श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 18/17–26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीनारायणके आदि प्रकाश हैं। महाप्रभु प्रेममें मत्त होकर श्रीहरिदेवके आगे नृत्य करने लगे। महाप्रभुके अद्भुत रूप और प्रेमके विषयमें सुनकर सब लोग उन्हें देखनेके लिये आये॥ 17-19॥ महाप्रभुके दर्शनसे सभीको विस्मय; श्रीहरिदेवके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- प्रभु-प्रेम-सौन्दर्य देखि' लोके चमत्कार। हरिदेवेर भृत्य प्रभुर करिल सत्कार ॥ 20 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके प्रेम तथा सौन्दर्यको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। श्रीहरिदेवके सेवकोंने महाप्रभुका बहुत आदर-सत्कार किया॥ 20 ॥ ब्रह्मकुण्डमें बलभद्रके द्वारा रसोई बनाना, महाप्रभुका स्नान और भोजन करना :- भट्टाचार्य 'ब्रह्मकुण्डे' पाकयात्रा कैल। ब्रह्मकुण्डे स्नान करि' प्रभु भिक्षा कैल॥ 21 ॥ अनुवाद—श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने ब्रह्मकुण्डपर रसोई बनायी। महाप्रभुने ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके बाद भोजन ग्रहण किया॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाक'—चावल, सब्जी आदि बनाना॥ 21 ॥ श्रीहरिदेव मन्दिरमें रात्रि व्यतीत करना और गोवर्धन-स्थित श्रीगोपालके दर्शनकी चिन्ता :- से-रात्रि रहिला हरिदेवेर मन्दिरे। रात्र्ये महाप्रभु करे मनेते विचारे ॥ 22 ॥ 'गोवर्धन-उपरे आमि कभु ना चड़िब। गोपाल-रायेर दरशन केमने पाइब!' ॥ 23 ॥ अनुवाद—उस रात महाप्रभु श्रीहरिदेवके मन्दिरमें ही रहे और रात्रिमें विचार करने लगे कि 'मैं गोवर्धनके ऊपर तो कभी भी नहीं चढूँगा, तब फिर मुझे गोपाल-रायके दर्शन किस प्रकार प्राप्त होंगे!'॥ 22-23 ॥ म्लेच्छके भयके छलसे श्रीगोपाल-ठाकुरके द्वारा महाप्रभुको दर्शन देना :- एत मने करि' प्रभु मौन करि' रहिला। जानिया गोपाल म्लेच्छभय-भङ्गी उठाइला ॥ 24 ॥ अनुवाद—मनमें ऐसा विचार करके महाप्रभु मौन धारण करके रहे। महाप्रभुके मनकी बातको जानकर श्रीगोपालने म्लेच्छोंके भयकी चाल चली॥ 24 ॥ ग्रन्थकार-कृत श्लोक :- अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै भक्ताभिमानिने। अवरुह्य गिरेः कृष्णो गौराय स्वमदर्शयत् ॥ 25 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गोवर्धन पर्वतपर नहीं चढूँगा'— ऐसी प्रतिज्ञासे युक्त और 'मैं कृष्णभक्त हूँ'—इस अभिमानसे युक्त श्रीगौरचन्द्रको श्रीगोपालने स्वयं गोवर्धनसे उतरकर दर्शन दिये॥ 25 ॥ अनुभाष्य— गिरेः (गोवर्धनशैलस्य) [उच्चप्रदेशात्] अवरुह्य (अवतीर्य) शैलं (गोवर्धनगिरिम्) अनारुरुक्षवे (आरोढुमनिच्छवे) भक्ताभिमानिने (भजनीयवस्तुभेदेऽपि आत्मानं सेवकतया मन्यमानाय) स्वस्मै (आत्मने) गौराय (स्वरूपविग्रहाय कृष्णस्वरूपाय) स्वम् (आत्मानम्) अदर्शयत् (प्रदर्शयामास)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 25 ॥ म्लेच्छोंके दुराचारकी बातको लोगोंमें फैलाकर श्रीगोपालके द्वारा नीचे गाँठोलि-ग्राममें उतरना :- 'अन्नकूट'-नामे ग्रामे गोपालेर स्थिति। राजपुत-लोकेर सेइ ग्रामे वसति ॥ 26 ॥ अनुवाद—श्रीगोपाल उस समय गोवर्धनमें 'अन्नकूट' नामक ग्राममें विराजमान थे तथा उस ग्राममें राजपूत लोगोंका वास था॥ 26 ॥ अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं तरङ्गमें,— “गोपगोपी भुञ्जायेन कौतुक अपार। 132 |
अठारहवाँ अध्याय 18/26-33 ] एइ हेतु 'आनियोर' नाम से इहार॥ अन्नकूट-स्थान एइ देख, श्रीनिवास। ए-स्थान-दर्शने हय पूर्ण अभिलाष॥” [अर्थात् “इस स्थानपर गोप और गोपियोंने श्रीकृष्णके साथ अनेक कौतुक भरी लीलाएँ कीं थी, इसलिये इसका नाम 'आनियोर' है। हे श्रीनिवास! इस अन्नकूटके स्थानको देखो। इस स्थानके दर्शन करनेवालेकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं।"] स्तवावलीके व्रजविलास-स्तवमें— “व्रजेन्द्रवर्य्यार्पित-भोगमुच्चैर्धृत्वा बृहत्कायमधारिरुक्तः। वरेण्यां राधां छलयन् विभुङ्क्ते यत्रान्नकूटं तदहं प्रपद्ये॥” [अर्थात् “अघारि श्रीकृष्णने सर्वोत्तमा श्रीराधाको छलनेके लिये ऊँचा और विशाल शरीर धारण करके उत्सुकतावश व्रजेन्द्र श्रीनन्द महाराजके द्वारा अर्पित अन्नकूट-भोगका जिस स्थानपर भोजन किया था, मैं उस स्थानकी शरण ग्रहण करता हूँ।"] “कुण्डेर निकट देख निविड़-कानन। एथाइ 'गोपाल' छिला हञा सङ्गोपन॥” [अर्थात् “कुण्डके निकट इस सघन वनको देखो, यहीं श्रीगोपालको छिपाकर रखा था।"]॥26॥ एकजने आसि' रात्र्ये ग्रामीके बलिल। “तोमार ग्राम मारिते तुरुक-धारी साजिल॥27॥ आजि रात्र्ये पलाह, ना रहिह एकजने। ठाकुर लञा भाग', आसिबे कालि यवन॥”28॥ अनुवाद—एक व्यक्तिने रात्रिके समय वहाँ आकर ग्रामवासियोंको कहा,—“पठान लोग तुम्हारे ग्रामके ऊपर आक्रमण करनेकी तैयारी कर रहे हैं। इसलिये आज रातको ही तुम सब यहाँसे भाग जाओ, एक भी व्यक्ति यहाँ नहीं रहे। तुम लोग गोपाल ठाकुरको लेकर भाग जाओ, यवन लोग कल यहाँ आ जायेंगे॥”27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तुरुक'—एक विशेष मुसलमान (तुर्की अथवा पठान) सेना॥27॥ अनुभाष्य—'ग्रामीके'—ग्रामवासियोंको; 'तुरुकधारी'— तुर्की-वेशधारी घुड़सवार सेना॥27॥ शुनिया ग्रामेर लोक चिन्तित हइल। प्रथमे गोपाल लञा गाँठोलि-ग्रामे थुइल॥29॥ अनुवाद—यह सुनकर ग्रामके लोग चिन्तित हो गये। उन्होंने सबसे पहले श्रीगोपालको ले जाकर गाँठोलि ग्राममें छिपा दिया॥29॥ विप्रगृहे गोपालेर निभृते सेवन। ग्राम उजाड़ हैल, पलाइल सर्वजन॥30॥ अनुवाद—एक ब्राह्मणके घरपर एकान्तमें श्रीगोपालकी सेवा होने लगी। ग्रामवासी सभी भाग गये, इसलिये अन्नकूट-ग्राम उजड़ गया॥30॥ ऐछे म्लेच्छभये गोपाल भागे बारे बारे। मन्दिर छाड़ि' कुञ्जे रहे, किंवा ग्रामान्तरे॥31॥ अनुवाद—इस प्रकार म्लेच्छोंके भयसे श्रीगोपालको बार-बार स्थानान्तर किया जा रहा था। वे मन्दिरको छोड़कर कभी कुञ्जमें रहते, तो कभी एक ग्रामसे दूसरे ग्राममें स्थान बदलते रहते॥31॥ मानसी-गङ्गामें स्नान करनेके बाद गोवर्धनकी परिक्रमा :— प्रातःकाले प्रभु 'मानसगङ्गा'य करि' स्नान। गोवर्धन-परिक्रमाय करिला प्रयाण॥32॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभु मानसी-गङ्गामें स्नान करके गोवर्धनकी परिक्रमा करनेके लिये चल पड़े॥32॥ गोवर्धनके दर्शनसे प्रेमावेश :— गोवर्धन देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हञा। नाचिते नाचिते चलिला श्लोक पड़िया॥33॥ अनुवाद—गोवर्धनको देखकर महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें आविष्ट हो गये। नाचते-नाचते चलते हुए उन्होंने एक श्लोकका उच्चारण किया॥33॥ । 133
[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगोवर्धन-स्तुति :– श्रीमद्भागवत (10/21/18)में– हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद्रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः। मानं तनोति सह-गोगणयोस्तयोर्यत् पानीय-सुयवस-कन्दर-कन्दमूलैः ॥ 34॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34॥ अमृतप्रवाह भाष्य–ये गोवर्धन पर्वत–वैष्णवप्रधान हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम-कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ– घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 34॥ अनुभाष्य–व्रजमें शरत्काल उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा वन-वनमें गोचारण करते-करते वंशी बजानेपर गोपियाँ श्रीकृष्ण-सङ्गके लिये कामातुर होकर श्रीकृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करते हुए इधर- उधर भ्रमण करते-करते सामने व्रजेन्द्रनन्दनसे अभिन्न गिरिराज गोवर्धनको देखकर गा रही हैं– हे अबलाः (सख्यः), हन्त (इति हर्षे) अयम् अद्रिः (गोवर्धनः) [ध्रुवं] हरिदासवर्यः (हरिदासानां श्रेष्ठः),–यत् (यस्मात्) रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः (रामकृष्णयोः चरणस्पर्शेन प्रमोदः, तृणाद्युद्गमनभेन रोमहर्षदर्शनात्, यस्य तादृशः सन्); यत् (यस्मात् च) पानीय-सुयवसकन्दरकन्दमूलैः (पानीयैः सुयवसैः सुकोमलैः शोभनतृणैः कन्दरैः कन्दमूलैश्च) [यथोचितम् अय] सहगोगणयोः (गोभिः गणेन सखिसमूहेन च सह वर्त्तमानयोः) तयोः (रामकृष्णयोः) मानं (समादरं) तनोति (विदधाति– अतोऽयमतिधन्यः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद–हे सखि ! अहो ये गोवर्धन निश्चय ही हरिदासोंमें श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम- कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ–घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 34॥ अमृतानुकणिका–जो लोग सांसारिक विषयोंमें आसक्त नहीं होकर भगवत्-सेवामें जीवन व्यतीत करते हैं, वे हरिदास हैं। श्रीमद्भागवतमें महाराज युधिष्ठिर, श्रीउद्धव और श्रीगिरिराज गोवर्धन–इन तीन महत् पुरुषोंको हरिदास कहा गया है। बृहद्भागवतामृत (1/5/7)में नारदजीकी युधिष्ठिर महाराजके प्रति उक्ति– “यूयं नृलोके वत भूरिभागा, येषां प्रियोऽसौ जगदीशवरेशः। देवो गुरुर्बन्धुषु मातुलेयो, दूतः सुहृत् सारथिरुक्तितन्त्रः॥” अर्थात् “इस नरलोकमें आपलोग ही सौभाग्यशाली हैं। क्योंकि ब्रह्मा, रुद्र आदि ईश्वरोंके भी जो ईश्वर हैं, वे श्रीदेवकीनन्दन आप लोगोंके प्रिय हैं। श्रीदेवकीनन्दन आप लोगोंके केवल प्रिय ही नहीं हैं, अपितु इष्टदेव, गुरु और बान्धव, मातृसम्बन्धसे सम्बन्धित कुटुम्बी, दूत, सुहृद् और कभी सारथी भी हैं।” अतः श्रीमद्भागवतमें उन्हें जो हरिदासकी पदवी मिली है, वह सर्वथा उपयुक्त है। उद्धवजी श्रीकृष्णके कैसे प्रिय हैं, इसे श्रीमद्भागवतमें कहा गया है। (भाः 10/46/1)– वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा। शिष्यो बृहस्पतेः साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तमः॥ अर्थात् “परीक्षित ! उद्धवजी वृष्णिवंशियोंमें प्रधान व्यक्ति थे। वे साक्षात् बृहस्पतिके शिष्य और परम बुद्धिमान् थे। उनकी महिमाके सम्बन्धमें और कौनसी बात कही जा सकती है कि वे भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा और मन्त्री थे।” (भाः 11/14/15)में श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुखसे कहते हैं– “न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥” अर्थात् “उद्धव ! तुम मेरे अत्यन्त प्रियपात्र हो। तुम मुझे जितने प्रिय हो, मेरा पुत्र आत्मयोनि ब्रह्मा, शङ्कर, सगे भाई बलरामजी, अद्धाङ्गिनी लक्ष्मी, और तो 134 |
अठारहवाँ अध्याय 18/34 ] क्या मेरी आत्मा भी उतनी प्रिय नहीं है।" अतः श्रीमद्भागवतमें उद्धवजीको जो हरिदासकी पदवी मिली है, वह सर्वथा उचित ही है। प्रेमपर भक्त युधिष्ठिर महाराजका प्रेम श्रीकृष्णकी भगवत्ताका ज्ञान रहनेके कारण कुछ शिथिल रहता है। इसलिये प्रेमातुर भक्त उद्धवजी इनसे श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णने इन्हें गोपियोंसे प्रेमकी शिक्षा लेनेके लिये व्रजमें भेजा। वहाँ श्रीराधाके मादनाख्या महाभावके दर्शन करके उद्धवजी चमत्कृत हो गये और गोपियोंकी चरणधूलि प्राप्तिकी अभिलाषासे व्रजमें तृण, गुल्म, औषधि आदिके रूपमें जन्म ग्रहण करनेकी लालसा प्रकट की। इस अभिलाषाकी पूर्तिके लिये उन्होंने व्रजस्थित गिरिराज गोवर्धनका ही आश्रय लेना उचित समझा। अतः गोवर्धनके अङ्गमें स्थित कुसुम सरोवरके निकट तृणादिका जन्म ग्रहण किया। भविष्य-पुराणके अनुसार रसिकवर गोवर्धन श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति श्रीराधिकाजीके हृदयसे प्रकट हुए हैं। गोवर्धन तन, मन, धन, प्राणादि सर्वस्व न्योछावर करके श्रीकृष्ण और उनके सहगामियोंकी सब प्रकारसे मनोऽभीष्ट सेवा करते हैं, इसलिये गोपियाँ उन्हें हरिदासवर्य कह रही हैं। जिस दासकी सेवासे श्रीहरि आनन्दित होते हैं और जो दास श्रीहरिकी सेवाकर परमानन्दित होते हैं, वे दास ही श्रीहरिके दासोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। जो दास श्रीहरिकी सेवामें कुछ परिश्रम या क्लेश अनुभव करते हैं अथवा जिस दासकी सेवाको भगवान् अनिच्छापूर्वक ग्रहण करते हैं, उस दासको श्रेष्ठ नहीं कहा जाता। अधिकांश बद्धजीव मायादास हैं। मायादास अर्थात् यह शरीर और धन, जन, पुत्र-परिवार-जितनी आसक्तिकी वस्तुएँ हैं, उनके प्रति चित्तका लगना ही माया-दासत्व है। संसारमें बद्ध होनेतक कुछ-न-कुछ रूपमें यह अवश्य ही रहेगा। यदि जीव साधु अथवा गुरु और कृष्णकी कृपा पाता है- 'गुरु कृष्ण प्रसादे पाये भक्तिलताबीज'-तब उसका कुछ उत्थान होता है और गुरुकी कृपासे गुरुदास हो जाता है। हरिदास बननेके लिये पहला चरण है-गुरुदास होना। गुरुदास तो एक ही है, किन्तु भक्तिकी भावनाके या विषयोंके तारतम्यसे उसके विविध नाम दिये गये हैं। प्रथम है शिष्यब्रुव, उसके बाद तामसिक गुरुदास, राजसिक गुरुदास, सात्त्विक गुरुदास, निर्गुण गुरुदास। निर्गुणमें भी कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम दासका भेद है। इन सबमें-से निर्गुण दास सबसे उत्तम है। इससे भी ऊपर स्तर होनेपर वह कृष्णदास होगा। उपरोक्त प्रकारके गुरुदासोंके विभिन्न लक्षणों और गुणोंका उदाहरण सहित संक्षेपमें वर्णन इस प्रकार है- (1) 'शिष्यब्रुव'-शिष्यब्रुव उसको कहते हैं जिसका गुरुसे यथार्थ कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु किसीको मारनेके लिये, किसीसे स्पर्धा करनेके लिये, किसीसे ईर्ष्या करनेके लिये, तामसिक भावनाओंको लेकर वह कपटतापूर्वक गुरु-पदाश्रय करता है। वह गुरुकी सेवा न कर अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये गुरुका सङ्ग करता है। इसका एक उदाहरण एकलव्य है। द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवोंको शिक्षा देते थे। इस प्रकार उनके एक सौ पाँच शिष्य थे और वे समान रूपमें इनको सिखलाते थे, किन्तु फिर भी अर्जुनके प्रति उनकी प्रीति अधिक थी। एकलव्य जो बहेलिया सरदारका पुत्र था, उससे अर्जुनकी प्रतिष्ठा सहन नहीं हुई। वह नास्तिक और विद्वेषी स्वभावका था। शास्त्रोंमें कहा गया है कि गुरुको उत्तम कुलके सदाचारी व्यक्तिको शिष्यरूपमें ग्रहण करना चाहिये। निम्न कुलका व्यक्ति जिसका चरित्र और आचरण ठीक नहीं है, अथवा जिसके कुलका पता नहीं है या माता-पिताका पता नहीं है-ऐसे लोगोंको दीक्षा नहीं देनी चाहिये। एकलव्य द्रोणाचार्यके पास आया और कहा,-'गुरुदेव, मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप कृपा मुझे भी शिक्षा प्रदान करें।' द्रोणाचार्यने पूछा, - 'कहाँ रहते हो? किसके पुत्र हो? किसलिये यह धनुष-विद्या लेना चाहते हो?' एकलव्यने कोई उत्तर नहीं दिया। द्रोणाचार्यके अनेक बार पूछनेपर भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया। एकलव्यकी दुर्योधनसे मित्रता थी। उसका हृदय भीतरसे । 135
[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
बड़ा कलुषित था और वह अर्जुनको नीचा दिखलाना चाहता था। गुरु तो सर्वज्ञ हैं। द्रोणाचार्य जान गये कि यह शिक्षा लेकर ईर्ष्यावश जगत्को ध्वंस करेगा, इसलिये उन्होंने एकलव्यसे कहा, — 'मेरे आश्रममें तुम्हारे लिये स्थान नहीं है, मैं तो केवल राजकुमारोंको शिक्षा देता हूँ जिनका शील, आचार-विचार ठीक है। मैं दूसरोंको ग्रहण नहीं करता।' एकलव्य बड़ा दुखी होकर वहाँसे चला गया। वनमें जाकरके उसने द्रोणाचार्यकी मूर्ति बनायी और मूर्तिसे धनुर्विद्या सीखने लग गया। बहुत दिनोंके बाद द्रोणाचार्य अपने शिष्योंकी परीक्षा लेनेके लिये उनको लेकर वनमें गये। जब वे वनमें पहुँचे तो इनको देखकर एक कुत्ता जोरसे भौंकने लगा। जैसे ही द्रोणाचार्य शिष्योंके साथ थोड़ा आगे गये तो कुत्तेका भौंकना एकदम बन्द हो गया। द्रोणाचार्यने मुड़कर देखा कि कुत्तेका भौंकना बन्द कैसे हो गया? उन्होंने देखा कि कुत्तेका मुख बाणोंसे भरा पड़ा है किन्तु कहीं भी वह क्षत-विक्षत नहीं है। वे बड़े आश्चर्यचकित हो गये कि ऐसी कुशलतासे किसने बाण चलाये? कुत्तेके मुखकी दिशासे उन्होंने बाणोंके आनेकी दिशाको निर्धारित कर लिया। वे उस दिशामें थोड़ी दूर गये तो उन्होंने देखा कि एक काले रङ्गका बड़ा बलिष्ठ युवक हाथोंमें धनुष-बाण लेकर खड़ा है। द्रोणाचार्यको देखते ही उसने उनको प्रणाम किया। द्रोणाचार्य ने पूछा, — 'तुम कौन हो?' उसने कहा, — 'मैं एकलव्य हूँ।' उससे पूछा, — 'यह बाण क्या तुमने चलाये?' उसने उत्तर दिया, — 'हाँ, मैंने चलाये।' फिर उससे पूछा, — 'तुमने किससे यह धनुर्विद्या सीखी? तुम्हारे गुरु कौन हैं?' उसने द्रोणाचार्यको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा, — 'आप ही मेरे गुरु हैं।' वे बोले, — 'मैंने तो तुम्हें कभी शिक्षा नहीं दी।' तो उसने अपने द्वारा बनायी द्रोणाचार्यकी मूर्तिको दिखलाया और कहा, — 'मैंने इनसे शिक्षा ली है।' द्रोणाचार्यने कहा, — 'इस प्रकार तुम मेरे शिष्य हो गये, परन्तु तुमने गुरु-दक्षिणा तो दी नहीं, इसलिये दक्षिणा दो।' एकलव्यने कहा, — 'आप जो माँगेंगे, मैं वह दे दूँगा। यह समस्त शरीर आपके लिये अर्पित है।' द्रोणाचार्यने कहा, — 'अपना दाहिना अँगूठा काट करके मुझे दे दो।' उसने एक क्षणकी देरी नहीं की और अपना अगूँठा काटकर दे दिया। वह रक्तसे लहूलुहान हो गया। द्रोणाचार्यने उसके कार्यको देखकर उसकी प्रशंसा नहीं की, अपितु उनके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया। वे उसे शिक्षा नहीं देना चाहते थे, परन्तु उसने सब कुछ सीख लिया। वे सोचने लगे कि यह अच्छा नहीं हुआ, जगत्का मङ्गल नहीं होगा। बादमें महाभारतके अन्तिम समयमें एकलव्यने श्रीकृष्णसे युद्ध किया और उनको और पाण्डवोंको मारना चाहा, तो श्रीकृष्णने सुदर्शन चक्रसे उसका वध कर दिया। गुरुकी आज्ञाका पालन करना ही तो शिष्यका कर्त्तव्य है। द्रोणाचार्यने जगत्के मङ्गलका विचार करते हुए उसे शिक्षा देनेसे मना कर दिया था, परन्तु उसने गुरुकी बातका उल्लङ्घन करके छलसे शिक्षा ली। इसलिये श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद कहते हैं, — 'जो जड़ कर्मी हैं, वे तो एकलव्यको आदर्श गुरु सेवकके रूपमें मानेंगे। क्योंकि वे जड़ कर्मी हैं, उनकी बुद्धि ध्वंस हो गयी है, उनमें कोई विचारशक्ति नहीं है, वे स्थूलदर्शी हैं, इसलिये वे इस सिद्धान्तके भीतर प्रवेश नहीं पाते। इस घटनामें परमार्थ नामकी कोई वस्तु नहीं है।' (2) 'तामसिक गुरुदास'—दूसरेको नीचा दिखलाने अथवा हिंसादिके लिये छलसे जो गुरुका आश्रय करते हैं, वे तामसिक गुरुदास होते हैं। इसका एक उदाहरण कर्ण है। अर्जुनकी प्रतिभा देखकर कर्णको उससे ईर्ष्या हो गयी। एक दिन जब रङ्गशालामें अर्जुनने सर्वश्रेष्ठ धनुर्विद्याका प्रदर्शन किया तो कर्णने भी वहाँ आकर बाण चलाने, मत्स्यभेद आदिमें अर्जुनके समान दक्षता दिखलायी। सब लोग उसकी प्रशंसा करने लगे और दुर्योधनने तो तुरन्त उठकर उसे गले लगा लिया। भीष्म पितामहने कहा, — 'तुम यहाँ अर्जुनकी समता करनेके
