वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
PREFACE.
In 1915, a translation of NITISHATAK of Maharaja Bhartri Hari was published by my firm well-known as Haridas & Co. I had an intense desire thenceforward, to publish a translation of VAIRAGYASHATAK also. I wrote to several well-known scholars but up to March last no one favoured me with a promise to take up the work. In the meantime my worthy customers began to send me repeated reminders and demands for the new book. Finally I ventured to translate it myself, as it was better to do something than nothing. I know very well that I am not scholar in any language nor am I well-know Hindi writer, but the public like the style and language of the books written by me with keenness. This was my only consideration to take up this bold undertaking, although it is like that of a dwarf trying to reach the moon. I do not know how far I have been successful. It is quite possible that there are many short-comings and defects, because I had to do this hurriedly—in fact within the short space of about two weeks.
( ४ )
It is perhaps superfluous to add that every one of the ślokas of the Niti, Vairagya and Shringar Shatakas, compiled by MAHARAJA BHATRIHARI is worth lacs of Rupees. His slokas have a peculiar charm which no other author's slokas have. It is impossible to describe the unspeakable pleasure it produces in the minds of its readers. The pleasure can better be imagined than described. I request every literate person to read it once or twice every week, so that he may think about the transitoriness of the world, and give up worldly desires and may fix his mind in the meditation of the Supreme Being and may devote his life and time in philanthropic and benevolent works.
There are lots of translations of VAIRAGYA SHATAK, but the translators seem not to have taken sufficient pains to explain the deep philosophy underlying its slokas. The present work has been undertaken with the sole object of making it easy to be understood by ordinary literate people and hence it is that its language has been made as easy as possible. The purport has been taken into consideration and not the meanings of the words only and in order to make it as easy as possible, free translation has been made and not literal.
( ३ )
First the original sloka has been put, then the purport and after that the soul-enchanting verses of Shri Maharaja Pratap Singhjoo and last of all the English translation has been put in. The purport verses and English translation all have been numbered as per the original slokas. But in the verses appearing in the explanatory notes no number has been given, because those verses do not give the purport of the original slokas of the VAIRAGYA SHATAKA. They have been put in along with the notes, simply to cheer the readers and it is hoped they will offer a pleasant reading to the reader.
In the preparation of this book much help has been taken from Tulsi Satsai, Sunder Bilas, Kabir's Sakhī. Occasional quotations have also been made from "Ustad Zauq" "Dagh the great poet" and Ghalib the great poet. For these quotations I am much indebted to my venerable friend and scholar Pandit Jwala Dutta Sharma, Editor "The Pratibha."
I received much assistance from a friend of mine in its preparation. I wanted to disclose his name and wrote for permission, but he seemed to be quite unwilling to consent and it is with regret that I can not publish his name here.
( ३ )
I am also highly thankful to my esteemed friend Babu Chhogmal ji Chopra, B. A., B. L., pleader Small Causes Court, Calcutta for the assistance he gave me from time to time in this connection.
About 20 half-tone pictures have been put in at the proper place at considerable expense and that at a time when there is a famine of printing papers.
I trust that my esteemed friends and admirers would overlook my mistakes and defects and give me encouragement in my present enterprise, so that I may in future serve my mother-tongue more cheerfully and successfully.
CALCUTTA, The 15th April, 1920
HARIDASS VAIDYA.
॥ श्रीः ॥
A decorative border consisting of a repeating pattern of stylized floral or geometric motifs. In the center of this border, the word 'निवेदन' (Nivedan) is written in a bold, serif font.
