त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
३. अध्याय ११-१६: शुद्ध संवित् तत्त्व, जीवन्मुक्ति एवं समाधि-दशा विचार
चतुर्दशोऽध्यायः । १६७ अन्तर्बहिर्वा यत् किञ्चिद्भारूपोदरसंस्थितम् । अतस्तन्नापादानं स्यात् शृङ्गस्येव हि पर्वतः ॥ ४२ ॥ एवंविधं हि भारूपं ग्रस्तसर्वप्रपञ्चकम् । भाति स्वतन्त्रतः स्वस्मिन् सर्वत्राऽपि च सर्वदा ॥ ४३ ॥ एतत् परा चितिः प्रोक्ता त्रिपुरा परमेश्वरी । ब्रह्मेत्याहुर्वेदविदो विष्णुं वैष्णवसत्तमाः ॥ ४४ ॥ शिवं शैवोत्तमाः प्राहुः शक्तिं शक्तिपरायणाः । एतद्रूपादृते किञ्चिद् यदि ब्रूयुस्तदल्पकम् ॥ ४५ ॥ तया व्याप्तं तु चिच्छक्त्या दर्पणप्रतिबिम्बवत् । तस्य भास्यकृतं भासकत्वं च न स्वतः स्थितम् ॥ ४६ ॥ जो अप्रकाशरूप होगा उसका तो भान ही नहीं हो सकता। इसलिये वह एकरस प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ४१ ॥ भीतर और बाहर जो कुछ भी है वह सब उस प्रकाशस्वरूपके पेटमें ही स्थित है। इसलिये जैसे पर्वत अपने शिखरका अपादान नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह उसका अपादान नहीं हो सकता। [ तात्पर्य यह कि जिस प्रकार शिखरको पर्वतसे पृथक् या पर्वतसे बाहर नहीं कह सकते उसीप्रकार प्रपञ्चको प्रकाशस्वरूप चेतनसे पृथक् या बाहर नहीं कह सकते ] ॥ ४२ ॥ इस प्रकारके इस प्रकाशस्वरूपने सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपनेमें ग्रस्त किया हुआ है। वह सर्वदा सर्वत्र स्वतन्त्रतासे अपनेमें आप ही प्रकाश- मान है ॥ ४३ ॥ यह पराचिति ही भगवती त्रिपुरा कही गयी है। वैदिक विद्वान् इसीको ब्रह्म कहते हैं और वैष्णव विष्णु ॥ ४४ ॥ श्रेष्ठ शैव इसे शिव बताते हैं और शाक्त लोग शक्ति। इस चिद्रूपसे भिन्न जो कुछ कहा जायगा वह अपूर्ण ही होगा ॥ ४५ ॥ प्रतिबिम्ब जिस प्रकार दर्पणसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह सब उस चेतन शक्तिसे व्याप्त है। इसका जो भासकत्व है वह भास्यके कारण है, स्वतः नहीं ॥ ४६ ॥
१६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भास्यं तु भाननिर्मग्नमादर्शे नगरादिवत् । दर्पणे नगरं यद्वद्दर्पणान्नातिरिच्यते ॥ ४७ ॥ तथा चिति जगद्भाति यत्तन्नैवातिरिच्यते । दर्पणात्मनि सम्पूर्णे निविडे चैकरूपिणि ॥ ४८ ॥ यथा हि भिन्नं नगरं सर्वथा नोपपद्यते । तथा पूर्णेऽस्तु निविडे चैकरूपे चिदात्मनि ॥ ४९ ॥ जगत् सर्वात्मना नैव ह्युपपत्तिं समश्नुते । आकाशस्त्ववकाशात्मा शून्यरूपत्वहेतुतः ॥ ५० ॥ द्वैतं जगत् प्रसहते सर्वत्रैव हि सर्वदा । सती चितिरशून्यात्मरूपिण्येकरसा कथम् ॥ ५१ ॥ द्वितीयलेशं प्रसहेदादर्शात्मवदञ्जसा । तस्मादादर्शवत् संवित् स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ ५२ ॥ भासयेदद्वितीये स्वे रूपे सर्वं चराचरम् । दर्पणमें दीखनेवाले नगर आदि जैसे दर्पणसे अभिन्न होते हैं वैसे ही सम्पूर्ण भास्यवर्ग अपने भासकसे अभिन्न है। दर्पणका नगर जैसे दर्पणसे भिन्न नहीं होता वैसे ही जिस जगत्को चिति प्रकाशित करती है वह चितिसे भिन्न नहीं है ॥ ४७-४८ पू० ॥ जिस प्रकार एकरूप घनीभूत एवं सम्पूर्ण ( अवकाशहीन ) दर्पणसे भिन्न उसमें प्रतिबिम्बित नगरकी सत्ता किसी प्रकार सम्भव नहीं है, उसी प्रकार एकरूप, घनीभूत एवं परिपूर्ण चिदात्मामें जगत्की पृथक् सत्ता किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥ ४८ उ०-५० पू० ॥ आकाश तो अवकाशरूप और शून्यात्मक है, अतः उसमें तो सर्वदा सर्वत्र ही द्वैतरूप जगत् समा सकता है ॥ ५० उ०-५१ पू० ॥ किन्तु सत्यरूपा चिति, जो अशून्यात्मा एकरूपिणी और एक- रसा है, स्वभावसे ही दर्पणके समान किस प्रकार लेशमात्र द्वैतको भी सहन कर सकती है ? ॥ ५१ उ०-५२ पू० ॥ अतः वह चित् शक्ति अपने स्वातन्त्र्यरूप सामर्थ्यके प्रभावसे दर्पणके समान अपने ही अद्वितीय स्वरूपमें इस सम्पूर्ण चराचर
चतुर्दशोऽध्यायः । १६६ निमित्तोपादानहीनं द्वितीयमतिचित्रितम् ॥ ५३ ॥ यथाऽनेकरूपविधे भासमानेऽपि दर्पणे । एकत्वं भासते स्पष्टमविशेषाददूषितम् ॥ ५४ ॥ तथा विचित्रे जगति भासमानेऽप्यनेकधा । अनुसन्धानसंसिद्धमेकं दोषविवर्जितम् ॥ ५५ ॥ राजन् स्वात्मनि सम्पश्य मनोराज्यदशास्थितिम् । अनेकवैचित्र्यवपुरपि चैतन्यमात्रकम् ॥ ५६ ॥ सृष्टौ वा प्रलये वाऽपि निर्विकल्पैव सा चितिः । प्रतिबिम्बस्य भावे वाऽप्यभावे वेव दर्पणः ॥ ५७ ॥ एवंविधैकरूपाऽपि चितिः स्वातन्त्र्यहेतुतः । स्वान्तर्विभासयेद्वाह्यमादर्शे गगनं यथा ॥ ५८ ॥ एषा हि प्रथमा सृष्टिरविद्या तम उच्यते । द्वैतको, जिसका कोई निमित्त या उपादान कारण नहीं है और जो परस्पर अत्यन्त विलक्षण है, भासित कर रही है ॥ ५२ उ०-५३ ॥ जिस प्रकार [ प्रतिबिम्बके कारण ] अनेकरूप प्रतीत होनेवाले दर्पणमें अपने सामान्यरूपसे अबाधित एकत्व स्पष्ट भासता है, उसी प्रकार [ जाग्रदादि अवस्थाओंके कारण ] यह विचित्र जगत् अनेक- रूपसे भासित होनेपर भी, इसमें किसी प्रकार भी बाधित न होनेवाला एक तत्त्व सिद्ध है ही, क्योंकि इसकी विभिन्न अवस्थाओंका एक ही के द्वारा स्मरण होता है ॥ ५४-५५ ॥ राजन् ! तुम अपनेमें ही अपने मनोराज्यके समयकी स्थितिका विचार करो। वह अनेक प्रकारके रूपोंवाली होनेपर भी वास्तवमें चैतन्यमात्र ही तो होती है ॥ ५६ ॥ वह चिति, सृष्टि हो अथवा प्रलय, निर्विकल्पा ही रहती है, जैसे प्रतिबिम्ब हो अथवा न हो दर्पण शुद्ध ही रहता है ॥ ५७ ॥ इस प्रकार एकरूपा होकर भी यह चिति अपने स्वातन्त्र्यके कारण दर्पणमें आकाशके समान अपने आन्तरिक स्वरूपको ही बाह्यरूपसे भासित करती है ॥ ५८ ॥ यही पहली सृष्टि है, यह अविद्या या तम कही जाती है ।
२०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पूर्णस्यांशेनेव भानं बाह्याभासनमुच्यते ॥ ५९ ॥ पूर्णाऽहम्भावविच्छेदादनहम्भावरूपता । एषैवाऽव्यक्तमित्युक्ता जडशक्तिश्च कथ्यते ॥ ६० ॥ या चितिश्चाऽत्र विच्छिन्नाभासिनी बहिरात्मनः । शिवतत्त्वमिति प्रोक्ता शक्तिस्तद्भासनं भवेत् ॥ ६१ ॥ बहिरूपं महाशून्यं कल्पितं यत्तदेव तु । अहम्भावाऽऽच्छादनेन सदाशिवमयं स्मृतम् ॥ ६२ ॥ तदेव जाड्यमुख्यत्वे ईश्वराख्यं प्रचक्षते । पूर्ण तत्त्वका अंशके समान भान होना ही बाह्याभास कहा जाता है ॥ ५६ ॥ परिपूर्ण आत्मतत्त्वमें अहंभाव न रहनेपर जो अनहंभावरूपता आती है वही अव्यक्त कही जाती है और उसीको जडशक्ति कहते हैं¹ ॥ ६० ॥ जो चिति इस लोकमें परिच्छिन्न रूपसे अपनेको बाह्यभावसे प्रकट करती है वही 'शिवतत्त्व' कही जाती है। उसका जो बाह्यरूपसे भासना है वही 'शक्ति' है² ॥ ६१ ॥ जो महाशून्य बाह्यरूपसे कल्पित हुआ है वही जब 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अहंभावसे आच्छादित होता है तो उसे 'सदाशिव' कहा जाता है ॥ ६२ ॥ वही जडताकी मुख्यता होनेपर 'ईश्वर' नामका चौथा तत्त्व कहलाता १. आत्मतत्त्व प्रत्यक्चैतन्य होनेके कारण अहमर्थ ही है। प्रलयादि निर्विकल्प अवस्थामें वह शुद्ध चिद्रूप ही रहता है। अपनी स्वातन्त्र्य शक्तिके द्वारा जब उसकी विक्षेपाभिमुख दशा होती है तब उसमें अहंभावका अभाव हो जाता है। यह समष्टि अहंकी अवस्था है। इसीको वेदान्त ग्रन्थोंमें मायाशक्ति कहा है। फिर जब विक्षेप दशा प्राप्त होती है तो परिच्छिन्न या व्यष्टि अहंकी स्फूर्ति होती है। इसे अविद्या या जडशक्ति कहते हैं। इस प्रकार भगवान्की चिच्छक्ति या उनके स्वरूपभूत स्वातन्त्र्यकी ये तीन अवस्थाएँ होती हैं। इन तीन श्लोकोंमें क्रमशः इन्हीं तीनों अवस्थाओंका वर्णन है। २. पूर्णचैतन्य में कोई बाह्याभास नहीं होता। उस अवस्थामें उसे 'परमशिव' कहते हैं। फिर सृष्टिरचना होनेपर विभिन्न परिच्छिन्न विशेषोंमें जो एक सामान्य निर्विकल्प चेतन अनुगत रहता है उसका नाम 'शिवतत्त्व' है और उस निर्विकल्प चेतनका परिच्छिन्न अहंरूपसे भासना 'शक्ति' है। इस प्रकार जो सृष्टिसे पूर्व परमशिव कहा जाता है वही सृष्टिकालमें सामान्य चिति रूपसे 'शिवतत्त्व' और अहंभासरूपसे 'शक्तितत्त्व' या जीव है।
चतुर्दशोऽध्यायः। २०२ अनयोः संवेदनं तु भेदाऽभेदविमर्शनम् ॥ ६३ ॥ शुद्धविद्येति सम्प्रोक्तमेतावच्छुद्धमुच्यते । भेदशक्तेरप्ररूढ्या चाऽभेदात्माऽवभासनात् ॥ ६४ ॥ अथ चित्स्वातन्त्र्यभरात् प्ररूढे भेदभावने । जडशक्तिर्धर्मिभावं चितिर्धर्मात्मतां ययौ ॥ ६५ ॥ तदा सा जडशक्तिस्तु मायातत्त्वं प्रचक्षते । माया विभेदबुद्धिस्तु भेदप्रचुरभावनात् ॥ ६६ ॥ भेदप्रचुरसंवीता चितिः सङ्कुचितात्मिका । पञ्चकञ्चुकसम्प्राप्ता पुरुषत्वं प्रपद्यते ॥ ६७ ॥ कलाविद्यारागकालनियतिः पञ्चकञ्चुकम् । कला किञ्चित्कर्त्तृता स्याद्विद्या किञ्चिज्ज्ञता भवेत् ॥ ६८ ॥ है।¹ इन सदाशिव और ईश्वरतत्त्वका 'यह मैं हूँ' और 'मैं यह हूँ' इस प्रकार भेदाभेद भेदरूपसे भासना ही 'शुद्धविद्या' नामका पाँचवाँ तत्त्व कहा जाता है। शिवतत्त्वसे लेकर यहाँतक ये पाँचो तत्त्व भेद- शक्ति (जडता) का विकास न होनेसे तथा अभेदस्वरूप आत्मतत्त्व के ही अवभास होनेके कारण 'शुद्ध' कहे जाते हैं ॥ ६३-६४ ॥ फिर जब चित्स्वातन्त्र्यके माहात्म्यसे भेदभाव बढ़ने लगता है तो जडशक्ति धर्मी भावको प्राप्त हो जाती है और चिति उसका धर्म हो जाती है ॥ ६५ ॥ तब वह जडशक्ति ही मायातत्त्व कही जाती है। माया भेदबुद्धिका नाम है, क्योंकि उसमें भेदप्रधान भावना रहती है ॥ ६६ ॥ भेदभावकी प्रचुरतासे व्याप्त चिति संकुचित हो जाती है तथा ऐसे पाँच कञ्चुक (आवरणों) से व्याप्त होकर वह पुरुषभावको प्राप्त हो जाती है ॥ ६७ ॥ वे पाँच कञ्चुक हैं—कला, विद्या, राग, काल और नियति। कुछ १. 'मैं यह हूँ' इसमें 'मैं' चिद्रूप है और 'यह' महाशून्य जडतत्त्व है। जब 'मैं' की प्रधानता होती है तब 'सदाशिव' और जब 'यह' की प्रधानता होती है तब ईश्वरतत्त्व होता है। 'मैं' और 'यह' में तत्त्वदृष्टिसे अभेद है और उल्लेख की दृष्टिसे भेद है। इस प्रकार इनका भान भेदाभेदरूपसे होता है।
