य करते, तो कभी भूमिपर गिर पड़ते और कभी उच्चस्वरमें गाते ॥ 73 ॥ वहाँसे सन्ध्याके समय अक्रूर-तीर्थमें आकर भोजन :— एइरङ्गे सेइदिन तथा गोङाइला। सन्ध्याकाले ‘अक्रूरे आसि’ भिक्षा निर्वाहिला ॥ 74 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वह दिन महाप्रभुने आनन्दपूर्वक केशीतीर्थमें ही व्यतीत किया। फिर सन्ध्याके समय अक्रूर-तीर्थमें आकर भोजन ग्रहण किया ॥ 74 ॥ प्रातःकालमें चीरघाटमें स्नान, इमलीतलामें विश्राम :— प्राते वृन्दावने कैला ‘चीरघाटे’ स्नान। तेँतुलि-तलाते आसि’ करिला विश्राम ॥ 75 ॥ द्वापरयुगका इमलीका वृक्ष :— कृष्णलीला-कालेर सेइ वृक्ष पुरातन। तार तले पिँड़ि-बान्धा परम-चिक्कण ॥ 76 ॥ उसके निकट ही यमुनाका प्रवाह :— निकटे यमुना बहे शीतल समीर। वृन्दावन-शोभा देखे यमुनार नीर ॥ 77 ॥ इमलीके वृक्षके नीचे बैठकर महाप्रभुका नामसङ्कीर्तन, दोपहरमें अक्रूरतीर्थमें आकर भोजन :— तेँतुल-तले बसि’ करेन नाम-सङ्कीर्त्तन। मध्याह्न करि’ आसि’ करे ‘अक्रूरे’ भोजन ॥ 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अगले दिन प्रातःकाल वृन्दावनमें चीरघाटपर स्नान किया और इमलीतलामें आकर विश्राम किया। श्रीकृष्णलीलाके समयका बहुत प्राचीन वह इमलीका वृक्ष है। उस वृक्षके नीचे बहुत ही चिकना चबूतरा बना हुआ था। उसके निकट ही यमुनाजी बह रही थीं, इसलिये वहाँ शीतल वायु प्रवाहित हो रही थी। महाप्रभु वृन्दावनकी शोभा और यमुनाजीके जलका दर्शन कर रहे थे। इमलीतलापर बैठकर महाप्रभु नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे। महाप्रभुने दोपहरके समय स्नान करनेके बाद अक्रूरतीर्थमें आकर भोजन किया ॥ 75-78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘तेंतुलि-तलाते’—इस स्थानको अब ‘आम्लितला’ कहते हैं ॥ 75 ॥ अक्रूरतीर्थवासियोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये आगमन और महाप्रभुके निर्जन भजनमें संख्या-नाम-कीर्तनमें बाधा :— अक्रूरेर लोक आइसे प्रभुरे देखिते। लोक-भिड़े स्वच्छन्दे नारे ‘कीर्त्तन’ करिते ॥ 79 ॥ अनुवाद—अक्रूरतीर्थमें रहनेवाले लोग महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आते, महाप्रभु लोगोंकी भीड़के कारण शान्तिसे संख्यापूर्वक नामकीर्तन नहीं कर पाते ॥ 79 ॥ महाप्रभुके द्वारा मध्याह्नतक निर्जनमें संख्या-नामकीर्तन :— वृन्दावने आसि’ प्रभु बसिया एकान्त। नामसङ्कीर्त्तन करे मध्याह्न-पर्यन्त ॥ 80 ॥ दोपहरके बाद लोगोंको महाप्रभुके दर्शनका सुयोग और महाप्रभुके द्वारा सभीको नाम-कीर्तनका उपदेश :— तृतीय-प्रहरे लोक पाय दरशन। सबारे उपदेश करे ‘नामसङ्कीर्त्तन’ ॥ 81 ॥ अनुवाद—इसी कारण महाप्रभु वृन्दावनमें आकर एकान्तमें बैठकर दोपहर तक नामसङ्कीर्तन करते। दोपहरके बाद तीसरे पहरमें लोगोंको महाप्रभुके दर्शन होते। महाप्रभु सभीको नामसङ्कीर्तनका उपदेश प्रदान करते ॥ 80–81 ॥ 150 |

अठारहवाँ अध्याय 18/82–92 ] उस समय महाप्रभुके दर्शन करने राजपूत-कृष्णदासका आगमन :– हेनकाले आइल वैष्णव 'कृष्णदास' नाम। राजपुत-जाति, गृहस्थ, यमुना-पारे ग्राम ॥ 82 ॥ 'केशी' स्नान करि' सेइ 'कालीयदह' याइते। आम्लि-तलाय गोसाञिरे देखे आचम्बिते ॥ 83 ॥ अनुवाद—उस समय कृष्णदास नामक एक वैष्णव महाप्रभुके दर्शन करने आये। वे गृहस्थ थे और जातिसे राजपूत थे। यमुनाके पार उनका घर था। केशीघाटपर स्नान करनेके बाद कालीयदहकी ओर जाते समय उन्होंने अचानक इमलीतलामें श्रीचैतन्य महाप्रभुको देखा ॥ 82–83 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे कृष्णदासको चमत्कार :– प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हइल चमत्कार। प्रेमावेशे प्रभुरे करेन नमस्कार ॥ 84 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके सौन्दर्य और प्रेमको देखकर कृष्णदास आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने प्रेमावेशमें महाप्रभुको नमस्कार किया ॥ 84 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसके परिचयकी जिज्ञासा और कृष्णदासके द्वारा दीनतापूर्वक अपना परिचय देना :– प्रभु कहे,—“के तुमि, काँहा तोमार घर?” कृष्णदास कहे,—“मुञि गृहस्थ पामर ॥ 85 ॥ राजपूत-जाति मुञि, ओ-पारे मोर घर। मोर इच्छा हय,—हङ वैष्णव-किङ्कर ॥ 86 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे अपने स्वप्नके दर्शनकी सफलताका वर्णन :– किन्तु आजि एक मुञि 'स्वप्न' देखिनु। सेइ स्वप्न परतेक तोमा आसिं पाइनु ॥” 87 ॥ महाप्रभुकी उसपर कृपा, कृष्णदासका प्रेम :– प्रभु ताँरे कृपा कैला आलिङ्गन करि'। प्रेमे मत्त हैल सेइ, नाचे, बोले 'हरि' ॥ 88 ॥ महाप्रभुके साथ आकर महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :– प्रभु-सङ्गे मध्याह्ने अक्रूर-तीर्थे आइला। प्रभुर अवशिष्ट पात्र-प्रसाद पाइला ॥ 89 ॥ तबसे कृष्णदास महाप्रभुके कमण्डलको वहन करनेवाला और नित्यसङ्गी हो गया :– प्राते प्रभुसङ्गे आइला जलपात्र लञा। प्रभु-सङ्गे रहे गृह-स्त्री-पुत्र छाड़िया ॥ 90 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनसे पूछा,—“आप कौन हैं? आपका घर कहाँ है?” कृष्णदासने कहा,—“मैं एक अधम गृहस्थ हूँ। मैं जातिसे राजपूत हूँ और यमुनाके उस पार मेरा घर है। मेरी इच्छा होती है कि मैं किसी वैष्णवका दास बनूँ। आज मैंने एक स्वप्न देखा था। उस स्वप्नके अनुसार मैं यहाँ आया और आप मुझे साक्षात् मिले।” महाप्रभुने उन्हें आलिङ्गन करके उनपर कृपा की। कृष्णदास प्रेममें मत्त होकर नृत्य करते हुए 'हरि' बोलते कीर्तन करने लगे। कृष्णदास दोपहरके समय महाप्रभुके साथ अक्रूरतीर्थमें आ गये और उन्होंने महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको ग्रहण किया। अगले दिन प्रातःकाल कृष्णदास महाप्रभुके साथ उनके जलके पात्रको उठाकर वृन्दावन आ गये। तबसे वे अपने घर-पत्नी-पुत्रको छोड़कर महाप्रभुके साथ रहने लगे ॥ 85–90 ॥ अनुभाष्य—'परतेक'—'प्रत्यक्ष', 'साक्षात्' ॥ 87 ॥ वृन्दावनमें श्रीकृष्णके प्रकट होनेका लोगोंका शोर :– वृन्दावने पुनः 'कृष्ण' प्रकट हइल। याँहा ताँहा लोक सब कहिते लागिल ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभु कहीं भी जाते, सभी लोग यही बात कहते कि श्रीकृष्ण वृन्दावनमें पुनः प्रकट हुए हैं ॥ 91 ॥ एकदिन वृन्दावनसे बहुतसे लोगोंका महाप्रभुके निकट आगमन :– एकदिन अक्रूरेते लोक प्रातःकाले। वृन्दावन हैते आइसे करि कोलाहले ॥ 92 ॥ । 151

