श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
11/25–26 ]
[बायाँ स्तम्भ]
“नवद्वीपसे थोड़ी दूरीपर 'शालिग्राम' है। वहाँ पण्डित सूर्यदास रहते थे। वे गौड़देशके यवन राजाके यहाँ कार्य करते थे और उसमें अति दक्ष थे। वे 'सरखेल' नामसे विख्यात थे और उन्होंने बहुत धन अर्जित किया। सूर्यदास चार भाई थे और चारोंका आचरण परम शुद्ध था। वसुधा और जाह्नवा नामकी इनकी दो पुत्रियाँ थीं।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 65वाँ श्लोक)—
“श्रीवारुणी-रेवत-वंशसम्भवे,
तस्य प्रिये द्वे वसुधा च जाह्नवी।
श्रीसूर्यदासस्य महात्मनः सुते,
ककुद्मिरूपस्य च सूर्यतेजसः॥65॥”
“श्रीबलदेवकी पत्नियाँ श्रीवारुणीदेवी और रेवतवंशमें उत्पन्न रेवतीदेवी अब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पत्नियाँ श्रीवसुधा और श्रीजाह्नवा हैं। ये दोनों सूर्यके समान तेजस्वी महात्मा श्रीसूर्यदास (सरखेल) की कन्याएँ हैं। ये सूर्यदास पहले रेवतीके पिता कुकुद्मी थे।”
बड़गाछि-धर्मदह-ग्रामके उस पार 'गुड़गुड़े' नहरके तटपर। इसके पास ही शालिग्राम और रुकुणपुर है।
'कृष्णदास सरखेल'—ये गौरीदास पण्डित और सूर्यदास सरखेलके छोटे भाई हैं। ये श्रीनित्यानन्दके विवाहके पूर्व दिन बड़गाछिसे शालिग्राम आये थे। 'भक्तिरत्नाकर' बारहवीं तरङ्गमें कहा है—
“नाना द्रव्य लैया विप्रगणेर सहिते।
कृष्णदास पण्डित आइला वाटी हइते॥”
“ब्राह्मणोंके साथ नाना प्रकारकी वस्तुओंको लेकर कृष्णदास पण्डित घरसे आये॥” 25 ॥
(12) गौरीदास पण्डित (गोपाल-4)
श्रीगौरीदास पण्डिते प्रेमोद्दण्ड-भक्ति।
कृष्णप्रेमा दिते, निते, धरे महाशक्ति॥26॥
अनुवाद— श्रीगौरीदास पण्डितमें उन्नत प्रेमाभक्ति थी। उनमें श्रीकृष्णप्रेम ग्रहण करनेकी और इस कारण देनेकी महाशक्ति थी॥26॥
अनुभाष्य— 'श्रीगौरीदास पण्डित'—हरिहोड़के पुत्र राजा
[दायाँ स्तम्भ]
कृष्णदासकी इनपर विशेष कृपा थी। ये व्रजके बारह गोपालोंमें अन्यतम 'सुबलसखा' हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 128वाँ श्लोक)—
“सुबलो यः प्रियश्रेष्ठः स गौरीदासपण्डितः॥128(क)॥”
“श्रीकृष्णचन्द्रके अति प्रिय सखा सुबल अब श्रीगौरीदास पण्डित हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)—
“गौरीदास पण्डित परम भाग्यवान्।
कायमनोवाक्ये नित्यानन्द याँर प्राण॥730॥”
“सरखेल सूर्यदास पण्डित उदार।
ताँर भ्राता गौरीदास पण्डित प्रचार॥
शालिग्राम हैते ज्येष्ठ भ्रातारे कहिया।
गङ्गातीरे कैला वास 'अम्बिका' आसिया॥”
“गौरीदास पण्डित महाभाग्यवान् हैं, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राण हैं और इन्होंने अपना तन, मन और वाणीको उन्हें समर्पित कर दिया है।” “सूर्यदास पण्डित सरखेल बहुत उदार हैं और गौरीदास पण्डित उनके भाईके रूपमें प्रसिद्ध हैं। गौरीदास पण्डित पहले शालिग्राममें रहते थे और बादमें अपने ज्येष्ठ भाई श्रीसूर्यदासके कहनेसे ये गङ्गाके किनारे अम्बिका-कालनामें आ गये।”
गौरीदास पण्डितकी साढ़े बाइस शाखाएँ हैं। (1) श्रीनृसिंहचैतन्य, (2) कृष्णदास, (3) विष्णुदास, (4) बड़े बलरामदास, (5) गोविन्द, (6) रघुनाथ, (7) बडू गङ्गादास, (8) आउलिया गङ्गाराम, (9) यादवाचार्य, (10) हृदयचैतन्य, (11) चाँद हालदार, (12) महेश पण्डित, (13) मुकुट राय, (14) भातुया गङ्गाराम (15) आउलिया चैतन्य, (16) कालिया कृष्णदास, (17) पातुया गोपाल, (18) बड़े जगन्नाथ, (19) नित्यानन्द (20) भावि, (21) जगदीश, (22) राइया कृष्णदास और (22½) अन्नपूर्णा। गौरीदास पण्डितके ज्येष्ठ पुत्र (बड़े) बलराम और कनिष्ठ पुत्र रघुनाथ हैं और अन्नपूर्णा उनकी पुत्री हैं।
शालिग्रामवासी श्रीकंसारि मिश्रके छह पुत्र थे—
ग्यारहवाँ अध्याय | 105
[ 11/26-28
(1) दामोदर, (2) जगन्नाथ, (3) सूर्यदास सरखेल
(वसुधा-जाह्नवाके पिता), (4) गौरीदास, (5) कृष्णदास
सरखेल और (6) नृसिंह चैतन्य।
गौरीदास पण्डित या हृदयचैतन्यका वंश नहीं है।
कोई कोई कहते हैं कि जो स्वयंको उनका वंशज
कहते हैं, वे सब गौरीदास पण्डित अथवा हृदयचैतन्यके
शिष्य-शाखाके वंशज हैं। भक्तिरत्नाकरकी ग्यारहवीं
तरङ्गमें कहा है—
“गौरीदास पण्डितेर समाधि देखिते।
बहे वारिधारा नेत्रे, नारे निवारिते॥”
“जाह्नवादेवीने वृन्दावनमें जब गौरीदास पण्डितकी
समाधिका दर्शन किया, तो उनके नेत्रोंसे अविरल
अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी, जिसे वे रोक नहीं पायीं।”
गौरीदासके शिष्य हृदयचैतन्य थे और हृदयचैतन्यके
शिष्य अन्नपूर्णादेवीके पुत्र गोपीरमण थे। इनकी वंशावली
ही अब कालनामें महाप्रभुके अधिकारी व्यक्ति हैं।
शान्तिपुरके दूसरे पार गङ्गा तटपर वर्धमान जिलामें
श्रीपाट अम्बिका-कालना है। यह जिलाका उपखण्ड
और एक छोटासा शहर है।
गौरीदासके देवालयके प्रवेश-मार्गमें एक अपूर्व
इमलीका वृक्ष है। ऐसा कहा जाता है कि इसी इमलीके
वृक्षके नीचे महाप्रभु और गौरीदास पण्डितका मिलन
हुआ था। देवालयमें सफेद पत्थर लगा है और गृहके
भीतर तीन प्रकोष्ठोंमें श्रीविग्रह इस प्रकार हैं,—
(1) श्रीगौरीदास, (2) श्रीराधाकृष्ण, (3) श्रीगौर-नित्यानन्द,
(4) श्रीजगन्नाथ, (5) श्रीबलराम और (6) श्रीसीताराम।
पण्डित गौरीदासके भवनकी पश्चिम दिशाकी ओर
श्रीसूर्यदास पण्डितका देवालय और कुछ ही दूरीपर
सिद्ध श्रीभगवानदास बाबाजीका आश्रम है।
जिस स्थानपर वर्तमान देवालय है, उसे 'अम्बिका'
कहते हैं और उसकी उत्तर दिशामें 'कालना' है।
इसलिये इन दोनोंका मिलित नाम 'अम्बिका-कालना'
है। ऐसा सुना जाता है कि इस मन्दिरमें अभी भी
श्रीमन्महाप्रभुके श्रीहस्तसे चलाया गया चप्पू और उनकी
श्रीहस्तलिखित श्रीगीता वर्तमान है (भक्तिरत्नाकर 7वीं
तरङ्ग द्रष्टव्य है) ॥ 26 ॥
गौरीदास पण्डितके प्राण श्रीगौर-निताइ :—
नित्यानन्दे समर्पिल जाति-कुल-पाँति।
श्रीचैतन्य-नित्यानन्दे करि' प्राणपति ॥ 27 ॥
अनुवाद—इन्होंने श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्राणोंसे
प्रिय स्वामी मानकर अपनी जाति, कुल और पाँति, सब
कुछ श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर दिया॥ 27॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पाँति'—पंक्ति-भोजन ॥ 27 ॥
इति अमृतप्रवाहभाष्ये एकादश परिच्छेद।
ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
(13) पुरन्दर पण्डित :—
नित्यानन्द प्रभुर प्रिय—पण्डित पुरन्दर।
प्रेमार्णव-मध्ये फिरे यैछन मन्दर ॥ 28 ॥
अनुवाद—पुरन्दर पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके अत्यन्त
प्रिय थे। वे प्रेम समुद्रमें मन्दराचल पर्वतके समान
घूमते रहते थे॥ 28 ॥
अनुभाष्य—'पुरन्दर पण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड,
पाँचवाँ अध्याय)—
“पुरन्दर पण्डित परम शान्त दान्त।
नित्यानन्दस्वरूपेर वल्लभ एकान्त ॥ 731 ॥”
“पुरन्दर पण्डित परम शान्त और संयमी हैं और
श्रीनित्यानन्द प्रभुके ऐकान्तिक प्रिय हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड,
पाँचवाँ अध्याय)—
“तबे आइलेन प्रभु खड़दह-ग्रामे।
पुरन्दर पण्डितेर देवालय स्थाने ॥ 423 ॥
खड़दह-ग्रामे प्रभु नित्यानन्द राय।
यत नृत्य करिलेन कथन ना याय ॥ 424 ॥
पुरन्दर पण्डितेर परम उन्माद।
वृक्षेर उपरि चड़ि' करे सिंहनाद ॥ 425 ॥
मुञि रे 'अङ्गद' बलि' लम्फ दिया पड़े ॥ 241 ॥”
“तब श्रीनित्यानन्द प्रभु खड़दह-ग्राममें पुरन्दर पण्डितके
106 | श्रीचैतन्यचरितामृत
text
11/28-29 ]
देवालय-स्थानपर आये। वहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभुने जैसा
अद्भुत नृत्य किया, उसका वर्णन करना सम्भव नहीं
है। पुरन्दर पण्डित वृक्षके ऊपर चढ़कर उस नृत्यको
देख रहे थे और उसे देखकर उन्हें उन्माद हो गया।
वे सिंहके समान गरजते हुए और 'मैं अङ्गद हूँ', ऐसा
कहकर वे वृक्षसे कूद पड़े॥"28॥
(14) परमेश्वरीदास (गोपाल-5)
परमेश्वरदास—नित्यानन्दैक-शरण।
कृष्णभक्ति पाय, तारे ये करे स्मरण॥ 29 ॥
अनुवाद- परमेश्वरदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके ऐकान्तिक
शरणागत थे। जो व्यक्ति इनका स्मरण करता है, उसे
श्रीकृष्णप्रेमकी अवश्य ही प्राप्ति होती है॥ 29॥
अनुभाष्य-'परमेश्वर अथवा परमेश्वरी-दास'- (चैःभाः
अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)—
“नित्यानन्द-जीवन परमेश्वरदास।
याँहार विग्रहे नित्यनन्देर विलास॥ 732 ॥”
“परमेश्वरदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके जीवनस्वरूप थे
और उनके विग्रहमें श्रीनित्यानन्द प्रभु विलास करते
थे।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)—
“कृष्णदास, परमेश्वर दास, -दुइजन।
गोपभावे है है करे सर्वक्षण॥ 240 ॥
पुरन्दर पण्डित, परमेश्वरीदास।
याँहार विग्रहे गौरचन्द्रेर प्रकाश ॥ 95 ॥
सत्वरे धाइया आइलेन सेइक्षणे।
प्रभु देखि' प्रेमयोगे कान्दे दुइजने ॥ 96 ॥
“कृष्णदास और परमेश्वरदास, दोनोंमें जब भी
गोपभाव उदित होता, वे सदा 'है है' करके हँसते रहते।
पुरन्दर पण्डित और परमेश्वरीदास, इन दोनोंके शरीरमें
श्रीगौरचन्द्रका प्रकाश है। महाप्रभुके आनेका समाचार
सुनते ही ये दोनों दौड़ते हुए आये और महाप्रभुको
देखते ही प्रेमके कारण क्रन्दन करने लगे॥” ये कुछ
समय तक खड़दहमें रहे थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
132वाँ श्लोक)—
“नाम्नार्जुनः सखा प्राग् यो दासः श्रीपरमेश्वरः ॥ 132(क) ॥”
“पूर्वके अर्जुन नामक सखा अब श्रीपरमेश्वर दास
हैं।” ये बारह गोपालोंमें अन्यतम 'अर्जुन' सखा हैं।
भक्तिरत्नाकरकी दसवीं तरङ्गमें कहा गया है कि
श्रीजाह्नवा-देवीके खेतुरि-महोत्सव जानेके समय ये उनके
साथ थे। भक्तिरत्नाकरकी तेरहवीं तरङ्गके अनुसार
इन्होंने आटपुरमें जाह्नवा-माताके आदेशसे 'श्रीराधा-गोपीनाथ'के
विग्रहोंकी प्रतिष्ठा की थी।
श्रीवैष्णव-वन्दनामें—
“परमेश्वर-दास ठाकुर वन्दिब सावधाने।
शृगाले लओयान नाम सङ्कीर्त्तन-स्थाने ॥”
भक्तिरत्नाकरकी तेरहवीं तरङ्गमें परमेश्वरी-ठाकुरका
वर्णन है।
परमेश्वरी ठाकुरका श्रीपाट आटपुरमें है, इसका
पूर्व नाम 'विशखाला' था। मन्दिरके बाहर बड़े छायादार
साथ-साथ दो बकुल वृक्ष और पृथक् एक कदम्बका
वृक्ष है तथा उनके बीचमें परमेश्वरी ठाकुरकी समाधि
है और उसके ऊपर तुलसीमञ्च सुशोभित है। जो दो
बकुल वृक्ष श्रील परमेश्वरी ठाकुरके समयमें थे, उनकी
शाखासे वर्तमान दो वृक्ष उत्पन्न हुए हैं, ऐसा कहा जाता
है। कदम्ब वृक्षपर प्रति वर्ष एक ही फूल लगता है
और उसके द्वारा श्रीविग्रहके श्रीचरणोंकी पूजा होती है।
परमेश्वरी ठाकुरका जन्म वैद्यकुलमें हुआ था।
उनके भाईके वंशज अब श्रीपाटके वर्तमान सेवायत हैं।
हुगली जिलाके चण्डीतला-डाकघरके अन्तर्गत
गरलगाछा-ग्राममें भी इनमेंसे कुछ वर्तमान हैं। कुछ
समय पूर्वतक इनके अनेक शौक्रब्राह्मण-शिष्य थे,
परन्तु कालके प्रभावसे सांसारिक लोगोंके समान इनके
द्वारा वैद्यके व्यवसायको अपनानेपर उन ब्राह्मण-वंशियोंने
धीरे-धीरे इनके शिष्यत्वका त्याग कर दिया। इनकी
उपाधि 'अधिकारी' थी।
ये स्वयंको साधारण 'वैद्य' मानकर देवल ब्राह्मणके
द्वारा श्रीविग्रहोंकी सेवा करवाते थे। पहले मन्दिरकी
व्यवस्थाके लिये प्रचुर भूमि थी, किन्तु अब वह भूमि
ग्यारहवाँ अध्याय | 107
[ 11/29-30
इनके अधिकारसे चली गयी है। अब कुछ शेष
सम्पत्तिसे बड़े कष्टसे श्रीविग्रहकी सेवा चल रही है।
देखा जाता है कि मन्दिरमें एक ही सिंहासनपर
श्रीबलदेव और श्रीराधागोपीनाथ श्रीविग्रह विराजमान हैं।
सम्भवतः सिंहासनपर श्रीबलदेव-विग्रह बादमें प्रतिष्ठित
किया गये होंगे, क्योंकि एक ही सिंहासनपर श्रीबलदेव
और श्रीमतीके साथ श्रीकृष्णके विग्रहका अवस्थान-
तत्त्वविरोधपूर्ण बात है अर्थात् यह रसाभास दोष है।
वैशाखी-पूर्णिमाके दिन परमेश्वरी-ठाकुरका तिरोभाव
उत्सव होता है॥29॥
(15) जगदीश पण्डित :-
श्रीजगदीश पण्डित हय जगतपावन।
कृष्णप्रेमामृत वर्षे, ये वर्षा घन॥30॥
अनुवाद—श्रीजगदीश पण्डित जगत्को पवित्र करनेवाले
थे। ये जलधर मेघोंके समान श्रीकृष्णप्रेमरूपी अमृतकी
घनघोर वर्षा करते थे॥30॥
अनुभाष्य—श्रीजगदीश पण्डितका श्रीपाट यशड़ा-ग्राममें
है। चैःभाः आदिखण्ड छठा अध्याय और चैःचः
आदिलीला 14/39 संख्या द्रष्टव्य है। इनके श्रीपाटके
विवरणसे यह जाना जाता है कि इनका जन्म
गोहाटी-अञ्चलमें हुआ था। इनके पिता कमलाक्ष-गयघर
बन्द्यघटीय भट्टनारायणके पुत्र थे। जगदीशके माता-पिता
दोनों ही परम विष्णुभक्तिपरायण गृहस्थ थे। माता-पिताके
अप्रकट होनेपर अपनी जन्मभूमि त्यागकर ये अपनी
पत्नी 'दुःखिनी' और भाई महेशको लेकर गङ्गाके तटपर
चले आये और वैष्णवसङ्गकी अभिलाषासे श्रीमायापुरमें
श्रीजगन्नाथ मिश्रके घरके निकट आकर वास करने
लगे। श्रीगौरसुन्दरने जगदीशको नाम प्रचारके लिये
नीलाचल जानेका आदेश किया। जगदीश पण्डित
महाप्रभुके आदेशानुसार नीलाचलमें नाम प्रचारके लिये
आये और उनको श्रीजगन्नाथजीसे प्रार्थना करनेपर एक
श्रीजगन्नाथजीकी मूर्ति प्राप्त हुई, जिसे इन्होंने चाकदह-थानाके
अन्तर्गत गङ्गाके तटपर स्थित यशड़ा-ग्राममें प्रतिष्ठित
किया। ऐसा कहा जाता है कि जगदीश पण्डित
पुरुषोत्तम क्षेत्रसे इस श्रीजगन्नाथ-मूर्तिको एक छड़ीमें
बाँधकर यशड़ा-ग्राममें लाये थे। अभी भी एक छड़ीको
जगदीश पण्डितकी 'जगन्नाथविग्रह लानेवाली छड़ी' कहकर
मन्दिरके सेवायत उसके दर्शन करवाते हैं। ऐसा कहा
जाता है कि श्रीगौर-नित्यानन्दप्रभु पार्षदों सहित दो बार
यशड़ा-ग्राममें आये थे और उन्होंने वहाँ सङ्कीर्तनविहार,
हरिकथा-कीर्तन और महामहोत्सव मनाया था।
जगदीश पण्डितने गृहस्थकी लीलाका अभिनय
किया था। उनके एकमात्र पुत्रका नाम 'रामभद्र गोस्वामी'
था।
पहले श्रीजगन्नाथजीकी मूर्ति गङ्गाके तटपर एक
वटवृक्षके नीचे प्रतिष्ठित थी, बादमें गोयाड़ी-कृष्णनगरके
राजा कृष्णचन्द्रने मन्दिरका निर्माण करवाया। उस
मन्दिरके जीर्ण होनेपर स्थानीय उमेशचन्द्र मजूमदारकी
सहधर्मिणी मोक्षदा दासीने 1324 वर्षमें वर्तमान मन्दिरका
संस्कार किया था, ऐसा वहाँ एक पत्थरके पटलपर
अंकित है। मन्दिर एक साधारण घरके आकारका है
और मन्दिरपर कोई चूड़ा नहीं है। मन्दिरमें श्रीजगन्नाथदेव,
श्रीराधावल्लभजी और जगदीशकी पत्नी दुःखिनी-माताके
द्वारा स्थापित श्रीगौरगोपालकी मूर्ति विराजमान है।
महाप्रभु जब यशड़ामें जगदीशके घरको पवित्र
करके नीलाचल जानेके लिये तत्पर हुए, तब दुःखिनी
श्रीगौरसुन्दरके विरहमें अत्यन्त कातर हो गयीं। यह
देखकर महाप्रभुने गौरगोपाल-विग्रहरूपमें यशड़ा-ग्राममें
उनकी सेवा स्वीकार की। तबसे श्रीगौरगोपाल-विग्रह
(पीतवर्णकी लकड़ीकी गोपाल-मूर्ति) वहाँ सेवित हो रहे
हैं।
कालनाके सिद्ध भगवान् दास बाबाजी महाराजने
कुछ समय यशड़ा-ग्राममें भजन किया था। बादमें वे
कालना चले गये, परन्तु वे कालनासे बीच-बीचमें
यशड़ा आया करते थे। तब विजयचन्द्र गोस्वामी
श्रीजगन्नाथदेवके सेवायत थे। श्रीगदाधर नामक एक
वैष्णव कविके द्वारा रचित जगदीश पण्डित गोस्वामीका
108 | श्रीचैतन्यचरितामृत
सूचक-गान अभी भी यशड़ा ग्राममें गाया जाता है। इस
गीतमें अल्प अक्षरोंमें जगदीश पण्डितका जीवन-वृत्तान्त
कहा गया है। खज्ज-भगवानके पुत्र रघुनाथाचार्य जगदीश
पण्डित गोस्वामीके शिष्य थे।
पौषी शुक्ला तृतीयाको श्रीजगदीश पण्डितका तिरोभाव
दिवस है। प्रति वर्ष पौषी शुक्ला द्वादशीको इनका
जन्मोत्सव होता है और स्नानयात्राके उपलक्ष्यमें अनेक
लोग यहाँ एकत्रित होते हैं॥ ३०॥
(16) धनञ्जय पण्डित (गोपाल-6) :-
नित्यानन्द-प्रियभृत्य पण्डित धनञ्जय।
अत्यन्त विरक्त, सदा कृष्णप्रेममय ॥31॥
अनुवाद-धनञ्जय पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रिय
सेवक थे। वे परम विरक्त और सदा श्रीकृष्णप्रेममें डूबे
रहते थे॥31॥
अनुभाष्य-‘पण्डित धनञ्जय'-इनका निवास कटोआके
निकट शीतल ग्राममें था। ये बारह गोपालोंमें 'वसुदाम'
सखा हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 127वाँ श्लोक)—
“वसुदामसखायश्च पण्डितः श्रीधनञ्जयः ॥ 127 (ख)॥”
“पूर्वकालके वसुदाम नामक सखा अब श्रीधनञ्जय
पण्डित हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)—
“धनञ्जय पण्डित महान्त विलक्षण।
याँहार हृदये नित्यानन्द अनुक्षण॥ 733॥”
“धनञ्जय पण्डित विलक्षण महात्मा हैं, श्रीनित्यानन्द
प्रभु उनके हृदयमें प्रतिक्षण विराजते हैं।”
शीतलग्राम बर्द्धमान जिलाके अन्तर्गत है। देवालय
चारों ओर मिट्टीकी दीवारके ऊपर फूसकी छतसे बना
