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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

वैराग्यशतक ७७६

हे खी ! अब तू अपनी कामसद पैदा करने वाली दुष्टि को रोक ले, हम पर कटाक्षवाक्ष न जला । तेरा परिश्रम व्यर्थ आयगा । क्योंकि अब हमने विषयों को तुष्टवत् त्याग दिया है ।

( २४१ )

तक नरकमें ही हैं; पर मैं विवेक-बुद्धिसे काम लेकर, नरकसे निकलकर स्वर्गमें आ गया हूँ। आप अभी तक दुःखके बीज ही बो रहे हैं; पर मैं अब सुखके बीज बो रहा हूँ। मित्र! तुम भी मेरी तरह उन भयङ्कर जञ्जालोंको छोड़ कर, मेरी जैसी सुखको राह पर क्यों नहीं आ जाते? मित्रवर ! इसी राहमें सुख है; उस राहमें घोर दुःख और नरकयातनायें हैं। संसारको छोड़ने और भगवत् से-प्राप्ति करनेमें बड़ा आनन्द है। उस्ताद् जौकने कहा है:—

दुनियासे जौक, रिश्तये उल्फतको तोड़ दे ।

जिस सरका है यह बाल, उसी सरमें जोड़ दे ॥

दोहा ।

तुम-हम हम-तुम एक हैं, सब विधि रखो अमेद ।

अब तुम-तुम हम-हमहि हैं, भयो कठिन यह मेद ॥

65. I had such a staunch connection with you before that it seemed as if you were I and I was you. What has happened now that you have become yourself and I myself again?

बाले लीलामुकुलितममीन्धरा दधिप्राता:

किं चिप्प्यते विरमं विरमं व्यर्थ एव अमस्ते ॥

संपत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमाप्नोत् वनान्ते

जीणो मोहस्तृणमिव जगन्जालमालोकयामः ॥ ६६ ॥

२६

( २४२ )

ऐ वाला ! अब तू लीलासे अपनी आधी खुली आँखोंसे मुझ पर क्यों कटाक्ष-वाण चलाती है ? अब तू काममद पैदा करने वाली दृष्टि को रोक ले ; तेरे इस परिश्रम से तुझे कोई लाभ न होगा । अब हम पहले जैसे नहीं रहे हैं । हमारी जवानी चली गई है । अब हमने वनमें रहनेका निश्चय कर लिया है और मेहत्याग दिया है ; अब हम विषय-सुखों को तृण से भी निकम्मा समझते हैं ॥३॥

महाकवि दाग कहते हैं :—

तोवा जो मैंनेकी, निकल आया ज़रासा मुँह ।

वह रंग रूप ही नहीं, सुबहे बहारका ॥

बसन्त को अपने सौन्दर्यका बड़ा अभिमान था । जबसे मैंने शराब पीनेसे तोबा कर ली है, तबसे बसन्त-लक्ष्मीका मुँह फोका पड़ गया है । जब तक मैं शराबी था, तभी तक उसकी शोभाका कायल था । अब तो मुझे उसमें कुछ भी विशेषता मालूम नहीं होती ।

66. O young lady, why art thou playfully peeping at us out of half-closed eyes ? Stop thy love-inspiring glances as all thy labour will be fruitless. Now we are different from what we were before. Our youth has gone. We are now bent on living in the forest. Our attachments have been given up and we look at the enjoyments of the world like a worthless straw.

( २४३ )

इयं बाला मां प्रत्यनवरतभिन्दीवरदल प्रभाचोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ॥

गतो मोहोऽस्माकं स्मरकुसुमवाण्यव्यतिकर-

ज्वलज्ज्वाला शान्ता तदपि न वराकी विरमति ॥६७॥

यह बाला ल्नी सुम्र पर बार-बार नील कमलकी शोभासे भी सुन्दर नेत्रोंके कटाक्ष क्यों मारती है ? मैं नहीं समझता, इसका क्या मतलब है ? अब तो मेरा मोह जाता रहा है—कामके पुष्प-वाणोंसे निकली हुई आगकी ज्वाला शान्त हो गई है। आश्चर्य है, कि अब तक भी यह मूर्खा बाला अपनी कोशिशोंसे बाजू नहीं ब्राती ! ॥६७॥

