श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
17/234-244 ] ताहि मध्ये छयऋतुर लीलार वर्णन। मधुपान, रासोत्सव, जलकेलि कथन॥ 238 ॥ ‘बल’ ‘बल’ बले प्रभु शुनिते उल्लास। श्रीवास कहेन तबे रास-विलास॥ 239 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु आवेशमें ‘बोलो’, ‘बोलो’ कहने लगे। श्रीवास पण्डित वृन्दावनकी रसमयी लीलाओंका वर्णन करने लगे। उन्होंने पहले वृन्दावनके माधुर्यका वर्णन किया। जिसे सुनकर महाप्रभुका चित्त अत्यधिक आनन्दित हो गया। तब महाप्रभु बार-बार ‘बोलो’, ‘बोलो’ कहने लगे। श्रीवास पण्डित पुनः-पुनः विस्तारपूर्वक वृन्दावनकी कथाका वर्णन करने लगे। श्रीकृष्णने कैसे वंशीकी ध्वनिके द्वारा गोपियोंको वनमें आकर्षण करके उनके साथ किस प्रकार वनमें विहार किया। उस विहारके समय छह ऋतुओंमें की गयी लीलाओंका श्रीवासने वर्णन किया [श्रीकृष्णकी इच्छानुसार वृन्दादेवीकी आज्ञासे लीलारसके वर्धनके लिये छहों ऋतुओंने भिन्न-भिन्न वनोंमें एक ही समयमें अपने-अपने प्रभावका विस्तार किया। इस प्रकार श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विहार करते हुए उन सभी ऋतुओंके अनुरूप लीलाओंका रसास्वादन किया]। और मधुपान, रासोत्सव तथा जलकेलिकी लीलाओंका भी गान किया। महाप्रभुके मनमें ये लीलाएँ सुनकर बहुत उल्लास हुआ और उन्होंने श्रीवाससे रास-विलासका वर्णन करनेके लिये कहा॥ 234-239 ॥ अनुभाष्य—श्रीवास पण्डितके द्वारा व्रजकी गोपियोंके साथ श्रीकृष्णके मधुर (शृंगार) रसका वर्णन विशेषरूपसे लक्ष्य करनेका विषय है॥ 235-239 ॥ कहिते, शुनिते ऐछे प्रातःकाल हैल। प्रभु श्रीवासेरे तोषि’ आलिङ्गन कैल॥ 240 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कहते-सुनते प्रातःकाल हो गया। महाप्रभुने परम प्रसन्न होकर श्रीवास पण्डितका आलिङ्गन किया॥ 240 ॥ आचार्यरत्नके घर महाप्रभुका लक्ष्मीवेशमें नृत्य :— तबे आचार्येर घरे कैल कृष्णलीला। रुक्मिण्यादि-रूप प्रभु याते आपने हैला॥ 241 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखर आचार्यके घरमें श्रीकृष्णलीलाका अभिनय किया। महाप्रभुने स्वयं ही श्रीरुक्मिणी आदिके रूपको धारण किया॥ 241 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक रात्रि श्रीचन्द्रशेखर आचार्यरत्नके घरमें महाप्रभुने रुक्मिणी आदिके रूपको धारण करके एक लीलाका अभिनय किया था। उसमें श्रीअद्वैताचार्य, श्रीहरिदासादि अनेकोंको नाना वेशोंमें सजाया था॥ 241 ॥ अनुभाष्य—रुक्मिणीभावमें और वेशमें महाप्रभुका प्रसङ्ग चैःभाः मध्यखण्ड, अठारहवें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥ 241 ॥ कभु दुर्गा, लक्ष्मी हय, कभु वा चिच्छक्ति। खाटे बसि’ भक्तगणे दिल प्रेमभक्ति॥ 242 ॥ अनुवाद—महाप्रभु कभी दुर्गा, कभी लक्ष्मी और कभी चित्शक्ति बन जाते। तब महाप्रभुने सिंहासनपर बैठकर सभी भक्तोंको प्रेमदान किया॥ 242 ॥ अनुभाष्य—आद्याशक्तिके वेशमें महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको स्तनपान कराना और प्रेमभक्ति प्रदान करनेका प्रसङ्ग चैःभाः मध्यखण्ड, अठारहवें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥ 242 ॥ ब्राह्मणीके द्वारा महाप्रभुके चरणस्पर्श करनेपर महाप्रभुका गङ्गामें स्नान :— एकदिन महाप्रभुर नृत्य-अवसाने। एक ब्राह्मणी आसि’ धरिल चरणे॥ 243 ॥ चरणेर धूलि सेइ लय बार बार। देखिया प्रभुर दुःख हइल अपार॥ 244 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 255
[ 17/243-255 सेइक्षणे धाञा प्रभु गङ्गाते पड़िल। नित्यानन्द-हरिदास धरि' उठाइल ॥ 245 ॥ विजय आचार्येर घरे से रात्रे रहिला। प्रातःकाले भक्त सबे घरे लञा गेला ॥ 246 ॥ अनुवाद-एक दिन महाप्रभुके नृत्यके अन्तमें एक ब्राह्मणीने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिये। वह ब्राह्मणी बार-बार उनके चरणोंकी धूलिको लेने लगी, उसको ऐसा करते देखकर महाप्रभुको बहुत दुःख हुआ। उसी समय महाप्रभु दौड़कर गङ्गामें जाकर कूद पड़े। श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीहरिदास ठाकुरने जाकर उन्हें बाहर निकाला। उस रात्रि महाप्रभु विजय आचार्यके घर पर ही रहे। प्रातःकाल सभी भक्त उन्हें घर ले गये॥ 243-246 ॥ अनुभाष्य-इस घटनाका चैतन्यभागवतमें वर्णन नहीं है॥ 243-246 ॥ उच्चस्वरमें 'गोपी' 'गोपी' पुकारते हुए महाप्रभु :- एकदिन गोपीभावे गृहेते बसिया। 'गोपी' 'गोपी' नाम लय विषण्ण हञा ॥ 247 ॥ अनुवाद-एक दिन अपने घरमें बैठे हुए महाप्रभु गोपीभावमें आविष्ट होकर दुःखित हृदयसे 'गोपी' 'गोपी' पुकार रहे थे॥ 247 ॥ मर्म-अनभिज्ञ पाषण्डी छात्रका महाप्रभुको मना करना :- एक पड़ुया आइल प्रभुके देखिते। 'गोपी' 'गोपी' नाम शुनि' लागिल बलिते ॥ 248 ॥ “कृष्णनाम ना लओ केने, कृष्णनाम-धन्य। 'गोपी' 'गोपी' बलिले वा किवा हय पुण्य ॥"249 ॥ अनुवाद-उस समय एक छात्र महाप्रभुसे मिलने आया और महाप्रभुके मुखसे 'गोपी' 'गोपी' नाम सुनकर वह कहने लगा,- “आप कृष्णनाम क्यों नहीं लेते? कृष्णनाम तो परम धन्य है। 'गोपी' 'गोपी' कहनेसे क्या कोई पुण्य होता है? ॥" 249 ॥ प्रहार करनेके लिये महाप्रभुका उसके पीछे दौड़ना; छात्रका भागना :- शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे दोषोद्गार। ठेङ्गा लञा उठिला प्रभु पड़ुया मारिबार ॥ 250 ॥ अनुवाद-उसकी बात सुनकर महाप्रभु क्रोधित होकर श्रीकृष्णके दोषोंका वर्णन करने लगे और लाठी लेकर छात्रको मारनेके लिये उठ खड़े हुए॥ 250 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'दोषोद्गार' - परिहासपूर्वक दोषारोपण ॥ 250 ॥ भये पलाय पड़ुया, प्रभु पाछे पाछे धाय। आस्ते व्यस्ते भक्तगण प्रभुरे रहाय ॥ 251 ॥ अनुवाद-वह छात्र डरकर भागा और महाप्रभु उसके पीछे दौड़े। जैसे-तैसे करके भक्तोंने महाप्रभुको रोका ॥ 251 ॥ महाप्रभुको सान्त्वना :- प्रभुरे शान्त करि' आनिल निज घरे। पड़ुया पलाया गेल पड़ुया-सभारे ॥ 252 ॥ छात्रसमाजमें महाप्रभुके प्रति कटु बातें और क्रोध :- पड़ुया सहस्र याहाँ पड़े एकठाञि। प्रभुर वृत्तान्त द्विज कहे ताहाँ याइ ॥ 253 ॥ अनुवाद-भक्त महाप्रभुको शान्त करके उनके घरपर ले आये। वह छात्र भागकर छात्रोंकी सभांमें जा पहुँचा जहाँ एक साथ सैकड़ों छात्र पढ़ रहे थे। उस ब्राह्मण छात्रने उस सभामें महाप्रभुका वृत्तान्त सुनाया ॥ 252-253 ॥ शुनि' क्रोध कैल सब पड़ुयार गण। सबे मेलि' करे तब प्रभु निन्दन ॥ 254 ॥ “सब देश भ्रष्ट कैल एकला निमाञि। ब्राह्मण मारिते चाहे, धर्मभय नाञि ॥ 255 ॥ 256 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/254-259 ] महाप्रभुपरे प्रहार करनेके लिये षड्यन्त्र :- पुनः यदि ऐछे करे, मारिब ताहारे। कोन् वा मानुष हय, कि करिते पारे ॥ "256 ॥ अनुवाद-ऐसा सुनकर सभी छात्र क्रोधित हो गये और सभी मिलकर महाप्रभुकी निन्दा करने लगे, - "अकेले निमाइने सारे देशको भ्रष्ट कर दिया है। वह ब्राह्मणको मारना चाहता है, उसे धर्मका कोई भी भय नहीं है। यदि फिर कभी वह ऐसा करनेका प्रयास करेगा, तो हम भी उसे मारेंगे। वह कोई भी हो, वह हमारा क्या बिगाड़ लेगा? ॥ "254-256 ॥ महाप्रभुसे ईर्ष्या करनेके फलस्वरूप उनकी विद्या-बुद्धि-लुप्त :- प्रभुर निन्दाय सबार बुद्धि हैल नाश। सुपठित विद्या कारओ ना हय प्रकाश ॥ 