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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ अगस्त, १८८२ परिच्छेद ७ ४५

तू सब छोड़कर ईश्वर-लाभ की चेष्टा कर। कोई साधु हो चाहे गृहस्थ, मन से सारी आसक्ति दूर करनी चाहिए।

“जब चैतन्यदेव दक्षिण में तीर्थ-भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आदमी गीता पढ़ रहा है। एक दूसरा आदमी थोड़ी दूर बैठ उसे सुन रहा है और सुनकर रो रहा है – आँखों से आँसू बह रहे हैं। चैतन्यदेव ने पूछा, ‘क्या तुम यह सब समझ रहे हो?’ उसने कहा, ‘प्रभु, इन श्लोकों का अर्थ तो मैं नहीं समझता हूँ।’ उन्होंने पूछा, ‘तो रोते क्यों हो?’ भक्त ने जवाब दिया, मैं देखता हूँ कि अर्जुन का रथ है और उसके सामने भगवान् और अर्जुन बातचीत कर रहे हैं। बस, यही देखकर मैं रो रहा हूँ।’ ”

(५)

भक्तियोग का रहस्य

श्रीरामकृष्ण – विज्ञानी क्यों भक्ति लिए रहते हैं? इसका उत्तर यह है कि ‘मैं’ नहीं दूर होता। समाधि-अवस्था में दूर तो होता है, परन्तु फिर आ जाता है। साधारण जीवों का ‘अहम्’ नहीं जाता। पीपल का पेड़ काट डालो, फिर उसके दूसरे दिन अंकुर निकल आता है। (सब हँसे।)

“ज्ञानलाभ के बाद भी, न जाने कहाँ से ‘मैं’ फिर आ जाता है। स्वप्न में तुमने बाघ देखा; इसके बाद जागे, तो भी तुम्हारी छाती धड़कती है। जीवों को जो दुःख होता है, ‘मैं’ से ही होता है। बैल ‘हम्बा, हम्बा’ (हम, हम) करता है, इसी से तो इतनी यातना मिलती है। हल में जोता जाता है, वर्षा और धूप सहनी पड़ती है और फिर कसाई लोग काटते हैं, चमड़े से जूते बनते हैं, ढोल बनता है, – तब खूब पिटता है। (हास्य)

“फिर भी निस्तार नहीं। अन्त में आँतों से ताँत बनती है और उसे धुनिया अपने धनुहे में लगाता है। तब वह ‘मैं’ नहीं कहता, तब कहता है ‘तू-ऊँ, तू-ऊँ’ (अर्थात् तुम, तुम)। जब ‘तुम’ ‘तुम’ कहता है तब निस्तार होता है। हे ईश्वर! मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो; मैं सन्तान हूँ, तुम माँ हो।

“राम ने पूछा, हनुमान, तुम मुझे किस भाव से देखते हो? हनुमान ने कहा, राम! जब मुझे ‘मैं’ का बोध रहता है, तब देखता हूँ, तुम पूर्ण हो, मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ; और राम! जब तत्त्वज्ञान होता है तब देखता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और मैं ही ‘तुम’ हूँ।

“सेव्य-सेवक भाव ही अच्छा है। ‘मैं’ जब कि हटने का ही नहीं तो बना रहने दो साले को ‘दास मैं’।

४६श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

'मैं' और 'मेरा' अज्ञान है

“मैं और मेरा – ये दोनों अज्ञान हैं। यह भाव कि मेरा घर है, मेरे रुपये हैं, मेरी विद्या है, मेरा यह सब ऐश्वर्य है – अज्ञान से पैदा होता है और यह भाव ज्ञान से कि हे ईश्वर, तुम कर्ता हो और ये सब तुम्हारी चीजें हैं – घर-परिवार, लड़के-बच्चे, स्वजनवर्ग, बन्धु-बान्धव – ये सब तुम्हारी वस्तुएँ हैं।

“मृत्यु का सर्वदा स्मरण रखना चाहिए। मरने के बाद कुछ भी न रह जाएगा। यहाँ कुछ कर्म करने के लिए आना हुआ है। जैसे कि देहात में घर है, परन्तु काम करने के लिए कलकत्ते आया जाता है। यदि कोई दर्शक बगीचा देखने को आता है तो धनी मनुष्यों के बगीचे का कर्मचारी कहता है – यह बगीचा हमारा है, यह तालाब हमारा है; परन्तु किसी कसूर पर जब वह नौकरी से अलग कर दिया जाता है, तब आम की लकड़ी के बने हुए सन्दूक को ले जाने का भी उसे अधिकार नहीं रह जाता, सन्दूक दरवान के हाथ भेज दिया जाता है। (हास्य)

“भगवान् दो बातों पर हँसते हैं। एक तो जब वैद्य रोगी की माँ से कहता है – माँ, क्या भय है? मैं तुम्हारे लड़के को अच्छा कर दूँगा। उस समय भगवान् यह सोचकर हँसते हैं कि मैं मार रहा हूँ और यह कहता है, मैं बचाऊँगा। वैद्य सोचता है – मैं कर्ता हूँ। ईश्वर कर्ता है – यह वह भूल गया है। दूसरा अवसर वह होता है जब दो भाई रस्सी लेकर जमीन नापते हैं और कहते हैं – इधर की मेरी है, उधर की तुम्हारी। तब ईश्वर और एक बार हँसते हैं; यह सोचकर हँसते हैं कि जगत्-ब्रह्माण्ड मेरा है, पर ये कहते हैं, यह जगह मेरी है और वह तुम्हारी।”

उपाय – विश्वास और भक्ति

श्रीरामकृष्ण – उन्हें क्या कोई विचार द्वारा जान सकता है? दास होकर – शरणागत होकर उन्हें पुकारो।

(विद्यासागर के प्रति, हँसते हुए) – “अच्छा, तुम्हारा भाव क्या है?”

विद्यासागर मुसकरा रहे हैं। कहते हैं, “अच्छा, यह बात आपसे किसी दिन निर्जन में कहूँगा।” (सब हँसे।)

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – उन्हें पाण्डित्य द्वारा विचार करके कोई जान नहीं सकता।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेम से मतवाले होकर गाने लगे। संगीत का मर्म है –

“कौन जानता है कि काली कैसी है? षड्दर्शनों ने उसका दर्शन नहीं पाया। मूलाधार और सहस्रार में योगी लोग सदा उसका ध्यान करते हैं। वह पद्मवन में हंस के साथ हंसी जैसे रमण करती है। वह आत्माराम की आत्मा है, प्रणव का प्रमाण है। वह इच्छामयी अपनी इच्छा के अनुसार घट घट में विराजमान है। माता के जिस उदर में यह ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, समझो कि वह कितना बड़ा हो सकता है। काली का माहात्म्य

५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ४७

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महाकाल ही जानते हैं। वैसा और कोई नहीं समझ सकता। उसको जानने का लोगों का प्रयास देखकर ‘प्रसाद’ हँसता है। अपार सागर क्या कोई तैरकर पार कर सकता है? यह मेरा मन समझ रहा है, परन्तु फिर भी जी नहीं मानता, वामन होकर चन्द्रमा की ओर हाथ बढ़ाता है।’

“सुना? कहते हैं – माता के जिस उदर में ब्रह्माण्ड समाया हुआ है समझो कि वह कितना बड़ा है’ और यह भी कहा है कि षड्दर्शनों ने उसका दर्शन नहीं पाया। पाण्डित्य द्वारा उसे प्राप्त करना असम्भव है।