जगदीशकी कृपासे आज "वैराग्यशतक" का तीसरा संस्करण छपकर तैयार है। लेखकको अपनी लिखी पुस्तकके संस्करण पर संस्करण होते देखकर कितनी खुशी होती है, यह कहने की ज़रूरत नहीं। दो-दो हजार प्रतियोंके दो संस्करण शीघ्र ही छप जानेसे साफ मालूम होता है कि, हिन्दी-प्रेमियोंने इस तुच्छातितुच्छ लेखकके अनुवादको बूब पसन्द किया है। हिन्दीके अनेक समाचार पत्रोंने भी हमारे अनुवाद किये नीति, वैराग्य और श्रृंगार शतककी दिल खोलकर तारीफ की है।
पाठकों और पत्र सम्पादकोंके उत्साहवर्द्धनसे उत्साहित होकर, प्रकाशकोंने इस बार इसमें ६ चित्र और भी बढ़ा दिये हैं। पहले संस्करणमें २० और दूसरेमें २६ चित्र थे। इस तीसरे संस्करणमें ३८ हाफटोन चित्र हो गये हैं। इन चित्रोंसे ग्रन्थकी शोभा और भी बढ़ गई है। हमारे एक विद्वान,
( ३ )
मित्रने हमारी अनुपस्थितिमें कितने ही खलोंमें महाराज प्रताप सिंहजी की व्रतकारिणी कविताओंके कठिन शब्दोंके अर्थ कुटनोद्योंके स्थानोंमें लिखनेकी कृपाकी है। इस शब्दार्थसे साधारण हिन्दी जानने वालोंको कविताओंका मर्म समझनेमें अवश्य आसानी होगी ; पर अफसोस है, सारी ही कविताओंके शब्दार्थे विस्तार-भयसे नहीं लिखे गये। सभी कविताओंके शब्दार्थकी ज़रूरत भी नहीं समझी गई, क्योंकि घूम फिर कर वे ही शब्द बारम्बार आते हैं। आशा है, पाठक इतनेसे ही सन्तुष्ट हो जायेंगे।
इस संस्करणमें, भाषाकी बुटियों पर भी जहाँ-तहाँ ध्यान दिया गया है। फिर भी आधीसे ज़ियादा पुस्तक हमारी नमौ-जूदगीमें छपी, इसलिये वहाँ कोई सुधार न हो सका। अगर इस संस्करणमें भी बुटियाँ या गलतियाँ रह गई हों, तो पाठको से हमारा नम्र निवेदन है कि, वे हमें पहलेकी तरह ही क्षमा प्रदान करें।
भगवान् कृष्णकी असीम कृपासे हमारे अनुवाद किये हुए “श्रृंगार शतक” का भी नवीन संस्करण होने वाला है। पुस्तक प्रेसमें दे दीगई है। अगर दैव अनुकूल रहा, विघ्न-बाधाओंका सामना न करना पड़ा, कोई अमङ्गल घटना न घटी और स्वास्थ्य अच्छा रहा, तो श्रृंगार शतकके भी चित्रों और पृष्ठों में वृद्धि की जायगी ; क्योंकि हमारा श्रृंगार भी पाठकोंने खूब पसन्द किया है। पाठकों की क्रूरदानीका ही नतीजा है कि, दो
( ८ )
हज़ारी संस्करण प्रायः डेढ़ सालमें ही शेष हो गया। अनेक पत्रसम्पादक महोदयोंने भी हमारा श्रृंगार शतक पढ़ कर भूरि-भूरि प्रशंसा की है। “वर्त्तमान”-सम्पादक श्रद्धेय पण्डित रमाशङ्करजी अवस्थी तो उस पर विलोजन से फिदा हो गये। बस, इन्हीं सब वज्झातोंसे हमारा और प्रकाशकोंका दिल बढ़ा है और हम लोग इसमें भी वृद्धि करने पर तैयार हुए हैं। आशा है, मनोरथदाता कृष्ण हमारी मनोकामना सफल करेंगे और हमारे प्रेमी पाठक पहलेकी तरह ही हमारा उत्साह बढ़ाते रहेंगे।
कलकत्ता।
१५ मई, सन् १९२५ ई०
}
विनीत—
अनुवादक
चिन्मन्त्री
| १ | देवता तपस्वी ब्राह्मणको अमर-फल देता है | ... २६ |
|---|---|---|
| २ | तपस्वी-ब्राह्मण महाराजा भर्तृहरिको अमरफल देता है | २८ |
| ३ | महाराजा भर्तृहरि रानी पिङ्गलाको अमर फल देते हैं | २९ |
| ४ | रानी अपने उपपति दारोगाको अमरफल देती है | ३१ |
| ५ | दारोगा अपनी प्रणयिनी वेश्याको अमरफल देता है | ३२ |
| ६ | वेश्या महाराजा भर्तृहरिको अमरफल देती है | ३३ |
| ७ | महाराजा भर्तृहरिको संसारसे विरक्ति हो जाती है | ३४ |
| ८ | धनके लिये अनेक उपाय किये, पर एक कानी कौड़ी | |
| भी न मिलो। तृष्णा ! अब तो पीछा छोड़ ! | १२ | |
| ९ | संसारमें स्त्री ही सब दुःखोंका कारण है | ... २४ |