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अठारहवाँ अध्याय 18/34 ] लिये आये हो, पहले बतलाओ तुम कौन हो ? ये राजकुमार हैं, ये तो पाण्डु पुत्र हैं और ये धृतराष्ट्र पुत्र हैं। तुम किसके पुत्र हो, तुम्हारे पिता-माताका नाम क्या है?' उसने कहा,-'मेरी माताका नाम राधे है।' तो भीष्म पितामहने कहा,-'तुम क्या सूतपुत्र हो? सूतपुत्रको इन राजकुमारोंसे समता करनेका कोई अधिकार नहीं है, इसलिये तुम यहाँसे चले जाओ।' उसी समय दुर्योधन एकदम उठकर खड़ा हुआ और अपना राजमुकुट देकर कहा,-'यह अङ्गदेशका राजा और हमारा परम मित्र है। इसका सम्मान हो।' लेकिन भीष्म पितामहके सामने उसकी एक नहीं चली। लज्जित होकर कर्ण वहाँसे चला गया। अब उसने अर्जुनको हरानेकी ठान ली और इसलिये वह शस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये परशुरामजीके पास गया। परशुरामजीने उसका परिचय पूछा कि वह किसका पुत्र है, किस जातिका है? तो उसने क्षत्रियका पुत्र न कहकर स्वयंको ब्राह्मणका पुत्र बतलाया। ऋषि- महर्षि लोग बड़े सरल सीधे होते हैं। उन्होंने उसकी बात मान ली कि यह झूठ क्यों कहेगा ? और यह शस्त्र-शिक्षाके लिये एवं परमार्थके लिये आया है, इसलिये इसको अपना शिष्य स्वीकार करना चाहिये। तब उन्होंने उसको ब्रह्मास्त्रसे लेकर सब प्रकारके जितने शस्त्र हैं, सबकी शिक्षा दे दी। अब दीक्षा समारोहसे एक-दो पहले ही ऋषि उसके गोदीमें सर रखकर सो गये। तब वर्षाकाल था, एक लाल कीड़ा न जाने कैसे ऊपर चढ़ा और कर्णकी जङ्घाको छेदता हुआ नीचे निकल गया। रक्तकी धारा बहने लगी, परन्तु कर्ण थोड़ासा भी नहीं हिला। जब रक्त ऋषिके सिरमें लगा तो उन्हें कुछ गरम अनुभव हुआ और देखा कि रक्त बह रहा है। उठकर उन्होंने देखा कि यह रक्त तो कर्णकी जङ्घासे बह रहा है। परशुरामजीने कर्णसे उसका कारण पूछा तो उसने बताया कि एक कीड़ेने उसकी जङ्घाको छेद दिया था। परशुरामजी बोले कि इतनी पीड़ा सहन करके भी तुम हिले क्यों नहीं ? कर्णने कहा कि गुरुजी मैं हिलता तो आपकी निद्रामें बाधा आती। तब परशुरामजली क्रोधित होकर बोले,-'तुम किसी प्रकारसे ब्राह्मण नहीं हो सकते, क्योंकि ब्राह्मणमें इतनी सहनशीलता नहीं होती। तुम अवश्य ही क्षत्रिय हो। सत्य बताओ, नहीं तो तुम्हें श्राप दे दूँगा। तुम किसके पुत्र हो?' उसने कहा,-'मैं सूतपुत्र हूँ।' परशुरामजीने कहा,-'यह सत्य पहले क्यों नहीं बताया ? किसलिये यह शस्त्रकी शिक्षा ली है ? अब सब सत्य बतलाओ।' तो कर्णने कहा,-'मैंने अर्जुनको परास्त करनेके लिये यह शिक्षा ली है।' परशुरामजीने कहा,- 'तुमने यह बात पहले नहीं बतायी, तुमने गुरुसे झूठ बोला, इसलिये तुम मेरे शिष्य नहीं हो। जब तुम्हारे प्राण सङ्कटमें होंगे, तब तुम मेरी दी हुई समस्त विद्याको भूल जाओगे और वह तुम्हारे किसी काम नहीं आयेगी। जब तक ऐसा सङ्कट नहीं आयेगा, तब तक यह तुम्हारे काम आयेगी।' कर्णके भावको तामसिक भाव कहते हैं, इसलिये उसे तामसिक गुरुदास कहेंगे। (3) 'राजसिक गुरुदास'-सुख-ऐश्वर्य भोग, पत्नी आदिके लिये जो गुरु सेवा होती है वह राजसिक होती है। राजसिक गुरुदासका उदाहरण देवव्रत (भीष्म) हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मैं विवाह नहीं करूँगा, आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा और राजपद भी ग्रहण नहीं करूँगा। वे अपने भाइयोंके विवाहके लिये काशीनरेशकी कन्याओं अम्बा, अम्बालिका और अम्बिकाको युद्धमें जीतकर हरण करके ले आये। अम्बालिका और अम्बिका, इन दोनोंका तो विवाह हो गया, किन्तु अम्बाने कहा कि मैं किसी राजकुमारसे प्रेम करती हूँ, इसलिये मैं आपके भाईसे विवाह नहीं कर सकती। परन्तु आप मुझे हरण करके ले आये हैं, तो मेरे प्रियतम राजकुमार मुझे स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिये आपको ही मुझसे विवाह करना होगा। भीष्मने कहा कि मैं तो प्रतिज्ञाबद्ध हूँ, इसलिये विवाह नहीं कर सकता। अम्बाने सबसे प्रार्थना की, किन्तु कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सका, क्योंकि भीष्म तो महाप्रचण्ड और बलवान थे। तब । 137
[ 18/34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अम्बा उनके गुरु परशुरामके पास गयी और जोर-जोरसे रोने लगी। परशुरामजीने पूछा, — 'बेटी, तुम क्यों रो रही हो, क्या बात है?' अम्बाने सारी बात उन्हें बतायी और कहा, — 'जब ये देवव्रत मुझे जीत करके लाये हैं, तो उनसे ही विवाह करूँगी। इसलिये कृपा करके आप उन्हें ऐसा आदेश दे दीजिये।' परशुरामजीको दया आ गयी और उन्होंने देवव्रतको बुलवाया और कहा कि जब इसे जीतकर लाये हो, तब तुम इससे विवाह क्यों नहीं करते हो? देवव्रतने कहा कि अपने भाइयोंके लिये इन्हें स्वयंवरमें जीतकर हरण करके लाया। परशुरामजीने कहा, — 'जब तुम जीतकर लाये हो, तब तुम्हें इससे विवाह करना पड़ेगा।' देवव्रतने कहा, — 'आप ऐसा आदेश मत दें। मैंने पिताजीको वचन दिया है कि मैं जीवन भर विवाह नहीं करूँगा और राज्य नहीं लूँगा।' परशुरामजीने कहा, — 'क्या तुम्हें स्वयंवरमें जाकर इन कन्याओंको बलपूर्वक पकड़कर अपहरण करते समय अपना वचन स्मरण नहीं था? अब इसका भागी कौन होगा? अब इससे विवाह करो, अन्यथा मुझसे युद्ध करो।' देवव्रत यह सुनकर प्रसन्न हो गये कि एक मार्ग तो खुल गया, इसलिये उन्होंने कहा, — 'मैं युद्ध करूँगा तो युद्धमें आपके द्वारा मारा जाऊँगा, किन्तु विवाह नहीं करूँगा।' उन दोनोंमें युद्ध हुआ, दोनों ही महावीर थे, इसलिये अन्तमें दोनोंमें-से कोई भी नहीं जीत सका। तब ब्रह्माजीने आकर उनका समाधान करा दिया। देवव्रतने विवाह तो नहीं किया, परन्तु उनके द्वारा गुरुका अपमान तो हुआ। इसमें कोई पारमार्थिक कारण नहीं था। इसलिये ऐसे शिष्योंको, भीष्म जैसे लोगोंको यहाँपर राजसिक कहा गया है। (4) 'सात्त्विक गुरुदास'—ऐसा शिष्य जो गुरुकी आज्ञाका अक्षरशः पालन करे और निज हितके विषयमें विचार न करे, ऐसी गुरुसेवा सात्त्विक होती है। इस सन्दर्भमें आरुणी और उपमन्युकी कथाका वर्णन आता है। आरुणी गुरुपत्नीके आदेश पालन करनेके लिये वर्षाकालमें कड़कड़ाती ठण्डमें मेड़ बाँधनेके लिये चले गये। मूसलाधार वर्षाके कारण जलकी प्रबल धाराके वेगसे मिट्टी बह जाती थी। अन्तमें कोई अन्य उपाय न देखकर वे स्वयं मेड़के ऊपर लेट गये और इससे जलका प्रवाह बहुत कम हो गया। किन्तु भोर होते-होते आरुणी ठण्डसे ठिठुरकर निर्जीव प्रायः हो गये। गुरु लालटेन लेकर उन्हें खोजते हुए पुकारने लगे, — "आरुणी, तुम कहाँ हो?" तो आरुणीने मेढ़पर लेटे हुए अति क्षीण स्वरमें उत्तर दिया, — "गुरुजी मैं यहाँ हूँ, खेतमें जल भर जाता था, इसलिये मैं यहाँपर लेट गया।" गुरुने उन्हें हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद दिया कि समस्त वेद-वेदान्तादि जो कुछ भी हैं, तुम्हें स्फुरित हो जाँय। गुरुके आशीर्वादसे आरुणी तत्क्षणात् मन्त्रदृष्टा ऋषि बन गये। उपमन्यु गुरु आश्रममें रहकर गुरुसेवा करते थे और उनकी आज्ञासे गायोंको चराने ले जाते थे। गुरुदेवने उनसे पूछा, — "तुम बहुत मोटे हो रहे हो, क्या खाते हो?" उपमन्युने कहा, — "बछड़ोंके दूध पी लेनेके बाद जो गायका दूध बच जाता है, मैं उसे पी लेता हूँ।" गुरुदेवने कहा, — "अरे! बछड़ोंके पीनेकी वस्तु तुम पी लेते हो? आगेसे ऐसा मत करना।" कुछ दिनोंके बाद गुरुदेवने पुनः कहा, — "तुम अब भी मोटे हो रहे हो, क्या खाते हो?" उपमन्युने उत्तर दिया, — "गायोंके मुँहसे जो फेन निकलता है, उसको पोंछकर खा लेता हूँ।" गुरुदेवने उसके लिये भी उसे निषेध किया। अगले दिन गुरु-आज्ञाका पालन करते हुए उपमन्युने वह भी नहीं खाया। किन्तु उन्हें जब बहुत भूख लगी, तो उन्होंने एकमन्दका पत्ता खा लिया, उसका कुछ रस आँखमें लग जानेके कारण वे अन्धे हो गये और गायोंको ढूँढ़ते हुए कुएँमें गिर पड़े। शामको गायें तो आश्रममें लौट आयीं, किन्तु उपमन्यु नहीं लौटे। गुरुजी उन्हें खोजने निकले और उनका नाम लेकर जोरसे पुकारने लगे। उपमन्युने कहा कि गुरुजी मैं कुँएमें गिरा हुआ हूँ। गुरुजीने रस्सी डालकर उन्हें जैसे-तैसे कुएँसे 138 ।
