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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ७२ )

( २ )

सुन्दरों सोनेकी ही क्यों न हो और उसमें मनभावन सुगंध भी क्यों न आती हो, यदि वह अपनी जननी भी हो, तोभी उसके पास न बैठे।

( ३ )

स्त्री काली नागिन है। केवल ईश्वरका नाम अपने वाले उससे बचे; विषय-भोगियोंको तो वह एकदमसे खागई—कोई न छोड़ा।

( ४ )

इसे मैं नारी कहूँ या नाहरी—सिंहनी कहूँ? क्योंकि यह नख-सिखसे खा जाती है। जलमें डूबा बच जाता है; पर स्त्रीमें डूबा नहीं बचता।

( ५ )

• एक सुवर्ण और दूसरी स्त्री इनसे बच कर रहा। यह भगवान् के और जीवके बीचमें खाई बताते हैं, जिससे यमराज मुँहमें धूल डालता है।

( ६ )

जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं है और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं। स्त्री और राम दोनों एक जगह नहीं रह सकते।

( ७ )

अविनाशी भगवान् और जीवके बीचमें तीन खाहूँयाँ हैं:— (१) कुल, (२) कंचन, और (३) कामिनी। जो इन तीनों से बचता है, वही पार होकर भगवान् तक पहुँच जाता है।

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वैराग्यशतक ॥ ४ ॥

गोस्वामी तुलसीदासजी नदी पार कर छतराल पहुँचे, द्वार बन्द पाकर सर्प को रस्सी समझ डले पकड़ ऊपर चढ़ गये। जब स्त्री के सामने पहुँचे—स्त्री कहने लगी:—“आप का जितना प्रेम मुझ में है, उतना उस जगदीश में हो, तो आप का भला हो जाय।

( ७३ )

क्या स्त्रीमें आनन्द है ?

—*—

स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं है। स्त्री हर तरह दुःखोंकी ध्वान और मनकी अशान्तिकी मूल है। स्त्रीसे मैथुन करनेमें पुरुषको जो आनन्द आता है, वह उसका अपना आनन्द है; स्त्रीका नहीं। कुत्ता सूखी हड्डी खवाता है; पर सूखी हड्डीमें धून नहीं होता। कुत्तेका अपना धून निकलता है और उसे उसीका स्वाद आता है, पर वह अज्ञानी उस आनन्दको हड्डी में समझता है। विषयी पुरुष भी कुत्तेकी तरह ही है। विषय जड़ है। विषयोंमें आनन्द कहाँ? आनन्द आत्मामें है। जब पुरुषका वीर्य मैथुनके अन्तमें स्खलित होता है, तब क्षण-भरके लिये मनकी वृत्ति स्थिर हो जाती है। उस स्थिर वृत्तिमें चेतन आत्माका अक्स पड़ता है। बस, उसीसे पुरुषको आनन्द आता है। पर अज्ञानसे, कुत्तेकी तरह, वह उस आनन्दको स्त्रीमें समझता है। तात्पर्य यह निकला कि, स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं, आनन्द आत्मामें है।

स्त्री-त्यागी ही परिणत है।

मनुष्यों और पशुओंमें क्या भेद है? मनुष्य खाते, सोते, डरते और स्त्री-भोग करते हैं और पशु भी यही चारों काम करते हैं। पर इन दोनोंमें अन्तर यही है कि, मनुष्यको धर्म-

( ७४ )

ज्ञान है और पशु को नहीं। यदि मनुष्य पशुओंकी तरह अज्ञानी हो, तो वह भी पशु ही है। कहा है—

अधीत्य वेदशास्त्राणि, संसारे रागिणश्च ये ।

तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति, सर्वां श्वाश्वसूकरैः ॥

जो पुरुष वेद-शास्त्रोंको पढ़कर भी संसार से या स्त्री-पुत्र आदिकी प्रीति रखते हैं, उनसे बढ़कर मूर्ख कौन है? क्योंकि स्त्री-पुत्र प्रभृतिमें तो कुत्ते, घोड़े और सूअर भी प्रेम रखते हैं। शुक्रदेवजाने भी “भागवत”में कहा है :—

मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य, वेदशास्त्राण्यधीत्य च ।

वध्यते यदि संसारे, का विमुच्येत मानवः ?

दुर्लभ मनुष्य-बोला पाकर और वेद-शास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसारमें फँसा रहे, तो फिर संसार-बन्धनसे छुट्टेगा कौन ?

