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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

सतरहवाँ अध्याय 17/32-39 ] केह भूमे पड़े, केह करये चित्कार। देखि' भट्टाचार्येर मने हय चमत्कार ॥ 33 ॥ अनुवाद—उस पानीकी एक बूँदका कण भी जिसके शरीरसे स्पर्श किया, वही 'कृष्ण', 'कृष्ण' कहने लगा और प्रेममें नाचने तथा गाने लगा। कोई भूमिपर गिर पड़ा, कोई आवेशमें चीत्कार करने लगा। यह सब देखकर भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये॥ 32-33 ॥ पथे याइते करे प्रभु उच्च सङ्कीर्त्तन। मधुर कण्ठध्वनि शुनि' आइसे मृगीगण ॥ 34 ॥ डाहिने-वामे ध्वनि शुनि' याय प्रभु-सङ्गे। प्रभु तार अङ्ग मुछे, श्लोक पड़े रङ्गे ॥ 35 ॥ अनुवाद—कभी मार्गमें चलते हुए महाप्रभु उच्च-स्वरसे कीर्तन कर रहे थे, उनके कण्ठकी मधुर ध्वनिको सुनकर हिरणियाँ उनके निकट आने लगीं। कीर्तनकी ध्वनिको सुनते-सुनते हिरणियाँ महाप्रभुके दाहिनी और बायीं और उनके साथ-साथ चलने लगीं। महाप्रभुने उनके अङ्गोंको सहलाते हुए कुतूहलसे एक श्लोक पढ़ा॥ 34-35 ॥ श्रीमद्भागवत (10/21/11)में :— धन्याः स्म मूढ़मतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥ 36 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये मूढ़ मतिवाली सभी हिरणियाँ ही धन्य हैं, क्योंकि उन्होंने विचित्र-वेशवाले नन्दनन्दनको प्राप्त करके और उनके वेणुकी ध्वनिको सुनकर कृष्णसारोंके (अपने पति हिरणोंके) साथ प्रणयरूपी अवलोकनके (प्रेम भरी चितवनके) द्वारा उनकी पूजा की थी॥ 36 ॥ अनुभाष्य—शरत्काल आनेपर श्रीकृष्णने वन-वनमें वेणुको बजाते हुए भ्रमण करना आरम्भ किया, उनकी वेणुध्वनिको श्रवण करके श्रीकृष्णसङ्ग-कामसे व्याकुल होकर गोपियोंका गीत— हे सखि, मूढ़मतयः (मूढ़ा विवेकहीना मतिः यासां तथाभूताः) अपि (त्रियग्जातयोऽपि) एताः हरिण्यः (मृग्यः) धन्याः (कृतार्थाः सन्ति) स्म, —याः (हरिण्यः) वेणुरणितं (वेणुनादम्) आकर्ण्य (श्रुत्वा) सहकृष्णसाराः (कृष्णसारैर्मृगैः स्वपतिभिः सहिताः एव) उपात्तविचित्रवेशम् (उपात्ताः स्वीकृताः विचित्राः वेशाः वनमाला-बर्हापीडा-गुञ्जावतंसादिरूपाः येन् तं) नन्दनन्दनं [प्रति] प्रणयावलोकैः (प्रणयसहितैः अवलोकनैः) विरचितां (भूषितां) पूजां दधुः (कृतवत्यः)। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि ! पशु होते हुए भी विवेकहीन मतिवाली ये हिरणियाँ धन्य हैं। इन्होंने वेणुनादसे आकृष्ट होकर अपने पतियोंके सहित विचित्र वेशधारी [वनमाला, मोरपंख, गुञ्जा-कुण्डलादिधारी] श्रीनन्दनन्दनकी प्रणय अवलोकनके द्वारा पूजा की॥ 36 ॥ हेनकाले व्याघ्र तथा आइल पाँच-सात। व्याघ्र-मृगी मिलि' चले महाप्रभुर साथ ॥ 37 ॥ देखि' महाप्रभुर 'वृन्दावन'-स्मृति हैल। वृन्दावन-गुण-वर्णन श्लोक पड़िल ॥ 38 ॥ अनुवाद—इतनेमें ही पाँच-सात बाघ भी वहाँ आ गये। बाघ और हिरणियाँ एक साथ मिलकर महाप्रभुके साथ चलने लगे। बाघ और हिरणियोंको एकसाथ चलते देखकर महाप्रभुको वृन्दावनकी स्मृति हो आयी। तब उन्होंने श्रीवृन्दावनके गुणोंका वर्णन करते हुए एक श्लोक पढ़ा ॥ 37-38 ॥ वृन्दावनमें अद्वयज्ञानका विरोधी भाव नहीं :— (श्रीमद्भागवत 10/13/60)में— यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् नृ-मृगादयः। मित्राणीवाजितावास-द्रुत-रुट्-तर्षणादिकम् ॥ 39 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 39 ॥ 97

[ 17/39–47 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य—जिस स्थानपर मनुष्य-बाघादि स्वभाववशतः परस्पर विरुद्ध चेष्टावाले होनेपर भी मित्रभावसे एक स्थानपर वास करते हैं और श्रीकृष्णके आराम (नित्यविहार) स्थान होनेके कारण क्रोध-तृष्णादि जिस धामको परित्याग करके पलायन कर गये थे, (ब्रह्मा उस अप्राकृत वृन्दावनधामको देख सके) ॥ ३९ ॥

अणुभाष्य—व्रजके बछड़ों और गोपालबालकोंका हरण करनेके त्रुटीकालके बाद ब्रह्मा पुनः व्रजमें ही परम-ऐश्वर्यसे युक्त बछड़ों तथा गोपालबालकोंको श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ामें रत देखकर श्रीकृष्णकी मायासे अत्यन्त मुग्ध हो गये। बादमें श्रीकृष्णके द्वारा कृपापूर्वक अपने मायारूपी पर्देको उठा लेनेपर ब्रह्माने सोकर उठे व्यक्तिकी भाँति चारों ओर दृष्टिपात करते ही महा-ऐश्वर्यमय श्रीवृन्दावनके दर्शन किये—

यत्र नैसर्गिकवैराः (स्वाभाविकाऽप्रतिकार्य-वैरवन्तोऽपि) नृ-मृगादयः (नराः सिंहादयः) मित्राणि इव सह आसन् (मिथः स्थितवन्तः), [तथाभूतम्] अजितावास-द्रुत-रुत्तर्षणादिकम् (अजितस्य श्रीकृष्णस्य आवासः सदावस्थानं तेन निजमहिम्ना द्रुतं पलायितं रुत्तर्षणादिकं क्रोधलोभतृष्णादयः यस्मात् तथाभूतं—वृन्दावनमपश्यदिति पूर्वेणान्वयः) ।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३९ ॥

'कृष्ण' 'कृष्ण' कह, करि' प्रभु यबे बलिल। 'कृष्ण' कहि' व्याघ्र-मृग नाचिते लागिल॥ ४० ॥

नाचे, कान्दे व्याघ्रगण मृगीगण-सङ्गे। बलभद्र भट्टाचार्य देखे अपूर्व-रङ्गे॥ ४१ ॥

व्याघ्र-मृग अन्योन्ये करे आलिङ्गन। मुखे मुख दिया करे अन्योन्ये चुम्बन॥ ४२ ॥

अनुवाद—जब महाप्रभुने उन बाघों और हिरणियोंको 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलनेके लिये कहा, तब वे 'कृष्ण' नामका उच्चारण करके नृत्य करने लगे। बाघ हिरणियोंके साथ नृत्य और क्रन्दन करने लगे। बलभद्र भट्टाचार्य इस अपूर्व दृश्यको आनन्दपूर्वक देखने लगे। बाघ और हिरणियाँ एक-दूसरेका आलिङ्गन करने लगे तथा मुखसे मुखको मिलाकर एक-दूसरेका चुम्बन करने लगे॥ ४०-४२ ॥

कौतुक देखिया प्रभु हासिते लागिला। ता-सबाके ताँहा छाड़ि' आगे चलि' गेला॥ ४३ ॥

अनुवाद—इस कौतुकको देखकर महाप्रभु हँसने लगे। फिर उन सबको वहीं छोड़कर महाप्रभु आगे बढ़ गये॥ ४३ ॥

मयूरादि पक्षिगण प्रभुरे देखिया। सङ्गे चले, 'कृष्ण' बलि' नाचे मत्त हञा॥ ४४ ॥

'हरिबोल' बलि' प्रभु करे उच्चध्वनि। वृक्षलता—प्रफुल्लित, सेइ ध्वनि शुनि'॥ ४५ ॥

झारिखण्डमें समस्त स्थावर-जङ्गमका उद्धार अथवा श्रीकृष्णभक्ति देना :— 'झारिखण्डे' स्थावर-जङ्गम आछे यत। कृष्णनाम दिया कैल प्रेमेते उन्मत्त॥ ४६ ॥

अनुवाद—मोर आदि पक्षी महाप्रभुको देखकर 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते-बोलते मत्त होकर नृत्य करते हुए उनके साथ चलने लगे। जब महाप्रभु 'हरिबोल' बोलकर उच्चध्वनि करते, तब उस ध्वनिको सुनकर वृक्ष-लताएँ प्रफुल्लित हो उठते। 'झारिखण्ड'में जितने भी चर-अचर प्राणी थे, महाप्रभुने उन सबको श्रीकृष्णनाम देकर प्रेममें उन्मत्त बना दिया॥ ४४-४६ ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'झारिखण्ड'—झारिखण्ड नामसे प्रसिद्ध वृन्दावन-जानेके पथमें एक विशेष वन-प्रदेश है। (वर्तमान आटगढ़, ढेङ्कानल, आङ्गुल, लाहारा, क्योञ्झड़, वामड़ा, बोनाइ, गाङ्गपुर, छोटानागपुर, यशपुर, सरगुजा आदि पर्वत-जङ्गलमय-राज्य)॥ ४६ ॥

येइ ग्रामे दिया यान, याँहा करेन स्थिति। से-सब ग्रामेर लोकेर हय 'प्रेमभक्ति'॥ ४७ ॥