अठारहवाँ अध्याय 18/34 ] बाहर निकाला। गुरुजीने पूछा कि तुम कुएँमें कैसे गिर गये? तब उन्होंने सारी घटना कह सुनायी। प्रसन्न होकर गुरुजीने आशीर्वाद दिया कि वेद-उपनिषद् आदि सब तुमको स्मरण हो जाँय। गुरुजीके आशीर्वादसे उनको वेदादि सबका ज्ञान तत्क्षणात् हो गया और उनकी नेत्रज्योति भी पुनः आ गयी। वेद अधिकांश त्रिगुणात्मक होते हैं अर्थात् सांसारिक कामनाओं आदिकी पूर्त्ति करनेवाले होते हैं, इसलिये इन दोनोंको सात्त्विक गुरुदास कहा गया है। (5) निर्गुण गुरुदास-त्रिगुणोंसे अतीत गुरुदास निर्गुण गुरुदास हैं। श्रीमद्भागवतमें इसका वर्णन आता है। एक बार गुरु-आश्रममें सुदामा और श्रीकृष्ण गुरुपत्नीके आदेशपर वनमें लकड़ी बीनने गये। बिना ऋतुके ही बड़ा भयङ्कर आँधी-पानी आ गया और चारों ओर पानी-ही-पानी हो गया। तब तक सूर्यास्त हो गया था और घना अन्धकार फैल गया। इसलिये वे वापस आश्रम नहीं लौट सके। प्रातःकालमें सान्दीपनि मुनि उन्हें खोजते हुये वनमें आये। उन्होंने देखा कि ये दोनों सिरपर गट्ठर रखकर खड़े हैं, तो सान्दीपनि मुनि बोले,–“अरे बोझा तो नीचे उतारकर रख देते।” इन्होंने कहा,–“गुरुजी लकड़ी भीग जाती तो फिर रसोई कैसे बनती?” तब गुरुजी बोले,–“सिरपर रखनेसे भी तो लकड़ी भीग गयी है।” इन्होंने कहा,–“यदि नीचे रख देते तो पानीसे लबालब भीगकर नष्ट हो जाती, इसलिये रात्रि भर सिरपर लकड़ी ले कर खड़े रहे हैं।” प्रसन्न होकर गुरुजीने वर दिया,–“तुम्हें चौंसठ-कलाओंका सम्पूर्ण ज्ञान हो जाय।” यह परमार्थिक सेवा है, इसमें स्वयंके लाभ-हानिका विचार नहीं है। एकमात्र गुरुकी सेवाकी भावनासे किया गया, इसलिये ये निर्गुण गुरुदास हैं। इनसे भी श्रेष्ठ गुरुदास महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द हैं। महाप्रभुकी इच्छाके अनुसार वे श्रीहरिदास ठाकुरको रोज प्रसाद देने जाते, क्योंकि वे दीनताके कारण आते नहीं थे। महाप्रभु जिस-जिसको प्रेम करते थे, उन्हींसे श्रीगोविन्दका सम्बन्ध था। महाप्रभुका जिनसे सम्बन्ध नहीं था, उनसे उनका भी सम्बन्ध नहीं था। शिष्यको भी ऐसा होना चाहिये। गुरुका जो प्रिय है, वह शिष्यको भी प्रिय होना चाहिये। एक दिन महाप्रभु गम्भीराके द्वारपर शयन करने लगे, श्रीगोविन्द उनका पाद-सम्वाहन करनेके लिये आये। श्रीगोविन्दका यह प्रतिदिनका नियम था कि महाप्रभुके पाद-सम्वाहनके बाद ही जाकर महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादका भोजन करते थे। उस दिन महाप्रभु द्वारपर ऐसे लेटे थे कि श्रीगोविन्द भीतर नहीं जा पा रहे थे। उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन किया कि मुझे भीतर जाने दीजिये। महाप्रभु ने कहा,–“मुझमें अपने शरीरको हिलाने-डुलानेकी भी शक्ति नहीं है।” श्रीगोविन्दके अनेक बार अनुरोध करनेपर भी महाप्रभुने पुनः पुनः वही उत्तर दिया। तब श्रीगोविन्दने अपने बहिर्वासको महाप्रभुके ऊपर डाल दिया और उनके पाद-सम्वाहनके लिये उन्हें लाँघकर गम्भीराके भीतर चले गये। श्रीगोविन्दकी कोमल मालिशसे महाप्रभुका सारा परिश्रम दूर हो गया और उनको बहुत अच्छी नींद आ गयी। श्रीगोविन्द तब भी धीरे-धीरे उनके अङ्गोंकी सेवा करते रहे। एक-दो घण्टेके बाद जब महाप्रभुकी निद्रा-भङ्ग हुई, तो उन्होंने श्रीगोविन्दको अभी तक भी वहीं बैठे देखकर क्रोधित होकर कहा–“तुम अब तक भी यहाँ क्यों बैठे हुए हो? तुम प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये?” श्रीगोविन्दने कहा कि आप तो दहलीजपर ही सो गये, जानेके लिये मार्ग ही नहीं है। महाप्रभुने कहा तुम जिस प्रकार भीतर आये, उसी प्रकारसे प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये? श्रीगोविन्दने कोई उत्तर नहीं दिया, परन्तु मन-ही-मन कहा,–‘मेरा तो सेवा करनेका ही नियम है, भले ही उसमें मेरा अपराध हो अथवा फिर नरकमें जाना पड़े। मैं प्रभुकी सेवाके लिये करोड़ों-करोड़ों अपराधोंकी भी परवाह नहीं करता, किन्तु अपने भोगोंके लिये अपराधके आभासमात्रसे भी भय करता हूँ।’ । 139
[ 18/34-35 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभु भक्तोंके गुणोंको प्रकाशित करनेमें बहुत आनन्दित होते थे। उन्होंने अपने सेवक श्रीगोविन्दकी महिमाको प्रकाशित करनेके लिये ही ऐसी लीला की। शिष्यको अपने सुखका विचार, अपना सर्वस्व त्यागकर अपने आराध्य जो गुरु हैं, उनकी सेवाके लिये सब कुछ बलिदान देना पड़ता है। श्रीगोविन्दका ऐसा गुण था जिसकी प्रशंसा करना भी कठिन है। उन्हें श्रीराय रामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरका रात्रिमें महाप्रभुके पास आना अच्छा नहीं लगता था। वे मन-ही-मनमें सोचते थे कि इनके आनेसे पहले महाप्रभु तो कुछ ठीक रहते हैं, परन्तु जब ये दोनों आ जाते हैं, तो ये भी रातभर रोते हैं और महाप्रभुको भी रुलाते हैं। ये न तो स्वयं सोते हैं और न ही महाप्रभुको सोने देते हैं। परन्तु श्रीगोविन्द कुछ कह तो सकते नहीं, केवल चुपचाप बेचारे टुकुर-टुकुर देखते थे कि कब ये दोनों चले जाँय। श्रीगोविन्द सब कुछ सुनते थे और उनका रोदन देख करके इनका हृदय भी रोता रहता था। यह कितनी बड़ी सेवा है, इसे हम जब तक उस धरातलपर नहीं पहुँचेंगे, तब तक इस सेवाको नहीं समझ सकते। श्रीगोविन्द महाप्रभुके दुःखमें दुःखी और उनके सुखमें सुखी होते थे। वे ही उनके सर्वस्व जीवनके आधार हैं। ऐसे लोग ही वास्तविक हरिदास होते हैं।—"श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज"॥ 34 ॥
गोविन्दकुण्डमें स्नान और श्रीगोपालकी अवस्थितिके संवादकी प्राप्ति :— गोविन्दकुण्डादि-तीर्थे प्रभु कैला स्नाने। ताँहा शुनिला, गोपाल-गाँठोलि-ग्रामे॥ 35 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दकुण्ड-तीर्थमें स्नान किया और उन्होंने वहींपर सुना कि श्रीगोपाल गाँठोलि-ग्राममें हैं॥ 35 ॥
अनुभाष्य—'गोविन्दकुण्ड'—पैठा-ग्रामसे श्रीगोवर्धन- पर्वतके ऊपर 'आनियोर'-ग्राम है। यहाँ श्रीगोविन्द और श्रीबलदेवके दो मन्दिर और 'गोविन्दकुण्ड' नामका सरोवर है; किसीके मतानुसार रानी पद्मावतीने इस सरोवरकी प्रतिष्ठा (स्थापना) की थी। भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें— “एइ श्रीगोविन्दकुण्ड-महिमा अनेक। एथा इन्द्र कैल गोविन्देर अभिषेक॥” [अर्थात् "इस गोविन्दकुण्डकी बहुत महिमा है। यहाँ इन्द्रने श्रीगोविन्दका अभिषेक किया था।"] स्तवावलीके व्रजविलासस्तवमें— “नीचैः प्रौढ़भयात् स्वयं सुरपति पादौ विधुत्येह यैः, स्वर्गाङ्गासलिलैश्चकार सुरभिद्वाराभिषेकोत्सवम्। गोविन्दस्य नवं गवामधिगता राज्ये स्फुटं कौतुकात् तैर्यत् प्रादुरभूत् सदा स्फुरतु तद्गोविन्दकुण्डं दृशोः॥” [अर्थात् “श्रीकृष्णके प्रति अपराधके कारण इन्द्र बहुत भयभीत हो गये। स्वयं दीनभावसे गौओंके अधिपत्य राज्यमें अर्थात् व्रजमें आकर श्रीगोविन्दके श्रीचरणयुगलको धारण करके सुरभिके द्वारा जिस स्वर्ग-गङ्गा (मन्दाकिनी) के जलसे कौतुक भरा अभिषेक उत्सव किया था, उस जलसे प्रकाशित वह गोविन्दकुण्ड सदा मेरे नयनगोचर हो।"] मथुरा-खण्डमें— “यत्राभिषिक्तो भगवान् मघोना यदुवैरिणा। गोविन्दकुण्डं तज्जातं स्नानमात्रेण मोक्षदम्॥” [अर्थात् “जिस स्थानपर यदुओंके वैरी इन्द्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक हुआ था, उस अभिषेक- जलसे बने गोविन्दकुण्ड स्नान करनेमात्रसे ही मोक्ष प्रदान करते हैं।"] 'गाँठोली ग्राम'—गोपालपुर अथवा बिलछुरका अति निकटवर्ती ग्राम है। जनश्रुति यह है कि यहाँपर व्रज-नवयुव-युगलका (श्रीराधा-कृष्णका) प्रणयग्रन्थि बन्धन हुआ था। भक्तिरत्नाकरकी (पाँचवीं तरङ्गमें)— “सखी दुँह वस्त्रे गाँठि दिल सङ्गोपने। फागुया लैया केह गाँठि खुलि' दिला।" [ अर्थात् “श्रीराधा-कृष्ण होली खेलकर सिंहासनपर
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अठारहवाँ अध्याय 18/35-43 ] बैठे थे और किसी सखीने गुप्त रूपसे उनके वस्त्रोंको गाँठ लगाकर बाँध दिया। श्रीराधा-कृष्ण जब सिंहासनसे उठे, तब उन्होंने वस्त्रोंका गठबन्धन देखा और उसे देखकर सखियाँ हँसने लगीं। श्रीराधा-कृष्ण, दोनों लज्जित हो गये। तब किसी सखीने 'फाग' लेकर उनके वस्त्रोंकी गाँठको खोल दिया।"]—इसी कारण इस ग्रामका नाम—गाँठोली है॥35॥ गाँठोलि-ग्राममें श्रीगोपालका दर्शन और स्तुति-नृत्य :— सेइ ग्रामे गिया कैल गोपाल-दरशन। प्रेमावेशे प्रभु करे कीर्त्तन-नर्त्तन॥36॥ गोपालेर सौन्दर्य देखि' प्रभुर आवेश। एइ श्लोक पड़ि' नाचे, हैल दिन-शेष॥37॥ अनुवाद—गाँठोली-ग्राममें जाकर महाप्रभुने श्रीगोपालके दर्शन किये। प्रेमके आवेशमें आकर वे कीर्त्तन और नृत्य करने लगे। श्रीगोपालके सौन्दर्यको देखते ही महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और उन्होंने एक श्लोक पढ़ा। फिर वे दिन समाप्त होने तक नृत्य-कीर्त्तन करते रहे॥36-37॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/62) :— वामस्तामरसाक्षस्य भुजदण्डः स पातु वः। क्रीड़ाकन्दुकतां येन नीतो गोवर्धनो गिरिः॥38॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥38॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलनयन श्रीकृष्णने जिस बाँयी भुजाके द्वारा गिरिराज गोवर्धनको उठाकर क्रीड़ा-कन्दुककी (खेलनेवाली गेंदकी) भाँति उसका व्यवहार किया था, वही बाँयी भुजा ही तुम्हारा पालन करे॥38॥ अनुभाष्य— येन (वामबाहुना) गोवर्धनः गिरिः क्रीड़ाकन्दुकतां (क्रीड़ा-सामग्रीत्वं) नीतः (प्राप्तः) तामरसाक्षस्य (पद्मलोचनस्य कृष्णस्य) सः [प्रसिद्धः] वामः भुजदण्डः वः (युष्माकं) पातु (रक्षतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥38॥ तीन दिन श्रीगोपालके दर्शन :— एइमत तिनदिन गोपाले देखिला। चतुर्थ-दिवसे गोपाल स्वमन्दिरे गेला॥39॥ चौथे दिन गिरिराजके ऊपर स्थित मन्दिरमें श्रीगोपालका नृत्य-गीतके साथ जाना :— गोपाल-सङ्गे चलि' आइला नृत्य-गीत करि। आनन्द-कोलाहले लोक बोले 'हरि' 'हरि'॥40॥ महाप्रभुकी श्रीगोपालके दर्शनकी अभिलाषा पूर्ण :— गोपाल मन्दिरे गेला, प्रभु रहिला तले। प्रभुर वाञ्छा पूर्ण सब करिल गोपाले॥41॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने तीन दिन तक श्रीगोपालके दर्शन किये। चौथे दिन श्रीगोपाल अपने मन्दिरमें जानेके लिये चले। महाप्रभु श्रीगोपालके साथ नृत्य तथा गान करते हुए चलने लगे। लोगोंकी भीड़ भी आनन्दसे 'हरि' 'हरि' बोलते हुए कोलाहल कर रही थी। तब श्रीगोपाल गोवर्धनके ऊपर अपने मन्दिरमें चले गये और महाप्रभु गोवर्धनकी तलहटीमें ही रह गये। श्रीगोपालने महाप्रभुकी समस्त वाञ्छाओंको पूर्ण कर दिया॥39-41॥ महाकृपालु श्रीगोपालके दर्शनमें भक्तका भाव :— एइमत गोपालेर करुण स्वभाव। सेइ भक्त जनेर देखिते हय 'भाव'॥42॥ अनुवाद—श्रीगोपालका ऐसा ही करुणामय स्वभाव है जिसे देखकर भक्तोंके हृदयमें उनके प्रति प्रेमावेश जाग्रत हो जाता है॥42॥ दयामय श्रीगोपालका किसी छलसे भक्तको दर्शन देना :— देखिते उत्कण्ठा हय, ना चढ़े गोवर्धने। कोन छले गोपाल आसिं' उतरे आपने॥43॥ अनुवाद—किसी भक्तके हृदयमें श्रीगोपालके दर्शन करनेकी उत्कण्ठा होनेपर भी यदि वह गोवर्धनपर नहीं चढ़ता, तो श्रीगोपाल स्वयं किसी छलसे गोवर्धनसे उतरकर नीचे आ जाते हैं॥43॥ । 141
[ 18/44-47 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जब जिस स्थानपर रहते हैं, वहीं आकर भक्तके द्वारा उनका दर्शन करना :— कभु कुञ्जे रहे, कभु रहे ग्रामान्तरे। येइ भक्त, ताँहा आसि' देखये ताँहारे ॥ 44 ॥ अनुवाद—कभी तो श्रीगोपाल कुञ्जमें रहते हैं और कभी ग्राम-ग्राममें स्थान बदलते रहते हैं। जो भक्त होता है, वह वहाँपर आकर उनके दर्शन करता है ॥ 44 ॥ श्रीरूप-सनातनको इसी प्रकार किसी छलसे दर्शन-दान :— पर्वते ना चड़े दुइ—रूप-सनातन। एइरूपे ताँ-सबारे दियाछेन दरशन ॥ 45 ॥ अनुवाद—श्रीरूप और श्रीसनातन भी गोवर्धन पर्वतपर नहीं चढ़ते थे। श्रीगोपालने उन दोनोंको भी इसी प्रकारसे दर्शन दिये ॥ 45 ॥ श्रीगोपालके दर्शनकी अभिलाषाके कारण श्रीरूपके गोपाल-दर्शनके वृत्तान्तका वर्णन :— वृद्धकाले रूप-गोसाञि ना पारे याइते। वाञ्छा हैल गोपालेर सौन्दर्य देखिते ॥ 46 ॥ अनुवाद—वृद्धावस्थामें श्रीरूप गोस्वामी उनके दर्शनके लिये जा नहीं पा रहे थे, किन्तु उनके हृदयमें श्रीगोपालके सुन्दर रूपके दर्शन करनेकी अभिलाषा थी॥ 46 ॥ मथुरामें वल्लभपुत्र विट्ठलेश्वरके घरपर एक मास तक वास :— म्लेच्छभये आइला गोपाल मथुरा-नगरे। एकमास रहिल विट्ठलेश्वर-घरे ॥ 47 ॥ अनुवाद—म्लेच्छोंके भयसे श्रीगोपाल मथुरा-नगरीमें आ गये और वहाँ एक मास तक वे श्रीविट्ठलेश्वरके घरमें रहे ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बादमें श्रीरूप-सनातनने आकर जब व्रजवास किया, तब वे भी श्रीगोवर्धन-पर्वतको साक्षात् भगवान्की मूर्ति जानकर उनपर नहीं चढ़ते थे। श्रीगोपालने जिस प्रकार महाप्रभुको दर्शन दिया, उन्हें भी उसी प्रकारसे दर्शन दिया था। वृद्धावस्थामें श्रीरूपगोस्वामी गोवर्धन जानेमें असमर्थ थे, परन्तु साथ ही श्रीगोपालका सौन्दर्य देखनेकी उनकी इच्छा हुई थी। तब श्रीगोपालने श्रीरूपगोस्वामीपर कृपा करनेके उद्देश्यसे इस प्रकार म्लेच्छोंसे भयरूपी 'छल' करके मथुरानगरीमें श्रीविट्ठलेश्वरके घरमें एक मास तक वास किया था ॥ 45-47 ॥ अनुभाष्य—'विट्ठलेश्वर'—भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं- तरङ्गमें— “विठ्ठलेर सेवा कृष्णचैतन्यविग्रह। ताहार दर्शने हैल परम आग्रह ॥ श्रीविठ्ठलनाथ—भट्टवल्लभ-तनय। करिला यतेक प्रीति कहिले ना हय ॥ गाँठोलि-ग्रामे गोपाल आइला 'छल' करि'। ताँरे देखि' नृत्यगीते मग्न गौरहरि ॥ श्रीदासगोस्वामी आदि परामर्श करि'। श्रीविठ्ठलेश्वरे कैला सेवा-अधिकारी ॥ पिता श्रीवल्लभभट्ट ताँर अदर्शने। कतदिन मथुराय छिलेन निर्जने॥” [ अर्थात् “श्रीविट्ठलनाथ श्रीवल्लभ-भट्टके पुत्र थे। वे श्रीकृष्ण-चैतन्यके विग्रहकी सेवा करते थे और उनके दर्शनमें उनका परम आग्रह था। गाँठोलि-ग्राममें श्रीगोपाल यवनोंके भयका छल करके आये और महाप्रभुको वहाँ दर्शन दिये। उनके दर्शन करके महाप्रभु प्रेममें मग्न होकर नृत्य और गान करने लगे। उस समय श्रीगोपालकी सेवा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके दो गौड़ीय वैष्णव शिष्य करते थे। उन्होंने सभी वैष्णवोंसे कहा कि हमारे अप्रकट होनेपर श्रीगोपालकी सेवा कौन करेगा? तब श्रीरघुनाथदास गोस्वामी आदिने परामर्श करके श्रीविट्ठलनाथको श्रीगोपालका सेवाधिकारी नियुक्त किया। अपने पिता श्रीवल्लभ-भट्टके अप्रकट होनेके बाद कुछ समय तक वे मथुरामें निर्जन स्थानमें रहे।”] श्रीवल्लभभट्टके दो पुत्र थे। ज्येष्ठ 'गोपीनाथ'का जन्म 1432 शकाब्दमें हुआ था। कनिष्ठ 'विट्ठलनाथ'का 142 |
अठारहवाँ अध्याय 18/47-53 ] जन्म 1437 शकाब्दमें हुआ और उन्होंने 1507 शकाब्दमें परलोक गमन किया। विट्ठलके सात पुत्र- गिरिधर, गोविन्द, बालकृष्ण, गोकुलेश, रघुनाथ, यदुनाथ और घनश्याम थे। विट्ठलने पिताके असम्पूर्ण ग्रन्थोंको पूर्ण किया जिनमें ब्रह्मसूत्र-भाष्य, 'सुबोधिनी'-टिप्पणी, 'विद्वन्मण्डन', 'शृङ्गाररसमण्डन', 'न्यासादेश-विवरण' आदि ग्रन्थ थे। “पूर्ण-सप्ततिवर्षाणि दिनान्यष्टौ च विंशतिः। वसुधायां व्यराजन्तु श्रीमद्विठ्ठल दीक्षिताः॥” श्रीमहाप्रभु श्रीवल्लभपुत्र श्रीविठ्ठलके जन्मसे एक वर्ष पहले या उससे भी एक वर्ष पहले श्रीवृन्दावनमें आये थे। श्रीरूप गोस्वामीजी वृद्धावस्थामें श्रीगोपाल श्रीवल्लभके पुत्र श्रीविट्ठलनाथके मथुरा स्थित घरमें एकमास तक रहे थे॥47॥ मथुरामें विट्ठलेश्वरके घरमें एकमास सपरिकर श्रीरूपके द्वारा श्रीगोपाल-दर्शन :- तबे रूप-गोसाञि सब निजगण लञा। एकमास दरशन कैला मथुराय रहिया॥48॥ सङ्गे गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ। रघुनाथ-भट्टगोसाञि, आर लोकनाथ॥49॥ भूगर्भ-गोसाञि, आर श्रीजीव-गोसाञि। श्रीयादव-आचार्य, आर गोविन्द-गोसाञि॥50॥ श्रीउद्धवदास, आर माधव, दुइजन। श्रीगोपाल-दास, आर दास-नारायण॥51॥ 'गोविन्द' भक्त, आर वाणी-कृष्णदास। पुण्डरीकाक्ष, ईशान, आर लघु-हरिदास॥52॥ एइ सब मुख्यभक्त लञा निज-सङ्गे। श्रीगोपाल दरशन कैला बहु-रङ्गे॥53॥ अनुवाद-तब श्रीरूप गोस्वामी अपने निजजनोंके साथ मथुरा आये और वहाँ एक मास तक रहकर श्रीगोपालके दर्शन किये। श्रीरूप गोस्वामीके साथ श्रीगोपाल-भट्ट, श्रीरघुनाथ-दास, श्रीरघुनाथ-भट्ट गोस्वामी, श्रीलोकनाथ, श्रीभूगर्भ गोस्वामी, श्रीजीव-गोस्वामी, श्रीयादव-आचार्य, श्रीगोविन्द-गोस्वामी, श्रीउद्धवदास, श्रीमाधव, श्रीगोपाल-दास, श्रीदास-नारायण, 'श्रीगोविन्द' भक्त, श्रीवाणी-कृष्णदास, श्रीपुण्डरीकाक्ष, श्रीईशान, छोटे-हरिदास आदि भक्त थे। इन सब मुख्य भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीरूप गोस्वामीने बड़े आनन्दपूर्वक श्रीगोपालके दर्शन किये॥48-53॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लघु-हरिदास'—अनेक वैष्णवोंका नाम 'हरिदास' होता है। इसलिये 'लघु', 'मध्यम' आदि 'विशेषण' हरिदास नामक वैष्णवोंके नामके साथ दूसरे वैष्णव प्रयोग करते हैं। महाप्रभुके समय जो लघु-हरिदास (छोटे-हरिदास) थे, उन्होंने प्रयागमें देहत्याग किया था; ये 'लघु हरिदास'—अन्य एक व्यक्ति हैं॥52॥ अनुभाष्य—'लोकनाथ'—श्रीमहाप्रभुके अत्यन्त विरक्त (वैरागी) महाभागवत पार्षद-गोस्वामी हैं। यशोहरके अन्तर्गत 'तालखड़ि'-ग्राममें इनका पहले निवास था; उससे पहले काचनापाड़ामें निवास था। इनके पिताका नाम-पद्मनाभ था; इनके एकमात्र छोटे भाई 'प्रगल्भ' थे। महाप्रभुकी आज्ञासे इन्होंने व्रजवास करके भजन किया और एकमात्र श्रीनरोत्तम-ठाकुर महाशयको दीक्षा प्रदान की। ऐसा लगता है, अत्यधिक दीनतावशतः इन्होंने अपने चरित्रका वर्णन करनेके लिये निषेध किया होगा, इसलिये इनका चरित्र श्रीचैतन्यचरितामृतमें विशेष रूपसे उल्लिखित नहीं हुआ है। इ, वि, आर लाइनमें 'यशोहर' स्टेशन है, वहाँसे मोटर गाड़ीके द्वारा सोनाखालि, वहाँसे खेजूरा, वहाँसे पैदल तथा वर्षाके समयमें नावके द्वारा 'तालखड़ि' जाना पड़ता है। इनके भाईके वंशज “तालखड़िके भट्टाचार्य” नामसे सामाजिक पद-मर्यादामें विशेष सम्मानित हैं। भ्रातृवंशके विवरणके लिये वैष्णव मञ्जूषा-समाहृति चतुर्थ संख्या देखें। भक्तिरत्नाकरकी छठी तरङ्गमें— “गोस्वामी गोपालभट्ट अति दयामय। । 143