कबीरदासजी कहते हैं :—

काम क्रोध मद लोभकी, जब लग घटमें खानि ।

कहा मूर्ख कहा पंडिता, दोनों एक समान ॥

जब तक मनमें काम, क्रोध, मद और लोभ है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों समान हैं। जिसमें काम, क्रोध, मद और लोभ नहीं, वही पण्डित है और जिसमें ये हैं वह मूर्ख या अज्ञानी है।

( ७५ )

शङ्कराचार्यकृत “प्रश्नोत्तरमाला”में लिखा है :—

शून्यमहाशून्यतमोऽस्ति का वा ?

मनेजवागैर्व्यथितो न यस्तु ।

प्राज्ञोऽति धीरश्च शमोऽस्ति को वा ?

प्राप्ता न मोहं ललनाकटाक्षैः ॥

संसारमें सबसे बड़ा शूरवीर कौन है ? जो काम-बाणों से पीड़ित नहीं है । प्राज्ञ, धीर और समदर्शी कौन है ? जिसे स्त्रीके कटाक्षोंसे मोह नहीं होता ।

महात्मा तुलसीदासजीको स्त्रीसे विरक्ति ।

एक बार महात्मा तुलसीदासजी की स्त्री अपने पीहर चढ़ी गई ; महात्माजीको आधी रातके समय स्त्री-प्रसंगकी इच्छा हुई । आपकी ससुराल और आपके गाँवके बीचमें नदी पड़ती थी । आप फौरन ही घर छोड़ ससुरालको चल दिये । भयङ्कर रातमें प्रबल वेगसे बहती हुई नदीको पार कर आप ससुराल पहुँच गये । लेकिन जब घरके द्वार पर पहुँचे तो पौलीका द्वार बन्द पाया । अब आप मकानमें चढ़ने की तरकीब सोचने लगे । इतनेमें आपको एक रस्सी सी नज़र आई, आप उसे पकड़ कर चढ़ गये और अपनी स्त्रीके कमरे में जा पहुँचे । स्त्री आपको देखते ही चौकन्नीसी हो गयी ।

( ७६ )

आपने कहा—“प्यारी ! मैं तेरे लिये इस समय महा कष्ट भोग कर आया हूँ । मेरी अभिलाषा पूर्ण कर ।”

स्त्री आपको देखते ही पल्लगसे नीचे बैठ गई और बोली—“हे मेरे पतिदेव ! देखिये तो रात कैसी भयावनी हो रही है । बादलोंकी गड़गड़ाहट और बिजलीकी कड़कसे मनुष्य का हृदय काँप उठता है । उधर नदी चढ़ रही है । आपने अपने शरीरकी परवा न कर मुझे दर्शन दिये; इसलिये मैं आप की अनुग्रहीत हूँ । परन्तु स्वामिन् ! यह तो बताइये, आप मकानमें आये कैसे, क्योंकि द्वार बन्द है ?” आपने कहा—“एक रस्ती लटक रही थी, उसीके सहारे मैं चढ़ आया ।” स्त्रीने जाकर देखा, तो वह रस्ती नहीं, बरन् एक लम्बा-चौड़ा काल-सर्प था । देखते ही स्त्रीके सिरमें चक्कर आगया । उसके मुँहसे इतना ही निकला—“स्वामिन् ! जितना प्रेम आपका मुझमें है, यदि इतना ही हरिमें होता, तो आपका निश्चय ही बड़ा उपकार होता ।

“जितना प्रेम हरामसे, उतना हरिसे होय ।

चला जाय वैकुण्ठके, पलान पकड़े काय ।”

कहते हैं, तुलसीदासजी तत्क्षण उसे गुरु कह कर बनको चले गये ।

पुरुष आठ पहर-चौंसठ घड़ी स्त्रीकी सेवा करता है, उसे हर तरह प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करता है, उसकी आज्ञा-पालनके लिये तैयार रहता है, आप नाना प्रकारके कष्ट

( ६१ )

बीच महलसे राजाको ले गया। सब देखते-के-देखते रह गये। वही बलवान काल तुम्हारी घातमें तुम्हारे सिरपर मँडरा रहा है। आप भी उससे किसी तरह बच नहीं सकते।

