सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ४१
| न माता शपते (धर्मवि १८) १६८।६६९ | न लज्जते सज्जन (सु ३५९) ५९।२२५ | नवे वयसि (गरुड पू अ ११४) १५६।१३४ |
| नमामि मामनो (शा.प ५४८) २०५।१ | न लज्जा न (हि १ १२०) ३४९।३८ | न वै ताडनात्ता २४६।१९ |
| नमिता फलभारेण न ३४४।८ | न लभन्ते विनोयोगं (दृ श ३५) ८३।१७ | न वैरमुद्दीपेय (मा ५ १०८२) ३९४।६९७ |
| न मिथ्यावादस्ते १०६।१५४ | नलिकागतमपि ५६।१९९ | न वैरण्यभि (मा २ २४३८) ३९४।६७८ |
| न मुग्धदयिता (शा प १८३) ३७।६१ | नलिनं मलिन (नैषध २ २३) २५९।९१ | नवोक्तिजतिरि (शा प १५२) ३०।४ |
| न मुद्रीयान्मुद्री (सु ५५) १८।३० | नलिनान्तिकोप (शिशु १३ ४३) १२६।४३ | न व्यावयो (मा.२ १९७४) ३८६।३७७ |
| न मे दु ख (शा प ३४५६) २७७।४ | नलिनि निपुणता २४४।२२४ | न व्याधिर्न (योगवा सा १ २७) ३८६।३७८ |
| नमो नम काव्यरसाय (सु.१६८) ३१।३० | नलिनीदलगत (शा प ५५७) १७१।७९० | न व्यासिरेषा (दृ श ४१) १६८।६८९ |
| नमो रामपदाम्भोजं २०१।६ | नलिनीदलगत (मोहमुद्गर) ३७३।१७२ | न शब्दशास्त्रे (पञ्च सू १९) ३८९।४८४ |
| नमो वाङ्मनसातीत (सु १५) १।५ | नलिनीदलताल २८५।६ | न शान्तान्तस्तुष्णा (सु ४९१) ७२।५६ |
| नमो विश्वसृजे (रघु १० १६) १४।२ | न लोकायत (शा प १५२१) १६६।६०६ | न शीलं दृग्भङ्गी २५५।३३ |
| नम्रत्वेनोन्नमन्त (भर्तृ २ ५९) ५३।२७७ | न लोपो वर्णाना १०६।१५३ | नश्यतो युध्य (मार्कण्डेयर ४९) ३८६।३७७ |
| नयगुणोपचितामि (रघु ९ २७) ३३२।४० | नवं वयो (शा प.२०८३) १४५।१११ | न श्लाघते खल १९९।१९ |
| न यज्वानो (पच १ ३२३) १४९।२९८ | नव वस्त्रं नव (नीतिप्र १५) १५९।२९६ | न श्वेतांगुव (शा प ११११) २१८।६५ |
| न यत्नकोटिशतकैरपि ५५।४४ | नवकदम्बरजोरु (शिशु ६ ३२) ३४१।३८ | नष्ट मृतमति (पच १ ३६३) १६४।५१३ |
| न यत्र गुणव (सूक्ति ३६ ३७) २४७।५५ | नवकनकपिंशङ्ग(शिशु ११ ४३)३२७।१२ | नष्टमपात्रे दान (सु ३४१) ५८।१६६ |
| न यत्र स्थेमानं २३०।३३ | नवकिसलयतल्प (ताराश १२२)२७५।२२ | नष्टे वारिजविपिने २२२।५९ |
| नयनच्छलेन सुत २५९।७५ | नवकुङ्कुमचर्चिका २९९।१८ | न सशयमना (मा १ ५६१३) १६३।४३४ |
| नयननिपाते (शा प ३५५५) ३१२।२६ | नवकुङ्कुमारुणपयो (शिशु ९ ७)२९४।३५ | न ससारोत्पन्नं (भर्तृ स २६३) ३६८।४३ |
| नयननीरज (शा प ३३३६) २६५।२८४ | नवकुमुदवनश्रीहा(शिशु ११ २२)३०२।९ | न सदश्वा कशाघातं (सु २२६५)८०।२७ |
| नयनपंथनिरोधा (शा प ५९४) २७७।८ | न नवोज्जालैषप्रभृति २८०।८६ | न समास समर्थस्य १०३।५२ |
| नयनमसि (शा प ७५५) २१०।२१ | नवचन्द्रिकाकुसुम(शिशु ९.२८)३००।५३ | न सर्पस्य मुखे १४७।१९३ |
| नयनयुगासेचन (सा द ३ २६७)२७०।१८ | न वध्यन्ते ह्य (पच १ १२३)१६४।५०५ | न सवर्णो न च रूप २८८।९ |
| नयनविकारै (शा प ३७६५) ३५९।५७ | नवनखपदमङ्ग (शिशु ११ ३४) ३०९।६ | न साधु कुत्रापि ५२।२३९ |
| नयनस्य तुला चक्रे २५९।७० | नवनीतोप (सूक्ति १३०.३) ३८५।३१२ | न सारणीया १५५।१०२ |
| नयनाञ्चलचञ्चरी २६०।१०५ | नवनीलमेघरुचिर (शा प ७३) ३६७।२९ | न सा (स्काद नागर अ ११५) ६५।३ |
| नयनानन्द (काव्यप्र १० ५४) २९९।५ | नवपय कणकोम (शिशु ६ ३६) ३४१।४२ | न सा प्रीति (मा १३ १८१८) ३९४।६७३ |
| नयनेन निरीक्षिता २७८।३१ | नवपलाशपलाशव (शिशु.६ २) ३३२।५८ | न सा सभा (शौन नी ११५) १७४।८८४ |
| नयनोत्पलजलधारा २७५।११ | न वाचा दुर्गम (र ६ ६७) ३९३।६६८ | न साहसैकान्त(हि ३० ११६)१७४।९०९ |
| न यस्य चेष्टितं(पच १ २८४)१६४।५१२ | न वारयामो भवती २१९।८ | न सुख न च सौभाग्यं ८३।२ |
| नयेन जाग्र (काम नी ७.५८) ३९४।६६९ | न वित्तं दर्शये (पच १ ४३३) ६४।२ | न सौख्यसौभाग्य(शा प ३००) ८३।४ |
| न येनाङ्कुरितं (वृ श ५३) १५०।३५९ | न विद्यया नैव कुलेन ६५।१२ | न स्कन्दते न (म ७ ८४) ३९४।६९१ |
| नं योजनशतं दूरं (हि १ १४८) ७५।११ | न विना परिवादेन (शा प ३४६) ५४।२ | न स्त्रीजित (शा प. १५११) १५४।६६ |
| नरत्वं दुर्लभं लो(अग्निपुराण) १६७।६६० | न विना पार्थिवो (पच १ ८७) १४४।८५ | न स्त्रीणामप्रिय (हि १ ११७) ३४९।४१ |
| नरनारीसमुत्पन्ना १८५।१५ | न विप्रापादोदकपङ्कि ८९।२ | न स्वातन्त्र्य (शा प ३२४) १६७।६२६ |
| नरपतिहित (शा प १३५३) १५२।४०९ | न विमोचयितु ४८।१३२ | न ज्ञानं न च २९२।३३ |
| न रम्य नारम्य १७७।९८९ | न विश्वसे (शा प.१३०१) १६०।३२३ | न स्पृशल्या (काव्या ३ १२१) ३९४।७०३ |
| नरस्य चिह्नं १७४।८९० | न विश्वासा (मा ५ १३६१) ३९४।६९५ | न स्म माति (शिशु १०५०) ३१६।१० |
| नरस्याभरणं रूपं रूप (चा नी ४३) ८३।२ | न विष विष (स ७ ४४) ९८।१ | न स्वप्नेन (गरुड पू अ १०८) १६६।५७३ |
| नरा सस्कार (सु ३०६) १७७।९८० | न विषममृतं (शा प ३७७) ६१।२५५ | न स्वल्पमप्यध्य (हि १ १७२) १७२।८३४ |
| नराणा नापितो (पच ३ ७४) १५९।२७९ | न विषयभोगो ३६७।२२ | न स्वल्पस्य कृते (भोज १३) १६१।३५५ |
| नराधिपा नीच(पच १ ४१४)१५०।३९६ | न विषेण न (कुव १२३) ३४९।५६ | न खा करेणुमपि २३१।७३ |
| नरेशे जीवलो(काम.नी ४.४२) १४५।१२८ | नवीनदीनभावस्य याच(कविता ३९) ७३।७ | न खादुनौषधमिदं १००।४ |
| नरैर्विफलजन्मभिर्गिरि ३१७।४ | न वेत्ति यो य (वृ चा ११ ८) १७३।८६५ | न खे सुखे (मा.५ १०८२) ३९४।६८८ |
६ सुभा०अनु०
४२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|---
| न द्वयेन च (शा प ३०८०) २५।१२ | नानीयन्ते मधुनि ८०।३९ | नालम्बते दैष्टि(शिशु २ ८६) १४७।१८६ |
| न हायनैर्न (भा ३ १०६३२) १६७।६१४ | नान्नृषि कुरुते १६०।३०३ | नालसा (भा १२ ५२६९) १५३।१० |
| न हार नाहार २८९।६१ | नान्त प्रवेशमरणं (अमरु ११४) २७३।५ | नालस्य (शा.प ११३७) २४४।२३६ |
| नहि कस्य (श्रीकृष्णजन्मख ५) २९४।६८२ | नान्तरज्ञा (किरात ११.२४) १६१।३६७ | नालिङ्गन्ति (शा प १२४३) १०८।२०० |
| नहि जन्मनि ज्येष्ठ (शा प गुण ४) ८२।२९ | नान्तर्विचिन्तयति (सु २७६) ५१।२१४ | नािलङ्गिता नवलवङ्ग २२३।८६ |
| नहि बुद्धिगुणेनैव (मालवि ४ ६) ८८।१६ | नान्दीपदानि (दश २ ४०) २५२।४३ | नालीकभङ्गकृदतीव ११८।१२० |
| नहि भवति यन्न (भर्तृ स ५६९) ९१।४२ | नान्बौ स्कन्ध्नति २१४।७७ | नालेनेव स्थित्वा (शा प ८८९) २०८।२३ |
| नहि भवति वियोग ५१।२१८ | नापरीक्ष्य नयेद्दण्डं १५०।२३७ | नालोक क्रियते (सु २२६) ४६।७७ |
| न हीदृश सव (शा प १४७०) १५४।५१ | नापितस्य गृह ३९४।६८४ | नाल्पीयसि (शा प.२११) ३८६।३६३ |
| नाकालतो (भा १२ ८८१) ३७९।१०३ | नापुष्ट (पञ्च पा अ.११०) १६६।६१० | नावज्ञया प्रदा (र १ १२ ३१) ३८७।३९२ |
| नाकालतो म्रि(भा १२ ७४२) ३७९।१०६ | नापेतोऽनुनयेन (अमरु ४२) ३११।२७ | नावज्ञा नाप्यवैद (सूक्ति २७ २) २१५।१ |
| नाकालमत्ता (भा १२ ७४१) ३८०।१०९ | नाप्तं यत्केनचिदपि (सु ५१९) ७०।२७ | नावर्तो न च तरला २१६।६ |
| नाकाले म्रियते(नीतिसार १९) १६०।३०१ | नाप्राप्यमभि (भा ५ ९९३) १६३।४५८ | नाविदग्ध प्रियं १६४।५१० |
| नाकाश न दि (सूक्ति ६९ ११) २९८।३४ | नाभिप्रभिन्नाम्बु(सा द १० १४) १४०।४ | नाशयन्तो घनध्वान्त(मा द ७ ८) २९९।६ |
| नाक्रोशी स्या (भा ५ १२६५) ३८०।११२ | नाभिरन्ध्र २६७।३३९ | नाश्नन्ति पित(गरुड पू १०८) ३८९।४८६ |
| नाक्षराणि पठता (नै १२५) ७०।३२ | नाभिषेको (शैन नी ११५) २२०।७ | नाश्रिय किमभूद्भव २०।७१ |
| नागच्छन्नुपहूयते न ६१।२६१ | नाभिसङ्गेन २६७।३४१ | नाश्नाति सेवयौ (पच १ २९०) ९७।९ |
| नागविशेषेषु शेषे २०६।१५ | नाभीपद्मवस (प्र राघव १ ३) १५।३० | नाश्चर्यमेतदधुना (सु ४४५) ६०।२४५ |
| नागुणी गुणिन ४५।१३ | नाभीबिलान्तर २६७।३५९ | नाश्रम कारण ३८७।३९४ |
| नागेन्द्रहस्ता (कुव ४५) २६९।३१७ | नाभीवलयसबद्धा २६७।३४२ | नासत्यवादििन सख्य ८३।१ |
| नागो भाति (पञ्चरत्न १) १८०।१०४२ | नाभूतिकालेषु(भा १२.७३८) ३८७।३९६ | नासा कश्चि (भा १३.१२१८) ३४८।१५ |
| नाग्निस्तृप्यति (पंच २ १४८) १५४।६० | नाभूवन्भुवि यस्य (शा प ९२४) २३२।८३ | नासादसीया (नै ७ ३६) २६०।११६ |
| नाङ्गीकृतव्याकरणौष ४२।७ | नाभ्यस्ता (भर्तृ स.१९५) ३७४।२१७ | नासामौक्तिकमबले २६०।११८ |
| नाजारज १६५।५६२ | नामृत न विषं (भर्तृ स ९१) २५१।१० | नासावंशविनिर्मुक्त २५८।४४ |
| नात पर (शा प ३७५२) ३५१।३० | नामोदस्ताखिलामो २६१।९३ | नास्ति कामस (वृ चा ५ १२) १५९।२८६ |
| नात पापीयसी (सु ३१६४) ६६।२१ | नाम्बुजैर्न कुसुमैरु ३५२।२७ | नास्ति वर्मसमो (प्रसगा १२) ३८०।३८९ |
| नातिप्रसङ्ग (पच १ १४८) ३४९।६७ | नायं धार्यमधी २६३।२३१ | नास्ति क्षुवासमं दुख ९६।१ |
| नात्यक्त्वा (भा १२ ६५८३) ३८६।३६५ | नाय प्रयाति विकृतिं २९।१८ | नास्ति मेघ (वृ चा ५ १७) १५९।२८८ |
| नात्यर्थमर्थार्थी (शा प ४३३) १६७।६२५ | नायं मुवति २८९।७६ | नास्ति (भा.३ १३६४९) १५६।१४२ |
| नात्युच्चशिखरो (सु २२६०) ८३।१८ | नायाति वाडवशि ७८।८ | नास्ति (वराह अ १५३) १६७।६२४ |
| नात्र व्याधशरा २३४।१२० | नायातो यदि (सु १४३८) ३५८।७३ | नास्ति सत्य १६५।५५६ |
| नाथ मयूरो नृत्यति १८४।१९ | नारब्धं कुचपरि ३१३।४७ | नास्ति सत्या(भा १ ३०९७) ३८७।३९० |
| नाथ विलोकय मेघ १८४।९ | नारमेतान्यसा(भा २ १९७२) ३८७।४०२ | नास्ति स्त्रीणा (म ५ १५५) ३५१।१६ |
| नाथे श्रीपुरु (शांति १ ११) ३७६।२५८ | नारसिंहाकृतिं वीक्ष्य १९४।१२ | नास्तीदृशं (मत्स्य अ ३६) ३८४।३०० |
| नाथो मे विपणिं (कुव १५४) ३५५।८८ | नारिकेलसमाकारा (हि.१ ९४) ४५।२४ | नास्त्यन्या तृष्णया (शा प ४२२) ७६।५ |
| नाद्रव्ये निहिता (हि प्र ४४) १६२।४३० | नारीणा खलु ३५४।५८ | नास्माक शिबिका ८०।४४ |
| नाधन्याना (सूक्ति १०३.२६) २१५।१ | नारीणा मृगनाभि ३२६।३१ | नास्मिन्सततवेष्ट (सु २२९०) ७८।१५ |
| नाधीतेऽत्र जनो यदि ९९।९ | नारीणा वचनेन ६१।२६७ | नास्य भारग्रहे (शा प ९६१) २३४।१३९ |
| नाध्यापयिष्यन्निगमाश्च ४२।१ | नारी परमुखद्रष्ट्री १५७।१८० | नास्योच्छायवती (शा प ९०६) २३०।३९ |
| नानन्दि कैरवमवर्धि २१०।२८ | नारीभिर्गुरुज (शिशु ८ ४७) ३३९।१०४ | नाहं रक्षो न (शा प ४०८८) ३६७।१५ |
| नानन्वयस्ते न च ते १०४।९३ | नारुतुद (मनु २.१६१) १६७।६१५ | नाह दुश्चरिणी न ६३।३८ |
| नानाभूषणभूषित १०९।२१३ | नारुहेद्विषमं वृक्ष १६७।६५१ | नाह धार्यमधी २६४।२३१ |
| नानाविध (काव्य प्र १०.२७) १०५।१४४ | नार्य कुङ्कुमशङ्कया १३४।२१ | नाहूतापि पुर पद १०१।१३ |
| नानिवेद्य (हि २ ९०) १४६।१४२ | नार्यस्तन्वि (अमरु ८) ३१७।४ | नि पद्म शिशिरेण २१४।७८ |
| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ४३ |
|---|
| नि पीतपीनति | २१६।१७ | नितरा नीचो (भामिनी अ ७) | २२०।६ | निम्नोन्नत वक्ष्यति | ८४।१७ | | नि पीते कलशो | ३६१।४७ | नितान्तस्वच्छहृदय | १९५।५० | निम्बे किं (शा प १०४०) | २४१।१५५ | | नि शङ्कं गजपति | २२३।७७ | नित्य छेदस्तुणूनाना (अष्टरत्न ३) | ३८५।२१८ | नियत (काम नी २ ४३) | १५२।४१० | | नि शङ्क बहिरम्ब | ३६५।९ | नित्यं (स्काद आ अ २५) | १६६।५९९ | नियत्तै पदैर्निक्षेप्य | १७१।७९७ | | नि शङ्कसोचित(नै ७ ७७) | २६५।२७८ | नित्य निरावृत्ति (सु ८९) | ९।१० | नियमयसि (अ शाकु ५ ८) | १०६।१९६७ | | नि शेषं व्यपनीय | ३२०।२० | नित्यं ब्रह्म (शा प १५५८) | २९१।३ | नियुक्त क्षत्रियो(हि २ ९७) | १४७।२०३ | | नि शेषच्युत (अमरु १०५) | २९३।७ | नित्यं मनोरथस्यापि | ३०४।१ | नियुक्तहस्ता (महा ना ९ ३४) | १५१।३८३ | | नि श्वासानलविद्ध | २७७।५८ | नित्य या (सु ५३८) | ७१।४२ | नियोगिभि (शा प १३३२) | १४४।-३ | | नि श्वासा वदनं (अमरु ९२) | ३०९।११ | नित्य वृद्धिसुपेषि | १८।१९४ | निरक्षरे वीक्ष्य | १७३।८५९ | | नि श्वासोद्गी (काम नी ३ १८) | ३८४।२८८ | नित्यं ज्ञाता सुगन्धा | ३५०।२ | निरञ्जने (किरात ८ ५२) | ३३८।९५ | | नि सारस्य (शा प ४८१) | १५५।११४ | नित्यमाचरतः | ३७१।११५ | निरतिशय (पच १ ३१) | १७१।७७५ | | नि सीम (भामिनी शृ.४६) | २५९।६१ | नित्यमाराधिता देवै | १९७।४९ | निरर्थकं जन्म (स क २ २५३) | २०५।५ | | नि सृप्तोऽह (शा प.४३२७) | ३७२।१४२ | नित्यमास्यं शुचि(शा प ६१२) | १५६।१४४ | निरवद्यानि पद्यानि | ३०।२ | | नि स्नेह नि करुण | ३५८।८० | नित्यानित्यविचारणा | ३७०।८४ | निरवधि (काव्यप्र १० ४२८) | १८।१६ | | नि स्नेह पतिरुज्झिता | २८७।९ | नित्यार्यपृथिवी | १५०।३२५ | निरस्थचालीके | ६७।५९ | | नि स्नेहो याति (शा.प ४१००) | ३६७।६ | निदधिरे (शिशु ६ २४) | ३३५।१२ | निरा (काव्यालं सू ३ १।१२) | २२३।९४ | | नि स्वो वष्टि शतं (अष्टरत्न ९) | ७७।५० | निद्रातुन्दिलशोण | ३२९।२३ | निरीक्षितुं (शिशु १७ ६२) | १२७।११ | | निकटस्थं (दृ श ७५) | १६९।७०६ | निद्रानिवृत्ता (का प्र १० २२) | ३२८।१ | निरीक्ष्य विद्युन्नयनै (कुव ६१) | ३४०।२० | | निकटस्थं दहल्यम्रिनं | १८४।११ | निद्रामीळित (भर्तृ.स ५७९) | २३१।५१ | निरीक्ष्य वेणी | ३३८।७१ | | निकाामं क्षामाङ्गी (मालती २ ३) | २७६।३४ | निद्रार्धमीलित (दश ४ २३) | २७८।४० | निरुत्साहं निरानन्दं(हि २ ७) | ९०।१० | | निखिलं जगदेव(रसगङ्गाधर ) | ३६७।२७ | निद्रितस्य बत | ३४०।४ | निरुद्यमानवद्याझ्या | १९३।२ | | निखिलेषु गुणेषु | १०४।८८ | निद्रे लोचनमुद्रणं | २८१।११० | निरुपादानसम्भार (वेणीसंहार ?) | ३।