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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२८ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९३ | ६५५

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श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए।

सुरेन्द्र कारण (शराब) पीते हैं। पहले नम्बर बहुत बढ़ा-चढ़ा था। सुरेन्द्र की हालत देखकर श्रीरामकृष्ण को चिन्ता हो गयी थी। बिलकुल ही पीना छोड़ देने के लिए नहीं कहा, उन्होंने कहा, “सुरेन्द्र, देखो, जो पीना, श्रीदेवी को निवेदित करके पीना और उतना ही जिससे न पैर लड़खड़ायें और न सिर घूमे। उनकी चिन्ता करते करते फिर तुम्हें पीना बिलकुल ही अच्छा न लगेगा। वे स्वयं कारणानन्ददायिनी हैं। उन्हें पा लेने पर सहजानन्द होता है।”

सुरेन्द्र पास खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनकी ओर दृष्टि करके कहा, तुमने कारण पान किया है। यह कहकर ही भाव में तन्मय हो गये।

शाम हो गयी। कुछ बहिर्मुख होकर श्रीरामकृष्ण माता का नाम लेकर आनन्दपूर्वक गाने लगे। बीच बीच में तालियाँ बजा रहे हैं। स्वर करके कह रहे हैं – “हरि बोल, हरि बोल, हरिमय हरि बोल, हरि हरि हरि बोल।”

फिर कहने लगे – “राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम।”

श्रीरामकृष्ण अब प्रार्थना कर रहे हैं – “ऐ राम! हे राम! मैं भजन हीन हूँ, साधन हीन हूँ, ज्ञान हीन हूँ, भक्ति हीन हूँ, क्रिया हीन हूँ, राम! शरणागत हूँ। मैं देह-सुख नहीं चाहता। अष्ट-सिद्धि तो क्या, शत सिद्धियाँ भी नहीं चाहता। मैं शरणागत हूँ, शरणागत। बस वही करो, जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो, और तुम्हारी भुवनमोहिनी माया से मैं मुग्ध न होऊँ। राम! मैं शरणागत हूँ।”

श्रीरामकृष्ण प्रार्थना कर रहे हैं और सब लोग टकटकी लगाये देख रहे हैं। उनका करुणामय स्वर सुनकर भक्त आँसू रोक नहीं सकते। श्रीयुत राम पास आकर खड़े हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण – (राम के प्रति) – राम, तुम कहाँ थे?

राम – जी ऊपर था।

श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों की सेवा के लिए राम ऊपर प्रबन्ध करने के लिए गये थे।

श्रीरामकृष्ण – (राम से, सहास्य) – ऊपर रहने की अपेक्षा क्या नीचे रहना अच्छा नहीं? नीची जमीन में ही पानी ठहरता है। ऊँची जमीन से पानी बह जाता है।

राम – (हँसते हुए) – जी हाँ।

छत पर पत्तलें पड़ चुकी हैं। श्रीरामकृष्ण और भक्तों को लेकर राम ऊपर गये और उन्हें आनन्द से भोजन कराया। उत्सव हो जाने पर, श्रीरामकृष्ण निरंजन, मास्टर आदि भक्तों को साथ लेकर अधर के यहाँ गये। वहाँ माँ आयी हुई हैं। आज महाष्टमी है। अधर की विशेष प्रार्थना है, श्रीरामकृष्ण उपस्थित रहें, जिससे उनकी पूजा सार्थक हो जाये।

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मातृभाव से साधना

(१)

ईश्वर-कोटि का विश्वास स्वयंसिद्ध

आज नवमी पूजा है, २९ सितम्बर, १८८४। अभी सबेरा हुआ ही है। काली की मंगलारती हो गयी है। नौबतखाने से रोशनचौकी में प्रभाती मधुर रागिनी बज रही है। ब्राह्मण देव हाथ में फूलदानी लेकर पूजार्थ फूल तोड़ने आ रहे हैं। उधर माली भी देवमन्दिरों में फूल चढ़ाने के उद्देश्य से पुष्पचयन करने निकले हैं। माता की पूजा होगी। श्रीरामकृष्ण उषा की ललाई छा जाने से पहले ही उठे हैं। भवनाथ, निरंजन और मास्टर गत रात्रि से ही यहाँ पर हैं। वे श्रीरामकृष्ण के कमरेवाले बरामदे में रात भर सोये थे। आँख खोलकर देखा, श्रीरामकृष्ण मतवाले होकर नृत्य कर रहे हैं और 'जय दुर्गा, जय दुर्गा' कह रहे हैं।

जैसे एक बालक, जिसके कमर में धोती भी नहीं रहती, माता का नाम लेते हुए कमरे भर में नाच रहे हैं।

कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं - 'संहजानन्द - सहजानन्द।' इसके अनन्तर बार बार गोविन्द का नाम लेने लगे। कह रहे हैं - 'प्राण हे गोविन्द! मेरे जीवन हो।'

भक्तगण उठकर बैठ गये। एकदृष्टि से श्रीरामकृष्ण का भाव देख रहे हैं। हाजरा भी कालीमन्दिर में हैं। श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण पूर्ववाले बरामदे में उनका आसन है। लाटू भी हैं और श्रीरामकृष्ण की सेवा किया करते हैं। राखाल इस समय वृन्दावन में हैं। नरेन्द्र कभी कभी दर्शन करने के लिए आते हैं। आज आयेंगे।

श्रीरामकृष्ण के कमरे के उत्तर-पूर्ववाले छोटे बरामदे में भक्तगण सोये हुए हैं। जाड़े का समय है, इसलिए टट्टी बँधी है। सब के हाथमुँह धो चुकने के बाद, इस उत्तरवाले बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक चटाई पर आकर बैठे। दूसरे भक्त भी यहाँ कभी कभी आकर बैठते हैं।

श्रीरामकृष्ण - (भवनाथ से) - बात यह है कि जो जीवकोटि के हैं उन्हें सहज ही विश्वास नहीं होता। ईश्वर-कोटि के जो हैं उनका विश्वास स्वतः सिद्ध है। प्रह्लाद 'क' लिखते

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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हुए ही फूट-फूटकर रोने लगे थे। उन्हें कृष्ण की याद आ गयी थी। जीव का स्वभाव है कि उसकी बुद्धि संशयात्मक होती है। वे कहते हैं 'हाँ यह सच तो है, परन्तु -'

'हाजरा किसी तरह भी विश्वास नहीं करना चाहता कि ब्रह्म और शक्ति, शक्ति और शक्तिमान दोनों अभेद हैं। जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें हम ब्रह्म कहते हैं और जब सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं, तब उन्हीं को शक्ति कहते हैं। हैं वे एक ही वस्तु - अभेद। अग्नि कहने के साथ ही दाहिका शक्ति का बोध हो जाता है और दाहिका शक्ति के कहने पर आग की याद आती है। एक को छोड़कर दूसरे को सोचने की गुंजाइश नहीं है।

"तब मैंने प्रार्थना की, 'माँ, हाजरा यहाँ का मत उलट देना चाहता है। या तो तू उसे समझा दे या उसे यहाँ से हटा दो।' उसके दूसरे दिन उसने आकर कहा, हाँ मानता हूँ। तब उसने कहा, विभु सब जगह हैं।"

भवनाथ – (हँसकर) – हाजरा की इसी बात पर आपको इतना दुःख हुआ था?