विश्वास का बल – ईश्वर के प्रति विश्वास तथा महापातक

“विश्वास और भक्ति चाहिए। विश्वास कितना बलवान है, सुनो। किसी मनुष्य को लंका से समुद्र के पार जाना था। विभीषण ने कहा – इस वस्तु को कपड़े के छोर में बाँध लो तो बिना किसी बाधा के पार हो जाओगे, जल के ऊपर से चल कर जा सकोगे; परन्तु खोलकर न देखना, खोलकर देखोगे तो डूब जाओगे। वह मनुष्य आनन्दपूर्वक समुद्र के ऊपर से चला जा रहा था, विश्वास की ऐसी शक्ति है। कुछ रास्ता पार कर वह सोचने लगा कि विभीषण ने ऐसा क्या बाँध दिया, जिसके बल से मैं पानी के ऊपर से चला जा रहा हूँ! यह सोचकर उसने गाँठ खोली और देखा तो एक पत्ते पर केवल ‘रामनाम’ लिखा था! तब वह मन ही मन कहने लगा – अरे, बस यही है! ज्योंही यह सोचा कि डूब गया।

“यह कहावत प्रसिद्ध है कि रामनाम पर हनुमान का इतना विश्वास था कि विश्वास ही के बल से वे समुद्र लाँघ गये, परन्तु स्वयं राम को सेतु बाँधना पड़ा था।

“यदि उन पर विश्वास हो तो चाहे पाप करे और चाहे महापातक ही करे, किन्तु किसी से भय नहीं होता।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण भक्त के भावों से मस्त होकर विश्वास का माहात्म्य गा रहे हैं –

(भावार्थ) – “दुर्गा दुर्गा अगर जपूँ मैं, जब मेरे निकलेंगे प्राण।
देखूँ कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान।”

(६)

जीवन का उद्देश्य – ईश्वरप्रेम

“विश्वास और भक्ति। भक्ति से वे सहज ही में मिलते हैं। वे भाव के विषय हैं।”
यह कहते हुए श्रीरामकृष्ण ने फिर भजन आरम्भ किया। भाव यह है –
“मन तू अँधेरे घर में पागल जैसा उसकी खोज क्यों कर रहा है? वह तो भाव का

४८श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

विषय है। बिना भाव के, अभाव द्वारा क्या कोई उसे पकड़ सकता है? पहले अपनी शक्ति द्वारा कामक्रोधादि को अपने वश में करो। उसका दर्शन न तो षड्दर्शनों ने पाया, न निगमागम-तन्त्रों ने। वह भक्तिरस का रसिक है, सदा आनन्दपूर्वक हृदय में विराजमान है। उस भक्तिभाव को पाने के लिए बड़े बड़े योगी युग-युगान्तर से योग कर रहे हैं। जब भाव का उदय होता है, तब भक्त को वह अपनी ओर खींच लेता है। जैसे लोहे को चुम्बक। ‘प्रसाद’ कहता है कि मैं मातृभाव से जिसकी खोज कर रहा हूँ, उसके तत्त्व का भण्डा क्या मुझे चौराहे पर फोड़ना होगा? मन, इशारे से ही समझ लो।”

श्रीरामकृष्ण समाधि में

गाते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गए, हाथों की अंजलि बँध गयी – देह उन्नत और स्थिर, – नेत्र स्पन्दहीन हो गए। पश्चिम की ओर मुँह किये उसी बेंच पर पैर लटकाए बैठे रहे। सभी लोग गर्दन ऊँची करके यह अद्भुत अवस्था देखने लगे। पण्डित विद्यासागर भी चुपचाप एकटक देख रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हुए। लम्बी साँस छोड़कर फिर हँसते हुए बातें कर रहे हैं – “भाव भक्ति, इसके माने उन्हें प्यार करना। जो ब्रह्म हैं, उन्हीं को माँ कहकर पुकारते हैं।

“‘प्रसाद कहता है कि मैं मातृभाव से जिसकी खोज कर रहा हूँ उसके तत्त्व का भण्डा क्या मुझे चौराहे पर फोड़ना होगा? मन, इशारे ही से समझ लो।’

“रामप्रसाद मन को इशारे ही से समझने के लिए उपदेश करते हैं। यह समझने को कहते हैं कि वेदों ने जिन्हें ब्रह्म कहा है उन्हीं को मैं माँ कहकर पुकारता हूँ। जो निर्गुण हैं वे ही सगुण हैं; जो ब्रह्म हैं वे ही शक्ति हैं। जब यह बोध होता है कि वे निष्क्रिय हैं तब उन्हें ब्रह्म कहता हूँ और जब यह सोचता हूँ कि वे सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं, तब उन्हें आद्याशक्ति काली कहता हूँ।

“ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं, जैसे कि अग्नि और उसकी दाहिकाशक्ति। अग्नि कहते ही दाहिकाशक्ति का ज्ञान होता है और दाहिकाशक्ति कहने से अग्नि का ज्ञान। एक को मानिए तो दूसरा भी साथ मान लिया जाता है।

“उन्हीं को भक्तजन माँ कहकर पुकारते हैं। माँ बड़े प्यार की वस्तु है न। ईश्वर को प्यार करने से वे प्राप्त होते हैं; भाव, भक्ति, प्रीति और विश्वास चाहिए। एक गाना और सुनो –

भाव और विश्वास

(भावार्थ) – “‘चिन्तन करने से भाव का उदय होता है। जैसा भाव होगा, लाभ भी वैसा होगा, मूल है प्रत्यय। काली के चरण-सुधासागर में यदि चित्त डूब जाय तो पूजा-होम, याग-यज्ञ – कुछ भी आवश्यक नहीं।’”

५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ४९

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"चित्त को उन पर लगाना चाहिए, उन्हें प्यार करना चाहिए। वे सुधासागर हैं; अमृतसिन्धु हैं; इसमें डूबने से मनुष्य मरता नहीं, अमर हो जाता है। किसी किसी का यह विचार है कि ईश्वर को ज्यादा पुकारने से मस्तिष्क बिगड़ जाता है, पर बात ऐसी नहीं। यह तो सुधासमुद्र है, अमृतसिन्धु है। वेदों में इसे अमृत कहा है। इसमें डूब जाने से कोई मरता नहीं, अमर हो जाता है।"

निष्काम कर्म तथा जगतकल्याण

"पूजा, होम, याग, यज्ञ - ये कुछ नहीं हैं। यदि ईश्वर पर प्रीति पैदा हो जाय तो इन कर्मों की अधिक आवश्यकता नहीं। जब तक हवा नहीं बहती तभी तक पंखे की जरूरत होती है। यदि दक्षिणी हवा आप ही आने लगे तो पंखा रख देना पड़ता है। फिर पंखे का क्या काम?

"तुम जो काम कर रहे हो, ये सब अच्छे कर्म हैं। यदि 'मैं कर्ता हूँ' इस भाव को छोड़कर निष्काम भाव से कर्म कर सको तो और भी अच्छा है। यह कर्म करते करते ईश्वर पर भक्ति और प्रीति होगी। इस प्रकार निष्काम कर्म करते जाओ तो ईश्वर-लाभ भी होगा।

"उन पर जितनी ही भक्ति-प्रीति होगी, उतने ही तुम्हारे काम घटते जाएँगे। गृहस्थ की बहू जब गर्भिणी होती है, तब उसकी सास उसका काम कम कर देती है। नौ महीने पूरे होने पर बिलकुल काम छूने नहीं देती। उसे डर रहता है कि कहीं बच्चे को कोई हानि न पहुँचे, सन्तान-प्रसव में कोई विपत्ति न हो। (हास्य) तुम जो काम कर रहे हो, उससे तुम्हारा ही उपकार है। निष्काम भाव से कर्म कर सकोगे तो चित्त की शुद्धि होगी, ईश्वर पर तुम्हारा प्रेम होगा। प्रेम होते ही तुम उन्हें प्राप्त कर लोगे। संसार का उपकार मनुष्य नहीं करता, वे ही करते हैं जिन्होंने चन्द्र-सूर्य की सृष्टि की, माता-पिता को स्नेह दिया, सत्पुरुषों में दया का संचार किया और साधु-भक्तों को भक्ति दी। जो मनुष्य कामनाशून्य होकर कर्म करेगा वह अपना ही हित करेगा।

