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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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श्रीः गौडीयमहाकविश्रीचन्द्रशेखरविरचितम् सुर्जनचरितमहाकाव्यम् प्रथमः सर्गः कार्यं प्रकाशयति कारणमन्तरेण स्वेच्छानुरूपविभवः प्रभुरव्ययो यः। सामोपगीतशिवकीर्तननामधेयः इयामः समग्रयतु सर्वसमीहितं नः ॥ १ ॥ जो स्वयम्भू अपनी माया-शक्ति के द्वारा स्वयं को अधिष्ठान बनाकर इस सम्पूर्ण कार्य- प्रपञ्च को, जिसका मिथ्या होने के कारण वास्तव में कोई कारण नहीं है, अभिव्यक्त करते हैं, जिनकी इच्छा-मात्र से यह विश्व-प्रपञ्च अभिव्यक्त होता है अथवा जो अपनी इच्छा-मात्र से वामन और विराट् बन सकते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं, जो कूटस्थ नित्य और अविनाशी हैं, जिनके कीर्तन और नाम-स्मरण को महामङ्गलकारी बतलाते हुए सामवेद जिनकी महिमा का गान करते हैं, वे भगवान् विष्णु हमारे सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करें ॥ १ ॥ यस्याः कृपालवसुधापरिशीलनेन निर्मात्यशेषमगुणोऽपि पुमान् पुराणः। तां मन्महे निगमसारगिरामुपास्यामाशापुरां पुरुषकारखनिं पुरारेः ॥ २ ॥ जिनकी कृपा के अणुमात्र अमृत को पाकर आदिपुरुष भगवान् विष्णु स्वयं निर्गुण होते हुए भी इस सारे संसार का निर्माण करनेमें समर्थ होते हैं तथा वेदों और शास्त्रों की सार-भूत वाणी जिनकी उपासना करती है उन (चौहाणवंशान्तर्गत हाड़ाकुल की कुलदेवता) भगवती आशापुरा देवी को हम भगवान् सदाशिव के पौरुष की खान मानते हैं (क्योंकि बिना शक्ति के 'शिव' 'शव' ही बने रहते हैं) ॥ २ ॥ (१) वस्तुतः अविद्यमानस्य कार्यप्रपञ्चस्य कारणरहितत्वात् कारणं विनापि कार्यावभासः संभवति यथोक्तं वेदान्तसम्प्रदायविद्भिः गौडपादाचार्यैः “संभूतेरपवादाच्च संभवः प्रतिषिध्यते । कोन्वेनं जनयेदिति कारणं प्रतिषिध्यते ।” इति, अपि च “अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजातिसमतां गतम् । यथा न जायते किंचिज्जाय- मानं समन्ततः ॥” इति, “मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ।” इति च । स्वस्या इच्छाया अनुरूपो विभवः सर्गः यस्य सः । यद्वा स्वेच्छानुरूपो विभवः शरीरं यस्य सः, अणोरणीयासः महतो महीयसः परमेश्वरस्य वामन- विराड्रूपधारणसामर्थ्यात् । सामभिः उपगीतं शिवं मंगलं कीर्तनं नामधेयं च यस्य सः। कालिदासैरप्युक्तं रघुवंशे (१०, २१) “सप्तसामोपगीतं त्वां” इत्यादि । (२) अगुणः निराकारनिर्गुणरूपः गुणरहितश्च । आशापुरा नाम चौहाणवंशान्तर्गतहाडाकुलदेवी यस्याः द्वे मन्दिरे बूँदीनगरे कोटानगरे च विराजते । पुरारेः शिवस्य पुरुषकारस्य पौरुषस्य खनिं उद्गमरूपां, पौरुषस्य शक्तिरूपत्वात् शक्तिं विना शिवे स्पन्दाऽभावात् च ।

२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शुम्भादिदम्भदलनेन विजृम्भमाणशम्भुप्रमोदभरपल्लवितप्रभावाम् । सम्भावितां नुतिभिरम्बुजसम्भवाद्यैः शाकम्भरीं भगवतीमनिशं भजामः ॥ ३ ॥ शुम्भ आदि दैत्यों को मारकर उनके अभिमान को चूर कर देने के कारण उत्पन्न होने वाले भगवान् शिव के हर्षातिरेक से विकसित प्रभाव वाली तथा ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं द्वारा प्रणामों से पूजित (साँभर नगर में स्थित चौहानवंश की कुलदेवता) भगवती शाकम्भरी देवी का हम रात दिन भजन करते हैं ॥ ३ ॥ पीयूषसारसरसान् भणितिप्रवाहान् मूकेऽपि वत्सलतया प्रतिपादयन्ती । देवी गिरां मयि चिराय विरामशून्यमाविष्करोतु करुणोपचितं प्रसादम् ॥ ४ ॥ जो वात्सल्य के कारण गूँगे को भी अमृत के सार के समान सरस और मधुर शब्दों की धारा बहा देने में समर्थ बना देती हैं वे वाणी की देवी सरस्वती दयाकरके मुझे भी कभी न रुकनेवाला वरदान दें ॥ ४ ॥ औचित्यमात्रमवलम्ब्य नमामि साधूनेतेषु मे किमपि नैव निवेद्यमस्ति । ये निर्निमित्तमुपकारपराः परेषामारोपितानपि गुणान् शतशाखयन्ति ॥ ५ ॥ केवल परम्परागत औचित्य का निर्वाह करने के कारण ही मैं सज्जनों को प्रणाम करता हूँ। वास्तव में उनकी सेवा में निवेदन करने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है। बिना किसी स्वार्थ के सदा दूसरों का उपकार करना ही सज्जनों का स्वभाव है। जैसे धरती में रोपे गये पौधे की सैकड़ों शाखायें फूट निकलती हैं वैसे ही सज्जन दूसरों के गुणों को सौगुना बढ़ा चढ़ा कर मानते हैं अथवा सज्जन इससे भी अधिक हैं क्योंकि शाखायें तो सचमुच के पौधे से ही निकल सकती हैं, किन्तु सज्जन लोग दूसरों के 'आरोपित' अर्थात् कल्पित (वस्तुतः अविद्यमान) गुणों को भी सौगुना बढ़ाकर मानते हैं ॥ ५ ॥ राज्ञामपारगुणसारधुरन्धराणां वंशान्हं कृशमतिप्रसरो विवक्षुः। पद्भ्यामुदग्रगिरिशेखरमारुरुक्षोः पङ्गोर्विवेकविकलः पदवीं प्रपन्नः ॥ ६ ॥ मैं दुर्बल-बुद्धि और अविवेकी होते हुए भी अपार गुणों में अग्रगण्य चौहान-वंश के राजाओं का वर्णन करने की इच्छा कर रहा हूँ। मेरी यह इच्छा वैसी ही है जैसी कि किसी पंगु की उन्नत गिरिशिखर पर पैदल चढ़ने की इच्छा ॥ ६ ॥ आज्ञाबलात् तदपि शूरजनस्य राज्ञः स्वान्तःस्थितेन हरिणा स्वयमीरितस्य । सोऽहं विहाय परिहासभयं सभायां लौल्येन साहसरसं सहसा प्रपन्नः ॥ ७ ॥ अपने अन्तःकरण में स्थित भगवान् की प्रेरणा के कारण शूर-वीरों में अग्रगण्य राव सुर्जन ने मुझे यह महाकाव्य लिखने की आज्ञा दी है। अतएव उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके मैं, सभा में मेरा परिहास होगा इस भय को छोड़कर, चपलतावश सहसा यह महाकाव्य लिखने का साहस कर रहा हूँ ॥ ७ ॥ (३) शुम्भादिदैत्यदलनेन प्रकटितो यः शंभुप्रमोदभरः शिवस्य हर्षातिरेकः तेन पल्लवितो विकसितः प्रभावो यस्यास्ताम् । शाकम्भरी नाम चौहानवंशकुलदेवी यस्याः मन्दिरं शाकम्भरी (सांभर) प्रदेशे विराजते । (५) आरोपितान् वस्तुतः अविद्यमानान् भूमौ आरोपितांश्च ।