३ | | निचयिनि (किरात १० २९) | ३४६।१४ | निधे कलानामपि | २१०।१५ | निर्गतामलवाक्यस्य | ३४।३ | | निजकरनिकर (शा प ७५२) | २१०।८ | निन्दन्तु नीति (भर्तृ स.२६५) | ७८।११ | निर्गत्य न विशे | ३९३।६३५ | | निजगुणगरिमा | ८३।५ | निन्दा य (दृ श २७) | १६८।६८३ | निर्गुण इति मृत | ४०।२७ | | निजदोषा (का प्र.१० २३) | १७१।८०१ | निन्यते पितृभिस्त | ८९।८ | निर्गुणमप्यनुरक्त (सु २४२) | ४८।१४१ | | निजनयन (सा द ८ १५) | ३३४।१०३ | निन्यन्ते यदि (प्र राघव १ २०) | ३२।४८ | निर्गुणस्य हतं रूपं(वृ चा ८ १६) | ३८८।४३८ | | निजपतिराद्यः | १८१।२५ | निपतति किल | ९२।६२ | निर्गुणेष्वपि (शा प २३२) | ४६।३९ | | निजपदगतिगुप्परञ्जित | ४७।९६ | निपत्य युधि (शा प १६०७) | १४३।५१ | निर्जितसकलाराति | २०१।५९ | | निजपाणिपल्लव (शिशु ९.५२) | ३५९।८८ | निपपात संभ्रमभूत (शिशु ९ ७१) | ३१०।३ | निर्गतव्यो | २६८।३६५ | | निजप्रियमुरुखप्रान्त्या | ३३७।५९ | निपानमिव (हि १ १७६) | ८२।९ | निर्णेत्रुं शक्य (कुव १७१) | ३१२।१७ | | निजरज पटवास (६.३७) | ३४१।४३ | निग्रन्धनी (भा १२ ६५४८) | ३८०।१४८ | निर्दयं खङ्ग (कुमार १६ ६) | १२७।४ | | निजवर्षािहितस्नेहा | १४५।१२५ | निबिडतमत्तमाल | ३५४।७३ | निर्दहति कुल (प्रसंगा ८२) | ३८८।४२९ | | निजसौख्यं (हि १ १५८) | ७१।१८ | निबिडानुषक्त | २६६।३०८ | निर्धौते सति (शिशु ८.५१) | ३३९।१०८ | | निजा काय (शा प ३८३२) | ३३६।२१ | निभृत निभृतं | ३५२।२४ | निर्मग्नेन मयाम्भसि | १५।२६ | | निजांशुकावृता (शा.प ३७३४) | ३२७।२ | निमग्नस्य (घट नीति २०) | १६०।३०२ | निर्मजचक्षु (सूक्ति ९३ ३) | ३६६।१४ | | निजानपि गजा | ११७।७६ | निमित्तमुद्दि (घट नीति १०) | १७४।९०८ | निर्मासि मुखमण्डले | १२४।८ | | निजानुत्पत्त (भा ५ ११६५) | ३८६।३८४ | निमीलदाकेक (किरात ८ ५३) | ३३८।९६ | निर्माणकौशल(सा द १० ३३) | २५३।६ | | निजाशयवदाभाति | १८८।६९७ | निमीलनन्शंशजुषा(नै १ २७) | २५३।७ | निर्मथ्य खलजिह्वाग्रं (सु ३७६) | ५६।१०६ | | नितम्बगौरवेणासौ | २६८।३७५ | निमीलनाय (शा प.७४३) | २०९।४ | निर्मित्सु शुंदती | २५४।४५ | | नितम्बपीड्य | २६९।४०८ | निमेष (भा १२ १२५०३) | १६१।३५९ | निर्मुक्तरशेषधवलैरचले | १३५।२२ | | नितम्बबिम्ब | २६८।३७२ | निम्ननाभि (का प्र.१०.४६) | ३३८।९९ | निर्मुक्तांशैश (प्र.राघव २ १९) | २५३।२३ | | नितम्बिन्यो नित्यं विनय | ३५२।३७ | निम्नप्रदेशा (कुमार १४ १४) | १२८।४५ | निर्यच्छोणितपूरताम्र | ११५।४८ | | नितम्ब्यो विशाल. | १७५।९८४ | निस्त्रैण्वोधीभूत(शिशु १८ ६९) | १३०।९८ | निर्यद्द्वाससरजीव (विद्ध २ २२) | २९५।६२ |
| ४४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | |
|---|---|---|
| निर्यान्त्या (शा प ३७२८) ३२४।४८ | नीचस्तनोत्वश्रु निता (सु १७५) ४०।४३ | नृत्यत्तद्वद्विजिराजी (रसगङ्गाधर)१२६।२५ |
| निर्लेपौ कुचकुड्मलौ ३२१।२९ | नीचावमानमलि (दृ श.२०) १६८।६७७ | नृत्यद्भगोदृहास (कुव १४८) ११६।५६ |
| निर्वाणदीपे (नीतिप्र १३) १७३।८७४ | नीचेषु यावनी (शा प ५५९) ९९।१३३ | नृत्यारम्भसरत्सद्गरि ६।७० |
| निर्विवेकतया बाल्यं ३६७।१८ | नीचैर्धुर्यवने शुनी १००।३० | नृप. कराभ्यासु (नै १२ ८०)१०४।११६ |
| निर्विशेषो यदा (पंच १ ८६) १४६।१५७ | नीतं जन्म (अमरा ४ १२) २२४।१०८ | नृप कामासक्तो (हि २.१४२)१५२।४११ |
| निर्विशेषेणापि (पच १ २२५) १५७।१७८ | नीत नवनवनीतं २२।१११ | नृपतिनिजाम तया ११५।३३ |
| निर्विषोऽपि (शा प.१२९७) १४९।३१० | नीता कुम्भस्थल क १२३।१ | नृपतिपुरुषशक्ति (मृच्छ ३ १०) २९६।२ |
| निर्वीर्या पृथिवी ९९।२३ | नीतानामाकुली (कुव ६५) ३१२।१४ | नृपतिसुकुटरत्न (हनु ७ ३) ११८।१२१ |
| निर्वृत्ताध्वरकृत्य १७८।१०८० | नीतिर्भूमिभुजा (नवरत्न ३) १७९।१०३२ | नृपदीपौ धन (पच.१.२४४) १४९।२९३ |
| निर्वृत्ते सुरतोत्सवे (सु २११६) ३२१।२६ | नीतिर्लक्ष्मीमुकुरो १११।२५६ | नृपाणा च नरा(शा.प १२८७)१४५।१२० |
| निर्व्याजा (शा प ३७५०) ३५१।३८ | नीते मेदं धौत (शिशु १८.२०)१२९।६५ | नृपोऽपकृष्ट (मुद्रा ४ १४) १५२।३९७ |
| निर्ह्लादं क्रकचकक्षतै. ३१।४५ | नीत्वोच्चैर्विशिख (अमरु ११९) ३४७।४६ | नृसिंहदेवे चलिते १९०।७३ |
| निलय श्रिय. (शिशु ९ १६) २९६।४ | नीपस्कन्धे कुहरिणि १४१।४ | नेता यस्य बृह (भर्तृ.स ४९) ९३।१०० |
| निलीना वेश्मान्त २५४।३४ | नीपस्कन्धे निवसति १४०।१ | नेतु प्रयाणोन्मुखता १९०।६८ |
| निलीयमानैर्विहगै (कुव १७१) २९३।६ | नीर दूर तदपि वि २१३।५७ | नेत्रे खञ्जनगञ्जने (सा.द ३ ५९)२७२।७१ |
| निवासश्चिन्ताया (मृच्छ १.१५) ६७।५५ | नीरक्षीरविचे (भामिनी.अ १२) २२१।१० | नेत्रे खञ्जनगञ्जने नव २८१।१०८ |
| निविशते यदि (नै ४.११) २७५।१८ | नीरक्षीरे गृहीत्वा ११७।९६ | नेत्रैरिवोत्पलै (सा द १०.२५) १४०।१ |
| निवृत्ता (भर्तृ स.१७३) ७७।४४ | नीरजान्यापि निषेव्य २२३।६८ | नेत्रोपान्तवतंसिते २७२।६० |
| निशम्य केलीभवनोप ३३०।२ | नीरन्ध्रं परिरभ्य (शृ ति.२ ६७) ३१०।३ | नेदं नभोम (सा द १०.३८) ३०४।१५१ |
| निशाचरोऽपि दीनो २०९।६ | नीरसान्यापि (शा प.२९४) २४२।१८४ | नेदं मुख मृगवियुक्त २५३।२० |
| निशारत्नं चन्द्र (प्रसगा १५) ११५।४६ | नीरागा मृग (शा प ३४८८) २९०।७२ | नेदं समीरितमकारि ३५९।८९ |
| निशितशरधि (काव्यप्र ४ १९) २५५।१६ | नीराञ्जिभं (भामिनी.अ ६१) २४४।२३७ | नेदं सर सरसवारि २२१।२१ |
| निशीथे लीना (शा प ३८९२) ३४२।८६ | नीलनीरजनि (किरात ९ १९) ३००।३६ | नेपथ्यादपि रा (सूक्ति ८० २) ३२१।२५ |
| निश्चितं समुद को १८७।९ | नीलाब्जद्युतिनं १८४।३९ | नेपालीनामराले १३८।७८ |
| निषेवन्तामेते २३२।७७ | नीलाञ्जाना नय(स क २ ६७) २७१।४८ | नेयं विद्युद्भवमध्वि २७४।२१ |
| निष्पन्दा किमु (शान्तिश ४ ३) ७४।४६ | नीलेन्दीवर (स क ३ ११५) २८१।१०२ | नैतच्चित्रं यद (अ शा २.१५) १०७।१७५ |
| निष्पन्दामरवि(स क ४ ९४) २३५।१५५ | नीलोत्पलदल (सूक्ति ४ ९६) ३६।५४ | नैतद्दारिदगजितं ३४२।७० |
| निष्कलङ्ककलकैक (शा.प.४६४) ८२।४२ | नीलोत्पलाभ (शा प ४१२२) ३७२।१५१ | नैतद्विचित्रं म(भाग.१०.१२) ३८४।२९३ |
| निष्कासयन्त्यनेके २७८।२५ | नीलोत्पलोल्लसित २५३।२४ | नैतत्सा प्रह्यति(शा प.३९४२) ३४८।१७ |
| निष्कूजस्तिमिता. १४०।५ | नीवारप्रसवाग्रमुष्टि (सु.६३७) २३२।८१ | नैता स्वयमृप(शा प ७८८) २११।१७ |
| निष्क्रामन्नमृश ३७२।१४३ | नीवारा शुकको (अ शा १ १३) १४१।७ | नैयायिकाना नलिनाम्ब ४३।४ |
| निष्ष्णातोऽपि च (भामिनी.अ.८५) ५५।५९ | नीवारौदनमण्डमु १४६।१० | नैयायिका वा ननु शाब्दिक ४३।४ |
| निष्पाल्यासु हि • २६।१६५ | नीवीदर्भापरीतकरा ३१।८१८ | नैरन्तर्यच्छि (शिशु १८.७६) १३०।१०५ |
| निष्पीडितो यद्य २१०।१६ | नीवीबन्धोच्छ्वस (मालती २.५) २७६।४८ | नैर्मल्य वपुषस्त २२९।२२९ |
| निष्पेषोऽस्थिच २४३।१८६ | नीव्या सयमनं कचे ३२१।२८ | नैव व्याकरणाज्ञमे ३१।४३ |
| निष्प्रत्यृहमनल्प (शा प १२४) १८।१९ | नीहाराकरसार (शा प ७७२) २१३।६० | नैवाकृति फलति (भर्तृ स.४०) ९२।७२ |
| निष्प्रत्यूहमुपासहे १५।३१ | नूनं दुग्धाब्धिम (सूक्ति ६ २) ४६।४७ | नैवात्मनो विनाशं(पच १.४४३)५६।११५ |
| निसर्गसौरभोद्गान्त ३२०।३ | नून बादालशाइ शो(शा प ५५०)२०७।३ | नैवार्यं भगवानुद ३०३।१३४ |
| निसर्गादारामे (भामिनी.अ ५२) २३८।७२ | नूनं हि ते क (भर्तृ स ११८) २५२।४२ | नैवालवालवलयं २१२।४४ |
| निस्त्रिंशत्रुटि (नैषध.१२ ६६)११०।२४२ | नूनमयं मे पाप (सु १२६५) २७७।१८ | नैषा सध्याविधिरवि १३९।५ |
| निहत निहत तूर्ण १४१।१ | नूनमाज्ञाकरस्त (भर्तृ १ ११) २५९।६० | नैषा वेगं सुदुतर (मु २१०७) ३१९।३७ |
| नीचं समृद्धमपि १७६।९६८ | नृणा धुरि स एवैको (सु ५१०) ७०।१९ | नैष्ठुर्यं कलकण्ठको २९०।८० |
| नीच समुत्थितो (शा प.३५६) ५५।६९ | नृणामन+यस्तफणामूदी ४२।६ | नो काम प्रति (सु.२५७६) १०८।१९६ |
| नीचतामनवलम्ब्य ७२।२९ | नृत्यचन्द्रकिणि (सु.१७७३) ३४२।८९ | नो ग्लानिं भजते १२१।२५८ |
सस्थाननिर्देशसङ्क्रमकोशः (पृ. ४५)
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| नो चाटु श्रवणं (सा.द.३ ८२) ३०५।१३ | पक्ष्मालीपिज्र (मालती १ ४) ९।१४२ | पतिव्रता पतिप्रा (पच.३ १४४)३७७।१२ |
| नो चापाकलनं न १३१।१२१ | पङ्कज जलेषु वा (शा प ९९) २४३।२१० | पतिरतीव धनी सुभ ३५२।२६ |
| नो चारु चर (सूक्ति १७ ९) २२८।२१८ | पङ्कसकराविगर्हितम(नैषध ५ ८७) ६९।२२ | पतिभार्या (मनु ९ ८) ३८६।३६१ |
| नो चिन्तामणि (भर्तृ स.२६६) २१४।७५ | पङ्कानुषङ्गं पथि (शा प ३९१७)३४५।५७ | पतिर्हि देवो(बौधा स्मृ.१ १३) ३५१।१४ |
| नोच्चै सत्यपि चक्षु (वेणी २ १) १३९।७ | पङ्गुष्वपि च देवर्षे ३४९।४८ | पतित्रताया कुच १७३।६६३ |
| नो जानाति कुलीनमु ६३।४२ | पङ्गो वन्ध्यस्त्वम (स क.४ ११३)७४।३५ | पत्ति पंक्ति वाहमे १२९।५३ |
| नो तल्पं भजसे न ३०९।२३ | पञ्चत्व यान्तु बाणा २८५।४५ | पत्ति पत्तिम (कुमार १६ २) १२७।२ |
| नो तावत्कल्याणि ३६१।४६ | पञ्चत्वं तनुत्रेव भू (सु १३५५) २८४।३० | पत्ति पदातिं र (रघु.७ ३७) १२८।२५ |
| नोदन्वानर्थितामे (सु २६६५) १५३।११ | पञ्च त्वानुगमि (भा.५ १०४६) ३७७।२० | पत्यु प्रवृत्तस्य रतौ ३१९।२४ |
| नो धर्माय त (भर्तृ स ५८२) ३७५।२२३ | पञ्चदशीरजनिसमा १८६।१० | पत्युर्यरपतितावशेष (सु ६३९) २३२।९० |
| नोपभोक्तु नच (हि १ ११३) ३८४।२७५ | पञ्चभि. कामिता १५५।११७ | पत्रं नैव यदा क (भर्तृ २ ८९) ९३।९६ |
| नोपभोक्तुमपि क्लीबो (सु २६७६)७१।१५ | पञ्चभि. सम्भृत (हि.४ ७१) ३८६।३५० | पत्रच्छायासु हं (मालवि २ १२)३३७।५६ |
| नोपभोगपरानर्था १६९।७०४ | पञ्चभि सह गन्त १५५।८४ | पत्रपुष्पफलच्छाया (शा प ९७७) २३६।२ |
| नोपभोगो न(काव्या.२ ३२६)३८८।४३५ | पञ्चभिर्याति दास (हि २ ३८)१६३।४७३ | पत्रफलपु (भामिनी अ.२२) २४२।१६० |
| नोपेक्षा न च दाक्षि २११।७ | पञ्चमेऽहनि षष्ठे (शा.प ३१४) ७५।६ | पत्राणि कण्टक (शा.प १०१२)२३९।९२ |
| नोपेक्षितव्यो (सु २७६२) १४९।३१५ | पञ्चसायकमहेन्द्र २७८।३३ | पथि निपति (सूक्ति १७ ६) २२८।२१४ |
| नो मन्ये दृढब (शा प ९३४) २३२।८९ | पञ्चास्यपञ्चदशनेत्र ९१।१६ | पथि पथि लता ३३४।१३१ |
| नो मन्त्रीमयमी (शा प ८२०) २२४।१०० | पञ्चास्यस्य पराभवा (धर्मवि ७) ३७७।४ | पथि पथि (काव्य.प्र ४ २०) ३३३।८५ |
| नो रविनं च (सूक्ति ६८ २०) २९४।१० | पञ्चेन्द्रियस्य म (भा.५.१०४७) ३७७।५ | पदद्वयस्य सधान (सु १४०) ३९।१९ |
| नोर्ध्वं न चा (कुमार १४ ३८) १२८।४१ | पञ्चैतानि विलि १६५।५५५ | पदन्यासो गेहाद्वहि ३५१।३२ |
| नोर्ध्वमीक्षण (कुमार ८ ५६) २९७।११ | पञ्चैते पाण्डुपुत्राः ९५।१२८ | पदप्रणतमालोक्य ३१०।१ |
| नो वा कियन्त २२०।२० | पञ्चैव पूजयन् (भा ५.१०४५) ३७७।६ | पदबन्धोज्ज्वलो हारी ३५।३० |
| नो सलेन मृगा (भर्तृ १ ७७)३८४।२७६ | पटलमम्बुमुचा ३४१।३५ | पदमनन्तरवान्त्वि २०२।८४ |
| नो सध्या समुपासते २०।७४ | पटालमे पत्यौ नमय (अमरु.४१) ३१८।९ | पदव्यक्तिव्यक्ती (सूक्ति ४.३५) ३३।४४ |
| नो सेवा विहिता ६७।६५ | पटविघटितमपि २६५।२८८ | पदशब्दलीनहृद (सूक्ति ४६ ६) २९४।१ |
| नौका वै भजते २४८।८५ | पटुत्वं सत्यवादित्वं (हि १ ९९)१६३।४५२ | पदस्थितस्य पद्मस्य (शा प ४८७) ८६।४ |
| नौका च (शा प दुर्जन १८) ३८८।४३३ | पटु रटति पलितदूतो ९५।१० | पदानि क्रतु (याज्ञ १.३२४) १५०।३४५ |
| नौश्व दुर्जनजिह्वा (कविता.१०) ५४।१४ | पाठक पाठकश्चैव १५८।२५१ | पदाभ्यामुन्नि (प्र राघव २.९) २७१।४४ |
| न्यग्रोधे फलशा २४१।१४७ | पठतो नास्ति मू(शा प.१४२४) १५३।५ | पदे पदे च रत्नानि (वृ चा २ १)१६०।३११ |
| न्यञ्चञ्चल (सूक्ति.९६ १०) २०८।२५ | पण्डिते चैव मूर्खे १५८।२२९ | पदैश्चतुर्भि सुकृते (नै.१ ७) १०५।१२३ |
| न्यञ्चति (भामिनी.शू ४१) २५५।६ | पण्डिते हि गुणा (स पाठो.५३) ३८।१ | पद्माकरं दिनकरो (भर्तृ २ ६५) ७५।१३ |
| न्यस्तं यथा मू(शा प ४११५)३७२।१६६ | पण्डितै सह १५८।२५२ | पद्माकारैर्योधवक्रे १३०।१०१ |
| न्यस्तं पन्नगमूर्ध्नि ३५३।५७ | पतङ्गपाकसमये पत ३३१।८ | पद्माक्षस्रग्दाम(नैषध ७ ४९) ४२६३।२२२ |
| न्यस्तानि (सूक्ति ८६ ५) २६४।२४३ | पतति रविरपूर्ववारि २९४।४८ | पद्मातपन्नरसिके (कुव ९०) ३१३।५५ |
| न्याय खलै (सु ३१७) ५०।२०८ | पतति व्यसने (सूक्ति ११० २३) ४६।२८ | पद्मानना पद्मपलाश १०१।१० |
| न्यायनिर्णीत (किरात ११ ३०) ८५।४ | पततु तवोरसि स (सु २१२०) ३२०।२ | पद्मापयोधरत (गीत.१ २.१०) १४।१८ |
| न्यायार्जितधनस्तत्त्व ८९।१ | पततु नभसो गच्छ २०९।१४ | पद्माया स्तनहेमसद्म १६।१२ |
| न्याय्यं मार्गमनु (सु ५३९) ७१।४३ | पतत्यविरतं वारि नृत्य (कुव ११४)३४०।७ | पद्मा सद्मनि केशवस्य १११।२६५ |
| प | पतलेत्तत्तेजो (नैषध १२.४६) १३५।३१ | पद्मिनि किमिति २४४।२१४ |
| पकानि प्रच्यवन्ते १४२।१४ | पतन्ति खङ्गधारासु (शा प ३४३) ६५।४ | पद्मिन्या सकला ३२४।४९ |
| पकाक्षमिव (सु २७६६) १४४।८० | पतन्ति नासि (किरात ४.२३) ३४४।१९ | पद्मिन्या दयितेऽनु ३२१।१०९ |
| पक्षविकलश्च (मृच्छ.५ ४१) ६६।३३ | पतन्ति व्यसने दैवात् ४५।२८ | पद्मे त्वन्नयने स्म (कुव.२०) २४।१५८ |