निष्काम कर्म का उद्देश्य – ईश्वरदर्शन

"भीतर सुवर्ण है, अभी तक तुम्हें पता नहीं चला। ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी है। यदि एक बार पता चल जाय तो अन्य काम घट जाएँगे। गृहस्थ की बहू के लड़का होने से वह लड़के ही को लिए रहती है, उसी को उठाती बैठाती है। फिर उसकी सास उसे घर के काम में हाथ नहीं लगाने देती। (सब हँसे)

"और भी 'आगे बढ़ो।' लकड़हारा लकड़ी काटने गया था; ब्रह्मचारी ने कहा - आगे बढ़ जाओ। उसने आगे बढ़कर देखा तो चन्दन के पेड़ थे! फिर कुछ दिन बाद उसने सोचा कि ब्रह्मचारी ने बढ़ जाने को कहा था, सिर्फ चन्दन के पेड़ तक तो जाने को कहा नहीं। आगे चलकर देखा तो चाँदी की खान थी।

५० श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अगस्त, १८८२

फिर कुछ दिन बीतने पर और आगे बढ़ा और देखा तो सोने की खान मिली। फिर क्रमशः हीरे की - मणियों की। वह सब लेकर वह मालामाल हो गया।

“निष्काम कर्म कर सकने से ईश्वर पर प्रेम होता है। क्रमशः उनकी कृपा से उन्हें लोग पाते भी हैं। ईश्वर के दर्शन होते हैं, उनसे बातचीत होती है जैसे कि मैं तुमसे वार्तालाप कर रहा हूँ।” (सब निःशब्द हैं।)

(७)

अहेतुक कृपासिन्धु श्रीरामकृष्ण

सब की जबान बन्द हैं। लोग चुपचाप बैठे ये बातें सुन रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की जिह्वा पर मानो साक्षात् वाग्वादिनी बैठी हुई जीवों के हित के लिए विद्यासागर से बातें कर रही हैं। रात हो रही है - नौ बजने को है। श्रीरामकृष्ण अब चलनेवाले हैं।

श्रीरामकृष्ण (विद्यासागर से, सहास्य) - यह सब जो कहा, वह तो ऐसे ही कहा। आप सब जानते हैं, किन्तु अभी आपको इसकी खबर नहीं। (सब हँसे।) वरुण के भण्डार में कितने ही रत्न पड़े हैं, परन्तु वरुण महाराज को कोई खबर नहीं।

विद्यासागर (हँसते हुए) - यह आप कह सकते हैं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ जी, अनेक बाबू नौकरों के नाम तक नहीं जानते! (सब हँसते हैं।) घर में कहाँ कौनसी कीमती चीज पड़ी है, वे नहीं जानते।

वार्तालाप सुनकर लोग आनन्दित हो रहे हैं। थोड़ी देर के लिए सब लोग शांत हो गए। श्रीरामकृष्ण विद्यासागर से फिर प्रसंग उठाते हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसमुख) - एक बार बगीचा देखने जाइए, रासमणि का बगीचा बड़ी अच्छी जगह है।

विद्यासागर - जरूर जाऊँगा। आप आए और मैं न जाऊँगा?

श्रीरामकृष्ण - मेरे पास? राम राम

विद्यासागर - यह क्या! ऐसी बात आपने क्यों कही? मुझे समझाइए।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हम लोग छोटी छोटी किश्तियाँ हैं जो खाई, नाले और बड़ी नदियों में भी जा सकती हैं। परन्तु आप हैं जहाज; कौन जानता है, जाते समय रेत में लग जाय! (सब हँसते हैं।)

विद्यासागर प्रफुल्लमुख किन्तु चुपचाप बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण हँसते हैं।

श्रीरामकृष्ण - पर हाँ, इस समय जहाज भी जा सकता है।

विद्यासागर - (हँसते हुए) - हाँ, ठीक है, यह वर्षाकाल है। (लोग हँसे।)

मास्टर (स्वगत्) - नवानुराग की वर्षा, नवानुराग जब होता है, तब मान-अपमान का बोध क्या रह सकता है।

५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ५१

५ अगस्त, १८८२परिच्छेद ७५१

श्रीरामकृष्ण उठे। भक्तजन भी उठे। विद्यासागर आत्मीयों के साथ खड़े हैं, श्रीरामकृष्ण को गाड़ी पर चढ़ाने जाएँगे।

श्रीरामकृष्ण अब भी खड़े हैं। करजाप कर रहे हैं। जपते हुए भाव के आवेश में आ गए, मानो विद्यासागर के आत्मिक हित के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हों।

भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण उतर रहे हैं। एक भक्त हाथ पकड़े हुए हैं। विद्यासागर स्वजन-बन्धुओं के साथ आगे आगे जा रहे हैं, हाथ में बत्ती लिए रास्ता दिखाते हुए। सावन की कृष्णपक्ष की षष्ठी है, अभी चन्द्रोदय नहीं हुआ है। अँधेरे से ढकी हुई उद्यान-भूमि को बत्ती के मन्द प्रकाश के सहारे किसी तरह पार कर लोग फाटक की ओर आ रहे हैं।

भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण फाटक के पास ज्योंही पहुँचे त्योंही एक सुन्दर दृश्य ने सब को चकित कर दिया। सामने एक दाढ़ीवाले, गौरवर्ण पुरुष खड़े थे। उम्र छत्तीस-सैंतीस वर्ष की होगी। बंगालियों की तरह पोशाक थी पर सिर पर सिक्खों की तरह शुभ्र साफा बँधा था। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को देखते ही भूमि पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। उनके उठ खड़े होने पर श्रीरामकृष्ण ने कहा, “बलराम तुम हो? इतनी रात को?”

बलराम (हँसकर) – मैं बड़ी देर से आया हूँ।

श्रीरामकृष्ण – भीतर क्यों नहीं गए?

बलराम – जी, लोग आपका वार्तालाप सुन रहे थे। बीच में पहुँचकर क्यों शान्ति भंग करूँ, यह सोचकर नहीं गया।

यह कहकर बलराम हँसने लगे।

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ गाड़ी पर बैठ गए।

विद्यासागर (मास्टर से धीमी आवाज में) – गाड़ी का किराया क्या दे दें?

मास्टर – जी नहीं, दे दिया गया है।

विद्यासागर और अन्यान्य लोगों ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

गाड़ी उत्तर की ओर चलने लगी, दक्षिणेश्वर काली मन्दिर को जाएगी। सब लोग गाड़ी की ओर देखते हुए खड़े हैं। सोच रहे हैं – ये महापुरुष कौन हैं? ये ईश्वर पर कितना प्रेम करते हैं फिर जीवों के घर घर जाकर कहते हैं कि ईश्वर पर प्रेम करना ही जीवन का उद्देश्य है।

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परिच्छेद ८

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परिच्छेद ८

दक्षिणेश्वर में केदार द्वारा आयोजित उत्सव

दक्षिणेश्वर के मन्दिर में श्रीरामकृष्ण केदार आदि भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। आज रविवार, अमावस्या, १३ अगस्त १८८२ ई. है, समय दिन के पाँच बजे का होगा।

श्री केदार चटर्जी का मकान हालीशहर में है। ये सरकारी अकाउन्टेन्ट का काम करते थे। बहुत दिन ढाका में रहे। उस समय श्री विजय गोस्वामी उनके साथ सदा श्रीरामकृष्ण के विषय में वार्तालाप करते थे। ईश्वर की बात सुनते ही उनकी आँखों में आँसू भर आते थे। वे पहले ब्राह्मसमाज में थे।