श्रीरामकृष्ण – मेरी अवस्था बदल गयी है। अब आदमियों के साथ वादविवाद नहीं कर सकता। इस समय मेरी ऐसी अवस्था नहीं है कि हाजरा के साथ तर्क और झगड़ा कर सकूँ। यदु मल्लिक के बगीचे में हृदय ने कहा, 'मामा, क्या मुझे रखने की तुम्हारी इच्छा नहीं है?' मैंने कहा, 'नहीं, अब मेरी वैसी अवस्था नहीं है कि तेरे साथ गला फाड़ता रहूँ।'

"ज्ञान और अज्ञान किसे कहते हैं? जब तक यह बोध है कि ईश्वर दूर हैं तब तक अज्ञान है और जब यह बोध है कि ईश्वर यहीं तथा सर्वत्र है, तभी ज्ञान है।

"जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब सब चीजें चेतन जान पड़ती हैं। मैं शिबू के साथ खूब मिलता-जुलता था। तब शिबू निरा बच्चा था। चार-पाँच साल का रहा होगा। उस समय मैं देश में था, बादल घिरे हुए थे और मेघों की गर्जना हो रही थी। शिबू मुझसे कहता था, चाचा, देखो, चकमक पत्थर घिस रहा है। (सब हँसते हैं।) एक दिन देखा, वह अकेला पतिंगे पकड़ने जा रहा था। इधर-उधर के पौधे हिल रहे थे। तब वह पत्तियों से कह रहा था, चुप-चुप, मैं पतिंगे पकडूंगा। बालक सब चेतन देख रहा है! सरल विश्वास, बालक की तरह का विश्वास जब तक नहीं होता, तब तक ईश्वर नहीं मिलते। उफ! मेरी कैसी अवस्था थी! एक दिन घास के वन में किसी कीड़े ने काट लिया। मुझे इससे बड़ा भय हुआ। सोचा कहीं साँप ने न काटा हो। तब क्या करता? मैंने सुना था, अगर वह फिर काटे तो विष उठा लेता है। बस वहीं बैठा हुआ मैं बिल खोजने लगा कि वह फिर काटे। इसी तरह बैठा था कि एक नें पूछा, यह आप क्या कर रहे हैं? मैंने कहा, बिल खोज रहा हूँ। उसने सब कुछ सुनकर कहा, ठीक वहीं पर उसे दुबारा काटना चाहिए, तब कहीं विष उतरता है। तब मैं उठकर चला आया। शायद गोजर या किसी कीड़े ने काटा था।

"एक दूसरे दिन मैंने रामलाल से सुना, शरद् काल की ओस देह में लगाना अच्छा होता है। क्या एक श्लोक है, रामलाल ने कहा था। कलकत्ते से जाते समय गाड़ी की

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खिड़की से मैं गला बढ़ाये हुए गया, ताकि खूब ओस लगे। बस दूसरे ही दिन बीमार पड़ गया।” (सब हँसते हैं।)

अब श्रीरामकृष्ण कमरे के भीतर जाकर बैठे। उनके पैर कुछ फुले हुए थे। उन्होंने भक्तों को हाथ लगाकर देखने के लिए कहा कि दोनों उँगली से दबाने पर गङ्ढा पड़ता है या नहीं। थोड़ा-थोड़ा गङ्ढा पड़ने लगा। परन्तु लोगों ने कहा, यह कुछ नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – (भवनाथ से) – सींती के महेन्द्र को बुला देना। उसके कहने से मेरा मन अच्छा हो जायगा।

भवनाथ – (सहास्य) – आप दवा पर बड़ा विश्वास करते हैं, हम लोग उतना नहीं करते।

श्रीरामकृष्ण – दवाएँ भी उन्हीं की हैं। एक रूप से वे ही चिकित्सक हैं। गंगाप्रसाद ने बतलाया, आप रात को पानी न पिया कीजिये। मैं उसकी बात को वेदवाक्य की तरह पकड़े हुए हूँ। मै मानता हूँ, वह साक्षात् धन्वन्तरि है।

(२)

समाधि में श्रीरामकृष्ण

हाजरा आकर बैठे। दो-एक बातें इधर-उधर की करके श्रीरामकृष्ण ने कहा – “देखो, कल राम के यहाँ उतने आदमी बैठे हुए थे, विजय, केदार, आदि फिर भी नरेन्द्र को देखकर मुझे इतना उद्दीपन क्यों हुआ? केदार, मैंने देखा, कारणानन्द के घर का है।”

श्रीरामकृष्ण महाष्टमी के दिन कलकत्ता गये हुए थे – देवी-प्रतिमा के दर्शनों के लिए। अधर के यहाँ प्रतिमा-दर्शन करने के लिए जाने से पहले राम के यहाँ गये थे। वहाँ बहुत से भक्त आये थे। नरेन्द्र को देखकर श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये थे। नरेन्द्र के घुटने पर उन्होंने अपना पैर रख दिया था और खड़े हुए समाधि-मग्न हो गये थे।

देखते ही देखते नरेन्द्र भी आ गये। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण के आनन्द की सीमा नहीं रही। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करने के पश्चात् भवनाथ आदि के साथ उसी कमरे में नरेन्द्र बातचीत करने लगे। पास मास्टर हैं। कमरे में लम्बी चटाई बिछी हुई है। नरेन्द्र बातचीत करते हुए पेट के बल चटाई पर लेट गये। उन्हें देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये। वे नरेन्द्र की पीठ पर जा बैठे, वहीं समाधि में डूब गये।

भवनाथ गा रहे हैं – (भाव) –

“माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना। तेरे कमलचरणों को छोड़ मेरा मन और कुछ नहीं चाहता। यह मुझे दोषदुष्ट बतलाता है, परन्तु मेरी समझ में नहीं आता कि मेरा दोष क्या है। तू मुझे बतला दे। माँ, मेरी तो यह इच्छा थी कि भवानी का नाम लेकर मैं भव-सागर से पार हो जाऊँ। मैं स्वप्न में भी नहीं जानता था कि अछोर समुद्र में मुझे

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इस तरह डूबना होगा। दिन-रात मैं दुर्गानाम की रट लगाये रहता हूँ, फिर भी मेरी दुःख-राशि दूर नहीं होती है। हर-सुन्दरी, अबकी बार अगर मैं मरा, तो तेरा दुर्गा नाम और कोई न लेगा।”

श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। उन्होंने दो गाने गाये। एक का भाव यह है –

“श्रीदुर्गा नाम का जप करो, ऐ मेरे मन! ... माँ! दुखी दास पर दया करो, तो तुम्हारा गुण भी मेरी समझ में आये। माँ, तुम सन्ध्या हो, तुम दीपक हो, तुम्हीं यामिनी हो। कभी तो तुम पुरुष होती हो और कभी स्त्री। माँ, रामरूप में तो तुम धनुर्धारण करती हो और कृष्ण रूप में तुम वंशी हाथ में लेती हो। माँ, मुक्त-कुन्तला होकर तुमने शिव को मुग्ध कर लिया था। तुम्हीं दस महाविद्याएँ हो और तुम्हीं दस अवतार। अबकी बार किसी तरह, माँ, मुझे पार करो। माँ, जवापुष्पों और बिल्वदलों से यशोदा ने तुम्हारी पूजा की थी। तुमने कृष्ण को उनकी गोद में डालकर उनकी मनोकामना पूरी की। माँ, जहाँ-तहाँ पड़ा रहा करता हूँ; कभी तो जंगल में ही पड़ा रहता हूँ, परन्तु मेरा मन तेरे श्रीचरणों में ही लगा रहता है। माँ, मैं जहाँ-तहाँ दुर्भाग्य के फेर में पड़ा अपने भाग्य पर रोया करता हूँ। खैर, मुझे इसका भी दुःख नहीं, प्रार्थना है कि अन्त समय में जिह्वा तेरे नाम का उच्चारण करे। अगर तू मुझे किसी दूसरी जगह चले जाने के लिए कहे, तो माँ, इतना तो बतला, मैं किसके पास जाऊँ? माँ, दूसरी जगह यह सुधा-मधुर तेरा नाम मुझे कहाँ मिल सकता है? तू चाहे कितना ही ‘छोड़ छोड़’ क्यों न करे, परन्तु मैं तुझे न छोड़ूँगा। मैं नुपुर बनकर तेरे श्रीचरणों में बजता रहूँगा। माँ, जब तू शिव के निकट बैठेगी तब तेरे चरणों में मैं ‘जय शिव जय शिव’ कहकर बजता रहूँगा।”