| पक्षावुत्क्षिप्य धुन्व (सु.२४१८)२०८।२६ | पतिते पतद्द्मृगराजि २९७।१४ | पद्मे मूढजने ददा ६३।३४ |
| पक्षिभ्रेष्ठसखीबभूवुरा १९८।३ | पतितोऽपि राहुव (शा प.४८०) ४७।९२ | पद्मोदयदिना (सा.द १०.३०) १०३।५८ |
| पक्ष्माग्रग्रथि (सूक्ति ३९ ११) २८६।२० |
| ४६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| पन्था सङ्कर दीर्घ | ११७।८८ | परार्थव्यास (भामिनी अ ७४) | ५२।२४६ | परोपकार कर्तव्य (पाञ्च उ २२) | ७४।१ |
| पन्नगधारिकराग्रो गङ्गो | १३।४ | परार्थानुष्ठाने जड (मुद्रा ३ ४) | १३९।३ | परोपकारविज्ञानमा (सु २३१६) | ५६।९६ |
| पपात गङ्गा हरमौलि | ३२१।५ | परार्थे य (शा प १०१२) | २४२।१७९ | परोपकारशून्यस्य (शा प १४७८) | ७४।७ |
| ‘ पपात पाथ कणि | २१२।२९ | परीक्षणं कश्चि (भर्तृ २ ३७) | ६५।१५ | परोपकाराय फल (विक्रम ६६) | ७५।१० |
| पपात मेरो सुरसिं | ३२१।४ | परिचरितव्या (भर्तृ २ १०८) | ३८६।३४८ | परोपकृतिकैवल्ये लोल | ७४।५ |
| पम्पासरसि रामेण | १९३।५ | परिचुम्बति स (शा प ३७८५) | ३३१।५ | परोपदेशकशला दृश्यन्ते | ८४।४ |
| पयःपीठं दत्ते त्वरि | ३५७।५२ | परिच्छिन्नस्वादोऽमृत | ३१।४० | परोपदेशवेलाया | १५६।१५९ |
| पयसि सलिल (शिशु ११ ४५) | ३२७।१४ | परिच्छेदती (मालती १ ३३) | ३७५।२४७ | परोपदेशे पाण्डित्यं (हि १ १०३) | ४५।२६ |
| पयोदकेशेषु विक्रु | २४७।१५ | परिच्छेदो हि (हि १ १५०) | १६३।४५५ | परोपसर्पणानन्त (भामिनी अ ८४) | २३६।५ |
| पयोद हे वारि (उत्त.चातक ६) | २१२।३५ | परिच्युतस्तत्कुच(रत्ना २.१४) | २८३।१५७ | परोऽपि हितवा (सु २७०५) | १५६।१५२ |
| पयोधरघनीभाव | २६४।२५३ | परिणयविधौ भङ्क्त्वा | २०।८० | परोऽप्यपत्यं(भाग ७ ५ ३७) | ३८७।४१३ |
| पयोधरस्तावदय | २६७।३५' | परितप्यत एव (शिशु १६ २३) | ५९।२०१ | परोऽवजाना(किरात १४ २३) | १७४।९०३ |
| पयोधराकारघ (शा प.३९२७) | ३४६।३४ | परितोषयिता न(शिशु १६ २८) | ५९।१९७ | पर्जन्य इव भूता (शा प १८८३) | १४२।४ |
| पयोधे सर्वस्वं शिर | २१७।५७ | परिपतति पयो (शा.प ३५८८) | २९४।४५ | पर्यङ्क खास्तर (शा प ३७६६) | ३५२।३ |
| पयोमुच प (काव्या २ १७३) | २८८।४३० | परिपीड्य करद्वयेन | २४६।३७ | पर्यङ्कग्रन्थिबन्धद्वि (मृच्छ १ १) | ८।११२ |
| परं क्षिपति (भा.५ १००७) | ३८६।३४५ | परिपूर्णगुणाभोगगिरि (सु ५०५) | ७०।१७ | पर्यङ्कीकृतनागनायक | १५।३६ |
| परं तदिह नास्ति | २४२।१६६ | परिपूर्णेऽपि तटाके | ५६।१२३ | पर्यङ्को राजलक्ष्म्या | ११८।११० |
| परं पलितकायेन | १६५।५६० | परिमन्थरा (शा प ३९१४) | ३४५।५० | पर्यच्छे सरसि (शिशु ८ ४६) | ३३९।१०३ |
| परं विनीतत्वमुपै (भाव ४ ३) | १५२।४०० | परिमन्थराभि (शिशु ९.७८) | ३११।१० | पर्यत्तपुष्पस्तबक | ३३१।३४ |
| परकाव्येन क(राजन ५ १५९) | ३९७।४२२ | परिमलसुरभित (शा प ९९०) | २३७।३९ | पर्वतभेदि पवित्रं जैत्रं | ९।१२३ |
| परगुह्यगुप्ति (भामिनी अ ८७) | ५७।१३९ | परिमृदितमृणा (मालती १ २५) | २७५।२५ | पर्वताग्रे रथारूढो | १८५।२७ |
| परदारपरद्रव्यपर (शा प ६६७) | १५४।४६ | परम्लानं पीन (रत्ना.२ १२) | २७५।२७ | पर्वताग्रे रथो याति | १८५।१९ |
| परदारं परद्र (स पाठो ५४) | १६१।३४९ | परम्लाने माने मुख (अमरु २५) | ३१०।४ | पलायिता तवारि | ११८।१०१ |
| परदारा न गन्त (सु २९) | १५४।४४ | परिलुठति ललाटे | ३०६।३६ | पलाशकुसुमभ्रा (कुव २५) | २२२।४३ |
| परदु खं समा (राजन १ २२७) | ४७।८१ | परिशिथिलित (शिशु ११ ११) | ३२३।२५ | पल्लवत कल्पतरोरे (कुव ५७) | १०३।७९ |
| परपतिनिर्दयकुल्टा | ३५१।२६ | परिशुद्धामपि वृ (शा प ३५५) | ५७।१३० | पल्लवोपमितिसा(शिशु १०.५३) | ३१७।१५ |
| परपरितापनकुतुकी | ५८।१५७ | परिश्रमज्ञ जनमन्त (सु १९५) | ३८।२१ | पल्लीनामधिपस्य पङ्क | ३५७।३९ |
| परभृतशिशो (सूक्ति १४ ९) | २२५।१३८ | परिसुरपतिसू (किरात.१० २०) | ३४०।२२ | पवनापनीतसौरभद्गदो | २२२।६० |
| परमर्मघट्टनादिषु (सु ४०३) | ५८।१७८ | परिस्रुरन्मीन (किरात ८ ४५) | ३३८।८८ | पवित्रमतिसूक्तिकू | २०३।१०५ |
| परमर्मदिव्यदर्शिषु (सु ३९२) | ५७।१३९ | परिहर कृता (गीत.१० १९ ३) | ३०६।४९ | पश्चादङ्गी प्रसार्य (सु २४२०) | २०७।१३ |
| परमो महत्स (शा प ७९३) | २१४।३ | परिहरत पराङ्गना | १७५।९४१ | पश्यति परस्य युवति | १७१।७८० |
| परवादे दशवदन.-(सु ३८९) | ५७।१२९ | परिहरति भयात्तवा | २०१।६८ | पश्यन्ति नैव कवयो | १७६।९६१ |
| परश्लोकान्स्तोकान (सु १७९) | ४१।६० | परिहरति यथा य(भाव ३.११) | २५५।१५ | पश्यन्ति स्निग्धमुग्धं | ३५४।६५ |
| परस्परानु (शा प १९२९) | १५०।३५० | परिहरति रतिं मतिं | २९३।२ | पश्यन्तीं परिणामके | ३२०।४६ |
| परस्परेण (रघु ७ ५३) | १२८।३६ | परिरुह्य दुरारोहं | २६७।३३१ | पश्यन्नन्यसख्यपथगा | १०२।३८ |
| परा विनीत (काम नी १ ६५) | ३७८।४६ | परीक्ष्य सत्कुलं वि (शा प ४०५) | ६५।४ | पश्यन्हतो (सूक्ति ५३ ८०) | २६९।३९६ |
| परागै कर्पूरैरस्तृहि | २८०।७१ | परीवादस्तथ्यो (लक्ष्मणसेन) | १७७।९७७ | पश्य पकफलिनीफ | २९९।२६ |
| पराधीनं वृथा | १६०।३२८ | परेषा क्लेशदं (शा प १५१३) | १५४।६८ | पश्य पश्चिमदिगन्त | २९४।१३ |
| परावरं प्राप्य दुर्बुद्धे (सु.२३११) | ३६३।३ | परेषा चेतांसि (भर्तृ ३ ६२) | ३६८।४५ | पश्यानुरूपमिन्द | २४१।१५७ |
| पराङ्गेन मुखे दग्धं(वृ चा ४ २३) | ९८।३ | परेषामात्मन. (पंच ३.८७) | ३७७।२१ | पश्याम किमिदं (अमरु २०) | ३११।२४ |
| परापकारनिरतै | १६८।६५९ | परै प्रोक्ता गुणा यस्य | ८३।१ | पश्यामि तामि (मालती १.४३) | २७८।४९ |
| पराभवं परिच्छे (हि २ १५०) | १६४।४९० | परै समुन्न्यते रा (हि २ १७६) | १३९।१ | पश्यैकश्चिञ्चलचपल | १३२।२३ |
| परामृशन्तो लिङ्गानि | ४३।१ | परोक्तमात्रं (वृ. चा ४ ४९) | ३८१।१७२ | पश्योदञ्चदवाञ्चदञ्चित | २०७।३ |
| परोक्षे कार्यहन्तारं (स.पाठा.५४) | ८८।१ | पश्योदेति वि (प्र राघव ७.५९) | ३०१।९१ |
| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ४७ | |
|---|---|---|
| पाकश्वेभ्र शु (राजत ३ ३०३) ६२।२७४ | पाथोदजालजटिलं ३४४।६ | पारीन्द्राणा धुरीणैरवनि १२६।३१ |
| पाटलया वन (शा प १०१४) २३९।९७ | पादन्यास (सु ५६१) २१०।३३ | पार्वतीमोषधीमेकमपर्णा ११।२ |
| पाटीर तव प (भामिनी अ ११) २३७।४३ | पादपाना (स पाठो.५४) १६२।४१४ | पार्श्वस्थपृथ्वीधरराजकन्या ४।२९ |
| पाठीन कमठ (शा प १३३) १७।३ | पादसवाहने वज्री २५१।१७ | पार्श्वभिया (शा प ३५०५) २९३।१ |
| पाणि पात्रं प (शान्ति ४ ७) ३७१।११३ | पादस्याविर्भवन्ती (मुद्रा १ २) १०१।५४ | पार्श्वस्फिाला (शा प ५८७) २०७।१९ |
| पाणिग्रहे पर्वतराज ४।२८ | पादा कन्दुकवत्स्थि १४३।५७ | पाशक्षुण्णखुरस्य २३४।१२३ |
| पाणिग्रहे पुलकितं वपु ४।१६ | पादाग्रस्थितया (सूक्ति २ ३८) १२।३८ | पाश्चात्यभागमिह (शिशु ४.२२) ३६३।१८ |
| पाणिग्राहस्य सा (म ५ १५६) ३५१।१७ | पादाघातविघूर्णिता (सु ६३५) २३२।८६ | पाश्चात्याम्बुधिदृष्टपूर्व २९५।६४ |
| पाणिपल्लवविधूत(किरात ९ ५०)३१८।१० | पादाङ्गुष्ठेन (अमरु परि १३६) २८१, २१ | पाश्चात्यैर्म (शा प १८३१) ३३६।२७ |
| पाणिरोधमविरो(शिशु १० ६९)३१८।१२ | पादसक्ते (अमरु ६८) ३०७।५२ | पाषाणखण्डे (शा प ४०९९) ३६७।२३ |
| पाणिर्नीरवरूक्षण स्तन २९१।९५ | पादस्त एव ३१३।५८ | पाषाणा पयसि १८३।६२ |
| पाणौ कङ्कणमुत्पर्गं (शृं ति ३ २) ७८९ | पादाहृत यदुत्थाय (शिशु २ ४६) ७९।५ | पाषाणो भिद्यते ५५।४५ |
| पाणौ गृहीतापि पुर ३५२।२२ | पादाहतोऽपि (शा प ३६१) ६०।२३७ | पास्यन्ति कस्य कुसुमे २४१।१३४ |
| पाणौ ताम्रघटी (सूक्ति ८९ ७) ३६५।४९ | पादेन क्रम्यते १५९।२७१ | पिकस्तावत्कृष्ण ८५।१२ |
| पाणौ पद्म (सूक्ति ६५ ४०) ३३४।११९ | पादे मूर्धनि (शा प ३५६९) ३१०।७ | पिका गी वाचालीभवति २८५।२६ |
| पाणौ मा कुरु (सु १३१३) २८२।१३८ | पादौ सस्तम्भयन्ती ९६।४८ | पिण्डे पिण्डे १५९।२६५ |
| पाण्डित्यस्य विभूष (सु ३०५४) ८४।२३ | पान दुर्जनसंसर्ग (म ९ १३) १६६।५७६ | पिता (गरुड पू अ ११५) १६६।५७५ |
| पाण्डु क्षामं वदन(काव्यप्र ७ १५)२८५।२ | पानं स्त्री (भा १२.५२७२) १४८।२३८ | पिता रत्नाकरो यस्य(वृ चा १७ ५)९१।२० |
| पात पूष्णो (भट्ट. १०) २०९।१३ | पानधौतनवया (शिशु १० २६)३१५।२९ | पिता रत्नावार शुचिसह ९३।१५ |
| पातकानां समास्ता १४७।१५७ | पानमक्षा (शा प १३८९) १४६।१६४ | पिता वा (पंच १ ४५७) १४७।२२१ |
| पात जले विष्णुपदापगा ४२।५ | पानायावरतोऽमृत २७२।६२ | पितुरधिपुर लङ्का ३२९।९२ |
| पातयति हृदयदेशे २७५।८ | पानीय (भा १२ ४११४) १६३।४५६ | पित्रो पादाब्जे १०१।४७ |
| पातालत. किमु (शा प ४०८०) ३६६।२ | पानीयं (शा प ३८०७) ३३५।१३५ | पित्रोर्निंल प्रियं १६७।६१८ |
| पातालमिव ते नाभि ३१२।१० | पानीय पातु (शा प ५३०) १८।४२ | पित्रोर्नैव वच शृणोति ९०।१२ |
| पातालाङ्गुवनावलो २७४।२४ | पानीयमानीय २१२।२८ | पिदधाति (शा प ३६०१) २९७।१३ |
| पातालाच्च विमो (शा प २५७) ८०।४४ | पान्तु वो (शा प ११३) २२।१०१ | पिदधानमन्वयुपग (शिशु ९ ७६)३१०।८ |
| पाताले मज्जु मूलं १२१।१६१ | पान्थ मन्दमते २५४।६८ | पिनष्टीव तरंगाग्रै (कुव ३५) २९९।४ |
| पातितोऽपि करा (भर्तृ २ ८३) ४५।३० | पान्थाधार इति (शा प ९८३) २३६।२१ | पिनाकफणिभालेन्दुभस्म (शा.प ६३) ३।६ |
| पातुं त्रीणि जग (शा प ४०१७) १८।३१ | पान्थाना प्रमदा ३३७।५६ | पिपासाक्षामकण्ठेन २२६।१४९ |
| पातु न प्रथम व्यव (अ शा ४ ८) ३६३।३९ | पापं समाचरति (सु २७२) ५०।२१० | पिपासुरिव चञ्चलं २६०।१११ |
| पातु श्रोत्ररसायनं (सूक्ति ४ ९९) ३६४।४३ | पापं कर्तुमृण कर्तुं ९८।२ | पिपि प्रिय (शा प.३६५१) ३१६।६७ |
| पातुमाहितर (किरात ९ ५१) ३१५।४३ | पापान्निवारयति (भर्तृ २ ६४) ८८।१८ | पिपीलिकार्जितं धान्यं १५५।१०१ |
| • पातु व कपटकैरळके १८।२७ | पामारागाभि (सूक्ति ९८ १) १९४।१७ | पिबतस्ते (शा प ५३८) १९५।४२ |
| पातु व शिति १०१।४४ | पार्यं पाय पिव (शा प ११५१) २२०।३ | पिबन्ति नद्य ४९।१७० |
| पातु वो निकषग्रावा ३।४ | पायात्पयोधिदुहितु (शा प १३४) १६।२ | पिबन्ति मधु (सु ६९०) ९१।८ |
| पातु वो (मृच्छ १ २) १०१।४२ | पायात्स व (सु.४८) १६।४५ | पिब पय (शा प १२११) २३५।१५६ |
| पातु वो मेदिनी (सु ३०) १८।२४ | पायादायासखे १०१।५७ | पिब स्तन्यं (भामिनी अ ५८) २३०।३६ |
| पातु श्रीस्तनपत्र १८।३२ | पायाद्गजेन्द्रवदन (सु ८०) २।२३ | पिशुन खलु ५८।१६२ |
| पात्र न तापयति ९०।१३ | पायाद् करणोऽरुणो २०६।१८ | पिशुनत्वमेव विद्या ५७।१५२ |
| पात्रं पवित्रयति (सु ३२४) ५१।२१६ | पायाद्दो जमदग्निवश २०।७२ | पीठा कच्छपवत्तरन्ति ६८।७८ |
| पात्रमपात्री (शा प ३७०) ८८।९ | पायान्मायामृगेन्द्रो १९।५८ | पीठीप्रक्षाल (शा प.४०२८) ३६५।५५ |
| पात्रविशेषे (भा.१३ १७७) ८६।७ | पारिजाततरु यावन्न २३७।३८ | पीठे पीठनिषण्णबालक २४।१५७ |
| पात्रापात्र (सु २९७५) १५७।२०३ | पारीन्द्रशावक न २३०।३० | पीडिते पुर (शिशु १० ४६) ३१६।६ |
| पात्रे त्यागी गुणे (प्रसगा ४) १४२।१२ | पारीन्द्रस्य (धर्मवि.८) १८३।५९ | पीतं येन पुरा पुरन्दरपुरे २३२।३७ |
| ४८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| पीतं यत्र हिम (शा प ९२१) २३२।८३ | पुमासो ये हि (भाव १ ४०) ३९०।५०६ | पूरयित्वा (शान्ति. २.२१) ३६७।१२ |
| पीत पङ्कजकानने २२४।११४ | पुर पूर्वमिव (रत्ना ३ ७) २०१।२८ | पूरोत्पीडे तडा १५६।१६६ |
| पीत क्रुद्धेन (वृ चा १५ १६) ३८७।४१७ | पुर स्थित्वा (सूक्ति ४१ १२) २७३।१४ | पूर्ण पङ्कज २११।४८ |
| पीतमत्र मधु यापिता २२३।६९ | पुरत कृच्छ्र ३९०।५१० | पूर्णचन्द्रमुखी १९६।१४ |
| पीतवल्यभिमते (शिशु १०.९) ३१४।१२ | पुरत प्रेय्यलाशा ७३।१६ | पूर्णनखेन्दुद्विगु ९१।३५ |
| पीतशीधुमधु (शिशु १० ११) ३१५।१४ | पुरंदरमहस्त्राणि (सु ३३०९) ३७३।१९० | पूर्णापूर्णे (पच १ १७) ३९३।६२९ |
| पीतस्तुषार (अमरु १२०) ३१६।६६ | पुरस्तन्व्या (अमरु ५१) ३५७।५३ | पूर्णेन्दुमा (माकडेय २७.२५) ३९३।६३१ |
| पीतस्त्वं कलशोद्भवेन १८३।६५ | पुरस्ताद्रच्छन्ती २८०।७८ | पूर्णेन्दु कर १३७।५५ |
| पीतोऽगस्त्येन तातश्वरण ६४।४३ | पुरा कवीना गण (कुव १६४) ३५।७ | पूर्णे शतसहस्रे (शा प ३९८५) ३६०।८ |
| पीतो यत. (अमरु १३०) २७९।५७ | पुराण (सूक्ति ५३ १३) २६०।११४ | पूर्वं तावत्कुवलय (शाति ४ १६) ३६९।६३ |
| पीत्वा गर्जन्त्यपस्ते २१७।३९ | पुराणमित्येव (मालवि १ २) १७४।८९३ | पूर्वं द्विरेफ (सूक्ति ६५ १२) ३३४।११६ |
| पीत्वा भृश (सूक्ति ८२ २८) ३२३।१५ | पुराणरश्मि २९३।३ | पूर्वं चेटी ततो (शा प ४०५२) ३६४।४ |
| पीनोत्तङ्ग (शा प ३९३९) ३४७।१४ | पुराणान्ते १५८।२३२ | पूर्वं यत्र सर्व २९३।५ |
| पीनोत्तुङ्गस्तनकलशयो २७६।४२ | पुरातनपरीमल ३२६।२१ | पूर्वजन्मकृतं कर्म (हि प्र ३२) ८२।६ |
| पीयूष वपुषोऽ (शा प ७६१) २१०।३६ | पुराभूद (शा प ३५५८) ३१३।६५ | पूर्वजन्मजनितं ८३।१९ |
| पीयूषाश्रयणं (सूक्ति ७२ ३०) ३०२।९७ | पुरा विद्वत्ता (भर्तृ ३ १००) ३७८।४२ | पूर्वत्रासिद्ध १२१।१६४ |
| पीयूषेण कृतार्थिता २१७।३६ | पुरारितनुहारिणी १२।२४ | पूर्वदत्ता च १५८।२२४ |
