सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
सस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः
६१
| यद्यपि दिशि (शा प ११२१) २३९।९९ | यमो वैवस्वत (भा १ ३०१८) ३७७।९ | यस्मिन्सृष्टे (वृ चाणक्य ९ ९) १५७।१७६ |
| यद्यपि दैवाल्लब्धा २४७।५८ | यममिव करधृतदण्डं ९५।८ | यस्मिन्वशे समु (शा प.३६३) ५४।१५ |
| यद्यपि न भ (भर्तृ स ६७२) २४१।१३७ | यमाश्रित्य न (पच १ ५२) १४८।२६० | यस्मिन्वस्तु (शा प ४१७१) ३७५।२३६ |
| यद्यपि बद्ध शै (शा प.१०७८) २१५।७ | ययोरारोपित (सा द १० ८०) १०२।४१ | यस्मिन्विश्वं ३६९।६९ |
| यद्यपि बहुगुणग (शा प १४९) २२०।५ | ययोरेव समं (पच१ ३०४) १४४।४९१ | यस्मिन्वेल्लति २३५।३ |
| यद्यपि बहु नाधीषे तथा ४२।२ | यवनीनयनाम्बु २७।२११ | यस्मै ददाति (शा प ११७६) २३५।१६२ |
| यद्यपि भ्रात(भा १२ ५०६४)३८५।३५६ | यवनैरवनि क्रान्ता ९८।१ | यस्य कृत्यं न (भा ५ ९९३) ३८९।४९५ |
| यद्यपि रटति (भर्तृ स ६७४) २२९।१७ | यश करणधोरणी १०६।१७१ | यस्य क्षेत्र (पच १ २२९) १६२।४१५ |
| यद्यपि शिरोऽधि (शा प.१७५६) २१०।९ | यश पटोडयमङ्गुष्ठे १२३।१ | यस्य क्षोणिपते १३६।४२ |
| यद्यपि सन्ति बहू २१२।२२ | यश पदाङ्गुष्ठ (नैषध ७ १०७) २७०।२६ | यस्य चाप्रिय (शा प १४२८) १५।३७ |
| यद्यपि स्वच्छ (शा प.२०७९) २१५।२ | यश पूरं (प्र राघव ७ ९२) १०६।१६५ | यस्य चित्तं (वृ चाणक्य १५ १)३८८।४६५ |
| यद्यप्याप्रतरोरमु २२४।११२ | यश शशाङ्क ११८।१०३ | यस्य चेतसि (कुमार ६ १८) १०२।४३ |
| यद्यप्युच्चैर्वि (काम नी ५.२७) ३७७।१७ | यश सौरभ्य (भामिनी प्रा ८०) ५५।६१ | यस्य जिह्वा ३४९।५५ |
| यद्रात्रौ रहसि (अमरु १५०) ३२८।१८ | यश स्तोमानुच्चै १०६।१५७ | यस्य जीवन्ति ९७।१ |
| यद्वक्तृ मु (शान्तिश १ १८) २३३।१९९ | यशश्चन्द्रैरुद्य १०६।१६० | यस्य त्वया व्रण (शाकु ४.१३) ३६२।२६ |
| यद्वञ्चनाहितमति (ध्वन्या उ ३) ५०।२०६ | यशस्करे (शा प १४०६) १७५।९२० | यस्य द्वारि सदा १८४।७१ |
| यद्ददन्ति चपले ६३।२२ | यशोदयामण्डि (शा प.१२३१) १०४।९७ | यस्य न ज्ञायते (पच २ ६३) १६५।५२७ |
| यद्ददहल्याहे (मृच्छ ५.३०) २९८।८ | यशोधननिधे ३५।२३ | यस्य न ज्ञायते (पच ४.२०) १६७।६४७ |
| यद्वद्धनमार्सिह च १४३।३७ | यशोऽधि (किरात ३.४०) १७२।८३२ | यस्य न सविधे (सा द १० ७) २५१।२५ |
| यद्वन्नयोदधिसम ३६९।७० | यशो यस्माद्धस्मी ८३।३ | यस्य नास्ति विवे (भा २ १९४५) ३९।८ |
| यद्वात्मान सकलव ३६९।६७ | यश्वत्वारि शतानि ३५।१८ | यस्य नास्ति स्वय (हि ३ ११९) ३९।१ |
| यद्विस्मयस्तिमि (मालती १ २२)२७९।४८ | यक्ष निम्बं (कुव ४६) २४१।१५६ | यस्य पुत्रो न वै ९०।७ |
| यद्वीक्ष्यते खलाना ५७।१४२ | यक्ष मूढतमो १५७।२०१ | यस्य पुत्रो (प्रसगाभ १४) ३८९।४९८ |
| यद्वीचीभि स्पृशसि २१६।२२ | यस्तीर्थानि २१।९२ | यस्य प्रसादे पद्मा (मनु ७ ११) १४२।९ |
| यद्वीर्यं कूर्म (सा द ६ १८६) १०२।३९ | यस्तु कृच्छ्र (भा १ ४५५७) ३९०।५१२ | यस्य भार्या विरू(गरुड पूर्व १०८)३५१।१ |
| यश्वान्द्रावितके(विद्ध शा ३ १४)३०३।१३५ | यस्तु शूद्रो (भा ३ १४०७५) ३८०।१२४ | यस्य भार्या (भा १२ ५५०५)३८५।४०२ |
| यन्नाकृष्टसुवर्णस् (शा प १५४) ३१।४६ | यस्तु संचरते ९८।२ | यस्य भार्या शुचि ३५०।१ |
| यन्न माति (शा प ३३४२) २६४।२४९ | यस्तोषं न २२२।६३ | यस्य मित्राणि मित्रा (का प्र ४ ३०) ९७।२ |
| यन्नम्र सरल (पच २ १८८) ३७७।१५ | यस्माच्च येन च (पच.२ २०) ९२।७१ | यस्य मित्रेण सभाषा (हि.१ ३९) ८८।२ |
| यन्नवे भाजने (हि प्र ८) ३७७।१६ | यस्मार्दार्य (शा प १०४१) २४१।१५९ | यस्य यस्य हि (पच १ ७४) १६३।४७८ |
| यन्नादृतस्त्वमलिना २३८।६९ | यस्मादाक्रामतो २०१।६७ | यस्य वक्त्रकुहरे २९।१६ |
| यन्नाब्यभ्रमिघूर्णमान ६।७२ | यस्मादासीत्कुमार १४।१० | यस्य वज्रमणे (शा प १०९९) २१८।६४ |
| यन्नाद्यापि समा ३५९।१०१ | यस्माद्विक्षुमुदेति १।१४ | यस्य षष्ठी चतुर्थी १८६।५ |
| यन्नाम्न प्रथमाक्षर ९।१२८ | यस्मिञ्जीवति जीव (भर्तृ स ६८०) ९८।६ | यस्य स्त्री तस्य ३४९।५४ |
| यन्नि शब्द (राज न ४ ३०८) ३७७।८ | यस्मिञ्जीवति (विक्रमच ४) २२९।१३ | यस्य स्नेहो (वृ चा १३ ६) ३९०।५१९ |
| यन्निमित्त भवे (शा प १४६१) ३७८।७ | यस्मिन्कुलेय (पच १ ३१४) १७४।८९२ | यस्य स्त्रीषु (प्रसगाभ.१३ ) ३९०।५२१ |
| यन्मञ्जुसिञ्जितमि २६२।१९२ | यस्मिन्कुल (पच १ ९४) १४९।२७४ | यस्या महत्त्व २२०।२ |
| यन्मध्यदेशा (कुव ९७) ३१२।१५ | यस्मिन्खङ्गे (शा प ४६६०) १४३।५९ | यस्या मौलि १०१।५३ |
| यन्मध्ये यच्च (शा प ४१२१) ३७२।१५० | यस्मिन्देशे (पच २ ८३) १५५।८८ | यस्या यस्यामव (भा ११ ७८)३८८।४६२ |
| यन्मनोरथशतैर (शा प.४५३) ९१।४६ | यस्मिंस्तुच्छे २३४।१३३ | यस्या स केस (शा प १२१३) २१५।१६ |
| यन्माता विष्णु १५।१३० | यस्मिन्नेवाधि (पच १ २६६) १४६।१६२ | यस्या सगम (शा.प ८३०) २२४।१०२ |
| यन्मुक्तामण (शा प १११२) २१८।६१ | यस्मिन्बुद्धुदसक ५।५३ | यस्याः सन्नत २३४।१३७ |
| यम प्रतिमही १०६।१७२ | यस्मिन्व्यथा व(भा ५ १३४०)३८९।४७३ | यस्याकर्ण्य वच.(शा प.८४६) २२८।२२० |
| यस्मिन्यदा पुष्क (भाग ४ ६) ३८९।४८९ | यस्यामि कोप ११६।७१ |
६२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्यपद्यार्धा
| श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या | श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या | श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| यस्याङ्गिदितयं | १३।४५ | याते मध्य (भामिनी प्रा १५) | २१९।१३ | यावद्दृष्टिर्मृगाक्षीणां (धूर्तश.८४) | २५१।१२ |
| यस्याञ्जनश्याम | १३५।१२ | यातेयं रजनी | २११।४१ | यावद्यावत्कुव (शा.प ३३१६) | २६१।१५८ |
| यस्यात्मबुद्धि (भा.११.७८) | ३८४।३०३ | याते यात | २२८।२०१ | यावद्याव | २८९।५१ |
| यस्यादौ व्रज (शा प ९६८) | २३५।१४९ | यातोऽस्मि पद्म (रत्ना ३ ६) | २९५।५० | यावन्त. कुरुते (शा प ४१३९) | ३६७।८ |
| यस्यार्थास्तस्य मित्राणि (पच १ १) | ६५।६ | यात्येकतोऽस्त (अ शाकु ४ १) | ३२३।११ | यावन्चीरनिवे | ३२७।२३ |
| यस्यालीयत | ७७२ | यात्रामङ्गल (शा.प ३४३७) | २८४।३२ | याविपत्तिर्धना | ७१।२६ |
| यस्यावन्ध्यरुष (शा.प.९१६) | २३४।१४५ | दन्त्राश्रु यस्य | १२५।४ | यासा कटा (शा प ३२९९) | २६०।१०० |
| यस्याश्वोरश्चिकुर | ३७।६८ | या दक्षिणा | २८८।१५ | यासा नाम्नापि (पच ४.३५) | २५१।११ |
| यस्यासीज्जव (शा प ९५५) | २३४।१३५ | यादृग्जानासि | १६।१३ | यासा सत्यपि (सा द ३ १०) | २५२।५३ |
| यस्यास्ति वित्तं स नर (भर्तृ स ५१) | ६४।९ | यादृशि तादृशि | ६५।११ | या सा जग | ७६।३८ |
| यस्याहुरागमविद. | ४।३५ | यानि मिथ्या (शा प.१३११) | १४५।१३२ | या साधूश्च | ९३।३७ |
| यस्येषव | १०४।१०१ | यानेन तन्व्या (नैषध ७ १०२) | २६९।४१५ | या साधूनिव | ३२।५ |
| यस्योच्छिन्ना | १२२।१८८ | यान्ति न्याय | १५५।८५ | यासामबल | २५१।९ |
| यस्योदये गुरु | २१२।४९ | यान्ती गुरु (भामिनी शृ वि.५४) | २६०।९७ | या सृष्टि स्रष्टुराद्या (अ शाकु १ १) | ७।९९ |
| यस्योदये नैव | २१०।१९ | यान्त्या सर | २७९।५५ | यास्यति जलधर (भर्तृ स ६८८) | २१८।३ |
| यस्योद्यद्वाणबाहु (सु ५१) | १६।४३ | यान्त्या मुहु (मालती.१ ३२) | २७८।५१ | यास्यति सजन (पच १.२२४) | ३३।२६ |
| यस्योद्यद्भुज | ११५।३० | या पाणिग्रह | १८६।१५ | यास्यत्यद्य शकु (अ शाकु ४ ५) | ३६२।३८ |
| यस्योपवीत | १११।६३ | या प्रकृत्यैव चपला (हि २ २४) | ९७।६ | यास्यामीति (शा प.३४३५) | २८४।३१ |
| या कान्ति | २४७।६५ | या बिम्बोष्ठरुचि (शा प ३३९६) | ३३०।२ | या खसञ्जानि पद्मे (शा प ४७१) | ६२।१ |
| या दृष्ट्वा यमुना | २४।१६१ | या भार्या दुष्ट (पच ४.१५१) | ३४८।२४ | या हि शश्वद्ध | ३४९।४७ |
| या या प्रिय. (शिशु ३.१६) | २७३।२ | याभिरनङ्ग | २५०।८ | युक्तं मध्ये | २६६।३१२ |
| या पश्यन्ति प्रियं (भर्तृ ६८९) | २८३।३ | यामस्ते शिव | २१५।१५ | युक्तं यया (सु ४४०) | ६०।२४२ |
| या कटाक्षच्छटा | १९४।३८ | या महेश | २१०।१२ | युक्त प्रमा (किरात ११.२९) | १६१।३७२ |
| या कर्थचन (शिशु.१० १८) | ३१५।२१ | या माताममता | २०५।४ | युक्तमुक्तं (स्कांद काशी १) | १५९।२९२ |
| या कर्षति निज | ८४।८ | यामि न यामीति धवे (कुव ४२) | ३२९।४ | युक्तियुक्तं प्रगृह्णी (शा.प ४५२) | १५३।२५ |
| या कामिनी सा | ३४०।२ | यामिन्येषा बह (शृगारति १३) | ३५४।७९ | युक्तोऽसि | २३५।१६५ |
| या कुन्देन्दुतुषार | ३।१३ | यामि प्रेयसि | ३२९।१९ | युक्त्या परो | १५०।३५७ |
| या केलिच्युत | ३६३।४० | यामि विधाय | १८८।४५ | युगपत्खगण्ड | २।१४ |
| या गम्या (किरात.११ २२) | १६१।३६५ | यामीति प्रिय (शा प.३३८७) | ३२९।२ | युगपद्विकास (शिशु ९ ४१) | ३००।६६ |
| याचकघीरो | ७३।२१ | यामीत्यप्रिय | ३२९।२० | युगान्तकालप्रति (शिशु.१०२३) | ३६३।१५ |
| याचते कार्यकाले य (हि २.३१) | ८८।८ | यामीत्युक्ते | ३२९।१४ | युगान्ते (वृ चाणक्य १३.२१) | ३८९।४७५ |
| याचना हि पुरुषस्य (प्रसगा.१७) | ७३।२७ | या राका (गुप्तरत्न.१०) | १७८।१०१७ | युद्धं च (चाणक्य ७२) | १६२।४०३ |
| या चन्द्रस्य | २९०।८१ | या लाक्षा | १११।२६१ | युद्धकालेऽप्रगो (पच १ ५८) | १४८।२६७ |
| याचमानजन (नैषध ५ ८८) | ७२।४६ | या लोभा | ६१।२६० | युद्धा चामि (नैषध १२ ४८) | ११०।२३९ |
| याचितो यः (भोजप्र ७१) | ७०।४ | यावकरसार्द्र (का.प्र ७.१४५) | ३१७।१ | युधिष्ठिर कस्य | १९६।४ |
| याज्ञापद (वृ २७४) | ५०।२१२ | यावच्चक्रे नाज (शिशु १८ २६) | १२९।६९ | युधिष्ठिरोऽसि (शा.प.१२२८) | १०२।१६ |
| याज्ञाशून्यम (शांतिश १ १३) | ३७०।९२ | यावच्छकलितो | २०७।९ | युध्यन्ति | १६७।६४३ |
| या जयश्रीर्मनो (सा द ७ ९) | २७७।१४ | यावज्जीव | १५७।१८६ | युध्यन्ते पक्षिणश | ७०।८ |
| यातं यौवन (भर्तृ.स.६८३) | ३७४।२०७ | यावत्तिष्ठति | २१३।६२ | युष्मत्प्रौढतर | १३४।२० |
| यातस्यास्य | ३०२।९९ | यावत्त्वा न | २४४।२२६ | युष्मद्दोर्दण्ड | १३१।१२५ |
| याता. किं न मिल (अमरु.१०) | २८०।९० | यावत्पौलस्त्य (नैषध १२ ४७) | १३८।८२ | युष्मद्राजि | १२५।१३ |
| याता यान्ति च या (शा.प १५०) | ३०।३ | यावत्फलो (शा प १०२३) | २३९।११० | युष्माकमम्बर (भट्ट.१) | २७।१८ |
| यातास्ते रससार (सु १०८) | ४१।७६ | यावत्स्वस्थ (भर्तृ स ६८६) | १६१।३६१ | यूथान्त्यग्रे | २३३।९८ |
| यातीत. पान्थ (शा प १२७६) | १३३।४२ | यावत्स्वस्थमिदं (भर्तृ १९४) | १७८।१००७ | यूथि यथो | २३८।७८ |
| संस्थाननिर्देशानुक्रमणिकोशः | ६३ |
|---|
| यूना धैर्यं २६८।३६८ | ये बालभावा (विक्रम १२३) ३८४।२९४ | यो धत्ते शेष १८४।२२ |
| यूना मोह २६५।२९४ | ये बाहवो न युधि (दश ४ ९) १५२।४०८ | यो धर्म (पञ्च सृष्टि २२४) ३८९।४९० |
| यूना येन २३१।४७ | येऽभिक्षा २४०।१२२ | योधैरेव १२७।२० |
| ये कन्द (का प्र.१०.५४७) १३२।१६ | ये मजन्ति (महा ना ७ १९) ११९।१३३ | यो ध्रुवाणि परि (गरुड १०८) १६२।३९४ |
| ये कायस्थ ९९।१८ | ये मुष्णन्ति ९९।२१ | यो न ददाति न (शा प ३८७) ६५।१६ |
| ये कुण्ठीकृत (शा प ३७२६) ३२४।४६ | ये ये खञ्जनमेक (शृङ्गारति ५) ३१४।७१ | यो न वेत्ति १८४।२५६ |
| ये के विचित्र ४०।४९ | ये लब्धाश्रय १११।२५३ | यो न सचरते ९८।१ |
| ये गृह्णन्ति (शा प ११०९) २१७।६० | येवर्धन्ते धनपति (भर्तृ स १७४) ९७।१० | यो नात्मजे न च (पञ्च १.११) ९८।१० |
| ये च प्राहुर्दुरा (पञ्च १ ४०) १४८।२५० | ये वर्धिता (विक्रमच २५९) २२१।१९ | यो नात्यु(भा १२ ११००८) ३९२।५९६ |
| ये च मूढ (भा १२ ७५९) ३९१।५७९ | येवर्धिता करि(विक्रमच.२५७) २२३।८१ | यो नानाद्युति (राज त ३ २१८)३७८।६३ |
| ये जाते व्यसने (शा प २४८) ५२।२५६ | ये शान्त १७३।८६२ | यो नास्ता १३४।२२ |
| ये जात्यादि (पञ्च १ ३९) १४८।२४९ | ये शिरसा २४७।५० | योऽनाहूत सम (पञ्च १ ९८) १४४।९० |
| ये जात्या लघव. (भल्लट ६०) २१४।१० | ये श्रमं हर्तुमी (सु ३४३) ५६।८६ | यो नोद्धतं (भा ५ १०८१) ३९१।५८८ |
| येऽणृत्वं १११।२५२ | येषा कण्ठ (का प्र १० ४८४) ११०।२३३ | योऽन्यथा स (मनु ४.२५५) ३७७।३६ |
| ये तावत्त्वद्गुणो (सु १६४) ४१।७५ | येषा कोमल (प्र राघव १ १८) ३४।६० | योऽभ्यर्थित (भा ५.१५३२)३९१।५६८ |
| ये त्वेनमभि (भा १.८४०५) ३९०।५०८ | येषा दोर्बल (का प्र ४ १०४) ११०।२३१ | योऽमित्रं कुरुते (पञ्च २ १३) १६५।५२४ |
| ये दीनेषु दयालव (शा प.२२८) ५२।२६४ | येषा न विद्या न (भर्तृ स ६०७) ४०।३२ | यो मे गर्भगतस्यापि (शा प.३१२) ७५।४ |
| ये दोलाकेलि (शा प ३८१६) ३३५।१३७ | येषा निमेषो (शा प ४१११) ३७२।१४६ | यो मोहान्मन्यते(पञ्च १ १५०) ३४८।१३ |
| येन ध्वस्त (ध्वन्या २.२५) १९२।४९ | येषा प्राणिवध (सु ३६७) ५६।९९ | यो य शस्त्रं (वेणी ३ ३२) ३६७।१६ |
| येन पाषाण (सु ८९५) ७९।१३ | येषा वल्लभया (भर्तृ स ६९८) ३६९।७७ | यो यत्र कुशल(भा.१ ३३२४)१४६।१४५ |
| येन भिन्न (भामिनी प्रा ४९) २३०।२४ | येषा श्री (वृ चाणक्य १२ ५) ३७६।२६३ | यो यत्र सतत (चा नी ४२) ३९१।५७७ |