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सतरहवाँ अध्याय 17/47-56 ] महाप्रभुके मुखसे कीर्तित श्रीनाम श्रवण करनेवालेको श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति, उसके मुखसे कीर्तित श्रीकृष्णनामकी श्रवण-कीर्तन-धारासे लोगोंका उद्धार :- केह यदि ताँर मुखे शुने कृष्णनाम। ताँर मुखे आन शुने, ताँर मुखे आन ॥ 48 ॥ महाप्रभुके गमन पथपर श्रवण-कीर्तनकी परम्परासे सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :- सबे 'कृष्ण' 'हरि' बलि' नाचे, कान्दे, हासे। परम्पराय 'वैष्णव' हइल सर्वदेशे ॥ 49 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जिस भी ग्रामसे होकर गुजरते अथवा जिस भी ग्राममें रहते, उन सब ग्रामोंके लोगोंमें 'प्रेमभक्ति' उदित हो जाती। कोई यदि महाप्रभुके मुखसे श्रीकृष्णनाम श्रवण करता, उस व्यक्तिके मुखसे अन्य कोई सुनता और उस अन्य व्यक्तिके मुखसे अन्य एक व्यक्ति सुनता, इस प्रकार परम्परासे सभी देशोंमें प्रायः सभी वैष्णव बन गये। सभी 'कृष्ण', 'हरि' बोलते हुए नृत्य करते, क्रन्दन करते तथा हँसते ॥ 47-49 ॥ अनुभाष्य- 'आन'-अन्य व्यक्ति ॥ 48 ॥ बहिरङ्ग लोगोंके सामने प्रेम-चेष्टाको छिपानेपर भी महाप्रभुके दर्शन और नाम-कीर्तनके श्रवणसे ही लोगोंको भक्तिकी प्राप्ति :- यद्यपि प्रभु लोक-सङ्घट्टे त्रासे। प्रेम 'गुप्त' करेन, बाहिरे ना प्रकाशे ॥ 50 ॥ तथापि ताँर दर्शन-श्रवण-प्रभावे। सकल देशेर लोक हैल 'वैष्णवे' ॥ 51 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु लोगोंकी भीड़के भयसे अपने प्रेमको छिपा लेते, बाहरमें प्रकाशित नहीं करते, तथापि उनके दर्शन और श्रवणके प्रभावसे सभी देशोंके लोग वैष्णव बन गये ॥ 50-51 ॥ सर्वत्र ही भारतवर्षके लोगोंका उद्धार-साधन :- गौड़, बङ्ग, उत्कल, दक्षिण-देशे गिया। लोकेर निस्तार कैल आपने भ्रमिया ॥ 52 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने गौड़देश (पश्चिम बङ्गाल), बङ्ग (बाङ्गलादेश), उत्कल (उड़ीसा) और दक्षिण भारतमें स्वयं जाकर भ्रमण करके लोगोंका उद्धार किया ॥ 52 ॥ झारिखण्डमें अत्यन्त श्रीकृष्णबहिर्मुख लोगोंका भी उद्धार करना :- मथुरा याइवार छले आसेन झारिखण्ड। भिन्नप्राय लोक ताँहा परम-पाषण्ड ॥ 53 ॥ नाम-प्रेम दिया कैल सबार निस्तार। चैतन्येर गूढ़लीला बुझिते शक्ति कार ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभु मथुरा जानेके छलसे झारिखण्डमें आये। वहाँके लोग प्राय असभ्य और परम-पाखण्डी थे। महाप्रभुने नाम-प्रेम प्रदान करके उन सबका भी उद्धार किया। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़लीलाको समझनेकी शक्ति किसमें है? ॥ 53-54 ॥ अनुभाष्य- 'भिन्नप्राय'-सुसभ्य समाजसे अलग अर्थात् 'प्रायः असभ्य' ॥ 53 ॥ महाप्रभुमें महाभागवतोचित व्रजलीलाका उद्दीपन :- वन देखि' भ्रम हय-एइ 'वृन्दावन'। शैल देखि' मने हय-एइ 'गोवर्धन' ॥ 55 ॥ याँहा नदी देखे, ताँहा मानये-'कालिन्दी'। महाप्रेमावेशे नाचे प्रभु पड़े कान्दि' ॥ 56 ॥ अनुवाद-झारिखण्डके वनको देखकर महाप्रभुको वह वृन्दावन प्रतीत होता। तथा मार्गमें पर्वत देखकर महाप्रभुको लगता कि यह गोवर्धन है। इसी प्रकार जब भी किसी नदीको देखते, तो उसे कालिन्दी (यमुना) मानने लगते। इस प्रकार वृन्दावनकी स्फूर्तिसे महाप्रेमके आवेशमें नाचते-नाचते महाप्रभु क्रन्दन करते हुए भूमिपर गिर पड़ते ॥ 55-56 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/11, 273 और 276 संख्या एवं भाः 10/30/9 और 10/35/9 श्लोक आदि विशेष रूपसे आलोच्य हैं ॥ 55-56 ॥ । 99

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[ 17/57-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— पथे याइते भट्टाचार्य शाक-मूल-फल। याँहा येइ पायेन, ताँहा लयेन सकल ॥ 57 ॥ अनुवाद— मार्गमें चलते-चलते बलभद्र भट्टाचार्यको जहाँपर जो भी शाक-मूल-फल आदि मिलता, वे सब कुछ ले लेते ॥ 57 ॥ मार्गमें वैष्णव-ब्राह्मणोंके द्वारा ही महाप्रभु-सेवा :— ये-ग्रामे रहेन प्रभु, तथाय ब्राह्मण। पाँच-सात जन आसि' करे निमन्त्रण ॥ 58 ॥ केह अन्न आनि' देय भट्टाचार्य-स्थाने। केह दुग्ध, दधि, केह घृत, खण्ड आने ॥ 59 ॥ दीक्षित-ब्राह्मणोंके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :— याँहा विप्र नाहि, ताँहा 'शूद्रमहाजन'। आसि' सबे भट्टाचार्ये करे निमन्त्रण ॥ 60 ॥ अनुवाद— महाप्रभु जिस ग्राममें पहुँचते, वहाँके पाँच-सात ब्राह्मण आकर उन्हें निमन्त्रण देते। कोई बलभद्र भट्टाचार्यको अन्न लाकर दे देता तथा अन्य कोई उन्हें दूध, दही, घी तथा चीनी आदि लाकर देता। जिस गाँवमें ब्राह्मण नहीं होते, वहाँ ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य कुलमें जन्में भक्त आकर बलभद्र भट्टाचार्यको निमन्त्रण देते ॥ 58-60 ॥ अनुभाष्य— जिस स्थानपर जन्मजात ब्राह्मण नहीं होते, वहाँ 'शूद्रमहाजन' अर्थात् जन्मजात शूद्र होनेपर भी जो दैक्ष-ब्राह्मण (दीक्षित होनेके कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त) महाजन थे, उन्हींके घरपर भट्टाचार्यका निमन्त्रण हुआ था। शाङ्कर-संन्यासी जन्मजात ब्राह्मणके घरके अतिरिक्त अन्यत्र भिक्षा-ग्रहण नहीं करते। परन्तु महाप्रभुने जिस स्थानपर वैष्णव-ब्राह्मणका अभाव था, वहाँ ब्राह्मण परिवारमें जन्म अथवा उपनयन संस्कारके द्वारा द्वितीय जन्मको नहीं मानकर महाप्रभुने 'वैष्णवत्व' अथवा शुद्धभक्तिको लक्ष्य करके ही दीक्षित ब्राह्मणादिके द्वारा प्रदत्त द्रव्यों (वस्तुओं)को ग्रहण किया था ॥ 60 ॥ वनके मार्गमें आहार आदिकी व्यवस्था :— भट्टाचार्य पाक करे वन्य-व्यञ्जन। वन्य-व्यञ्जने प्रभुर आनन्दित मन ॥ 61 ॥ दुइ-चारिदिनेर अन्न राखेन संहति। याँहा शून्य वन, लोकेर नाहिक वसति ॥ 62 ॥ ताँहा सेइ अन्न भट्टाचार्य करे पाक। फल-मूले व्यञ्जन करे, वन्य नाना शाक ॥ 63 ॥ परम सन्तोष प्रभुर वन्य-भोजने। महासुख पान, ये दिन रहेन निर्जने ॥ 64 ॥ अनुवाद— बलभद्र भट्टाचार्य वनसे एकत्रित किये व्यञ्जनोंकी रसोई बनाते और उन वनके व्यञ्जनोंको महाप्रभु बड़े आनन्दपूर्वक ग्रहण करते। बलभद्र भट्टाचार्य दो-चार दिनके लिये चावलको संग्रह करके अपने साथमें रखते थे। वनमें जहाँपर लोग वास नहीं करते थे, वहाँपर बलभद्र भट्टाचार्य उस चावलको पकाते और उसके साथ खानेके लिये वनमेंसे प्राप्त फल-मूल तथा अनेक प्रकारके साग बनाते। महाप्रभु वनके भोजनसे अत्यन्त सन्तुष्ट होते। और जब भी उन्हें निर्जन स्थानमें रहनेका अवसर प्राप्त होता, तो वे बहुत प्रसन्न होते ॥ 61-64 ॥ भट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा और उनका साथी महाप्रभुका वाहक :— भट्टाचार्य सेवा करे, स्नेहे यैछे 'दास'। ताँर विप्र बहे जलपात्र-बहिर्वास ॥ 65 ॥ अनुवाद— बलभद्र भट्टाचार्य महाप्रभुसे इतना स्नेह करते कि वे दासकी भाँति उनकी सेवामें लगे रहते। और उनका सङ्गी ब्राह्मण महाप्रभुके जलपात्र तथा बहिर्वास वस्त्रको उठाकर चलता ॥ 65 ॥ झरनेमें महाप्रभुका तीनों सन्ध्याओंमें स्नान और लकड़ी जलाकर शीतको दूर करना :— निर्झरिते उष्णोदके स्नान तिनबार। दुइसन्ध्या अग्निताप काष्ठेर अपार ॥ 66 ॥ 100 |

सतरहवाँ अध्याय 17/66-79 ] अनुवाद - महाप्रभु झरनेके गर्म पानीमें तीन बार स्नान करते। प्रातः और सायंकाल-इन दो सन्ध्याओंमें बहुत सी लकड़ी जलाकर अग्निका ताप लेते ॥ 66 ॥ भट्टको महाप्रभुके द्वारा पहली वृन्दावनकी यात्राका वर्णन :- निरन्तर प्रेमावेशे निर्जने गमन। सुख अनुभवि' प्रभु कहेन वचन ॥ 67 ॥ “शुन, भट्टाचार्य, – आमि गेलाङ बहु-देश। वनपथे दुःखेर काँहा नाहि पाइ लेश ॥ 68 ॥ कृष्ण-कृपालु, आमाय बहुत कृपा कैला। वनपथे आनि' आमाय बड़ सुख दिला ॥ 69 ॥ पूर्वे वृन्दावन याइते करिलाङ विचार। माता, गङ्गा, भक्तगणे देखिब एकबार ॥ 70 ॥ भक्तगण-सङ्गे अवश्य करिब मिलन। भक्तगणे सङ्गे लञा याब 'वृन्दावन' ॥ 71 ॥ एत भावि' गौड़देशे करिलुँ गमन। माता, गङ्गा, भक्ते देखि' सुखी हैल मन ॥ 72 ॥ भक्तगणे लञा तबे चलिलाङ रङ्गे। लक्षकोटि लोक ताँहा हैल आमा-सङ्गे ॥ 73 ॥ सनातन-मुखे कृष्ण आमा शिखाइला। ताहा विघ्न करि' वनपथे लञा आइला ॥ 74 ॥ श्रीकृष्णकृपाकी महिमासूचक उक्ति :- कृपार समुद्र, दीन-हीने दयामय। कृष्णकृपा बिना कोन 'सुख' नाहि हय ॥” 75 ॥ अनुवाद - निरन्तर प्रेममें आविष्ट निर्जन वनमें जाते समय बहुत सुखका अनुभव करके महाप्रभुने बलभद्र भट्टाचार्यसे कहा, – “हे भट्टाचार्य, सुनो ! मैं वनके मार्गसे अनेक स्थानोंपर गया, किन्तु मैंने कहींपर दुःखका लेशमात्र भी नहीं पाया। श्रीकृष्ण बहुत कृपालु हैं, उन्होंने मुझपर बहुत कृपा की है। वे कृपा करके मुझे वनके मार्गमें लाये हैं और मुझे बहुत सुख प्रदान किया है। मैंने पहले भी वृन्दावन जानेका विचार किया था। मैंने सोचा था कि माता शची, गङ्गा तथा भक्तोंके एकबार दर्शन करूँगा। भक्तोंके साथ अवश्य ही भेंट करूँगा और भक्तोंको साथ लेकर 'वृन्दावन' जाऊँगा। ऐसा सोचकर मैं गौड़देश गया था, शचीमाता, भगवती गङ्गा तथा भक्तोंको देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ था। मैं आनन्दपूर्वक भक्तोंको साथ लेकर वृन्दावनके लिये चल पड़ा था। लाखों-करोड़ों लोग मेरे साथ चलने लगे। सनातनके मुखसे श्रीकृष्णने मुझे शिक्षा प्रदान की और उस यात्रामें विघ्न उत्पन्न करके अब वनके मार्गसे वृन्दावनकी ओर ले जा रहे हैं। कृपाके सागर, दीन-हीनके प्रति दयामय श्रीकृष्णकी कृपाके बिना किसी प्रकारके 'सुख'की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥” 67-75 ॥ भट्टकी सेवासे महाप्रभुके द्वारा कृतज्ञता-ज्ञापन :- भट्टाचार्ये आलिङ्गिया ताँहारे कहिल। “तोमार प्रसादे आमि एत सुख पाइल ॥” 76 ॥ अनुवाद - महाप्रभुने बलभद्र भट्टाचार्यका आलिङ्गन करके कहा, – “तुम्हारी कृपासे मुझे इतने सुखकी प्राप्ति हुई है ॥” 76 ॥ भट्टकी दैन्य-उक्ति और स्तव :- तँहो कहेन, – “तुमि 'कृष्ण', तुमि 'दयामय'। अधम जीव मुञि, मोरे हइला सदय ॥ 77 ॥ मुञि छार, मोरे तुमि सङ्गे लञा आइला। कृपा करि' मोर हाते 'प्रभु' भिक्षा कैला ॥ 78 ॥ अधम-काकेरे कैला गरुड़-समान। 'स्वतन्त्र ईश्वर' तुमि-स्वयं भगवान् ॥” 79 ॥ अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने कहा, – “आप साक्षात् 'श्रीकृष्ण' हैं, इसलिये आप 'दयामय' हैं। मैं तो एक अधम जीव हूँ, किन्तु आपने मेरे प्रति दया की है। मैं बहुत पतित व्यक्ति हूँ, तथापि आप मुझे अपने साथ ले आये हैं। हे प्रभो ! बहुत कृपा करके आपने मेरे हाथसे बने भोजनको स्वीकार किया है। अधम कौवेको । 101