जिनका मोह-जाल कट जाता है, जिनकी विषयवासना बुझ जाती है, जो स्त्रियोंकी असलियत को समझ जाते हैं, जो उनको नरककी नसेनी समझ लेते हैं, उनपर स्त्रियोंके कटाक्ष-वाण असर नहीं करते। हाँ, वे अपने स्वभावानुसार अपने तीखे-तीखे वाण चलाया ही करती हैं—अपने जाल बिछाया ही करती हैं ; पर तत्त्ववित् लोग उनके जालमें नहीं फँसते। उन पर उनके अचूक वाण फँल हो जाते हैं।

दोहा ।

केहि कारण डारत वयन, कमलनयन यह नार ।

मोह काम मेरे नहीं, तज न तिय-चित् हार ॥६७॥

( २४४ )

67. Why does this young woman continuously throw at me glances out of eyes which are beautiful like a lotus-leaf ? I wonder what is her object in doing so ! My passions have now gone and the fire lit up within my heart by concussion produced by the striking of cupid's arrows of flowers has been extinguished. It is strange that the foolish damsel does not quit her efforts even now !

रम्यं हर्म्यतलं न किं बसतये श्राव्यं न गेयादिकं किं वा प्राणसमासमागमसुखं नैवाधिकं पीतये ॥ किं तूद्धान्तपतयंतगपवनन्यालोलीदीपांकुर- च्छायाचंचलमाकलव्य सकलं सतो बनांतं गताः ॥६८॥

क्या सन्तोके रहनेके लिये उत्तमोत्तम महल न थे, क्या सुनने के लिये उत्तमोत्तम गान न थे, क्या प्यारी-प्यारी स्त्रियोंके संगम का सुख न था, जो वे लोग बनोमें रहनेको गये ? हाँ, सब कुछ था ; पर उन्होंने इस जगत्को गिरने वाले पतंगके पछोसे उत्पन्न हवासे हिलते हुए दीपक की छायाके समान चञ्चल समझकर छोड़ दिया ; अथवा उन्होंने मूर्ख पतंगकी भाँति, जो हवासे हिलते हुए दीपक की छायामें घूम-घूमकर अपने तर्जि जलाकर भस्म कर देता है, संसारको अपना नाश कराते देखकर संसारको छोड़ दिया ॥६८॥

यह संसार दीपक की लोहे के समान है और इसमें बसने वाले जीव पतङ्गोंके समान हैं। जिस तरह मूर्ख पतङ्ग दीपक

वैराग्यशतक २

पञ्जाबी भगवत् प्रसंग और महालियों की समग्र संख्या का भाषा तोड़ में देख कर पाठना जाय करने हैं :

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( २४५ )

से मोह करके और उस पर गिर-गिर भस्म होते हैं ; उसी तरह मनुष्य इस संसारके असल तत्त्वको न समझकर, इसके मोहमें फँस कर, इसमें नाश होते हैं । जिस तरह पतङ्ग नहीं समझता, कि दीपकसे प्रेम करनेमें मेरे हाथ कुछ न आवेगा, बल्कि मेरी जान ही जायगी ; उसी तरह संसारी आदमी नहीं समझते, कि इन संसारी विषय-वासनाओंमें फँस कर, इनसे प्रेम करके हम अपना नाश करा बैठेंगे । जो बुद्धिमान और विचारवान् है, वे इस बातको समझते हैं ; अतः संसारी पदार्थाँसे मोह नहीं करते और अपने नाशसे बचते हैं । वे संसारको अनित्य और नाशकी निशानी समझ कर, इससे मन हटाकर परमात्मामें मन लगाते हैं । वे अपने तर्जुनियार्थाका मुसाफिर मात्र समझ कर, मौतका हरदम खयाल रखते हैं । महात्मा कबीरने कहा है—

तन सराय मन पाहरु, मनसा उत्तरी आय । को काहू को है नहीं, सब देखा ठोक बजाय ॥ “कबिरा” रसरी पाँव में, कहैं सोचे सुख चैन । शवास-नकारा कूँच का, बाजत है दिन रैन ॥ इस चौसर चेता नहीं, पशु-ज्यों पाली देह । राम नाम जाना नहीं, अन्त परी सुख लेह ॥