हुआ है। बहुत वर्ष पहले 'बाजारवन कावाशी' गाँवके
मल्लिक महोदयने श्रीविग्रहके लिये एक पक्के घरका
निर्माण किया था। परन्तु वह मन्दिर अब टूट गया है।
प्राचीन मन्दिरकी नींव अभी भी वर्तमान है। प्रवेशपथके
बायीं ओर एक तुलसीकी बेदी है,-वही धनञ्जय
पण्डितकी समाधि-बेदी है। घरका द्वार पश्चिमकी ओर
है और घरमें श्रीधनञ्जयके द्वारा सेवित श्रीगोपीनाथ,
श्रीश्रीनिताइ-गौर और श्रीदामोदर-विग्रह विराजमान हैं।
देवालयसे थोड़ी दूर एक बगीचेमें श्रीविग्रहको ले जाकर
प्रत्येक वर्ष माघ मासके मध्यमें तिरोभाव-उत्सव होता
है। किसी-किसी का कहना है कि धनञ्जय पण्डितकी
वास्तविक जन्मभूमि चट्टग्राम जिला (वर्तमान बङ्गलादेश)
के 'जाड़' ग्राममें है। वहाँसे आकर इन्होंने शीतलग्राम
और साँचड़ा-पाँचड़ा ग्राममें श्रीविग्रह-सेवाको प्रकाशित
किया था।
कहा जाता है कि ये कुछ दिन नवद्वीपमें
महाप्रभुके साथ सङ्कीर्तन करके शीतलग्राम लौट आये
थे और वहाँसे श्रीवृन्दावन-धामके दर्शनको चले गये।
वृन्दावन जानेसे पहले साँचड़ा-पाँचड़ा ग्राममें कुछ समय
रहकर वहाँ अपने सहयात्री शिष्यको श्रीसेवा प्रकाश
करनेकी अनुमति देकर वृन्दावनके लिये प्रस्थान किया।
इसलिये साँचड़ा-पाँचड़ा ग्रामको भी लोग “धनञ्जयका
पाट' कहते हैं। आजकल इस गाँवमें धनञ्जय पण्डितके
वहाँ पूर्वकालमें रहनेका कोई भी प्रमाण नहीं है, परन्तु
शीतलग्राममें ही उनका प्रधान श्रीपाट है। वृन्दावनसे
लौटकर इन्होंने जलन्दि-ग्राममें देवसेवाकी और वहाँसे
पुनः शीतलग्राम आकर श्रीगौराङ्गदेवकी सेवाको प्रकट
किया।
सुना जाता है कि धनञ्जय पण्डितका कोई वंश
नहीं था। सञ्जय नामके उनके एक भाई थे, जिनके
पुत्रका नाम रामकानाइ ठाकुर था। सञ्जयका श्रीपाट
वर्द्धमान जिलाके 4-5 कोस पूर्व जलन्दि-ग्राममें है।
सञ्जयके वंशधरोंमें कुछ लोग जलन्दि-ग्राममें वास
करते हैं। इस स्थानपर श्रीराधागोविन्दकी सेवा है।
वर्तमान बोलपुरके अति निकट मुलुक-ग्राममें उक्त
रामकानाइका श्रीपाट है। किसी-किसीका कहना है कि
सञ्जय धनञ्जयके शिष्य थे। शीतलग्राममें अब जो
सेवायत हैं, वे सब धनञ्जय पण्डितके शिष्यके वंशधर
हैं। धनञ्जयके शिष्य जीवनकृष्णके द्वारा स्थापित प्राचीन
विग्रह श्रीश्यामसुन्दरजी अब गोपाल राय-चौधुरीके भवनमें
विराजमान हैं॥31॥
[ 11/32-33
(17) महेश पण्डित (गोपाल-7) :-
महेश पण्डित-व्रजेर उदार गोपाल।
ढक्कावाद्ये नृत्य करे प्रेमे मातोयाल ॥ 32 ॥
अनुवाद-महेश पण्डित व्रजके बारह गोपालोंमेंसे
एक हैं, जो बहुत उदार थे। वे ढोल-नगाड़े आदि
वाद्योंके साथ प्रेममें मत्त होकर नृत्य करने लगते
थे॥ 32 ॥
अनुभाष्य- 'महेश पण्डित'-इनका श्रीपाट बङ्गाब्द
1334 वर्षके प्रथम कुछेक महीनोंतक पालपाड़ामें स्थित
था। बादमें चाकदहके निकट काठालपुलि-ग्राममें स्थानान्तरित
हो गया था (गौड़ीय पत्रिका, षष्ठ वर्ष (खण्ड), 13
संख्यामें 'प्राप्तपत्र' द्रष्टव्य है)। ये द्वादश-गोपालमें
अन्यतम 'महाबाहु' सखा हैं। (गौरगणोद्देशदीपिका 129
श्लोकमें)-
“महेशपण्डितः श्रीमन्महाबाहुर्व्रजे सखा ॥ 129(ख) ॥ ”
“व्रजके महाबाहु सखा अब महेश पण्डित हैं।”
चैःभाः अन्त्यखण्ड छठा अः-
“महेश पण्डित अति परम महान्त॥ ”
“महेश पण्डित परम महात्मा हैं।”
'पालपाड़ा'-नदिया जिलामें चाकदह स्टेशन से एक
मील दक्षिणमें जङ्गलमें स्थित है। गङ्गा यहाँसे दूर है।
महेश पण्डित पहले जिराटके पूर्वतट पर मसिपुर या
यशीपुर(?) नामक स्थानमें रहते थे। परन्तु मसीपुर
गङ्गाके गर्भमें समाहित हो जानेके कारण उस स्थानसे
सुखसागरके निकटवर्ती बेलेडाङ्गामें महेश पण्डितके द्वारा
प्रतिष्ठित श्रीविग्रह कुछ समयके लिये थे, बादमें गङ्गाके
कटावके कारण वेलेडाङ्गा भी ध्वंस हो जानेसे पालपाड़ाके
जमीन्दार नवकुमार चट्टोपाध्याय उन श्रीविग्रहको उस
समयके सेवायेत बाबाजी रामकृष्णदाससे पूछकर पालपाड़ा
ले आये और वहाँ एक मन्दिरका निर्माण करवाया।
नवकुमार बाबूके पुत्र रजनीबाबूने 1883 ईसवीमें मन्दिरकी
जमीन हरेकृष्णदास बाबाजीके हाथों रजिस्ट्र
दी। तबसे उसका नाम 'पालपाड़ा-पाट' चला आ रहा
है। पालपाड़ा पाँचनगर-परगणाके अन्तर्गत है। बेलेडाङ्गा,
बेरिग्राम, सुखसागर, चान्दुड़े, मनसापोता, पालपाड़ा आदि
चौदह मौजा पाँचनगरमें रहनेके कारण कोई-कोई उसे
'नगरदेश' कहते हैं। किसी-किसीके मतानुसार, महेश
पण्डित यशड़ा-श्रीपाटके जगदीश पण्डितके छोटे भाई
हैं। उनके अनुसार जगदीश, हिरण्य और महेश
पण्डित-तीन भाई थे। जगदीश-बड़े, हिरण्य-मँझले
और महेश-छोटे हैं। ये महेश पण्डित ही जगदीशके
भाई हैं अथवा नहीं, इस विषयमें प्रामाणिक ग्रन्थोंमें
उल्लेख न रहनेके कारण इसकी सत्यता सन्देहकी
सीमामें है।
श्रीमहेश पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ पाणिहाटीके
महोत्सवमें उपस्थित थे और उत्सवके उपरान्त श्रीनित्यानन्द
प्रभुके साथ सप्तग्राम गये थे। भक्तिरत्नाकरकी आठवीं
तरङ्गमें लिखा है कि श्रीनरोत्तम ठाकुर जब खड़दहमें
आये थे, तब महेश पण्डित भी वहाँ उपस्थित थे।
श्रीपाटका मन्दिर सामान्य घर जैसा है। जीर्ण
मन्दिरमें श्रीगौरनित्यानन्द-श्रीमूर्ति, श्रीगोपीनाथ, श्रीमदनमोहन,
श्रीराधागोविन्द और शालग्राम विराजित हैं। मन्दिरके
सामने महेश पण्डितकी फूलसमाज-बेदी है। अब
भिक्षाके द्वारा ही सेवाका निर्वाह होता है। श्रीमहेश
पण्डितकी कोई वंशावली वर्तमान नहीं है॥ 32 ॥
(18) पुरुषोत्तम पण्डित (गोपाल-8) :-
नवद्वीपे पुरुषोत्तम पण्डित महाशय।
नित्यानन्द-नामे याँर महोन्माद हय ॥ 33 ॥
अनुवाद-नवद्वीपके वासी पुरुषोत्तम पण्डित महाशयको
श्रीनित्यानन्द प्रभुका नाम सुनते ही महा-उन्माद हो
जाता था ॥ 33 ॥
अनुभाष्य- 'पुरुषोत्तम पण्डित'- (चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय) -
“पण्डित पुरुषोत्तम नवद्वीपे जन्म।
नित्यानन्दस्वरूपेर महाभृत्य मर्म ॥ 737 ॥ ”
“नवद्वीपमें जन्में पुरुषोत्तम पण्डित श्रीनित्यानन्दस्वरूपके
110 | श्रीचैतन्यचरितामृत
महान् सेवकोंमें अन्यतम थे।” (गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक
130)—
“स्तोककृष्णं सखा प्राग् यो दासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ 130 ॥”
“स्तोककृष्ण नामक श्रीकृष्णके सखा अब श्रीपुरुषोत्तम
दास हैं।” किसी-किसीका कहना है कि इनका श्रीपाट
सुखसागरमें है॥ 33 ॥
(19) बलरामदास :-
बलराम दास—कृष्णप्रेमरसास्वादी।
नित्यानन्द-नामे हय परम उन्मादी ॥ 34 ॥
अनुवाद—बलराम दास श्रीकृष्णप्रेमका रसास्वादन
करनेवाले थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके नामसे ही वे परम
उन्मादी हो जाते थे॥ 34 ॥
अनुभाष्य—'बलरामदास'—(चैःभाः पाँचवाँ अध्याय)—
“प्रेमरसे महामत्त बलरामदास।
याँहार वातासे सब पाप याय नाश ॥ 734 ॥”
“बलरामदास प्रेमरसमें महामत्त रहते थे। उनके
अङ्गके स्पर्श करके आ रही वायुके स्पर्शसे सभी
पापोंका नाश हो जाता है॥” 34 ॥
(20) यदुनाथ कविचन्द्र :-
महाभागवत यदुनाथ कविचन्द्र।
याँहार हृदये नृत्य करे नित्यानन्द ॥ 35 ॥
अनुवाद—यदुनाथ कविचन्द्र महाभागवत थे, जिनके
हृदयमें सदा श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते रहते थे॥ 35 ॥
अनुभाष्य—'यदुनाथ कविचन्द्र'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय)—
“यदुनाथ कविचन्द्र—प्रेमरसमय।
निरवधि नित्यानन्द याँहार हृदय ॥ 735 ॥”
“यदुनाथ कविचन्द्र प्रेमरसमय हैं। उनके हृदयमें
श्रीनित्यानन्द प्रभु सदा वास करते हैं।” (चैःभाः
मध्यखण्ड प्रथम अध्याय)—
“रत्नगर्भ आचार्य विख्यात याँर नाम।
नित्यानन्द-प्रभुर बापेर सङ्गी, जन्म—एकग्राम ॥ 296 ॥
11/33–37 ]
तिन पुत्र—ताँर कृष्णपद-मकरन्द।
कृष्णानन्द, जीव, यदुनाथ कविचन्द्र ॥ 297 ॥”
“एक महाभाग्यवान् ब्राह्मण थे, जिनका नाम
रत्न-आचार्य था। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके पिताजीके
सङ्गी थे और उन दोनोंका जन्म एकचक्र ग्राममें ही
हुआ था। रत्न-आचार्यके तीन पुत्र थे,—कृष्णानन्द,
जीव और यदुनाथ कविचन्द्र। तीनों ही सदा श्रीकृष्णके
चरणकमलोंके मकरन्दका पान करते रहते थे॥” 35 ॥
(21) द्विज कृष्णदास :-
राढ़े याँर जन्म कृष्णदास द्विजवर।
श्रीनित्यानन्देर तैं हो परम किङ्कर ॥ 36 ॥
अनुवाद—कृष्णदासका जन्म राढ़देशमें हुआ था। वे
