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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

७८६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५२ ]

महाबलाघुत—चित्रक, सारिवा, बला, कालानुसारिवा, द्राक्षा, इन्द्रायण, पिप्पली, एरण्ड, मुलेहटी, हरड, आंबला प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनके कल्क से, एक द्रोण जल, एक द्रोण में घी का एक आदक लिङ्ग करे। छानकर शीतल होने पर इसमें शर्करा एक प्रस्थ, वंशलोचन एक प्रस्थ, भली प्रकार मिलाये। इसमें से परिमित मात्रा को, यथासमय, दोष और बल के अनुसार पीये। बात से, पित्त से, कफ से दूषित शुक्-वाला, रक्त से दूषित, ग्रन्थि रेतवाला जो स्वास्थ्य-आरोग्य चाहे, वह पीये। यह घृत जीवनीय, बृंहण, बलवर्धक है। बुद्धि के लिये हितकारी, धन्य, सर्वरोगनाशक, कल्याणकारी है। इस घृत के सेवन से स्त्री को पुत्र प्राप्ति शीघ्र ही होती है। असङ्गज्य दोषों को तथा सम्पूर्ण दोषों को यह घृत नष्ट करता है सम्पूर्ण मूत्र दोषों में यह चिकित्सा करे ॥१५-७२॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे मूत्राघातप्रतिषेधो नाम (विशोऽध्यायः, आदितः)

अष्टपञ्चाशत्सामोऽध्यायः ॥१५॥

ऊनपष्टितमोऽध्यायः

अथातो मूत्रकृच्छ्रप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे मूत्रकृच्छ्रप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

वातेन पित्तेन कफेन सर्वै-

स्तथाऽभिघातैः शकृदश्मरीभ्याम् ।

तथापरः शर्करया सुकृष्टो

मूत्रोपघातः कथितोऽष्टमस्तु ॥३॥

मूत्रकृच्छ्र आठ प्रकार के हैं, यथा—वायु से, पित्त से, कफ से, सन्निपात से, अभिघात से, शकृत् के कारण, अश्मरी से और शर्करा से मूत्रकृच्छ्र (डुःख से मूत्र प्रवृत्ति) होती है।

वक्तव्य—मूत्राघात में मूत्र का अवरोध रूकावट रहती है।

मूत्रकृच्छ्र में मूत्र प्रवृत्ति होता है, परन्तु कठिनाई से प्रवृत्ति होता है ॥३॥

अल्पमल्पं समुत्पीक्य मुष्कमेहनवस्तिभिः ।

फल्कदुर्भिरिव कृच्छ्रेण वाताघातेन मेहति ॥४॥

वातजन्य मूत्रकृच्छ्र में वायु, मुष्क, मेहन, वस्ति (मूत्राशय) को पीड़ित करके कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा मूत्र त्याग करता है, यह वेदना फटने के समान होती है। मुष्क वस्ति मेहन में फटने के समान वेदना रहती है ॥४॥

हारिद्रमुष्णं रक्तं वा मुष्कमेहनवस्तिभिः ।

अग्निना दह्यमानाभैः पिताघातेन मेहति ॥५॥

पित्ताजन्यमूत्रकृच्छ्र में मुष्क-मेहन वस्ति में अग्नि से जलते हुए के समान, हल्दी की भाँति पीला, उष्ण, या लाल मूत्र आता है।

वि० मन्तव्य—पित्ताजन्यमूत्रकृच्छ्र से रोगी-हल्दी के समान पीला, उष्ण अथवा लाल मूत्र त्यागता है, और अण्डकोश, शिशु (मूत्र मार्ग) तथा मूत्राशय अग्नि से जलते हुए प्रतीत होते हैं ॥

स्निग्धं मुष्कलमुष्णं च मुष्कमेहनवस्तिभिः ।

संहृष्टरोमा गुरुभिः श्लेष्माघातेन मेहति ॥६॥

कफजन्यमूत्रकृच्छ्र में रोमांच होता है, मुष्क, मेहन और वस्ति में भारीपन होता है। मूत्र, चिकना, श्वेत और ईषद् उष्ण त्याग करता है ॥६॥

दाह्मीतर्जुजाविष्टो नानावर्णं सुदुर्मुहः ।

तान्यमानस्तु कृच्छ्रेण सन्निपातेन मेहति ॥७॥

सन्निपात से रोगी दाह, शीत, वेदना से पीड़ित, नाना रंग का (पीत, रक्त, श्वेत वर्ण), बार-बार तम अन्वकार में प्रविष्ट होता हुआ अतिकष्ट से मूत्र त्याग करता है ॥७॥

मूत्रवाहिषु शल्येन क्षतेष्वभिहतेषु च ।

क्षोतःसु मूत्राघातस्तु जायते शुक्रवेदनः ॥८॥

वातवस्तेस्तु तुल्यानि तस्य लिङ्गानि लक्ष्येत् ।

शकृतस्तु प्रतीघाताद्यायुर्विगुणतां गतः ॥९॥

आधमान स सशूलं च मूत्रभङ्गं करो त हि ।

मूत्रबाहि क्षोतों में शल्य से क्षत हो जाने पर या चोट लगा जाने पर अतिशय वेदनावाला मूत्राघात उत्पन्न होता है। इसमें वात वस्ति के समान लक्षण होते हैं। मल के अवरोध से वायु विपरीतगामि होकर आधमान, शूल और मूत्र संग उत्पन्न करता है ॥८,९॥

अश्मरीहेतुकः पूर्व मूत्राघात उदाहृतः ॥१०॥

अश्मरीजन्य मूत्राघात प्रथम निदान स्थान अ० ३ में कह दिया है ॥१०॥

अश्मरी शर्करा चैव तुल्ये संभवलक्षणैः ।

शर्कराया विशेषं तु श्रृणु कीर्तयतो मम ॥११॥

पञ्चमानस्य पित्तेन भिद्यमानस्य वायुना ।

श्लेष्मणोऽवयवा भिन्नाः शर्करा इति संज्ञिताः ॥१२॥

हृत्पीडा वेपथुः शूल कुक्षौ वह्निः सुदुर्बलः ।

आभिर्भवंति मूच्छां च मूत्राघातश्च दारुणः ॥१३॥

मूत्रवेगनिरस्तासु तासु आभ्यति वेदना ।

यावदन्या पुनर्नैति गुडिकां क्षोतसो मुखम् ॥१४॥

शर्करासंभवस्यैतन्मूत्राघातस्य लक्षणम् ।

अश्मरी और शर्करा के कारण और लक्षण समान हैं। शर्करा के विशेष लक्षण मुक्ष से सुनो, कफ का पित्त से परिपाक होने के समय वायु से टुकड़े-टुकड़े होने पर कफ के छोटे-छोटे टुकड़े शर्करा नाम से कहे जाते हैं। इनसे हृदय में पीड़ा, कम्पन, कुक्षि में शूल, वह्नि में दुर्बलता, मूच्छा, और भयानक मूत्राघात होता है। मूत्र वेग में शर्करा निकल जाने से वेदना शान्त हो जाती है। यह वेदना शान्ति

अ० ६० |

बरतक रहती है, जव्रतकं कि दंखरी शकरा गुटिका के रूप मे

छलोत-मूत्र सोत के मुख में नदीं फंस जाती । शकराजन्य मूत्रा-

, धात के ये लक्षण ईह ॥ ११.१५]

चिकिस्सितमथंतेषामष्टानामपि व्यते ॥१५॥

इसके आगे आगो मूत्राघातों की चिकित्सा कदी जायेगी ॥

अर्मरीं च खमाभिस्य यदुक्तं प्रसमीदय तत्‌ |

यथादोषं प्रयुञ्ञीत स्तेदादिमपि च क्रमम्‌ ॥१६॥

अश्मरी चिकित्खा मे वातादिभेदसेजो चिकित्सा कदी

६, उसी चिकित्छाको दोष के अनुसार करे स्नेहादि विधि

मी करे ॥१६॥ धदष्ारममिदो कुम्भीं हपुषां कण्टकारिकाम्‌ । बलां रतावरी रास्नां वरुण गिरिकर्णिकाम्‌ ॥१७॥ तथा विद्‌ारिगन्धादिं संहृत्य चरेबृतं पचेत्‌ । तें घृतं वा तत्‌ पेयं तेन बाऽप्यनुवासनम्‌ ॥१८॥ द यादुत्तरबस्ति च वातक्ृच्ड्धोपपशान्तये । गोखरु; पाषाणमेद्‌, कुम्भी (जल्कुम्भी), हाऊवेर, कटेरी

बला, शतावरी, रास्ना, वरण, गिरिकर्णिका ( अपराजिता कोयल), ओर विदारिगन्धादिगण, इन सबको एकत्रित करके

इनसे वेषेत तेर या चेबरेत घृत (वसा, मञ्जा धृत के खाय ते

या वसा मज्जा तल के साथ घी) बनाये। इनको पीये, अनु- वासन बस्ति देवे, ओर उत्तर वस्ति देवे--इससे वातजन्य

मूत्रकृच्छ्र शान्त होता है ॥१७,१८॥ | शच दृषटरास्वरसे तें सगुडक्षीरनागरम्‌ ॥१९॥। पक्त्वा तत्‌ पूबवयोज्यं तत्रानिखरुजा पहम्‌ ।

गोखरू के स्वरस मे गुड़, दुध, सोढ के साथ तेर सिद्ध

| || करे । इस तेर को पान अनुवाखन ओर उत्तरवस्ति मे ब्रते ।

यह वातजन्य वेदना को शान्त करता हे ॥१६॥

तृणोखखादिकाकोडीन्यभोधादिगणेः क (श) तम्‌ २० पीतं घतं पित्तछच्छं नाशयेत्‌ क्षीरमेव वा।_ `

तृणोत्खादि, काकोल्यादि, न्यभरोधादि गण से सिद्ध किया

धृत या दूध पित्तजन्यमूङच्छं को नष्ट करता हे ॥२०॥

द्द्यादुत्तरबस्ति च पित्तङृच्ट्रोरशान्तये ॥२१॥

इसी से - पित्तजन्यङ्च्छ की शान्ति के ण्थि उत्तर बस्ति

देवे ॥२१॥।

एभिरेव कृतः स्तेहखिविधेष्वपि बस्तिषु ।

हितं विरेचनं चेचलक्षीरद्राक्षारसेयुतम्‌॥२२॥ -

तृणोत्रलादि (पञ्चवृण आदि) से सिद्ध क्था ईनेहनिरूह

अनुवासन, उन्तर वस्ति तीनों मे उत्तम हे । इषुः दुध; द्रा

रस से युक्त विरेचन देना उत्तम है ॥२२॥

सुरसोषकमुस्तादौ बरुणादो च यत्‌ कृतम्‌ ।

तेरं तथा यवाग्बादि कफाघाति प्रशस्यते ॥२२॥

शतरतन्त्रध्‌ ७23

` कफजन्यमूत्रङ्छ मै-युरसादि, ऊषकादि सुक्तादिगण

म तथा वरुणादिगण मे सिद्ध किया ते एवं सुरादि, ऊष￾कादिगण, वरुणादि गण, समुस्तादिगण से सिद्ध की यवाग्‌ू-

प्सी आदि देवे ॥२३॥।

यथादोषोच्छयं कुयोदेतानेव च सवज ।

सान्निपातिक मनकृच्छर मे जिस दोष की अधिकता

दिखाई देवे, उस दोष नाशक चिकित्वा करे ।

फल्गुचृश्चीरदभौडमसारचणं च वारिणा ॥२४॥।

सुरेच्रसद भाम्बुपीतं कृच्छं रुजापहम्‌।

कटगूढर, पुनन॑वा, दभं, शिलाजतु इनका चुणं, पानी

सुरा, इश्चरस, दाम के पानी से (दोष के अनुसार) पीने से

मङ्च्छर की बेदना को नष्ट करता है । (प्रसंग से सन्िपात्‌-

जन्य कृच्छं को) ||२४॥

तथाऽमिघातजे कयत्‌ सयोत्रणविंकिस्सितम्‌ ॥२५॥

अभिघातजन्यमचक्ृच्छ मे सद्योव्रण चिरकित्खा करे ॥२५॥

मूत्रकच्छ्े शकृऽजाते कायो वातहरी क्रिया ।

स्वेदावगाहावभ्यङ्गबस्तिचण क्रियास्तथा ॥२६॥

राङत्‌जन्य मचङ्च्छं मेँ वातनाशक चिकित्खा करे | स्वेद्‌,

अवगाहन, अभ्यंग, बस्ति, चूण क्रिया विधि करे ॥२९॥

ये खन्ये तु तथा कृच्छ्रे तयोः भोक्त क्रियाविधिः ॥२७॥

अश्मरीजन्य, शकीराजन्य शेष दो जो मूत्रङ्च्छं है, उनमें

अश्मरी, शकरा चिकित्सा की विधि बरतनी चाये ॥१७॥

इति श्रीसुश्रतसंहितायामत्त रतन्तरान्तगते कायचिकित्वातन्त्र

मञ्कृच्छप्रतिषेधो नाम (एकर्विंशतितमोऽष्यासः, आदितः)

एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥*६॥

८ षष्टितमोश्ध्यायः

अथातोऽमालुषोपसगंप्रतिषेधमथ्यायं व्याख्यास्यामः ॥१९॥

यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरि; ॥२॥

|, अब इसके आगे अमानुषोपसगप्रतिषेष अध्याय का

व्याख्यान करेगे जैसा कि भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा था ॥

वि० मन्तम्य - यहाँ मूतविया-जो आयुवद का एक अङ्ग

है. का वणन किया गया है ॥२,२॥ _ ॑ |

निआचरेभ्यो रल्यस्तु सिस्यमेव क्ष तातुरः । इति यत्‌ प्रागभिहितं विस्तरस्तस्य वदयते ॥३॥

श्त रोगौ कौ निस्य प्रति निशाचरो से रक्षा करनी चाहिये, `

यह जो पिरे कहा है, उखको विस्तार से करेगे । =

वक्तव्य्‌-ङुछ आघुनिकों का कहना ह

राश्चस, कमि, जम्सं, वे सिरा, कोकाईे, ये सब -स

है । चकि दोनों रात को आक्रमण करे अ मां

=

७८८

मुश्रुतसंहिता

[ अ० ६०

हैं। इनके गुण धर्म समान हैं, इसलिये इनको राक्षस कहते हैं, परन्तु ॥३॥

गुह्यानागतविज्ञानमनवस्थाऽसहिष्णुता ।

क्रिया वाऽमानुषी यस्मिन् स ग्रहः परिकीर्त्यते ॥४॥

सामान्यलक्षण—गुप्तवस्तु का, भावी का ( भविष्य का ) ज्ञान, अनवस्थिति (अस्थिरता), असहिष्णुता मनुष्यों से अधिक क्रिया (वर देना आदि, या कूदने फाँदने की क्रिया), जिस रोगी में होती है उसे ग्रह से आक्रान्त जाने ।

अमर्यवळवीर्यपौरुषपराक्रमग्रहणधारणस्मरणज्ञानविज्ञानवच नविज्ञानानि.....चरक । वि० अ० ७ ।

वि० मन्तव्य—आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार ग्रह अर्थात् भूत से आक्रान्त मानव में गुह्याऽनागत विज्ञान आदि भाव उत्पन्न हो जाते हैं, जो अमानुष-अमानवीय होते हैं। इन उन्मादों के निदान, पूर्वरूप, रूप, सम्प्रति एवं उपशय दोष-जनित उन्मादों से विलक्षण होते हैं ॥४॥

अशुचि भिन्नमर्यादं क्षतं वा यदि वाऽक्षतम् ।

हिंस्युहिंसाविहारार्थं सत्कारार्थमर्थापि वा ॥५॥

अपवित्र, मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाले, व्रणवाले, अथवा व्रण रहित मानव को मारने की इच्छा से अथवा विहार रति के लिये अथवा सत्कार (पूजा) प्राप्त करने के लिये हिंसा करते हैं ।

“त्रिविधं तु खलुन्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति । तथाया-हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति ॥” चरक ॥५॥

असङ्ख्येया ग्रहगणा ग्रहाधिपतयस्तु ये ।

व्यञ्ज्यन्ते विविधाकारा भिद्यन्ते ते तथाऽष्टधा ॥६॥

देव-दैत्य राक्षस आदि जो असंख्य ग्रह समूह हैं, वे भिन्न भिन्न प्रकार के लक्षणोंवाले होने से आठ प्रकार के हैं ॥६॥

देवास्तथा शत्रुगणाश्च तेषां

गन्धर्वयक्षाः पितरो भुजङ्गाः ।

रक्षासि या चापि पिशाचजाति-

रेषोऽष्टको देवगणो ग्रहाख्यः ॥७॥

देवता (दीव्यन्तीति-देवाः), देवताओं के शत्रुगण (दैत्य), गन्धर्व, यक्ष, पितर, भुजंग (सांप), राक्षस, और पिशाच (मांस खानेवाले) यह आठ देवगण हैं ।

वक्तव्य—चरक में गुरु, बुद्ध, सिद्ध, श्रुषि भी इसका कारण कहे हैं। उन्होंने दैत्य और भुजंग को नहीं गिना ॥७॥

संतुष्टः शुचिरपि चेषगन्धमाल्यो

निस्तन्द्री ह्यवितथसंस्कृतप्रभाषी ।

तेजस्वी स्थिरनयनो वरप्रदाता

ब्रह्मण्यो भवति नरः स देवजुष्टः ॥८॥

देवग्रह से युक्त मनुष्य—संतोषी, पवित्र गन्ध माला की चाह रखनेवाला, आलस्य रहित निरन्तर संस्कृत बोलता (शुद्ध