| पीयूषेण सुरा श्रिया २१७।३४ | पुरा शर (शिशु १७ ५५) १२७।४ | पूर्वभागतिमिर २९४।१६ |
| पीलूना फलव (शा प.९५६) २३४।१३६ | पुरा सरसि (भामिनी अ २) २२१।२६ | पूर्वा क्षणक्रम ३९५।५२ |
| पुंस सबोधन (शा.प ५५२) १९८।४२ | पुरीषस्य च ४५।१ | पूर्वाह्ने प्रतिबोध्य २०९।१७ |
| पुंसा दर्शय सुन्दरि १६२।१७४ | पुरुष कीदृशो १९९।३१ | पूर्वे वयसि (भा १३ १७८८) ३८७।४१५ |
| पुंसा सर्वसुखैक १४५।१९२ | पुरुष पौरुष ९१।२७ | पृच्छति पुरुष २००।४६ |
| पुसामुन्नत (सूक्ति ७ ५) ७०।१३ | पुरुहूतदिगङ्गना (सु २२२०) ३२७।४ | पृच्छति शिरसिरुहो २०१।६९ |
| पुंस्कोकिलकुलसैते १९४।१४ | पुरो (भामिनी अ ७९) २४५।११ | पृथिवी दह्यते (सु ३३०८) ३७२।१५४ |
| पुच्छं चेदहमुन्नयाम्य १७।१२ | पुरोजनमा नाय(महा ना १ ४७)३६०।३३ | पृथिवी रत्न (भा १ ३१७५) ३९०।५३४ |
| पुज्यमानानरुण १८२।३३ | पुरो दिगनुरा ३०६।४० | पृथिव्या त्रीणि (वृ चा १४ १) २९।६ |
| पुञ्जीभूतं प्रेम २२१।२४ | पुरोन्नम पक्षा (सूक्तिसङ्घ) २०७।११ | पृथुकार्तरस्वर (सूक्ति. १२७ ४) ६६।३५ |
| पुण्यतीर्थे कृतं (हि १७) ९०।६ | पुरो रेवापारे (नीतिरत्न ५) ३७८।६८ | पृथु गगन (सूक्ति ६८ ६) २९५।५४ |
| पुण्यान्नौ (सूक्ति ६४ १२) ३४८।२० | पुरो वा पश्चाद्वा ८०।३३ | पृथुवर्तुलतन्नि (नै २ ३६) २६८।२७७ |
| पुण्ये ग्रामे वने (भर्तृ ३ २४) ३७९।७६ | पुष्पं पुष्पं (भा ५ ११११) ३८८।४४९ | पृथ्वी तावन्त्रि ३५४।६६ |
| पुण्यैर्मूलफलै (भर्तृ ३ २७) ३७०।८५ | पुष्प प्रवा (शा प ३३१८) २६१।१४८ | पृथ्वीपते शुभ १३५।२० |
| पुत्र (शान्ति २ १०) ३७०।९४ | पुष्पाणि प्रथमं ३३३।१५ | पृथ्वी पृथ्वीगुणा (सु ५०२) ७०।१६ |
| पुत्रदारादि (शान्ति २.२५) ३६७।१३ | पुष्पे गन्धं (वृ चा ७ २१) ३९०।५१५ | पृथ्वी श्रीमदनङ्ग(शा प १२६०)११३।५ |
| पुत्रपौत्र (चाणक्य. १०७) १४४।७७ | पुष्पेषुमाता पुरुषा १९०।७० | पृथ्वीसबोधनं १९६।६ |
| पुत्रपौत्रवधू १५६।१३२ | पुष्पेष्वोरभिषेक (सु १५४६) २६५।२९३ | पृष्टो ब्रूते न १४२।२९ |
| पुत्रप्रयोजना (चाणक्य ५३) १६१।६८५ | पुष्पैरपि न (शा प १२९८) १५०।३२६ | पृष्ठत (हि २.३४) १६३।४७२ |
| पुत्रमित्रकल (वामन. अ ७७) ३६७।२ | पुस्तकस्था (चाणक्य ८३) १६२।४१३ | पृष्ठे श्राम्यद (सु.३६) १८।२० |
| पुत्रसू पाक १५७।१९४ | पुस्तकेषु च (हि प्र ३८) ३९।१५ | पृष्ठे कञ्चुकमुत्कल्यै ३१।८७ |
| पुत्रिण्य कति २३६।५ | पुस्तकप्रत्यया (वृ चा १७ १) ३९०।५१८ | पेटीचीवरपट्टवस्त्र ४१।७३ |
| पुन प्रभातं ३७४।२१० | पुस्तकेषु च या १५९।२६९ | पेशलमपि खल ४८।१२५ |
| पुनरपि मिलनं २७८।२८ | पूजाया कि पद १९८।१ | पोतो दुस्तर (पंचरत्न. २) ६१।२६४ |
| पुनर्वित्तं पुनर्मिं(वृ चा १४ ३) ३८७।४०९ | पूज्यो बन्धुरपि(पच १ २४०) ३७८।५१ | पौर सुतीयति १०५।१४७ |
| पुनर्दांरा पुन (वृ चा १४ ४) ३८५।३३९ | पूतिपङ्कमये (सूक्ति ९८ ९) १९८।२९ | पौरस्त्यैदर्दाक्षि (शा प ११०८) २१८।७२ |
| पुन्नाम्नो नर (भा.१ ३०२६) ३८९।५०१ | पूरयति पूर्णमेषा ६२।१७ | पौराणिकाना व्यभि ४४।१ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| पौरैर्भ्यो न भयं ६८।७५ | प्रणालीदीर्घस्य (विद्ध ४ १४) २६०।१०८ | प्रत्युपकुर्वे (भा १२ ४९९३) ८०।२९ |
| पौलस्त्य. (पच. २.४) १७९।१०२४ | प्रणीतक्षा (शा प १३१४) ३९२।६०० | प्रत्युपस्थित (मा.१२ ५२८०) ३७८।५९ |
| पौलस्त्यपीनभुज (दश रू ४ २८) ११।२० | प्रतापभीत्या (भोजप्र १९५) ११७।७७ | प्रत्यूह पुलका ३२०।४७ |
| पौलोमीकुच ३०२।१३३ | प्रतिकामिनीति (शिशु ९ ३५) ३००।६० | प्रत्यूहू (हि ३ ४५) १६६।५६८ |
| पौलोमी (भामिनी. अ. ४४) २४५।२४२ | प्रतिकूलता (शिशु ९ ६) ९२।७० | प्रत्येकं दिक्प १८४।७६ |
| प्रकटमपि न (सु.४३५) ५९।२०९ | प्रतिक्षणमय (हि ४ ६६) ३९२।५९७ | प्रथम कला (शिशु ९.२९) ३००।५४ |
| प्रकटं (शिशु १६ १९) १७५।९२४ | प्रतिक्षणसमुल्ल (शा प ३६६७) ३१७।३ | प्रथमं युद्धकारित्व (हि ३ ८६) १४३।६० |
| प्रकटमलिन (शिशु ११ ३०) ३२२।११ | प्रतिगतमर्थि (शा प.३८२५) ३३५।३ | प्रथमं संस्थिता (भा १ ३०३३) ३७८।६० |
| प्रकटान्यपि (शिशु १६ ३०) ४९।१५३ | प्रतिगृहकोणं १७०।१४४ | प्रथमदिवस १७७।९७५ |
| प्रकाममभ्यस्यतु ४९।१६५ | प्रतिदिनमयलसुलभे (भर्तृ स ६०७) ९६।१ | प्रथममन्यमृता ३३२।४४ |
| प्रकीर्ण (काम नी १ २५) ३९०।५२२ | प्रतिदिवस (पच ५ ४) ३९२।६२७ | प्रथममरुण (सूक्ति ७२ ४) ३०१।८५ |
| प्रकुप्यत्प्र (राजत ६ २७८) ३९०।५२३ | प्रतिदिशमभि (किरात १० ०१) ३४०।२३ | प्रथमवयसि (विक्रम ९१) ५१।२२० |
| प्रकीर्णकेशामन १७४।९०० | प्रतिनगरमटन्ती १३५।२३ | प्रथमा गति (र २ ६०) ३८०।१३९ |
| प्रकुर्वता सगति २१।०२० | प्रतिपक्षेणापि (मालवि ५ १९) ३५१।२२ | प्रथमे ना (चाणक्य. ९३) ३७८।६१ |
| प्रकृति (हि ३ १४४) १४५।१२७ | प्रतिपक्षो यदि २६५।२६९ | प्रथितोऽसि यत २१।२३० |
| प्रकृतिखलत्वाद (सु ४१३) ५८।१८६ | प्रतिबिम्बितगौरीमुख ४।२३ | प्रदह्यमाना (शा प ३७५) ३९०।५३७ |
| प्रकृतिप्रत्ययो ४६।५० | प्रतिबिम्बितप्रिया १।४९ | प्रदान प्रच्छन्नं (भर्तृ २.५४) ५२।२४९ |
| प्रकोष्ठबन्धे २६४।२३७ | प्रतिरजनि प्रति (शा प.३७६०) ३५१।२० | प्रदीप किमु २४७।६६ |
| प्रखला एव गुण (सु.३९७) ५८।१७३ | प्रतीक्ष्यन्ते वीरा १३१।११४ | प्रदोषमातङ्ग ३०४।१४८ |
| प्रगल्भाना (शा प ३२८१) २५५।२८ | प्रतीप (कथास ३१ ८७) ३९२।५८९ | प्रदोषे दीपकश्चन्द्र १५८।२१५ |
| प्रचण्डचण्डमुण्ड ११।२३ | प्रतीपभूपैरिव (नै १ १३) १०५।१२७ | प्रदोषे (चाणक्य ९९) १६२।४२४ |
| प्रचण्डवासनावा ३६७।९ | प्रतीयमानं पुनर (सु १५७) ३३।३४ | प्रधानाध्वनि १०३।७५ |
| प्रचण्डसूर्य. ३३५।७ | प्रत्यक्षरक्षुत १०५।१४० | प्रबुद्धाया प्रातलं ३२८।३ |
| प्रजा न (पच. ३ २४९) १४५।१२१ | प्रत्यक्षे गुरव १५९।२७३ | प्रभव को १९६।११ |
| प्रजां सर (काम नी १ १२) १४५।११७ | प्रत्यग्रज्व (सूक्ति ८२ २७) ३२५।५९ | प्रभव. खलु (किरात २ १२) १५१।३९० |
| प्रजाना धर्मसङ्घ (वे २७) १४९।३०० | प्रत्यस्मै पत्रनिश्चयै (सु ७८४) २३६।३ | प्रभवति मनसि (प्रब ७) २५१।१८ |
| प्रजाना (पच १ २४०) १४९।२९० | प्रत्यग्रोन्मेष (मुद्रा ३ २१) १५।४९ | प्रभाते पृच्छन्ती ३२८।१३ |
| प्रजापीडन (याज्ञ. १ ३४०) १४५।१२३ | प्रत्यङ्गमङ्कुरित (प्र राघव १ ७) ३२।१ | प्रभुप्रसाद (पच १ ५५) १४८।२६२ |
| प्रजावृद्ध धर्म (मा.५ १५५) ३७७।३० | प्रत्यङ्गर्णं प्रति २२८।२१२ | प्रभुप्रसादे (शा प १५२०) १५४।७४ |
| प्रज्ञया (मा ३ १४०७९) ३८१।१६० | प्रत्यङ्गमस्यामभि (नै ७ १९) २७०।२३ | प्रभुभि पूज्यते(भोजप्र.६८) ८१।१९ |
| प्रज्ञया वा विसारण्या ९०।३ | प्रत्यार्थिवामनयना १३३।८ | प्रभुर्विवेकी धन १७३।८५१ |
| प्रज्ञागुप्त (भोजप्र १५) १४५।१३६ | प्रत्यहं प्रत्य (शा प १४२१) १५३।२ | प्रभूतमल्प (चाणक्य ६७) १६२।३९८ |
| प्रज्ञातृतीयोग्रवि १२३।२ | प्रत्याख्याने च (हि १ १३) १६३।४३७ | प्रभूतवयस (वृ श. २३) १६९।६८० |
| प्रज्ञावास्त्वे(मा ३ १५३८३) ३८९।४९७ | प्रत्यादिष्टविशे (सूक्ति ४२ ५) २७४।७ | प्रश्रश्यच्युति ११२।२६७ |
| प्रज्ञाशरेणा (मा ५ १३९१) ३९३।६३९ | प्रत्यावासक १०९।२१४ | प्रभ्रष्टै सरभ (शिशु ८ ४९) ३३९।१०६ |
| प्रणतिमिरपि ३४३।१०२ | प्रत्यावृत्तं (शिशु १८ ५५) १३०।८६ | प्रमदा मदिरा १६०।३२५ |
| प्रणमत्युन्नति (हि २.२७) ९७।१४ | प्रत्यावृत्य यदि ३५६।२८ | प्रमाणाभ्यधिक(पच १ ३१८)३९०।५३० |
| प्रणयकुपितप्रिया ४।२० | प्रत्यासत्ति (राजत.४.३५४) ३७७।२७ | प्रमादिना (पच १ १६७) १४९।२८६ |
| प्रणयकुपिता दृष्ट्वा (दश रू ४.६०) ५।४४ | प्रत्यासन्नतुषारदीधिति १४१।९ | प्रमोदं जनय १९५।५२ |
| प्रणयकोप (शिशु ६ ३८) ३४१।४४ | प्रत्यासन्न (सूक्ति. ६५ २६) ३४२।७७ | प्रमोदे खेदे ४४।५ |
| प्रणयमधुरा (भर्तृ सं २७३) ३९१।५८६ | प्रत्यासन्नविवा (सूक्ति २.३७) १२।२८ | प्रम्लाना (सूक्ति. १५ ७) २२२।३५ |
| प्रणयादुप (हि. ४ १०) ३९१।५५० | प्रत्यासन्नसुरेन्द्र ३२५।५८ | प्रयच्छति चम (सु १९०) ३१।३७ |
| प्रणिपातेन (काम नी.३.३२) ३९२।५९१ | प्रत्यासन्ने (शिशु १८ २८) १२९।७० | प्रयच्छतोञ्चै कु(किरात ८.१४)३५७।४५ |
| प्रत्युपकुर्वन्मूर्ख (सु.५१५) ७०।२४ | प्रयत्ने समके (वृ. श ७०) १६९।७०२ |
७ सुभा०अनु०
| ५० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| प्रयत्नै रस्तोकैः परि | ४३।६ | प्रहरति न पञ्च (शा प ५०६) | १८४।५ | प्रातर्नीलनिचोलमच्युत | २५१।७५ |
| प्रयाणे तव | १२५।१ | प्रहरविर (अमरु १२) | ३२९।११ | प्रातर्मूत्रपुरीषा (सु ३३३६) | ३६७।१९ |
| प्रयाति शमनं (पञ्च ३ ३१) | ३९१।५६३ | प्रहरिष्यन्प्रियं (शा प १४२९) | १५३।८ | प्रातर्हन्त कृतापराधोऽपि रज | ९९।२८ |
| प्रयातुमस्माक (नै १ ६९) | १२३।४ | प्राकारगोपुरा (शा प १५६५) | १४३।३८ | प्रातिभ त्रिसर (शिशु १० २२) | ३१५।१५ |
| प्रयातेऽस्तं भानौ (सु १०९०) | २७५।२८ | प्राक्पादयो (हि १ ८१) | ६०।२३५ | प्राथमिकी घनवृष्टि प्राप्ता | २१४।४ |
| प्रयाहि तत्रैव | ३०९।२ | प्राकृतो हि (भा १२ ४२१७) | ३८९।४७२ | प्रादुर्भवन्ति वपुष (प्रब ९३) | ३७१।१२९ |
| प्रयोगव्युत्पत्तौ प्रति | ३४।१ | प्रागल्भ्यं पुरुषा | ३०१।२१ | प्रादुर्भूते नवजलधरे त्वत्पथं | २८९।५६ |
| प्रयोजनेषु ये (भा ५ २४४१) | ३८०।१४२ | प्रागल्भ्य प्रयय | २४८।७६ | प्रादुष्यातपण्डिताना कवि | ४२।७७ |
| प्रलयसहायकरा (शा प ५१०) | १८१।२४ | प्रागल्भ्यहीनस्य (ज्योतिस्तत्त्व) | १७३।८५६ | प्रापितेन चटुकानुविडम्ब | ६९।१९ |
| प्रवसतः (शिशु ६ ३०) | ३४१।३६ | प्रागेतद् (नै १२ ९३) | ११०।२४६ | प्राप्तं प्राज्यमिव श्रम | ३३५।१३४ |
| प्रवातान्नीलोत्पल (कुमार १ ४६) | २५९।७७ | प्राज्ञा मेति ततो (भर्तृ १ २५) | ३१।७७ | प्राप्तमदो मधुमास प्रबला | १९४।३७ |
| प्रविश झटिति (शृं ति ६) | २६२।१९३ | प्राची वासकसज्जिकामुपगते | ३२५।६१ | प्राप्ताविद्यार्थ (पञ्च १ ४३२) | ३९०।५३२ |
| प्रविष्टं सर्वं (र २.१२२ २०) | ३९१।५५५ | प्राचीकुङ्कुमतिल (प्र राघव ७ ९०) | २७।४ | प्राप्तव्यमर्थ लभ (पञ्च २ १३३) | ९२।४९ |
| प्रवीणे पाक्पदु (शा प १३३५) | १४४।७४ | प्राची दिगम्बरमणौ दयिते | ३२३।१० | प्राप्ता श्रिय (भर्तृ ३ ६८) | १७६।९४९ |
| प्रशस्त्यायुक्त | १९४।३२ | प्राचीनाचलचुम्बिचन्द्र | ३०२।११६ | प्राप्ता जरा (शा प ४१६५) | ३७४।१९६ |
| प्रशान्त (किरात ८ २८) | ३३८।७३ | प्राचीभागे सरागे धरणि | ३०३।१२२ | प्राप्तानपि न (सूक्ति ९ १९) | ७२।३७ |
| प्रशान्ते नूपुरा (शा प ३६९६) | ३२०।१ | प्राचीमहीधरशिलाविनिवे | ३४३।११० | प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्य (हि २ १०३) | १४२।२४ |
| प्रसत्तेर्य. पात्रं | ३१।४१ | प्राचीमालम्ब (प्र राघव २.३३) | २९५।७० | प्राप्ताज्ञासात्पिपासातिशय | १३३।४४ |
| प्रसङ्गा (सु १४७) | ३९२।५९३ | प्राचीविभ्रमकर्णिकाकमलिनी | ३२५।५६ | प्राप्ते भये परि (पञ्च २ १९३) | ३९०।५२६ |
| प्रसरति (पञ्च ३ २४५) | १७७।९९४ | प्राचेतसस्यापसराशराधा | ३७।६६ | प्राप्ते वसन्तसमये (सु ७९४) | २०२।९४ |
| प्रसरदल (सूक्ति ६१ २७) | ३४३।१०५ | प्राज्ञो वा (भा १२.५७१७) | ३८९।४६७ | प्राप्यं कार्यं गरी (र ५ ८४) | ३८८।४६० |
| प्रसह्य मणिमुद्धरे (भर्तृ. २ ४) | ४०।५६ | प्राञ्जलावपि (किरात ९ १०) | २९४।२९ | प्राप्य चलानधिकारा | १७०।७४० |
| प्रसाद कुरुते (हि ३ १९) | ३७७।२८ | प्राज्ञे नियोज्य (चाणक्य ८५) | १४६।१७८ | प्राप्यते गुणव (किरात ९ ५८) | ३१५।५० |
| प्रसाद्माधुर्यगुणौ | ४९।१६७ | प्राज्ञो हि जल्पता | ३८।६ | प्राप्यते स्म (शिशु १० ७८) | ३१९।२१ |
| प्रसादग्म्य (किरात ११.३८) | ८५।३ | प्राणवद्रक्ष्ये (पञ्च ३ १२२) | ३९२।६०७ | प्राप्य नाम्नि (शिशु १० ६०) | ३१७।२१ |
| प्रसादे व (सूक्ति ५७ २३) | ३०६।४४ | प्राणब्रुवन्त्येव (भाग ११ ७) | ३८५।३०९ | प्राप्य प्रमाणपद (भोजप्र १३४) | २४७।६९ |
| प्रसादो (सु.२७८५) | १४६।१५८ | प्राणघातान्नि (भर्तृ २ ६०) | १८०।१०५६ | प्राप्य मन्मथर (शिशु १० ८०) | ३१९।२३ |
| प्रसादो नि (भोजप्र ४७) | ३७७।२९ | प्राणातिपात (भा १२.५८४) | १५४।३९ | प्राप्य वित्त जडास्तूर्ण (दृ श ४४) | ५५।७७ |
| प्रसाधिकाल (रघु ७ ७) | १२६।३३ | प्राणत्यागे (पञ्च २ १७८) | ३९१।५८३ | प्रांभ्रश्राद्विष्णु (का प्र ७ १७४) | १८८।४३ |
| प्रसारणपरै करै. | ३०१।८७ | प्राणाना च (शा प ३०८९) | २५१।६ | प्रामाण्यं स्वत एव नैव | १०९।२१५ |
| प्रसारितकरे (शा प.११३८) | ३९१।५७६ | प्राणाना बत कि (शान्ति १ १८) | ७४।४३ | प्रामाण्यं परत खतोऽपि | १०९।२१६ |
| प्रसार्य (शा प.३८७८) | ३४२।७४ | प्राणा यथात्मनो (हि.१ १२) | १६३।४३६ | प्रामाण्यं परतो न शक्ति | ११७।९९ |
| प्रसीदेति (रत्ना.२.१९) | ३०६।४५ | प्राणायामोपदेष्टा सरसिरुह | ३०२।११८ | प्राय कार्ये न मुह्यन्ति | १९९।१२ |
| प्रसूतकलिका | ३३३।९० | प्राणेश तव विरहिणी हिम | २८७।६ | प्राय काव्यैर्गमितवयस | ४३।५ |
| प्रसूनबाणाद्वय (नै ७ ४८) | २६३।२२१ | प्राणेशमभिस (शा प ३६१२) | २९८।५ | प्राय. कुकवयो लोके | ३७।४ |
| प्रसूनशृङ्गै (शा प.३७९१) | ३३१।१६ | प्राणेश विज्ञाप्ति (शृ.ति.१७) | ३३०।४ | प्राय. खलप्रकृतयो (सु ४०२) | ५८।१७७ |
