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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

दूसरा अध्याय कथासार-इस दूसरे अध्यायमें ग्रन्थकारने महाप्रभुके अन्तिम बारह वर्षोंकी भावास्वादन-लीलाओंका सूत्ररूपमें वर्णन किया है और बीचमें संस्कृत श्लोक उद्धृत करनेके कारण उनकी व्याख्या भी की है। इन गम्भीर भावोंके तत्त्वको लोग आसानीसे समझ नहीं सकते। इस ग्रन्थमें वर्णित श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंके वर्णनको सुनते-सुनते आसानीसे भावतत्त्व जीवोंके हृदयमें उदित होगा। कविराज गोस्वामीने बहुत वृद्धावस्थामें इस ग्रन्थको लिखा था। उन्हें भय था कि कहीं यह ग्रन्थ अधूरा न रह जाय, इसलिये भक्तोंके उपकारके लिये उन्होंने अन्त्यलीलाके सूत्रोंको इस अध्यायमें संग्रह किया है। कविराज गोस्वामीने कहा है,— श्रीस्वरूप-गोस्वामीका मत ही भजनके सम्बन्धमें प्रधान मत है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उनकी कृपासे उनके द्वारा रचित कड़चा कण्ठस्थ कर लिया था। श्रीस्वरूपके अन्तर्धान होनेके बाद श्रीरघुनाथदास गोस्वामी व्रजमें आये। कविराज-गोस्वामी व्रजमें आकर श्रीरूप और श्रीरघुनाथसे मिले और उनकी कृपासे उस कण्ठस्थ कड़चाके तात्पर्यको समझकर इस ग्रन्थकी रचना की। -(अमृतप्रवाह भाष्य) महाप्रभुके कृष्ण विरह-प्रलापादिका वर्णन :— विच्छेदेऽस्मिन् प्रभोरन्त्यलीला-सूत्रानुवर्णने। गौरस्य कृष्णविच्छेदप्रलापाद्यनुवर्ण्यते॥1॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुकी अन्त्यलीला सूत्ररूपमें वर्णन करते हुए इस अध्यायमें उनके श्रीकृष्ण-विरह-प्रलाप आदिका वर्णन किया है॥1॥ अनुभाष्य- अस्मिन् विच्छेदे (श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यलीलायां द्वितीयपरिच्छेदे) प्रभोः (श्रीचैतन्यदेवस्य) अन्त्यलीलासूत्रानुवर्णने (संन्यासचरित्रसूत्र-प्रतिसंक्रमणे विषये) गौरस्य (गोपीभावाश्रितस्य भगवतो महाप्रभोः) कृष्णविच्छेदप्रलापादिः (निजकान्त- विरहजन्योन्मत्तवाक्यादिः) अनुवर्ण्यते (मया लिख्यते)। श्लोक-भावानुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यलीलाके दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्यदेवके संन्यासचरित्रके विषयमें गोपीभावाश्रित महाप्रभुके निजकान्त विरहजनित उन्मत्त- वाक्यादिको मैं लिख रहा हूँ॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर भक्तोंकी जय हो॥2॥ अन्तके बारह वर्षोंमें महाप्रभुका कृष्णविरह :- शेष ये रहिल प्रभुर द्वादश वत्सर। कृष्णेर वियोग-स्फूर्त्ति हय निरन्तर॥3॥ अनुवाद-अन्तिम बारह वर्षोंमें महाप्रभु निरन्तर श्रीकृष्णका वियोग और वियोगमें उनकी स्फूर्ति अनुभव करते थे॥3॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'वियोग'-विच्छेद, विरह॥3॥ उद्धवके दर्शनसे श्रीराधिकाभावमय महाप्रभु :- श्रीराधिकार चेष्टा येन उद्धव-दर्शने। एइमत दशा प्रभुर हय रात्रि-दिने॥4॥ निरन्तर हय प्रभुर विरह-उन्माद। भ्रममय चेष्टा सदा, प्रलापमय वाद॥5॥ । 51

[ 2/4-6 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-उद्धवजीके दर्शनसे जैसी श्रीमती राधिकाकी चेष्टाएँ हुई थी, वैसी ही दशा महाप्रभुकी भी दिन-रात रहती थी। महाप्रभु सब समय श्रीकृष्ण-विरहमें उन्मादित रहते थे, इस कारण उनकी सभी क्रियाएँ भ्रमित व्यक्तिकी भाँति होती थीं और वे प्रलापमय (बाहरसे पागलोंके जैसे, परन्तु वास्तविकतामें नहीं) वाक्य बोलते थे॥ 4-5॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वाद'-वाक्य॥ 5॥ अनुभाष्य- 'भ्रममय चेष्टा'-उद्घूर्णा। 'प्रलापमय वाद'-चित्रजल्पादि दस प्रकारके प्रलापमय वाक्य॥ 5॥ अमृतानुकणिका-“महाप्रभु सब समय कृष्णके विरहमें उन्मादित रहते थे, उनकी भ्रममय चेष्टाएँ और वाक्य प्रलापमय होते थे। 'भ्रममय चेष्टा'-श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं, परन्तु श्रीमती राधिका सोच रही हैं कि वे अभी गोचारण करके आयेंगे। अब उनको यह भ्रम हो गया कि श्रीकृष्ण मथुरा नहीं गये हैं, अभी ब्रजमें ही हैं। अथवा श्रीकृष्णके मथुरा जानेपर भी वे उस बातको भूल गयीं और उनसे मिलनेके लिये कुञ्जमें जा रही हैं। वहाँपर श्रीकृष्णके लिये सज्जादि सजा रही हैं, थोड़ी देरके बादमें देखती हैं कि श्रीकृष्ण नहीं आये। वे मार्ग देखते-देखते रह गयीं और श्रीकृष्ण नहीं आये, तब वे रोने लगीं। थोड़ी देरमें उन्होंने आकाशकी ओर देखा और वहाँ नील मेघको देखकर उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई। तब उन्हें लगा कि श्रीकृष्ण आ गये हैं और देरीसे आनेपर क्षमा याचना कर रहे हैं। परन्तु राधाजी उस मेघको श्रीकृष्ण समझकर उसको गर्जन-तर्जन करने लगीं। थोड़ी देर बादमें जब देखा कि मेघ अन्तर्धान हो गया, तो अब उनका वह भाव दूर हो गया और अब कलहान्तरिताके रूपमें, कलह करनेके बादमें जब श्रीकृष्ण चले गये, तब उनके लिये रोने लगीं और हाय-हाय करने लगीं। 'कलहान्तरिता नायिका' (उःनीः 5/87)- “या सखीनां पुरः पादपतितं वल्लभं रुषा। निरस्य पश्चात्तपति कलहान्तरिता हि सा। अस्याः प्रलाप-संताप-ग्लानि-निःश्वसितादयः॥” “जो नायिका सखियोंके सामने अपने चरणोंमें झुके वल्लभको परित्यागकर पीछे अत्यन्त अनुताप अनुभव करती है, उसे कलहान्तरिता कहा जाता है। प्रलाप, सन्ताप, ग्लानि, दीर्घनिःश्वास-त्याग आदि कलहान्तरिता नायिकाओंकी चेष्टाएँ हैं।” ऐसी चेष्टाएँ ही 'भ्रममय-चेष्टा' कहलाती हैं और इन्हींमें प्रलापमय वाक्य बोले जाते हैं। जो व्यक्ति वहाँ नहीं है, उसको देखकर उससे बातचीत करना और जो बात नहीं है, वही कहना 'प्रलापमयवाद' है। (उःनीः अनुः प्रः 11/87-88)- 'प्रलाप:' - व्यर्थालापः प्रलापः स्यात्॥ 87॥ करोति नादं मुरली रली रली व्रजाङ्गनाहन्मथनं थनं थनम्। ततो विदूना भजते जते जते हरे भवन्तं ललिता लिता लिता॥ 88॥ अर्थात् 'प्रलाप'-व्यर्थ आलापको प्रलाप कहते हैं। मधुपानसे उन्मत्ता श्रीराधा श्रीकृष्णसे कह रही हैं,-“हे कृष्ण! मैं जानती हूँ कि तुम्हारी मुरली 'रली-रली' व्रजाङ्गनाओंके हृदयको मन्थन 'थन-थन' शब्द प्रकाश करती है और इसीलिए ललिता 'लिता-लिता' दुःखी होकर तुम्हारा भजन 'जन-जन' कर रही है।” यहाँ 'रली-रली, थन-थन, जते-जते, लिता-लिता, जन-जन' आदि शब्द निरर्थक हैं।”-श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 5॥ महाप्रभुका विप्रलम्भ महाभाव :- लोमकूपे रक्तोद्गम, दन्त सब हाले। क्षणे अङ्ग क्षीण हय, क्षणे अङ्ग फूले॥ 6॥ अनुवाद-उनके लोमकूपोंसे रक्त बहता था, उनके दाँत सब ढीले होकर हिलते थे। एक क्षणमें उनका शरीर पतला हो जाता और दूसरे क्षणमें फूलकर मोटा हो जाता था॥ 6॥ 52 ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण है:

दूसरा अध्याय 2/6-15 ]


अमृतप्रवाह भाष्य—'हाले'—हिलने लगे ॥ 6 ॥ गम्भीरा-भितरे रात्रे नाहि निद्रा-लव। भित्ते मुख-शिर घषे, क्षत हय सब ॥ 7 ॥ अनुवाद— वे 'गम्भीरा' में रहते थे और रातमें एक क्षणके लिये भी उन्हें नींद नहीं आती थी। विरहमें व्याकुल होकर वे अपना मुख और सिर दीवारोंसे घिसते थे, जिससे उनमें घाव हो जाते ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'गम्भीरा'—बरामदेके बाद जो घर होता है, उसके भीतर जो छोटासा कमरा होता है, उसे 'गम्भीरा' कहते हैं ॥ 7 ॥ तिन द्वारे कपाट, प्रभु यायेन बाहिरे। कभु सिंहद्वारे पड़े, कभु सिन्धुनीरे ॥ 8 ॥ अनुवाद— गम्भीराके तीनों द्वार बन्द कर देनेपर भी वे वहाँसे निकल जाते और कभी श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरके सिंहद्वारपर पड़े मिलते और कभी समुद्रके जलमें कूद पड़ते ॥ 8 ॥ महाप्रभुको चिन्मय व्रजलीलाका उद्दीपन :- चटक-पर्वत देखि' 'गोवर्धन'-भ्रमे। धाञा चले आर्त्तनाद करिया क्रन्दने ॥ 9 ॥ उपवनोद्यान देखि' वृन्दावन-ज्ञान। ताँहा याइ' नाचे, गाय, क्षणे मूर्च्छा या'न ॥ 10 ॥ अनुवाद— चटक पर्वतको देखकर उन्हें गोवर्धनका भ्रम हो जाता, वे रोते और आर्त्तनाद करते हुए उसकी ओर दौड़ पड़ते। पुरीमें उपवन-उद्यानोंको देखकर उन्हें वृन्दावनकी स्फूर्ति होती, वे वहाँ जाकर नाचते-गाते और कभी उन्मादमें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते ॥ 9-10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चटकपर्वत'—समुद्र तटपर जो बालूका पहाड़ होता है, उसे 'चटकपर्वत' कहते हैं। गुण्डिचा मन्दिर और समुद्रके बीच एक बड़ा चटकपर्वत है, अनेक बार उसे देखकर महाप्रभु 'गोवर्धन'के भ्रमसे वहाँ दौड़ते हुए जाते थे ॥ 9 ॥