धाराप्रवाह भाषा) है, तेजस्वी, पलकें नहीं गिरतीं (जैसा दम-यन्ती के स्वयंवर में देवताओं में पलक नहीं झपकती थी), सबको वर देनेवाला, ब्रह्मण्य (ब्राह्मण के आचार-विचारवाला) मनुष्य देवग्रह से युक्त रहता है ॥८॥

संस्वेदी द्विजगुरुदेवदोषवक्ता

दिक्षाक्षो विगतभयो विमार्गदृष्टिः ।

सन्तुष्टो भवति न चान्नपानजाते-

दुष्टात्मा भवति च देवशत्रुजुष्टः ॥९॥

प्रस्वेद युक्त, ब्राह्मण गुरु देवता के दोषों को कहनेवाला, देदी आँखों का, भयशून्य, कुमार्ग में दृष्टिवाला, खान पान समूह से भी सन्तुष्ट नहीं होता, दूषित आत्मावाला मनुष्य देव-शत्रु (दैत्य) से आक्रान्त रहता है ॥९॥

हृष्टात्मा पुलिनवनान्तरोपसेवी-

स्वाचारः प्रियपरिगीतगन्धमाल्यः ।

नृत्यन् वै ग्रहसति चारु चाल्यशब्दं

गन्धर्वग्रहपरिपीडितो मनुष्यः ॥१०॥

प्रसन्नचित्त, पुलिन (द्वीप) तथा वन के बीच में रमण करनेवाला, शोभन आचार का, गीत-गन्ध माला में रुचिवाला, नाचते हुए-हँसकर सुन्दर और थोड़ा बोलनेवाला मनुष्य गन्धर्वग्रह गण से पीड़ित रहता है ॥१०॥

ताम्राक्षः प्रियतनुरक्तवृक्षधारी

गम्भीरो द्रुतमतिरल्पवाक् सहिष्णुः ।

तेजस्वी वदति च किं द्वादमि कस्मै

यो यक्षग्रहपीडितो मनुष्यः ॥११॥

लालनेत्रों का, कमनीय पतले लाल वक्ष को पहनने का आदी, गम्भीर, चंचल बुद्धि, थोड़ा बोलनेवाला, सहनशील, तेजस्वी, ‘किसको क्या दै’ ऐसा कहनेवाला मनुष्य यक्षग्रह से पीड़ित रहता है ॥११॥

प्रतेभ्यो विसृजति संस्त्रेषु पिण्डान्

शान्तात्मा जलमपि चापसत्यवक्षः

मासेषुस्तिलगुडपायसाभिकाम-

स्तद्वुक्तो भवति पितृग्रहाभिभूतः ॥१२॥

कुशा को बिछाकर भूतों के लिये जौ-तिल आदि पिण्ड देता है, शान्तस्वभाव, दक्षिण की ओर वक्ष करके, पितरों को जल भी देता है। मांस, तिल, गुड़, खीर की चाह रखता है, इनको खाता है, ऐसा मनुष्य पितृग्रह से आक्रान्त रहता है ॥

भूमौ यः प्रसरति सर्पवत् कदाचित्

सृक्किण्यो विलिखति जिह्वया तथैव ।

निद्रालुगुंडमधुगुंधपायसेषु-

विन्नेयो भवति भुजङ्गमेन जुष्टः ॥१३॥

जो मनुष्य छाती से सांप की भांति कभी भूमि पर रंगता है, कभी ओठों को जीभ से चाटता है, सोनेवाला, गुड़, मध,

अ० ६० ]

उत्तरतन्त्रम्

७२६

दूध, खीर की चाहवाला मनुष्य सांप से आक्रान्त जानना चाहिये ॥१३॥

मांसासुग्विविधसुराविकारलिप्सु- निलैज्जो भूशमतिनिष्ठुरोऽतिशूरः ।

क्रोधालुर्विपुलबलो निशाविहारी शौचद्विद्भवति च रक्षसा गृहीतः ॥१४॥

मांस, रक्त, नानाप्रकार की सुरा इसकी बनावट की चाहवाला लज्जारहित, अतिकूर, अतिशूर, क्रोधी, अतिशय बलवान् रात में घूमनेवाला, पवित्रता से द्रैष करनेवाला मनुष्य राक्षस से आक्रान्त होता है ॥१४॥

उद्भूतः कृशपरुषश्चिरप्रलापी दुर्गन्धो भूशमशुचिस्तथाऽतिलोलः ।

बह्माग्नी विजनहिमांशुराग्निसेवी व्याविग्नेो भ्रमति रुदन् पिशाचजुष्टः ॥१५॥

हाथों को ऊपर उठाये, कृश, कठोर बोलनेवाला, दुर्गन्धयुक्त, अतिशय, अपवित्र, अति लालची, बहुत खानेवाला, एकान्तस्थान-शीतल जल का सेवन करनेवाला, रात में घूमने वाला, उद्विग्न, एवं रोता हुआ जो मनुष्य घूमता है, वह पिशाच से आक्रान्त रहता है ॥१५॥

स्थूलाक्षस्वरितगतः स्वफेनलेही निद्रालुः पतति च कम्पते च योऽति ।

यश्चाद्विद्विरदन्गदिविच्युतः सन् संसृष्टो न भवति वार्धकेन जुष्टः ॥१६॥

असाध्यलक्षण—जिसकी आँखें मोटी मोटी (सूजी) हों, शीघ्रगति, मुख से निकलों अपनी फेन को चाटनेवाला, निद्राशील, बहुत ही गिरता एवं कांपता रहता है, पहाड़ से, हाथों, वृक्ष आदि के गिरने के कारण जो ग्रहसे आक्रान्त होता है, तथा, वार्धक (हिंसा प्रवृत्ति) से जो आक्रान्त रहता है, वह मनुष्य नहीं बचता-यह असाध्य है ॥१६॥

देवग्रहाः पौर्णमास्यामसुराः सन्ध्ययोरपि । गन्धर्वः प्रायजोऽष्टम्यां यक्षाश्च प्रतिपद्य ॥१७॥ कृष्णक्षये च पितरः पञ्चम्यामपि चोरगाः । रक्षासि निशि पैशाचाश्चतुर्दश्यां विशन्ति च ॥१८॥ देवग्रह पूर्णमासी के दिन, असुरग्रह सन्ध्याकालों में, गन्धर्व प्रायः करके अष्टमी में, यक्ष प्रतिपदा के दिन, पितर अमावस्या में, सर्प पञ्चमी में, राक्षस रात्रि में, और पैशाच चौदह तथा अमावस के दिन भी आविष्ट होते हैं ।

उन्मादविच्युतामपि खलु देवविपितुगन्धर्वयक्षराक्षसपिशा- चानां गुरुवृद्धसिद्धानां वा एष्वन्तरेष्वभिगमनीयाः पुरुषाः भवन्ति, तथाया—पापस्य कर्मणः समारम्भे, पूर्वकृतस्य कर्मणः परिणामकाले,.....सन्ध्यावेलायां, अप्रयतभावे वा, पर्व-

सन्धिषु वा, मिश्रुनीभावे, रजस्वलाभिगमने वा, विगुणे वाऽध्य- यनवल्लिंगलहोमप्रयोगे, नियमव्रतब्रह्मचर्यभङ्गे वा, महाहवे वा, देशकालपुरविनाशे वा, महाश्रहोपगमने वा, त्रिया वा प्रजनन- काले, विविधभूताशुभाशुचिस्पर्शने वा, वमनविरचनरुचिरखावे अशुचयेप्रयतस्य वा, चैत्यदेवायतनाभिगमने वा, मांसमधुतिल- गुडमद्योच्छिष्टे वा, दिग्वाससि वा, निशिनगरनिगमचतुष्यथोप- वनशमशानाधातनाभिगमने वा द्विजगुरुसुरयतिपूज्याभिषेधे वा, धर्मख्यानध्यतिक्रमे वा, अन्यस्य वा कर्मणोऽप्रशस्तस्वारम्भे, इत्यभिघातकाला व्याख्याता भवन्ति ॥ चरक नि० अ० ७.१७।

“तत्र शौचाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नरं प्रायः शुक्ल प्रतिपदि त्रयोदश्यां च लिङ्गमवेद्याभिषेधंयन्ति देवाः, स्नानशु- चिविविक्तऽसेविन् धर्मशास्त्रश्रुतिवाक्यकुशलं प्रायः पञ्च्यां नवम्यां श्रूषयः.....इत्यपरिसंख्येयानां ग्रहणाणांमविष्कृततमा-हृष्टावैते व्याख्याताः ॥”

चरक वि० अ० १।२८ ॥१७,१८॥

दर्पणादीन् यथा छाया शीतोष्णं प्राणिनो यथा ।

स्वमणि भास्करस्योत्सा यथा देहं च देहयुक्तं ॥

विशन्ति च न दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणम् ॥१९॥

जिस प्रकार छाया आयना (दर्पण) आदि में प्रविष्ट होती नहीं दीखती, प्राणियों में सरदी-गरमी जाती है, सूर्यकान्त में जैसे सूर्य की किरणें जाती हैं, और जैसे शरीर में आत्मा-जीव प्रविष्ट होता है, ये जैसे अन्दर शरीर में जाते दिखाई नहीं देते, उसी प्रकार मनुष्यों में ग्रह प्रविष्ट होते हुए नहीं दीखते ।

“अदृश्यन्तः पुसृष्य देहं देवादयः स्वैश्च गुणप्रभावे । विशन्त्यदृश्यस्तस्मा यथैव छायातपो दर्पणसूर्यकान्तौ ॥”

वि० मन्तव्य—जो भूतों को अपनी आँखों देखने का आग्रह किया करते हैं वे भगवान् धन्वन्तरि के अथवा भूतविद्या के इस वाक्य को देखने का कष्ट करें । यही बालग्रहों के सम्बन्ध में अ० २७-७ में कहा गया है ॥१९॥

तपासि तीव्राणि तथैव दानं व्रतानि धर्मो नियमाश्च सत्यम् ।

गुणास्तथाऽष्टावपि तेषु नित्या

न्यस्ताः समस्ताश्च यथाप्रभावम् ॥२०॥

इन सब ग्रहों में तीव्रतप, दान, व्रत (चान्द्रायण आदि), धर्म, नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिषान), सत्य, आठों गुण, ये अपने प्रभाव के अनुसार सम्पूर्ण रूप में, या थोड़े-थोड़े (दो, तीन, चार) रहते हैं ।

वक्तव्य—आठगुण—“अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्यं, ईशित्वं, वशित्वम् ।” अथवा “आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्यानां छन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चान्प्यदर्शनम् ॥” च० अ० १।

७६०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६० ]

वि० मन्तव्य—गुरु, बुद्ध, सिद्ध तथा ऋषि भी यदि योगी हैं तो वे अन्यमानव के शरीर में आवेश कर जाते हैं, क्योंकि यह अणिमा आदि तथा आवेश आदि आठ गुण-योगियों का ईश्वरीय बल है और शुद्ध सत्त्व (मनस्) के समाधान (समाधि) से यह सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥२०॥

न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति

न वा मनुष्यान् क्वचिदाविशन्ति ।

ये स्वाविशन्तीति वदन्ति मोहा-

त्वे भूतविद्याविषयादपोद्याः ॥२१॥

ये देवगण मनुष्यों के साथ कभी एकत्रित नहीं होते और न मनुष्य शरीरों में कभी प्रविष्ट होते हैं । जो वैद्य अज्ञान के कारण इनका शरीर में प्रविष्ट होना कहते हैं, उन वैद्यों को भूतविद्या के विषय से अनभिज्ञ जानना चाहिये ॥२१॥

तेषां महाणां परिचारका ये

कोटीसहस्रायुतपद्मासंख्याः ।

असुरवसामांसमुजः सुभौमा

निशाविहाराश्च तमाविशन्ति ॥२२॥

इन देवता गणों के जो करोड़ों, हजारों, लाखों, पद्म असंख्य नौकर हैं, जो नौकर रक्त, वसा, मांस का भोजन करते हैं, देखने में बहुत भयानक, रात में विहार करनेवाले हैं वे पुरुषों में प्रविष्ट होते हैं ।

“निवृत्तामिषमद्यो ये हितार्थी प्रयतः शुचिः ।

निजागन्तुमिन्द्रमादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥” चरक ॥२२॥

निशाचराणां तेषां हि ये देवगणमाश्रिताः ।

ते तु तत्सत्त्वसंसर्गद्विज्योस्तु तदुज्ञनाः ॥२३॥

उन राक्षसों के अनुचर (नौकर) जिस देवगण के आश्रित हैं, (नौकर होते हैं), वे नौकर, उस देवता आदि के सत्त्व के संयोग से उसी देवता के लक्षणोंवाले जानने चाहिये ।

वक्तव्य—गवर्नर का जो नौकर है, उस नौकर को भी गवर्नर के प्रतिनिधि रूप में मानकर व्यवहार किया जाता है ॥

देवग्रहा इति पुनः प्रोच्यन्तेऽशुचयश्च ते

देववच्च नमस्यन्ते प्रत्यर्थ्यन्ते च देववत् ॥२४॥

इनमें जो नौकर पवित्र होते हैं, वे देवग्रह कहे जाते हैं । इनको देवता के समान नमस्कार किया जाता है और देवता के समान इनसे याचना की जाती है ॥४२॥

स्वामिशौलक्रियाचाराः क्रम एव सुरादिषु ।

निश्चंतेर्या दुहितरस्तासां स प्रसवः स्मृतः ॥२५॥

ये नौकर स्वामी के स्वभाव, क्रिया के समान आचरण-वाले होते हैं, यह नियम देवग्रह आदि में है । क्योंकि ये नौकर निश्चंति (राक्षसों का पितामह) की स्त्रियों की संतान हैं, इस-लिये प्रसूति के गुणोंवाले हैं ॥२५॥

सत्यत्वाद्पवृत्तेषु वृत्तिस्तेषां गणैः कृता ।

शान्त्रोक्त सत्यव्यवहार के छोड़ देने से ही इनकी गणों से अनुचर वृत्ति बना दी जाती है ।

हिंसाविहारा ये केचिहवभावमुपाश्रिताः ॥२६॥

भूतानोति कृता संज्ञा तेषां संज्ञाप्रवक्तृभिः ।

जो देवता भाव में आश्रित होकर हिंसा की इच्छा करते हैं, उनकी ‘भूत’ यह संज्ञा, संज्ञा बनानेवालों ने की है । (जो ग्रह देवता रूप होकर भी हिंसा की रुचि करते हैं, उनको भूत कहते हैं) ॥२६॥

ग्रहसंज्ञानि भूतानि यस्माद्धेत्यनया भिषक् ॥२७॥

विद्याया भूतविद्यात्वमत एव निरुच्यते ।

क्योंकि वैद्य इस विद्या से ग्रह संज्ञक भूतों को जानता है, इसलिये इस विद्या को भूत विद्या कहते हैं ॥२७॥

तेषां शान्त्यर्थमन्विच्छन् वैद्यस्तु सुसमाहितः ॥२८॥

जपैः सनियमैर्होमैरांभेत चिकित्सितुम् ।

इन ग्रहों की शान्ति की इच्छा करनेवाला वैद्य अति सावधानी से जप, नियम, होम के द्वारा चिकित्सा करनी आरम्भ करे ।

‘शान्तिकर्मणिहोमांश्च जपस्वस्ययनानि च ।

वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाचरेद् ॥

भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् ।

पूजयन् प्रयतो नित्यं जयत्युन्मादजं भयम् ॥” चरक ।

रक्तानि गन्धमाल्यानि बीजानि मधुसपिषां ॥२९॥

भदयाश्च सर्वं सर्वेषां सामान्यो विधिरुच्यते ।

लालवर्ण के गन्ध, माला (केशर, लाल कनेर, गुडहल का फूल आदि) सरसों, तिल, जो आदि बीज, मधु, घी सब प्रकार के भक्ष्य (लड्डू आदि), यह सब के लिये सामान्य विधि है ॥

वष्णानि गन्धमाल्यानि मांसानि रुधिराणि च ॥३०॥

यानि येषां यथेष्टानि तानि तैश्चः प्रदापयेत् ।

हिंसन्ति मनुजान् येषु प्रायशो दिवसेषु तु ॥३१॥

दिनेषु तेषु देयानि तद्भूतविनिवृत्तये ।

वस्त्र, सुगन्ध, माला, मांस, रक्त और जो जो जिस जिस ग्रह को इष्ट हो, वह उनके लिये देवे । जिन दिनों में मनुष्यों को प्रायः करके ये पीड़ित करते हैं, उन दिनों में, उस भूत की निवृत्ति के लिये उपर्युक्त वस्तुयें वस्त्र, सुगन्ध माला आदि देवे ।

देवग्रहे देवगृहे हृत्वाऽग्निं प्रा (दा) पयेद्वलिम् ॥३२॥

कुशस्वस्तिकपूपाज्यच्छत्रपायससंभूतम् ।

देवग्रह में मन्दिर के अन्दर अग्नि में होम करके बलि देवे । इसके लिये कुशा, स्वस्तिक (X), अपूप, घी, छत्र, खीर, इनसे बलि देवे ॥३२॥