[ 17/77-82 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

आपने गरुड़के समान बना दिया है। आप 'स्वतन्त्र ईश्वर' तथा स्वयं भगवान् हैं॥” 77-79 ॥

श्रीमद्भागवत (1/1/1) की भावार्थ-दीपिकामें :- मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द-माधवम् ॥ 80 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपा गूँगोको भी वाचाल और लँगड़ेको भी पर्वत पार करा सकती है, उन 'परमानन्द-स्वरूप' माधवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 80 ॥

अनुभाष्य- यत् (यस्य) कृपा (अनुकम्पा) मूकं (वाक्शक्तिहीनमपि) वाचालं (वाक्पटुं कृष्णकीर्त्तनरतं) करोति, पङ्गुं (चलच्छक्तिहीनमपि) गिरिं (पर्वतं) लङ्घयते (कृष्णभजनाय असाध्यमपि साधयतीत्यर्थः), परमानन्द-माधवं (श्रीविष्णुस्वामिनोऽन्वयं श्रीपरमानन्दस्वामिनं स्वेष्टदेवं श्रीभगवन्तम्) अहं वन्दे।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥

भट्टका सेवाके द्वारा महाप्रभुको प्रसन्न करना :- एइमत बलभद्र करेन स्तवन। प्रेमसेवा करि' तुष्ट कैल प्रभुर मन ॥ 81 ॥

अनुवाद-इस प्रकार श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुका स्तव किया और प्रेमसेवा करके उनके मनको सन्तुष्ट कर दिया ॥ 81 ॥

काशीमें आकर महाप्रभुका मणिकर्णिका-घाटपर स्नान :- एइमत नाना-सुखे प्रभु आइला 'काशी'। मध्याह्न-स्नान कैल मणिकर्णिकाय आसि' ॥ 82 ॥

अनुवाद-इस प्रकार अति सुखपूर्वक महाप्रभु 'काशी' में आ पहुँचे। उन्होंने मणिकर्णिका घाटपर गङ्गामें दोपहरका स्नान किया ॥ 82 ॥

अनुभाष्य- 'काशी'-इसका अन्य नाम 'वाराणसी' अथवा 'अविमुक्त' है। यह अति प्राचीन पुरी है-

“असिञ्च वरुणा यत्र क्षेत्ररक्षाकृतौ कृते। वाराणसीति विख्याता तदारभ्य महामुने। असेश्च वरुणायाश्च सङ्गमं प्राप्य काशिका ॥”

[अर्थात् “हे महामुने, सत्ययुगमें वरुणा और असि नामक दो नदियोंने जिस समय इस क्षेत्रकी रक्षाकी थी, काशिका उस समयसे आरम्भ करके वरुणा और असिके सङ्गमको प्राप्त करके 'वाराणसी', इस नामसे विख्यात हुई है।"]

'मणिकर्णिका'-विष्णुके कर्णसे, किसी अन्य मतानुसार, शिवके कर्णसे मणिके इस घाटपर गिरनेके कारण इसका नाम- 'मणिकर्णिका' है। किसी औरके मतानुसार, - भवरोगके वैद्य विश्वनाथ काशीवासी मुमुर्षु (मरणोन्मुख) लोगोंके कानमें तारक-ब्रह्म 'राम'-नाम देकर उसका त्राण (उद्धार) करते हैं, इसलिये इस तीर्थका नाम 'मणिकर्णिका' है।

“नास्ति गङ्गासमं तीर्थं वाराणस्यां विशेषतः। तत्रापि मणिकर्णाख्यं तीर्थं विश्वेश्वरप्रियम् ॥”

[अर्थात् “यद्यपि गङ्गाके समान अन्य कोई तीर्थ नहीं है, उसमें भी वाराणसीका विशेष स्थान है, तथापि मणिकर्णिका नामक तीर्थ विश्वनाथका अतिप्रिय है।"]

काशीखण्डमें- “संसारिचिन्तामणिरत्र यस्मात् तं तारकं सज्जनकर्णिकायाम्। शिवोऽभिधत्ते सहसान्तःकाले तद्गीयतेऽसौ मणिकर्णिकेति ॥ मुक्तिलक्ष्मीमहापीठमणिश्चरणाम्बुजयोः। कर्णिकेयं तत प्राहुरार्या जना मणिकर्णिकाम् ॥”

[अर्थात् “क्योंकि इस स्थानपर संसारी लोगोंके चिन्तामणि-स्वरूप श्रीशिव मृत्युके समय सहसा सज्जनोंके कानोंमें उस तारकब्रह्म-नामका कीर्त्तन करते हैं, इसलिये इस स्थानने 'मणिकर्णिका' यह नाम धारण किया है। और भी मुक्तिरूपा लक्ष्मी इस महापीठकी मणिस्वरूपा हैं। उनके चरणकमलकी यह कर्णिका होनेके कारण मनुष्य इसे मणिकर्णिका कहते हैं।"] ॥ 82 ॥

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सत्रहवाँ अध्याय 17/83-87 ] उसी समय तपन मिश्रका भी स्नान और महाप्रभुके दर्शनसे पहले उनको विस्मय :- सेइकाले तपनमिश्र करे गङ्गास्नान। प्रभु देखि' हैल ताँर विस्मय किछु ज्ञान ॥ 83 ॥ 'पूर्वे शुनियाछि प्रभु करयाछेन संन्यास' । निश्चय करिया, हैल हृदये उल्लास ॥ 84 ॥ बादमें प्रसन्नताके आँसू :- प्रभुर चरण धरि' करेन रोदन। प्रभु तारे उठाया कैल आलिङ्गन ॥ 85 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीतपन मिश्र गङ्गास्नान कर रहे थे और महाप्रभुको वहाँ देखकर वे विस्मित हो गये। वे विचार करने लगे—'मैंने पहले सुना है कि महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया है।' यह बात स्मरण करके उनके हृदयमें बहुत उल्लास हुआ। तब श्रीतपन मिश्र महाप्रभुके चरण पकड़कर रोने लगे। महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 83-85 ॥ महाप्रभुको लेकर मिश्रका विश्वेश्वर और बिन्दुमाधवके दर्शन :- प्रभु लञा गेला विश्वेश्वर-दरशने। तबे आसि' देखे बिन्दुमाधव-चरणे ॥ 86 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र महाप्रभुको विश्वेश्वर शिवके दर्शन करानेके लिये ले गये। उसके बाद महाप्रभुने श्रीबिन्दुमाधवके चरणकमलोंके दर्शन किये ॥ 86 ॥ अनुभाष्य—'बिन्दु-माधव'—प्राचीन विष्णुमन्दिर है; आजकल 'पञ्चगङ्गा'के ऊपर अवस्थित 'वेणीमाधव'के नामसे प्रसिद्ध मन्दिर है। 'पञ्चनदी' अर्थात् धूतपापा, किरणा, सरस्वती, गङ्गा और यमुना—इन पाँच नदियोंमेंसे केवलमात्र गङ्गा ही प्रवाहित होती दिखायी देती हैं। कहा जाता है कि श्रीमन्महाप्रभुने जिस प्राचीन बिन्दु-माधव- मन्दिरके दर्शन किये उसको 'हिन्दू-विद्वेषी' मुगल-सम्राट औरङ्गजेबने विध्वंस करके वहाँ एक बहुत बड़ी मस्जिद स्थापित की थी। वर्तमान मन्दिरके पासमें ही एक बहुत बड़ी प्राचीन मस्जिद है। श्रीमन्दिरमें चतुर्भुज श्रीनारायण और लक्ष्मीदेवीके विग्रह तथा उनके सामने श्रीगरुड़के एवं बगलमें श्रीराम-सीता और लक्ष्मणादि तथा श्रीहनुमानके श्रीविग्रह विराजमान हैं। [टीका लिखनेके समय] महाराष्ट्र अन्तर्गत सातारा-जिलेमें आउन्धैर वैष्णव-सम्प्रदायके अनुगत महाराष्ट्र पन्थ महाराज ही श्रीविग्रहसेवाके और मन्दिरके समस्त व्ययको चला रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि लगभग दो सौ वर्षोंसे इस राजवंशके हाथोंमें श्रीवेणीमाधवकी सेवाका भार सौंपा हुआ था; इस वंशके प्रथम सेवाइत 'प्रतिनिधि'का नाम-महाराज जगजीवन राव साहेब था॥ 86 ॥ महाप्रभुको अपने घरमें लाना और महाप्रभुको पाकर मिश्रका आनन्द :- घरे लञा आइला प्रभुके आनन्दित हञा। सेवा करि' नृत्य करे वस्त्र उड़ाञा ॥ 87 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र बड़े आनन्दसे महाप्रभुको अपने घरपर ले आये और उनकी सेवा की। वे इतने प्रसन्न थे कि वे वस्त्रको लहराकर नृत्य करने लगे ॥ 87 ॥ अनुभाष्य—' (श्रीतपनमिश्रके) घरमें'—काशीमें रहते समय श्रीमन्महाप्रभु बहुत ही निकटमें 'पञ्चनदी-घाट'पर स्नान आदि करके सबसे पहले श्रीबिन्दुमाधवजीके दर्शन करते, उसके बाद श्रीतपन-मिश्रके घरमें भिक्षा ग्रहण करते। ऐसा सुना जाता है कि एक लोक-कहावतके अनुसार इस मन्दिरसे कुछ दूरीपर जिस वटवृक्षके नीचे श्रीमन्महाप्रभु विश्राम करते थे, उन्हींके नामके अनुसार वह बादमें “चैतन्यवट” एवं क्रमशः “यतनवट”के नामसे आज भी प्रसिद्ध है। वर्तमान समयमें वहाँ एक गलीके अन्दर श्रीवल्लभाचार्यकी ही एक समाधिका । 103