257 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी निन्दा करनेसे उन सबकी बुद्धि नष्ट हो गयी और उनकी भली-भाँति पढ़ी हुई विद्या विस्मृत हो गयी ॥ 257 ॥ अनुभाष्य-क्योंकि, (श्वेताश्वर उपनिषद्में)— “यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” “जिसकी, परदेवता विष्णुके प्रति जैसी, उनके प्रिय श्रीगुरुदेवके प्रति भी वैसी परमा (अहैतुकी और निरन्तर) भक्ति है, उसी महात्माके शुद्धचित्तमें ही सभी श्रुतियोंके वास्तविक हरिभक्ति तात्पर्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं, अन्य किसीके हृदयमें नहीं।” श्रीप्रह्लाद महाराजकी उक्ति (भाः 7/5/24)- “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेत्रवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥” “जो भगवान् श्रीविष्णुके प्रति आत्मसमर्पणपूर्वक ये नौ प्रकारकी भक्ति करते हैं, उन्होंने ही उत्तमरूपसे शास्त्र अध्ययन किया है- ऐसा कहा जाता है।" इस श्लोककी श्रीधर स्वामीकी टीका- “सा चार्पिंतैव सती यदि क्रियते, न तु कृता सती पश्चादर्प्येत, तदुत्तममधीतं मन्ये, न त्वस्माद्दुरोर्धीतं शिक्षितं वा तथाविधं किञ्चिदस्तीति भावः।" “पहले आत्मसमर्पण, बाद में हरिभजन-क्रिया-यही विधि है। ऐसा होनेपर ही उत्तम शास्त्र अध्ययन हुआ है, ऐसा विचार है। आत्मसमर्पणपूर्वक विष्णुपूजाकी अपेक्षा और कुछ भी श्रेष्ठ शिक्षा अथवा अध्ययन नहीं हो सकता।" अविद्याके वशमें होकर उन जड़विद्या-अभिमानी (छात्रों) ने परविद्यारूपी वधूके जीवन-स्वरूप विष्णुकी अवज्ञा की और नित्य वास्तववस्तु विष्णुके चरणोंमें आत्मसमर्पणके अभावके कारण उन दाम्भिकोंके कलुषित-मलिन हृदयमें विद्याकी स्फूर्ति नहीं हुई। इसलिये (भाः 11/11/18)- “शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि। श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥” “यदि कोई वेदादि शास्त्रोंमें पारदर्शी होनेपर भी परब्रह्म विष्णुमें भक्तिपरायण न हो, तो उसका समस्त शास्त्रानुशीलन-श्रम केवल व्यर्थके परिश्रममें ही समाप्त होता है ॥ "257 ॥ तथापि दाम्भिक पडुया नम्र नाहि हय। याहाँ ताहाँ प्रभुर निन्दा हासि' से करय ॥ 258 ॥ अनुवाद-तब भी वे दाम्भिक छात्र नम्र नहीं हुए। जहाँ-तहाँ सभी स्थानोंपर वे हँसी उड़ाते हुए महाप्रभुकी निन्दा करने लगे॥ 258 ॥ पाखण्डियोंकी दुर्गति देख महाप्रभुकी करुणा :- सर्वज्ञ गोसाञि जानि' सबार दुर्गति। घरे बसि' चिन्तेन ता'-सबार अव्याहति ॥ 259 ॥ अनुवाद-सर्वज्ञ महाप्रभु उन सबकी उस अपराधके फलस्वरूप दुर्गति को जानकर घरमें बैठकर उनके उद्धारकी चिन्ता करने लगे॥ 259॥ सत्रहवाँ अध्याय | 257
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[ 17/260-266 [बायाँ स्तम्भ / Left Column] अभक्त व्यक्तियोंका परिचय :- 'यत अध्यापक, आर ताँर शिष्यगण। धर्मी, कर्मी, तपोनिष्ठ, निन्दक, दुर्जन॥ 260 ॥ श्रीकृष्णविद्वेष-अपराधसे मुक्त करनेके उपायकी चिन्ता :- एइ सब मोर निन्दा-अपराध हैते। आमि ना लओयाइले भक्ति, ना पारे लइते ॥ 261 ॥ निस्तारिते आइलाम आमि, हैल विपरीत। एसब दुर्जनेर कैछे हइबेक हित ॥ 262 ॥ अनुवाद—'जितने भी अध्यापक और उनके शिष्य हैं, वे सभी धर्मी-कर्मी (वर्णाश्रम धर्म और कर्मकाण्डमें रत) अथवा तपादिको मुख्य धर्म माननेवाले हैं और वैष्णवोंके निन्दक हैं, इसलिये ये दुर्जन हैं। ये सब मेरी निन्दारूपी अपराधके कारण स्वयं भक्ति नहीं कर सकते, जब तक मैं इन्हें भक्ति प्रदान न करूँ। मैं तो सभीका उद्धार करनेके लिये आया था, किन्तु सब विपरीत हो रहा है। इन सभी दुर्जनोंका कैसे कल्याण होगा ? ॥ 260-262 ॥ अनुभाष्य—गोपीभावमें आविष्ट होनेके कारण महाप्रभुका श्रीकृष्णके प्रति क्रोध और दोषारोपणको अप्राकृत न समझनेके कारण एक कर्मजड़ स्मार्त्त छात्रका महाप्रभुके साथ वादानुवाद और गोपीभावमय महाप्रभुका उसको श्रीकृष्णका पक्षपाती समझकर क्रोधित होकर उसके पीछे दौड़ना; ऐसा देखकर कर्मजड़ हरिविमुख नाम मात्रके ब्राह्मणोंके द्वारा मोहवशतः महाप्रभुको पीटनेका परामर्श; उनकी दुर्गति और दुर्दशा दूर करनेके लिये प्राकृत समाजकी दृष्टिमें श्रेष्ठ जन्म और वर्णके अभिमानी लोगोंके गुरुका संन्यास आश्रम स्वीकार करनेकी अभिलाषा— चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।॥ 247-262 ॥ आमाके प्रणति करे, हय पापक्षय। तबे से इहारे भक्ति लओयाइले लय ॥ 263 ॥ [दायाँ स्तम्भ / Right Column] पाषण्डियोंके उद्धारकी इच्छा :- मोरे निन्दा करे ये, ना करे नमस्कार। एसब जीवेरे अवश्य करिब उद्धार ॥ 264 ॥ अनुवाद—यदि ये मुझे नमस्कार करेंगे, तो इनके पाप नष्ट हो जायेंगे। तब मेरे द्वारा इनको भक्ति प्रदान करनेपर ये उसे धारण कर सकेंगे। जो मेरी निन्दा करते हैं, मुझे नमस्कार भी नहीं करते, तो भी मैं उन सभी जीवोंका अवश्य ही उद्धार करूँगा ॥ 263-264 ॥ लौकिक मर्यादामय संन्यास-लीलाभिनयका सङ्कल्प :- अतएव अवश्य आमि संन्यास करिब। संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत हइब ॥ 265 ॥ अनुवाद—इसलिये मैं अवश्य ही संन्यास ग्रहण करूँगा। तब ये सभी मुझे संन्यासी जानकर प्रणाम करेंगे ॥ 265 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंके मतानुसार यदि कोई ब्राह्मण संन्यास ग्रहण करे, तो संन्यासी-बुद्धिसे अर्थात् संन्यासीको प्रणामके योग्य समझकर गृहस्थ और ब्राह्मणादि सभी प्रणाम करते हैं। मेरे संन्यास लेनेपर निन्दक ब्राह्मण अवश्य ही प्रणाम करके मुझसे सुबुद्धि लाभ करेंगे ॥ 265 ॥ संन्यासी जानकर महाप्रभुको नमस्कारके फलस्वरूप पाषण्ड ब्राह्मणादि उच्चजातिके व्यक्तियोंमें भी शुद्धचित्तसे सेवा-प्रवृत्तिका उदय :- प्रणतिते ह'बे इहार अपराध-क्षय। निर्मल हृदये भक्ति कराइब उदय ॥ 266 ॥ अनुवाद—मुझे प्रणाम करनेसे जब इनके अपराध नष्ट हो जायेंगे, तब इनके निर्मल हृदयमें मैं भक्ति उदय कराऊँगा ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—पाषण्डी ब्राह्मणब्रुव अर्थात् नाम मात्रके ब्राह्मण जो ब्राह्मण जातिके विहित कर्त्तव्योंका पालन नहीं करते, वे भी वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम 258 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/265-272 ] करेंगे—यही श्रीमन्महाप्रभुकी धारणा थी; उस समयमें सदाचार भी ऐसा ही था। इस समय जो इन सभी नाम मात्रके ब्राह्मणोंकी अपेक्षा और भी अधिक दाम्भिकता दिखाते हुए वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम नहीं करते, उनके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी विधि,— “देवता-प्रतिमां दृष्ट्वा यतिञ्चैव त्रिदण्डिनम्। नमस्कारं न कुर्याद् यः प्रायश्चित्तीयते नरः॥” (पाठान्तरमें, नमस्कारं न कुर्याच्चेदुपवासेन शुद्धयति॥”) “परमदेवता श्रीविष्णुके विग्रह और वैष्णव-त्रिदण्डी-संन्यासीको देखकर यदि कोई ब्राह्मण (चाहे वह नाम मात्रका ब्राह्मण हो) प्रणाम न करे, तो इस दोषके कारण उसे प्रायश्चित करना पड़ता है, अथवा उपवास करके शुद्ध होना पड़ता है॥” 265-266॥ एसब पाषण्डी तबे हइबे निस्तार। आर कोन उपाय नाहि, एइ युक्ति सार॥'267॥ अनुवाद—यही युक्ति ठीक है, क्योंकि इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, तभी इन सब पाषण्डियोंका उद्धार होगा॥'267॥ उसी समय केशव भारतीका नवद्वीपमें महाप्रभुके घरमें भिक्षा ग्रहण :- एइ दृढ़ युक्ति करि' प्रभु आछे घरे। केशव भारती आइला नदिया-नगरे॥