श्रेष्ठ ब्राह्मण और श्रीनित्यानन्द प्रभुके परम सेवक
थे॥ 36 ॥
अनुभाष्य—'कृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“राढ़े जन्म महाशय विप्र कृष्णदास।
नित्यानन्द-परिषदे याँहार विलास ॥ 739 ॥”
“ब्राह्मण कृष्णदासका जन्म राढ़देशमें हुआ था और
श्रीनित्यानन्द प्रभुके परिकरोंमें वे अन्यतम थे॥” 36 ॥
(22) कालाकृष्णदास (गोपाल-9)
काला-कृष्णदास बड़ वैष्णवप्रधान।
नित्यानन्द-चन्द्र बिना नाहि जाने आन ॥ 37 ॥
अनुवाद—कालाकृष्णदास श्रेष्ठ वैष्णवोंमें प्रधान थे।
वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त किसी औरको नहीं
जानते थे॥ 37 ॥
अनुभाष्य—'कालाकृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“प्रसिद्ध कालिया कृष्णदास त्रिभुवने।
गौरचन्द्र लभ्य हय याँहार स्मरणे॥ 740 ॥”
“कालाकृष्णदासकी ख्याति तीनों लोकोंमें है। उनके
स्मरणमात्रसे ही श्रीगौरचन्द्रकी प्राप्ति हो जाती है।”
ग्यारहवाँ अध्याय | 111
[ 11/37-39
गौरगणोद्देशदीपिका 132 श्लोक—
“कालः श्रीकृष्णदासः स यो लवङ्गः सखा व्रजे ॥132(ख)॥”
“व्रजके लवङ्ग नामक सखा कालाकृष्णदास है।” ये
द्वादश गोपालोंमें अन्यतम ‘लवङ्ग’ सखा हैं। इनका
श्रीपाट बर्द्धमान जिलाके ‘आकइहाट’ ग्राममें है।
आकइहाट-गाँव बहुत ही छोटा है, इसलिये वहाँ बहुत
कम लोग रहते हैं। श्रीपाट आजकल श्रीहीन है।
कालाकृष्णदास ठाकुरके समाधि-मन्दिरकी छतकी लकड़ियाँ
टूट गयी हैं और उन्होंने समाधिको ढक दिया है।
रास्तेमें आमके बगीचेके भीतर होकर जानेसे सामने
एक टूटी हुई कोठरी दिखलायी देती है। कोठरीमें
श्रीविग्रहशून्य बेदी और कोठरीके पूर्व-दक्षिण कोणकी
ओर फूसकी छतवाला घर है, इसमें सेवायतगणोंका
समाज है। दक्षिण दिशाकी ओर एक कुण्ड है, जिसे
‘नूपुरकुण्ड’ कहते हैं। सुना जाता है कि इस कुण्डमें
श्रीखण्डनिवासी मुकुन्दके पुत्र रघुनन्दन ठाकुरका और
किसी-किसीके मतानुसार श्रीनित्यानन्द प्रभुका नूपुर गिरा
था। सुननेमें आता है कि वह नूपुर और आकाइहाट
श्रीपाटके श्रीराधावल्लभ एवं श्रीगोपालजी, आकाइहाटसे
तीन कोसकी दूरीपर कडुइ-गाँवमें महान्तके घर आज
भी विराजमान हैं। 1200 (बङ्गाब्द) वर्षकी हाथोंसे
लिखी एक श्रीचैतन्यभागवत और 1191 वर्षकी हाथोंसे
लिखी एक श्रीचरितामृत भी वहाँ है। चैत्रमासकी
कृष्णद्वादशी-वारुणीके दिन यहाँ श्रीकालाकृष्णदास ठाकुरका
तिरोभाव-उत्सव सम्पन्न होता है।
पावना जिलाके सोनातला गाँवके निवासी ‘गोस्वामी’
महोदयके अनुसार कालाकृष्णदास वरेन्द्र श्रेणीके ब्राह्मणकुलमें
जन्में थे और वे भरद्वाज-गोत्र एवं भादड़-गाँवके
निवासी हैं। आकाइ-हाटसे हरिनाम प्रचार करनेके लिये
कालाकृष्णदास ठाकुर पावनामें आये। जिस स्थानपर
उन्होंने आश्रम बनाया, उस स्थानपर अभी भी गृहादिके
टूटे चिह्न विद्यमान हैं। बादमें उनके परिवारवाले भी इस
स्थानमें आये। आकाइहाटमें वारेन्द्र ब्राह्मण न रहनेके
कारण उन्होंने इस देशमें ही विवाह किया और कुछ
दिनोंके पश्चात् वे पुनः आकाइहाट और फिर श्रीवृन्दावन
चले गये।
सोनातला-गाँवमें वास करते समय उनका ‘श्रीमोहनदास’
नामक एक पुत्र हुआ; जिसे सोनातला या भादुटी-मथुरापुर
ग्राममें मामाके घरमें छोड़कर अपनी सारी सम्पत्ति देकर
वे धर्मपत्नी-सहित श्रीवृन्दावन चले गये। श्रीवृन्दावनमें
भी उनका ‘गौराङ्गदास’ नामक एक और पुत्र हुआ।
श्रीवृन्दावनमें जन्म होनेके कारण ‘गौराङ्गदास’ का दूसरा
नाम वृन्दावनदास भी था। कुछ समय पश्चात् उन्होंने
अपने छोटे पुत्र वृन्दावनदासको बड़े पुत्र मोहनदासके
पास भेज दिया और सम्पत्तिका (एक रुपये अर्थात्
सोलह आनामें) छह आना अंश स्वीकार करनेकी
आज्ञा प्रदान की। गौराङ्गदासने श्रीवृन्दावनके श्रीगोविन्दजीके
अनुरूप श्रीकालाचाँद विग्रहको प्रकाशित किया और
अपने बड़े भाईके साथ श्रीविग्रहकी सेवा करने लगे।
कालाकृष्णदास ठाकुरके वशंधरगण पावना-जिलाके
सोनातला आदि स्थानोंपर आज भी वर्तमान हैं।
सोनातला-ग्राममें स्थित आश्रम-भवनकी नींव, मन्दिरकी
ईंटें और कुण्डका घाट आज भी दिखायी देता है।
यहाँके श्रीविग्रह-श्रीकालाचाँदजी बारी-बारीसे काला-
कृष्णदासके वशंधरोंके द्वारा सेवित होते हैं। यहाँ
अग्रहायण-मासके कृष्णद्वादशीके दिन कालाकृष्णदास
ठाकुरका तिरोभाव-उत्सव सम्पन्न होता है॥37॥
(23) सदाशिव कविराज,
(24) पुरुषोत्तम (गोपाल-10) :-
श्रीसदाशिव कविराज-बड़ महाशय।
श्रीपुरुषोत्तमदास-ताँहार तनय॥38॥
‘नागर’ पुरुषोत्तम :-
आजन्म निमग्न नित्यानन्देर चरणे।
निरन्तर बाल्यलीला करे कृष्ण-सने॥39॥
अनुवाद-श्रीसदाशिव कविराज महाशयके पुत्र
श्रीपुरुषोत्तमदास हैं। जन्मसे ही श्रीपुरुषोत्तमदासका मन
112 | श्रीचैतन्यचरितामृत
11/38-40 ]
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें निमग्न रहता था और वे निरन्तर श्रीकृष्णके साथ बाल्यलीला करते थे॥३८-३९॥
अनुभाष्य—'सदाशिव कविराज और नागर पुरुषोत्तम'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
"सदाशिव कविराज महाभाग्यवान्।
यॉर पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास नाम॥741॥
बाह्य नाहि पुरुषोत्तम दासेर शरीरे।
नित्यानन्दचन्द्र यॉर हृदये विहरे॥742॥"
"महाभाग्यवान् सदाशिव कविराजके पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास थे। श्रीपुरुषोत्तम दासको अपने बाह्य शरीरका ज्ञान नहीं रहता था, क्योंकि उनके हृदयमें सदा श्रीनित्यानन्द प्रभु विहार करते थे।” गौरगणोद्देशदीपिका 156 श्लोकमें—
"पुरा चन्द्रावली यासीद्व्रजे कृष्णप्रिया परा।
अधुना गौड़देशे सा कविराजः सदाशिवः॥156॥"
"ब्रजमें जो पहले श्रीकृष्णकी परमप्रिया चन्द्रावली थीं, वे अब गौड़देशमें सदाशिव कविराज हैं।” गौरगणोद्देशदीपिका 131 श्लोकमें—
"सदाशिवसुतो नाम्ना नागरः पुरुषोत्तमः।
वैद्यवंशोद्भवो नाम्ना दामा योबल्लवो ब्रजे॥131॥"
"ब्रजमें 'दाम' नामक गोप सखा अब वैद्यवंशमें उत्पन्न सदाशिवके पुत्र नागर-पुरुषोत्तम हैं।”
सदाशिव कविराजके पिता कंसारि सेन श्रीकृष्णलीलामें ब्रजकी 'रत्नावली' सखी हैं। कोई-कोई कहते हैं कि कंसारि सेनका निवास गुप्तिपाड़ामें हैं, परन्तु अब इसका कोई चिह्न वहाँ नहीं दिखायी देता। जो भी हो, इन सबकी भाँति चार पुरुष-परम्परा (श्रीकंसारिसेन, उनके पुत्र श्रीसदाशिव कविराज, उनके पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास और उनके पुत्र श्रीकानु ठाकुर) से सिद्ध गौरभक्त अन्यत्र विरले ही हैं।
श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरका श्रीपाट पहले चाकदह और सुखसागरमें था। पहले बेलेडाङ्गा गाँवके ध्वंस हो जानेसे श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरके सभी श्रीविग्रह सुखसागरमें लाये गये। परन्तु बादमें सुखसागरके भी गङ्गाके गर्भमें समा जानेसे, उस स्थानपर श्रीजाह्नवा-माताकी जो गद्दी थी, उस गद्दीके श्रीविग्रहोंके साथ पुरुषोत्तम ठाकुरके भी श्रीविग्रह साहेबडाङ्गा बेड़ीग्राममें आये। बेड़ीग्राम ध्वंस होनेपर जाह्नवा-माताके गद्दीके श्रीविग्रहोंके साथ पुरुषोत्तम ठाकुरके श्रीविग्रह प्राय पचास वर्ष तक नदीया जिलाके अन्तर्गत चान्दुड़े-गाँवमें विराजमान थे। प्राचीन सुखसागर नदीगर्भमें समा जानेके कारण नवीन सुखसागर इस चांदुड़े-गाँवसे 3-4 मीलकी दूरीपर कालीगञ्जके दक्षिणमें अवस्थित है।
श्रीनित्यानन्द प्रभुके दामाद (श्रीमती गङ्गादेवीके पतिदेव) जिराट्-निवासी श्रीमाधवाचार्य (माधव चट्टोपाध्याय) किसी-किसीके मतानुसार श्रीनित्यानन्द प्रभुके और किसी-किसीके मतानुसार श्रीजाह्नवादेवीके तथा किसी-किसीके मतानुसार इन श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरके शिष्य थे। 'वैष्णव-वन्दना' के लेखक श्रीदेवकीनन्दन दास इन्हींके ही शिष्य थे, इस बातका वैष्णव वन्दनामें स्पष्ट उल्लेख है।
वर्तमान मन्दिर मिट्टीकी दीवारोंपर फूसकी छतसे बना घर है। मन्दिरगृहमें श्रीजगन्नाथ, श्रीबलराम, सुभद्रा, निताइ-गौर-दो-दो विग्रह, गोपीनाथ, जाह्नवा-माता, बालगोपाल, राधागोविन्द-पाँचयुगल; रेवती और श्रीबलराम, एवं शालग्राम विराजित हैं। किसी-किसीका ऐसा कहना है कि इनमेंसे कुछ श्रीमूर्तियाँ पुरुषोत्तम ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित हैं एवं शेष श्रीमूर्तियाँ जाह्नवा-देवीकी गद्दीकी हैं। यह श्रीपाट 'वसु-जाह्नवाका श्रीपाट' के नामसे भी विख्यात है। निम्नलिखित सेवायेत महान्तगणोंके नाम चादुंड़े-श्रीपाटमें मिलते है,—(1) गोपालदास महान्त, (2) रामकृष्ण, (3) बिहारीदास, (4) रामदास, (5) गोपालदास और (6) सीतानाथ दास॥38-39॥