[ 18/92-101 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-बहुतसे लोग एकदिन प्रातःकाल वृन्दावनसे जाते और सभी आकर कहते,-'हमें श्रीकृष्णके दर्शन अक्रूरतीर्थपर आकर बहुत अधिक कोलाहल करने हुए हैं।'॥96॥ लगे॥92॥ सरस्वतीके द्वारा इन वचनोंकी सत्यताका स्थापन :- महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु-आगे कहे लोक,-'श्रीकृष्ण देखिल।' प्रभु देखि' करिल लोक चरण वन्दन। 'सरस्वती' एइ वाक्ये 'सत्य' कहाइल॥97॥ प्रभु कहे,-"काँहा हैते करिला आगमन?"॥93॥ अनुवाद-लोग महाप्रभुके आगे आकर कहते,- अनुवाद-महाप्रभुको देखकर उन लोगोंने उनके 'हमने श्रीकृष्णको देखा है।' 'सरस्वती देवी' उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। महाप्रभुने उनसे पूछा,- मुखसे यह सत्य वचन ही कहलवातीं॥97॥ "आप लोग कहाँसे आये हैं?"॥93॥ महाप्रभुके दर्शनसे ही लोगोंके श्रीकृष्णदर्शन 'सत्य' लोगोंके द्वारा श्रीकृष्णके प्रकट होनेका शोर; होनेपर भी वास्तवमें उनका वर्णन मूर्ख लोगोंका विवर्त्तभ्रम :- और उद्देश्य-विवर्त्तके आश्रित :- लोके कहे,-"कृष्ण प्रकट कालीयदहेर जले! महाप्रभु देखि' 'सत्य' कृष्ण-दरशन। कालीय-शिरे नृत्य करे, फणि-रत्न ज्वले॥"94॥ निज-ज्ञाने सत्य छाड़ि' 'असत्ये सत्य भ्रम'॥98॥ अनुवाद-लोगोंने कहा,-"कालीयदहके जलमें अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुका दर्शन करके सत्य ही श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं! श्रीकृष्ण कालीयके सिरपर नृत्य उन्होंने श्रीकृष्णका दर्शन किया। किन्तु अपने ज्ञानके करते हैं तथा कालीयके फणोंमें स्थित मणियाँ चमकती द्वारा उन्होंने सत्यको छोड़कर असत्य वस्तुको ही सत्य हैं॥"94॥ (श्रीकृष्ण) समझा॥98॥ महाप्रभुका दर्शन ही श्रीकृष्ण-दर्शन; सरलबुद्धिवाले भट्टका विवर्त्त-भ्रम :- तथापि महाप्रभुका कौतुक-हास्य :- भट्टाचार्य तबे कहे प्रभुर चरणे। साक्षात् देखिल लोक-नाहिक संशय। "आज्ञा देह', याइ' करि कृष्ण-दरशने!"॥99॥ शुनि' हासि' कहे प्रभु,-सब 'सत्य' हय॥95॥ अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणकमलोंमें अनुवाद-(महाप्रभुके दर्शनसे) लोगोंने अपनी निवेदन करते हुए कहा,-"आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आँखोंसे श्रीकृष्णको देखा है, इसमें संशयकी कोई बात भी जाकर श्रीकृष्णका दर्शन करूँ॥"99॥ नहीं है। उनकी बात सुनकर मुस्कराते हुए महाप्रभुने महाप्रभुके द्वारा उसके भ्रमको दूर करना :- कहा,-सब कुछ 'सत्य' है॥95॥ तबे ताँरे कहे प्रभु चापड़ मारिया। तीन दिन तक सभीके द्वारा श्रीकृष्णके "मूर्खेर वाक्ये 'मूर्ख' हैला पण्डित हञा॥100॥ दर्शन होनेका वर्णन :- स्वयं श्रीकृष्ण होनेपर भी भट्टसे आत्म-गोपन, फिर भी एइमत तिन रात्रि लोकेर गमन। सरल बुद्धि भट्टका विवर्त्तके मुखसे उद्धार :- सबे आसि' कहे,-'कृष्ण पाइलूँ दरशन॥'96॥ कृष्ण केने दरशन दिबेन कलिक़ाले? अनुवाद-इस प्रकार तीन रात तक लोग कालीय-ह्रद निज-भ्रमे मूर्ख लोक करे कोलाहले॥101॥ 152 ।

अठारहवाँ अध्याय [ 18/100-110 ] माया-मुग्धकी अचिद्में चिद्बुद्धि अथवा चिद्का आरोप करनेवाले मूर्ख विवर्त्तवादी ही 'पागल' :- 'वातुल' ना हइओ, घरे बहुत बसिया। 'कृष्ण' दरशन करिह कालि रात्र्ये याञा ॥" 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करते हुए उसे थप्पड़ मारकर कहा,—“पण्डित होकर भी मूर्खोंकी बातें सुनकर तुम भी मूर्ख बन गये। श्रीकृष्ण कलियुगमें दर्शन क्यों देंगे ? अपने भ्रमके कारण ही मूर्ख लोग शोर मचाते हैं। पागल मत बनो, घरपर ही बैठे रहो। कल रातको जाकर श्रीकृष्णके दर्शन करना ॥” 100-102 ॥ प्रातःकालमें वहाँ आये शिष्ट लोगोंसे श्रीकृष्णके दर्शनके विषयमें पूछना :- प्रातःकाले भव्य-लोक प्रभु-स्थाने आइला। “कृष्ण देखि' आइला?”-प्रभु ताँहारे पुछिला ॥ 103 ॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकाल कुछ सभ्य लोग महाप्रभुके पास आये। महाप्रभुने उनसे पूछा, —“क्या आप लोग श्रीकृष्णके दर्शन करके आये हैं?” ॥ 103 ॥ उन लोगोंके द्वारा वास्तविक बात बतलाना :- लोक कहे,—“रात्र्ये कैवर्त्य नौकाते चड़िया। कालीयदहे मत्स्य मारे, देउटी ज्वालिया ॥ 104 ॥ दूर हैते ताहा देखि' लोकेर हय भ्रम। 'कालीयेर शरीरे कृष्ण करिछे नर्त्तन ॥' 105 ॥ मूर्ख लोगोंकी विपरीत बुद्धि :- नौकाते कालीय-ज्ञान, दीपे रत्न-ज्ञाने! जालियारे मूढ़-लोक 'कृष्ण' करि' माने ! !” ॥ 106 ॥ अनुवाद—उन लोगोंने कहा,—“रातके समय मछुवारा नौकामें बैठकर लालटेन जलाकर कालीयदहपर मछलियोंको पकड़ता है। दूरसे उसीको देखकर लोगोंको भ्रम होता है कि कालीयके सिरके ऊपर श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। नौकाको कालीय, दीपकको मणि तथा मछुवारेको मूर्ख लोग श्रीकृष्ण मानते हैं!” ॥ 104-106 ॥ पक्षान्तरमें लोगोंके शोर और लोगोंके श्रीकृष्ण-दर्शनकी क्रियाकी भी सत्यता :- वृन्दावने 'कृष्ण' आइला,—सेह 'सत्य' हय। कृष्णरे देखिल लोक,—इहा 'मिथ्या' नय ॥ 107 ॥ किन्तु वास्तवमें प्रतीतिकी विचित्रतामें ही विपरीत भ्रमका उदय :- किन्तु काहाँ 'कृष्ण' देखे, काहाँ 'भ्रम' माने। स्थाणु-पुरुषे यैछे विपरीत-ज्ञाने ॥ 108 ॥ अनुवाद—[श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं कि] वृन्दावनमें 'श्रीकृष्ण' आये हैं,—यह 'सत्य' ही है। लोगोंने श्रीकृष्णको देखा है,—यह बात भी 'मिथ्या' नहीं है। किन्तु उन्होंने जहाँ श्रीकृष्णके दर्शन किये हैं, वही उनकी भूल है। कभी ठूंठको देखकर जैसे उसे मनुष्य समझ लिया जाता है, उसी प्रकार लोगोंको भी भ्रम हुआ है ॥ 107-108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'स्थाणु'—पत्तोंके बिना सूखा वृक्ष। कुछ दूरसे पत्तोंसे रहित वृक्षको देखकर 'एक पुरुष आ रहा है' ऐसा विपरीत ज्ञान होता है। व्रजवासियोंका भी उसी प्रकार मछुवारेकी नौकाको कालीय समझनेका, उसके ऊपर लगे हुए दीपकको रत्न समझनेका तथा मछली पकड़नेवाले मछुवारेको श्रीकृष्ण समझनेका 'भ्रम' उदित हुआ था ॥ 108 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके दर्शनकी प्राप्तिके संवादकी जिज्ञासा; महाप्रभुके दर्शनसे सुकृति-प्राप्त लोगोंकी उनके प्रति श्रीनारायण-बुद्धि :- प्रभु कहे,—“काँहा पाइला 'कृष्ण-दरशन' ?” लोक कहे,—“संन्यासी तुमि जङ्गम-नारायण ॥ 109 ॥ वृन्दावने हइला तुमि कृष्ण-अवतार। तोमा देखि' सर्वलोक हइल निस्तार ॥” 110 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“आपको श्रीकृष्णके दर्शन कहाँपर हुए?” लोगोंने कहा,—“संन्यासी होनेके कारण आप ही चलते-फिरते श्रीनारायण (जङ्गम-श्रीनारायण) । 153