(३)

समाधि और नृत्य

हाजरा उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में हरिनाम् की माला हाथ में लिए हुए जप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण सामने आकर बैठे और हाजरा की माला लेकर जप करने लगे। साथ में मास्टर और भवनाथ हैं। दिन के दस बजे का समय होगा।

श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से) – देखो, मुझसे जप नहीं होता – नहीं, नहीं, होता है! बायें हाथ से होता है, परन्तु उधर (नाम-जप) फिर नहीं होता।

इतना कहकर श्रीरामकृष्ण नाम-जप की चेष्टा करने लगे, परन्तु जप का आरम्भ करते ही समाधि लग गयी।

श्रीरामकृष्ण इसी समाधि-अवस्था में बड़ी देर से बैठे हुए हैं। हाथ में माला अब भी लिए हुए हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर देख रहे हैं। हाजरा अपने आसन पर बैठे हुए हैं। वे भी चुपचाप श्रीरामकृष्ण की समाधि-अवस्था देख रहे हैं। बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण को

६६० श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

होश हुआ। वे कह उठे, मुझे भूख लगी है। साधारण अवस्था को लाने के लिए श्रीरामकृष्ण प्रायः इस तरह कहा करते हैं।

मास्टर खाना लाने के लिए जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बोल उठे, “नहीं भाई, पहले काली-मन्दिर जाऊँगा।”

पक्के आँगन से होकर श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर जा रहे हैं। जाते हुए द्वादश शिवालयों के शिवजी को प्रणाम कर रहे हैं। बाई ओर राधाकान्तजी का मन्दिर है। राधाकान्तजी को देखकर श्रीरामकृष्ण ने प्रणाम किया। कालीमन्दिर में पहुँचकर माता को प्रणाम किया और आसन पर बैठकर माता के पादपद्मों में उन्होंने फूल चढ़ाये। फिर अपने सिर पर फूल रखा। लौटते हुए भवनाथ से बोले, यह सब ले चल – माता का प्रसाद, नारियल और चरणामृत। श्रीरामकृष्ण कमरे में लौट आये। साथ में भवनाथ हैं और मास्टर।

हाजरा के सामने पहुँचते ही उन्होंने प्रणाम किया। ‘यह आप क्या कर रहे हैं – यह क्या कर रहे हैं’ कहकर हाजरा चिल्ला उठे।

श्रीरामकृष्ण – तुम कह सकते हो कि यह अन्याय है?

हाजरा तर्क करके प्रायः यह बात कहते थे कि ईश्वर सब के भीतर हैं, साधना करके सब लोग ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

दिन बहुत चढ़ गया है। भोग की आरती का घण्टा बज चुका है। ब्राह्मण, वैष्णव और कंगाल सब अतिथिशाला की ओर जा रहे हैं। सब लोग माता का प्रसाद पायेंगे। अतिथिशाला में काली-मन्दिर के कर्मचारी जहाँ बैठकर प्रसाद पाते हैं, वहीं भक्तों के लिए भी प्रसाद पाने का बन्दोबस्त हो रहा है। श्रीरामकृष्ण ने कहा – “सब लोग वहीं जाकर प्रसाद पाओ – क्यों? (नरेन्द्र से) नहीं, तू यहाँ भोजन कर।

“अच्छा, नरेन्द्र तथा मेरे लिए यहीं प्रसाद की व्यवस्था हो।”

प्रसाद पाने के बाद श्रीरामकृष्ण ने थोड़ी देर विश्राम किया। भक्त-मण्डली बरामदे में बातचीत करने लगी। श्रीरामकृष्ण भी वहीं आकर बैठे। दो बजे का समय होगा। एकाएक भवनाथ दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे से ब्रह्मचारी के वेश में आकर उपस्थित हुए। भगवा धारण किये, हाथ में कमण्डलु लिए हुए हँस रहे हैं। श्रीरामकृष्ण और भक्त सब हँस रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – उसके मन का भाव भी यही है, इसीलिए तो यह भेष धारण किया।

नरेन्द्र – वह ब्रह्मचारी बना तो मैं अब वामाचारी बनूँ। (सब हँसते हैं।)

हाजरा – उसमें पञ्चमकार, चक्र, यह सब करना पड़ता है।

श्रीरामकृष्ण वामाचार की बात से चुप हो रहे हैं। इस बात पर उन्होंने कोई मत प्रकट

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नहीं किया। बस हँसकर बात उड़ा दी। एकाएक मतवाले होकर नृत्य करने लगे। गा रहे हैं – “माँ, अब मैं किसी दूसरे लालच में नहीं पड़ सकता, तुम्हारे अरुण चरणों को मैंने देख लिया।”

श्रीरामकृष्ण ने कहा – “अहा! राजनारायण चण्डी-गीत बहुत ही सुन्दर गाता है। वे लोग नाचते हुए गाते हैं, और उस देश* के नकुड़ आचार्य का गाना! अहा! कितना सुन्दर होता है और नृत्य भी वैसा ही मधुर!”

पञ्चवटी में एक साधु आये हुए हैं। बड़े क्रोधी स्वभाव के हैं। जिस तिसको गालियाँ दिया करते हैं – शाप देते हैं। खड़ाऊ पहने हुए वे आकर हाजिर हो गये।

साधु ने पूछा, 'क्या यहाँ आग मिल जायगी?' श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर साधु को नमस्कार कर रहे हैं। जब तक वे साधु वहाँ पर रहे, तब तक हाथ जोड़े हुए खड़े रहे।

साधु के चले जाने पर भवनाथ हँसते हुए कहने लगे, साधु पर आपकी कितनी भक्ति है!

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अरे, तमःप्रधान नारायण हैं। जिनका यही स्वभाव है, उन्हें ऐसे ही प्रसन्न करना चाहिए। ये साधु जो हैं!

गोलोकधाम (एक तरह का खेल) खेला जा रहा है। भक्त भी खेलते हैं और हाजरा भी खेलते हैं, श्रीरामकृष्ण आकर खड़े हो गये। मास्टर और किशोरी की गोटियाँ पक गयीं। श्रीरामकृष्ण ने दोनों को नमस्कार किया। कहा – “तुम दोनों भाई धन्य हो! (मास्टर से एकान्त में) अब न खेलना।”

श्रीरामकृष्ण खेल रहे हैं। हाजरा की गोटी एक बार नरक में पड़ी थी। श्रीरामकृष्ण ने कहा – “हाजरा को क्या हो गया! फिर!” अर्थात् हाजरा की गोटी दुबारा नरक में पड़ी। इस पर सब लोग जोर से हँसने लगे।

संसारवाले कोठे में लाटू की गोटी थी। एक बार ही सातों कौड़ियाँ चित्त पड़ीं, इससे एक ही चाल में गोटी लाल हो गयी। लाटू मारे आनन्द के नाचने लगे। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “लाटू को कितना आनन्द है, जरा देखो। उसकी गोटी अगर लाल न होती तो उसको दुःख होता। (भक्तों से अलग) इसका एक अर्थ है। हाजरा को बड़ा अहंकार है कि इसमें भी मेरी जीत होगी। ईश्वर की इच्छा ऐसी भी होती है कि सच्चे आदमी की हार कहीं नहीं होती। कहीं भी उसका अपमान नहीं होने देते।”

(४)

मातृभाव से साधना

कमरे में छोटे तख्त पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। नरेन्द्र, भवनाथ, बाबूराम, मास्टर


* उनके जन्मस्थान से मतलब है – कामारपुकुर के आसपास।

६६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

जमीन पर बैठे हुए हैं। घोषपाड़ा और पंचनामी मतों की बात नरेन्द्र ने चलायी। श्रीरामकृष्ण उनका वर्णन कर रहे हैं :-