२०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे रागस्तृष्णा परिच्छित्तिरायुषा काल उच्यते । नियतिः परतन्त्रत्वमेतैर्युक्तस्तु पूरुषः ॥ ६९ ॥ चितिशक्तिमधिष्ठाय विचित्राऽनादिकर्मणाम् । जनानां वासनापिण्डः स्थितः प्रकृतिरुच्यते ॥ ७० ॥ फलं तु त्रिविधं यस्मात् कर्मणां सा त्रिरूपिणी । अस्या अवस्थाभेदो हि चित्तमित्यभिधीयते ॥ ७१ ॥ सुषुप्तौ प्रकृतिर्ज्ञेया तदन्ते चित्तमुच्यते । वासनापिण्डसहिता चितिश्चित्तमुदीरितम् ॥ ७२ ॥ अव्यक्तमेतदेवोक्तं वासनापिण्डभावतः । पुरुषाणां विभेदेन चित्तं बहुविधं भवेत् ॥ ७३ ॥ जीवानांमविभेदेन सुषुप्तावेकधा हि तत् । प्रकृतित्वं समायाति तदन्ते चित्ततामियात् ॥ ७४ ॥ कर सकना कला है, कुछ जान सकना विद्या है, राग तृष्णाको कहते हैं, आयुकी सीमा काल है और परतन्त्रता नियति है । इन पाँच कञ्चुकोंसे जो युक्त है उसे 'पुरुष' कहते हैं ॥ ६८-६९ ॥ जीवोंके शुक्ल-कृष्णादि अनेक प्रकारके अनादिकालीन कर्मोंकी वासनाओंका जो समूह चितिशक्तिको आश्रय करके स्थित है वह 'प्रकृति' कहलाता है ॥ ७० ॥ क्योंकि कर्मोंका फल सुख, दुःख एवं मोह रूप तीन प्रकारका होता है इसलिये वह प्रकृति भी सत्त्व, रज एवं तम तीन रूपोंवाली है । उसीका एक अवस्थाभेद 'चित्त' कहा जाता है ॥ ७१ ॥ सुषुप्तिमें उसे 'प्रकृति' कहते हैं और सुषुप्तिका अन्त होनेपर वही 'चित्त' कहा जाता है । वासनासमूहके सहित जो चिति है वही 'चित्त' कहलाता है ॥ ७२ ॥ वासनासमूहसे युक्त होनेके कारण यह चित्त ही 'अव्यक्त' भी कहा जाता है। पुरुषोंके भेदके अनुसार चित्त भी अनेक प्रकारका होता है ॥ ७३ ॥ किन्तु सुषुप्तिमें पुरुषोंका भेद नहीं रहता, इसलिये उस समय वह एक ही प्रकारका होता है। उस अवस्थामें वह प्रकृतिभावको प्राप्त हो जाता है और उसका अन्त होनेपर चित्तरूपताको ॥ ७४ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः । २०३ एतदेव पुमान् प्रोक्तश्चितिप्राधान्यहेतुना । अव्यक्तप्राधान्यतस्तु चित्तप्रकृतितामियात् ॥ ७५ ॥ क्रियाभेदाच्च त्रिविधमन्तःकरणमुच्यते । अहङ्कारबुद्धिमनोरूपेण नृपसत्तम ! ॥ ७६ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां तु पञ्चकं स्यात्ततः पृथक् । शब्दादिगगनादीनि भूतानि स्थूलसूक्ष्मतः ॥ ७७ ॥ एवं सा परमा संविद् बाह्याभासपूर्वकम् । क्रीडां करोति सृष्ट्यादिक्रमेण सर्वसाक्षिणी ॥ ७८ ॥ तत्राऽऽद्यया श्रीत्रिपुराशक्त्या सृष्टौ प्रभावतः । हिरण्यगर्भो यो ब्रह्मा तस्यैतद्भावनोत्थितम् ॥ ७९ ॥ जगत्तत्र तु या संवित्त्वमहंरूपभासिनी । सा परैव हि चिच्छक्तिस्तद्भेदो न तु विद्यते ॥ ८० ॥ चितिकी प्रधानताके कारण यह चित्त ही 'पुरुष' कहा जाता है तथा अव्यक्त की प्रधानतासे यही चित्त और प्रकृति रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ ७५ ॥ नृपश्रेष्ठ ! क्रियाभेदसे वह चित्त ही अहंकार, बुद्धि एवं मन तीन प्रकारका अन्तःकरण कहलाता है ॥ ७६ ॥ उस त्रिगुणात्मक अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ १, पाँच कर्मेन्द्रियाँ २ तथा शब्दादि ३ सूक्ष्म एवं आकाशादि ४ स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं ॥ ७७ ॥ इस प्रकार वह सर्वसाक्षिणी परमा चिति बाह्याभासपूर्वक सृष्टि आदि क्रमसे क्रीडा कर रही है ॥ ७८ ॥ इस सृष्टिक्रममें सबकी मूलकारण त्रिपुराशक्ति है । उसकी भावना से जो हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुआ है उसीके संकल्पसे यह संसार उत्पन्न हुआ है । इसमें जो 'तू' 'मैं' रूपसे भासनेवाली संवित् है वह परा चित् शक्ति ही है । उसमें कोई भेद नहीं है ॥ ७९-८० ॥ १. श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा और घ्राण । २. वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ । ३. शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ सूक्ष्म भूत हैं । ४. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये पाँच स्थूल भूत हैं ।