268॥ अनुवाद—ऐसा दृढ़ निश्चय कर जब महाप्रभु घरमें विराजमान थे, तभी श्रीकेशव भारती नदिया-नगरमें पधारे॥268॥ प्रभु ताँरे नमस्करि' कैल निमन्त्रण। भिक्षा कराइया ताँरे कैल निवेदन॥269॥ भारतीके निकट महाप्रभुका निवेदन :- “तुमि त' ईश्वर वट,—साक्षात् नारायण। कृपा करि' कर मोर संसार-मोचन ॥” 270 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जाकर उन्हें नमस्कार करके अपने घर निमन्त्रित किया और भिक्षा करानेके उपरान्त उनसे निवेदन किया,—“आप कृपा करके मेरे संसार-बन्धनको काट दीजिये, आप यह करनेमें समर्थ हैं। आप ईश्वर हैं, साक्षात् नारायण ही हैं॥”269-270॥ भारतीकी उक्ति :- भारती कहेन,—“तुमि ईश्वर, अन्तर्यामी। ये कहे, से करिब,—स्वतन्त्र नहि आमि॥” 271 ॥ अनुवाद—श्रीकेशव भारतीने कहा,—“आप तो ईश्वर हो, अन्तर्यामी हो। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा, क्योंकि मैं स्वतन्त्र नहीं, आपके परतन्त्र हूँ॥”271॥ भारतीका काटोया लौटकर आना और महाप्रभुका उनसे संन्यास ग्रहण :- एत बलि' भारती गोसाञि काटोयाते गेला। महाप्रभु ताहा याइ' संन्यास करिला ॥ 272 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीकेशव भारती कटोया चले गये। महाप्रभुने वहीं जाकर उनसे संन्यास ग्रहण किया॥272॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुकी चौबीस वर्षकी आयुके अन्तमें जो माघी शुक्लपक्ष पड़ा, उस उत्तरायणके समय संक्रमणके दिन महाप्रभुने रात्रिके अन्तमें श्रीनवद्वीपको त्यागकर ‘नदियार घाट’से तैरते हुये गङ्गा पारकर कण्टकनगर या कटोया-ग्राममें पहुँचकर श्रीकेशव भारतीसे (एक) दण्ड ग्रहण किया। चन्द्रशेखर आचार्य रत्नने महाप्रभुकी आज्ञानुसार संन्यासके सभी कृत्योंका अनुष्ठान किया। सारा दिन कीर्त्तन करते-करते लगभग सन्ध्याके समय क्षौरकार्य (मुण्डन) समाप्त हुआ। अगले दिन प्रातःकाल दण्डधारी संन्यासीका वेश धारण किये हुये श्रीकृष्णचैतन्यने राढ़देशमें भ्रमण करना आरम्भ किया। श्रीकेशवभारती भी कुछ दूरी तक उनके साथ-साथ गये थे॥272॥ सतरहवाँ अध्याय | 259
[ 17/273–278 महाप्रभुके संन्यासके समय निताइ, आचार्यरत्न और मुकुन्द :— सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर आचार्य। मुकुन्ददत्त,—एइ तिन कैल सर्व कार्य॥ 273 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीमुकुन्ददत्त, इन तीनोंने संन्यास ग्रहण करनेके सभी अनुष्ठानादि आवश्यक कार्योंको किया॥ 273 ॥ एइ आदिलीलार कैल सूत्र गणन। विस्तारि वर्णिला इहा दास वृन्दावन॥ 274 ॥ अनुवाद—यहाँ तक आदि-लीलाकी सूत्ररूपमें मैंने गणना की है। इन समस्त लीलाओंका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥ 274 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, अठाइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 274 ॥ महाप्रभुकी शान्तको छोड़कर दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर भावमें उक्त चित्तवृत्ति :— यशोदानन्दन हैला शचीर नन्दन। चतुर्विध भक्त-भाव करे आस्वादन॥ 275 ॥ अनुवाद—श्रीयशोदानन्दन अब श्रीशचीनन्दनके रूपमें अवतीर्ण हुये हैं और उन्होंने चार प्रकारके भक्तोंके भावोंका आस्वादन किया॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चतुर्विध भक्त-भाव'—दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसके आश्रित चार प्रकारके भक्तोंके भाव॥ 275 ॥ आश्रयजातीय भावमय विषयविग्रह ही गौरसुन्दर— “गौरनागरी”-वादका खण्डन :— माधुर्य राधा-प्रेमरस आस्वादिते। राधाभाव अङ्गीकार करियाछे भालमते॥ 276 ॥ अनुवाद—अपने माधुर्य और राधाके प्रेम रसका आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्ण श्रीराधाके भाव और अङ्गकान्तिको अङ्गीकार करके श्रीगौरसुन्दरके रूपमें अवतीर्ण हुए॥ 276 ॥ गोपी-भाव याते प्रभु करियाछे एकान्त। व्रजेन्द्रनन्दने माने आपनार कान्त॥ 277 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने ऐकान्तिक रूपसे गोपीभावको ग्रहण किया है, इसलिये वे श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको अपने कान्तके रूपमें मानते हैं॥ 277 ॥ गोपिका-भावेर एइ सुदृढ़ निश्चय। व्रजेन्द्रनन्दन बिना अन्यत्र ना जानय॥ 278 ॥ अनुवाद—गोपी-भावका यही सुदृढ़ निश्चय है कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही उनके एकमात्र प्राण-प्रियतम हैं और वे उनके अतिरिक्त किसी औरको नहीं जानती हैं॥ 278 ॥ अनुभाष्य—'श्रीगौरसुन्दर'—श्रीराधाभावद्युति-सुवलित श्रीकृष्ण हैं, इसलिये श्रीकृष्णकी सेवाके लिये आश्रय-जातीय श्रीमती राधिकादि गोपियोंके हृदयमें जो भाव है, महाप्रभु सदा उसी भावमें ही स्थित रहते थे। उसे त्यागकर कभी भी उन्होंने स्वयं श्रीकृष्णके समान विषय-जातीय चेष्टाएँ अर्थात् भोक्ताके अभिमानसे परस्त्री-दर्शनादिके द्वारा 'लम्पट नागर' की वृत्तिका परिचय नहीं दिया। परन्तु प्राकृत कामुक परस्त्री लम्पट सहजिया-सम्प्रदायके लोग निज-निज घृणित काम-पिपासा और व्यभिचारको जगद्गुरु आचार्यकी लीलाका प्रदर्शन करने वाले श्रीगौरसुन्दरके कन्धेपर आरोपित करके वैष्णवाचार्य शिरोमणि श्रीस्वरूप-दामोदर और ठाकुर वृन्दावनदासके श्रीचरणोंमें केवलमात्र अपराधकी ही वृद्धि करते हैं। चैःभाः पन्द्रहवाँ अध्याय— “सबे पर-स्त्री प्रति नाहि परिहास। स्त्री देखिले दूरे प्रभु हन एकपाश॥ 27 ॥ एइमत चापल्य करेन सबा-सने। सबे स्त्री-मात्र नाहि देखेन दृष्टिकोणे॥ 28 ॥ 260 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/276–283 ] 'स्त्री' हेन नाम प्रभु एइ अवतारे। श्रवणो ना करिला-विदित संसारे॥29॥ अतएव यत महामहिम सकले। 'गौराङ्ग-नागर' हेन स्तव नाहि बले॥30॥ यद्यपि सकल स्तव सम्भव ताहाने। तथापिह स्वभावे से गाय बुधगणे॥31॥" "सबके साथ परिहास करनेपर भी महाप्रभु पर-स्त्रीके साथ कभी परिहास नहीं करते थे, स्त्रीको देखकर वे दूरसे ही एक ओर हट जाते थे। इस प्रकार महाप्रभु सबके साथ चपलता करते रहते, किन्तु किसी भी स्त्रीकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते थे। संसारमें प्रसिद्ध है कि इस अवतारमें महाप्रभुने 'स्त्री' नामका भी श्रवण नहीं किया। इसलिये जितने भी महिमाशाली महापुरुष हैं, उनमेंसे किसीने भी महाप्रभुकी स्तुति 'गौराङ्ग-नागर' कहकर नहीं की है। यद्यपि महाप्रभुके लिये सभी प्रकारकी स्तुति सम्भव है, तथापि विद्वान लोग महाप्रभुके तत्त्वके अनुकूल ही उनकी लीलाका कीर्तन करते हैं।" इन तीन पद्योंमें सुस्पष्ट रूपसे भक्तिसिद्धान्त विरोधी दुराचार-पुष्ट कल्पित 'गौराङ्गनागरीवाद' का खण्डन हुआ है।॥276-278॥ स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य रूपोंमें गोपियोंकी प्रीति नहीं :- श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ-गुञ्जा-विभूषण। गोप-वेश, त्रिभङ्गिम, मुरली-वदन॥279॥ इहा छाड़ि' कृष्ण यदि हय अन्याकार। गोपिकार भाव नाहि याय निकट ताहार॥280॥ अनुवाद-जिनका परम सुन्दर रूप श्याम वर्णका है, सिरपर मयूर-पंख है, गलेमें गुञ्जाकी माला है, गोप-वेश है और अधरोंपर मुरली धारणकर त्रिभङ्ग ललित मुद्रामें खड़े हैं-ऐसे रूपको छोड़कर श्रीकृष्णका यदि कोई अन्य आकार हो, तो गोपियोंका उनके प्रति कान्त-भाव स्फुरित नहीं होता॥279-280॥ ललितमाधव (6/14)- गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्। आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि- र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति॥281॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया, जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया। इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय- पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको कौन पण्डित समझ सकता है?॥281॥ अनुभाष्य-सूर्यपत्नी सवर्णाके प्रति विशाखाके वचन,- गोपीनां दुरूहपदवीसञ्चारिणः (दुरूहायां पदव्यां सञ्चरितुं शीलं यस्य तस्य) पशुपेन्द्र-नन्दनजुषः (पशुपेन्द्रस्य गोपराजस्य नन्दस्य नन्दनं सूनुं जुषते सेवते यस्तस्य कृष्णसेवापरस्य) भावस्य तां प्रक्रियां विज्ञातुं (बोद्धुं) कः कृति क्षमते (समर्थवान् भवति)? [यतः] हन्त! जिष्णुभिः (जयशीलैः) चतुर्भिः भुजैः (धृतनारायण विग्रहैः) अद्भुतरुचिं (अद्भुत-रुचिः शोभा यस्याः ताम् अलौकिकीं कान्तिमयीं) वैष्णवीं तनुं आविष्कुर्वति (प्रकटयति सति) तस्मिन् (कृष्णे) अपि यासां (गोपीनां) रागोदयः कुञ्चति (विकाशं न लभते)। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥ रासके समय आत्मगोपनकी इच्छासे श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंको चतुर्भुज प्रदर्शन और संरक्षण :- वसन्तकाले रासलीला करे गोवर्धने। अन्तर्धान कैला सङ्केत करि' राधा-सने॥282॥ निभृतनिकुञ्जे बसि' देखे राधार बाट। अन्वेषिते आइला ताहाँ गोपिकार ठाट॥283॥ अनुवाद-वसन्त ऋतुमें गोवर्धनमें रासके मध्य श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके साथमें एकान्तमें विहारकी इच्छासे उन्हें सङ्केत करके अन्तर्धान हो गये। श्रीकृष्ण सतरहवाँ अध्याय | 261
[ 17/283-293 निभृतनिकुञ्जमें बैठकर राधाजीकी बाट जोहने लगे। श्रीकृष्णको रासमें न देखकर सब गोपियाँ श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई तभी वहाँ आयीं ॥ 283 ॥ अनुभाष्य—'बाट'—वर्त्म अथवा पथ। 'ठाट'—श्रेणीबद्ध सैन्य॥ 283 ॥ दूर हैते देखि' ताँरे बोले गोपीगण। “एइ देख कुञ्जेर भितर व्रजेन्द्रनन्दन ॥"284 ॥ अनुवाद—दूरसे देखकर ही गोपियोंने कहा,—“वह देखो, व्रजेन्द्रनन्दन इसी कुञ्जके भीतर हैं॥"284॥ गोपीगण देखि' कृष्णेर हइल साधवस। लुकाइते नारिल, ताहे हैला विरस ॥ 285 ॥ चतुर्भुज मूर्त्ति करि' आछेन बसिया। कृष्ण देखि' गोपी कहे निकटे आसिया ॥ 286 ॥ अनुवाद—गोपियोंको देखकर श्रीकृष्ण भयभीत हो गये और उनसे छिपना चाहते थे, परन्तु छिपनेको कोई स्थान न देखकर वे विवश हो गये। वे कहीं और जा नहीं सकते थे, इसलिये वहीं चतुर्भुजरूप धारण करके बैठ गये। उन्हें देखकर गोपियाँ उनके निकट आकर कहने लगीं ॥ 285-286॥ अनुभाष्य—'साध्वस'—भय, त्रास, शङ्का, मनका आवेग, सम्भ्रम ॥ 285 ॥ गोपियोंका नारायण-स्तव :- 'इहों कृष्ण नहे, इहों नारायण-मूर्त्ति।' एत बलि' सबे ताँरे करे नति-स्तुति ॥ 287 ॥ “नमो नारायण, देह' करह प्रसाद। कृष्णसङ्ग देह' मोरे, घुचाह विषाद ॥" 288 ॥ एत बलि नमस्करि' गेला गोपीगण। हेनकाले राधा आसि' दिला दरशन ॥ 289 ॥ अनुवाद—'अरे ! ये तो श्रीकृष्ण नहीं हैं, ये तो भगवान् नारायण हैं।' यह कहकर वे सब उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं,—“हे नारायण ! आपको हम नमस्कार करती हैं। आप कृपा करें और हमें श्रीकृष्णका सङ्ग प्रदान करके हमारे हृदयकी विरह-वेदनाको दूर करें।" यह कहकर गोपियोंने उन्हें नमस्कार किया और तभी राधाजी वहाँ उपस्थित हुईं ॥ 287-289 ॥ अनुभाष्य—'मोरे'—हमें ॥ 288 ॥ श्रीमती राधिकाके आगमन-मात्रसे ही चतुर्भुजका अन्तर्धान, द्विभुज-मूर्ति अथवा स्वयंरूप :- राधा देखि' कृष्ण ताँरे हास्य करिते। सेइ चतुर्भुज-मूर्त्ति चाहेन राखिते ॥ 290 ॥ लुकाइला दुइ भुज राधार अग्रेते। बहु यत्न कैला कृष्ण, नारिल राखिते ॥ 291 ॥ अनुवाद—राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूपमें रहकर उनसे परिहास करना चाहते थे, परन्तु बहुत प्रयास करनेपर भी राधाजीके सामने वे उस रूपकी रक्षा नहीं कर सके और उनकी दो भुजाएँ अन्तर्हित हो गयीं ॥ 290-291 ॥ श्रीराधाका अचिन्त्य कृष्णप्रेम :- राधार विशुद्ध-भावेर अचिन्त्य-प्रभाव। ये कृष्णेरे कराइला द्विभुज-स्वभाव ॥ 292 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति राधाजीके विशुद्ध-भावका यह अचिन्त्य प्रभाव है कि उसने श्रीकृष्णको उनके मूल द्विभुजरूपमें आनेपर विवश कर दिया ॥ 292 ॥ श्रीराधाके सामने कृष्ण-चातुर्यकी पराजय, नित्य स्वयंरूप श्यामसुन्दर :- उज्ज्वलनीलमणिमें नायिकाभेद-प्रकरणमें छठे अङ्कमें— रासारम्भाविधौ निलीयवसता कुञ्जे मृगाक्षीगणै- दृष्टं गोपयितुं स्वमुद्धुरधिया या सुष्ठु सन्दर्शिता। राधायाः प्रणयस्य हन्त महिमा यस्य श्रिया रक्षितुं सा शक्या प्रभविष्णुनापि हरिणा नासीच्चतुर्बाहुता ॥ 293 ॥ 262 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/293-299 ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ 293 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रासके आरम्भमें कौतुकवशतः श्रीकृष्ण कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर अपना मनोहर चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने केवल यही कहा, - 'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी आश्चर्यमयी महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये ॥ 293 ॥ अनुभाष्य-[गोवर्द्धनोपत्यकायां परासौलीति ख्यातानाम्नां रासस्थल्यां वसन्तकाले] रासारम्भविधौ (रासस्य आरम्भविधौ प्रवृत्तिकल्पे) कुञ्जे निलोयवसता (संलग्नावस्थितेन) हरिणा (श्रीकृष्णेन) मृगाक्षिगणैः (कुरङ्गनयनाभिः गोपीभिः) [प्रविष्टक-नामारण्ये पेठाख्ये] दृष्टं स्वम् (आत्मानं) गोपयितुं (बह्वीभिस्ताभिः सर्वतः आवृतात् तस्मात् कुञ्जात् सहसापसर्पणासम्भवात्) उद्बुद्धधिया (उत्कृष्टबुद्ध्या) या चतुर्बाहुता सुष्ठु सन्दर्शिता, यस्य (कृष्णप्रणयमहिम्नः) श्रिया प्रहविष्णुना (कृष्णेन) अपि या चतुर्बाहुता रक्षितुं न शक्या आसीत्-हन्त! (भोः!) राधायाः प्रणयस्य महिमा (माहात्म्यम्)- [एतादृगचिन्त्यम्!] (गौतमीये—'गोवर्द्धनगिरौ रम्ये स्थितं रासरसोत्सुकम्।' भगवतोऽपि प्रेमाधीनत्वात् प्रेमणोऽग्रे ऐश्वर्यं न तिष्ठतीति न शक्यते वक्तु तस्य नित्यत्वात्, किन्तु तिरोभवति)। श्लोक भावानुवाद-वसन्तकालमें गोवर्धनके प्रान्तमें रसौली नामक रास-स्थलीमें रासके आरम्भमें कौतुकवशतः श्रीकृष्ण पेठा नामक वनमें एक कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर चातुर्यपूर्वक अपना मनोहर चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने यही कहा,-'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी अचिन्त्य महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये। (गौतमीय-तन्त्रमें-रम्य गोवर्धनमें स्थित रासरसोत्सुक भगवान् श्रीकृष्ण भी प्रेमके अधीन हैं, प्रेमके आगे वे भी अपने नित्य ऐश्वर्यको धारण करनेमें असमर्थ हैं) ॥ 293 ॥
