वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
१. अध्याय १-२: वैदिक शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि, लक्ष्य एवं आचार्य-शिष्य सम्बन्ध
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xxii २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के समाजदर्शन का अनुशीलन। २७० ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के राजदर्शन का अनुशीलन। २७४ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २७५ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २७६ ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् का प्रदेय। २७९ अष्टम अध्याय - गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन :- २८१ १. गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २८१ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के समाजदर्शन का अनुशीलन। २८३ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के राजदर्शन का अनुशीलन। २८७ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २८८ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २९० ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र का प्रदेय। २९२ चतुर्थ खण्ड - तुलनात्मक परिशीलन नवम अध्याय - राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारों का अनुशीलन :- २९५ १ प्राचीन वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में विचार। २९५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xxiii २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में आधुनिक विचारधारा। २९७ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन एवं आधुनिक विचारधारा की तुलना। ३०० ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बाधक एवं साधक तत्त्व। ३०३ ५. वैदिक वाङ्मय में निरूपित राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का वर्तमान राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के लिए योगदान। ३०७ दशम अध्याय - उपसंहार ३११ सहायक ग्रन्थसूची ३१७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम खण्ड – परिप्रेक्ष्य प्रथम अध्याय राष्ट्र की संकल्पना राष्ट्र का स्वरूप एवम् प्रकृति वैदिक काल में 'राष्ट्र' शब्द देश या राज्य के लिए प्रयुक्त किया जाता था।¹ ऋग्वेद में स्वराज्य का उल्लेख भी मिलता है। राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति राज् धातु से ष्ट्रन प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका सामान्य अर्थ है— राज्य, देश, साम्राज्य। राष्ट्र शब्द बहुत ही व्यापक अर्थ रखता है, इसमें निश्चित भू-भाग पर निवास करने वाली समस्त प्रजा की भावनाओं और विचारों की प्रतीक संस्कृति और सभ्यता सम्मिलित होती है। किसी देश की सभी इकाईयों की समष्टि ही राष्ट्र का वास्तविक स्वरूप है किन्तु राष्ट्र के स्वरूप को स्पष्ट करने हेतु कुछ व्यापक तथा अनिवार्य तत्त्व भी होते हैं, जिसमें धर्म, संस्कृति, भाषा, जनता, राजनैतिक विचार आदि प्रमुख हैं। राष्ट्र का प्राकृतिक स्वरूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना सामाजिक। विश्व के प्राचीनतम साहित्यों में राष्ट्र या देश के प्रति सुन्दर उद्गारों की अभिव्यक्ति की झलक यत्र-तत्र स्पष्ट दिखाई पड़ती है। राष्ट्र शब्द एक सुनिर्दिष्ट अर्थ और भावना का प्रतीक है जिस प्रकार यजुर्वेद में राष्ट्र के कल्याण की कामना कितने सुन्दर शब्दों में की गयी है— आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्।² अर्थात् हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय, वीर, धनुर्धारी, लक्ष्यवेधी और महारथी हो। अभिवर्धताम् पयसाभि राष्ट्रेण वर्धताम्।³ अथर्ववेद में भी 'राष्ट्र' के धन-धान्य, दुग्धादि से संवर्धन प्राप्ति की कामना की गयी है :— 'राष्ट्र' से सम्बन्धित शब्दों का प्रयोग वैदिक साहित्य में अत्यधिक किया गया
- ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त, २७३, ऋचा ५ और म० ४, सू० ४२, ऋ० १ तथा मं० ५, सू० ६६, ऋ० ६।
- यजुर्वेद - अध्याय २८/२२
- अथर्ववेद - अध्याय ६/७८/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 2 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता है। जैसे साम्राज्य, स्वराज्य, राज्य, महाराज्य आदि। इन सबमें 'राष्ट्र' शब्द ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। 'राष्ट्र' शब्द से आशय उस भूखंड विशेष से है जहाँ के निवासी एक संस्कृति विशेष में आबद्ध होते हैं। एक सुसमृद्ध राष्ट्र के लिए उसका स्वरूप निश्चित होना आवश्यक है। कोई भी देश एक राष्ट्र तभी हो सकता है जब उसमें देशेतरवासियों को भी आत्मसात् करने की शक्ति हो। उनकी अपनी जनसंख्या, भू-भाग, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता तथा राष्ट्रीय एकता आदि समस्त तत्त्व हों, जिसकी समस्त प्रजा अपने राष्ट्र के प्रति आस्थावान हो। वह चाहे किसी भी धर्म, जाति तथा प्रान्त का हो। प्रान्तीयता और धर्म संकुचित होते हुए भी राष्ट्र की उन्नति में बाधक नहीं होते हैं क्योंकि राष्ट्रीय एकता 'राष्ट्र' का महत्त्वपूर्ण आधारतत्त्व है, जो नागरिकों में प्रेम, सहयोग, धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बन्धुत्व आदि गुणों का विकास करता है तथा धर्म तथा प्रान्तीयता गौण हो जाती है। तब राष्ट्र ही सर्वोपरि होता है। इन गुणों के विकास से ही राष्ट्र स्वस्थ तथा शक्तिशाली होता है। राष्ट्र नागरिकों पर अनिवार्य रूप से कर लगाता है जिसे राष्ट्र