(25) कानु ठाकुर :-
तॉर पुत्र-महाशय श्रीकानु ठाकुर।
यॉर देहे रहे कृष्ण-प्रेमामृतपूर॥40॥
अनुवाद—श्रीपुरुषोत्तमदासके पुत्र श्रीकानु ठाकुर हैं,
ग्यारहवाँ अध्याय | 113
[ 11/40
जिनके देहमें श्रीकृष्णप्रेमका अमृत सदा परिपूर्ण रहता
है॥ 40 ॥
अनुभाष्य - 'कानु ठाकुर' - कोई-कोई इन्हें
द्वादशगोपालोंमें अन्यतम कहते हैं। इनका निवास
बोधखाना है।
ठाकुर कानाइके पूर्वजोंमें चतुर्थ पुरुष (चार पीढ़ी
पूर्व-पितामहके पितामह) श्रीकंसारि सेनका नाम 'सम्बरारि'
है। देवकीनन्दनने वैष्णव-वन्दनामें ठाकुर कानाइके
पूर्वज चार पुरुषोंका नाम उल्लेख किया है,-
“श्रीकंसारि सेन वन्दों सेन श्रीवल्लभ।
सदाशिव कविराज वन्दों एक मने।
निरन्तर प्रेमोन्माद, बाह्य नाहि जाने।
इष्टदेव वन्दों श्रीपुरुषोत्तम नाम।
के कहिते पारे ताँर गुण अनुपाम॥”
“सदाशिवके पुत्र पुरुषोत्तम ठाकुर हैं और पुरुषोत्तम
ठाकुरके पुत्र ही कानुठाकुर हैं। कानुठाकुरके वंशज
पुरुषोत्तम ठाकुरको 'नागर पुरुषोत्तम' से पृथक् मानते
हैं। उनका कहना है कि 'दास पुरुषोत्तम' के रूपमें
जिनका नाम गौरगणोद्देशमें उल्लिखित है, एवं ब्रजलीलामें
जो स्तोक-कृष्ण हैं, वही कानु ठाकुरके पिता हैं, परन्तु
गौरगणोद्देशमें वैद्यवंशमें आविर्भूत सदाशिवके पुत्र पुरुषोत्तम
ही 'नागर पुरुषोत्तम' के रूपमें उल्लिखित हैं। वे 'नागर
पुरुषोत्तम' ब्रजलीलामें 'दाम' नामक सखा हैं। कानुठाकुरके
वंशजोंमें एक किंवदन्ती प्रचलित है कि पुरुषोत्तम
ठाकुर गङ्गाके पूर्वीतटपर 'सुखसागर' नामक गाँवमें रहते
थे। पुरुषोत्तमकी पत्नीका नाम 'जाह्नवा' था। ठाकुर
कानाइके जन्मके बाद ही जाह्नवा अप्रकट हो गयीं।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने जब पुरुषोत्तम ठाकुरकी धर्मपत्नीके
वियोगकी बात सुनी, तब वे उनके घर आये और
बारह दिनके शिशु (कानु ठाकुर) को अपने भवन
खड़दह ले गये।
कानुठाकुरके वंशजोंके मतानुसार 1457 शकाब्दमें
(बङ्गाब्द 942 वर्ष) आषाढ़-मासकी शुक्ला-द्वितीय
बृहस्पतिवारको रथयात्राके दिन कानाइ ठाकुर आविर्भूत
हुये थे। बचपनसे ही ठाकुरमें कृष्णभक्ति-परायणताको
देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनका नाम 'शिशुकृष्णदास'
रखा था।
शिशुकृष्णदास जब पाँच वर्षके थे, तब ईश्वरी
जाह्नवा-माताके साथ श्रीवृन्दावन-धाम गये थे। श्रीजीव
गोस्वामी आदि प्रमुख व्रजवासियोंने शिशुकृष्णदासके
भावादिको देखकर उन्हें 'ठाकुर कानाइ' नाम प्रदान
किया। जनश्रुति है कि ठाकुर कानाइ जब वृन्दावनमें
कीर्त्तनके आनन्दमें विह्वल होकर नृत्य कर रहे थे, तब
उनके दक्षिण पैरका एक नूपुर अन्तर्हित हो गया, तब
ठाकुर कानाइने कहा कि 'जिस स्थानपर यह नूपुर गिरा
है, मैं उसी स्थानपर निवास करूँगा।' सुननेमें आता है
कि यशोहर जिलाके 'बोधखाना' नामक गाँवमें यह नूपुर
गिरा था, तबसे ठाकुर कानाइ 'बोधखाना' में आकर
रहने लगे।
इनकी वंश-परम्परामें एक और जनश्रुति प्रचलित
है कि श्रीमन्महाप्रभुके आविर्भावके कुछ सौ वर्ष पूर्वसे
सदाशिवके किसी पूर्वजके द्वारा प्रतिष्ठित 'प्राणवल्लभ'
विग्रहकी सेवा चली आ रही थी। ये 'प्राणवल्लभ' अभी
भी बोधखानामें सेवित हो रहे हैं।
'साम्प्रदायिक दङ्गों' के समय ठाकुर कानाइके
ज्येष्ठ पुत्रकी सन्तानोंको छोड़कर वंशीवदन आदि
अन्यान्य पुत्र बोधखाना छोड़कर भाग गये एवं नदीया
जिलाके अन्तर्गत 'भाजनघाट' नामक गाँवमें जाकर रहने
लगे। ठाकुर कानाइके छोटे पुत्रोंमेंसे 'हरिकृष्ण गोस्वामी'
'साम्प्रदायिक दङ्गों' के मिट जानेके पश्चात् बोधखानामें
आये। इन्होंने 'प्राणवल्लभ' नामसे और एक नये
विग्रहकी प्रतिष्ठा की। अभी भी बोधखाना गाँवमें ठाकुर
कानाइके ज्येष्ठ पुत्रोंके वंशजोंके द्वारा प्राचीन 'श्रीप्राणवल्लभ'
की और कनिष्ठ पुत्रके वंशजोंके द्वारा नये प्रतिष्ठित
'प्राणवल्लभ' की सेवा हो रही है। भाजनघाटमें
'श्रीराधावल्लभ' विग्रह सेवित हो रहे हैं। प्रेमविलास-ग्रन्थमें
लिखा है कि कानु ठाकुर खेतरिके उत्सवके समय
श्रीजाह्नवा-देवी और श्रीवीरभद्रप्रभुके साथ वहाँ उपस्थित
थे।
114 | श्रीचैतन्यचरितामृत
11/40-41 ]
पुरुषोत्तम ठाकुर और कानु ठाकुरके अनेक
ब्राह्मण शिष्य थे। पुरुषोत्तम ठाकुरके ब्राह्मण शिष्योंमेंसे
प्रधान चारके नाम इस प्रकारसे वर्णित हैं—
“तस्य प्रियतमाः शिष्याश्चत्वारो ब्राह्मणोत्तमाः।
श्रीमुखो माधवाचार्यो यादवाचार्यो-पण्डित॥
देवकीनन्दन-दासः प्रख्यातो गौड़मण्डले।
येनैव रचिता पुस्ती श्रीमद्वैष्णव-वन्दना॥”
“श्रीमुख, श्रीमाधवाचार्य, श्रीयादवाचार्य और
श्रीदेवकीनन्दन दास उनके प्रिय चार उत्तम ब्राह्मण शिष्य
थे। गौड़मण्डलमें विख्यात श्रीदेवकीनन्दन दासने
श्रीमद्वैष्णव-वन्दना ग्रन्थकी रचना की थी।”
ये माधवाचार्य श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कन्या गङ्गादेवीके
पति हैं। सुखसागर गाँव ध्वंस हो जानेके पश्चात्
पुरुषोत्तमके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीविग्रह चादुड़ियाँमें लाये
गये। आजकल जिराट्के गङ्गा-वंशजोंकी देखरेखमें उनके
अन्यान्य विग्रहके साथ सेवित हो रहे हैं। पुरुषोत्तम
ठाकुरका श्रीपाट ‘वसु-जाह्नवाका’ श्रीपाट नामसे भी
कहा जाता है।
कानु ठाकुरके शिष्योंने मेदिनीपुर-जिलाके शिलावती
नदीके पास गड़वेता नामक गाँवमें वास किया। सामवेदीय
कौथुमी-शाखाके राढ़ीश्रेणीय “श्रीराम’ नामक एक ब्राह्मण
कानाइ ठाकुरके प्रसिद्ध शिष्य थे॥40॥
(26) उद्धारण ठाकुर (गोपाल-11) :—
महाभागवत-श्रेष्ठ दत्त उद्धारण।
सर्वभावे सेवे नित्यानन्देर चरण॥41॥
अनुवाद—उद्धारण दत्त श्रेष्ठ महाभागवत थे। वे
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंकी सभी प्रकारसे सेवा करते
थे॥41॥
अनुभाष्य—‘उद्धारणदत्त’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 129वाँ
श्लोक)—
“सुबाहुर्यो ब्रजे गोपो दत्त उद्धारणाख्यकः॥129(क)॥”
“ब्रजके ‘सुबाहु’ नामक गोप अब उद्धारण दत्त
कहलाते हैं।” इनका निवास स्थान हुगली जिलाके
अन्तर्गत सप्तग्राममें हैं। पहले ‘सप्तग्राम’ कहनेसे
वासुदेवपुर, बाँशवेड़िया, कृष्णपुर, नित्यानन्दपुर, शिवपुर,
शङ्खनगर और सप्तग्रामको समझा जाता था। चैःभाः
अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“उद्धारण दत्त महावैष्णव उदार।
नित्यानन्द-सेवााय याँहार अधिकार॥743॥”
“उद्धारण दत्त महावैष्णव और परम उदार थे।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सेवामें उनका अधिकार था।”
चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“कतदिन थाकि’ नित्यानन्द खड़दहे।
सप्तग्राम आइलेन सर्वगण सहे॥443॥
उद्धारण दत्त भाग्यवन्तरे मन्दिरे।
रहिलेन प्रभुवर त्रिवेणीर तीरे॥449॥
कायमनोवाक्ये नित्यानन्देर चरण।
भजिलेन अकैतवे दत्त उद्धारण॥450॥
यतेक वणिककुल उद्धारण हैते।
पवित्र हइल, द्विधा नाहिक इहाते॥453॥”
“खड़दहमें कुछ दिन रहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु सभी
परिकरोंके साथ सप्तग्राममें पधारे। त्रिवेणीके तटपर
स्थित सप्तग्राममें उद्धारण दत्तके घरमें प्रभु ठहरे।
उद्धारण दत्तने निष्कपट भावसे काय-मन-वाक्यके द्वारा
श्रीनित्यानन्दके चरणोंकी सेवा की। वहाँ जितने भी
वणिक कुल थे, सभी उद्धारण दत्तके कारण पवित्र हो
गये, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है।” उद्धारण दत्त
शौक्रसुवर्णवणिक (सोनेके व्यापारी) कुलमें आविर्भूत
हुये थे।
सप्तग्राममें श्रीउद्धारण ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित और
उनके हाथोंसे सेवित महाप्रभुकी षड्भुज मूर्ति है। उनके
दायीं ओर श्रीनित्यानन्द प्रभु और बायीं ओर श्रीगदाधर
विराजमान हैं। श्रीराधागोविन्द मूर्ति, श्रीशालग्राम और
सिंहासन-बेदीके नीचे श्रीउद्धारण ठाकुर महाशयका
चित्रपट अर्चित होता है। वर्तमान श्रीमन्दिरके सामने