२०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भेदस्त्वौपाधिको भाति ह्युपाधिर्ब्रह्मभावितः । तद्भावनोपसंहारे नास्ति भेदस्य भासनम् ॥ ८१ ॥ चितौ या भावना शक्तिर्मायया ते समावृता । तदावरणहाने तु तव सा सिद्धिमेष्यति ॥ ८२ ॥ देशः कालोऽथवा किञ्चिद् यथा येन विभावितम् । तथा तत्तत्र भासेत दीर्घसूक्ष्मत्वभेदतः ॥ ८३ ॥ मयैकदिनरूपेण भावितं तद्दिनैककम् । ब्रह्मणा तावदेवाऽत्र द्वादशाऽर्बुदरूपतः ॥ ८४ ॥ भावितं तेनैवमेतच्चिरशीघ्रत्वभासनम् । ब्रह्मणा निर्मिते शैले पादगव्यूतिसम्मिते ॥ ८५ ॥ मयाऽनन्तप्रदेशस्य भावितत्वादनन्तता । एवं च द्वयमप्यत्र सत्यं चाऽसत्यमेव च ॥ ८६ ॥ भेद उपाधिके कारण भासता है और उपाधि ब्रह्माकी भावनासे हुई है। अतः उसकी भावनाका अन्त होनेपर भेदका भास भी नहीं होता ॥ ८१ ॥ तुममें जो चितिकी भावनाशक्ति है वह मायासे ढकी हुई है। उस आवरणकी निवृत्ति हो जाने पर वह तुम्हारे लिये सिद्ध (प्रकट) हो जायगी ॥ ८२ ॥ देश, काल अथवा कोई भी वस्तु हो उसके विषयमें जिसकी जैसी भावना है उसीके अनुसार वह उसे अल्प या बृहत् रूपमें भासता है ॥ ८३ ॥ मैंने [ अपने संसारमें ] एक दिनकी भावनाकी थी, इसलिये वहाँ एक दिन हुआ। किन्तु उतने ही कालकी ब्रह्माने बारह अरब वर्षरूपसे भावना की। इसीसे यह एक ही कालमें दीर्घता और शीघ्रता- का भास हुआ ॥ ८४-८५ पू० ॥ ब्रह्माके बनाये चौथाई गव्यूतिमात्र पर्वतमें मैंने अनन्त देशकी भावना की, इसलिये उसमें अनन्तता भासी। इस प्रकार ये अनुभूतियां दोनों प्रकार की हैं—[ व्यावहारिक दृष्टिसे ] सत्य भी हैं और [ पार- मार्थिक दृष्टिसे ] असत्य भी ॥ ८५ उ०-८६ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः। २०५ त्वमप्यन्तःक्रोशमितं देशं कालं कलात्मकम्। विभाव्य भूयस्तत्रैव भावयाऽनन्तयोजनम् ॥ ८७ ॥ असङ्ख्यकालमपि च भासेद्यावद्धि भावनम्। तस्माद्भावनमात्रात्मरूपमेतज्जगद्बहिः ॥ ८८ ॥ चिदात्मरूपे व्यक्ते वै भासते मनुजाऽधिप। तस्माद्वाह्यात्मकाऽव्यक्तभित्तौ चित्रमयं जगत् ॥ ८९ ॥ अव्यक्तभित्तिमात्रं स्यात् सा स्वभित्तिचिदात्मिका। अत एव चिराद्गम्यो दूरदेशोऽपि योगिनः ॥ ९० ॥ क्षणेन गत्वा पश्यन्ति करामलकवद् ध्रुवम्। तस्माद् दूरं समीपं वा चिरं शीघ्रमथाऽपि वा ॥ ९१ ॥ भावनामात्रसंसिद्धं चिद्दर्पणसमाश्रितम् । निश्चित्यैवं त्यज भ्रान्तिं शुद्धचिद्भावनक्रमात् ॥ ९२ ॥ ततस्त्वमप्यहमिव स्वतन्त्रस्तु भविष्यसि। इति श्रुत्वा मुनिसुतवचनं मुनिसत्तमः ॥ ९३ ॥ तुम भी यदि अपनी संकल्पभूमिमें पहले एक कोश लम्बे देश और कलामात्र कालकी कल्पना करके फिर उसमें अनन्त योजनके विस्तार और असंख्यकालकी भावना करो तो जैसी तुम्हारी भावना होगी वैसा ही भासेगा। इसलिये राजन् ! यह भावनामात्र रूपवाला बाह्य जगत् चिदात्मारूप अव्यक्तपर ही भास रहा है। अतः बाह्यात्मक अव्यक्त भित्तिपर भासनेवाला यह चित्ररूप जगत् अव्यक्तमात्र ही है और वह अव्यक्त भित्ति चित्स्वरूपिणी है ॥ ८७-६० पू० ॥ इसीलिये योगीलोग दीर्घकालमें पहुँचने योग्य दूरवर्ती प्रदेशको भी क्षणमात्रमें जाकर निश्चय ही करामलकवत् देख लेते हैं॥६०उ०-६१पू०॥ अतः दूर या समीप तथा चिरकाल या अल्पकाल केवल भावनासे ही सिद्ध हुए हैं और चेतनरूप दर्पणके आश्रित हैं—ऐसा निश्चय करके तुम शुद्ध चेतनकी भावना करते हुए भ्रान्तिको त्याग दो। तब तुम भी मेरी ही तरह स्वतन्त्र हो जाओगे ॥ ६१ उ०-६३ पू० ॥ मुनिश्रेष्ठ परशुरामजी मुनिपुत्रके ये वचन सुनकर महासेनका सारा
२०६ Tripura Rahasye Jñānakhaṇḍe | २०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे परित्यज्याऽखिलभ्रान्तिं ज्ञातज्ञेयः शुभाशयः । समाध्यभ्यासयोगेन संसाध्य निजभावनाम् ॥ ९४ ॥ स्वातन्त्र्यमधिगम्याऽथ चिरकालं विहृत्य तु । देहाभासमथोन्मूल्य महागगनसंश्रयः ॥ ९५ ॥ निर्वाणं परमं प्राप्तो महासेनोऽपि भार्गव । एवं जगत् सत्यभावभावनामात्रहेतुतः ॥ ९६ ॥ भाति सत्याऽऽत्मरूपेण विमृश्यैतद् भृगूद्वह । विचारेण शमं यायाद् भ्रान्तिस्ते चित्तसंश्रया ॥ ९७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकाख्यानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ भ्रम दूर हो गया । जानने योग्य तत्त्वको जानलेनेसे उसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया । समाधिके अभ्यासद्वारा उसने अपनी भावनाको सिद्ध कर लिया और इस प्रकार स्वातन्त्र्य प्राप्त करके वह चिरकालतक भूतलमें विहार करता रहा। फिर देहानुसन्धानको भी निर्मूलकर उसने निर्विकल्प पराचितिका आश्रयसे परम निर्वाणपद प्राप्त कर लिया ॥ ६३ उ०-६६ पू० ॥ इस प्रकार हे भृगुनन्दन ! केवल सत्यताकी भावनाके कारण ही यह जगत् सत्यरूप भासता है—ऐसा विचार करो । विचारके द्वारा ही तुम्हारे चित्तमें रहनेवाला भ्रम शान्त होगा ॥ ६६ उ०-६७ ॥ चतुर्दश अध्याय समाप्त ।