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के दक्षिणवाले बरामदे में भक्तों के साथ बैठे हैं। राम, मनोमोहन, सुरेन्द्र, राखाल, भवनाथ, मास्टर आदि अनेक भक्त उपस्थित हैं। केदार ने आज उत्सव किया है; सारा दिन आनन्द से बीत रहा है। राम ने एक गायक बुलाया है। उन्होंने गाना गाया। गाने के समय श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न होकर कमरे में छोटी खाट पर बैठे हैं। मास्टर तथा अन्य भक्तगण उनके पैरों के पास बैठे हैं।

समाधितत्त्व तथा सर्वधर्मसमन्वय – हिन्दु, मुसलमान और ईसाई

श्रीरामकृष्ण वार्तालाप करते करते समाधितत्त्व समझा रहे हैं। कह रहे हैं, “सच्चिदानन्द की प्राप्ति होने पर समाधि होती है, उस समय कर्म का त्याग हो जाता है। मैं गायक का नाम ले रहा हूँ, ऐसे समय यदि वे आकर उपस्थित होते हैं तो फिर उनका नाम लेने की क्या आवश्यकता? मधुमक्खी गुनगुन करती है कब तक? – जब तक फूल पर नहीं बैठती। कर्म का त्याग करने से साधक का न बनेगा; पूजा, जप, तप, ध्यान, सन्ध्या, कवच, तीर्थ आदि सभी करना होगा।

“ईश्वरप्राप्ति के बाद यदि कोई विचार करता है तो वह वैसा ही है जैसा मधुमक्खी मधु का पान करती हुई अस्फुट स्वर से गुनगुनाती रहे।”

गायक ने अच्छा गाना गाया था। श्रीरामकृष्ण प्रसन्न हो गए। उससे कह रहे हैं, “जिस मनुष्य में कोई एक बड़ा गुण है, जैसे संगीत-विद्या, उसमें ईश्वर की शक्ति विशेष रूप से वर्तमान है।”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१३ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद | ५३

१३ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद | ५३

गायक – महाराज, किस उपाय से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है?

श्रीरामकृष्ण – भक्ति ही सार है। ईश्वर तो सर्वभूतों में विराजमान हैं। तो फिर भक्त किसे कहूँ – जिसका मन सदा ईश्वर में है। अहंकार, अभिमान रहने पर कुछ नहीं होता। 'मैं'रूपी टीले पर ईश्वरकृपारूपी जल नहीं ठहरता; लुढ़क जाता है। मैं यन्त्र हूँ।

(केदार आदि भक्तों के प्रति) “सब मार्गों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। सभी धर्म सत्य हैं। छत पर चढ़ने से मतलब है, सो तुम पक्की सीढ़ी से भी चढ़ सकते हो, लकड़ी की सीढ़ी से भी चढ़ सकते हो, बाँस की सीढ़ी से भी चढ़ सकते हो, रस्सी के सहारे भी चढ़ सकते हो और फिर एक गाँठदार बाँस के जरिये भी चढ़ सकते हो।

“यदि कहो, दूसरों के धर्म में अनेक भूल, कुसंस्कार हैं, तो मैं कहता हूँ, हैं तो रहें, भूल सभी धर्मों में है। सभी समझते हैं मेरी घड़ी ठीक चल रही है। व्याकुलता होने से ही हुआ। उनसे प्रेम आकर्षण रहना चाहिए। वे अन्तर्यामी जो हैं। वे अन्तर की व्याकुलता, आकर्षण को देख सकते हैं। मानो एक मनुष्य के कुछ बच्चे हैं। उनमें से जो बड़े हैं वे 'बाबा' या 'पापा' इन शब्दों को स्पष्ट रूप से कहकर, उन्हें पुकारते हैं। और जो बहुत छोटे हैं वे बहुत हुआ तो 'बा' या 'पा' कहकर पुकारते हैं। जो लोग सिर्फ 'बा' या 'पा' कह सकते हैं, क्या पिता उनसे असन्तुष्ट होंगे? पिता जानते हैं कि वे उन्हें ही बुला रहे हैं, परन्तु वे अच्छी तरह उच्चारण नहीं कर सकते। पिता की दृष्टि में सभी बच्चे बराबर हैं।

“फिर भक्तगण उन्हें ही अनेक नामों से पुकार रहे हैं। एक ही व्यक्ति को बुला रहे हैं। एक तालाब के चार घाट हैं। हिन्दू लोग एक घाट में जल पी रहे हैं और कहते हैं जल। मुसलमान लोग दूसरे घाट में पी रहे हैं – कहते हैं पानी। अंग्रेज लोग तीसरे घाट में पी रहे हैं और कह रहे हैं वाटर (Water) और कुछ लोग चौथे घाट में पी रहे हैं और कहते हैं अकुवा (aqua) एक ईश्वर, उनके अनेक नाम हैं।”

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परिच्छेद ९

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परिच्छेद ९

दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ विराजमान हैं। दिन बृहस्पतिवार है, सावन शुक्ला दशमी, २४ अगस्त १८८२ ई.।

आजकल श्रीरामकृष्ण के पास हाजरा महाशय, रामलाल, राखाल आदि रहते हैं। श्रीयुत रामलाल श्रीरामकृष्ण के भतीजे हैं; कालीमन्दिर में पूजा करते हैं। मास्टर ने आकर देखा, उत्तर-पूर्व के लम्बे बरामदे में श्रीरामकृष्ण हाजरा के पास खड़े हुए बातें कर रहे हैं। मास्टर ने भूमिष्ठ हो श्रीरामकृष्ण की चरणवन्दना की।

श्रीरामकृष्ण का मुख सहास्य है। मास्टर से कहने लगे – “विद्यासागर से और भी दो एक बार मिलना चाहिए। चित्रकार पहले नक्शा खींच लेता है, फिर उस पर रंग चढ़ाता रहता है। प्रतिमा पर पहले दो तीन बार मिट्टी चढ़ायी जाती है, फिर सफेद रंग चढ़ाया जाता है, फिर वह ढंग से रँगी जाती है। – विद्यासागर का सब कुछ ठीक है, सिर्फ ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई है। कुछ अच्छे काम करता है; परन्तु हृदय में क्या है उसकी खबर नहीं। हृदय में सोना दबा पड़ा है। हृदय में ईश्वर है, – यह समझने पर सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उसे पुकारने की इच्छा होती है।”

श्रीरामकृष्ण मास्टर से खड़े खड़े वार्तालाप कर रहे हैं, कभी बरामदे में टहल रहे हैं।

साधना – कामिनी-कांचनरूपी तूफान से पार होने के लिए

श्रीरामकृष्ण – हृदय में क्या है इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए कुछ साधना आवश्यक है।

मास्टर – साधना क्या बराबर करते ही जाना चाहिए?

श्रीरामकृष्ण – नहीं, पहले कुछ कमर कसकर करनी चाहिए। फिर ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती। जब तक तरंग, आँधी, तूफान और नदी की मोड़ से नौका जाती है तभी तक मल्लाह को मजबूती से पतवार पकड़नी पड़ती है; उतने से पार हो जाने पर फिर नहीं। जब वह मोड़ से बाहर हो गया और अनुकूल हवा चली तब वह आराम से बैठा रहता है, पतवार में हाथ भर लगाए रहता है। फिर तो पाल टाँगने का बन्दोबस्त करके आराम

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

२४ अगस्त, १८८२

परिच्छेद ९

५५

से चिलम भरता है। कामिनी और कांचन की आँधी, तूफान से निकल जाने पर शान्ति मिलती है।

श्रीरामकृष्ण तथा योगतत्त्व - योगभ्रष्ट - योगावस्था -

"निवातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्" - योग के विघ्न

“किसी किसी में योगियों के लक्षण दीखते हैं परन्तु उन लोगों को भी सावधानी से रहना चाहिए। कामिनी और कांचन ही योग में विघ्न डालते हैं। योगभ्रष्ट होकर साधक फिर संसार में आता है, – भोग की कुछ इच्छा रही होगी। इच्छा पूरी होने पर वह फिर ईश्वर की ओर जाएगा - फिर वही योग की अवस्था होगी। 'सटका' कल जानते हो?”