| १० | द्विदावस्थामें वैराग्य । | ... ४१ |
| ११ | सुखेश्वर्यमें वैराग्य । | ... ४२ |
| १२ | बुद्धापि में तृष्णा । | ... ४३ |
| १३ | सूरज और चन्द्रमाकी पराधीनता । | ... ४८ |
| १४ | कामदेव मरेको भी मारता है । | ... ५३ |
| १५ | ब्रह्माका अमोघा पर मोहित होना । | ... ५४ |
( ड )
१६ विभ्रामित्र और मेनका ... ५५
१७ पारंशर और नाविककी कन्या ... ५५
१८ वृद्ध तपस्वीका युवती पर सुगंध होकर सिर कटाना ५७
१९ सुन्दरी से सुन्दरी कामिनी की असलियत ... ५६
२० बहू अपनी सेवा टहलसे मुझे खुश रखती है।
महात्मा—भैया सब मतलबसे प्रीति करते हैं ... ६६
२१ लड़केका साँस चढ़ा लेना और खीका उसे मुदाँ
समझ कर पहले खोर खाना। ... ६६
२२ लड़केकी खी और माँ एवं अन्य कुटुम्बी उसके
चारों तरफ़ जमा होकर रोते पीटते हैं। बसमें
फँसे हुए पैरोंको खी कटवाना चाहती है। ... ६७
२३ गोस्वामी तुलसीदास जी और उनकी धर्मपत्नी ७५
२४ हाय ! यहाँ पहले कैसा राजा था इत्यादि ... १२१
२५ योग-निद्रामें मन्न तपस्वी ... १४०
२६ विवेकप्रश्नों का पद-पद पर पतन (गङ्गा का दृष्टान्त) १४८
२७ शुद्धचित्त योगीश्वर हो आशानदीके पार जा सकते हैं १४६
२८ हे स्त्री ! तू कटाक्षवाण क्यों चलाती है ? तेरा
परिश्रम व्यर्थ होगा, क्योंकि अब हमने विषयों
को तृणवत् त्याग दिया है ... २४२
२९ अज्ञानी मनुष्य पतङ्ग और मछलियों को तरह संसार
के माया-मोहमें फँसकर अपना नाश करते हैं २४७
३० अरे मूल ! विश्वेशकी शरण में क्यों नहीं जाता ? ३१७
( ६ )
३१ रे कामदेव ! रे कोकिल ! हे मूर्खा स्त्री ! अब तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते ... ३३३
३२ कमल में बैठे औरों को हाथी खा जाता है ... ३४८
३३ मनुष्य को तीनों ( चित्र में पाँच दिखाई गई हैं ) अवस्थाओंमें से किसी में भी सुख नहीं ३७६
३४ मनुष्य की वृद्धावस्था बड़ी ही खेदजनक है ४५०
३५ स्वार्थियों का चित्र ... ४५२
३६ स्वार्थियों का चित्र ... ४५२
३७ मनुष्य और पशु-पक्षी सबमें एक ब्रह्म व्यापक है ४७४
३८ सर्प मैडक को खाता है और सर्प के मुखमें पड़ा हुआ मैडक मच्छरों को खाता है ...
श्रीः
महाराजा भर्तृहरि
हते हैं, कोई दो हजार वर्ष पहले, राजपूतानेके मालवा के प्रान्तकी उज्जयिनी नगरीमें,—जिसे आजकल उज्जैन कहते हैं,—एक उच्च श्रेणीके विद्वान्, नीतिकुशल, न्याय-परायण, प्रजावत्सल, सर्वगुणसम्पन्न नृपति राज करते थे। उस का शुभ नाम महाराज भर्तृहरि था। आप अपनी प्रजाको निज सन्तानसे भी अधिक चाहते थे और उसीकी हितचिन्तनामें दिन-रात मशगूल रहते थे। आपकी न्यायप्रियता और प्रजाहितैषणा की चर्चा सारे भारतमें फैल गई थी, इसलिये अन्य राज्योंकी बहु-संख्यक प्रजा भी अपना देश छोड़कर आपके राज्यमें आ कर बस गई थी; इससे उज्जयिनीकी शोभा-समृद्धि आजकलके कलकत्ते बम्बईके समान होगई थी। राजाके धर्मपरायण होनेके कार
( ६ )
३१ रे कामदेव ! रे कोकिल ! हे मूर्खा स्त्री ! अब तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते ... ३३३
३२ कमल में बैठे औरों को हाथी खा जाता है ... ३४८
३३ मनुष्य को तीनों ( चित्र में पाँच दिखाई गई हैं ) अवस्थाओंमें से किसी में भी सुख नहीं ३७६
३४ मनुष्य की वृद्धावस्था बढ़ी ही खेदजनक है ४५०
३५ स्वार्थियों का चित्र ... ४५२
३६ स्वार्थियों का चित्र ... ४५२
३७ मनुष्य और पशु-पक्षी सबमें एक ब्रह्म व्यापक है ४७४
३८ सर्प मैडक को खाता है और सर्प के मुखमें पड़ा हुआ मैडक मच्छरों को खाता है ...