पञ्चदशोऽध्यायः इति श्रुत्वा शैललोकाख्यानमत्यद्भुतं तदा । भूयोऽत्यन्तं विस्मितोऽभूद्रामो भृगुकुलोद्वहः ॥ १ ॥ विमृश्य गुरुणा प्रोक्तं बुद्ध्या निश्चित्य शुद्धया । दत्तात्रेयं पुनर्गत्वा नत्वा पप्रच्छ सादरम् ॥ २ ॥ भगवन् यत्त्वया प्रोक्तमाख्यानैर्विविधैस्तु तत् । तत्र सारमियज्ज्ञातं मयात्यन्तं विचारतः ॥ ३ ॥ संवेदनं सत्यमेकं संवेद्यं तत्र कल्पितम् । आदर्शनगरप्रख्यं मृषैव प्रविभावितम् ॥ ४ ॥ सा चितिः परमा शक्तिः संविद्रूपा महेश्वरी । स्वात्मभित्तौ जगच्चित्रमव्यक्तादिप्रभेदितम् ॥ ५ ॥ भावयेत्स्वातन्त्र्यमात्रान्निरुपदानहेतुकम् । एतावत्तु मया ज्ञातं विचार्य सूक्ष्मया धिया ॥ ६ ॥ पञ्चदश अध्याय ॥ १५ ॥ अष्टावक्रका प्रसङ्ग इस प्रकार शैललोककी अत्यन्त अनोखी गाथा सुनकर भृगुनन्दन श्री परशुरामजीको बड़ा ही अचम्भा हुआ ॥ १ ॥ उन्होंने गुरुदेवके कथनपर शुद्ध बुद्धिसे विचार किया और फिर कुछ निश्चयकर श्रीदत्तात्रेयजीके पास जा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार करके पूछा ॥ २ ॥ “भगवन् ! आपने अनेकों आख्यानों द्वारा जो कुछ कहा है उस पर अत्यन्त विचार करके मैंने उसका यह सार समझा है—॥ ३ ॥ 'एक ज्ञान ही सत्य है, ज्ञेय (दृश्य) उसमें कल्पित है। दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान उसकी मिथ्या भावना कर ली गयी है ॥४॥ वह ज्ञानस्वरूपा परमाशक्ति चिति साक्षात् महेश्वरी है। वह अपने स्वातन्त्र्यसे बिना किसी उपादानके ही अपने ही स्वरूपभूत भित्तिपर इस अव्यक्तादि भेदों वाले जगच्चित्रकी कल्पना कर लेती है।' मैंने तो सूक्ष्म बुद्धिसे विचार करके इतना ही समझा है ॥ ५-६ ॥
२०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे किं त्वेवंविधसंवित्तिर्वेद्यवन्ध्या निरूपिता। उपलब्धुमशक्यैव संवेद्यायाः सदा स्थितेः॥ ७॥ वेद्यं विना तु संवित्तेः कथं स्यादुपलम्भनम्। उपलम्भं विना तस्याः पुरुषार्थो न विद्यते॥ ८॥ पुरुषार्थोऽपि मोक्षः स्यात्स वा किंविध उच्यते। विज्ञाने सति मोक्षः स्यान्मुक्ते व्यवहृतिः कथम्॥ ९॥ ज्ञानिनोऽपि च दृश्यन्ते व्यवहारपरायणाः। कथं तेषां हि संवेद्यमुक्तं संवेदनं स्थितम्॥ १०॥ स्थितायां शुद्धसंवित्तौ व्यवहारः कथं भवेत्। विज्ञानमेकरूपं वै मोक्षोप्येकः फलं भवेत्॥ ११॥ तत्कथं ज्ञानिनां भेदः स्थितौ लोके हि दृश्यते। के चित्कर्म प्रकुर्वन्ति काले सच्छास्त्रचोदितम्॥ १२॥ के चित्समाराधयन्ति देवतां भिन्नवर्त्मभिः। किन्तु इस प्रकारकी उस चितिको तो वेद्यभावसे शून्य [अर्थात् अज्ञेय] कहा गया है। और यदि उसकी स्थिति सर्वदा उपलब्धिके अयोग्य ही है तो ज्ञानकी विषय न होनेके कारण उस चितिको किसीको उपलब्धि ही कैसे हो सकती है। और उसकी उपलब्धिके बिना पुरुषार्थ- की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ७-८॥ पुरुषार्थ भी यदि मोक्ष है तो वह किस प्रकारका कहा जाता है। यदि ज्ञान होनेपर मोक्ष हो जाता है तो मुक्तिके अनन्तर उस जीव- न्मुक्तका व्यवहार कैसे होता है? ॥ ९॥ ज्ञानियोंको भी व्यवहारमें तत्पर तो देखा ही जाता है। ऐसी अवस्थामें उनका ज्ञान ज्ञेयहीन (निर्विकल्प) कैसे रहता है? ॥ १०॥ यदि उनका ज्ञान निर्विकल्प ही रहता है तो उनके द्वारा व्यवहार कैसे होता है? [इसके सिवा एक संशय यह भी है कि] ज्ञान तो सबका एक जैसा ही होता है और उसका फल मोक्ष भी एक ही है। फिर लोकमें ज्ञानियोंकी स्थितिमें भेद क्यों देखा जाता है ॥११-१२ पू०॥ ज्ञानियोंमें कोई तो यथासमय शास्त्रोक्त कार्य करते हैं, कोई भिन्न-
पञ्चदशोऽध्यायः। २०६ केचित्समाधिपरमाः संहृतेन्द्रियमण्डलाः ॥ १३ ॥ केचित्तपः प्रकुर्वन्ति देहेन्द्रियविशोषणम् । केचिच्छिष्यान्प्रबोधयन्ति पृथक्प्रवचनैः स्फुटम् ॥ १४ ॥ केचिद्राज्यं प्रशासन्ति दण्डनीत्युक्तवर्त्मना । केचित्प्रवादं कुर्वन्ति सदःसु प्रतिवादिभिः ॥ १५ ॥ केचिच्छास्त्राणि विविधान्यजस्रं रचयन्ति वै । अन्ये केवलमुग्धत्वमावहन्ति सदैव हि ॥ १६ ॥ केपि लोकविगर्हां तु वृत्तिं नित्यमिहास्थिताः । त इमे ज्ञानिन इति प्रथिता भूरिशोचनैः ॥ १७ ॥ तत्कथं साधनफलाभेदेपि स्थितिभिन्नता । किमेते समविज्ञानास्तारतम्यमुताश्रिताः ॥ १८ ॥ एतत्सर्वमशेषेण प्रवक्तुं मे समर्हसि । शिष्येऽनन्यशरण्ये ते निसर्गसदयं मनः ॥ १९ ॥ इत्यत्रिसूनुनापृष्टो भार्गवेण प्रसन्नधीः । भिन्न प्रणालियोंसे देवताओंकी आराधना करते हैं, कोई इन्द्रियग्रामका संयम करके समाधिमें तत्पर रहते हैं, कोई देह और इन्द्रियोंको सुखाने- वाला तप करते हैं, कोई तरह-तरहके वचनों द्वारा स्पष्टतया शिष्योंको उपदेश करते हैं, कोई दण्डनीतिमें बताये हुए नियमोंके अनुसार राज्य- शासन करते हैं, कोई सभाओंमें प्रतिवादियोंके साथ वाद-विवाद करते हैं, कोई निरन्तर तरह-तरहके शास्त्रोंकी रचना करते रहते हैं और कोई सर्वदा पागलपनका स्वांग ही बनाये रहते हैं ॥ १२ उ०-१६ ॥ कोई इस लोकमें निन्दनीय वृत्तिका आचरण करते हैं। फिर भी अत्यन्त चिन्तनशील लोग निश्चय करते हैं कि ये सभी ज्ञानी हैं ॥ १७॥ तब ऐसा क्यों है कि साधन और फलमें भेद न होनेपर भी इनकी स्थितियोंमें भेद है। इन सबका ज्ञान समान ही होता है अथवा उसमें न्यूनाधिकता रहती है ? ॥ १८ ॥ कृपया यह सब रहस्य मुझसे समझाकर कहिये। मुझे किसी अन्यका आश्रय नहीं है। अपने इस शिष्यके प्रति आपका चित्त स्वभावसे ही दयार्द्र है" ॥ १९ ॥ परशुरामजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर श्रीदत्तात्रेयजी बड़े