शीघ्र शान्त हो जाता है ॥३८,२६९॥

| खीर आदि से नानाप्रकार की बलि देवे ॥३६॥।

क्षण ६० | अघुराय यथाकारं बिदभ्याचत्वरादिषु ।२३॥

अपुर मरह के व्यि सन्ध्याकाल मे चौराहे पर वहि देवे ॥

गन्धवेंस्य गवां मध्ये मयमांसाम्बुजाङ्गरम्‌ ।

गन्धर्वं ग्रह के ल्थि गोओंके ब्रीचमें मद्र मांस पानी

जीर जांगल मांस की बलि देवे ।

हये वेश्मनि यक्षस्य ल्माषाखकूसुरादिभिः ॥३४॥

अतिञुक्तकङ्कन्दान्जेः पुष्पेश्च वितरेद्रसिम्‌ ।

यक्षग्रह के ल्यि मनके अनुकूक सुन्दर घर मं-कुल्माष

(अस्विन्न जौ), उड़द, रक्त, सुरा आदि मदय, अतिमुक्तक

(माधवी कता); कुन्द, कमल इनके पएूरछो से बलि देवे ॥२४॥।

न्यां पिवप्रहाये्ठं कुगास्तरणमूषितम्‌ ॥२५॥

पितृप्रह के ल्यि नदी के किनारे कुशा विशछाकर उसमें

तिल, गुड, जो की वि देवे ॥३५॥ तत्नेवोपहरेच्चापि नागाय वित्रिधं बसिम्‌।

नाग (सप) के व्यि नदी के किनारे पर ही गुड़, मधु,

चतुष्पथे राक्षसस्य भीमेषु गहनेषु वा ॥३६॥

शून्यागारे पिशाचस्य तीव्रं बखिमुपाहरेत्‌ ।

राक्चस के ल्यि चौराहे पर या गहन-भयानक वनां में

मस, रक्त, सुरा आदि की बलि देवे । पिशाच के व्यि खारी

धर मँ--तीव्र बलि (कचा मांस, पशु बलि) को देवे ॥३६॥

पूवंमाचरितेभेन्त्रमूः तविद्यानिद नितेः ॥२७॥

न शक्या बङिभिजंतं योगेस्तान्‌ समुपाचरेत्‌ ।

भूतविद्या मँ के हृए- मंब के प्रथम प्रयोग करने से

तथा बङि देने से जो ग्रह शान्त नदीं हो सके, उनको शन्त

करने के ल्यि- योगों को बरते ॥३७॥। अजक्षेचमरोमाणि अस्यकोदूकयोस्तथ ॥२८॥

दिङक मूत्रं च वस्तस्य धूमनस्यं प्रयोजयेत्‌ ।

एतेन शाम्यति क्षिप्रं बङ्बानपि यो अहः ॥२९॥

बकरा, रीछ, सेद, उल्क्--्नकी खा, रोम, दग बकरे

क मून, इनका धुवा रोगी को देषे । इससे बलवान्‌ भह मी

गजाहपिप्पटीम्‌रव्योषामल्कसषेपान्‌। `

गोधानङ्कऊमाजगैर छष्यपित्तप्रपेषिताच्‌ ॥४०॥

नस्याभ्यञ्लनसेकेषु विदभ्यायोगतरववित्‌ । ६

गजपिप्पली, पिप्पलीमूछ, तरिकट, वलाः सरसो इन्‌

गोह, नेवा, विल्छी, रौ इनके पिततो से पीकर, इसे

नस्य, अभ्यंग, परिक आदि मँ योगतत्त्व कौ जाननेवाला

ू भ्रते ४०|| । । =

खरारवतरोलूककरभश्वश्गाठजम्‌ ॥४५॥

पुरीषं गृधकाकानो बरादस्य च पेषधेत्‌ ।

छत्तरतन्त्रम्‌

` ब्तमूमेण तत्पद्धं डं स्यात पूेवद्धितम्‌॥४२। दूर्वा, रषतवूष, सूतरेश)

७९१ गघा, घोड़ा, खचर, उल्द्‌, ऊंट, कुत्ता, गीदड़, गीध,

कोओआ, सूअर इनकी पुरीष (मल) इनको पीखकर (इनके कल्क

से) वक्रे के सूत्रम तेल सिद्ध करे । ( इखका प्रयोग नस्य,

अभ्यंग तथा से चन) ॥४१,४२॥

शिरीषबीजं ख्शनं ण्ठां सिद्धाथेकं वचाम्‌

मञ्जिष्ठ रजनीं कृष्णां बस्तमूत्रेण पेषयेत्‌ ॥४३॥। वत्यंर्छायाविशष्कास्ताः सपित्ता नयनाञजनम्‌।

शिरीष के बीज, लहसुन, सोढ, सरसो, वच, मजीठ,

हल्दी, पिप्पली इनको बकरे के मूत्र से पीखकर गाय का पित्त

मिलाकर-वर्ियां बनाक्रर छायाम सुखा के। ये बत्तियां

धिषकर आंखों म अंजन्‌ करे ।४३॥

नक्तमारषटं उ्योषं मृं श्योनाक बिल्वयोः ॥४४॥

हरिद्रे च कृता वर्यः पूबेवन्नयनाञ्नम्‌ ।

करंज का फल, सोढ, मरिच, पिप्पली, श्योनाक ओर

बिल्व का मूढ, हल्दी, दाखदल्दी से बनाई व्या; (पूवं की

भाति से बनाई बकरे के मूत्र म पीसकर, छाया में सुखाकर;

पित्त के साथ) अंजन करे ॥४४॥

सेन्धवं कटुकां हिक वयःस्थां च व चामपि।

बस्तमनत्रेण संपिष्टं मसस्यपित्तन पूवेवत ॥४५॥ ये ये बरहा न सिध्यन्ति सर्वषां नयनार्जनम्‌ ।

सैन्धव, कुटकी, हींग, गिलोय (या आंवला) बच, इनको

बकरे के मूत्र से पीसकर, छाया मे सुलाकर बनाई बि महली

के पित्त के साथ अंजन करे। जो जो प्रह शान्त नदीं होते;

उनमें आंखों म इसका अंजन करे ॥४५॥

पुराणसर्पिखशनं दिग सिद्धाथेकं वसा ॥४६॥

गोरोमौ चाजखोमी च भूतकेशो जटा तथा ।

कुरा सरपगन्धा च तथा काणविकाणिके ॥५०॥

वजनपरोक्ता वयःस्था च ङ्गी मोहन क्षिका ।

अेमृखं त्रिकटुकं ता खोतोजमजनम्‌ ॥४०।

सैपारी हरितारुं च रश्षोष्ना ये च कोतिताः।

सिह्याघ्क्षेपाजौ रद्र पिवाजिगवां तथा ॥४९॥

श्वाविच्छल्यकगोधानासुष्स्य नङ्गखस्य च ।

विटखभोमवसामञ्ररक्तपित्तनखादयः ॥५०॥ . = अस्मिन्‌ वग भिषक कयोत्तङानि च घृतानि च ।

पानाभ्यज्ञननस्थेषु तानि योऽ्यानि जानता ॥५९॥

अवपीडेऽञ्लने चैव विद्भ्याद्गुटिकोकृतम्‌ ।

विदधीत परषेके क्वथितं, चूणितं तथा ॥५२॥

'उदुभूज्ने, श्छर्णपिष्टं देहे चाव चारयत्‌ ।

एष स्वविकारास्तु मानसानपराजितः ॥ 9 द. र भ २ र + चँ

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७६२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६१ ]

काकोली, खीर काकोली, वज्रकन्द, गिलोय, काकड़ाशुद्धी, मोहनवल्लीका (बट पत्रिका), आक का मूल, त्रिकुट, प्रियङ्गु, क्षोतोजन, मैनशिल, हरताल, श्वेत सरसों, (अथवा गुग्गुल आदि जो रक्षोन्न द्रव्य हैं, इनको तथा सिंह, व्याघ्र, रीछ, बिल्ली, चीता, घोड़ा, गाय, सेह, श्वावित् (बड़ी सेह), गोह, ऊंट, नेवला इनकी विष्ठा, त्वचा, रोम, वसा, मूत्र, रक्त, पित्त नख आदि लेकर इनसे वैद्य तैल और घृत अलग-अलग सिद्ध करे। इन तैल या घृतों को जाननेवाला वैद्य पान, अश्वंग नस्य आदि में बरते। इनसे गोलियाँ बनाकर अवपीडन नस्य, अंजन करे। इनका क्वाथ परिषेक-स्तन बरते, इनका चूर्ण शरीर पर छिड़के, इनको बारीक पीसकर शरीर पर लेर करे। वह मनोजन्य सब रोगों का अपराजित रहता है। योड़े ही समय में सब मानसिक रोगों को नष्ट करता है, स्नेहन, धूपन आदि उपचार भी करे।

“विशेषतः पुराणं च घृतं तं पाययेद् भिषक्। उग्रगन्धं पुराणं स्याद् दशवर्षस्थितं घृतम् ॥ लाक्षारुचिभिं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम्। मेध्यं विरेचनेष्वग्र्यं प्रपुराणमतः परम् ॥ नासाधयं नाम तस्यास्ति यत्स्याद् वर्षशतस्थितम्। दृष्टं स्पृष्टमथाभ्रातं तद्धि सर्वं ग्रहापहम् ॥”

चरक चि० अ० ६ ॥४६-५३॥

न चाचौक्षं प्रयुञ्जीत प्रयोगं देवताग्रहे ॥४४॥

देवता आदि पवित्र ग्रहों में अपवित्र प्रयोग नहीं करना चाहिये।

वि० मन्तव्य—च अ चौक्षं—अपवित्र—उक्त पुरीष एवं रोम आदि अपवित्र द्रव्यों के धूप, अञ्जन, परिषेचन एवं लेप आदि प्रयोग न हो ॥५४॥

ऋते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूलं न चाचरेत्।

वैद्यातुरौ निहन्तुस्ते ध्रुवं कुट्टा महौजसा ॥५५॥

पिशाच ग्रह को छोड़कर अन्यत्र प्रतिकूल कार्य न करे, क्योंकि महान् शक्तिवाले ये ग्रह कुट्ट होकर वैद्य और रोगी दोनों को निश्चित मार देते हैं।

देवर्षिपितुराग्ध्ववेः उन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्।

बर्जयेदक्षनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकमं च ॥

सर्पिष्यानादि तत्स्येह मुदु भेषज्यमाचरेत्।

पूर्णा बलि उपहारंश्च मंत्राञ्जनविधीस्तथा ॥

चरक । चि० अ० ६ ॥

वि० मन्तव्य—मूतोन्माद में—ताड़न, त्रासन एवं तर्जन आदि का भी विधान है, परन्तु वह केवल पिशाच ग्रह से पीड़ित में ही करना चाहिये। अन्यान्य देव, यक्ष एवं पितृग्रह आदि में नहीं करना चाहिये ॥५५॥

हिताहितीये यद्योक्तं नित्यमेव समाचरेत्।

ततः प्राप्स्यति सिद्धिं च यज्ञश्च विपुलं भिषक् ॥५६॥

हिताहितीय अध्याय में जो आहार कहा है, उसे सदा बरते।

इस प्रकार करने से ग्रह से मुक्ति, रोगों को मिलती है, और वैद्य को यज्ञ मिलता है ॥५६॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रेऽमानुषोपसर्गप्रतिषेधो नाम (प्रथमोऽध्यायः, आदितः) पश्चिमोऽध्यायः ॥६०॥

एकषष्ठितमोऽध्यायः

अथातोऽपस्मारप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यस्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे अपस्मारप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

स्मृति (याददास्त स्मरण) मूतार्थ (अनुभव किया विषय), इनके ज्ञान का नष्ट होना या भूल जाना, अपस्मार कहा है, यह अपस्मार रोग विनाशकारक है।

वक्तव्य—“अपस्मारं पुनः स्मृतिबुद्धिसत्त्वसंख्ण्वाद्भीमत्सचेष्टमावस्थिकं तमःप्रवेशमावक्षते ॥” चरक।

स्मृतेरपगमं प्रादुरपस्मारं भिषग्विदः ॥”

चरक चि० अ० १०, ३ ॥१॥

स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपश्च परिवर्जने।

अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽयं व्याधिरन्तकृत् ॥३॥

मिथ्यातियोगेन्द्रियार्थकर्मणामभिसेवनात्।

विरुद्धमलिनाहारविहारकुपितैर्मैलैः ॥४॥

वेगनिग्रहशोठानामहिताशुचिभोजिनाम्।

रजस्तमोभिभूतानां गच्छुतां च रजस्वलाम् ॥५॥

तथा कामभयोद्गक्रोधशोकादिभिर्भुञ्जम्।

चेतस्यभिहते पुंसामपस्मारोऽभिजायते ॥६॥

इन्द्रियों के विषय और कर्मों के मिथ्या योग, अथवा अतियोग के सेवन से, विरुद्ध एवं मलिन आहार, विहार से कुपित हुए दोनों से, उपस्थित मल मूत्रादि के वेगों को रोकने के स्वभाववाले, अहित, अपवित्र भोजन करनेवालों में, रज एवं तम से आक्रान्त मनवालों में रजस्वला के साथ सम्भोग करने से, तथा कामशोक-भय-उद्वेग, क्रोध आदि से मन पर बहुत आघात होने पर पुरुषों में अपस्मार उत्पन्न होता है।

“त एवंविधानां प्राणभूतां क्षिप्रमभिनिवर्त्तन्ते, तद्यथा—रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसामुद्भ्रान्तविषयबहुदोषाणां समलविकृतोपहितानि अशुचीनि अभ्यवहारजातानि वैषम्ययुक्तोपयुञ्जानानां

अ० ६१ ] १००

उत्तरतन्त्रम्

७६३

तन्त्रप्रयोगमपि च विषममाचरतामन्याश्च शरीरचेष्टाविषमाः समाचरतामत्युपक्षीणदेहानां वा दोषाः प्रकृतिः रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसा मन्तरात्मनः श्रेष्ठतममायतनं हृदयमुपसृत्य पर्यवतिष्ठते तयेन्द्रियायतनानि च तत्र तत्र चावस्थिताः सन्तो यदा हृदयमिन्द्रियायतनानि चेरिताः कासकौधमयलोभमोहहर्षशोकचिन्तोद्वेगादिभिः भूयः सहसाऽभिपूरयन्ति, तदा जनतुरपस्मरति।”

चरक नि० अ० ८-४ ||४-६||

हृत्कम्पः शून्यता स्वेदो ध्यानं मूर्च्छा प्रभूहता । निद्रानाशश्च तस्मिन्स्तु भविष्यति भवन्त्यथ ॥७॥

पूर्वरूप—हृदय में कम्प, शून्यता (हृदय में), स्वेद, ध्यान (चिन्तन-एकाग्रता), मूर्च्छा, अतिशय संज्ञानाश और निद्रा-नाश होता है ।

तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति, तद्यथा—भ्रूवृदासः सतत-मङ्गोर्वैकृतमशब्दश्रवणं, लालासिंधाणप्रखण्वणमन्नामिलक्षण-मरोचकविपाकौ हृदयग्रहः, कुचैराटोपो दौर्बल्यमस्थिभेदोऽङ्ग-मर्दो, मोहस्तमसो दर्शनम्, मूर्च्छा, भ्रमश्चाभीर्दणं च स्वप्ने मदनर्त्तनपीडनवेपशुध्ययनपतनादीन्यपस्मारपूर्वरूपाणि भवन्ति, ततोऽनन्तरमपस्माराभिनिर्बुत्तिरेव ॥

चरक नि० अ० ८-७ ||७

संज्ञाबहेषु श्लोतःसु दोषःप्यामेषु मानवः । रजस्तमःपरीतेषु मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥८॥ विक्षिपन हस्तपादं च विजिह्वाभ्रविर्लोचनः । दन्तान् खादन् वमनं फेनं विवृताक्षः पतेतु क्षितौ ॥९॥ अल्पकालान्तरं चापि पुनः संज्ञां लभेत् सः । सोऽपस्मार इति प्रोक्तः—

संज्ञावाही श्लोतों के दोषों से भर जाने पर तथा रज एवं तम से युक्त हो जाने के कारण मूढ़ हुआ मनुष्य विक्षिप्त चित्त से हाथ पैर को फेंकता है, भ्रू और आंख कुटिल हो जाती है, दांत कटकटाता है, मुख से झाग गिरता है, आँखें पलट जाती हैं, भूमि पर गिर पड़ता है, कुछ देर के पीछे फिर चेतना प्राप्त करता है, इसको अपस्मार कहते हैं ।

“धमनीभिः श्रिता दोषा हृदयं पीडयन्ति हि । संपीड्यमाने व्यथते मूढो भ्रान्तेन चेतसा ॥ पश्यत्यसन्ति रूपाणि पतति प्रस्फुरत्यपि । जिह्वाक्षिभ्रः क्षवल्पालो हस्तौ पादौ च विक्षिपन् । बोधवेगे च विगते सुसवत्यलिबुद्धये ॥”

चरक० चि० अ० १०-६ ||८,६||

स च हृष्टभ्रतुर्विधः ॥१०॥

वातपित्तकफैर्नृणां चतुर्थः सन्निपाततः । यह अपस्मार मनुष्यों में वायु, पित्त, कफ और सन्निपात से चार प्रकार का होता है ॥१०॥

वेपमानो दशन् दन्तान् श्वसनं फेनं वमन्नपि ॥११॥ यो त्रयाद्विकृतं सत्त्वं कृष्णं मामनुधावति । ततो मे चिन्तनाशः स्यात् सोऽपस्मारोऽनिलारुक्तः ॥ जो रोगी कांपता हुआ, दांतों को काटते हुए जोर से श्वास लेता है, झाग मुख से गिरती हो, जो रोगी यह कहे कि विकृत आकार का काला प्राणी मेरी ओर दौड़ रहा है, इससे मेरी संज्ञा नष्ट होती है, उसे वातजन्य अपस्मार से पीड़ित जानो ॥