[ 17/87-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थान देखा जाता है; किन्तु श्रीगौरसुन्दरका कोई स्मृतिचिह्न दिखायी नहीं देता। श्रीवल्लभाचार्यके अनुगत भक्त भी उन्हें 'महाप्रभु'के नामसे पुकारते हैं। यह सम्भव है कि श्रीमन्महाप्रभु 'यतनवट'में विश्राम करते थे, किन्तु श्रीचन्द्रशेखरका भवन, श्रीतपनमिश्रका घर, मायावादि- मण्डलीके अधिपति प्रकाशानन्द-सरस्वतीके स्थानादि चिह्न तक अब लुप्त हो गये हैं। तथापि कुछ दूरीपर कोलकत्ता-निवासी परलोकगत शशीभूषण नियोगी महाशयके भवनमें श्रीगौरनित्यानन्दके श्रीअर्च्यविग्रह प्रतिष्ठित हैं। उनकी सास माता और ससुर श्रीनारायणचन्द्र घोष महाशयकी देखरेखमें वर्तमान समयमें सेवा चल रही है॥ ४7॥ सपरिवार महाप्रभुका चरणामृत-पान और भट्टको सम्मान :- प्रभुर चरणोदक सवंशे कैल पान। भट्टाचार्येर पूजा कैल करिया सम्मान ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने महाप्रभुके चरणोंको धोया और अपने परिवारसहित उस चरणामृतका पान किया। उन्होंने बलभद्र भट्टाचार्यकी भी सम्मानपूर्वक पूजा की॥ 88॥ भट्टके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा दान :- प्रभुरे निमन्त्रण करि' घरे भिक्षा दिल। बलभद्र-भट्टाचार्ये पाक कराइल ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने महाप्रभुको अपने घरमें निमन्त्रित करके भोजन कराया। उन्होंने श्रीबलभद्र भट्टाचार्यके द्वारा भोजन बनवाया॥ 89॥ आहारके बाद महाप्रभुका शयन, श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुका चरण-सम्वाहन :- भिक्षा करि' महाप्रभु करिला शयन। मिश्रपुत्र रघु करे पादसम्वाहन ॥ 90 ॥ अनुवाद—प्रसाद पानेके बाद महाप्रभु विश्राम करने लगे। तब श्रीतपन मिश्रके पुत्र श्रीरघुनाथ आकर महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे॥ 90॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तपन मिश्रके पुत्र रघुनाथ—जो बादमें 'भट्ट गोस्वामी'के नामसे विख्यात हुए थे—वे महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे॥ 90॥ परिवारसहित महाप्रभुके उच्छिष्टको ग्रहण करना; श्रीचन्द्रशेखरका आगमन :- प्रभुर 'शेषात्र' मिश्र सवंशे खाइल। 'प्रभु आइला' शुनि' चन्द्रशेखर आइल ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको श्रीतपनमिश्रके सारे परिवारने खाया। 'महाप्रभु आये हैं'—ऐसा सुनकर श्रीचन्द्रशेखर भी उनके दर्शनके लिये आये॥ 91॥ श्रीचन्द्रशेखरका परिचय :- मिश्रेर सखा तँहो प्रभुर पूर्व दास। वैद्यजाति, लिखनवृत्ति, वाराणसी-वास ॥ 92 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर श्रीतपन मिश्रके मित्र और महाप्रभुके पुराने दास थे। वे जातिसे वैद्य थे और लेखन-कार्य उनका व्यवसाय था। उस समय वे वाराणसीमें ही रहते थे॥ 92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लिखनवृत्ति'—पुस्तककी नकल लिखकर उससे धन कमाना॥ 92॥ श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और उन्हें प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :- आसि' प्रभु-पदे पड़ि' करेन रोदन। प्रभु ताँरे कृपाय उठि' कैल आलिङ्गन ॥ 93 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और रोने लगे। महाप्रभुने कृपा करके उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 93॥ श्रीचन्द्रशेखरका महाप्रभुसे अपने दुःखका निवेदन :- चन्द्रशेखर कहे,—“प्रभु, बड़ कृपा कैला। आपने आसिया भृत्ये दरशन दिला ॥ 94 ॥ 104 |

सतरहवाँ अध्याय 17/94-98 ] हरिभजन-कथा-विहीन काशी-शुष्क-मायावादियोंकी आवास-स्थली :- आपन-'प्रारब्धे' वसि' वाराणसी-स्थाने। 'माया', 'ब्रह्म' शब्द बिना नाहि शुनि काणे॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरने कहा,—“हे प्रभो! आपने बहुत कृपा की है जो आपने स्वयं आकर अपने दासको दर्शन दिया है। मैं अपने प्रारब्धके कारण ही वाराणसीमें वास करता हूँ। यहाँ 'माया' तथा 'ब्रह्म' शब्दके अतिरिक्त अन्य कोई शब्द कानोंमें नहीं पड़ता॥ 94-95 ॥ अनुभाष्य— 'प्रारब्धे'—काशी 'शैव' अथवा पञ्चोपासकोंका सर्वप्रधान तीर्थ होनेपर भी वहाँ हरिभजनकी कोई बात नहीं होनेके कारण वह श्रीगौरभक्तोंके रहनेके अत्यन्त अयोग्य है। इसलिये श्रीचन्द्रशेखरने कहा कि वे अपनी प्राचीन दुष्कृतिके फलस्वरूप ही बड़े दुःखके साथ वहाँ वास कर रहे हैं। यहाँपर निन्दाके अर्थमें ही 'प्रारब्ध' शब्दका प्रयोग हुआ है। (भःरःसिः पूर्व-विभाग प्रथम लहरी)— “दुर्ज्जात्यारम्भकं पापं यत् स्यात् प्रारब्धमेव तत्”। [अर्थात् “अपने पूर्वकृत पापोंके अनुसार ही जीवको निम्नजातिमें जन्म मिलता है।"] शुद्ध भगवद्भक्त यद्यपि स्वयंको प्रारब्ध अथवा 'प्राचीन कर्मोंके फल-भोक्ता' कहते हैं, तथापि यमके दण्डके भागी अन्य मर्त्यजीवोंकी भाँति वे कभी भी शुभ-अशुभ कर्मोंके फलके भोगी नहीं होते। नित्यसिद्ध अथवा साधनसिद्धकी तो बात ही नहीं, साधकावस्थामें भी जीवोंकी साधनभक्ति—'क्लेशघ्नी' ('पाप', 'पापबीज', और अविद्या—इन तीन प्रकारके क्लेशोंका नाश करनेवाली) होती है। जैसे पद्मपुराणमें कहा है— “अप्रारब्ध-फलं पापं कूटं बीजं फलोन्मुखम्। क्रमेणैव प्रलीयेत विष्णुभक्तिरतात्मनाम्॥" [अर्थात् “जिन लोगोंकी आत्मा और उनका शरीर, मन, प्राणादि सभी श्रीकृष्णकी भक्तिमें लगे हुए हैं, उनके अप्रारब्ध पाप, कूट पाप, बीजरूप पाप और फलोन्मुख पाप (जिनका फल भुगतना आरम्भ हो गया है), ये सब भक्तिसे क्रमशः विनष्ट हो जाते हैं।"] इसके पूर्ववर्ती दो श्लोकोंकी “दुर्गम-सङ्गमनी" टीका भी इस प्रसङ्गमें आलोच्य है॥ 95 ॥ मिश्रको सम्मान देना :- षड्दर्शन-व्याख्या बिना कथा नाहि एथा। मिश्र कृपा करि' मोरे सुनान कृष्णकथा॥ 96 ॥ अनुवाद—षड्दर्शनकी व्याख्याके अतिरिक्त यहाँपर अन्य कोई कथा नहीं होती। श्रीतपन मिश्र कृपा करके मुझे श्रीकृष्ण-कथाका श्रवण कराते हैं॥ 96 ॥ अनुभाष्य— 'षड्दर्शन'— 1) कणादऋषि-कृत 'वैशेषिक'-दर्शन, 2) गौतमऋषि-कृत 'न्याय'-दर्शन, 3) पतञ्जलिऋषि कृत 'योग'-दर्शन, 4) कपिलऋषि-कृत 'सांख्य'-दर्शन, 5) जैमिनीऋषि-कृत 'पूर्व' (कर्म)-मीमांसा, 6) महर्षि वेदव्यास-कृत 'उत्तर (ब्रह्म)-मीमांसा' या 'वेदान्त'॥ 96 ॥ महाप्रभुके प्रति कातर-उक्ति :- निरन्तर दुँहे चिन्ति तोमार चरण। 'सर्वज्ञ ईश्वर' तुमि दिला दरशन॥ 97 ॥ शुनि'-'महाप्रभु' याबेन श्रीवृन्दावने। दिन कत रहि' तार' भृत्य दुइजने॥"98 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्र और मैं निरन्तर आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते हैं। यद्यपि आप 'सर्वज्ञ ईश्वर' हैं, आपने हमें अपना दर्शन प्रदान किया है। हे महाप्रभु! मैंने सुना है कि आप श्रीवृन्दावन जायेंगे। कुछ दिन यहाँपर रहकर अपने इन दो दासोंका भी उद्धार कीजिये॥"97-98॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'तार'—उद्धार करो। 'भृत्य दुइजने'—श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र, इन दो लोगोंका॥ 98 ॥ । 105

[ 17/98-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—महाप्रभुके अत्यन्त निकट रहनेपर भी महाप्रभुके प्रति अत्यन्त सम्भ्रम-उक्ति ॥ 98 ॥ मिश्रका महाप्रभुसे निवेदन :— मिश्र कहे,—“प्रभु, यावत् काशीते रहिबा। मोर निमन्त्रण बिना अन्य ना मानिबा ॥”99 ॥ अनुवाद—श्रीतपन मिश्रने कहा,—“हे प्रभो! जब तक आप काशीमें रहेंगे, कृपया तब तक मेरे अतिरिक्त आप किसीके निमन्त्रणको स्वीकार मत कीजियेगा ॥”99 ॥ भक्तके वशमें भगवान् :— एइमत महाप्रभु दुइ भृत्येरे वशे। इच्छा नाहि, तबु तथा रहिला दिन-दशे ॥ 100 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुकी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी, तथापि दोनों दासोंके वशीभूत होनेके कारण वे दस दिनों तक वहाँ रहे ॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'दिन-दशे'—काशीमें श्रीतपन मिश्रके घरमें महाप्रभुकी इस यात्रामें (मध्यलीला 1/239 संख्यामें) चार दिनों तक रहनेकी बातका उल्लेख है ॥ 100 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हय चमत्कारे ॥ 101 ॥ अनुवाद—वाराणसीमें एक महाराष्ट्र दर्शनके लिये आता था। महाप्रभुके रूप और उनके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर वह आश्चर्यचकित हो जाता था ॥ 101 ॥ महाप्रभुको भिक्षा देनेमें मायावादी अवैष्णव-विप्रकी अयोग्यता :— विप्र सब निमन्त्रय, प्रभु नाहि माने। प्रभु कहे,—“आजि मोर हञाछे निमन्त्रणे ॥” 102 ॥ अनुवाद—बहुतसे ब्राह्मण महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण देते, किन्तु महाप्रभु किसीके भी निमन्त्रणको स्वीकार नहीं करते। महाप्रभु कहते,—“आज पहलेसे ही मुझे कहींसे निमन्त्रण हो चुका है ॥” 102 ॥ आचार्यकी लीला करनेवाले महाप्रभुके द्वारा मायावादियोंके सङ्गका त्याग :— एइमत प्रतिदिन करेन वञ्चन। संन्यासीर सङ्ग-भये ना मानेन निमन्त्रण ॥ 103 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रतिदिन मायावादी संन्यासियोंके सङ्गके भयसे उन ब्राह्मणोंके निमन्त्रणको स्वीकार नहीं करते ॥ 103 ॥ प्रकाशानन्दकी बहुतसे शिष्योंके साथ मायावादकी व्याख्या :— प्रकाशानन्द श्रीपाद सभाते बसिया। 'वेदान्त' पड़ान बहु शिष्यगण लञा ॥ 104 ॥ अनुवाद—एक प्रमुख मायावादी संन्यासी प्रकाशानन्द सरस्वती बहुतसे शिष्योंकी सभा करके उनको 'वेदान्त' पढ़ाते थे ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—'प्रकाशानन्द'—श्रीमहाप्रभुके समकालीन काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके एक विशेष संन्यासी थे। चैः भाः मध्यखण्ड तीसरे अध्यायमें— “'हस्त', 'पद', 'मुख' मोर नाहिक 'लोचन'। वेद मोरे एइमत करे विड़म्बन ॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेइ बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड ॥ बाखानये वेद, मोर विग्रह ना माने। सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, तबु नाहि जाने॥ सर्वयज्ञमय मोर ये अङ्ग-पवित्र। 'अज', 'भव' आदि गाय याँहार चरित्र ॥ 'पुण्य' पवित्रता पाय ये-अङ्ग-परशे। ताहा 'मिथ्या' बोले बेटा केमन साहसे॥” [अर्थात् “महाप्रभु कह रहे हैं—बेटा प्रकाशानन्द काशीमें मेरे विषयमें ऐसा पढ़ाता है कि मेरे हाथ, पैर, मुख, नेत्रादि कुछ नहीं हैं। इस प्रकार मेरे नित्य रूपको अस्वीकारकर मुझे निराकार कहकर वह लोगोंके साथ 106 |