“ये लोग ठीक ठीक साधना नहीं कर सकते। धर्म का नाम लेकर इन्द्रियों को चरितार्थ किया करते हैं।

(नरेन्द्र से) “तुझे अब इन मतों के सम्बन्ध में कुछ सुनने की आवश्यकता नहीं है।

“ये जो भैरव-भैरवियाँ हैं, ये सब ऐसे ही हैं। जब मैं काशी गया था, तब एक दिन मुझे भैरवी-चक्र ले गये थे। उनमें एक एक भैरव था और एक एक भैरवी। मुझे कारण-पान करने के लिए कहा। मैंने कहा, माँ, मैं तो कारण छू भी नहीं सकता। तब वे लोग खुद पीने लगे। मैंने सोचा अब शायद ये लोग जपध्यान करेंगे; परन्तु वह तो रहा अलग, वे लोग नाचने लगे। मुझे भय होने लगा कि कहीं गंगाजी में न गिर जायँ। चक्र गंगा के तट पर ही था।

“पति और पत्नी अगर भैरव-भैरवी हो जायँ तो उनका बड़ा सम्मान होता है।

(नरेन्द्र आदि भक्तों से) “मेरा मातृभाव है, सन्तान-भाव। मातृभाव बड़ा शुद्ध भाव है। इसमें कोई विपत्ति नहीं है। भगिनी भाव भी बुरा नहीं स्त्रीभाव या वीरभाव बड़ा कठिन है। तारक का बाप इसी भाव की साधना करता था। बड़ा कठिन है, भाव ठीक नहीं रहता।

“ईश्वर के पास पहुँचने के अनेक मार्ग हैं। सभी मत एक एक मार्ग हैं जैसे काली-मन्दिर जाने की बहुतसी राहें हैं। इनमें भेद इतना ही है कि कोई राह शुद्ध है और कोई राह अशुद्ध; शुद्ध रास्ते से होकर जाना ही अच्छा है।

“मैंने बहुत से मत देखे, बहुत से पथ देखे। यह सब अब और अच्छा नहीं लगता। सब एक दूसरे से विवाद किया करते हैं। यहाँ और कोई नहीं है, तुम सब अपने आदमी हो, तुम लोगों से कह रहा हूँ, अब मैंने यही समझा कि वे पूर्ण हैं और मैं उनका अंश हूँ, वे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ। कभी यह भी सोचता हूँ कि 'वही' 'मैं' है और 'मैं' ही 'वह' हूँ।”

(भक्तमण्डली स्तब्ध हो सुन रही है।)

भवनाथ – (विनयपूर्वक) – लोगों से मतान्तर होने पर मन न जाने कैसा करने लगता है। इससे यह याद आता है कि सब को मैं प्यार न कर सका।

श्रीरामकृष्ण – पहले एक बार बातचीत करने की, उनसे प्रीतिपूर्वक बर्ताव करने की चेष्टा करना। चेष्टा करने पर भी अगर न हो, तो फिर इसकी चिन्ता न करनी चाहिए। उनकी शरण में जाओ – उनकी चिन्ता करो। उन्हें छोड़कर दूसरे आदमियों के लिए मन में दुःख लाने की क्या जरूरत है?

भवनाथ – ईसा मसीह और चैतन्य, इन लोगों का कहना है कि सब को प्यार करना चाहिए।

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२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद १४ ६६३

श्रीरामकृष्ण – प्यार तो करना ही चाहिए, क्योंकि सब में परमात्मा का ही वास है, परन्तु जहाँ दुष्टात्मा हों वहाँ दूर से नमस्कार करना ही ठीक है। और चैतन्यदेव? उनके लिए भी एक गाने में है – 'विजातीय लोगों को देखकर प्रभु भाव संवरण करते हैं।' श्रीवास के यहाँ से उनकी सास को बाल पकड़कर निकाल दिया था।

भवनाथ – परन्तु किसी दूसरे ने निकाला था।

श्रीरामकृष्ण – बिना उनकी सम्मति के क्या वह कभी ऐसा कर सकता था?

"किया क्या जाय! अगर दूसरे का मन न मिला, तो क्या रातदिन बैठे हुए इसीकी चिन्ता की जाय? जो मन उन्हें देना चाहिए, उसे इधर-उधर लगाये रखकर उसका व्यर्थ खर्च किया करूँ? मैं कहता हूँ, 'माँ, मैं नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल, किसी को नहीं चाहता, मैं तुम्हें चाहता हूँ। आदमी को लेकर मैं क्या करूँ?'

"उन्हें पा लेने पर सब को पा जाऊँगा। रुपया मिट्टी है और मिट्टी ही रुपया, सोना मिट्टी है और मिट्टी ही सोना, यह कहकर मैंने त्याग किया था – गंगाजी में फेंक दिया था। पीछे से डरा कि लक्ष्मीजी को कहीं क्रोध न आ जाय। लक्ष्मी के ऐश्वर्य की मैंने अवज्ञा की, यदि वे मेरी खुराक बन्द कर दें तो? तब कहा, माँ, बस तुम्हें चाहता हूँ और कुछ नहीं। उन्हें पाया तो सब कुछ पा गया।"

भवनाथ – (हँसते हुए) – यह तो चालबाजी है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, उतनी चालबाजी है।

"श्रीठाकुरजी ने किसी को दर्शन देकर कहा, तुम्हारी तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। तुम अब कोई वरदान माँगो। साधक ने कहा, 'भगवन्, अगर वरदान दीजियेगा तो यह वर दीजिये – मैं सोने की थाली में अपने पोते के साथ भोजन करूँ।' इस तरह एक वर में बहुत से वर मिल गये। धन हुआ, लडका हुआ और पोता हुआ।" (सब हँसे।)

(५)

श्रीरामकृष्ण की मातृभक्ति। संकीर्तनानन्द

भक्तगण कमरे में बैठे हैं। हाजरा बरामदे में ही बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – जानते हो, हाजरा क्या चाहता है? कुछ रुपया चाहता है, घर में ऋण है, इसीलिए जप और ध्यान करता है, कहता है, ईश्वर रुपये देंगे।

एक भक्त – क्या वे मनोरथ की पूर्ति नहीं कर सकते?

श्रीरामकृष्ण – यह उनकी इच्छा है। परन्तु प्रेमोन्माद के बिना हुए वे सम्पूर्ण भार नहीं लेते। छोटे बच्चे को, देखो न, हाथ पकड़कर भोजन करने के लिए बैठा देते हैं। बूढ़ों को कौन देता है? उनकी चिन्ता करके जब आदमी खुद अपना भार नहीं ले सकता, तब ईश्वर उसका भार लेते हैं। हाजरा खुद घर की खबर नहीं लेता। हाजरा के लड़के ने

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६६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

रामलाल से कहा है, ‘बाबा से आने के लिए कहना। हम लोग उनसे कुछ माँगेंगे नहीं।’ उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों में आँसू भर आये।

“हाजरा की माँ ने रामलाल से कहा है, ‘प्रताप (हाजरा) से एक बार आने के लिए कहना। और अपने चाचा (श्रीरामकृष्ण) से मेरा नाम लेकर कहना जिससे वे उसे आने के लिए कहें।’ मैंने हाजरा से कहा; उसने कुछ ध्यान ही नहीं दिया।

“माँ का स्थान कितना ऊँचा है! चैतन्यदेव ने कितना समझाया था, तब माँ के पास से आ सके थे। शची ने कहा था, ‘मैं केशव भारती को काट डालूँगी!’ चैतन्यदेव ने बहुत तरह से समझाया। कहा, ‘माँ, तुम्हारी आज्ञा जब तक न होगी, तब तक मैं न जाऊँगा; परन्तु अगर मुझे संसार में रखोगी, तो मेरा शरीर न रह जायगा। और माँ जब तुम मेरी याद करोगी, तभी मैं तुमसे मिलूँगा। मैं पास ही रहा करूँगा। कभी कभी तुमसे मिल जाया करूँगा।’ तब शची ने आज्ञा दी।