अनुभाष्य—'भ्रमे'—भ्रमसे ॥ 9 ॥ श्रीकृष्ण विरहसे उत्पन्न अपूर्व महाभाव-विकार :- काँहा नाहि शुनि येइ भावेर विकार। सेइ भाव हय प्रभुर शरीरे प्रचार ॥ 11 ॥ हस्तपादेर सन्धि सब वितस्ति-प्रमाणे। सन्धि छाड़ि' भिन्न हुये, चर्म रहे स्थाने ॥ 12 ॥ हस्त, पाद, शिर, सब शरीर-भितरे। प्रविष्ट हय—कूर्मरूप देखिये प्रभुरे ॥ 13 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके शरीरमें जो भाव प्रकाशित होते थे, वे इस जगत्में कहीं सुने भी नहीं जाते, अर्थात् किसी अन्यके शरीरमें नहीं हो सकते। कभी उनके हाथ-पाँवकी अस्थियोंके जोड़ खुलकर वितस्ति (हथेली फैलाकर अंगूठेके कोनेसे छोटी अंगुलीके कोने तक) जितने लम्बे हो जाते, केवल त्वचाके कारण ही वे अस्थियाँ शरीरमें टिकी रहतीं। कभी महाप्रभुके हाथ-पाँव-सिर उनके शरीरके भीतर चले जाते और उनका शरीर कछुवे जैसा हो जाता ॥ 11-13 ॥ अनुभाष्य— 'प्रचार'—प्रकाशित। जोड़ोंमें जुड़ी हुई अस्थियाँ अलग होकर केवल त्वचाका ही अस्तित्व दिखायी देता। सन्धि-स्थल तब फैली हुई हथेली जितने लम्बे हो जाते ॥ 11-12 ॥ एइ मत अद्भुत-भाव शरीरे प्रकाश। मनेते शून्यता, वाक्ये हाहा-हुताश ॥ 14 ॥ अनुवाद— इस प्रकार महाप्रभुके शरीरमें अद्भुत सात्त्विक भावोंका प्रकाश होता। श्रीकृष्णविरहमें उनके मनमें शून्यता अर्थात् जगत् उन्हें शून्य प्रतीत होता और जो वचन वे बोलते उसमें निराशा ही होती ॥ 14 ॥ कृष्णविरहमें महाप्रभुका करुण विलाप :- “काँहा मोर प्राणनाथ मुरलीवदन। काँहा करौं, काँहा पाङ व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 15 ॥

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[ 2/15-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काहारे कहिब, केबा जाने मोर दुःख। व्रजेन्द्रनन्दन बिना फाटे मोर बुक॥"16॥ एमत विलाप करे विह्वल अन्तर। रायेर नाटक-श्लोक पड़े निरन्तर॥17॥ अनुवाद-महाप्रभुका करुण विलाप, - "हाय! मुरली वादन करते हुए मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मेरे प्राणनाथ व्रजेन्द्रनन्दन मिलेंगे? किससे मनका दुःख कहूँ? कौन मेरे दुःखको समझ सकता है? व्रजेन्द्रनन्दनके बिना मेरा हृदय फटा जा रहा है।" इस प्रकार महाप्रभु श्रीकृष्णविरहमें विह्वल होकर विलाप करते और श्रीराय रामानन्दके 'जगन्नाथ-वल्लभ' नाटकके इस श्लोकका सदा उच्चारण करते॥15-17॥ जगन्नाथवल्लभ नाटक (3/9)- प्रेमच्छेद‌रुजोऽवगच्छति हरिनार्यं न च प्रेम वा स्थानास्थानमवैति नापि मदनो जानाति नो दुर्बलाः। अन्यो वेद न चान्यदुःखमखिलं नो जीवनं वाश्रवं द्वित्रीण्येव दिनानि यौवनमिदं हाहा विधेः का गतिः॥18॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हमारे कृष्ण प्रेमके द्वारा दिये गये आघातजनित रोगको अनुभव नहीं करते। प्रेमकी बात ही क्या कहूँ, वह तो स्थान-अस्थानको (कहाँ करना है और कहाँ नहीं करना है, इसको) न जानकर आघात करता है। मदनकी तो बात क्या है, क्योंकि वह यह भी नहीं समझता है कि हम अति दुर्बल हैं। हम किसे क्या कहें, कोई हमारे इन सब दुःखोंको नहीं समझ सकता। हमारा जीवन हमारे वशमें नहीं है; यौवन तो दो-तीन दिनके समान थोड़े समयका है। हाय! इस अवस्थामें हे विधाता! हमारी क्या गति होगी? पाठान्तरमें-'विधे'॥18॥ अनुभाष्य- अयं हरिः (कृष्णः) अस्मान् प्रेमच्छेद‌रुजः (प्रेमच्छेदेन तस्य प्रेमभङ्गेन याः रुजः ताः विच्छेदरोगार्त्ताः गोपी) न अवगच्छति (जानाति); प्रेम वा स्थानास्थानां (सदसत्-पात्रापात्रं) न अवैति (जानाति); मदनः अपि नः (अस्मान्) दुर्बलाः (परवश्याः अबलाः) न जानाति। अन्यः जनः अन्यदुःखं (अपरजनकलेशं) न वेद (जानाति)। नः (अस्माकं) जीवनम् आश्रवं (क्लेशमात्रं परवश्यं वा)। इदं यौवनं द्वित्रीण्येव दिनानि ! हा हा विधेः (विधातुः) का गतिः (कीदृशी गतिः, अस्माभिर्दुर्बोध्येति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-(राधाजी शोकमैं विह्वल होकर कहती हैं)-प्रेमके विच्छेदसे जो वेदना हमें हो रही है, उसे कृष्ण नहीं जानते। प्रेम पात्र या अपात्र नहीं देखता है। और न ही मदन (कामदेव) यह जानता है कि हम अति दुर्बल हैं [हम उसके वारको झेल नहीं पायेंगी, फिर भी वह हमपर निरन्तर वार कर रहा है]। कोई किसीके दुःखको नहीं समझ सकता। हमारा जीवन तो क्लेशमात्र और दूसरेके वशमें है। यह यौवन भी तो दो-तीन दिनकी भाँति अल्प समयका है। हा! हा! हे विधाता! ऐसेमें हमारी क्या गति होगी? (हमारे लिये यह जानना अति कठिन है-यह भाव है)॥18॥ अत्यन्त विरहके कारण श्रीकृष्णके प्रति दोषोद्गार :- “उपजिल प्रेमाङ्कुर, भाङ्ग्लि ये दुःख-पूर, कृष्ण ताहा नाहि करे पान। बाहिरे नागरराज, भितरे शठेर काज, परनारी वधे सावधान॥19॥ अपने भाग्यको धिक्कार :- सखि हे, ना बुझिये विधिर विधान। सुख लागि' कैलुँ प्रीति, हैल विपरीत गति, एबे याय, ना रहे पराण॥20॥ध्रु॥ प्रेमके प्रति दोषारोपण :- कुटिल प्रेमा अगेयान, नाहि जाने स्थानास्थान, भाल-मन्द नारे विचारिते। क्रूर शठेर गुणडोरे, हाते-गले बान्धि' मोरे, राखियाछे, नारिं उकाशिते ॥21॥ कृष्णकामनाके प्रति दोषोद्गार :- ये मदन तनुहीन, परद्रोहे परवीण, पाँच बाण सन्धे अनुक्षण। 54 ।

दूसरा अध्याय 2/19-26 ] अबलार शरीरे, बिन्धि' कैल जरजरे, दुःख देय, ना लये जीवन ॥22॥ परमप्रेष्ठ-सखियोंके प्रति भी दोषारोपण :- अन्येर ये दुःख मने, अन्ये ताहा नाहि जाने, सत्य एइ शास्त्रेर विचार। अन्य जन काँहा लिखि, ना जानये प्राणसखी, याते कहे धैर्य धरिबार ॥23॥ आयुके अल्प होनेके कारण विलम्ब या प्रतीक्षासे हताशभाव :- 'कृष्ण-कृपा-पारावार, कभु करिबेन अङ्गीकार', सखि, तोर ए व्यर्थ वचन। जीवेर जीवन चञ्चल, येन पद्मपत्रेर जल, तत दिन जीवे कोन् जन ॥24॥ शत वत्सर पर्यन्त, जीवेर जीवन अन्त, एइ वाक्य कह ना विचारि'। नारीर यौवन-धन, यारे कृष्ण करे मन, से यौवन-दिन दुइ चारि ॥25॥ अग्नि और पतङ्गेके साथ कृष्ण और अपनी तुलना :- अग्नि यैछे निज-धाम, देखाइया अभिराम, पतङ्गीरे आकर्षिया मारे। कृष्ण ऐछे निज-गुण, देखाइया हरे मन, पाछे दुःख-समुद्रेते डारे ॥"26॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥19-26॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिका कह रही हैं,-"अहो! दुःखकी बात क्या कहूँ? कृष्णमिलनसे हमारा प्रेमाङ्कुर उत्पन्न हुआ; अब कृष्ण विच्छेदसे उस प्रेमाङ्कुरको आघात लगा और अब वह दुःखके प्रवाहमें बह रहा है। इस रोगके कृष्ण ही एकमात्र चिकित्सक हैं, किन्तु कृष्ण उस प्रेमाङ्कुरकी रक्षा करनेके लिये कोई यत्न नहीं कर रहे हैं। कृष्णके व्यवहारके बारेमें क्या कहूँ!-वे बाहरसे तो नागरराज (प्रेम व्यवहारमें चतुर) हैं, परन्तु भीतरमें शठता (धूर्तता)से परिपूर्ण हैं और परनारी-वधमें बहुत कुशल हैं। कृष्णके साथ प्रीति करनेसे ऐसा फल! हे सखी! इस विधिके विधानको न बूझकर मैंने सुखके लिये प्रीति की, किन्तु इस दुखियारीको उसका विपरीत होकर महादुःख मिला। अब तो स्थिति यह है कि प्राण अब जायेंगे या तब जायेंगे। हमारे कृष्ण तो ऐसे हैं, और 'प्रेम' नामक जो एक तत्त्व है, उसके विषयमें क्या कहूँ? प्रेम तो स्वभावसे कुटिल और अज्ञानी (अन्धा) है। उसने उचित या अनुचित स्थान न जानकर और उस मन्दबुद्धिने फल या कुफलका विचार न करके कृष्णरूप क्रूर शठकी गुण-रस्सीसे मेरे हाथ-गलेको बाँधकर रख दिया है, मैं उससे अपनेको छुड़ा नहीं पा रही हूँ! कृष्ण और प्रेम-इन दोनोंका यही कार्य है। इस प्रीतिकार्यमें 'मदन' नामक एक और तत्त्व है। उसके गुण ये हैं, - वह स्वयं तो देहरहित है, परन्तु दूसरोंको सतानेमें बहुत प्रवीण है। पाँच बाण सन्धान करके अबलाओंके शरीरको बींधकर जर्जरित कर देता है। यदि वह एक बारमें वध करके प्राण ले लेता, तो अच्छा होता, परन्तु वह ऐसा न करके केवल दुःख ही देता है। शास्त्रोंमें कहा है कि एक व्यक्तिका दुःख अन्य कोई नहीं जान सकता। इस सम्बन्धमें औरोंकी बात क्या कहूँ, मेरी ललितादि सभी प्राणसखियाँ भी मेरे दुःखको समझ नहीं पातीं और 'हे सखी, धैर्य रखो' ऐसा बार-बार कहती हैं। हे सखी! तुम यह कहती हो, - 'कृष्ण कृपाके समुद्र हैं, वे कभी-न-कभी तुम्हें अङ्गीकार करेंगे', -किन्तु तुम्हारे ये शब्द कभी सत्य नहीं होंगे; क्योंकि कमलके पत्तेपर जलकी बूँदके समान जीवका जीवन चञ्चल है। कृष्णकृपा जिस समय होगी, उस समय तक क्या मैं जीवित रहूँगी? मनुष्यकी आयु तो सौ वर्षसे अधिक नहीं है। और विचार करके देखो, कृष्ण-चित्तहारी रमणीका यौवनधन तो बहुत अल्प समयके लिये ही है। यदि तुम कहो, - कृष्ण तो गुणोंके सागर हैं, वे अवश्य ही कृपा करेंगे, इसलिये कहती हूँ कि अग्नि जिस प्रकार अपना प्रकाश दिखाकर । 55