[ 18/49-57 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भूगर्भ, श्रीलोकनाथ-गुणेर आलय॥ श्रीमाधव, श्रीपरमानन्द-भट्टाचार्य। श्रीमधुन-पण्डित-याँर चरित्र आश्चर्य॥ प्रेमी कृष्णदास, कृष्णदास ब्रह्मचारी। यादव आचार्य, नारायण कृपावान्। श्रीपुण्डरीकाक्ष-गोसाञि, गोविन्द, ईशान॥ श्रीगोविन्द, वाणीकृष्णदास अत्युदार। श्रीउद्धव-मध्ये मध्ये गौड़े गति याँर॥ द्विज-हरिदास, कृष्णदास कविराज। श्रीगोपालदास याँर अलौकिक काय। श्रीगोपाल, माधवादि यतेक वैष्णव।” [श्रीनिवासाचार्यके द्वारा ग्रन्थरूपी रत्नोंको लेकर वृन्दावनसे गौड़देश जानेके समय विदायी देनेके लिये एकत्रित वैष्णवगण-परम दयामय श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, गुणोंके भण्डार श्रीभूगर्भ और श्रीलोकनाथ गोस्वामी, श्रीमाधव, श्रीपरमानन्द-भट्टाचार्य, श्रीमधुन-पण्डित जिनका चरित्र आश्चर्यजनक है, प्रेमी कृष्णदास, श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारी, श्रीयादव आचार्य, कृपामय श्रीनारायण, श्रीपुण्डरीकाक्ष-गोसाईं, श्रीगोविन्द, श्रीईशान, श्रीगोविन्द, परम उदार श्रीवाणीकृष्णदास, श्रीउद्धव जो बीच-बीचमें गौड़देश जाया करते थे, श्रीद्विज-हरिदास, श्रीकृष्णदास कविराज, श्रीगोपालदास जिनके कार्य अलौकिक होते थे, श्रीगोपाल, श्रीमाधवादि जितने भी वैष्णव व्रजमें थे।"]॥ 49-52॥ एक मासके बाद श्रीगोपाल और श्रीरूपका अपने-अपने स्थानपर लौटना :- एकमास रहि' गोपाल गेला निज-स्थाने। श्रीरूप-गोसाञि आइला श्रीवृन्दावने॥ 54॥ अनुवाद-एक मास तक मथुरामें रहकर श्रीगोपाल अपने स्थानपर लौट गये और श्रीरूप-गोस्वामी श्रीवृन्दावन धाममें आ गये॥ 54॥ महाप्रभुका काम्यवनमें आगमन :- प्रस्तावे कहिलुँ गोपाल-कृपार आख्यान। तबे महाप्रभु गेला 'श्रीकाम्यवन'॥ 55॥ अनुवाद-प्रसङ्ग आनेपर ही मैंने श्रीगोपालकी कृपाका वर्णन किया है। महाप्रभु श्रीगोपालका दर्शन करके 'श्रीकाम्यवन'में गये॥ 55॥ अनुभाष्य- 'काम्यवन'-आदि-वाराहमें- “चतुर्थं काम्यकवनं वनानां वनमुत्तमम्। तत्र गत्वा नरो देवि मम लोके महीयते॥” [अर्थात् “ब्रजमण्डलके बारह वनोंमें चौथा वन काम्यवन है। यह व्रजमण्डलके सर्वोत्तम वनोंमें-से एक है। इस वनकी परिक्रमा करनेवाला सौभाग्यवान् व्यक्ति मेरे व्रजधाममें पूजनीय होता है।”] भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें- “एइ काम्यवने कृष्णलीला मनोहर। करिबे दर्शन स्थान कुण्ड बहुतर॥ काम्यवने यत तीर्थ लेखा नाहि तार॥” [अर्थात् “इस काम्यवनमें श्रीकृष्णकी अनेक मनोहर लीलाएँ होती हैं। इस वनमें बहुत दर्शनीय कुण्ड हैं। काम्यवनमें जितने तीर्थ हैं, उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है।"]॥ 55॥ वृन्दावनमें सभी लीला-स्थलियोँका दर्शन :- प्रभुर गमन-रीति पूर्वे ये लिखिल। सेइमत वृन्दावने तावत् देखिल॥ 56॥ अनुवाद-मैंने महाप्रभुके वृन्दावनमें भ्रमण करनेका वृत्तान्त लिखा है। उसी प्रकार ही महाप्रभुने प्रेमाविष्ट होकर सम्पूर्ण वृन्दावनका दर्शन किया॥ 56॥ वृन्दावनसे नन्दीश्वरमें श्रीनन्दके घरका दर्शन और प्रेम-विह्वलता :- ताँहा लीलास्थली देखि' गेला 'नन्दीश्वर'। 'नन्दीश्वर' देखि' प्रेमे हइला विह्वल॥ 57॥ अनुवाद-काम्यवनमें श्रीकृष्णकी लीलास्थलियोंके दर्शन करके महाप्रभु 'नन्दीश्वर'में (नन्दभवनमें) गये। नन्दभवनमें पहुँचकर महाप्रभु प्रेममें विह्वल हो गये॥ 57॥ 144 ।
अठारहवाँ अध्याय 18/57-63 ] अनुभाष्य— 'नन्दीश्वर'—नन्दालय (नन्दभवन); भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें— “देख नन्दीश्वर चतुर्दिके कुण्डवन। कृष्णविलासेर स्थान भुवनपावन॥” [अर्थात् “इस स्थान नन्दीश्वरको देखो, यहाँ चारों ओर कुण्ड और वन हैं। ये श्रीकृष्णके विलासके स्थान हैं और इनके दर्शनसे ही समस्त लोक पवित्र हो जाते हैं।”]॥ 57॥ पावन-सरोवरमें स्नान, विग्रहके सम्बन्धमें जिज्ञासा :— 'पावनादि' सब कुण्डे स्नान करिया। लोकेरे पुछिल, पर्वत-उपरे याञा॥ 58 ॥ लोगोंसे गुफाके अन्दर विराजमान श्रीनन्द-यशोदा और श्रीकृष्णकी मूर्तिके अवस्थानके विषयमें श्रवण करना :— “किछु देवमूर्त्ति हय पर्वत-उपरे?” लोक कहे,—“मूर्त्ति हय गोफार भितरे ॥ 59 ॥ दुइदिके माता-पिता पुष्ट-कलेवर। मध्ये एक शिशु' हय त्रिभङ्गसुन्दर ॥”60 ॥ शुनि' महाप्रभु मने आनन्द पाञा। 'तिन' मूर्ति देखिला सेइ गोफा उघाड़िया ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पावन-सरोवरादि सभी कुण्डोंमें स्नान करके पर्वतके ऊपर जाकर लोगोंसे पूछा, —“क्या पर्वतके ऊपर भगवान्का कोई श्रीविग्रह है?” लोगोंने कहा,—“गुफाके अन्दर विग्रह हैं। दोनों तरफ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले माता और पिता हैं तथा बीचमें त्रिभङ्गसुन्दर एक बालक है।” इस बातको सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने गुफामें प्रवेश करके तीनों मूर्तियोंके दर्शन किये॥ 58-61 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनन्द-यशोदाकी वन्दना और श्रीकृष्ण-स्पर्शन :— व्रजेन्द्र-व्रजेश्वरीर कैल चरण वन्दन। प्रेमावेशे कृष्णेर कैल सर्वाङ्ग-स्पर्शन॥ 62 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने व्रजेन्द्र श्रीनन्द तथा व्रजेश्वरी श्रीयशोदाजीके चरणोंकी वन्दना की, उन्होंने प्रेमावेशमें श्रीकृष्णके सभी अङ्गोंका स्पर्श किया॥ 62 ॥ अनुभाष्य— 'पावन-सरोवर'—मथुरा-माहात्म्यमें— “पावने सरसि स्नात्वा कृष्णं नन्दीश्वरे गिरौ। दृष्ट्वा नन्दं यशोदाञ्च सर्वाभीष्टमवाप्नुयात् ॥” [अर्थात् “पावन-सरोवरमें स्नान करके नन्दीश्वर पर्वतपर (विराजमान) श्रीकृष्ण, श्रीनन्दमहाराज और श्रीयशोमती माताके दर्शन करनेसे सर्वाभीष्ट प्राप्त होता है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “ए पावन सरोवर कृष्णप्रिय अति ॥” “पर्वत-उपरे देख पुत्रेर सहिते। श्रीनन्दयशोदा शोभे अपूर्व-गोफाते ॥ ओहे श्रीनिवास, एथा श्रीचैतन्यराय। करिते दर्शन गिया प्रवेशे गोफाय ॥ श्रीनन्द-यशोदा-दुइदिके दुइजन। मध्ये कृष्णचन्द्रे देखि' प्रफुल्ल नयन ॥ श्रीनन्द-यशोदार चरण वन्दिया। कृष्णेर सर्वाङ्ग स्पर्श उल्लसित हञा॥ प्रेमेर आवेशे नृत्य-गीत आरम्भिल ॥” [अर्थात् “यह पावन सरोवर श्रीकृष्णको अति प्रिय है। पर्वतके ऊपर देखो—गुफामें पुत्रके सहित श्रीनन्द-यशोदाकी अपूर्व-शोभा है। ओहे श्रीनिवास, यहाँ श्रीचैतन्यरायने इनके दर्शन करनेके लिये गुफामें प्रवेश किया था। श्रीनन्द और श्रीयशोदाके मध्यमें श्रीकृष्णचन्द्रको देखकर उनके नयन प्रफुल्लित हो गये। उन्होंने श्रीनन्द और श्रीयशोदाके चरणोंकी वन्दना की। उल्लसित होकर उन्होंने श्रीकृष्णके सभी अङ्गोंको स्पर्श किया। प्रेमके आवेशमें उन्होंने वहाँ नृत्य-गीत करना आरम्भ कर दिया।”]॥ 58-62 ॥ सारा दिन नृत्य-गीतके बाद खदिरवनमें आगमन :— सब दिन प्रेमावेशे नृत्य-गीत कैला। ताँहा हैते महाप्रभु 'खदिर-वन' आइला ॥ 63 ॥ । 145
[ 18/63-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—प्रतिदिन महाप्रभु वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य तथा गान करते। बादमें वहाँसे महाप्रभु ‘खदिर-वन’में आ गये॥ 63॥ अनुभाष्य—‘खदिरवन’— ‘सप्तमन्तु वनं भूमौ खदिरं लोकविश्रुतम्॥’ [अर्थात् “द्वादश वनोंमें सातवाँ वन ‘खदिर-वन’ समस्त जगत्में विख्यात है।”] भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— “देखह खदिर वन विदित जगते। विष्णु-लोकप्राप्ति एथा गमन-मात्रेते॥” [अर्थात् “इस जगत्-विख्यात खदिर-वनको देखो। यहाँ जानेमात्रसे जीवको विष्णुलोककी प्राप्ति हो जाती है।”] ॥ 63॥ शेषशायी श्रीकृष्ण और लक्ष्मी-दर्शन :— लीलास्थल देखि’ ताँहा गेला ‘शेषशायी’। ‘लक्ष्मी’ देखि’ एइ श्लोक पड़ेन गोसाञि ॥ 64 ॥ अनुवाद—खदीरवनकी लीलास्थलियॉंको देखकर महाप्रभु वहाँसे ‘शेषशायी’ गये और वहाँपर लक्ष्मीको देखकर उन्होंने निम्नलिखित एक श्लोक पढ़ा— ॥ 64 ॥ अनुभाष्य—‘शेषशायी’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— ‘एइ ‘शेषशायी’ क्षीरसमुद्र एथाते। कौतुके शुइला कृष्ण अनन्तशय्याते॥ एइ शेषशायि-मूर्त्ति दर्शन करिते। श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र आइला एथाते॥ करिया दर्शन, महाकौतुक बाड़िल। से-प्रेमावेशे प्रभु अधैर्य हइल॥” [अर्थात् “ये ‘शेषशायी’ हैं और यहाँ क्षीरसमुद्र है। लीला करते हुए कौतुकवश श्रीकृष्ण अनन्त-शय्यापर लेट गये थे। इन शेषशायी विग्रहके दर्शन करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र यहाँ आये थे। दर्शन करके उनमें महाकौतुक बढ़ने लगा और प्रेमावेशमें महाप्रभु अधीर हो गये।”] ॥ 64 ॥ श्रीमद्भागवतमें (10/31/19) :— यत्ते सुजातचरणावरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायूषां नः ॥ 65 ॥ अनुवाद—गोपियों कहती हैं—हे प्रिय, हम तुम्हारे जिन सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करती हैं, अपने उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पथरादिके चुभनेसे अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन-स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ 65॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें॥ 65 ॥ खेलातीर्थ, भाण्डीरवन और भद्रवनमें आगमन :— तबे ‘खेला-तीर्थ’ देखि’ ‘भाण्डीरवन’ आइला। यमुना पार हञा ‘भद्रवन’ गेला ॥ 66 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु ‘खेला-तीर्थ’ (खेलनवन)के दर्शन करके भाण्डीरवन आ गये। फिर यमुना पार करके वे भद्रवनमें गये॥ 66॥ अनुभाष्य—‘खेलातीर्थ’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— “देखह खेलनवन, एथा दुइ भाइ। सखासह खेले भक्षणेर चेष्टा नाइ॥ मायेर यत्नेते भुञे कृष्ण-बलराम। ए खेलनवटेर श्रीखेलातीर्थ नाम॥” [अर्थात् “इस खेलनवनको देखो, यहाँ दोनों भाई (श्रीकृष्ण और श्रीबलराम) सखाओंके साथ खेलते थे। खेलनेमें वे इतने आविष्ट हो जाते थे कि खाना आदि सब भूल जाते थे। माता यशोदाको उन्हें बड़े यत्नसे बुलाकर घर लाना पड़ता कि वे स्नान और भोजन कर लें। इस खेलनवटका नाम श्रीखेलातीर्थ है।”] ‘भाण्डीर-वन’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— 146