प्रथमः सर्गः ३ जिह्नाविलोलनविलासंवशा द्विजिह्वा मूर्ध्ना धृता अपि नहि प्रकृतिं त्यजन्ति । तेभ्यो न भीतिरिह भूपतिसुर्जनस्य जागर्ति जाङ्गलिकवत् करुणाविशेषः॥८॥ इधर उधर जीभ चलाना ही जिनका विलास बन गया है और जो इस स्वभाव के वशीभूत होकर ज़बान पर कोई लगाम नहीं लगा सकते उन दुर्जन चुगलखोर रूपी सर्पों को यदि कोई अपने मस्तक पर भी बैठाये तो भी वे अपना दुष्ट स्वभाव नहीं छोड़ते। मुझे ऐसे दुर्जनों रूपी सर्पों से कोई भय नहीं है क्योंकि मन्त्रों एवं ओषधियों द्वारा सर्प के विष को नष्ट कर देनेवाला राव सुर्जन का अपूर्व कृपा-रूपी वैद्य मेरी रक्षा के लिये सदैव सजग है ॥८॥ चौहाणवंशभवभूमिपुरन्दराणामाद्यो यथा तनुभृतां पुरुषः पुराणः । ख्यातः क्षितावजनि दीक्षितवासुदेवनामा स्वधर्मसुमनोकृतवासुदेवः ॥९॥ जिस प्रकार शरीरधारी प्राणियों में सबसे आदि पुरुष भगवान् विष्णु हैं उसी प्रकार चौहाण वंश के नृपेन्द्रों में यज्ञ में दीक्षित तथा अपनी धर्मनिष्ठा से भगवान् वासुदेव को प्रसन्न रखने वाले आदि पुरुष संसार में 'वासुदेव' नाम से विख्यात हुए ॥९॥ सत्ये युधिष्ठिर उदग्रबले च भीमश्चापेऽर्जुनः स नकुलस्तुरगाधिरोहे । शास्त्राभियोगसमये सहदेव एवमेकोऽवतार इव पाण्डवपञ्चकस्य ॥१०॥ वे सत्य में युधिष्ठिर के समान, उत्कट बल में भीम के समान, धनुर्विद्या में अर्जुन के समान, अश्वविद्या में नकुल के समान और शास्त्र-व्यसन में सहदेव के समान निपुण थे। अतः पाँचों पाण्डवों के मानों वे एक ही अवतार थे ॥१०॥ यः कामपाल इव धामनिधिर्बलेन जग्राह काम इव वामदृशां मनांसि । कामारिवत् करुणयाऽधिककोमलात्मा कामानपूरि परितः शरणागतानाम् ॥११॥ वे बलदेव के समान तेजस्वी थे। कामदेव के समान सुन्दर होने के कारण कामिनियों के मन को हठात् वश में कर लेते थे। भगवान् शिव के समान परम कारुणिक एवं आशुतोष होने के कारण शरणागतों के सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करते थे ॥११॥ उद्दामधाम्नि सवितुः सविधेऽपि काष्ठासङ्गेन धूमविकृतेरकृतान्तराये । यस्य प्रतापदहने गहने निपेतुर्हप्यत्सपत्नपृतनापतयः पतङ्गाः ॥१२॥ जिनकी सूर्य के सामने भी उत्कट तेज से प्रज्वलित, काष्ठाओं (दिशाओं) में व्याप्त, बिना ईंधन ही जलनेवाली और इसलिये धूम-विकृति से रहित प्रतापरूपी भीषण अग्नि में अनेक अभि- मानी शत्रु-सेनापति-रूपी पतंगे गिर गिर कर भस्म हो जाते थे ॥१२॥ (८) द्विजिह्वाः सर्पाः पिशुनाश्च। जाङ्गलिको विषवैद्यः। (९) स्वधर्मेण सुमनीकृतः प्रसन्नीकृतो वासुदेवो येन सः। (१२) सूर्यसामीप्येऽपि उत्कटतेजसा प्रज्वलनात्, इन्धनं विनांपि प्रज्वलनात्, सदैव धूमेन अविकृतत्वात् च अस्य राज्ञः प्रतापवह्वेः साधारणवह्नेः विशेषः। काष्ठानां दिशां संगेन, काष्ठस्य इन्धनस्य असंगेन च।

४ सुर्जनचरितमहाकाव्य नक्तं दिनं सममदीपि सुमेरुशृङ्गमारोहति स्म महसा जितसैंहिकेयः। अस्तं जगाम न कदापि जगत्प्रकाशस्तस्य प्रतापतपनः पुनरन्य एव ॥१३॥ सूर्य केवल दिन में चमकता है, सुमेरु पर्वत पर चक्कर लगाया करता है, ग्रहण के समय राहु द्वारा ग्रस्त कर लिया जाता है, रात में अस्त हो जाता है और एक समय विश्व के केवल आधे भाग को ही प्रकाशित कर सकता है। वासुदेव राजा का प्रतापरूपी सूर्य विलक्षण है। वह रात- दिन समान रूप से चमकता है, सुमेरु पर्वत के शिखर पर चढ़ा हुआ है, अपने तेज से राहु को जीत लेता है, कभी अस्त नहीं होता तथा एक साथ सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है ॥१३॥ क्षीराम्बुधिः सुरगणैरपनीतसारः पूर्णो विधुर्विवश एव विधुन्तुदस्य । रुद्राचलोऽपि तुलितो रजनीचरेण को नाम साम्यमयतामदसीयकीर्तेः ॥१४॥ इन राजा की शुभ्र कीर्ति की हम किससे तुलना करें ? क्षीर-समुद्र को तो देवताओं ने अमृतरूपी सार निकालकर निःसार बना रक्खा है। पूर्ण चन्द्रमा (कलंकित होने के अतिरिक्त) राहु के सामने विवश हो जाता है और श्वेत कैलास पर्वत को तो रजनीचर रावण ने हँसी में ही हाथ पर उठा लिया था ॥ १४ ॥ दुष्कीर्तिपङ्कगतवैरियशोमृणाललेशानशेषयितुमाशु गवेषयन्ती । यस्योल्लसद्विशदवारिदगर्भशुभ्रा बभ्राम विश्वमखिलं किल कीर्तिहंसी ॥१५॥ इनकी शरद् ऋतु के प्रसन्न बादल के समान शुभ्र कीर्ति रूपी हंसी अपकीर्ति रूपी कीचड़ में फँसनेवाले शत्रुओं के बचे-खुचे यशरूपी कमल-तन्तुओं को खा जाने के लिये इधर-उधर शीघ्र उड़ती हुई सम्पूर्ण विश्व में घूम रही है ॥ १५ ॥ संग्रामसोम्नि शमनं भ्रुकुटीसमानं यस्मिन् विधुन्वति धनुर्धरणीवतंसे । दर्पोद्धतप्रतिभटप्रमदाजनानां सीमन्तसान्द्रखचिता मणयो निपेतुः ॥१६॥ विश्व-भूषण वासुदेव राजा के युद्ध-स्थल में (शत्रुओं को परास्त करके) शान्ति स्थापित करनेवाले अथवा यमराज (शमन) के समान लगनेवाले तथा भौंह के समान टेढ़े धनुष को टंका- रते ही उत्कट अभिमान में चूर शत्रुओं की स्त्रियों के माँग में बँधे हुए मोती (वैधव्य की सूचना देते हुए) अपने आप नीचे गिर जाते हैं ॥ १६ ॥ निध्वानतो बधिरितैः शतदुन्दुभीनामन्धीकृतैश्च पृतनारजसां भरेण । मार्गेषु वारणमदैरतिपिच्छिलेषु नो वेदि विद्रुतममुष्य कथं द्विषद्भिः ॥१७॥ वासुदेव की रणभूमि में बजनेवाली सैकड़ों दुन्दुभियों के घोर स्वर से शत्रुओं के कान बहरे हो जाते हैं और इनकी विशाल सेना के चलने से उड़नेवाली धूल से शत्रुओं की आँखें अन्धी हो जाती हैं। युद्ध के हाथियों के गण्डस्थल से बहनेवाली मद-जल की धारा से मार्ग की धूल कीचड़ (१३) रात्रावपि दीपनात्, सुमेरुशृंगारोहणात्, राहोः विजयात्, अस्तगमनाऽभावात्, एकदैव सम्पूर्णविश्व- गोलकप्रकाशनात् च राज्ञः प्रतापसूर्यस्य सूर्यात् विशेषः । (१४) रावणस्य स्वहस्ते कैलासधारणं प्रसिद्धमेव । (१५) हंसपक्षिणः मृणाललेशान् भुञ्जते इति प्रसिद्धिः ।