यह शरीर सराय है, मन चौकीदार है और मनसा—इच्छा इस शरीर कपी सरायमें उत्तरा हुआ मुसाफिर है ; इस जगत्में

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नी यें ता ने

को हल

( २४६ )

कोई किसीका नहीं है। अच्छी तरह ठोक बजा या जाँच पड़-ताल कर देख लिया।

हे कबीर ! पैरोंमें रस्सी पड़ी हुई है। फिर भी तू सुख-चैनमें कैसे सो रहा है? देख, इस दुनियासे कूच करनेका आस-रूपी नगाड़ा दिन-रात बज रहा है !

अगर तू इस चौपड़के खेलमें न चेतोगा, इस जन्ममें भी होश न करेगा, पशुकी तरह शरीरको पाछेगा और रामको नहीं जानेगा ; तो अन्तमें तेरे मुँहमें धूल पड़ेगी।

छपय ।

महल महारमणीक, कहा बसिने नहीं लायक ?

नाहिन सुनवे जोग, कहा जो गावत गायक ?

नवतरुणी के संग, कहा सुखहूँ नहीं लागत ?

तो काहे को छँड़-छँड़, ये बन को भागत ?

इन जान लियो या जगतको, जैसे दीपक पवनमें ।

बुझिजात छिनकमें छवि भर्यो, होत अँधेरो भवनमें ॥६८॥

अतीव सुन्दर और रमणीक महल क्या बसने योग्य नहीं हैं ? गवैये जो मनोहर गाना गाते हैं, क्या वह छनने योग्य नहीं है ? नवीना बाला स्त्रियों के साथ रम्या करनेमें क्या आनन्द नहीं आता ? अगर इन सबमें आनन्द और सुख है, तो फिर लोग इन सबको छोड़-छोड़ कर बनमें क्यों भागे जाते हैं ? इसलिये भागे जाते हैं, कि उन्होंने इस जगत्को उस दीपकके समान समझ लिया है, जो हवामें रखा हुआ है और ज्वा-भरमें उफ-जाता है।

( २४७ )

68. Were there no comfortable mansions for the holy men to live in or musicians' songs to hear or the pleasure of the company of dearly loved women to enjoy, that these holy men went to live in the forests ? Finding all the mankind bent upon self-destruction like the foolish moth, which flies here and there in the shade of a lamp seeking to throw itself on its flame which is continually being flattered by the wind, they went to the forests.

किं कन्दःकन्दरेभ्यःप्रलयमुपगता निर्धरा वा गिरिस्थः

प्रवृत्स्ता वा तरुभ्यःसरसफलभूतो वल्कलिन्मथ श्राखाः॥

वीच्यन्तेयन्मुखानि प्रसभभगतप्रथयाणां खलानां

दुःखोपात्ताल्पवित्तसम्यवशपवनानर्तितश्रूतानि ॥६६॥

क्या पहाड़ोंकी गुफाओंमें कन्दमूल और उनकी चट्टानोंमें पानी के भरने नहीं रहे, क्या डाल वाले वृक्षोंमें रसीली फलवती शाखायें नहीं रही, जो लोग उन अभिमानी और नीचोंके सामने दीनता करते हैं, जिनकी माँहें मारे अभिमानके चढ़ी रहती हैं और जिन्होंने बड़े कष्टसे थोड़ासा धन जमा कर लिया है ? ॥६६॥

पहाड़ों में रहने को गुफायें, खाने को कन्दमूल, पीने को उनके भरनों का जल और वृक्षोंमें मीठे-मीठे रसीले फल मौजूद हैं ; फिर भी लोग उन धनियों की टेढ़ी भुकुटियों को क्यों देखते हैं, उनकी टेढ़ी-सुधी क्यों सहते हैं, जिनकी आँखें उस थोड़े से धनके मद से नहीं खुलतीं, जो उन्होंने बड़े-बड़े कष्टों से येनकेन प्रकारेण जमा कर लिया है ! ऐसे नीच

( २४८ )