“माँ जब तक थीं, तब तक नारद तपस्या के लिए नहीं निकल सके। माता की सेवा करते थे न? माता की देह छूट जाने पर वे साधना के लिए निकले थे।

“वृन्दावन जाकर फिर वहाँ से मेरी लौटने की इच्छा ही नहीं हुई। गंगा माँ के पास रहने का विचार हुआ। सब ठीक हो गया कि इस ओर मेरा बिस्तरा लगाया जायगा, उस ओर गंगा माँ का। अब कलकत्ता न जाऊँगा। केवट का अन्न और कितने दिन खाऊँ? तब हृदय ने कहा, नहीं, तुम कलकत्ता चलो। एक ओर वह खींचता था, एक ओर गंगा माँ। मेरी तो रहने की इच्छा अधिक थी; इसी समय माँ की याद आ गयी। बस सब ठाट बदल गया। माँ बुड्ढी हो गयी थीं। सोचा, माँ की चिन्ता करने लगूँगा तो ईश्वर-फीश्वर का भाव सब उड़ जायगा। अतएव माँ के पास ही चलकर रहना चाहिए। वहीं जाकर ईश्वरचिन्ता करूँगा, निश्चिन्त होकर।

(नरेन्द्र से) “तुम जरा उससे कहो न। मुझसे उस दिन कहा था कि देश जायेगा, जाकर तीन दिन रहेगा। परन्तु फिर ज्यों का त्यों हो गया।

(भक्तों से) “आज घोषपाड़ा-फोसपाड़ा की कैसी सब वाहियात बातें हुईं। गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! अब जरा ईश्वर का नाम लो। उड़द की दाल के बाद पायस-लड्डू हो जाय।”

नरेन्द्र गा रहे हैं।

“निरंजन पुरातन पुरुष एक हैं, अरे तू उन पर अपने चित्त को लगा दे। वे आदि-सत्य हैं, वे कारण (माया) के भी कारण हैं। प्राणरूप से वे चराचर में व्याप्त हैं। वे स्वतः प्रकाशित और ज्योतिर्मय हैं। सब के आश्रय हैं। जिसका उन पर विश्वास होता है, वह उनके दर्शन करता है। वे अतीन्द्रिय भूमि में रहते हैं, नित्य और चैतन्यस्वरूप हैं।” इत्यादि।

नरेन्द्र एक गाना और गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उठकर नाचने लगे। उन्हें घेरकर

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२९ सितम्बर, १८८४ \qquad परिच्छेद १४ \qquad ६६५

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२९ सितम्बर, १८८४ \qquad परिच्छेद १४ \qquad ६६५

भक्तगण भी नाच रहे हैं। सब लोग एक साथ कीर्तन गाते हुए नाच रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने भी एक गाना गाया।

मास्टर ने भी गाया था। श्रीरामकृष्ण को इसकी बड़ी खुशी है। गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए मास्टर से कह रहे हैं, “अच्छा खोल बजानेवाला होता तो गाना और जमता। ताक्ताक् ता धिना, दाक्, दाक् दा धिना, ये सब बोल बजते!” कीर्तन होते होते शाम हो गयी।

☐ ☐ ☐

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परिच्छेद ९५

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परिच्छेद ९५

भक्तों के साथ कीर्तनानन्द

(१)

अधर के मकान पर

आज आश्विन शुक्ला एकादशी है। बुधवार, १ अक्टूबर, १८८४। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर से अधर के यहाँ आ रहे हैं। साथ में नारायण और गंगाधर हैं। रास्ते में एकाएक श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। श्रीरामकृष्ण भावावेश में कह रहे हैं - “मैं माला जपूँगा? छिः! ये शिव पाताल फोड़कर निकले हुए शिव हैं, स्वयम्भू लिंग।”

वे अधर के यहाँ पहुँचे। वहाँ बहुत से भक्त एकत्रित हुए हैं। केदार, विजय, बाबूराम आदि सब आये हैं। कीर्तनिया वैष्णवचरण आये हुए हैं। श्रीरामकृष्ण की आज्ञानुसार, रोज आफिस से आते ही, अधर वैष्णवचरण का कीर्तन सुनते हैं। वैष्णवचरण बड़ा मधुर कीर्तन करते हैं।

आज भी संकीर्तन होगा। श्रीरामकृष्ण अधर के बैठकखाने में गये। भक्तमण्डली उन्हें देखकर खड़ी हो गयी और चरण-वन्दना करने लगी। श्रीरामकृष्ण ने प्रसन्न-चित्त से आसन ग्रहण किया। उसके बाद उन लोगों ने भी आसन ग्रहण किया। केदार और विजय ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम और नारायण से उन्हें प्रणाम करने के लिए कहा, फिर कहा, आप लोग आशीर्वाद दें, जिससे इन्हें भक्ति हो। नारायण को दिखाकर बोले, यह बड़ा सरल है। भक्तगण नारायण और बाबूराम को देख रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (केदार आदि भक्तों से) - तुम्हारे साथ रास्ते में मुलाकात हुई, नहीं तो तुम लोग काली-मन्दिर जाते। ईश्वर की इच्छा से मुलाकात हो गयी।

केदार - (विनयपूर्वक) - जो ईश्वर की इच्छा है, वही आपकी इच्छा है। (श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं।)

(२)

भक्तों के साथ कीर्तनानन्द

अब कीर्तन शुरू हुआ। अभिसार से आरम्भ करके रासलीला कहकर वैष्णवचरण

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१ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद १५ | ६६७

१ अक्टूबर, १८८४परिच्छेद १५६६७

ने कीर्तन समाप्त किया। फिर श्रीराधाकृष्ण का मिलन गाया जाने लगा। श्रीरामकृष्ण मारे आनन्द के नृत्य करने लगे। साथ साथ भक्तगण भी उन्हें घेरकर नाचने और गाने लगे। कीर्तन हो जाने पर सब ने आसन ग्रहण किया।

श्रीरामकृष्ण – (विजय से) – ये बहुत अच्छा गाते हैं।

यह कहकर उन्होंने वैष्णवचरण को इशारे से बतला दिया। फिर 'गौरांग-सुन्दर' गाने के लिए उनसे कहा। वैष्णवचरण गाने लगे।

गाना समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण विजय से पूछते हैं “कैसा रहा?” –

विजय – सुनकर तो मुझे आश्चर्य हो रहा है।

इसके बाद बड़ी देर तक कीर्तनानन्द होता रहा।

(३)

साकार-निराकार की कथा। चीनी का पहाड़

केदार और कई भक्त घर जाने के लिए उठे। केदार ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया, और कहा, आज्ञा हो तो अब चले।

श्रीरामकृष्ण – तुम अधर से बिना कहे ही चले जाओगे, अभद्रता न होगी?

केदार – तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्। जब आप रहे तो सब का रहना हुआ। अभी मेरी तबीयत भी कुछ खराब है और फिर विवाह आदि के लिए जरा कुछ डर भी लगता है। समाज ही तो है – एक बार गड़बड़ हो भी चुका है।*

विजय – क्या इन्हें (श्रीरामकृष्ण को) छोड़कर जायेंगे?