सतरहवाँ अध्याय 17/104–114 ] छल करता है। वह बेटा वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरे नित्य विग्रहको नहीं मानता। इस प्रकार वह मानो मेरे अङ्ग खण्ड-खण्ड करके मुझे निराकार कहता है। इस अपराधके कारण उसके सभी अङ्गोंमें कोढ़का रोग हो गया है, तब भी इस सत्यको नहीं समझता। मेरे अङ्ग परम पवित्र और यज्ञमय हैं। ब्रह्मा, शङ्करादि उनकी महिमाका गान करते हैं। जिनके स्पर्श-मात्रसे सभी पुण्यवान् और पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीअङ्गोंको मिथ्या कहनेका बेटा किस प्रकार साहस करता है?"] चैः भाः मध्यखण्ड बीसवें अध्यायमें— “संन्यासी 'प्रकाशानन्द' बसये काशीते। मोरे खण्ड खण्ड बेटा करे भालमते॥ पड़ाय 'वेदान्त', मोर 'विग्रह' ना माने। कुष्ठ कराइलुँ अङ्गे, तबु नाहि जाने॥ 'सत्य' मोर लीला-कर्म, सत्य मोर 'स्थान'। इहा 'मिथ्या' बोले, मोरे करे खान्-खान्॥” [अर्थात् “संन्यासी 'प्रकाशानन्द' काशीमें रहकर अच्छे प्रकारसे मेरे खण्ड-खण्ड करता है। वह वेदान्त पढ़ाता है, किन्तु मेरे नित्य विग्रहको नहीं मानता। मैंने उसके अङ्गोंमें कोढ़का रोग कराया, तब भी यह बात वही नहीं समझता। मेरी लीलाएँ और मेरा धाम, सब सत्य हैं, किन्तु इन्हें वह मिथ्या कहकर मेरे खण्ड-खण्ड करता है।"] श्रील गोपालभट्ट गोस्वामीके श्रीगुरुदेव और पूर्वाश्रमके चाचा श्रीरङ्गक्षेत्रवासी त्रिदण्डिपाद श्रीरामानुजीयस्वामी श्रीश्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वती एवं ये (प्रकाशानन्द) कभी भी 'एक' व्यक्ति नहीं है॥ 104॥ प्रकाशानन्दको एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुके चरित्रका वर्णन :— एक विप्र देखि' आइला प्रभुर व्यवहार। प्रकाशानन्द-आगे कहे चरित्र ताँहार॥ 105॥ “एक संन्यासी आइला जगन्नाथ हैते। ताँहार महिमा-प्रताप ना पारि वर्णिते॥ 106॥ ईश्वरके लक्षण-समूह महाप्रभुमें विराजमान :— सकल देखिये ताँते अद्भुत-कथन। प्रकाण्ड-शरीर, शुद्धकाञ्चन-वरण॥ 107॥ आजानुलम्बित भुज, कमल-नयन। यत किछु ईश्वरेर सर्व सल्लक्षण॥ 108॥ अनुवाद—एक ब्राह्मण महाप्रभुके अद्भुत व्यवहारको देखकर आया और प्रकाशानन्दके सामने महाप्रभुकी महिमा कहने लगा,—“एक संन्यासी जगन्नाथ पुरीसे आये हैं, मैं उनकी महिमा और प्रतापका वर्णन नहीं कर सकता। उनकी सभी बातें अद्भुत हैं। उनका दिव्य शरीर प्रकाण्ड है, शुद्ध स्वर्णके जैसा उनका वर्ण है, उनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं और उनके नयन कमलके समान हैं। उनमें ईश्वरके समस्त सद्-लक्षण हैं॥ 105-108॥ भागवतमें कथित ईश्वर अथवा महाभागवतके समस्त लक्षण महाप्रभुमें विद्यमान :— ताहा देखि' ज्ञान हय—'एइ नारायण'। येइ ताँरे देखे, करे कृष्णसङ्कीर्त्तन॥ 109॥ 'महाभागवत'-लक्षण शुनि भागवते। से-सब लक्षण प्रकट देखिये ताँहाते॥ 110॥ 'निरन्तर कृष्णनाम' जिह्वा ताँर गाय। दुइ-नेत्रे अश्रु बहे गङ्गाधारा-प्राय॥ 111॥ क्षणे नाचे, हासे, गाय, करये क्रन्दन। क्षणे हुहुङ्कार करे,—सिंहेर गर्जन॥ 112॥ अलौकिक-नामरूपगुणलीलायुक्त श्रीकृष्णचैतन्य :— जगन्मङ्गल ताँर 'कृष्णचैतन्य' नाम। नाम, रूप, गुण ताँर, सब-अनुपम॥ 113॥ श्रद्धावान्‌को ईश्वरके दर्शन होनेपर उनकी कृपासे ही उनकी चेष्टाओंका अनुभव, केवल तर्कपन्थासे श्रवण निष्फलमात्र :— देखिले से जानि ताँर 'ईश्वरेर रीति'। अलौकिक कथा शुनि' के करे प्रतीति?”॥ 114॥ । 107

[ 17/109-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-उन्हें देखकर ऐसा लगता है-मानो 'ये श्रीनारायण' ही हैं। जो कोई भी उनके दर्शन करता है, वह श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करने लगता है। 'भागवत'में मैंने महाभागवतके जिन लक्षणोंके विषयमें सुना है, उन सब लक्षणोंको मैं उनमें प्रकाशित देखता हूँ। उन संन्यासीकी जिह्वा 'निरन्तर श्रीकृष्णनाम'का गान करती है और उनके दोनों नेत्रोंसे गङ्गाकी धाराकी भाँति अश्रु प्रवाहित होते हैं। वे संन्यासी कभी तो नृत्य करते हैं, हँसते हैं, गान करते हैं, क्रन्दन करते हैं और कभी सिंहकी गर्जनकी भाँति हुङ्कार भरते हैं। उनका जगत्का मङ्गल करनेवाला 'श्रीकृष्णचैतन्य' नाम है। उनका नाम, रूप, गुण आदि सब कुछ अनुपम है। उनकी अलौकिक कथा केवल सुननेसे ही किसको विश्वास होगा? देखनेपर ही कोई उनके ईश्वर होनेमें विश्वास करेगा॥” 109-114 ॥ महाप्रभुके चरित्रको सुनकर तर्कपन्थी प्रकाशानन्दके द्वारा महाप्रभुके प्रति व्यङ्ग अथवा अवज्ञा :- शुनिया प्रकाशानन्द बहुत हासिला। विप्रे उपहास करि' कहिते लागिला ॥ 115 ॥ अपने मायावाद रूपी हलाहलको उगलना :- “शुनिय़ाछि गौड़देशेर संन्यासी—'भावुक'। केशव-भारती-शिष्य, लोकप्रतारक ॥ 116 ॥ 'चैतन्य'-नाम ताँर, भावुकगण लञा। देशे-देशे, ग्रामे-ग्रामे बुले नाचाञा ॥ 117 ॥ येइ ताँरे देखे, सेइ ईश्वर करि' कहे। ऐछे मोहन-विद्या—ये देखे, से मोहे ॥ 118 ॥ सार्वभौम भट्टाचार्य—पण्डित प्रबल। शुनि' चैतन्येर सङ्गे हइल पागल ॥ 119 ॥ 'संन्यासी'—नाम-मात्र, महा-इन्द्रजाली! 'काशीपुरे' ना बिकावे ताँर भावकालि ॥ 120 ॥ 'वेदान्त' श्रवण कर, ना याइह ताँर पाश। उच्छृङ्खल-लोक-सङ्गे दुइलोक-नाश ॥” 121 ॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणकी बातोंको सुनकर प्रकाशानन्द बहुत हँसे। उस ब्राह्मणका उपहास करते हुए वे कहने लगे,-“मैंने उसके विषयमें सुना है। वह गौड़देशका संन्यासी है और 'भावुक' है। सुना है कि वह केशव भारतीका शिष्य है। परन्तु वह एक बड़ा ढोंगी है। उसका नाम 'चैतन्य' है। वह भावुक व्यक्तियोंको अपने साथ लेकर देश-देश, गाँव-गाँवमें सबको नचाते हुआ घूमता रहता है। जो भी उसे देखता है, वही उसे ईश्वर कहता है। उसमें ऐसी मोहन-विद्या है कि जो भी उसे देखता है, वह मोहित हो जाता है। मैंने सुना है कि इतने बड़े विद्वान पण्डित श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य भी चैतन्यके सङ्गसे पागल हो गये हैं। वह नाममात्रका संन्यासी है, वास्तवमें तो वह महा-इन्द्रजाली (जादूगर) है। इस 'काशीपुरी'में उसकी भावुकता नहीं बिकेगी। तुम वेदान्तका श्रवण करो और उसके पास मत जाना। उच्छृङ्खल लोगोंका सङ्ग करनेसे यह लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं॥” 115-121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भावकालि'—भावुकका स्वभाव। जिन सब व्यक्तियोंने शास्त्रविधिकी बेड़ियोंको तोड़ दिया है, उनके साथ रहनेसे इस लोक और परलोक, दोनों लोकोंका ही नाश होता है ॥ 120-121 ॥ अनुभाष्य- 'भावुक'—श्रीमन्महाप्रभुके परम चमत्कारमय अप्राकृत चिन्मय भावों और मनोधर्मके द्वारा कृत्रिम (दिखावटी) और थोड़े समय टिकनेवाले उच्छ्वास और उच्छृङ्खलतामय भावोंको 'एक' समझकर मायावादी प्रकाशानन्द यह कह रहे हैं। मायावादी शुद्धभक्तोंके अप्राकृत श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाओंके कीर्तन, नृत्य और गानको भी जागतिक इन्द्रियोंकी सन्तुष्टि करनेवाले नाचने-गाने-बजाने जैसा ही समझते हैं। वे इस कीर्तन-नृत्यादिको कामादि छः शत्रुओंकी दासताकी भाँति इन्द्रियोंकी चेष्टामात्र समझनेके कारण 'अपराधी' अथवा 'पाखण्डी' कहलाने योग्य हैं। वे नित्य स्वधर्म, श्रीकृष्णानुशीलनके श्रीकृष्ण-सम्बन्धी उपकरणके परित्यागके कारण “फल्गु-वैरागी” हैं॥ 116-121 ॥ 108 ।

सत्रहवाँ अध्याय 17/122-129 ] महाप्रभुकी निन्दा सुननेपर ब्राह्मणके द्वारा 'श्रीकृष्ण' स्मरण करते हुए स्थानका परित्याग :- एत शुनि' सेइ विप्र महादुःख पाइला। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' तथा हैते उठि' गेला॥ 122॥ अनुवाद—प्रकाशानन्दके मुखसे महाप्रभुकी निन्दा सुनकर उस ब्राह्मणको बहुत दुःख हुआ। वह 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते हुए तुरन्त वहाँसे उठकर चला गया॥ 122॥ महाप्रभुके दर्शनके फलसे शुद्धचित्त ब्राह्मणका महाप्रभुसे समस्त घटनाका वर्णन :- प्रभुर दर्शने शुद्ध हञाछे तौर मन। प्रभु-आगे दुःखी हञा कहे विवरण ॥ 123 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनसे उस ब्राह्मणका मन शुद्ध हो गया था। उस ब्राह्मणने दुःखी होकर आकर महाप्रभुको सारा वृत्तान्त बतलाया ॥ 123 ॥ महाप्रभुका मन्द-मन्द मुस्कराना :- शुनि' महाप्रभु तब ईषत् हासिला। पुनरपि सेइ विप्र प्रभुरे पुछिला ॥ 124 ॥ मायावादियोंकी प्रकृति-सम्बन्धित गौण-नाम उच्चारण करनेकी ही योग्यता, अप्राकृत वैकुण्ठ-नाम-उच्चारणमें अयोग्यता :- “तार आगे यबे आमि तोमार नाम लइल। सेह तोमार नाम जाने, - आपने कहिल ॥ 125 ॥ तोमार 'दोष' करिते करे नामेर उच्चार। 'चैतन्य' 'चैतन्य' करि' कहे तिनबार ॥ 126 ॥ चिद्-विलासमें अविश्वासके कारण मायावादियोंके मुखसे अवज्ञापूर्वक ही श्रीनामके उच्चारित होनेसे नामापराधके कारण वह श्रवण योग्य नहीं :- तिनबारे 'कृष्णनाम' ना आइल तार मुखे। 'अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' पाइ दुःखे ॥ 127 ॥ महाप्रभुसे इसके कारणकी जिज्ञासा :- इहार कारण मोरे कह कृपा करि'। तोमा देखि' मुख मोर बले 'कृष्ण' 'हरि' ॥" 128 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द मुस्कुराये। उस ब्राह्मणने पुनः महाप्रभुसे पूछा, - "जब मैंने उसके सामने आपका नाम लिया, तब उसने स्वयं ही कहा कि वह आपका नाम जानता है। आपके दोषोंको बतलानेके लिये उसने आपका नाम लेते हुए केवल 'चैतन्य' तीन बार कहा। तीनों बार कृष्णनाम उसके मुखमें नहीं आया। उसने अवज्ञासे आपका नाम लिया, जिसे सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। आप कृपा करके मुझे इसका कारण बतलाइये। आपको देखते ही मेरे मुखसे तो 'कृष्ण' 'हरि' नाम निकलता है॥"124-128 ॥ अनुभाष्य- 'तार' - प्रकाशानन्दका। 'दोष'- निन्दा। 'ब्रह्म', 'चैतन्य', 'आत्मा', 'परमात्मा', 'जगदीश', 'ईश्वर', 'विराट', 'विभु', 'भूमा', 'विश्वरूप', 'व्यापक' आदि श्रीकृष्णके गौण नाम हैं। इन सब नामोंको ग्रहण करनेवाले श्रीकृष्णके औदार्य और माधुर्यके प्रति आकर्षित नहीं होते। इन नामोंमें श्रीकृष्णका कुछ ऐश्वर्य अवश्य ही प्रकाशित होता है, परन्तु इन नामोंमें मुख्य श्रीकृष्ण नामसे अभिन्न उनके चैतन्यरसविग्रहत्वकी स्फूर्ति नहीं है। इसलिये मायावादी लोग या प्रकृतिके उपासकगण तत्त्व-वस्तुकी चरम अवस्थाको निर्विशेष अथवा चिद्विलाससे रहित होनेकी धारणा करते हैं। तत्त्व-वस्तु श्रीकृष्ण अपने चिन्मय नाम-रूप-गुण-लीला और परिकरोंसे अभिन्न हैं, इस बातमें वे अविश्वास और संशयका पोषण करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके मुख्य नाम ही एकमात्र 'साध्य' और 'साधन' हैं, ऐसा मानकर उनमें श्रद्धा नहीं करनेसे वे महापराधी हैं। अपने नित्य चरम-कल्याणकी कामना करनेवालेको उनके मुखसे किसी भी परमार्थकी बातको श्रवण नहीं करना चाहिये ॥ 125-127 ॥ मायावादी-सेवा-विवादी अथवा अपराधी, इसलिये उनके मुखमें श्रीकृष्णनाम नहीं आता :- प्रभु कहे, - "मायावादी कृष्णे अपराधी। 'ब्रह्म' 'आत्मा' 'चैतन्य' कहे निरवधि ॥ 129 ॥ 109