वृत्तापस्वेदमूर्च्छातीर्तो धुन्वन्नञ्जानि विह्वलः । यो त्रयाद्विकृतं सत्त्वं पीतं मामनुधावति ॥१३॥ ततो मे चिन्तनाशः स्यात् स पित्तभव उच्यते । प्यास, ताप, स्वेद, मूर्च्छा से पीड़ित, अंगों को फेंकता हुआ, बेचैन, जो पीले रंग के विकृत प्राणि को अपनी ओर दौड़ता हुआ अनुभव करके बेहोश होता है, उसे पित्तजन्य अपस्मार से पीड़ित जाने ॥१३॥

श्रीतहृल्लासनिद्रांतः पतन् भूमौ वमन् कफम् ॥१४॥ यो त्रयाद्विकृतं सत्त्वं शुक्लं मामनुधावति । ततो मे चिन्तनाशः स्यात् सोऽपस्मारः कफारुक्तः ॥१५॥ शीत जी मचलाना, निद्रा से पीड़ित, भूमि पर गिरकर कफ का वमन करता है, जो श्वेत रंग के विकृत प्राणी को अपनी ओर भागता हुआ अनुभव करके मूर्च्छित होता है, उसे कफजन्य अपस्मार से पीड़ित जानना ॥१४,१५॥

हृदि तोदस्तुडुक्त्वेद्विष्वप्येतेषु संख्यया । वातजं में हृदय में पीड़ा, पित्तज में प्यास और कफज अपस्मार में जी मचलाना होता है ।

प्रलापः कूजनं क्लेशः प्रत्येकं तु भवेद्विह ॥१६॥ प्रलाप, कराहना, क्लेश, ये लक्षण तीनों दोषों के अपस्मारों में सामान्य हैं ॥१६॥

सर्वलिङ्गसमावायः सर्वदोषप्रकोपजे । सन्निपातजन्य अपस्मारं सर्वलक्षणो का मेल रहता है ।

अनिमित्तागमादव्याधैर्गमनादकृतेऽपि च ॥१७॥ आगमाद्याप्यपस्मारं वदन्यन्ये न दोषजम् ।

विना कारण के रोग का आक्रमण होने से, चिकित्सा न करने पर भी रोग के मिट जाने से, कुछ लोग शास्त्र (अपने) से अपस्मार को आगन्तुज मानते हैं, दोषजन्य नहीं मानते ॥

क्रमोपयोगादोषाणां क्षणिकत्वात्तथैव च ॥१८॥ आगमाद्वैरवरूप्याच्च स तु निर्वर्ण्यते बुधैः ।

देवे वर्षत्यपि यथा भूमौ बीजानि कान्चित् ॥१९॥ शरदि प्रतिरोहन्ति तथा व्याधिःसमुद्भवः ।

स्थायिनः केचिदल्पेन कालेनाभिप्रवर्धिताः ॥२०॥ दर्शयन्ति विकारास्तु विश्वरूपान्निसर्गतः । अपस्मारो महान्वापिस्तस्मादोषज एव तु ॥२१॥

७६४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६२ ]

दोषों का संचय आदि क्रम से रोगोत्पत्ति करने के कारण, अपस्मार दोषजन्य है। वातादि दोषों के क्षणिक होने के कारण अपस्मार दोषजन्य है। जब तक दोष का वेग रहता है, तब तक रोग रहता है। आगम (चरक में) अपस्मार को दोषजन्य कहा है। विश्वरूप होने से वात, पित्त, कफ एवं रज और तम ये दोष विश्वरूप हैं, इसलिये अपस्मार दोषजन्य है। इसलिये विद्वान् अपस्मार को दोषजन्य मानते हैं। जिस प्रकार बादल के बरसने पर भी कुछ बीज शरद् काल में उगते हैं, इसी प्रकार रोग भी अपने समय पर उत्पन्न होते हैं। अवश्य अस्थायी वातादि दोष इसी थोड़े से समय के लिये बढ़कर नानाप्रकार के रोगों को अपने स्वाभाविक दूषण स्वभाव के कारण दिखाते हैं। इसलिये अपस्मार नामक महारोग दोषजन्य ही है।

वक्तव्य—“इह खलु चत्वारोऽपस्मारा भवन्ति, वात-पित्त-कफ-सन्निपातनिमित्ताः ॥” (२) पक्षाद्वा द्वादशाद्वाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः। अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिद्वात्परम् ॥ (३) अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति। अधिशेते तथा धातुं दोषः काले च कुप्यति”॥

वि० मन्तव्य—कुछ आचार्य श्लो० १७ के अनुसार अपस्मार को आगन्तु मानते हैं जैसे विषम ज्वरों को, परन्तु कुछ आचार्य इसको “दोषज” मानते हैं, अस्तु। इस विवाद का समाधान भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार किया है कि—

यदा दोषनिमित्तस्य भवति आगन्तुः अन्यवः।

तदा साधारणं कर्म प्रवदन्ति भिषग्वराः। च० नि० अ० ८

अर्थात्—जब किसी दोषज व्याधि में आगन्तु कारण भी होता है तब विद्वान् चिकित्सक साधारण अर्थात् दोनों के लिये उपयोगी कर्म-उपचार करते हैं। जैसे विषम ज्वरों में तथा उन्मादों में। भगवान् धन्वन्तरि ने उक्त दोनों मतों का उल्लेख कर दिया है ‘दोषज एव तु’ पाठ अपस्मार को दोषज मानने वालों का है, क्योंकि—अग्रिम श्लो० २३ में ‘उपयोगो ग्रहोक्तानां योगानां तु विशेषतः’ पाठ में ग्रह शामक योगों के उपयोग का निर्देश किया गया है। और श्लो० २६ में रुद्र एवं रुद्र के गणों की पूजा का निर्देश किया है, अतः भगवान् धन्वन्तरि जी दोनों मतों को मानते हैं ॥२१॥

तस्य कार्यों विधिः सर्वो य उन्मादेषु बह्यते।

पुराणसर्पिषः पानमभ्यङ्गश्चैव पूजितः ॥२२॥

उपयोगो ग्रहोक्तानां योगानां तु विशेषतः।

ततः सिध्यन्ति ते सर्वे योगैरन्यैश्च साध्येत्।

शिमृकटवृक्षकिण्वाहिनिम्बत्वप्रससाधितम् ॥२३॥

चतुर्गुणे गवां मूत्रं तैलमभ्यञ्जने हितम्।

अपस्मार में उन्माद में कहीं जानेवाली सम्पूर्ण विधि बरतनी चाहिये। पुरातन घृत का पान कराये और पुरातन घृत का अभ्यंग करे। ग्रहों में कहे योगों को विशेष रूप में बरते। इनसे सब अपस्मार अच्छे होते हैं, अन्ययोगों से भी चिकित्सा करे। यथा—शोभांजन, श्योनाक, किण्ही (कटमी), नीम को छाल, इनके स्वरस (रस में) और कल्क से तैल से चार गुणे गोमूत्र में तैल सिद्ध करे। यह तैल अभ्यंग में उत्तम है।

“कटमी निम्बकटवृक्षमधुधिगुत्वचां रसे।

सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थं प्रशस्यते ॥” चरक ॥२२,२३॥

गोधानकुलनागानां पृषतक्षगवामपि ॥२४॥

पित्तेषु सिद्धं तैलं च पानाभ्यङ्गेषु पूजितम्।

गोह, नेवला, हाथी, चित्रलमृग, रीछ, गाय, इनके पित्त से सिद्ध किया तैल पान और अभ्यंग में प्रशस्त है ॥२४॥

तीक्ष्णैरुभयतोभग्नैः शिरश्छापि विशोधयेत् ॥२५॥

तीक्ष्ण वमन, तीक्ष्ण विरेचन और तीक्ष्ण शिरो-विरेचन से चिकित्सा करे ॥२५॥

पूजां रुद्रस्य कुर्वीत तद्गणानां च नित्यशः।

रुद्र की ओर उनके गणों की नित्यप्रति पूजा करे।

वातिकं बस्तिभिश्चापि पैत्तिकं तु विरेचनैः ॥२६॥

कफजं वमनैर्धार्मानपस्मारमुपाचरेत्।

वातिक अपस्मार की बस्तियों से, पैत्तिक की विरेचनों से, कफज अपस्मार की वमनों से बुद्धिमान् चिकित्सा करे ॥२६॥

कुल्लथयवकोलानि शणबीजं पलङ्कषाम् ॥२७॥

जटिलां पञ्चमूल्यौ द्वे पथ्यां चोक्ताश्च यत्नतः।

बस्तमूत्रयुतं सर्पिः पचेत्तद्व्रातिके हितम् ॥२८॥

कुल्लथी, जौ, बेर, सन के बीज, गुग्गुलु, जटामासी, दश-मूल, हरड इनको सावधानी से क्वाथ करके, इस में बकरे का मूत्र मिलाकर घृत सिद्ध करे, यह घृत वातिक अपस्मार में हितकारी है ॥२७,२८॥

काकोल्यादिप्रतीवापं सिद्धं च प्रथमे गणे।

पयोमधुसितायुक्तं घृतं तत् पैत्तिके हितम् ॥२९॥

विदारीगन्धादिगण के क्वाथ में काकोल्यादि गण का प्रक्षेप देकर, घी को सिद्ध करे। इस घी को दूध, मधु शर्करा के साथ खाये। यह घृत पित्तज अपस्मार में हित है।

वक्तव्य—डल्हन ने दूध, मधु, शर्करा के साथ घी सिद्ध करने को कहा है। इसमें मधु के साथ घी सिद्ध करने में मधु जल जायेगा। अथवा रोगप्रभाव से विधेय होगा। यथा—‘क्षीरादिप्रक्षेपयुक्तं घृतं हितम् ॥’ कहा है ॥

अ० ६१ |

करष्णाव चासुस्तकाययुक्तमारग्वधादिके ।

पक्वं च मूच्रवग तु इरेष्मापस्मारिणे हितम्‌ ।३०॥

पिप्पल्यादि, वचादि, मुस्तकादि, इनके क्वाथ मे आर￾ग्वधादिगण का कल्क प्रत्तेप देकर आटो मूर्नोंके साथ सिद्ध

किया घत कफजन्य्‌ अपस्मार में उत्तम हे ॥३०॥।

सुरद्रुमब चाङु्ठसिद्धाथव्योषदहिङ्कभिः। मञिष्ठारजनीयुग्मसमङ्गात्रिषएरम्बदेः ॥३१॥ करञ्जबीजर'रीषगिरिकर्णीहूताशनः ।

सिद्धं सिद्धाथंकं नाम सर्पिमू त्रचतुगु णम्‌ ।३२॥।

कर.भिृष्टगरश्चासबरासविषमञ्वरान्‌ ।

सवभूतग्रहोन्मादानपस्मारांश्च नाशयेत्‌ ॥३३॥

सिद्धार्थक धृत-देव दाङ, वच, कूठ, सरसों सोऽ, मरिच,

पिपरी, हींग, मंजीट, हल्दी, दारुहल्दी, मजीठ, त्रिफला,

मुस्ता, करंज के बीज, शिरीष के वीज, श्वेत स्यन्द (सफेद कोयल), इनके कल्क से चार गुणे मृत्रमे सिद्धक्रिया षी;

सिद्धाथक धृत दै। यह घृत कृमि, कुष्ठ, गर, श्वाख, कफ,

विषमञ्वर, सवर प्रकार की भूत बाधा, अह; उन्माद, अपस्मार,

को नष्ट करता है ॥३१-३३॥।

दशमङेन्द्रवृक्षसवङम बीभार्गीषूडतरिकेः। उम्पाकश्रेयसीसप्रपणापामागेष्टस्गुभिः॥२४॥ श॒तैः कर्केश्च भूनिम्बपूतिकम्योषचित्रके

त्रिबृसाठानिश्चायुग्मसारिवाद्रयपोष्करेः ॥३५ कटकायासदन्द्युग्रानीङिनीङमिशतुभिः।

सर्पिरेभिश्च गोक्षीरद धिमूत्रञक्‌ रसेः ॥२६॥

साधितं पञ्च गन्याख्यं सवापस्मारभूतयुत्‌।

चातुथकक्षयश्ासानुन्मादां श नियच्छति ॥३५॥

पंचगव्यघत-दशमल, कुटज की छाल, मूवा, भागीं

त्रिफला, अमलतास, गजपिष्यटी, सक्षपण, चिरचिटा, कट गूर

इनके क्वाथ में, चिरायता, करंज, त्रिकटु, चित्रक; निशोथ

पाटा, हल्दी, दारुहल्दी, सारिवा, कष्ण सारिवा; पुष्कर मूख

। रकी, धमासा, दन्ती, वच, नलिनी, विडंग इनके कल्क से.

गायका दुघ, दही) मुन्न, गोबर का स्वरस ओर घी (ये सब

` परस्पर समान भाग केकर) इनसे धृत सिद्ध कृरे | यह पंचगग्य

धृत सब \कार के अपस्मार को, मूतबाधा को नष्ट करता हे ।

। चातुथिक ज्वर, श्चय, श्वास, ओर उन्माद को नष्ट करता दै ॥ |

भार्गीते पचेत्‌ क्षीरे आ्तिण्डल्पायसम्‌। ~ `

चयं शद्धाय तं भोक्त बराहायोपकल्पयेत्‌ ॥२६॥ ज्ञार्वा च मधुरीभूतं ` तं विश्षस्यान्तसुद्धरेत्‌ ।

जीन्‌ भागस्तस्य चणस्य किण्वभागेन संसजत्‌ ।१९॥

सण्डोदकाथे देयश्च भार्गीक्वाथः सुशीतलः

शद्धे म्भे निदभ्याल्च संभारं तं सुरां ततः ॥४०॥

( ` जातगन्धां जातरसां पाययेदातुरं भिषक्‌ ।

उत्तरतन्त्रभ ७९५

मागींसे षिद्ध क्रियि दुध म शालि .चाव्छों की खीर

बनाये । सुभर को तीन दिन भखा रखकर खीर खने को

देवे | जव्र॒ खीर में मधुरता (विदाहं प्रथम अवस्था पाक) आ

जाय, तवर सुर को मारकर इस अन्न को उसके पेट में (आ￾माशय से) निकाल ठे | इस अन्न को सुखाकर चूण कर ख्व |

इस चूणके तीन भाग केकर इसमे एक भाग सुरा बीज

(किण्व) मिकाये । सन्धानके ल्यिमार्गी का क्वाथ दण्डा

करके इसमे भिलाये । इस संभार को शुद्ध साफ धड़े मे रख

देवे । फिर जब इस सुरा मे गन्ध ओर रस उन्न हो जाये,

तव रोगी को पिलाये |

वक्तव्य--दुधर पाक विधि- दूध से चोथाई मागं का

कल्क मिटाकर, दुध से चार गुणा जक डाक्कर दूध का पाक्‌

करे । दूध मात्र शष रहने पर उतार लेव । सूअर को खिलाया

अन्न आमाश्चयसे अगेन जाने पाये उस अन्न मे केवल

आमाशय की ही क्रिया हो, इतने तक मे वह अन्न निकाल

ठेना चाष्टिये। अर्थात्‌ निशस्ता भाग अभी अकरा मेही

परिणत हआ हो । यथा--

अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षडरसस्य प्रपाकतः ।

मधरात्प्राक्‌ कफो भावात्फेनम्‌ृत उदीयते ।च०।३८-४०।

शद्ध कुम्भ--चावुर्जातक, मधु, पिप्पली आदि से किमि

किये ॥३८-४०॥

सिरां बिध्येदथ प्राप्तं माङ्गल्यानि च धारयेत्‌ ॥४१॥

हनुसन्धिमध्यगत सिरा का वेधन करे । ब्रणितोपासनीय

ध्याय मे कही छत्रा, अतिच्छत्रा आदि मांगल्यं वस्ठ॒ओं को

धारण करे ।

वक्तव्य-चरक मे अतस्त्वाभिनिवेश एक रोग कहादै

यथा- अतत्वाभिनिवेशो यस्तद्धेतवाकेतिभेषजम्‌ ।

  • तंत्र नोक्तं तत. श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम्‌ ॥

: . शुभूषवे वचः श्रुता शिष्यायाइ पुनवयुः ।

महामदं सौम श्णु सदेत्वाङृतिभेषजम्‌ ॥

` मलिनाहारशीलस्य वगान्प्राप्तान्‌ निण्हतः

शीतोष्णस्निग्धरूक्षायेः देठभिश्ातिसेवितेः ॥

हदयं समुपाभििव्यं सनोबुद्धहताः सिराः

` - दोषाः सन्दृष्य तिष्ठन्ति रजोमोहाइृतास्सनः ॥

` रजस्तमोभ्यां इद्धाभ्यां बुद्धो मनसि चा इते ।

हृदये व्याक्रके दोषरथ मूढाल्पचेतसः ॥

करोति विषमां बुद्धि नित्यानि हिताहिते ।

अतत््वाभिनिषेश तमाइुगत्ता सहागदम्‌ ॥ ष स्तेदसेदोपपन्तं तं संशोध्य बमनादिभिः॥ ~

७६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६२ ]