मास्टर – जी नहीं।

श्रीरामकृष्ण – उस देश में है*। बाँस को झुका देते हैं। उसमें बंसी और डोर लगी रहती है। काँटे में मछलियों के खाने का चारा बेध दिया जाता है। ज्योंही मछली उसे निगल जाती है, त्योंही वह बाँस झटके के साथ ऊपर उठ जाता है। जिस प्रकार उसका सिर ऊँचा था वैसा ही हो जाता है।

“तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं। नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर। नीचे की सुई का ऊपर की सुई से एक होना ही योग है।

“मन के स्थिर हुए बिना योग नहीं होता। संसार की हवा मनरूपी दीपशिखा को सदा ही चंचल किया करती है। वह शिखा यदि जरा भी न हिले तो योग की अवस्था हो जाती है।

“कामिनी और कांचन योग के विघ्न हैं। वस्तुविचार करना चाहिए। स्त्रियों के शरीर में क्या है - रक्त, मांस, आँतें, कृमि, मूत्र, विष्ठा - यही सब। उस शरीर पर प्यार क्यों?

“त्याग के लिए मैं अपने में राजसी भाव भरता था। साध हुई थी कि जरी की पोशाक पहनूँगा, अँगूठी पहनूँगा, लम्बी नलीवाले हुक्के में तम्बाकू पिऊँगा। जरी की पोशाक पहनी। ये लोग (रानी रासमणि के दामाद मथुरबाबू आदि) ले आए थे। कुछ देर बाद मन से कहा – यही शाल है, यही अँगूठी है, यही हुक्के में तम्बाकू पीना है। सब फेंक दिया, तब से फिर मन नहीं चला।”

शाम हो रही है। कमरे के दक्षिण-पूर्व की ओर के बरामदे में द्वार के पास ही, अकेले में श्रीरामकृष्ण मणि^+ से बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है – सदा आत्मस्थ रहता


* श्रीरामकृष्ण अपनी जन्मभूमि को बहुधा 'वह देश' कहते थे।
+ मणि और मास्टर एक ही व्यक्ति हैं।

५६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २४ अगस्त, १८८२


है। शून्य दृष्टि, देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है। समझ में आ जाता है कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र क्या मुझे दिखा सकते हो?

मणि – जैसी आज्ञा। चेष्टा करूँगा यदि कहीं मिल जाय।

(२)

गुरुशिष्य-संवाद – गुह्यकथा

शाम हो गयी। कालीमन्दिर, राधाकान्तजी के मन्दिर और अन्यान्य कमरों में बत्तियाँ जला दी गयीं। श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए जगन्माता का स्मरण कर रहे हैं। तदनन्तर वे ईश्वर का नाम जपने लगे। घर में धूनी दी गयी है। एक ओर दीवट पर दिया जल रहा है। कुछ देर बाद शंख घण्टा आदि बजने लगे। कालीमन्दिर में आरती होने लगी। तिथि शुक्ला दशमी है; चारों ओर चाँदनी छिटक रही है।

आरती हो जाने पर कुछ क्षण बाद श्रीरामकृष्ण मणि के साथ अकेले अनेक विषयों पर बातें करने लगे। मणि फर्श पर बैठे हैं।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”

श्रीरामकृष्ण – कर्म निष्काम करना चाहिए। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जो कर्म करता है वे अच्छे हैं; वह निष्काम कर्म करने की चेष्टा करता है।

मणि – जी हाँ। अच्छा; जहाँ कर्म है वहाँ क्या ईश्वर मिलते हैं? राम और काम क्या एक ही साथ रहते हैं? हिन्दी में मैंने पढ़ा है कि ‘जहाँ काम तहँ राम नहिं, जहाँ राम नहिं काम।’

श्रीरामकृष्ण – कर्म सभी करते हैं। उनका नाम लेना कर्म है – साँस लेना और छोड़ना भी कर्म है। क्या मजाल है कि कोई कर्म छोड़ दे! इसलिए कर्म करना चाहिए, किन्तु फल ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।

मणि – तो क्या ऐसी चेष्टा की जा सकती है कि जिससे अधिक धन मिले?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, की जा सकती है किन्तु यदि विद्या का परिवार हो, तो। अधिक धन कमाने का प्रयत्न करो, परन्तु सदुपाय से। उद्देश्य उपार्जन नहीं, ईश्वर की सेवा है। धन से यदि ईश्वर की सेवा होती है तो उस धन में दोष नहीं है।

मणि – घरवालों के प्रति कर्तव्य कब तक रहता है?

श्रीरामकृष्ण – उन्हें भोजनवस्त्र का अभाव न हो। सन्तान जब स्वयं समर्थ होगी, तब भार-ग्रहण की आवश्यकता नहीं। चिड़ियों के बच्चे जब खुद चुगने लगते हैं तब माँ के पास यदि खाने के लिए आते हैं तो माँ चोंच मारती है।

मणि – कर्म कब तक करना होगा?

२४ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ९ | ५७

२४ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ९ | ५७

श्रीरामकृष्ण – फल होने पर फूल नहीं रह जाता। ईश्वरलाभ हो जाने से कर्म नहीं करना पड़ता, मन भी नहीं लगता।

“ज्यादा शराब पी लेने से मतवाला होश नहीं सम्हाल सकता – दुअन्नीभर पीने से कामकाज कर सकता है। ईश्वर की ओर जितना ही बढ़ोगे उतना ही वे कर्म घटाते रहेंगे। डरो मत। गृहस्थ की बहू के जब लड़का होनेवाला होता है तब उसकी सास धीरे धीरे काम घटाती जाती है। दसवें महीने में काम छूने भी नहीं देती। लड़का होने पर वह उसी को लिए रहती है।

“जो कुछ कर्म है, जहाँ वे समाप्त हो गए कि चिन्ता दूर हो गयी। गृहिणी घर का सारा कामकाज समाप्त करके जब कहीं बाहर निकलती है, तब जल्दी नहीं लौटती, बुलाने पर भी नहीं आती।”

ईश्वरलाभ तथा ईश्वरदर्शन का अर्थ

मणि – अच्छा, ईश्वरलाभ के क्या माने हैं? ईश्वरदर्शन किसे कहते हैं और किस तरह होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – वैष्णव कहते हैं कि ईश्वरमार्ग के पथिक चार प्रकार के होते हैं – प्रवर्त्तक, साधक, सिद्ध और सिद्धों में सिद्ध। जो पहले ही पहल मार्ग पर आया है वह प्रवर्त्तक है। जो भजन-पूजन, जप-ध्यान, नाम-गुणकीर्तनादि करता है वह साधक है। जिसे ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव मात्र हुआ है वह सिद्ध है। उसकी वेदान्त में एक उपमा है, – वह यह कि अँधेरे घर में बाबूजी सो रहे हैं। कोई टटोलकर उन्हें खोज रहा है। कोच पर हाथ जाता है, तो वह मन ही मन कह उठता है – यह नहीं है; झरोखा छू जाता है तो भी कह उठता है – यह नहीं है; दरवाजे में हाथ लगता है तो यह भी नहीं है, – नेति नेति नेति। अन्त में जब बाबूजी की देह पर हाथ लगा तो कहा – यह – बाबूजी यह हैं; अर्थात् अस्ति का बोध हुआ। बाबूजी को प्राप्त तो किया किन्तु भलीभाँति जान-पहचान नहीं हुई।

“एक दर्जे के और लोग हैं, जो सिद्धों में सिद्ध कहलाते हैं। बाबूजी के साथ यदि विशेष वार्तालाप हो तो वह एक और ही अवस्था है, यदि ईश्वर के साथ प्रेम-भक्ति द्वारा विशेष परिचय हो जाय तो दूसरी ही अवस्था हो जाती है। जो सिद्ध है उसने ईश्वर को पाया तो है, किन्तु जो सिद्धों में सिद्ध है उसका ईश्वर के साथ विशेष परिचय हो गया है।