[ 17/129-133 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णविग्रह और श्रीकृष्णस्वरूपका अद्वय-ज्ञान-सम्पन्न होना एवं जीवनाम, जीवमूर्ति और जीवके स्वरूपके अन्तरका वर्णन :- अतएव तार मुखे ना आइसे कृष्णनाम। 'कृष्णनाम', 'कृष्ण स्वरूप'—दुइत' 'समान' ॥ 130 ॥ 'नाम', 'विग्रह', 'स्वरूप'—तिन एकरूप। तिने 'भेद' नाहि,—तिन 'चिदानन्द-रूप' ॥ 131 ॥ देह-देहीर, नाम-नामीर कृष्णे नाहि 'भेद'। जीवेर धर्म—नाम-देह-स्वरूपे 'विभेद' ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'मायावादी लोग श्रीकृष्णके चरणोंमें अपराधी हैं, इसलिये वे केवल 'ब्रह्म', 'आत्मा', 'चैतन्य' आदि ही कहते हैं। इसी कारण श्रीकृष्णनाम उनके मुखमें नहीं आता। श्रीकृष्णनाम और श्रीकृष्ण-स्वरूप—दोनों एक समान हैं। श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णका विग्रह और श्रीकृष्णका स्वरूप तीनों एक ही हैं। तीनोंमें कोई भेद नहीं है, तीनों 'चिदानन्द-रूप' हैं। श्रीकृष्णके शरीर और उनमें अथवा उनके नाम और उनमें कोई भेद नहीं है। नाम, शरीर और स्वरूपमें परस्पर भेद तो बद्धजीवका होता है॥ 129-132 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—मायावादी जीवतत्त्वको 'अप्राकृत' न मानकर, मायासे ढके ब्रह्मखण्डको 'जीव' कहकर स्थिर करते हैं और ब्रह्मको 'निर्विशेष' जानकर (सच्चिदानन्द) भगवद्-विग्रहको भी 'मायामय- विग्रह' कहते हैं। इसीसे ही मायावादी श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाको 'अनित्य' जानकर महापराधी हुए हैं। वे श्रीकृष्णके 'मुख्यनाम'का परित्याग करके 'ब्रह्म', 'आत्मा', 'चैतन्य' आदि 'गौण-नामों'का उच्चारण करते हैं। यद्यपि कभी 'गोविन्द', 'माधव', 'कृष्ण'—ये सब 'मुख्यनाम' उनके मुखसे निकलें, तथापि उनके ज्ञानदोषसे (श्रीकृष्णनाममें अविश्वास होनेके कारण उन मुख्य नामोंको अन्यान्य प्राकृत अथवा जागतिक एक शब्द माननेके कारण उनके मुखसे) चिद्-विग्रह श्रीकृष्णका 'नाम' कभी भी (बाहर) नहीं निकलता। वास्तवमें श्रीकृष्णका नाम और श्रीकृष्णका स्वरूप—दोनों ही चिद्-वस्तु हैं, अर्थात् नाम, विग्रह और स्वरूप—तीनों ही चिदानन्दमय हैं। बद्धजीवोंकी देह—जीवरूपी 'देही'से 'पृथक्' है। इसी प्रकार उनके पिताके द्वारा दिया गया 'नाम' और उनकी 'आत्मा' अथवा 'स्वरूप'से 'पृथक् और जड़ाश्रित' है। किन्तु श्रीकृष्णमें वैसा नहीं है, अर्थात् श्रीकृष्णकी जो 'देह' है, वही 'देही' है, जो नाम है, वही नामी है। श्रीकृष्णमें माया अथवा मायासे उत्पन्न जड़सम्बन्ध नहीं होनेके कारण उनके 'देह-देही' अथवा 'नाम-नामी'के बीचमें भेद असम्भव है। बद्धजीवके पक्षमें ही देह-देही अथवा नाम-नामी (इनके बीचमें पार्थक्य वर्तमान) है अर्थात् जीवमें ही 'नाम', 'देह' और 'स्वरूप'का परस्पर पृथक् धर्म विद्यमान है॥ 129-132 ॥ अनुभाष्य—'मायावादी'—आदिलीला, 7/29 और 7/39 संख्या देखें॥ 129 ॥ श्रीकृष्णनामका स्वरूप :- पद्मपुराण और विष्णुधर्मोत्तरका वचन— नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः। पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वात्नामनाभिनोः ॥ 133 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णनाम—चित्स्वरूप एक विशेष चिन्तामणि है, वह श्रीकृष्ण-चैतन्य-रसका विग्रह स्वरूप है। वह पूर्ण है अर्थात् मायिक वस्तुकी भाँति बँधा हुआ और खण्ड नहीं है। वह-शुद्ध अर्थात् मायासे मिश्रित नहीं है। वह-नित्यमुक्त अर्थात् सर्वदा चिन्मय है, कभी भी जड़सम्बन्धमें आबद्ध नहीं है; क्योंकि नाम और नामीके स्वरूपमें कोई भेद नहीं है॥ 133 ॥ अनुभाष्य— नाम-नाभिनोः (नाम च नामी कृष्णः च तयोः नाम्ना सह नाभिनः कृष्णस्य) अभिन्नत्वात् (भेदाभावात्) [कृष्ण] नाम-चिन्तामणिः (सकल-सेवाभीष्टप्रदाता), कृष्णः (साक्षात् स्वयंरूपः कृष्ण एव), चैतन्यरसविग्रहः (चिन्मयरसमूर्तिः, न तु 110 |

सत्रहवाँ अध्याय 17/133-137 ] अचिज्जड़वैरस्याश्रयः, तस्य मायातीतत्वात्, मायामिश्रण- योग्यताभावात्), पूर्णः (मायया खण्डनानर्हतनुः), शुद्धः (मायाविमिश्रः, व्युदस्तमायः), नित्यमुक्तः (सदा जड़ातीतः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। चिन्तामणि अर्थात् सबको अभीष्ट सेवा प्रदान करनेवाले ॥ 133 ॥ श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णदेह और श्रीकृष्णविलास- अप्राकृत, चिन्मय और स्वतःप्रकाश :- अतएव कृष्णेर 'नाम', 'देह', 'विलास'। प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय स्वप्रकाश ॥ 134 ॥ श्रीकृष्णका नाम, रूप, गुण, लीला-एक ही वस्तु :- 'कृष्णनाम', 'कृष्णगुण', 'कृष्णलीला'वृन्द। कृष्णेर स्वरूप-सम-सब चिदानन्द ॥ 135 ॥ अनुवाद-इसलिये स्वयं प्रकाशित होनेके कारण श्रीकृष्णका नाम, उनकी देह और उनकी लीला प्राकृत (जड़ीय) इन्द्रियोंके द्वारा नहीं समझे जा सकते। श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णके गुण तथा श्रीकृष्णकी लीलाएँ-श्रीकृष्णके स्वरूपके समान ही सभी चिदानन्दमय हैं॥ 134-135 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी देह, श्रीकृष्णका नाम, श्रीकृष्णका रूप, श्रीकृष्णके गुण, श्रीकृष्णकी लीलाएँ और परिकर-वैशिष्ट्यादि सच्चिदानन्दमय होनेके कारण सत्त्वादि तीन गुणोंके अभिमानी जीवके जड़ीय रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्शादिके द्वारा ग्रहण अथवा अनुभव नहीं किये जा सकते। ये जीवकी फलभोगमें प्रवृत्त इन्द्रियोंकी भोग्य वस्तु नहीं हैं। ये समस्त ही स्वप्रकाशवस्तु, नित्य चिन्मय और आनन्दमय हैं। गुणोंके अन्तर्गत जड़ वस्तुके नाम, रूप, गुण और क्रियाके बीचमें परस्पर जड़ीय पार्थक्य होता है, एकत्व नहीं होता; किन्तु अधोक्षज श्रीकृष्णमें ऐसा 'भेद' नहीं है ॥ 134 ॥ अप्राकृत श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीला-शुद्धभक्तिके द्वारा ही ग्राह्य, तर्कपन्थासे इन्द्रियोंके ज्ञानसे अगोचर :- अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥ 136 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अतएव श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण- लीला कभी भी प्राकृत नेत्रों-कानों आदिके द्वारा ग्राह्य नहीं हैं। जब जीव सेवोन्मुख होता है, अर्थात् चित्-स्वरूपसे श्रीकृष्णोन्मुख होता है, तभी अप्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंपर श्रीकृष्णनामादि स्वयं ही स्फुरित होते हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य- अतः (कृष्ण-नामादिना सह कृष्णस्य प्राकृत-भेदाभावात्), श्रीकृष्णनामादि (श्रीकृष्णनामरूपगुणलीला-परिकर-वैशिष्ट्यम्) इन्द्रियैः (प्राकृतभोगपरैर्नेत्रकर्णनासाजिह्वात्वगादिभिः) ग्राह्यं (रूपशब्दगन्धरसस्पर्शादिविषयीकृतं) न भवेत् (कर्हिचित् न स्यात्)। (ननु अस्यैवाधोक्षजत्वात् सर्वथेदं जड़- भोगपरेन्द्रियाणामलभ्यञ्च, तर्हि कथमेतत् कीदृशानां जीवानामाश्रयितव्यमिति चेत्, तत्राह-) सेवोन्मुखे (अप्राकृतबुद्ध्या शुद्धकृष्णभजन-प्रवृत्ते) जिह्वादौ (शुद्धसत्त्वमये इन्द्रिये) हि (खलु) अदः (कृष्णनामादि) स्वयमेव स्फुरति (प्रकटयति)। श्लोक-भावानुवाद-इसलिये श्रीकृष्ण-नामादिसे श्रीकृष्णके अभिन्न होनेके कारण श्रीकृष्णनाम- रूप-गुण-लीलापरिकर-वैशिष्ट्य प्राकृतभोगपर नेत्र-कर्ण- नासिका-जिह्वा-त्वचादि इन्द्रियोंके ग्राह्य रूप-शब्द-गन्ध- रस-स्पर्शादि विषयोंके समान कभी भी ग्रहण नहीं किये जा सकते। (निश्चय ही श्रीकृष्ण-नामादि अधोक्षज होनेके कारण सर्वथा ही जड़-भोगपर इन्द्रियोंसे अलभ्य हैं, तब कब और किस प्रकार जीवोंको नामका आश्रय प्राप्त होता है, इसे कह रहे हैं-) अप्राकृत बुद्धिसे शुद्धकृष्णभजनमें प्रवृत्त जिह्वादि शुद्धसत्त्वमय इन्द्रियोंपर ही श्रीकृष्णनामादि स्वयं ही प्रकटित होते हैं ॥ 136 ॥ परम-चमत्कारमय श्रीकृष्ण-माधुर्य- ब्रह्मज्ञानीको भी आकर्षित करनेवाला :- ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द लीलारस। ब्रह्मज्ञानी आकर्षिया करे आत्मवश ॥ 137 ॥ अनुवाद-पूर्ण आनन्दमय लीलारस ब्रह्मज्ञानीको । 111