ब्राह्मीस्वरसंयुक्तं यत् पंचगव्यमुदाहृतम् ।

तत्सेव्यं शाखपुष्पी च यच्च मेधं रसायनम् ॥

वि० मन्तव्य—सु० शा० अ० ८ में अपस्मार के विना शार्प हनु की सन्धि में विद्यमान खिरा का वध करने का विधान है, परन्तु खिरा सर्वाङ्ग शोथन होती है, अतः अन्य स्थान में भी खिरावध किया जा सकता है ॥४१॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रेऽपस्मार-

प्रतिषेधो नाम (द्वितीयोऽध्यायः आदितः)

एकषष्टितमोऽध्यायः १.६१॥

द्विषष्टितमोऽध्यायः

अथातो उन्मादप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे उन्मादप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

मदयन्त्युद्ध(द्वग)ता दोषा यस्मादुन्मार्गमाश्रिताः ।

मानसोऽयमतो व्याधिरुन्माद इति कीर्तितः ॥३॥

उपचित हुए दोष उन्मार्ग में आश्रित होकर क्योंकि मन को चलायमान (विश्रमयुक्त) कर देते हैं, इसलिये यह उन्माद रोग मानस-मनोजन्य कहा है। मनोवहस्तों के दूषित होने से यह मानस रोग होता है। यथा—

विषद्वदुद्युशुचि भोजनानि

प्रधर्षणं देवगुरु द्विजानाम् ।

उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो

मनोऽभिधातो विषमाश्र चेष्टाः ॥

तैरत्यसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा

बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रदूष्य ।

स्रोतांस्यविष्टाय मनोवहानि

प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥

चरक० चि० अ० ६.५ ।

वि० मन्तव्य—उन्मार्ग आश्रितः—पुरुष (चेतना धातु-आत्मा) कर्मेन्द्रियों द्वारा चेष्टा (कर्म) करता है, ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मनस् द्वारा मनन-चिन्तन करता है बुद्धि द्वारा बोध-सत् असत् का विवेक करता है और अहंकार द्वारा अहं—मैं हूँ आदि भावना करता है। जिन मायों द्वारा यह सब होता है वे उन्मार्ग कहे जाते हैं। उनमें जब वातादि दोष आश्रित हो जाते हैं तब उक्त सब कार्य अन्ध-वस्थित-विश्रंखल हो जाते हैं और इसी दशा का नाम “उन्माद” है ॥३॥

एकैकशः समतैश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः ।

मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उच्यते ॥४॥

विषाद्ववति षष्ठश्च यथास्वं तत्र भेषजम् ।

स चाप्रवृद्धस्तस्यो मदसंज्ञां बिभर्ति च ॥५॥

उन्माद, बात, पित्त, कफ इन तीन दोषों के पृथग पृथग, अतिशय मिले हुए तीनों दोषों को सन्निपात से एक, मानसिक दुःख के कारण एक, इस प्रकार से उन्माद पांच प्रकार का है। विष के कारण से भी छठे प्रकार का उन्माद होता है, परन्तु इसमें विष की अपनी चिकित्सा की जाती है। यह छठा उन्माद अल्प लक्षणोंवाला, तथा अल्प मात्रा में होने से ‘मद’ नाम से कहा जाता है।

उन्मादं पुनः मनोबुद्धिर्द्वयंज्ञानस्मृतिभक्तिशीलचेष्टाचार-विभ्रमं विद्यात् ॥ चरक ।

वि० मन्तव्य—विष तथा तदगुणयुक्त मद्य से जो उन्माद होता है उसकी प्रारम्भिक अवस्था में बड़ी दशा होती है जो मद्य (भांग-सुरा आदि मादक द्रव्य) के सेवन में होती है जिसको मद या नशा कहते हैं। मद की दशा से आगे चलकर जो मदमत्त की दशा होती है वही उन्माद से उन्मत्त की दशा हो जाती है ॥४,५॥

मोहोद्वेगो स्वप्नः श्रोत्रे गात्राणामपकर्षणम् ।

अत्युत्साहोऽरुचिश्चान्नने स्वप्ने कलुषभोजनम् ॥६॥

वायुन्यूनोन्मथनं चापि श्रमश्चक्रगतस्य वा ।

यस्य स्यादचिरेणैव उन्मादं सोऽधिगच्छति ॥७॥

पूर्वरूप—मोह (मन की विचित्रता), उद्वेग, कानों में शब्द, अंगों में क्रशता, अतिशय, उत्साह, अन्न में अरुचि, स्वप्न में (सुपने में), मलिन भोजन वायु से हृदय का उन्मथन, चक्कर पर चढ़े हुए के समान चक्कर आना, ये लक्षण जिनमें होते हैं, उसे शीघ्र ही उन्माद रोग होगा ॥६,७॥

रुक्षन्च्छ्विः परुषवाग्धमनीततो वा

शीतातुरः कृशतनुः स्फुरिताङ्गसन्धिः ।

आस्फोटयत्यटति गायति नृत्यशीलो

विक्रोशति श्रमति चाप्यनिलप्रकोपात् ॥८॥

वातिक उन्माद में रोगी की कान्ति रुक्ष, वाणी कर्कश, शरीर पर धमनियों का जाल, शीत से पीड़ित, शरीर कृश, अंगों की सन्धियों में स्फुरण, सन्धियों को चटकाता है, वे मतलब घूमता है, गाता है, नाचता है, चिल्लाता है, चक्कर काटता है।

अनियतानां च सततं गिरामुत्सर्गः । फेनागमनमास्यात् ।

स्मितहसितनृत्यगीतवादित्रादिप्रयोगश्रास्थाने । यानमयाने;

कार्यं, पारुष्यम्, उत्पिण्डता, अरुणाक्षता । चरक ॥८॥

तृट्स्वेददाहबहुलो बहुभुग्विनन्दि-

रुक्षायहिमानिलजलान्तविहारसेवी ।

तीक्ष्णो हिम्साबुन्निचयेऽपि स बह्विगङ्घी

पित्ताहिवा नभसि परयति तारकाश्च ॥९॥

पित्तोन्माद में प्यास, स्वेद, दाह की अधिकता, बहुत भोजन करना, नींद न आना, छाया, शीतल, वायु, जल के

को, +वि

१ मत्‌! ती विरेचन, तीचण

अण ६९ | उतरतन्चरम्‌ ७€७

किनारे पर २ या घूमनेवाला, तीण ( क्रोधी ), शीतल पानी | सरो के तेढ म मिढाकर नानाप्रकार ॐ अवपीडन ( नस्य )

क संचय मे भी अस्मि की शंका रखनेवाला, दिनम भी | देवे। सरो का चृणं रोगी कौ नाखा मे प्रमन करे ।१४,१५।

आकाश में तारका देखता ह ॥६॥ छम्रिसादसद नारुचिकासयुक्तो योषिद्धिविक्तर तिरत्पमतिप्रचारः। निद्रापरोऽल्पकथनोऽल्पयुगुष्णसेवौ रात्रौ भृशं भवति चापि कफप्रकोपात्‌ १०

कफोन्माद मे-- वमन, अभ्चिमान्य, अरुचि, कास, लिया

से एकान्त मे प्रीति करने को चाह; थोड़ी बुद्धि, थोडा चलना,

गिरना, सोने की आदत, थोड़ा बोल्नेवाला, थोड़ा खानेवाला,

उष्य वस्तु की चाह करता ई । कफके प्रकोप से उन्माद्‌ रातं

अधिक बद़ जाता है । (चरक म.धयथुरानने-यह चिह भी दै) ॥

सवौरमके पवन्‌पित्तकफा यथास्वं

संहर्षिता इव च छिङ्खमुदीरयन्ति ॥१९॥

सन्निपातजन्य उन्माद मे वायु, पित्त, कफ, अतिशय बढ़-

कर्‌ (एक दूसरे से होढ़ टेकर) अपने अपने रक्षणा को उलन

करते द | ( इसी से यह्‌ असाध्य होता हं ) ॥१६॥ चौरन॑रेन्द्रपुरुषैररिमिस्तथाऽन्ये-- विन्नासितस्य धनबान्धवसखक्षयाद्रा ।

गां क्षते मनसि च प्रियया रिरंसो-

जीयेत चोत्कटतरो मनसो विकारः ।१२।

चोरो से, राजपुरूषों से, शच॒ओं से, तथा दूसरे पुरषो से

राये जाने के कारण, धन-बान्धव के नाश हो जाने से, मन

पर तीत्र आघात पर्हुचने के कारण अथवा इच्छित प्रियख्री से

रमण करने की इच्छा होने के कारण ( उखके न मिलने से )

अतिशय प्रर मानसिक विकार से उन्माद उतपन्न होता ई ॥

चिन्न स जल्पति मनोदुगतं विसंज्ञो

गायत्यथो हसति रोदिति मूढसंज्ञः ।

वह्‌ मन मे आई वस्तु को अबुद्धि पूवक ने सोचे समभे-

चेतना के बिना भिन्न भिन्न सूप मे वकतां दै, गाता द, हसता

है, रोता द, मूर्छित दो जाता ई । |

रक्तेक्षणो हतबटेन्द्रियभाः सुदानः

इ्यावाननो विषद्तेऽथ भवेत्‌ परासुः १२

विषोन्माद म-आंखं खाल) बर्‌ एव इन्द्रियां की कान्ति

नष्टो जाती 8, अतिशय गरीब, यख म॒ काङापन तथा

उपेक्षा करने से मर जाता है ॥१३॥ र

स्निग्धं स्विन्नं ठ मलुजयुन्मादातं विशोषयेत्‌ ।

तीच्णैरुभयतोभागेः शिरसश्च विरेचनैः ॥९४॥ `

विविधैरवपीडेश्च सषेपस्तेदसंयुतेः । ख

योजयित्वा च॒ तश्चणं घ्राणे तस्य प्रयोजयत्‌ ॥९५॥

` उन्माद रोगी मनुष्य का, स्नेहन. ओर स्वेदन करके तीण

शिरोविरेचनों से शोधन करे । ।.

सततं धूपयेच्वेनं श्रगोमसेः सुपृतिभिः।

सषेपानां च तैटेन नस्याभ्यङ्गौ हितो सदा ॥१६॥

, अच्छी प्रकार पवित्र खाफ किये कुत्ते ओर गोमांख से इको

निरंतर धुप देवे । सरो के तेर से नस्य एवं अभ्यंग करना

सदा उत्तम है ॥१६॥ द्ङयेदद्‌ सुतान्यस्य वदेन्नाशं प्रियस्य वा ।

भीमाकारनेरेनीगेदौन्तेग्यरेश्च निर्विषः ॥१८॥

भीषयेत्‌ संयतं पाडः कञाभिवोऽथ ताडयेत्‌ ।

यन्त्रयित्वा सुराप बा त्राखयेत्त तृणाभ्निना ॥९८॥

जडेन तज्येद्राऽपि रज्नुघतेर्बिभावयेत्‌ ।

बटर्वाश्चापि संरेत्‌ जञेऽन्तः परिवासयेत्‌ ।

भ्रुदेदारया चनं ममाधातं विवजयेत्‌।

वेहमनोऽन्तः परविश्यैनं र्सतद्वश्म दीपयेत्‌ ॥१९॥

सापिधाने जरत्करूपे सततं वा निवासयेत्‌ ।

जो वस्तु न देखी हो, एेसे विचित्र स्प इसको दिखाये ।

प्रिय वस्व का नाश के सुनाये । भीषण आकारवाडे मनुष्यां

से, शिक्षित हाथियों से, विष रदित खापोसे इसको राये ।

पाशों से-रस्वियों से बांधकर) कया ते.चाब्ुक से इसको मारे ।

बाधिकर सुरश्चित सूप में तिनको की आग से इसका डराये ॥

मग्र जल से कम्पाये | रस्सी की चोट से मारे । बलवान्‌ व्यक्ति

इसको बचाते हए जल मे ङवाने का नाय्कः क्रं । मोटी ना

सहसे चुभाये, परन्द॒ ममे स्थानो पर चाड न करे । घर के

अन्दर छे जाकर इखको बचति हृ ध्र मे आग ख देषे |:

जल रहित कुएं मे इसको रखकर ठ देवे ।

वि० मन्तव्य-इस प्रकार के उपायों से उसका मन ठिकाने

आ जाता है, क्योकि शारीरिक दुःखो के भय की अपेषठा प्राण

का मय महान्‌ होता है ओर प्राणभय होने पर- मृत्यु का भय

उपस्थित होने पर इधर.उधर भटकता हना मन्‌ शान्ति

| प्राप्त कर छेता दे ॥ कशामिस्ताडयित्वा वा सुब्रडधं विजने ण्डे ।

रन्ष्याचेतो हि विभान्तं त्रजव्यस्य यथा सम्‌ ॥

देषदुःलभयेभ्यो हि परं प्राणमयं महत्‌ ।

तेन याति शमं तस्य सवतो विप्लुतं मनः ॥

इष्टद्रव्यविनाशात्त॒ मनो यस्योपहन्यते ।

तस्य तत्छदश्रािशान््याश्वासेः शमं नयेत्‌ 1 चरकं

ञयदायहाद्यवागृञ्च तपेणान्‌ वा प्रदापयेत्‌ ।॥२०॥

केवखानम्डुस्तान बा छतापाय्‌ वा बशः । ह ^

हथं यदहीपनीयं च तत्पथ्य तस्य्‌ सो (यो) जयेद्‌ ।२९५॥ ` (बिडङ्गन्निफकायुस्तमजिषठादाडिमोत्पकेः। भ

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७८६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३ ]

बर्हिष्ठरजनीकुष्ठपरिणीनीसारिवाह्यैः ।

हरेणुकात्रिबुहन्तीवचातालीसकेसरैः ॥२३॥

द्विक्षीरं साधितं सर्पिमालतीकुमुभैः सह ।

गुल्मकासज्वरश्वासखयोन्मादनिवारणम् ॥२४॥

एतदेव हि सम्पक्वं जीवनीयोपसंभूतम् ।

चतुर्गुणं दुग्धेन महाकरुणामुच्यते ॥२५॥

अपस्मारं ग्रहं शोषं क्लेद्यं कार्यं मबीजताम् ।

घृतमेतन्निहन्त्याशु ये चादौ गदित्वा गदाः ॥२॥

एक एक दिन छोड़कर इसको थवागू, तर्पण (जी का मन्थ या लाजा सत्) देवे । इन सत्तुओं को अकेले जल के साथ देवे । बहुत विचक्षण वैद्य कुल्माष (अर्धस्विन्न जी) देवे । हृदय के लिये प्रिय (हितकारी) और दीपनीय (अग्निवर्धक), जो पथ्य भोजन हो, वह इस रोगी को देवे । (विडंग, त्रिफला, मुस्ता, मजीठ, अनारदाना, नौलोफर, निशोथ, ऐलबालुक, इलायची, चन्दन, देवदारु, बर्हिष्ठ, हल्दी, कूठ, सुद्रापर्णी, सारिवा, कृष्णसारिवा, हरेणु, त्रिदूत, दन्ती, वच, ताळीस, केसर, चमेली के फूल, इनके कल्क से, घी से दुगुने दूध में सिद्ध किया घी गुल्म, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, उन्माद को नष्ट करता है । उपर्युक्त द्रव्यों में जीवनीय गण के द्रव्य मिलाकर चार गुणे दूध से सिद्ध किया घृत महाकरुण्य कहा जाता है । यह घृत अपस्मार, ग्रह, शोष, क्लीवता, कृशता, नपुंसकता को तथा पूर्वोक्त कहे रोगों की शीघ्र नष्ट करता है ।

वि० मन्तव्य—अबीजताम्—अबीजता शुक्र का वह विकार है जिसमें मैथुन शक्ति तो होती है परन्तु उस शुक्र से गर्भोत्पत्ति नहीं होती ॥२०-२६॥

बर्हिष्ठकुष्ठमज्जिहाकटुकैलनिशाह्यैः ।

तगरत्रिफलाहिङ्कुवाजिगन्धामरदुग्धैः ॥२७॥

वचाऽजमोदाकाकोलीमेदामधुकपदुमकैः॥

सशर्करं हितं सर्पिःपक्वं क्षीरं चतुर्गुणम् ॥२८॥

बालानां ग्रहजुष्टानां पुंसां दुष्टालपरेतसाम् ।

ख्यातं फलघृतं क्षीणां वन्ध्यानां चाशु गर्भदम् ) ।

फलघृत—बर्हिष्ठ, कूठ, मजीठ, कुटकी, इलायची, हल्दी, तगर, त्रिफला, हींग, अश्वगन्धा, देवदारु, वच, अजवाइन, काकोली, मेदा, मुलेहठी, पद्माल, इनके कल्क से शर्करा के साथ चार गुणे दूध में (घी से) सिद्ध किया घी—ग्रहों से पीड़ित बालकों के लिये दुष्ट एवं अल्प शुक्रवाले पुंसों के लिये उत्तम है, वन्ध्या स्त्रियों के लिये शीघ्र ही गर्भप्रद है ) ॥२७, २८॥

ब्राह्मीसेन्द्रौ विडङ्कानि व्योषं हिङ्कु सुरां जटाम् ।

विषधन्तीं लघुनं रास्तां विशलयां सुरसां वचाम् ॥२०॥

१ कल्याणक घृत में क्षीर के स्थान में जल लेना उत्तम है । चरक में जल ही पाठ है, यथा—चतुर्गुणे जले सम्यक् घृतप्रस्थं विपाच्येत । महाकल्याणक में 'गृष्णिरी चतुर्गुणे' पाठ है ।