एक बड़ा नाट्य-मन्दिर है। नाट्य-मन्दिरके प्रत्येक
ग्यारहवाँ अध्याय | 115
[ 11/41-43
स्तम्भपर स्मृतिरक्षक पत्थरके पटलोंपर मन्दिरके निर्माता
और श्रीपाटके संस्कार करवानेवालोंके नाम खुदे हुए
हैं। नाट्यमन्दिरके सामने ही एक सुशीतल छायापूर्ण
माधवी-मण्डप है। माधवी-मण्डपके दोनों ओर दो
स्तम्भ हैं, एकमें उद्धारण ठाकुर महाशयका चित्रपट
और दूसरेमें पत्थरके पटलपर चतुर्युगके चार
तारक-ब्रह्मनाम खुदे हुए हैं।
1283 (बङ्गाब्द) वर्षमें निताइदास बाबाजी नामक
एक भिक्षुने श्रीपाटके लिये बारह बीघा भूमि संग्रह की
थी। तत्पश्चात् किसी-किसीकी विशेष चेष्टासे श्रीपाटकी
सेवा कुछ दिनोंतक चलनेपर भी धीरे-धीरे सेवामें कमी
होती गयी। तदुपरान्त 1306 (बङ्गाब्द) वर्षमें हुगलीके
भूतपूर्व सब-जज बलराम मल्लिक और कोलकाता-निवासी
अनेक धनी सुवर्ण-व्यापारियोंकी एकजुट चेष्टासे पुनः
श्रीपाटकी सेवामें कुछ परिपाटी दिखाई देने लगी।
1875 ईसवीके लगभग पहले एक टूटी-फूटी
कुटियामें हुगली-वालि-निवासी परलोकगत जगमोहन
दत्तके द्वारा प्रतिष्ठित श्रील उद्धारण ठाकुरकी एक
दारुमयी (लकड़ीकी) श्रीमूर्त्ति विराजित थी। वह श्रीमूर्त्ति
अब सप्तग्राम-श्रीपाटमें नहीं है। उनका चित्रपट ही अब
पूजित हो रहा है। लगभग सौ वर्ष पूर्व अनुसन्धानसे
सुना गया था कि उद्धारण ठाकुरकी वह श्रीमूर्त्ति तब
हुगली-वालि-निवासी श्रीमदन दत्त महोदयके घरमें और
ठाकुरके द्वारा सेवित श्रीशालग्राम उसी गाँवमें श्रीनाथ
दत्तके घरमें विराजमान थे।
ठाकुर उद्धारण काटोयासे डेढ़ मील उत्तरी दिशाकी
ओर 'नैहाटी'-गाँवमें राजाके दीवान थे। दाँइहाट स्टेशनके
निकट अभी भी राजवंशके लोगोंके महलोंके भग्नावशेष
दिखायी देते हैं। ठाकुर राजकार्यके उपलक्ष्यमें जिस
स्थानपर वास करते थे, उस स्थानका नाम 'उद्धारण-पुर'
है। कहा जाता है कि ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित यहाँके
श्रीनिताइगौर-विग्रह वनओयारीबादकी राजधानीसे लाये
गये थे। इस स्थानपर स्थित मन्दिरके पश्चिम ओर
(और किसी-किसीके मतानुसार, वृन्दावनमें) ठाकुरकी
समाधि वर्तमान है। किसीके मतानुसार, ठाकुरके पिताका
नाम श्रीकर, माताका नाम भद्रावती और पुत्रका नाम
श्रीनिवास है॥41॥
(27) वैष्णवानन्द आचार्य :-
आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति-अधिकारी।
पूर्वे नाम छिल याँर 'रघुनाथ पुरी' ॥ 42 ॥
अनुवाद-आचार्य वैष्णवानन्द परम भक्त थे और
उनका पहले नाम रघुनाथपुरी था॥42॥
अनुभाष्य-'वैष्णवानन्द आचार्य'-चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय-
“आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार।
पूर्वे 'रघुनाथपुरी'-नाम ख्याति याँर ॥ 746 ॥ ”
“आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार थे। पहले ये
रघुनाथपुरीके नामसे विख्यात थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
96-97वाँ श्लोक)-
“वृन्दावने याः प्रागासन्नणिमाद्याष्टसिद्धयः।
ता एवाष्टौ भक्तरूपा भूता गौड़े च ते यथा॥96॥
अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः।
कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ।
पुर्युपाधिक्रमाज्ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः॥97॥”
“पूर्वकालमें श्रीवृन्दावनमें जो अणिमा आदि
अष्टसिद्धियाँ थीं, उन्होंने गौड़देशमें आठ भक्तोंके रूपमें
जन्म ग्रहण किया है। क्रमसे उन आठोंके नाम इस
प्रकार हैं, यथा-अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ,
कृष्णानन्द, केशव, दामोदर और राघव। ये आठों 'पुरी'
उपाधिसे युक्त थे॥”42॥
(28) विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास-तीन भाई :-
विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास,-तिन भाइ।
पूर्वे याँर घरे छिला ठाकुर निताइ ॥ 43 ॥
अनुवाद-विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास-ये तीन
भाई थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आनेपर पहले इनके
घरमें आकर रहे थे॥43॥
116 | श्रीचैतन्यचरितामृत
11/43-46 ]
अनुभाष्य—'विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास'—ये
तीनों भाई नवद्वीपवासी भट्टाचार्य हैं। विष्णुदास और
गङ्गादास कुछ दिनोंके लिये नीलाचलमें महाप्रभुके पास
रहे थे (चैःचः आदिलीला, 10/151 संख्या)। नन्दनाचार्यके
घरमें महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य छिपे थे। श्रीनित्यानन्द
प्रभुने भी नवद्वीपमें आकर कुछ दिन इनके घरमें वास
किया था। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“चतुर्भुज पण्डित-नन्दन गङ्गादास।
पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर विलास॥ 745॥”
“चतुर्भुज पण्डितके पुत्र गङ्गादासके घर किसी एक
समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने विहार किया था॥”43॥
(29) परमानन्द उपाध्याय, (30) जीव पण्डित :-
नित्यानन्दभृत्य—परमानन्द उपाध्याय।
श्रीजीव पण्डित नित्यानन्द-गुण गाय॥ 44॥
अनुवाद—परमानन्द उपाध्याय श्रीनित्यानन्द प्रभुके
सेवक थे और श्रीजीव पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुका
गुणगान करते थे॥ 44॥
अनुभाष्य—'परमानन्द उपाध्याय'—चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय—
“परमानन्द उपाध्याय—वैष्णव एकान्त॥ 744॥”
“परमानन्द उपाध्याय ऐकान्तिक वैष्णव थे।”
'श्रीजीव पण्डित'—ये श्रीनित्यानन्द प्रभुके पिता श्रीहाड़ाइ
ओझाके बाल्यकालके मित्र रत्नगर्भ आचार्यके मंझले
पुत्र हैं। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“महाभाग्यवन्त जीवपण्डित उदार।
याँर घरे नित्यानन्दचन्द्रेर विहार॥ 751॥”
“जीव पण्डित उदार और महाभाग्यवान् हैं, क्योंकि
उनके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने विहार किया था।”
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 169वाँ श्लोक)—
“इन्दिरा जीवपण्डितः॥ 169(ख)॥”
“श्रीजीव पण्डित व्रजकी इन्दिरा हैं॥”44॥
(31) परमानन्द गुप्त :-
परमानन्द गुप्त—कृष्णभक्त महामति।
पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर वसति॥ 45॥
अनुवाद—परमानन्द गुप्त बहुत बुद्धिमान और श्रीकृष्ण
भक्त थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके घरमें भी रहे
थे॥ 45॥
अनुभाष्य—'परमानन्द गुप्त'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“प्रसिद्ध परमानन्द गुप्त महाशय।
पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर आलय॥ 747॥”
“प्रसिद्ध परमानन्द गुप्त महाशयके घरमें श्रीनित्यानन्द
प्रभुका अवस्थान था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं
199वाँ श्लोक)—
“मालती चन्द्रलतिका 'मञ्जुमेधा' वराङ्गदा॥ 194(क)॥
'परमानन्दगुप्तो' यत्कृता कृष्णस्तवकवली॥ 199(ख)॥”
“व्रजकी मञ्जुमेधा वही परमानन्द गुप्त हैं, जिन्होंने
श्रीकृष्ण 'स्तवावली' की रचना की है॥”45॥
(32) नारायण, (33) कृष्णदास,
(34) मनोहर, (35) देवानन्द :-
नारायण, कृष्णदास, आर मनोहर।
देवानन्द—चारि भाइ निताइ-किङ्कर॥ 46॥
अनुवाद—नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानन्द—ये
चारों भाई श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे॥ 46॥
अनुभाष्य—'नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानन्द'—
चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“कृष्णदास, देवानन्द—दुइ शुद्धमति॥ 749(क)॥
नित्यानन्दप्रिय 'मनोहर', नारायण'।
'कृष्णदास', 'देवानन्द'—एइ चारिजन॥ 752॥”
“कृष्णदास और देवानन्द, ये दोनों शुद्धमति थे।
मनोहर, नारायण, कृष्णदास और देवानन्द—ये चारों
श्रीनित्यानन्द प्रभुके अति प्रिय थे॥”46॥
ग्यारहवाँ अध्याय | 117
[ 11/47-51
(36) होड़ कृष्णदास :-
होड़ कृष्णदास-नित्यानन्दप्रभु-प्राण।
श्रीनित्यानन्द-पद बिना नाहि जाने आन॥ 47॥
अनुवाद—होड़ कृष्णदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्राण
थे। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंके अतिरिक्त कुछ नहीं
जानते थे॥ 47॥
अनुभाष्य—'होड़ कृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“बड़गाछि-निवासी सुकृति कृष्णदास।