प्रथमः सर्गः ५ बन जाती है और चारों ओर फिसलन छा जाती है । समझ में नहीं आता कि मार्ग में चारों ओर भयंकर कीचड़ और फिसलन होने पर भी बहरे और अन्धे बने हुए शत्रु-गण इन राजा के सम्मुख आते ही युद्ध-स्थल से बड़ी तेज़ी से किस प्रकार भाग जाते हैं ? ॥ १७ ॥ एतस्य दानसलिलव्ययितप्रवाहा चर्मण्वती ध्रुवमधास्यत पङ्कभावम् । नाऽपूरयिष्यत यदि प्रसभोपरुद्धविद्वेषिवामनयनानयनाम्बुपूरैः ॥१८॥ युद्धवीर राजा वासुदेव ने बलात् घेरे गये शत्रुओं की स्त्रियों की (वियोग के कारण उत्पन्न) आँसुओं की धारा से यदि चम्बल नदी को वापस न भर दिया होता तो इन राजा के दानवीर होने के कारण चम्बल नदी का सारा पानी दान संकल्पों के जल में खर्च हो जाता और निःसन्देह चम्बल में कीचड़ ही कीचड़ रह जाता ॥ १८ ॥ बृन्दारकाधिपदृशामपि लोभनीयां वृन्दानि यः सुमनसां सुमना दधानम् । बृन्दाटवीमभिमतामिव नन्दसूनुर्वृन्दावतीपुरमनाकुलमध्युवास ॥१९॥ जिस प्रकार (भक्तों के प्राण) नन्दनन्दन वृन्दावन में रहते थे उसी प्रकार (प्रजा के प्राण) सुन्दर मन वाले राजा वासुदेव भयरहित और समृद्ध बूंदी नगरी में रहते थे । विविध देवताओं और पुष्पों से शोभित तथा इन्द्र के लिये भी दर्शनीय वृन्दावन के समान वह नगरी नाना प्रकार के विद्वानों एवं पुष्पों से सुशोभित थी और (उसकी समृद्धि) देवताओं के राजा इन्द्र के (हज़ार) नेत्रों के लिये भी दर्शनीय थी ॥ १९ ॥ तस्मादजायत सुतो नरदेवनाम्ना धाम्ना परानधरयन् नरदेवमुख्यान् । रूपेण यन्निरुपमेण निरूप्यमाणं नार्यो नराकृतिममन्वत देवमेव ॥२०॥ उन वासुदेव के नरदेव नामक पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने तेज से अन्य प्रमुख नरदेवों (राजाओं) को कान्तिहीन कर देते थे और जिनको, अनुपम रूप के कारण, स्त्रियां नरदेहधारी देव ही मानती थीं ॥ २० ॥ तेनाजनिष्ट यशसाऽर्दितपूर्णचन्द्रः श्रीचन्द्र इत्यभिहितस्तनयो नयज्ञः । यस्यानिसमुद्रमपैनिद्रभुजप्रतापैरेकातपत्रमवनीवलयं बभूव ॥२१॥ उन नरदेव के श्रीचन्द्र नामक नीतिकुशल पुत्र पैदा हुए जिन्होंने अपने शुभ्र यश से पूर्ण चन्द्र को भी फीका बना दिया था और समुद्र तक फैला हुआ पृथ्वीमंडल जिनकी सजग भुजाओं के प्रताप से शुभ्र और देदीप्यमान बनकर एकमात्र छत्र-सा प्रतीत होता था ॥ २१ ॥ तस्मिन्नलङ्कृतवति त्रिदिवं वयोऽन्ते पुत्रः स्वपैतृकपर्द प्रतिपद्यते स्म । यः पालयन्नपि जयं निजपौरुषेण प्राप्तः क्षितावजयपाल इति प्रसिद्धिम ॥२२॥ श्रीचन्द्र के वृद्धावस्था में स्वर्गवासी हो जाने पर उनके पुत्र पैतृक सिंहासन पर आरूढ़ हुए । यद्यपि वे अपने पराक्रम से सदा जय प्राप्त करके और उसकी रक्षा करके 'जयपाल' बने रहे तथापि उनके नाम की प्रसिद्धि संसार में 'अजयपाल' के रूप में हुई ॥ २२ ॥ (१९) इन्द्रस्य सहस्रनेत्राणामपि लोभनीयाम् । सुमनसां देवानां विदुषां पुष्पाणां च । (२२) जयपालोऽपि अजयपालः इति विरोधाभासः । अजयपालः इति राज्ञो नामेति तत्परिहारः ।

६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् उच्चैस्तया ध्रुवमलङ्घ्यतया परेषां तेनाजयैन निरमायि परोऽपि मेरुः । तस्मादभूदजयमेरुरिति प्रसिद्धं दुर्गं तदद्भुतफलं किल योगसिद्धेः ॥२३॥ उन अजयपाल ने अत्यन्त उच्च और शत्रुओं द्वारा अलंघ्य तथा अजेय (सुमेरु से भिन्न) एक दूसरा ही मेरु बनाया। योगसिद्धि के अद्भुत फल के समान सुन्दर उस प्रसिद्ध दुर्ग का नाम 'अजयमेरु' (अजमेर) हुआ ॥ २३ ॥ तेनापि सूनुरनुरूपगुणोज्ज्वलेन राजन् जयेन जनितो जयराजनामा । दोर्दण्डचण्डिमचमत्कृतिचारुदृप्यत्कोदण्डताण्डवितदण्डितवैरिवर्गः ॥२४॥ उन अजयपाल के पुत्र जयराज हुए जो सदा जय से सुशोभित रहे और जो अपनी उद्दाम तथा प्रचण्ड भुजाओं में चमचमाते हुए अभिमानी धनुष के नृत्य से शत्रु-वर्ग को दण्ड देते रहे ॥ २४ ॥ सामन्तसिंह इति तस्य सुतः प्रतोतः सिंहासनं निजकुलोचितमारुरुक्षुः

CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri प्रथमः सर्गः ७ दक्षिण दिशा से सम्बन्ध—उनमें विद्यमान होने के कारण वे इस संसार में वास्तव में साक्षात् चन्दन ही थे। चन्दन की केवल एक बात उनमें नहीं थी। वह यह कि चन्दन में द्विजिह्व (सर्प) लिपटे रहते हैं किन्तु उनको द्विजिह्वों (चुगलखोरों) का मेल बिलकुल नहीं सुहाता था ॥२८॥ प्रौढाहितावनिभृदुद्धतपक्षवज्रं वज्रायुधप्रतिममायतविक्रमेण । राजन्यवीरनिकुरम्बकिरीटवज्रं वज्राभिधं स तनयं जनयाञ्चकार ॥२९॥ उन चन्दन राजा ने, दुर्धर्ष शत्रु राजाओं के उद्धत पक्ष को भेदने के लिये वज्र के समान (इन्द्र ने वज्र से पर्वतों के पक्षों को काट गिराया था ) एवं उत्कट पराक्रम के कारण इन्द्र के समान और वीर राजाओं के समूह रूपी मुकुट में हीरे के समान शोभित होनेवाले वज्र नामक पुत्र को जन्म दिया ॥ २९॥ वज्रादजायत वशीकृतविश्वराज्यः प्राज्यैर्गुणैर्जगति विश्वपतिः प्रतीतः । यो विश्वनाथवनिताचरणावलम्बी विश्वम्भराखिलधुरां विभराम्बभूव ॥३०॥ वज्र के पुत्र विश्वपति हुए जो अखिल विश्व के राज्य को वश में करने वाले, उत्तम गुणों के कारण् साक्षात् विश्वपति, भगवान् विश्वनाथ की अर्द्धाङ्गिनी भगवती पार्वती के चरणों की शरण लेने वाले तथा (अपने कंधों पर) पृथ्वी का सारा भार उठाने वाले थे ॥ ३० ॥ कामं बभूवुरपरेऽपि पुरा नरेशा धन्या परन्तु धरणीयमनेन भर्त्रा । आलम्बते न कमला कतमं समृद्धं नारायणोरसि परं लभते प्रतिष्ठाम् ॥३१॥ भले ही पहले इस पृथ्वी का उपभोग करनेवाले अनेक राजा हुए, किन्तु यह पृथ्वी विश्वपति को पतिप्वाकर ही धन्य हुई। भले ही लक्ष्मी सभी धनिकों के पास रहे, किन्तु जो प्रतिष्ठा भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर मिलती है वह अन्यत्र नहीं ॥ ३१ ॥ कीर्त्याऽस्य चन्द्रकरकोमलयाऽतिशुभ्रं शोणं नवार्ककिरणप्रतिमैः प्रतापैः । श्यामद्युति द्विषदकीर्तितमोभिरित्थं चित्रं तदाम्बरमराजत दिग्वधूनाम् ॥३२॥ उन विश्वपति के कारण, दिशारूपी स्त्रियों का आकाशरूपी वस्त्र (प्रकृति-वधू के सत्वरज- स्तमौमय वस्त्र के समान) रंग-बिरंगी 'श्वेत श्याम रतनार' शोभा पा रहा था—वह विश्वपति की चन्द्रमा की किरणों कै समान कोमल कीर्ति के कारण श्वेत था, उनके नवोदित सूर्य की किरणो के समान प्रताप के कारण लाल था और उनके शत्रुओं के दुष्कीर्ति रूपी अन्धकार के कारण कण्वा था ॥ ३२ ॥ (२८) सुरभितां कामधेनुतां सुगन्धित्वं च । परिरक्षिता दक्षिणा आशा दिक् येन सः, अपि च परिरक्षिताः पूरिताः दक्षिणानां अनुकूलजनानां आशाः मनीषितानि येन सः। द्विजिह्वाः सर्पाः पिशुनाश्च । चन्दनवत् चन्दन- भूपतिरपि सुरभितः विशदः शीतः दक्षिणदिक्सम्बन्धयुतश्च, किन्तु द्विजिह्वानां अमिलनात् तस्य चन्दनात् विशेषः । (२९) प्रौढाः उद्भटाः ये अहताः अवनिभृतः शत्रवो राजानः तेषां ये उद्धताः पक्षाः तेषां कर्तने यः वज्रं इन्द्रायुधमिव आचरतीति तम् । पुरा इन्द्रः वज्रेण पर्वतानां पक्षान् कृत्तवान् । राजन्यवीराणां यानि निकुरम्बाणि वृन्दानि तान्येव किरीटानि तेषु वज्रमिव हीरकमिव आचरतीति तम् । (३१) कालिदासेरप्युक्तं—"कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् । नक्षत्रताराग्रह- संकुलापि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥” इति । (३२) अम्बरं आकाशः वस्त्रं च । दिग्वध्वोऽपि प्रकृतिनटीवत् सत्वरजस्तमोमयं शुक्ललोहितकृष्णं विचित्रं आकाशाम्बरं धृतवत्यः । Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi

८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भूभृद्विशालकटकं समकालमेव तस्मिन् रणोद्यमिनि दुर्दिनयाम्बभूव । दानद्रवैर्द्विपकदम्बकुम्भजातैर्बाष्पैश्च वैरिवनितानयनाब्जमुक्तैः ॥३३॥ विश्वपति के युद्ध के लिये उद्यत होते ही राजाओं की विशाल सेना में दुर्दिन (वह दिन जब आकाश में बादलों के कारण अन्धकार सा छा जाता है और घनघोर वृष्टि होती है) छा जाता था क्योंकि हाथियों के गण्डस्थलों से मदजल की झड़ी लगी रहती थी और शत्रुओं की स्त्रियों के नय- नारविन्दों से आँसुओं की धारायें बरसती रहती थीं (तथा उनकी आहों के बादल छाये रहते थे) ॥ ३३ ॥ आह्लादितद्विजगणाऽविरतप्रवाहा पद्मावतारसुरभिं परिभूततृष्णाम् । एतस्य दानजलनिर्झरिणीं विगाह्य को नाम नाऽजनि जनोऽत्र विमुक्ततापः ॥३४॥ जिस प्रकार नदी के प्रवाह में प्रसन्न हंस आदि पक्षी क्रीड़ा किया करते हैं, खिले हुए कमलों से वह सुगन्धित रहती है, लोगों की प्यास बुझाती है और स्नान कर लेने पर उनकी गर्मी शान्त करती है उसी प्रकार विश्वपति के दान-संकल्पों के जल की जो नदी बह चली थी उसमें प्रसन्न ब्राह्मणों के समूह निरन्तर स्नान करते थे तथा वह लक्ष्मी के अवतार के कारण कामधेनु के समान थी एवं याचकों की तृष्णा को शान्त करनेवाली थी । विश्वपति की इस दान-नदी में स्नान करके किस मनुष्य ने अपना सन्ताप दूर नहीं किया ? ॥ ३४ ॥ आकारतो न परमस्य भुजद्वयस्य स्वर्वासिवृक्षविटपैः प्रतिपक्षताऽऽसीत् । अप्राथितं धनमनेन वनीयकेभ्यो विश्राण्य सन्ततमहारि यशोऽपि तेषाम् ॥३५॥ ...तः विश्वपति के सुन्दर और कोमल हाथों ने स्वर्ग के कल्पवृक्षों की केवल आकृति ...ही ग्रहण नहीं की, किन्तु याचकों को बिना माँगे ही निरन्तर धन दे-देकर उनका (कल्पवृक्षों की शाखाओं का) यश भी छीन लिया । (कल्पवृक्ष तो माँगने पर ही धन देता है, किन्तु विश्वपति के हाथों ने बिना माँगे ही धन दिया) ॥ ३५ ॥ वाञ्छाधिकद्रविणवर्षिणि याचकानां यस्योज्ज्वले जगति जाग्रति पञ्चशाखे । वीतप्रयोजनतया सुरपादपानां पञ्चत्वमेव बत युक्ततरं प्रतीमः ॥३६॥ ...हि याचकों को उनकी इच्छा से अधिक धन देने वाले विश्वपति के उज्ज्वल हाथ के विद्यमान रहने पर स्वर्ग के कल्पवृक्षों का कोई प्रयोजन नहीं रहा । अतः कल्पवृक्षों का 'पञ्चत्व' (पाँच की संख्या; मृत्यु) प्राप्त करना युक्त ही है ॥ ३६ ॥ (३४) पद्मानां कमलानां अवतारः पद्मायाः लक्ष्म्याश्च अवतारः । (३५) अस्य राज्ञः भुजयुगलेन पारिजातादिस्वर्गतकविटपानां न केवलं आकार एव अहारि, किन्तु याचकेभ्यः अप्राथितं धनं प्रदाय तेषां यशोऽपि अहारि । स्वर्गकल्पवृक्षास्तु प्रार्थितमेव धनं ददति, अयं राजा च अप्राथितमपि ददातीति अस्य तेभ्यो विशेषः । (३६) पारिजातमन्दारादिस्वर्गकल्पद्रुमाः पञ्चसंख्याकाः सन्ति । ते हि वाञ्छितमेव धनं ददति । अस्य राज्ञः पंचशाखः करः वाञ्छितादपि अधिकं धनं ददाति । अतः अस्य राज्ञः करे जाग्रति सति कल्पद्रुमाणां पञ्चत्व- मेव पञ्चसंख्यात्वं मरणं च युक्ततरमेव ।

२ प्रथमः सर्गः ९ न स्म प्रमाद्यति मदेन स मेदिनीशो नापि प्रमाद्यति रिपौ प्रजिघाय शस्त्रम् । नायं क्वचिद् विमुखतां समितौ जगाम प्रत्यर्थिनं न विमुखं पुनरन्वियेष ॥३७॥ वे नरेश कभी दर्प और प्रमाद नहीं करते थे ! न वे शत्रु पर प्रहार करके कभी आलस करते थे । उन्होंने युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई और न कभी उन्होंने पीठ दिखाने वाले शत्रु का पीछा किया ॥ ३७ ॥ कामं क्रमेण नितरां दुरतिक्रमेण दोर्वििक्रमेण वसुधां वशयाम्बभूव । भूपालरीतिरिति नीतिपथोपनेतृन् नेता स मन्त्रसचिवान् सममभ्यनन्दत् ॥३८॥ जननायक विश्वपति ने अपने अत्यन्त दुर्धर्ष बाहु-बल द्वारा क्रमशः पृथ्वी के राज्यों को अच्छी तरह वश में कर लिया। ऐसा उन्होंने लोभ या स्वार्थवश नहीं किया, किन्तु इसलिये किया कि यह उत्कृष्ट राजाओं की रीति है। और साथ ही साथ उन्होंने नीति के पथप्रदर्शक मन्त्रिमुख्यों का समुचित आदर-सत्कार किया ॥ ३८ ॥ यस्मिन् जयाऽऽहितमतौ समराजिरेषु जातं रजः प्रतिभटेषु तमस्तदेव । सत्वं सपत्नपृतनासु विपक्षजायावक्षोजहारलतिकास्वपि निर्गुणत्वम् ॥३९॥ युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को जीतने की इच्छा रखने वाले विश्वपति की सेनाओं से जो धूल ऊपर उठी वह शत्रुओं के लिये अन्धकार बन गई, अपनी सेनाओं के लिये बल और साहस बन गई तथा शत्रुओं की ललनाओं के वक्षःस्थल के हारों के लिये सूत्र तोड़ देने वाली बन गई । युद्धक्षेत्र में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये विश्वपति में रजोगुण (शत्रुओं को मारने के वीरकर्म में प्रवृत्ति) उत्पन्न हुआ। आश्चर्य है कि वह रजोगुण शत्रुओं के लिये तमोगुण बन गया (अर्थात् शत्रु निश्चेष्ट हो गये और उनकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया) तथा विश्वपति की सेनाओं के लिये सत्वगुण बन गया (अर्थात् उनकी सेनाओं में बलऔर साहस आ गया) और शत्रु-ललनाओं के वक्षःस्थल के हारों के लिये निर्गुण बन गया (अर्थात् वैधव्य की सूचना देते हुए शत्रुललनाओं के हारों का 'गुण' अर्थात् सूत्र टूट गया और हारों के मोती नीचे बिखर गये) ॥ ३९ ॥ पारीन्द्रमेव मृगयन् मृगयां गतोऽसौ नान्यान् जघान घनया घृणया परीतः । नष्टं तदैव परिपन्थिनितम्बिनीनां वक्षोजपत्रमकरीभिरिदं विचित्रम् ॥४०॥ शिकार खेलते समय विश्वपति केवल सिंह को ही खोजते थे । अन्य प्राणियों को मारने में उन्हें बड़ी घृणा होती थी । फिर भी आश्चर्य है कि उनके शिकार के लिये प्रस्थान करते ही वैरि- वनिताओं के वक्षःस्थल के मकराकृति आभूषण निर्जीव से नीचे गिर पड़ते थे । (विश्वपति (३८) अयं राजा नितरां दुरतिक्रमेण दोर्विक्रमेण क्रमेण वसुधां कामं वशयाम्बभूव । इयं भूपालरीतिरिति कारणेन न तु लोभेन । (३९) अस्य राज्ञः सेनायाः गमनेन युद्धस्थले यत् रजः धूलिः रजोगुणजन्यशत्रुमारणप्रवृत्तिश्च उत्थितं तदेव प्रतिभटेषु तमः अन्धकारः तमोगुणजन्यकर्त्तव्यविमूढ़ता च संजातं तद्रूपेण रज एव परिणतमित्यर्थः, स्वसैनि- केषु च सत्वं बलं सत्वगुणजन्योत्साहश्च संजातं, शत्रुललनास्तनहारेषु च निर्गुणत्वं गुणराहित्यं भाविवैधव्यसूचिका 'हारसूत्रत्रुटिश्च संजातम् । रजः एव तमः सत्वं निर्गुणत्वं च संजातमिति महदाश्चर्यम् ।

१० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिकार के लिये जाते थे किन्तु उनके शत्रु सोचते थे कि उनसे युद्ध करने जा रहे हैं और इस भय से शत्रु-ललनाओं के मकराकृति स्तनाभूषण गिर पड़ते थे मानों उनके भावी वैधव्य की सूचना दे रहे हों।) ॥४०॥ नाश्चर्यमेतदमुमेकमपि द्विषन्तो दोषाहता यदि रणेषु बहूनपश्यन् । एकोऽप्यनेक इव कैरवबान्धवोऽसावाभासते तिमिरताडितलोचनानाम् ॥४१॥ विश्वपति एक होते हुए भी युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को अनेक से दिखाई देते थे। तैमिरिक पुरुषों को जिनकी आँखों की ज्योति मन्द पड़ गई है, अन्धकार में एक चन्द्रमा भी अनेक दिखाई देता है ॥४१॥ सम्पद्द्युतोऽपि तरुणोऽपि नराधिपोऽपि नाङ्गीचकार स कदाचन पानलीलाम् । बाणाः पुनः परपुरं सपदि प्रविश्य रक्तासवं निभृतमेव निपीतवन्तः ॥४२॥ विश्वपति यद्यपि सम्पन्न और समृद्ध थे, युवा थे, राजा थे, फिर भी उन्होंने कभी मदिरा नहीं पी। केवल उनके तीक्ष्ण बाण शत्रुओं के शरीरों में घुस कर चुपचाप पर्याप्त मात्रा में रक्त-मदिरा पीते थे ॥४२॥ स्तब्धत्वहेतुमपनीतविशेषदृष्टिं गुर्वङ्कुशानपि हठादवसादयन्तम् । यो वैरिणाञ्च करिणाञ्च तदाश्रितानामत्याजयन् मदमुदञ्चितमञ्चितौजाः ॥४३ ओजस्वी विश्वपति ने वैरि-राजाओं के प्रबल मद को, जिसके कारण वे अभिमान में चूर हो हो रहे थे, उनकी भले और बुरे का विचार करने की विवेक-दृष्टि लुप्त हो गई थी और गुरुजनों के उपदेशों का तिरस्कार करते थे, दूर कर दिया और साथ ही साथ वैरियों के हाथियों के प्रबल मद (दान जल) को भी छुड़ा दिया जिस मद के कारण हाथी उन्मत्त हो रहे थे, उनकी दृष्टि कलावृत हो रही थी और वे महावतों के अंकुशों के भारी आघातों की भी अवहेलना कर रहे थे ॥४३॥ समुल्लङ्घ्य क्षीराम्बुधिमधरितः शीतकिरणः समाक्रान्तं शश्वद् गिरिशगिरिगौरीगुरुपदम् । कृतश्चान्तेवासी भुजगपतिरित्थं विभुतया वितेने यः कीर्त्या भुवनजययात्राविलसितम् ॥४४॥ विश्वपति ने तीनों लोकों में अपनी शुभ्र कीर्ति के द्वारा मानों विजय यात्रा की। क्षीरसागर को पार करके (शुभ्रता में परास्त करके) उनकी कीर्ति आकाश में छा गई और शुभ्रता में चन्द्रमा को फीका कर दिया। मर्त्यलोक में कैलास और हिमालय के गौरीशंकर शिखर पर (धवलता में उनको पराजित करती हुई) फैल गई। पाताल में शेषनाग के पास तक फैल गई मानों शुक्लता में शेषनाग को भी अपना शिष्य बना लिया हो ॥४४॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये प्रथमः सर्गः। (४०) मृगयां गतोऽसौ राजा सिंहमेव हन्ति नान्यान् प्राणिनः। तथापि शत्रुललनास्तनपत्रमकरीभिः नष्ट- मिति विरोधाभासः। मृगयां गतमपि एनं शत्रुस्त्रियः युद्धार्थिनं मत्वा राज्ञः भयात् त्रस्यन्ति, तासां भयजन्यप्रबल- कम्पात् मकराकृतीनि स्तनाभूषणानि भाविवैधव्यभयादिव प्रपतन्ति इत्यर्थः। (४२) परपुरं शत्रुशरीरम्। रक्तासवं रुधिररूपरक्तमदिराम्।

द्वितीयः सर्गः अथ विश्वपतिः क्रमागतं प्रतिपद्यापि स पैतृकं पदम् । अविशिष्टतयाऽन्यभूभृतां न मनस्वी भजते स्म निर्वृतिम् ॥ १ ॥ स्वाभिमानी राजा विश्वपति पैतृक राज्य को पाकर भी, अन्य राजाओं की अपेक्षा स्वयं में कोई असाधारण विशेषता न पाकर, शान्ति न पा सके ॥ १ ॥ सदसि स्पृहणीयसौहृदैः सवयोभिः समशीलचेष्टितैः । न बबन्ध धृतिं स बन्धुभिर्नवहर्म्येषु हिरण्मयेष्वपि ॥ २ ॥ सभा में प्रशंसनीय मैत्रीभाव वाले एवं अवस्था, शील और चेष्टा में समान, बन्धु-वर्ग को पाकर, सुवर्णमय नवीन प्रासादों में भी वे धैर्य धारण न कर सके ॥ २ ॥ करिणः परिणद्धकन्धरा नवशृङ्गारितचारुविग्रहाः । नवनिर्झरमेदुरानना न मुदे तस्य बभूवुरोशितुः ॥ ३ ॥ विशाल गण्डस्थल वाले, नवीन शृङ्गारों से सुसज्जित शरीरवाले, मदजल से गाढ़े चिकने मुखवाले मदोत्कट हाथी भी उन्हें आनन्दित न कर सके ॥ ३ ॥ दिवमुत्पतितुं कृतोद्यमा विनिरुद्धा विनियम्य सादिभिः । अभवञ्जवना वनायुजाः प्रमदायाऽस्य न मेदिनीभुजः ॥ ४ ॥ टापें फटकार कर मानों आकाश में उड़ने की इच्छा रखनेवाले, साईसों द्वारा कठिनाई से रोके जाने वाले, अत्यन्त वेगवाले उत्तम अरबी घोड़े भी उन्हें आनन्द न दे सके ॥ ४ ॥ दयिताधरचारुपल्लवाः कुसुमोद्भेदविजृम्भितस्मिताः । अलिगुञ्जितमञ्जुगीतयो रुरुधुस्तस्य मनो न वीरुधः ॥ ५ ॥ जिनके सुकुमार लाल पत्ते कामिनियों के अधरों के समान सुन्दर थे, जिनके विकसित पुष्प रमणियों की मुस्कान के समान शुभ्र थें, भ्रमरों की गूँज के बहाने जो मानों सुन्दर गीत गा रहीं थीं ऐसी लतायें भी उनके मन को न बाँध सकीं ॥ ५ ॥ सरसीरुहसौरभोज्ज्वला कलहंसीकलनादकोमला । सरसी विमलाशायाप्यलं सरसीकर्तुमभून् न भूभृतम् ॥ ६ ॥ कमलों की सुगन्ध से सुरभित, हंसियों के सुन्दर नाद से मुखरित, स्वच्छ हृदय के समान निर्मल जल से युक्त, मनोहर सरोवरा भी उनके हृदय को सरस न कर सकी ॥ ६ ॥ समये समुदीरितोच्चकैर्जयशब्दैरवदानशंसिभिः । स ननन्द न वन्दिचारणैर्विरुदालीपदबन्धकोविदैः ॥ ७ ॥ समय पर उच्च स्वर से जयशब्द का उच्चारण करने वाले, प्रशस्त कर्मों का वर्णन करनेवाले, प्रशंसा की पंक्तियों को सुन्दर रूप से पद्य-बद्ध करने में निपुण भाट और चारण उन्हें आनन्दित न कर सके ॥ ७ ॥ (४) वनायुजाः पारसीका अश्वाः ।