| येन यत्रैव भोक्तव्यं (भर्तृ स ६९२) ९१।३३ | येषामन्यकल ६३।४१ | यो यमर्थं प्रार्थ (शा प.१४३६) १५३।१३ |
| येन शुक्लीकृता (हि १ १८३) १६३।४६१ | येषु येषु दृढं (शा.प ४१२०) ३७२।१४९ | यो येन प्रतिबद्ध. (हि ३ १३०) १४८।२४१ |
| येन स्वा विनिहत्य (शा प ४०८३) ३६६।६ | ये सतोषसुखप्रबुद्ध (भर्तृ स ३१४) २१५।५ | यो रक्ततामतित २७।७ |
| येनाकारि १८७।१० | ये ससत्सु विवादिन (शा प २०६) ४१।६४ | यो रामो निज २१।८२ |
| येनाकारि २४६।२९ | ये सूक्तीन्दुकला (शा प १४३) ८५।१६ | योऽर्थकामस्य(भा ५ ४१४६) ३९२।६२३ |
| येनाकारि मृणाल (नीतिप्र ३) ९५।१२२ | यै ह्याहवेषु १५०।३४४ | यो व्योमा १९२।९० |
| येनाञ्चलेन सर ९२।७७ | यै कारुण्यपरि (सु ३२००) ६८।८४ | योषित पति (शिशु १०.८५) ३२१।११ |
| येनात्मा पण्यता (दृ श ५५) १६८।६९३ | यै. प्राणापहति ३६६।८ | योषिदुद्धत (किरात.९ ६८) ३१६।६० |
| येनानन्दमये (शा प ८४४) २२५।१४२ | यैरिहोडसि १११।२५१ | योषिद्भिरप्या (भाग ११.८) ३८९।४८२ |
| येनानर्गलकाल (शा.प ९०८) २३०।४१ | यैर्वातुलो (सु ३२१) ५१।२३२ | योऽसकृत्वर (का प्र.९ ३७६) १०२।४८ |
| येनामन्दमरन्दे (भामिनी प्रा ९) २२२।५२ | यैस्त्वं गुणगण (भामिनी प्रा.१९) २३०।४४ | यो हि दिष्टमु (भा ३.२९१५)३९२।६०५ |
| येनामोदिनि (शा प ८३७) २२४।१०५ | यो गङ्गामतर ६८।७० | यो हि (भा १२.११३४१) ३९२।६१५ |
| येनास्य (का प्र १० ४४४) २११।४५ | योगीन्द्रश्छन्द ३६।४६ | यौ तौ शङ्खकपाल (शा प १११) १४।८ |
| येनाहंकार (पञ्च १० ४४४) १६४।५१७ | योग्यतयैव (सु २३९) ४८।१४० | यौवनं जरया (सु ३१४३) ७६।१५ |
| येनैवाम्बरखण्डेन (भर्तृ स ३१३) ६५।५ | योग्यस्य त्रिन (शिशु ८ ३३) ३३९।१०२ | यौवनं धन (द्वि.प्र १०) १५९।२६२ |
| येनोत्थाप्य १५।२८ | योजनाना सह ८२।११ | यौवने वर्ती ३४९।४६ |
| येनोत्पलानि २७१।३३ | यो जित (भा ५ ११४९) ३९१।५८१ | र |
| येनोन्मथ्य तमासि(शा.प ७४४) २०९।१५ | योऽत्ति यस्य (सु २९८४) १६५।५४८ | रक्त मर्कचरोध (शा.प.३९७५) ३६६।६ |
| येनोषितं २२५।१३६ | यो दिव्याम्बुज (शा प ८०५) २२१।२८ | रक्तत्वं कमलाना (भर्तृ.स.७०२) ८४।१४ |
| ये पाप १८४।४८ | यो दृष्ट (शा प १०१९) २४०।१२४ | रक्तभावमप २९९।२८ |
| ये पूर्वं परिपालि (शा प ९८५) २३६।२३ | योऽद्वा योद्धा २१।१० | रक्तमासमयं (शा प ४१४२) ३७१।११७ |
| ये पूर्वं यव (विद्ध.शा.३ १०) ३०२।१०५ | यो द्रोणाचल १८४।३४ | रक्तस्त्वं नवप (हनु ५.२४) २८३।१५४ |
| येऽप्यासन्निम (राज.त.१.४७) ३४।६६ | रक्ताब्जपुञ्जर (शा.प.८५८) २२६।१५९ |
६४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या | पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या | पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| रक्ताशोक (विक्रमोर्व.४.४१) | २८३।१५५ | रत्नान्यधो (सु २१२७) | १११।२५७ | रहस्यभेदो (हि.१.९८) | ८८।२ |
| रक्तैर्नैव | १११।२६० | रत्नावलीपूर्वं | ३६।३३ | रा. पुण्यं | १६६।५८७ |
| रक्तोत्फुल्ल (सा द ३ २६५) | ३६६।११ | रत्नैरापूरितस्यापि (शा प.१०८०) | २१५।३ | राकायाम (का.प्र.१० ४५१) | २६२।१६६ |
| रक्तोऽभिजायते (पच १ १५५) | ३४८।१६ | रत्नैर्महार्हेस्तुतुषुर्न (भर्तृ स.५२) | ७७।१० | राकाविभा (का प्र ७.१५६) | ३१२।१८ |
| रक्षन्ति कृपणा (शा प ४७२) | ७०।३ | रत्नाप्तप्रिय (कुव १४०) | २६६।२९७ | राका सुधाकरकरें | २८८।४३ |
| रक्षन्ति पक्षं ((शा प १५७३) | १४३।४४ | रथ शरीरं (भा ५ ११९३) | ३८५।३४० | राकासुधाकर (का प्र.४ ४९) | २७९।५४ |
| रक्ष पात्रगतं (शा प.१११५) | २४७।६२ | रथस्थिताना (कुव ३५) | ३३१।२० | राक्षसा कलि | ९८।४ |
| रक्षाधिका | १५०।३२२ | रथस्यैक चक्र (भोजप्र.१६९) | ५२।२५१ | राक्षसेभ्य. | १९४।२० |
| रक्षामालिका (शा प ३६६९) | ३१७।१ | रथिनो रथि | १२८।२३ | रागकान्तनयने (किरात ९.६३) | ३१६।५५ |
| रक्षेत्कन्या (याज्ञ १ ८५) | ३९२।६३५ | रथेभ्यो गज (शा प ३९८४) | ३६०।७ | रागादिरोगान्सत | ४३।२ |
| रघुतिलक | ११८।१२२ | रथो रथाङ्ग | १२८।२७ | रागिणि नलिने | ७४।८ |
| रङ्गावङ्क | ३०४।१६३ | रथ्याघोषैर्बृंहणै (शिशु १८.३) | १२९।५४ | रागिण्यपि | ३६७।१० |
| रचयति | २६८।३६१ | रथ्यान्तरश्वरत (शान्तिश ४ ९) | ३७०।८८ | रागी बिम्बाध (पच.१ २२१) | ३७८।६२ |
| रचयति सहसा | ११।२२ | रथ्यारजोषु (शा प ३४०७) | ३५४।७६ | रागी भिनत्ति | १८६।७ |
| रजनिचर (विद्ध शा ४ २) | ३३६।२० | रभसादभिस | २९८।१० | रागे द्वेषे | १६६।५८० |
| रजनीमवाप्य (शिशु ९ ३३) | ३००।५८ | रभसेन हार (शिशु १३ ३२) | १२६।३९ | राघवस्य | १९४।१६ |
| रजनीषु विमल (सा द ४ ९) | १३५।९ | रमणीय | १७०।७४५ | राजंस्त्वत्कीर्ति | १३४।१ |
| रजन्यामन्वस्या (शा प ३५०९) | २९३।६ | रमणे चरण (सा द ७ ८) | ३०८।४ | राजंस्त्वद्दर्शने | १०१।१ |
| रजोजुषे जन्मनि | १४।३ | रम्भातरु | १२८।३५ | राजचन्द्रं (भोजप्र १७६) | १०२।४५ |
| रज्यन्न | २६४।२४५ | रम्भापि (नैषध ७ ९३) | २६९।३९२ | राजत सलि (भा ३ ८५) | ६४।१० |
| रजिता न | २१०।१३ | रम्यं द्वेष्टि (अ शाकु ६ ५) | २७४।६ | राजति त्रिवली | २६७।३३३ |
| रजिता नु विवि (किरात ९.१५) | २९७।९ | रम्यं हर्म्यतलं (भर्तृ स ३१५) | ३४५।४५ | राजते राजरामा (भर्तृ स ७०९) | ३२८।२ |
| रटतु जलवर (शा.प ३८७४) | ३४०।३० | रम्यं हर्म्यतलं (भर्तृ स ७०८) | २७३।१८१ | राजनि (हि २ ६४) | १७०।७४९ |
| रणत्कङ्कणाना | ३३१।२ | रम्याणि वीक्ष्य (अ शाकु ) | ३९२।६१८ | राजन्कनक (भोजप्र ३१४) | १०२।२६ |
| रणे बाणगणै (कुमार १६ २४) | १२८।१० | रम्या रामा (प्रसगाभ १३) | ३९२।६२८ | राजन्कमल | १८४।७ |
| रण्डा पीन | ३६५।५३ | रम्यार्थोक्ति | ३१।४४ | राजेन्द्रधुक्षसि (भर्तृ.स.५८) | १५२।४०५ |
| रतखिन्नतरा प्रात(शा प ३७४५) | ३२८।१ | रवि करसह | १०१।६ | राजेन्द्रौवारि (भोजप्र ३१०) | १०२।२५ |
| रतरीतिवीत | ८५।९ | रविचन्द्रौ घना | ७४।३ | राजेन्द्रिष्टस्ते भय (शा प १२७९) | १३२।८ |
| रतान्ते प्राणेशे | ३२१।२३ | रविजा शशि | १८४।७ | राजन्प्रम्यु (भोजप्र ७५) | १११।२६६ |
| रतिकृति गते (शा प ३७१२) | ३२२।५ | रवितप्तो गज (कुव ३७) | २३१।६० | राजन्नवद्य | १९३।६ |
| रतिकेलिकल (सा द ६ १९३) | २९६।१ | रवितुरङ्गतनूरुह (शिशु ६ २२) | ३३५।१० | राजनमुञ्ज (भोजप्र २१२) | ११७।९० |
| रतिक्रीडाद्यूते कथ(दशरू २.३९) | ३१६।३ | रविमणि (सु २२७३) | ३६०।१५ | राजन्नजन्यु (राज त ५ ३१७) | ३८६।३७५ |
| रतिपतिप्रहितेव (शिशु ६ ७) | ३३२।६२ | रविमावसते | २८।२ | राजनराजसुता (शा प १२६८) | १३२।२८ |
| रतिरभसनि (शा प ३६८८) | ३१९।३० | रविरपि न | ५६।१९६ | राजनिव (का प्र ७.२११) | १०५।१४६ |
| रतिरभसविला (शिशु ११ २) | ३२३।२१ | रविसुतकृत | १८९।५४ | राजनवीर | १२४।१० |
| रत्नभित्तिषु (काव्या २ ३०२) | ३६३।२ | रचे कवे• (शा प ५५४) | १९७।२१ | राजन्ससाप्य (कुव १६३) | १३३।२ |
| रत्नसानु | १०४।८४ | रवेरस्तं तेज | २९५।५९ | राजपत्नी (वृ चाणक्य ४ २०) | १६०।३२६ |
| रत्नाकर किं कुरुते (नीतिप्र.१) | ४९।१७१ | रवेरेवोदय (वेणी ?) | २०९।१ | राजश्लाट (प्र राघव ७ ८) | २७८।४४ |
| रत्नाकरतनुजनु (शा प ११४०) | ६२।१६ | रवेर्मयूखैरभि (शा प ३८३८) | ३३६।३६ | राजसेवा (कुव ५४) | १३९।१ |
| रत्नाकरस्तव | ६३।२८ | रसति तरुणीके (शा प ३८९०) | ३४२।८५ | राजा कुल (हि १ १७३) | ८६।५ |
| रत्नाकरे परि (भर्तृ स ७०५) | २४६।२२ | रसायनविद (भा १२ ८७३) | ३९२।६२२ | राजा धृणी (शा प १५४१) | १७२।८२० |
| रत्नाकरो | २१०।२७ | रसालशिखरा (शा प ८४८) | २२५।११७ | राजा तुष्टोऽपि (भोजप्र १७) | १४४।१०१ |
| रत्नाना न (शा.प.१०७२) | २१५।१८ | रसालानामन्त | १४।१६ | राजा धर्मविना (समरञ्जन.२) | ३७८।४३ |
| रत्नानि विभूष (शा.प.३०८६) | २५१।३० | रसा सार (काव्याल.५.२०) | २०६।१२ | राजानं प्रथम (हि.१.२०४) | १४३।२ |
संख्याननिर्देशसप्तमक्रमकोशः ६५
| राजानं ११२।२७४ | रामं सीता १८९।६२ | रे खल तव ५७।१३७ |
| राजानमेव (पंच १ ४२) १४८।२५२ | राम त्वत्की १८४।७३ | रेखा काचन २५६।५० |
| राजा नाम १५०।३२३ | रामरामे (रामरक्षा ३८) १८८।३६ | रे चाञ्चल्य (भामिनी.प्रा ५७) २३२।८० |
| राजानो यं (शा प.१३२४) १४५।१३५ | रामाणा रमणीय (अमरु १२३) ३२६।२८ | रेजुरंश्ट्या ६३०।९७ |
| राजा पश्य १६६।५६७ | रामायाचय १२।२९ | रेजे पुष्पैर्भ्रीष्म ३३५।१ |
| राजा बन्धु (पच १ ३७७) १४९।३०१ | रामाभिषेके (ऋतु ३ ३) १८१।२८ | रेत शोणि (शाति श १ २६) ३७६।२५९ |
| राजा मत्तं (हि ३ १८) १४७।२२४ | रामार्चिता १२।५३ | रेतोरक्तमया २६।२०४ |
| राजा राजा (सु ९७) ८।११८ | रामाविलोल २५९।९५ | रे धाराधर (चान ७) २१४।८० |
| राजा (वृ चाणक्य ६ १०) १६०।३१२ | रामेण त्रि सप्त (शिशु १८ ७०) १३०।९९ | रे धूष्टा वार्त (शा प ४०८७) ३६७।१४ |
| राजा राष्ट्र (वृ चाणक्य ६ १०) ३९१।६०६ | रामे प्रव्रजन (विक्रमच ८०) ९४।१०८ | रे पद्माकर याव (शा प.१८४३२) २१९।१२ |
| राजा वे (वृ चाणक्य १७.१९) ३९२।६०६ | रामो नाम (कृष्ण कर्णा २ ७२) २४१।५५ | रे पद्मिनीदल (शा प ११३३) २४४।२२७ |
| राजाश्रय १७३।८५७ | रामो हेममृग (वै १५) ३७८।४१ | रे पद्मिनी २४४।२१९ |
| राजा सप (भोजप्र ५२) १४७।१९८ | राक्षस चित्त १७८।२८९ | रे पान्था ३३५।१४१ |
| राजस्य जगतो (का नी १ ९) १४२।१ | रासोल्लासम (गीत १ ४ १२) २४१।६८ | रे पुत्र सत्सङ्ग १८२।३४ |
| राजीव जीव (प्र राघव १.३६) २७१।३५ | रिक्ता कर्मणि (शा प १३३०) १५१।३६३ | रेफ व्यञ्जन १२०।१४४ |
| राजीवमिव (काव्या २ १६) ३४४।१० | रिक्तेषु वारि (कुव ३१) ३३६।१८ | रे बालकोकिल (शा प ८४७) २२५।१३३ |
| राजीविनीवि २१४।९ | रिङ्गत्तुङ्गतरेङ्ग १३७।७२ | रे राजहस (शा प ८०४) २२१।१८ |
| राजेति क्षण ११५।२१ | रिपुरिव सखी (गीत.७ १६ २) २८४।२३ | रे रे कोकिल (भर्तृ स.७१९) २२५।१३१ |
| राज्ञौ द्विजा (नैषध ७ ४६) २६१।१५७ | रिपुश्रिय कि १२४।४ | रे रे खला ३१।३२ |
| राज्ञ सबो २००।३८ | रुचि वात्रि भर्तरि (शिशु ९ १३) २९४।४१ | रे रे घरट्ट २६०।१०१ |
| राज्ञस्तु १५०।३३० | रुचिभिर ३०४।१६० | रे रे चातक (भर्तृ स ७२१) २२६।१६६ |
| राज्ञामस्य (नैषध १२ ५८) १९०।२४० | रुचिरति २४४।२२३ | रे रे दीप २४७।६७ |
| राज्ञामाज्ञा १५०।३२४ | रुचिरखरखणंपदा (शा प ५२३) १८६।२ | रे रे निर्दय (ऋतु ५.२२) २८२।१३९ |
| राज्ञि धर्मिणि (भोजप्र.४४) १४५।१९९ | रुजन्ति (मा १२ १२५।४) ३९२।६१६ | रे रे पान्थ ३५५।८३ |
| राज्ञि मात १४६।१६३ | रुद्धनिर्गमन (कुमार ८.६०) २९९।२५ | रे रे रसाल २४०।११३ |
| राज्ञो मानधन (वेणी ४ १) २६६।९ | रुद्रस्यापि १२२।१७५ | रे रे रासभ २३४।१३८ |
| राज्ञो विपद्धनुवियो (दश रू.) ३८५।३३४ | रुद्रोऽद्रिं जलधिं (सु ५४३) ७१।४४ | रे रे लोका ३६५।५६ |
| राज्यं येन २१।८३ | रविरविसर (का प्र ४ ७७) ११६।७२ | रे रे शिष्टबकोट (शा प ८९५) २२९।२३१ |
| राज्य शत १४३।५५ | रुन्धती नयन (किरात ९.६७) ३९६।५९ | रे लाङ्गलिक (शा प ११८४) २४६।३९ |
| राज्य (हि २ १८१) १४७।२२२ | रुष्टे का परपुष्टे (भर्तृ स ७१७) २८८।१९ | रेवावारिणि (शा प ९२२) ९५।१२५ |
| राज्ये सारं (काव्याल ७ ९७) १७१।८०२ | रुष्टोऽपि १५०।३३६ | रे सारङ्गा २८३।१६५ |
| रात्रि काल २९२।३४ | रूक्षं वपुर्न (सूक्ति २४ ४) २३४।१२९ | रोगशोक (हि १ ४१) १६९।७१९ |
| रात्रि सैव (भर्तृ ३ ४५) ३७५।२२७ | रूक्षं विरौति (सु ४३८) ६०।२४१ | रोगी चिर (शा प २५८९) १७०।७६८ |
| रात्रिरागमलि (किरात ९ १६) २९७।१० | रूक्षस्यामधुरस्य (शा प ८८४) २२८।२१६ | रोगोऽण्ड (सु ३८३) ५८।१६७ |
| रात्रिर्गमिष्यति (भर्तृ.स ७१२) २२३।७८ | रूक्षाया स्नेह (पच ४ ५८) ३४९।३० | रोदोरन्ध्रं (शिशु १८.१५) १२९।६१ |
| रात्रिर्मे २८५।३८ | रूढस्य सिन्धु (शा प १०६०) २४३।१९४ | रोमन्थमारेचय(भर्तृ स ७२३) २३३।१०६ |
| रात्रौ जानु (भोजप्र २३३) ६६।११ | रूपं जरा (वानरा ४) १७३।८७२ | रोमावलिङ्क २६७।३५२ |
| रात्रौ रखे (कुव.३५) १३८।१ | रूपमप्रति (शिशु १० ३७) ३१५।४० | रोमावली २६७।३४३ |
| रात्रौ वारिभरा (अमरु ५४) ३४३।९१ | रूपयौवनसपन्ना (स पाठोप ५३) ३९।९ | रोमावलीदण्ड (नैषध ७.९०) २६८।३७९ |
| राधा पुनातु(कृष्ण कर्णा २ २५) २६१।९९ | रूपवाश्चापि ८६।२ | रोमावली सु १४।११ |
| राधामधु २२१।१२ | रूपसपन्न (नल.च १.२२) ३५०।५ | रोमावली र (नैषध ७ ८४) २६७।३५० |
| राधामुग्ध (गीत.५.११.६) २५१।७२ | रूपसौरभ २३८।६६ | रोलम्बस्य (शा प.१०११) २३९।९६ |
| राधामोहन (साहिल.कौ.४.६) २५१।८६ | रूपेणा (पच.४ २२६) १७९।१०२८ | रोलम्बा. २८५।४० |
| रामं वानर १९१।८७ | रे कूप जीव ३२०।२ | रोलम्बेन (शा.प.९७६) १८०।१०४८ |
१ सुभा०अनु०
६६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| प्रतीक / पाद | पृष्ठ।पद्य | प्रतीक / पाद | पृष्ठ।पद्य | प्रतीक / पाद | पृष्ठ।पद्य |
|---|---|---|---|---|---|
| रोलम्बैर्निमि | २३७।२७ | लङ्काधा | १२२।१८४३ | लाभप्रणयिनो (सु २३०) | ४७।८० |
| रोलम्बो | २८५।३६ | लङ्कापते सकुचित (शा प १६१) | ३३।२९ | लाभस्तेषा | १६६।५८३ |
| रोषावेशादामि(शिशु १८ १२) | १२९।५८ | लङ्काभूप | १९७।३७ | लालने बह (भाग १० ११५) | १६१।३४३ |