२१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मत्वा योग्यं प्रश्नजातं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ २० ॥ राम बुद्धिमतां श्रेष्ठ नूनं स्पृशसि तत्पदम् । सद्विमर्शपरो यस्त्वमतो ज्ञातुं प्रभावितः ॥ २१ ॥ एतदेव हि तच्छक्तिपातो यत्सद्विमर्शनम् । भगवच्छक्तिपातेन विना कः श्रेय आप्नुयात् ॥ २२ ॥ कृत्यमात्मदेवताया जानीह्येतावदेव हि । यत्सद्विमर्शनं नित्यं वर्धयेत्सुप्रसादिता ॥ २३ ॥ यत्त्वया विदितं तत्तु तादृक् सत्यं नहीतरत् । किन्तु तत्तादृशमपि त्वयोक्तं परचिद्वपुः ॥ २४ ॥ न ते सुविदितं राम यत एवं वदस्यतः । ताटस्थ्येन तु यो यावद्वेद तावन्न वेद वै ॥ २५ ॥ यतः सा विदिता सम्यक्ताटस्थ्यमुपशामयेत् । तटस्थसंवेदनं तु स्वप्नसंवेदनोपमम् ॥ २६ ॥ प्रसन्न हुए और उनके प्रश्नोंको उचित समझकर उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ २० ॥ "परशुराम ! तुम बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हो । तुमने अवश्य उस पदका स्पर्श प्राप्त किया है । तुम सद्विचारमें तत्पर हो, इसलिये उसे जाननेकी भी योग्यता रखते हो ॥ २१ ॥ यह जो सद्विचार करता है वही भगवान्की अनुग्रहशक्तिको पाना है । भला उनकी अनुग्रहशक्तिको प्राप्त किये बिना कौन उस परमपदको प्राप्त कर सकता है ? ॥ २२ ॥ उस आत्मदेवका कार्य तो केवल इतना ही समझो कि वह प्रसन्न होकर निरन्तर सद्विचारकी वृद्धि करता रहे ॥ २३ ॥ तुमने जो कुछ समझा है वह तो उतना ही है; उससे भिन्न नहीं । किन्तु वह वैसा होनेपर भी तुमने जिस परा चिच्छक्तिकी चर्चा की है वह अभी तुम्हें ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है । इसीसे तुम ऐसी शंका करते हो ॥ २४-२५ पू० ॥ जबतक साधक तटस्थरूपसे उसे जानता है तबतक वास्तवमें नहीं जानता; क्योंकि जब उसका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है तो तटस्थता
पञ्चदशोऽध्यायः । २११ यथा स्वप्ननिधिप्राप्तिः पुरुषाणां निरर्थिका । तथा तटस्थविज्ञानममुख्यफलदं भवेत् ॥ २७ ॥ अत्र ते कथयिष्यामि प्राग्वृत्तमतिशोभनम् । पुरा विदेहेषु कश्चिदासीद्राजा सुधार्मिकः ॥ २८ ॥ वृद्धप्रज्ञो हि जनकः प्रविज्ञातपरावरः । स कदाचित्स्वात्मदेवीमीजे क्रतुभिरुत्तमैः ॥ २९ ॥ तत्राजग्मुर्ब्राह्मणाद्या विद्यावन्तस्तपस्विनः । कलाभिज्ञा वैदिकाश्च यज्वानश्चापि सत्रिणः ॥ ३० ॥ तत्काल एव वरुणो यष्टुं समुपचक्रमे । तेनोपहूता विप्राद्या न ययुस्तत्र भूरिशः ॥ ३१ ॥ जनके ह्यभिसंप्रीताः पूजितास्तेन तर्पिताः । अथाजगाम वरुणदायादो बौद्धसम्पदा ॥ ३२ ॥ विप्रवेषधरो नेतुं ब्राह्मणान्कूटवर्त्मना । निवृत्त हो जाती है। उसे तटस्थरूपसे जानना तो स्वप्नज्ञानके समान है ॥ २५ उ०-२६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें खजानेको पा लेना मनुष्यके किसी काम नहीं आता, उसी प्रकार तटस्थ ज्ञान मनुष्यको मोक्षरूप मुख्य फल नहीं दे सकता ॥ २७ ॥ अब मैं तुमसे एक अति सुन्दर प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ। पूर्व- कालमें विदेह-राज्यमें जनक नामका कोई धर्मनिष्ठ और बुद्धिमान राजा था । उसे परमात्माका ज्ञान हो चुका था ॥ २८-२९ पू० ॥ उसने किसी समय उत्तम यज्ञों द्वारा अपने आत्मदेवकी आरा- धना की। उसके यज्ञोंमें अनेकों विद्वान् और तपस्वी ब्राह्मणादि पधारे। वे अनेकों कलाओंके ज्ञाता, वेदज्ञ, यजनशील और सत्रोंका अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ २९ उ०-३० ॥ उसी समय वरुणने भी यज्ञ आरम्भ किया। उसके निमन्त्रित करनेपर भी अनेकों ब्राह्मणादि, जनकसे अधिक प्रेम हो जाने और उससे पूजित तथा तृप्त होनेके कारण वहाँ नहीं गये ॥ ३१-३२ पू० ॥ तब वरुणका पुत्र अपने बुद्धिवैभवसे कूटमार्गद्वारा ब्राह्मणोंको ले जाने-