१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिथिलेतरबन्धबन्धुरा सुकुमाराऽपि विदग्धभूपतेः । रसभावनिरन्तराप्यहो ! कविवाणी न विनोदभूरभूत् ॥ ८ ॥ दृढ़ बन्धों से सुन्दर, सुकुमार, रसों और भावों में सनी हुई, कवियों की 'कोमल कान्त पदावली' भी, आश्चर्य है कि, उन सहृदय और विदग्ध नरेश को आनन्दित न कर सकी ॥ ८ ॥ मधुमत्तविदग्धकामिनीभणितादप्यधिकं मनोरमान् । अभिनन्दति न स्म भूपतिः स विपञ्चीकलनिक्कणानपि ॥ ९ ॥ मदिरा से मत्त और कामकला में चतुर कामिनी के सरसं शब्दों से भी अधिक मनोहर, वीणा के सुन्दर स्वर भी उन्हें प्रमुदित न कर सके ॥ ९ ॥ मदनेप्युपदेष्टुमिच्छवः कुटिलभ्रूदलवल्गुचालनैः । नयनान्तनिरस्तरङ्गितैस्तृणयन्त्यस्तरुणीर्नभःसदाम् ॥ १० ॥ सविलासपदाम्बुजार्पणैरनुगृह्णन्त्य इवावनीतलं । प्रमदा न मदालसा मनागपि निन्युर्वशतां विशां पतिम् ॥ ११ ॥ टेढ़ी भौंहों को नचाकर कटाक्षों द्वारा मानों पुष्पधन्वा कामदेव को तीर चलाने की विद्या में उपदेश देने की इच्छा रखनेवाली, अपाङ्गों के विलासों से स्वर्ग की तरुणियों को भी तृणवत् तुच्छ बना देनेवाली, मन्द सविलास चाल के बहाने मानों अपने पदारविन्दों से धरातल को अनुगृहीत करनेवाली, मद में अलस प्रमदायें भी उन राजा को जरा भी वश में न कर सकीं ॥ १०-११ ॥ इति दुर्मनसं मनीषिणं विषये सत्यपि वीतवासनम् । अधिराजतया दुरासदं तमलं बोधयितुं न कश्चन ॥ १२ ॥ विषयों की उपस्थिति में भी वासना-रहित, कठिनता से मिलने योग्य, उन बुद्धिमान् विश्व- पति को खिन्न देखकर भी, उनके राजा होने के कारण, उन्हें कोई समझा न सका ॥ १२ ॥ तनयोऽस्य गुरोरथैकदा सुनयो नामतयोपबृंहितः । समशीलवयो विचेष्टितैरधिरूढः किल बालमित्रताम् ॥ १३ ॥ विश्वपति के गुरु के पुत्र, जिनका नाम सुनय था, अवस्था और शील में इनके समान थे और बचपन के मित्र थे ॥ १३ ॥ वपुषा ललितेन चेष्टितैरभिरामैर्भणितैश्च सूनृतैः । विशदं परितो विकाशयन्ननिशं विश्वजनीनमाशयम् ॥ १४ ॥ सुन्दर शरीर से, कुलीन चेष्टाओं से, सत्य और मधुर वचनों से सुनय सदा सब लोगों के हृदयों को अच्छी तरह प्रफुल्लित करते थे ॥ १४ ॥ द्विगुणं खलु बिम्बमात्मनः सहसाऽऽदर्शसमोपगं दधत् । कलयन्नधिकोज्वलाः कला रुचिमासाद्य च कृत्स्नपक्षगाम् ॥ १५ ॥ (१५) दर्शं अमायां चन्द्रबिम्बस्याभावः, आदर्शो पुरोधसः बिम्बस्य प्रतिबिम्बात् द्विगुणत्वम् । कृत्स्नपक्षगां रुचिं सम्पूर्णपक्षगां जनानां रुचि, कृष्णपक्षे शुक्लपक्षे सर्वत्र समानकान्ति च । कलाः वेदिनिर्माणलेखाद्याः विद्याः चन्द्रकलाश्च ।

द्वितीयः सर्गः १३ न च वक्रतया विकारितो न कलङ्केन कदाचिदङ्कितः । श्रितवान् नहि जातु वारुणीं न च दोषाकरतामुपागतः ॥१६॥ तमसा न तिरस्कृतः क्वचित् प्रतिपक्षो वपुषा मनोभुवः । अपरो ननु कोऽपि निर्मितो द्विजराजः कुतुकेन वेधसा ॥१७॥ ब्रह्मा ने कौतुकवश सुनय का एक अद्वितीय 'द्विजराज' (श्रेष्ठ ब्राह्मण; चन्द्रमा) के रूप में निर्माण किया था। जब कभी वे दर्पण (आदर्श) के समीप जाते थे तो उनके शरीर-बिम्ब की शोभा (प्रतिबिम्ब के कारण) द्विगुणित हो उठती थी (चन्द्र-बिम्ब तो 'दर्श' अर्थात् अमावस्या के समीप जाने पर लुप्त हो जाता है)। सुनय सब वर्गों के (कृत्स्न पक्ष के) लोगों की प्रीति (रुचि) प्राप्त करके अपनी सारी कलाओं से सदा ही अत्यधिक उज्ज्वल और उन्नत बने रहते थे (चन्द्रमा शुक्लपक्ष की रुचि अर्थात् कान्ति पाकर क्रमशः एक एक कला से बढ़ता है)। सुनय सरल स्वभाव के होने के कारण कभी कुटिलता से दूषित नहीं हुए (चन्द्रमा

१४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् रहसि स्थितमाहितस्थितिः समयज्ञः समये समेत्य तम् । इदमानतकन्धरः शनैरधिगम्यानुमतिं न्यवेदयत् ॥२१॥ विशाल कंधों वाले, परिस्थिति को समझने वाले, समय को जानने वाले वे सुनय एक दिन अनुकूल समय देख कर एकान्त में स्थित राजा विश्वपति के पास गये और उनसे आज्ञा लेकर इस प्रकार निवेदन किया ॥ २१ ॥ उपदिष्टमुपायदर्शिभि र्न विना प्रश्नमुदीरयेत् क्वचित् । इति सर्वत एव सज्जते किमुताऽधृष्यतमेषु राजसु ॥२२॥ नीति-कुशल विद्वानों का उपदेश है कि बिना प्रश्न किये गये उत्तर नहीं देना चाहिये। यह सामान्य नियम सब जगह लागू है, फिर स्वतन्त्र नरेशों की तो बात ही क्या ॥ २२ ॥ अतिविस्मयिनों तथापि ते नृप निर्वेदनिवेदिनीं स्थितिम् । अवलोक्य वितर्कविकलं हृदयं मे दिशति प्रगल्भताम् ॥२३॥ फिर भी खिन्नमनस्कता और निर्वेद को प्रकट करने वाली तथा अत्यन्त आश्चर्य में डाल देने वाली आपकी इस दशा को देखकर तर्क-वितर्क से पीड़ित मेरा हृदय आपकी सेवा में कुछ निवेदन करने के लिये, हे राजन् ! मुझे प्रेरित कर रहा है ॥ २३ ॥ इयमायतिमञ्जुला मही महनीयोज्वलविक्रमेण ते । चिरमुद्धतवैरिकण्टका सुतरां पाणितलावलम्बिनी ॥२४॥ यह विशाल और सुन्दर पृथ्वी, जिसके शत्रुरूपी काँटों को आप, अपने श्लाघ्य और उज्ज्वल पराक्रम से, पहले ही उखाड़ कर फेंक चुके हैं, आपके अधिकार में हैं ॥ २४ ॥ प्रणयैः सुहृदः सभाजिता महसा विद्विषतां सभा जिता । चरितैर्जगदुत्तरैस्त्वया जगदेतन् नृपतेऽनुरञ्जितम् ॥२५॥ आपने मित्रों का सस्नेह सत्कार किया है और अपने तेज से शत्रुओं की सभा को जीत लिया राजन् ! आपने अपने अलौकिक कृत्यों से इस जगत् को प्रसन्न और अनुरक्त बना रक्खा है। ॥ २५ ॥ नितरां निरुपप्लवाः प्रजा वसुपूर्णा वशगा वसुन्धरा । परितः परितर्पितो मखैः समये वर्षति वारि वासवः ॥२६॥ प्रजा को किसी प्रकार के संकट का भय नहीं है। वसुन्धरा (पृथ्वी) अपने नाम को सार्थक करती हुई वसु (धन धान्य) से पूर्ण है और आपके वश में है। चारों ओर यज्ञ होते रहते हैं जिनसे तृप्त होकर इन्द्र समय पर वर्षा करता रहता है ॥ २६ ॥ तव जाग्रति दोर्युगे भुवो धुरि धुर्ये प्रतिलब्धविभ्रमाः । करियूथपकैतवादमी धृतसेवाः सविधे कुलाद्रयः ॥२७॥ आपके पृथ्वी का भार उठाने में समर्थ भुजयुगल के इस कार्य में प्रवृत्त होने पर कुलाचल पर्वत ही मानों अवकाश पाकर बड़े बड़े हाथियों के बहाने आपकी सेवा में संलग्न हैं ॥ २७ ॥