[ 2/19-29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पतङ्गेको आकर्षित करके उसे मार देती है, कृष्णके गुण भी उसी प्रकार हैं। वे पहले गुणोंकी चकाचौंधसे नारियोंके मनको आकर्षण करके फिर उन्हें विरहरूप दुःख-समुद्रमें डुबो देते हैं॥”19-26॥ अनुभाष्य—'अगेयान्'—अज्ञान, अज्ञेय। 'उकाशिते'—मुक्त करना। 'तनुहीन'—अनङ्ग (देहरहित)॥ 21-22॥ एतेक विलाप करि', विषादे श्रीगौरहरि, उघाड़िया दुःखेर कपाट। भावेर तरङ्ग-बले, नानारूप मन चले, आर एक श्लोक कैल पाठ॥ 27॥ अनुवाद—इस प्रकार विषादमें विलाप करते हुए महाप्रभुने अपने हृदयके कपाट खोलकर अपने भावोंको प्रकाशित किया। भावोंकी तरङ्गोंमें बहते हुए उनका मन इधर-उधर चलने लगा और उन्होंने एक और श्लोकका पाठ किया॥ 27॥ अनुभाष्य—'उघाड़िया'—उद्घाटन किया (दिखलाया)॥ 27॥ गूढ़ कृष्णप्रीति-सूचक निर्वेदमय गान :- गोस्वामि-पादोक्त-श्लोक— श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं बिना व्यर्थानि मेऽहान्यखिलेन्द्रियाण्यलम्। पाषाणशुष्केन्धनभारकाण्यहो बिभर्मि वा तानि कथं हतत्रपः॥ 28॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! श्रीकृष्णके रूप-गुण-लीला सेवन न करके मेरी समस्त इन्द्रियाँ (और सभी दिन) व्यर्थ हो रहे हैं, अब मैं उन सब पाषाण (पत्थर) और सूखी-लकड़ीके समान इन्द्रियोंको निर्लज्ज होकर धारण करनेमें कैसे सक्षम होऊँगी?॥ 28॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं (श्रीकृष्णरूपगुणलीलानां निषेवणं शुश्रूषादिकं) बिना मे (मम) अहानि (दिनानि जीवितकालानि) अखिलेन्द्रियाणि (सर्वहर्षीकाणि भोग्याङ्गविग्रहाणि च) अलं व्यर्थानि (विफलप्रदानि भवन्ति)। अहो, पाषाणशुष्केन्धनभारकाणि (पाषाण-शुष्ककाष्ठतुल्यो भारो येषां तानि इन्द्रियाणि) कथं वा बिभर्मि (धारयामि)? अहं हतत्रपः (निर्लज्जः), [अतः कृष्णभोगरहिते जीवितविग्रहे मम स्पृहा वर्त्तते]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके रूप-गुण-लीलाकी सेवाके बिना मेरा जीवनकाल और समस्त इन्द्रियाँ विफल हो रही हैं। अहो! पाषाण-शुष्ककाठके तुल्य भारके समान इन्द्रियोंको मैं कैसे धारण करूँगी? मैं निर्लज्ज हूँ [इसलिये श्रीकृष्णसेवाके बिना जीवित रहनेकी स्पृहा (कामना) मुझमें है]॥ 28॥ (1) भोगरत चक्षुकी व्यर्थता :- “वंशीगानामृत-धाम, लावण्यामृत-जन्मस्थान, ये ना देखे से चाँदवदन। से नयने किवा काज, पडुक् तार मुण्डे बाज, से नयन रहे कि कारण॥ 29॥ अनुवाद—"वे आँखें किस कामकी यदि उनसे श्रीकृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन न किया जाय जो समस्त लावण्यामृतका जन्मस्थान और वंशीके गानामृतका आधार है? उसके सिरपर तो वज्रपात होना चाहिये, उसने ऐसी आँखोंको क्यों धारण किया है?॥ 29॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णका मुखचन्द्र वंशीगानका अमृतधामस्वरूप और लावण्यरूप अमृतका जन्मस्थान- स्वरूप है॥ 29॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका मुखचन्द्र वंशीगानरूप अमृतका आश्रय और लावण्यामृतका मूल है। जिस गोपीके नेत्र इस प्रकार परमरमणीय श्रीकृष्णरूपके दर्शनसे वञ्चित हैं, उन नेत्रोंके आश्रय उस गोपीके मस्तकपर वज्रपात होना ही श्रेयस्कर है। वास्तवमें गोपियाँ श्रीकृष्णसे अतिरिक्त कोई भी वस्तु देखकर उसके प्रति वैराग्य दिखलाती हैं अथवा उदासीन रहती हैं, उसमें उनकी कोई रुचि नहीं होती। उनके नयनाभिराम (नयनोंको 56 ।

दूसरा अध्याय 2/29-34 ] आनन्द देनेवाले) सेव्य श्रीकृष्णका मुखचन्द्र ही उनकी नेत्र इन्द्रियोंकी आराध्य वस्तु है। जिसके नेत्रोंका आराध्य श्रीकृष्णका मुखचन्द्र नहीं है, वह नेत्र-धारक या नेत्रोंका आधारस्वरूप सिर वज्रपात होने योग्य ही है। गोपियाँ यह नहीं समझ सकतीं कि श्रीकृष्णके दर्शनके अतिरिक्त नेत्रोंको धारण करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ 29॥ सखि हे, शुन, मोर हत विधिबल। मोर वपु-चित्त-मन, सकल इन्द्रियगण, कृष्ण बिना सकल विफल॥30॥ध्रु॥ अनुवाद—हे सखि, सुनो! मैंने अपना सौभाग्य गँवा दिया है, अब श्रीकृष्णसेवाके बिना मेरा तन-चित्त-मन और सभी इन्द्रियाँ निष्फल ही हैं॥30॥ (2) भोगरत कानोंकी व्यर्थता :— कृष्णेर मधुर वाणी, अमृतेर तरङ्गिणी, तार प्रवेश नाहि ये श्रवणे। काणाकड़ि-छिद्र सम, जानिह से श्रवण, तार जन्म हैल अकारणे॥31॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी मधुर वाणी (अथवा श्रीकृष्ण-सम्बन्धी शब्द) अमृतकी तरङ्गोंके समान है। यदि किसीके कानोंमें यह अमृत नहीं जाता, तो वे कान फूटे हुए शङ्खके समान हैं। ऐसे कानोंका होना व्यर्थ ही है॥31॥ (3) भोगरत जिह्वाकी व्यर्थता :— कृष्णेर अधरामृत, कृष्ण-गुण-चरित, सुधासार-स्वादु-विनिन्दन। तार स्वाद ये ना जाने, जन्मिया ना मैल केने, से रसना भेक-जिह्वा सम॥32॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका अधरामृत और उनके दिव्य गुण-चरितादिका गानरूप अमृत अन्य सभी प्रकारके अमृतके स्वादको विनिन्दित करते हैं। जिसने इसका आस्वादन नहीं किया है, वह जन्म लेते ही मर क्यों नहीं गया? (अर्थात् उसके जीनेका क्या प्रयोजन है?) उसकी जिह्वा तो मेंढककी जिह्वाके समान है (जो टर्र-टर्र करके मृत्युरूप साँपको अपनी ओर बुलाती है)॥32॥ (4) भोगरत नासिकाकी व्यर्थता :— मृगमद-नीलोत्पल, मिलने ये परिमल, येइ हरे तार गर्व-मान। हेन कृष्ण-अङ्ग-गन्ध, यार नाहि से सम्बन्ध, सेइ नासा भस्त्रार समान॥33॥ अनुवाद—कस्तूरी और नीलकमलकी मिलित सुगन्धको भी पराभूत करनेवाली सुगन्ध श्रीकृष्णके समस्त अङ्गोंमें है—जिसकी नासिकाने ऐसी सुगन्धका आस्वादन नहीं किया, वह नासिका तो लोहारकी धौंकनीके समान है॥33॥ (5) भोगरत त्वचाकी व्यर्थता :— कृष्ण-कर-पदतल, कोटिचन्द्र-सुशीतल, तार स्पर्श येन स्पर्शमणि। तार स्पर्श नाहि यार, से याउक छारखार, सेइ वपु लोहा-सम जानि॥” 34॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी हथेली और श्रीचरणोंके तलवे करोड़ों-करोड़ों चन्द्रमाओंसे अधिक शीतलता प्रदान करनेवाले हैं। उनका स्पर्श तो स्पर्शमणिके समान है। जिसने उनका स्पर्श नहीं किया है, उसका जीवन व्यर्थ है और उसका शरीर लोहेके समान है, अर्थात् मायाके त्रिताप भोगनेके योग्य है॥”34॥ अनुभाष्य—(श्रीमद्भागवत 2/3/17-24)— “आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तञ्च यन्नसौ। तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमःश्लोकवार्त्तया॥17॥ तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्वसन्त्युत। न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामे पशवोऽपरे॥18॥ । 57

[ 2/29-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्वविड्वराहोष्ट्र न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः ॥ 19 ॥ बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य। जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥ 20 ॥ भारः परं पट्टकिरीटजुष्ट-मप्युत्तमाङ्गं न नमेन्मुकुन्दम्। शावौ करौ नो कुरुतः सपर्यां हरेर्लसत्काञ्चनकङ्कणौ वा ॥ 21 ॥ बर्हायिते ते नयने नराणां लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये। पादौ नृणां तौ द्रुमजन्मभाजौ क्षेत्राणि नानुव्रजतो हरेर्यौ ॥ 22 ॥ जीवञ्छवो भागवताङ्घ्रिरेणुं न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु। श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः श्वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम् ॥ 23 ॥ तदश्मसारं हृदयं बतेदं यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः। न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः ॥ 24 ॥ अर्थात् “अतः श्रीकृष्ण-कथाओंके श्रवणमें विलम्ब करना उचित नहीं है, क्योंकि सूर्यदेव प्रतिदिन उदित और अस्त होकर मनुष्योंकी हरिकथासे रहित व्यर्थ आयुको हरण कर लेते हैं। जिनका समय केवल उत्तमश्लोक श्रीहरिकी कथाओंमें ही व्यतीत होता है, उनकी ही आयुका वे हरण नहीं कर पाते। श्रीकृष्ण-कथामें क्षणमात्र काल भी व्यतीत होनेपर सम्पूर्ण जीवन सफल हो जाता है। क्या वृक्ष जीवित नहीं रहते हैं? क्या लुहारकी धौंकनी श्वास लेती अथवा छोड़ती नहीं है? क्या गाँवके अन्य पशु आहार अथवा मैथुन नहीं करते? इसलिये जो हरिभजन न कर आहार और निद्रादिमें ही अपना समय बिताते है, वे नराकारमें पशु ही हैं। जिनके कानोंमें कभी भी श्रीकृष्णके नामने प्रवेश नहीं किया, वे मानव कुत्ते, ग्रामके सूअर, ऊँट और गधेके समान पशु कहे गये हैं, अर्थात् ऐसे श्रीकृष्ण-भजनसे हीन मनुष्योंको पशुसे भी अधिक निन्दनीय माना गया है। जो व्यक्ति अपने कानोंसे प्रचुर गुणोंसे युक्त भगवान्‌के पराक्रमकी कथा नहीं सुनते, उनके दोनों कानोंके छिद्र बिलके समान व्यर्थ ही हैं। जिसकी जिह्वा भगवान्‌के पराक्रमका कीर्तन नहीं करती, अर्थात् जो जिह्वा अपने पति भगवान् हृषीकेशकी लीलाओंका गुणगान न करके तरह-तरहकी सांसारिक वार्त्ताको ही कहती रहती है, वह असती नारी अथवा वेश्याके समान है। वह मेंढककी जिह्वाके समान केवल टर्र-टर्रका शोर मचाकर कालसर्पके समान मृत्युका ही आह्वान करती है। जो मस्तक भगवान् मुकुन्दके श्रीचरणोंमें नहीं झुकता, रेशमी वस्त्रोंसे सुसज्जित और मुकटसे युक्त रहनेपर भी वह उत्तम-अङ्ग रूपी मस्तक संसार सागरके अथाह जलमें प्रवेश करनेवाले व्यक्तिको और भी अधिक शीघ्रतासे उसमें डुबोनेके लिये केवल बोझमात्र ही है। जो हाथ सोनेके कङ्कणोंसे सुशोभित होकर भी श्रीहरिकी सेवामें नियुक्त नहीं होते, वे मृतकके हाथोंके समान हैं। (इसका कारण है कि देव-पितरादि भी इन हाथोंके द्वारा दिये गये जल-पिण्ड आदिको अपवित्र मानकर स्वीकार नहीं करते)। जिन व्यक्तियोंके नेत्र भगवान्‌के श्रीविग्रह, तीर्थ आदिका दर्शन नहीं करते, वे मोरोंके पंखमें बनी हुई आँखोंके समान व्यर्थ ही हैं। ऐसी निरर्थक आँखोंवाले व्यक्ति अपने कल्याणके मार्गको न देख पानेके कारण संसाररूप काँटोंके क्षेत्रमें ही पड़े रहते हैं। जिन मनुष्योंके पैर श्रीहरिकी लीलाभूमि अथवा तीर्थोंमें नहीं जाते, उनके पैर न चलनेवाले वृक्षोंके समान स्थावर ही हैं। जिस प्रकार वृक्षकी जड़को कुल्हाड़ीके द्वारा काट डाला जाता है, उसी प्रकार यमदूत भी कुल्हाड़ीके द्वारा ऐसे व्यक्तियोंके पैरोंको काट डालते हैं। जिस व्यक्तिने कभी भी भगवद्भक्तोंकी चरणधूलिको भलीभाँति अपने समस्त अङ्गोंमें नहीं लगाया, जीवित रहनेपर भी उस व्यक्तिके अङ्ग प्रेतके समान हैं, क्योंकि वह सदा-सर्वदा साधुओंसे भयभीत रहता है। उसके हाथोंके द्वारा की गयी पूजा-सेवाको भी भगवान् स्वीकार नहीं करते। इसी प्रकार जो मनुष्य भगवान् श्रीविष्णुके श्रीचरणोंमें अर्पित तुलसीकी सुगन्धको लेकर आनन्दित नहीं होता, वह व्यक्ति साँस लेते हुए भी मृत प्राणीके समान ही है। (इस प्रकार एक-एक करके बाह्य अङ्गोंकी निन्दा करके अब आन्तरिक भावोंकी निन्दा करते हुए कह रहे हैं कि) भगवान् श्रीहरिके मङ्गलमय नामोंको ग्रहण 58 ।