[ 18/109-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

हैं। आप ही वृन्दावनमें श्रीकृष्णके अवतार हैं। आपको देखकर सभी लोगोंकी मुक्ति हो गयी है॥" 109-110 ॥

अनुभाष्य- 'जङ्गम-नारायण'- चलनेकी शक्तिसे युक्त नारायण; "दण्डग्रहण-मात्रेण नरो नारायणो भवेत्" [संन्यास दण्ड ग्रहण करने मात्रसे मनुष्य श्रीनारायण हो जाता है]। दण्डधारियोंको केवलाद्वैतमायावादी लोग "ॐ नमो नारायणाय" कहकर बातचीत करते हैं। किन्तु जीव,-मुक्त और बद्ध, सभी अवस्थाओंमें ही मायाधीश परमेश्वर श्रीनारायणके 'नित्य-अधीन' हैं और कभी भी उन्हें श्रीनारायण कहकर नहीं बुलाया जा सकता। जो जीवको विष्णुके साथ समान या एक कहते हैं अथवा वैसा समझते हैं, वे मायावादी [विष्णुके चरणोंमें] अपराधी हैं॥ 109 ॥

महाप्रभुकी लोकशिक्षा,-जीव 'श्रीकृष्ण' नहीं है, इसलिये जीवको श्रीकृष्ण समझना निषिद्ध है :- प्रभु कहे, —" 'विष्णु', 'विष्णु' इहा ना कहिबा ! जीवधमे 'कृष्ण'-ज्ञान कभु ना करिबा ! ! 111 ॥

जीव और श्रीकृष्णमें भेद-वर्णन :- संन्यासी-चित्कण जीव, किरण-कण-सम। षडैश्वर्यपूर्ण कृष्ण हय सूर्योपम ॥ 112 ॥ जीव, ईश्वर-तत्त्व-कभु নহে 'सम'। ज्वलदग्निराशि यैछे स्फुलिङ्गेर 'कण' ॥ 113 ॥

अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - " 'विष्णु'! 'विष्णु'! ऐसा मत कहिये ! अधम जीवको कभी भी श्रीकृष्ण मत समझना ! संन्यासी भी एक चित्कण जीव है। षडैश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्ण सूर्यके समान हैं और जीव उनकी किरणके कणके समान है। जीव और ईश्वर-तत्त्व कभी भी एक समान नहीं हो सकते। जैसे जलती हुई अग्नि और उसकी चिङ्गारीका कण एक समान नहीं हो सकते ॥ 111-113 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-मायावादी संन्यासी स्वयंको 'ब्रह्म' कहकर, मुखसे 'नारायण' 'नारायण' कहते हैं। स्मार्ट्प्रथामें गृहस्थ-ब्राह्मणादि सभी उस संन्यासीको देखनेपर उसे 'श्रीनारायण' मानकर प्रणाम करते हैं। इस भ्रम-प्रथाको रोकनेके लिये महाप्रभुने कहा, संन्यासी जीवके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं; वे कभी भी षडैश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्णरूपी सूर्यके समान नहीं हो सकते। वे चित्कण-मात्र हैं, इसलिये, जीव श्रीकृष्णरूपी सूर्यकी किरण-कणके समान हैं; उनको कभी भी 'श्रीनारायण' कहकर प्रणाम करना उचित नहीं है॥ 112 ॥

अनुभाष्य-आदिलीला 2/96 संख्या देखें ॥ 111-113 ॥

श्रीकृष्ण-'ईश्वर', जीव-उनके 'वशीभूत' :- भगवत्सन्दर्भमें उद्धृत सर्वज्ञसूक्त-वाक्य अथवा भाः 1/7/6 श्लोककी टीकामें श्रीधर स्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीविष्णुस्वामि-वाक्य :- ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः । स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः ॥ 114 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 114 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-ईश्वर-सदैव सच्चिदानन्द और 'ह्लादिनी' एवं 'सम्वित्'-शक्तिके द्वारा आश्लिष्ट (आलिङ्गित) हैं; किन्तु जीव सर्वदा ही अपनी (आरोपित) अविद्याके द्वारा पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह सब प्रकारके क्लेशोंका उद्गम-स्थल है॥ 114 ॥

अनुभाष्य- ईश्वरः (श्रीकृष्णः) सच्चिदानन्दः (सन्धिनीसम्वित्- ह्लादिनी-शक्तिमान्) ह्लादिन्या (यया खलु भगवान् स्वरूपानन्दविशेषी भवति, ययैव तं तमानन्दमन्यानप्यनुभावयति, सा ह्लादिनी शक्तिः तया) संविदा (अद्वयज्ञानस्वरूपभूतया चिच्छक्त्या) आश्लिष्टः (आलिङ्गितः); जीवः तु स्वाविद्यासंवृतः (स्वस्य आत्मनः भगवतः बद्धजीवमोहिन्या अविद्यया मायया शक्त्या सम्यक् आवृतः सन्) संक्लेशनिकराकरः (संक्लेशाः तु त्रिविधाः- "क्लेशास्तु पापं तद्बीजमविद्या चेति ते त्रिधा" इति न्यायात्, तेषां निकरस्य पुञ्जस्य आकरः खनिः)।

श्लोक-भावानुवाद-सन्धिनी-सम्वित्-ह्लादिनी-शक्तिमान् श्रीकृष्ण अपनी स्वरूपशक्तिकी विशेष वृत्ति आनन्दस्वरूपा 'ह्लादिनी' जो उन्हें आनन्द प्रदान करती है और

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अठारहवाँ अध्याय 18/114-116 ] 'सम्बित्' जो उनकी अद्वयज्ञानस्वरूपभूता शक्ति है, इन दोनोंके द्वारा सदैव आलिङ्गित रहते हैं। किन्तु जीव सदा अपनी (आरोपित) भगवान्‌की जीवको बाँधनेवाली अविद्यारूपी मायासे पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह तीन प्रकारके क्लेशों (पाप, बीज और अविद्या) की निधिकी खान है॥114॥ जीव और श्रीनारायणको समान समझना ही पाखण्ड :– येइ मूढ़ कहे,–जीव ईश्वर हय 'सम'। सेइत 'पाषण्डी' हय, दण्डे तारे यम॥' 115 ॥ अनुवाद—जो मूर्ख कहता है,–जीव और ईश्वर एक समान हैं, वह पाखण्डी है और यमराजके दण्डका भागी बन जाता है॥'115॥ अनुभाष्य—'पाषण्डी'—आदिलीला 3/78 संख्या देखें। मायावश जीवके अथवा मायिक जड़वस्तुके साथ मायाधीश शुद्धसत्त्व चेतन-विग्रह श्रीविष्णुको 'एक' अथवा समान माननेवाला 'पाखण्डी' है। श्रीभक्तिसन्दर्भके (255 संख्या)—'नामापराध-वर्णन-प्रसङ्ग'में एक अपराध 'श्रुति-शास्त्रनिन्दा'के वर्णनमें— “यथा पाषण्डमार्गेण दत्तात्रेयर्षभदेवोपासकानां पाषाण्डिनाम्” [अर्थात् “दत्तात्रेय और ऋषभदेवके पाखण्डी उपासक- गण पाखण्डमार्गके अनुसार वेदादि शास्त्रनिन्दक हैं।"] पुनः अन्य एक अपराध 'अहं-मम-बुद्धि' अथवा 'देहात्मबुद्धि'के वर्णनमें— “देह-द्रविणादि-निमित्तक-'पाषण्ड'-शब्देन च दशापराधा एव लक्ष्यन्ते, पाषण्डमयत्वात् तेषाम्” [अर्थात् “पुनः, 'मैं और मेराकी बुद्धि'के वर्णनमें— 'नामैकं यस्य वाचि'—श्लोकमें देह-धनादि निमित्त 'पाखण्ड'-शब्दके द्वारा भी दसों नामापराध लक्षित हुए हैं, क्योंकि ये समस्त अपराध ही पाखण्डमय हैं।"] पुनः (223 संख्यामें)— “उद्दिश्य देवता एव जुहोति च ददाति च। स पाषण्डीति विज्ञेयः स्वतन्त्रो वापि कर्मसु॥' इति पाषण्डित्वञ्च वैष्णव-मार्गाद्भ्रष्टत्वमित्यर्थः।” [अर्थात् “जो व्यक्ति दूसरे देवताओंके उद्देश्यसे ही दान और होमादि करता है, उसको पाखण्डी अथवा कर्मविषयमें स्वेच्छाचारी समझना चाहिये। इसलिये 'पाखण्ड' वैष्णवमार्गसे भ्रष्ट होना है।"] पुनः (179 संख्या)में “विष्णुधर्म-ग्रन्थमें विष्णुभक्त उपरिचर-वसुके द्वारा पाखण्डी असुरोंके उद्धार करनेके वृत्तान्तका उल्लेख करते हुए कहा गया है—दैत्यगुरु शुक्राचार्यके आदेशसे दैत्य उपरिचर-वसुको पाखण्ड मार्गका उपदेश करने लगे। परन्तु ऐसा करनेपर भी दैत्यगण उनकी कृपासे भगवद्भक्त बन गये। पुनः (153 संख्यामें) हरिनााममें अर्थवाद तथा वैष्णव-अपराधके वर्णनमें— “तादृशापराधे भक्तिस्तम्भश्च श्रूयते। ×× देहादिलोभार्थं ये पाषण्डा गुर्ववज्ञादिदशापराधयुक्ताः” [अर्थात् “इस प्रकारके अपराधोंके कारण भक्ति स्तम्भित हो जाती है—ऐसा शास्त्रोंमें सुना जाता है। देह-सम्पत्तिके लोभके उद्देश्यसे नाम ग्रहण करनेका पाखण्ड करनेवाले और गुरु-अवज्ञादि दस नामापराध युक्त व्यक्तियोंको श्रीनाम-कीर्तनका फल बहुत देरसे प्राप्त होता है।"] इस प्रकार अनेक स्थानोंपर 'पाखण्ड' शब्दका उपयोग हुआ है। भाः 4/2/28, 30, 32, 5/6/9 एवं 12/2/13, 43 आदि बहुतसे श्लोकोंमें पाखण्डियोंके पाखण्डका वर्णन है॥115॥ शास्त्र-प्रमाण :— वैष्णवतन्त्र-वाक्य, पाद्मोत्तर-खण्ड (23/12)में और हरिभक्तिविलास (1/73)में – यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः। समतवेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम्॥116॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥116॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं॥116॥ । 155