| प्रस्ताव (चाणक्य.१४.१५) | १५८।२५० | प्राणेशेन प्रहितनखरैश्छिन्न | ३२८।४ | प्राय परोपतापाय (सु ३५१) | ५६।९३ |
| प्रस्तावे हेतुयुक्तानि | ३२।२ | प्राणेश्वरपरि (काव्या सू. १५) | १७३।३०३ | प्राय प्रकाशता याति (सु ३५०) | ५६।९२ |
| प्रस्थान (अमरु.३५) | ३२९।२१ | प्राणेश्वरे किमपि जल्पति | ३२९।९ | प्राय प्रकुप्यतितरा (दृ श ३०) | ५५।७६ |
| प्रस्थाने तव | १२५।१८ | प्राणैरपि हिता वृत्तिरद्रोहो | ८८।१७ | प्राय सन्त्युप (दृ श ६) | १६८।६७० |
| प्रस्फुरत्प्रचुर | ३३२।७३ | प्रात क्षालितलोचना कर | ९६।५ | प्राय स्वभावमनिलो (सु ४४२) | ६०।२४३ |
| प्रस्वेदमलदिग्धेन (सु.३३४२) | ३६६।१ | प्रात प्रात समुत्थाय द्वौ | १९३।२ | प्राय स्वभावं (दृ. श ८०) | ४६।६५ |
| प्रहरकमपनीय (शिशु ११.४) | ३२३।२२ | प्रातः प्रातरुपा (अमरु ३३) | ३५६।१९ | प्रायश्चरित्वा वसुधा (कुव ११०) | ३२५।९ |
| प्रात. सीमन्ति (शा.प.३७३१) | ३२६।३२ | प्रायश्चित्त न गृहीतस्तन्वङ्ग्या | २६४।२५२ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ५१
| प्रायेण धनिनामेव (शा प ४३४) ६९।७ | प्रिये सदा पूर्णतरं मनोहरे ३१३।४० | बकुलमालिकायापि २८४।१४ |
| प्रायेण नीचलोकस्य क १९९।२७ | प्रिये सलीलं (किरात ८ ४९) ३३८।९२ | बकोट ब्रूम (शा प.८९१) २२९।२२८ |
| प्रायेण श्रीम (भा ५ १।४५) ३९०।५४३ | प्रियो मयैवावचित्ते प्रसूनै ३५२।२३ | बङ्गालिदाम भवतः शुभ ११६।६७ |
| प्रायेण सुकरं (शा प ३९६२) ३६०।२ | प्रीणाति य (भर्तृ स २७९) ३७८।४७ | बत सखि (का प्र १० ४३१) २८४।२१ |
| प्रायेणात्र (पच १ ४४८) १७९।१०२३ | प्रीतिं न प्रकटीकरोति (सु ४९३) ७२।६० | बदरामलका (भामिनी शु ८) २६५।२८५ |
| प्रायो दुरन्त (प्र राघव५ ४९) १५८।२३५ | प्रीतिं वस्तुगुना हरि कुत्र २५१।७६ | बद्धकोपोविकृती (किरात.९ ३४) ३१६।५६ |
| प्रायो यत्किंचिदपि प्राप्नो ८६।९ | प्रीतिर्लक्ष्मीर्व्यय क्लेश १५७।१८४ | बद्धकोशमपि तिष्ठति २९४।१८ |
| प्रारभ्यते न (मुद्रा २ १७) ३९०।५४८ | प्रेक्षणीयकमिव (शिशु १० ८२) ३२९।८ | बद्धा मणिम (पार्वती ५ १५) २६८।३८० |
| प्रारब्धे रति (शा प ३६९७) ३२०।१७ | प्रेङ्खणप्रेक्षणालापान्कुर्वत्य २५३।७ | बद्धा यदर्पणरसेन ४०।५२ |
| प्रारब्धे विपरीतनामनि रते ३२०।१९ | प्रेङ्खद्भाजितरगमुन्मदगज २७२।२ | बद्धा पद्मासनं यो नयन २६।२०७ |
| प्रारम्भतोऽतिविपुलं (सु ४२३) ५८।१९३ | प्रेम सत्यं तयोरेव १६०।३१४ | बद्धा हियोमा त्रिवली गुणेन २६६।३१८ |
| प्रारम्भे (भामिनी. अ. ४६) २२४।१०९ | प्रेमार्द्रा (मालती.५ ७) २८०।९३ | बधिरयति कर्णविवर वाचं ६४।१२ |
| प्रालेयमिश्रमकर (वेणी २ ७) ३२३।१३ | प्रेमैव मास्तु यदि चेत्पथि ५०।१९३ | बन्दीकृस्य (का प्र ५ ११९) ११२।२६८ |
| प्रालेयलेशमिश्रे (पच ३ २३९) ३९१।५८२ | प्रेम्णोऽामितरेवतीमुख २६१।९६ | बन्दी (भर्तृ स ६१२) १८०।१०५२ |
| प्रालेयशैल (शा प ३९२५) ३४६।२३ | प्रेरयति परम (शा प ३६४) ५७।१३१ | बन्धं लब्धत परस्य २२८।२२२ |
| प्रावारैरङ्गारैर्गर्भ (शा प ३९३७) ३४७।१ | प्रेरितः शश (किरात ९ २८) ३००।४४ | बन्धनस्थो हि (शा प.१२०९) २३१।५८ |
| प्रावृषि शैलश्रेणीनितम्ब २१२।२१ | प्रेषिक. प्रैष्यक (शा.प ४०६४) ३६४।९ | बन्धनानि (चाणक्य १५ १७) ३९०।५११ |
| प्रावृषेण्यस्य (शा प ७६८) २११।१ | प्रेषितस्य कुतो (चाणक्य ६१) १६२।३९२ | बन्धु को नाम (हि २ १७४) १६४।४९३ |
| प्रासस्रोतप्रवीरोल्बणरुधिर १३१।१२३ | प्रोज्वलज्वलनज्वाला १९।६३ | बन्धुत्याग (काव्या ३ १४७) ३८१।१५७ |
| प्रासादीयति वैणवादिगहन २५०।२२ | प्रोद्यत्प्रौढार (शा प ३९२४) ३४६।३३ | बन्धुलीकृत्य (हि २ ८०) १६४।४८३ |
| प्रासादे सा दिशि (अमरु १०२) २७९।६५ | प्रोषितवति (प्र राघव ५ ५) २१०।१० | बन्धुकद्युति (शा प ३६५८) ३१४।६८ |
| प्रियकृतपटस्येय (अमरु ११५) ३२१।१९ | प्रौढमौक्तिकरुच पयोमुचा ३४१।४८ | बन्धूकबन्धनुभव २६१।१४९ |
| प्रियतमेन यया (शिशु ६ ५७) ३४६।१८ | प्रौढच्छेदानुरु (छलितराम) ३६५।११ | बन्धूकबन्धुरधर (प्र रा २.८) २७१।३२ |
| प्रियप्राया (उ रामच २ २) ५१।२३७ | प्रौढिं धत्ता कलासु प्रथ १२१।१६५ | बन्धूना सुहृदा चैव १६६।५८१ |
| प्रियमनु (राज त ४ ३२१) ३९१।५९९ | प्लवन्ते धर्मे (भा १३ २२) ३९१।५५९ | बभूव वल्मीकभव कवि. ३६।४२ |
| प्रियमेवा (काम नीति.३ २६) ३७८।४४ | बर्बरेश्च तपस्वी (शा प १४९६) १५४।५९ | |
| प्रियवसतेरपया (सूक्ति ८२ १३) ३२३।४ | फ | बर्ही रौति बका (शा प ३८८७) ३४३।८८ |
| प्रियवाक्य (चाणक्य १६ १७) १५५।८३ | फणीन्द्रेस्ते (कुव ६३) १०२।३५ | बलमार्तभयो (रघु ८ ३१ ) १०४।८६ |
| प्रियविरहमहो (विद्ध ३ २३) २८५।४८ | फल कतक (मनु ६ ६७) ३९०।५२५ | बलवदपि (किरात १० ३७) ३३६।१४ |
| प्रियसखि न तथा पटीरपङ्के २८४।१८ | फल दूरतरे (शा प १०४८) २४२।१७३ | बलवानपि (किरात २.३७) १६४।४९२ |
| प्रियसखि विपद् (शा प ४५१) ९३।८६ | फलं धर्मस्य (शुक ४०) ३९०।५३८ | बलाङ्गीतो (शा प ३६७८) ३१८।११ |
| प्रियसखीसदृशं (शिशु ६ ८) ३३२।६३ | फल स्वेच्छाल् (भोज २७०) ७२।५४ | बलि पातालानिल (भोज २२१) १०१।७ |
| प्रियस्य सुहृदो (मालती ९ ४१) ३६१।७ | फलतीह (पच ५ ९) ३९०।५२८ | बलिकर्णदधी (शा प १२२९) १०२।१७ |
| प्रियदर्शनमेवास्तु (सूक्ति ४९ २) २०३।१ | फलहीनं नृपं (पच १ १६३) १४९।२८१ | बलिना सह (काम नी ९ ४९) १४८।२३२ |
| प्रिया न्याय्या वृ (भर्तृ २ ६१) ५२।२४८ | फलाना च दलाना च २२२।४२ | बलीयसा हीन (पच ३ १२६) ३७७।२२ |
| प्रियामुखीभूय सुखी सुधांशु २६१।१५२ | फलायते कुचद्वन्द्वमिय २७०।४ | बलोपपन्नो (पच ३ १११) ३७७।२३ |
| प्रियाया (सूक्ति ४३.१८) ३२१।२२ | फलार्थी (पच १ ३७८) १४९।२९२ | बल्लाल क्षोणिपाल (भोज ६४) ११६।६८ |
| प्रिया वा (महाना ९ १५) ३८८।४५७ | फलाशिनो मूलतृणाम्बु ६७।४९ | बल्हबलसमर्था मेघनादा १८४।४१ |
| प्रियाविरहितस्या (सूक्ति ४२ १) २७४।१ | फलितस्य रसालशाखिन २३९।१०५ | बहव. पन्नवोऽपीह (सु.२२५५) ७८।२ |
| प्रियासखीभूतवतो मुदं २६९।४१६ | फुलेषु य कम (शा प ८२५) २२३।८० | बहवोऽविनया (म.५.४०) ३९३।६६५ |
| प्रिया हिता (पच.१ ३२) ३७८।५७ | फेनमा (भा १२ १२०५०) ३८८।४५५ | बहि सर्वा (मालती.१ १७) १७७।९७८ |
| प्रियेण संप्रथ्य (किरात ८ ३७) ३३८।८० | बहिरतिनिर्मलरूपं २४७।६३ | |
| प्रियेण सिक्ता (किरात.८.५४) ३३८।९७ | ब | बहिर्न लोला दृगपाङ्ग ३५१।२८ |
| बककोयष्टिमिरुष्टे पल्वले २२।७ | बहु जगद पुर (शिशु ११.३९) ३२८।११ | |
| बकुलकुलमिलन्मिलिन्दमाला ३३२।७५ |
५२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| बहुतरहृते रसातलं १७०।७४३ | बाहू द्वौ च मृणाल (शृ ति १) ३७८।५५ | ब्रह्मघ्ने च सुरापे (पंच ४ ११) ७५।१ |
| बहुधा बहुभि (पच ३ ७५) ३९०।५४० | बाहू प्रियाया जयता मृणा २६४।२२८ | ब्रह्मघ्नोऽपि नर (चाणक्य ८२) ६४।४ |
| बहुधा राज्यलाभेन यस्तो १०१।९ | बिडालभक्षिते दु ख ३७२।१६३ | ब्रह्मज्ञान (भर्तृ ३ १४) ३७५।२२४ |
| बहुनात्र किमु (शा प ३५०६) २९२।२ | बिडौजा पुरा पृष्टवान् १००।३ | ब्रह्म नान्तमपि १८७।२४ |
| बहुनिष्कपद्रोही बहुधा ५४।१३ | बिन्दुद्वन्द्वतरङ्गि (सूक्ति.४.१०६) ३५।२९ | ब्रह्महत्या (मनु ११ ५४) १५४।४७ |
| बहुभिर्न (पच ३ ११९) १६५।५६५ | बिभर्ति वदनेन किं क २०३।१०३ | ब्रह्माण्ड कियद ८०।४३ |
| बहुभिर्बत (शा प २०८५) १४५।१९३ | बिभेति पिशुना (सु ३७८) ५६।१०८ | ब्रह्माण्डं प्रवि १२६।३० |
| बहुभिर्मू (वृ चाणक्य ७ ११) १६९।७१६ | बिभेषि सखि (शा प ३४३३) २८३।२ | ब्रह्माण्डकुम्भकारं १६।५९ |
| बहुनामप्यसा (सु २७४२) १४४।८३ | बिभ्रतौ (शिशु १० ८) ३१४।११ | ब्रह्माण्डच्छत्र (दशकु. पू १) २०१।६६ |
| बहूनामल्पसाराणा (भोजप्र १४५) ८३।३ | बिभ्रत्पाथ कपर्दे सुर ८१।१७ | ब्रह्माण्डमण्डली (भर्तृ स २८४) ७९।३ |
| बहूनि नरशीर्षाणि (सु १४४) ३९।२३ | बिभ्राणा गरलं कण्ठे भुजंग ५५।५२ | ब्रह्माण्डसपुटक्लेवर २७।८ |
| बह्वपि स्वेच्छया (शिशु २ ७२) ८४।५ | बिभ्राणा हृदये (कुव.१५५) २९०।८४ | ब्रह्मा दक्ष कुबेरो (सु ८३) ९।१९ |
| बह्वाशी स्वल्प (चाणक्य ६९) १६२।४०० | बिभ्राणे त्वयि (शा प ११६०) २४५।४ | ब्रह्मादयोऽपि ९१।०८ |
| बाणं हरिरिव कुरुते सुजनो ४७।९७ | बिभ्राणोऽभिनवे (सूक्ति २ ७२) १८।३५ | ब्रह्मानन्दप्रचुरं ३१८।४ |
| बाणकरवीरदमनकशत १०३।६९ | बिम्बाकारंसुधा (भर्तृ स ६१२) १९४।१५ | ब्रह्मा येन (गरुड अ ११३) ९३।९८ |
| बाणाः पञ्च (रत्न ३ १) २८२।१४१ | बिम्बितं मृतपरि (शिशु १० ५) ३१४।८ | ब्रह्मा विष्णुदिने ३७३।१९३ |
| बाणाशिक्षा (शिशु १८ ५६) १३०।८७ | बिम्बोष्ठ एव (नवसाहसाङ्क ) ३१२।९ | ब्रह्मैव सत्यमखिल ३५२।२९ |
| बाणाग्निमस्तकरुणे विकिरण् २८२।१३५ | बिलाद्वहिर्बिलस्यान्त ३६४।१४ | ब्राह्मण ब्राह्म (भा ५ १४२५) ३९०।५२० |
| बाणान्सहर (विद्ध १ २२) २८२।१४३ | बिसमलमशनाय खादु पाना ६०।२४६ | ब्राह्मण (हि.० ९६) १४७।२०२ |
| बाणेष्वारोप्य गुणान्विधाय ६५।१६ | बीजं चिन्तामणिश्चेत्क १२२।१६७ | ब्राह्मण (भा ३ १४०७५) ३८०।१२१ |
| बालक्रीडनमिन्दुशेखर २१।८७ | बीजं चेदिन्द्रदन्तिस्फुरित १३८।८५ | ब्राह्मणा गणका १५६।१३१ |
| बालक्रीडनमिन्दुशेखर १२१।१५३ | बीजैरङ्कुरितं (शा प ८५६) २२६।१६३ | ब्रूत नूतन (दश २ १३) ७९।२ |
| बालया वा (मनु ५ १४७) ३५१।१५ | बीभत्सा (शान्ति १ ७) ३७६।२५७ | ब्रूतेऽन्यस्या (शा प २४२) ३८८।४५० |
| बालसखित्वमकारणहास्यं १७४।८९५ | बीभत्सा (शान्ति १ २०) ३७०।९३ | ब्रूते सप्रति (शा प १२५६) १२२।१८२ |
| बालस्यापि रवे (पचं १ ३५७) ७८।१ | बुध कीटग्वचो ब्रूते २००।३० | भ |
| बाला चन्दन (शा प ३५२९) ३०५।२ | बुधामे न (भोजप्र १२८) १६१।३६७ | भक्तं रक्तं (शा प १५१७) १५४।७२ |
| बालाटाक्षसूत्रितमसती ३७।१५ | बुद्धिं वर्धयति श्रियं वित ८७।३६ | भक्ताना (पच १ ३०७) ९७।१७ |
| बाला तन्वी (सु १४०१) ३१७।२ | बुद्धिप्रभाव (भा ५ १३७४) ३८२।२३५ | भक्ति प्रेयसि (शा प.३७५६) ३५१।३५ |
| बालातप (गरुड पू १०८) ३८२।४८५ | बुद्धिमन्तं (भा १२ ६४९८) ३८३।२३७ | भक्तिप्रह्वविलोकन (रसगगा २ ७) १५।३२ |
| बालादपि (हि २.७९) १६४।४८२ | बुद्धिमत्त्वाभि (वृ श.६९) १६९।७०० | भक्तिप्रह्वाय (शा प १३८) २७।१२ |
| बाला मामियमित्छतीन्दुवद ३७२।१३५ | बुद्धिरूप (प्रसगा.१३) ३८३।२३९ | भक्तिर्भवे (का प्र १० ५२४) ४८।१२६ |
| बालिकारचितवस्त्रपुत्रिका ३७५।२४१ | बुद्धिर्या सत्त्वरहिता (सु ५१२) ७०।२० | भक्ते द्वेषो जडे (शा प ३४१) ६४।४ |
| बालिशस्तुनरो (र ४ ७ १०) ३९३।६३६ | बुद्धिशस्त्र. (शिशु २ ८२) १४६।१८४ | भक्तो गुणी (हि २ १६) १४४।७१ |
| बाले तवाधरसुधारसपान ३१३।४९ | बुद्धिश्च हीयते (भा ३.३०) ३७९।७० | भगवदनभ्युपगमनं ४३।१ |
| बाले नाथ (अमरु ५७) ३०९।७ | बुद्धिश्रेष्ठा (मा ५ १०५६) ३८३।२४० | भगवन्तौ (शा प ४४०) ९०।५ |
| बालेन्दुवक्राण्य (कुमार ३ २९) ३३१।२६ | बुद्धेरगोचर (शान्ति ३ १४) ३६८।३६ | भगिनि (सूक्ति ३९ ७) २८६।१४ |
| बाले बाला विदुषि विबुधा १७८।१००५ | बुद्धौ कल्ल (भा २.२६८०) १६६।६०३ | भगीरथाय (शा प ४००३) ३७४।१९७ |
| बाले मालेयमु (शा प ३८२९) ३३६।३१ | बुभुक्षित किंन (पच ४ १६) ३९०।५४२ | भग्नकुम्भशकल्येन ५९।२१५ |
| बाले ललामले (शा प ३२९३) २५८।४१ | बुभुक्षितैर्व्याकिर (भर्तृ सं.६२१) ६४।११ | भग्ना वयं (सु ३१७९) ६७।५१ |
| बालोऽपि नावमन्त (मनु ७.८) १४२।८ | बृहत्सहाय (शिशु २ १००) ८७।१९ | भग्नाशस्य (भर्तृ २ ९२) ९४।१०९ |
| बाल्ये गेहपतौ निमीलति २५६।४८ | बोधयन्ति न (शा.प.२७४) ७१।९ | भग्नासु रिपुसे (शा प १२४४) १०२।१९ |
| बाष्पाकुलं प्रलपतोर्गृहिणी ३२९।३ | बोधितोऽपि बहुसूक्तिवि ५९।२११ | भग्नेर्दण्डैरात (शिशु १८ ६७) १३०।९६ |
| बाहुपीडनकच (शिशु १० ७२) ३१८।१५ | बोद्धारो (भर्तृ.३.२) ३९०।५३६ | भङ्क्त्वा (शृगाररसाष्टक ५) २९६।१३ |
| बाहुवीर्यं (वृ.चाणक्य.६.११) ३८६।३५९ | भञ्जकीर्तिमपीम १३४।१७ | |
| बाहू तस्या कुचाभोग २६४।२२७ |
सस्थाननिर्देशसमनुक्रमकोशः
५३
भजन्त्यास्त (शा प ३६८.१) ३९।१३३
भण्डस्ताण्ड (सु ४६३) ६२।२७९
भद्रं तस्य तरो (शा प ३७७.१) ३५३।४५
भद्रं ते सदृशं (शा प ५८.१) २०८।३२
भद्रं भद्रं (नीतिरत्न ११) २२५।११८
भद्रामनो (रसगंगा २ श्लो) १०५।१४१
भद्रात्र ग्रामके (शा प ३८९५) ३४३।१६
भद्रे वाणि ममान (सु ३१९४) ६७।६९
भयं ताव (मुद्रा ५ १२) १३९।४
भयं प्रमत्तस्य (भाग ५ १) ३८९।४९०
भयादिवाश्लिष्य ३३८।८२
भयेन कृष्णान्यर्ह १२६।२८
भये वा (पच १ ११८) १६८।५०४
भर्ता देवो (दर्पदल ५८) १५६।१४५
भर्ता यद्यपि (भर्तृ स ६२५) ३५०।७९
भर्तारं किल (र २ २९ २०) ३८८।४६३
भर्तु पिण्डानुण (शा प ३९६१) ३६०।१
भर्तुर्यस्य कृते ३०९।१४
भर्तृभि प्रणय (किरात ९ ५४) ३१५।४६
भर्तृषुपसखि (किरात ९ ६६) ३१६।५८
भल्लैर्भिन्ना प्रति १३१।१९६
भवत इवाति १९६।८
भवतामहमिव १०३।६६
भवति गमनयो २०३।९८
भवति जघिनी २०३।९९
भवति (मालती. १० १५) ३१०।१
भवति (वासव ४) ४७।१०२
भवति (शा प १००८) १७७।९७६
भवतु विदितं (अमरु ३०) ३५६।१६
भवतु विदितं (सु १६१७) २९१।१४
भवत्कृते खञ्जन ३१२।३५
भवत्तुरगनिघुर १३०।१११
भवत्येकस्थले १६७।५३०
भवत्या विश्लेषे २९२।१६
भवनभुवि (विद्ध ४ १२) २६०।१०७
भवनमिव मदीयं ३५४।७७
भवनेत्रभवो २८२।१२४
भवने सुहृदो (पच २ १७) ३८९।४७६
भवनोदरेषु परि(शिशु ९ ३९) ३००।६४
भवन्ति ते ८५।१०
भवन्ति नम्रा (भर्तृ २ ६२) ७५।११
भवन्ति नरका (कुव १०४) ६९।५
भवन्तो वे (भर्तृ १ ५२) २५२।४८
भवबीजाङ्कुरजल (सु २६) १।९
भवभूतिमानाम्य (शा प १७८) ३६।३८
भवभूते सवन्वा ३६।३२
भवानिशकरोमेश १९५।४५
भवान्दि भगवा १०२।३०
भवितव्य (विक्रम १४८) ९१।२२
भवितव्यं यथा ९१।३०
भवित्री र (महा ना १० १२) २०५।९
भवेत्खपर (हि २ ३४) १४४।७८
भस्मनि स्मररिपो २४५।१
भस्मना (वृ चाणक्य ६ ३) ३८९।५३०
भस्माङ्गलिर्बको (शा प ४०६३) ३६४।८
भस्मान्धोरगफूत्कृति ५।६०
भस्मीभूत २८४।२९
भस्मोद्धूलन (कुव १२१) ३७०।८६
भागीरथी (कुमार ११ ३) २००।३६
भाग्यवन्तं (शा प ४४२) ९०।२
भाति निर्विवरे २६४।२५४
भाति रोमा (सूक्ति ५३ ६६) २६७।३४०
भाति विन्यस्तक (शा प ३२८७) २५७।२
भानु नाम (शिशु १० ८६) ३२१।१२
भानुबिम्बमिद २९४।११
भानो. पादैर्दहन ३३७।४१
भानो शीतकरस्य ४४।६
भानावभ्युदिते ३०२।१०
भानुर्वै जायते १९४।३६
भारं स (मा १२ १११४१) ३९२।६१७
भारत चेक्षुदण्डं २०५।१
भारत्या वदनं १३६।४७
भार्या पति (भा १ ३०२४) ३९०।५१७
भार्या हि (भा १२ ५५०६) ३९३।६४१
भार्या पुत्र (म ८ ४१६) ३७८।५६
भार्याविन्त (भा १ ३०२९) ३७८।५३
भार्यावियोग (चाण ३ १४) १७२।८२७
भाषासु मुख्या २९।१
भासते प्रति (का प्र ९ ३८७) २०५।१०
भासो रामिलसो (शा प १८८) ३७।६९
भास्वत्कर्कश ३०३।१२९
भास्वतकुण्डलमणि २५९।६९
भास्वद्वंश (प्र राघव १ ९) ३६।५२
भास्वाश्वततरू ३३०।७
भिक्षवो रुचिरा १९६।११
भिक्षार्थी स (कुव १५९) १३।४७
भिक्षाशनं (भर्तृ ३.१६) ७६।३७
भिक्षाशनं (शान्ति.१.२३) ३७५।२४३
भिक्षाहार (भर्तृ ३ २१) ३७०।१०१
भिक्षितकमल ३२५।५
भिक्षु कास्ति १२।४२
भिक्षुश्वोऽपि सक्लेप्सित ४।२७
भिक्षुद्वारि ११२।२७२
भिक्षो कन्था (सु २४०२) ६२।२८०
भिक्षो मास (दश ४ ७५) ६१।२७१
भित्त्वा (शिशु १८ २०) १२९।६७
भित्त्वा सद्य (मेघ २ ४४) २९२।२६
भिनत्ति (नीतिरत्न ७) २३०।२२
भिन्दन्नरातिहृदयानि (सु ४७) १६।४४
भिन्दानो (शा प ३८१४) ३२५।६६
भिन्ना महा (भामिनी अ १००) २३०।२९
भिन्ने चित्ते १६७।६३६
भिद्योरस्कौ (शिशु १८ ६५) १३०।९५
भिषजो (मा १२ ५१८४) ३८८।४४२
भीतवत्स (भा १ ५६२२) ३७७।१०
भीतासि नैव ३५५।२३
भीतिर्नास्ति भुजंगपुगव ५।५५
भीतो वाडववासतो २११।४९
भीमं यज्जलधिं १२०।१४०
भीमं वनं (मर्तृ २ ९९) ९२।७४
भीमश्यामप्रतनु (शा प ११४७) २२०।९
भीमभीमशुभ्रै (शा प ५००) १८१।१६
भुक्तं खाडुफलं (शा प ९७९) २३६।२०
भुक्तानि यैस्तव (शा प ९८०) २३६।१३
भुक्ता मृणा (भामिनी अ ४५) २२१।२३
भुक्तिमुक्तिञ्च (का प्र ४ ७८) ८७।१४
भुक्त्वा भव्य २३४।१२२
भुजभ्रूयुगलै १३१।१९८
भुजालंकं (प्र राघव ७ १५) ३०६।२७
भुजगकुण्डली व्यक्त ३।५
भुजंगभोग (काव्या ३ ३४६) १०१।१०
भुजतरुवनच्छाया (राजत १ ४६) ३३१।४५
भुजपञ्जरे (भामिनी शृ ३७) ३१।८४
भुजप्रभादण्ड २२१।१७
भुज्यन्ते खगहस्तिथा ७१।४०
भुजे विशाले विमले (सु २२७४) ७८।६
भुज्ञाना (राज त ३ १९४) ३७७।११
भुवनमोहनजेन २८२।१२९
भू पर्यङ्को (भर्तृ ३ ९३) १६९।६०
भूजाने किं न जाने १३४।३०
भूतानामपर (३ १३८५१) ३८८।४४५
भूतानाम (भा १२ २५२३) ३९३।६६०
५४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| भूतावेशनिवेशिता ३४।५६ | भोगाक्षमस्य १७१।८०६ | भ्रात कोकिल (शा प ८५१) २२९।१४४ |
| भूतैराक्रम्य (भाग ११ ७) ३८५।३०८ | भोगा न (भर्तृ ३ ८) ३७४।२०९ | भ्रात पञ्जर (शा प.१२०६) २४६।४३ |
| भूत्यालेपनभूषित ६।६३ | भोगा (भर्तृ ३ ३६) ३७३।१८६ | भ्रात पान्य (कुव १७८) ३४३।९३ |
| भूत्वा कल्प (प्रब ०१) ३७३।१८४२ | भोगा भङ्गुर (भर्तृ स २०२) ३८५।३२७ | भ्रात पान्थ (शा प ३४०६) ३५५।८६ |
| भूप कूप १४९।२८२ | भोगासक्तैकचेता १९८।१०६ | भ्रात पान्थ प्र (शा प ३८९४) ३४३।९५ |
| भूस्तन्मौलित १२६।१२ | भोगास्तुङ्ग (भर्तृ ३ ३५) ३७३।१८५ | भ्रात प्राणगणप्रयाण ३५७।३६ |
| भूयन्मीलितटीषु १२३।१९१ | भोगिन (पच १.६९) १४६।१७४ | भ्रातप्रम्ये कुविन्द २४६।२८ |
| भूमात्रं कियदेन ३६।१३९ | भोगीन्द्र प्रमदो (सु २६३८) १३७।६४ | भ्रातर्द्विरेफ २८३।१५९ |
| भूमिपतावर्ध १६९।७२० | भोगेच्छा नोप १६८।६८५ | भ्रातर्धार्तराश (भर्तृ स ४९) ७४।३६ |
| भूमिर्मित्रं (काम नी १० २८) १४९।३११ | भोगे रोगभय (भर्तृ ३ ३२) ३७०।९० | भ्रातर्भ्रम्य (शा प ११८४) २२४।१०६ |
| भूमौ स्थिता (भामिनी क २३) ३६२।३० | भोज त्वत्कीर्ति (भोजप्र १२७) ११७।७८ | भ्रातश्चन्दन कि (शा प ९९३) २३७।५४ |
| भूय कण्ठावधृति १९।५६ | भोज त्वद्दानपाथो ११७।७५ | भ्रान्त याचन (शा प ४२१) ७७।५३ |
| भूयस्तराणि यदमूनि ३०१।७२ | भोजनाच्छादने (पच.५ ६०) ३४९।३१ | भ्रान्त देशमनेक (भर्तृ ३ ४) ७७।५४ |
| भूयादेश सता १९।३७ | भोजनान्ते च कि १९६।५ | भ्रान्ता वेदान्तिन ४४।६ |
| भूयिष्ठ द्रविणात्मज ९४।११५ | भोजप्रतापं तु (भोजप्र ९२) ११७।८५ | भ्रान्त्वा (सूक्ति ९७ २८) ११९।१३२ |
| भूयो गर्जितमम्बु (शा प ७८७) २१३।६७ | भोजप्रतापामिर (भोजप्र २१८) ११७।८६ | भ्राम्यची (शा प ३८५७) ३४०।१३० |
| भूयो निपीय ३२७।९ | भोज्यं (चाणक्य २ २) १५५।१२१ | भ्राम्यन्मन्दर (पार्वती ५ २३) १५।३५ |
| भूयो भूयस्त्व १२२।१७३ | भो पान्थ त्वरितो ३५५।८७ | भ्रुवौ काञ्चिल्ली (शा प ३२७४) २५५।२६ |
| भूरिभारभरा (शा प ५६२) २०५।४ | भो पान्य (भर्तृ स ८५०) ३५४।७४ | भ्रूचातुर्या (भर्तृ १ ३) २५१।४१ |
| भूरिशोऽपि च २३९।१०३ | भो मो. करी (शा प ९०५) २३१।६९ | भ्रूचापवल्ली (कुव ८५) २७७।१२ |
| भूरेणुदिग्धा ( ध्वन्या ३) ३६०।२२ | भो भो कि कि (शा प ११५२) २२०।६ | भ्रूचापे निहि (शा प ३५०२) ३१४।७० |
| भूर्ज (शा प १०५६) २४३।१८४ | भो भो श्रीभो (शा प १२५२) ११७।९५ | भ्रूपल्लवो धनुर (शा प ३३८०) २५५।२३ |
| भृशक्रस्य यशा (सूक्ति ९७ २५) १३९।९ | भो मेघ (मृच्छ ५ ४७) २८३।१५१ | भ्रूभङ्ग न करोषि ३०७।६३ |
| भूशय्या (पच १.२९२) ९७।१० | भो रोहिणि त्वमसि २८५।४९ | भ्रूभङ्गे रचि (अमरु २८) ३५९।९९ |
| भूषणाद्युप (मुद्रा ३ २३) १०२।३२ | भो हंसास्ताव (शा प ८०७) २२२।४० | भ्रूभङ्गै क्रियते ३०७।६२ |
| भूसर्पकरंजो (शा.प १२७४) १३२।३१ | भ्रमच्चरणपल्लवक्वण ३४६।२९ | भ्रूभेदै कति (शा प ३७६३) ३५३।४१ |
| भ्रुकुटीकुटिल ३६४।२० | भ्रमति गिरि (सूक्ति १०८ २) २३५।४ | भ्रूभेदो रचित (अमरु ९७) ३५८।६७ |
| भृङ्गश्रेणीश्याम (शिशु १८ ४१) १२९।७८ | भ्रमन्वनान्ते नवमञ्ज ९२।५९ | भ्रूभ्या प्रियाया भवता मनोभू २५९।५८ |
| भृङ्गाङ्गनाजनम (शा प ७९९) २२१।१६ | भ्रमन्स (वृ चाणक्य ६ ६) १५९।२८१ | भ्रूयुग्ममुच्चैर्धनुरञ्जितञ्जय ३६७।३० |
| भृङ्गालीकण्ठमाला ३२७।४१ | भ्रमन्स्वैरं भ्रातर्भ्रमर २२४।९८ | भ्रूरेखायुगल (शा प ३२९७) २५८।५२ |
| भृङ्गालीमुदरे २७२।६६ | भ्रम भ्रमर यूथीषु २२२।४५ | भ्रूविलास (किरात ९ ५६) ३१५।४८ |
| भृत्यैर्विना (पच १ ८८) १४४।८६ | भ्रमय (मालती ९.४२) २८३।१५२ | भ्रूविभ्रमरेखा च तिलोत्तमा २७०।२४ |
| भृशमद्यत याधर ३४६।१९ | भ्रमर भ्रमता (शा प ८१८) २२३।११ | म |
| भेकेन कणता (भट्ट १६) २७७।४६ | भ्रमर मरणमीति २२३।१० | मकरीविरचनभङ्ग्या (शा प ७७) २२१।०८ |
| भैके कोटरशा (भोज २०१) २१३।६५ | भ्रमरहित कीदृक्षो १९६।१० | मक्षिका मशको वेश्या १५६।१२८ |
| भेतव्य (मुद्रा ३ १४) १३९।८ | भ्रमरहिता सा ३०।१९ | मक्षिका व्रणमि (चाणक्य ५८) १६७।६३७ |
| भेदाभेदौ सपादि ३६९।६६ | भ्रमात्प्रकीर्णे (शा प ३०१७) ३४५।४९ | मग्ने मेरो पतति तपने १७।५ |
| भेरीझाङ्कृति १२२।१८४ | भ्रष्टं नृपति (शा प ११०५) २१७।५१ | मङ्गलकलशाद्वयमय २।१२ |
| भैषज्यमेतद्दु (भा ११ ७२) ३९३।६५६ | भ्राजिष्णवो (सु ७८०) २२९।२३८ | मज्जत्वम्भसि (भर्तृ स ४८) ९४।११६ |
| भोक्तुं पुरुष (काम १३ १०) ३८९।४९९ | भ्रात कङ्कण किं ३५६।२९ | मज्जन्तोऽपि (सूक्ति ६ २९) ५२।२५८ |
| भोक्तुं (काम.नी.१३.१०) ३८९।४९९ | भ्रात (शा प ४१६४) ३७४।२०० | मञ्जिष्ठारागदी (शा प २२८०) ३२८।२४ |
| भोग. परो (हृ. श ७२) १६९।७०३ | भ्रात कस्त्व १००।७ | मञ्जुलघौ सभाचितगुणे १८४।४९ |
| भोगस्य भाजन (हि.२.१२५) ३४७।२०८ | भ्रात काञ्चन (शा प ११९३) २४८।७२ | मणि शाणोल्ली ( |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ५५
| मणिर्लुठति (नीतिरत्न १२) २१७।४७ | मधुर सुधाव (सा द १० १७) २७०।१५ | मनोभुर्मुग्धासु क्षिपति १०६।१५९ |
| मणिहारलता विभाति तन्व्या २६६।३०५ | मधुरमिव वदन्ति स्वागतं १४१।३ | मनो मधुकरी मेघो मानिनी १५७।१८५ |
| मण्डलीकृत्य (शा प ५६९) २०७।२० | मधुरया (शिशु ६ २०) ३३२।६८ | मनोरथरथारूढ (सु ३२४१) ७६।१९ |
| मण्डले मण्डलाकारो रेखा २०७।१० | मधुरवचनै (सुधारति १ ४२) २५४।३९ | मनोरथान्करोत्युच्चैर्जनो ९१।१९ |
| मतिरेव (गुणरत्न ८) १७५।९२५ | मधुरस्वना घृतोर्णा मध्या १८६।६ | मनोरागस्तीव्रं (मालती २ १) २८४।२७ |
| मत्तेभकुम्भपरि (पचं १ २२०) ३१९।२७ | मधुरिमरुचि (का प्र १० ५१६) ५९।२०८ | मन्त्रतन्त्रार्पित (शा प १३५१) १४२।२१ |
| मत्तो हिनस्ति सर्वं मिथ्या १००।५ | मधुरेणदृशा (काव्या ३ २०) ३८९।४६९ | मन्त्रबीजमिदं (हि २ ४५) १४७।२१४ |
| मत्वा परीक्ष्य (भा ५ १४८७) ३८८।४६१ | मधुरोन्नतश्रु (शिशु ९ ७९) ३११।११ | मन्त्रभेदेऽपि (भा १५ १९३) १४७।२२८ |
| मत्वा चापं शशिमुखि निज २६७।३३८ | मञ्चुव्रतौघ (कुव १११) ३०४।१५२ | मन्त्रसस्कारसपन्नास्तव २९३।१ |
| मत्वा लोकम (सा द ६ १८७) १०३।५७ | मञ्जूके माध्वीक पिबसि २२४।९७ | मन्त्रिणा पृथ्वि (हि २ १६७) १४७।२१५ |
| मत्वा सारं गुणाना (सु ४९४) ७२।६१ | मथो मन्दं मन्दं मरुति १८२।४३ | मन्त्रिणा (पच १ १३८) १६४।५०७ |
| मत्स्यादयोऽपि जानन्ति नीर १५५।९१६ | मध्यं तनुकृत्य (नैषध ७ ८०) २६५।२८१ | मन्त्रे तीर्थे द्विजे (विक्रम ६४) ३७८।५४ |
| मदकलकृतान्तकासर २८४।८ | मध्यं तव (सा द १० १५) २६६।३१४ | मन्त्रो द्वावि (शा प ४१५८) ३७५।२२१ |
| मदनदहन (शा प ३४१३) २७५।२१ | मध्यं विष्णुपदं कुचौ शिव २७२।६८ | मन्त्रो योव (शिशु २ २९) १४६।१८१ |
| मदनमपि गुणैर्विशेषयन्ती २७२।१३ | मध्यत्रिवली (शा प ३३४६) २६७।३३४ | मन्थक्ष्माधरघूर्णिता (सु ३५) १५।३७ |
| मदनमवलोक्य (शा प ८२४) २२२।४९ | मध्यमोपलनिभे (किरात ९ २) २९०।२२ | मन्थानभूमिधर (कुव २७) ३०४।१५७ |
| मदमयमदमयदुरगं (सु ३१) २२१।१५ | मध्यस्य प्रथ्रिमा (सा द ३ ५८) २५६।५१ | मन्यायस्तारणी (वेणी १ २२) ३६६।१३ |
| मदरक्तस्य (भा ५.१४८४) २९४।७०० | मध्यात्ससानीय सुसारभा २६७।३३७ | मन्दं निक्षिपते पदानि ३३।५२ |
| मदर्थसद्भू (नैषध १ १३७) ३६२।१९ | मध्याह्ने (दश रू २ ५०) ३३९।१२३ | मन्दं निधेहि (शा प ३६२०) २९८।१५ |
| मदसिफमुखै (किरात २ १८) ७९।१८ | मध्याह्नार्क मरीचिका ११।३ | मन्दं मन्दं श्रवणपुटकोपान्त २५६।४१ |
| मदाम्भसा (शिशु १७ ६८) १२७।३७ | मध्याह्ने चलतालवृन्त ३३७।४८ | मन्द मरुद्वहति गर्जति वारि २७४।३ |
| मदुक्तिश्वेद्दन्तर्मद (कुव १३६) ३३।४६ | मध्याह्नेऽति (शा प ३८६१) ३३९।१२१ | मन्दं मुद्रितपास (अमरु.१२७) ३४१।५२ |
| मदेकपुत्रा जननी (नैषध १ ३५) ३६२।१८ | मध्याह्ने दव (शा प ४०१४) ३६२।३६ | मन्दमग्रिमधुर्य्य (कुव ६५) ३२२।४ |
| मदोपशमनं शास्त्र ३९।११ | मध्याह्ने नूनमापोऽपि तिग्म ३३६।३४ | मन्दमन्दगमना करिणो २४४।१४ |
| मद्गेहे मुशकीव (सु ३१९७) ६८।७७ | मध्याह्ने हरितो हुताशन २३७।७७ | मन्दश्चन्द्रकिरी (शा प १२५४) ११६।६६ |
| मद्यपस्य कुत सत्य दया १००।३ | मध्ये न कृशिमा स्तने ३५६।९ | मन्दस्मितेन (भामिनी क १२) २७८।४६ |
| मद्यपा कि न जल्पन्ति १६६।५९२ | मध्यन (सा द १०८६) २६५।२६७ | मन्दाकिनीपय पान १५८।२४१ |
| मद्यमन्दविगल (शिशु १० १७) ३१५।२० | मध्यन सा (कुमार १ ३९) २६७।३२५ | मन्दार कुसुम (विद्ध २ ३) २७९।५६ |
| मद्युगमध्योत्पन्ना कृतयुग ९८।८ | मध्येऽथ बलिसद्म दृष्टि २६६।२९८ | मन्दारमाला (शा प ६७) १०१।६१ |
| मद्वाणि मा कुरु (भामिनी शा २८) ४०।५० | मन प्रकृत्यैव (सु १२०६) २७७।१३ | मन्दारमेदुरमरदरसाल २२२।८७ |
| मधुकरगणश्वतं (शा प ८२९) १७७।९९८ | मनसा चिन्तित (दृ श ३८) १६१।३७६ | मन्दोद्धूते शिरोभिर्मणि ११२।२८३ |
| मधुकर तव (शा.प ८१५) २२२।४७ | मनसि (शा प ३३८१) ३२९।५ | मन्दोप्यमन्दतामे (मालवि.२ ७) ८६।१० |
| मधुकर मा कुरु शोकं २२२।६२ | मनसि वचसि (भर्तृ स १९) ५१।२२१ | मन्दोऽयं (सूक्ति ५९९) ३३२।९२ |
| मधुकरैरपवाद (शिशु ६ ९) ३३२।६४ | मनसैव कृतं पाप न १६७।६३५ | मन्दिन्द्या (शान्तिश ३ ८) ७५।१६ |
| मधु द्राक्षा (भामिना शा २९) ३५।१६ | मनस्यन्यद्वचस्य (वृ चा २ ६०) ५५।५० | मन्ये तद्रूप (शा प ३३५७) २६८।३८८ |
| मधु द्विरेफ कुछ (कुमार ३.३६) ३३१।३१ | मनस्विनो न (दृ श ८७) ८०।२१ | मन्ये मायैमम (शा प ४०९०) ३६७।३ |
| मधुधारेव न मुञ्चसि मानिनि ३०५।१३ | मनस्सिहृदय धत्ते (दृ श ९) ८०।२० | मन्येऽमुना कर्ण (नैषध ७ ६४) २६१।१२९ |
| मधुना सिञ्चेन्निम्ब्र निम्बं १६०।३१६ | मनस्वी म्रियते (हि १ १३३) ८०।१९ | मन्ये मृत्यो सपत्नी जगति १२२।१६८ |