[ 17/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्रह्मानन्दसे भी आकर्षित करके अपने वशमें करता है॥137॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं ही ब्रह्म हूँ'—ऐसी बुद्धि जिन लोगोंकी उदित होती है, उनमें माया चिन्ता दूर होकर चित्स्वरूप-ब्रह्ममें अवस्थितिरूप थोड़ा सा सुखका उदय तो होता है; किन्तु जो लोग श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णरूप, श्रीकृष्णगुण और श्रीकृष्णलीला-रूपी चिन्मय रस-विलास हृदयमें उदित करा पाते हैं, वे 'ब्रह्मानन्द'से अनन्त गुणा श्रेष्ठ पूर्णानन्द लीलारस भोग करते हैं। इसलिये पूर्णानन्द लीलारस-स्वरूप श्रीकृष्णलीला सहसा ब्रह्मज्ञानीको भी आकर्षित करके अपने वशमें कर लेती है॥137॥ श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यसे आकर्षित ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मरात :- श्रीमद्भागवतमें (12/12/69)— स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो- ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्। व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ 138 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो पहले ब्रह्मसुखमें एकान्तचित्त थे और बादमें जिन्होंने उस सुखको परित्याग करके श्रीकृष्णकी माधुर्यमयी लीलासे आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण-सम्बन्धी तत्त्वदीप-स्वरूप श्रीभागवत पुराणका विस्तार किया था; उन समस्त प्रकारके पापोंका नाश करनेवाले गुरुदेव व्यासपुत्र श्रीशुकको मैं नमस्कार करता हूँ॥ 138 ॥ अनुभाष्य—वास्तविक रूपमें सुननेके अभिलाषी शौनकादि ऋषियोंके समक्ष श्रीभागवतके वर्णनको समाप्त करके महाभागवत श्रीसूत गोस्वामी अपने गुरुदेव ब्रह्मरात श्रील शुक-गोस्वामीको प्रणाम कर रहे हैं,— स्वसुखनिभृतचेताः (स्वस्य आत्मनः सुखेन निभृतं पूर्णं चेतो यस्य सः, आत्माराम इत्यर्थः) तद्व्युदस्तान्यभावः (तत् तेनैव आत्मारामत्वेन व्युदस्तः सम्यग्-दूरीकृतः अन्यभावो ब्रह्मेतरे अन्यस्मिन् वस्तुनि भावः रतिः यस्य तथाभूतः) अपि अजितरुचिरलीलाकृष्टसारः (अजितस्य कृष्णस्य रुचिराभिः मनोज्ञाभिः लीलाभिः आकृष्टः सारः स्वसुखगतं स्थैर्यं यस्य सः) यः तत्त्वदीपं (परमार्थभूत-वस्तु-प्रकाशकं) तदीयं (भगवल्लीलामयं) पुराणं (दशविधलक्षणमय-सन्दर्भात्मकं श्रीमद्भागवतं) कृपया (लोकस्याजानतः हिताय, सुकृतिवतां मङ्गलाकाङ्क्षया वा) व्यतनुत (प्रकटितवान्), तम् अखिलवृजिनघ्नं (सर्वपापनुदं) व्याससूनुं (द्वैपायनात्मजं वैयासकीं शुकदेवं) नतः अस्मि (प्रणमामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ परम चमत्कारपूर्ण श्रीकृष्णगुण-आत्मारामगणोंको भी आकर्षित करनेवाले :- ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द कृष्णगुण। अतएव आकर्षय आत्मारामेर मन ॥ 139 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके गुण पूर्ण-आनन्दमय हैं, इसलिये वे आत्मारामगणोंके मनको ब्रह्मानन्दसे भी आकर्षित कर लेते हैं॥ 139 ॥ मुक्तपुरुषगण भी श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति आकृष्ट :- श्रीमद्भागवत (1/7/10)में— आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणोः हरिः ॥ 140 ॥ अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्के चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है॥ 140 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/186 संख्या देखें ॥ 140 ॥ श्रीकृष्णचरण-तुलसी ब्रह्मज्ञोंके भी मनोहारिणी :- एइ सब रहु—कृष्णचरण-सम्बन्धे। आत्मारामेर मन हरे तुलसीर गन्धे ॥ 141 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी लीलाओंकी बात तो छोड़ो, श्रीकृष्णके चरणोंमें अर्पित होनेपर तुलसीकी गन्धमात्र ही आत्मारामोंके मनका हरण कर लेती है ॥ 141 ॥ 112 |

सतरहवाँ अध्याय 17/142–145 ] श्रीनारायण-चरणकी तुलसी ब्रह्मज्ञ चतुःसनके भी देह और मनकी शुद्ध-सात्त्विक-विकारकारिणी :- श्रीमद्भागवत (3/15/43)में- तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द किञ्जल्कमिश्र-तुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन कमल-नेत्र-भगवान्‌के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था॥ 142 ॥ अनुभाष्य—मैत्रेय-विदुरके संवादमें दितिके गर्भके प्रभावसे भयभीत देवताओंको ब्रह्मा दितिके गर्भमें स्थित दोनों असुरोंका पूर्व-वृत्तान्त सुना रहे हैं,-पहले एकबार ब्रह्मर्षि चतुःसन अथवा कुमारगण श्रीनारायणके दर्शनकी अभिलाषासे वैकुण्ठमें प्रवेश करके जब सातवें कक्षमें पहुँचे, तब 'जय' और 'विजय' नामक दो द्वारपालोंने उन्हें रोक दिया। भेदबुद्धिसे उत्पन्न द्वेषप्रवृत्तिके कारण क्रोधित द्वारपालोंको उन्होंने असुर योनिमें जन्म ग्रहण करनेका शाप दिया। सर्वज्ञ भगवान् पद्मनाभ यह जानकर उसी समय स्वयं ही लक्ष्मीजीके सहित वहाँ आ गये। ऋषियोंने अपनी ब्रह्मसमाधिके फल आराध्यदेव साक्षात् भगवान् श्रीनारायणको अपने समक्ष देखकर प्रणाम किया, उनके जैसे आत्माराम ब्रह्मज्ञानियोंके भाव-विकारका वर्णन,- अरविन्दनयनस्य (पद्मलोचनस्य) तस्य (भगवतः) पदारविन्दकिञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः (पदारविन्दयोः चरणकमलयोः किञ्जल्कैः केशरैः मिश्रा या तुलसी, तस्याः मकरन्देन संयुक्तः समीरणः) स्वविवरेण (निजनासारन्ध्रेण) अन्तर्गतः (अन्तःप्रविष्टः सन्) अक्षरजुषां (निर्विशेष-ब्रह्मपराणाम् अपि) तेषां (सनकादीनां कुमाराणां) चित्ततन्वोः (मनःशरीरयोः) संक्षोभं (चित्ते हर्षं देहे रोमाञ्चादिकं) चकार (अजीजनत्) । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ मायावादी लोग नित्य श्रीकृष्णसेवाके विरोधी होनेके कारण शुद्ध-नाम कीर्तनमें अनधिकारी :- अतएव 'कृष्णनाम' ना आइसे तार मुखे। मायावादिगण याते महा बहिर्मुखे ॥ 143 ॥ प्रेमकी बाढ़में काशीको डुबानेके लिये ही महाप्रभुका आगमन :- भावकालि बेचिते आमि आइलाङ काशीपुरे। ग्राहक नाहि, ना बिकाय, लञा याब घरे ॥ 144 ॥ लोभरूपी मूल्यसे ही महाप्रभुकी प्रेम-वितरणकी प्रतिज्ञा :- भारी बोझा लञा आइलाङ, केमने लञा याब ? अल्प-स्वल्प मूल्य पाइले, एथाइ बेचिब ॥" 145 ॥ अनुवाद—मायावादी लोग श्रीकृष्णसे अत्यन्त बहिर्मुख होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण-अपराधी होनेके कारण 'श्रीकृष्णनाम' प्रकाशानन्दके मुखमें नहीं आया। मैं भक्तिपूर्ण भावोंको बेचनेके लिये काशी नगरीमें आया था, किन्तु यहाँपर उनका कोई ग्राहक नहीं है। मैंने सोचा था कि यदि यहाँ बिक्री नहीं होगी, तब मैं उन्हें अपने घर लौटा ले जाऊँगा। परन्तु यहाँ बेचनेके लिये मैं इतना भारी बोझा उठाकर लाया हूँ, तब कैसे उसे लौटाकर ले जाऊँगा? इसलिये मूल्यका स्वल्प अंश भी मिलनेपर मैं उन्हें यहीं बेच दूँगा ॥" 143-145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्मय नामरसका पात्र—अतिशय भारी बोझा है। मैं पूर्ण श्रद्धा-मूल्यमें उसे जीवोंको बिक्री करता हूँ। व्यापारीके लिये इतना भारी बोझा लौटाकर ले जाना भी बहुत कठिन है, इसलिये अल्प-स्वल्प मूल्य अर्थात् श्रद्धा आभासरूपी मूल्य मिलनेपर भी इसी स्थानपर बेचकर जाऊँगा ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—'अल्प-स्वल्प-मूल्य'-श्रीकृष्ण सेवामें लौल्य, लोभ अथवा रुचि; वह आत्मसमर्पणके बिना प्राप्त नहीं की जा सकती। मध्यलीला 8/70 संख्यामें उद्धृत पद्यावलीका श्लोक 'कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः' इस स्थानपर विचारणीय है ॥ 145 ॥ । 113