नन्द-जगन्नाथ मिश्र, यशोदा-शची :- सेइ व्रजेश्वर-इहाँ जगन्नाथ पिता। सेइ व्रजेश्वरी-इहाँ शचीदेवी माता ॥ 294 ॥ व्रजके कानाइ-बलाइ-गौड़के गौर-निताइ :- सेइ नन्दसुत-इहँ चैतन्य-गोसाञि। सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द-भाइ ॥ 295 ॥ अनुवाद-वे व्रजेश्वर नन्द महाराज इनके (महाप्रभुके) पिता श्रीजगन्नाथ हैं और वे व्रजेश्वरी यशोदा इनकी माता शचीदेवी हैं। वे नन्दनन्दन ही ये चैतन्य-महाप्रभु हैं और वे श्रीबलदेव ही उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं ॥ 294-295 ॥ मधुररसके अतिरिक्त अन्य रसोंमें श्रीनित्यानन्द-रामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :- वात्सल्य, दास्य, सख्य-तिन भावमय। सेइ नित्यानन्द-कृष्णचैतन्य-सहाय ॥ 296 ॥ प्रेमभक्ति दिया तैं हो भासाल जगते। ताँर चरित्रचित्र लोके ना पारे बुझिते ॥ 297 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु वात्सल्य, दास्य और सख्य-ये तीन भाव महाप्रभुके प्रति रखते हैं और वे सदा महाप्रभुकी लीलाओंमें सहायक हैं। प्रेमाभक्ति प्रदान करके उन्होंने समस्त जगत्को उसमें डुबो दिया है। उनके अलौकिक चरित्रको साधारण लोग समझ नहीं पाते हैं ॥ 296-297 ॥ भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्यका शुद्धभक्ति-प्रचार :- अद्वैत-आचार्य-गोसाञि भक्त-अवतार। कृष्ण अवतारिया कैला भक्तिर प्रचार ॥ 298 ॥ श्रीअद्वैताचार्यकी दो भावोंमें श्रीगौरकृष्णसेवा :- सख्य, दास्य,-दुइ भाव सहज ताँहार। कभु प्रभु करेन ताँरे गुरु-व्यवहार ॥ 299 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाई भक्तावतार हैं, उन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाकर जगत्में भक्तिका प्रचार सतरहवाँ अध्याय | 263
[ 17/298-302 किया है। सख्य और दास्य-ये दो उनके महाप्रभुके प्रति स्वाभाविक भाव हैं, परन्तु महाप्रभु कभी-कभी उन्हें गुरुके समान मानकर व्यवहार करते हैं॥298-299॥ श्रीवासादि शुद्धभक्तोंका दास्य :- श्रीवासादि यत महाप्रभुर भक्तगण। निज निज भावे करेन चैतन्य-सेवन॥300॥ श्रीगदाधर-स्वरूप-रामानन्द-श्रीरूपादि शक्तियोंकी मधुररसमें श्रीगौरकृष्णसेवा :- पण्डित-गोसाञि आदि याँर सेइ रस। सेइ सेइ रसे कृष्ण हय ताँर वश॥301॥ अनुवाद-श्रीवासादि जितने भी भक्त हैं, वे अपने-अपने भावोंके अनुरूप महाप्रभुकी सेवा करते हैं। श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूप, श्रीरूप-सनातनादि गोस्वामीका श्रीकृष्णके प्रति जो-जो भाव है, श्रीकृष्ण उसी भावके द्वारा उन भक्तोंके वशीभूत होते हैं॥300-301॥ अनुभाष्य-इन सब (296-301) पद्योंमें श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी परम चमत्कारमय गौरसेवा-भाव-वैचित्रीके तारतम्यका वर्णन हुआ है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 11-13वें श्लोक)- “भक्तरूपो गौरचन्द्रो यतोऽसौ नन्दनन्दनः। भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः। भक्तावतार आचार्योऽद्वैतो यः श्रीसदाशिवः। भक्ताख्याः श्रीनिवासाद्या यतस्ते भक्तरूपिणः। भक्तशक्तिर्द्विजाग्रण्यः श्रीगदाधरपण्डितः॥11॥ श्रीमद्विश्वम्भराद्वैतनित्यानन्दावधूतकाः । अत्र त्रयः समुन्नेया विग्रहाः प्रभवश्च ते। एको महाप्रभुर्ज्ञेयः श्रीचैतन्यो दयाम्बुधिः। प्रभू द्वौ श्रियुतौ नित्यानन्दाद्वैतौ महाशयौ। गोस्वामिनो विग्रहाश्च ते द्विजश्च गदाधरः। पञ्चतत्त्वात्मका एते श्रीनिवासश्च पण्डितः॥12॥ यदुक्तं तत्र गोस्वामि श्रीस्वरूपपदाम्बुजैः। “त्रयोऽत्र विग्रहा ज्ञेयाः प्रभवश्चात्र ते त्रयः। एको महाप्रभुर्ज्ञेयो द्वौ प्रभु सम्मतौ सताम्॥”13॥ “यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने पञ्चतत्त्वके अर्थका विस्तृत वर्णन किया है, तथापि यहाँपर उसे संक्षेपमें लिखा जा रहा है- जो श्रीनन्दनन्दन हैं, वे ही भक्तरूपमें श्रीगौरचन्द्र हैं। जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। जो सदाशिव हैं, वे ही भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य हैं। श्रीवासादि भक्तवृन्द ही भक्ताख्य अर्थात् शुद्धभक्तके रूपमें प्रसिद्ध हैं। द्विजश्रेष्ठ श्रीगदाधर पण्डित ही भक्तशक्ति हैं। यद्यपि पञ्चतत्त्वके अन्तर्गत आनेवाले श्रीमान् विश्वम्भर, श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत श्रीनित्यानन्द-तीनों ही भगवद्-विग्रह अर्थात् विष्णुत्तत्त्व और महाप्रभावशाली होनेके कारण प्रभु हैं, तथापि इन तीनोंमेंसे दयाके सागर श्रीचैतन्यदेव 'महाप्रभु' तथा श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य 'प्रभु' के नामसे प्रसिद्ध हैं। (भक्तोंके द्वारा) ये गोस्वामी (अर्थात् श्रीचैतन्य गोसाईं, श्रीनित्यानन्द गोसाईं तथा श्रीअद्वैत गोसाईं) के नाम से भी जाने जाते हैं। अन्य दो तत्त्वोंमेंसे श्रीगदाधर 'द्विज' और श्रीनिवास 'पण्डित' के नामसे प्रसिद्ध हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी पादने भी ऐसा ही कहा है कि यद्यपि भगवद्-विग्रह होनेके कारण ये तीनों ही 'प्रभु' हैं, तथापि साधुओंकी सम्मत रीतिके अनुसार उनमेंसे एक 'महाप्रभु' तथा अन्य दोनों 'प्रभु' हैं-ऐसा समझना चाहिये। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 23-24वाँ श्लोक)- “तस्य शिष्योऽभवच्च्छ कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः॥23॥ अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे। श्रीमान् रङ्गपुरी ह्येष वात्सल्ये यः समाश्रितः॥24॥” “श्रीईश्वरपुरी शृङ्गाररसके, श्रीअद्वैतप्रभु दास्य और सख्यरसके एवं श्रीरङ्गपुरी शुद्धवात्सल्यरसके सेवक थे।” चैःचः आदिलीला, 7/10-17 संख्या द्रष्टव्य है॥296-301॥ व्रजमें मुरलीधारी गोपबालक श्यामलीला, गौड़में ब्राह्मण-संन्यासी वेशधारी कीर्तन-विग्रह गौरलीला :- तिँह श्याम,-वंशीमुख, गोपविलासी। इहँ गौर-कभु द्विज, कभु त' संन्यासी॥302॥ 264 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/302-308 ] अनुवाद-व्रजमें वे (श्रीकृष्ण) श्यामवर्णके हैं, उनके मुखपर वंशी सुशोभित होती है और वे गोपबालकके रूपमें विलास करते हैं। [वे ही श्रीकृष्ण] नवद्वीपमें [महाप्रभुके रूपमें] गौर वर्णके हुए हैं, ये कभी ब्राह्मण (गृहस्थ) और कभी संन्यासीकी लीला करते हैं॥ 302 ॥ गोपीभावयुक्त श्रीकृष्णका श्रीगौररूपमें श्रीकृष्णप्रेमास्वादन :- अतएव आपने प्रभु गोपीभाव धरि'। व्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' करि' ॥ 303 ॥ अनुवाद-इसलिये स्वयं महाप्रभुने गोपीभावको अङ्गीकार किया है और वे व्रजेन्द्रनन्दनको अपना 'प्राणनाथ' मानते हैं॥ 303 ॥ रूपानुगजनोंके आनुगत्यके बिना श्रीगौरका विप्रलम्भरस सुदुर्लभ :- सेइ कृष्ण, सेइ गोपी, - परम विरोध। अचिन्त्य चरित्र प्रभुर अति सुदुर्बोध ॥ 304 ॥ अनुवाद-वे ही श्रीकृष्ण हैं और वे ही गोपी हैं, यह तो परस्पर परम विरोधी बात है, परन्तु महाप्रभुके अचिन्त्य चरित्रको समझना अत्यन्त कठिन है॥ 304 ॥ अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 17/276-278 संख्या द्रष्टव्य है॥ 303-304 ॥ श्रीगौरके परमवैचित्र्य-चमत्कारमय अचिन्त्यभाव तर्कसे अतीत :- इथे तर्क करि' केह ना कर संशय। कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति एइ मत हय ॥ 305 ॥ अनुवाद-इसमें तर्क करके कोई संशय मत करो, क्योंकि श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिका प्रभाव इसी प्रकार है॥ 305 ॥ अचिन्त्य, अद्भुत कृष्णचैतन्य-विहार। चित्र भाव, चित्र गुण, चित्र व्यवहार ॥ 306 ॥ तार्किककी दुर्गति- “संशयात्मा विनश्यति" :- तर्के इहा नाहि माने, येइ दुराचार। कुम्भीपाके पचे सेइ, नाहिक निस्तार ॥ 