श्रीः
महाराजा भर्तृहरि
हते हैं, कोई दो हजार वर्ष पहले, राजपूतानेके मालवा के प्रान्तकी उज्जयिनी नगरीमें,—जिसे आजकल उज्जैन कहते हैं,—एक उच्च श्रेणीके विद्वान्, नीतिकुशल, न्याय-परायण, प्रजावत्सल, सर्वगुणसम्पन्न नृपति राज करते थे। इनका शुभ नाम महाराज भर्तृहरि था। आप अपनी प्रजाको निज सन्तानसे भी अधिक चाहते थे और उसीकी हितचिन्तनामें दिन-रात मशगूल रहते थे। आपकी न्यायप्रियता और प्रजाहितेषणा की चर्चा सारे भारतमें फैल गई थी, इसलिये अन्य राज्योंकी बहु-संख्यक प्रजा भी अपना देश छोड़कर आपके राज्यमें आ कर बर गई थी; इससे उज्जयिनीकी शोभा-सम्बद्धि आजकलके कलकत्ते बम्बईके समान होगई थी। राजाके धर्मपरायण होनेके कार
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प्रजा भी धर्मात्मा थी। सभी अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मका पालन करते थे। ढौर-ढौर यज्ञ और हवन होते थे। मेघ समय पर यथेष्ट जल बरसाते थे। मालवा प्रान्तमें लोग अकालका नाम तक भूल गये थे। राजा-प्रजाके भाण्डार सदा धन-धान्यसे पूर्ण रहते थे। गरीब दोनों समय पेटभर अच्छ खाते थे। प्रजाको किसी बातका दुःख, क्लेश और अभाव नहीं था। चोरी, ज़ोरी, लूट-मार और डकैती एवं अत्याचार, अनाचार और व्यवहार प्रभुतिका नाम ही उठ गया था। कभी ही कोई ऐसा केस राजदरबारमें आता था। इन जुर्मोंके सुजूरिमोंको महाराज सख्त सज़ा देते थे। न्याय, नीति और धर्म पर चलनेवालोंके लिये महाराज ऊँचे दयालु थे; दुष्ट और अन्यायियोंके लिये वैसे ही कठोर थे। सारांश यह कि, महाराजमें सभी उत्तमोत्तम राजोचित गुण विधाताने दिये थे। आपके राज्यमें रोर बकरी एक घाट पानी पीते थे। कोई किसी की ओर आँख उठा कर नहीं देख सकता था। निबल और सबल सभी अपनी-अपनी खालमें मस्त थे। “जिसको लाटो उसकी मैस” वाड़ी कहावत चरितार्थ न होती थी। सब तो यह हैं, कि मालवा प्रान्तकी प्रजा फिरसे रामराज्य का सुख लूटती हुई, हृदयसे महाराजकी मङ्गल-कामना और उनके दीर्घजीवनके लिये जगदीशसे करजोड़ प्रार्थना करती थी। उस समय प्रजाको कोई ज़बर्दस्ती राजभक्तिका पाठ नहीं पढ़ाता था। सुखो होनेके कारण, प्रजा आपही राजाको पिताकी तरह मानती थी और उसमें अच्छल अटल भक्ति रखती थी।
[ ३ ]
महाराजके एक छोटे भाई भी थे। उनका नाम राजकुमार विक्रम था। विक्रम भी बड़े भाईकी तरह ही विद्वान्, न्यायप्रायण, धर्मात्मा और राजनीतिकुशल थे। यह राजकुमार विक्रम ही हमारे सुप्रसिद्ध प्रतापशाली महाराजाधिराज वीर विक्रमादित्य थे, जिन्होंने भयंकर युद्धोंमें विदेशों आक्रमणकारियोंको परास्तकर, भारतकी रक्षा की और उन्हें इस देशसे निकाल बाहर कर, अपने नामसे संवत् चलाया, जो आजतक विक्रम-संवत्के नामसे पुकारा जाता है। आपहीका चलाया संवत् अबतक पञ्चाङ्गों, जन्त्रियों और साहूकारोंके बही-खातोंमें लिखा जाता है। यद्यपि कालकी कुटिल गति, जमानेके फेर या देशके दुर्भाग्य से आजकल ईस्वी सन्की तृती बोल रही है। लोग चिह्नों-पत्रियों एवं अन्यान्य कागज़ और दस्तावेजोंमें आपके संवत्को छोड़कर ईस्वी सन्को लिखनेकी मूर्खता करते हैं; पर बहुतसे सज्जन अपनी भूलको सुधारकर, फिर महाराजके संवत्से ही काम लेने लगे हैं। आशा है, सभी भूले हुए राह पर आजार्यंगे और संवत्के कारणसे महाराजका शुभ नाम यावत् चन्द्र-दिवारक इस लोकमें अमर रहेगा।