यह दुनिया नापायेदार है, मनुष्य-शरीरका कोई ठिकाना नहीं; फिर भी मनुष्यके अभिमानकी सीमा नहीं। थोड़ी सी विषय-सम्पत्ति पर वह इतना इतरा उठता है, कि ईश्वरको भी माल नहीं समझता। उस्ताद जौकने ठीक ही कहा है—

मौत ने कर दिया नाचार, वगनी इन्हीं।

है वह खुदबी, कि खुदाका भी न क़ायल होता ॥

मनुष्य के घमण्डका कुछ ठिकाना है—किसीको कुछ नहीं समझता। मौत ने इसे लाचार कर रक्खा है, नहीं तो यह ईश्वरको भी कुछ न समझता।

शिक्षा—अगर अपना भला चाहते हो, तो अभिमान को त्यागो; यह बड़ा भारी शत्रु है। जिन्होंने इसकी संगति की, उन्हींका नाश हुआ। अभिमान से ही उस लंकाविपत्ति रावणका नाश हुआ, जिसने त्रिलोकीको अपने अधीन कर रक्खा था और जो देवताओंसे सेवा और हवा-पानीसे टहल कराता था। अभिमानसे ही सप्यहके मार्त्तण्डकी भाँति तपते हुए देहलीके सुगल बादशाह औरज्जनेवकी सस्तनतकी जड़ हिल गई, सुगलिया खान्दानसे बादशाहत विदा हो ही गई। अभिमान ने ही उस जर्मन कैसरको रव्से रङ्ग बना दिया, जिसने छोड़ेसे देशका राजा होकर भी, सारी पृथ्वी को चार साल तक अपनी उँगली पर नचाया। भाइयो, इन दृष्टान्तोंको ध्यानमें रखकर, अपने प्रबल शत्रु-अभिमानका नाश करो।

( ६२ )

छप्पय ।

छिनहूँ छाँड़ी नाहि, भोग भुगती वह भूयनि ।

कुलटासी यह भूमि, लाभ मानत महीप मनि ।

ताहू के इक अंग के, सु अंगहि को पावत ।

राखत हैं करि कष्ट, दिवस निशि चहूँ दिशि धावत ।

अपनी ओरकी होत यह, यातें पचि-पचि रचि रहे ।

पछितैवौ तजि जग-विषयसों, जड़ उरुटे सुख गनि रहे ॥२५॥

25. Why should kings feel so much pride in the ownership of the earth, which has successively been owned by hundreds of kings without the break of even a second. It is a pity that petty kings who possess even a very small portion of it, foolishly find pleasure in the possession of their estates while really they ought to grieve over it as their power is not going to endure for ever.

मृत्पिण्डो जलरेखया वलपितः सर्वोऽप्ययं नान्धु-

रणीकृत्य स एव संयुगशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते ।

तद्वदुद्वदतेऽथवा न किमपि क्षुद्रा ददिता भृशं

विश्विकान्पुरुषाधमान्धनकर्णं वाञ्छन्ति तेष्योऽपि ये ॥२६॥

भृगति=राजा लोग । महीप=राजा । कुतश्च=अभिचारिणी ओ । दिवस निशि=रात-दिन । चहूँ दिशि=चारों दिशाओंमें । धावत=दौड़ते हैं । पछितैवौ तजि=पछताना छोड़कर । जड़=मूर्ख । छल गनि रहे=छल मान रहे हैं ।

( ६३ )

अब्वल तो यह पृथ्वी स्वयं ही बड़ी नहीं है।१ मिट्टीका सा लौदा है, जो चारों ओरसे पानीसे घिरा हुआ है। दूसरे ; सैकड़ों-हज़ारों राजाओंने आपसमें अनेक लड़ाइयाँ लड़-लड़कर, इसके भागों पर अपना-अपना कब्जा कर रखाहै। ऐसे खुद और संकीर्ण-हृदय-राजाओंका जो दानी सम्भूते हैं और उनके मुँहकी ओर ताकते हैं कि वे कुछ देंगे, ऐसे नीच लोगोंका धिक्कार है ! ऐसे तुच्छ और दरिद्रियोंसे धनपानेकी आशा करना व्यर्थ है ॥२६॥