द्वितीयः सर्गः १५ अमितैः परितो विस्तृतरैर्वसुविश्राणननीरनिर्झरैः । अपि जाङ्गलभूमयस्त्वया विहितास्तावददेवमातृकाः ॥२८॥ आपके दानसंकल्प के अपार जल की जो नदियाँ चारों ओर वह निकली हैं उनके कारण जंगली देश भी 'अदेवमातृक' अर्थात् 'नदीमातृक' (वह भूमि जहाँ नदी या नहरों से सिंचाई होती है) बन गये हैं ॥ २८ ॥ अभिरामतरं निरामयं भवतो वीक्ष्य वपुर्वधूजनः । नरदेव निरादरोऽभवद् भिषजोर्नाकनिवासिनोरपि ॥२९॥ हे नरदेव ! आपके अत्यन्त सुन्दर और स्वस्थ शरीर को देखकर रानियों के मन में स्वर्ग के वैद्य अश्विनीकुमारों के सौन्दर्य और वैद्य विद्या के प्रति कोई आदर नहीं रहा है ॥ २९ ॥ इति ते कृतकृत्यता मया कृतिनां नायक निश्चिता धिया । सुविचारयताऽपि दृश्यते न च निर्वेदनिदानमण्वपि ॥३०॥ कर्मठ पुरुषों में श्रेष्ठ ! मेरी मति के अनुसार तो आपको जो कार्य करने चाहिये थे वे सब आप कर चुके हैं। खूब विचार करने पर भी मुझे आपके खेद का ज़रा भी कारण नहीं दिखाई देता ॥३०॥ रिपवो वनगोचरा अपि स्फुटमुत्साहविपर्ययं तव । निशमय्य विधातुमिच्छवः पुनराशाङ्कुरमात्मनो हृदि ॥३१॥ आपके शत्रु जो इस समय आपके भय से वन में छिप रहे हैं आपकी उदासीनता और निर्वेद की खबर सुनकर फिर अपने मन में आशा का अंकुर उपजाना चाहते हैं ॥ ३१ ॥ विधुरं ध्रुवमप्रसादतः सदसि प्रेक्ष्य सदोशितुर्मुखम् । न च नोद्विजतेऽनुजीविनां हृदयं भूरिवितर्कसङ्कुलम् ॥३२॥ सभा में आपका अप्रसन्न और उदासीन मुख देखकर आपके शुभचिन्तकों के हृदय नाना प्रकार के संकल्प-विकल्पों से पीड़ित होकर व्याकुल हो जाते हैं ॥ ३२ ॥ सरितां पतिरप्यधीरतां भजते कारणगौरवात् क्वचित् । न कदापि मनो महीयसां प्रलयेऽपि प्रतियाति वैकृतम् ॥३३॥ समुद्र भी ज्वार के समय (चन्द्रमा के प्रेम के) गुरुकारणवश अधीर हो उठता है, किन्तु महान् पुरुषों का मन प्रलय में भी विकृत नहीं होता ॥ ३३ ॥ विषयेष्वधिका विरागिता विजनेषु स्पृहयालुता तथा । शमिनां समवैति शर्मणे महसाक्रान्तभुवां न भूभुजाम् ॥३४॥ विषयों में अधिकाधिक वैराग्य और अधिकाधिक एकान्तप्रेम निवृत्तिमार्ग के लोगों के लिये कल्याणकारक होते हैं, अपने तेज से पृथ्वी को वश में रखने वाले राजाओं के लिये नहीं ॥ ३४ ॥ (२८) अदेवमातृकाः नदीमातृकाः नद्यः मातरः धान्यादिसंवर्धनेन पालिकाः येषां ते । (२९) राज्ञः वपुषा स्वर्वैद्यौ अश्विनौ सौन्दर्ये अधःकृतौ, निरामयत्वात् च उपेक्षितौ तद् दृष्ट्वा वधूजनस्तयोः निरादरोऽभूत् ।

१६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् तनया महतां महीभृतां परिणीता हरिणीदृशस्त्वया। नयनान्तनिदेशपात्रतामपि यासामभिनन्दति स्मरः ॥३५॥ बड़े बड़े राजाओं की मृगनयनी कुमारियों का आपने पाणिग्रहण किया है जिनकी आँखों के इशारे पर नाचने में कामदेव अपना गौरव समझता है ॥ ३५ ॥ जनिता न धुरन्धराः सुताः प्रमदाः प्रेमभरेण नादृताः। नहि सौम्य शमः समञ्जसस्तरुणस्त्रीप्रथमातिथौ तव ॥ ३६ ॥ न तो आपने अभी राज्य-भार सँभालने योग्य राजकुमार ही उत्पन्न किये हैं और न आपने अभी रानियों का प्रेम-सत्कार किया है। स्त्रियों के तारुण्य की प्रथम तिथि में ही आपको इस प्रकार का वैराग्य शोभा नहीं देता ॥ ३६ ॥ क्व तनुर्नवयौवनाश्रया क्व विरागस्तव देव दारुणः। न निदाघकठोरमातपं सुकुमारा सहते हि माधवी ॥३७॥ देव ! कहाँ तो आपका

३ द्वितीयः सर्गः १७ इतिवादिनमादिवर्णजं सुनयं सूनृतभाषितेन सः। अवदद् वदतां वरो नृपः स्वरशिष्यायितनूतनाम्बुदः ॥४२॥ ब्राह्मण-श्रेष्ठ सुनय के ये वचन सुन कर गंभीर घोष से नवीन मेघ को अपना शिष्य बनाने वाले, बोलने में कुशल, राजा विश्वपति ने इस प्रकार सत्य बात कही ॥ ४२ ॥ अनुकूलतरेण यत् त्वया वचनं सम्प्रति सोपपत्तिकम् । प्रणयात् प्रणिधाय भाषितं हृदयं प्रह्वयतीव तन् मम ॥४३॥ आपने जो स्नेहवश सावधान मन से युक्तियुक्त और अत्यन्त अनुकूल बातें कहीं उनको सुन कर मेरा मन बहुत विनीत हुआ है ॥ ४३ ॥ तदपि स्वमहं विभावयन् बत साधारणमन्यपार्थिवैः। न मनो विनियन्तुमुत्सहे वशगायामपि सर्वसम्पदि ॥४४॥ तथापि मैं अपने आपको अन्य राजाओं के समान साधारण समझ रहा हूँ और इसीलिये सब प्रकार की सम्पत्ति होते हुये भी, मैं अपने मन को शान्ति देने में समर्थ नहीं हो पा रहा हूँ॥४४॥ हरभूधरतोऽपि शाश्वती यदि जागर्ति न कीर्तिरुज्ज्वला । तरुणीनयनान्तचञ्चलैः किमु साम्राज्यसमुद्भवैः सुखैः ॥४५॥ यदि कैलास पर्वत से भी अधिक शुभ्र और अधिक चिरस्थायी कीर्ति इस विश्व में व्याप्त न रहे, तो तरुणी स्त्रियों के कटाक्ष के समान चञ्चल और क्षणिक साम्राज्य से उत्पन्न होने वाले सुखों से क्या लाभ ? ॥४५॥ अधिगम्य निरुढमाशयं किल रत्नाकरमेखलापतेः । द्रुतमस्य विगाहनक्षमां प्रतिपेदे सुनयः सरस्वतीम् ॥४६॥ समुद्र-रशना पृथ्वी के पति विश्वपति के हृदय में रूढ़ इस आशय को समझ कर सुनय ने शीघ्र इस आशय की प्राप्ति के उपाय बताने में समर्थ ये वचन कहे ॥ ४६ ॥ प्रतिपालनमंत्र वस्तुनः सुधियस्तद्वदलब्धसाधनम् । द्वयमाहुरिहेष्टसाधनं तदुपायाः परमुद्यमाः परे ॥४७॥ विद्वान् लोग इष्ट साधन के लिये दो बातें (योग और क्षेम) बताते हैं—प्राप्त वस्तु की रक्षा (क्षेम) और अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति (योग) । अन्य सब उद्योग इन्हीं के उपाय हैं ॥ ४७ ॥ अनयोः प्रथमे प्रवर्तते नियतं सर्वजनः प्रयत्नतः । विरमत्यपि नाऽऽफलोदयं तदसिद्धौ महदेव दुर्यशः ॥४८॥ इनमें से पहली बात के लिये—प्राप्त वस्तु की रक्षा के लिये—सभी लोग सदा प्रयत्नशील रहते हैं और सफलता मिलने तक प्रयत्न नहीं छोड़ते क्योंकि प्राप्त वस्तु की रक्षा न करने में तो बड़ी भारी अपकीर्ति है ॥ ४८ ॥

१८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अपरं तु निरन्तरं गुणैर्नयविक्रान्तिमुखैः प्रसाधयन् । लभतेऽद्भुतकीर्तिसत्कृतिं यदि न स्यान् मदतो विकत्थनम् ॥४९॥ किन्तु नीति के अनुरूप गुणों से निरन्तर प्रयत्नशील धीमान् पुरुष अप्राप्त को प्राप्त करके अद्भुत यश से सत्कृत होते हैं, यदि वे प्रमादवश डींग मारकर गुप्त उपायों को प्रकट न कर दें॥४९॥ कति न क्षितिरक्षिणः क्षिताविह जाताः परिभोगलालसाः । गणयन्ति जनास्तमेव तु त्रिजगद् यस्य यशोभिरुज्वलम् ॥५०॥ इस पृथिवी पर अनेक राजा हो गये हैं जो केवल भोग-विलास ही में लिप्त रहे। उन्हें आज कोई जानता भी नहीं। लोग उन्हीं को याद रखते हैं जो अपने सुयश से तीनों लोकों को उज्वल बना जाते हैं ॥५०॥ अवनीमवनीशवंशजा वशयन्तः कुलजेन तेजसा । सुकृतैरुपभुञ्जते परं न हि तत्राधिकविक्रमः क्रमः ॥५१॥ प्रायः राजाओं के वंशज अपने कुल परम्परागत ऐश्वर्य के कारण पृथिवी को अपने वश में रख कर अपने पुण्यों से राज्य-सुख का उपभोग कर लेते हैं। इसमें उनका अपना कोई अधिक पराक्रम नहीं ॥५१॥ यदि कश्चन जायते पुमानिह विश्वोद्यमबुद्धिपौरुषः । स समुज्ज्वलयन् निजान्वयं ध्वनयत्युद्भटकीर्तिडिण्डिमम् ॥५२॥ किन्तु जो राजा अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा और अप्रतिहत पौरुष से विश्व को अपने वश में करता है वही अपने कुल को उज्वल बनाता है और उत्कृष्ट कीर्ति का ढिंढोरा पीट जाता है ॥५२॥ महसां निधयो महोदधेर्मणिवर्गाः कति वा न जज्ञिरे । हरिकण्ठतटाधिरोहणात् परमेकः प्रथितोऽस्ति कौस्तुभः ॥५३॥ समुद्र में से (मन्थन के समय) नाना प्रकार के अत्यन्त उज्वल और प्रकाशमान मणियों के समूह निकले, किन्तु भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर स्थान प्राप्त कर लेने के कारण एक कौस्तुभ मणि ही आज तक विख्यात है ॥५३॥ मनुवंशभवो भगीरथस्त्रिजगद्गीतयशा विशालधीः । रघुपङ्क्तिरथादयः परे प्रथितास्ते पृथगद्भूतैर्गुणैः ॥५४॥ मनुवंश में जन्म लेने वाले महात्मा भगीरथ का यश आज भी तीनों लोकों में गाया जाता है। रघु और दशरथ आदि भी अपने अद्भुत गुणों के कारण विख्यात हैं ॥५४॥ अपरस्तव पूर्वजेषु कः प्रथितो दीक्षितवासुदेवतः । स्वयमर्जितमूर्जितौजसा नवराज्यं नृवरः शशास यः ॥५५॥ आपके पूर्वजों में भी दीक्षित वासुदेव के समान और कौन प्रतापी हुआ ? वासुदेव ही थे जिन नर-रत्न ने अपने भुजबल के तेज से नवीन राज्य स्थापित कर शासन किया ॥५५॥

द्वितीयः सर्गः १९ इतरोऽपि तदन्वयोद्भवोऽजयपालः स कथं न गण्यताम् ! उपपुष्करमन्यदुष्करं निरमाद् योऽजयमेरुदुर्गकम् ॥५६॥ हाँ, उनके वंश में जो अजयपाल हुए उनकी गिनती भी क्यों न की जाय ? क्योंकि उन्होंने पुष्कर तीर्थ के समीप अन्य लोगों के लिये दुष्कर अजयमेरु (अजमेर) दुर्ग का निर्माण किया ॥५६॥ श्रमविक्रमनीतिरीतिभिस्त्वमसाधारणमर्जयन् यशः । भवितासि भुवि प्रतिष्ठितो ध्रुवमाकल्पमनल्पपौरुषः ॥५७॥ महापौरुषवान् आप पराक्रम और राजनीति की रीतियों से असाधारण यश प्राप्त करके प्रलय-काल तक इस संसार में निश्चित ही प्रतिष्ठित हो जायेंगे ॥ ५७ ॥ मतिमानतिमानुषं यशः पदवीं वा प्रतिपित्सुरुच्छ्रिताम् । तपसा जपसाधनेन वा वरिवस्येद् विधिनेष्टदेवताम् ॥५८॥ जो बुद्धिमान् अतिमानुष यश अथवा अलौकिक पद प्राप्त करना चाहता है उसे चाहिए कि विधिपूर्वक तप और जप के साधन से इष्ट देवता को प्रसन्न करे ॥ ५८ ॥ अखण्डब्रह्माण्डं सहचरितगाण्डीववलयः स्वदोर्दण्डेनैव प्रसभमपहर्तुं प्रभुरपि । समाराध्य श्रद्धासमुचिततपोभिः पशुपतिं प्रपेदे रौद्रास्त्रं स किल नरनामा नरहरिः ॥५९॥ मनुष्यों में श्रेष्ठ अर्जुन, जिनका दूसरा नाम 'नर' भी था, सदा साथ रहनेवाला गाण्डीव धनुष ही जिनका वलय था, और जो अपने भुज-दण्ड के पराक्रम से सारे ब्रह्माण्ड को हठात् वश में करने में समर्थ थे, उन्होंने भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उचित तपस्या करके भगवान् शंकर को प्रसन्न किया और उनसे रौद्रास्त्र प्राप्त किया। ॥ ५९ ॥ त्वमप्येवं देवं कमपि सुखसेवं परतरं भजञ्छ्रद्धा श्रद्धाधिकतरविशुद्धाशयतया । अरण्ये पुण्ये वा क्वचन पशुशून्येऽपि विषये ध्रुवां सिद्धिं विद्धि प्रगुणितसमृद्धिं करगताम् ॥६०॥ आप भी अब किसी पवित्र वन में या किसी प्राणि-शून्य निर्जन स्थान में पूर्ण श्रद्धा से अपने हृदय को विशुद्ध करके किसी परात्पर, सुख से सेवा किये जाने योग्य, आशुतोष देवता का भजन करें और निश्चय ही प्रगुणित समृद्धि से युक्त सिद्धि को अपनी मुट्ठी में आई हुई समझें ॥ ६० ॥ शुम्भाऽसुरप्रशमनी सकलार्थदात्री शाकम्भरी जनपदे भवति प्रतीता । आराधयन्नभिमतां परदेवतां तां वीतान्तरायमवधारय सिद्धमर्थम् ॥६१॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली, सम्पूर्ण सिद्धियों को देनेवाली, भगवती इस देश में (साँभर में) शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध है। इन परमपूज्य परदेवता भगवती की आराधना करके आप विघ्नों को नष्ट और अर्थ को सिद्ध समझें ॥ ६१ ॥