“परन्तु उनको प्राप्त करने की इच्छा हो तो एक न एक भाव का सहारा लेना पड़ता है, जैसे – शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य या मधुर।

“शान्त भाव ऋषियों का था। उनमें भोग की कोई वासना न थी; ईश्वरनिष्ठा थी जैसी पति पर स्त्री की होती है; वह यह समझती है कि मेरे पति कन्दर्प हैं।

“दास्य – जैसे हनुमान का; रामकाज करते समय सिंहतुल्य। स्त्रियों का भी दास्य

५८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ अगस्त, १८८२

भाव होता है, – पति की हृदय खोलकर सेवा करती है। माता में भी यह भाव कुछ कुछ रहता है, – यशोदा में था।

"सख्य – मित्रभाव। आओ, पास बैठो। सुदामा आदि श्रीकृष्ण को कभी जूठे फल खिलाते थे, कभी कन्धे पर चढ़ते थे।

"वात्सल्य – जैसे यशोदा का। स्त्रियों में भी कुछ कुछ होता है, – स्वामी को खिलाते समय मानो जी काढ़कर रख देती हैं। लड़का जब भरपेट भोजन कर लेता है, तभी माँ को सन्तोष होता है। यशोदा कृष्ण को खिलाने के लिए मक्खन हाथ में लिए घूमती फिरती थीं।

"मधुर – जैसे श्रीराधिका का। स्त्रियों का भी मधुर भाव है। इस भाव में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य सब भाव हैं।"

मणि – क्या ईश्वर के दर्शन इन्हीं नेत्रों से होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – चर्मचक्षु से उन्हें कोई नहीं देख सकता। साधना करते करते शरीर प्रेम का हो जाता है। आँखें प्रेम की, कान प्रेम के। उन्हीं आँखों से वे दीख पड़ते हैं, उन्हीं कानों से उनकी वाणी सुन पड़ती है। और प्रेम का लिंग और योनि भी होती है।

यह सुनकर मणि खिलखिलाकर हँस पड़े। श्रीरामकृष्ण जरा भी नाराज न होकर फिर कहने लगे।

श्रीरामकृष्ण – इस प्रेम के शरीर में आत्मा के साथ रमण होता है।

मणि फिर गम्भीर हो गए।

श्रीरामकृष्ण – "ईश्वर को बिना खूब प्यार किये दर्शन नहीं होते।

"खूब प्यार करने से चारों ओर ईश्वर ही ईश्वर दीखते हैं। जिसे पीलिया हो जाता है उसे चारों ओर पीला दिखायी पड़ता है।

"तब 'मैं वही हूँ' यह बोध भी हो जाता है। मतवाले का नशा जब खूब चढ़ जाता है तब वह कहता है, 'मैं ही काली हूँ'।

"गोपियाँ प्रेमोन्मत्त होकर कहने लगीं – 'मैं ही कृष्ण हूँ'।

"दिनरात उन्हीं की चिन्ता करने से चारों ओर वे ही दीख पड़ते हैं। जैसे थोड़ी देर दीपशिखा की ओर ताकते रहो, तो फिर चारों ओर सब कुछ शिखामय ही दिखायी देता है।"

क्या ईश्वरदर्शन मस्तिष्क का भ्रम है? "संशयात्मा विनश्यति"

मणि सोचते हैं कि वह शिखा तो सत्य शिखा है नहीं।

अन्तर्यामी श्रीरामकृष्ण कहने लगे – "चैतन्य की चिन्ता करने से कोई अचेत नहीं हो जाता। शिवनाथ ने कहा था, 'ईश्वर की बार बार चिन्ता करने से लोग पागल हो जाते

२४ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ९ | ५९

२४ अगस्त, १८८२परिच्छेद ९५९

हैं।' मैंने उससे कहा, 'चैतन्य की चिन्ता करने से क्या कभी कोई चैतन्यहीन होता है?'"

मणि – जी, समझा। यह तो किसी अनित्य विषय की चिन्ता है नहीं; जो नित्य और चेतन हैं उनमें मन लगाने से मनुष्य अचेतन क्यों होने लगा?

श्रीरामकृष्ण (प्रसन्न होकर) – यह उनकी कृपा है। बिना उनकी कृपा के सन्देह-भंजन नहीं होता।

"आत्मदर्शन के बिना सन्देह दूर नहीं होता।

"उनकी कृपा होने पर फिर कोई भय की बात नहीं रह जाती। पुत्र यदि पिता का हाथ पकड़कर चले तो गिर भी सकता है परन्तु यदि पिता पुत्र का हाथ पकड़े तो फिर गिरने का कोई भय नहीं। वे यदि कृपा करके संशय दूर कर दें और दर्शन दें तो फिर कोई दुःख नहीं। परन्तु उन्हें पाने के लिए खूब व्याकुल होकर पुकारना चाहिए – साधना करनी चाहिए – तब उनकी कृपा होती है। पुत्र को दौड़ते हाँफते देखकर माता को दया आ जाती है। माँ छिपी थी। सामने प्रकट हो जाती है।"

मणि सोच रहे हैं, ईश्वर दौड़धूप क्यों कराते हैं? श्रीरामकृष्ण तुरन्त कहने लगे – "उनकी इच्छा कि कुछ देर दौड़धूप हो तो आनन्द मिले। लीला से उन्होंने इस संसार की रचना की है। इसी का नाम महामाया है। अतएव उस शक्तिरूपिणी महामाया की शरण लेनी पड़ती है। माया के पाशों ने बाँध लिया है, फाँस काटने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।"

आद्याशक्ति महामाया तथा शक्तिसाधना

श्रीरामकृष्ण – कोई ईश्वर की कृपा प्राप्त करना चाहे तो उसे पहले आद्याशक्तिरूपिणी महामाया को प्रसन्न करना चाहिए। वे संसार को मुग्ध करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय कर रही हैं। उन्होंने सब को अज्ञानी बना डाला है। वे जब द्वार से हट जाएँगी तभी जीव भीतर जा सकता है। बाहर पड़े रहने से केवल बाहरी वस्तुएँ देखने को मिलती हैं, नित्य सच्चिदानन्द पुरुष नहीं मिलते। इसीलिए पुराणों में है – सप्तशती में – मधुकैटभ का वध करते समय ब्रह्मादि देवता महामाया की स्तुति कर रहे हैं।*

"संसार का मूल आधार शक्ति ही है। उस आद्याशक्ति के भीतर विद्या और अविद्या दोनों हैं – अविद्या मोहमुग्ध करती है। अविद्या वह है जिससे कामिनी और कांचन उत्पन्न हुए हैं, वह मुग्ध करती है; और विद्या वह है जिससे भक्ति, दया, ज्ञान और प्रेम की उत्पत्ति हुई है; वह ईश्वरमार्ग पर ले जाती है।


* ब्रह्मोवाच। त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारस्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधामात्रात्मिका स्थिता।।
— सप्तशती, मधुकैटभवध

६०श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ अगस्त, १८८२

“उस अविद्या को प्रसन्न करना होगा। इसीलिए शक्ति की पूजापद्धति हुई।

“उन्हें प्रसन्न करने के लिए नाना भावों से पूजन किया जाता है। जैसे दासीभाव, वीरभाव, सन्तानभाव। वीरभाव अर्थात् उन्हें रमण द्वारा प्रसन्न करना।

“शक्तिसाधना – सब बड़ी विकट साधनाएँ थीं, दिल्लगी नहीं।

“मैं माँ के दासीभाव से और सखीभाव से दो वर्ष तक रहा। परन्तु मेरा सन्तानभाव है। स्त्रियों के स्तनों को मातृस्तन समझता हूँ।

“लड़कियाँ शक्ति की एक एक मूर्ति हैं। पश्चिम में विवाह के समय वर के हाथ में छुरी रहती है, बंगाल में सरौता – अर्थात् उस शक्तिरूपिणी कन्या की सहायता से वर मायापाश काट सकेगा। यह वीरभाव है। मैंने वीरभाव से पूजा नहीं की। मेरा सन्तानभाव था।

“कन्या शक्तिस्वरूपा है। विवाह के समय तुमने नहीं देखा – वर अहमक की तरह पीछे बैठा रहता है; परन्तु कन्या निःशंक रहती है!