व्योतिषमती नागरं च अनन्तामभयां तथा ।

सौराष्ट्रीं च सर्मांसानि गजमूत्रेण पेययेत् ॥३१॥

छायाविशुष्कास्तद्वर्तीयोजयेद्विधिकोविदः ।

अवपीडेऽन्नैऽभ्यङ्गं नश्ये धूम्रे प्रलेपने ॥३२॥

ब्राह्मी, इन्द्रवाष्णी, विडंग, त्रिकटु, हींग, देवदारु, जटामांसी, विषधन्ती (हल्दी), लहसुन, रास्ता, विशलया, (कलिहारी), तुलसी, वच, मालकांगनी, सोंठ, सारिवा, हरड और सौराठी-मिठी, इनको परस्पर समान भाग लेकर हाथी के मूत्र से पीसे । इनकी वर्त्ति बनाकर छाया में सुखा ले । विधि को जाननेवाला वैद्य इनको अवपीड में, अंजन में, अभ्यंग में, नश्य में, धूम्र में, प्रलेप में बरते ॥३०-३२॥

उरोऽपाङ्गललाटेषु सिराश्चाशय विमोक्षयेत् ।

उन्मादं रोगी के उर, अपांग और ललाट में सिरा का वेधन करे ।

अपस्मारक्रियां चापि ग्रहोद्विष्टां च कारयेत् ॥३३॥

अपस्मार में कही एवं ग्रह में कही चिकित्सा करे ॥३३॥

शान्तदोषं विशुद्धं च स्नेहबस्तिभिराचरेत् ।

उन्मादेषु च सर्वेषु कुर्याच्चिन्तप्रसादनम् ।

मृदुमुर्वा मदेऽप्येवं क्रियां मृद्धौ प्रयोजयेत् ॥३४॥

शोकजन्म व्यपनयेदुन्मादे पञ्चमे भिषक् ।

विषजे मृदुपर्वा च विषधन्ती कारयेत् क्रियाम् ॥३५॥

उन्माद के शान्त हो जाने पर—वमनादि से शुद्ध करके स्नेह बस्तियों से चिकित्सा करे । उन्माद शान्त होने का लक्षण—प्रसादश्चन्द्रियाथार्थान् बुद्ध्यात्ममनसां तथा ।

धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ चरक ।

सब प्रकार के उन्मादों में चित्त की प्रसन्नता उत्पन्न करे । मद में प्रथम मृदु संशोधन देकर पीछे से कोमल अंजन, अवपीडन रूपी चिकित्सा करे । शोकजन्म पांचवें उन्माद में वैद्य शोकशत्य को निकाल देवे । विषजन्म उन्माद में मृदु-संशोधन देकर विषनाशक चिकित्सा करे ॥३४, ३५॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रे उन्मादप्रतिषेधो नाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)

द्विषष्ठितमोऽध्यायः ॥६२॥

त्रिषष्ठितमोऽध्यायः

अथातो रसभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे रस भेद विकल्प अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१, २॥

दोषाणां पञ्चदशाधा प्रसरोऽभिहितस्तु यः ।

त्रिषष्टया रसभेदानां तत्प्रयोजनमुच्यते ॥३॥

अ० ६३ ]

उत्तरतन्त्रम्

७८६

दोषों का जो पन्द्रह प्रकार से प्रसर कहा है, उसका प्रयोजन, तिरसठ रस भेदों की दृष्टि से है।

वक्तव्य—पन्द्रह दोषों के उपलक्षण मात्र हैं। दोष परस्पर मिलकर तिरसठ प्रकार के हैं, रस भी संसर्ग रूप में तिरसठ हैं, इसलिये दोनों की तुलना करके इन रसों का प्रयोग करना चाहिये ॥३॥

अविदग्धा विदग्धाश्च भिद्यन्ते ते त्रिषष्टिषा ।

रसवेदत्रिषष्टि तु वीक्ष्य वीक्ष्यावचारयेत् ॥४॥

अविदग्ध (असंयुक्त-एकाकी) रस और विदग्ध (संयुक्त मिले) रस तिरसठ प्रकार के हैं। रसों के इन तिरसठ भेदों के दोषों को देख देखकर बरतना चाहिये ॥४॥

एकैकेनानुगमनं भागशो यदुदीरितम् ।

दोषाणां तत्र मतिमान् त्रिषष्टि तु प्रयोजयेत् ॥५॥

दोषों का अंशांश कल्पना से एक एक रस का अनुकरण करना, जो कहा है, उनमें बुद्धिमान् वैद्य इन तिरसठ रस भेदों को बरते ॥५॥

यथाकमप्रवृत्तानां द्विकेषु मधुरो रसः ।

पञ्चानुकमते योगान्मल्लश्चतुर एव तु ॥६॥

त्रींश्चानुगच्छति रसो लवणः कटुको द्वयम् ।

तिक्तः कषायमन्वेति ते द्विका दश पञ्च च ॥७॥

तद्यथा—मधुराम्लः १, मधुरलवणः २, मधुरकटुकः ३, मधुरतिक्तः ४, मधुरकषायः ५, एते पञ्चानुकान्ता मधुरेण, अम्ललवणः १, अम्लकटुकः २, अम्लतिक्तः ३, अम्लकषायः ४, एते चत्वारोऽनुकान्ता अम्लेन, लवणकटुकः १, लवणतिक्तः २, लवणकषायः ३, एते त्रयोऽनुकान्ता लवणेन, कटुतिक्तः १, कटुकषायः २, द्वावेतावनुकान्तौ कटुकेन, तिक्तकषायः १, एक एवानुकतान्तस्तिक्तन, एवमेते पञ्चदश द्विकसंयोगा व्याख्याताः ॥८॥

दो रसों के संयोग में क्रम से मधुर रस पाँच रसों में, अम्ल रसों के चार योगों में, लवणरस तीन योगों में, कटु रस दो में और तिक्त केवल कषाय के साथ मिलता है, इस प्रकार दो रसों के संयोग पन्द्रह हैं।

यथा—मधुराम्ल, मधुरलवण, मधुरकटुक, मधुरतिक्त, मधुरकषाय—ये पाँच मधुररस के संयोग से बने हैं। अम्ललवण, अम्लकटु, अम्लतिक्त, अम्लकषाय ये चार प्रकार अम्ल से बने हैं। लवणकटु, लवणतिक्त, लवणकषाय, ये तीन लवण के योग से बने हैं। कटुतिक्त, कटुकषाय, ये दो कटुरस से बने हैं। तिक्तकषाय तिक्त से एक ही संयोग है। इस प्रकार से ये पन्द्रह योग दो रसों के संयोग से बने हैं ॥९॥

त्रिकान् वक्ष्यामः—

आदौ प्रयुज्यमानस्तु मधुरो दश गच्छति ।

षडम्लो लवणस्तरमादर्थमेकं तथा कटुः ॥१०॥

तद्यथा—मधुराम्ललवणः १, मधुराम्लकटुकः २, मधुराम्लतिक्तः ३, मधुराम्लकषायः ४, मधुरलवणकटुकः ५, मधुरलवणतिक्तः ६, मधुरलवणकषायः ७, मधुरकटुतिक्तः ८, मधुरकटुकषायः ९, मधुरतिक्तकषायः १०, एवमेषां दशानां त्रिकसंयोगानामादौ मधुरः प्रयुज्यते, अम्ललवणकटुकः १, अम्ललवणतिक्तः २, अम्ललवणकषायः ५, अम्लतिक्तकषायः ६, एवमेषां षण्मादावम्लः प्रयुज्यते, लवणकटुतिक्तः १, लवणकटुकषायः २, लवणतिक्तकषायः ३, एवमेषां त्रयाणामादौ लवणः प्रयुज्यते, कटुतिक्तकषायः १, एवमेकस्यादौ कटुकः प्रयुज्यते, एवमेते त्रिकसंयोगा विशतिष्योख्याताः ॥१०॥

त्रिक-तीन के संयोग को कहेंगे—मधुर को प्रारम्भ में रखकर दस संयोग बनते हैं। अम्ल को आगे में रखकर छे संयोग, लवण को आगे में रखकर तीन संयोग बनते हैं। यथा—मधुराम्ललवण, मधुराम्लकटु, मधुराम्लतिक्त, मधुराम्लकषाय, मधुरलवणकटु, मधुरलवणतिक्त, मधुरलवणकषाय, मधुरकटुतिक्त, मधुरकटुकषाय, मधुरतिक्तकषाय, इस प्रकार इन तीन रसों के दस संयोगों में मधुररस प्रारम्भ में है। अम्ललवणकटु, अम्ललवणतिक्त, अम्ललवणकषाय, अम्लकटुतिक्त, अम्लकटुकषाय, अम्लतिक्तकषाय, इन छे में अम्लरस पहले आता है। लवणकटुतिक्त, लवणकटुकषाय, लवणतिक्तकषाय, इन तीन के प्रारम्भ में लवण बरता गया है। कटुतिक्तकषाय, इस एक में कटु रस ही आरम्भ में बरता गया है। इस प्रकार तीन रसों के बीस संयोग कह दिये हैं।

वि० मन्तव्य—तीन रसों के संयोग का नाम 'त्रिक' है और इसी प्रकार चार रसों के संयोग का नाम "चतुष्क" पाँच रसों के संयोग का नाम "पञ्चक" तथा छः रसों के संयोग का नाम "षट्क" है ॥११,१०॥

चतुष्कान् वक्ष्यामः—

चतुष्करससंयोगान्मधुरो दश गच्छति ।

चतुरोऽम्लोऽनुगच्छेच लवणस्त्वेकमेव तु ॥११॥

मधुराम्ललवणकटुकः १, मधुराम्ललवणतिक्तः २, मधुराम्ललवणकषायः ३, मधुराम्लकटुतिक्तः ४, मधुराम्लकटुकषायः ५, मधुराम्लतिक्तकषायः ६, मधुरलवणतिक्तकषायः ९, मधुरकटुतिक्तकषायः १०, एवमेषां दशानामादौ मधुरः प्रयुज्यते, अम्ललवणकटुतिक्तः १, अम्ललवणकटुकषायः २, अम्ललवणतिक्तकषायः ३, अम्लकटुतिक्तकषायः ४, एवमेषां चतुर्णामादावम्लः प्रयुज्यते, लवणकटुतिक्तकषायः १, एवमेकस्यादौ लवणः प्रयुज्यते, एवमेते चतुष्करससंयोगाः पञ्चदश कीर्तिताः ॥१२॥

चार रसों के संयोगों को कहेंगे—चार रसों के संयोग में

200

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६३ ]

मधुर रस आगे आकर दस संयोग बनते हैं। अम्ल रसों के चार संयोग और लवण का एक संयोग बनता है, यथा—

मधुराम्ललवणकटु, मधुराम्ललवणतिक, मधुराम्लतिक, मधुराम्लकटुकपाय, मधुराम्लतिककपाय, मधुरलवणकटुतिक, मधुरलवणकटुकपाय, मधुरलवणतिककपाय, मधुरकटुतिककपाय—इस प्रकार इन दस के प्रारम्भ में मधुर रस बरता जाता है। अम्ललवणकटुतिक, अम्ललवणकटुकपाय, अम्लकटुतिककपाय, अम्ललवणतिककपाय—इन चार में अम्लरस प्रारम्भ में बरता गया है। लवणकटुतिककपाय—इस प्रकार चार रस के पन्द्रह संयोग कह दिये हैं ॥१२॥

पञ्चकान् वद्यामः—

पञ्चकान् पञ्च मधुर एकमम्लस्तु गच्छति ॥१३॥

मधुराम्ललवणकटुतिकः १, मधुराम्ललवणकटुकपायः २, मधुराम्ललवणतिककपायः ३, मधुराम्लकटुतिककपायः ४, मधुरलवणकटुतिककपायः ५, एवमेषां पञ्चा नामादौ मधुरः प्रयुज्यते, अम्ललवणकटुतिककपायः, १, एवमेकस्यादावम्लः, एवमेते षट् पञ्चकसंयोगा व्याख्याताः ॥१४॥

पाँच रसों के संयोगों को कहते हैं—मधुररस पाँच संयोगों में पहले आता है और अम्ल रस एक संयोग में यथा—

मधुराम्ललवणकटुतिक, मधुराम्ललवणकपाय, मधुराम्ललवणतिककपाय, मधुराम्लकटुतिककपाय, मधुरलवणकटुतिककपाय, इस प्रकार इन पाँच के प्रारम्भ में मधुररस बरता जाता है। अम्ललवणकटुतिककपाय इस एक में अम्लरस बरता गया, इस प्रकार से पाँच रसों के छे संयोग कह दिये हैं ॥१३,१४॥

षट्कमेकं वद्यामः एकस्तु षट्कसंयोगः—मधुराम्ललवणकटुतिककपायः एष एक एव षट्क संयोगः ॥१५॥

छे रसों का संयोग एक कहेंगे—छे रसों का संयोग एक ही है—मधुराम्ललवणकटुतिककपाय, यही एक छे रसों का संयोग है ॥१५॥

एकैकश्च षड्रसा भवन्ति—मधुरः १, अम्लः २, लवणः ३, कटुकः ४, तिक्तः ५, कपायः ६, इति ॥१६॥

एक एक रस छे हैं, यथा—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कपाय ॥१६॥

भवति चात्र—

एषा त्रिषष्टिख्याताः रसानां रसचिन्तकैः।

दोषभेदत्रिषष्ट्यां तु प्रयोक्तव्या विचक्षणेः ॥१७॥

इस विषय में श्लोक है—रस के विचारकों ने रसों के ये तिरसठ भेद कहे हैं। बुद्धिमानों को चाहिये कि दोष भेद के तिरसठ भेदों में इनका प्रयोग करे।

वि० मन्तव्य—द्रव्य एकरसं नास्ति न रोगोऽपि एकदोषजः—के अनुसार संसार का कोई भी द्रव्य एक रस अर्थात् केवल एकरसवाला नहीं और कोई रोग भी एक दोषज अर्थात् केवल एक दोषज नहीं है। अतएव अनेक रस अर्थात् एक रस से अधिक रसवाले द्रव्यों का प्रयोग अनेक दोषज अर्थात् एक से अधिक दोषों से उत्पन्न रोगों में—द्रव्याश्रित रसों का विचार करके करना चाहिये तभी लाभ होता है। यह विचार इस प्रकार किया जाता है—रसाः तावत् षट्-मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कपायाः। ते सम्यक् उपयुज्यमाना शरीरं यापयन्ति, मिथ्या उपयुज्यमानाः तु खलु दोषप्रकोपाय उपकल्पन्ते। और—दोषाः पुनः त्रयः वात-पित्त-श्लेष्माणः। ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका भवन्ति, विकृतिम् आपन्नाः तु खलु नानाविधैः विकारैः शरीरम् उपतापयन्ति। और—तत्र दोषं एकैकं त्रयः त्रयः रसा जनयन्ति, त्रयः त्रयः च उपशमयन्ति। तद्-यथा—कटुतिककपाया वातं जनयन्ति, मधुर-अम्ललवणाः तु एनं (वातं) शमयन्ति, कटुकअम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति मधुरतिककपायाः तु एनत् (पित्तं) शमयन्ति। मधुरअम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिककपायाः तु एनं (कफं) शमयन्ति। परन्तु—रसदोषसन्निपाते तु ये रसाः यैः दोषैः समानगुणाः समानगुणभूषिष्टा वा भवन्ति ते (रसाः) तान् (दोषान्) अभिवर्द्धयन्ति। विपरीतगुणाः तु विपरीतगुणभूषिष्टा वा शमयन्ति अभ्यस्थमाना (सेव्यमानाः) इति। (च० नि० अ० १)-सारांश—रस छे हैं और दोष तीन हैं, तीन तीन रस एक एक दोष को बढ़ाते हैं और तीन तीन एक एक दोष को शान्त करते हैं, परन्तु रस एवं दोषों के सन्निपात (संयोग) में भी जो २ रस दोषों के समान गुणवाले होते हैं वे उनको बढ़ाते हैं और जो २ विपरीत गुणवाले होते हैं वे उनको शान्त करते हैं। भगवान् धन्वन्तरि के उक्त श्लोक का यही तात्पर्य है, परन्तु यह सब केवल रसों को ध्यान में रखकर अथ च मुख्य मानकर कहा गया है। पाठक यह भी न भूलें कि रसों से भी अधिक कार्यकर गुण, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव हैं, जो दोषों के वर्द्धन एवं शमन में हेतु होते हैं। देखिये सु० सू० अ० ४०। अतएव भगवान् पुनर्वसु ने उक्त पाठ से आगे पाठकों को सावधान करने के लिये कहा है कि—एतद्व्ययस्था हेतोः परस्परणे असंस्थानां (असंयुक्तानां) रसानां षट्त्वं उपदिश्यते दोषाणां च त्रित्वम्। अर्थात् यह केवल व्यवस्था के लिये—परस्पर न मिले हुए रस छे और दोष तीन कह दिये जाते हैं ॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु रस-

भेदविकल्प्याध्यायो नाम (प्रथमः आदितः)

त्रिषष्टिभेदोऽध्यायः ६३॥

१०९

चतुःषष्टितमो.ऽ्यायः

अथातो स्वस्थवृत्तमभ्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥

अ० ६४ |

अव इसके आगो स्वस्थन्रत्त अध्यायुका व्यास्यान करगे नखा कि भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा या ॥१,२॥ सू त्स्थाने सञुदिष्ठः स्वस्थो भवति यादृशः । तस्य यद्रक्षणं तद्धि चिकि्सायाः भ्रयोजनम्‌ ॥३॥ सूत्रस्थान मं समदोषः समाग्निश्च' इ्यादि (सू० अ० १५) से जो स्वस्यव्यक्ति कहा दै, उखकी जो रक्षा करनी है, वही चिकित्सा का प्रयोजन है।