अभिमानियों से अपमानित होने की अपेक्षा पहाड़ों में रहना और फलमूल तथा शीतल जल पर गुज़ारा करना भला । इस से उनकी आत्मा खूब सुखी होगी ; अभिमानी नीच धनियोंकी बुढ़ी बातोंसे आत्मा जल-जल कर खाक होती है ।

अगर कुछ भी समझ हो, जरा भी आत्मप्रतिष्ठा का खयाल हो, तो मनुष्य को अपनी “इच्छा” का नाश करना चाहिये । इच्छा-रहित मनुष्य सात विलायतों के बादशाह को भी तुच्छ समझता है । धनियों से दीनता करना और माँगना बड़ी बुढ़ी बात है । देखिये, गोस्वामी तुलसीदासजी प्रभुति महा पुरुषों ने कहा है :—

तुलसी कर पर कर* करो, कर तर कर न करो ।

जा दिन कर तर कर करो, ता दिन मरन करो ॥

माँगन मरण समान है, मत कोई माँगो भीख ।

माँगन ते मरना भला, यह सतगुरुकी सीख ॥

तुलसीदासजी कहते हैं—हे प्रभु ! हाथपर हाथ करो, हाथ के नीचे हाथ न करो । जिस दिन हाथके नीचे हाथ करो, उस दिन हमारी मौत हो जाय । मतलब यह है कि, जब तक हम दूसरोंको देते रहें, तबतक हम जीवित रहें ; जिस दिन हमारी माँगनेकी नौबत आ जाय, उस दिन हम मर जायँ ।

✽ कर पर कर करो=पराये हाथके ऊपर हमारा हाथ रहे—हम देते रहें । लेने वालेका हाथ लेने वालेके हाथके ऊपर रहता है और लेने वालेका हाथ दाताके हाथके नीचे रहता है ।

( २४६ )

माँगना मरनेके बराबर है। इसलिये कोई भी भीख न माँगो। सतगुरुको शिक्षा है कि, माँगनेसे मर जाना भला।

अगर दीनता ही करनी हो तो परमात्मा से करो। उसके आगे दीनता करनेसे सभी इच्छायें पूरी हो सकती हैं। कहा है :—

तेरी बन्दानवाजी, हफ्त किशवर वर्षमा देती है।

जो तू मेरा—जहाँ मेरा, धरव मेरा, अजम मेरा ॥ दाग ॥

तेरी सेवा करनेसे सातों वलायतों का राज मिल जाता है। जब तू अपना हो जाता है ; तब सभी अपने हो जाते हैं। कबीरने कहा है :—

थोड़ा सुमिरत बहुत सुख, जो करि जाने कोय ।

सुत लगै न बिनावनी, सहजै तनसुख होय ॥

साई सुमिर, मत दौल कर; जा सुमरे ते लाह ।

वहाँ खलक खिदमत करे, वहाँ अमरपुर जाह ॥

भगवान्की थोड़ीसी याद करनेसे ही बहुत सुख होता है, वशसे कि कोई याद करना जाने। इसमें न तो सूत लगता है और न बिनवाई देनी पड़ती है ; सहजमें आनन्द होता है।

हे मनुष्य ! स्वामीको सुमरण करनेमें देर न कर। उसके सुमरणमें बहुत लाभ है। जो स्वामीको याद करता है, इस दुनियामें संसारी लोग उसकी सेवा करते हैं और जब मर कर दूसरी दुनियामें जाता है, तब स्वर्गपुरीमें बसता है।

( २५० )

क्षप्य ।

कहा कन्दराहीन भये, पर्वत भूतल से ?

भरना निर्जल भये कहा, जे पूरित जल से ?

कहा रहे सब वृक्ष, फूल-फल-बिन सुरभाये ?

सहे खलनके वैन, ग्रन्थता जो मद छाये ।

कर संचित धन जे स्वरूप हूँ; इत उत फेरें भू विकट ।

रे मन ! तू भूल न जाहु कई, इन खल पुरुषनके निकट ॥६६॥

69. Have the wild roots in the caves of mountains and the springs of water flowing out of rocks disappeared or the branches of trees bearing juicy fruits been destroyed, that people look supplicatingly towards the faces of proud and evil-minded persons, whose brows often contract with vanity owing to the little wealth, which they possess after having laboured hard for it ?