307 ॥ अनुवाद- श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाएँ अचिन्त्य और अद्भुत हैं। उनके भाव, गुण और व्यवहार सभी आश्चर्यजनक हैं। जो दुराचारी कुतर्कसे इसको नहीं मानता, वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है और वहाँसे उसका उद्धार नहीं होता है॥ 306-307 ॥ अनुभाष्य-'कुम्भीपाक'- एक विशेष प्रकारका नरक। पापी व्यक्तिको 'कुम्भी' नामके एक विशेषपात्र में पकाया जाता है। (भाः 5/26/13)- “यस्तिह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचराः कुम्भीपाके तप्ततैल उपरन्धयन्ति ॥" “प्राणियोंका वध करनेवाले जीवको यमराज दण्डके रूपमें कुम्भीपाक नरकमें तप्त तेलमें राँधते हैं॥"307॥ महाभारतमें भीष्मपर्वमें (5/12)- अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ 308 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 308 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृतिसे अतीत जो तत्त्व है, उसका लक्षण ही [प्राकृत इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा वह] अचिन्त्य है। तर्क तो प्राकृत है, इसलिये वह तत्त्वको स्पर्श नहीं कर सकता। इसलिये अचिन्त्यभावोंको समझनेके लिये तर्क मत करो॥ 308 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये सप्तदश परिच्छेद। सतरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य-नदी-पर्वत-वनादि भूतलपर स्थित पदार्थोंके नामोंको श्रवण करनेकी इच्छा होनेपर धृतराष्ट्र उत्तरमें सञ्जयने कहा,- ये भावाः अचिन्त्याः (प्राकृत-भोगमय-चिन्तातीताः) खलु (निश्चयं) तान् अचिन्त्यभावान् तर्केण न योजयेत् (ते हेतुभिः सतरहवाँ अध्याय | 265
[ 17/308-317 न हन्तव्याः इत्यर्थः); यत् च प्रकृतिभ्यः परं (भिन्नम् अतीतम् अप्राकृतमिति यावत्) तत् एव अचिन्त्यस्य लक्षणम्। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥308॥ श्रद्धावान्को ही सेवा-प्राप्ति :- अद्भुत चैतन्यलीलाय याहार विश्वास। सेइ जन याय चैतन्येर पद-पाश॥309॥ अनुवाद—अद्भुत चैतन्यलीलामें जिसका दृढ़ विश्वास है, वही व्यक्ति श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंको प्राप्त कर सकता है॥309॥ प्रसङ्गे करिल एइ सिद्धान्तेर सार। इहा येइ शुने, शुद्धभक्ति हय तार॥310॥ अनुवाद—प्रसङ्गवश मैंने सभी सिद्धान्तोंके सारको कहा है। इसे जो श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके हृदयमें शुद्धभक्ति उदित होती है॥310॥ पुनरावृत्ति :- लिखित ग्रन्थेर यदि करि अनुवाद। तबे से ग्रन्थेर अर्थ पाइबे आस्वाद॥311॥ अनुवाद—लिखित ग्रन्थका यदि अन्तमें संक्षेपरूपमें वर्णन किया जाय, तो ग्रन्थके सभी विषयोंका एक साथ आस्वादन किया जा सकता है॥311॥ भागवतमें श्रीव्यास-रीतिके अनुसार अध्याय-वर्णन :- अतएव भागवते व्यासेर आचार। कथा कहि' अनुवाद करे बार बार॥312॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमद्भागवतमें श्रीव्यासदेवका ऐसा ही आचरण देखा जाता है। उन्होंने श्रीमद्भागवतके शेषमें उसके विषयका पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है॥312॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने श्रीमद्भागवतके अन्तमें बारहवें स्कन्धके बारहवें अध्यायमें बावन श्लोकोंमें प्रारम्भसे अन्त तक सम्पूर्ण भागवतको जिस प्रकार प्रतिछायारूपमें (संक्षेपमें) वर्णन करके ग्रन्थ समाप्त किया है, उन महाजनके द्वारा प्रदर्शित पथका अनुसरण करते हुये ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास) ने भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी आदिलीलाको संक्षेपरूपमें पुनः वर्णन किया है॥312॥ संक्षेपमें अध्यायोंमें वर्णित विषयोंकी पुनरावृत्ति :- ताते आदिलीलार करि परिच्छेद गणन। प्रथम परिच्छेदे कैलुँ 'मङ्गलाचरण'॥313॥ अनुवाद—इसलिये मैं भी आदिलीलाके सभी अध्यायोंके विषयोंकी सूची गणना कर रहा हूँ। पहले अध्यायमें मैंने 'मङ्गलाचरण' किया गया है॥313॥ द्वितीय परिच्छेदे 'चैतन्यतत्त्व-निरूपण'। स्वयं भगवान् येइ व्रजेन्द्रनन्दन॥314॥ तेंहो त' चैतन्य-कृष्ण-शचीर नन्दन। तृतीय परिच्छेदे जन्मेर् 'सामान्य' कारण॥315॥ तहिँ मध्ये प्रेमदान-'विशेष' कारण। युगधर्म-कृष्णनाम-प्रेम-प्रचारण॥316॥ अनुवाद—दूसरे अध्यायमें चैतन्यतत्त्वका निरूपण किया है। व्रजेन्द्रनन्दन जो स्वयं भगवान् हैं, वे ही तो शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। तीसरे अध्यायमें उनके जन्मका 'सामान्य' कारण कहा है, उसके मध्यमें प्रेमदानको विशेष कारण बतलाया है। श्रीकृष्णनाम और उसके द्वारा प्रेमका प्रचाररूपी युगधर्मका भी इस अध्यायमें वर्णन हुआ है॥314-316॥ चतुर्थे कहिलुँ जन्मेर् 'मूल' कारण। स्वमाधुर्य-प्रेमानन्दरस-आस्वादन॥317॥ अनुवाद—चौथे अध्यायमें महाप्रभुके जन्मका 'मूल' कारण अपने माधुर्य और प्रेमानन्दरसके आस्वादनको कहा है॥317॥ 266 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/318-327 ] पञ्चमे 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्व निरूपण। नित्यानन्द हैला राम रोहिणीनन्दन ॥ 318 ॥ अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्वका निरूपण हुआ है, रोहिणीनन्दन श्रीबलराम ही अब श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ 318 ॥ षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत-तत्त्वे'र विचार। अद्वैत-आचार्य-महाविष्णु-अवतार ॥ 319 ॥ अनुवाद—छठे अध्यायमें 'श्रीअद्वैत-तत्त्व' का विचार हुआ है। श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णुके अवतार हैं॥ 319 ॥ सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वे'र आख्यान। पञ्चतत्त्व मिलि' यैछे कैला प्रेमदान ॥ 320 ॥ अनुवाद—सातवें अध्यायमें 'पञ्चतत्त्व' का वर्णन है। इन पाँच-तत्त्वोंने मिलकर कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका दान किया, इसका वर्णन हुआ है॥ 320 ॥ अष्टमे 'चैतन्यलीला-वर्णन'-कारण। एक कृष्णनामेर महा-महिमा-कथन ॥ 321 ॥ अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने श्रीचैतन्यचरितामृत लिखनेका कारण कहा है। इसी अध्यायमें श्रीकृष्णनामकी महामहिमाकी कथा भी वर्णित है॥ 321 ॥ नवमेते 'भक्तिकल्पवृक्षे'र वर्णन'। श्रीचैतन्य-माली कैला वृक्ष आरोपण ॥ 322 ॥ अनुवाद—नौवें अध्यायमें 'भक्तिकल्पवृक्ष' का वर्णन है। श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी मालीने इस वृक्षका आरोपण किया है॥ 322 ॥ दशमेते मूल-स्कन्धेर 'शाखादि-गणन'। सर्वशाखागणेर यैछे फल-वितरण ॥ 323 ॥ अनुवाद—दसवें अध्यायमें इस भक्तिकल्पवृक्षके मूल स्कन्धकी शाखाओं-उपशाखाओंकी गणना हुई है और उनके द्वारा प्रेमरूपी फलके वितरणका वर्णन हुआ है॥ 323 ॥ एकादशे 'नित्यानन्दशाखा-विवरण'। द्वादशे 'अद्वैतस्कन्ध शाखार वर्णन' ॥ 324 ॥ अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्दशाखा' का विवरण और बारहवें अध्यायमें 'श्रीअद्वैतस्कन्धकी शाखा' का वर्णन हुआ है॥ 324 ॥ त्रयोदशे महाप्रभुर 'जन्म-विवरण'। कृष्णनाम-सह यैछे प्रभुर जनम ॥ 325 ॥ अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें महाप्रभुके 'जन्मका विवरण' हुआ है और कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णनामके कीर्तनके साथ महाप्रभुका जन्म हुआ॥ 325 ॥ चतुर्दशे 'बाल्यलीला'र किछु विवरण। पञ्चदशे 'पौगण्डलीला'र सङ्क्षेपे कथन ॥ 326 ॥ अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें कुछ 'बाल्यलीला' का वर्णन हुआ है और पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुकी 'पौगण्डलीला' का संक्षेपमें वर्णन किया है॥ 326 ॥ षोड़शे कहिलुँ 'कैशोरलीला'र उद्देश। सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ विशेष ॥ 327 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुकी 'कैशोरलीला' के उद्देश्यको बतलाया है। सतरहवें अध्यायमें 'यौवनलीला' का विशेष वर्णन किया है॥ 327 ॥ अनुभाष्य—313से 327पयर संख्यामें अध्यायोंकी गणना लिखी है— पहले अध्यायमें-गुरु आदिके वन्दनरूपी मङ्गलाचरण। दूसरे अध्यायमें-गौरतत्त्वनिर्देश मङ्गलाचरण। तीसरे अध्यायमें-अवतारका सामान्य कारण; प्रेमदान। सतरहवाँ अध्याय | 267