२१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आसाद्य यज्ञसदनं नृपं संयोज्य चाशिषा ॥ ३३ ॥ आक्षिपत्तत्र सभ्यांस्तु शृण्वताञ्च सभासदाम् । राजंस्ते यज्ञसदनमत्यन्तं नैव शोभते ॥ ३४ ॥ कमलाकरवत्काककङ्कवृन्दस्य सञ्चयात् । सभा विद्वत्समुदयैः क्षोमिनी शोभतेतराम् ॥ ३५ ॥ शारदं हंससंघातैः सपद्मं तु सरो यथा । तदत्र विद्याविशदं न पश्याम्येकमप्यलम् ॥ ३६ ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि नात्र मे संस्थितिर्भवेत् । कथं सभामिमां मूर्खप्रचुरां संविशाम्यहम् ॥ ३७ ॥ एवं वारुणिना प्रोक्ताः सभ्याश्चक्रुधुरञ्जसा । किमरे द्विजबन्धो ! त्वमधिक्षिपसि सर्वतः ॥ ३८ ॥ केयं तवेदृशी विद्या यया सर्वे वयं जिताः । वृथा कत्थसि दुर्बुद्धे जित्वास्मांस्त्वं गमिष्यसि ॥ ३९ ॥ के लिये ब्राह्मणका वेष धारण कर जनकके यज्ञमें आया ॥३२ उ०-३३पू०॥ उसने यज्ञशालामें आकर राजाको आशीर्वाद दे सब सभासदोंको सुनाते हुए उनपर आक्षेप किया, "राजन् ! यज्ञमण्डप तो विशेष शोभित नहीं है, जिस प्रकार कौए और कंकसमुदायके इकट्ठे हो जानेसे सरोवरकी शोभा नहीं होती ॥ ३३ उ०-३५ पू० ॥ सुन्दर सभाकी शोभा तो विद्वत्समुदायसे ही होती है, जैसे कमलोंसे युक्त शरत्कालीन सरोवर हंससमूहसे ही सुशोभित होता है ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥ सो, मुझे तो यहाँ एक भी विद्याविभूषित सदस्य दिखायी नहीं देता । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो जाता हूँ । यहाँ मेरा निर्वाह नहीं हो सकता । इस मूर्खबहुल सभामें मैं कैसे बैठ सकता हूँ ?” ॥. ३६ उ०-३७ ॥ वरुणपुत्रके इस प्रकार कहनेपर सभी सभासद स्वभावसे ही क्रोधमें भर गये [ और बोले-] "अरे ब्राह्मणाधम ! तू सभीका अपमान कैसे कर रहा है ? ॥ ३८ ॥ तुझमें ऐसी क्या विद्या है जिससे तू हम सभीको जीत सकता है। मूर्ख ! तू व्यर्थ क्यों बकवाद करता है ? अब हमें जीतकर ही जाना ॥ ३६ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः। २१३ प्रायो भूलोकसंस्थाना विद्वांसः सङ्गताः खलु । किं त्वं भूलोकमेवाद्य जेतुमिच्छसि दुर्मते ॥ ४० ॥ ब्रूहि का ते भवेद्विद्या यथाऽस्माञ्जेतुमिच्छसि । इत्युक्तवत्सु सभ्येषु वारुणिः पुनराह तान् ॥ ४१ ॥ समयेन विजेष्यामि सर्वान् वः क्षणमात्रतः । अहं जितो भवद्भिस्तु समुद्रे स्यान्निमज्जितः ॥ ४२ ॥ युष्मास्त्वहं मज्जयामि जितं जितमथापि वा । उपेत्यैवं तु समयं विवदन्तु मया सह ॥ ४३ ॥ इत्युक्त्वा सम्मतिं चक्रुः सभ्या वादाय तेन तु । विवादं चक्रुरत्यन्तं तेन वारुणिना द्विजाः ॥ ४४ ॥ जिग्ये वारुणिर्विप्रान् वितण्डाजल्पवर्त्मना । सिन्धौ निमज्जिता विप्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४५ ॥ निमज्जितास्तु ये विप्रा दूतैस्तैर्वारुणैर्हृताः । यहाँ भूमण्डलके प्रायः सभी विद्वान् एकत्रित हुए हैं। क्यो रे दुर्बुद्धि ! क्या तू अकेला ही सारे भूलोकको जीतना चाहता है ॥ ४० ॥ बोल, तेरी वह क्या विद्या है, जिससे तू हमें जीतनेकी इच्छा करता है।" सभासदोंके ऐसा कहनेपर वरुणपुत्रने उनसे कहा-॥ ४१ ॥ “मैं एक शर्त करके तुम सभीको क्षणमात्रमें जीत सकता हूँ। यदि तुमलोग मुझे जीत लो तो मुझे समुद्र में डुबो देना। नहीं तो तुममेंसे जिस-जिसको मैं परास्त करूँगा उसे डुबा दूँगा। इस शर्तको स्वीकार करो, फिर मेरे साथ विवाद कर सकते हो" ॥ ४२-४३ ॥ इस शर्तको स्वीकार कर सभी सभासदोंने उसके साथ विवाद करनेका निर्णय किया। और उन सभी ब्राह्मणोंने उस वरुणपुत्रके साथ खूब शास्त्रार्थ किया ॥ ४४ ॥ वरुणपुत्रने वितण्डा¹ और जल्प²के द्वारा सभी ब्राह्मणोंको जीत लिया। और इस प्रकार उसने सैकड़ों-हजारों ब्राह्मणोंको समुद्रमें डुबा दिया ॥४५॥ उन डुबाये हुए ब्राह्मणोंको वरुणके दूत ले जाते थे और १. अपना कोई पक्ष स्थापित न करते हुए केवल दूसरेके पक्षका खण्डन करना । २. अपने पक्षको स्थापित करते हुए दूसरेके पक्षका खण्डन करना ।
२१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
वारुणं यज्ञमासाद्य मुमुदुः पूजिता भृशम् ॥ ४६ ॥ मज्जितं पितरं श्रुत्वा कहोलं तत्सुतस्ततः । अष्टावक्रः समागत्य ज्ञानवैतण्ड्यजल्पकः ॥ ४७ ॥ विजित्य वारुणिं सिन्धावादिदेश निमज्जने । अथ प्रकाशमापन्नो वारुणिर्द्विजमुख्यान् ॥ ४८ ॥ समानयत्स्वलोकस्थानष्टावक्रेण निर्जितः । अथागतेषु विप्रेषु कहोलतनयो भृशम् ॥ ४९ ॥ विप्रान् विमोचितान् सर्वानत्यवर्त्त दर्पतः । अष्टावक्रेण विमता विप्राः खेदमुपागताः ॥ ५० ॥ तत्काल आगतां कांचित्तापसीं शरणं ययुः । तान्समाश्वास्य विप्रान् सा काषायाम्बरवासिनी ॥ ५१ ॥ जटिला नित्यतरुणी मनोहरवपुर्धरा । सभामुपैत्य प्रोवाच नृपेणाभिसुपूजिता ॥ ५२ ॥