की व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित कर सके। इस प्रकार 'राष्ट्र' प्रभुत्त्व-सम्पन्न स्वाधीन तथा स्वतन्त्र संगठन है जिसका स्वरूप आध्यात्मिक भावना तथा राष्ट्रीय एकता पर निर्भर रहता है, जो अमूर्त होता है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है। राष्ट्र का प्राकृतिक स्वरूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना सामाजिक। राष्ट्र को सुसम्पन्न तथा गौरवपूर्ण होने के लिए उसकी प्राकृतिक-सम्पदाएँ भी अपनी पूर्णता को प्राप्त होनी चाहिए, जिससे राष्ट्र निवासी अपना भरण-पोषण स्वयं कर सकें तथा अपने राष्ट्र पर बोझ न बनने पाएँ। जिस प्रकार पर्वतराज हिमालय हमारे राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर सैकड़ों ऋषि-मुनि निरन्तर साधना करते रहते हैं और उस पर उगने वाली असंख्य जड़ी-बूटियाँ भयानक से भयानक रोगों को दूर करने में सक्षम हैं। जो उत्तर दिशा में मुकुट के समान देदीप्यमान है। महाकवि कालिदास ने हिमालय का वर्णन कितने सुन्दर शब्दों में किया है- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोय निधीवगाह्य- स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥१ १. महाकवि कालिदास CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 3 ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, सिन्धु आदि महानदियाँ इसी हिमालय से निकलती हैं जो भारत-भू को हरा-भरा तथा उपजाऊ बनाती हैं। इसकी प्राकृतिक शोभा अनुपम है जिसका वर्णन करते हुए सैकड़ों महाकवियों ने प्रकृति-परक रचनाएँ लिखी हैं। स्वराष्ट्र भारत का मौसम भी सर्वानुकूल है। यहाँ पर वर्ष भर में छः ऋतुएँ आती हैं। जिनका क्रम बहुत ही सुन्दर है तथा प्राणियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त उपयुक्त है। सर्वप्रमुख वसन्त ऋतु है जिसमें चित्र-विचित्र रंगों वाले सुगन्धित पुष्प खिल जाते हैं, कोयल पंचम स्वर में गाने लगती है। यह वसन्त ऋतु अन्य किसी देश में नहीं होती। इस वसन्त ऋतु में समस्त विशेषताओं को एकत्र देखकर ही भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में वसन्त को अपना स्वरूप बताया है— बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥१ इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अपने ऋतु संहार में वसन्त ऋतु का कितना सटीक वर्णन किया है जिसका एक अनुपम उदाहरण यह है— द्रुमा सपुष्पाः सलिलं सपद्मम् स्त्रियः सकामाः पवनः सुगन्धिः। सुखा प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः सर्वप्रिये चारुतरं बसन्ते॥२ अर्थात् वसन्त ऋतु में वृक्ष पुष्पों से युक्त हो जाते हैं, जल में कमल खिल जाते हैं, स्त्रियाँ कामभाव से युक्त हो जाती हैं तथा पवन सुगन्धित हो जाता है। सन्ध्या काल सुखदायक तथा दिन रमणीय हो जाते हैं। इस प्रकार प्रिय वसन्त ऋतु में सब कुछ चारुतर हो जाता है। यहाँ का साहित्य, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेदादि संसार के प्राचीनतम साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान है जो पाठक के हृदय में ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करता है जो राष्ट्रीय एकता तथा विश्व-बन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत हो। अधोलिखित उदाहरण भारत की विश्व बन्धुत्व की भावना का सार्थक उदाहरण है— विश्वबन्धुत्वमुद्घोषयत्पावनं विश्ववन्द्यैश्चरित्रैर्जगत्पावयत्। १. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १०/३५ २. महाकवि कालिदास का ऋतुसंहार। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 4 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता विश्वमेकं कुटुम्बं समालोकयद् भूतले भाति मेऽनारतं भारतम्॥१ अर्थात् पवित्र विश्वबन्धुत्व-भावना की उद्घोषणा करने वाला, विश्ववन्द्य चरित्रों से जगत् को पवित्र करने वाला और सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखने वाला मेरा भारत भूतल पर सदा प्रोद्भासित रहता है। इस प्रकार भारत में जनसंख्या, भौगोलिकता, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता आदि समस्त तत्त्व हैं जो किसी भी राष्ट्र की आन्तरिक शक्ति होते हैं और यही आन्तरिक शक्ति राष्ट्रीय एकता का आधार है जो राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है। अतः राष्ट्र के प्रति विशिष्ट आत्मीयता व गौरव की भावना से युक्त व्यक्तियों का समुदाय ही राष्ट्र कहलाता है जिसका सार्थक उदाहरण है- भारत। राष्ट्र की विषयवस्तु एवं क्षेत्र राष्ट्र की रचना के लिए जनसमूह अर्थात् जनसंख्या का होना अति-आवश्यक है। जनसमूह के पश्चात् उसमें एकता, सहायता और सहयोग की भावना राष्ट्र का प्राणतत्त्व है क्योंकि एक राष्ट्र के संगठन के लिए सदस्यों में एकता, सहायता तथा सहयोग की भावना अति आवश्यक है, उसके अभाव में राष्ट्र का संगठन ही असम्भव है। रेम्जेम्यूर ने राष्ट्र के स्वरूप को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है— "अस्थायी तौर पर हम कह सकते है कि राष्ट्र वह जन-समुदाय है जिसके सदस्य अपने को स्वाभाविक रूप से एकता के कुछ ऐसे सूत्रों में बँधा हुआ अनुभव करते हैं जो इतने दृढ़ और वास्तविक होते हैं कि उनके कारण वे प्रसन्नतापूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं, पृथक् हो जाने पर दुःखी होते हैं और ऐसे लोगों की अधीनता सहन नहीं कर सकते जो उन बन्धनों के अन्तर्गत नहीं है।''२ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्र के संगठन हेतु किन्हीं निश्चित तत्त्वों की आवश्यकता नहीं। समान जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, भूभाग की अपेक्षा उनमें साथ-साथ रहने की इच्छा तथा एकता की भावना होना अति आवश्यक है। अतः 'राष्ट्र' एक कल्पना है जिस कल्पना का आधार होता है— मानवीय एकता। 'राष्ट्र' वह भावना है जो एकत्व की ओर प्रेरित करती है। राष्ट्र के लिए जनसंख्या, भू-भाग, सरकार, प्रभुसत्ता आवश्यक नहीं, उसके लिए आवश्यक है मिट्टी से प्यार। १. भातिमे भारतम् – शुक्ल, रमाकान्त। २. आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, लेखक सत्यनारायण दुबे, पृ० ३३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 5 "जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।''१ आध्यात्मिक संगठन ही राष्ट्र का स्वरूप राष्ट्रीय भावनाओं का सम्बन्ध मुख्यतः मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक तथ्यों से है। राष्ट्रीयता की भावना को जगाने वाले मूल तत्त्व आवश्यक रूप से अमूर्त होते हैं। गिलक्राइस्ट ने भी राष्ट्र के प्राणतत्व राष्ट्रीयता को एक भाव ही माना है। गिलक्राइस्ट के अनुसार— "राष्ट्रीयता एक भावना है, जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में होती है, जो साधारणतः एक जाति के होते हैं, जो एक भू-भाग पर रहते हैं, जिनकी एक भाषा, एक धर्म, एक साहित्य, एक-सी परम्पराएँ एवं समान हित होते हैं तथा जिनके एक से राजनीतिक समुदाय तथा राजनीतिक एकता के समान आदर्श तथा आंकाक्षाएँ होती हैं, जिन पर राष्ट्रीयता आधारित होती है। यह सब राष्ट्रीयता के आधार हैं, स्वयं राष्ट्रीयता नहीं। राष्ट्र भावनात्मक शक्ति पर निर्भर राष्ट्र की शक्ति आन्तरिक रूप से भावनात्मक होती है जिसका सम्बन्ध नैतिकता से है। इस प्रकार राष्ट्र की मूल शक्ति नैतिकता ही है। राष्ट्र जब सदस्यों से कोई कार्य करवाना चाहता है तब वह ऐसे वातावरण का निर्माण करता है जिससे लोगों के मन में स्वतः ही उस कार्य को करने की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार वह प्रार्थना करता है परन्तु आज्ञा नहीं देता। अतः राष्ट्र की शक्ति प्रजा की स्वैच्छिक नैतिक शक्ति है। राष्ट्र निर्माणक तत्त्व अनिश्चित राष्ट्र को निर्मित करने के लिए कोई निश्चित तत्त्व नहीं है क्योंकि उनमें सदैव समयानुसार परिवर्तन होता रहता है। जिस प्रकार राज्य के चार निर्माणक तत्त्व निश्चित है— जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता। जहाँ ये चारों संयुक्त हो जाते हैं वहीं राज्य का निर्माण हो जाता है। वैसे राष्ट्र के कोई निश्चित निर्माणक तत्त्व नहीं है। इस प्रकार राष्ट्र के मूलतः कोई निश्चित तत्त्व नहीं है क्योंकि राष्ट्र का स्वरूप अमूर्त होता है जिसकी संरचना को अनुभव के आधार पर समझा जा सकता है, देखा नहीं जा सकता। राष्ट्र के निर्माणक तत्त्व राष्ट्र के निर्माणक तत्त्व मुख्यतः अनिश्चित है, तत्त्वों की अनिश्चितता होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण हेतु अधोलिखित तत्त्वों की आवश्यकता पड़ती है। १. राष्ट्रकवि मैथिलीशरणगुप्त की कविता से उद्धृत। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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6 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. जनसंख्या २. भौगोलिकता ३. भाषा ४. धर्म ५. शासन व्यवस्था ६. सभ्यता और संस्कृति ७. साहित्य ८. राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना ९. स्वाधीनता और स्वतन्त्रता १. जनसंख्या जनसंख्या राष्ट्र का मुख्य तत्त्व है। जब तक राष्ट्र में पर्याप्त जनसंख्या नहीं होगी तब तक राष्ट्र को संगठित नहीं किया जा सकता क्योंकि राष्ट्र का प्राणतत्त्व है— राष्ट्रीय भावना, जो कि लोगों के परस्पर मिलजुल कर एक साथ रहने से तथा विचारों के आदान-प्रदान, प्रेम सहयोग की भावना, सभ्यता और संस्कृति आदि के द्वारा पल्लवित तथा पुष्पित होती है। यह तभी सम्भव है जब जनसंख्या का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, शान्तिमय जीवन तथा जीओ तथा जीने दो की भावना से ओत-प्रोत हो। अतः राष्ट्र की उन्नति हेतु यह भी आवश्यक है। राष्ट्र की जनसंख्या न तो इतनी कम हो कि शासन-व्यवस्था सुचारू रूप से कार्य न कर सके और न ही इतनी अधिक कि राष्ट्र पर बोझ बन जाये अर्थात् उसे पराश्रयी होना पड़े। २. भौगोलिकता राष्ट्र की आध्यात्मिकता की भावना को दृढ़ता प्रदान करने में भौगोलिकता का अपना विशेष महत्त्व है क्योंकि भौगोलिकता ही मनुष्य को एकत्व की शिक्षा प्रदान करती है। एक भू-भाग पर बसा हुआ जन-समूह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय एकता के दृढ़-बन्धन में बँध जाता है क्योंकि उसकी समान जाति, भाषा, धर्म, परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, आचार-विचार तथा भाव आदि समान होने के कारण उनसे प्रेरित होकर ही वह दूसरे के दुःख में अपना दुःख तथा दूसरों के सुख में अपना सुख समझता है। यही प्रेम, परस्पर सहयोग की भावना ही उसे राष्ट्रीयता से जोड़ती है जो निश्चित भू-भाग पर रहने के लिए बाध्य करती है तथा राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता रूपी निधि को सुरक्षा प्रदान करती है।