[ 18/116-123 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— यः (भाग्यहीनो जनः) तु (गर्हणार्थे) देवं नारायणं (ब्रह्मरुद्रोपास्यं तयोरीश्वरं भगवन्तं विष्णुं) ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः (चतुर्मुख-पञ्चमुखादि- नारायणदासभूतैः देवैः जीवरूपैः सह) समत्वेन (नित्यप्रभुणा सह देवाख्यनित्यदासैः समानतया) वीक्षेत (पश्येत्) सः ध्रुवं (निश्चितम् एव) 'पाषण्डी' भवेत्—“अर्च्ये विष्णौ शिलाधीर्गुरुषु नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धिर्विष्णोर्वा वैष्णवानां कलिमलमथने पादतीर्थेऽम्बु बुद्धिः। श्रीविष्णोर्नाम्नि मन्त्रे सकल-कलुषहे शब्द- सामान्यबुद्धिर्विष्णौ सर्वेश्व रेशे तदितरसमधीर्यस्य वा नारकी सः।” इति पद्मपुराणवचनात्। श्लोक-भावानुवाद—जो [निन्दाके अर्थमें-] भाग्यहीन लोग ब्रह्म-रुद्रके उपास्य और उनके अधीश्वर भगवान् विष्णुको जीवरूप चतुर्मुख-पञ्चमुखादि नारायणदास देवताओंके साथ समान अर्थात् नित्यप्रभुके साथ उनके नित्यदास देवोंको समान देखता है, वह निश्चित ही 'पाखण्डी' होता है। पद्मपुराणवचन,—“जो व्यक्ति श्रीमूर्तिमें शिला बुद्धि, वैष्णव और गुरुदेवमें मरणशील मानव बुद्धि, वैष्णवोंमें जाति बुद्धि, विष्णु और वैष्णवोंके चरण धौतजलमें जल बुद्धि तथा सर्वपाप नाशक विष्णूनाम, मन्त्रमें सामान्य शब्द बुद्धि एवं सर्वेश्वर विष्णुको अन्य देवताओंके साथ समान बुद्धि रखता है, वह नारकीय है।”॥ 116॥ लोगोंका महाप्रभुके 'श्रीकृष्ण' होनेका दृढ़ विश्वास और स्तुति :- लोक कहे,—“तोमाते कभु नहे ‘जीव’-मति। कृष्णेर सदृश तोमार आकृति-प्रकृति ॥ 117 ॥ ‘आकृत्ये’ तोमारे देखि' ‘व्रजेन्द्रनन्दन’। देहकान्ति पीताम्बर कैल आच्छादन ॥ 118 ॥ प्रियभक्तोंके सामने भगवद्-स्वरूपका स्वतःप्रकाश :- मृगमद वस्त्रे बान्धे, तबु ना लुकाय। ‘ईश्वर-स्वभाव’ तोमार ढाका नाहि याय ॥ 119 ॥ अनुवाद—लोगोंने कहा,—“आपको कोई भी 'जीव' नहीं मान सकता, क्योंकि आपकी आकृति तथा प्रकृति सभी प्रकारसे श्रीकृष्णके समान ही है। यद्यपि पीतवर्णने आपकी अपनी उस श्यामल कान्तिको ढक रखा है, तथापि 'आकृति'से हम आपको साक्षात् 'व्रजेन्द्रनन्दन' ही देख रहे हैं। जैसे कस्तूरीको वस्त्रमें बाँधकर रखनेपर भी उसकी गन्धको छिपाया नहीं जा सकता, वैसे ही आपका 'ईश्वर-स्वभाव' छिपानेपर भी छिपाया नहीं जा सकता॥ 117-119 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/85-89 संख्या देखें। जिस प्रकार कस्तूरीके वस्त्रमें बँधे होनेपर भी उसकी गन्ध सभी दिशाओंमें फैल जाती है, उसी प्रकार आपके द्वारा भक्तजीवरूपी आवरणसे अपनेको गोपन करनेपर भी आपका भगवत् स्वभाव छिपता नहीं है॥ 119 ॥ अधोक्षज होनेपर भी जगत्के आकर्षक :- अलौकिक ‘प्रकृति’ तोमार—बुद्धि-अगोचर। तोमा देखि' कृष्णप्रेमे जगत् पागल ॥ 120 ॥ अनुवाद—आपकी अलौकिक 'प्रकृति' हमारी बुद्धिके अगोचर है। आपका दर्शन करके समस्त जगत् श्रीकृष्णप्रेममें पागल हो रहा है॥ 120 ॥ भगवद्दर्शन अथवा शुद्धनाम-श्रवणमात्रसे बालक-वृद्ध-स्त्री, यहाँ तक कि अन्त्यज्य भी 'आचार्य' बनकर जगत्का उद्धार करनेमें समर्थ :- स्त्री-बाल-वृद्ध, आर ‘चण्डाल’, ‘यवन’। येइ तोमार एकबार पाय दरशन ॥ 121 ॥ कृष्णनाम लय, नाचे हञा उन्मत्त। आचार्य हइल सेइ, तारिल जगत ॥ 122 ॥ अनुवाद—स्त्री, बालक, वृद्ध और यहाँ तक कि 'चण्डाल' और 'यवन'—जो कोई एकबार भी आपका दर्शन करता है, वह श्रीकृष्ण नामका कीर्तन करता है, उन्मत्त होकर नृत्य करता है तथा आचार्य बनकर जगत्का उद्धार करता है॥ 121-122 ॥ दर्शनेर कार्य आछुक, ये तोमार ‘नाम’ शुने। सेइ कृष्णप्रेमे मत्त, तारे त्रिभुवने ॥ 123 ॥ 156 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/123-130 ] तोमार नाम शुनि' हय श्वपच 'पावन'। अलौकिक शक्ति तोमार ना याय कथन ॥ 124 ॥ अनुवाद-दर्शनकी तो बात दूर रहे, जो कोई आपका 'नाम' भी सुनता है, वही श्रीकृष्णप्रेममें मत्त होकर त्रिभुवनको तार देता है। आपके नामको सुनकर कुत्तेके माँसको खानेवाला भी 'पवित्र' हो जाता है। आपकी अलौकिक शक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 123-124 ॥ श्रीमद्भागवत (3/33/6) में :- यन्नामधेय-श्रवणानुकीर्त्तनाद्- यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥ 125 ॥ अनुवाद-हे भगवन्, जिनके नाम श्रवण, अनुकीर्तन, प्रणाम और स्मरण करने मात्रसे चण्डाल और यवन कुलमें जन्मा व्यक्ति भी तत्क्षणात् सवन-यज्ञ (सोमयज्ञ) करनेके योग्य हो जाता है, ऐसे वे प्रभु आप हैं, आपके दर्शनसे क्या नहीं हो सकता ? ॥ 125 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 16/186 संख्या देखें ॥ 125 ॥ उक्त समस्त ही महाप्रभुके 'तटस्थ' लक्षण, स्वरूपतः महाप्रभु-साक्षात् स्वयंरूप श्रीकृष्ण :- एइत' महिमा-तोमार 'तटस्थ'-लक्षण। 'स्वरूप'-लक्षणे तुमि-व्रजेन्द्रनन्दन ॥"126 ॥ अनुवाद-यह महिमा तो आपका 'तटस्थ'-लक्षण है, 'स्वरूप'-लक्षण तो आपका व्रजेन्द्रनन्दन होना है॥"126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्य वस्तुके साथ तुलना नहीं करके जिन 'स्वतःसिद्ध-लक्षणों'से वस्तु परिचित होती है, वही उसके 'स्वरूप'-लक्षण हैं। अन्य वस्तुके साथ तुलना करके जिन लक्षणोंसे वस्तुका अपना परिचय साधित होता है, उन लक्षणोंको 'तटस्थ' कहते हैं। पूर्वोक्त महिमासमूहने तटस्थ लक्षणके रूपमें ही आपको 'व्रजेन्द्रनन्दन' कहकर स्थिर किया है। पुनः आपको देखनेमात्रसे ही 'व्रजेन्द्रनन्दन'के रूपमें जो बोध उदित होता है, यही आपका 'स्वरूप'-लक्षण है; स्वरूप-लक्षणके द्वारा ही आपको 'श्रीकृष्ण' कहकर स्थिर किया है॥ 126 ॥ सभीपर ही महाप्रभुकी कृपा; उनका अपने घर जाना :- सेइ सब लोके प्रभु प्रसाद करिल। कृष्णप्रेमे मत्त लोक निज घरे गेल ॥ 127 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उन सब लोगोंपर कृपा की। वे लोग श्रीकृष्णप्रेममें मत्त हो गये और अन्तमें अपने घरोंमें लौट गये ॥ 127 ॥ अक्रूरतीर्थमें रहकर लोगोंका उद्धार :- एइमत कतदिन 'अक्रूरे' रहिला। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥ 128 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कुछ दिन तक अक्रूरतीर्थमें रहे। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-नाम और प्रेम प्रदान करके लोगोंका उद्धार किया ॥ 128 ॥ सनोड़िया-विप्रका मथुरामें सभी सज्जनोंको ही महाप्रभुकी सेवाका सुयोग प्रदान करके उनका उद्धार करना :- माधवपुरीर शिष्य सेइत' ब्राह्मण। मथुरार घरे-घरे करा'न निमन्त्रण ॥ 129 ॥ मथुरार यत लोक ब्राह्मण-सज्जन। भट्टाचार्य-स्थाने आसि' करे निमन्त्रण ॥ 130 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य वे सनोड़िया ब्राह्मण मथुराके घर-घरमें जाकर उन्हें महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके लिये उत्साहित कर रहे थे। मथुराके जितने भी सज्जन ब्राह्मण थे, वे सभी बलभद्र भट्टाचार्यके पास आकर महाप्रभुके लिये निमन्त्रण देने लगे ॥ 129-130 ॥ अनुभाष्य-'सेइत' ब्राह्मण'-सनोड़िया (मध्यलीला 17/179 संख्या देखें) ॥ 129 ॥ । 157