वक्तन्य--चिक्रि्वा का प्रयोजन यही है कि स्वस्थ मसुष्य के स्वास्थ्य को रक्ता हो सके | इषी से आयुवेद का प्रयोजन बताते हुए कहा दे धव्वाध्युपदश्टानां व्याधिपरिमोक्षः सवास्थयस परिरक्षणं च ॥” रोगचिकित्छा कह दी, अब्र स्वास्थ्यरश्चा कहते ह ।।२।। तस्य यदुवृत्तसुक्तं हि रक्षणं च मयाऽऽदितः। तस्मिन्नथोः समासोक्ता विस्तरेणेह बद्यते ॥४॥ उस स्वस्य व्यक्ति की रक्षाके ल्ि अनागत बाधा प्रति षष अध्याय मेँ जो विषय खंञेपसेर्मँने कदे दै उनको यहं प्र विस्तार से करहरगा ।[४।] यस्मिन्‌ यस्मिन्तरतो ये ये दोषाः कुप्यन्ति देहिनाम्‌ ।

तेषु तेषु प्रदातव्या रसस्ते ते विजानता ॥५॥ जिस जिस ऋतु से मनुष्यों के जो जो दोष प्रकुपित ते हे, उन उन श्छूठओं मे वे-वे रख जाननेवाला वैद्य देवे ।

वि° मन्तग्य-देखिये-अ० ६३ के श्लो०. १५ का विशेष- बचन ॥५॥। स प्रकिठननतबाच्छरीराणां बषासु भिषजा खदु ।

मन्देऽग्नौ कोपमायान्ति सवषां मारुतादयः ॥६॥ तस्मात्‌ क्डेद विुद्धयथं' दोषसंहरणाय च ।

कषायतिक्तकटुके रसेयुक्तयुपद्रवम्‌ ॥७॥

नातिस्निग्धं नातिरूक्षयुष्णं दौपनमेव च॑ ।

देयमन्नं च॒पतये यज्ञं चोक्तमा दितः ॥८॥

तप्रावरतमस्भो वा पिबेन्मघुसमायुतम्‌ । अहि मेघानिखाविष्टेऽव्यथंशीताम्बुसङ्क@े ॥€॥ तरुणत्वाद्विदाहं च गच्छन्त्योषधयस्तदा ।

मतिमांस्तन्तिमित्तं च नातिग्यायाममाचरेत्‌ ॥१०॥

अस्यम्बुपानावश्यायम्रास्यध मोतपासस्यजेत्‌ ।

भूबाष्पपरिहाराथे' शयीत च विहायसि ॥१९॥ शीते खाग्नौ निवति च गुरुप्रावरणे गृहे । ` यायान्नागवधूमिश्च परशस्ताणरुभूषितः ॥१२॥ दिबास्वप्तमजौणे' च बजयेन्तत्र यत्नतः । . वधां ऋतु में शरीरो मे अतिशय आद्रता रहने के कारण

भ्न के मन्द्‌ हो जाने से वायु आदि दोष कुपित हो जाते

    • &.-

उत्तरतन्त्रम्‌ ८०१ द । इसलिये किलन्नता की शुद्धि क ल्यि, जर दोष के नाश के लिय कषाय, तिक्त, कटु से मित, द्रवदहीन -मोजन मैच देवे । न तो बहुत सिनग्ध, न बहुत रूक्ष, उष्ण, अग्निदीपक अन्नष्राजा को वेदय देवे । पानीयवगं मे-वर्षालान्तरि्ष का जल पीने को देषे | अथवा गरम करके ठण्डां किया जटं मधु मिलाकर पीये । दिन के बादङ वायु सै भरे आक्रान्त रहने से, अतिशयशीत जल से व्याप्त एवं नूतन उत्पन्न होने से, ओषधियो मे अम्नता आ जाती ३ । इस कारण विद्वान्‌ मनुष्य वधांकाक में बहुत व्यायाम न करे। पानी का ब्त पीना, ओस, मेथुन, धुप से चता रंहे । जमीन की वाष्प (सीन) से बचने के ल्थि-छत पर (अधिका में दुमंजिले पर) सये । ठण्ड होने पर, भारो वस्र ओदृकर अग्नि से गरम क्रिये वायु रदित षर में रहे । उत्तम-अगर का शरीर प्र छेप करके इथि- नियो द्वारा आना जाना करे । दिन में. सोना ओर अजीर्ण इससे वषा ऋत मे कोशिश करके बचता रहे । "“भृवाष्पान्मेषनिष्यन्दाखाकादम्जलस्य च । वघांस्वग्निभले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः ॥ तस्मात्खधारणः सर्वो विधिवषांसु शस्यते 1? चरक ॥ सेव्याः शरदि यत्नेन कशयस्वादुतिक्तकाः ।१३॥ कषीरे्विकतिक्षोद्रशादियुद्गादिजाङ्गगाः! (सवेतसलजश्चन्द्रपादाः प्रदोषे छु चाम्बरम्‌ ॥ ९४) । सटिङं च प्रसन्नत्वात्‌ सवमेव तदा हितम्‌। सरःस्वाप्ठवनं चैव कमरोतटशादिषु ॥९५॥ प्रदोषे शशिनः पादाश्चन्दनं चाद रेषनप्‌ । तिक्तस्य सर्पिषः पानेरखषस्रावेश्च युक्तितः ॥१६॥ वषासूपचितं पित्त' हरेचापि बिरेचनेः।

नोपेयात्तीदणमभ्डोष्णं क्षारं स्वम्नं दिवाऽऽतपम्‌ ।९७। रात्री भजागरणं चैव सेथुनं चापि बजयेत्‌ ॥ (स्वादु्ीतजलं मेध्यं ुचिस्फरिकनिमेम्‌ ॥१८॥ सरच्चन्द्राुनिषोतमगस्त्योदयनिर्विषम्‌ । प्रसन्नस्वाच्च सखि सवमेव तदा हितम्‌ ॥१९९॥ सचन्दनं सकपूर वासश्चामञछ्तं रघु । भजेच्च शारदं माल्यं सीधोः पानं च युक्तितः ।२०। पित्तप्रशमनं यच्च तच्च सवं समाचरेत्‌ |) प्रयत्पूबकं शरद्‌ ल स कषायः, स्वादु, तिक्त रस, दूध, गन्ने के रस की बनावट, मधु, शाङ्षान्य, मूग आदिः एवं जांगज मांस सेवन करना चाहिये । श्वेत माला, रात के प्रथम प्रहर मं चन्द्रमा कौ किरणों का सेवन करे । हल्के-सूर्म बख्ञ ५ पहने । जर के नमल होने के कारण सब जल कुष आदि का सब स्थानो का) हितकारी है । कमलू-नील ह से शोभित तालो मे तेरना चादिये । रात्रि केयम्‌ ` रः ~ मे चन्प्रमा की किरणे एवं चन्दन का ५. लेप +> # शरीर ~~~ । ८

पर करे । वषा

वदन १६ क 8, +

प ^)

८०२

मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ६४ ]

में संचित पित्त को तित्त धृतों के पीने से, युक्तिपूर्वक रक्तमोक्षण से, विरेचनों से निकाले। तीक्ष्ण अम्ल, उष्ण, क्षार दिन में सोना, धूप इनसे बचे। रात्रि में जागना, मैथुन भी छोड़ देवे।

(मधुर-शीतल जल गंध (मेघावर्षक)। पवित्र, स्फटिक के समान निर्मल, शरद ऋतु के चन्द्रमा की किरणों से धुला, अगस्त्य के निकलने से निर्बिष बना निर्मल होने के कारण सब जल इसमें हितकारी है। चन्दन कपूर से सुगन्धित करके, निर्मल लघु कपड़े पहिने। शरद ऋतु के फूलों की माला पहने और युक्ति से सीधु की पीये। पित्तनाशक जो भी हो, उन सब का सेवन करे।) वक्तव्य—हंसोदक—

दिव्या सूर्याशुसंतप्तं निधि चन्द्रांशुशीतलम् । कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥ हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचिं । स्नानपानावगाहेषु हितमस्वु यथाऽमृतम् ॥ शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च । शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चन्द्ररश्मयः ॥१३-२०॥ (हेमन्तः शीतलो रूः) मन्दसूर्योऽनिलाकुलः ॥२१॥ ततस्तु शीतमासाद्य वायुस्तत्र प्रकृप्यति । कोष्ठस्थः शीतसंस्पर्शादनतःपिण्डीकृतोऽनलः ॥२२॥ रसमुच्छोषयत्याग्न्य तस्मात् स्निग्धं तदा हितम् ।) हेमन्ते लवणक्षारतित्तकाम्लकटुकोक्तटम् ॥२३॥ ससर्पित्तैलमहिममशनं हितमुच्यते । तीक्ष्णान्यपि च पानानि पिवेदगुरुभूषितः ॥२४॥ तैलाकृतस्य सुखोष्णो च वारिकोष्ठेऽवगाहनम् । साक्षारयाने महति कौशेयास्तरणस्तृते ॥२५॥ शयोत जयने तैस्तैर्धृतो गर्भगृहोदरे । स्त्रीः शिल्प्याऽगुरुधूपाद्याः पीनोरुजघनस्तनीः ॥२६॥ प्रकामं च निषेवेत् मैथुनं तर्पितो नृपः । (मधुरं तित्तकटुकमम्लं लवणमेव च ॥२७॥ अन्नपानं तिलान् माषाण्डाकाणि च दधीनि च । तथेच्छुविकृतीः शालीन सुगन्धाश्च नवानपि ॥२८॥ प्रसहानूपमांसाणि क्रव्याद्विलशाधिनाम् । औदकानां प्लवानां च पादिनां चोपसेवयेत् ॥२९॥ मद्यानि च प्रसन्नानि यत्तु किञ्चिद् बलप्रदम् । कामतस्तन्निषेवेत् पुष्टिमिच्छन् हिमागमे ॥३०॥ दिवारुच्यन्मजीर्णं च वज्येतत्र यत्नतः ।) एष एव विधिः कार्यः जिगिरे समुदाहृतः ॥३१॥

(हेमन्त ऋतु शीतल, रूख, सूर्य का तेज मन्द, वायु की अधिकतावाली होती है। इस ऋतु के शीतल होने से इस ऋतु में वायु कुपित होता है। शीतस्पर्श के कारण जाठराग्नि अन्दर में पिण्डीभूत—एकत्रित हो जाती है, इससे वह रस को सुखाती है, अतः स्निग्धभोजन इस ऋतु में हितकारी है। हेमन्त ऋतु में प्रबल लवण-तित्त-क्षार-अम्ल-कटु रसों का, प्रखुर

धी तैल का तथा उष्ण भोजन का सेवन हितकारी है। शरीर पर अगर का लेप करके तीक्ष्ण पानों को (पेयों को) पीये। शरीर पर तैल की मालिश करके गरम पानी से भरे टब में स्नान करे। अंगारों से भरी अंगीठीवाले, घर में बड़े विस्तृत देशम से विछाये विस्तर पर शीतको मिटानेवाले वस्त्रों को ओढ़कर गर्भगृह के अन्दर सोये। अगर और धूप से भरी, उरु, जघन एवं स्तनवाली स्त्रियों का आलिंगन करके वाजीकरण खान-पान से तुरंत हुआ राजा इच्छानुसार मैथुन करे। (मधुर तित्त कटु, अम्ल, लवण, खान-पान, तिल, माष, शाक, दही, गन्ने के रस से बने पदार्थ, सुगन्धित नवीन शालिषान्य, प्रसह-आनूपमांस, मांस खानेवाले एवं विलेश्यों का मांस, औदक (मछली आदि) मांस, प्लव (बत्तख आदि) आदि का मांस, कल्लुए आदि पादियों का मांस खाये। निर्मल स्वच्छ मद्य पीये। और जो भी बलप्रद हो, उसको हेमन्तऋतु में इच्छापूर्वक खाये, दिन में सोना, अजीर्ण, इनको प्रयत्न पूर्वक छोड़ देवे।) शिशिर में यही विधि बरते।

वक्तव्य—“प्रावराजिनकीशयप्रवेणीकुथकास्ततम्—” ये वस्त्रों के भेद हैं, जो कि गरम होते हैं।

“वज्येदन्तपानानि लघूनि वातलानि च । प्रवातं प्रमिताहारमुदमर्थं हिमागमे” ॥चरक ॥२१-३१॥ (हेमन्ते निचितः श्लेष्मा शैत्याच्छीतशरीरिणाम् । औषध्याद्वासनते कुपितः कुतृते च गदान् बहुन् ॥३२॥ ततोम्लमधुरस्निग्धलवणानि गुरुणि च । वज्येद्वृमनादीनि कर्माण्यपि च कारयेत् ॥३३॥ षष्ठिकान् यवाच्छीतान् मुदगान् नीवारकोद्रान् । लावादिबिष्कररसेर्दद्याद्युषेभ्र युक्तिः ॥३४॥ पटोलनिम्बवार्ताकतिक्तकैश्च हिमाग्ये । सेवेन्मध्वासवारिष्टान् सीधुमाध्वीकमाधवान् ॥३५॥ व्यायाममञ्जनं धूमं तीक्ष्णं च कवलप्रदम् । सुखाभ्युना च सर्वाथान् सेवेत् कुसुमागमे ॥३६॥ तीक्ष्णरूक्षकटु क्षारकषायां कोष्णमद्रवम् । यबसुदग्धमधुमायं वसन्ते भोजनं हितम् ॥३७॥ व्यायामोऽत्र नियुद्धाध्वशिलानिर्घातजो हितः । वस्सादनं तथा स्नानं वनिताः काननानि च ॥३८॥ सेवेत् निर्हरेच्छापि हेमन्तोपचितं कफम् । शिरोंविरैकवमनतिरूहकवलादिभिः ॥३९॥ वज्येन्मधुरस्निग्धदिवारुच्यन्गुरुद्रवान् ।

शीतल शरीरवाले पुरुषों में हेमन्त के अन्दर संचित हुआ कफ वसन्त में गरमी से कुपिय होकर बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। इससे अम्ल, मधुर, स्निग्ध, लवण और गुप्त वस्तुओं का त्याग करे, और वमन-विरेचन आदि कर्मों को

२० ६४ ]

उत्तरतन्त्रम्

६०३

करे। सांठी अन्न, जौ (ठण्डे किये), मूँग, नीवार, कोदा आदि को बटरे आदि विकिर मांस रसों के साथ या मूँग कुलरथी आदि के यूष से देवे। वसन्त में परवल, नीम बैंगन, तित्तक वस्तुओं से भोजन करे। मधु, आसव, अरिष्ट, सीधु, मधु-मद्य, माध्वीक, माधव (मधु से बने मद्य) का सेवन करे। व्यायाम, अंजन, तीक्ष्ण धूम, कवलग्रह को बरते। वसन्त में जल के सब कार्यों में गरम पानी बरते। तीक्ष्ण, रूक्ष, कटु, क्षार, कषाय, सुहाता गरम, द्रवरहित, जौ मूँग मधु की अधिकता का भोजन वसन्त में हितकारी है। नियुद्ध (कुशती), मुसाफरी, पत्थर फेंकना आदि व्यायाम हितकारी हैं। उबटन, स्नान, स्निग्धों, वन इनका वसन्त में सेवन करे। हेमन्त में संचित कफ को शिरोविरेचन, वमन, निरूह, कवल आदि से निकाले। मधुर, स्निग्ध, दिन में सोना, भारी द्रव बहुत वस्तुओं का त्याग करे ॥

व्यायाममुष्णमायासं मैथुनं परिशोषि च ॥४०॥

रसांश्चाग्निगुणोद्विकान् निदाघे परिवर्जयेत्।

श्रीमच्छतु में व्यायाम, धूप, परिश्रम, मैथुन, शरीर को सुखानेवाले आहार, अग्नि गुण की अधिकतावाले रसों का त्याग कर देवे। (अग्नि गुण की अधिकतावाले रस कटु, अम्ल और लवण हैं) ॥४०॥

सर्वासि सरितो वापीर्वैतानि रुचिराणि च ॥४१॥

चन्दनानि पराध्याणि स्त्रजः सकमलोत्पलाः।

तालवृन्तानिलाहारास्तथा शीतगृहाणि च ॥४२॥

घर्मकाले निषेवेत वासांसि सुलघूनि च।

शर्कराखण्डद्विघानि सुगन्धानि हिमानि च ॥४३॥

पानकानि च सेवेत मन्थांश्चापि सशकंरान्।

भोजनं च हितं शीतं सधृतं मधुरद्रवम् ॥४४॥

श्रुतेन पयसा रात्रौ शर्करामधुरेण च।

प्रत्यग्रकुसुमाकीर्णं शयने हर्म्यसंस्थिते ॥४५॥

शयोत चन्दनार्द्राङ्गः स्पर्शयमानोऽनिलैः सुखैः।

श्रीमच्छतु में तालाब, नदियाँ, बावड़ी, सुन्दरवन, उत्कृष्ट चन्दन, कमल, नीलोफर की माठायें, ताड़ के बने पंखों की वायु, शीतल घर, हल्के पतले वस्त्रों का सेवन करे। शर्करा, खाँड़ से लिप्त, सुगन्धित, शीतल पानक (शर्बतों) का सेवन करे, और शर्करा मिश्रित मन्थों को पीये। शीतल, घृतयुक्त, मधुर, एवं द्रव भोजन हितकारी है। गरम किये दूध में शर्करा मिलाकर इससे रात्रि में भोजन करना उत्तम है। अदालिका की छत पर बिछाये, नूतन-नये फूलों से भरे बिस्तर पर शरीर पर चन्दन का लेप करके सुखदायक वायु का स्पर्श लेते हुए सोये।