इसी समय श्रीरामकृष्ण को ले जाने के लिए अधर आये। भीतर पत्तलें पड़ चुकी थीं। श्रीरामकृष्ण उठे। विजय और केदार से कहा – “आओ जी मेरे साथ।” विजय, केदार और दूसरे भक्तों ने श्रीरामकृष्ण के साथ बैठकर प्रसाद पाया।

भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण एक बार फिर बैठकखाने में आकर बैठे। केदार, विजय और दूसरे भक्त चारों ओर बैठे।

केदार ने हाथ जोड़कर बड़े ही विनयपूर्ण शब्दों में श्रीरामकृष्ण से कहा – 'मैं टाल-मटोल कर रहा था, मुझे क्षमा कीजिये।'

केदार ढाका में काम करते हैं। वहाँ बहुत से भक्त उनके पास आते हैं और उन्हें खिलाने के लिए सन्देश आदि बहुत तरह की चीजें ले आया करते हैं। केदार यही सब बातें श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं।


* अधर केदार की अपेक्षा कुछ नींची जाति के थे। केदार ब्राह्मण थे इसलिए वे न तो अधर के घर पर खा सकते थे और न उनके साथ ही।

६६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १ अक्टूबर, १८८४

केदार – (विनयपूर्वक) – बहुत से आदमी खिलाने के लिए आते हैं। क्या करूँ? कोई आज्ञा दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – भक्ति होने पर चाण्डाल का भी अन्न खाया जा सकता है। सात वर्ष की उन्माद-अवस्था के बाद मैं उस देश में (कामारपुकुर) गया। तब कैसी कैसी अवस्थाएँ थीं! वेश्याओं तक ने खिलाया, परन्तु अब वह सब नहीं होता।

केदार जाने को उठे।

केदार – (धीमी आवाज में) – महाराज, आप मुझ में कुछ शक्ति-संचार कर दीजिये, बहुत से लोग मेरे पास आते हैं, मुझे क्या ज्ञान है?

श्रीरामकृष्ण – अजी, सब हो जायगा, आन्तरिक भक्ति के रहने पर सब हो जाता है।

केदार के बिदा होने के पहले बंगवासी के सम्पादक श्रीयुत योगेन्द्र ने आकर प्रवेश किया। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उन्होंने आसन ग्रहण किया। साकार निराकार की बात होने लगी।

श्रीरामकृष्ण – वे साकार हैं, निराकार हैं और भी क्या क्या हैं, यह सब हम लोग क्या जानें? केवल निराकार कहने से कैसे काम चलेगा?

योगेन्द्र – ब्राह्म-समाज की एक बात बड़े आश्चर्य की है। बारह वर्ष का लड़का है, उसे भी निराकार ही सूझता है! आदि-समाजवाले साकार पर विशेष आपत्ति नहीं करते। दुर्गा पूजा के समय वे लोग भलेमानसों के घर भी जा सकते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – उन्होंने ठीक कहा, उसे भी निराकार ही सूझता है!

अधर – शिवनाथ बाबू साकार नहीं मानते।

विजय – वह उनके समझने की भूल है। ये जैसा कहते हैं, गिरगिट कितने ही रंग बदलता रहता है; जो पेड़ के नीचे रहता है, वही जान सकता है। मैंने ध्यान करते हुए मूर्तियाँ देखी। कितने ही देवता थे! उन्होंने बहुत कुछ कहा! मैंने मन में कहा, 'मैं उनके (श्रीरामकृष्ण के) पास जाऊँगा, ये बातें तभी मेरी समझ में आयेंगी।'

श्रीरामकृष्ण – तुमने ठीक देखा है।

केदार – भक्तों के लिए वे साकार हैं। भक्त प्रेम से उन्हें साकार देखता है। ध्रुव ने जब उनके दर्शन किये, तब पूछा, आपके कुण्डल क्यों नहीं हिल रहे हैं? श्रीठाकुरजी ने कहा, हिलाओं तो हिलें।

श्रीरामकृष्ण – सब मानना चाहिए जी – निराकार और साकार सब मानना चाहिए। काली-मन्दिर में ध्यान करते हुए मैंने देखी, एक वेश्या। मैंने कहा, माँ, तू इस रूप में भी है। इसीलिए कहता हूँ, सब मानना चाहिए। वे कब किस रूप से दर्शन देते हैं, सामने आते हैं, यह कहा नहीं जा सकता।

२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६६९

यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे। गाना हो जाने पर विजय ने कहा, 'वे अनन्तशक्ति हैं – क्या किसी दूसरे रूप से दर्शन नहीं दे सकते? कितने आश्चर्य की बात है! लोग रेणु की रेणु जो हैं, फिर भी वे समझ बैठते हैं कि ईश्वर के सम्बन्ध में सब कुछ जान लिया।'

श्रीरामकृष्ण – कुछ गीता, भागवत और वेदान्त पढ़कर लोग सोचते हैं, हमने सब समझ लिया। चीनी के पहाड़ पर एक चींटी गयी थी। एक दाना खाने से ही उसका पेट भर गया। एक दाना और मुँह में दबाकर वह घर लौट पड़ी। जाते हुए सोच रही थी, अबकी बार आकर सारा पहाड़ उठा ले जाऊँगी! (सब हँसते हैं।)

(४)

कर्मयोग तथा मनोयोग

आज बृहस्पतिवार, २ अक्टूबर, १८८४ – आश्विन शुक्ला द्वादशी-त्रयोदशी। कल श्रीरामकृष्ण कलकत्ते में अधर के यहाँ आये हुए थे। श्रीरामकृष्ण वहाँ कीर्तनानन्द में नाचे थे।

श्रीरामकृष्ण के पास आजकल लाटू, हरीश और रामलाल रहते हैं। बाबूराम भी कभी कभी आकर रहते हैं। श्रीयुत रामलाल श्रीभवतारिणी की सेवा करते हैं। हाजरा महाशय भी हैं।

आज श्रीयुत मणिलाल मल्लिक, प्रिय मुखर्जी, उनके आत्मीय हरि, शिवपुर के एक ब्राह्मभक्त, बड़ाबाजार १२ नम्बर मल्लिक स्ट्रीट के मारवाड़ी भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए हैं। क्रमशः दक्षिणेश्वर के कई लड़के और सींती के महेन्द्र वैद्य आये। मणिलाल पुराने भक्त हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मणिलाल आदि से) – नमस्कार मन ही मन का अच्छा होता है। पैरों पर हाथ रखकर नमस्कार की क्या जरूरत है? और मन ही मन जिसे नमस्कार किया जाता है, उसे सङ्कोच भी नहीं होता।

“मेरा ही धर्म ठीक है और सब मिथ्या है; यह सब अच्छा नहीं।

“मैं देखता हूँ, वे ही सब कुछ हुए हैं – मनुष्य, प्रतिमा, शालग्राम; सब के भीतर एक ही सत्ता देखता हूँ! मैं एक को छोड़ दूसरा कुछ नहीं देखता।

“बहुत से लोग सोचते हैं, मेरा ही मत ठीक है और सब गलत हैं – हम जीते और सब हार गये। इससे, जो, बढ़ गया है, वह थोड़े के लिए अटक जाता है। तब जो पीछे पड़ा था, वह बढ़ जाता है। गोलकधाम के खेल में, बहुत कुछ बढ़ गया, परन्तु फिर पौ न पड़ा।

“हार और जीत उनके हाथ में हैं। उनका काम कुछ समझ में नहीं आता। देखो,

६७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

नारियल इतने ऊँचे रहता है, धूप लगती है, फिर भी उसके जल की तासीर ठण्डी है। इधर पानी-फल (सिंघाड़े) पानी में रहते हैं, परन्तु उनकी तासीर गर्म होती है।

“आदमी का शरीर देखो। सिर जो मूल है, ऊपर चला गया।”

मणिलाल – हमारा इस समय कर्तव्य क्या है?