[ 18/131-138 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एकसाथ बहुतसे व्यक्तियोंके द्वारा निमन्त्रण करनेपर भी, भट्टके द्वारा एक-एक व्यक्तिका ही निमन्त्रण-स्वीकार :- एकदिन 'दश' 'बिश' आइसे निमन्त्रण। भट्टाचार्य एकेर मात्र करेन ग्रहण ॥ 131 ॥ अनुवाद-एक ही दिनमें दस-बीस निमन्त्रण आने लगे, परन्तु बलभद्र भट्टाचार्य केवल किसी एकके ही निमन्त्रणको स्वीकार करते ॥ 131 ॥ सभीके द्वारा एक ही साथ महाप्रभुको भिक्षा देनेकी इच्छा करनेके कारण लोगोंके लिये महाप्रभुकी सेवाके अवसरका अभाव :- अवसर ना पाय लोक निमन्त्रण दिते। सेइ विप्र साधे लोक निमन्त्रण निते ॥ 132 ॥ अनुवाद-क्योंकि सभी लोगोंको महाप्रभुको निमन्त्रण करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं हो रहा था, इसलिये वे सनोड़िया ब्राह्मणसे ही निवेदन करते कि महाप्रभु उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लें ॥ 132 ॥ वैदिक सद्ब्राह्मणोंका दीनतापूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण :- कान्यकुब्ज-दाक्षिणात्येर वैदिक ब्राह्मण। दैन्य करि', करे, महाप्रभुर निमन्त्रण ॥ 133 ॥ अक्रूरतीर्थमें आकर स्वयं ही रसोई बनाकर महाप्रभुको भिक्षा-दान :- प्रातःकाले अक्रूरे आसि' रन्धन करिया। प्रभुरे भिक्षा देन शालग्रामे समर्पिया ॥ 134 ॥ अनुवाद-कान्यकुब्ज, दक्षिण-भारत आदि स्थानोंके वैदिक ब्राह्मणोंने अत्यधिक दीनतापूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। वे ब्राह्मण प्रातःकालमें अक्रूरतीर्थ आकर रसोई बनाते और शालग्रामको भोग समर्पित करके उसे महाप्रभुको समर्पित करते ॥ 133-134 ॥ अनुभाष्य-'कान्यकुब्ज', 'सारस्वत', 'गौड़', 'मैथिल' और 'उत्कल' - ये पाँच गौड़-ब्राह्मण एवं 'आन्ध्र', 'कर्णाट', 'गुर्जर', 'द्राविड़' और 'महाराष्ट्र दक्षिण-भारतके ब्राह्मण, - इन दस प्रकारके वैदिक शुद्ध ब्राह्मण, जो वैदिक आचारका पूर्णरूपसे पालन करते थे अर्थात् तान्त्रिक-दुराचारके द्वारा जिन्होंने अपने वैदिक अनुष्ठानका त्याग नहीं किया, सभीने दैन्यपूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण किया था ॥ 133 ॥ महाप्रभुके द्वारा अक्रूर घाटपर बैठकर ऐश्वर्य-पूजक अक्रूरके और माधुर्य-सेवक व्रजवासियोंके अपने-अपने अधिकारसे धाम दर्शनका विचार :- एकदिन सेइ अक्रूर-घाटेर उपरे। बसि' महाप्रभु किछु करेन विचारे ॥ 135 ॥ 'एइ घाटे अक्रूर वैकुण्ठ देखिल। व्रजवासी लोक 'गोलोक' दर्शन कैल ॥' 136 ॥ अनुवाद-एकदिन उस अक्रूर घाटपर बैठकर महाप्रभु कुछ विचार कर रहे थे, - 'इसी घाटपर अक्रूरने वैकुण्ठका दर्शन किया था और यहींपर व्रजवासी लोगोंने 'गोलोक'का दर्शन किया था ॥ 135-136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अक्रूरघाट'- वृन्दावन और मथुराके बीचमें आधे रास्तेपर यह घाट है। यहाँ रथको खड़ा करके अक्रूरने श्रीबलराम-कृष्णको साथ लेकर यमुना-स्नान किया था। स्नानके समय अक्रूरने जलमें 'वैकुण्ठ'का दर्शन किया था एवं व्रजवासी लोगोंने उस घाटके जलमें गोलोकका दर्शन किया था ॥ 135 ॥ महाप्रभुके द्वारा जलमें कूदना और डूबना :- एत बलि' झाँप दिला जलेर उपरे। डुबिया रहिला प्रभु जलेर भितरे ॥ 137 ॥ अनुवाद-अक्रूर कैसे जलमें रहे, यह विचार करते हुए महाप्रभुने जलमें छलाँग लगा दी और वे जलके अन्दर ही डूबे रहे ॥ 137 ॥ कृष्णदासके रोने-चिल्लानेको सुनकर भट्टके द्वारा उसी समय आकर महाप्रभुको निकालना :- देखि' कृष्णदास कान्दि' फुकार करिल। भट्टाचार्य शीघ्र आसि' प्रभुरे उठाइल ॥ 138 ॥ 158 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/138-147 ] अनुवाद-ऐसा देखकर कृष्णदास रोते-रोते बहुत जोरसे सहायताके लिये पुकारने लगे। बलभद्र भट्टाचार्यने जल्दीसे आकर महाप्रभुको बाहर निकाला ॥ 138 ॥ भट्ट और ब्राह्मणका परामर्श :- तबे भट्टाचार्य सेइ ब्राह्मणे लञा। युक्ति करिला किछु निभृते बसिया ॥ 139 ॥ “आजि आमि आछिलाङ, उठाइलूँ प्रभुरे। वृन्दावने डुबेन यदि, के उठाबे ताँरे ? ॥ 140 ॥ लोगोंकी भीड़, भिक्षाकी परेशानी और महाप्रभुके सदैव प्रेमावेशसे भयभीत भट्टकी वृन्दावनसे महाप्रभुको अन्य स्थानपर ले जानेकी इच्छा :- लोकेर संघट्ट, आर निमन्त्रणेर जञ्जाल। निरन्तर आवेश प्रभुर, – ना देखिये भाल ॥ 141 ॥ वृन्दावन हैते यदि प्रभुरे काड़िये। तबे मङ्गल हय, – एइ भाल युक्ति हय ॥” 142 ॥ अनुवाद-तब बलभद्र भट्टाचार्यने सनोड़िया ब्राह्मणको अपने साथ लेकर एकान्तमें बैठकर कुछ विचार-विमर्श किया,–“आज तो मैं यहाँ था, मैंने महाप्रभुको जलसे बाहर निकाल लिया। यदि वे वृन्दावनमें डूबने लगें, वहाँ उन्हें कौन बाहर निकालेगा ? वैसे भी यहाँ लोगोंकी इतनी भीड़ है और उसपर निमन्त्रणका जञ्जाल है। साथमें महाप्रभु भी निरन्तर आवेशमें रहते हैं। मुझे यहाँकी स्थिति अच्छी नहीं लग रही है। यदि महाप्रभुको वृन्दावनसे बाहर ले जा सकें, तभी अच्छा होगा। मुझे तो यही उचित लग रहा है॥” 139-142 ॥ अनुभाष्य- 'काड़िये'-ले जाँय ॥ 142 ॥ ब्राह्मणके द्वारा माघस्नानके उपलक्ष्यमें गङ्गा तटके पथसे प्रयागमें ले जानेका परामर्श :- विप्र कहे, – “प्रयागे प्रभु लञा याइ। गङ्गातीर-पथे याइ, तबे सुख पाइ ॥ 143 ॥ 'सोरोक्षेत्रे' आगे याञा करि' गङ्गास्नान। सेइ पथे प्रभु लञा करिये पयान ॥ 144 ॥ माघ-मास लागिल, एबे यदि याइये। मकरे प्रयाग-स्नान कत दिन पाइये ॥ 145 ॥ अपने दुःखका निवेदन और सामयिक परामर्श देना :- आपनार दुःख किछु करि' निवेदन। 'मकरे' पँछिते प्रयागे करिह सूचन ॥ 146 ॥ महाप्रभुसे भट्टके द्वारा भिक्षाके लिये अनुरोध करनेवालोंकी असुविधाका वर्णन करनेके बाद माघ-स्नानके लिये प्रयागमें जानेका अनुरोध :- गङ्गातीर-पथे सुख जानाइह ताँरे।” भट्टाचार्य आसि' तबे कहिल प्रभुरे ॥ 147 ॥ अनुवाद-सनोड़िया ब्राह्मणने कहा, – “मेरा विचार है कि महाप्रभुको प्रयागमें ले चलें। यदि गङ्गातटवाले मार्गसे जायेंगे, तो उसमें बड़ा आनन्द होगा। पहले 'सोरोक्षेत्र'में जाकर गङ्गास्नान करके उसी मार्गसे महाप्रभुको लेकर आगे बढ़ेंगे। माघ-मास अभी आरम्भ हुआ है, यदि अभी यहाँसे जायेंगे, तो प्रयागमें मकर-सक्रान्तिके समय कुछ दिनके लिये वहाँ स्नान कर सकेंगे। आप महाप्रभुसे अपने दुःखका भी निवेदन करना और कहना कि यदि अभी चलेंगे तो हम लोग माघी-पूर्णिमा तक प्रयाग पहुँच जायेंगे। आप महाप्रभुसे कहना कि गङ्गातटवाले पथसे जानेपर यात्रा सुखप्रद होगी।” तब बलभद्र भट्टाचार्यने आकर महाप्रभुसे कहा, – ॥ 143-147 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सोरोक्षेत्रे' - मथुरासे सबसे निकटवर्ती गङ्गा-तटपर ही 'सोरोक्षेत्र' है ॥ 144 ॥ अनुभाष्य - कर्मनिष्ठ व्यक्तियोंके लिये माघमासमें प्रयाग-स्नान विशेष फल प्रदान करनेवाला है; “माघे मासि गमिष्यन्ति गङ्गायामुनसङ्गमम्। गवां शतसहस्रस्य सम्यक् दत्तञ्च यत्फलम्। प्रयागे माघमासे वै त्र्यहं स्नातस्य तत्फलम् ॥” [अर्थात् “यदि कोई प्रयागमें जाकर गङ्गा-यमुनाके सङ्गमपर माघ-मासमें स्नान करता है, तो उसे लाखों गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। केवल तीन दिन वहाँ स्नान करनेसे उसे इतना पुण्य प्राप्त होता है।”] । 159