ईश्वरदर्शन तथा ऐहिक ज्ञान या अपरा विद्या

“ईश्वरलाभ करने पर उनके बाहरी ऐश्वर्य, संसार के ऐश्वर्य को भक्त भूल जाता है। उन्हें देखने से उनके ऐश्वर्य की बात याद नहीं आती। दर्शनानन्द में मग्न हो जाने पर भक्त का हिसाबकिताब नहीं रह जाता। नरेन्द्र को देखने पर तेरा नाम क्या है, तेरा घर कहाँ है यह कुछ पूछने की जरूरत नहीं रहती। पूछने का अवसर ही कहाँ है? हनुमान से किसी ने पूछा, आज कौनसी तिथि है? हनुमान ने कहा, भाई, मैं दिन, तिथि, नक्षत्र – कुछ नहीं जानता, मैं केवल श्रीराम का स्मरण किया करता हूँ।”

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परिच्छेद १०

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परिच्छेद १०

दक्षिणेश्वर में अन्तरंग भक्तों के साथ

(१)

श्रीरामकृष्ण की प्रथम प्रेमोन्माद अवस्था

आज श्रीरामकृष्ण बड़े आनन्द में हैं। दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में नरेन्द्र आए हैं। और भी कुछ अन्तरंग भक्त हैं। नरेन्द्र ने यहाँ आकर स्नान किया और प्रसाद पाया।

आज आश्विन की शुक्ला चतुर्थी है – १६ अक्टूबर १८८२, सोमवार। आगामी गुरुवार को सप्तमी है, दुर्गापूजा होगी।

श्रीरामकृष्ण के पास राखाल, रामलाल और हाजरा हैं। नरेन्द्र के साथ एक-दो और ब्राह्म लड़के आए हैं। आज मास्टर भी आए हैं।

नरेन्द्र ने श्रीरामकृष्ण के पास ही भोजन किया। भोजन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने अपने कमरे में बिस्तर लगा देने को कहा, जिस पर नरेन्द्र आदि भक्त – विशेषकर नरेन्द्र – आराम करेंगे। चटाई के ऊपर रजाई और तकिये लगाए गए हैं। श्रीरामकृष्ण भी बालक की भाँति नरेन्द्र के पास बिस्तर पर आ बैठे। भक्तों से, विशेषकर नरेन्द्र से, और उन्हीं की ओर मुँह करके, हँसते हुए बड़े आनन्द से बातचीत कर रहे हैं। अपनी अवस्था और अपने चरित्र का बातों बातों में वर्णन कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि भक्तों से) – मेरी इस अवस्था के बाद मुझे केवल ईश्वरी बातें सुनने की व्याकुलता होती थी। भागवत, अध्यात्मरामायण, महाभारत – कहाँ इनका पाठ हो रहा है, यही सब ढूँढ़ता फिरता था। आरियादह के कृष्णकिशोर के पास अध्यात्मरामायण सुनने जाया करता था।

“कृष्णकिशोर का कैसा विश्वास है! वह वृन्दावन गया था, वहाँ एक दिन उसे प्यास लगी। कुएँ के पास जाकर उसने देखा कि एक आदमी खड़ा है। पूछने पर उसने जवाब दिया, ‘मैं नीच जाति का हूँ और आप ब्राह्मण हैं; मैं कैसे आपको पानी निकाल दूँ?’ कृष्णकिशोर ने कहा, ‘तू कह ‘शिव’। शिव शिव कहने से ही तू शुद्ध हो जाएगा।’ उसने शिव शिव कहकर पानी ऊपर निकाला। वैसा निष्ठावान् ब्राह्मण होकर भी उसने वही जल पिया। कैसा विश्वास है!

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२

"आरियादह के घाट पर एक साधु आया था। हमने सोचा कि एक दिन देखने जाएँगे। कालीमन्दिर में मैंने हलधारी से कहा, 'कृष्णकिशोर और हम साधु-दर्शन को जाएँगे। तुम चलोगे?' हलधारी ने कहा, 'एक मिट्टी का पिंजरा देखने जाने से क्या होगा?' हलधारी गीता और वेदान्त पढ़ता था न? इसी से उसने साधु-शरीर को 'मिट्टी का पिंजरा' बताया! मैंने जाकर कृष्णकिशोर से वह बात कही तो वह बड़े क्रोध में आ गया। उसने कहा, 'क्या! हलधारी ने ऐसी बात कही है? जो ईश्वर-चिन्तन करता है, राम-चिन्तन करता है, और जिसने उसी उद्देश से सर्वत्याग किया है, क्या उसका शरीर मिट्टी का पिंजरा ठहरा? हलधारी नहीं जानता कि भक्त का शरीर चिन्मय होता है!' उसे इतना क्रोध आ गया था कि, कालीमन्दिर में फूल तोड़ने आया करता था, पर हलधारी से भेंट होने पर मुँह फेर लेता था। उससे बोलता तक न था।

"उसने मुझसे कहा था, 'तुमने जनेऊ क्यों फेंक दिया?' जब मेरी यह अवस्था हुई तब आश्विन की आँधी की तरह एक भाव आकर वह सब कुछ न जाने कहाँ उड़ा ले गया, कुछ पता ही न चला! पहले की एक भी निशानी न रही। होश नहीं थे। जब कपड़ा ही खिसक जाता था, तो जनेऊ कैसे रहे? मैंने कहा, 'एक बार तुम्हें भी उन्माद हो जाय तो तुम समझो!'

"फिर हुआ भी वैसा! उसे उन्माद हो गया। तब वह केवल 'ॐ ॐ' कहा करता और एक कोठरी में चुपचाप बैठा रहता था। यह समझकर कि वह पागल हो गया है, लोगों ने वैद्य बुलाया। नाटागढ़ का राम कविराज आया, कृष्णकिशोर ने उससे कहा, 'मेरी बीमारी तो अच्छी कर दो, पर देखो मेरे ॐकार को मत छुड़ाना!' (सब हँसे।)

"एक दिन मैंने जाकर देखा कि वह बैठा सोच रहा है। पूछा 'क्या हुआ है?' उसने कहा, 'टैक्सवाले आए थे, इसीलिए सोच में पड़ा हूँ। उन्होंने कहा है रुपया न देने से घर का माल बेच लेंगे।' मैंने कहा, 'तो सोचकर क्या होगा? अगर सब उठा ले जायँ तो ले जाने दो। अगर बाँधकर ही ले जायँ तो तुम्हें थोड़े ही ले जा सकेंगे। तुम तो 'ख' (आकाश) हो!' (नरेन्द्र आदि हँसे।) कृष्णकिशोर कहा करता था कि मैं आकाशवत् हूँ। वह अध्यात्मरामायण पढ़ता था न! बीच बीच में उसे 'तुम ख हो' कहकर दिल्लगी करता था। सो हँसते हुए मैंने कहा, 'तुम ख हो; टैक्स तुम्हें तो खींचकर नहीं ले जा सकेगा।'

"उन्माद की दशा में मैं लोगों से सच सच बातें - स्पष्ट बातें कह देता था। किसी की परवाह न करता था। अमीरों को देखकर मुझे डर नहीं लगता था।