अब्वल तो पृथ्वी कोई चीज़ ही नहीं है। फिर, यह ज़रासा मिट्टीका लौदा है, जो चारों ओरसे सीमा-बद्ध है, चारों ओर इसके खुद है। फिर ; इस खुद पृथ्वीको भी अनेक राजाओं ने आपसमें खुद कर-करके अपने-अपने अधिकारमें कर रक्खा है। ज़रासी चीज़के हज़ारों टुकड़े हो गये हैं। इन टुकड़ोंके मालिकोंको जो लोग बड़े आदमी और दानी सम्भूते हैं और उनसे कुछ पानेकी आशा करते हैं, उनको बारम्बार धिक्कार है ! क्योंकि उन नामके भूपतियोंके पास रक्खा ही क्या है ? वे स्वयं द्रिद्र हैं। जब वे स्वयं द्रिद्र और सुहताज हैं, तब वे किसकी आशा पूरी कर सकते हैं ? इसलिये, ऐसे खुदोंका मुँह ताकना नीचोंका काम है। मुँह उसका ताकना चाहिये, जो किसी लायक हो। मनुष्यको जो माँगना हो, सर्वशक्तिमान् भगवान् से माँगना चाहिये ; वही सबकी इच्छा पूरी कर सकता है। खुद धनियोंकी खुशामदमें समय गँवाना, वृथा जन्म खोना

( ६४ )

है। वे आप-दीन हैं। उनकी इच्छायेँ क्या पूरी हो गई हैं ? अमीर-गरीब सभी ज़रूरतें रखते हैं। इसलिये दोनों ही दीन हैं। अमीरोंकी ज़रूरतें गरीबोंसे ज़ियादा हैं, इसलिये वे दीनातिदीन हैं। ऐसे दीनोंसे भी जो माँगते हैं, वे बड़े ही निर्बद्ध हैं। अगर माँगना हो है, तो बादशाहों-के-बादशाहसे माँगो। महात्मा कबीरदास कहते हैं—

कबिरा जग की कहा कहूँ, जो भल बूढ़े दास । पारवन्ध पति छँडि के, करै मनुष्य की आस ॥ रामहिं थोरा जानि के, दुनिया आगे दीन । जीवन को राजा कहै, माया के आधीन ॥ राम धनी सिर पर खड़ा, कहा कमी तोहि दास । स्मृष्टि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छँड़े पास ॥ दास दुखी तो हरि दुखी, यदि चन्त तिहुँकाल । पलक एक में परगटे, पल में करे निहाल ॥ जाकी गँठी राम है, ताके हैं सब सिद्धि । कर जोरे ठाढ़ी सबैं, अष्ट सिद्धि नव निद्धि ॥

कबीरदास कहते हैं कि, मैं जगत्के विषयमें क्या कहूँ ? वे लोग बुढ़ी तरह झूब रहे हैं, जो परमब्रह्म परमात्माको छोड़कर शुद्ध मनुष्योंकी आशा करते हैं।

लोग रामको तो कम समझते हैं और दुनियाँके आगे

( ६५ )

दीनता करते हैं तथा मायाके वश होकर जीवोंको राजा कहते हैं।

हे दास ! राम जैसा मालिक तेरे सिर पर खड़ा है, फिर तुझे क्या अभाव है ? उसकी कृपासे ऋद्धि-सिद्धि तेरो सेवा करेंगी और मुक्ति तेरे पीछे फिरेगी।

अगर सेवक दुःखी रहता है, तो परमात्मा भी तीनों कालों में दुःखी रहता है। वह दासको कष्टमें देखकर, क्षणभरमें प्रकट होता और उसे निहाल कर देता है।

जिसकी गाँठमें राम है, उसके पास सब सिद्धियाँ हैं। उसके आगे अष्ट सिद्धि और नौ निधि हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजीने भी कहा है :—

गरल सुषा, रिपु करें मितार्ई ; गोपद सिन्धु, अनल सितलार्ई ।

गरुड सुमेरु रेणु-सम ताही, राम कृपा करिचितर्वाहि जाही ।।

भगवान् जिसकी ओर कृपासे देखते हैं, उसके लिये जूहर अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, समन्दरमें गौके स्वरण डूबें उतना जल हो जाता है, आग शीतल हो जाती है, और भारी सुमेरु-पर्वत रेणुके समान हो जाता है।

बहुतसे मूर्ख इन धनमत्तोंसे यहाँतक कह बैठते हैं— “हुजूर ! हम बड़े सङ्कटमें हैं, हमारी नाव मंझधारमें है, उसे पार लगाइये।” यह बड़ी भद्दी भूलकी बात है। नावका पार लगाना, मनुष्यके हाथ नहीं; डूबती हुई नावको वह सर्व-