[ 18/145-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एवं “तुमि आमाय आनि' देखाइला वृन्दावन। “सर्वाधिकारितां माघस्नानस्य व्रतता यतः” एइ 'ऋण' आमि नारिब करिते शोधन ॥ 153॥ अर्थात् “माघस्नानके व्रतका सबसे अधिक ये तोमार इच्छा, आमि सेइत करिब। फल होता है” याँहा लञा याह तुमि, ताँहाइ याइब ॥ ” 154 ॥ आदि व्यवस्था देखी जाती है॥145॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुकी वृन्दावनको छोड़कर “सहिते ना पारि आमि लोकेर गड़बड़ि। जानेकी बिलकुल भी इच्छा नहीं थी, तथापि भक्तकी निमन्त्रण लागि' लोक करे हड़ाहूड़ि ॥ 148 ॥ इच्छाको पूर्ण करनेके लिये उन्होंने मधुर वचन कहे,—“अपने साथ लाकर तुमने मुझे वृन्दावनके दर्शन प्रातःकाले आइसे लोक, तोमारे ना पाय। कराये हैं, मैं तुम्हारे इस 'ऋण'को कभी भी नहीं चुका तोमारे ना पाञा लोक मोर माथा खाय ॥ 149॥ पाऊँगा। तुम्हारी जैसी इच्छा है, मैं वैसा ही करूँगा। तबे सुख हय यबे गङ्गापथे याइये। तुम मुझे जहाँ ले जाओगे, मैं वहीं जाऊँगा॥”152-154॥ एबे यदि याइ, 'मकरे' गङ्गास्नान पाइये ॥ 150 ॥ प्रातः स्नानके बाद भावि-विच्छेदके स्मरणसे प्रेमावेश :- उद्विग्न हइल प्राण, सहिते ना पारि। प्रातःकाले महाप्रभु प्रातःस्नान कैल। प्रभुर ये आज्ञा हय, सेइ शिरे धरि ॥”151 ॥ 'वृन्दावन छाड़िब' जानि' प्रेमावेश हैल ॥ 155 ॥ अनुवाद—“लोगोंकी भीड़ आकर जो गड़बड़ी करती अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने प्रातःकालमें उठकर है, मुझसे वह सहन नहीं होती। निमन्त्रण देनेके लिये स्नान किया। 'वृन्दावनको छोड़कर जाऊँगा'-यह सोचकर लोग एकके बाद एक आते रहते हैं। वे लोग ही वे प्रेमाविष्ट हो गये॥155॥ प्रातःकालमें ही आ जाते हैं, जब आप यहाँ नहीं होते। महाप्रभुको गोकुल जानेके लिये नौकामें और आपको नहीं पाकर लोग मेरा दिमाग खाते हैं। बैठाकर दूसरी पार गमन :- मुझे तो तभी प्रसन्नता होगी, जब हम यहाँसे चलें और बाह्य विकार नाहि, प्रेमाविष्ट मन। गङ्गातटके मार्गसे जाँय। यदि हम अभी जायँगे, तब हम भट्टाचार्य कहे,—चल, याइ महावन ॥ 156 ॥ मकर-सक्रान्तिमें प्रयागमें गङ्गास्नान कर पायेंगे। मेरा मन बहुत उद्विग्न हो रहा है और मैं इसे सहन नहीं एत बलि' महाप्रभुरे नौकाय बसाञा। कर पा रहा हूँ, परन्तु आपकी जो आज्ञा होगी, मैं पार करि' भट्टाचार्य चलिला लञा ॥ 157 ॥ उसीको शिरोधार्य करूँगा॥”147-151॥ अनुवाद-बाहरसे महाप्रभुमें कोई विकार दिखायी अनुभाष्य- 'गड़बड़ि'-लोगोंके आने-जानेसे होनेवाली नहीं दे रहा था, परन्तु उनका मन प्रेममें आविष्ट था। गड़बड़ी ॥ 148 ॥ बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—चलिये, हम लोग वृन्दावनको छोड़नेकी इच्छा नहीं होनेपर भी भट्टकी महावन चलें। यह कहकर बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुको इच्छाकी पूर्ति और भट्टकी प्रशंसा :- नौकामें बैठाया। नदी पार करनेके बाद वे महाप्रभुको यद्यपि वृन्दावन-त्यागे नाहि प्रभुर मन। साथ लेकर चल पड़े॥ 156-157॥ भक्त-इच्छा पूरिते कहे मधुर वचन ॥ 152 ॥ अनुभाष्य-'महावन'-गोकुल ॥ 156 ॥ 160 |