"यदु मल्लिक के बाग में यतीन्द्र आया था। मैं भी वहीं था। मैंने उससे पूछा, 'कर्तव्य क्या है? क्या ईश्वर का चिन्तन करना ही हमारा कर्तव्य नहीं है?' यतीन्द्र ने कहा, 'हम संसारी आदमी हैं। हमारे लिए मुक्ति कैसी! राजा युधिष्ठिर को भी नरक दर्शन करना पड़ा था!' तब मुझे बड़ा क्रोध आया। मैंने कहा, 'तुम भला कैसे आदमी हो, युधि-

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१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६३

सिर्फ नरकदर्शन ही तुमने याद रखा है? युधिष्ठिर का सत्यवचन, क्षमा, धैर्य, विवेक, वैराग्य, ईश्वर की भक्ति – यह सब बिलकुल याद नहीं आता!’ और भी बहुत कुछ कहने जाता था, पर हृदय ने मेरा मुँह दबा लिया। थोड़ी देर बाद यतीन्द्र यह कहकर कि जरा काम है, चला गया।

“बहुत दिनों बाद मैं कप्तान के साथ सौरिन्द्र ठाकुर के घर गया था। उसे देखकर मैंने कहा, ‘तुम्हें राजा-वाजा कह नहीं सकूँगा, क्योंकि वह झूठ बात होगी।’ उसने मुझसे थोड़ी बातचीत की। फिर मैंने देखा कि साहब लोग आने-जाने लगे। वह रजोगुणी आदमी है, बहुत कामों में लगा रहता है। यतीन्द्र को खबर भेजी गयी। उसने जवाब दिया, ‘मेरे गले में दर्द हुआ है।’

“उस उन्माद की दशा में एक दूसरे दिन वंराहनगर के घाट पर मैंने देखा कि जय मुकर्जी जप कर रहा है, पर अनमना होकर। तब मैंने पास जाकर दो थप्पड़ लगा दिए।

“एक दिन रासमणि दक्षिणेश्वर में आयी। कालीमाता के मन्दिर में आयी। वह पूजा के समय आया करती और मुझसे एक दो गीत गाने को कहती थी। मैं गीत गा रहा था, देखा कि वह अनमनी होकर फूल चुन रही है। बस, दो थप्पड़ जमा दिए तब होश सम्हालकर हाथ बाँधे रही।

“हलधारी से मैंने कहा, ‘भैया, यह कैसा स्वभाव हो गया! क्या उपाय करूँ? फिर माँ को पुकारते पुकारते वह स्वभाव दूर हुआ।

काशी में विषयसम्बन्धी चर्चा सुनकर श्रीरामकृष्ण का रुदन

“उस अवस्था में ईश्वरीय प्रसंग के सिवा और कुछ अच्छा नहीं लगता था। वैषयिक चर्चा होते सुनकर मैं बैठा रोया करता था। जब मथुरबाबू मुझे अपने साथ तीर्थों को ले गए, तब थोड़े दिन हम वाराणसी में राजाबाबू के मकान पर रहे। मथुरबाबू के साथ बैठकखाने में मैं बैठा था और राजाबाबू भी थे। मैंने देखा कि वे सांसारिक बातें कह रहे हैं। ‘इतने रुपये का नुकसान हुआ है’ – ऐसी ऐसी बातें। मैं रोने लगा – कहा, ‘माँ, मुझे यह कहाँ लायी! मैं रासमणि के मन्दिर में कहीं अच्छा था। तीर्थ करने को आते हुए भी वे ही कामिनी-कांचन की बातें! पर वहाँ (दक्षिणेश्वर में) तो विषय-चर्चा सुननी नहीं पड़ती थी।’ ”

श्रीरामकृष्ण ने भक्तों से, विशेषकर नरेन्द्र से, जरा आराम लेने के लिए कहा, और आप भी छोटे तख्त पर थोड़ा आराम करने चले गए।

(२)

नरेन्द्र आदि के साथ कीर्तनानन्द। नरेन्द्र का प्रेमालिंगन

तीसरा प्रहर हुआ है। नरेन्द्र गाना गा रहे हैं। राखाल, लाटू, मास्टर, नरेन्द्र के ब्राह्म मित्र प्रिय, हाजरा आदि सब हैं।

६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२

नरेन्द्र ने कीर्तन गाया, मृदंग बजने लगा –

(भावार्थ) – “ऐ मन, तू चिद्घन हरि का चिन्तन कर। उनकी मोहनमूर्ति की कैसी अनुपम छटा है! – वह श्रीहरी भक्तों का हृदयधन उसकी सौंदर्य सुषमा कोट्यवधि चन्द्रमाओ को लज्जित करेगी! उसके लावण्य दर्शनसे प्राण पुलकित हो जाते हैं। हृत्कमलासन में उसके श्रीचरणों का चिन्तन कर, शान्तिपूर्ण मनसे तथा प्रेमनेत्रों से उस अपरूप प्रियदर्शन का दर्शन कर भक्ति के आवेग से उस चिदानन्द रस में चिरनिमग्न हो जा। ...”

नरेन्द्र ने फिर गाया –

(भावार्थ) – “सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में शोभायमान है, जिसे नित्य देखकर हम उस रूप के समुद्र में डूब जाएँगे। वह दिन कब आएगा? हे प्रभु, मुझ दीन के भाग्य में यह कब होगा? हे नाथ, कब अनन्त ज्ञान के रूप में तुम हमारे हृदय में विराजोगे और हमारा चंचल मन निर्वाक होकर तुम्हारी शरण लेगा? कब अविनाशी आनन्द के रूप में तुम हृदयाकाश में उदित होंगे? चन्द्रमा के उदय होने पर चकोर जैसे उल्लसित होता है, वैसे हम भी तुम्हारे प्रकट होने पर मस्त हो जाएँगे। तुम शान्त, शिव, अद्वितीय और राजराज हो। हे प्राणसखा, तुम्हारे चरणों में हम बिक जाएँगे और अपने जीवन को सफल करेंगे। ऐसा अधिकार और ऐसा जीते जी स्वर्गभोग हमें और कहाँ मिलेगा? तुम्हारा शुद्ध और अपापविद्ध रूप हम देखेंगे। जिस तरह प्रकाश को देखकर अँधेरा जल्द भाग जाता है, उसी तरह तुम्हारे प्रकट होने से पापरूपी अन्धकार भाग जायगा। तुम ध्रुवतारा हो, हे दीनबन्धो, हमारे हृदय में ज्वलन्त विश्वास का संचार कर मन की आशाएँ पूरी कर दो। तुम्हें प्राप्त कर हम अहर्निश प्रेमानन्द में डूबे रहेंगे और अपने आपको भूल जाएँगे। वह दिन कब आएगा, प्रभो?”

(भावार्थ) – “आनन्द से मधुर ब्रह्मनाम का उच्चारण करो। नाम से सुधा का सिन्धु उमड़ आयगा। – उसे लगातार पीते रहो आप पीते रहो और दूसरों को पिलाते रहो। विषयरूपी मृगजल में पड़कर यदि कभी हृदय शुष्क हो जाय तो नामगान करना। प्रेम से हृदय सरस हो उठेगा। देखना, वह महामन्त्र नहीं भूलना। संकट के समय उसे दयालु पिता कहकर पुकारना। हुंकार से पाप का बन्धन तोड़ डालो। जय ब्रह्म कहकर आओ, सब मिलकर ब्रह्मानन्द में मस्त होवें और सब कामनाओं को मिटा दें। प्रेमयोग के योगी बनें।”

मृदंग और करताल के साथ कीर्तन हो रहा है। नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण को घेरकर कीर्तन कर रहे हैं। कभी गाते हैं – ‘प्रेमानन्द-रस में चिरदिन के लिए मग्न हो जा।’ फिर कभी गाते हैं – ‘सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में शोभायमान है।’

अन्त में नरेन्द्र ने स्वयं मृदंग उठा लिया और मतवाले होकर श्रीरामकृष्ण के साथ गाने लगे – ‘आनन्द से मधुर ब्रह्मनाम का उच्चारण करो।’