गंगातरंगकण्डीकरशीतलानि

विद्याभराध्युपितचारुशिलातलानि ॥

कन्दराहीन-बिना गुफाओंके । भूतल-पृथ्वी । निर्जल-बिना जलके । पूरित-भरे हुए । खलन-दुष्टों । वैन-बाते । कर संचित-इकट्टा करके । जे-जो । स्वरूप हूँ-थोड़ासा भी । इत उत-उधर उधर । भू-भौँ । भूल न जाहु-भूल कर भी न जा । क्या पर्वतोंमें गुफाये नहीं रही, क्या भरनोंका जल सूख गया, क्या वृक्षोंमें फल-फूल नहीं रहे, जो तू मदान्व दुष्टोंको तानेजती सहता है ? जो थोड़ासा भी धन सन्चय करके भौखोंको टेढ़ी करते हैं, उन दुष्टोंके पाँख है मन ! तू भूलकर भी मत जा ।

( २५१ )

स्थानानि किं हिश्वतः प्रलयं गतानि

यत्सावमानपरिण्डरता मनुष्याः ॥७०॥

हिमालय पर्वतकी वे चट्टानें जो गंगाजलकी लहरोंसे उठे हुए छाँटोंसे शीतल हो रही हैं और जहाँ जगह-जगह विद्याधर बैठे हैं क्या अब नहीं रही हैं, जो लोग अपमानसे मिले हुए पराये टुकड़ों पर गुजर करते हैं ? ॥७०॥

पराये टुकड़ों पर गुजर करनेकी अपेक्षा मर जाना भला है। अगर माँगना ही हो, तो माँगने की विधि चातक से सीखनी चाहिये। वह एक से ही माँगता है, दूसरेसे हर-गिज़ नहीं माँगता, चाहे मर क्यों न जाय, और माँगनेमें भी यह खूबी, कि वह कभी अधीन होकर नहीं माँगता, खिर नवाकर नहीं लेता। वह छोटोंसे नहीं माँगता; एक घन-श्याम ( बादल ) से ही माँगता है। चातकके समान याचक और वापिद ( बादल ) के समान दानी जगत्में कौन है ? जो ओछोंसे माँगते हैं, जने-जनेके पैर पकड़ते हैं, उनको चिकार है ! इसलिये मनुष्यों ! पपहिये की तरह एकमात्र घनश्याम से ही माँगो। महात्मा तुलसीदासजीने कहा है:—

“तुलसी” तीनों लोक मैं, चातक ही को माथ ।

सुनियत जासु न दीनता, किये दूसरो नाथ ॥

ऊँची जाति पीहरा, नीचो पियत न नीर ।

कै याचै घनश्याम सों, कै दुख सहे शरीर ॥

( २५२ )

हूँवे अधीन चातक नहीं, शीश नाय नहीं लेय । ऐसे मानी मँगनहिं, को वारिद बिन देय ? ॥

तुलसीदासजी कहते हैं—तीनों लोकोमें सिर्फ एक पपहिये का ही सिर ऊँचा है, क्योंकि उसने अपने स्वामी खातीके सिवा और किसीसे कभी दीनता नहीं की ।

पपहियेकी जाति ऊँची है; क्योंकि वह नदियों और तालाबों वगैरः जलाशयोंका पानी नहीं पीता । वह या तो धनश्यामसे यानी खाती नक्षत्रमें बाढ़लसे ही माँगता है अथवा दुःख भोगता है ।

पपहिया और मँगतोंकी तरह अधीन होकर और सिर नवाकर नहीं लेता । वह तो मानके साथ ही लेता है । ऐसे मानी मँगतेको बाढ़लके सिवा और कौन दे सकता है ?