याँहार मन्दिरे नित्यानन्देर विलास॥ 748॥”
“बड़गाछिमें निवास करनेवाले कृष्णदास बड़े सुकृतिवान्
थे, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके घरमें विलास
किया था।” बड़गाछिके माहात्म्यके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय और (नवनी होड़) पयार संख्या 50
का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 47॥
(37) नकड़ि, (38) मुकुन्द, (39) सूर्य,
(40) माधव, (41) श्रीधर (गोपाल-12),
(42) रामानन्द, (43) जगन्नाथ, (44) महीधर :-
नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर।
रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर॥ 48॥
(45) श्रीमन्त, (46) गोकुलदास, (47) हरिहरानन्द,
(48) शिवाइ, (49) नन्दाइ, (50) परमानन्द :-
श्रीमन्त, गोकुलदास, हरिहरानन्द।
शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द॥ 49॥
(51) वसन्त, (52) नवनी, (53) गोपाल, (54) सनातन,
(55) विष्णाइ, (56) कृष्णानन्द, (57) सुलोचन :-
वसन्त, नवनी होड़, गोपाल, सनातन।
विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द, सुलोचन॥ 50॥
अनुवाद—नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर,
रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर, श्रीमन्त, गोकुलदास,
हरिहरानन्द, शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द, वसन्त,
नवनी होड़, गोपाल, सनातन, विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द
और सुलोचन—ये सभी श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास
थे॥ 48-50॥
अनुभाष्य—'नवनी होड़'—बड़गाछि-निवासी हरि होड़के
पुत्र राजा कृष्णदास होड़ थे। बड़गाछि (बहिरगाछि) के
निकट शालिग्राममें राजा कृष्णदासके प्रयाससे श्रीनित्यानन्द
प्रभुका विवाह हुआ (भक्तिरत्नाकर 12 तरङ्ग)। नवनी
होड़ राजा कृष्णदासके पुत्र थे। इनकी वंशावली अब
'रुकुणपुर' में है। रुकुणपुर बहिरगाछिसे कुछ दूरीपर है।
ये सब जन्मसे शौक्रदक्षिण राढ़ीय कायस्थ थे, परन्तु
उनमें ब्राह्मण-संस्कार होनेके कारण सभी वर्णोंको दीक्षा
प्रदान करते थे। पहले बड़गाछिमें गङ्गा प्रवाहित होती
थी, अब वह 'काल्शिकी नहर' नामसे प्रसिद्ध है।
'कृष्णानन्द'—35 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48-50॥
(58) कंसारि, (59) रामसेन, (60) रामचन्द्र,
(61) गोविन्द, (62) श्रीरङ्ग, (63) मुकुन्द :-
कंसारि सेन, रामसेन, रामचन्द्र कविराज।
गोविन्द, श्रीरङ्ग, मुकुन्द, तिन कविराज॥ 51॥
अनुवाद—कंसारि सेन, रामसेन और रामचन्द्र
कविराज श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे। तीन
कविराज—गोविन्द, श्रीरङ्ग और मुकुन्द भी श्रीनित्यानन्द
प्रभुके किङ्कर थे॥ 51॥
अनुभाष्य—'कंसारि सेन'—गौरगणोद्देशदीपिका 194 और
200 श्लोक—
'रत्नावली' च कमला गुणचूडा सुकेशिनी॥ 194(ख)॥
'कंसारिसेनः' सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः॥ 200(ख)॥
“ये व्रजकी 'रत्नावली' हैं।”
'सदाशिव कविराज'— (चैः चः आदिलीला, 11/38)
का अनुभाष्य द्रष्टव्य है।
'रामचन्द्र कविराज'—खण्डवासी चिरञ्जीव और
सुनन्दाके पुत्र एवं श्रीनिवासाचार्यके शिष्य तथा ठाकुर
नरोत्तमके प्रियबन्धु हैं। नरोत्तम ठाकुरने प्रत्येक जन्ममें
इनके सङ्गकी प्रार्थना की है। गोविन्द कविराज इनके
छोटे भाई हैं। इनकी कृष्णभक्तिको देखकर श्रीजीवगोस्वामी
प्रभुने वृन्दावनमें इन्हें 'कविराज' नाम प्रदान किया था।
ये जन्मसे ही संसारसे विरक्त थे। ये श्रीनरोत्तम ठाकुर
118 | श्रीचैतन्यचरितामृत
11/51–56 ]
और श्रीनिवासाचार्य प्रभुके प्रचार और भजनके प्रधान
एवं प्रियतम सङ्गी थे। इन्होंने पहले श्रीखण्डमें और
बादमें भागीरथीके तटपर ‘कुमारनगर’ में आकर वास
किया (भक्तिरत्नाकर द्रष्टव्य है)।
‘गोविन्द कविराज’—खण्डवासी चिरञ्जीवके कनिष्ठ
पुत्र एवं रामचन्द्र कविराजके भाई है। ये पहले शाक्त
थे और बादमें श्रीनिवासाचार्य प्रभुके दीक्षित शिष्य हुए।
इन्होंने पहले श्रीखण्ड में, बादमें कुमारनगर में, तत्पश्चात्
पद्मानदीके दक्षिण तटपर ‘तेलिया बुधरि’ गाँवमें आकर
वास किया। इनकी काव्य-प्रतिभाको देखकर श्रीजीव
गोस्वामी प्रभुने इन्हें भी ‘कविराज’ नाम प्रदान किया
था। ये ‘सङ्गीत-माधव’ नाटक और ‘गीतामृत’ आदि
ग्रन्थोंके रचयिता हैं (भक्तिरत्नाकर नवम तरङ्ग द्रष्टव्य
है)॥51॥
(64) पीताम्बर, (65) माधवाचार्य, (66) दामोदर, (67)
शङ्कर, (68) मुकुन्द, (69) ज्ञानदास, (70) मनोहर :—
पीताम्बर, माधवाचार्य, दास दामोदर।
शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर ॥ 52 ॥
(71) गोपाल, (72) रामभद्र, (73) गौराङ्गदास,
(74) नृसिंह-चैतन्य, (75) मीनकेतन :—
नर्त्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्गदास।
नृसिंहचैतन्य, मीनकेतन रामदास ॥ 53 ॥
अनुवाद—पीताम्बर, माधवाचार्य, दामोदरदास, शङ्कर,
मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर, नर्त्तक गोपाल, रामभद्र,
गौराङ्गदास, नृसिंह-चैतन्य और मीनकेतन रामदास, ये
भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके अन्य दास थे॥52-53॥
अनुभाष्य—‘मीनकेतन रामदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
68वाँ श्लोक)—
“मीनकेतन-रामादिव्यूहः सङ्कर्षणोऽपरः॥68(ख)॥”
“मीनकेतन रामदास (श्रीकृष्णके) आदिव्यूह-श्रीबलदेवके
अन्य रूप सङ्कर्षण (अर्थात् श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अभिन्न
विग्रह) हैं॥”53॥
(76) श्रीठाकुर वृन्दावनदास :—
वृन्दावनदास—नारायणीर नन्दन।
‘चैतन्य-मङ्गल’ येंहो करिल रचन ॥ 54 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक अन्य प्रमुख
दास नारायणीदेवीके पुत्र श्रीवृन्दावनदास थे, जिन्होंने
चैतन्य-मङ्गलकी रचना की थी॥54॥
अनुभाष्य—‘वृन्दावनदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 109वाँ
श्लोक)—
“वेदव्यासो य एवासीद्वासो वृन्दावनोऽधुना।
सखा यः कुसुमापीडः कार्यतस्तं समाविशत्॥109॥”
“श्रीवेदव्यास ही अब श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं।
व्रजके कुसुमापीड नामक सखा भी कार्यवशतः इनमें
प्रविष्ट हुए हैं।” ये श्रीवास पण्डितकी भतीजी नारायणीदेवीके
पुत्र और चैतन्यभागवतके लेखक हैं। भाष्यकार-कृत
चैतन्यभागवतकी भूमिकामें ‘ठाकुरकी जीवनी’ शीर्षक
प्रबन्ध द्रष्टव्य है॥54॥
इति अनुभाष्ये एकादश परिच्छेद।
ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
व्यासदेवके द्वारा श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णलीला और
श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीगौरलीलाका वर्णन :—
भागवते कृष्णलीला वर्णिला वेदव्यास।
चैतन्य-लीलाते व्यास—वृन्दावनदास ॥ 55 ॥
अनुवाद—जिस प्रकार वेदव्यासजीने भागवतमें
श्रीकृष्णकी लीलाका वर्णन किया है, उसी प्रकार
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके व्यास वृन्दावनदास हैं॥55॥
वीरभद्रगोसाई-शाखा—सर्वश्रेष्ठ :—
सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र गोसाञि।
ताँर उपशाखा यत, तार अन्त नाइ ॥ 56 ॥
अनुवाद—वीरभद्र गोसाईं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सर्वश्रेष्ठ
शाखा हैं और उनकी अनन्त उपशाखाएँ हैं॥56॥
ग्यारहवाँ अध्याय | 119
[ 11/57-61
असंख्य श्रीनित्यानन्दगण :-
अनन्त नित्यानन्दगण—के करु गणन।
आत्मपवित्रता-हेतु लिखिलाङ कत जन॥ 57॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके असंख्य भक्त हैं, जिनकी गणना कौन कर सकता है? मैंने तो केवल स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे कुछ भक्तोंका यहाँ उल्लेख किया है॥ 57॥
इन सबके श्रीकृष्णप्रेमदानसे जगत्का उद्धार :-
एइ सर्वशाखा पूर्ण-पक्व प्रेमफले।
यारे देखे, तारे दिया भासाइल सकले॥ 58॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके सभी परिकर पके हुए प्रेमफलसे पूर्ण थे। श्रीनित्यानन्दके भक्त जिसपर भी दृष्टिपात करते थे, उसे प्रेममें डुबो देते थे॥ 58॥
इन सबकी निरन्तर श्रीकृष्णप्रीति-चेष्टा :-
अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा अनर्गल।