| रोषावेशाङ्गच्छ (शिशु १८ ४) | १२९।५५ | लज्जा गुणौघ (भर्तृ स ३१८) | ३८५।३२८ | लालयन्तमर (प्र राघव ३।३) | २८।१ |
| रोहणं सूक्तिरत्ना (नल च १.८) | ३८।४ | लज्जा विहाय (शा प ३३८५) | ३२९।७ | लालयेत्पञ्च (भाग १० ११४) | १६०।३०८ |
| रोहणाचल (शा प १०७१) | २१५।१३ | लज्जा कीर्ति | ११९।१२६ | लाला वक्रास (दश रू ४ ७३) | ३७१।१२५ |
| रोहते सायकै (पञ्च ३ १०९) | ३८५।३२२ | लज्जा प्रौढ | ३४६।३० | लावण्य क नु | २०४।१९८ |
| रोहन्तो प्रथमं (अमरु १११) | ३१०।११ | लज्जामहे (सु ८६७) | २१६।२० | लावण्यं तद् (का प्र ४ ७५) | ३६७।११ |
| ल | लज्जावत (सु ३१७१) | ६६।२७ | लावण्यकान्तिप (दश ४ ३६) | ३०६।२८ | |
| लक्ष्मणेयुत्त | १९९।११ | लज्जावशा (शा प ३७५०) | ३५१।२९ | लावण्यद्रविण (औचित्य ११) | २८६।२९ |
| लक्ष्मणो लघु (शा प.३९८७) | ३६०।१० | लज्जा स्नेहः (पञ्च ५ ९१) | ३७९।७५ | लावण्यमधु (सा द १० ३२) | २६२।१६९ |
| लक्ष्मि क्षमस्व | ६३।२९ | लज्जे त्वं मज | ७७।५७ | लावण्यामृतदी (नल च ७ ४३) | २५४।४१ |
| लक्ष्मी तनोतु | २।२३ | लज्जैवोद्व | २८१।१११ | लावण्यामृतमा (शा प ३२.८४) | २५६।४७ |
| लक्ष्मी स्वय (सु १८४८) | २४४।२३३ | लता पुष्पवती | ३२५।१ | लावण्यामृतनव (दश ४.६९) | ३१४।७४ |
| लक्ष्मीकपोल (सु २९) | १४।३ | उताकुञ्ज (सा द ८ ४) | २३४।१२९ | लावण्यौकसि (खडप्रशस्ति) | १०९।२१२ |
| लक्ष्मीकेलि (सु २००५) | २११।४० | लताकुञ्जे | ३२६।२३ | लिखति न (शा प ३४०३) | २७५।६ |
| लक्ष्मीकौस्तुभ (भोजप्र २९) | ९४।११७ | लतानाामे (का.प्र १० ४९८) | २४५।२४३ | लिखन्त्या | २६७।३४४ |
| लक्ष्मीक्रीडा (भोजप्र २५९) | ३०२।१३८ | लतामूले (अल कौस्तु अति १) | २७५।२३ | लिखन्नास्ते (अमरु ७) | ३०८।१२ |
| लक्ष्मीधर | २००।५३ | लतास्ता | २२४।९६ | लिखिता चित्रगुप्तेन | ९१।३२ |
| लक्ष्मीपङ्क (सु ३४१९) | २४४।२३२ | लब्ध जन्म सह (शा प ७५९) | ९४।१०७ | लिम्पतीव (मृच्छ १ ३४) | २९६।१ |
| लक्ष्मीपयोधरोत्स (दश रू ४ ७२) | ७०।१० | लब्ध्व्यमर्थ (महा.ना २१४?) | ३९१।५७८ | लीढग्रस्त (शा प ५९२) | २०७।२ |
| लक्ष्मीपाणि (सूक्ति सहस्र ) | १५।२३ | लब्धसौरभ (शिशु १० २४) | ३१५।२७ | लीनानसूनसरोरुहदष्टे | २७५।१२ |
| लक्ष्मीरस्य हि (अनर्घ ७ ९३) | १४०।२ | लब्धार्थं (विक्रमच २७७) | १०३।६७ | लीनेव प्रति (मालती ५ १०) | २८१।१०५ |
| लक्ष्मीधर्मं (प्रसगाम १७) | ३९२।६२६ | लब्धास्य (शा प ४१३३) | ३७२।१५६ | लीने श्रोत्रेकदे (खडप्रशस्ति २२) | १९।३८ |
| लक्ष्मीर्निर्वृति (शातिश ४ १) | ८१।४६ | लब्धोच्छ्रायो (शा प ३५१) | ५७।१२७ | लीलयैव (शिशु १० ३८) | ३१५।४१ |
| लक्ष्मीर्यादोनिधे (शा प ५२९) | ६२।९ | लब्धोदयो (सु ३९५) | ५८।१७१ | लीलातामरसा (अमरु ७२) | २११।३१ |
| लक्ष्मीर्या | १९८।११२ | लब्ध्वा जन्म(सु ३१०५) | १०४।१०२ | लीलादोला (शा प ३८१५) | ३२७।४० |
| लक्ष्मीर्वसति | १५५।८७ | लभेत सिकतासु (भर्तृ स ३१९) | ४१।५७ | लीलाद्यूतजिता | ६।६२ |
| लक्ष्मीवन्कृत | १९२।९१ | लभेयदयुनं | ६५।१९ | लीलासु (भामिनी प्रा ६२) | २३१।६४ |
| लक्ष्मीवन्तो | ६४।२ | लम्बोदर तव | १८९।५७ | लीलायन्त्य (मा १३ १४७५) | ३७८।४० |
| लक्ष्मीश्चेन्न | १११।२५८ | लम्भिता | २६८।३८९ | लीलालु (भामिनी प्रा ७०) | ३८।२७ |
| लक्ष्मीसपर्क (शा प ११३९) | २७३।२०० | ललाटतिल | १९३।४ | लीलावतीना (भर्तृ स.८२) | ३७९।६९ |
| लक्ष्मीस्ते | १०९।२२२ | ललाटदेशे (पञ्च १ ३३४) | ३८६।३५७ | लीलावली | २७६।४६ |
| लक्ष्मीस्ते | १०९।२२४ | ललाटे कस्तूरीतिलक | २५२।४७ | लीलास्मितेन (शा.प ५४६) | २७८।५० |
| लक्ष्म्या परिपूर्णो (शा प १५०१) | ६४।१३ | ललितगमना नार्यो | २३१।३२ | लुब्ध स्तब्धो (सु ३७३) | ५६।१०३ |
| लक्ष्म्या (काम नी ५ ७३) | ३९२।६२६ | ललितमुरसा (अमरु १६१) | ३३७।६० | लुब्धमर्थेन (हि ४ १०४) | १५५।९७ |
| लक्ष्म्या श्री | २१७।३७ | ललितविभ्रम | ३३२।४६ | लुब्धाना (वृ चा १० ६) | १५६।१५७ |
| लग्नं रागा (वेणीदत्त.पद्यवेर्णी २) | १३८।७९ | ललितान्तानि | १६०।३३१ | लुब्धो न (कुव १०३) | ७१।२५ |
| लग्न केलिकच (का.प्र ७ २३७) | १२।४० | लवङ्गलतिका | ३२५।२ | लुलाये गोमायौ | ९३।९१ |
| लग्नाद्विरेफा (कुमार ३ ३०) | ३३१।२७ | लसन्नौक्तिक | २५७।२० | लुलित (शिशु.११ २०) | ३२४।३३ |
| लग्न पाद | २७४।२७ | लाक्षालक्ष्म (अमरु.६०) | ३७९।७४ | लूनग्रीवा (शिशु १८.५९) | १३०।८९ |
| लग्ना नांशुक (अमरु.६२) | ३२९।१७ | लाङ्गूलचालन (भर्तृ सं ५७) | २३१।७१ | लूनं मत्त (भामिनी प्रा.३९) | २४२।१८२ |
| लघुनि तृणकुटीरे(दशरू.४ २२) | ३४९।२५ | लाङ्गूलेनाभिहत्य (सा.द.१०.९२) | २०७।५ | लेखनी पुस्तक | १५८।२३२ |
| लघुरय | २१६।११ | लाटीनेत्र (सुकुन्द.३२) | ३७१।१०० | लेखन्ती व्योमगर्भे | १२४।१९ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमणिकोशः ६७
| लेखया विमल (किरात ९.२२) ३००।३९ | वक्रं निर्मल (विक्रमांक ८.८७) २७२।६७ | वदति राममनुष्य जघन्यजो २०२।८५ |
| लोक शुभ (शा प ३९६९) ३६०।१७ | वक्र शीतकरो (शा प ९४) १२।३७ | वदनं दशनविहीनं (पच ५ ७३) ९५।९ |
| लोक क्षय (भाग.५ ५) ३८४।३०६ | वक्रश्रीजितज (विद्ध शा २.११) २७४।३३ | वदनं प्रसादसदन ४७।१०३ |
| लोक एष (सु ३०४१) १७७।८११ | वक्रश्रीजितल (शा प ३९२८) ३४७।४० | वदनमिद न (अल कौ अप १) २८३।१५८ |
| लोक एष परलोक (नैषध ५ ९१) ७२।४८ | वक्रसन्दि (का प्र १० ५३७) ३२०।० | वदनशशिन (शा.प ३७११) ३२२।४ |
| लोकत्रय (सू ९१) ९।११ | वक्रस्याधर ३५६।५ | वदनसौर ३३२।६६ |
| लोकद्वयप्रति ९८।३ | वक्राणि पञ्च (अल कौस्तु रसा. १) ४।३३ | वदनाच्च बहि ७३।१२ |
| लोकयात्राऽमर्थ (हि १.१०५) १६३।४५३ | वक्रादुद्रूस मे ७४।४० | वदनेन निर्जित (कुव ५०) ३१२।२८ |
| लोकानन्दन (कुव १३५) २३८।५७ | वक्राम्भोजं (भोजप्र २३०) ११३।२८७ | वदने विनिवेशिता ५५।२०५ |
| लोकानामपि ३४९।५० | वक्राम्मोरुहि ६।७५ | वदन्ती जारवृत्तान्त (कुव ३०) १८६।१ |
| लोकाना मानमात्र ११३।२९३ | वक्रे गुह्यत्व २७०।५ | वदन्तु कतिचिद्बठात्ख ३३।४९ |
| लोकानुग्रह (पच १ २४८) १४९।२९५ | चक्रे वल्गाप्रकर्षी ५३।२७८ | वदन्तु देव १३३।११ |
| लोके कलङ्कम (कुव ००) २६२।१९१ | वक्रोपान्त २७४।२२ | वद प्रादुर्भावा २३९।९० |
| लोकेश कर्ण ११३।९ | वक्रता विश्रतो ५४।१९ | वद वल्लभ १९९।२४ |
| लोकेषु निर्धनो १५८।२४८ | वक्रत्वं ननु ६१।२६८ | वध्यन्ते न ३९०।५०९ |
| लोकोत्तरं चरित (अल सर्वस्व) ७८।७ | वक्ता नैष (शा प ११९१ २४९।९८ | वनानि दहतो (शा प ४८८) १५५।१२० |
| लोको वहति (हि ४ ६०) ३७९।७२ | वका कपटर्नि (कविनामृ १२) ५८।१६३ | वनान्ते खेल (अल कोस्तु विष १) २४५।९ |
| लोचन (भामिनी शृ ५०) २५८।४५ | वकेण शिरसि (सु १६६९) ३३५।१३८ | वनान्यमूनि (काव्या २ २८९) ३६७।१५ |
| लोचना (किरात ९.६०) ३१५।५२ | वक्तै क्रूतरैरै (शा प १५१५) १५४।७० | वनिताकरतामर (भोज प्र ) ३४६।३५ |
| लोचने हरिण २५९।९३ | वक्रोऽपि पङ्कज ८२।४३ | वनी मुनीनाम ३६२।१३ |
| लोडितमखिलं २३९।१०१ | वक्रोऽस्तु बाल्ये २१०।१७ | वनेऽखिलकला (सा द.१० ९६) १३१।५ |
| लोभ प्रतिष्ठा (भोजप्र १) ६९।१ | वक्ष किमु ३५६।१० | वने जने ९२।५६ |
| लोभ सदा (शा प ४२८) ६९।८ | वक्षःपीठे (शा प १०३) १३।५२ | वने जाता (शा प ५१५) १८४।२ |
| लोभमूलानि पापानि १५८।२१४ | वक्षस्ते दृढलम ३२८।१६ | वनेऽपि सिंहा (पच ५ ७१) ४९।१६८ |
| लोभश्चेदगुणेन (भर्तृ स ३७) १७८।१०१५ | वक्ष स्थली रक्षतु १४।१५ | वने वसति १८४।६ |
| लोभात्क्रोध (भा.१२ ५८८०) ६९।३ | वक्ष स्थलीवदनवा २५०।१३ | वनेषु दोषा (शाति श २ २८) १७४।९०५ |
| लोभात्क्रोध प्रभवति (भोजप्र २) ६९।२ | वक्षत्यावरणा (शा प ३२८०) २५६।४६ | वनेषु वन १३५।२७ |
| लोभादेव (हि १ २४) ३८२।२०० | वक्षोजच्चि ३५६।१४ | वन्दामहे महे २०।७५ |
| लोभाविष्टो नरो ६९।६ | वक्षोजौ निबिट २५८।२९ | वन्दे देवं जलधिशरधि (कुव ६८) ५।४६ |
| लोभेन बुद्धिश्चलति (हि १ ४२) ६९।५ | वचनैरनमता (शिशु १६ २७) ४९।१५२ | वन्दे वन्दारुमन्दार २।१ |
| लोलचोलचमत्कृति ३५७।४० | वचसि भवति (भर्तृ स १४७) २५२।५१ | वन्द्य स पुमा (सु ३१९) ४९।१८३ |
| लोलदृष्टि (किरात ९ ४७) ३१६।१२ | वचस्तत्रैव वक्त्त (पच १ ३४) १५९।२६४ | वन्द्याश्चिन्दति (सु ४५९) ६२।२७७ |
| लोलाशुक्स्य (वेणी ५ २८) ३११।१२ | वचासि वाचस्पति (विक्रमांक १ ७) ३।९ | वपु कुञ्जीभूत (कविता ६४) ७६।४२ |
| लोले ब्रूहि १४।९ | वचो वीचीदान ३११।१४ | वपु परीणाह (शा प.११०३) २५७।५२ |
| लोलैलौचन (अमरु ६१) ३३०।६ | वचो हि सत्य ८४।१५ | वपुरनुपम (शा प ३३५४) २६८।३८५ |
| लोहितायति (शा प ३९८३) ३६०।६ | वज्र च राजते (हि २ १६८) १४७।२१६ | वपुरविहितसिद्धा एव ५१।२२४ |
| लौकिकाना हि (उत्तर रा १ १०) ३६।४७ | वज्रादपि कठो (उत्तर रा २१५) ४५।४ | वपुर्दलनसभ्रमा (खड प्र ३०) १९।४७ |
| व | वज्रेण त्रिजग (सूक्ति ६१ ९) ३४१।६१ | वपुर्विषमसस्थान (भल्हट ?) २३४।१२४ |
| वंश प्राशुरसौ (शा प ११८७) २४७।५१ | वटवृक्षो महानेष (शा प ५३९) १९५।४३ | वय काका वय काका २२८।२०४ |
| वंशभवो गुणवानपि ८७।२१ | वणिक्प्र (शौनकी नी.अ.११५) ३८९।४७७ | वयं बाल्ये बाला(शा प ३७६१) ३५२।३२ |
| वंशावलम्बन ५७।१४४ | वणिगालोक्य निजे ३९०।५३९ | वय येभ्यो (शा प ४११३) ३७३।१७७ |
| वंशे गुण इव ५७।१५६ | वत्स गच्छ सम वाचिक ३६२।१० | वय.प्रकर्षांदु (शा प.३३४४) २६६।३१७ |
| वंशो विश्वावतंसो ८९।६ | वत्से मा गा विषादं (कुव १५५) १७।१५ | वयमपि कवयः कवयः ३५।५ |
| वक्र चन्द्रविका (भर्तृ स ००) २५४।४३ | वदतानुत्तमवचनं ध्वनि २००।४४ | वयभिह परितुष्टा (शा प.३०८) ७५।१७ |
| वयस परि (बृ.चा १२.२३) ३९२।६१३ |
| ६८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| वयसि गते कः काम १७४।८९६ | वर्णैः कतिपयैरेव (शिशु २ ७२) ८४।४ | वाक्यं तु यो ३८२।२२० |
| वयसी शिशुता (नैषध २ ३०) २६७।३४७ | वर्धते येन न (सूक्ति १२६ १८) ७६।२५ | वागर्थाविव (रघु १ १) १८१।२० |
| वयस्या क्रोष्टार प्रति ३६०।३० | वर्धते न चिर लोके वंश ८९।४ | वागुच्चारोत्सवं ९८।६ |
| वयो नव्यं स्वान्तं विषयतरल ३३०।१ | वर्धनं वाथ समानं (हि २ १३९) ५५।४० | वाग्वादमर्थं १६७।६४० |
| वयोभिमानादपमानता २३०।२१ | वर्धिते सेवि (शा प १०३३) २४१।१४५ | वाङ्मात्रार्यन्नान्य (शा प.१४२७) ८५।११ |
| वयोवृद्धास्तपोवृद्धा (शा प ३३४) ६५।२ | वर्धेत स्पर्धयैवोभौ (सु ३४६) ५६।८९ | वाच पल्लवयत्यु (गीत १ ४) ३७।७० |
| वरं कृतध्वस्तगुणादप्य १६६।५९० | वर्षेन्ति स्तन (शा प ३४९०) २९०।७४ | वाचयति नान्य (सु २३४४) ३६४।२६ |
| वरं गर्भस्रावो (पञ्च.भू ५) ९०।११ | वर्षानिलरजो(शा प १४१२) १४५।१०६ | वाचाशौचं च (वृ चा ७ २०) ३८६।३५२ |
| वरं तुङ्गाच्छृङ्गा (भर्तृ २ ७७) १७७।९८१ | वर्षासु का भवति निर्मधु २०२।८७ | वाचो वाग्मिनि (शृं ति २ ३५) ३११।१९ |
| वर दरिद्र श्रुतिशास्त्र(सु ३४४०)४०।३६ | वर्षासु जाता(अल कौस्तु अस १)३४०।१६ | वाच्य तस्मै २८७।६ |
| वरं दारिद्र्यम (शा प १४४१) १५३।१८ | वर्षासु भीतमवशाद्विभुजं १३२।१४ | वाजिवारण (गरुड पूर्व ११०) १६३।४७४ |
| वरं न राज्यं न (वृ चा ६ १३) | वलिभिर्मुखमाक्रान्तं (भर्तृ स १५६) ७६।४ | वाजी चारु (शा.प १५५५) १४५।११० |
| वरं पक्षच्छेद (भर्तृ स ३२१) २१५।११ | वल्गतकुच व्याकु(शा प ३६०८) ३२०।८ | वाञ्छा सज्जन (भर्तृ स ४३) ५२।२५९ |
| वरं पर्वतदुर्गेषु (भर्तृ स ३२०) ३९।५ | वल्गतकचानि वलनासट २९१।११ | वाञ्छैव सूच (पंच २ ८७) १७६।९५१ |
| वर प्राणपरि (शा प १७४३) १४७।२०९ | वल्मीकप्रभवेण (सु १८६) ३४।६५ | वाणिज्येन गत ३५५।८२ |
| वरं मौनं कार्यं (हि १ १३७) ३७८।६७ | वल्लभोसङ्गसङ्गेन (सा द १० ६८)२७५।४ | वाणि त्वत्पद (प्र राघव.१.८) ३२।५० |
| वरं वनं वरं भैक्ष्यं (शा प १३७४) ९७।५ | वल्लीना कति (शा प १०६१) २४३।१९९ | वाणी दरिद्रस्य ६५।१० |
| वरं वन व्याघ्रगजे (नीति र १५) ६६।४६ | वंशं प्राप्ते (प्र ९५) ३७८।३८ | वाणी ममैव ३१।३३ |
| वरं वरयते कन्या १६५।५४३ | वश्यभावेन सुमना ३५०।१० | वाणी रसवती ९७।३ |
| वरं विन्ध्याटव्यामन्न (सु ३०५५)८४।१८ | वसति कुत्र सरोरुहसन्तति २०१।६४ | वात स्थावर १२४।१० |
| वरं विभवहीनेन (हि १ १३५) ७१।१३ | वसन्तनीलोत्पलषट्पदाना २६०।१०४ | वातार्कीणे (शा प ३८५६) ३४०।१२८ |
| वरं शून्या (हि १.१३८) १७७।९८६ | वसन्तप्रारम्भे (सु १६८८) ३३५।१४० | वाताच्छीतिर १८९।५६ |
| वर सखे सत्पुरुषापमानि १७४।८८५ | वसन्तमासाथ २०२।७९ | वातान्दोलित (विक्रमच २६०) २२१।२७ |
| वरं हालाहल पीतं (शा प.२५९) ६४।३ | वसन्तमासाद्य २०२।८१ | वाता वान्तु (भट्ट.१०१) ३४३।१०७ |
| वरं हि नरके वासो (सु ३१६३) ६६।२० | वसन्तविश्लेषमपारयन्त्या ३४०।१७ | वाताहारतया (भट्ट.८७) ६१।२६९ |
| वरतरुविघटनपटव (शा.प ७९०) २१४।५ | वसन्त्यरण्येषु (शा प ९४५) १७४।८८३ | वाति गन्ध (र २.६१ १९) ३९२।६०२ |
| वरममी तरवो वन (सु.४८८) ७२।५० | वसुधान्तनिःसृत (शिशु.९ २५) ३००।५० | वाते वाति यद ९१।२६ |