[ 17/313–334 चौथे अध्यायमें—अवतारका मूलकारण। पाँचवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्दतत्त्व-निरूपण। छठे अध्यायमें—श्रीअद्वैततत्त्व-निर्देश। सातवें अध्यायमें—पञ्चतत्त्व-निर्देश और प्रचार। आठवें अध्यायमें—उपक्रमणिका और नाम-महिमा। नौवें अध्यायमें—भक्तिकल्पवृक्ष-वर्णन-प्रचार। दसवें अध्यायमें—गौरगणोंकी गणना। ग्यारहवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंकी गणना। बारहवें अध्यायमें—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीगदाधरगणोंकी गणना। तेरहवें अध्यायमें—गौरजन्मलीला। चौदहवें अध्यायमें—बाल्यलीला। पन्द्रहवें अध्यायमें—पौगण्डलीला। सोलहवें अध्यायमें—कैशोरलीला। सतरहवें अध्यायमें—यौवनलीला ॥ 313-327 ॥ एइ सप्तदश प्रकार 'आदि-लीला'र प्रबन्ध। द्वादश प्रबन्ध, ताते ग्रन्थ-मुखबन्ध ॥ 328 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सतरह अध्यायोंमें 'आदिलीला' का वर्णन है, इनमेंसे पहले बारह अध्यायोंमें आदिलीलाकी भूमिका है॥ 328 ॥ पञ्चप्रबन्धे पञ्चवयस चरित। संक्षेपे कहिलुँ अति,—ना कैलुँ विस्तृत ॥ 329 ॥ वृन्दावनदास इहा 'चैतन्यमङ्गले'। विस्तारि' वर्णिला नित्यानन्द-आज्ञा-बले ॥ 330 ॥ अनुवाद—शेष पाँच अध्यायोंमें महाप्रभुकी पाँच विभिन्न अवस्थाके अनुरूप (जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन) लीला-चरित्रका वर्णन है। मैंने आदिलीला अति संक्षेपमें कही है, इसे विस्तारमें नहीं कहा है, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञाके बलपर श्रीवृन्दावनदासने 'चैतन्यमङ्गल' में इनका विस्तारसे वर्णन किया है॥ 329-330 ॥ अनुभाष्य—आदिलीलामें सतरह अध्याय अथवा प्रबन्ध हैं, उनमेंसे पहले बारह अध्याय ग्रन्थकी भूमिका अथवा उपक्रमणिका मात्र हैं। बादके तेरहसे सतरह अध्याय तक 'जन्म', 'बाल्य', 'पौगण्ड', 'कैशोर' और 'युवा',— पाँच प्रकारकी अवस्थाकी कथा पाँच प्रबन्धोंके रूपमें पाँच अध्याय हैं॥ 329 ॥ श्रीगौरलीला अपार :— श्रीकृष्णचैतन्यलीला—अद्भुत, अनन्त। ब्रह्मा-शिव-शेष याँर नाहि पाय अन्त ॥ 331 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यलीला तो अद्भुत-अनन्त है, जिसका ब्रह्मा-शिव-शेषादि भी अन्त नहीं पा पाते ॥ 331 ॥ अनुभाष्य—चैःचः मध्यलीला, 21/10,12 संख्या और भागवत 2/7/41 एवं 10/14/7 आदि श्लोक द्रष्टव्य हैं ॥ 331 ॥ श्रीगौरलीलाके श्रवण-कीर्तनकारीको चरम मङ्गलकी प्राप्ति :— येइ येइ अंश कहे, येइ शुने धन्य। अचिरे मिलिबे तारे श्रीकृष्णचैतन्य ॥ 332 ॥ अनुवाद—जो उस अनन्त लीलाके जिस भी अंशको कहेगा अथवा जो उसे सुनेगा, उसे अति शीघ्र ही श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥ 332 ॥ श्रीकृष्णचैतन्य, अद्वैत, नित्यानन्द। श्रीवासादि गदाधरादि यत भक्तवृन्द ॥ 333 ॥ वृन्दावनवासी भक्तोंकी वन्दना :— यत यत भक्तगण कैसे/बैसे वृन्दावने। नम्र हञा शिरे धरौँ ताँहार चरणे ॥ 334 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य; तथा श्रीवासादि और श्रीगदाधरादि जितने भक्त हैं तथा जो-जो भक्त वृन्दावनमें वास कर रहे हैं, अति विनीत भावसे मैं उन सबके चरणकमलोंमें अपने शीशको नत करता हूँ॥ 333-334 ॥ 268 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/335-336 ] श्रीगुरु-प्रणाम :- कृपाकी आशा रखकर यह कृष्णदास चैतन्यचरितामृतका गान कर रहा है॥ 335-336॥ श्रीस्वरूप-श्रीरूप-श्रीसनातन। श्रीरघुनाथदास, आर श्रीजीव-चरण॥ 335॥ अनुभाष्य-‘श्रीस्वरूप’-श्रीदामोदर-स्वरूप; चैःचः मध्यलीला, 10/102-127संख्या और अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 335॥ शिरॆ धरि वन्दौँ, नित्य करौँ ताँर आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 336॥ इति अनुभाष्ये सप्तदश परिच्छेद। सतरहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे यौवनलीलासूत्र-वर्णनं नाम सप्तदशपरिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें यौवनलीलासूत्र-वर्णन नामक सतरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामीके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण करते हुए, उनकी वन्दना करते हुए और नित्य उनकी इति आदिलाीला समाप्ता॥ यह आदिलाीला समाप्त हुई॥ सतरहवाँ अध्याय | 269
270 | श्रीचैतन्यचरितामृत
श्लोक सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण] अद्वैताऽङ्घ्यब्जभृङ्गांस्तान् 12/1 | ज्ञानतः सुलभा मुक्ति 8/17 | पौगण्ड-लीला चैतन्य 15/4 अचिन्त्याः खलु ये भावा 17/308 | तं श्रीमत्कृष्णचैतन्यदेवं 9/1 | प्रकृतिभ्यः परं यच्च 17/308 अनुवादमनुक्त्वा तु न 16/58 | तदश्मसारं हृदयं 8/25 | प्रसभं नर्त्तते चित्रं 8/1 अमानिना मानदेन 17/31 | तया हि सहितः सर्वान् 15/27 | प्राणिनामुपकाराय यदेवेह 9/43 अम्बुजमम्बुनि जातं 16/82 | तल्लीलावर्णने योग्यः सद्यः 13/1 | प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय 9/42 अश्वमेधं गवालम्भं 17/164 | तस्य श्रीकृष्णचैतन्य 11/4 | प्रेमनाम-प्रदानैश्च गौरो 17/4 अस्त्वेवमङ्ग भजतां 8/19 | तृणादपि सुनीचेन तरोरिव 17/31 | ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं 17/78 अहो एषां वरं जन्म 9/46 | त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरो 14/15 | मयानुमोदितः सोऽसौ 14/69 आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि 17/281 | दाता भोक्ता तत्फलानां 9/6 | महत्त्वं गङ्गायाः 16/41 ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः 11/4 | देवेरेण सुतोत्पत्तिं कलौ 17/164 | मालाकारः स्वयं कृष्ण 9/6 एतावज्जन्मसाफल्यं देहिना 9/42 | द्वितीय-श्रीलक्ष्मीविव 16/41 | मुरभिदि तद्विपरीतं पाद 16/82 ओतं प्रोतमिदं यस्मिन् 13/77 | न गृहं गृहमित्याहुः 15/27 | यवनाः सुमनायन्ते कृष्ण 17/1 कथञ्चन स्मृते यस्मिन् 14/1 | नत्वाखिलान् तेषु मुख्या 11/1 | यस्यां श्रीकृष्णचैतन्यो 13/19 कथञ्चिदाश्रयाद् येषां 10/1 | न विक्रियेताथ यदा 8/25 | यस्यानुकम्पया श्वापि 9/1 कर्मणा मनसा वाचा 9/43 | न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो 17/76 | यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्य 8/58 कलौ नास्त्येव नास्त्येव 17/21 | न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् 16/58 | रसालङ्कारवत् काव्यं 16/71 कुमनाः सुमनस्त्वं हि 15/1 | ना साधयति मां योगो 17/76 | राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां 8/19 कृपासुधा-सरिद्व्यस्य 16/1 | नित्यानन्द-पदाम्भोज 11/1 | राधायाः प्रणयस्य हन्त 17/293 क्वाहं दरिद्रः पापीयान् 17/78 | नीचगैव सदा भाति 16/1 | रासारम्भविधौ निलीय 17/293 गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दन 17/281 | नैतच्चित्रं भगवति 13/77 | लक्ष्म्यार्च्चितोऽथ वाग्देव्या 16/3 जीयात् कैशोर-चैतन्यो 16/3 | पञ्चदीर्घः पञ्चसूक्ष्मः 14/15 | लौकिकीमपि तामीश 14/5