दूसरा अध्याय 2/29-35 ] करनेपर भी जिनका हृदय नहीं पिघलता, आँखें आँसुओंसे भर नहीं जातीं, रोम-रोम आनन्दसे पुलकित नहीं हो जाते, हाय ! उनका हृदय लोहेके समान अति कठोर है। (ये श्रीनामके प्रति अपराधके भी लक्षण हैं)॥"29-34॥ करि' एत विलापन, प्रभु श्रीशचीनन्दन, उघाड़िया हृदयेर शोक। दैन्य-निर्वेद-विषादे, हृदयेर अवसादे, पुनरपि पड़े एक श्लोक॥ 35॥ अनुवाद—इस प्रकार विलाप करते हुए महाप्रभुने अपने हृदयके शोकको उजागर कर दिया। हृदयमें उदासीके कारण दैन्य, निर्वेद और विषादग्रस्त होकर उन्होंने एक श्लोक और पढ़ा॥ 35॥ अनुभाष्य—'दैन्य'—(भःरःसिः दःविः 4र्थ लः)— “दुःखत्रासापराधाद्यैरनोजिंत्यन्तु 'दीनता'। चाटुकन्मान्द्यमालिन्यचिन्ताङ्गजड़िमादिकृत्॥” अर्थात् “दुःख, त्रास और अपराधादिके द्वारा अपनेको अति निकृष्ट माननेको 'दीनता' कहते हैं। दैन्य होनेपर दैन्यमयी याचना, हृदयकी अपटुता (मन्दता), अस्वच्छन्दता (मालिन्य), नाना प्रकारकी भावनायें (चिन्तायें) और अङ्गोंमें जड़ता (निष्क्रियता) होती है। 'निर्वेद'—(भःरःसिः दःविः 4र्थ लः)— “महात्तिविप्रयोगादिद्वेकादिकल्पितम्। स्वावामाननमवेवात्र 'निर्वेद' इति कथ्यते। अत्र चिन्ताश्रुवैवर्ण्य-दैन्यनिश्वसितादयः॥” अर्थात् “अत्यन्त दुःख, विरह, ईर्ष्या, अकर्त्तव्य करनेके लिये अथवा कर्त्तव्यका पालन न करनेके लिये शोकयुक्त अपने अपमानको 'निर्वेद' कहते हैं। इस निर्वेदमें चिन्ता, अश्रु, वैवर्ण्य, दैन्य और निःश्वासादि अनुभाव प्रकाशित होते हैं। 'विषाद'—(भःरःसिः दःविः 4र्थ लः)— “इष्टानवाप्तिप्रारब्धकार्यासिद्धिर्विपत्तितः। अपराधादितोऽपि स्यादनुतापो विषण्णता॥ अत्रोपायसहायानुसन्धिश्चिन्ता च रोदनम्। विलापश्वासवैवर्ण्यमुखशोषादयोऽपि च॥” अर्थात् “इष्ट-वस्तुके प्राप्त न होनेसे, सङ्कल्पित प्रारब्ध कार्यमें असिद्धि, विपत्ति एवं अपराधादि होनेसे जो अनुताप होता है, उसे 'विषाद' कहते हैं। इस विषादमें उपाय एवं सहायकको ढूँढ़ना, चिन्ता, रोदन, विलाप, श्वास, वैवर्ण्य और मुखका सूखना आदि लक्षण होते हैं। दैन्य, निर्वेद एवं विषादादि तैंतीस व्यभिचारी भाव स्थायीभावके ऊपर विशेष प्रधानता लाभ करके विचरण करते हैं। वाक्य, क्रन्दनादि अङ्ग और सत्त्वसे उत्पन्न अनुभावोंके द्वारा सूचित होनेपर इन्हें व्यभिचारी भाव कहा जाता है। ये भावोंकी गतिको सञ्चार करते हैं, इसलिये व्यभिचारी-भावको 'सञ्चारी-भाव' भी कहते हैं॥ 35॥ अमृताणुकणिका— “'उघाड़िया हृदयेर शोक'—जिन भावोंको अपनी माँको नहीं कहा जा सकता, पिताको नहीं कहा जा सकता, अन्य किसीको नहीं कहा जा सकता, किन्तु उन्हें अपने अन्तरङ्ग सखा या सखीको कहा जा सकता है। राधाजी अपने भावोंको निःसङ्कोच बिना छिपाये ही ललिता-विशाखाको बताती हैं, क्योंकि ललिता-विशाखा उनकी अपनी अन्तरङ्ग सखियाँ हैं। राधाजी ललिता, विशाखाको अपने भावोंको उघाड़कर कह रही हैं,—'कृष्ण हमें छोड़कर मथुरा चले गये हैं। उन्होंने कहा था कि मैं अति शीघ्र लौट आऊँगा, परन्तु वे अभी तक नहीं आये। यदि वे प्रेम करना छोड़ देते हैं, तो हम क्यों नहीं उनसे प्रेम करना छोड़ देती?' श्रीकृष्ण विरहमें राधाजीके जो भाव हृदयमें उठ रहे हैं, वही कह रही हैं,—'ऐसा धूर्त हमने जगत्में नहीं देखा, यदि ऐसा जानती, तो उनसे प्रेम नहीं करती। ऐसा सखा भी हमने नहीं देखा, ये (कृष्ण) तो भ्रमरके समान हैं, जैसे भ्रमर फूलोंका रस लेकर वहाँसे चल देते हैं, वैसे ही ये भी हैं। हमें त्यागकर अब ये मथुराकी रमणियोंके साथ विहार कर रहे हैं। इन्हें हम । 59

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[ 2/35-39 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोगोंके सुख-दुःखसे क्या प्रयोजन?' महाप्रभुमें तदात्मभावका आवेश है अर्थात् राधाजीके भाव उनके हृदयमें है। उस समय राधाजीके भावोंके आवेशमें वे श्रीस्वरूप दामोदरको ललिताके रूपमें और श्रीरायरामानन्दको विशाखाके रूपमें देखते हैं। जो उस भावावेशमें तमाल वृक्षको कृष्ण देख सकते हैं, किसी पहाड़को गोवर्धन देख सकते हैं, नदीमात्र या समुद्रको यमुना देख सकते हैं, उनके लिये स्वरूप दामोदरको ललिताके रूपमें और श्रीराय रामानन्दको विशाखाके रूपमें देखना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दको वैसे ही अपने हृदयके भावोंको उघाड़कर कह रहे हैं।" - श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 35 ॥ श्रीजगन्नाथवल्लभ-नाटक (3/11) :- यदा यातो दैवान्मधुरिपुरसौ लोचनपथं तदास्माकं चेतो मदनहतकेनाह्तमभूत्। पुनर्यस्मिन्नेष क्षणमपि दृशोरेति पदवीं विधास्यामस्तस्मिन्नखिलघटिका रत्नखचिताः ॥ 36 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे भाग्यसे श्रीकृष्ण-रूपका मेरे नयनोंके द्वारा दर्शन होनेपर मेरा चित्त दर्शन-सौभाग्यके अभिमानके द्वारा घायल होनेपर 'आनन्द' नामक किसी तत्त्वके द्वारा अपहरण कर लिया गया, इसलिये मैं मन भरकर उस रूप-सौन्दर्यको नहीं देख पायी। और यदि जब पुनः वह कृष्णस्वरूप देख पाऊँगी, तब उस समयको (उस क्षणको, उस पलको) बहुत रत्नोंसे अलङ्कृत करूँगी ॥ 36 ॥ अनुभाष्य- यदा (यस्मिन् काले स्वप्ने वा) असौ मधुरिपुः (मधुसूदनः) दैवात् (मम भाग्येन) लोचनपथं (दृग्गोचरं) यातः (प्राप्तः) तदा मदनहतकेन (मदयति हर्षयति इति मदनः एवः हतकः शत्रुर्यस्य तेन वैरिणा मदनेन) अस्माकं चेतः (मनः) आहृतं (चोरितम्) अभूत्। पुनः यस्मिन् (क्षणे) एषः (कृष्णः) दृशोः (नेत्रयोः) पदवीं (मार्गं) एति (याति प्राप्नोतीत्यर्थः) [तस्मिन् काले] अखिलघटिकाः (मुहूर्त्तघटीपलविपलादिकाः) रत्नखचिताः विधास्यामः (माल्य-चन्दनमणिमुक्तादिना समलङ्कर्मः)। श्लोक-भावानुवाद-जिस समय या स्वप्नमें वे मधुसूदन मेरे भाग्यसे मेरे दृष्टिगोचर हुए, तभी आनन्द नामक शत्रु (मदन) ने मेरे चित्तको चुरा लिया। पुनः जिस क्षण श्रीकृष्ण मेरे नयनपथपर प्राप्त होंगे, उस कालको (उस मुहूर्त-घड़ी-पल-विपलको) माला-चन्दन- मणि-मुक्तादिसे अलङ्कृत करूँगी ॥ 36 ॥ श्लोकार्थ :- विरहके कारण श्रीकृष्णके दर्शन या मिलनके एक क्षणको भी बहुत आदर :- "ये काले वा स्वप्ने, देखिनु वंशीवदने, सेइकाले आइला दुइ वैरि। 'आनन्द' आर 'मदन', हरि' निल मोर मन, देखिते ना पाइलुँ नेत्र भरि' ॥ 37 ॥ पुनः यदि कोन क्षण, कराय कृष्ण दरशन, तबे सेइ घटी-क्षण-पल। दिया माल्यचन्दन, नाना रत्न-आभरण, अलङ्कृत करिमु सकल ॥" 38 ॥ अनुवाद-दैववशतः जिस समय मैंने साक्षात् अथवा स्वप्नमें वंशीवादन करते हुए श्रीकृष्णको देखा, उसी समय 'आनन्द' और 'मदन', ये दो वैरी आ गये और इन दोनोंने मेरा मन हर लिया, इसलिये मैं मन भरकर उनका दर्शन भी नहीं कर पायी। यदि सौभाग्यवश कोई 'क्षण' मुझे पुनः श्रीकृष्णके दर्शन कराये, तो उस घड़ी-क्षण-पलको मैं माला, चन्दन और नाना प्रकारके रत्नों एवं आभूषणोंसे अलङ्कृत करूँगी ॥ 37-38 ॥ महाप्रभुका 'चित्रजल्प' महाभाव; बाह्यदशामें महाप्रभुका स्वरूप-रामानन्दके निकट विलाप :- क्षणे बाह्य हैल मन, आगे देखे दुइ जन, ताँरे पुछे, - "आमि ना चैतन्य? स्वप्नप्राय कि देखिनु, किवा आमि प्रलापिनु, तोमरा किछु शूनियाछ दैन्य ? ॥ 39 ॥ 60 ।