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 7 ३. भाषा प्रत्येक राष्ट्र के संगठन हेतु भाषा का होना अति आवश्यक है क्योंकि भाषा रहित राष्ट्र गूँगे व्यक्ति के समान होता है जिसकी अपनी कोई भाषा, शैली, भाव तथा विचार नहीं होते। अतः राष्ट्र को सुसंगठित करने हेतु राष्ट्र की एक राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए जो सम्पूर्ण राष्ट्र में बोली जाए तथा जिसके माध्यम से ही राष्ट्रीय स्तर पर समस्त कार्य किये जाएँ तथा राष्ट्र अपनी शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित कर सके। भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा ही हम अपने भावों, विचारों तथा अनुभवों को व्यक्त कर सकते हैं तथा दूसरों के भावों, विचारों तथा अनुभवों को समझ सकते हैं। भाषा के माध्यम से ही मानव जाति ने न केवल समाज के रूप में अपितु, राष्ट्र रूप में स्वयं को गुम्फित कर लिया है। इस प्रकार राष्ट्र संगठन तथा राष्ट्रीयता को दृढ़ता प्रदान करने में भाषा अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ४. धर्म मनुष्य स्वेच्छा से जो कुछ धारण करता है वही धर्म है और धर्म का राष्ट्र के संगठन में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि धर्म ही मनुष्य को मानवता से जोड़ता है और मानवता मनुष्यता से। जब मनुष्य के मन में सुखी जीवों को अधिक सुखी और दुःखी जीवों को सुखी बनाने का भाव जाग्रत होता है, तब उसके द्वारा किये गये प्रत्येक कल्याणकारी कार्य उसका धर्म होते हैं। यही धर्म उसे राष्ट्र की भावनात्मक शक्ति राष्ट्रीयता से जोड़ता है जो राष्ट्र को सुसंगठित करता है। ५. शासन-व्यवस्था सुसंगठित राष्ट्र के संचालन हेतु शासन-व्यवस्था की आवश्यकता होती है जिसके अभाव में राष्ट्र में अराजकता, वैमनस्य आदि व्याप्त हो जाते हैं जिससे सब अपनी मनमानी करने लगते हैं। "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है। अतः समस्त मानव जाति तथा राष्ट्र उन्नति के मूल उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही शासन-व्यवस्था की महती आवश्यकता पड़ती है, जिससे राष्ट्र का गौरव तथा उसकी स्वतन्त्रता सदैव बनी रहती है। शासन व्यवस्था से तात्पर्य यहाँ केवल राजनैतिक व्यवस्था से ही नहीं है, अपितु सामाजिक, आर्थिक, नैतिक आदि उसमें सभी सम्मिलित हैं। इस प्रकार सरकार शासन-व्यवस्था को संचालित करने का माध्यम है और जिसका संचालक है राष्ट्र। ६. सभ्यता और संस्कृति सभ्यता और संस्कृति राष्ट्र गठन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 8 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता भी राष्ट्र की पहचान उसकी सभ्यता तथा संस्कृति ही होती है जिसके द्वारा ही वह अन्य राष्ट्रों के समक्ष अपनी पहचान बनाये रखता है। सभ्यता और संस्कृति ही मनुष्य को आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक तथ्यों से सम्बद्ध करती है और राष्ट्रीयता की भावना को साकार करती है। सभ्यता और संस्कृति के माध्यम से ही मानव-समाज विचारों की संकीर्णता को त्यागकर विस्तृतता को प्राप्त होता है जिससे मानव का स्वयं का, समाज का तथा राष्ट्र का कल्याण होता है। इस प्रकार संस्कृति ही धार्मिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा विश्वबन्धुत्व की भावना को प्रवाहित करने वाली नदी है जिसका उद्गम स्थान है- राष्ट्र। ७. साहित्य साहित्य भी राष्ट्र संगठन को अत्यधिक प्रभावित करता है। साहित्य के द्वारा ही व्यक्ति स्वयं को समाज में समायोजित करने योग्य बनाता है। समाज में समायोजित व्यक्ति ही अपना, अपने परिवार का, नगर का, देश तथा समाज का कल्याण कर सकता है। इस प्रकार साहित्य व्यक्ति पर, समाज पर तथा राष्ट्र पर अपना विशेष प्रभाव डालता है जिससे राष्ट्र की आन्तरिक भावनात्मक शक्ति को तथा राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है। साहित्य के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी सभ्यता, संस्कृति, धर्म, भाषा, आचार-विचार आदि से स्वयं की पहचान बनाते हैं और सभ्यता, संस्कृति, धर्म, भाषा आदि से जोड़कर स्वयं को तथा राष्ट्र को गौरवान्वित करते हैं। राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का प्राणतत्त्व है जिसके अभाव में राष्ट्र का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। राष्ट्रीय एकता मूलतः वह भावना है जो प्रत्येक जन के हृदय में विद्यमान रहती है, जिससे प्रेरित होकर ही वह एकता के सूत्र में बँध जाते हैं और राष्ट्र के उत्थान हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। जे०एच० रोज़ के शब्दों में— "राष्ट्रीयता हृदयों की वह एकता है जो एक बार बनकर कभी नहीं बिगड़ती।"१ उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट ही है जब प्रत्येक जन हृदय से एकता के सूत्र में बँध जाता है, तो वह मन, वचन, कर्म से स्वतः ही एकता के अटूट बन्धन में बँध जायेगा, तब उसका प्रत्येक कार्य बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय तथा निःस्वार्थ भाव लिये अवश्य ही कल्याणकारी होगा, जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र सुगन्धित हो उठेगा। जिसका प्रत्येक जनरूपी विकसित पुष्प प्रफुल्लित हो, वह राष्ट्ररूपी उपवन को ही सर्वोपरि समझेगा और अपने उपवन की सुगन्ध को किसी को चुराने नहीं देगा। १. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० सं० ४०६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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प्रथम अध्याय 9 इस प्रकार राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना राष्ट्र रूपी आत्मा के दो अलग-अलग नाम हैं जिनके अभाव में राष्ट्र संगठन कदापि सम्भव नहीं। स्वाधीनता और स्वतन्त्रता स्वाधीनता और स्वतन्त्रता ही प्रत्येक राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से भिन्न करती है। जब तक राष्ट्र स्वाधीन और स्वतन्त्र नहीं होगा तब तक वह राष्ट्र ही नहीं कहला सकता। राष्ट्रीय स्वाधीनता और स्वतन्त्रता से तात्पर्य है— राष्ट्र का आत्मनिर्भर होना अर्थात् अपने आन्तरिक, बाह्य कार्य में पूर्ण स्वतन्त्र तथा शासन-व्यवस्था में किसी अन्य राष्ट्र का हस्तक्षेप न होना, स्वतन्त्रता जिसकी परिचायक है। स्वाधीनता और स्वतन्त्रता राष्ट्र निधि के ऐसे बहुमूल्य रत्न है जो नागरिकों में प्रेम, सहयोग, अनुशासन, धर्म, निष्ठा, कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बन्धुत्व आदि गुणों को विकसित कर राष्ट्र को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाते हैं। स्वाधीनता और स्वतन्त्रता के अभाव में राष्ट्र की स्थिति एक दास के समान होती है जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती। इस प्रकार राष्ट्र के संगठन में स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार राष्ट्र का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत तथा व्यापक है जो मुख्यतः अपने नागरिकों की बाह्य आक्रमणों से रक्षा करता है तथा उनके आत्मिक, मानसिक तथा शारीरिक विकास हेतु अवसर प्रदान करता है। विधि, सुरक्षा विभाग तथा न्यायालयों के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र में शासन-व्यवस्था बनाये रखता है क्योंकि देश में व्याप्त अशान्ति ही राष्ट्र उन्नति में बाधक होती है और सुरक्षा उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। राष्ट्र द्वारा प्रदत्त सुरक्षा ही नागरिकों का नैतिक एवं मानसिक स्तर ऊँचा उठाती है तथा उन्हें सभ्यता और संस्कृति की ओर उन्मुख करती है। राष्ट्र ही प्रत्येक नागरिक के अधिकार और कर्तव्य निश्चित करता है और अधिकार मनुष्य को वास्तविक रूप प्रदान करते हैं। राष्ट्र किसी भी नगर तथा प्रान्त को असामयिक, प्राकृतिक प्रकोप के आ जाने पर प्रत्येक दृष्टि से सहायता प्रदान करने हेतु सदैव तत्पर रहता है। सार्वजनिक वाचनालय, पुस्तकालय, चित्रशाला, पार्क, चलचित्र, प्रदर्शनी, मेले आदि साधनों के द्वारा राष्ट्र समस्त जनता का मनोरंजन कराता है जो मनोरंजन के साथ-साथ प्रेम-सौहार्द की भावना को विकसित करते हैं। राष्ट्र व्यापार, सहयोग के लिए दूसरे राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करता है जिससे विश्व-बन्धुत्व की भावना पल्लवित तथा पुष्पित होती है। इस प्रकार राष्ट्र का उद्देश्य होता है अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना तथा समस्त देशवासियों को शिक्षित कर उनका सर्वतोमुखी विकास करना।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 10 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता इस प्रकार राष्ट्र की विषय-वस्तु एवं क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत तथा व्यापक है जिसे व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। राष्ट्र के विषय में भारतीय और पाश्चात्य अवधारणाएँ राष्ट्र के विषय में विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार भिन्न-भिन्न रूप में प्रस्तुत किये हैं। वैदिक काल से लेकर आज तक राष्ट्र को अपने-अपने मतानुसार परिभाषित किया जाता रहा है तथा उसके स्वरूप को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता रहा है, जिनमें से कुछ प्रमुख विचार यहाँ प्रस्तुत हैं। दाते तथा आपटे के शब्दकोष के अनुसार- राष्ट्र को विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त किया है। इस शब्द के विविध अर्थ है- देश, राज्य, मंडल, प्रांत, धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आत्मीयता से पूर्ण जनसमुदाय, अनेक लोग, राज कारोबार आदि।¹ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि इन्होंने राष्ट्र को विविध अर्थों में प्रयुक्त करते हुए उसके प्राणतत्त्व, आत्मीयता से पूर्ण जनसमुदाय को ही 'राष्ट्र' की संज्ञा दी है। प्राचीन संस्कृत काव्य के अनुसार- 'राष्ट्र' शब्द का उल्लेख निम्नलिखित वाक्यों में प्राप्त होता है- "पृथिव्यै समुद्रपर्यन्तया एक राष्ट्र" और "पशुधन हिरण्य सम्पदा च राजते शोभते इति राष्ट्रम्।"² अर्थात् पशु-धन-धान्य आदि सम्पदाओं से सुशोभित भू-भाग ही राष्ट्र है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार- शतपथ ब्राह्मण में राष्ट्र शब्द की व्याख्या इस रूप में मिलती है- "श्री वैराष्ट्रम्"³ अर्थात् समृद्धियुक्त ओजस्वी जनसमूह ही राष्ट्र है। अथर्ववेद में राष्ट्र के स्वरूप को कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया गया है। "राष्ट्र के सभी निवासी राष्ट्र के निज बनकर रहे अर्थात् राष्ट्र का हित अपना हित समझे और राष्ट्र का अहित अपना अहित समझें- सच्ची राष्ट्रीय भावना से परिचालित हो, संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि महत्ता प्रदान करे। साथ ही यह भी प्रार्थना की गयी है कि शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाली सचेत देव सेना के सहयोग में हम (प्रजाजन) अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं। शत्रु के उन्मूलन में समस्त राष्ट्रवासियों का योग अपेक्षित है। माता भूमिः, पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थात् मेरी माता भूमि है और मैं मातृभूमि का १. (अ) दाते- महाराष्ट्र शब्द-कोष, पृ० २६६२ (ब) आपटे- संस्कृत इंग्लिश डिक्शनरी, पृ० ८०२ २. डा० सुधाकर शंकर कलवडे की आधुनिक हिन्दी कविता में राष्ट्रीय भावना, पृ० १७ ३. शतपथ ब्राह्मण, पृ० ६-७-३-६। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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प्रथम अध्याय 11 पुत्र हूँ— राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्र के सच्चे अभ्युदय में यथाशक्ति योग दे।१ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि राष्ट्र का हित ही अपना हित है। इस भावना से ओत-प्रोत होकर प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र के अभ्युदय में अपना यथाशक्ति योग दे। डा० सिन्हा ने राष्ट्र की उत्पत्ति किस प्रकार होती है तथा राष्ट्र के उत्पत्तिकाल को अपने शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है। डा० सिन्हा के अनुसार— “जब आर्यजन (कबीले) निश्चित भू-भाग पर रहने लगे तो उन्हें उस भूमि से अवश्य ही प्रेम उत्पन्न हुआ होगा, उस प्रेम के साथ उनमें आदिवासियों के प्रति घृणा और अपने वर्ण (रंग) तथा विजित प्रदेश के रक्षण के लिए गहरी चिन्ता उत्पन्न हुई होगी। इस प्रकार आर्यों के मन में उसी भूमि के प्रति, जहाँ के वे निवासी थे, एक सुदृढ़ भावना पैदा हुई होगी क्योंकि उस भूमि से वह कभी हटना नहीं चाह सकते थे। इस भावना ने, जिसे प्रतिरक्षा व आक्रमण की आवश्यकता ने अधिक सुदृढ़ बनाया होगा, प्रारम्भिक राजनीतिक चेतना का रूप धारण किया होगा और इस प्रकार प्रथम राज्य, जिसे वैदिक आर्यों ने राष्ट्र कहा, उत्पन्न हुआ होगा।”२ डा० सुधीन्द्र के शब्दों में- भूमि, भूमिवासी जन और जन संस्कृति का समुच्चय 'राष्ट्र' है और 'राष्ट्र' के उत्थान और प्रगति के संयोजक तत्त्वों का समीकरण- राष्ट्र धर्म है।३ डा० सुधीन्द्र महोदय भूमि, उस पर निवास करने वाले समस्त जनसमूह तथा संस्कृति के समुच्चय को ही राष्ट्र मानते हैं तथा राष्ट्रधर्म को राष्ट्र की उन्नति का सर्वोत्तम कारण। प्रोफेसर बर्गेस के अनुसार— राष्ट्र जातीय एकता के सूत्र में बँधी हुई वह जनता है जो किसी अखण्ड भौगोलिक प्रदेश पर निवास करती हो।४ उपर्युक्त परिभाषा में जातीय आधार को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। जातीय एकता से अभिप्राय केवल जाति विशेष से नहीं हैं अपितु ऐसे समस्त समान जन समूह से है जिसकी भाषा, साहित्य, परम्परा, इतिहास तथा रीतिरिवाज आदि सभी समान हो। ब्राइस ने 'राष्ट्र' को इस प्रकार परिभाषित किया है। राष्ट्र वह राष्ट्रीयता है जिसने १. परमात्मा शरण की प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थायें, पृ० ५३५ २. H.N.Sinha : The Development of Indian Polity, P. 23. ३. डा० सुधीन्द्र— हिन्दी कविता में युगान्तर, पृ० ३६. ४. आर०सी० अग्रवाल की भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० सं० २
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 12 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अपने आप को स्वतन्त्र अथवा स्वतन्त्रता होने की इच्छा रखने वाली राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित कर लिया हो।१ ब्राइस की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एक राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित स्वतन्त्र एवं स्वतन्त्रता की इच्छा रखने वाला जन-समूह है। उनकी परिभाषा से सिद्ध होता है कि उन्होंने स्वतन्त्रता को अत्यधिक महत्त्व दिया है। गिलक्राइस्ट के अनुसार- राष्ट्र अर्थ की दृष्टि से राज्य के बहुत समीप है। वे कहते है कि राष्ट्रीयता तथा राज्य को मिलाकर राष्ट्र बन जाता है।२ गिलक्राइस्ट जी राष्ट्र को राज्य के अत्यन्त समीप बताते है तथा एक-दूसरे को एक-दूसरे का पूरक मानते है। उनके अनुसार किसी एक के अथवा राष्ट्रीयता और राज्य के अभाव में राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता। अतः राष्ट्र के लिए राष्ट्रीयता तथा राज्य दोनों का होना महती आवश्यक है। हैज के अनुसार- राष्ट्रीयता, राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता को प्राप्त करके राष्ट्र बन जाता है।३ श्री हैज के इन शब्दों का अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीयता, राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता के अभाव में राष्ट्र के स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती है। रैम्जेभ्योर के अनुसार- राष्ट्र एक ऐसा समूह होता है जिसके सदस्य स्वभावतः आपस में कई प्रकार की समानताओं से बँधे होते हैं। ये समानताएँ इतनी सुदृढ़ और वास्तविक होती है कि वे प्रसन्नता के साथ रह सकते हैं और यदि उन्हें अलग-अलग कर दिया जाये, तो वे असन्तुष्ट रहेंगे, साथ ही ऐसे व्यक्तियों के अधीन रहना नहीं चाहते, जो कि उस जन समूह से उन समानताओं द्वारा न बँधे हुए हो।४ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो स्वभाव से अर्थात् अन्तर्मन से ऐसे बन्धन में बँधे होते हैं जिसे देखा नहीं जा सकता अर्थात् अनुभव किया जा सकता है। वहीं बन्धन उनकी एकता अर्थात् राष्ट्रीयता कहलाता है और जिसके अभाव में वह डाल से टूटे हुए मुरझे हुए पुष्प के समान स्वयं को अनुभव करते हैं। डा० गार्नर के शब्दों में- राष्ट्र पारस्परिक समानता रखने वाले व्यक्तियों का १. आर०सी० अग्रवाल की भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० सं. ३ २. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ ३. उपर्युक्त पृ० सं. ३ ४. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 13 एक संगठित समूह है, उन व्यक्तियों का जो अपनी पारस्परिक समानता के प्रति सजग होते हैं।