जिनको परमात्माने देने-लायक बनाया है, उन्हें दिल खोल कर गरीब और मुहताजोंकी देना चाहिये । जो देते हैं, फिर पाते हैं और जो देते हैं उन्हींका जीवन सफल है । रहीम कवि कहते हैं:—

दोहा ।

दीनहि सबको लखत है, दीन लखे नहिं कोय । जो “रहीम” दीनहिं लखत, दीनबन्धु-सम सोय ॥ “रहियन” बे नर मर चुके, जे कई मँगन जाहिं । उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं ॥

( २५३ )

तवही लग जीवो भलो, दीवो परे न धीम ।

विन दीवो जीवो जगत, हमें न रुचे ‘रहीम’ ॥

दीन या मुहताज सबकी तरफ देखता है, पर दोनकी तरफ कोई नहीं देखता । रहीम कहते हैं, जो दीनकी तरफ देखता है, वह दीनबन्धु भगवान् के समान होता है ।

रहीम कहते हैं, वे मनुष्य मर गये जो कहीं माँगने जाते हैं । उनसे पहले वे मरे, जिनके मुँहसे नाहीं निकलती है । मतलब यह है, माँगता तो मरा हुआ है ही, पर जो माँगने वालेको नहीं देता, वह उससे भी पहले मरा हुआ है ।

जीना तभी तक अच्छा है जब तक देना मन्द न हो । बिना दान किये जीना, रहीम कहते हैं, हमें अच्छा नहीं लगता ।

दोहा ।

गंगातट गिरिवर गुफा, उहाँ कहा चहि ठौर ? ।

क्यों एते अपमान सों, खात पराये कौर ? ॥७०॥

70. Have the grounds in the Himalaya mountains the stones of which are washed by the cold spray arising from water of the river Ganges and which are the favourite resort of Vidyadharas been destroyed, that men like to depend upon other people's charity, even when it is disrespectfully given ?

गिरिवर गुफा=पहाड़ोंकी गुफा । उहाँ=वहाँ । कहा=क्या । ठौर=जगह । एते=इतने । खात=खाता है । पराये कौर=पराये ठुकरे । क्या गंगाकिनारेके पहाड़ोंकी गुफाओंमें जगह नहीं रही, जो इतना अपमान सह कर पराये ठुकरे तोड़ता है ?

( २५४ )

यदा मेहः श्रीमान्नपतति युगान्ताग्निनितः

समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरनिकराहानिलयाः ॥

धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता

शरीरिका वार्ता करिकलभकर्णग्रिचपले ॥७१॥

का

सिः

ता

धन

दुः

नव

मा

पा

का

जब प्रलयकालकी अग्निके मारे श्रीमान् सुमेरु पर्वत गिर पड़ता है ; मगर-मच्छोंके रहनेके स्थान समुद्र भी सूख जाते हैं ; पर्वतोंके पैरोसे दबी हुई पृथ्वी भी नाश हो जाती है ; तब हाथीके कानकी कोरके समान चञ्चल मनुष्यकी क्या गिन्ती ? ॥७१॥

जब काल सुमेरु जैसे पर्वतोंको जला कर गिरा देता है, महासागरोंको सुखा देता है, पृथ्वीको नाश कर देता है, तब इस छोटेसे चञ्चल मनुष्यकी क्या गिन्ती ? इसके नाश होने में कौनसा आश्चर्य ?

दोहा ।

मेरु गिरत सूखत जलधि, धरनि प्रलय हवै जात !

गजसुतके श्रुति चपल ल्यों, कहा देहकी बात ? ॥७२॥

मेरु=उमेरु पर्वत । जलधि=समुद्र । धरनि=पृथ्वी । प्रलय=नाश । गजसुत=हाथीका बच्चा । श्रुति=कान । चपल=चंचल । मेरु=बात=उमेरु गिर पड़ता है, समुद्र सूख जाता है और पृथ्वी नाश हो जाती है, तब हाथीके बच्चेके कानकी तरह चञ्चल देह किस गिन्तीमें है ?

( २५५ )

71. When even the great Meru collapses, burnt away by the Mahapralaya fire,* when even the oceans which are the home of huge crocodiles and sharks are at last dried up and when the earth itself is destroyed although; it is held fast by the feet of great mountains, what should we say of the human body which is as shaky as the ear of an infant elephant?