वरुणकी यज्ञशालामें पहुँचनेपर खूब सत्कार पाकर वे बड़े प्रसन्न होते थे ॥ ४६ ॥ कहोलका पुत्र अष्टावक्र वितण्डा और जल्पमें बड़ा प्रवीण था। जब उसने अपने पिताको समुद्र में डुबाया सुना तो वहाँ आकर वरुणपुत्रको परास्त किया और उसे समुद्रमें डुबानेका आदेश दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥ अष्टावक्रसे परास्त होनेपर वरुणपुत्रने अपनेको प्रकट कर दिया और अपने लोकसे सभी द्विजश्रेष्ठोंको ले आया ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥ सब ब्राह्मणोंके आनेपर कहोलपुत्रको बड़ा अभिमान हुआ और वह वरुणके यहाँसे छुड़ाये हुए ब्राह्मणोंसे अपना बड़प्पन प्रकट करने लगा। इस प्रकार अष्टावक्रसे अपमानित होनेपर ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ ॥ ४९ उ०-५० ॥ उसी समय वहाँ एक तपस्विनी आयी। वह काषाय वस्त्र धारण, किये थी, उसके सिरपर जटाएँ थीं, योगाभ्यासके कारण नित्य तरुणा- वस्थामें रहती थी और अत्यन्त मनोहर शरीरवाली थी। राजाने उसका खूब सत्कार किया। वे सब उसकी शरणमें गये। उनको सान्त्वना दे उसने सभामें आकर कहा-॥ ५१-५२ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः । २१५ कहोलसुत वत्स त्वमत्यन्तं बुद्धिमानसि । त्वया विमोचिता विप्रा वादे निर्जित्य वारुणिम् ॥ ५३ ॥ अहं पृच्छामि किञ्चित्त्वां वद हित्वा सुकैतवम् । यत्पदं विदितं सर्वामृतत्वप्रतिपादकम् ॥ ५४ ॥ यत्पदे विदिते सर्वसन्देहः प्रलयं व्रजेत् । अविज्ञातं न किञ्चित्स्यादाशास्यं वा न किञ्चन ॥ ५५ ॥ अवेद्यं विदितं तच्चेद्वद मामुप सत्वरम् । तापस्यैवं समापृष्टः कहोलतनयोऽब्रवीत् ॥ ५६ ॥ विदितं तत्पदं भूयो वच्मि तापसि संशृणु । न मे ह्यविदितं लोके ह्यस्ति किञ्चित्कियच्चिदम् ॥ ५७ ॥ मया शास्त्राणि सर्वाणि भूयः संलुलिठतानि वै । यत्त्वं पृच्छसि तद्वक्ष्ये शृणु तापसि तत्त्वतः ॥ ५८ ॥ तद्धि सर्वजगद्धेतुरादिमध्यान्तवर्जितम् । देशकालानवच्छिन्नं शुद्धाखण्डचिदात्मकम् ॥ ५९ ॥ “कहोलपुत्र ! बेटा ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । तुमने वरुणपुत्रको विवादमें जीतकर सभी ब्राह्मणोंको छुड़ा दिया ॥ ५३ ॥ मैं तुमसे कुछ पूछती हूँ । तुम कपट त्यागकर बताओ । जो पद जान लिये जानेपर सब प्रकार की अमरता प्रदान करनेवाला है, जिस पदको जान लेनेपर सारे सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, कुछ भी जानना शेष नहीं रहता और न कोई चाहने-योग्य वस्तु ही रहती है, ऐसा जो अवेद्य पद है वह यदि तुम्हें विदित है तो शीघ्र ही मेरे सामने कहो ।” तपस्विनीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर कहोलपुत्रने कहा-॥५४-५६॥ “उस पदको मैं अच्छी तरह जानता हूँ और तपस्विनीजी ! सुनो, तुम्हें बताता हूँ । संसारमें ऐसी कोई बात नहीं है जो मैं नहीं जानता । तुम्हारे इस प्रश्नमें तो है ही क्या ? ॥ ५७ ॥ मैंने सारे ही शास्त्रोंका अनेकों बार आलोडन किया है । तुम जो कुछ पूछती हो अभी ठीक-ठीक बताये देता हूँ । तपस्विनीजी ! सुनिये ॥ ५८ ॥ तुम्हारा पूछा पद ही सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है । उसका न
२१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदुपाश्रित्य वै सर्वं जगदेतद्विराजते । आदर्शानगरप्रख्यं तदेतत्परमं पदम् ॥ ६० ॥ प्राप्नोति तद्विदित्वैव निश्चलामृतसंस्थितिम् । आदर्शे विदिते यद्वत् सन्देहः क्वचिद्भवेत् ॥ ६१ ॥ प्रतिबिम्बेष्वनन्तेषु न स्यादविदितं तथा । नाशास्यं वा भवेत्किञ्चिदेवं प्रविदिते परे ॥ ६२ ॥ तच्चाप्यवेद्यमन्यस्य वेदकादेरभावतः एवं तापसि तत्तत्त्वं शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६३ ॥ इत्यष्टावक्रवचनं श्रुत्वा सा पुनरब्रवीत् । मुनिदारक सूक्तं ते यथावत्सर्वसम्मतम् ॥ ६४ ॥ यदुक्तं वेदकाभावादवेद्यं तदिति त्वया । प्राप्नोति तद्विदित्वैव चामृतं पदमव्ययम् ॥ ६५ ॥ आदि है, न मध्य है और न अन्त है। वह देश और कालसे सीमित नहीं है तथा शुद्ध, अखण्ड और चिन्मय है ॥ ५६ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान जिसका आश्रय लेकर यह सारा जगत् विद्यमान है वही तुम्हारा पूछा हुआ परम पद है ॥ ६० ॥ जिस प्रकार दर्पणको जान लेनेपर उसमें प्रतिबिम्बित किसी भी वस्तुकी स्थितिके विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता उसी प्रकार उस पदको जान लेनेपर ही साधक अविचल अमरपद प्राप्त कर लेता है ॥६१॥ तथा जैसे [दर्पणका ज्ञान होनेपर] उसके अनन्त प्रतिबिम्बोंमें से कोई भी अज्ञात नहीं रहता उसी प्रकार उस परमपदको जान लेनेपर किसी वस्तुकी आशा (चाह) नहीं रहती ॥ ६२ ॥ अवश्य ही वह किसी अन्यके द्वारा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उसका कोई अन्य ज्ञाता है ही नहीं। तपस्विनीजी ! शास्त्र-दृष्टिसे उस तत्त्वके विषय में ऐसा निर्णय किया गया है” ॥ ६३ ॥ अष्टावक्रका ऐसा कथन सुनकर वह फिर बोली, “मुनिपुत्र ! तुम्हारा कथन बड़ा सुन्दर है। तथा वह यथार्थ और सर्वसम्मत भी है ॥ ६४ ॥ किन्तु तुमने जो कहा कि उसका कोई अन्य ज्ञाता न होनेके कारण वह पद अवेद्य है और [साथ ही यह भी कहा कि] उसे जान