अठारहवाँ अध्याय 18/158-167 ] राजपूत कृष्णदास और मथुराके सनोड़िया ब्राह्मण-दोनों अनुवाद-उसी समय वहाँपर दस घुड़सवार ही मार्गको जाननेवाले :- म्लेच्छ-पठान सैनिक आये और महाप्रभुको मूर्च्छित प्रेमी कृष्णदास, आर सेइत ब्राह्मण। पड़े देखकर वे घोड़ोंसे उतरकर उनके पास आ गङ्गातीरे-पथे याइवार विज्ञ दुइजन ॥ 158 ॥ गये॥ 163 ॥ अनुवाद-प्रेमी कृष्णदास और सनोड़िया ब्राह्मण-दोनों अनुभाष्य- 'आशोयार'-घुड़सवार सैनिक ॥ 163 ॥ ही गङ्गातटवाले मार्गको भली-भाँति जानते थे॥158॥ महाप्रभुके साथी चारों लोगोंको ही मार्गमें एक वृक्षके नीचे सभीका 'महाप्रभुकी हत्या करनेवाले डाकू' समझकर विश्रामके लिये बैठना :- सरदारके द्वारा उनको मारनेका प्रयास :- याइते एक वृक्षतले प्रभु सबा लञा। प्रभुरे देखिञा म्लेच्छ करये विचार। बसिला, सबार पथ-श्रान्ति देखिया ॥ 159 ॥ 'ऐइ यति-पाश छिल सुवर्ण अपार ॥ 164 ॥ अनुवाद-चलते हुए महाप्रभुने देखा कि उनके एइ चारि बाटोयार धुतुरा खाओयाञा। सङ्गी सब थक गये हैं, तो उनको साथमें लेकर वे एक मारि' डारियाछे, यतिर सब धन लञा ॥' 165 ॥ वृक्षके नीचे बैठ गये॥ 159 ॥ तबे सेइ पाठान चारि जनेरे बाँधिल। काटिते चाहे, गौड़िया सब काँपिते लागिल ॥ 166 ॥ गैयाओंको घूमते देखकर व्रजलीलाका स्मरण :- सेइ वृक्ष निकटे चरे बहु गाभीगण। अनुवाद-महाप्रभुको मूर्च्छित देखकर म्लेच्छ विचार ताहा देखि' महाप्रभुर उल्लसित मन ॥ 160 ॥ करने लगे, - 'इस संन्यासीके पास अवश्य ही बहुत अधिक सोना था। इन चारों डकैतोंने संन्यासीका सब अनुवाद-उस वृक्षके निकट ही बहुत सी गायें कुछ लूटकर उसे धतूरा खिलाकर मार डाला है।' तब घास चर रही थीं। उन्हें देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत उन पठानोंने उन चारों लोगोंको बाँध दिया और उनको उल्लास हुआ॥ 160 ॥ मारनेका निश्चय किया। दोनों बङ्गाली भयसे काँपने लगे॥ 164-166 ॥ हठात् एक वंशीध्वनिके श्रवणसे महाप्रभुकी प्रेम-मूर्च्छा :- अमृतप्रवाह भाष्य- 'बाटोयार'- मार्गमें जो डकैती आचम्बिते एक गोप वंशी बाजाइल। कर लेते हैं; 'मारि' डारियाछे' - मार डाला है॥ 165 ॥ शुनि' महाप्रभुर महा-प्रेमावेश हैल ॥ 161 ॥ अनुभाष्य- 'बाटोयार' - असहाय पथिकोंको लूटनेवाले अचेतन हञा प्रभु भूमिते पड़िला। डाकू। 'चारिजनेर' - 1) कृष्णदास राजपूत, 2) मुखे फेना पड़े, नासाय श्वास रुद्ध हैला ॥ 162 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य 'सनोड़िया'-ब्राह्मण, 3) बलभद्र अनुवाद-अचानक एक गोपने वंशी बजायी, उसे भट्टाचार्य, 4) बलभद्रके साथी ब्राह्मण ॥ 165-166 ॥ सुनते ही महाप्रभुमें अत्यधिक प्रेमावेश आ गया और वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। उनके मुखसे झाग कृष्णदास और मथुराके ब्राह्मणके द्वारा निर्भय होकर निकलने लगी तथा उनकी सांस रुक गयी ॥ 161-162 ॥ पठानको अपना परिचयादि देना :- उसी समय वहाँ दस घुड़सवार पठानोंका आगमन :- कृष्णदास-राजपुत, निर्भय से बड़। हेनकाले ताँहा आशोयार दश आइला। सेइ विप्र-निर्भय, से-मुखे बड़ दड़ ॥ 167 ॥ म्लेच्छ-पाठान घोड़ा हैते उत्तरिला ॥ 163 ॥ । 161

[ 18/167-176 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—कृष्णदास तो राजपूत होनेके कारण बिलकुल निडर थे। सनोड़िया ब्राह्मण भी निडर और बोलनेमें निपुण थे॥ 167 ॥ अनुभाष्य—'मुखे बड़ दड़'—अति निपुण वक्ता, बातचीत-परिचयमें पटु॥ 167 ॥ विप्र कहे,—“पाठान, तोमार पातसार दोहाइ। चल तुमि, आमि सिक़्दार-पाश याइ ॥ 168 ॥ अनुवाद—सनोड़िया ब्राह्मणने कहा,—“पठान, बादशाह तुम्हारा स्वामी है। तुम हमें अपने सरदारके पास लेकर चलो॥ 168 ॥ अनुभाष्य—'सिक़्दार'—शान्तिरक्षक विशेष कर्मचारी, अथवा पदपर विराजमान सेनाका अध्यक्ष, अथवा सिक्का (बादशाही मुद्रा)-दार (भारप्राप्त कर्मचारी) ॥ 168 ॥ एइ यति—आमार गुरु, आमि—माथुर ब्राह्मण। पातसार आगे आमार आछे 'शत जन' ॥ 169 ॥ अनुवाद—ये संन्यासी हमारे गुरु हैं और मैं मथुराका ब्राह्मण हूँ। मैं ऐसे सैकड़ों लोगोंको जानता हूँ, जो बादशाहकी नौकरी करते हैं॥ 169 ॥ एइ यति व्याधिते कभु हयेन मूर्च्छित। अबँहि चेतन पाइबे, हइबे सम्वित ॥ 170 ॥ अनुवाद—ये संन्यासी रोगके कारण कभी मूर्च्छित हो जाते हैं। थोड़ी देर प्रतीक्षा करके देखो, इनमें चेतनता आ जायेगी और इनकी सामान्य दशा हो जायेगी ॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अबँहि'—अभी ॥ 170 ॥ अनुभाष्य—'सम्वित्'—ज्ञान ॥ 170 ॥ क्षणेक इँहा बैस, बान्धि' राखह सबारे। इँहाके पुछिया, तबे मारिह आमारे ॥” 171 ॥ अनुवाद—थोड़ी देर तक यहीं बैठो और हम सबको भले ही बँधा ही रहने दो। जब इनकी चेतनता लौट आये, तब इनसे ही सब कुछ पूछना। उसके बाद ही चाहे हमें मार डालना ॥” 171 ॥ पठानके द्वारा क्रोधपूर्वक सभीको 'डाकू' कहना :— पाठान कहे,—“तुमि पश्चिमा माथुर दुइजन। 'गौड़िया' ठक् एइ काँपे दुइजन ॥” 172 ॥ अनुवाद—पठानने कहा,—“तुम सभी ठग हो, तुम दोनों पश्चिम भारतके मथुराके रहनेवाले हो और ये जो भयसे काँप रहे हैं, दोनों बङ्गालके हैं॥” 172 ॥ उसके उत्तरमें कृष्णदासके द्वारा पठानको भय दिखाना और कड़वे वचन कहना :— कृष्णदास कहे,—“आमार घर एइ ग्रामे। दुइशत तुर्की आछे, शतेक कामाने ॥ 173 ॥ अखनि आसिबे सब, आमि यदि फुकारि। घोड़ा-पिड़ा लुटि' लबे तोमा-सबा-मारि' ॥ 174 ॥ गौड़िया—'बाटपाड़' नहे, तुमि—'बाटपाड़'। तीर्थवासी लुठ', आर चाह' मारिवार ॥” 175 ॥ अनुवाद—कृष्णदासने कहा,—“इसी ग्राममें मेरा घर है। मेरे पास दो सौ तुर्की सैनिक और एक सौ तोपें हैं। यदि मैं उन्हें वंशी बजाकर बुलाऊँगा, तो वे सभी अभी आ जायेंगे। फिर वे तुम सबको मारकर तुम्हारे घोड़े, काठी और सब सामान ले लेंगे। गौड़ीय ठग नहीं हैं, बल्कि तुम ही ठग हो। तुम लोग तीर्थयात्रियोंको लूटते हो और उन्हें मारना चाहते हो॥” 174-175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'घोड़ा-पिड़ा'—घोड़ा तथा उसकी पीठपर रखी काठी आदि वस्तुएँ॥ 174 ॥ अनुभाष्य—'फुकारि'—वंशीध्वनि करके॥ 174 ॥ पठानोंको भय :— शुनिया पाठान मने सङ्कोच हइल। हेनकाले महाप्रभु 'चैतन्य' पाइल ॥ 176 ॥ 162 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/176-186 ] अनुवाद—कृष्णदासकी बात सुनकर पठानोंके मनमें कुछ सङ्कोच हुआ। उसी समय अचानक महाप्रभुमें चेतनता आ गयी॥ 176॥ महाप्रभुकी बाह्यदशा और नृत्य-कीर्तन :- हुङ्कार करिया उठे, बोले 'हरि' 'हरि'। प्रेमावेशे नृत्य करे ऊर्ध्वबाहु करि'॥ 177॥ अनुवाद—महाप्रभु हुङ्कार करके उठ खड़े हुए और जोरसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। तब महाप्रभु हाथ उठाकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ 177॥ पापी म्लेच्छोंको हरिनाम्-श्रवण करनेसे कष्ट :- प्रेमावेशे प्रभु यबे करेन चित्कार। म्लेच्छेर हृदये येन लागे शेलधार॥ 178॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें जब महाप्रभु चीत्कार कर रहे थे, तब म्लेच्छोंको ऐसा लग रहा था मानो कोई उनके हृदयको बाणकी नोकसे बेध रहा हो॥ 178॥ अनुभाष्य—'लागे शेलधार'—बाणकी नोककी भाँति बेधना (छेदना)॥ 178॥ म्लेच्छोंके द्वारा तत्क्षणात् चारों लोगोंको खोल देना; महाप्रभुके लिये भक्तद्रोहके दर्शनके अवकाश नहीं :- भय पाञा म्लेच्छ छाड़ि' दिल चारिजन। प्रभु ना देखिल निज-गणेर बन्धन॥ 179॥ अनुवाद—भयभीत होकर पठानोंने उसी समय चारों लोगोंको खोल दिया। इसलिये महाप्रभुने अपने साथियोंको बँधे हुए नहीं देखा॥ 179॥ म्लेच्छको देखकर महाप्रभुके द्वारा भावको छिपाना :- भट्टाचार्य आसि' प्रभुरे धरि' बसाइल। म्लेच्छगण देखि' महाप्रभुर 'बाह्य' हैल॥ 180॥ अनुवाद—तब बलभद्र भट्टाचार्यने आकर महाप्रभुको पकड़कर बैठाया। म्लेच्छोंको देखकर महाप्रभुको बाह्यज्ञान हुआ॥ 180॥ म्लेच्छोंके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना और चारोंके विरुद्ध शिकायत :- म्लेच्छगण आसि' प्रभुर वन्दिल चरण। प्रभु-आगे कहे,—"एइ ठक् चारिजन॥ 181॥ एइ चारि मिलि' तोमाय धुतुरा खाओयाञा। तोमार धन लैल, तोमाय पागल करिया॥" 182॥ अनुवाद—म्लेच्छोंने आकर महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की और उनसे कहा,—"ये चारों लोग ठग हैं। इन चारोंने मिलकर आपको धतूरा खिलाकर पागल करके आपका सारा धन ले लिया है॥" 181-182॥ चारों लोगोंको ही 'अपना' कहकर महाप्रभुके द्वारा उनका परिचय देना :- प्रभु कहेन,—"ठक् नहे, मोर 'सङ्गी' जन। भिक्षुक संन्यासी, मोर नाहि किछु धन॥ 183॥ मृगी व्याधिते आमि कभु हइ अचेतन। एइ चारि दया करि' करेन पालन॥" 184॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"ये लोग ठग नहीं, बल्कि मेरे साथी हैं। मैं एक भिक्षुक संन्यासी हूँ, मेरे पास कोई धन नहीं है। मैं मिरगीकी बीमारीके कारण कभी-कभी मूर्च्छित हो जाता हूँ। ये चारों लोग कृपा करके मेरा पालन करते हैं॥" 183-184॥ पठानोंमेंसे एक व्यक्ति 'मौलाना' :- सेइ म्लेच्छ-मध्ये एक परम गम्भीर। कालवस्त्र परे सेइ,—लोके कहे 'पीर'॥ 185॥ अनुवाद—उन म्लेच्छोंमें-से एक व्यक्ति बहुत गम्भीर था। उसने काले वस्त्र पहने थे और लोग उसे 'पीर' (साधु) कहते थे॥ 185॥ महाप्रभुके दर्शनसे उसमें नम्रभाव और निर्विशेष-ब्रह्मको स्थापित करनेकी चेष्टा :- चित्त आर्द्र हैल ताँर प्रभुरे देखिया। 'निर्विशेष-ब्रह्म' स्थापे स्वशास्त्र उठाञा॥ 186॥ । 163