( २६ )

शक्तिमान् ही पार लगा सकता है ; अतः बुद्धिमान् लोग उसी के भरोसे रहते हैं, वे तुल्य मनुष्योंके ऐहसान सिरपर नहीं लेते ।

उस्ताद जौकने क्या खूब कहा है :—

अहसाने नाखुदा के, उठाये मेरी बला ।

किरती खुदा पै छोड़ दूँ, लंगरको तोड़ दूँ ॥

माँकीके अहसान मेरी बला उठाये, मैं तो अपनी नाबको ईश्वरका नाम लेकर छोड़ दूँ गा और उसका लङ्गर तोड़ दूँ गा ।

छप्पय ।

इक मृत्तिकाको पिण्ड, रहत जलमौहि निरन्तर ।

सोज सब ही नाहिं, तनकसौ, ताहूँ में डर ।

करत हजारन अंग, भूप तब भोग करत चित ।

मिटत आपनी प्यास, दान को होत कहा चित ? ।

ऐसे दरिद्र दुखसों भरे, तिनहूँ सों जो चहत धन ।

धिङ्कार जन्म वा अश्वसको, सदा सर्वदा लीन मन ।।२६॥

26. In the first place this earth, which is surrounded on all sides by a line of water, is not large enough itself. Secondly, it is divided and owned by multitudes of kings after fighting hundreds

दुःखिका = सिही । पिण्ड = गोला । निरन्तर = सदा । तनकसो = छोटांसा । हजारन अंग = हजारों भाग या कड़े । अश्वस = नीच ।

( ७७ )

सहता, जने-जनेकी खुशामद करता, नर्म-गर्म सहता, पर स्त्री के लिये तो कुछ न कुछ लेकर ही घरमें घुसता है ; रात-दिन बाहर-भीतर उसीका ध्यान रखता और उसके लिये अपने प्राणों तककी परवा नहीं करता । इसके एवजमें स्त्रीसे उसे क्या मिलता है ? भग या पेशाबका पात्र । दिन-रात चिन्ता और अशान्ति । यहाँ नरक और वहाँ नरक । अगर पुरुष इतनी ही या इससे कुछ कम भक्ति भी परमात्माको करे, तो निश्चय ही उसका उपकार हो सकता है । इस जन्ममें उसे सुख-शान्ति मिले और देह छोड़ने पर स्वर्ग या परमपद मिले । शङ्कराचार्यजी ने कहा है :—

कामं क्रांथं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं पश्य हि कांशहम् ।

आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥

काम, क्रोध, लोभ और मोहको छोड़कर आत्मामें देख कि, मैं कौन हूँ । जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, जो अपने स्वरूप या आत्माके सम्बन्धमें नहीं जानते, वे मूर्ख नरकोंमें पड़े हुए पकते हैं ।

जहाँ स्त्री होगी, वहाँ काम, क्रोध, लोभ और मोह अवश्य होंगे ; और जहाँ ये होंगे, वहाँ भगवान् नहीं होंगे । मतलब यह है कि, जब मनुष्यके हृदयमें काम, क्रोध आदिक नहीं रहते, तब उसका हृदय शुद्ध रहता है । शुद्ध हृदयमें ही आत्माका दर्शन होता है । जिस तरह साफ़ आईनेमें सुँह स्पष्ट दीखता

( ७८ )

है, स्थिर और निर्मल जलमें सूर्य-बिम्ब साफ दीखता है ; उसी तरह शुद्ध, स्थिर और निर्मल मनमें परमात्मा साफ दीखता है ।

शिक्षा—जो परमात्माके दर्शन करना चाहें ; जो सदा छव भोगना चाहें, जो भव-बन्धनसे पीड़ा छुड़ाना चाहें, उन्हें कामिनी और काञ्चनमें आसक्ति न रखनी चाहिये । जो इनमें मन लगाये रहते हैं, उन्हें सिद्धि नहीं मिलती—भगवान् उनसे सदा दूर रहते हैं ।

कुच आमिषकी गौठ, कनकके कलश कहत छवि ।

सुखहु कफको धाम, कहत शशिके समान कवि ।

भरत मूत्र अरु धातु, भरी दुर्गन्ध ठौर सब ।

ताकी चंपकबेल कहत, रस रेल टेल दब ।

यह नारि निहारी निन्दतन, बहँके विषयी बावरे ।

याकों बढाय, वाकों विरद, बोले बहुत उतावरे ॥२०॥

20. The breasts of a woman which are nothing but lumps of flesh, are likened by poets to a pair of vessel made of gold. Her mouth which is only a depository of saliva is likened to the moon. Her thighs although wet with falling drops of urine are likened to the trunk of an elephant. Oh ! how contemptible is the person of a woman which is so servilely flattered by the poets !