१ गार्नर महोदय की परिभाषा इस ओर संकेत करती है कि राष्ट्र उन व्यक्तियों का समूह कहलाता है जिनमें पारस्परिक समानता होती है, जिसके प्रति वे सदैव सजग रहते हैं। साम्यवादी विचारक स्तालिन के अनुसार– राष्ट्र ऐतिहासिक प्रक्रिया से निर्मित वह स्थायी जनसमुदाय है जिसका निर्माण समान भाषा, भूमि, आर्थिक जीवन और समान संस्कृति के रूप में अभिव्यक्त एक से मानसिक गठन के आधार पर हुआ हो।२ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि राष्ट्र अपने मूल निर्माणक तत्त्वों जैसे समान भाषा, भूमि, आर्थिक स्तर, संस्कृति पर मूलतः निर्भर होता है जिनका आधार है समस्त जनसमुदाय का समान मानसिक संगठन तथा देश के प्रति सच्ची भक्ति। प्रादियर फोदरे के अनुसार– जिन-जिन तत्त्वों के सयुंक्त रूप से 'राष्ट्र' शब्द का बोध होता है, वे हैं– प्रजाति, भाषा, रीति-रिवाज तथा धर्म।'३ फ्रांस के लेखक प्रादियर फोदरे ने राष्ट्र को इन चारों– प्रजाति, भाषा, रीतिरिवाज तथा धर्म के संयुक्त को 'राष्ट्र' शब्द से अभिहित किया है। यहाँ पर इन्होंने इन चारों के व्यापक रूप को प्रस्तुत किया जैसे प्रजाति से तात्पर्य उनका समस्त मानव जाति से है न कि किसी जाति विशेष से। इसी प्रकार भाषा से तात्पर्य उनका राष्ट्रभाषा से है। रीति-रिवाज से संस्कृति विशेष से है जो राष्ट्र के गौरव की कथा कहती है, जो प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ती है। इसी प्रकार धर्म से तात्पर्य यहाँ मानव धर्म से है न कि हिन्दू या मुस्लिम धर्म विशेष से। हॉलैड रोज के अनुसार– राजनीतिक दृष्टि से संगठित जनता को ही राष्ट्र कहते हैं। रोज के अनुसार राजनैतिक दृष्टि से जब राष्ट्र के समस्त तत्त्व होते हैं और राजनैतिक दृष्टि से शासन व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहती है वही सुसंगठित जनता अर्थात् समाज ही राष्ट्र कहलाने लगता है। नेविको के अनुसार– राष्ट्र एक सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता है और वह सामाजिक विकास का सर्वोत्कृष्ट उत्पादन होता है।४ १. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ २. सत्यनारायण दुबे की आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, पृ० ३३१ ३. डा० आर०पी० साहनी की राजनीति शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० १५९ ४. डा० इकबाल नारायण की राजनीति शास्त्र के मूल सिद्धान्त, पृ० ८० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 14 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ब्लुंशली के मतानुसार- राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो विशेषतः भाषा और प्रथाओं द्वारा परस्पर एक-सी सभ्यता में आबद्ध होता है और जिसके कारण उसमें एकता तथा सब विदेशियों से पृथकता का भाव उत्पन्न हो जाता है।१ ब्लुंशली जी ऐसे व्यक्तियों के समूह को राष्ट्र कहते है जिनकी विशेष रूप से भाषा, प्रथा, सभ्यता एक हो तथा वह सब एकता के सूत्र मे गुँथे होने के साथ- साथ विदेशियों से पृथक् उनकी अपनी अलग पहचान हो। उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि सभी ने अपने-अपने मतानुसार राष्ट्र के स्वरूप को परिभाषित करने का प्रयास किया और एकता, समानता जिसके आवश्यक अंग हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के आधार तत्त्व “वसुधैव कुटुम्बकम्" भारतीय संस्कृति का एक आदर्श है। इस आदर्श की संकल्पना वैदिक है। हमारे धर्मग्रन्थों में इसको उल्लिखित किया गया है। हमारे वैदिक ऋषियों ने समग्र मानवता को एक माना है, सबके कल्याण की कामना की है। यथा :— सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥२ ऋग्वेद के निम्न मंत्र में भी मानव मात्र की समता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते संभ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वसा रुद्र एषां सुदुघा पृशिनः सुदिना मरूद्द्भ्यः॥३ वेदों में वर्णित समता, सहृदयता और स्नेह का यह आदर्श अधिकांशतः मानव जाति के सन्दर्भ में प्रतिष्ठित हुआ है। यही भावना आगे चलकर उपनिषदों और गीता में विस्तारित हुई है। परम एकत्व के आदर्श के अन्तर्गत समस्त प्राणियों और वनस्पतियों तक के प्रति भी समभाव प्रकट किया गया है। १. उपर्युक्त, पृ० ८० २. संस्कृत परिचायिका, पृ० ५९ (मुख्यतः 'पद्मपुराण' से) ३. ऋग्वेद ५/६०/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 15 सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥१ अद्वैत वेदान्त में समस्त प्राणियों में एक ही ईश्वर की सत्ता स्वीकार की गयी है। यहाँ अपने और पराये के लिए कोई स्थान ही नहीं है। सभी प्राणी समान है, सभी के भाव एवं विचार समान है, एक हैं। सभी एकता के अटूट बन्धन में उसी प्रकार गुथे हुए हैं जिस प्रकार माला में मोती। राष्ट्रीय एकता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार राष्ट्र के समस्त निवासी एक-दूसरे के प्रति सद्भावना रखते हुए राष्ट्र की उन्नति हेतु परस्पर मिलकर कार्य करते हैं। वस्तुतः यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो राष्ट्र का एकीकरण करते हुए उसके निवासियों में पारस्परिक बन्धुत्व और राष्ट्र के प्रति निजत्व का भाव जाग्रत करते हुए राष्ट्र को सुसंगठित और सशक्त बनाती है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता भाषा, धर्म, जाति, सम्प्रदाय, संस्कृति और सभ्यता की भिन्नता होते हुए भी उन्हें एकता के सूत्र में बाँधकर राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र रूपी शरीर में आत्मा के समान है। जिस प्रकार आत्माविहीन शरीर प्रयोजनहीन हो जाता है उसी प्रकार राष्ट्र भी राष्ट्रीय एकता के अभाव में टूट जाता है। राष्ट्रीय एकता के लिए भाषा, धर्म, जाति और संस्कृति की एकता आवश्यक नहीं होती और विविधता बाधक नहीं बनती। राष्ट्रीय एकता तो विविधता के बीच ही जन्म लेती हुई फूलती और फलती है। हमारा देश भारत एक ऐसा ही देश है। यहाँ भाषा, धर्म, जाति, सम्प्रदाय, संस्कृति और सभ्यता आदि की भिन्नता पायी जाती है। लेकिन फिर भी यह एक गौरवशाली राष्ट्र है और राष्ट्रीय एकता इसकी मौलिक विशेषता है। राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित कुछ प्रमुख विचार राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के अनुसार– “राष्ट्रीय एकता एक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, संगठन एवं सन्निकटता की भावना, सामान्य, नागरिकता की भावना और राष्ट्र के प्रति भक्ति की भावना का विकास किया जाता है।”