| मधुप इव (भामिनी प्रा १७) २४४।२१७ | मनागनभ्यावृ (शिशु २ ४३) १६३।७१७ | मन्येऽरण्ये कुलगिरि ११४।२० |
| मधुपराजिपरा (हरिविजय) ३३०।१ | मनीषिण (भोजप्र ५८) १७४।९०२ | मन्ये सत्यमहं लक्ष्मी समु ६२।७ |
| मधुपानप्रवृ (सा द १० ९५) १०२।४२ | मनुष्यजातौ तुल्याया (सु ३२१४) ९७।७ | मन्ये समास (शा प ३३५०) २६७।३२४ |
| मधुपानसमुल्लसत्प्रवाल ३२०।१० | मनोजराजस्य सितातपत्र २९१।१६ | मन्ये शशरीरमपि तवैव १०७।१८९ |
| मधुपे मालतीपुष्पं सतुण २२२।४६ | मनो धावति सर्वत्र १५८।२२६ | मम करग्रहणाय (शा.प.५९३) १८२।३८ |
| मधुमधुरिमभङ्गी मेजिरे ३४४।४२ | मनोऽपि शङ्कमानाभि २१३।८ | मम प्रिया कैरविणी करेण ३०४।१४९ |
५६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| मम रूपकीर्तिं (शिशु.) | २८८।२७ | महतोऽपि हि विश्वासा | ४७।९९ | मा गमनमदवि (किरात.९ ७०) | ३१६।६२ |
| ममत्वं हिन (भा २ १९५६) | ३८९।४९६ | महतो हि (भाव.३१) | ३७७।१ | मा गर्वमुद्वह (सूक्ति ८६ १४) | ३५५।२ |
| मया कुमार्यापि (शा प ३७६२) | ३५२।२१ | महतो सुवृत्तयो सखि | ४७।९८ | मा गा प्रत्युप (भर्तृ स ६४६) | ११४।११ |
| मयास्योप (काम नीति ९ १०) | ३८९।४७४ | महल्पल्पेऽप्युपा (हि ३ ४९) | १८४।२३४ | मा गा विषाद (सूक्ति १९ ४) | २२३।८५ |
| मयि जीवति बीजाढ्ये | २४१।१३८ | महद्भि स्पर्धे (पच १ ४०४) | ३७७।२ | माघश्वोरो मयूरो सुररिपु | ३७७।१ |
| मयि ते पादपतिते (पंच ४ ८) | ३०५।३ | महद्भिरोधैस्तम (सु.१९०३) | २९४।४२ | माघेन विम्रितोत्सा (सूक्ति ४ ५९) | ३७।६४ |
| मयि मलयसमीरो वर्षतीव | ३०९।२ | महागजाना गुरुबृंहितै | १२८।३८ | मा चक्र चक्रि(शा प १२५७) | १२३।१९४ |
| मयि सकपटं (सा द ३ १६२) | २७९।७० | महागजाना (कुमार १६ ४२) | १२८।४३ | मा जीवन्ध (शिशु २ ४५) | ८१।१ |
| मयि स्थितिर्न (सु २५२१) | ००४।११५ | महाजनस्य संसर्ग (पच ३ ५९) | ८६।२ | माणिक्यद्रव (राघवचैतन्य) | २२७।२०० |
| मयूखनखरत्रुट (सु.१९८१) | ३०१।८६ | महातरुर्वा (सु.७८८) | २४१।१४६ | मात क हृदये (दश रू २ ३९) | २८६।३२ |
| मय्यायाते सपदि शयना | ३५७।४९ | महादेवो देव (भर्तृ स २९९) | ३८८।४५८ | मात किं यदुनाथ देहि | २४१।५२ |
| मरणं प्रकृति (रघु.८ ८६) | ३७२।१७० | महात्मानोऽनुगृ (शिशु २ १०४) | ४५।१४ | मातङ्ग कुम्भ (सूक्ति.५३.३८) | २६६।३०२ |
| मरालश्रेणीभिर्नियतमुप | २७५।३० | महानदीप्रतरणं (विक्रमच १६) | १६७।६५० | मातङ्गा किमु (सूक्ति २२ ६) | २३१।४९ |
| मरौ नास्त्येव सलि (सु ९३८) | २२०।१ | महानपि (सूक्ति ९८.२१) | १९५।७ | मातज्ञाना (शिशु.१८ ३४) | १२९।७३ |
| मर्कटस्य सुरापानं तस्य | १५९।२६८ | महानप्यल्पता (हि.३ १२) | १६४।४९८ | मातङ्गीमिव (भोजप्र २६१) | ३४।६६ |
| मर्तव्यमिति (विक्रम.१४३) | १६५।५४९ | महानुभावसंसर्ग (शा प ३२१) | ८६।१ | मातङ्गैरथ यैर्महे(शा प १५७६) | १४३।४६ |
| मर्दितरावणक्सौ सरयू | २२१।७ | महानुभावसंसर्ग कस्य नो | ८६।३ | मातरं पितरं पुत्र (भोजप्र ३) | ६९।४ |
| मर्यादानिलयो महोदधि | २४९।१०३ | महान्तमप्य (भा ५ १५३३) | ३८८।४६४ | मातर्जीव किमेत (सु ६९) | ७।९४ |
| मलयज (काव्याल सू ४ ३ १०) | २९९।२३ | महाप्रलयमारु ( वेणी ३ ४) | ३६५।५ | मातर्धर्मपरे दया (सूक्ति ९६ ३) | २०८।३१ |
| मलयभुवि विरुद्धश्चन्दनेना | ६०।२४७ | महाबलान्प (भा ५ १५४६) | ३८८।४५३ | मातर्नति परमनुचितं यत् | ९७।११ |
| मलयमग्ना (अमरू ३२) | २८३।१५३ | महामतिरपि प्राज्ञो न | १६४।५०६ | मातमयि (शान्ति ४.२३) | ३६९।६४ |
| मलयशिखरादाकैलास | ३३४।१३० | महाराज श्रीमज्जग (भोजप्र.८२) | १३५।२९ | मातर्मेदिनि (भर्तृ स ३०१) | ३६९।७५ |
| मलयस्य गिरेरपत्यमादौ | २१९।५ | महाशयमतिस्वच्छं नीर | १९५।१ | मातर्लक्ष्मि (भर्तृ स.३०२) | ३७०।१०२ |
| मलयाचलगन्धेन विन्ध्यनं | ८६।४ | महाशय्या (शान्ति.४ ८) | ३६८।५४ | मातस्तर्णकर (सु १०१) | २३१।४६ |
| मलयानिल (सु १६६७) | ३६७।२८ | महासेनो यस्य प्रमदमय | ३६०।३२ | मातस्तातजटासु कि | १२।३१ |
| मलयानिल (काव्याल ३ ३०) | ३३१।१० | महास्वन (कुमार १४ ३२) | १२८।३७ | मा तात सपदा (सु २७४९) | १४५।१३३ |
| मलिनयितुं खलवदन (कुव ९४) | १३८।२ | महिम्नामन्तर पश्य (सु २२५७) | ७८।४ | मा तात साहस (सु २७४७) | १४५।१३० |
| मलिनहुतभुग्धूम (सु १७६०) | ३४१।५४ | महिष्या दृष्टया भाव्यं | १४४।४२ | माता नताना सघट्ट | २०५।८ |
| मलिना अपि सय्यमनात्कृ | २५७।१० | महीपते सन्ति (शा प १६७) | ३३।३२ | माता निन्दति (नीतिसार २) | ६४।१६ |
| मलिनात्मना (सूक्ति १४.४) | २२४।१३० | महीमण्डलीमण्डपीभूत | ३४१।४७ | माता पिता (शा प १३४७) | १४६।१५२ |
| मलिनेऽ |
| पाठ | संख्या | पाठ | संख्या | पाठ | संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| मायति प्रमदा | ३४०।४५ | मार्गं देहि पदं (शा प ५८९) | १४१।३ | मीलत्कैरवलोचना | ३४२।२३ |
| माद्यद्विग्गज (शा.प.११३१) | २१९।११ | मार्गे कर्दम (शा प ९६२) | २४१।४५५ | मुकुटे रोपित. (हि २ ७३) | १६४।४८१ |
| माद्यद्द्रैतण्डगण्ड | १२१।१६६ | मार्गे पञ्चचिते (सूक्ति ७१.२) | ३५०।३२ | मुकुलितमति (किरात १० २७) | ३४०।२९ |
| माद्यन्मातङ्गकु (शा.प.४०७२) | ३६६।१२ | मार्गो भूरि (शा प ७७६) | २१३।६४ | मुक्तं मौक्तिकदाम | २९८।२० |
| मा धनानि कृपण | ७२।४७ | मार्जारो महिषो (हि १ ८७) | १६३।४४९ | मुक्तमूललघु (किरात ९ ५) | २९४।२४ |
| माधवस्य मुरली | २४६।३६ | मार्तण्डमण्डलसमं | १३३।९ | मुक्ता (सूक्ति ९७ १९) | ११७।९२ |
| मा धाव मा धाव | ९२।५० | मार्दव सर्वे (भा ५ १४९८) | ३८९।५०० | मुक्ता पतन्ति भूमौ | ३२०।७ |
| माधुर्यं (वामर्योक्त १) | १७९।१०३५ | मालतीकुसुमे | २३८।८० | मुक्ताताटङ्कयुग | २६१।१३१ |
| माधुर्यंसाराधरि | २४३।१८९ | मालतीमुकुला | २४३।२०९ | मुक्ताफलै किं | ४०।३३ |
| माधुर्यैरपि धुर्यैर्दाक्षा | ३५।१४ | मालाबहर्मनोज्ञ | २५१।८१ | मुक्ताभा ऋकपाल (शा प.१०६) | ९।१२९ |
| माध्वीके विधुमण्डले | १८३।६४ | माला बालाम्बुज | ३५९।८४ | मुक्ताभूषणमिन्दु(भोजप्र.२५१) | ३२१।२७ |
| मानं मानिनि मुञ्च (शृ ति २९) | ३०७।६९ | मालिन्यमब्ज (कुव.१२४) | ३१३।५३ | मुक्तावली स्मर | २६६।३११ |
| मानं मानिनि मुञ्च | ३०८।१७ | मालिन्यमवलम्बे | ५५।६८ | मुक्ता विद्रुमम (कुव ३७) | २७२।७६ |
| मानभ्रष्टपुना (शिशु १० २५) | ३१५।२८ | मालिन्यं परिदृश्यते | ३२५।६२ | मुक्ताहारगुणीभूय | २४६।२४ |
| मानम्लानमाना | ३५८।५७ | मा वन (भा ५ १३७८) | ३८९।५०८ | मुक्ताहार न च | २८६।१७ |
| मानसदुद्गहत (भर्तृ सं ६४८) | ३८५।३३८ | मा वम सत्तृणु | ४।१७ | मुक्ताहारलता (प्रव ७१) | ३५०।८२ |
| मानव्याधि (अमरु १५७) | ३०९।१० | मासि मासि (शा प ४८३) | १५५।११५ | मुक्तिर्हि नाम परम (सु ९४) | ४।३८ |
| मानाभिवर्धनम | ३५१।३१ | मितं ददाति (भा १२ ५५६६) | ३६१।४ | मुक्ते काञ्चनकुण्डले | ३४५।५४ |
| मानिनीजन (किरात.९ २६) | २९९।२२ | मितं भुङ्क्ते (भा ५ १०८८) | ३८८।४४० | मुक्तेषु रश्मिषु (अ.शाकु १.८) | १४०।३ |
| मानिनो हतमानस्य | ८०।१८ | मितमायुर्वयो (शा प ४०९२) | ३६७।५ | मुक्तेर्यास्यति (सूक्ति २ ७१) | १९।३६ |
| मातुर्व्यं वरवंश (सु २९४९) | ८९।५ | मित्रं कलत्र (शा प ४१२५) | १७२।१७५ | मुक्तोत्कर (सा द १० ४५) | २६३।२१७ |
| मातुव्ये सति (प्रसंगा ८) | १८०।१०५० | मित्रं परित्यज (पंच ५ २४) | ३८१।१७८ | मुक्तो मानपरिग्रह (सु १६३५) | ३०९।४ |
| माने नेच्छति (भट्ट.७) | ७७।५१ | मित्रं प्रीतिरसाय (हि १ २१४) | ८८।१९ | मुक्त्वानङ्ग (विद्ध शा ३ २५) | २७६।४० |
| माने म्लायिनि (भर्तृ स ३०३) | ३७६।२५४ | मित्रे स्वेच्छतया (नवरत्न.१) | १७८।१००९ | मुख जुम्भारम्भि | ३२१।२१ |
| मानोन्नेतेत्य (शा.प ३५४७) | ३०९।५ | मित्रखजनबन्धू (भोजप्र १५६) | १५३।१५ | मुख तस्या (शा प ३४७२) | २७०।६ |
| मानो वा द (पंच ५.३) | ३७८।४५ | मित्रद्रुह (सु २९९०) | १५५।९२ | मुखं पद्मदला (चाणक्य ७१) | ४९०।५१६ |
| मान्याता स (भोजप्र ३८) | ३७४।२०४ | मित्रद्रोही (विक्रम ५७) | १६४।४५९ | मुख पाण्डुच्छायं (सु १०९६) | २८६।१९ |
| मान्या एव हि | ४५।१७ | मित्रवान्सा (पच २ ८२) | १६४।५२२ | मुख प्रसन्न (हि २ ५९) | ३७७।१९ |
| मा पुनस्तमभि (शिशु १० २१) | ३१५।२४ | मित्रखजन (शा प १४३८) | ३७७।२४ | मुख प्रियाया | ३३०।३ |
| मा बोधि वैद्यकमथापि | ४३।४ | मित्राणि शत्रुत्वं (मुद्रा ५ ८) | १५१।२८१ | मुखं यदि किमिन्दु | २७१।४० |
| मा भूत्सज्जनयोगो | ४८।१४९ | मित्राण्येव हि (र ४ २० १८) | ३७०।२५ | मुख वहति | २६२।१६३ |
| मा भूजन्म महाकुले (सु ३१९९) | ६८।८३ | मित्रार्थे (पंच १.३४६) | ३७७।२६ | मुख विकसित (शा प ३२७७) | २५६।३५ |
| मा भैष्ट नैते (शा प.३९६४) | ३६०।३ | मित्रे कापि (सूक्ति ६८ १४) | २९६।१२ | मुखकमलक (शिशु ७ ४४) | ३३४।१०८ |
| मामाकाशप्रणि (मेघ २ ४३) | २९२।२५ | मिथ्योऽर्धचन्द्र (कुमार १६ ४९) | १२८।२४ | मुखकृतबिस (शा प ३८२६) | ३३६।१९ |
| मा मालति म्लायसि | २३९।८३ | मिथ्यौषधैर्हन्त | ४४।६ | मुखमात्रेण (सु ९९६) | ३७।७ |
| मा मा ससाध्वसम | ३०५।२२ | मिलितमिहिर | १३०।११० | मुखमिन्दुर्यथा (सा द १० १८) | ३०५।५ |
| मायामयः प्रकृत्यैव (सु ३३७) | ५६।८३ | मिश्रीभूते तत्र (शिशु १८ १८) | १२९।६३ | मुखविधुपरिवृत्तो | २५५।९६ |
| मायामीनतनोरूनोतु | १७।९ | मीन. ज्ञानपर. (कविता ६०) | ३८६।३५८ | मुखसरोरुहं (शिशु ६ ४८) | ३४४।३६ |
| मा याहीत्यपमङ्ग (सु १०४९) | ३३०।८ | मीनवती नयना (रसग २रू) | २५३।९ | मुखारविन्ददत्त | २६१।१४१ |
| मारमासुषमा (सा.द १० १३) | २०६।११ | मीमासका कति | ४३।२ | मुखारविन्दोपरि | २५५।७८ |
| मारयन्त्या (शा प.३३६५) | २६९।४२३ | मीमासको मही | १०२।२४ | मुखेन गरल (कुव १७१) | २३६।६ |
| मारस्य मित्रमसि | २१०।२६ | मीमासा पठिता | ४१।७२ | मुखेन चन्द्रका (सूक्ति ५३.१७) | २७०।२ |
| मारारिशकरामेभ (काव्याल.५.६) | २०५।७ | मीमांसाणर्वसोमं | २२१।०६ | मुखेन नोद्गिर (शा प २४९) | ४५।१५ |
| मा रोषीश्चिरमेहि (गा.प.४०८) | ६७।६२ | मीयता कथमभी (नैषध.५.३८) | ६९।१८ | मुखेनैकेन विध्यन्ति (छ्र.३७५) | ५३।१०५ |
| मा वनं छि (भा.५.१६७८) | ३८९।५०४ |
८ सुभा०अनु०
५८ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| मुखेन्दुच (सूक्ति ५३ ४६) ५६४।२६० | मूर्ख व्यसनिनं १४२।३० | मृत्युर्मायति मूर्ध्नि ७५।१९ |
| मुखे यद्वैरस्यं (शा प १०५३) २४२।१८० | मूर्ख खल्प (हि ३ १२५) ३९।१३ | मृत्योर्बिभेषि किं (सु ३२९५) ३७५।२३१ |
| मुखे हारावाप्तिर्नय (शा प १२६२) ११३।७ | मूर्खेष्विहानि षडिति ३९।२ | मृत्योर्वा (भा १२ ९९५२) ३८८।४४३ |
| मुखैरसौ (किरात.४ ३६) ३४४।२८ | मूर्खत्वं सुलभं (उद्भट १) ४१।६६ | मृदुचरणतलाप्रदु ३३४।११२ |
| मुख्यमेक १५९।२६३ | मूर्खशिष्योप (वृ चाणक्य १४) १५५।९१ | मृदुनातिसुवृत्तेन (पञ्च.१.२९४) ९७।१२ |
| मुग्धस्य कलिंविजि २९६।६ | मूर्खश्विरा (वृ चाणक्य ४ ६) ३८९।४७१ | मृदुपवनवि (विक्रमोर्व ४ २२) २८३।१६६ |
| मुग्धस्य ते वद (शा प ३४३०) २८५।४७ | मूर्खस्तु (वृ चाणक्य.३ ७) ३८८।४४३ | मृदुभिर्बहुभि (दृ श.५४) १५१।३६० |
| मुग्धा कान्तस्य (काव्या २ १५५) ३२९।१ | मूर्खा यत्र (वृ चाणक्य ३ २१) ३८१।१९० | मृदुराई. (हरिवश ११६८) ३८१।१९१ |
| मुग्धा दुग्ध (सा द १० ३६) ३०३।१३६ | मूर्खाणा (पञ्च १ ४४९) १६४।५१८ | मृदुलकनककान्ति ३१३।५७ |
| मुग्धा खप्रस (शृङ्गारति १ ५१) २७६।५१ | मूर्खे नियोज्य (चाणक्य ८५) १४६।१७९ | मृदुलवलितमध्यं २५५।९ |
| मुग्धे किं (शा प ३५५३) ३०८।२० | मूर्खों (वानर्यष्टक ५) १७१।८२१ | मृदुव्यवहितं (शिशु २ ८५) १४७।१८७ |
| मुग्धे तवास्मि (सु २१२७) ३२०।१३ | मूर्खोऽपि मूर्ख ३९।६ | मृद्ना खादन्ता (शा प १००५) २३८।७६ |
| मुग्धे दोर्लतिका (शा प ३४१९) २८६।२३ | मूर्खोऽशान्त (नवरत्न ६) १८०।१०५४ | मृदो परि (सु २६९२) १४६।१६८ |
| मुग्धे धानुष्कता (सूक्ति ७४ १८) ३१२।१ | मूर्खो हि (भा १ ३०७७) ३९।३ | मृद्वटवत्सुख (हि १ ९२) ५७।१३५ |
| मुग्धे प्रतार (शा प ३३३२) २६४।२३५ | मूर्तिमन्तमिवरा (सु २०१६) ३१४।३ | मृद्वङ्गि कठिनौ (शा.प.३३३९) २६४।२४७ |
| मुग्धे मानं न ते ३०७।१ | मूर्ध्न्यध्याधूयमान (सा द ७ १६) १०।१५५ | मृष्टचन्दनवि (शिशु १० ८४) ३२१।१० |
| मुग्धे मानिनि ३०७।६८ | मूर्ध्ना कल्याण ११८।११५ | मेखलीयति मेदिन्या. १२३।१ |
| मुग्धे मुग्ध (अमरु ७०) ३०८।२१ | मूल स्थूलमती(भामिनी प्रा ३२) २३६।२२ | मेघाटोपै स्वनित (सु १७८९) ३४१।५६ |
| मुग्धे मुश्व विषा (सु ८४) १५।२९ | मूल दोषस्य (किरात ११ २०) १६१।३६३ | मेघालये भवति २०२।८६ |
| मुग्धे विधेहि (गीत १० १९ २) ३०५।२३ | मूल बालकवीरुधा (विद्ध ४ ५) ३३६।२५ | मेघालये भवति २०२।९३ |
| मुञ्चन्तश्चापलरस ४६।५२ | मूलं भुजगै (शा प ९९९) २३७।४६ | मेघालये भवति २०२।९० |
| मुञ्चति मुञ्चति (कुव ४१) १२३।१९२ | मूलभृत्यान्परि (हि २ १३६) १४७।२१३ | मेघा वर्षन्तु (मृच्छ ५.१६) २९८।१ |
| मुञ्चद्विर्मदवारि १३१।११७ | मूलमेवादित (भा १ ५५५७) ३८१।१९२ | मेघैर्मेदुरमम्बरं (गीत.१ १ १) २३१।४१ |