कुच=लतन । आमिष=मांस । कनक=सोना । कलश=घड़ा । धाम= वर । शशि=चन्द्रमा ठौर=जगह । चंपकबेल=चम्पकलता बावरे=पागल बिरद=तारीफ कर ।

( ७६ )

आज्ञानम्माहात्म्यं पततु शलभो दीपदहने स भीनोऽप्यज्ञानाद्विशयुतमश्वातु पिथितम् ॥

विज्ञानन्तोऽप्येतान्वयमिह विपद्जालनटिला-

न्मृञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥ २१ ॥

अज्ञानवश, पतङ्ग दीपक की लौ पर गिरकर अपने तर्द भस्म कर लेता है ; क्योंकि वह उसके परियायके नहीं जानता ; इसी तरह मछली भी कौटिके मांस पर मुँह चलाकर अपने प्राण खोती है, क्योंकि वह उससे अपने प्राण-नाशकी बात नहीं जानती । परन्तु हम लोग तो अच्छी तरह जान-बूझकर भी विपद्-मूलक विषयेकी अभिलाषा नहीं त्यागते । मोहकी महिमा कैसी विस्मय-कर है ! ॥२१॥

पतङ्ग दीपकके रूपपर मरता है, उसके प्रेममें रँगा रहता है ; इसलिये उसको आलिङ्गन करनेके लिये उसपर भगटकर गिरता है और अपना नाश कराता है । पतङ्गको ज्ञान नहीं है, कि इस पर गिरनेसे मेरी मौत हो जायगी । इसी तरह मछली मछुएके लगाये हुए कौटिके मांस पर मुँह लपकाती है और कण्ठमें काँटा लगनेसे मर जाती है ; क्योंकि वह नहीं जानती, कि मेरी मृत्युका सामान है । पतङ्ग और मछली तो अज्ञानवश अपनी जान खोते हैं ; पर आश्चर्य तो यह है कि, मनुष्य—जिसे भगवान्ने समर्थ दी है, जो जानता

( ८० )

है कि, विषयोंकी कामना आफतकी जड़ है, विषयोंमें सुख नहीं, घोर विपद है; विषय विषसे भी अधिक दुःखदायी है,— विषयोंकी इच्छा करता है। इससे कहना पड़ता है कि, मोहकी माया बड़ी कठिन है। महात्मा कबीरदास कहते हैं :—

शंकर हूँ ते सबल है, माया या संसार ।

अपने बल छूटे नहीं, छुड़ावे सिरजनहार ॥

21 The moth may burn itself by falling over the flame of a lamp, because it is ignorant of the result of its action, The fish may swallow the bait hung by a fisherman, because it is similarly ignorant, How wonderful should the force of attachment be, that we, being thoroughly conversant with the result of action, do not care to renounce the network which brings distress and misery in the end !

फलमलमशनाय स्वादुपानाय तोयं

शयनमवनिष्ठे वलकले वाससी च ।

नवधनमधुपानश्रान्तसर्वेन्द्रियाणा-

मविनयमखुमन्तु नोत्सहे दुर्जनानाम् ॥२२॥

खानेके लिये फलोंकी इफ़्फ़रात है, पीनेके लिये मीठा जल है, पहननेके लिये वस्त्रोंकी खाल है; फिर हम धनमदसे मतवाले दुष्टोंकी बातें क्यों सहे ? ॥२२॥

( ८१ )

जबकि भगवान् ने हमारे लिये खानेको फल-ही-फल पैदा कर दिये हैं, पीनेको जगह-जगह मीठा और शीतल जल भर दिया है, पहनने के लिये दरख्तों को छाल पैदा कर दी है; फिर क्या ज़रूरत, जो हम धनसे मतवाले लोकोके ताने और कटोर बचन सहेँ ?