श्रीरामकृष्ण – किसी तरह उनके साथ युक्त होकर रहना। दो रास्ते हैं, कर्मयोग और मनोयोग।

“जो लोग गृहस्थाश्रमी हैं, उनका योग कर्म के द्वारा होता है। चार आश्रम हैं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। संन्यासी को काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिए, परन्तु नित्यकर्म उसे कामना-हीन होकर करना चाहिए। दण्डधारण, भिक्षा, तीर्थ-यात्रा, पूजा, जप, इन सब कर्मों के द्वारा उनके साथ योग होता है।

“और चाहे जो काम करो, फल की आकांक्षा का त्याग करके, फल की आकांक्षा को छोड़कर कर सको तो उनके साथ योग होगा।

“एक मार्ग और है, मनोयोग; इस तरह के योगी में बाहर से कोई चिह्न नहीं दीख पड़ते। उसका योग अन्तर से होता है। जैसे जड़भरत तथा शुकदेव। और भी बहुत से हैं, पर ये दो प्रसिद्ध हैं। इनकी दाढ़ी और बाल तैसे ही रहते हैं, वे उन्हें नहीं निकालते।

“परमहंस अवस्था में कर्म उठ जाते हैं। तब स्मरण-मनन ही रहता है। सदा ही मन का योग रहता है। अगर वह कर्म भी करता है तो लोक-शिक्षा के लिए।

“चाहे कर्म के द्वारा योग हो या मन के द्वारा, भक्ति के होने पर सब समझ में आ जाता है।

“भक्ति से कुम्भक आप ही हो जाता है। मन में एकाग्रता होने पर ही वायु स्थिर हो जाती है, और वायु के स्थिर होने पर ही मन एकाग्र होता है, बुद्धि स्थिर हो जाती है। जिसे होता है, वह खुद नहीं समझ सकता।

“भक्तियोग में योग के साधन होते हैं। मैंने माँ से रो-रोकर कहा था – 'माँ, योगियों ने योग करके, ज्ञानियों ने विचार करके जो कुछ समझा है, वह सब तू मुझे समझा दे – मुझे दिखला दे।' माँ ने मुझे सब कुछ दिखा दिया है। व्याकुल होकर, उनके निकट रोने पर सब कुछ बतला देती हैं। वेद, वेदान्त, पुराण, इन सब शास्त्रों में क्या है, सब उन्होंने मुझे समझा दिया है।”

मणि – हठयोग?

श्रीरामकृष्ण – हठयोगी देहाभिमानी साधु हैं। वे बस नेति-धौति करते हैं – केवल देह की चिन्ता! उनका उद्देश्य आयु की वृद्धि करना है। देह की ही दिनरात सेवा किया करते हैं। यह अच्छा नहीं।

“तुम्हारा कर्तव्य क्या है? – तुम लोग मन ही मन कामिनी और कांचन का त्याग

२ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद ९५ | ६७१

२ अक्टूबर, १८८४परिच्छेद ९५६७१

करो। तुम लोग संसार को काकविष्ठा नहीं कह सकते।

"गोस्वामी गृहस्थ हैं; इसीलिए मैं उनसे कहता हूँ, तुम्हारे यहाँ श्रीठाकुरजी की सेवा है, तुम लोग क्या संसार का त्याग करोगे - तुम लोग संसार को माया कहकर उनका अस्तित्व लोप नहीं कर सकते।

"संसारियों का जो कर्तव्य है, उस पर श्रीचैतन्यदेव ने कहा है - 'जीवों पर दया रखो, वैष्णवों की सेवा करो, उनका नाम लो।'

"केशव सेन ने कहा था - 'वे इस समय, दोनों ही करो, कह रहे हैं। एक दिन कहीं चुपचाप काट खायेंगे।' परन्तु बात ऐसी नहीं - भला मैं क्यों काटूँगा?"

मणि मल्लिक - किन्तु आप तो काटते हैं।

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - क्यों? तुम जैसे के वैसे ही तो बने हो - तुम्हें त्याग करने की क्या जरूरत है?

(५)

आचार्य का कामिनी-कांचन त्याग, फिर लोकशिक्षा का अधिकार

श्रीरामकृष्ण - जिनके द्वारा वे लोक-शिक्षा देना चाहते हैं, उन्हें संसार का त्याग करना चाहिए। जो आचार्य हैं, उन्हें कामिनी और कांचन का त्याग करना चाहिए। नहीं तो उनके उपदेश लोग मानते नहीं। केवल भीतर ही त्याग के होने से काम नहीं होता। बाहर भी त्याग होना चाहिए। लोक-शिक्षा तभी हो सकती है। नहीं तो लोग सोचते हैं, ये कामिनी और कांचन का त्याग करने के लिए कह तो रहे हैं, परन्तु भीतर ये खुद उसका भोग कर रहे हैं।

"एक वैद्य ने रोगी को दवा देकर कहा, 'तुम किसी दूसरे दिन आना, भोजन-आदि की बात बता दूँगा।' उस दिन वैद्य के यहाँ राब की बहुतसी कलसियाँ भरी थीं। रोगी का घर बहुत दूर था। उसने दूसरे दिन आकर उनसे भेंट की। वैद्य ने कहा, 'खाने पीने में जरा सावधानी रखना, गुड़ खाना अच्छा नहीं।' रोगी के चले जाने पर एक आदमी ने वैद्य से पूछा, 'उसे इतनी तकलीफ आपने क्यों दी? उसी दिन कह देते कि गुड़ न खाना।' हँसकर वैद्य ने कहा, 'इसका एक खास अर्थ है। उस दिन मेरे यहाँ राब और गुड़ के बहुत से घड़े रखे हुए थे। उस दिन अगर मैं कहता तो उसको विश्वास न होता। वह सोचता, जब इन्हीं के यहाँ इतना गुड़ रखा हुआ है, तो ये जरूर कुछ न कुछ गुड़ खाया करते होंगे। अतएव गुड़ कुछ ऐसी बुरी चीज नहीं हो सकती। आज मैंने गुड़ के घड़ों को छिपा रखा है। अब उसे मेरी बात का विश्वास होगा।

"मैंने आदि-समाज के आचार्य को देखा; सुना, दूसरी या तीसरी बार उसने विवाह किया है! - लड़के सब बड़े-बड़े हो गये हैं!

६७२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

“ये ही लोग आचार्य हैं! ये लोग अगर कहें, ईश्वर सत्य है और सब मिथ्या, तो इनकी बात का विश्वास भला किसे हो सकता है?

“जैसा गुरु है, उसको शिष्य भी वैसे ही मिलते हैं। संन्यासी भी अगर मन से त्याग करके बाहर कामिनी और कांचन लेकर रहे, तो उसके द्वारा लोक-शिक्षा नहीं हो सकती। लोग कहेंगे, यह छिपकर गुड़ खाता है।

“सींती का महेन्द्र वैद्य रामलाल को पाँच रुपये दे गया था। मुझे यह बात मालूम नहीं थी।

“रामलाल के कहने पर मैंने पूछा, किसे दिया है? उसने कहा, यहाँ के लिए। मैंने पहले सोचा कि दूधवाले को रुपया देना है, न हो, इन्हीं में से दे दिया जायगा! हरे-हरे! जब कुछ रात हुई, तब मैं खाट पर उठकर बैठ गया – बड़ी बेचैनी थी। जान पड़ता था, छाती में कोई खरोंच रहा है! तब रामलाल के पास जाकर मैंने फिर पूछा – 'उसने तेरी चाची को तो नहीं दिया है?' उसने कहा – 'नहीं।' तब मैंने कहा, 'तू अभी रुपये लौटा दे।' रामलाल उसके दूसरे दिन रुपये लौटा आया।

“संन्यासी के लिए रुपये लेना या लोभ में फँस जाना कैसा है, जानते हो? जैसे ब्राह्मण की विधवा बहुत दिनों तक आचार और ब्रह्मचर्य से रहकर एक दिन एक नीच शूद्र के साथ निकल गयी थी।

“उस देश में भगी तेलिन के बहुत से चेले हो गये थे। शूद्र को सब लोग प्रणाम करते हैं, यह देखकर वहाँ के जमींदार ने उसके पीछे किसी बदमाश को भिड़ा दिया। उसने उसका धर्म नष्ट कर दिया। साधन-भजन सब मिट्टी में मिल गया। पतित संन्यासी भी वैसा ही है।

“तुम लोग संसारी हो, तुम्हारे लिए सत्संग की आवश्यकता है।

“पहले है साधुसंग, फिर है श्रद्धा। साधु सन्त अगर उनका नाम न लें – उनका गुण न गायें, तो ईश्वर पर लोगों का विश्वास और श्रद्धा-भक्ति कैसे हो सकती है? जब लोग तुम्हें तीन पुश्त का अमीर समझेंगे, तभी मानेंगे न?