| मुञ्च मुञ्च सटिलं २१२।२४ | मूलादेव (शा प १०३७) २४१।१५० | मेघैर्व्योम नवा (सु १७७७) ३४३।१०६ |
| मुण्ड पृच्छति २०४।११० | मृग प्रमील ११८।१०० | मेघो भाति १०९।२२० |
| मुण्डी जटी (शा प ४१७३) ३७५।२३७ | मृगत्रय भाति १९०।७१ | मेदरच्छेदकृशो (अ शाकुं २ ५) १४५।१०९ |
| मुण्डो जटिलो (शा प ४०३०) ३६४।१९ | मृगमदकर्पूरा (सु ४१५) ५८।१८७ | मेदिन्या विषमेषु १०८।२०७ |
| मुदं विषाद (हि.३.११८६) १७४।१९० | मृगमीनसज्ज (भर्तृ स ३२) ५७।१३६ | मेधावी (स पाठोप ५५) १४४।६९ |
| मुद्रदाली धृत (भोजप्र १४२) १८८।४२ | मृगशिशुदृश (दश रू २ २९) २८९।६५ | मेरु स्थितो (शा.प ४०४९) ३६४।३० |
| मुद्रीदालिशुशालित् १९३।९५ | मृगशिशुनयनाया १८२।४२ | मेरुर्द्रुरगतो हिमा १११।२६२ |
| मुनिर्नयति (कुव १७१) २१७।४२ | मृगसबन्धिनी २५९।६६ | मेरूरुकेसरसुदार (सु ५४) १८।२८ |
| मुनेरपि (भा.१२.४१४२) १६५।५५४ | मृगा प्रियालद्रु (कुमार ३ ३१) ३३१।२८ | मोमारामममादंदे १८८।३६ |
| मुरारातिर्लक्ष्मी (शा प १०६८) २१५।९ | मृगाङ्गोड्य (शा प ३६२७) ३०१।७८ | मोहं रुन्द्धि विमली ४२।३ |
| मुरारिपदभक्तिश्चेत्तदा ३६।३९ | मृगा मृगै (पञ्च.१ ३०५) १७२।८४० | मोहान्मया सु (अ शाकु.७ २४) ३०६।२० |
| मुहुरनुपतता (किरात १० ३३) ३३३।७८ | मृगेन्द्रं वा भृगारिं (शा प ९०१) २२९।२ | मौढ्येन विपदा (कविता ७६) ३८१।१९४ |
| मुहुर्मुहुरवेक्षणं ३०६।३७ | मृगेभ्यो रक्ष्यते (शा प ९०२) २२९।३ | मौनं कालविलम्ब १५८।२४३ |
| मुहुर्लक्ष्योद्भेदा(मुद्रा.रा ५ ३) १५२।४१४ | मृगैर्नष्टं शशैलौघ (शा प ९०३) २२९।४ | मौनादस्तमितेव (सूक्ति.१.१०) ५।५२ |
| मुहुर्व्यजनवीजनै. २८९।६६ | मृणालव्यालवलया (शा प ४६३२) ११।४ | मौनान्मूक (हि २.२६) ९७।१५ |
| मुहूर्तंमपि (वृ चाणक्य १३ १) १६९।२७६ | मृत प्राप्नोति (हि २ १५९) १४७।२१७ | मौनी पादप्रहारे (शा.प.२८६) ७८।३ |
| मूक परापवादे ४८।१२४ | मृतस्य लिप्सा १७२।८२५ | मौने मौनी १७८।१००० |
| मूकारब्ध कमपि ३६३।२० | मृताना (पञ्च.२.३३८) १४९।२९७ | मौर्ये सर्वापदा (सु ३१५७) ६६।१६ |
| मूकीभूय तमेव (सु ७२१) २२५।१४१ | मृत्तो दरिद्र (विक्रमच १५६) १६५।५२९ | मौलि खर्णकि (शा प ११८८) २४७।५२ |
| मूढ जहीहि (मोहमूद्गर ) ८३।११०७ | मृत्पिण्डो जल (भर्तृ.स ३०४) ८०।४० | मौलिं मानविधि १३२।३४ |
| मूढे निरन्तरपयो २९८।१६ | मृत्यु शरीर (शा.प.३८०) ७१।४ | मौलीं किं नु महेश ६।६६ |
संस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः (पृष्ठ ५९)
| मौलौ केकिशिख २५।१८० | य स्तोकेना (पञ्च २ १४८) १६५।५३२ | यत्प्रत्यग्रदलावलीकवल २३३।९५ |
| मौलौ मन्दारदाम ३४।६७ | य स्यात्क्रवललक्ष्य (सु १९२) ३८।३० | यत्प्रदेशमुपनीय (नैषध ५ ८५) ६९।२० |
| मौलौ सन्मणयो (उद्भट ६३) २३५।१६३ | य स्वभावो हि (हि १ ५८) ८४।३ | यत्प्रियव्यति (शिशु १० ५१) ३१६।११ |
| प्रदीयसीपि (शिशु २ ७४) ८४।६ | य एवादि स एवा १८५।१८ | यत्र क्षिपामि दृशमन्य २७८।४५ |
| प्रदीयस्त्वा (शा प १००७) २३९।८७ | यक्ष विरहिण क्वचि ३०३।१४० | यत्र देशेऽथ (पञ्च १ ४४३) १६४।५१६ |
| म्रियमाणं (शा प ४१६९) ३७३।१९२ | यच्च कामसु (भा १२ ६५०३) ७६।१६ | यत्र न फलितास्तरवो १६९।७३४ |
| म्लानस्य जीवकुसु(मालती ६ ८) ३१३।५२ | यच्चिन्तितं तदिह १७६।९७१ | यत्र न मदनवि (शा प.३६६६) ३१७।२ |
| यच्छक्यं प्र (भा ५ ११०७) १६६।६०२ | यत्र नार्यस्तु(भा १३ २८८८) ३८९।४९३ | |
| य | यच्छजलमपि जल (पञ्च २ ७९) ७०।२६ | यत्र नास्ति दधिमन्थन ८९।१ |
| यं दृष्ट्वा मीनरूप १८।१४ | यच्छति प्रतिमु (किरात ९ १४) २९६।६ | यत्र पतत्यव (सा द १० ६३) २५१।२६ |
| य प्राक्प्रत्यगवा ३०२।१९४ | यजमानेन क स्वर्गं १९९।३२ | यत्र यत्र चलते शनै २६०।१०६ |
| य मातापितरौ (म २ २२७) १६७।६१७ | यज्जातोऽसि (शा प ७५८) २१०।३५ | यत्र विद्वज्जनो नास्ति (हि १ ६३) ३८।२ |
| यं य नृपोऽनु (भोजप्र १३९) १४७।२०१ | यज्जीवति क्षणमपि (पञ्च १ २४) ९८।९ | यत्र श्यामाकवी ९५।१२९ |
| यं शैवा समुपास (महा ना १ ३) १५।२७ | यत प्रभृति ते कान्तं २९१।४ | यत्र सूक्त (भा ५ ३२९०) ३८८।४४१ |
| य कन्दुकैरिव ४।२७ | यत सत्यं त (विष्णु प्र अ ९) १४३।३५ | यत्र स्त्री यत्र (पञ्च ५ ६१) ३४९।३२ |
| य करोति (किरात ११ १९) १६१।३६ | यत एवागतो (वृ श ६६) १६९।६९९ | यत्राकृतिस्तत्र गु(पञ्च.१ २०८) २७८।३२ |
| य काकिनी (सु २९११) १५१।३७९ | यती व्रती चापि १७४।८८२ | यत्राखण्डलदन्तिद ९४।१२० |
| यः कुन्तपाणिरिह २४८।९१ | यतो गजैर्र्विना (शा प १५६०) १४३।३६ | यत्रात्मीयो जनो १५०।३३३ |
| य कुर्यात्सन्धि (हि २ १३०) १४७।२११ | यतो यत षट्चर ३४५।५१ | यत्रानुल्लिखि (का प्र ७.२७३) २१८।६२ |
| य. कुलाभिज्ञ (हि १ १३०) १४५।१९६ | यतो यतोऽङ्गा (शा प ३३७५) २७०।२८ | यत्रानेके क (भर्तृ स १७१) ३७४।१९९ |
| य कृत्वा सुकृ (पञ्च १ ९३) १४९।२७५ | यत्कण्ठे गरल (शा प ५०२) १८२।५० | यत्रापि कुत्रापि २२९।१४ |
| य कृष्णं कुरु (शा प ८६४) २२६।१६५ | वत्करोल्यरतिं केश (गुणरत्न २) ७१।३ | यत्राभ्यागतदानमान ६३।४० |
| य कोटिहोमानल १३५।१३ | यत्कर्म कुर्व (मनु ४ १६१) १६७।६०३ | यत्रायुद्धे ध्रुवं (हि २ १७०) १४७।२१८ |
| य कौमारहर (सा द १ २) ३५३।४२ | यत्कस्यामपि (नैषध १२ ८१) ११०।२४३ | यत्रार्जवेन लघिमा १६९।७३८ |
| य पठति लिखति १७०।७६० | यत्कीर्ति कापि गङ्गा १३८।८८ | यत्रास्ति लक्ष्मीर्विप १७३।८४७ |
| य. परस्य विषमं १७१।८१२ | यत्कीर्तिर्वलयं भुव १३७।६७ | यत्रैकं श्रुतमक्षरं ३६९।८१ |
| य पित्रा (मार्क पु २१ ९५) ३८५।३२६ | यत्कीर्त्या धवलीकृत १०७।१७९ | यत्रैता लहरीच (कुव.१७१) २५२।५६ |
| य पीयूषसहो (शा प ११६४) २४५।१२ | यत्कोवनो(भा १२.११०१८) ३८९।५०५ | यत्रोदक (वृ चाणक्य ७ १३) ३८८।४४४ |
| य पूतनामारणलब्ध २२।९८ | यत्क्षान्ति. (शान्तिश ३.१२) ३७०।९७ | यत्सग्रहो (राज.त ६.२२७) ३८८।४५१ |
| य. पृष्ट्वा कुरु (पञ्च ४ ६४) १६५।५४४ | यत्खलु खलमूखेषु ५७।१४३ | यत्सकाशाच्च (पञ्च २.१००) १४९।२८० |
| य पृष्टुं युधि (नैषध १२ ९७) १०८।१९२ | यत्तादृशेषु सरलेषु न २१२।४२ | यत्सत्यव्रतभङ्गी (वेणी १ २४) ३६६।५ |
| य प्रशंसति नरो ७०।३३ | यत्तालीदलपा (विद्ध शा.२.१५) २८६।२६ | यत्सद्गुणोऽपि (शा प ११९८) २४८।७४ |
| य. प्रागासीदभि ३१३।५८ | यत्तीर्थाम्बु मुखाम्बुजा २७२।६९ | यत्सारस्वतवैभव गुरु(भोजप्र ९५) ३४।६३ |
| य प्रीणयेत्सुच (भर्तृ स २७९) ५०।१९२ | यत्तु (काम नी ११ ३९) ३९०।५१४ | यत्स्मृत्यैव परां यान्ति (सु ३४८) ५६।९० |
| य. शौर्यावधिरे (शा.प ९१७) २३१।४६ | यत्त्वन्नेत्रसमान(सुवृत्तति २.३९) २९२।३० | यथा काष्ठ (भा १२ १३३८) १६६।५८९ |
| य श्रीख (प्र राघव ७ ६२) ३०२।१०४ | यत्नादन्विष्य का ग्राह्या १९९।२५ | यथा खननख् (मनु २ २१८) १६७।६१६ |
| य सतापमपाक (शा प ८०९) २२१।३१ | यत्नादपि क (पञ्च १ ४४१) २२६।१७० | यथा खरश्चन्दन (सुश्रु १.१३) ३८८।४५४ |
| य समानं समा (पञ्च २ २२) १४९।३०४ | यत्नोत्थापन (शा.प ४०५६) ३६५।५० | यथा गजपति श्रान्त (सु ३५४) ५६।९४ |
| य सत्पदस्थमिह (सु १९१) ३८।२३ | यत्पङ्केरुहलक्ष्म ३०९।९५ | यथा गौर्दुह्य (का नी ५ ८४) १४९।२९४ |
| य सर्वैका (राज त ४.५२९) ३८८।४८४ | यत्पद्ममादित्यु(नैषध २२ ११५) ३१२।३७ | यथा ग्रामान्त(र २ १०८.५.६) ३७७।३१ |
| य. ससर्ज कमल २६२।१७७ | यत्पल्लव समभवत्कुसु २१२।४३ | यथा चतुर्भि (वृ.चा ५ २) १७५।९१४ |
| य सिन्धौ फेनराशि ३।३४ | यत्पादा शिर (शा प.७४७) २०९।१६ | यथा चित्तं तथा (विक्रम २५२) ४६।३६ |
| य सुन्दरस्तद्वनिता ९२।५८ | यत्पीयूषमयूखमालि ३०२।११३ | यथा छायातमौ (पञ्च २ १३६) ३७७।३३ |
| य सृष्टिस्थितिसंहतीर्वि १।१५ | यत्पूर्वं पवना (शा.प.११७२) २४६।३१ | यथा तथापि य पूज्यो (सु.१९) १।६ |
| य सैन्यै स्मर (शा प ३७२१) ३२४।४५ |
६० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| यथा तैलस्य (भा १३ ३३८) ३८८।४५९ | यदकांशुकान्त (शा प ५९५) २०७।१४ | यदि रामा (वृ.चाणक्य १७ १६) ८९।२ |
| यथा दोषो हिमालयस्य (दृ श ४) ५५।७४ | यदर्ज्यते परिक्ले (शा प ३७८) ७१।२ | यदि वै मनसि १०४।९२ |
| यथा धेनुसहस्रेषु (पच २ १३२) ९१।१२ | यदवधि वि (भामिनी शृ वि ६०) २५५।७ | यदि सत्सङ्गनिरतो (सु ४६१) ८७।१५ |
| यथा नयति कै (शा प २०६१) १८८।३७ | यदवधि विबुद्ध ३५२।१७ | यदि सन्ति गुणा (कुव ५१) ८१।६ |
| यथा परोपकारेषु ५६।१०७ | यदशक्य न त (हि १ ९०) १६३।४५० | यदि समर (वेणी ३ ६) १५२।४०२ |
| यथा प्रभुक्रुता (हि ३ ८८) १४८।२३६ | यदसेवनीयमसता ३१।२२ | यदि स्मरामि (शा प ३४६२) २७७।५ |
| यथा बीजं विना(मा १३ २०१)३७७।३५ | यदस्माभि (शा प ४१२८) ३७३।१७८ | यदि स्याच्छीत (पंच १ २८७) ३४९।३५ |
| यथा बीजा (शा प १२९२) १४५।१२४ | यदस्य यात्रासु बलो (नैषध १८) १२५।६ | यदि स्यात्पाव (पंच ३ १९३) ३४८।२३ |
| यथामिषं ज (स्कंद नागर १८४) ६४।९ | यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं (भर्तृ स ५) ४१।५८ | यदि स्यान्म (सा.द १० ४७) २५९।७२ |
| यथा मृत्पिण्डत (पञ्च भूमि ८१) ८२।८ | यदा तु भाग्य (मृच्छ १ ५३) ६७।४७ | यदिच्छसि (शा प.१४२६) १५८।२१० |
| यथायर्थ ता. (किरात ८ २) ३३४।१२० | यदा त्वं चन्द्रो (शा प ३५६४) ३०९।३ | यदीयबलमालोक्य २८३।४ |
| यथा यथा भोज (भोजप्र ७६) ११७।८७ | यदानतोऽयदान २०६।१३ | यदुपात्तं (मार्क पु २१.९३) ३८५।३३२ |
| यथा यथाय वल २५८।३२ | यदा न योगो ३८९।४८० | यदेक कासारं रच २९२।१९ |
| यथा यथा विश (शा प ३२७०) २५४।१ | यदा पूर्वं ना (शान्तिश २ ६)३७६।३५० | यदेकस्मिन्वर्षे २४०।११७ |
| यथा यथास्या (शा प ३२८५) २५५।१७ | यदा प्रकृत्यैव (शान्तिश २ ४) ३२।३ | यदेतच्चन्द्रान्त (भोजप्र २३६) २०५।८ |
| यथा यथैव स्नेहे (शा प ३७२) ५४।२२ | यदालोके सूक्ष्मं (अ शाकु १ ९) १४०।४ | यदेतत्कामिन्या (शा प ४१७०) २४६।३५ |
| यथा यूनस्तद्व (नैषध २२ १५०) ३१।३९ | यदा वि (किरात.१४ २४) १७४।९०४ | यदेतत्क्षेत्राम्भ (शा प.१४०१) ५१।२३४ |
| यथा रन्ध्रे व्योम्न (कुव १७१) ३४२।८७ | यदा विनाश (र ३ ६२ २०) ३८३।२४३ | यदेतत्स्वच्छन्दं (भर्तृ.३.५१) ३६८।४६ |
| यथा विहंगास्तरुमा १७४।८८१ | यदा विनाशो (र ३ ६२ २०)३८८।४५६ | यदेते साधूना (शान्तिश ३ २३) ७२।५५ |
| यथा वृष्टि समुद्रेषु ५५ ७१ | यदा शरीरस्य शरी(शाकु ९४)३८९।४६८ | यदेव भर्त्ता (शा.प.४९५) १६६।६०४ |
| यथा शरीर किल (सु ५२६) ७०।३४ | यदासीदज्ञानं (भर्तृ स ६) ३७५।२४६ | यद्रन्ध्रद्विपदानवा १३७।६६ |
| यथा शरीर (कथास २२ ४०)३८२।२२८ | यदासौ दु (शान्तिश १ २२) ३६८।४८ | यद्रम्यं गुरुगौर (अमरु १५९) ३०७।६७ |
| यथा सत्प्रसव १९५।४ | यदि कुप्यसि ना (मृच्छ ५ ३४) ३०८।५ | यद्गुणैर्मथिते १३४।४ |
| यथा हि पुरुष (स.पातोप ५६)३८२।२२९ | यदि क्षुण्ण पूर्वे १११।१२४ | यद्ददाति यदश्नाति (भोजप्र ६३) ६८।२ |
| यथा हि (याज्ञ ३ १६२) ३८२।२३२ | यदि गन्तासि ३५४।७२ | यद्ददासि विशिष्ठे (हि १ १६९) ६८।३ |
| यथा हि मलिनैर्वस्त्रै (पच ४ ३०) ८४।९ | यदि गर्जति (मृच्छ ९ ३२) २९८।९ | यद्दुर्गामटवीमट ६९।११ |
| यथा हि शृङ्गं (भा १२ ९९२०) ७६।२० | यदि तव हृदयं (भोजप्र ४९) १५१।३७२ | यद्धात्रा निजभाल (भर्तृ स ५६) ९२।९९ |
| यथा ह्येकेन चक्रेण (याज्ञ १ ३५१) ८२।७ | यदि त्रिलोकी (नैषध ३ ४०) १०४।१०३ | यद्बाहू व (प्र राघव ३ २६) १०९।२२६ |
| यथेयं वाग्देवी (शा प १८२) ३५।२२ | यदिदमगणयित्वा ३०६।३२ | यद्विम्बमम्बरमणि २७।६ |
| यथोदयगिरौ द्रव्यं (हि प्र ४६) ८७।६३ | यदि दह्येतन (आनन्द देवीश.) ५०।१९० | यद्बीजानि च १२१।१५७ |
| यथोर्ध्वाक्ष पिब (कुव ९८) ३३९।११७ | यदि न स्यान्न (पच ४ ७१) १४५।१२६ | यद्धनु धनुरीश्वरस्य ९४।११३ |
| यदक्षिभ्रूलतापा (शा प ४०५९) ३६४।५ | यदि नाम कुले (सु ३१५८) ६६।१७ | यद्भर्तुं कुरुते(नैषध १२.९२)११०।२४५. |
| यदचेतनोऽपि (भर्तृःस ६५) ७९।१५ | यदि नाम दैव (भर्तृ स ३०७) २२१।९ | यन्मूलते तरलिते २०८।४० |
| यदधोऽध (हि १ १५७) ७१।१७ | यदिन्दोरन्वेति ५१।२३५ | यद्यत्परवशं कर्म (म ४ १५९)१६७।६२० |
| यदन्तस्तन्न जि (पच ४ ५३) ३४९।२७ | यदिन्दोर्लक्ष्मीस्ते २९१।१५ | यद्यदिष्टतमं तत्तद्धे ५६।१११ |
| यदपथ्यवता १६६।५७८ | यदि परगुणा (दश रू ४ १७) ६१।२५६ | यद्यदेव रुचे (शिशु १० ७१) ३१९।२२ |
| यदपि कटकयात्रा ११६।६५ | यदि प्रभुरुदारधी ३३।४८ | यद्यदेव हि वाञ्छे(हि १ १९१)१६३।४६४ |
| यदपि जन्म बभूव ९२।६९ | यदि प्रसारीकु (नैषध ७ ४३) २६३।२१० | यद्यप्यनीनं चिर २४०।११४ |
| यदपि मेघगणेन २२३।७५ | यदि प्राणा एव २९२।१८ | यद्यपि क्षितिपा(हनु ११.१९)१४७।१९४ |
| यदपि रतिमहोत्सवे ३५।५१ | यदि प्रियावियो (शा प ३४४९) २७७।१ | यद्यपि खदिरारण्ये २३८।६५ |
| यदभावि न (भर्तृ स ६६६) १६२।४२९ | यदि प्रिये वेत्सि तब ३०५।१५ | यद्यपि च दैवयो २२९।१६ |
| यदमरशैलै सिन्धो २६२।१९४ | यदि भवति दै (पच.१ १९२) ३५२।१६ | यद्यपि चन्दन (भर्तृ स ६७१) २३७।४१ |
| यदमी दश (शा प.२४४) ४८।११५ | यदि भवति (पच १ १९२) ७२।३३ | यद्यपि चातकप (चातक ८) २२६।१५३ |
| यदम्बुकणमादा (शा प ७८९) २११।६ | यदि मत्तोऽसि (शा.प ९३६) २३१।६२ | यद्यपि तरणे कि २२९।२३३ |