महाराज विक्रमके समयमें बौद्ध-धर्म बड़े जोरों पर था। ब्राह्मण-धर्मकी नींव खोखली हो गई थी। आपने ही बौद्धोंको मार भगाया और ब्राह्मण-धर्मकी फिरसे स्थापना की। आप अपने ज़मानेमें भारतके सर्वश्रेष्ठ नृपति समझे जाते थे। प्रायः सभी राजे-महाराजे आपको अपना सम्राट् या नेता मानते थे। सभी
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आपके ईशारों पर नाचते थे। आप कहनेको तो उज्जैनके राजा कहलाते थे, पर आपके राज्यकी सीमा बड़ी लम्बी-चौड़ी थी। अतुल धन-वैभव और सुविस्तृत राज्यके अधीश्वर होने पर भी, आपमें अस्मिमान नामको भी न था। आप छोटे-बड़े सभीसे मिलते और बातें करते थे। आप एक चट्टाई पर सोया करते और अपने पीनेके लिये क्षिप्रा नदीसे एक तूम्बा जल स्वयं अपने हाथोंसे भर लाते थे। आप आजकलके राजाओंकी तरह प्रजा के पैसेसे देश-आराम नहीं करते थे। आपका सारा समय प्रजा की भलाईमें ही व्यतीत होता था। आप अधिक-से-अधिक तीन चार घण्टे साते थे। रातके समय भेष बदल कर, आप अकसर शहरमें राश्ट लगाया करते थे और इस बातकी खोज करते थे, कि मेरी किस प्रजाको कौनसा दुःख है। आप जिसे दुःखी देखते थे, उसका दुःख या अभाव किसी न किसी तरह अवश्य ही दूर कर देते थे। अनेक मौकोंपर तो आपने अपनी वैश्वकीमत जानको खतरेंमें डालकर भी, प्रजाका दुःख दूर किया था। इसी से प्रजा आपको “परदुःख भञ्जन” कहती थी। भारतमें अबतक हजारों-लाखों राजा-महाराजा होगये होंगे, पर आपके सिवा और किसीको भी यह महाभूत उपधि नसीब नहीं हुई। हाँ, ईरानके खलीफ़ा हार्क-उर-रशीदके सम्बन्धमें भी ऐसी ही बातें सुनी जाती हैं। खलीफ़ा हार्क रशीद भी, महाराज विक्रमकी तरह, रातको भेष बदलकर घूमा करते और दीन-दुःखियोंका पता लगाकर उनके कष्ट मोचन किया करते थे। इस पृथ्वीपर आज
[ ५ ]
तक न जाने कितने एक-से-एक बढ़कर राजा-महाराजाँ होंगयें, जिनकी दृढ़ारसे पृथ्वी काँपती थी, जिनके पास असंख्य सेना-सामन्त और अतुल धन-भाण्डार था, पर आज उनका नाम भी कोई नहीं लेता। पर ऐसे प्रजावत्सल, परोपकारी, न्यायी और प्रजाकष्ट मोचन करनेवाले महीपालोंका नाम, जब तक पृथ्वी रहेगी, लोगोंकी ज़बान पर रहेगा। इस जगत्में जिनकी कीर्ति है, वह मर जानेपर भी अमर है। कीर्तिवान् मृतक नहीं समझा जाता। मृतक वही है, जिसकी कीर्ति या सुनाम नहीं है। महाराजा विक्रम, खलीफा हारुँ रशीद, नौशेरवाँ और सम्राट् अकबर प्रभृति आज इस नापायेदार दुनियामें नहीं हैं, पर उनका सुनाम लोगोंकी ज़बानपर है; अतः वे सशरीर न रहनेपर भी अमर हैं। धन्य है ऐसे नरपाल ! ऐसे भूपालोंसे ही महोकी शोभा है !