२ नवभारत टाइम्स के प्रधान सम्पादक श्री अक्षय कुमार जैन के अनुसार–
१. गीता ६/२९ २. आधुनिक सामाजिक विज्ञान / लेखक उदयवीर तथा शकुन्तला सक्सेना, पृ० ३३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
16 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता "अनेकता में एकता इस प्रकार बैठी है जैसे शरीर में भिन्न-भिन्न अवयवों के होते हुए भी रीढ़ की हड्डी में चलता हुआ स्नायु मंडल।''१ महात्मा गाँधी के अनुसार- ''एकता क्या चीज है और उसे किस तरह बढ़ाया जा सकता है? इसका उत्तर सीधा सादा है। एकता के लिए आवश्यक यह है कि हम सब लोगों का उद्देश्य एक हो, लक्ष्य एक हो तथा हमारी तकलीफें भी एक समान हो। एकता को प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग किया जाये, दूसरों के दुःखों में हिस्सा बँटाया जाए और परस्पर सहिष्णुता बरती जाये।''२ उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि एकता अर्थात् राष्ट्रीय एकता वह भावना है जो समस्त जन-जन के हृदय में विद्यमान रहती है, जिससे प्रेरित होकर वह एकता के सूत्र मे बँध जाते हैं। अखण्डता शब्द से अभिप्राय है खण्डित न होने वाली स्थिति या प्रक्रिया अर्थात् जिसका खण्डन न किया जा सके। राष्ट्रीय अखण्डता को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है। राष्ट्रीय संविधान का सम्पूर्ण राष्ट्र में समान रूप से लागू होना। राष्ट्रीय अखण्डता भौगोलिक सीमाओं और भूखण्डों से प्रभावित होते हुए भी एक संविधान सूत्र के अन्तर्गत विभिन्न प्रान्त व भूखण्डों का एक राष्ट्र के रूप में स्थापित होना। राष्ट्रीय अखण्डता एक संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रीय एकता के आधार पर बनी रह सकती है। जैसे भारतवर्ष एक विशाल राष्ट्र है जो विभिन्न प्रान्तीय भूखण्डों में विभक्त होते हुए भी एक संविधान के अन्तर्गत अपनी अखण्डता को बनाये हुए है। जिसकी अखण्डता पर प्रान्तीय भूखण्डों, विचारधाराओं, धर्म, जातियों, सम्प्रदायों की विभिन्नताओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। राष्ट्रीय अखण्डता के कारण ही राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक सम्पूर्ण राष्ट्र को अपना घर समझता है और उसके किसी भी स्थान पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार होता है चाहे वह किसी भी प्रान्त, धर्म, सम्प्रदाय जाति अथवा विचारधारा से सम्बन्धित हो। एक अखण्ड राष्ट्र ही राष्ट्रीय एकता स्थापित रख सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक तत्त्वों पर आधारित होती है। ये सभी तत्त्व एक-दूसरे से आबद्ध होते हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के आधार तत्त्व मुख्यतः निम्न हैं।
१. हाईस्कूल सामाजिक विज्ञान भाग-१, पृ० ३६३ २. महात्मा गाँधी का सन्देश : संकलन और सम्पादन, यू० एस० मोहनराव, पृ० ८२
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 17 १. भौगोलिकता २. नागरिकता ३. धर्म ४. राष्ट्रभाषा ५. राष्ट्रीय प्रतीक ६. राष्ट्रीय पर्व ७. सामाजिक समानता ८. साहित्य ९. संस्कृति १. भौगोलिकता- राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के निर्माण हेतु भौगोलिक एकता अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है जिसके अभाव में नागरिकों में एकरूपता उत्पन्न नहीं हो पाती और वह अपनी भाषा, संस्कृति से तादात्म्य भी स्थापित नहीं कर पाते। भौगोलिक स्थिति, जलवायु तथा रहन-सहन का मनुष्य पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक एकता के कारण ही अखण्ड राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है। भौगोलिक एकता एवम् अखण्ड राष्ट्र पर बल देते हुए रूथना स्वामी कहते है कि "किसी देश की जनता में भले राजनीतिक तथा धर्म के कारण विभिन्नता पैदा हो जाये, किन्तु एक देश में निवास और देश-प्रेम की भावना उसे एकता के सूत्र में बाँधे रहती है।'"१ गिलक्राइस्ट के शब्दों में- एक निश्चित भू-भाग पर निरन्तर एक साथ रहना राष्ट्रीयता के विकास के लिए आवश्यक है।२ उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता के विकास में भौगोलिक एकता का अपना महत्त्वपूर्ण योगदान है, जिसका प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक गठन, सामाजिक जीवन तथा चरित्र पर अवश्य ही पड़ता है। २. नागरिकता- नागरिकता नागरिक शब्द की भाववाचक संज्ञा है। नागरिकता से नागरिक के उन अधिकारों और कर्त्तव्यों का बोध होता है जो उसे राष्ट्र की ओर से मिले हुए रहते हैं तथा नागरिक की श्रेणी प्रदान करते हैं। यह एक वैधानिक स्थिति है जो १. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० ४०७ २. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० ४०७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar