वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २६ )
यह दशा देखि अस्वस्त चित, जीव थरथरत रुकत सुख ।
अपने सुजरे या उदरहित, “देह”, कहै को सतपुरष ?॥८॥
8. If one had not to see the distressed face of a housewife, wearing worn out clothes, the skirts of which are continually being drawn by miserable looking children and who has to feel the agony of listening to the cries of hunger-stricken members of her family, who having a sense of self-respect would utter, for the satisfaction of his own hunger, the word “Give” spoken in a faltering tone, owing to his throat being choked by the fullness of his heart, in fear of his appeal for charity being refused.
निवृत्ता भोगेच्छा पुरुषबहुमानो विगलितः
समानाः स्वर्घाताः सपदि सुहृदो जीवितसमाः ॥
शनैर्षष्ठ्योत्थानं घनतिभिरुद्धे च नयने
अहो धृष्टः कायस्तदपि मरणापायचकितः ॥९॥
बुद्धापेके मारे भोग भोगनेकी इच्छा नहीं रही ; मान भी घट गया ; हमारी बराबर वाले चल बसे ; जो घनिष्ठ मित्र रह गये हैं, वे भी निकम्मे या हम जैसे हो गये हैं । अब हम बिना लकड़ीके उठ भी नहीं सकते और आँखोंमें आँखेरी छा गई है । इतना सब होनेपर भी, हमारी काया कैसी बेहया है, जो अपने मरनेकी बात सुनकर चौंक उठती है ! ॥९॥
शुष्ठासा यह है, कि हमारी जवानी चली गयी है ; वह
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जोशखरोश और चटक-मटक अब नहीं रही है ; बुढ़ापेका दौरदौरा हो गया है ; गालोंमें खड्ड हो गये हैं ; वदनपर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं ; सिरके बाल सफेद हो गये हैं ; दाँतोंने जवाब दे दिया है ;—यह तो हमारी दशा हो गयी है। लोगोंमें जो हमारा आदरमान था, अब वह भी घट रहा है। अब लोग हमें निकम्मा बूढ़ा समझकर घुणाकी दृष्टिसे देखते हैं। हमारी उम्रके लोग हमारे देखते-देखते चल बसे। जो रह गये हैं, वे भी हम जैसे निकम्मे हैं। अब हम ऐसे कमज़ोर हो गये हैं, कि बिना लकड़ी टेके चल भी नहीं सकते। आँखोंसे सूक्ष्मता नहीं। इतने पर भी, हमारी काया मरनेके नामसे काँप उठती है ! जीवनके मोहकी अजब हालत है !!
जगत्को विचित्र गति है ! इस जीवनमें जरा भी सुख नहीं है। मनुष्यके मित्र और नातेदार मर जाते हैं, आप निकम्मा हो जाता है, आँख-कान प्रभुति इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं, आँखोंसे सूक्ष्मता नहीं और कानोंसे सुनाई नहीं देता, घर-बाहरके लोग अनादर करते हैं, बुढ़ापेके मारे चला-फिरा नहीं जाता, खानेको भी कठिनाईसे मिलता है ; तोभी मनुष्य मरना नहीं चाहता, बल्कि मरनेकी बात सुनकर चौंक उठता है। इसे मोह न कहें तो क्या कहें ?
लकड़हारा और मौत ।
एक वृद्ध अतीव निर्धन था । बेदे-पोते सभी मर गये थे ।
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एक मात्र बुढ़िया रह गयी थी। बूढ़ेके हाथ-पैरोंने जवाब दे दिया था। आँखोंसे दीखता न था। फिर भी ; अपने और बूढ़ी के पेटके लिये, वह जड़लसे लकड़ी काटकर लाता और बेचकर गुज़ारा करता था। एक दिन उसने जीवनसे निहायत दुःखी होकर मौतको पुकारा। उसके पुकारते ही मौत मनुष्य-रूप में उसके सामने आ खड़ी हुई। बूढ़ेने पूछा—“तुम कौन हो?” उसने कहा—“मैं मृत्यु हूँ, तुम्हें लेने आई हूँ।” मौतका नाम सुनते ही लकड़हारा चौँक उठा और कहने लगा—“मैंने आपको यह भारी उखानेको बुलाया था।” मौत उसकी भारी उखवा कर चली गयी।
देखिये ! बूढ़ा लकड़हारा हर तरह दुःखी था, उसे जीवन में जरा भी सुख न था ; फिर भी वह मरता न चाहता था ; बल्कि मौत को देखते ही चौँक पड़ा था। यही गति संसार की है।
एक दुःखित बूढ़ा सेठ ।
एक वैश्यने उग्र-भर भर-पचकर खूब धन जमा किया। बुढ़ापेमें पुत्रोंने सारे धन पर कबज़ा कर, बूढ़ेको पौलीमें एक टूटी सी खाट और फटोसी गुदड़ों पर डाल दिया और कुत्ता मारनेके लिये हाथमें लकड़ी दे दी। सुबह-शाम घरका कोई आदमी बचा-खुचा बासी-कूसी उसे खानेको दे जाता। सेठ बड़े दुःखसे अपनी जिन्दगी पार करता था। पुत्र-बध्रपं दिन-भर
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कहा करती थीं—“यह भर नहीं जाते। सबको मौत आती है, पर इनको मौत नहीं। दिन-भर पौलीमें थूक-थूककर मैला करते हैं।” एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था। इतनेमें नारदजी आ निकले। उन्होंने सारा हाल देख कर कहा—“सेठजी ! आप बड़े दुःखी हैं। स्वर्गमें कुछ आदमियों की ज़रूरत है। अगर तुम चलो तो हम ले चले।” सुनतेही सेठ ने कहा—“जारे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे-पोते मुझे मारते हैं वाहे गालो देते हैं तुझे क्या ? तू क्या हमारा पंच है ? मैं इन्हींमें सुखी हूँ। मुझे स्वर्गकी ज़रूरत नहीं।” सेठकी बातें सुनते ही नारदजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे—“ओह ! संसार सबमुच ही मोह-पाशमें फँसा है। मोहकी मदिराके मारे इसे होश नहीं। मनुष्यने क्रममें पैर लटकवा रखे हैं ; फिर भी विषयोंमें ही उसका मन लगा है।” किसीने ठीक ही कहा है :—
गतं तत्तारुण्यं तत्क्षणिहृदयानन्दजनकं, विशीर्णा दन्तालिनिजगतिरहो यश्चिरणं । जहीभूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णसुगलं, मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यःस्पृहयति ॥
तत्क्षणिके हृदयमें आनन्द पैदा करवाली जवानी चली गई है, दन्तपत्तिके गिर गयी हैं, लकड़ीका सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति
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मारी गयी है, दानों कानोसे सुनाई नहीं देता, तोभी मेरा बेहूया मन विषयोंको चाहता है ।
व्यपय ।
गयी भोगकी चाह, गयो गौरव गुमान सब ।
मिल गये सुरलोक, अकेले आप रहे अब ।
उठत सु लकड़ी टेक, तिसिर आँखन में डायो ।
शब्द सुनत नहीं कान, बचन बोलत बहायो ।
यह दशा वृद्धतनकी, तज चकित होत मरिचौ सुनत ।
देखो विचित्र गति जगतकी, दुखहूँको सुखसों लुनत ॥६॥
9. Along with the approach of old age the power for the enjoyment of sensual pleasures has vanished and the great respect and honour paid by the people have also declined. Our equals in age have already died. Our surviving friends are not so better off in the world as to be of any use to us. Owing to physical weakness we can only rise and that slowly with the help of a stick. Our eyes has become dim with ever-increasing darkness. How shameless should our body be to think that notwithstanding all these disabilities it still fears to meet death ?
हिंसाशून्यमयललभ्यमशनं धात्रामरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवस्तृणां कुसुजः सृष्टाः स्थलीशायिनः ॥
संसाराण्यवलंबनचमधियां वृत्तिः कृता सा नृणां
यामन्वेषयतां प्रयाति सततं सर्वं समाप्तिं गुणाः ॥१०॥
३
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विधायताने हिंसा-रहित और बिना उद्योगके मिलनेवाली हवाका भोजन साँपोंकी जीविका बनाई, पशुओंका घास खाना और जमीन पर सोना बताया ; किन्तु जो मनुष्य अपनी बुद्धिके बलसे भव-सागरके पार हो सकते हैं, उनकी जीविका ऐसी बनाई, कि जिसकी खोजमें उनके सारे गुणोंकी समाप्ति हो जाय, पर वह न मिले ॥ १० ॥
विधायता या रचयिताने साँपोंके लिये तो हवाका भोजन बता दिया है, जिसके हासिल करनेमें किसी प्रकारकी हिंसा भी नहीं करनी पड़ती और वह बिना किसी प्रकारकी चेष्टा या उद्योगके उन्हें अपने वासस्थानोंमें ही मिल सकता है। जानवरोंके लिये घास चरनेको और जमीन सोनेको बतादी, इससे उनको भी अपने खानेके लिये किसी प्रकारकी विशेष चेष्टा नहीं करनी पड़ती, वे जड़ूलमें उगी-उगाई घास तैयार पाते हैं और इच्छा करते ही पेट भर लेते हैं। उन्हें सोनेके लिये पल्लों और गह-तकियोंको फिक नहीं करनी पड़ती, ज़मोन पर ही जहाँ जी चाहता है पड़ रहते हैं। सर्प और पशुओंके साथ भगवान्ने पक्षपात किया, उन्हें बेफिकीकी ज़िन्दगी भोगनेके उपाय बता दिये, किन्तु मनुष्योंके साथ ऐसा नहीं किया ! उन बेचारोंको बुद्धि तो ऐसी दी, कि जिससे वे संसार-सागरसे पार हो सकें अथवा दुर्लभ मोक्षपदको प्राप्त कर सकें ; पर उन्हें जीविका ऐसी बताई, कि जिसको
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खोजमें उनको सारी कोशिशों बेकार हो जायें, पर जीविकाका टिकाना न हो। यह क्या कुछ कम दुःखकी बात है? यदि विद्याता मनुष्योंको भी साँपों और पशुओंकी सी ही जीविका बताता, तो कैसा अच्छा होता? मनुष्य, जीविकाकी फिक न होनेसे, सहजमें ही अपनी बुद्धिकी ज़ोरसे मोक्ष पा जाते।
उत्ताद ज़ौक भी कुछ इसी तरहकी शिकायत करते हैं,—
बनाया ज्ञैक जो इन्सां को उसने जुज्व जईफ।
तो उस जईफसे कुल काम दो जहाँके लिए ॥
ये ज़ौक! ईश्वरको देखो, कि उसने मनुष्यको कितना कमज़ोर बनाया, पर काम उससे दोनों लोकोंके लिये। उसे इस लोक और परलोक दोनोंकी फिक लगादी।
किसीने ठीक ही कहा है :—
घृतलवणतैलतगदुल शकेन्धनचिन्तयाऽनुदिनम्।
विपुल मतेरपि पुंसां नश्यति धीर्मेन्दविभवत्वात् ॥
घो, नोन, तेल, चाँवल, साग और ईंधनकी चिन्तामें बड़े-बड़े मतिमानोंको उग्र भी पूरी हो जाती है; पर इस चिन्ताका ओर-छोर नहीं आता। इसीसे मनुष्यको ईश्वर-भजन या परमात्माकी भक्ति-उपासनाको समय नहीं मिलता। अगर मनुष्य इतनी आपदाओंके होते हुए भी परलोक बनाना चाहे, तो उसे चाहिये कि, अपनी ज़िन्दगीकी ज़रूरियातोंको कम करे,
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क्योंकि जिसकी आवश्यकतायें जितनी ही कम हैं, वह उतनाही सुखी है। इसीलिये महात्मा लोग महलोंमें न रहकर वृक्षोंके नीचे उग्र काट देते हैं। बनमें जो फल-फूल मिलते हैं, उन्हें खाकर और भरनोंका शीतल जल पीकर पेट भर लेते हैं। आवश्यकताओंको कम करना ही सुख-शान्तिका सच्चा उपाय है।
वृष्यय ।
बिन उद्यम बिन पाप, पवन सर्पनको दीन्हीं ।
तैसेही सब ठौर, घास पशुवनको कीन्हीं ।
जिनकी निर्मल बुद्धि, तरन भवसागर समरथ ।
तिनकी दूर वृत्ति, हरत गुण ज्ञान ग्रन्थ गथ ।
विधि ! अविधि करी तें अति अधिक, यातें नर पर घर फिरत ।
निशि-दिवस पचत तनमन नचत, लचत रचत उरभत गिरत ॥१०॥
10. The Creator has designed the harmless and easily obtainable air to be the food of serpents. The quadrupeds have been made to eat the green grass and to sleep on the flat earth. But the tendency of human beings, who have been endowed with sufficient reason to enable them to attain a life of everlasting bliss, has been created such as to baffle all the faculties of an observer in his attempt to explain its working.
न भ्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छिन्नये
स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुधर्मोऽपि नोपाजितः ॥
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नारीपीनपयोधरोस्त्युगलं स्वप्नेऽपि नारिर्गिर्गतं
मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥११॥
हमने संसार-बन्धनके काटनेके लिये, यथाविधि, ईश्वरके चरणोंका ध्यान नहीं किया; हमने स्वर्गके दरवाज़े खुलवाने वाले धर्म का भी सन्ध्वय नहीं किया; और हमने स्वप्नमें भी झूठके कठोर कुर्चोंका आलिङ्गन नहीं किया। हम तो अपनी मौके यौवन रूपी बनके काटनेके लिये कुल्हाड़े ही डूए ॥११॥
हमने लोक-परलोक साधनके लिये, जन्म-मरणका फल्दा काटनेके लिये अथवा परमपदकी प्राप्तिके लिये, शास्त्रोंमें लिखी विधिसे, परमात्माके कमल-चरणोंका ध्यान नहीं किया, उसकी पूजा-उपासना नहीं की; सारी उम्र पेटकी चिन्तामें ही बिता दी। हमने पूर्वजन्म वा वर्तमान जन्मके पापोंके समूल नाश करनेके लिये प्रायश्चित्त नहीं किये, न जीवोंको अभय किया, न दानपुण्य किया; फिर हमारे लिये स्वर्गका द्वार कैसे खुल सकता है? क्योंकि धर्मका सञ्चय करनेसे ही स्वर्गका द्वार खुलता है। न हमने परमात्माके पदपङ्कजोंका ध्यान किया, न धर्म सञ्चय किया और न स्त्रीके पीनपयोधरोंका स्पर्शमें भी आलिङ्गन किया ! मतलब यह है, न हमने संसारके मिथ्या विषय-सुख ही भोगे और न हमने मोक्ष या स्वर्ग-प्राप्तिके उपाय ही किये। “दुविधामें दोनों गये, माया मिली न राम” अथवा “इधरके रहे न उधरके रहे,
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खुदा ही मिला न विसाले सनम ।” हमने योंही संसारमें जन्म लेकर अपनी माताकी जवानी और नाशकी ! अगर हम जैसे निकम्मे न पैदा होते, तो बेचारीकी जवानीको रेंढ़ तो न होती !
व्यपय ।
विधि सों पूजे नाहिं, पाँय प्रभुके सुखकारी ।
प्रभुको धरो न ध्यान, सकल भव-दुखको हारी ।
खोले स्वर्ग-कपाट, धर्महू कयों न ऐसो ।
कामिन-कुचके संग, रंगभर रहो न तैसो ।
हरि ! हाय २ कीन्हौं कहा, पाय पदारथ नर जनम ? ।
जननी यौवन वन दहन कौं, अग्नि रूप मे प्रगट हम ॥११॥
11, We did not meditate in an appropriate way upon the essence of Godhead for the termination once for all of our ever recurring births and deaths. Neither did we practise religion which is the surest means for throwing open the door leading to Paradise. Nor did we embrace even in our dreams the pair of fat breasts or seductive nipples of a woman. Having done nothing for the present or the next world, we are only like an axe meant to hew down the wood of our mothers' youth.
भोगा न सुक्ता वयमेव सुक्ता-
स्तपो न तसं वयमेव तसाः ॥
( ३६ )
कालो न यातो वयमेव याता-
स्तुष्या न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥ १२ ॥
विषयोंको हमने नहीं भोगा, किन्तु विषयोंने हमारा ही भुगतान कर दिया ; हमने तपको नहीं तपा, किन्तु तपने हमें ही तपा डाला ; कालका खात्मा न हुआ, किन्तु हमारा ही खात्मा हो चला । तुष्याका बुढ़ापा न आया, किन्तु हमारा ही बुढ़ापा आ गया ॥ १२ ॥
हमने बहुत कुछ भोग भोगे, पर भोगोंका अन्त न आया ; हाँ हमारा अन्त आ गया । काल या समयका अन्त न आया, किन्तु हमारा अन्त आ गया—हमारी उम्र पूरी हो चली । हमें जो अर्ध-कार्य करने थे, वह हम न कर सके । हमने तप तो नहीं तपा, किन्तु संसारी तापोंने हमारे तर्ह तपा डाला—संसारके जञ्जालोंमें फँसकर हम हो शोक-तापोंसे तप गये । हमारा अन्त आ पहुँचा, हम निर्बल और बुद्ध हो गये ; पर तुष्या बूढ़ी और कमज़ोर न हुई—हमें संसारसे विरक्ति न हुई ।
येसी ही बात उस्ताद ज़ौकने कही है—
दुनियासे जैक ! रिश्तये उल्फ़तको तोड़ दे ।
जिस सरका है यह बाल, उसी सरमें जोड़ दे ॥१॥
पर जैक न छोड़ेगा, इस पीरा जालको ।
यह पीरा जाल, गर तुम्हें चाहे तो छोड़ दे ॥२॥
( ४० )
मतलब यह, कि लोग दुनियाको नहीं छोड़ते, दुनिया ही उन्हें निकम्मा करके छोड़ देती है ।
छप्पय ।
भोग रहे भरपूर, आयु यह सुगत गई सब । तप्यो नाहिं तप मूढ़, अवस्था तपत भई अब । काल न कितहूँ जात, वैस यह चली जात नित । वृद्ध भई नहिं आस, वृद्ध वय भई छाँड़ हित । अजहूँ अचेत चित ! चेतकर, देह-गोहसों नेह तज ।
दुख-दोषहरण मंगलकरन, श्रीहरिहरके चरण भज ॥१२॥
12. We did not exhaust the enjoyments of life, rather we ourselves were exhausted, We did not practise penances, but it was rather undergoing a life of extreme misery. It was not Time that passed, rather it was ourselves that passed away. It is not Avarice that has become monotonous and weak, rather we ourselves have become so.
ज्ञान्तं न क्षमया शृहोचितसुखं त्यक्तं न सन्तोषतः
सोढा दुःसहशीतवाततपनकृेशा न तसं तपः ॥
ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितपापैर्न शंभोः पदं
तत्तत्कर्म कृतं यदेव मुनिभिस्तैस्तैःफलैर्वचितम् ॥१३॥
क्षमा तो हमने की, परन्तु धर्मके ख्यालसे नहीं की । हमने
दरिद्रावस्था में वैराग्य ।
आपके घरमें कंगालो और मुहताजी का राज है । आप खी-बच्चोंका पालन कर नहीं सकते । इसलिए ही आपको नफ़रतकी नज़र से देखती है । यह सब देखकर आपके दिलमें वैराग्य पैदा हुआ है । यह नीचे दर्जका वैराग्य है । पृष्ठ ४०
वैराग्यशतक
सुखेश्वर्य में वैराग्य ।
आपका अन्तःकरण शुद्ध होगा है ; अतः आप धनेश्वर्य और पुत्रकुलव्रादि को त्यागकर वन को जा रहे हैं । आप कहते हैं, “अब मुझे विषय सुख अच्छे नहीं लगते । मैं वन में जाकर जगदीश का भजन करूँगा ।” यही वैराग्य उत्तम वैराग्य है और ऐसे नरन प्रशंसा के पात्र हैं । पृष्ठ ४१
Popular Press, Calcutta.
( ४१ )
घरके सुख-चैन तो छोड़े, परन्तु सन्तोषसे नहीं छोड़े । हमने सदी-गर्मी और हवाके न सह सकने योग्य दुःख तो सहे ; किन्तु हमने ये सब दुःख तपकी गरजेसे नहीं, किन्तु दरिद्रताके कारण सहे । हम दिन-रात ध्यानमें लगे तो रहे, पर धनके ध्यानमें लगे रहे—हमने प्राणायाम-क्रिया द्वारा शस्त्रके चरणोंका ध्यान नहीं किया । हमने काम तो सब मुनियोंकेसे किये, परन्तु उनकी तरह फल हमें नहीं मिले ! ॥ १३ ॥
हमने क्षमा तो की, परन्तु दयाधर्म-वश नहीं की, हमारी क्षमा असमर्थताके कारणसे हुई ; हममें सामर्थ्य नहीं थी, इसीसे हम शान्त हो गये । हमने अच्छा खाना-पीना ऐश-आराम छोड़े, पर मजबूरीसे छोड़े ; अपनी भीतरी इच्छासे नहीं छोड़े । हमने उन्हें रोग प्रभृतिके कारण या और किसी घटनाके कारण त्यागा, पर सन्तोषसे नहीं त्यागा । हमने गर्म-सर्द हवाके भोके सहे ; हमने सदी-गर्मी सही ज़रूर, पर तपकी गरजेसे नहीं ; किन्तु घरमें पैसा न होनेकी वजहसे । हम सोते-जागते आठ पहर वॉसठ घड़ी ध्यान तो करते रहे, पर पैसे या स्त्री-पुत्रोंका अथवा संसारके और भगड़ोंका । हमने भोठानाथके कमल-चरणोंका ध्यान नहीं किया ! सारांश यह, हमने मुनियोंकी तरह विषय-सुख भी त्यागे, उनकी तरह सदी-गर्मीके दुस्सह कष्ट भी उठाये, उनकी तरह हम ध्यान-मग्न भी रहे—पर वे जिस तरह सामर्थ्य होते भी शान्त होते
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हैं—सन्तोषके साथ विषय-सुखोंसे मुँह मोड़ लेते हैं—शिवका ही ध्यान करते हैं, उस तरह हमने नहीं किया ; इसीसे हम उन फलोंसे वञ्चित—महरूम—रहे, जिनको वे लोग प्राप्त करते हैं ।
जो लोग शक्ति-सामर्थ्य रहते विषयोंको छोड़ते हैं, वे ही प्रशंसा-भाजन होते हैं । सामर्थ्य न रहने या धातुओंके क्षीण होने पर जो लोग विषयोंको छोड़ते हैं, वे तो मनसे नहीं—लाचारसे छोड़ते हैं ; इसलिये वे प्रशंसा-भाजन नहीं हो सकते । घर-जञ्जालमें रहकर, सदी-गमी और शोक-ताप आदि के कष्ट उठाने ही पड़ते हैं ; फिर तप ही क्यों न किया जाय ? क्योंकि घर-जञ्जालोंके शोक-तापसे कोई लाभ नहीं, किन्तु तपसे स्वर्ग और मोक्ष-को प्राप्ति हो सकती है । धनका ध्यान करनेसे सच्चा सुख नहीं मिल सकता । धनसे जो सुख मिलता है, वह क्षणस्थायी और झूठा है । इस लिये धन-ध्यान छोड़कर, आशुतोष भगवान् शिवके चरणोंका ध्यान करना अच्छा ; जिससे सभी मनोरथ पूरे होते हैं और अन्तमें जन्म-मरणके ऋगड़ोंसे छुटकारा मिलकर परमपद—मोक्ष मिल जाती है । वह बड़े मूर्ख है, जो कष्ट तो उठाते हैं, पर वे कष्ट नहीं उठाते, जिनसे उभय लोक साधन हों ।
लुप्य ।
चमा चमा-बिन कीन, बिना सन्तोष तजे सुख ।
सहे सीत तप घाम, बिना तप पाय महा दुख ।
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धर्यो विषैकौ ध्यान, चन्द्रशेखर नहि ध्यायौ ।
तज्यौ सकल संसार, प्यार जब उन बिसरायौ ।
मुनि करत काज सोई करे, फल दीसत विपरीत अति ।
अब होत कहा चिन्ता किये ? अजहँ कर हरचरणरति ॥१३॥
13. We forgave, but not for the sake of forgiveness. We renounced the comforts of the home, but not for the sake of renunciation and contentment. We suffered the unbearable rigours of cold, heat and the winds, but it was through adversity that we did so and not for the sake of practising Tapa. We meditated day and night with regulated breath on Mammon and not on God. We practised the very deeds which the sages do, but devoid of the fruits which the latter reap of them.
वलभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरंकितं शिरः ।
गात्राणि शिथिलायन्ते तुष्यैका तरुणायते ॥१४॥
चेहेरे पर मुर्खियाँ पड़ गईं, सिरके बाल पककर सफेद हो गये, सारे अंग ढीले हो गये,—पर तुष्या तो तरुण होती जाती है ! ॥१४॥
बुढ़ापा आ गया है, क्योंकि चेहेरेका चमड़ा सुकड़ गया है, मुर्खियाँ पड़ गयीं हैं, रङ्ग-रूप हवा हो गया है, हाथ पैर आदि अङ्ग शिथिल या ढीले हो गये हैं, किसी कामकी सामर्थ्य नहीं रही है । शरीरकी तो यह दशा हो गयी ; पर तुष्याका न तो बुढ़ापा आया, न बल घटा ; वह तो उल्टी तेज हो रही है ।
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हमारे शरीरका बुढ़ापा आ गया, पर तृष्णाकी तो जवानी चढ़ रही है ! महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं—
नैननकी पलही पलमें, क्षण आधि घरी घरी घटिका जु गई है । जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सैक गई तब रात भई है । आज गई अरु काल गई, परसों तरसों कलु और ठई है । सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होता नई है ।
आज सारा संसार तृष्णाके फेरमें पड़ा हुआ है। अमीर और गरीब सभी इसके बन्धनमें बँधे हैं। गरीबीकी अपेक्षा धनियोंको तृष्णा बहुत है। धनी हमेशा निन्ध्यानवै के फेरमें लगे रहते हैं। ६६ होने पर १०० पूरे करनेकी फिक रहती है। हजार होनेपर दस हजारकी, दस हजार होनेपर लाखकी, लाख होनेपर करोड़की और करोड़ होनेपर अरब-खरबकी तृष्णा लगी रहती है। इसी फेरमें मनुष्य रोगी और बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढ़ी। “सुभाषितावलि”में लिखा है :—
यौवनं जया प्रस्तमोराम्यं व्याधिभिर्हतम् ।
जीवितम् मृत्युरन्येति तृष्णैका निरुपद्रवा ॥
जवानी बुढ़ापेसे, आरोग्यता व्याधियोंसे और जीवन मृत्यु से प्रसित है ; पर तृष्णाको किसी उपद्रवका डर नहीं ।
बुढ़ापे में तुष्णा ।
आप बूढ़े हो गये हैं, पर आपकी तुष्णा बूढ़ी नहीं हुई है । आप रात-दिन निस्संनय के फेर में लगे रहते हैं ! पूछ लूँ
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