वक्तव्य—“दिवा पानानि शीतानि हितं रात्रौ च भोजनम्।

ससर्पिः शर्करं शीतं श्रुतेन पयसा युतम् ॥ दिवा शीतग्रहे निद्रां निधि चन्द्रांशुशीतले। भजेचन्दनद्विघाङ्गः प्रवाते हर्म्यमस्तके ॥”

चरक ॥४१-४५॥

तापास्तये हिता नित्यं रसा ये गुरवक्षयः ॥४६॥

पयो मांसरसाः कोष्णस्तैलानि च घृतानि च।

बृंहणं चापि यत्किञ्चिदभिष्यन्दि तथैव च ॥४७॥

निद्राघोषचित्तं चैव प्रकृप्यन्तं ससौरणम्।

निहन्त्यादुनिलक्ष्नेन विधिना विधिकोविदः ॥४८॥

(नदीजलं रूक्षमुष्णमुदुमन्थं तथाऽऽतपम्।

व्यायामं च दिवास्वप्नं व्यवयं चात्र वजयेत् ॥४९॥

(नवात्ररूक्षशीताम्लुसक्तृश्चापि विवर्जयेत्।)

यवषष्टिकगोधूमान् शालीश्चाप्यनवांस्तथा ॥५०॥

हर्म्यमध्ये निवाते च भजेच्छ्रुयां सूदुत्तराम्।

सविषप्रापिविषमूत्रलाठानिष्टोवनाद्विभिः ॥५१॥

समाप्लुतं तदा तोयमान्तरिक्षं विषोपमम्।

वायुना विषदुष्टेन प्रावृषेण्येन दूषितम् ॥५२॥

तद्वि सर्वोपयोगे तु तस्मिन् काले विवर्जयेत्।

अरिष्टासवमैरेयान् सोपदंशास्तु युक्ततः ॥५३॥

पिबेत् प्रावृषि जोगांस्तु रात्रौ तानपि वर्जयेत्।

निरूहेर्वैस्तिभिश्चान्यैस्तथाऽन्यैर्मांरूतापहैः ॥५४॥

(कुपितं शमयेद्वायुं वाषिर्कं चाचरेद्विधिम् ॥)

श्रीम के बीत जाने पर प्रावृड काल में नित्य भारी तीन

रसों का (मधुर, अम्ल, लवण का) सेवन करे। दूध सुहाते गरम मांसरस, तैल, घृत इनका सेवन करे। जो भी कोई द्रव्य बृंहण एवं अभिष्यन्दि हो, उनका सेवन करे। श्रीम में संचित वायु के प्रकोप को, विधि को जाननेवाला वैद्य बातनाशक विधि से शान्त कर दे। (इसी श्रुतु में नदी का पानी, रूक्ष, उष्ण वस्तुएँ, पानी में घुले सत्, धूर, व्यायाम, दिन में सोना और मैथुन छोड़ देवे।) नूतन अन्न (एक साल से कम), रूक्ष, शीतल अन्न, शीतल जल, सत् (पानी में घुले) छोड़ दे। जो, गेहूँ, पुराने साँठों, शाली का सेवन करे। मकान के मध्य में वायु रहित स्थान पर अतिशय कोमल शय्या पर सोये। वर्षा का जल विषकाले प्राणी के मल मूत्र, लाला, थूक आदि से मिला होने के कारण विष के समान होता है, प्रावृड श्रुतु के विष से दूषित वायु से दूषित होने के कारण इस श्रुतु में प्रत्येक कार्य में यह निन्दित होता है। प्रावृड श्रुतु में चटनी आदि (या मांस को) खाकर युक्ति से पुरातन अरिष्ट, आसव, मैरेय को पीये। रात्रि में इनका भी परित्याग कर देवे। निरूह से, अनुवासन वस्ति से, तथा दूसरी बातनाशक विधियों से कुपित वायु को शान्त करे। वर्षा की श्रुतुचर्या का सेवन करे।

वक्तव्य—प्रावृडकाल में वायु का संचय होता है, संचय काल में ही वायु को शान्त करना चाहिये। यथा—“संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः” ॥४६-४५॥

श्रुतावृतौ य एतेन विधिना वत्से नरः ॥५५॥

२०४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६४ ]

घोरानुक्रुतान् रोगाद्वाप्नोति स कदाचन ।

इस विधि से जो मनुष्य प्रत्येक ऋतु में बरतता है, वह श्रुतुजन्य भयानक रोगों से कभी भी आक्रान्त नहीं होता ॥५५॥

अत ऊर्ध्वं द्वादशाशनप्रविचारात् वक्ष्यामः । तत्र शीतोष्णस्तिग्धरूक्षद्रवशुष्कैककालिकद्विकालिकौषधयुक्त-मात्राहीनदोषप्रशमनवृत्त्यर्थः ॥५६॥

इसके आगे भोजन के बारह विभागों को कहेंगे—इनमें शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, द्रव, शुष्क, एककालिक, द्विकालिक, औषधयुक्त, मात्राहीन, दोषप्रशमन, वृत्ति के लिये ॥५६॥

तृष्णोष्णमददाहातीन् रक्तपित्तविषातुरान् ।

मूर्च्छातीन् क्षोषु च क्षीणान् शीतरैर्रूपाचरेत् ॥५७॥

तृष्णा, गरमी, मद, दाह से पीड़ित, रक्तपित्त, विष के रोगी, मूर्च्छा पीड़ित, क्षीण से क्षीण पुरुषों की शीतल अन्न (खान-पान) से चिकित्सा करे ॥५७॥

कफवातामयाविष्टान् विरिक्तान् स्नेहपायिनः ।

अक्लिन्नकायांश्च नरानुष्णोरनैरूपाचरेत् ॥५८॥

कफ-वात के रोगों से आक्रान्त, विरेचन लिये, स्नेह पीये, क्लेद रहित शरीरवालों की उष्ण अन्न से चिकित्सा करे ॥५८॥

वातिकान् रूक्षवेहांश्च व्यायायोपहतस्तथा ।

व्यायामिनश्चापि नरान् स्निग्धैर्रूपाचरेत् ॥५९॥

वात प्रकृति, रूक्ष शरीर, मैथुन से पीड़ित (थके), नित्य-प्रति व्यायाम करनेवालों की स्निग्ध अन्न ( खान-पान ) से चिकित्सा करे ॥५९॥

मेदसाऽभिपरीतास्तु स्निग्धान्मेहातुरानपि ।

कफाभिपन्नदेहांश्च रूक्षैर्रूपाचरेत् ॥६०॥

मेद से व्याप्त शरीरवालों की, स्निग्ध एवं मेहरोगियों की कफ से भरे शरीरवालों की रूक्ष अन्न से चिकित्सा करे ॥६०॥

शुष्कदेहान् पिपासातांन् दुर्बलानपि च द्रवैः ।

शुष्कशरीरवाले, पिपासा से पीड़ित, दुर्बल मनुष्यों की द्रव भोजनों से चिकित्सा करे ।

प्रक्लिन्नकायान् त्रणिनः शुष्कैर्मैहिन एव च ॥६१॥

कुष्ठ आदि से सड़े शरीरवाले, त्रण रोगियों की, मेहरोगियों की शुष्क अन्न से चिकित्सा करे ।

वक्तव्य—किलन्न त्रणों में शुष्क भोजन देवे । अक्लिन्न

त्रणों में द्रव भोजन विषेय है ॥६१॥

एककालं भवेद्येयो दुर्बलान्निबद्धये ।

दुर्बल अग्नि को बढ़ाने के लिये एक समय भोजन देना चाहिये ।

समान्नये तथाऽऽहो द्विकालमपि पूजितः ॥६२॥

समान अग्नि के लिये दोनों समय आहार देना उत्तम है ॥

औषधद्वेषिणे देयस्तथौषधसमायुतः ।

औषध से द्वेष रखनेवाले को औषध से मिला अन्न देवे ।

मन्दाग्नेये रोगिणे च मात्राहीनः प्रशस्यते ॥६३॥

तदतुदत्तस्त्वाहारे दोषप्रशमनः स्मृतः ।

मन्दाग्नि और रोगी को मात्रा से कम आहार देवे । श्रुतु के अनुसार दिया अन्न आहार दोष प्रशमक कहा गया है ॥

अतः परं तु स्वस्थानां वृत्त्यर्थं सर्व एव च ।

प्रविचारानिमान्नेव द्वादशात्र प्रयोजयेत् ॥६४॥

इसके उपरान्त समान धातु एवं समदोष प्रकृति स्वस्थ पुरुषों के लिये शरीर के धारण के लिये अन्न देवे । इन बारह विभागों को इस प्रकार प्रयोग करे ॥६४॥

अत ऊर्ध्वं दशौषधकालान् वक्ष्यामः । तत्राभक्तं

प्राग्भक्तमधोभक्तं मध्येभक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्गं मुहुर्मुहुर्मासप्रासान्तरं चेति दशौषधकालाः ॥६५॥

इसके आगे दस औषध कालों को कहेंगे इनमें अभक्त, प्राग्भक्त, अधोभक्त, मध्येभक्त, अन्तराभक्त, सभक्त, सामुद्ग, मुहुर्मुहुः, प्रास, प्रासान्तर-ये दस औषधकाल (औषध देने के समय) हैं ॥६५॥

तत्राभक्तं तु यत केवलमेवौषधमुपयुज्यते ॥६६॥

इनमें जब केवल औषध ही बरती जाती है, उसको अभक्त कहते हैं ।

वि० मन्तव्य—जैसे लंघन-उपवास करते २ औषध खिलाई जाती है ॥६६॥

वीर्याधिकं भवति भेषजमन्मनहोन्

हन्यात्तथाऽऽमयमसंशयमाशु चैव ।

तद्वाळवृद्धवन्तितामृदवस्तु पीत्वा

ग्लानिं परां समुपयान्ति बलक्षयं च ॥६७॥

अन्न के बिना औषध अधिक शक्तिशाली होती है । इससे औषध बिना संशय के रोगों को शान्त करती है । परन्तु इस प्रकार की औषध बालक, बृद्ध, स्त्री एवं कोमल प्रकृति के मनुष्य पीकर विशेष ग्लानि तथा बलक्षय को प्राप्त होते हैं ।

वि० मन्तव्य—इससे लाभ तो बहुत होता है, परन्तु बाल आदि को उससे हानि भी होती है, और उनको भी जिनको लंघन का निषेध है । ऐसे रोगियों को लघु भोजन के साथ २ औषध देना चाहिये देखिये निम्नलिखित श्लोक ६६ ॥६७॥

प्राग्भक्तं नाम श्रोक्तं यत प्राग्भक्तस्तयोपयुज्यते ॥६८॥

जो औषध भोजन से पूर्व दी जाती है, उसका नाम प्राग्भक्त है ॥६८॥

श्रीमं विपाकमुपयान्ति बलं न हिंस्या-

द्वजावृतं न च मुधबंदनान्निरेति ।

प्राग्भक्तसेवितमथौषधमेतदेव

दद्यात्तु च वृद्धशिशुभोक्तुमाक्रान्नाभ्यः ॥६९॥

अ० ६४]

अन्तरत्नत्रय

८०१

इस प्रकार की औषधि शीघ्र ही मुखपूर्वक पच जाती है, बल का नाश नहीं करती। अन्न से आहत होने के कारण मुख से वापिस नहीं निकलती। भोजन से पूर्व सेवन की औषध वृद्ध, शिशु, डरपोक, कृश एवं स्त्रियों के लिये देनी चाहिये ॥६६॥

अधोभक्तं नाम—यदधो भक्तस्येति ॥७०॥

जो औषध भोजन के पीछे दी जाती है, उसका नाम अधोभक्त है ॥७०॥

मध्यभक्तं नाम—यन्मध्ये भक्तस्य पीयते ॥७१॥

जो औषध भोजन के बीच में दी जाती है, उसका नाम मध्येभक्त है ॥७१॥

पीतं यदन्नमुपयुज्य तदूर्ध्वकाये

हन्याद् गदान् बहुविधाश्च बलं ददाति ।

मध्ये तु पीतमपहन्यविसारिभावा-

चे मध्यदेहसमिभूय भवन्ति रोगाः ॥७२॥

औषध पीकर जो अन्न खाया जाता है, वह शरीर के ऊर्ध्व भाग के बहुत से रोगों को नष्ट करके, शरीर के ऊर्ध्व भाग में बल देता है। भोजन के बीच में पी हुई औषध न फैलने के स्वभाव के कारण कोष्ठ के रोगों को नष्ट करती है ॥७२॥

अन्तराभक्तं नाम—यदन्तरा पीयते पूर्वापरयोर्मक्तयोः ७३ पूर्व और अपर भोजनों के बीच में जो औषध पी जाती है, (प्रातः और सायं भोजन के बीच में) वह अन्तराभक्त है ॥७४॥

सभक्तं नाम—यत् सह भक्तैन ॥७५॥

भोजन के साथ सिद्ध की या खाई हुई औषध सभक्त है ॥

पथ्यं सभक्तमबलाबलयोहिं नित्यं

तद्वृद्धिषामपि तथा शिशुवृद्धयोश्च ।

हृद्यं मनोबलकरं त्वथ दीपनं च

पथ्यं सदा भवति चान्तरभक्तकं यत् ॥६५॥

स्त्री, दुर्बल, औषध से द्रव रखनेवाले, शिशु, वृद्ध इनके लिये भोजन के साथ औषध देना सदा हितकारी है। इस प्रकार दी हुई औषध हृदय के लिये प्रिय, मनोबल को देनेवाली, अग्निदीपक, सदा पथ्य है ॥७५॥

सामुद्रगं नाम—यद्वक्तस्यादावन्ते च पीयते ॥७६॥

दोषे द्विधा प्रविस्तृते च समुद्रगसंज्ञ-

माद्यन्तयोर्यदशनस्य निषेध्यते तु ॥७७॥

सामुद्रग—भोजन के आदि में और भोजन के अन्त में जो औषध दी जाती है, वह सामुद्रग है। दोष के ऊपर और नीचे दोनों ओर प्रसृत होने पर औषध को भोजन के आदि और अन्त में दिया जाता है, इसको सामुद्रग कहते हैं ॥७६,७७॥

मुहुर्मुहुर्नाम—

सभक्तमभक्तं वा यदोषधं मुहुर्मुहुर्पयुज्यते ॥७८॥

श्वासे मुहुर्मुहुर्तिप्रस्तृते च कासे

हिक्कावमीपु स वदन्त्युपयोऽयमेतत् ॥७९॥

भोजन के साथ या भोजन के बिना जो औषध बार-बार सेवन की जाती है, उसका नाम मुहुः मुहुः है। श्वास में या कास के बहुत वेगवान् होने पर, हिचकी में, वमन में औषध को बार-बार देना चाहिये ॥

प्रासं तु—यत्पिण्डन्यामिश्रम् ॥८०॥

कवच के साथ मिलाई औषध प्रास औषध है ॥

प्रासान्तरं तु यद्प्रासान्तरेषु ॥८१॥

दो प्रासों ( कवलों ) के बीच में दी गई औषध प्रासान्तर औषध कही जाती है ॥८१॥

प्रासेषु चूर्णमबलाग्निपु दीपनीयं

वाजीकराण्यपि तु योजयितुं यतेत ।

प्रासान्तरेषु वितरेद्दमनीयभूमान्

श्वासादिषु प्रथितदृष्टगुणाश्च लेहान् ॥८२॥

दुर्बलाग्नि में, प्रासों में औषध देवे। दीपन गुण एवं वाजीकरण औषधियों को भी इसी रूप में देने का यत्न करे। वमन कारक धूमों को प्रासों के बीच में देवे। श्वास आदि रोगों में दृष्ट गुणवाले प्रसिद्ध लेहों को प्रासान्तरों में दे ॥८२॥

एवमेते दूगौषधकालाः ॥८३॥

इस प्रकार से ये दश औषधकाल हैं।

रोग्यवेक्ष्य यथा प्रायः निरन्तो बलवान् पिबेत् ।

भेषजं लघुपथ्यान्नैः युक्तमद्यात्तु दुर्बलः ॥

भेषज्यकालो भक्तादौ मध्ये पश्चान्मुहुर्मुहुः ।

सामुद्रगं भक्तसंयुक्तं प्रासे प्रासान्तरे तथा ॥ चरक ॥

विसृष्टे विष्णून्ने विशदकरणे देहे च सुलघौ

विशुद्धे चोद्गारे हृदि सुविमले वाते च सरति ।

तथाऽन्नश्रद्धायां कृमपरिगमे कुक्षौ च शिथिले

प्रदैयस्त्वाहारी भवति भिषजां कालः स तु मतः ॥८४॥

आहारकाल—मलमूत्र का त्याग कर चुकने पर, इन्द्रियों के निर्मल होने पर, शरीर में हल्कापन प्रतीत होने से, उद्गार के शुद्ध हो जाने पर, हृदय में निर्मलता होने से, अपान वायु का अघः प्रवाहण होने पर, भोजन में रुचि होने पर, थकान मिट जाने पर, उदर में ढीलापन होने से, वैद्य को चाहिये कि इस समय आहार देवे, क्योंकि भोजन का सच्चा समय यही है ॥८४॥

इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु

स्वस्थवृत्ताध्यायो नाम (द्वितीयोऽध्यायः, आदितः)

चतुःषष्ठितमोऽध्यायः ॥६४॥