दूसरा अध्याय 2/39-43 ] कृष्णविरहमें अपने आपको दीन मानना :— शुन, मोर प्राणेर बान्धव। नाहि कृष्ण-प्रेमधन, दरिद्र मोर जीवन, देहेन्द्रिय वृथा मोर सब॥" 40 ॥ ध्रु॥ अनुवाद—तभी महाप्रभुको कुछ कालके लिये बाह्य ज्ञान हुआ, तो उन्होंने सामने दो लोगोंको देखा। तब उनसे पूछने लगे,—“क्या मैं (कृष्ण) चैतन्य नहीं हूँ? मैं क्या स्वप्न देख रहा था? मैंने क्या प्रलाप किया? तुमने क्या मेरा कुछ दैन्य-प्रलाप सुना? हे मेरे बन्धुओं! तुम मुझे प्राणोंसे भी प्रिय हो, इसलिये मेरी बात सुनो। मेरे पास कृष्णप्रेमरूपी धन नहीं है, अतः मैं अति दरिद्र हूँ, मेरा देह और इन्द्रियोंको धारण करना व्यर्थ है॥” 39-40॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे देखे दुइ जन'—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दको देखा। उन्हें देखकर थोड़ी देरके लिये महाप्रभुको बाह्य ज्ञान हुआ और वे राधाभिमान छोड़कर पूछने लगे कि क्या मैं वही चैतन्य नहीं हूँ?॥ 39॥ पुनः कहे,—“हाय हाय, शुन, स्वरूप-रामराय, एइ मोर हृदय-निश्चय। शुनि' करह विचार, हय, नय—कह सार”, एत बलि' श्लोक उच्चारय ॥ 41 ॥ अनुवाद—महाप्रभु पुनः कहने लगे,—“हाय! हाय! सुनो स्वरूप और रामराय, मेरे हृदयकी अन्तरङ्ग बात सुनो और उसपर विचार करके अपना निर्णय दो कि ऐसा है अथवा नहीं।” यह कहकर उन्होंने एक श्लोकका उच्चारण किया॥ 41 ॥ श्रीमद्भागवत (10/31/1) टीकामें तोषणी-उद्धृत श्लोक :— कइअवरहिअं पेम्मं ण हि होइ मानुसे लोए। जइ होइ कस्स विरहो विरहे होन्ताम्मि को जीअइ ॥ 42 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 42 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्लोक सामान्य लोक प्रचलित संस्कृत भाषा 'प्राकृत' में है। संस्कृतमें यह श्लोक इस प्रकार है— “कैतव-रहितं प्रेम न हि भवति मानुषे लोके। यदि भवति कस्य विरहो विरहे सत्यपि को जीवति॥” अर्थात् “प्रेम कैतवरहित (छलरहित) है और यह मनुष्यलोकमें कभी भी उदित नहीं होता। यदि उदित हो, तब विरह नहीं होता। यदि विरह हो, तब जीवन नहीं रहता॥” 42 ॥ अनुभाष्य— कइअवरहिअं (कैतवरहितं धर्मार्थकाममोक्षादि-छलधर्मशून्यं) पेम्मं (प्रेम) मानुसे लोत्र (मानुषे लोके) ण हि होइ (भवति)। जइ (यदि) कस्स (कस्य) विरहः (प्रेम्णः विच्छेदः भवति), (तदा) विरहे (विच्छेदे) होन्तरिम्म (भवत्यपि) को जीअई (जीवति?—न कोऽपीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि छल-धर्मसे शून्य (श्रीकृष्ण) प्रेम इस मनुष्यलोकमें नहीं होता। यदि ऐसा प्रेम कहीं है, तो वहाँ विरह नहीं हो सकता। यदि ऐसे प्रेममें विरह है, तो फिर कौन जीवित रह सकता है? अर्थात् कोई जीवित नहीं रह सकता—यह अर्थ है॥ 42 ॥ श्लोकका अर्थ :— “अकैतव कृष्णप्रेम, येन जाम्बुनद-हेम, सेइ प्रेमा नृलोके ना हय। यदि हय तार योग, ना हय तबै वियोग, विरह हैले केह ना जीयय॥” 43 ॥ अनुवाद—“जाम्बु-नदीके शुद्ध सोनेके जैसा शुद्ध छलरहित श्रीकृष्णप्रेम इस मनुष्य लोकमें नहीं होता है। यदि वह प्रेम कहीं होता है, तो वहाँ वियोग नहीं हो सकता। यदि वियोग हो, तो कोई जीवित नहीं रह सकता॥” 43 ॥ । 61

[ 2/44-47 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एत कहिं शचीसुत, श्लोक पड़े अद्भुत, शुने दुँहे एक मन हञा। “आपन-हृदय-काज, कहिते वासिये लाज, तबु कहि लाजबीज खाञा ॥” 44 ॥ अनुवाद—यह कहकर शचीनन्दन गौरहरिने एक और अद्भुत श्लोक पढ़ा जिसे श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दने एकाग्रचित्तसे सुना। महाप्रभु कहने लगे,—“अपने हृदयकी गोपनीय बात कहनेमें लज्जा आती है, किन्तु उस लज्जाके बीजको खाकर अर्थात् औपचारिकता त्यागकर मैं कहता हूँ॥” 44 ॥ अनुभाष्य—'लाजबीज खाञा'—लज्जाके शीशको खाकर ॥ 44 ॥ श्रीमहाप्रभुके द्वारा उक्त श्लोक :- न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ क्रन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम्। वंशीविलास्यान्नलोकनं बिना बिभर्मि यत् प्राणपतङ्गकान् वृथा ॥ 45 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! कृष्णके लिये मेरे हृदयमें प्रेमकी लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। तब मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने परम-सौभाग्यका प्रकाश करनेके लिये ही करती हूँ। वंशीवदन कृष्णके दर्शनके बिना मैं जो प्राणपतङ्ग धारण करती हूँ, वह व्यर्थ ही है ॥ 45 ॥ अनुभाष्य— मे (मम) हरौ (भगवति कृष्णे) दरापि (ईषदपि) प्रेमगन्धः (प्रेमाभास) न अस्ति, [तथापि] सौभाग्यभरं (मम प्रेमास्ति इति सौभाग्यातिशयं) प्रकाशितुं क्रन्दामि (आनन्द-नीरं क्षिपामि)। वंशीविलास्यान्नलोकनं (मुरलीनिनाद-पर-कृष्णमुख-शोभानिरीक्षणं) बिना यत् प्राणपतङ्गकान् (यानि क्षुद्रपतङ्गतुल्यप्राणान्) बिभर्मि (धारयामि), [तानि] वृथा एव। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ श्लोकार्थ :- “दूरे शुद्धप्रेमबन्ध, कपट प्रेमेर गन्ध, सेइ मोर कृष्णे नाहि पाय। तबे ये करि क्रन्दन, स्वसौभाग्य प्रख्यापन, करि, इहा जानिह निश्चय ॥ 46 ॥ याते वंशीध्वनि-सुख, ना देखि से चाँदमुख, यद्यपि नाहिक 'आलम्बन'। निज-देहे करि प्रीति, केवल कामेर रीति, प्राण-कीटेर करिये धारण ॥ 47 ॥ अनुवाद—शुद्ध कृष्णप्रेमकी गन्ध तो मुझसे बहुत दूर है, मेरा प्रेमका प्रदर्शन तो कपटता मात्र है। मेरी कपटताके कारण मैं कृष्णको प्राप्त नहीं कर पाती। तब ऐसा तुम निश्चित जानना कि मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने सौभाग्यको प्रदर्शित करनेके लिये ही है। मैं वंशीवादन करते हुए कृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन नहीं कर रही हूँ और न ही उनकी वंशीध्वनि सुननेका आनन्द प्राप्त कर रही हूँ। यद्यपि उनसे मिलनकी कोई सम्भावना भी नहीं है, तो भी मैं अपनी देहसे प्रीति करते हुए उसका पालन कर रही हूँ अर्थात् केवल स्वसुखकी कामना करती हूँ। यह प्रेमकी नहीं, कामकी रीति है; व्यर्थ ही मैं कीटके समान प्राणको धारण कर रही हूँ ॥ 46-47 ॥ अनुभाष्य—सेव्य (श्रीकृष्ण)को ‘विषय’ और सेवक (भक्त)को ‘आश्रय’ कहते हैं, विषय और आश्रयके एक साथ मिलनको ‘आलम्बन’ कहते हैं। यहाँ आश्रयके श्रवण और विषयकी वंशीध्वनिका प्रसङ्ग है; परन्तु विषयके चन्द्रमुखके दर्शनमें आग्रहका अभाव आश्रयका आलम्बन रहित होनेका ज्ञापक है। स्वयंके देहसुखके लिये कामपूर्तिके कारण प्राण धारण करना वृथा ही है। भःरःसिः— “हन्त देहतकैकैः किममीभिः पालितैर्विफलपुण्यफलैर्नः।” अर्थात् “हाय! मेरी पुण्यरहित हत-देहका पालन करनेसे क्या होगा? ॥” 47 ॥ 62 ।

दूसरा अध्याय [2/48-52] [बायाँ स्तम्भ] कृष्णप्रेमका लक्षण :— कृष्णप्रेमा सुनिर्मल, येन शुद्धगङ्गाजल, सेइ प्रेमा—अमृतेर सिन्धु। निर्मल से—अनुरागे, ना लुकाय अन्य दागे, शुक्लवस्त्रे यैछे मसीबिन्दु ॥ 48 ॥ शुद्धप्रेम—सुखसिन्धु, पाइ तार एक बिन्दु, सेइ बिन्दु जगत् डुबाय। कहिबार योग्य नय, तथापि बाउले कय, कहिले वा केबा पातियाय ॥” 49 ॥ **अनुवाद—**कृष्णप्रेम शुद्धगङ्गाजलके समान निर्मल और प्रेमामृतका समुद्र है। यह निर्मल अनुराग किसी दागको नहीं छुपाता, जैसे श्वेत वस्त्रके ऊपर स्याहीका एक बिन्दु भी स्पष्ट दिखायी देता है। शुद्ध कृष्णप्रेम आनन्दका समुद्र है। यदि किसीको उस समुद्रका एक बिन्दु मिल जाता है, तो वह समस्त जगत्‌को उस बिन्दुमें डुबो सकता है। यद्यपि प्रेमको वाणीके द्वारा प्रकाश करना उचित नहीं है, तथापि एक पागल इसे कहेगा। क्योंकि उसके कहनेपर भी कोई उसका विश्वास नहीं करेगा ॥ 48-49 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'पातियाय'— विश्वास करे ॥ 49 ॥ **अनुभाष्य—**निर्मल कृष्णप्रेमका अनुराग श्वेत वस्त्रके समान कहा गया है और अनुरागका अभाव काले दागके समान है। जिस स्थानपर अनुरागका अभाव है, वह अनुराग नामक श्वेत-भूमिकाके ऊपर काले दागके जैसे स्पष्ट दिखायी देता है ॥ 48 ॥ कृष्ण प्रेमके परस्पर विरुद्ध लक्षण :— एइ मत दिने दिने, स्वरूप–रामानन्द–सने, निज–भाव करेन विदित। बाहिरे विषज्वाला हय, भितरे आनन्दमय, कृष्णप्रेमेर अद्भुत चरित ॥ 50 ॥ **अनुवाद—**इस प्रकार दिन-प्रतिदिन महाप्रभु श्रीस्वरूप