| वरमल्पबलं सारं (हि ३ ८९) १४३।६२ | वसुमतीपतिना नु सरस्वती ३०।११ | वातैर्विधूनय (चात ३) २१२।४६ |
| वरमत्यन्तविफल (सु ३८५) ५६।११२ | वस्तुनि चिराभिलषिते १७१।७८५ | वातोद्भूतमुखी (शा.प ३६११) २९८।१९ |
| वरमश्रीकता (शा प.११३६) २४३।२०५ | वह्नं गा च (शा प ४४१७) १६६।५७९ | वातोल्लासित २१५।५ |
| वरमसिधारा तरु (पञ्च.स.९) ६५।१५ | वह्नहीनस्त्वलं (चाणक्य.५१) १६१।३८४ | वादानाशान्नु ११३।२९४ |
| वरमसौ दिवसो (अमरु १२५) २८४।१२ | वहति भुवनश्रेणीं (भोजप्र २०७) ५१।२२६ | वानीरप्रसवैर्नि (मालती ९.१५) १४०।३ |
| वरमहिमुखे क्रोधा' (शा प २५५) ८०।३८ | वहति विषधरा ५९।२०७ | वान्ति कहार (अमरु.१२२) ३४५।५६ |
| वरमुन्नतलाङ्गला (शा.प.४९३) २२९।११ | वहल्यस्या दृष्टि (प्र.राघव २ १६) २७१।४५ | वान्ति रात्रौ (शा.प.२९१५) ३४५।५५ |
| वरमेको गुणी पुत्रो (स पाठो ५३) ९०।७ | वहद्वहलमारुत ३३७।४२ | वापी कापि कदा २४७।५६ |
| वरुणेन यथा (र २.१२२.१२) ३७९।७३ | वहन्ति शोक ४५।१२ | वापी कापि स्फु (कुव.३६) २७१।५० |
| वर्जनीयो मतिमन्ता (शा प.३६७) ५४।१८ | वहन्ती सिन्दूरं (कुव.६७) २५८।३८ | वापीतोयं तटरूह (शा प.३६००) २९६।९ |
| वर्जयेदिन्द्रिय (शा प.१५१९) १५४।७३ | वहसि बलि २३९।१०७ | वापी पाताल १३८।७७ |
| वर्णं सितं समभि (भर्तृ सं ३२३) ९५।१४ | वहेदमित्रं (मा १२ ५२६४) १५५।८९ | वापी स्वल्प (पू चातका ५) २२६।१६७ |
| वर्णनदयित (शा प ४०५३) ३६४।३३ | वह्निं शीतयितु हिम (सु २२८७) ७८।१४ | वाप्या ज्ञाति ३५५।११ |
| वर्णप्रकर्षे सति (कुमार.३ २८) ३३१।२५ | वह्निज्यालेव १६०।३०५ | वाप्यो भव (सा द.१० ७८) १७१।८०३ |
| वर्णयामि विमलत्वमम्भस १२४।१ | वह्निस्तस्य (भर्तृ सं ४३) ८४।१९ | वामस्कन्धनिक्ष (कवि क ५ १) २०८।२९ |
| वर्णस्थं गुरुलाघवं न ६२।२७६ | वह्ने शक्तिर्जल (बाल रा ५ ३५) ३४७।१३ | वामासस्थल २५१।७८ |
| वर्णाकारप्रतिष्ठा (हि ३ ३२) १४७।२२५ | वाक्चक्षुःश्रोत्र ६२।१४ | वामाङ्गीकृतवामाक्षी (शा.प ६२) ३।२ |
स्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ६९
| वायुमित्र १८९।५९ | विकिर धवल (वेणी.२ १६) ३०६।३५ | विद्यया विमल ५९।२१२ |
| वायुरिव खलजनोऽयं (सु.४०५) ५८।१८० | विकीर्णहरिं (शा प ४०७८) ३६६।२ | विद्यया शस्यते ३९।१६ |
| वायुरेव महाभूतं २१४।१ | विक्रीतं नैव (शा.प ३२३) ४५।१६ | विद्यया सह १५९।२६७ |
| वारंवारं (मालती.१ ३८) २७९।६२ | विक्रन्ततीव ३६१।८ | विद्ययैव समं काम (सु ५०६) १६७।६१२ |
| वारंवारं धुत ३२६।२६ | विक्रीतं निज १६८।६९४ | विद्यातीर्थे (प्रसगाभ ६) १७८।१००१ |
| वारंवारमुदश्रु ३३०।१ | विगततिमिर (शिशु ११ २६) ३२३।२९ | विद्या नाधि (भर्तृ स १७५) ३७५।२२५ |
| वारणार्थपद (शिशु १० ७०) ३१८।१३ | विगतराग (शिशु ६ ३९) ३४१।४५ | विद्या नाम (भर्तृ स ७०) ३०।१६ |
| वारणेन्द्रो १९९।१५ | विगतशय्य (शिशु ६ ४९) ३४५।३७ | विद्या नाम ३०।१५ |
| वारस्त्रीव वन ३३३।९९ | विगाहमात्रे (किरात ८ ३१) ३३८।७६ | विद्याभ्यासो १५५।८६ |
| वारिजेनेव (सा द १० २६) १६८।६६१ | विगुणोऽपि ३२।२१ | विद्या मित्र (वृ चा ५ १४) १५९।२८७ |
| वार्ता च (प्र राघव २ १) ३७६।९५४ | विगृहीत ४६।४९ | विद्याया दुर्मदो (शा प ४९७) १८१।८ |
| वार्यन्तां २८५।४१ | विघ्नध्वान्त २।२६ | विद्यारत्न सरस (प्रसगाभ १४) ११५।४५ |
| बालीयुतश्रवण १३।५४ | विघ्नेश सर्वं ३।३० | विद्यावत कुलीनस्य (शा प.३९६) ७३।२ |
| वाश्वारेड् १९३।९६ | विघ्नेशो व स पाया (महा ना १ २) २।२९ | विद्यार्थी सेवक (वृ चा ९ ६) ३९२।६१० |
| वास का (पद्य सं ६) २२७।१९७ | विचरन्ति विला (सा द १०.८०) १३१।२ | विद्यावता (पच १ ३८) १४८।२४८ |
| वास खण्डमिद (शा प ४०९) ६७।६३ | विच्छिन्ना रथ (धनजय वि २४) १४०।५ | विद्यावन्तो ११२।२८६ |
| वास शुभ्र (चोर पचा ) १८०।१०४७ | विजनमिति (शिशु ७ ५१) ३३४।११५ | विद्याविधिविही ३९।१० |
| वास शैल (शा प ९९७) १३८।५६ | विजिगीषु (शा प १२९६) १५०।३४२ | विद्या विनयो ३९।१७ |
| वासनावा (शा प ४२२५) १८८।४० | विजितात्म (शा प ५१८) १८७।११ | विद्या विवा (गुण रत्न.७) ६०।२२९ |
| वासरगम्य ४७।९४ | विजेतव्या लङ्का (भोजप्र १७०) ५२।२५० | विद्याविहीना ९०।१२ |
| वासश्मर्म ६८।७६ | विजेतु प्रयते (हि ३ ३९) १४८।२३० | विद्या शस्त्रं च (हि.म ७) ३०।७ |
| वाससां (किरात.९.६५) ३१६।५७ | विज्ञै स्निग्धे (हि.२ १६०) ९७।१६ | विद्युच्चक्रकराल १९।५३ |
| वास्त्वस्तदेव २८५।८ | विडम्बनैव ७१।२९ | विद्ये हृद्यत ४१।७१ |
| वासांसि व्रज १७९।१०३० | विततपृथुवरत्रा (शिशु ११ ४४) ३२७।१३ | विद्योतन्ते २१५।८ |
| वासोऽर्थं (नागा.१.११) १४२।१२ | वितरति गुरुः (शा प.४१४) ४१।६१ | विद्राणे रण (नैषध १२.३०) ११०।२३६ |
| वासो वल्कल (शांति श २.१९) ७४।४४ | वितरवि १७१।७९२ | विद्राणे रुद्रवृन्दे स (शा.प.११२) १३।५१ |
| वासो विधूय ३२५।८ | वितरय कुच ३०६।३३ | विद्वत्कवय ३२।२२ |
| वाहव्यूहखर ११५।३८ | वितर वारिद २१२।३३ | विद्वत्ता चैव ७६।२७ |
| वाहितं १६६।५९५ | वितीर्णशिक्षा इव (सु १७१) ४०।३९ | विद्वत्ता वसु १००।३१ |
| विकचकचकलापः (सु १४८४) २५७।२३ | वित्तं देहि गुणा (वृ चा.८ ५) ३९२।५९८ | विद्वत्त्वं च नृपत्वं च (सु ३४२६) ३८।७ |
| विकचकमल (शिशु.११.१९) ३२६।१४ | वित्तं परि १७०।७४१ | विद्वद्द्रोहीगरिष्ठ ११५।३९ |
| विकटाटव्या ९१।३७ | वित्ते त्याग क्षमा (सु २६४) ४७।८२ | विद्वद्भि सुहृदा (पच २) ३९१।५७४ |
| विकसति नय (शा.प ५३३) १९१।७८ | वित्तेन किं (सप्त रत्न ५) १७६।९४७ | विद्वद्वृन्दगुणा ११७।९३ |
| विकसति सह ३३३।८७ | विदग्धे (भोजप्र.३०३) १८१।२३ | विद्वन्मान (अल सर्वस्व ) १०७।१८१ |
| विकसति सूर्ये ३४५।१० | विदधतु १०६।१५० | विद्वास कवयो १०१।२ |
| विकसदमर १३।२ | विदलितसकला (शिशु.१२ ७७) १०३।७८ | विद्वानुपालम्भ ६०।२२८ |
| विकसन्नेत्रनी (सा.द १०.१२) २७०।६ | विदुरेष्यदपाय (शिशु १६ ४०) ४०।४५ | विद्वान्पूजु (पच १) ३९२।६०४ |
| विकसामि रवानुदिते (सु.३१८६) ६६।३८ | विदुषा वदना २८।१३ | विद्वानेव विजा (कुव ५१) ३८।५ |
| विकसितकु (किरात १०.३२) ३३३।७७ | विदूरे (राघवान ) ३५९।९१ | विद्वान्सदसि (नवरत्न ९) १७९।१०३७ |
| विकसितमुखी (सा द.१० ५६) ३२२।१२ | विदेशेषु धनं विद्या (सु ३०५३) ८४।९३ | विधातुर्नै कन्ये ६७।५७ |
| विकसितसंकु (अनर्घ २ १२) ३२३।३ | विदेवज्ञं ग्रामं १७७।९८२ | विधात्रा रचिता (पच.२ १८४) ३८५।३४१ |
| विकसितसह ३३१।३ | विद्या सूगी २३३।१०१ | विधिरैव हि (कथास.३० ९१) ३७८।३९ |
| विकारं याति नो (पंच २०) ३९१।५६५ | विद्धि श्रीहृदयं १८३।५६ | विधाय मूर्धनि (नैषध.७ १४) २६९।२९३ |
| विकिरति (शा प.३४९८) २९३।३ | विद्यया विनया १६५।५५१ |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | ||
|---|---|---|
| ७० |
| प्रथमः स्तम्भः | द्वितीयः स्तम्भः | तृतीयः स्तम्भः |
|---|---|---|
| विधाय वैरं (शिशु २ ४२) १५०।३५२ | विपन्नलेखा निर ३३८।८३ | विरलविरली (शा.प.३७१८) ३२४।४१ |
| विधायापूर्वं (रत्ना २ ८) २६२।१६४ | विपरीतमावेप (सूक्ति ७९ १) ३२०।३ | विरला जानन्ति १७०।७६१ |
| विधायालीक ३४८।४ | विपश्चिताम ३६४।१ | विरलातपच्छ (शिशु ९.३) २९४।३२ |
| विधि किमस्या २५७।१८ | विपाकदारुणो (प्रव ३१) १४९।३०९ | विरहविदित ३५९।८२ |
| विधिना मन्त्र (पञ्च १ २३९) १४९।२८९ | विपाण्डुभिम्ली (किरात ४.२४) ३४४।२० | विरहविषम काम (अमरु ६७) २८९।६४ |
| विधिरनशम (नैषध ४ ८८) २८२।१३१ | विपिने क्व (राघवविलास) ३६२।१७ | विरहे तव (सा द.१०.६५) २८७।३ |
| विधिरेव (भर्तृ.स ७४७) २२८।२०९ | विपुलकमपि (शिशु ७ ७०) ३३४।१२३ | विरहोऽपि सगम (भर्तृ १ ८०) ३९१।५८५ |
| विधूतकेशा परि (भर्तृ स ७४८) ३३८।७८ | विपुलतरनितम्बा (शिशु ११ ५) ३२३।२३ | विराजतेऽस्या (शा प.३२९५) २५८।४८ |
| विधूता प्रियस्य ३१८।६ | विपुलपुलक (गीत ६ १२ १) २८९।४७ | विराजराजपुत्रा १८७।१४ |
| विधे पिधेहि (शा.प ४९९) १८१।१२ | विपुलमति (मा १३.३३९) ३९१।५६७ | विराटनगरे राज १९३।९ |
| विधोर्विधि २६२।१८६ | विपुलहृदयाभियोग्ये (भोजप्र ९७) ३७।१३ | विराममेवानलया ३०५।१४ |
| विधौ विरुद्धे न ९२।६० | विपुलहृदयैर्धन्यै (भर्तृ सं १६२) ८०।३७ | विरोधिषचसो (शिशु २ २५) ८५।१ |
| विध्वंसपर (वासवदत्ता ९) ५७।१३८ | विपुलेन सागर (शिशु १३ ४०) ३६३।१७ | विलपति तथा (शा प ७८०) २१३।५६ |
| विध्वस्ता मृग (शा प ११५९) २२०।७ | विप्रो वृक्षस्त (वृ चा १० १३) ३९१।५५१ | विलसत्याननं २६२।१६२ |
| विनयं (वृ चाणक्य १२ १८) १५९।२७४ | विप्रार्थेषु धन १६०।३२२ | विलसितमनु (शिशु ७ ४६) ३३४।११० |
| विनयति सुदृशो (शिशु ७.५४) ३३४।१२१ | विप्रियमप्याकर्ण्य ४८।१३० | विलाससद्मगोल्लस (शा प ५८२) २०८।४१ |
| विना कार्येण ये ९६।२ | विप्रेभ्य साधु २४७।४८ | विलासिनी काञ्चन १९०।६६ |
| विना खदिर २४२।१६४ | विबुधावलिसम्पूर्णा १०१।५ | विलासिभिरिवोन्मदै ३३३।९१ |
| विना गोरस १७५।३३६ | भिषज्य मेऽन्नं (नैषध १ १६) १०५।१२९ | विलिखति सदसद्वा ४४।४ |
| विना न साहित्यविद्या (सु १७३) ४०।४१ | विभवो हि यथा ६४।८ | विलिख्य सत्या २२१।१९ |
| विना परीक्षा (दृ श ४३) ४६।६१ | विभिन्नपर्यन्त (किरात ८ ३०) ३३८।७५ | विलीयेन्दु (विद्ध.शा.२ २) २८०।८० |
| विनापि तातेन ३६४।३७ | विभूतिरर्घत्यपि याच (सु ३२५१) ७६।३६ | विल्लुलितकम (शिशु.११.२८) ३२६।२८ |
| विनाप्यर्थैर्वीर स्पृशति (सु ५३५) ७८।१० | विभ्रमैर्विध्वृद्वैस्त्व ३१२।७ | विल्लुलितमतिपूरै २८६।११ |
| विना मयं विना मास(शा प ४०४५) ४५।३ | विभ्रम्य कानन २४४।२२९ | विल्लुलितालकसङ्गति (शिशु ६ ३) ३३२।५९ |
| विना मद्य ३६४।३ | विमुञ्चति पदे १३२।२६ | विलोकयन्तीभिर २५२।८ |
| विनायकपते १८८।३४ | विमुञ्चति बुधो २५२।४९ | विलोकितास्या (नैषध ७ ५१) २६१।१५९ |
| विनायमेनो (काव्याल ३ १५) २०६।१६ | विमुञ्चन्त्या प्राणा (सु १४०३) २८९।६० | विलोकेय (कुमार.१४ ३७) १२८।४० |
| विना यौवन १८८।३३ | वियति विलोलति ३२०।५ | विलोकेय बालामुख १८२।३० |
| विना सायं २६३।१९९ | वियत्पुच्छातुच्छो (शा प.८२) १७।६ | विलोकेय सगमे रागं (सु १८८७) २९३।४ |
| विनिर्गतं मानद ३६५।३ | वियदलिमलिनाम्बु ३०८।८ | विलोचनं दक्षि (कुमार ७ ५९) १२६।३४ |
| विनिश्चेतु (उत्तर रा.१ ३५) ३१३।६२ | वियुक्ता वासन्ती २४०।१२१ | विवर्णवचनैर्मृत्यु (दृ श.७४) १६९।७०५ |
| विनैवाम्भोवाहं (प्र राघव १ ३३) २७१।४२ | वियोगबाष्पा (नैषध ७ ६१) २६०।१२६ | विवक्षतानायिष (कुव ३५) २९७।२१ |
| विन्ध्यमन्दर (शा प १०६४) २१५।३ | वियोगवह्निकुण्डे २८५।१ | विवादप्रारम्भ ८२।४७ |
| विन्ध्याद्रि करि (शा प १२६४) ११६।६३ | विरचिता मधु ३३२।४२ | विवादशीला स्वय १७५।९२१ |
| विपक्ष श्रीकण्ठो (सु २२८०) ५२।२५३ | विरञ्चिनारायण ९१।१२ | विवादो घ्न (शा प.१४६९) १५४।५२ |
| विपक्षचित्तो (किरात ८ ३४) ३३८।७९ | विरमत घना कि (सु १७६२) ३४३।१०४ | विवाहकाले ऋतु १७३।८४६ |
| विपक्ष्मखिली (शिशु २ ३४) १५१।३६१ | विरमत विरमत (सु १०७०) २८४।५ | विवाहे पुरन्ध्रीज १९७।२८ |
| विपत्तौ कि विषा ९१।१४ | विरमति कथनं ३५०।४३ | विविक्तवर्णाम्भर (किरात १४ ३) ८५।१३ |
| विपत्प्रशान्त्यै (शा प.४०९१) ३६७।४ | विरमति महा (अनर्घ १ २) १५।२२ | विविनक्ति न तं (शिशु १६ ३९) ४०।४४ |
| विपत्सिन्धु २८०।८५ | विरम तिमिर (शा प ७६३) २१०।२२ | विवृण्वती पुरस्तैक्ष्यं ५५।६५ |
| विपदि धैर्यमथाम्बु(भर्तृ स १४) ५०।१८८ | विरम नाथ (शृ ति १ ३५) ३१८।७ | विवेक कि (शाति श २.२३) ३७६।२५२ |
| विपदोऽभि (किरात २ १४) १५१।३९२ | विरम रत्न सुधा २१७।५४ | विवेक सह सय (नल च ३ १६) ४६।३७ |
| विपद्यमानता १९४।३९ | विग्म विरभाग्य (भर्तृ स ३२७) ७८।१४ | विवेक एव व्यसनं (दृ श ५) ३७५।२३५ |
| विपन्न पद्मिन्या (शा प ९८१) २३६।१६ | विवेकव्याकोशे (भर्तृ स.३२९) ७७।४७ |
| संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ७९ | ||||
|---|---|---|---|---|---|
| विवेकिन (वृ चा.१६.९) | ३९।३६३० | विषादी मैक्यम | १९५।४८ | वीरसिंहारिनारीणा | १२२।१८६७ |
| विशदप्रभाप (शिशु ९ २६) | ३००।५१ | विष्णुर्वा त्रिपुरान्तको (सु २४) | १।१७ | वीराणा रुण्डतुण्ड | १३१।१२३ |
| विशन्तीना (विद्ध शा १.४४) | ३३७।४३ | विष्णो कावल्लभा | १९९।३० | वीराणा विषमघैर्ण(कुमार १६ २६) | १२८।९ |
| विशाखान्ता गता | १५७।१९० | विष्णोरागमन निशम्य | ५।५९ | वीराणा शस्त्रभि(कुमार १६.२७) | १२८।१२ |
| विशापते विस्त | १०४।९६ | विष्णुपोवनकुमार (अनर्घ २ २२) | १४१।१ | वीरायितेषु मृग | ३२०।१४ |
| विशालं शाल्म (मछट.१०७) | २४१।१५१ | विष्वद्रीचींविक्षिंप | १२९।६८ | वीरे सस्रधि रिपूणां | १९६।९ |
| विशालाक्षीकटा | २६०।९९ | विसृजन्यविक (शिशु १६ ३२) | ४९।१५५ | वीरोऽसौ किमु(महा ना ७.५५) | ३६१।३७ |
| विशालाक्ष्या कटा | २७७।८ | विसृज सुन्दरि (मालवि ४ १३) | ३०५।१९ | वीर्योत्साहस्त्रा (शिशु.१८.१६) | १२९।६२ |
| विशिखव्यालोरन्यस् | ५४।३ | विस्तारिणा मुहु | २६८।३७३ | वृक्षं क्षीण (सस.रत्न ४) | १७८।१०१३ |
| विशीर्णे. प्रार (शांति श १ ६) | ३७६।२४८ | विस्तारी स्तनभार (दश रू) | २५७।५८ | वृक्षमूलेऽपि | ३५०।७ |
| विशोधयेन्मही (शा प १३५०) | १४६।१५३ | विस्तीर्णव्य (पञ्च ३) | ३७९।७१ | वृक्षस्याग्रे फलं | १८५।३३ |
| विश्रामार्थमुप (शिशु १० ८८) | ३२१।१४ | विस्तीर्णी दीर्घ (शा प १०३४) | २४१।१४८ | वृक्षाग्रवासी न च | १८५।३४ |
| विश्रम्य विश्रम्य (भर्तृ १ २२) | २७५।१६ | विस्फार्य व्योमगङ्गा | ११४।१५ | वृक्षाग्रवासी न च | १८५।३३ |
| विश्रान्तो दिवस (शा प ३४२०) | २८६।२४ | विस्सय सवेथा (हि २ १५) | १५५।९५ | वृक्षान्दोलनमद्य | २३५।१५२ |
| विश्राम्यन्ति (का नी ५ ७२) | ३९१।५५३ | विस्रन्वघातदोष (कुव १२३) | १७१।७८६ | वृत्तं यत्नेन (मा.पू.१२८९) | ८४।८ |
| विश्लेषाकुलचक (नल च ५.७५) | २९५।६१ | विहगपति क हत | २०१।६० | वृत्त युद्धे (शिशु.१८ ६६) | १३०।९० |
| विश्वं चाक्षुषमस्त (अनर्घ २ ५२) | २९८।३७ | विहंगा वाहन येशा | १८७।२८ | वृत्तानुपूर्वे च (कुमार १ ३५) | २६९।४०१ |
| विश्वंभराप्रलम्बघ्र | १९८।४ | विहंगैर्गतं मधुकैरश्च | २९।१५ | वृत्ताम्बिष्या हृतायां | ८।१९३ |
| विश्वस्य हेतुरमरै (शा प ५४२) | २०६।१७ | विहस्य प.णो (किरात ८.५१) | ३३८।९४ | वृत्ति खा (राज त १.२२८) | ६१।२७३ |
| विश्वाभिरामगुण - | ५०।२०१ | विहाय पीयूषरस | २२१।१८ | वृत्तिच्छेदविधौ | १५३।४२१ |
| विश्वामित्रपराशर (भर्तृ स ३३०) | २५२।५७ | विहाय पौरुषं यो हि (शा प ४५६) | ८२।५ | वृत्त्यर्थं नाति (हि.१ १८२) | १६२।४६० |
| विश्वास संपदा (पञ्च २ २५) | १४१।३०५ | विहाय वाञ्छा (किरात ४.२५) | ३४४।२१ | वृथा कथं नृत्यसि | २२६।१५७ |
| विश्वासप्रति (हि ४ ५२) | १६५।५६१ | विहायसि विहारिणी | ३२०।१६ | वृथा गाथाश्लोकै (सूक्ति ४१ ६) | २८७।५ |
| विश्वासो भवता | १३७।७१ | विहारभूमेरभि (किरात.४ ३१) | ३४४।२३ | वृथा ज्वलित (सु ३७९) | ५६।१०९ |
| विश्वास्य मधुर | २४५।१३ | विहितचनालकार | ३६।५० | वृथा दुग्धोऽनड्वा (सु.४४९) | ६०।२५१ |
| विश्वेशो व स पायात् | ९।१८ | विहितस्नाननु (याज्ञ ३ २११) | ३९१।५५६ | वृथा वूलीधारा | ३२६।२५ |
| विश्वेश्वरस्तु सुधिया | १७६।१६५ | विहिताञ्जलिर्जनत (शिशु ९ १४) | २९६।२ | वृथा वृष्टि (वृ चा ५.१६) | १५३।२६ |
| विश्वोपजीव्ये न | २२६।१५५ | वीक्षितानि तव वारिधि | ६३।२१ | वृथेव सकलपशर्तै | २८२।१२६ |
| विषं चङ्क्रमणं (चाणक्य ९७) | १६२।४२२ | वीक्षितुं न क्षमा (सा द १०.८२) | ३५४।६९ | वृद्धत्वानलदग्धस्य | ९५।५ |
| विषं भुङ्क्ष्व | १८६।३ | वीक्ष्यते पलितश्रेणिनैव | ५।५६ | वृद्धस्य वचनं (नीतिसार८) | १५९।२९७ |
| विषङ्गिणि (शिशु १७.६३) | १२७।१२ | वीक्ष्य रत्नचष (किरात ९ ५३) | ३१५।५१ | वृद्धाङ्गेनैव विजहौ | ३४५।४१ |
| विषङ्गिभिर्मूंगैश्चमिश्रि (शिशु १७ ५३) | १२७।२ | वीणाप्येकगुणेन | २४९।१०० | वृद्धार्यस्य (शा प ९८६) | . २३६।२४ |
| विषता निषेवित (शिशु.९.६८) | २८८।३२ | वीणामङ्के कथमपि | २७६।८ | वृद्धिहासा कुमुदसुहृदः | ४४।५ |
| विषदिग्धस्य भक्त(हि.२ १२९) | १४७।२१० | वीणा वशथन्दनं (सु ३१७४) | ६६।४० | वृद्धोऽन्व पतिरेष (भोजप्र.२५५) | ६७।६४ |
| विषधरतोऽप्यतिवि (वासवद ६) | ५७।१२५ | वीणावंशाश्रया (शा प ३२५) | ८६।५ | वृन्ते क्षुद्रप्रवालस्य | १४०।६ |
| विषभारसहत्त्वेन गर्व | २३५।१५७ | वीणेव श्रोत्रही (दर्प दलन ३ ५१) | ७१।२४ | वृन्दारका यस्य | १४।१६ |
| विषमगता अपि न (सु.२३८) | ४८।१३९ | वीतव्यसन (काम.नी.१३ ७) | ३८५।३३५ | वृन्दारण्ये चरन्ती | २६।१९३ |
| विषमस्थस्खादु (पञ्च.१.१९०) | १७१।७७७ | वीथीषु वीथीषु | २९९।१४ | वृन्दारण्ये तपनत | २३।१३४ |
| विषमा मलिनात्मानो (शा.प.३५३) | ५४।४ | वीरक्षीरसमुद्र (खड.प्र.१०) | ११२।२७६ | वृन्देन तारावलितण्डु | ३२२।३ |
| विषमोऽपि (किरात २.३) | १५१।३८५ | वीर त्व कार्मुक चेद | ११३।२ | वृद्विष्याकुलगो (गीत.४.९.१३) | २५।१७१ |
| विषयविधुरा दृष्टि. | २७६।४८ | वीर त्वद्रिपुरमणी (कुव.१४१) | १३१।६ | वेगज्वलद्विट (शा.प.८६९) | २२६।१७१ |
| विषयस्य विष (भर्तृ.सं ७५१) | १५८।२३१ | वीर त्वद्वैरिदारा | १३३।४५ | वेणी ते प्रसमीक्ष्य | ३१४।७९ |
| विषहीनो यथा (शा.प.१३६४) | १४३।६५ | वीरमलङ्कृत लोके | १९५।४६ | वेणीबन्धक (शा.प.३११८) | १३।४४ |
| विषादप्यमृतं (गरुड.पुव.११०) | १५५।९६ | वीर श्रीकुसुमेन्द्र | ११७।१८ | वेणीवन्वमहीन | २७०।१२ |
७२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
स्तम्भ १
वेणी विडम्ब (शा.प.३३७८) २७१।३१
वेणीवेलनमङ्गर्णं २७१।५३
वेणी श्यामा भुज २५७।७
वेतण्डगण्ड (भामिनी प्रा.६०) २२९।८
वेत्ता कोकिल एव २३९।१००
वेत्रत्वचा (अल कौस्तु.प्र.१) २२३।६५
वेदवेदाङ्गत (प्रसगाम.१६) १४२।१८
वेदव्यास न ९९।१७
वेदस्याध्ययनं ३७१।१०८
वेदा प्रमाणं स्मृत(द श २४)३९१।५७०
वेदादिशास्त्र (पञ्च क्रिया अ ५) ३८५।३१६
वेदानुद्धरते (गीत.१.१.१२) १७।१
वेदान्तेषु (विक्रमोर्व १.१) ५।५६
वेदा येन समुद्धृता १७।४
वेधा द्वेधा (कुव.२०) १६५।५५२
वेधा वेदनया (विक्रमच २७७) १०२।२१
वेपथुर्मलिनं (रुद्रक मेल.२ ३०) ७३।१
वेपन्ते (शा.प.३९२१) ३४६।२८
वेलामुल्लङ्घ्य हेलाद ११४।१६
वेल्लत्पक्षितराज १२५।१६
वेश्यानामिव विद्याना ३८।१२
वेश्यावेश्मसु (प्रबोध च २.१) ६१।२७२
वेश्यासौ (भर्तृ सं ११०) ३५५।१
वैकल्यं धरणी (पच.१.१८८) १००।१
वैकुण्ठाभ्रप्रकाम १२३।१८९
वैगुण्येऽपि हि ४७।१००
वैदेहीं समावाप्य १८३।५३
वैद्यं पानरत (पच.रत्न ३) १७८।१०१२
वैद्यराज नमस्तु (शा प ४०३८) ४४।२
वैद्यराज नमस्तुभ्यं (सु २३१९) ४४।१
वैद्यस्तर्कविहीनो १६९।७२६
वैद्यानामातुर. (हि ३ ३३) १६४।४९९
वैद्या वदन्ति १७६।९५७
वैभवभाजा दूषणमपि ६५।९
वैभातको मरुदनु ३२५।१२
वैमुख्यं मृगलाञ्छ २४४।२३९
वैयाकरणकिरा (सु २३३१) ४२।१
वैराग्यभङ्गि (शा.प ४०२७) ३६४।८०
वैराग्ये सचरत्येको(भर्तृ.१ ९९)३९१।५७२
वैषम्यमपि (भा.३.२७५१) ३९०।५४७
व्यचलन्विश (शिशु.१३ ३४) १२६।४१
व्यजनं व्यजनं २८८।२६
व्यजनमरुत (विद्ध.शा ३ २०) २७६।४७
व्यज्यमानकलङ्क (शा.प.७५४) २०९।४
स्तम्भ २
व्यजनं हन्ति (पञ्च ३ २०४) ३९१।५५९
व्यतनोदपास्य (शिशु १३ ३३) १२६।४०
व्यतिकरितदिग (मालती २ ९) ५१।२२३
व्यतिषजति (मालती १.२७) १७६।९७४
व्यतोतकल्पे शिशिरे ३३१।१७
व्यथयतितरा (शा प ४९१) १६९।७३२
व्यथयति वृ (गीत १०.१९ ५) ३०७।५०
व्यथयन्ति परं(पच २ १०२) ३९०।५३५
व्यथितमपि (किरात.१०.२२) ३४०।२४
व्यधत्त धाता (नैषध ७.५४) २६२।१८२
व्यथवासाः पञ्च १९४।२२
व्यसनं (पच.२.१९४) १६५।५३८
व्यसनानन्तर (वृ श २१) १६८।६७८
व्यसनिन इव (भोजप्र ७७) २९७।२६
व्यसने मित्रपरीक्षा १७१।७९३
व्यसनेष्वेव (पच २ ६) १६४।५२१
व्यसरत्सु भूधर (शिशु.९ १९) २९७।१५
व्याकुलोऽपि (शा प.१५२७) १५५।८१
व्याकोशकोकन २७१।३९
व्याख्यातुमेव (सु.१५५) ३९।१८
व्यागुञ्जन्मधुकर (रसग समा.) २३६।१२
व्याघ्रा सेवति ८४।२२
व्याघ्रीव तिष्ठति (भर्तृ.स ३३२) ३६०।३२
व्याजस्तुति (सा द १० ६०) २१२।४७
व्याजृम्भमाणव (प्र राघव ७.७९)१४१।२
व्यावित्तस्यार्थहीनस्य ८८।१०
व्यधिभि (भा.१२ १२५४१) ३८०।११५
व्याधूतकेसरस (सर्वज्ञ.वासुदेव ) १९।४४
व्याध्य (सा द.१० ५६) २८३।१५०
व्यानशे (किरात ९ १७) ३००।३४
व्यापारान्तरमुत्सृज्य ९८।४
व्याप्तं लोकै (शिशु १८.४०) १२९।७७
व्यामिश्रैकैकबाहु ३२२।३४
व्यामोहं तव १९४।२३
व्यालं बालमृणा (भर्तृ स ६७) ४१।६७
व्यालाक्ष राहुश्च (सु १९६) ४०।३७
व्यालाश्रया (वृ चा १७ २१) ३८३।२४४
व्यालोल केश (शा प ३७०४) ३२२।३२
व्यावल्गतुकुच (कुव ६१) ३४७।४१
व्यावृत्तं खलु (शा प.३५५९) ३०७।६६
व्यासगिरा निर्यातं ३६।५८
व्यासादीन्कवि (शा.प.२०५) ४१।६३
व्यास्थं नैकतया (भर्तृ २.६) १०९।२२९
व्योमनि (भामिनी.प्रा.९३) ७५।३
स्तम्भ ३
व्योमपात्रमपि २९६।१
व्योमव्या (शा.प.३८५२) ३३९।१२६
व्योमार्थे (युक्ति.२६ ८) २३४।१२१
व्योमैकान्त (भर्तृ स ७५८) ३७४।२०३
व्योम्रस्तापिच्छ (मालती.५.६) २९५।७३
व्योम्नि प्राङ्गणसीम्नि २९८।३८
व्योम्नि स वास ५७।१२३
व्योम्नीव नीरदभर. (सु १०) ४।३६
व्रजति विषय (शिशु ११.२५) ३२३।२८
व्रजलघ्वः (विद्ध शा.४ १) १५४।६२
व्रजत्यपरवारि (विद्ध ४ १) ३२४।४२
व्रजन्ति ते (किरात.१.३०) १५२।३९८
व्रजन्ति पद्मानि १९७।२२
व्रणगुरुप्रमदा ३३१।३८
व्रणभृता सुतनो (शिशु.६.५९) ३४६।२०
व्रततिवित (शिशु ७ ४५) ३३४।१०९
व्रते विवादं (सु.३१८) ४९।१८२
व्रीडायोगाञ्ज (शा.प.३१६४) २७९।६१
व्रीडावेलारुद्धं २५१।२२
श
शंकर पतितं दृष्ट्वा १८७।१२
शंकरशिरसि २१०।११
शंकरार्धतनुव (प्र राघव ७ ५६) २९९।२३
शंभु श्वेसर्क १५८।२३९
शंभुमनिंस (सु २६३९) १३४।१९
शंभुस्खयंमुहुरयो (भर्तृ स ११२) २५०।१२
शंयत्तत्त्वविबोध २८५।३५
शक्ति प्रमापयति १०५।१३७
शक्ति सर्वानिरिक्ता १२१।१६३
शक्तिर्निर्विंशा (छ.२५९६) १४८।८०
शक्तिरहितो (शा प १५३२) १६९।७२७
शक्तिवैकल्य (किरात.११ ५९) ७९।९
शक्तेनापि (पच ३ २२२) १७९।१०२६
शक्यं यन्न विशेषतो ९।१६
शक्यते येन २२६।१५०
शक्याशक्य (स पा ४२) ३९१।५४९
शक्यो वारयितुं (भर्तृ स ७५९) ४१।६८
शक्रादराक्षि (शा.प १०६९) २१५।१०
शक्रोद्याननिवासिता ९८।२
शक्ष्यामि कर्तु (पच ३.२४६) ३९१।५५२
शङ्क्यान्य (शिशु १० ३५) ३१५।३८
शङ्काभि. सर्वं (हि.४.२४) १६३।४३९
शङ्काश्यङ्गुलितेन ३१७।८
शङ्किताय (किरान ९.४६) ३५६।१३
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ७३
| शङ्कुव्याकीर्णरङ्कद्भुतनि १४।१७ | शय्या पुष्प (शा प ३४१२) २७६।५३ | शाखोट शाल्म (शा प १८४२) २४२।१७० |
| शङ्के तच्चित्तमक्लेश २६४।२५६ | शय्या वस्त्रं चन्दनं ९६।२ | शास्त्रेन धर्मं (शा प १५३८) १७२।८१९ |
| शङ्का सन्ति (शा प १११९) २१८।८२ | शय्या शाद्वल (नागा ४ २) ३७०।९१ | शान्ता धर्मरुणा २४०।१३२ |
| शठस्तु समय (स पाठोप ४७)३९१।५६१ | शय्या शैलशिला (भर्तृ ३ ८७)३८५।३२३ | शान्तिकन्थाल ३६७।१६ |
| शत दयान्न विव (हि ३ ३१) ५५।४२ | शरजालाश्रित (शा प १५६६) १४३।३९ | शान्ते मन्मथ (भर्तृ म ७६२) ३२१।२४ |
| शतपदी (भल्लट ७२) २४८।८९ | शरणं करवाणि ३।७ | शान्तेमतिर्विवेका ७७।५६ |
| शतमम्युं दण्डधरं ९५।११ | शरण कि प्रपन्नानि (सु ४६७) ७१।२२ | शारता (किरात ९ २९) ३००।४५ |
| शतमेकोऽपि (पच १ २५२) १४४।६६ | शरणागत (शा प ६८३) १६५।५५८ | शारदा शारदा ३।५ |
| शतह्रदा (रामायण ३ १३ ६) ३९१।५५७ | शरत्कालस (काव्य प्र ७ ३) २६२।१६५ | शार्ङ्ग ब्रजक्रमण्डलो ९।१२७ |
| शतेषु जायते ७०।१ | शरत्पद्मो (भाग ६ १८ ४०) ३९१।५८७ | शासति त्वयि (रसग तुल्य ) १०३।५६ |
| शत्रुक्षेत्रकलत्र १३७।५६ | शरदम्बुध (किरात ११ १२) ३७२।१६४ | शास्त्रं सुनिश्च (वानर्थ २) १७६।१६२ |
| शत्रुणा योजयेच्छ(पच ४ १८)३९०।५४४ | शरदि न वर्षति (शा प २४५) ४८।१९४ | शास्त्रज्ञ कपटानु (मृच्छ् ९ ५) १४२।३३ |
| शत्रुर्वर्धति संयोगे १५५।१९० | शरदिन्दुकुन्द १९४।२५ | शास्त्रज्ञोऽपि (भर्तृ स १००) ३५०।७३ |
| शत्रुवाक्या (स पाठोप ३७) १५६।१६२ | शरदि समग्र (शा प ४९२) १६९।७३३ | शास्त्राण्यधीत्यापि (हि १ १७१) ३९।२१ |
| शत्रूणा यम १११।२५९ | शरासने सायकमा १९८।१९८ | शास्त्रेषु निष्ठा १७२।८३३ |
| शत्रो प्राणानिला १९।४२ | शरीर क्षामं (मालवि ३ १) २८०।८३ | शास्त्रोपस्कृत (भर्तृ स १३) ३९।२७ |
| शत्रोरत्यन्तमित्रं १५०।३३२ | शरीरनिर (भोज प्र ८) १६१।३५१ | शिक्षितापि ३६४।३८ |
| शत्रोरपत्या (बृह नीति ११०) ३८४।२९७ | शरीरमेवा (मा १२ ६४७८) ३७८।६४ | शिखरिणि क नु (सु २०३०) ३१३।४३ |
| शत्रोरपि (कविता ९९) १६०।३४० | शरीरस्य गुणाना (हि १ ४९) ८१।९ | शिखिनि कूजति ३४२।८४ |
| शनिरशनिश्च (काव्य प्र ४ १६) १०३।७३ | शर्वाणीपाणिता १०१।५६ | शितैर्बाणैरेके मृध १३१।११५ |
| शनै पन्था १५६।१२६ | शल्यमपि स्वल (सु ४२१) ५८।१९२ | शिथिलयति (प्र राघव ७ ८६) ३२४।३४ |
| शनै शनैश्च (पच २ ८४) १६५।५२८ | शशपदमणिमालं ३२८।१२ | शिर शार्वं (भर्तृ २ १०) ४१।५९ |
| शनै शनैश्च (पच १ २३८) १४९।२८८ | शशमृगश्व (शा प ३३९८) २७५।१४ | शिरश्छाया (शा प ७९) २३१।३५ |
| शनैर्विद्या शनै (वृ चा ३ ३३) १५७।२०४ | शशाङ्के सनद्धे २९६।४ | शिरमा वार्यमाणो (शा प ७५३) ९६।१ |
| शपथै सवि (पच १ १२५) १४९।३१३ | शशिना सह (कुमार ४ ३३) ३७८।६६ | शिरसा विधृता (सु २६९१) १४४।८८ |
| शबरकुमारिलगुरवो ४३।३ | शशिनि खल (अष्ट रत्न ६) ९३।८५ | शिरसि (शिशु १३ १२) १९०।७५ |
| शब्द प्रभूत १९७।३० | शशिनीव हिमार्ता (हि १ १०३) ९५।३ | शिरसि धृतसुरापगे (पुष्प माला ) ११।१३ |
| शब्दवद्भिर (सु १५३०) २६४।२२५ | शशिमुखि (गीत १० १९ ४) ३०५।१७ | शिरसि निहितोऽपि (शा प ३६९) ५७।१३२ |
| शब्दशक्त्यैव ३०।९ | शशी दिवस (भर्तृ स १०) १७७।२९३ | शिरसि शिरसिजं ३५२।२५ |
| शब्दशास्त्रमनधीत्य ४२।८ | शशी हर्तु लोभा २६१।१३३ | शिरासि वयोध्वा १२८।१३ |
| शब्दार्थमात्रमपि (सु १८४) ३३।४१ | शश्वद्वाणद्वितीयेन (नल च १४) ३५।९ | शिरीषकोषादपि २६३।२२० |
| शब्दार्थयो (शा प १७९) ३५।२६ | शश्वन्निसर्गमलिना २४०।११२ | शिरोरुहैरलिकुल (शिशु १७ ५८) १२७।७ |
| शमयति ७९।२३ | शस्त्रं न खलु (कुव ९३) १८७।२९ | शिरोवेष्टनव्याजतस्ते १२३।५ |
| शमयति ग (विक्रमोर्व ५ १८)३८०।१९८ | शस्त्रभिन्नभकुम्भेभ्यो १२८।८ | शिलाघनैर्नाक (किरात ८ ३२) ३३८।७७ |
| शमयति जलधारा (कुव ५०) ३४०।१४ | शस्त्राशस्त्रिकथैव ३६१।४२ | शिला बाला जाता ५२।२४५ |
| शमयति यश (सु ३६३) ६१।२५७ | शस्त्रास्त्रैर्भिन्नदेहोऽपि १४३।५२ | शिलार्पितपदद्वन्द्वा १८६।७ |
| शमिततापमपोढ (शिशु ६ ३३) ३४१।३९ | शस्त्रीकृतस्त्वश्वर ३६०।२६ | शिलासम्यग्धौ(शा प ३३०३) २६०।११० |
| शमितनिखिल (शा प ३७१०) ३२२।१ | शस्त्रैर्जीवति शास्त्र ९९।२९ | शिलीमुखै (विदग्ध मुख ४ ४४) १९४।३३ |
| शर्मागर्भस्य यो १८७।२६ | शस्त्रैर्हतास्तु रिपवो १७६।१५२ | शिलीमुखोत्कृत्त १२८।३२ |
| शम्बरस्य च (मा १३ २२३७) ३४८।१८ | शाखा कण्टक २४२।१६३ | शिल्प दर्शयितुं ३५९।९६ |
| शम्बरारिरमृतं ३०४।१४६ | शाखामृगस्य १६६।५८६ | शिवभालानलोत्थेन ३०३।१४१ |
| शम्पाकस्य रज १२।३६ | शाश्वतचित (भोजप्र २२२) २३६।७ | शिवयो सुधाहरिद्रा २।१३ |
| शयानं चानु (र २ ६१ १९) ३९२।६०३ | शास्वासत (शा प १०५१) २४२।१७६ | शिव शिव हि शिवेन २५०।११ |
| शयानस्योत्तानं ३२१।२० | शाखोटकैश्चन्दन ८७।२६ | शिशिरकिरण (शिशु ११ २१) ३२३।२७ |
१० सुभा०अनु०
७४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|---
| शिशिरमासमपा (शिशु ६ ६५) ३४७।१० | शुद्धकास्यरचितापि ८५।९ | शोकोत्पत्तिर २९०।७२ |
| शिशिरसीकर (शा प ३८९७) ३४३।९९ | शुद्धमाविलमव (कुमार ८ ५७) २९७।१२ | शोकेन रोगा (वृ चा १० २०) ३९२।६११ |
| शिशुरपि निपुणो १७५।९४२ | शुद्धा सङ्गं न (शिशु १८ १३) १२९।५९ | शोणं वीक्ष्य (सा द ३ ३६) ३५८।६३ |
| शिशुर्वेत्ति पशुर्वेत्ति वेत्ति २९।९ | शुद्धान्ते सीधुपानोन्मद ८।१९६ | शोणौ कोणौ सखि २८६।९६ |
| शिष्टैरप्यविशेष (द्वि ३ १२८) १४८।२३९ | शुन पुच्छमिव (वृ चाणक्य ७ १९) ३०।८ | शोभते विदुषा (दृष्टांत श ५०) ३९।१७ |
| शीकरासार (विदग्ध मुख४ ३८) १९४।२६ | शुभ वाप्यशुभं (दृष्टांत श ३१) १६८।६८४ | शोभन्ते विद्यया १५६।१३० |
| शीघ्रं भूमिगृहे (शा प ३४११) २७६।५२ | शुभानना (किरात ८ ४२) ३३८।८५ | शोषं गते (शा प ७८५) २१२।४० |
| शीघ्रकृत्येषु (पञ्च ३ २१८) ३८५।३२९ | शुभ्र मङ्ग सवि (भर्तृ १ ९५) ३७७।१४ | शौर्यं केसरिणा १०८।२०३ |
| शीतमध्वा कदम्बं च (सु ३१६९) ६६।२५ | शुभ्रभिरे स्मित ३३२।४७ | श्याम श्रीकुचकुङ्कुम १४।८ |
| शीतलादिव सत्रस्तं (शा प ३८६२)३४०।५ | शुश्रूषस्व गुरून् (अ शाकु ४ १७)२५१।३७ | श्यामं च वर्तुलकार १८५।२० |
| शीतवातातपक्लेशा (सु ३२०७)१६३।४६९ | शुश्रूषस्व गुरून् (मालती १० २२)३५२।४४ | श्यामलेनाङ्कितं (रसग उपमा ) २५८।४३ |
| शीतभीताश्च (चाणक्य ९६) ३९२।६२० | शुश्रूषामनुरुन्धती ३५१।४१ | श्यामश्वेतारुणाङ्गा जल १४।४ |
| शीतांशुर्मुख (रत्ना ३ ११) ३०७।६० | शुष्कं मास त्रि(चाणक्य ६४) १६२।३९५ | श्यामा प्रिया (प्रमगा ११) ३९०।५४१ |
| शीतांशुर्बिंब (विद्ध शा ३ १९) २८१।११८ | शुष्केन्धने वह्नि (वानरा ६) १७३।८७३ | श्यामा मन्थर १६०।३१० |
| शीतांशुस्फटिकाल ३०२।१०३ | शून्यं वासगृह (अमरू ८२) ३११।२८ | श्यामा मिलिन्दमाला २५७।९ |
| शीताशोरिव नूतनस्य ३४६।२९ | शून्यं वेश्म चिरा (सूक्ति ८७ ५) ३५५।८४ | श्यामासङ्ग (ध्वन्या २ १७) २९२।२३ |
| शीतातपादिकष्टानि (पञ्च १ २९३)९७।११ | शून्यं कुञ्जगृह निरीक्ष्य ३५८।७४ | श्यामौ तव १९४।२१ |
| शीतार्तिप्रसर (शा प.३९३३) ३४७।५१ | शून्यमपुत्रस्य गृहं (मृच्छ १ ८) ६६।३२ | श्रद्दधान शु(भा १२ ६०७१) १६७।६९९ |
| शीतेऽतीते (नीति प्र १४) १७८।१००३ | शून्यमा (योग वा सार १ ८) १६१।३७० | श्रमण श्राव (सूक्ति ८९ १७) ३६४।३५ |
| शीतेनाध्युषितस्य (भोजप्र २३२) ६८।७२ | शून्येऽपि च (भामिनी प्रा ८५) ४७।८७ | श्रमयति शरीर २५९।७३ |
| शीधुपानविधु (किरात ९ ४२) ३१५।४२ | शूरं त्यजामि वैधव्यादुदारं ६२।३ | श्रवणाञ्जलि (वेणी १ ४) ३६।५७ |
| शीधुपानविधुरेषु (किरात ९ ७३)३१६।६५ | शूरतव्युत्का मृदु ३८४।३०२ | श्रावं श्रावं त्वदीय ११२।२८५ |
| शीर्णघ्राणाङ्घ्रिपःणी (सूर्येश ६) २७।१६ | शूराश्च कृतविद्याश्च (सु ५४२) १५६।१६३ | श्रियं प्रदुग्धे (विद्ध शा १ ८) ३०।१२ |
| शीलं प्रधानं (भा ५ १।१४२) ३७७।१ | शूरा केऽपि पुर ७४।३८ | श्रिया हस (किरात ८ ४४) ३३८।८७ |
| शीलं रक्षतु मेधावी (सु ३०५२) ८४।१२ | शूरा सन्ति सहस्रश (शशि व ) ५३।२७१ | श्रियो दोलालोला (प्रब ९६) ३७२।१३३ |
| शीलं शातयति श्रुतं ६८।७९ | शूरोऽर्थशास्त्र (शा प १३३८) १४३।३४ | श्रियो वासा (सूक्ति १९ ६) २२४।९५ |
| शीलं शौर्यमना १५८।२५३ | शूरोऽसि कृतविद्यो (पंच.४ ३९) २२९।१२ | श्रीकण्ठस्य कपर्द (अनर्घ रा.७ ५३) ९।१३७ |
| शीलभारवती (रसगं दीप ) १५६।१६५ | शृगालशशशार्दूल २२५।१९९ | श्रीकण्ठस्य सकृत्ति (सु ९५) ७।९१ |
| शीलानि ते चन्दन ३६२।१२ | शृणु सखि (कुट्टनी म ३९२) ३६४।३४ | श्रीकण्ठासक्त ११३।२९२ |
| शीलावलम्बनमह १५६।१५९ | शृणु हृदयगृहं (शांति श १ २८)३५०।७२ | श्रीकरपिहित चक्षु १४।७ |
| शीलाविजामाम्ला (शा प १६३) ३३।२७ | शृण्वन्पुर (भामिनी प्रा ३५) २१२।४१ | श्रीकर्ण प्रौढतेजा १९४।१० |
| शुक तव पठन (शा.प ८७४) २२७।१८४ | शेते शीतकरोऽम्बुजे ३३०।१ | श्रीकृष्ण पूतनाया १००।६ |
| शुकतुण्डच्छवि सवितु (शा प ८६) २७।२ | शेषं भाष्यं तु काव्येन ६६।३० | श्रीकृष्ण त्वत्प्रतापेन १९४।१९ |
| शुक हरितयवाना (शा प ३९२०)३४६।२४ | शैल्यं नाम (अल कौस्तु नि १) २४५।१४ | श्रीधात्रि दुग्धो १४।१४ |
| शुकीचञ्चूत्वात्तच्छवि २६५।२९० | शैलराजतनयास्तन (सु ७१) १३।१ | श्रीनाथ न श्रुतमिति १८१।२७ |
| शुक्तिद्वयपुटे भोज (भोज २५६) ११७।८२ | शैलषी तव १३७।६८ | श्रीनाथस्तवनानु ३८।२६ |
| शुक्ले पक्षे शीत १७२।८१६ | शैलेन्द्र प्रतिपाय (सा द १०.९२) ६।७६ | श्रीपरिचयाजडा (रविगुप्त ) ६२।१३ |
| शुचा पात्रं (शांति श १ २५) ३७६।२४९ | शैलेयेषु शिलात २१३।५९ | श्रीभोज (शा प १२५३) ११७।८४ |
| शुचित्वं त्यागिता (काम नी ४ ७५) ८८।३ | शैले शैले न (चाणक्य.२ ९) १५७।१८४ | श्रीमच्चन्दनवृक्ष (भोजप्र.२२) २३८।५९ |
| शुचि भूमिगतं (शा.प ६११) १५६।१४३ | शैवालश्रेणिशोभा ९।१३२ | श्रीमन्ता कथय २४६।३० |
| शुचि भूषयति (किरात २ ३२) ३९२।६१४ | शैशवात्प्रभृति ३६२।११ | श्रीमद्गोपवधूश्वर्यं २४१।६२ |
| शुचिरिति परित (शा प ३५९३)२९४।४६ | शोक मा कुरु ७५।४ | श्रीमद्राजशिखामणे १३६।४६ |
| शुण्ठीगोक्षुरयो (धर्म विवेक ६) १८३।५७ | शोकस्थानसह (भा १२ ७५१)१६२।४३१ | श्रीमद्रूपमणे गुणेन १२२।१७७ |
| शुद्ध स एव कुलजश्च (सु.२७३) ५०।२११ | शोकारातिभयत्रा (भोजप्र १४८) ८८।१४ | श्रीमद्धीर मही ११२।२७७ |
| संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ७५ | |
|---|---|---|
| श्रीमद्गीराधिवीर १३४।२६ | श्रोत्र हसस्वनोऽय १४१।७ | सपन्नरमणीशील २५१।१६ |
| श्रीमद्वैकण्ठकण्ठी ११६।५७ | श्रोत्रपीयूषगण्डूषै २६३।२१३ | सपादिता सपदि २१२।४८ |
| श्रीमन्नायक १२०।१४२ | श्लाघ्य स एको (हि प्र २) ४९।१७२ | सपूर्णकुम्भो न १७३।८७० |
| श्रीमाहेश्वरमौलि २१।४४ | श्लाघ्यं कार्पास (शा प १०५४) २४३।१८४ | सप्रति न कल्पत (सूक्ति १३ ५) २११।१३ |
| श्रीराजीवाक्षवक्ष स्थल १६।४० | श्लाघ्यं जन्म (प्रसगा १२) ३९२।६१२ | सप्रवेष्टुमिव योषि (शिशु १० ४८) ३१६।८ |
| श्रीराम त्वदनेक ११९।१३१ | श्लाघ्यं नीरसकाष्ठ (शृ ति १०) २४८।७१ | सप्राप्तचिकुरभाव २५८।३१ |
| श्रीरामायणभारत ३७।६५ | श्लाघ्या महतामुच्च (शा प २२६) ७७।६ | सप्राप्त मकरध्वजेन १४।७ |
| श्रीरामे मृगया १२०।१४६ | श्लाघ्याशेषतनुं (ध्वन्या) २६।१९८ | सप्राप्तेऽवविवा (सूक्ति ४४ ३०) २९०।७५ |
| श्रीमङ्गललभ (मा ५ १२३२) ३८६।३४९ | श्लाघ्यैव वक्रि (श्रीकण्ठ च २ ३४) ४०।५४ | सप्राप्तान्विति (सु २२८९) ७८।९ |
| श्रीलक्ष्मीनरसिंह ११५।४७ | श्लिष्टा समझ़ा सदृश्यां ३०।१० | सप्राप्य पण्डि (रा ३ ४८ ५३) ३९२।५९० |
| श्रीवीर क्षिति ११२।२७३ | श्लिष्यत प्रिय (किरात ९ २७) ३००।४३ | सभाग्यमिष्ठभुवना १०५।१३९ |
| श्रीवीर त्वद्रिपूणा ११३।२९५ | श्लिष्यति पश्यति २७।५९ | सभिन्नयोरसुख्या २५५।१० |
| श्रुत कृत (सा द १० ७६) १६८।६६३ | श्लेषे केचन शब्द (शा प १७७) ३५।२८ | सभूतिस्तव मानसे २४५।२४० |
| श्रुत दृष्ट स्पृष्टं (शा प ३०८७) २५२।४६ | श्लेष्माङ्गारे वसति २६०।११९ | सभोगाद्विष (शाति श ३ १३) ३७०।९८ |
| श्रुति शिथिलता ९६।१५ | श्लोकस्तु श्लोकता याति ४५।३३ | सभोगानति (अनर्घ रा ७ ३७) १११।६५ |
| श्रुतिमपरे स्मृति २२।११३ | श्लोकार्थस्वादकाले तु ३७।८ | सभोजनं (मा ५ १४६९) १४६।१६७ |
| श्रुतिर्विभिन्ना १७३।८५५ | श्वश्रू विना वृत्तिरिह ६३।२४ | सभ्रम लेहमा १५७।११९ |
| श्रुतिलङ्घनमीहमान २५९।९२ | श्वश्रू स्वापयति ३५९।९२ | समतोऽहं प्रभोर्नि (पच १ ५९) १४८।२६४ |
| श्रुतिसिद्धान्तशूरस्य ८५।७ | श्वश्रू पद्मदल ददाति ३५९।८७ | समानाब्राह्मणो (मनु २ १६२) ३९२।५९२ |
| श्रुतिसुखभमरखन ३३२।४५ | श्वश्रू पश्यति नैव ३५५।४ | समूर्च्छितं (योगयात्रा) ३६०।१९ |
| श्रुतिस्मृत्युक्त (श प १५२५) १५४।७८ | श्वश्रूश्वशुरयो पादौ ३५०।१३ | समोहयन्ति (भर्तृ स ३३६) ३५०।६९ |
| श्रुतेन बुद्धिवर्य (काव्यप्र ७ ९) १७४।८९९ | श्वसनचलित (किरात १० ३४) ३३३।७९ | संयोजयति विद्यैव (हि प्र ५) ३०।६ |
| श्रुते महाकवे ३८।१६ | श्वास कि (शा प ३५०७) २९३।१० | सरम्भोद्रिक्तनों ३०३।१२० |
| श्रुत्यध्ययनसपन्ना १४२।३७ | श्वासा एव मृगीदृशो २८०।९१ | सवरणाय वधूटी बहु ३२८।५ |
| श्रुत्वा (शा प ११९७८) २४८।९७ | श्वासान्मुञ्चति (सा द ३ १०६) २९०।७७ | सवर्धितोऽपि भु (ख पाठो ४८) ३९२।६०९ |
| श्रुत्वा तन्व्या (अमरु ५५) ३४३।१०९ | श्वासास्ते सखि सूच २८७।३३ | सविधातुमभि (किरात ९ ३२) ३००।४७ |
| श्रुत्वा धर्म विजा (वृ चा ६ १) १५८।२२५ | ष | सविष्टो ग्राम (शा प ३९४७) ३४८।२१ |
| श्रुत्वा नामापि (अमरु ५९) २८५।४२ | षट्कर्णो (शा प १३५४) १४७।२२७ | सश्लिष्टा सानुरागं ३२२।१४ |
| श्रुत्वा प्रदग्धं तनयं १८२।३५ | षट्कर्णो भिद्यते (सु २७१८) १४६।१५४ | ससकानिव पातुमौप २३१।४४ |
| श्रुत्वा बालमृगी (शा प ३८८९) ३४३।९० | षट्चक्रे क्रमभावे २६।२०३ | ससदि तदेव भूषण (शा प १३९) २९।११ |
| श्रुत्वायान्त बहि (मा ३ १०४) ३०४।१ | षट्पद पुष्प १५९।२५८ | ससारकटुवृक्षस्य द्वे (हि १ १५४) २९।४ |
| श्रुत्वा षडामनजनु ११।१५ | षड्दोषा पुरु (मा ५ १०४८) १६३।४४१ | ससार तव नि सार (शा प.४१९३) ८८।१ |
| श्रुत्वा सागरबन्धनं १८३।६१ | स | ससाररात्रि (शा प ४११८) ३७२।१४८ |
| श्रुत्वा साङ्ग्रामिकीं (पच १ १००) १४४।९३ | सप्तकस्थाय तारा ३५४।६४ | ससारविषवृक्षस्य द्वे (हि १ १५४) ८८।२ |
| श्रूयता कौतुकं सोऽपि २५९।६८ | सपत्नय पराधीना (हि २ १५२) १३९।२ | ससारश्रान्त (प्रसगा ९) ३९२।६०१ |
| श्रेय सदा दिशतु १५।१९ | सपत्नी कर्कशं (दृ श २२) ५५।७५ | ससार सार्क दर्पेण २०५।६ |
| श्रेयस्त्री यत्र मान ८१।४९ | सपत्नी कोमलं (दृ श ३७) ४६।५८ | ससारेऽभिन्नसारे (भर्तृ स ८८) २५२।६० |
| श्रेयांसि वो दिशतु यस्र (सु ६५) ४।४० | सप्तसरस्वती १५६।१५० | ससारेऽस्मिनसारे (भर्तृ स ९७) २५२।६१ |
| श्रेयान्विघोर्बहुल्पक्ष २१०।२५ | सपत्सु महता (भर्तृ स.३३५) ४५।२७ | ससारैनिमित्ताय (सु १८) ४।११ |
| श्रेयो नून व्रजति १७८।१००४ | सपदमत ललम्ब्या २५०।७ | ससेवितमृगुतुङ्ग विध्यो ४।१४ |
| श्रोणीबन्धस्त्यजति (बाल भा १) २५६।४३ | सपदा सुस्थित (शिशु २ ३२) ८३।१६ | सस्थितस्य गुणे (बृहात श ८) १६८।६७१ |
| श्रोणीभारभरालसा २७४।२६ | सपदि यस्य (पच २.१०८०) ४७।८९ | सहति श्रेयसी राज (हि १.३६) ८३।१ |
| श्रोतून्मूकयति ध्रुव ८६।१४ | सपदो महतामेव ४५।८ | स एकस्त्रीणि ज (सा द १० ६७) २५०।४ |
| श्रोत्रं श्रुतेनैव न (भर्तृ स ५४) ७५।१२ | सपद्यास्ते परै (दृ श १९) १८८।६७६ | स एव खलु (मा ५ १३९३) ३८०।१११ |
| ७६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| स एव धन्यो विपदि ७७।१ | सङ्ग्रह नाकुली(नल च ४ २०) १४२।२८ | सति शीले गुणा (दृ श १४) ८४।६ |
| स एव रसिको लोके ३८।१५ | सङ्ग्रामक्षोणिदप्य ११८।१०७ | सतीमपि ज्ञा(अ शाकु ५ १७) १७४।९०१ |
| स कथं न (शा प ३३५३) २६८।३७६ | सङ्ग्रामाङ्गणमाग (सु २५१३) १०८।१९७ | सत्कविरसनास्फूर्ती निस्तुष ३१।२३ |
| सकळभुवनबन्धोर्वैर (शा प १२१) १५।२० | सङ्ग्रामाङ्गणमागते (सदुक्ति क ) २४५।८ | सत्कृता लालिता (भाव २०) ३९३।६३२ |
| सकलापि कला १७५।९३७ | सङ्ग्रामाानन्दवर्धिष्णौ १२७।३ | सत्कोणं लोलनेत्रं (शा प ४०३९) ४४।९ |
| स किसखा साधु (किरात १ ५) १५२।३९५ | सङ्ग्रामे रिपुभुभुजा १८३।५२ | सत्क्षेत्रप्रति (सु.३०२८) ३७९।७९ |
| स किमु सहेत सुधांशु २१९।१० | सङ्ग्रामे सुभटे (भोजप्र.१५१) १५८।२३० | सत्पक्षा ऋजव शुद्धा (सु २२९) ४७।७९ |
| सकृज्जल्पन्ति (वे १४) ३७७।१८ | सङ्ग्रामे स्फुरदसिना २०१।७५ | सत्पात्रोपनयोचितसत्प्र ३०।२० |
| सकृत्कन्दुकपातेनो (पच २ १६८)४५।३१ | सङ्ग्रामो दिवसाायते १९९।१३६ | सत्पादपान्विपुल (शा प ११५३) २२०।२ |
| सकृदपि दृष्ट्वा (सु.२४०) १७१।७८३ | सच्छिद्रे निकटे १६७।६३२ | सत्पूरुष खलु हिता ५०।१९७ |
| सकृदिव समर्प्य बाले ३०५।७ | सच्छिद्रो मध्यकुटिल. (सु ४४७) ९०।४ | सत्यं गुणा गुणवत्ता ५०।२०९ |
| सकृद्दुष्टगृहीता (चाणक्य १०४) १४४।७५ | स च्छिन्मूलम् १३८।२९ | सत्यं जना (भर्तृ १ ५४) ३८५।३४२ |
| सकृद्दुष्टं च मित्रं(चाणक्य १९) १६१।३४५ | स जयति चित्रचरित्रो १८९।५३ | सत्यं तयदवोचथा मम ३१०।१० |
| सत्सूक्ष्मोषयति द्रुता (सु ३२०१) ६८।८५ | स जयति महावराहो १८।२६ | सत्यं तप सुगत्यै (कुव ९३) ३१२।२९ |
| स क्षत्रियस्त्राण (किरात ३ ४८) १५१।३७६ | स जयति हिमकरले (वासवद ४) ४।१५ | सत्य तपो ज्ञानमहिंसता ३९।१९ |
| स क्षारो जल (सूक्ति १३ १०) २१४।८३ | स जयी वरमा (भोजप्र ५९) १४७।१९९ | सत्यं त्वं पुरुषोत्तमो १२५।१६ |
| सखि दयित (किरात १० ४७) २८८।३६ | सजलजलधर (किरात १० १९) ३४०।२१ | सत्यं दुर्लभ एष (शृङ्गारति २ ८) ३११।१८ |
| सखि दशनक्षतमधरे ३२८।४ | स जात कोऽप्या (भर्तृ स ३३८) ८०।३६ | सत्य म (व्यास औचित्य १८) ३७२।१६० |
| सखि पतिविरहदहुताश २८५।३ | स जातो येन जातेन (हि प्र १४) ९८।७ | सत्य वक्तुमशेष(शांति श ४ ५)३९०।५२७ |
| सखि स विजितो ३५९।९८ | स जीव (वृ चाणक्य १४ १३) १५९।२५६ | सत्य शौर्यं दया (हि ३ १२९)१४८।२४० |
| सखि साहजिक ८८।१ | स जीवति यशो यस्य (नीतिसार ७) ९८।४ | सत्य सत्यं मुने (शा प ८५५) १६६।५७२ |
| सखि सुखलयव ३५२।१० | सज्जन एव हि विद्या ४७।१०१ | सत्यं सन्ति गृहे गृहे(शृ ति १ ७) ३४।५७ |
| सखि हे पश्य रस ३४३।९८ | सज्जनसङ्गो मा भूयदि ८७।२० | सत्य सा बहुरूपिणी १२०।१३८ |
| सखीभिक्षा (शा प ३४८५) २८९।५९ | सज्जनस्य हृदयं नवनीतं ४९।१६२ | सत्यधर्मच्युतात्पुंस (सु ३६६) ५६।९८ |
| सखे खेदं मा गा (सु ३१९१) ६७।६० | सज्जना एव साधूना (नीतिसार ७) ४६।५६ | सत्यपि च सुकृत (भोजप्र २६) १७१।७८७ |
| सखे साय ज्ञात्वा २७३।१७ | सज्जन्ता कुम्भभित्ति १२७।२४ | सत्यप्रशमतपोभि स (शा प ४३२) ६९।९ |
| सगुणापि हन्त ५८।१५८ | सज्जमानम (का नी ४ ४५) ३९०।५२४ | सत्यभामासमाश्लिष्ट १०२।२९ |
| सगुणै सेवितोषा (शा प ११४८) २२०।४ | सज्जितसकलशरीरा (सु ३५२६) ३०४।३ | सत्यमेव गदितं त्वया ३५६।११ |
| सङ्कटे न च गन्तव्यं १६७।६५२ | सज्जितानि सुरभी (शिशु १० १) ३१४।४ | सत्यमेव (महानिर्वाण तन्त्र २१) ३८६।३४४ |
| सङ्केतकुञ्जभुवि सा २८८।४२ | सञ्चये च (मा १२ ३८९१) ३९०।५३१ | सत्यशील (विदग्ध मुख ४ ७०) १९६।१२ |
| सङ्केतकेलिगृहेमत्त्य ३५८।७१ | सञ्चरन्ति मृगनाभि २९८।१३ | सत्यशात्र (रा २ ३५ २८) ३८१।१८४ |
| सङ्घिष्येत क्षण (मेघ २.४५) २९२।२७ | सञ्चारो रतिमन्दिरा ३५१।४० | सत्या क्षितौ (भाग २ २ ४) ३८४।३०७ |
| सङ्गेपात् कथ्यते ३७७।१३ | सञ्चित क्रतुषु नोप (सु ४८७) ७२।४९ | सत्यानुसारिणी लक्ष्मी १५७।१७८ |
| सङ्गोभं पयसि (शिशु ८ १८) ३३८।१०० | सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य(भोजप्र ९०)१७४।८९४ | सत्यानृता च परु (हि २ १८४)१५२।४०४ |
| सङ्गह्येया न भवन्ति २१६।२८ | सज्जग्माते तावपा (शिशु १८ १) १२९।५२ | सत्यासक्तमना गुणा ११८।१०८ |
| सङ्गं त्यजेत (शौनकी ३०) ३८९।४८७ | सञ्जहार सहसा प(शिशु १० ४४)३१६।४ | सत्यासक्तमना प्रबुद्ध १९२।८८ |
| सङ्ग नैव हि कश्चि (मृच्छ १ ३७) ६८।७४ | सञ्जातपन्नप्रकरान्विता (कुव ४५) ३३५।६ | सत्येन धार्यते (वृ चा ५ १८) १५१।२९० |
| सङ्ग सत्सु (साधन पचक २) ३९१।५८४ | सञ्जातसान्द्रमकरन्दरसा ९२।७१ | सत्त्वादिस्तैरगणितगुणै १२।२५ |
| सङ्ग सर्वात्मना (हि ४ ९०) ८७।१७ | सञ्जाते द्रवरूपता ११८।१०५ | सत्सङ्गाद्भवति हि (वृ चा १२ ७) ८७।२७ |
| सङ्गतानि मृगा(काव्या २ ३३२)३४९।३६ | सता मतमति(मा ३ ४१४७) ३९०।५३३ | सत्साङ्गत्यमवाप्य य २२७।१९८ |
| सङ्गताभिरुचितैश्च(शिशु १०.८१)३२९।७ | सता समालोकयता २६५।२८३ | सत्साधुवादे मूर्खस्य (सु ३३६) ५६।८२ |
| सङ्गति खविपरीत ८८।११ | सति काकुत्स्थकुलोन्नति ३६।५१ | सत्सूत्रस्रविधानं सद ३०।२१ |
| सङ्गमविरह २७७।१९ | सति द्राक्षाफले क्षीरे ७१।२० | सद्महारैर्रभवता ११८।१०४ |
| सङ्गीतमपि साहित्य २९।८ | सति प्रदीपे सत्यग्नौ(भर्तृ स १३०) २७७।९ | सद्दम्भोजाम्भोजं परि २२३।९३ |
| सद्य हृदयं यस्य १५७।१९२ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमणकोशः
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| सदवनमसदनुशास १५१।३७१ | सन्ततं श्लाघते कस्मै १९९।२० | सन्ध्यां यत्प्रणिपत्य लोक ७।९५ |
| सदसत्त्वेन भावाना युक्ता (सु.२०) ४।१२ | सन्ततमुसलासङ्गा १०४।८२ | सन्ध्याताण्डवचण्डदण्ड २९५।६३ |
| सदसि विदुरभीष्मद्रोण ९३।८१ | सन्ततोदयसृष्ट्येव वद २६१।१४२ | सन्ध्याताण्डवड (वक्ति २ ३१) १०१।४८ |
| सदा खण्डनयोग्याय (सु ३३२) ५५।७८ | सन्तप्तश्रमहारीशीतल १०७।१९० | सन्ध्याताण्डवडम्बरव्यस १०१।५२ |
| सदागतियोच्छ्रायस्तम १९६।१३ | सन्तप्तायसि सस्थि (भर्तृ स ३३) ८७।३३ | सन्ध्यान्तौ नरपुरधितनो ४।३४ |
| सदानुरक्तप्रकृति (शा प १२८८) १४२।५ | सन्तमेव चिर (शिशु १० १५) ३१५।१८ | सन्ध्यारागवती स्वभाव १३।४६ |
| सदा प्रदोषो मम (मृच्छ ५ ३७) ३१२।३८ | सन्तश्च लुब्धाश्च १९७।२३ | सन्ध्यावन्दन भद्र ३७१।१०४ |
| सदा प्रहृष्टया भाव्यं (द श ४०) ३५१।१८ | सन्तश्चेद (शा प १५८२) १७८।१०१४ | सन्ध्यावन्दनवेलाया १९४।१३ |
| सदा मध्ये यासा (का प्र ७ २५६) ३१।४२ | सन्तश्चेदिह गुणबिन्दवो ३९।२४ | सन्ध्यावध्वसशोणं २९५।७१ |
| सदामात्यो न (हि २ १०२) १४७।२१२ | सन्तस्तृणोत्सारण (भोजप्र ४०) ४९।१७३ | सन्ध्यासलिलाञ्जलिमपि ४।१९ |
| सदारिमध्यापि न वैरि १८५।३२ | सन्तापं जगतो विल्ल २१३।७२ | सन्नद्धोऽयं नवतरु २५६।४२ |
| सदा वक्र सदा (सु २३०८) ३६४।१५ | सन्तापमोहकम्पान्नपा ५७।१४७ | सन्ना नाविकधोरणी २४५।१६ |
| सदाईसालस (नल च १ ३६) १०२।२३ | सन्तापय चिर चन्द्र २८५।४६ | सञ्चारीभरणोमा (काव्या ३ ५) १०३।५९ |
| स दीक्षितो य सकल १७५।१९९ | सन्तापिताना मधुरै ७३।३१ | सन्निकर्षोऽत्र १५८।२२२ |
| सदुत्तंस दैवादर्यं १०५।१३२ | सन्ति कूप्रा स्फुर (सु ६८६) २११।१० | सञ्चिग्गुद्य चिकुर ३२।३८ |
| सदूषणापि निर्दो (नल च १.११) ३६।४५ | सन्ति श्वान (अल कौस्तु उ १५) ३२।४ | सन्नियच्छति (मा.५ १३८४) ३८६।३४७ |
| स दोष (मुद्रा रा ३ ३२) १४७।१९२ | सन्ति स्वादुफला (सु ३२३६) ७४।४५ | सन्निहितेऽपि १७१।८०४ |
| सदोषमपि निर्दोष ३८।९ | सन्तु-द्रुमा (सूक्ति ६५ ३) ३३४।११७ | सन्मन्त्रिणा वर्ध १५१।३८२ |
| सद्भावेन ज (काम नी ३ ३३) १६०।३३६ | सन्तु विलोकनभाषण (प्रव ९) २५१।१९ | सन्मार्गे ताव (शा प ३३००) २६०।११२ |
| सद्भि सबोध्यमानो १६५।५४१ | सन्तुष्टे तिस्रूणा (अनर्घ ३ ४१) ३६१।३८ | सद्यस्तभूषाषि २७०।१९ |
| सद्भिरेव सहासीत (शा प १४२२) १५३।३ | सन्तुष्टो भार्यया (म ३ ६०) ३९२।६१९ | सभ्यासमक्रूत (अल कौस्तु अ १) ३२१।१ |
| सद्भिर्भाव्ये हिते काव्ये ३०।५ | सन्तुष्ट्ययुक्तम (वृ श ९१) १६९।७१२ | सपक्षो लभते (शा प १४४९) १५०।३४८ |
| सद्भिस्तु लीलया प्रोक्त ४५।२१ | सन्तोऽपि न विस्रा (वृ ३१६१) ६६।१९ | सपक्षो लभते (शा प १४४९) १५०।३४९ |
| सद्मन्येव निरन्तरं ३४२।७२ | सन्तोऽपि सन्त (शा प २४०) ४९।१६६ | सपदि कुमुदि (शिशु ११ २४) ३२२।१० |
| सद्य करस्पर्शमवा (नवसाहसाङ्क) १२४।५ | सन्तो मनसिकृत्यैव प्रवृ ४६।४४ | सपदि सखीभिर्नि ३३१।१४ |
| सद्य पुरीपरि(बाल रामा ६ ३४) ३६२।२३ | सन्तोषक्षतये पुसा (वृ श ८८) १६९।७११ | स पातु वो यस्य जरा (सु ६३) २२।१२० |
| सद्य प्रबालोद्रमचारु ३३१।२४ | सन्तोषलिप्सु (वृ चा १३ १९) १६०।३३७ | स पुमानर्थवज्ज (किरात ११ ६२) ७९।७ |
| सद्य सघटमानकोक ३२४।५१ | सन्तोषाभृततृप्ता (सूक्ति १२८ ७) ७५।१ | सप्तषष्टि हृता (शा प ३९९६) ३६०।१२ |
| सद्य सान्द्रमषी (शा प ३६०७) २९०।३२ | सन्त्यज्य सर्पवद्दोषा ५४।२८ | सप्तैतानि न (शा प १४५६) १५६।१४८ |
| सद्यश्चन्दनपङ्क ३०२।१०६ | सन्त्यन्येऽपि वृह (भर्तृ स ५३) २४९।९९ | सप्रतिबन्धं कार्यं(मालवि १ ९) १५१।३६७ |
| सद्यो मास (चाणक्य ६५) १६२।३९६ | सन्त्येके धनला (शाप सु ४११०) ३६९।७९ | स बन्धुर्यो विपन्नाना (हि १ ३१) ८८।६ |
| सद्रत्नस्फारहाराभय २५२।५९ | सन्त्येकेऽपि महीरुहा २३८।७१ | सभयचकितं (गीत ५ ११ ६) ३०८।१० |
| सद्रंशजस्य परिताप (सु ३०८) ५०।२०७ | सन्त्येव प्रतिमन्दिर युव ३५६।७ | सभाकल्पतरुं वन्दे १०१।१ |
| सद्वंशजात गुणकोटि ६०।२३० | सन्त्येव लिखिताकाशा २३७।४० | सभा वा न (शा प १३४५) १४६।१५० |
| सद्वंशतवादङ्ग (शिशु १८ १९) १२९।६४ | सन्त्येवात्र गृहे (अमरु ९२) ३०७।५५ | सभूभृङ्ग करकिस २५६।४४ |
| सद्वंशसंभव (सा द ६ १७७) १५०।३५३ | सन्दधीत (मा १२ २७०५) १५०।३३९ | समं विलासो (शा प ३२७६) २५५।१८ |
| सद्विद्या यदि का चिन्ता (शा प ४७३) ३०।९ | सन्दर्शयन्खमधुवैभव २४३।२०४ | समदनमवतं (शिशु ७ ५९) ३३४।१२५ |
| सद्वृत्तसद्गुण (शा प ११७३) २४६।२६ | सन्दष्टवस्त्रेष्वबला (सु १८७२) ३३८।६६ | समदमत्तग (का प्र १० ४९१) १०३।७७ |
| सद्भेदिमद्योत्थमहेमकुम्भ १०९।९ | सन्दष्ट्राधरपल्लवा (अमरु ३६) ३१७।५ | समदशिखि (किरात १० २५) ३४०।२७ |
| स धूर्जटिजटाजूटो (शा प १०१) ९।१२० | सन्दानान्ताद (शिशु १८ ७१) ३०१।९०० | समान्तदाक्रान्तादव २२६।१७४ |
| सन्त कापि न सन्ति ९९।२६ | सन्दिग्धे परलोके(पच १ १९६) ३५२।१५ | समभिसृत्य (शिशु ६ १०) ३३२।६५ |
| सन्त सच्च (दश रू ३ १८) ३८०।१२७ | सन्देहो वैष्णवे मार्गे १६६।६०७ | समय एव करोति (शिशु ६ ४४) ३४४।३२ |
| सन्त स्वत प्रका-न्ते ४५।२९ | सन्धिविग्रहया (सु २४६६) १५०।३१८ | समयज्ञानर्थवत. (शिशु ६ ४४) ३४९।४३ |
| सन्त एव सता नि (हि १ १९३) ४६।४६ | सन्ध्या कोषं तत उप - २७६।४५ | समयमिह वदन्ति कं २०१।६६ |
| समयशबरो व्योमा ३०४।१५९ |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्याना | |||||
|---|---|---|---|---|---|
| ७८ | |||||
| समरविहरदसङ्क | ३६०।२९ | सरसपरिपत्करणे | २५।३५ | सर्वस्य जन्तोर्भवति | १८२।३१ |
| समरशिरसि सैन्यं | २०३।९७ | सरसापि कवेर्वाणी | ३०।७ | सर्वस्य द्वे (भोजप्र ३०७) | १८२।४७ |
| समरे हेमरेखाङ्कं वाण | १८६।६ | सरसा सालंकारा | ३०।१७ | सर्वस्य सर्वदापि | ४८।१३४ |
| मर्मार्पना कस्य न (सु ४२५) | ६०।२२६ | सरसि बहुशस्ता(हि ४ १०२) | १७७।९९५ | सर्वस्य हि परीक्ष्यन्ते (हि १ २०) | ८३।१ |
| समर्प्य हृदि दारुणा | ३५९।८५ | सरसीतोय | १९४।३४ | सर्वस्यैव हि (सु १५०९) | २६१।१३९ |
| समवलोक्य विलास | ३३५।१३९ | सरस्वति प्रसा(दवी शत आनन्द) | २०५।५ | सर्वस्वापहरो न दस्यु | १८५।२७ |
| समस्तवनीति (चाणक्य १०५) | १४३।३३ | सरस्वतीपवित्राणा (सूक्ति ८ ६९) | ३५।२१ | सर्वस्वापहरो न | १८६।३८ |
| समस्तलक्षणाद्योग एव (सु १७) | ४।१० | सरखनीमातुर (श्रीकण्ठ च २ २७) | ४०।३८ | सर्वहिंसानिवृत्ता (हि १ ६४) | १६५।५४७ |
| समस्तावनीनाथमौले | १३१।१० | सरस्वतीय कर्णा (सूक्ति ४ ९३) | ३६।५३ | सर्वाङ्गमर्पयन्ती | ९१।४३ |
| समस्तस्वीकृत (शिशु १७ ६६) | १२७।१५ | सरस्वती स्थिता (सु २४४३) | १३४।३ | सर्वांलंकारयुक्तापि न | ८४।७ |
| समाकृष्टं वास (शा प ३६७७) | ३१८।१० | सरोरुह तस्य दृगैव | २५२।५ | सर्वांशापरिपूरि (सु ९१८) | २१८।८१ |
| समागमिष्यता (शा प ८६३) | २१।१८ | सरोषदृष्टावर | ३६६।१ | सर्वांशास्त्रधि (स क २ २१४) | ३३९।१२७ |
| समाजे सम्राजा | १०६।१५२ | सरोषयुद्धाङ्कन | १२८।३४ | सर्वाशुचिनि (नागा ४ ७) | ३७१।१२४ |
| समानकुलशील्यो | २७४।१ | सर्प क्रूर (भर्तृ स ७८५) | ५४।३३ | सर्वोत्तुम्बय सम | २४३।२०० |
| समायाति यदालक्ष्मी (नीति प्र १६) | ६२।८ | सर्पस्तारिण वा(सूक्ति ६० २३) | ३२७।४५ | सर्वे क्ष्यान्ता (भा ११ ४८) | ३७२।१६२ |
| समारम्भा भग्ना (भर्तृ स ७८१) | ७७।४६ | सर्पदुर्जनयोर्मध्ये (भर्तृ ७८४) | ५४।३० | सर्व ध्वान्तमिद | २९८।३६ |
| समाश्लिष्टा समा (शा द ३ ९७) | २५१।१३ | सर्पस्य रने | १७३।८५४ | सर्वेन्द्रिया (चाणक्य ६८) | १६२।३९९ |
| समाश्लिष्य (शांति श १ २९) | ३७०।१३४ | सर्पा पिवन्ति (पच २ १५९) | ७५।१४ | सर्वेऽपि विस्मृ (रसग विप्र) | ३६२।२८ |
| समिति पतिनिपाता | १३६।३७ | सर्पाणा च (पच ५ ४४) | १६४।५०९ | सर्वे यत्र (शा प १४६७) | १५०।३४० |
| समाचीना चीनांशुक | २१४।३१ | सर्पान्न्याघ्रा (पंच १ ४१) | १४८।२५१ | सर्वेषामेव (मनु ५ १०६) | ३९१।५६० |
| समुत्कीर्ण तन्व्या | २८०।७९ | सर्पावेषा कृपाणी | १२४।१६ | सर्वेद्विगकर मृगादन | २४७।४५ |
| समुत्पत्ति स्वच्छ | २४४।२३५ | सर्वं लुण्ठितमुद्धटे | १०८।२०५ | सर्वोपमाद्रव्यसमु | २७०।२२ |
| समुदितकुचकुम्भ | २८७।३५७ | सर्वं वन तृणाल्या | २१२।२० | सर्वोषधीना (वृ चा ९ ४) | ३९२।५९४ |
| समुद्विग्नस्ति (शा प ८२९) | २२५।११५ | सर्वमहा ये (शा प १४५१) | १६५।५५७ | सल्ललितमलकाना | ३२६।१७ |
| समुद्दीपितकंदर्पा कृत | ३५।१० | सर्व कल्ये वयसि यतते | १३९।६ | सल्ललितमव (शिशु ७ ४७) | ३३४।१११ |
| समुद्यते कुत्र न | २०४।८२ | सर्व किलाय (सु ९२) | १।१२ | सलील मिय (सूक्ति ५३ ८८) | २६९।४२२ |
| समुद्रवीचाव (मृच्छ ८ १५) | २४९।६३ | सर्व एव जन (हि ३ ४१) | १५०।३३५ | सलीलयातानि (शिशु १ ५२) | ३६०।२३ |
| समुद्रस्यापत्य (शा प १६६७) | ६३।३१ | सर्वज्ञ संवदसि | १९१।८५ | स विकचोत्पल (शिशु ६ ४२) | ३४४।३० |
| समुद्वानरणा भूमि | १६२।४०७ | सर्वज्ञ इति लोको (भोजप्र ३१२) | ९९।२७ | सविता (का प्र १० ४०५) | १७१।८०० |
| समुद्रेणान्तस्थस्तट | २१७।५६ | सर्वज्ञेन त्वया | १९५।४१ | सविप्रपादोदककर्द | ८९।३ |
| समुन्नतस्तन (भोजप्र २६४) | १३५।२६ | सर्वत्र गुणवान्देशे | ८२।३१ | सव्यदक्षिगयो (पच १ ८२) | १४८।२७२ |
| समुपागतवति | २४२।१७७ | सर्वत्र गुणवानव (वृ श ७९) | ८१।२७ | सव्यलीक्ष्मव (किरात ९ ४५) | ३५६।१२ |
| समुल्लसत्पङ्कजलो • | ३४४।१४ | सर्वत्र संपदस्तस्य (सूक्ति १२८ ५) | ७५।८ | सव्याजं तिलकाल | २८१।१९२ |
| समुल्लसद्दिनकर (शिशु १७ ६१) | १२७।१० | सर्वत्रोद्गत रुन्दला | ३४२।६९ | सव्यावे (शा प ३८२२) | ३३५।१४६ |
| समुल्लासो वाचा | ३५।३८ | सर्वथा व्यवहर्त (उत्तर राम १ ५) | ५५।६६ | सन्यासव्योरुबाहु | ३२२।३३ |
| स मूर्ख कालम (हि ३ १७) | १८८।३३३ | सर्वथा सत्यजेद्दाद | १५४।३७ | सम्ब्रीडा दयिता (का प्र ७ ३२१) | १२।४१ |
| समूलघातममृन्न (शिशु २ ४७) | ७९।० | सर्वथा स्वहित (सु २१०५) | १७१।८०७ | सम्ब्रीडार्वनिनरी (शा प ३७८०) | ३५३।८८ |
| सम्यगनिष्टन्न | १७१।७८ | सर्वदा सर्वदो (भोजप्र ३१३) | १०१।३ | स श्रीकण्ठ (अनर्घ रा ७ ६१) | ३०२।११५ |
| सरजसमप (किरात १० २६) | ३४०।२८ | सर्वदेवमयस्यापि (पच १ १३१) | १४२।७ | ससत्वरमितस्तत | १९४।४९ |
| सरजस्का पाण्डु | २२२।४१ | सर्वदेवमयो (पच १ १३१) | १४२।६ | ससार साक (काव्याल ३ ३५) | २०५।६ |
| सरलप्रिय (नल च २ १५) | १०३।६८ | सर्वद्रव्येषु (मात्स्य पु १८९) | २९।३ | स सुहृद्वसने (पच २ २६७) | १६४।११५ |
| सरला बहुलारम्भ (काव्यालं) | २०५।९ | सर्वनाशे (पच ४ २८) | १५५।९० | सान्धवो (हि २ १८१) | १७९।१०२२ |
| सरले एव दो (विक्रमांक ८ ६४) | २६४।२२६ | सर्वनाशे च (पच ४ २०) | ३१०।५२९ | सस्यानि स्वय | १८०।१०४६ |
| सरले साहसरा (मालती १०) | ३०५।१० | सर्वलोकपरितोष | २५१।१२ | सहकारकुसुम (भर्तृ स ३४०) | ३३१।९ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| पाद/प्रतीक | संदर्भ | पाद/प्रतीक | संदर्भ | पाद/प्रतीक | संदर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| सहकारे चिरं (भोजप्र २८६) | २२५।१२३ | साधनं सुमहद्य (का प्र ७ १५१) | ७९।१२ | सा मे यद्यपि | २८१।१०३ |
| सह कुमुदकदम्बै | ३०३।१२८ | साधर्म्येण कथं | १२०।१४९ | सामैव हि | १४९।३१२ |
| सहचरी शपथ | २८५।५ | साधयति (सु ४०१) | ५८।१७६ | मामोपायनय (सु २२८५) | ७८।१२ |
| सहजमलिनवक्र (प्रबोध १२) | १७५।९४० | सावारणतहू(सूक्ति ३३ ३०) | २३८।६४ | सान्ना दानेन (मनु ) | १४८।२३१ |
| सहजानघदृश.(शिशु १६.२९) | ५९।१९८ | सा वारयत्य | २६४।२६२ | साम्नैव यत्र (पच १ ४०९) | ३९१।५६४ |
| सहजोऽपि (दृ श २६) | १६८।६८२ | साधु चन्द्रम (सूक्ति ५३ ३५) | २६२।१७८ | साम्य (विद्ध शा १ २५) | ३३३।१०० |
| सह तया स्मर | २८२।१३३ | साधुरेव (दृ श २) | ४६।५४ | सायं चन्द्रकला | २७४।३१ |
| सह परिजनेन | ७७।५ | साधुरेवार्थिभि (भर्तृ स ७९२) | ७३।४ | साय दामग्रथन | २८६।१८ |
| सह वसतामप्य (सु ३९९) | ५८।१७५ | साधु व्याकरण | ४३।९ | सायं नायमुदेति | ३०२।११७ |
| सहसा विद (किरात २ ३०) | १७५।९३५ | साधुष्वेवातित (सु ४०८) | ५८।१८४२ | सायं स्नानमुपा (का प्र ८ ७९) | २९३।१२ |
| सहसा हृदये | २८५।४ | साधूना दर्शनं पुण्य (शुक ६८ १) | ८६।७ | सायक्रसहायबाहो (काव्यप्र ७ ४) | १८४।५५ |
| सहसिद्धमिदं (सु २४८) | ४८।१४६ | साधो कुण्डलघट | २४८।८८ | सा यावन्ति (शा प ३५८०) | ३११।२० |
| सहस्रकरपूरणा | १०६। ७० | साधो प्रकोपि (हि १ ८६) | ४५।२३ | सारङ्गाक्ष्या कुच | २६६।३१० |
| सहस्रशीर्षा पुरुष (शा प ४९४) | १८१।१ | साध्वी मा वी (गीत १२ २४ १) | ३५।१७ | मारङ्गो न लता (सु ६१८) | २३३।१९५ |
| सहस्रास्यो नाग | ५५।१ | साध्वीव भारती (सु १४५) | ३२।१७ | सारसवत्तावि (शा.प ४००१) | १२२।१७९ |
| सहायबन्ध (मा ५ १३७१) | ३९१।५७१ | साध्वीत्रीणा (नीतिरत १५) | १७८।१००२ | सारखते स्रोतसि | १०१।८ |
| स हि गगन (हि १ २१) | ९३।८३ | सानन्द नन्दिहस्ता (सु ८१) | ३।३५ | सा राजहंसैरिव | २६९।२४४ |
| सहिष्ये विरह (काव्या २ १५१) | ३३०।३ | सानन्दं सदनं (चाणक्य १२ १) | ८९।४ | सा रामणी (अल कौस्तु अ १) | २७१।३४ |
| सहृदया कवि (सु १५९) | ३३।२८ | सानन्दरुन्दुक | ३४६।३६ | सारासारपरि (सु २८२०) | १४४।१०२ |
| सहैमकटकं वत्ते | २६४।२३९ | सानन्दप्रमदाकटाक्ष(शृ ति १ ४) | ३२।४९ | सा रोमाञ्चति (गीत ४ ९ ९) | २९०।८८ |
| सहोदरा कुङ्कुमकेस | ३१।२९ | सानन्दमेष (अल कौस्तु वि १) | २२३।८३ | सार्थकानर्थकपदं | २७०।४२८ |
| स ह्यामलय (हि २ ९२) | १४२।२२ | सानन्दा गणनायके | ९।१४० | सार्थ मनोरथ (शृगार ति १२०) | ३०६।१ |
| सासारिकसुखासक्तं | १५७।१८२ | सा न भ्राति न | २९०।८७ | सार्वभौमभवनं (शाति श २ २६) | ३६७।३० |
| साक कुरग (का प्र ५ १२१) | १०५।१४२ | सानुज काननं | १९९।२८ | सालकाननयुक्ता (शा प १२७५) | १३९।१ |
| साक्र प्रावगणैर्लु | २१७।४१ | सान्त्वप्रायै | ३२९।१३ | सालक्तकं (अमरु १२८) | ३१०।४ |
| सा कविता सा (प्रसगा भ १३) | ३०।१८ | सान्द्रा मुद | २६१।२०१ | सालक्तकेन (अमरु ११६) | ३१०।३ |
| साकारो (पच ३ ८६) | १४४।७२ | सान्द्रानन्दजुर (गीत ९ १८ ३) | २५१।४७ | सालस मुखर (शा प १३१९) | १४४।९८ |
| साकृत निजसविदे (सु ११७) | ४१।७४ | सान्द्रामोदवती | २३२।९२ | सावलेपमुपलि (किरात १३ ८६) | ५९।१५८ |
| साकूतमधुरकोमल | ३५।६ | सान्द्राम्भोद (शिशु १८ ३६) | १२९।७५ | सावशेषपदमूक्त(शिशु १० १६) | ३१५।१९ |
| साकूतस्मितमा (गीत २ ६ १२) | २४१।६९ | सान्ध्यमस्तमित | २९४।२० | सावित्रीमात्र | १६७।१६३ |
| साक्षर पुरुषं | १५६।१५५ | सान्ध्यरागरु (भट्टोपमन्यु ) | २९३।९ | सा विद्याधर | २८१।१०६ |
| साक्षरा विपरीता | १५८।२०३ | सा पत्यु (अमरु २९) | ३५८।६४ | सा विरहदहनदूता | २८८।१० |
| साक्षात्किलाष्ट (महावीरच ७ ९) | १४०।१ | साप्तपदीन (सु २४५) | ४८।१४३ | साशङ्कस्य (सु २५६७) | १०८।१९५ |
| साक्षात्प्रेमाव (शा प ४११९) | ३७३।३८७ | सा बाढ भवते (शृगार ति १२२) | ३१०।६ | साश्चर्यं युवि (सु ३६२) | ६२।२७५ |
| साक्षादभूत्क्षय | ३२०।४ | सा बाला वय (अमरु ३४) | २८०।९२ | सा श्रीर्या न (गरुड पुराण ) | १५७।१७१ |
| साक्षान्मघवत (शा प ४००७) | ३६१।२ | सा भार्या या (भा १ ३०२७) | १५४।६१ | सा सचराचम | २८१।१०४ |
| सागसि प्रियतमे (सु २०१४) | ३१४।२ | साभिमानम (सु ३१०) | ४७।८५ | सा सर्वथैव रक्ता | २८८।८ |
| सागसेऽपि न (सु ३२३) | ४७।८४ | सामगायनपूतं मे (शा प ४०६२) | ३६४।७ | सा सा सपद्यते बु (विक्रमच ५३) | ९१।३४ |
| साग्रयोऽपि किल | १०१।११ | सामदाने भेद | १५०।३२० | सा सुन्दर तव (काव्याल ६ १०) | २८०।४ |
| साटोपव्योमहट्टोषित | २७।१३ | सामवादा (शिशु २ ५५) | ३९१।५६६ | सा सेवा या (पच १ ४७) | १४८।२५५ |
| सा तन्वीति (सूक्ति ४२ १) | ३३५।१४२ | सा मा द्रक्ष्यति(गीत ११ २० १) | २९३।४ | सा सौन्दर्यनिधि | २८१।१९६ |
| सा तोरणान्ति (सूक्ति.३८ ३) | २७५।१९ | सामादित्सञ्जि (पच १ १६८) | १४९।२८७ | सा स्तनाञ्जलि | २६४।२५७ |
| सा दुग्ध्व (विद्ध शा १ ३८) | २७१।३६ | सामुद्रास्तिम (राजत ४ ६२९) | ३८६।३८० | साङ्गे मा कुरु | ३५८।७६ |
| सा दृष्टा येर्न (सु १२५४) | २७०।१ | साहजिकरूपवत्या | ३१२।२१ |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | ||
|---|---|---|
| ८० |
| साहारं वचन ३१०।९ | सुखं दु खान्तं (मा १२ ८३०) ३८२।२१९ | सुभगे कोटिसख्यत्व ३३१।७ |
| साहित्यपाथो (कुव ७३) ३८।१८ | सुख हि (मृच्छ १ १०) १७५।९१८ | सुभाषितं हारि विश २९।१७ |
| साहित्यसङ्गीत (भर्तृ स ७९६) ४०।३० | सुख ह्यवमत (मनु २ १६३) ३९१।५६२ | सुभाषितज्ञेन जनेन १७३।८६७ |
| साहित्ये सुकुमार (सूक्ति ४ १०४) ३४।५९ | सुखदु खा(मा १२ १२५१८) ३८२।२१० | सुभाषितमयैर्द्रव्यै (पच २ १७४) २९।३ |
| सिंह शिशु (भर्तृ स ७५) ७९।१४ | सुखदु खे (दृ ग ४७) ३८२।२१३ | सुभाषितरमा (शा प १५६) १५९।२९४ |
| सिंहक्षुण्णकरीन्द्रा (नीतिप्र ८) ८६।१४ | सुखदु खे हि (वृ चा ४ २३) ३८२।२१६ | सुभाषितरसास्वाद (पच २ १७३) २९।५ |
| सिंहादेकं (चाणक्य ६६) १६२।३९७ | सुखमापतितं(मा ३ १५३८४) ३८२।२२२ | सुभाषितस्याध्ययने २२७।१८६ |
| सिंहो बली गिरि (भर्तृ म ७०७) ९२।८० | सुखमेव हि (मा १२ ७५५) ३८२।२०४ | सुभाषितेन गीतेन २९।२ |
| सिंहो व्याकरण (पच २ ३६) १७९।१०२५ | सुखयतिितरा न ८५।१० | सुभाषिते प्रीतिरनु (सु २६९) ५०।१८७ |
| सिक्त स्फटिककुम्भा (कुव १७१) १३४।५ | सुखलवदशा हर्ष ५१।२२८ | सुभिन्नं (चाणक्य ९०) १६२।४१७ |
| सिक्ताया वीर (शा प १२३४) १२४।१५ | सुखशय्या ताम्बूल(शा प ३७८१) ३५२।६ | सुभ्रु त्वं कुपिते (चोरपचाशिका) ३०७।६५ |
| सिक्तानैर्मञ्जरीति ११४।२५ | सुखस्य दु खस्य न ९२।५७ | सुभ्रु त्व नवनीतकल्प ३०७।७० |
| सित वसनम (शा प ३०९७) ३५६।२७ | सुखाद्बहुनर (मा १२ ७४६५) ३८६।३७९ | सुभ्रुवामधिपयो(शिशु १० ८७) ३२१।१३ |
| सितकिरणकपोली ३०३।१२६ | सुखार्थी त्यजते १५८।२१६ | सुम ये वाग्भङ्गैर्वचन २९२।१७ |
| सितांशुवर्णैर्वियति १०५।१२६ | सुखार्थी ना (राजन ३ २१५) ३८२।२०७ | सुमनोवररत्नाना १४५।१०८ |
| सिद्ध मन्त्रौ (वृ चा १४ १७) १६८।६५६ | सुग्वास्वादपरो (हि ४ ७७) ३७८।५० | सुमन्त्रिते सुवि (शा प १४३१) १५३।९ |
| सिद्धिं वाञ्छ (पव ३ २२४) १७९।१०२७ | सुगन्ध कतकीपुष्प १४६।१७६ | सुमहन्त्यपि (हि १ २६) १६३।४४० |
| सिद्ध्यन्ति कर्मसु(अ शाकु ७ ४) १५२।४०६ | सुगृहीतमालिन (कवित्तामृत १४) ५७।१४५ | सुमुखेन वदन्ति (पच २ १९९) ३४९।६० |
| सिन्दूरं रवि ३२०।४५ | सुजन व्यजनं (प्रमगा ३) ४५।१८ | सुमुखोऽपि सुवृत्तो (शाम ३५८) २४८।७८ |
| सिन्दूर सीमन्ता(शा प १२४०) १३९।३ | सुजनानामपि हृदयं ५६।१२२ | सुमेरुशिखरप्रान्त १८१।१३ |
| सिन्दूरद्युतिमुग्ध (नैषध १२ ३६) १२३।२ | सुजनो न याति (भर्तृ २ ६२) ४७।११० | सुरतमरखिन्नपद्म(विद्ध शा १ २८) ३२५।३ |
| सिन्दूरस्पृहया (नल च ३ ७) २७।९ | सुजीर्णमन्नं (वानर्यष्टक ७) १७४।९०६ | सुरतविरत (शा प ३७०७) ३२१।१८ |
| सिन्दूराणीव २८।१९ | सुतं पतन्त प्रस (भोजप्र २९२) १८२।३६ | सुरते च समाप्ते च ३१७।१ |
| सिन्धुष्वङ्गावगाह १९।३९ | सुतनु जहिहि (अमरु ३९) ३११।१३ | सुरमन्दिरतरुमूल (मोहमुद्गर) ३६७।२६ |
| सिन्धूत्तरं (शा प १११३) २१७।५३ | सुतनु जहिहि (शा प.३५७७) ३०६।३० | सुराणा (अल कोस्तु व्य १) १०६।१५८ |
| सिन्धो सुधांशुश २९७।२५ | सुतनु श्रुतिसेवनतो ३२१।२ | सुरासुरशिरोरत्नकान्ति (सु ६) १९।४१ |
| सिन्धोजैत्रमय ११०।२३८ | सुतनु हृदया (अ शाकु ७ २४) ३०६।४८ | सुरूपं पुरुष दृष्ट्वा ३४९।४० |
| सीतासमागमोत्कण्ठा १८९।९ | सुतन्प्रत्य (शा प १४१९) १५०।३४७ | सुलभ वस्तु सर्वस्य (दृ श ५७) १५७।१७२ |
| सीत्कार शिक्षयति (शा प ५२४) १८६।३ | सुदीर्घा रागशा(शा प ३३३५) २६४।२८४ | सुलभा (मा ५ १३४८) १४५।११५ |
| सीत्कृतानि (शिशु १० ७५) ३१९।१८ | सुधाशोजर्जितं क्व (पच म २०) ९३।९० | सुवदनावदना ३३२।४३ |
| सीदन्ति चामि ९८।२ | सुधाकरकर (शा प ११०२) २१८।६७ | सुवर्णतुषणा (मा ५ १२५५) १४८।२५४ |
| सीदन्ति सन्तो ९९।१० | सुधावान्त कान्ति २६।२०० | सुवर्णवर्णललितापद १०१।४ |
| सीमन्तिनीषु का १९६।३ | सुधाबद्धग्रासै (विद्ध १ ३१) २६३।१९८ | सुवर्णस्य सुवर्णस्य १८६।८ |
| सीमा वृद्धि (पच १ १०१) १४४।९४ | सुधामयोऽपि (शा प ३३०५) २६०।१२० | सुवर्णालंकृता कन्या १८७।२१ |
| सीमा सङ्कोच (पच १ १०२) १४४।९५ | सुधारश्मि सद्यस्तिमिर ३०१।८३ | सुवर्णे पद्मे (भोजप्र १२६) १४७।२०० |
| सुकपरिविन्द २००।४९ | सुधाशुभ्र (भर्तृ १ ४०) ३७८।५२ | सुविरलमोक्ति (रमंग २ रूप) २६२।१७३ |
| सुकविद्वितय मन्ये (भोजप्र १९१) ३६।३१ | सुदारी सा (शा प ३३६६) २७०।४३१ | सुवृत्तस्यैकरूपस्य पर (सु २१९) ४६।७१ |
| सुकर सर्वथा (रा ४ ३२ ७) ३८२।२२५ | सुपर्णपरिसवितस्तदनु १०१।५ | सुव्यवमायिनि शूरे ६२।१८ |
| सुकवे शब्द (भोजप्र ८०) ३२।३ | सुपर्णे खर्णाङ्गारचित २३१।३९ | सुशील खर्णगौराङ्ग १९६।८ |
| सुकुमारमहो (शिशु १६ २१) ५९।१९९ | सुपात्रदानाच्च भवेद्ध १७३।८४९ | सुश्यामा चन्दनवती १९५।३ |
| सुकुलजन्म १७५।९३८ | सुपूरा स्यात्कृ (पच १ २६) १८४।५०१ | सुषमाविषये परी २६२।१७६ |
| सुकुले योजये (चाणक्य ३ ३) १६०।३४१ | सुभग वदति जनम्त ३५२।१२ | सुसदिग्धस्य भक्तस्य १६८।६५४ |
| सुख च दुख (मा ५ १३०६) ८६।३८१ | सुभग तवाननपङ्क १९४।२७ | सुसङ्गत्तैर्जिविनवन्सु (सु १८९) ७२।५२ |
| सुखं जीवन्ति (काव्या.२ ३४१) ८०।२३ | सुभग त्वत्कथारम्भे २८७।१ | सुसहदैर्दैवदपि (शिशु १७ १९) १२७।८ |
| सुभगसलिलाव (अ शाकु १ ३) ३८५।४ |