[ 18/186-194 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—महाप्रभुको देखकर उस 'पीर'का चित्त द्रवीभूत हो गया। वह अपने शास्त्रके (कुरानके) द्वारा 'निर्विशेष-ब्रह्म'की स्थापना करनेके लिये महाप्रभुसे बात करना चाहता था॥ 186॥ अनुभाष्य—'निर्विशेष-ब्रह्म'—अज्ञेय, परिचयरहित 'ईश्वर'। 'खुदा' (ईश्वर) और 'बन्दा' (जीव)—इन दो नित्यभावोंसे रहित चिद्विलासहीन पारलौकिक अवस्थान॥ 186॥ मुस्लिम-शास्त्रकी युक्तिके द्वारा ही महाप्रभुके द्वारा उसके मतका खण्डन :— 'अद्वैत-ब्रह्मवाद' सेइ करिल स्थापन। ताँर शास्त्रयुक्त्ये ताँरे प्रभु कैला खण्डन॥ 187॥ येइ येइ कहिल, प्रभु सकलि खण्डिल। उत्तर ना आइसे मुखे, महास्तब्ध हैल॥ 188॥ अनुवाद—उस म्लेच्छाचार्यने कुरानके आधारपर 'अद्वैत-ब्रह्मवाद'की स्थापना की, परन्तु महाप्रभुने उसका खण्डन कर दिया। उसने जो-जो तर्क या विचार रखे, महाप्रभुने उस सबका खण्डन कर दिया। अन्तमें वह म्लेच्छाचार्य बिलकुल स्तब्ध हो गया और कुछ भी नहीं बोल सका॥ 187-188॥ मुस्लिम-शास्त्रोंमें सर्वप्रथम निर्विशेषत्वको स्थापित करनेके बाद अन्तमें सविशेष-ब्रह्मका ही स्थापन :— प्रभु कहे, —"तोमार शास्त्र स्थापे 'निर्विशेषे'। ताहा खण्डि' 'सविशेष' स्थापियाछे शेषे॥ 189॥ कुरानमें सबसे अन्तमें सविशेष-ब्रह्म श्रीकृष्णका परिचय :— तोमार शास्त्रे कहे शेषे 'एकइ ईश्वर'। 'सर्वैश्वर्यपूर्ण' तैं हो—श्याम-कलेवर॥ 190॥ सच्चिदानन्द-देह, पूर्णब्रह्म-स्वरूप। 'सर्वात्मा', 'सर्वज्ञ', नित्य सर्वादि-स्वरूप॥ 191॥ सृष्टि, स्थिति, प्रलय ताँहा हैते हय। स्थूल-सूक्ष्म-जगतेर तैं हो समाश्रय॥ 192॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —"पहले तो तुम्हारे शास्त्र 'निर्विशेष'की स्थापना करते हैं, किन्तु अन्तमें उसीका खण्डन करके 'सविशेष'की स्थापना करते हैं। तुम्हारे शास्त्रमें अन्तमें 'एक ही ईश्वर'की बात कही गयी है। वे ईश्वर सब प्रकारके ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं और उनका शरीर श्याम वर्णका है। उनकी देह सच्चिदानन्द है, वे पूर्ण ब्रह्म स्वरूप हैं, वे सर्वात्मा, सर्वज्ञ, नित्य और सबके आदि-स्वरूप हैं। उन्हींके द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलय होता है। वे स्थूल और सूक्ष्म जगत्के वास्तविक आश्रय हैं॥ 189-192॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वशास्त्र'—कुरान; मुसलमानोंमें 'सूफी' नामक एक सम्प्रदाय है, इनका मत ही 'निर्विशेष ब्रह्म' अथवा 'अद्वैत ब्रह्मवाद' है, इनका महावाक्य— “अनलहक्” है। यह सूफी-मत शाङ्कर मतसे उत्पन्न हुआ है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। तुम्हारे मोहम्मदके शास्त्रमें मोहम्मदके सप्तम स्वर्गमें ईश्वरके दर्शनके वर्णनमें ईश्वरका पूर्ण विग्रह स्वीकार किया गया है॥ 186-190॥ उन भगवान्की प्रीति अथवा भक्ति ही संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाली और परम-पुरुषार्थ :— सर्वश्रेष्ठ, सर्वाराध्य, कारणेर कारण। ताँर भक्त्ये हय जीवेर संसार-तारण॥ 193॥ ताँर सेवा बिना जीवेर ना याय 'संसार'। ताँहार चरणे प्रीति—'पुरुषार्थ-सार'॥ 194॥ अनुवाद—वे ईश्वर सर्वश्रेष्ठ, सभीके आराध्य तथा सभी कारणोंके भी कारण हैं। उनकी भक्तिसे जीव संसारसे तर जाता है। उनकी सेवाके बिना बद्धजीवोंका संसार क्षय नहीं होता। उन्हीं ईश्वरके चरणोंमें प्रीति ही सभी पुरुषार्थोंका सार है॥ 193-194॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन ईश्वरकी 'एबादत्' अर्थात् पाँच समय नमाज आदि सेवा नहीं करनेसे जीवको पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती। तुम्हारे शास्त्रमें प्रीतिको ही पुरुषार्थ कहा गया है; उसमें कर्म-योग-ज्ञानादिको 164 |