[दायाँ स्तम्भ] दामोदर और श्रीराय रामानन्दके आगे अपने दिव्य भावोंको प्रकट करते। बाहरसे ऐसा लगता कि महाप्रभु मानो विषकी ज्वालामें जल रहे हैं, परन्तु भीतरसे वे आनन्दका अनुभव करते। कृष्णप्रेमका ऐसा ही अद्भुत चरित (स्वभाव) है ॥ 50 ॥ एइ प्रेमा—आस्वादन, तप्त–इक्षु–चर्वण, मुख ज्वले, ना याय त्यजन। सेइ प्रेमा याँर मने, तार विक्रम सेइ जाने, विषामृते एकत्र मिलन ॥ 51 ॥ **अनुवाद—**कृष्णप्रेमका आस्वादन गर्म गन्नेके रसके समान है। जो गर्म गन्नेके रसका पान करता है, उसका मुख जलता है, परन्तु वह उसकी मिठासके कारण उसे छोड़ भी नहीं पाता। जिसके हृदयमें कृष्णप्रेम है, वही इसकी महिमाको समझ सकता है। यह तो विष और अमृतका मिश्रण है ॥ 51 ॥ विदग्धमाधव (2/18) :— पीडाभिर्नवकालकूट–कटुतागर्वस्य निर्वासनो निस्यन्देन मुदां सुधा–मधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः। प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो जागर्त्ति यस्यानन्तरे ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः॥ 52 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— हे सुन्दरि ! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण-सम्बन्धी प्रेम जिसके हृदयमें जाग्रत होता है, उस प्रेमके वक्र (कुटिल अर्थात् कटु) एवं मधुरभावकी समस्त महिमा उस हृदयमें स्पष्ट रूपसे प्रकाशित होती है। वह प्रेम दो रूपसे कार्य करता है,—(1) अपने द्वारा प्रदानकी गयी पीड़ाके द्वारा वह नव-सर्पविषकी कटुताके गर्वको दूर करता है अर्थात् जिससे अधिक कोई नहीं हो सकता, ऐसा दुःख उदय कराता है; और (2) आनन्दके द्वारा अमृतके माधुर्यका जो अहङ्कार है, । 63

[ 2/52-57 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उसको भी सङ्कुचित करके परम सुख प्रदान करता है ॥ 52 ॥ अनुभाष्य-पौर्णमासी नान्दीमुखीसे कह रही हैं- हे सुन्दरि, पीडाभिः (यातनाभिः) नवकालकूट-कटुतागर्वस्य (नवकालकूटस्य सुतीव्रविषस्य यः कटुतागर्वः अन्यावज्ञा- रूपोग्रतामयभावः तस्य) निर्वासनः (दूरीकरणशीलः), मुदां निस्यन्देन (क्षरणेन) सुधामधुरिमाहङ्कारसङ्कोचनः (सुधायाः अमृतस्य यः मधुरिमा माधुर्यं तेन यः अहङ्कारः गर्वः तं सङ्कोचयति खर्वीकरोति यः) नन्दनन्दनपरः (कृष्णोद्देशकः) प्रेमा यस्य अन्तरे (हृदये) जागर्त्ति, अस्य (प्रेम्णः) वक्रमधुराः (कुटिलमाधुर्यसमन्विताः) विक्रान्तयः (प्रभावाः) तेन (जनेन) एव स्फुटं (स्पष्टं) ज्ञायन्ते (अनुभूयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥ कृष्णदर्शनसे महाप्रभुकी महाभाव-चेष्टा :- ये काले देखि जगन्नाथ, श्रीराम-सुभद्रा-साथ, तबे जानि-आइलाम कुरुक्षेत्र। सफल हैल जीवन, देखिलुँ पद्मलोचन, जुड़ाइल तनु-मन-नेत्र ॥ 53 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब श्रीजगन्नाथका बलराम और सुभद्राके साथ दर्शन करते, तो उन्हें ऐसा लगता कि वे कुरुक्षेत्रमें आकर श्रीकृष्णका दर्शन कर रहे हैं। वे सोचते कि उनका जीवन सफल हो गया है, क्योंकि कमलनयन श्रीकृष्णके दर्शन करके उनके तन-मन और नेत्र शीतल हो जाते हैं ॥ 53 ॥ गरुड़ेर सन्निधाने, रहिं करे दरशने, से आनन्देर कि कहिब ब'ले। गरुड़-स्तम्भेरे तले, आछे एक निम्न खाले, से खाल भरिल अश्रुजले ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभु गरुड़-स्तम्भके निकट खड़े होकर श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते थे और उनको जो आनन्द होता था, उसका वर्णन कैसे करें? गरुड़-स्तम्भके नीचे एक खड्डा था और वह महाप्रभुके आनन्दाश्रुओंसे भर जाता था ॥ 54 ॥ अनुभाष्य-श्रीजगन्नाथ-मन्दिरके सम्मुख जगमोहनके अन्तमें एक स्तम्भ है [इसपर गरुड़जी विराजमान हैं, इसलिये] इसे गरुड़-स्तम्भ कहते हैं। इस स्तम्भके पीछे भागकी भूमिमें एक खड्डा था, वह भगवान् महाप्रभुके प्रेमाश्रुजलसे भर जाता था ॥ 54 ॥ पुनः कृष्णविरहका उद्दीपन :- ताँहा हैते घरे आसिं, माटीर उपरे बसि' नखे करे पृथिवी लिखन। “हा-हा काँहा वृन्दावन, काँहा गोपेन्द्रनन्दन, काँहा सेइ वंशीवदन ॥ 55 ॥ काँहा से त्रिभङ्गठाम, काँहा सेइ वेणुगान, काँहा सेइ यमुना-पुलिन। काँहा से रासविलास, काँहा नृत्यगीत-हास, काँहा प्रभु मदनमोहन ॥” 56 ॥ उठिल नाना भावोद्वेग, मने हैल उद्वेग, क्षणमात्र नारे गोड़ाइते। प्रबल विरहानले, धैर्य हैल टलमले, नाना श्लोक लागिला पड़िते ॥ 57 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे महाप्रभु घर लौटकर आते और भूमिपर बैठकर अपने नाखूनोंसे पृथ्वीपर कुछ लिखते। उस समय विषादकी दशामें क्रन्दन करते और कहते,―“हा! हा! कहाँ है वृन्दावन? नन्दनन्दन कृष्ण कहाँ हैं? कहाँ हैं वे वंशीवदन? कहाँ हैं वे त्रिभङ्ग-ललित कृष्ण? कहाँ है उनका मधुर वंशीगान? कहाँ है वह यमुनाका तट? कहाँ है वह रास-विलास? कहाँ है वह नृत्य-गान और हास-परिहास? कहाँ हैं मेरे प्रभु मदनमोहन?” इस प्रकार महाप्रभुके मनमें अनेक भावोंका वेग आता और उनका मन उद्विग्न हो जाता। इनसे वे एक क्षण भी नहीं निकल पाते। प्रबल विरहाग्निमें उनका धैर्य डगमगाने लगा और वे नाना श्लोक पढ़ने लगे ॥ 55-57 ॥ 64 ।

दूसरा अध्याय 2/58-60 ] श्रीकृष्णकर्णामृत (41) :- अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि हरेस्त्वदालोकनमन्तरेण। अनाथबन्धो करुणैकसिन्धो हा हन्त हा हन्त कथं नयामि ॥ 58 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 58 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे हरि ! हे अनाथबन्धु ! हे करुणाके एकमात्र सिन्धु ! आपके दर्शनके बिना हाय-हाय मैं ये अशुभ दिन-रात कैसे काटूँगा ? ॥ 58 ॥ अनुभाष्य- हे अनाथबन्धो (अनाथानां विरहविधुराणां गोपीनां बन्धुर्यः एवम्बिध) करुणैकसिन्धो (दयैकसमुद्र) [कृष्णादृते माधुर्यप्रेम सम्पत्त्यभावात् कोऽप्यन्यः गोपीः अनुकम्पयितुं न समर्थ इति भावः] हे हरे (गोपीजनकायमनोवाक्यहारिन्), त्वदालोकनं (भवद्दर्शनम्) अन्तरेण (बिना) हा हन्त ! हा हन्त! अधन्यानि (अशुभानि) अमूनि दिनानि * कथं (केन प्रकारेण) [तव सेवां बिना] नयामि (अतिवाहयामि)।

  • दिनान्तराणि- “दिनस्य अहोरात्रस्य अन्तराणि मध्यगतानि क्षणवृन्द्वानि इति" (सारङ्ग-रङ्गदा)। [अर्थात् दिन और रातमें जो सब क्षण हैं, वे, अथवा करोड़ों कल्पोंके समान जिनका अतिक्रमण करना असम्भव है।] श्लोक-भावानुवाद-हे अनाथबन्धु (विरह-विधुर गोपियोंके बन्धु)! हे करुणैकसिन्धु (अर्थात् कृष्ण द्वारा आदृत माधुर्यप्रेम सम्पत्तिकी स्वामिनी गोपीपर अन्य कोई अनुकम्पा करनेमें समर्थ नहीं है)! हे हरे (गोपियोंके काय-मन-वाक्यको हरण करनेवाले)! तुम्हारे दर्शनके बिना हाय-हाय ये अशुभ दिन किस प्रकार तुम्हारी सेवाके बिना कटेंगे? ॥ 58 ॥ अमृतानुकणिका-श्रीराधाके भावोंमें विभावित महाप्रभुके हृदयमें विरहज्वाला और भी प्रज्ज्वलित हो उठी और एक क्षणकाल भी अनेक दिनोंके समान प्रतीत होने लगा, तब अतिशय खेद और विषादके साथ प्रलाप करने लगे, -'हाय हाय! तुम्हारे दर्शनके बिना ये कोटि कल्पोंके समान क्षण कैसे कटेंगे? यह तुम ही बताओ। तुम्हारे अदर्शनके कारण ये दिन सभी विफल हैं।' इसलिये आगे कहने लगे, -'हे अनाथबन्धो !' अपने पति-पुत्रादिको दुःखप्रद जानकर उन्हें त्याग करनेवाली हम अनाथा गोपियोंके तुम ही एकमात्र बन्धु हो।' यदि श्रीकृष्ण कहें कि तुम अपने पति आदिकी सेवा करते हुए अपने नारी धर्मका पालन करते हुए सुखपूर्वक गृहमें अवस्थानको त्यागकर मुझसे मिलनकी प्रार्थना क्यों कर रही हो? तो इसके उत्तरमें राधाजी कह रही हैं,-'हरे!' हे चित्त-इन्द्रियोंको हरण करनेवाले। तुमने हमारे चित्त और इन्द्रियोंका हरण किया है, इसमें तुम्हारा ही दोष है।' यदि श्रीकृष्ण कहें कि कामिनियोंमें तुम ही चपला नारी हो, तो मैं कैसे अपने धर्मका त्याग करूँ (मैं तो ब्रह्मचारी हूँ)? इसलिये दैन्यसहित राधाजी कह रही हैं, -'हे करुणासिन्धो !' तुम तो करुणाके सिन्धु हो, इसलिये धर्मका भी उल्लङ्घनकर मुझ दीनके प्रति अनुग्रह करो अर्थात् कृपाकर दर्शन दो ॥ '58 ॥ कृष्णविरहमें महाप्रभुका विलाप :- “तोमार दर्शन-बिने, अधन्य ए रात्रि-दिने, एइ काल ना याय काटन। तुमि अनाथेर बन्धु, अपार करुणासिन्धु, कृपा करि' देह दरशन ॥" 59 ॥ अनुवाद - "तुम्हारे दर्शन बिना ये अशुभ दिन-रात काटे नहीं कटते। हे कृष्ण! तुम अनाथोंके बन्धु और करुणाके अपार सिन्धु हो। अपने दर्शन देकर इस दीनपर कृपा करो॥"59॥ कृष्णदर्शनके लिये पागल :- उठिल भाव-चापल, मन हइल चञ्चल, भावेर गति बुझन ना याय। अदर्शने पोड़े मन, केमने पाव दरशन, कृष्ण-ठाञि पुछेन उपाय ॥ 60 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें भावोंकी लहरियाँ आने । 65