(मास्टर से) “ज्ञान के होने पर भी सदा अनुशीलन चाहिए। नागा (तोतापुरी) कहता था, लोटे को एक दिन मलने से क्या होगा? डाल रखोगे तो फिर मैला हो जायगा।

“तुम्हारे घर एक बार जाना है। तुम्हारा अड्डा अगर मालूम रहा तो सम्भव है, वहाँ बहुत से भक्त आ मिलें। तुम ईशान के पास एक बार जाना।

(मणिलाल से) “केशव सेन की माँ आयी थीं। उनके घर के बालकों ने हरिनाम गाया। वे तालियाँ बजा-बजाकर उनकी प्रदक्षिणा करने लगीं। मैंने देखा, शोक से उन्हें बहुत दुःख न था। यहाँ आकर वे एकादशी को माला लेकर जप करती थीं। मैंने देखा, उनमें बड़ी भक्ति है।”

२ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद ९५ | ६७३

२ अक्टूबर, १८८४परिच्छेद ९५६७३

मणिलाल – केशव बाबू के पितामह रामकमल सेन भक्त थे। तुलसी-कानन में बैठकर नाम-जप करते थे। केशव के पिता प्यारीमोहन भी वैष्णव भक्त थे।

श्रीरामकृष्ण – बाप अगर वैसा न होता तो लड़का कभी इतना भक्त नहीं हो सकता। विजय की अवस्था देखो न।

“विजय का बाप भागवत पढ़ता था तब भावावेश में बेहोश हो जाता था। विजय भी कभी ‘हो हो’ कहता हुआ, उठकर खड़ा हो जाता था।

“आजकल विजय जो कुछ दर्शन कर रहा है, सब ठीक है।

“साकार और निराकार की बात विजय ने कही, जैसे गिरगिट का रंग लाल पीला हर तरह का होता है और फिर कोई भी रंग नहीं रहता, उसी तरह साकार और निराकार हैं।

सरलता तथा ईश्वर-प्राप्ति

“विजय बड़ा सरल है। खूब उदार और सरल हुए बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते।

“कल विजय अधर सेन के यहाँ गया हुआ था। व्यवहार ऐसा था, जैसे अपना मकान हो – सब अपने आदमी हों।

“विषय-बुद्धि के गये बिना कोई उदार और सरल नहीं होता।

“मिट्टी बनायी हुई न हो, तो उसके बरतन नहीं बन सकते। भीतर बालू या कंकड़ के रहने पर बरतन चिटक जाते हैं; इसीलिए कुम्हार पहले मिट्टी बनाता है।

“आईने में गर्द पड़ गयी हो तो उसमें मुँह नहीं दिखायी पड़ता। चित्त-शुद्धि के हुए बिना अपने स्वरूप के दर्शन नहीं होते।

“देखो न, जहाँ अवतार है वहीं सरलता है। नन्द, दशरथ, ये सब सरल थे।

“वेदान्त कहता है, बुद्धि की शुद्धि हुए बिना ईश्वर के जानने की इच्छा नहीं होती। अन्तिम जन्म या अर्जित तपस्या के बिना उदारता या सरलता नहीं आती।”

(६)

श्रीरामकृष्ण की बालक जैसी अवस्था। वेदान्त-विचार

श्रीरामकृष्ण के पैर फूले हुए हैं। इसके लिए वे एक बालक समान चिन्ता कर रहे हैं।

सींती के महेन्द्र कविराज आये और उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण – (प्रिय मुखर्जी आदि भक्तों से) – कल नारायण से मैंने कहा, ‘तू अपने पैर में उँगली गड़ाकर जरा देख तो सही, उँगली का निशान बनता है या नहीं।’ उसने गड़ाकर देखा तो निशान बन गया। तब मेरे जी में जी आया कि मेरे पैरों का फूलना भी कुछ नहीं है। (मुखर्जी से) तुम भी जरा अपने पैर में उसी तरह उँगली गड़ाओं। गड्ढा हुआ ?

६७४ श्रीरामकृष्णवचनामृतँ २ अक्टूबर, १८८४

मुखर्जी – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – अब मेरा जी ठिकाने हुआ।

मणि मल्लिक – आप बहते हुए पानी में नहाया कीजिये। दवा की क्या जरूरत है?

श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, तुम्हारा अभी खून ताज़ा है, तुम्हारी बात ही कुछ और है?

“मुझे बच्चे की अवस्था में रखा है।

“एक दिन घास के जंगल में मुझे किसी कीड़े ने काट लिया। मैंने सुना था, साँप अगर दो बार काटे तो विष निकाल लेता है। इसी ख्याल से बिलों में हाथ डालता फिरता था। एक ने आकर कहा, 'यह आप क्या कर रहे हैं? – साँप जब उसी जगह फिर काटता है, तब विष निकाल लेता है। दूसरी जगह काटने से नहीं होता।'

“मैंने सुना था, शरद् काल की ओस लगाना अच्छा है। उस दिन कलकत्ते से आते हुए गाड़ी में से सिर निकालकर मैंने खूब ओस लगायी। (सब हँसते हैं।)

(सींती के महेन्द्र से) “तुम्हारे सींती के वे पण्डितजी अच्छे हैं। वेदान्तवागीश हैं, मुझे मानते हैं। जब मैंने कहा, तुमने तो खूब अध्ययन किया है – परन्तु 'मैं अमुक पण्डित हूँ', ऐसे अभिमान का त्याग करना, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ।

“उसके साथ वेदान्त की बातें हुईं।

(मास्टर से) “जो शुद्ध आत्मा हैं, वे निर्लिप्त हैं। उनमें माया या अविद्या है। इस माया के भीतर तीन गुण हैं – सत्त्व, रज और तम। जो शुद्ध आत्मा हैं उन्हीं में ये तीनों गुण हैं; किन्तु फिर भी वे निर्लिप्त हैं। आग में अगर आसमानी रंग की बड़ी डाल दो तो उसकी शिखा उसी रंग की दीख पड़ती है। लाल बड़ी छोड़ो तो शिखा भी लाल हो जाती है। परन्तु आग का अपना कोई रंग नहीं है।

“पानी में आसमानी रंग डालो तो आसमानी रंग हो जायेगा और फिटकरी छोड़ो तो वही पानी का रंग रहता है।

“चाण्डाल मांस का भार लिये जा रहा था। उसने आचार्य शंकर को छू लिया। शंकर ने ज्योंही कहा – 'तूने मुझे छू लिया?' चाण्डाल बोला – 'महाराज, न तुम्हें मैंने छुआ और न मुझे तुमने। तुम तो शुद्ध आत्मा हो – निर्लिप्त हो।'

“जड़भरत ने भी ऐसी ही बातें राजा रहूगण से कही थीं।

“शुद्ध आत्मा निर्लिप्त है और शुद्ध आत्मा को कोई देख नहीं सकता। पानी में नमक घोला हुआ हो तो आँखें नमक को देख नहीं सकतीं।

“जो शुद्ध आत्मा हैं, वही महाकारण – कारण का कारण हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ये इतने हैं। पाँच भूत स्थूल हैं। मन, बुद्धि और अहंकार सूक्ष्म हैं। प्रकृति अथवा आद्याशक्ति सब की कारणरूपिणी है। ब्रह्म या शुद्ध आत्मा कारण का कारण है।

“यही शुद्ध आत्मा हमारा स्वरूप है।