एकाकी निःस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः ॥

कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षमः ॥७२॥

हे शिव ! मैं कब अकेला, इच्छा-रहित और शान्त हूँगा ? कब हाथ ही मेरा पात्र होगा और कब दिशायें मेरे वक्ष होंगे ? मैं कब कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ हूँगा ? ॥७२॥

एकान्त वास करना, इच्छाओंको त्याग देना, शान्त रहना, हाथसे ही पानी वगैरः पीनेके बर्तनका काम लेना, दिशाओंको ही वस्त्र समझना ; यानी नम्र रहना और कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ होना—ये ही कल्याणके मार्ग हैं। जिनमें ये गुण हैं, वे धन्य हैं और वे ही सच्चे सुखिया हैं।

दोहा ।

एकाकी इच्छा-रहित, पाणिपात्र दिगवस्त्र ।

शिव शिव ! हँ कब होऊँगो, कर्मशत्रुको शस्त्र ? ॥७२॥

  • The fire at the time of universal destruction.

एकाकी = अकेला । इच्छा रहित = बिना इच्छाओंके । पाणिपात्र =

( २५६ )

72, O Shiva, when shall I be alone, desireless, peaceful, with hands only to be used as receptacles for water etc., with space only in place of garments and fit for exterminating the roots of Karma (actions) ?

पासाः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं

दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम् ॥

समानिताः प्रणयिनो विषवैस्ततः किम्

कल्पं स्थितं तदुभृतां तदुभित्ततः किम् ॥७३॥

जीर्णां कथा ततः किं सितममलपटं पटसुत्रं ततः किं

एका भायां ततः किं हयकरिसुगणैराड्रुतो वा ततः किम् ॥

भक्तं सुक्तं ततः किं कदशनमथ वा वासरोते ततः किं

व्यक्त ज्योतिर्निर्वातमथितभवभयं वैभवं वा ततः किम् ॥७४॥

अगर मनुष्योंको सब इच्छाओंके पूर्ण करनेवाली लक्ष्मी मिली तो क्या हुआ ? अगर शत्रुओंको पदानत किया तो क्या ? अगर धन से मित्रोंकी खातिर की तो क्या ? अगर इसी देहसे इस जगत्में एक कल्प तक भी रहे तो क्या ? ॥७३॥

अगर चिथड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी पहनी तो क्या ? अगर निर्मल सफेद वस्त्र पहने या पीताम्बर पहने तो क्या ! अगर एक ही स्त्री


हाथका बतन । दिग् = दिशाएँ । वस्त्र = कपड़े । हौं = मैं । कर्म शत्रु = कर्म रूपी शत्रु का शस्त्र = काटने वाला डथियार ।

( २५७ )

रही तो क्या ? अगर अनेक हाथी-घोड़ों सहित अनेकों ख़ियाँ रहीं तो क्या ? अगर नाना प्रकारके व्यञ्जन भोजन किये अथवा शामको मामूली खाना खाया तो क्या ? चाहे जितना विभव पाया, पर यदि संसार-वन्धनको मुक्त करनेवाली आत्मज्ञानकी ज्योति न जानी, तो कुछ भी न पाया और कुछ भी न किया ॥७४॥

मतलब यह है, सारे संसारके राज्य-वैभव अथवा त्रिभुवन के अधिपति होनेमें भी जो आतन्त्र नहीं है, वह आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञानमें है । आत्मज्ञान होनेसे ही मनुष्य, जीवन-मरणके कष्टसे छुटकारा पाकर, परम शान्ति-लाभ करता है ।

अर्ब सर्व लो द्रव्य है, उदय अस्त लो राज ।

जो तुलसी निज मरन है, तौ आवे केहि काज ॥

अगर अरब-खरब तक धन हो और उद्याचलसे अस्ताचल तक राज हो, तोभी अगर अपना मरण हो, तो ये सब किस कामके ? धन-दौलत और राजपाट सब जीते रहने पर काम आते हैं, मरने पर इनसे कोई लाभ नहीं ।

दोहा ।

इन्द्र भये धनपति भये, भये शत्रु के साल ।

कल्प जिऐ तौऊ गये, अन्त कालके गाल ॥७४॥

इन्द्र = देवताओंका राजा । धनपति = धनेश, कुबेर । कल्प = ब्रह्मा का एक दिन, जो हमारे ४३२०००००००० बरसोंके बराबर होता है । अगर

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