[ 2/60-61 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[बायाँ स्तम्भ] लगी और उनका मन चञ्चल हो गया। उनके भाव उनको कहाँ ले जायेंगे, यह कोई नहीं समझ सकता। श्रीकृष्णके दर्शन नहीं होनेसे उनका मन जलने लगा। वे श्रीकृष्णसे ही पूछने लगे कि किस उपायसे आपके दर्शन मिलेंगे? ॥ 60 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'चापल'- चापल्य, चपलता ॥ 60 ॥

श्रीकृष्णकर्णामृत (32) बिल्वमङ्गलवाक्य :- त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम् ॥ 61 ॥

अनुवाद- अनुभाष्य देखें ॥ 61 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- हे वंशीविलासी कृष्ण! तुम्हारा शैशव (कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे मुखकमलके दर्शनके लिये अब मैं क्या करूँ? ॥ 61 ॥

अनुभाष्य- हे मुरलीविलासि (गोपीचित्तहारिवंशीवादक,) त्वत् (तव) शैशवं मत् (मम) चापलं च त्रिभुवनाद्भुतं (त्रिलोकमध्ये विचित्रं) - तव वा मम वा (आवयोरव इत्यर्थः) अधिगम्यं (अन्यः कोऽपि न जानाति) विरलं (दुर्लभदर्शनं निर्जने वा) मुग्धं (गोपीमनोहरं) मुखाम्बुजं (वदनकमलं) ईक्षणाभ्यां (नेत्राभ्यां) यथेष्टम् उदीक्षितुम् (अवलोकयितुं) किं करोमि, [तदुपायं कथय]।

श्लोक-भावानुवाद- हे अपनी मधुर वंशीवादनसे गोपियोंके चित्तको हरण करनेवाले! तुम्हारा कैशोर और मेरा चापल्य त्रिभुवनमें अद्भुत हैं। इन्हें मैं और तुम ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं। इसलिये अब वह उपाय बताओ जिससे निर्जनमें तुम्हारे गोपीमनोहर मुखकमलका अपने नेत्रोंसे यथेष्ट रूपसे दर्शन कर सकूँ? ॥ 61 ॥


[दायाँ स्तम्भ] अमृतानुकणिका- श्रीमती राधिका कह रही हैं कि मेरा चापल्य भी तुम्हारे द्वारा उत्पादित होता है, इसलिये तुम इसे जानते हो। और (यह चापल्य) मेरा होनेके कारण मैं भी इसे जानती हूँ। जैसे कोई दूसरेके दुःखको सम्पूर्ण रूपसे नहीं जान सकता, इसी प्रकार मेरे चापल्यको पूर्णरूपसे मेरी सखियाँ भी नहीं जानती हैं। पुनः उद्वेगकी वृद्धि होनेसे राधाजी कहने लगीं कि तुम्हारे मुखकमलको अपने दोनों नेत्रोंके द्वारा मन भरके देखनेके लिये क्या उपाय करूँ? जिससे उसका दर्शन हो, वह उपाय तुम बतलाओ। यदि श्रीकृष्ण कहें कि दर्शन न करनेसे तुम्हारा क्या आता-जाता है? तब उसके उत्तरमें कह रही हैं कि तुम्हारे 'मनोहर' मुखकमलको देखे बिना ये नेत्र धारण करना विफल है। जैसे दानकेलिकौमुदी (श्लोक 55) में- "भवतु माधवजल्पमशृण्वतोः श्रवणयोरलमश्रवणिर्मम। तमवलोकयतोर्विलोकनिः सखि विलोचनयोश्च किलानयोः ॥" अर्थात् श्रीराधारानी वृन्दासे कह रही हैं, - "हे सखि ! मेरे कानोंने माधवका गुणानुवाद नहीं सुना है, इसलिये इनका बहरा हो जाना ही अच्छा है। मेरे दोनों नेत्रोंने उनका अवलोकन नहीं किया है, इसलिये इनका अन्धा हो जाना ही अच्छा है।" यदि श्रीकृष्ण कहें कि अभी नहीं देखनेसे क्या होगा? प्रतीक्षा करो, बादमें मेरे दर्शन होंगे। इसके उत्तरमें राधाजी कहती हैं 'विरलं' अर्थात् मैं कुलवधू हूँ, मेरे लिये यह बहुत दुर्लभ है। उसपर भी तुम गोचारणादिके लिये सारा दिन वनमें चले जाते हो, इसलिये तुम्हारे दर्शन अतीव दुर्लभ हैं। अतएव इस समय निर्जन स्थानमें अवसर पाकर भी दर्शनदान नहीं करते हो, तो यह तुम्हारी निष्ठुरता है। अथवा कोई कहे कि उनके समान किसी औरको देखो, तो कह रही हैं 'विरलं' अर्थात् श्रीकृष्ण अतुलनीय हैं। उसका कारण है-'मुरलीविलासि', अर्थात् ऐसा मुरलीवादन करता मुखकमल किसी औरका नहीं है ॥ 61 ॥

66 ।

दूसरा अध्याय 2/62-64 ] श्लोकका अर्थ :- "तोमार माधुरी-बल, ताते मोर चापल, एइ दुइ, तुमि आमि जानि। काँहा करूँ काँहा याङ, काँहा गेले तोमा पाङ, ताहा मोरे कह त' आपनि॥" 62 ॥ अनुवाद-हे कृष्ण ! तुम्हारी माधुरीका बल और कैसे वह मेरे चित्तको चपल बना देती है, इन दोनोंको तुम भी जानते हो और मैं भी जानती हूँ। तुम बताओ कि मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? कहाँ जानेसे तुम मिलोगे ? ॥ 62 ॥ महाभावमें महाप्रभुका दिव्योन्माद :- नाना-भावेर प्राबल्य, हैल सन्धि-शाबल्य, भावे-भावे हैल महारण। औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोषामर्ष आदि सैन्य, प्रेमोन्माद-सबार कारण॥ 63 ॥ मत्तगज भावगण, प्रभुर देह-इक्षुवन, गज-युद्धे वनेर दलन। प्रभुर हैल दिव्योन्माद, तनुमनेर अवसाद, भावावेशे करे सम्बोधन ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें नाना भाव प्रबल वेगसे आ रहे हैं; दो भावोंका एक साथ समावेश होनेसे भाव-सन्धि और एक भावको दबाकर दूसरे भावका उदय होनेसे भाव-शाबल्य; इस प्रकार भावोंमें परस्पर महायुद्ध हो रहा है। औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोष, अमर्ष आदि भाव इस युद्धमें सैनिक हैं और कृष्णप्रेमका उन्माद ही इन सबका कारण है। महाप्रभुका शरीर गन्नेके खेतके समान था जिसमें मतवाले हाथियोंके समान भाव प्रवेश कर गये। उन हाथियोंमें युद्ध हो गया और उसके कारण वह गन्नेका खेत नष्ट हो गया। महाप्रभुके शरीरमें दिव्योन्माद जाग्रत हो गया और उनके तन-मनमें निराशा छा गयी। भावावेशमें वे कहने लगे॥ 63-64 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दिव्योन्माद'- मोहनभावमें भ्रमके जैसी किसी प्रेमवैचित्य-दशाका नाम 'दिव्योन्माद' है ॥ 64 ॥ अनुभाष्य- 'सन्धि'- (भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “सरूपयोर्भिन्नयोर्वा सन्धिः स्याद्भावयोर्युतिः।” 'सरूपसन्धि'- "सन्धिः सरूपयोस्तत्र भिन्नहेतुत्थयोर्मतः।” 'भिन्नरूप सन्धि'- "भिन्नयोर्हेतुनैकेन भिन्नेनाप्युपजातयोः।” अर्थात् “समानरूप अथवा भिन्नरूप दो भावोंके मिलनको 'सन्धि' कहते हैं। भिन्न-भिन्न कारणोंसे समानरूप दो भावोंके मिलनको 'सरूपसन्धि' और एक कारण या भिन्न कारणसे दो भिन्न भावोंके मिलनको 'भिन्नरूप सन्धि' कहते हैं।" एक कारण या भिन्न कारण-जनित दो भावोंकी सन्धि; हर्ष और शङ्का-दोनोंकी सन्धि, हर्ष और विषादकी सन्धि। 'शाबल्य'- (भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “शबलत्वं तु भावानां संमर्द्दः स्यात् परस्परम्।” अर्थात् “समस्त सञ्चारी भावोंके परस्पर युद्धका नाम 'शाबल्य' है। गर्व, विषाद, दैन्य, मति, स्मृति, शङ्का, अमर्ष, त्रास, निर्वेद, धैर्य और औत्सुक्य आदि भावोंके युद्ध होनेपर 'शाबल्य' होता है।" 'औत्सुक्य'-(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “कालाक्षमत्वमौत्सुक्यमिष्टेष्ठाप्ति-स्पृहादिभिः । मुखशोष-त्वरा-चिन्ता-निश्वास-स्थिरतादिकृत् ॥” अर्थात् “अभीष्टवस्तुके दर्शनकी इच्छा या अभीष्टप्राप्ति-वासनाके लिये काल विलम्ब सहन न कर सकनेको 'औत्सुक्य' कहते हैं। इसमें मुखका सूखना, व्यस्तता, चिन्ता, दीर्घःश्वास और स्थैर्य आदि लक्षित होते हैं।” 'चापल'-(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)- “रागद्वेषादिभिborderश्चित्तलाघवं चापलं भवेत्। तत्राविचारपारुष्यस्वच्छन्दाचरणादयः ॥” अर्थात् “आसक्ति और विरक्तिके द्वारा चित्तकी लघुताको 'चापल' कहते हैं। इसमें अविचार, स्वच्छन्द आचरण और कर्कशवाक्यादि लक्षित होते हैं।” । 67

[ 2/63-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'रोष'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “अपराधदुरुक्त्यादिजातं चण्डत्वमुग्रता। वधबन्धशिरःकम्पभर्त्सनाताड़नादिकृत्॥” अर्थात् “अपराध और बुरे-वचनजनित क्रोधको 'उग्रता' या 'रोष' कहते हैं। इसमें वध, बन्धन, सिरका काँपना, भर्त्सना और ताड़नादि लक्षण होते हैं।” 'अमर्ष'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “अधिक्षेपापमानादेः स्यादमर्षोऽसहिष्णुता॥ तत्र स्वेदः शिरःकम्पो विवर्णत्वं विचिन्तनम्। उपायान्वेषणाक्रोशवैमुख्योत्थाड़नादयः॥” अर्थात् “व्यङ्ग या तिरस्कार और अपमानादिके लिये असहिष्णुताको 'अमर्ष' कहते हैं। इसमें पसीना आना, सिरका काँपना, विवर्णता (रङ्गहीन या कान्तिहीन होना), चिन्ता, उपायको ढूँढना, आक्रोश, विमुखता और ताड़नादि लक्षण होते हैं॥” 63 ॥ प्रियतम श्रीकृष्णके दर्शनकी आकाङ्क्षा :— श्रीकृष्णकर्णामृत (40) बिल्वमङ्गल-श्लोक— हे देव, हे दयित, हे भुवनैकबन्धो, हे कृष्ण, हे चपल, हे करुणैकसिन्धो। हे नाथ, हे रमण, हे नयनाभिराम, हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे॥ 65 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव! हे दयित! हे भुवनके एकमात्र बन्धु! हे कृष्ण! हे चपल! हे करुणासिन्धु! हे नाथ! हे रमण! हे नयनोंको आनन्द देनेवाले! आहा! तुम कब मुझे दर्शन दोगे? ॥ 65 ॥ अनुभाष्य— हे देव, हे दयित (प्रिय), हे भुवनैकबन्धो (व्रजभूम्येकपालक), हे चपल (स्वेच्छाराम), हे करुणैकसिन्धो, हे रमण (गोपीजनरमण), हे नयनाभिराम (नयनानन्द), हे कृष्ण (गोपवध्वाकर्षक), हा हा मे (मम) दृशोः (नयनयोः) पदं (गोचरं) कदा (कस्मिन्काले) नु (किं) भवितासि? श्लोक-भावानुवाद—हे देव! हे प्रियतम! हे व्रजके पालनहारे! हे चपल (स्वेच्छासे रमण करनेवाले)! हे करुणाके सिन्धु! हे गोपीजन-रमण! हे नयनानन्द! हे गोपवधु-आकर्षक! हा हा कब मेरे नयनोंके गोचर होओगे? ॥ 65 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादका वर्णन :— उन्मादेर लक्षण, कराय कृष्ण-स्फुरण, भावावेशे उठे प्रणय-मान। सोल्लुण्ठ-वचन-रीति, मद, गर्व, व्याज-स्तुति, कभु निन्दा, कभु वा सम्मान॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुमें उन्मादके लक्षण उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति कराते। भावके आवेशमें प्रणय, मान, व्यङ्गात्मक वाक्य, मद, गर्व और परोक्ष-स्तुति आदि प्रेमके विकार और सञ्चारी भाव जाग्रत हो गये। वे कभी कृष्णकी निन्दा करते और कभी सम्मान करते॥ 66 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सोल्लुण्ठ'—स्तुतिवाक्यके द्वारा निन्दा॥ 66 ॥ अनुभाष्य— उन्माद'—(भ.र.सि. दःविः चतुर्थ लः)— “उन्मादो हृद्भ्रमः प्रौढ़ानन्दापद्विरहादिजः। अत्राट्टहासो नटनं सङ्गीतं व्यर्थचेष्टितम्। प्रलाप-धावनक्रोश-विपरीत-क्रियादयः॥” अर्थात् “अत्यन्त आनन्द, विपत्ति एवं विरहादिसे उत्पन्न हृदयके भ्रमको 'उन्माद' कहते हैं। उन्मादमें अट्टहास, नृत्य, सङ्गीत, व्यर्थ-चेष्टा, प्रलाप, भागना, चीत्कार और विपरीत क्रियादि अनुभाव होते हैं।” 'प्रणय'—(भःरःसिः पःविः तृतीय लः)— “प्राप्तायां सम्भ्रमादीनां योग्यतायामपि स्फुटम्। तद्गन्धेनाप्यसंस्पृष्टा रतिः प्रणय उच्यते॥” अर्थात् “जिस रतिमें स्पष्टरूपसे सम्भ्रमादिकी प्राप्तिकी योग्यता रहते हुए भी यदि उसे सम्भ्रम लेशमात्र भी स्पर्श नहीं करता, तो उसे 'प्रणय' कहते हैं।” 68 ।