[ 17/146-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्राह्मणपर कृपा करनेके बाद महाप्रभुकी मथुरा यात्रा :- एत बलि' सेइ विप्रे आत्मसात् करि'। प्राते उठि' मथुरा चलिला गौरहरि ॥ 146 ॥ तीन लोगोंके द्वारा महाप्रभुका अनुगमन और महाप्रभुके आग्रहसे लौटकर जाना :- सेइ तीन सङ्गे चले, प्रभु निषेधिल। दूर हैते तिनजने घरे पाठाइल ॥ 147 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उस ब्राह्मणको अपने भक्तके रूपमें ग्रहण कर लिया। अगले दिन प्रातःकालमें उठकर श्रीगौरहरि मथुराकी ओर चल दिये। श्रीतपन मिश्र, श्रीचन्द्रशेखर तथा महाराष्ट्र तीनों उनके साथ चलने लगे, किन्तु महाप्रभुने उन्हें सङ्ग चलनेसे मना किया और दूरसे महाप्रभुने उन्हें घर लौट जानेके लिये कहा ॥ 146-147 ॥ तीनोंका एक साथ मिलकर महाप्रभुके गुणोंका गान :- प्रभुर विरहे तिने एकत्र मिलिया। प्रभुगुण गान करे प्रेमे मत्त हञा ॥ 148 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मथुरा चले जानेके बाद उनके विरहमें वे तीनों परस्पर मिलकर महाप्रभुके गुणोंका गान करते थे। इस प्रकार वे प्रेममें मत्त हो जाया करते थे॥ 148 ॥ प्रयागमें आकर स्नानके बाद वेणीमाधवके दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-कीर्तन :- 'प्रयागे' आसिया प्रभु कैल नदी-स्नान। 'माधव' देखिया प्रेमे कैल नृत्यगान ॥ 149 ॥ अनुवाद—काशीसे महाप्रभु प्रयागमें आये और वहाँ त्रिवेणीके सङ्गममें स्नान किया। तब उन्होंने 'वेणी-माधव' विग्रहके दर्शन करके प्रेममें नृत्य और गान किया ॥ 149 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माधव'—वेणीमाधव ॥ 149 ॥ अनुभाष्य—'प्रयाग'— “प्रकृष्टः यागः यागफलं यस्मात्” [अर्थात् “प्रकृष्टरूपसे यज्ञका फल है जिसका”] तीर्थराज, गङ्गा और यमुनाका सङ्गम अथवा 'त्रिवेणी'—वर्तमान इलाहाबाद दुर्गसे कुछ दूरीपर प्राचीन 'प्रतिष्ठानपुर' अथवा वर्तमान 'झूसी' ॥ 149 ॥ यमुनाके दर्शनसे व्रजलीलाके उद्दीपनके कारण उसमें कूदना, भट्टके द्वारा उन्हें निकालना :- यमुना देखिया प्रेमे पड़े झाँप दिया। आस्ते-व्यस्ते भट्टाचार्य उठाय धरिया ॥ 150 ॥ अनुवाद—यमुनाको देखकर महाप्रभुने प्रेमावेशमें उसमें छलाँग लगा दी। बलभद्र भट्टाचार्यने तुरन्त उन्हें पकड़कर बाहर निकाला ॥ 150 ॥ प्रयागमें तीन दिन लोगोंका उद्धार :- एइमत तिनदिन प्रयागे रहिला। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥ 151 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु तीन दिन तक प्रयागमें रहे। उन्होंने श्रीकृष्ण-नाम-प्रेम देकर लोगोंका उद्धार किया ॥ 151 ॥ मथुराके मार्गमें जाते समय लोगोंका उद्धार :- 'मथुरा' चलिते पथे यथा रहि' याय। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोकेरे नाचाय ॥ 152 ॥ अनुवाद—मथुरा जानेके मार्गमें महाप्रभु जहाँ भी विश्रामके लिये रुकते, वे वहींपर ही श्रीकृष्ण-नाम-प्रेम देकर लोगोंको नचाते थे ॥ 152 ॥ दक्षिण देशकी भाँति पश्चिम देशका भी उद्धार :- पूर्वे येन 'दक्षिण' याइते लोक निस्तारिला। 'पश्चिम'-देशे तैछे सब 'वैष्णव' करिला ॥ 153 ॥ अनुवाद—दक्षिण भारतकी ओर जाते समय महाप्रभुने जिस प्रकार लोगोंका उद्धार किया था, उसी प्रकार उन्होंने पश्चिम भारतमें भी सभीको वैष्णव बना दिया ॥ 153 ॥ 114 |

सतरहवाँ अध्याय 17/154–163 ] यमुनाके दर्शनमात्रसे ही उसमें कूद जाना :- प्रेमावेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। एक पथे याँहा याँहा हय यमुना-दर्शन। ब्राह्मण महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़ा और वह भी प्रेममें ताँहा झाँप दिया पड़े प्रेमे अचेतन ॥ 154 ॥ आविष्ट होकर उनके साथ नृत्य करने लगा ॥ 157–158 ॥ अनुवाद—मार्गमें जहाँ-जहाँ भी महाप्रभुको यमुनाका दोनोंका नृत्य-कीर्तन :- दर्शन होता, वे वही छलाँग लगाकर उसमें कूद पड़ते दुँहे प्रेमे नृत्य करि' करे कोलाकुलि। तथा प्रेममें अचेतन हो जाते ॥ 154 ॥ 'हरि' 'कृष्ण' कहे दुँहे बलि बाहु तुलि' ॥ 159 ॥ मथुराके दर्शनसे प्रेमावेश :- अनुवाद—दोनों प्रेमावेशमें नृत्य कर रहे थे और मथुरा-निकटे आइला—मथुरा देखिया। उन्होंने एक-दूसरेको गले लगाया। अपनी भुजाओंको दण्डवत् हञा पड़े प्रेमाविष्ट हञा ॥ 155 ॥ उठाकर दोनों 'हरि' 'कृष्ण' आदि नामोंका कीर्तन कर रहे थे ॥ 159 ॥ अनुवाद—मथुराके निकट आनेपर मथुराको देखकर महाप्रभु भूमिपर पड़ गये और प्रेमाविष्ट होकर दण्डवत् लोगोंका कोलाहल, पुजारीके द्वारा प्रणाम किया ॥ 155 ॥ महाप्रभुके गलेमें माला देना :- लोक 'हरि' 'हरि' बोले, कोलाहल हैल। विश्राम-घाटमें स्नान और योगपीठमें श्रीकेशव-दर्शन :- 'केशव'-सेवक प्रभुके माला पराइल ॥ 160 ॥ मथुरा आसिया कैला 'विश्राम-तीर्थे' स्नान। 'जन्मस्थाने' 'केशव' देखि' करिला प्रणाम ॥ 156 ॥ अनुवाद—वहाँ उपस्थित सभी लोग जोर-जोरसे 'हरि' 'हरि' बोलकर कीर्तन करने लगे, वहाँ कोलाहल अनुवाद—मथुरामें आकर महाप्रभुने विश्राम-घाटपर मच गया। भगवान् श्रीकेशवके सेवकने महाप्रभुको स्नान किया। तब महाप्रभु श्रीकृष्ण-जन्मभूमिपर आये माला लाकर पहनायी ॥ 160 ॥ और वहाँ भगवान् श्रीकेशवको देखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ 156 ॥ महाप्रभुके प्रेमकी 'अलौकिक'के रूपमें लोगोंको प्रतीति :- लोके कहे, प्रभु देखि' हञा विस्मय। अमृतप्रवाह भाष्य— विश्राम-तीर्थ'—प्रसिद्ध विश्रामघाट। ऐछे हेन प्रेम 'लौकिक' कभु नय ॥ 161 ॥ 'जन्मस्थाने केशव'—श्रीकृष्णके जन्म स्थानपर श्रीकेशवजीकी मूर्ति ॥ 156 ॥ अलौकिक होनेके कारणका निर्देश :- याँहार दर्शने लोके प्रेमे मत्त हञा। महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर लोगोंका विस्मय :- हासे, कान्दे, नाचे, गाय, कृष्णनाम लञा ॥ 162 ॥ प्रेमावेशे नाचे, गाय, सघने हुङ्कार। प्रभुर प्रेमावेश देखि' लोके चमत्कार ॥ 157 ॥ निश्चय सिद्धान्त :- सर्वथा निश्चित—इँहो—कृष्ण-अवतार। एक ब्राह्मणका महाप्रभुके आनुगत्यमें मथुरा आइला लोकेर करिते निस्तार ॥ 163 ॥ प्रेमावेशमें नृत्यगान :- एकविप्र पड़े प्रभुर चरण धरिया। अनुवाद—महाप्रभुको प्रेमावेशमें नृत्य-गान करते प्रभु-सङ्गे नृत्य करे प्रेमाविष्ट हञा ॥ 158 ॥ देखकर लोग विस्मित हो गये और कहने लगे कि ऐसा प्रेम कभी भी 'लौकिक' नहीं है। जिनके दर्शनमात्रसे अनुवाद—महाप्रभु प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य कर ही लोग प्रेममें मत्त होकर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते रहे थे, गा रहे थे और जोरसे हुङ्कार कर रहे थे, उनके । 115

[ 17/161-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हुए हँस रहे हैं, रो रहे हैं, नाच रहे हैं, गा रहे हैं, तो यह निश्चित ही है कि ये श्रीकृष्णके अवतार हैं। ये लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही मथुरा आये हैं॥ 161-163 ॥ ब्राह्मणके सम्बन्धकी बात सुनकर महाप्रभुने उनके चरणोंकी वन्दना की। भयभीत होकर वे ब्राह्मण भी महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 166-169 ॥ मर्यादा-रक्षक महाप्रभुका गुरुके निकट दीनता प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-“तुमि 'गुरु', आमि 'शिष्य'-प्राय। 'गुरु' हञा 'शिष्ये' नमस्कार ना युयाय॥” 170 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “आप मेरे 'गुरु'तुल्य हैं और मैं आपके 'शिष्य'के समान हूँ। 'गुरु' होकर 'शिष्य'को प्रणाम करना उचित नहीं है॥” 170 ॥ उस ब्राह्मणके प्रेमके दर्शन करके उसके परिचयकी जिज्ञासा :- तबे महाप्रभु सेइ ब्राह्मणे लञा। ताँहारे पुछिला किछु निभृते बसिया॥ 164 ॥ “आर्य, सरल तुमि-वृद्धब्राह्मण। काँहा हैते पाइले तुमि एइ प्रेमधन?”॥ 165 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उन ब्राह्मणको अपने साथ ले जाकर एकान्तमें बैठकर उनसे पूछा, - “आप एक वृद्ध ब्राह्मण हैं, आप समर्पित और भक्तिमें उन्नत हैं। आपको यह प्रेमधन कहाँसे प्राप्त हुआ?”॥ 164-165 ॥ ब्राह्मणका भय और दैन्य-ज्ञापन :- शुनिया विस्मित विप्र कहे भय पाञा। “ऐछे बात कह केने संन्यासी हञा॥ 171 ॥ महाप्रभुको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके साथ सम्बन्धयुक्त समझकर ब्राह्मणका अनुमान :- किन्तु तोमार प्रेम देखि' मने अनुमानि। माधवेन्द्र-पुरीर 'सम्बन्ध' धर-जानि॥ 172 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके सम्बन्धके बिना अन्यत्र श्रीकृष्णप्रेम अप्राप्य :- कृष्णप्रेमा ताँहा, याँहा ताँहार 'सम्बन्ध'। ताँहा बिना एइ प्रेमार काँहा नाहि गन्ध॥” 173 ॥ अपने गुरुदेव श्रीमाधवेन्द्रका परिचय देना :- विप्र कहे,-“श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी। भ्रमिते भ्रमिते आइला मथुरा-नगरी॥ 166 ॥ कृपा करि' तँहो मोर निलये आइला। मोरे शिष्य करि' मोर हाते 'भिक्षा' कैला॥ 167 ॥ गोपाल प्रकट करि' सेवा कैल 'महाशय'। अद्यापिह ताँहार सेवा 'गोवर्धने' हय॥” 168 ॥ गुरुबुद्धिसे महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणकी वन्दना, ब्राह्मणका भय और सम्भ्रमपूर्वक महाप्रभुको प्रणाम :- शुनि' प्रभु कैल ताँर चरण-वन्दन। भय पाञा प्रभु-पाय पड़िला ब्राह्मण॥ 169 ॥ अनुवाद-यह सुनकर ब्राह्मण विस्मित और साथ ही भयभीत भी हो गये। उन्होंने कहा, - “आप संन्यासी होकर ऐसी बात क्यों कह रहे हैं? किन्तु आपके उन्नत श्रीकृष्णप्रेमको देखकर मैंने अनुमान लगाया कि अवश्य ही श्रीमाधवेन्द्रपुरीके साथ आप सम्बन्ध रखते हैं। उनसे किसी-न-किसी प्रकारका कोई सम्बन्ध होनेपर ही इस प्रकारके उन्नत श्रीकृष्णप्रेमका अनुभव किया जा सकता है। उनसे सम्बन्धके बिना ऐसे प्रेमकी गन्ध भी कहीं नहीं हो सकती॥” 171-173 ॥ अनुवाद-ब्राह्मणने कहा, - “श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी भ्रमण करते-करते मथुरा नगरीमें आये थे। कृपा करके वे मेरे घरपर आये और उन्होंने मुझे अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार किया। उन्होंने मेरे हाथोंसे भिक्षा (भोजन) भी ग्रहण की थी। उन्होंने श्रीगोपालको प्रकट कराके उनकी सेवा की थी। आज तक भी गोवर्धनमें उन श्रीगोपालकी सेवा होती है।” श्रीमाधवेन्द्रपुरीसे उन भट्टके द्वारा महाप्रभुके गुरुका परिचय देना :- तबे भट्टाचार्य तारे 'सम्बन्ध' कहिल। शुनि' आनन्दित विप्र नाचिते लागिल॥ 174 ॥ 116 |