वन्दे चैतन्यकृष्णस्य 14/5 | शाखारूपान् भक्तगणान् 10/7 | सुजनस्येव येषां वै 9/46 वन्दे चैतन्यदेवं तं भगवन्तं 8/1 | श्रीचैतन्यपदाम्भोज 10/1 | सुमनोऽर्पणमात्रेण तं 15/1 वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य 10/7 | श्रीचैतन्यामरतरोर्द्वितीय 12/3 | सेयं साधनसाहस्रैर्हरि 8/17 वन्दे स्वैराद्भुतेहं तं 17/1 | श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखा 12/3 | स्याद्वपुः सुन्दरमपि 16/71 विद्यारम्भमुखा पाणिग्रहणा 15/4 | सङ्कल्पो विदितः साध्यो 14/69 | हरावभक्तस्य कुतो 8/58 विद्या-सौन्दर्य-सद्देश 17/4 | स प्रसीदतु चैतन्यदेवो 13/1 | हरेर्नाम हरेर्नाम हरे 17/21 विस्मृते विपरीतं स्यात् 14/1 | सर्वसद्गुणपूर्णां तां 13/19 | हित्वाऽसारान् सारभृतो 12/1
272 | श्रीचैतन्यचरितामृत
प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण] अ अतएव दुइगणे दुँहार 11/15 अनन्तदास, कानुपण्डित 12/61 अतएव प्रभु ताँरे बले 13/78 अनन्त नित्यानन्दगण-के 11/57 अङ्के लञा शची ताँरे 14/10 अतएव पुनः कहों 8/13 अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्ड 17/105 अङ्गसेवा गोविन्देर दिलेन 10/141 अतएव बाल्यलीला संक्षेपे 14/96 अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा 11/59 अञ्जलि अञ्जलि भरि' 9/30 अतएव भज, लोक, चैतन्य 8/43 अनायासे पाइल सेइ 12/74 अ-कलङ्क गौरचन्द्र 13/91 अतएव भागवते व्यासेर 17/312 अनायासे भवक्षय, कृष्णेर 8/28 अकिञ्चन प्रभुर प्रिय 10/66 अतएव 'विश्वरूप' नाम 13/76 अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि 10/85 अक्रूर बलि' प्रभु याँरे 10/76 अतएव शब्दालङ्कार 16/75 अनुपम वल्लभ, श्रीरूप 10/84 अग्नि उल्का मोर मुखे 17/189 अतएव सब फल देह' 9/39 अन्तरीक्षे देवगण 13/106 अचिन्त्य, अद्भुत कृष्ण 17/306 अतएव 'हरि' 'हरि' बले 13/24 अन्तरे ईश्वर-चेष्टा, बाहिरे 11/10 अचिन्त्य चरित्र प्रभुर 17/304 अतएव हिन्दुमात्र ना करे 17/159 अन्तरे जानिला प्रभु 16/22 अचिरे मिलिबे तारे 17/332 अतएव हैल ताँर 13/25 अन्तरे विस्मित शची 14/30 अच्युतानन्द-अद्वैत 10/150 अतिथि-विप्रेर अन्न खाइल 14/37 अन्तर्धान कैला सङ्गेत 17/282 अच्युतानन्द-प्राय, चैतन्य 12/75 अत्यन्त विरक्त, सदा 11/31 अन्न-जल त्याग कैल 10/98 अच्युतानन्द-बड़ शाखा 12/13 'अद्भुतगुणा'-एइ पुनराय 16/66 अन्यथा ये माने, तार 17/25 अट्ट अट्ट हासे, करे 17/180 अद्भुत चैतन्यलीलाय याहार 17/309 अन्य लोक नाहि जाने 17/87 अतएव अवश्य आमि 17/265 अद्यापि याँहार कृपा-महिमा 11/11 अन्वेषिते आइला ताहाँ 17/283 अतएव आदिखण्डे 13/18 अद्यापिह देख चैतन्य 8/22 अपत्य-विरहे मिश्रेर 13/73 अतएव आपने प्रभु 17/303 अद्वैत आचार्य, आर पण्डित 13/55 अपरश याय गोसाञि 10/142 अतएव आमि आज्ञा 9/36 अद्वैत-आचार्येर स्थाने 13/63 अपराध नाहि, कैले लोकेर 17/97 अतएव गोवध करे बड़ 17/158 अद्वैत-आचार्य-गोसाञि 17/298 अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल 12/86 अतएव गोवध केह ना 17/163 अद्वैत-आचार्य-भार्या 13/111 अयाचित-वृत्ति, किम्बा 17/29 अतएव जरद्गव मारे 17/161 अद्वैत-आचार्य-महाविष्णु 17/319 अलङ्कार नाहि पड़, नाहि 16/92 अतएव तटे रहि' चाकि 12/94 अद्वैत पाइल विश्वरूप 17/10 अलौकिक ऐछे प्रभुर 10/59 अतएव ताँ-सबार वन्दिये 12/92 अध्ययन-लीला प्रभुर दास 15/7 अलौकिक प्रेम ताँर 11/24 अतएव ताँ-सबारे करि' 10/6 अनन्त आचार्य, कविदत्त 12/80 अलौकिक वृक्ष करे 9/32 अतएव दण्ड करि' 12/35 अनन्त चैतनलीला क्षुद्र 13/44 अल्पकाले हैला पञ्जी 15/6 अतएव दिङमात्र इहाँ 15/33 अनन्त चैतन्यभक्त ना 10/121 अल्प दिने द्वादश-फला 14/94
[ अवतीर्ण-आर
अवतीर्ण हैते मने 13/52 अवश्य पाइबे तबे 17/33 अविचार काव्ये अवश्य 16/85 अविचारे देह दोष 14/29 'अविमृष्ट-विधेयांश'-एइ 16/61 'अविमृष्ट-विधेयांश'-दुइ 16/55 अष्ट कन्या क्रमे हैल 13/72 अष्टमास रहिल भिक्षा देन 10/156 अष्टमे चैतन्यलीला-वर्णन' 17/321 अष्टादश वत्सर रहिला 13/13 अष्ठि-वल्कल नाहि 17/85 असंख्य अनन्त गण 11/7 असंख्य अद्वैत-शाखा 12/65 असंख्य भक्तेर कराइला 13/62 असह्य वेदना, दुःखे ज्वलये 17/46 असाररे नामे इँहा नाहि 12/11
आ
आँखि मुदि' काँपि आमि 17/182 आउलाय सकल अङ्ग 8/23 आकाशे उड़िया याङ, पाङ 10/20 आगे अवतारिल ये गुरु 13/53 “आगे केन इहा, माता 14/33 आगे ता' करिब, शुन 9/20 आगे विस्तारिया ताहा 10/104 आगे सम्प्रदाये नृत्य करे 17/136 आचार्य कहे,–“इहाके 12/47 आचार्य-गोसाञि मने 12/53 आचार्य गोसाञि याँरे 10/44 आचार्य गोसाञिर शिष्य 8/70 आचार्य-गोसाञिरे प्रभु करे 17/66 'आचार्यरत्न'-नाम धरे 10/12 आचार्यरत्न, विद्यानिधि 13/55 आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति 11/42 आचार्य-व्यवहार सब 12/28 आचार्यरत्न, श्रीनिवास 13/102 आचार्यरत्न, श्रीनिवास 13/108 आचार्यरत्नेर नाम 10/13 आचार्य शेखर ताँरे 17/118 आचार्य-स्थाने मातार 17/71 आचार्येर अभिप्राय 12/54 आचार्येर आज्ञा पाञा 13/111 आचार्येर आर पुत्र 12/27 आचार्येर दुःखे वैष्णव 12/24 आचार्येर मत येइ, सेइ 12/10 आचार्येर लज्जा-धर्म 12/49 आचार्येरे स्थापियाछे करिया 12/34 आजन्म आज्ञाकारी तेंहो 10/74 आजन्म निमग्न नित्यानन्देर 11/39 आजन्म सेविला तेंहो 12/13 आजि आमि क्षमा करि' 17/127 आजि ताँरे निवेदिब, करि' 16/96 आजि दिन भाल,–करिब 14/18 आजि बासा' याह, कालि 16/104 आज्ञा पाञा मिश्र कैल 16/17 आज्ञामाला पाञा आमार 8/77 आटचल्लिश वत्सर 13/8 आत्म-इच्छामृते वृक्ष सिञ्चि 9/38 आत्मपवित्रता-हेतु लिखिलाङ 1/57 आत्म लुकाइते प्रभु 14/33 आत्मवृत्ति करि' करे कुटुम्ब 10/50 आदिलीला-मध्ये प्रभुर 13/15 आदिलीला-सूत्र लिखि 13/51 आधुनिक आमार शास्त्र 17/169 आनन्दे विह्वल मन 13/102 आनन्दित हञा आइल 12/43 आनन्दित हञा सबे 12/26 आनिया नैवेद्य तारा 14/60 आपन-इच्छाय कैल 17/89 आपना शोधिते कहि 11/7 आपनि चन्दन परि' 14/51 आपनि निरभिमानी, अन्ये 17/26 आपने चैतन्यमाली स्कन्ध 9/11 आपने दुइ भाइ हैला 17/229 आपने महाप्रभु गाय याँर 10/18 आमाके प्रणति करे, हय 17/263 आमा देखि' लुकाइला 17/145 आमा सबार पक्षे इहा 14/53 आमा हैते प्रसादपात्र 12/44 आमार महिमा देख, ब्राह्मण 17/42 आमार लिखन येन शुकेर 8/78 आमार हृदय हैते गेला 13/85 आमारे पूजिले पाबे 14/66 आमारेह कभु येइ 12/45 आमि कहि,–'आमार 15/19 आमि त' करिब 15/15 आमि ना लओयाइले 17/261 आमि ना शिखाले 14/87 आमि बालक,–संन्यासेर 15/19 आम्रमहोत्सव प्रभु करे 17/88 आर अर्थालङ्कार आछे 16/78 आर एक दोष आगे 16/61 “आर एक प्रश्न करि 17/172 आर एक विप्र आइल 17/60 आर कोन उपाय नाहि 17/267
274 | श्रीचैतन्यचरितामृत