दूसरा अध्याय 2/66-68 ] 'मान'-(उज्ज्वलनीलमणि 14/96)- “स्नेहस्तूत्कृष्टता-व्याप्त्या माधुर्यं मानयन्नवम्। यो धारयत्यदाक्षिण्यं स मान इति कीर्त्यते॥” अर्थात् “जो स्नेह उत्कर्ष प्राप्तिके द्वारा श्रीराधाकृष्णयुगलको नव-नव माधुर्य अनुभव कराता है और अपने भावको गोपन रखनेके लिये बाहरसे कौटिल्यको धारण करता है, उसे 'मान' कहते हैं॥66॥ पूर्वोक्त 'हे देव' श्लोककी व्याख्या :- “तुमि देव-क्रीड़ारत, भुवनेर नारी यत, ताहे कर अभीष्ट क्रीड़न। तुमि मोर दयित, ताते वैस मोर चित, मोर भाग्ये कैले आगमन॥67॥ अनुवाद-[श्लोकके 'हे देव'का भाव]-'तुम देव हो अर्थात् तुम सदा अपनी क्रीड़ामें रत रहते हो। इसलिये जगत्की अन्य समस्त नारियोंके साथ तुम अपनी अभीष्ट क्रीड़ा करो। ['हे दयित'का भाव]-तुम मेरे प्रियतम हो, मेरे हृदयमें विश्राम करो। आज मेरा भाग्य उदित हुआ है, जो तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है॥67॥ अमृतानुकणिका-दिव्योन्माद दशामें महाप्रभु श्रीराधिकाके भावोंमें विभावित होकर 'हे देव...' यह श्लोक पढ़ने लगे। राधाजीकी कृष्णविरहजनित मूर्च्छा दूर हुई और वे चारों ओर देखकर कहने लगीं,–'अहो सखी! मैं नूपुरकी ध्वनि सुन रही हूँ, परन्तु वे तो कहीं दिखायी नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कि इसी कुञ्जमें किसी और रमणीके विलास करते हुए वे शठ यहीं अवस्थान कर रहे हैं।' ऐसा कहकर पुनः उन्मादवश हेतु किसी अन्य रमणीके साथ सङ्गमसे चिह्नाङ्कित श्रीकृष्णको सामने देखकर उनके प्रति राधाजीमें अमर्ष उदित हो गया। और फिर वे चले गये, ऐसा मनमें चिन्तन करनेके बाद तापसे औत्सुक्य उदित हुआ (यहाँ अमर्ष और औत्सुक्य, दोनों भावोंकी सन्धि हुई)। पहले अन्य रमणीके साथ सम्भुक्त श्रीकृष्णका मनमें ही दर्शनकर स्वाभाविक अपना धीराधीर-मध्यत्व (नायिकाके गुण) का आश्रयकर नेत्रोंमें जल भरे हुए राधाजीने वक्रोक्तिसे सम्बोधन किया,–'हे देव!' अन्य रमणियोंके साथ क्रीड़ारत हो, इसलिये तुम देव (क्रीड़ाशील) हो। अतः तुम उन्हींके पास जाओ-यही अर्थ है।' (उःनीः 5/39)- “धीराधीरा तु वक्रोक्त्या सवाष्पं वदति प्रियम्॥” अर्थात् “जो नायिका अपराधी वल्लभके आनेपर अपने नेत्रोंसे आँसुओंको बहाती हुई वक्रोक्ति प्रयोग करती है, उसे धीराधीरमध्यया नायिका कहते हैं।” 'किसी अन्य रमणीके पास जाओ'–राधाजीके यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण जैसे चले गये हैं, ऐसा मनमें सोचकर बादमें हृदयमें तापके उदय होनेसे उनके दर्शनकी उत्सुकतावश कहने लगीं,-' 'हे दयित!', तुम तो मेरे प्राणकोटि प्रियतम हो, मैं कैसे तुम्हारा त्याग कर सकती हूँ? इसलिये दर्शन दो-यह अर्थ है॥'67॥ भुवनेर नारीगण, सबा' कर आकर्षण, ताँहा कर सब समाधान। तुमि कृष्ण-चित्तहर, ऐछे कोन् पामर, तोमारे वा केबा करे मान॥68॥ अनुवाद-[हे भुवनैकबन्धौ!] जगत्में सभी रमणियोंके चित्तको तुम वंशीध्वनिके द्वारा आकर्षित करते हो और उन सबके मनकी सन्तुष्टिका विधान करते हो। [हे कृष्ण!] निज रूप-गुण-माधुर्यके द्वारा तुम सभीके चित्तको हरण करनेवाले हो। ऐसा कौन अधम है जो तुमसे मान करेगा? अर्थात् कोई भी नहीं कर सकता॥68॥ अमृतानुकणिका-पुनः श्रीकृष्ण आकर अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर राधाजीमें अमर्षके अनुगत असूयाका उदय हुआ। असूयाके उदय होनेसे धीराधीर-मध्य भावका आश्रयकर वक्रोक्तिसे सोलुण्ठ । 69

[ 2/68–70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

वचन (परिहासयुक्त वचन, स्तुतिपूर्वक निन्दा) बोलने लगीं,–'हे भुवनैकबन्धो!' इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम तो केवल मेरे ही बन्धु नहीं हो, सभी गोपियोंके भी केवल नहीं, वेणुनादसे समस्त भुवनोंके, अर्थात् समस्त भुवनोंमें रहनेवाली स्त्रियोंके तुम बन्धु हो, इसलिये उनके सब कार्योंके समाधान हेतु जाओ—यह अर्थ है। उसका लक्षण (उःनीः 5/35)— “धीरा तु वक्ति वक्रोक्त्या सोत्रासं सागसं प्रियम्॥” अर्थात् “जो नायिका अपने अपराधी प्रियतमके प्रति उपहासपूर्वक वक्रोक्तिका प्रयोग करती है, उसको 'धीरमध्या' कहा जाता है॥” पुनः श्रीकृष्ण जैसे चले गये, ऐसा मनमें जानकर औत्सुक्यके अनुगत मति–नामक भावके उदयसे कहने लगीं,–'हे कृष्ण!'–हे श्यामसुन्दर, तुम सबके चित्ताकर्षक हो। मेरा चित्त तो तुमने पहले ही हरण कर लिया था, अब मेरे मान करनेका क्या प्रयोजन है? इसलिये एकबार तो दर्शन दो—यह अर्थ है॥'68॥

तोमार चपल मति, एकत्र ना हय स्थिति, ता'ते तोमार नाहि किछु दोष। तुमि त' करुणासिन्धु, आमार पराण–बन्धु, तोमाय नाहि मोर कभु रोष॥69॥

अनुवाद–[हे चपल!] तुम्हारी मति अति चञ्चल है, तुम्हारे मनकी कहीं स्थिरता नहीं है। तुम्हारा मन किसी एक रमणीमें स्थिर नहीं रहता। [करुणैकसिन्धो!] तुम तो करुणाके सिन्धु हो। तुम तो मेरे प्राणोंसे प्रिय बन्धु हो, इसलिये मैं तुमसे कभी भी रुष्ट नहीं हो सकती॥69॥

अमृतानुकणिका—पुनः श्रीकृष्ण जैसे आकर विनय कर रहे हैं,–'प्रिये! मैं बाहर ही था, कहीं और गया नहीं था, अतः तुम प्रसन्न होओ।' इस प्रकार श्रीकृष्ण अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर राधाजीमें औग्रद्य या उग्रता नामक भाव उदय हो गया। उग्रता नामक भाव उदय होनेसे अधीरामध्या नायिकाके गुणोंका आश्रय करके रोषसहित राधाजी बोलीं,–'हे चपल!' हे चपलराज परस्त्री–चोर! जाओ जाओ, यहाँसे चले जाओ—यह अर्थ है।' अधीराके लक्षण (उःनीः 5/37)— “अधीरा परुषैर्वाक्यै र्निरस्येद्वल्लभं रुषा॥” अर्थात् “जो नायिका अपने रोषको प्रकाशकर अपने वल्लभको निष्ठुर वाक्योंसे फटकार लगाती है, उसको अधीरामध्या कहा जाता है।” राधाजीको लगा कि मेरे रोषपूर्ण वाक्य सुनकर श्रीकृष्ण चले गये हैं, तो अपने मनमें ग्लानिसे सोचने लगीं,–'हाय! मैंने उनका अनादर कर दिया, इस कारण वे चले गये हैं और अब वे नहीं आयेंगे'—इस प्रकार दैन्य उदय होनेसे सकाकु (मिनतीपूर्वक) बोलीं,–'हे करुणैकसिन्धो!' तुम तो करुणाके एकमात्र सिन्धु हो, यद्यपि मैं अपराधिनी हूँ, तथापि तुम करुणासे आर्द्र होकर दर्शन दो॥'69॥

श्रीकृष्णके प्रति क्षमा या प्रसन्न भाव :– तुमि नाथ—व्रजप्राण, व्रजेर कर परित्राण, बहु कार्ये नाहि अवकाश। तुमि आमार रमण, सुख दिते आगमन, ए तोमार वैदग्ध्य–विलास॥70॥

अनुवाद–[हे नाथ!] हे कृष्ण! तुम व्रजके नाथ, व्रजवासियोंके प्राण हो। व्रजवासियोंकी रक्षाके लिये तुम अनेक कार्योंमें व्यस्त रहते हो, इसलिये मेरे पास आनेका तुम्हें अवकाश नहीं है। [हे रमण!] तुम तो सदा ही मेरे हृदयमें रमण करते रहते हो और मुझे सुख प्रदान करनेके लिये मेरे पास आये हो, यह तुम्हारे विलासका वैदग्ध्य है॥70॥ अनुभाष्य–'वैदग्ध्य'–पटुता, पाण्डित्य, रसिकता, चतुरता, शोभा और भङ्गी॥70॥

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