अठारहवाँ अध्याय 18/66-67 ]
“चलये भाण्डीर-पथे उल्लास अन्तरे। एबे लोक कहय ‘अक्षयवट’ तारे॥ बलराम कौतुके प्रलम्बवध कैला। सखासह भाण्डीरे कृष्णेर नाना लीला॥” [अर्थात् “उल्लाससे भरे हृदयसे महाप्रभु भाण्डीर-वनके मार्गपर चले। अब लोग उसे ‘अक्षयवट’ के नामसे बुलाते हैं। यहाँ खेल-ही-खेलमें श्रीबलरामने प्रलम्बासुरका वध किया था। सखाओंके साथ भाण्डीर-वनमें श्रीकृष्णकी अनेक लीलाएँ हुई थीं।”] स्तवावलीके व्रजविलास-स्तवमें— “मल्लीकृत्य निजाः सखीः प्रियतमागर्वेण सम्भाविता मल्लीभूय मदीश्वरी रसमयी मल्लत्वमुत्कण्ठया। यस्मिन् सम्यगुपेयुषा वकभिदा राधानियोद्धुं मुदा कुर्वाणा मदनस्य तोषमतनोद्भाण्डीरकं तं भजे॥” [अर्थात् “जहाँ मेरी अधीश्वरी श्रीकृष्ण प्रियतमा श्रीराधिका मल्लयुद्धके कौतुकवश स्वयं मल्लवेशमें सुसज्जित होकर अपनी सखियोंको भी मल्लवेशमें सजाकर गर्वित हुई थी और मल्लवेशधारी बकारि श्रीकृष्णके साथ आनन्दपूर्वक मल्लयुद्ध करके मदनका आनन्दवर्धन किया था, मैं उस भाण्डीर-वनका भजन करता हूँ।”] 'भद्रवन'— “अस्ति भद्रवनं नाम षष्ठञ्च वनमुत्तमम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें उत्तम यह छठा वन भद्रवन है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “कृष्णप्रिय हय भद्रवन-गमनेते॥” [अर्थात् “जो भद्रवनमें गमन करता है, वह श्रीकृष्णका प्रिय हो जाता है।”] ॥ 66 ॥ श्रीवन, लोहवन और श्रीकृष्णजन्मभूमि गोकुल दर्शन :— ‘श्रीवन’ देखि’ पुनः गेला ‘लोह-वन’। ‘महावन’ गिया कैला जन्मस्थान-दरशन॥ 67 ॥ अनुवाद—श्रीवन (बिल्ववन)के दर्शन करके महाप्रभु पुनः लोह-वनमें गये और फिर महावनमें जाकर उन्होंने श्रीकृष्णके जन्मस्थानका दर्शन किया॥ 67 ॥ अनुभाष्य—‘श्रीवन’— “वनं बिल्ववनं नाम दशमं देवपूजितम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें दसवें वनका नाम बिल्ववन (बेलवन) है और देवता भी इस वनकी पूजा करते हैं।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देवता-पूजित बिल्ववन शोभामय।” [अर्थात् “अति शोभायुक्त बिल्ववनकी सभी देवता पूजा करते हैं।”] 'लोहवन'— “लौहजङ्ग-वनं नाम लोहजङ्गेन रक्षितम्। नवमन्तु वनं देवि सर्वपातकनाशनम्॥” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें नौवाँ वन लौहजङ्ग-वन है। लौहजङ्गा नामक एक असुर इसकी रक्षा करता था। हे देवि! यह वन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “लोहवने कृष्णेर अद्भुत गो-चारण। एथा लोहजङ्गासुरे वधे भगवान्॥” [अर्थात् “लौहवनमें श्रीकृष्ण गोचारण कराते थे। यहीं श्रीकृष्णने लौहजङ्घा नामक असुरका वध किया था।”] 'महावन'— “महावनं चाष्टमन्तु सदैव तु मम प्रियम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें आठवाँ वन महावन मेरा सदा अति प्रिय है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देख, नन्द-यशोदा-आलय महावने। ×× एइ देख श्रीकृष्णचन्द्रेर जन्मस्थल। ×× श्रीगोकुल, महावन—दुइ ‘एक’ हय॥” [अर्थात् “महावनमें श्रीनन्द और यशोदाके भवनका दर्शन करो। यहाँ श्रीकृष्णके जन्मस्थानको देखो। | 147
[ 18/67-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महावन और श्रीकृष्णका जन्मस्थान गोकुल, दोनों ही वहाँसे अक्रूर-तीर्थ आ गये। वहाँ आकर वे एकान्त एक और अभिन्न हैं।"] ॥ 67 ॥ स्थानमें रहने लगे ॥ 70 ॥ यमलार्जुन-भञ्जनस्थलके दर्शनसे प्रेमावेश :- अनुभाष्य- 'अक्रूरतीर्थ'- यमलार्जुनभङ्गादि देखिल सेइ 'स्थल'। “अक्रूरतीर्थमत्यर्थमस्ति प्रियवरं हरेः। प्रेमावेशे प्रभुर मन हैल टलमल ॥ 68 ॥ तीर्थराजः हि चाक्रूरं गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्॥ ” अनुवाद-यमलार्जुन-भञ्जनादि लीलास्थलीको देखकर [अर्थात् “अक्रूरतीर्थ श्रीहरिका अति प्रियतम है। वहाँ प्रेमावेशमें महाप्रभुका मन अस्थिर हो गया ॥ 68 ॥ यह तीर्थोंका राजा है और गुह्यसे भी अति गुह्यतम धाम अनुभाष्य- 'यमलार्जुन'- है।"] “यमलार्जुनतीर्थञ्च कुण्डं तत्र च वर्त्तते।” (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- [अर्थात् “उस स्थानपर यमलार्जुन-तीर्थ और “देख, श्रीनिवास, एइ अक्रूर ग्रामेते। यमलार्जुन-कुण्ड हैं।"] श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु छिलेन निभृते॥ ” (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- [अर्थात् “हे श्रीनिवास, देखो इस अक्रूर ग्राममें “एइ यमलार्जुन-भञ्जन तीर्थस्थल। श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु एकान्त स्थानमें रहे थे।"] ॥ 70 ॥ एथा उदूखले कृष्णे यशोदा बाँधिला। वृन्दावनके दर्शनके लिये आगमन एवं कालीय-ह्रद और बन्धन-स्वीकार कृष्ण कौतुके करिला॥ ” प्रस्कन्दन-क्षेत्रमें स्नान :- [अर्थात् “यह यमलार्जुन-भञ्जन तीर्थस्थल है। यहाँ आर दिन आइला प्रभु देखिते वृन्दावन। यशोदा माताने श्रीकृष्णको ऊखलसे बाँधा था। श्रीकृष्णने 'कालीय-ह्रदे' स्नान कैला आर प्रस्कन्दन ॥ 71 ॥ माताके प्रेमके कारण बन्धन स्वीकार किया था] ॥ 68 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु वृन्दावनके दर्शनके उसके बाद मथुरामें योगपीठका दर्शन और लिये आये। उन्होंने कालीय-ह्रद और प्रस्कन्दन तीर्थमें माधवेन्द्रपुरीके शिष्यके घरमें अवस्थान :- स्नान किया ॥ 71 ॥ 'गोकुल' देखिया आइला 'मथुरा'-नगरे। अनुभाष्य- 'वृन्दावन'- 'जन्मस्थान' देखि' रहे सेइ विप्र-घरे ॥ 69 ॥ “अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः।” अनुवाद-महाप्रभु गोकुलका दर्शन करके 'मथुरा'- “वृन्दावनं द्वादशमं वृन्दया परिरक्षितम्॥ ” नगरीमें आये और उन्होंने वहाँ श्रीकृष्ण जन्मस्थानके [अर्थात् “अहो ! वृन्दावन अति रमणीय स्थान है, दर्शन किये। मथुरामें वे उन सनोड़िया ब्राह्मणके घरमें जहाँ गिरिराज गोवर्धन हैं। बारह वनोंमें यह बारहवाँ वन रहे ॥ 69 ॥ है और वृन्दादेवीके द्वारा यह सभी प्रकारसे सुरक्षित लोगोंकी भीड़के कारण वहाँसे है।"] जाकर अक्रूरतीर्थमें रहना :- (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- लोकेर संघट्ट देखि' मथुरा छाड़िया। “कृष्णेर परमप्रिय धाम-वृन्दावन। एकान्ते 'अक्रूर-तीर्थे' रहिला आसिया ॥ 70 ॥ कृष्णदेहरूप 'पञ्चयोजन' एइ वन। अनुवाद-मथुरामें लोगोंकी भीड़को देखकर महाप्रभु ×× वृन्दावन-षोलक्रोश, लोके इहा प्रचार ॥ ” [अर्थात् “यह वृन्दावन-धाम श्रीकृष्णका परम प्रिय 148 ।
अठारहवाँ अध्याय 18/71-72 ] स्थान है। यह श्रीकृष्णकी देह स्वरूप है और इसका परिमाण पाँच योजन है। लोगोंमें इस बातका भी प्रचार है कि वृन्दावन सोलह कोस परिमाणका है।"] 'कालीयह्रद'— “कालीयह्रदपूर्वेण कदम्बो महितो द्रुमः। ततः कालीयतीर्थाख्यं तीर्थमघविनाशनम्॥ अनृत्यद्यत्र भगवान् बालः कालीय-मस्तके ॥” [अर्थात् “कालीय-ह्रदके पूर्वमें एक विशाल कदम्बका वृक्ष है। वहाँ कालीय-तीर्थ नामक एक तीर्थ है, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने अपनी बाल्य-लीला करते हुए कालीयके मस्तकपर नृत्य किया था।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “ए कालीय-तीर्थ पाप विनाशय। कालीय-तीर्थस्थाने बहु कार्यसिद्धि हय॥” [अर्थात् “इस कालीय-तीर्थमें स्नान करनेसे समस्त पापोंका विनाश हो जाता है। इसमें स्नान करनेसे अनेक लौकिक कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।"] 'प्रस्कन्दन'— “क्षेत्रं प्रस्कन्दनं नाम सर्वपापहरं शुभम्। तस्मिन् स्नातस्तु मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥” [अर्थात् “प्रस्कन्दन नामक क्षेत्र सभी पापोंको हरकर शुभ प्रदान करनेवाला है। इसमें स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देख 'प्रस्कन्दन'-क्षेत्र-स्नाने पाप याय। प्राणत्याग हइलेइ विष्णुलोक पाय॥ ओहे श्रीनिवास, सूर्य्यगणेर तापेते। दूरे गेल शीत, घर्म्म हइल देहेते॥ सेइ घर्म्मजल सूर्य्यकन्याय मिलिल। एइ हेतु 'प्रस्कन्दन'-नाम तीर्थ हैल॥ श्रीकृष्णचैतन्याभिन्न श्रीअद्वैत ईश्वर। कतदिन छिला एइ वनेर भितर॥” [अर्थात् “ओहे श्रीनिवास! इस 'प्रस्कन्दन'-क्षेत्रको देखो, यहाँ स्नान करनेसे पाप दूर हो जाते हैं। यहाँ कोई प्राण त्याग करता है, तो उसी समय वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (कालीय ह्रदमें कालीय दमनके समय श्रीकृष्णको जलमें अधिक समय रहनेके कारण सर्दी लग रही थी) तब श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सूर्य बारह कलाओंके साथ ताप देने लगे। उस तापसे श्रीकृष्णके शरीरसे शीत दूर हो गया और देहसे पसीना आने लगा। वह पसीना यमुनासे जाकर मिल गया, इस लिये इसका नाम 'प्रस्कन्दन'-तीर्थ हुआ। श्रीकृष्णचैतन्यसे अभिन्न श्रीअद्वैत प्रभु कुछ दिन तक इस वनके भीतर रहे थे।"] ॥ 71 ॥ द्वादश-आदित्यसे केशीतीर्थमें रासस्थली-दर्शनसे मूर्च्छा :- 'द्वादश-आदित्य' हैते 'केशीतीर्थे' आइला। रासस्थली देखि' प्रेमे मूर्च्छित हइला ॥ 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रस्कन्दनमें स्नान करके 'द्वादश-आदित्य' तीर्थमें आये। वहाँसे वे केशीतीर्थपर आये और जब उन्होंने रासस्थलीको देखा तो वे प्रेमावेशमें मूर्च्छित हो गये ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-'द्वादश-आदित्य'- “द्वादशादित्य-तीर्थाख्यं तीर्थं तदनुपावनम्। तस्य दर्शनमात्रेण नृणामघो विनश्यति ॥” [अर्थात् “द्वादश-आदित्य-तीर्थ तीर्थोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसके दर्शनमात्रसे ही मनुष्यके पापोंका विनाश हो जाता है।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देखह द्वादशादित्य तीर्थ एइखाने॥” [अर्थात् “इस स्थानपर द्वादशादित्य तीर्थको देखो।"] 'केशीतीर्थ'-आदि-वाराहमें- “गङ्गा शतगुणं पुण्यं यत्र केशी निपातितः।” [अर्थात् “जहाँ केशी दैत्यका वध हुआ था (वह केशीतीर्थ) गङ्गासे सैंकड़ों गुणा अधिक पुण्य स्थान है।"] । 149
[ 18/72–81 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “केशीवध कैल कृष्ण परम-कौतुके॥” [अर्थात् “खेल-ही-खेलमें श्रीकृष्णने केशी दैत्यका वध कर दिया था।”] ॥ 72 ॥ सारा दिन प्रेमाविष्ट महाप्रभुकी पागलों जैसी चेष्टाएँ :— चेतन पाञा पुनः गड़ागड़ि याय। हासे, कान्दे, नाचे, पड़े, उच्चैःस्वरे गाय ॥ 73 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब पुनः चेतन हुए, तब वे भूमिपर लोट-पोट खाने लगे। महाप्रभु कभी तो हँसते, कभी रोते, कभी नृत्य करते, तो कभी भूमिपर गिर पड़ते और कभी उच्चस्वरमें गाते ॥ 73 ॥ वहाँसे सन्ध्याके समय अक्रूर-तीर्थमें आकर भोजन :— एइरङ्गे सेइदिन तथा गोङाइला। सन्ध्याकाले ‘अक्रूरे आसि’ भिक्षा निर्वाहिला ॥ 74 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वह दिन महाप्रभुने आनन्दपूर्वक केशीतीर्थमें ही व्यतीत किया। फिर सन्ध्याके समय अक्रूर-तीर्थमें आकर भोजन ग्रहण किया ॥ 74 ॥ प्रातःकालमें चीरघाटमें स्नान, इमलीतलामें विश्राम :— प्राते वृन्दावने कैला ‘चीरघाटे’ स्नान। तेँतुलि-तलाते आसि’ करिला विश्राम ॥ 75 ॥ द्वापरयुगका इमलीका वृक्ष :— कृष्णलीला-कालेर सेइ वृक्ष पुरातन। तार तले पिँड़ि-बान्धा परम-चिक्कण ॥ 76 ॥ उसके निकट ही यमुनाका प्रवाह :— निकटे यमुना बहे शीतल समीर। वृन्दावन-शोभा देखे यमुनार नीर ॥ 77 ॥ इमलीके वृक्षके नीचे बैठकर महाप्रभुका नामसङ्कीर्तन, दोपहरमें अक्रूरतीर्थमें आकर भोजन :— तेँतुल-तले बसि’ करेन नाम-सङ्कीर्त्तन। मध्याह्न करि’ आसि’ करे ‘अक्रूरे’ भोजन ॥ 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अगले दिन प्रातःकाल वृन्दावनमें चीरघाटपर स्नान किया और इमलीतलामें आकर विश्राम किया। श्रीकृष्णलीलाके समयका बहुत प्राचीन वह इमलीका वृक्ष है। उस वृक्षके नीचे बहुत ही चिकना चबूतरा बना हुआ था। उसके निकट ही यमुनाजी बह रही थीं, इसलिये वहाँ शीतल वायु प्रवाहित हो रही थी। महाप्रभु वृन्दावनकी शोभा और यमुनाजीके जलका दर्शन कर रहे थे। इमलीतलापर बैठकर महाप्रभु नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे। महाप्रभुने दोपहरके समय स्नान करनेके बाद अक्रूरतीर्थमें आकर भोजन किया ॥ 75-78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘तेंतुलि-तलाते’—इस स्थानको अब ‘आम्लितला’ कहते हैं ॥ 75 ॥ अक्रूरतीर्थवासियोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये आगमन और महाप्रभुके निर्जन भजनमें संख्या-नाम-कीर्तनमें बाधा :— अक्रूरेर लोक आइसे प्रभुरे देखिते। लोक-भिड़े स्वच्छन्दे नारे ‘कीर्त्तन’ करिते ॥ 79 ॥ अनुवाद—अक्रूरतीर्थमें रहनेवाले लोग महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आते, महाप्रभु लोगोंकी भीड़के कारण शान्तिसे संख्यापूर्वक नामकीर्तन नहीं कर पाते ॥ 79 ॥ महाप्रभुके द्वारा मध्याह्नतक निर्जनमें संख्या-नामकीर्तन :— वृन्दावने आसि’ प्रभु बसिया एकान्त। नामसङ्कीर्त्तन करे मध्याह्न-पर्यन्त ॥ 80 ॥ दोपहरके बाद लोगोंको महाप्रभुके दर्शनका सुयोग और महाप्रभुके द्वारा सभीको नाम-कीर्तनका उपदेश :— तृतीय-प्रहरे लोक पाय दरशन। सबारे उपदेश करे ‘नामसङ्कीर्त्तन’ ॥ 81 ॥ अनुवाद—इसी कारण महाप्रभु वृन्दावनमें आकर एकान्तमें बैठकर दोपहर तक नामसङ्कीर्तन करते। दोपहरके बाद तीसरे पहरमें लोगोंको महाप्रभुके दर्शन होते। महाप्रभु सभीको नामसङ्कीर्तनका उपदेश प्रदान करते ॥ 80–81 ॥ 150 |
अठारहवाँ अध्याय 18/82–92 ] उस समय महाप्रभुके दर्शन करने राजपूत-कृष्णदासका आगमन :– हेनकाले आइल वैष्णव 'कृष्णदास' नाम। राजपुत-जाति, गृहस्थ, यमुना-पारे ग्राम ॥ 82 ॥ 'केशी' स्नान करि' सेइ 'कालीयदह' याइते। आम्लि-तलाय गोसाञिरे देखे आचम्बिते ॥ 83 ॥ अनुवाद—उस समय कृष्णदास नामक एक वैष्णव महाप्रभुके दर्शन करने आये। वे गृहस्थ थे और जातिसे राजपूत थे। यमुनाके पार उनका घर था। केशीघाटपर स्नान करनेके बाद कालीयदहकी ओर जाते समय उन्होंने अचानक इमलीतलामें श्रीचैतन्य महाप्रभुको देखा ॥ 82–83 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे कृष्णदासको चमत्कार :– प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हइल चमत्कार। प्रेमावेशे प्रभुरे करेन नमस्कार ॥ 84 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके सौन्दर्य और प्रेमको देखकर कृष्णदास आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने प्रेमावेशमें महाप्रभुको नमस्कार किया ॥ 84 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसके परिचयकी जिज्ञासा और कृष्णदासके द्वारा दीनतापूर्वक अपना परिचय देना :– प्रभु कहे,—“के तुमि, काँहा तोमार घर?” कृष्णदास कहे,—“मुञि गृहस्थ पामर ॥ 85 ॥ राजपूत-जाति मुञि, ओ-पारे मोर घर। मोर इच्छा हय,—हङ वैष्णव-किङ्कर ॥ 86 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे अपने स्वप्नके दर्शनकी सफलताका वर्णन :– किन्तु आजि एक मुञि 'स्वप्न' देखिनु। सेइ स्वप्न परतेक तोमा आसिं पाइनु ॥” 87 ॥ महाप्रभुकी उसपर कृपा, कृष्णदासका प्रेम :– प्रभु ताँरे कृपा कैला आलिङ्गन करि'। प्रेमे मत्त हैल सेइ, नाचे, बोले 'हरि' ॥ 88 ॥ महाप्रभुके साथ आकर महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :– प्रभु-सङ्गे मध्याह्ने अक्रूर-तीर्थे आइला। प्रभुर अवशिष्ट पात्र-प्रसाद पाइला ॥ 89 ॥ तबसे कृष्णदास महाप्रभुके कमण्डलको वहन करनेवाला और नित्यसङ्गी हो गया :– प्राते प्रभुसङ्गे आइला जलपात्र लञा। प्रभु-सङ्गे रहे गृह-स्त्री-पुत्र छाड़िया ॥ 90 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनसे पूछा,—“आप कौन हैं? आपका घर कहाँ है?” कृष्णदासने कहा,—“मैं एक अधम गृहस्थ हूँ। मैं जातिसे राजपूत हूँ और यमुनाके उस पार मेरा घर है। मेरी इच्छा होती है कि मैं किसी वैष्णवका दास बनूँ। आज मैंने एक स्वप्न देखा था। उस स्वप्नके अनुसार मैं यहाँ आया और आप मुझे साक्षात् मिले।” महाप्रभुने उन्हें आलिङ्गन करके उनपर कृपा की। कृष्णदास प्रेममें मत्त होकर नृत्य करते हुए 'हरि' बोलते कीर्तन करने लगे। कृष्णदास दोपहरके समय महाप्रभुके साथ अक्रूरतीर्थमें आ गये और उन्होंने महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको ग्रहण किया। अगले दिन प्रातःकाल कृष्णदास महाप्रभुके साथ उनके जलके पात्रको उठाकर वृन्दावन आ गये। तबसे वे अपने घर-पत्नी-पुत्रको छोड़कर महाप्रभुके साथ रहने लगे ॥ 85–90 ॥ अनुभाष्य—'परतेक'—'प्रत्यक्ष', 'साक्षात्' ॥ 87 ॥ वृन्दावनमें श्रीकृष्णके प्रकट होनेका लोगोंका शोर :– वृन्दावने पुनः 'कृष्ण' प्रकट हइल। याँहा ताँहा लोक सब कहिते लागिल ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभु कहीं भी जाते, सभी लोग यही बात कहते कि श्रीकृष्ण वृन्दावनमें पुनः प्रकट हुए हैं ॥ 91 ॥ एकदिन वृन्दावनसे बहुतसे लोगोंका महाप्रभुके निकट आगमन :– एकदिन अक्रूरेते लोक प्रातःकाले। वृन्दावन हैते आइसे करि कोलाहले ॥ 92 ॥ । 151