प्रेम दिते, कृष्ण दिते सबे धरे महाबल॥ 59॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंमें प्रचुर प्रेम था और उसे वितरण करनेमें उन्हें कोई भी बाधा नहीं आती थी। उनमें इतना बल था कि वे किसीको भी श्रीकृष्णप्रेम और स्वयं श्रीकृष्णको भी प्रदान करनेमें सक्षम थे॥ 59॥
संक्षेपे कहिलाङ एइ नित्यानन्दगण।
याँहार अवधि ना पाय 'सहस्रवदन' ॥ 60॥
अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंका वर्णन किया है, अनन्त-शेष भी अपने हजारों मुखोंसे वर्णन करके भी जिनका अन्त नहीं पाते हैं॥ 60॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 61॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे नित्यानन्द-स्कन्ध-शाखावर्णनं नाम एकादश-परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 61॥
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डका श्रीनित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाओंका वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
बारहवाँ अध्याय
चित्र 5
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और यथावत पाठ प्रस्तुत है:
बारहवाँ अध्याय
बारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें
श्रीअद्वैतप्रभुकी सभी शाखाओंका वर्णन करके उनमेंसे
श्रीअच्युतानन्दके मतानुयायी वैष्णवोंको 'सारग्राही' और
अन्य सभीको 'असार' कहकर निर्देश किया गया है।
अन्तमें श्रीगदाधर पण्डित-गोस्वामीकी शाखाका वर्णन
करके इस अध्यायको समाप्त किया है। इस अध्यायके
मध्यमें श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र गोपाल मिश्र और श्रीअद्वैताचार्यके
सेवक कमलाकान्त विश्वासके दो उपाख्यानोंका वर्णन
हुआ है। छोटी आयुमें श्रीगोपालका गुण्डिचा-मन्दिर
मार्जनके समय प्रेम-मूर्च्छाको प्राप्त होना और श्रीमन्महाप्रभुकी
कृपासे उनकी मूर्च्छा भङ्ग होनेका प्रसङ्ग वर्णित है।
आचार्यके सेवक कमलाकान्त विश्वासने राजा प्रतापरुद्रसे
श्रीअद्वैतप्रभुके तीन सौ मुद्राओंके ऋणशोधनकी भिक्षाके
लिये पत्र लिखा और महाप्रभुको यह पता लगनेपर उस
पागल विश्वासको दण्ड प्रदान किया और श्रीअद्वैताचार्यके
अनुरोधपर उसका शोधन किया। (अमृतप्रवाह भाष्य)
सारग्राही और असारग्राही-भेदसे
दो प्रकारके श्रीअद्वैतदास :—
अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गांस्तान् सारासारभृतोऽखिलान्।
हित्वाऽसारान् सारभृतो नौमि चैतन्यजीवनान्॥१॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभुके अनुगतजन दो
प्रकारके हैं—'सारग्राही' और 'असारग्राही'। इन दोनोंमेंसे
असारवाहियोंका परित्यागकर समस्त सारग्राही चैतन्यदासोंको
मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥
अनुभाष्य—सारासारभृतः (सारः अद्वैतानुगो गौरहरिजनः,
असारः तदनुगाभिमानी गौरहरि-विमुखजनः, तौ विभ्रतीति तान्)
अखिलान् (सर्वान्) अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गान् (अद्वैतस्य अङ्घ्री एव
अब्जे तयोः भृङ्गान् भ्रमरान् अद्वैतसेवकान्) [मत्वा] असारवान्
(तदनुप्रयान् शुद्धभक्तिरहितान् मायावादिनः) हित्वा (त्यक्त्वा)
चैतन्यजीवनान् (चैतन्य एव जीवनं येषां तान् गौरप्राणान्)
सारभूतः (सारग्राहिणः भागवतान्) नौमि (नमस्करोमि)।
श्लोक भावानुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके दो प्रकारके
अनुगतजन हैं—श्रीअद्वैतानुग जो श्रीगौरहरिको समर्पित
हैं, वे सारग्राही हैं और जो अपनेमें केवल श्रीअद्वैतानुग
होनेका अभिमान करते हैं, परन्तु श्रीगौरहरिके विमुख
हैं, वे असारग्राही है। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके चरणकमलोंके
समस्त भ्रमरोंमेंसे असारग्राहियोंको छोड़कर शेष जिनका
जीवन ही चैतन्य महाप्रभु हैं, ऐसे गौरगतप्राण सारग्राही
भक्तोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥
जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य।
जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥२॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय
हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो; धन्य
श्रीअद्वैत प्रभुकी जय हो॥२॥
गौरभक्त सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंकी वन्दना :—
श्रीचैतन्यामरतरौर्द्वितीयस्कन्धरूपिणः।
श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् गणान्नुमः॥३॥
अनुवाद—अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥३॥
अनुभाष्य—श्रीचैतन्यामरतरोः (गौरामरवृक्षस्य) द्वितीय
स्कन्धरूपिणः श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् (वृक्षशाखातुल्यान्) गणान्
(आश्रितजनान्) [वयं] नुमः (नमस्कुर्मः)।
श्लोक भावानुवाद—श्रीचैतन्य कल्पवृक्षके दूसरे
स्कन्धरूप श्रीमद्-अद्वैतचन्द्रकी शाखारूप उनके
आश्रितजनोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥३॥
वृक्षेर द्वितीय स्कन्ध—आचार्य गोसाञि।
ताँर यत शाखा हइल, तार लेखा नाञि॥४॥
[ 12/4-17
श्रीगौर-कृपासे सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंका ही विस्तार :-
चैतन्य-मालीर कृपाजलेर सेचने।
सेइ जले पुष्ट स्कन्ध बाड़े दिने दिने॥5॥
सेइ स्कन्धे यत प्रेमफल उपजिल।
सेइ कृष्णप्रेमफले जगत् भरिल॥6॥
सेइ जले स्कन्धे करे शाखाते सञ्चार।
फले-फुले बाड़े,-शाखा हइल विस्तार॥7॥
धान्यराशि मापे यैछे पात्ना सहिते।
पश्चाते पात्ना उड़ाञा संस्कार करिते॥12॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥8-12॥
अमृतप्रवाह भाष्य-पहले श्रीअद्वैतप्रभुके समस्त
अनुगतजन एकमत थे, बादमें कुछ लोग दैववशतः
पृथक् मतके हो गये। आचार्यके निजमतसे जो चले, वे
शुद्ध-वैष्णव हैं और जिन्होंने दैववशतः आचार्यके
बतलाये मतसे स्वतन्त्र किसी प्रकार अपने मतकी
कल्पना की, वे असार हैं। जिस प्रकार धानको छिलके
सहित ही तोला जाता है और साफ करते समय
छिलकेको उड़ाकर केवल सार चावलको ही ग्रहण
किया जाता है; उसी प्रकार असार व्यक्तियोंके नामोंसे
हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, तो भी सारग्राही वैष्णवोंसे
असारवाहियोंको पृथक् रखनेके अभिप्रायसे उनकी एक
साथ गणना की है।
चावलसे रहित असार धानको 'पात्ना' कहते
हैं॥8-12॥
अनुवाद-वृक्षके दूसरे स्कन्ध श्रीअद्वैताचार्य हैं।
उनकी जितनी शाखाएँ हुई हैं, उनकी कोई गणना नहीं
हो सकती। श्रीचैतन्य-महाप्रभु मालीके कृपारूपी जलके
सिञ्चनसे पुष्ट होकर यह स्कन्ध दिन-प्रतिदिन बढ़ता
गया। उस स्कन्धपर जितने प्रेमफल उत्पन्न हुए, सारा
जगत् उन श्रीकृष्णप्रेमरूपी फलोंसे परिपूर्ण हो गया।
स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य) ने उस महाप्रभुके कृपारूपी
जलका अपनी शाखाओंमें सञ्चार किया, जिससे उनपर
फूल और फलोंके बढ़नेसे शाखाओंका बहुत विस्तार
हुआ॥4-7॥
(1) अच्युतानन्द-शाखा :-
अच्युतानन्द-बड़ शाखा, आचार्य-नन्दन।
आजन्म सेविला तें'हो चैतन्य-चरण॥13॥
अच्युतके गुणोंका वर्णन :-
“चैतन्य गोसाञिर गुरु-केशव भारती।”
एइ पितार वाक्य शुनि' दुःख पाइल अति॥14॥
“जगद्गुरुते तुमि कर ऐछे उपदेश।
तोमार एइ उपदेशे नष्ट हइल देश॥15॥
चौद्द भुवनेर गुरु-चैतन्य-गोसाञि।
ताँर गुरु-अन्य, एइ कोन शास्त्रे नाइ॥”16॥
पञ्चम वर्षे बालक कहे सिद्धान्तेर सार।
शुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार॥17॥
श्रीअद्वैतदासोंके दो पृथक् मत :-
प्रथमे त' आचार्येर एकमत गण।
पाछे दुइमत हैल दैवेर कारण॥8॥
सारग्राहियोंकी श्रीअद्वैतके आनुगत्यमें गौरभक्ति,
असारगणोंके द्वारा स्वतन्त्रभावमें गौरविरोध :-
केह त' आचार्येर आज्ञाय, केह त' स्वतन्त्र।
स्वमत कल्पना करे दैव-परतन्त्र॥9॥
आचार्यका अनुगत्य ही सार, अन्यथा असार :-
आचार्येर मत येइ, सेइ मत सार।
ताँर आज्ञा लङ्घि' चले, सेइ त' असार॥10॥
श्रीअद्वैत-दासाभिमानी अभक्तोंके
उल्लेखका कारण और दृष्टान्त :-
असारेर नामे इँहा नाहि प्रयोजन।
भेद जानिवारे करि एकत्र गणन॥11॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतानन्द एक बड़ी
शाखा हैं, जिन्होंने सारा जीवन श्रीचैतन्य महाप्रभुके
124 | श्रीचैतन्यचरितामृत