मनुष्यको सन्तोष नहीं, उसे तुष्णा नहीं छोड़ती ; इसीसे वह विषयोंके भोगनेकी लालसा से धनियों की खुशामद करता है, उनकी टेढ़ी-सूथी सुनता है, अपनी प्रतिष्ठा खोता है, निरादर और अपमान सहता है। अगर वह सन्तोष कर ले, तो उसे ऐसे दुष्टों और धन-मदसे मतवाले शैतानोंकी खुशामद क्यों करनी पड़े ? अपनी मानहावि क्यों करानी पड़े ? परमात्मा इन शैतानोंसे बचावे ! एक तो नातजख्मेकार और तंगदिल लोग वैसे ही शैतान होते हैं, पर जब उन पर दौलतका नशा चढ़ जाता है, तब तो उनकी शैतानीका ठिकाना ही क्या ? उस्ताद औरू कहते हैं और खूब कहते हैं—

नशा दौलत का बद अतवार को, जिस आन चढ़ा ।

सर पै शैतानके, एक और भी शैतान चढ़ा ॥

अनुभव-विहोम और तंगदिल मनुष्य पर जिस समय दौलत का नशा चढ़ गया, तब मानो शैतानके सिर पर एक और शैतान चढ़ गया ।

जिते किसी बीज़की ज़रूरत नहीं, वह किसीकी खुशामद क्यों

( ८२ )

करेगा ? वह अपना भ्रान क्यों खोयेगा ? निस्सृहके लिये तो जगत् तिनके समान है । इसलिये, सुख चाहो तो इच्छाओंको त्यागो ।

अगर आप आशा, तृष्णा और इच्छा को न त्यागोगे, धनियोंके पीछे-पीछे फिरोगे, तो आपको सिवा मानहानि और बे-इज्जतीके कुछ भी न मिलेगा ; पर यदि आप कुछ भी इच्छा न रखेंगे, किसीके भी पास न फटकागे तो दुनिया आपकी खुशामद करेगी, आपकी पूजा-प्रतिष्ठा करेगी और लक्ष्मी आपकी चैरी होकर आपके कदमोंमें पड़ी रहेगी । किसीके ठीक ही कहा है :—

भागती फिरती थी दुनिया, जब तलब करते थे हम ।

अब जो नफरत हमने की, तो बेक़रार आनेको है ॥

दोहा ।

भूमि शयन बरकल वसन, फल भोजन जल पान ।

धनसदमाते नरन को, कौन सहत अहमान ? ॥२२॥

22. While there is plenty of fruit to eat, delicious water to drink, the surfaces of the earth to sleep upon and the bark of trees to wear, we should not care to bear the taunts of evil-minded persons whose senses have all been taken prisoner by newly-got wealth.

तलब करना=डुलाना । नफरत=दुष्प्रा । बेक़रार=बेचैन । भूमि=त्रभूमि । शयन=सोना । बरकल=डाल । वसन=कपड़ा । अहमान=अभिमान-पूर्ण बातें ।

( ८३ )

विपुलहृदयैर्धन्यैः कैश्चिज्जगज्जनितं पुरा ।

विद्युतमपरेर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा ।

इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते ।

कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मद्भ्यः ॥ २३ ॥

कोई तो ऐसे बड़े दिलवाले लोग हुए, जिन्होंने प्राचीनकालमें इस जगत्की रचना की ; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने इस जगत्को अपनी भुजाओं पर धारण किया ; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने समग्र पृथ्वी जीती और फिर तुच्छ समझकर दूसरोंको दान कर दी ; और कुछ ऐसे भी हैं जो चौदह भुवनका पालन करते हैं । जो लोग, थोड़ेसे गाँवोंके मालिक होकर, अभिमानके ज्वरसे मतवाले हो जाते हैं, उनके सम्बन्धमें हम क्या कहें ? २३ ॥

इस जगत्में ऐसे लोग भी हुए, जिन्होंने जगत्की रचना कर डाली, पर उन्हें जरा भी अभिमान न हुआ । कुछ ऐसे लोग भी हुए, जिन्होंने इसे अपनी भुजाओं पर रखवा, पर अभिमान न किया । कुछ ऐसे हुए, जिन्होंने सारी दुनियाँको जीत लिया और फिर तुच्छ समझ कर दान भी कर दिया, पर उन्हें अभिमान न हुआ । कोई ऐसे हैं, जो इस संसारका पालन करते और इस पर आधिपत्य रखते हैं, पर उन्हें जरा भी घमण्ड नहीं । फिर वे लोग जो चन्द्र गाँवोंके मालिक बन जाते हैं, घमण्डके मारे क्यों पेड़ने लगते हैं ?