हमें यहाँ महाराजा विक्रमादित्यके सम्बन्धमें नहीं लिखना है। लिखना है,—महाराजा भर्तृहरिके सम्बन्धमें। प्रसंगवश हम महाराजा विक्रमादित्यके विषयमें इतना लिख गये। अब फिर असली सुकाम पर आते हैं। सुनिये, प्रातःस्मरणीय महाराजा विक्रम छोटे थे और महाराजा भर्तृहरि बड़े होनेके कारण राज करते थे। महाराजा विक्रम बड़े भाईके प्रधान मन्त्रीका काम करते थे। दोनों भाइयोंमें बड़ा प्रेम और सहभाव था। राम-लक्ष्मणकीसी जोड़ीथी। राम लक्ष्मणको जिस तरह बाहते थे, उसी तरह महाराजा भर्तृहरि भाईविक्रमको प्यार करतेथे। लक्ष्मण राममें जैसी श्रद्धा और भक्ति रखतेथे, वैसीही श्रद्धा और भक्ति विक्रमादित्य महाराजा
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भर्तृहरिमें रखते थे। दोनों ही दोनों के लिये जी-जानसे चाहते थे। बड़े भाई छोटेको निज पुत्रवत् समझते थे और छोटे बड़ेको पितृवत् मानते थे। महाराजा भर्तृहरि यद्यपि निराळसी और राजकार्यदर्श थे, तथापि उन्होंने राजकाजका विशेष भार विक्रमपर ही छोड़ रक्खा था। पिता जिसतरह सुपुत्रपर शुहस्थीका सारा भार छोड़कर एक तरह निश्चिन्त हो जाता है; उसी तरह महाराज भर्तृहरि विक्रमपर राजकाजका भार छोड़ निश्चिन्त हो गये थे। महाराज विक्रम भी अपनी कुशाग्रबुद्धि और राजनीतिज्ञतासे सारे काम सुचारु रूपसे चलाते थे और राजकाजकी जटिल समस्याओंके सुलझानेमें महाराजके दाहिने हाथ बने हुए थे। प्रजा सब तरह सुखी और प्रसन्न थी। राज्यमें आनन्दकी बहसुरी
। पर परमात्माकी इच्छा या होनहारके कारण आगे चलकर एक विषवृक्ष पैदा हो गया। उसने इन दोनों भाइयोंमें मनोमालिन्य करा दिया। इतना ही नहीं, दोनोंको एक दूसरेसे जुदा करा दिया। जिसका लोगोंको स्वप्नमें भी ख्याल नहीं था, जिसका होना लोग अलम्बव समझते थे, वही हुआ। सब है, भावी बड़ी बलवती है—होनी होकर रहती है।
महाराजा भर्तृहरिकी दो या तीन शादियाँ हो चुकी थीं। फिर भी, अपने किसी देशकी अपूर्व रूपलावण्यसम्पन्न, परमासुन्दरी, रतिमानमहिनी, सुनिमनमहिनी, अप्सराओंको भी शमनैवाली एक राजकुमारीसे शादी कर ली। नयी महारानीका नाम पिंगला था। महारानी पिंगलाके असाधारण रूपवती होनेके
[ ७ ]
कारण, महाराज उनके रूपपर ऐसे मोहित हुए कि अपनी विद्या-बुद्धि, विवेक और विचार प्रभृतिको ताकूपर रखकर, उनके हाथों बिक गये—उनके कीर्तिदास हो गये। ठीक शाहंशाह जहाँगीर और बेगम नूरजहाँका सा हाल हुआ। जिसतरह नूरजहाँके बिना दिल्लीश्वर जहाँगीरको एक क्षण कल न पड़ती थी; उसीतरह महाराज भर्तृहरिको भी महारानी पिंगला बिना जैन नहीं था। जिसतरह जहाँगीरकी नकेल नूरजहाँके हाथोंमें थी; उसीतरह महाराज भर्तृहरिकी नकेल पिंगलाके हाथोंमें थी। जिसतरह बादशाह जहाँगीर नूरजहाँके हाथोंकी कठपुतली थे; उसीतरह महाराज भर्तृहरि भी पिंगलाके हाथोंकी कठपुतली थे। बादशाह जहाँगीर, नामके बादशाह थे; नूरजहाँ ही बादशाहतको असल सञ्चालिका थी। वह जो चाहती थी सो करती थी। बादशाह सिकंदर वस्तुतः और मुहर भर कर देते थे। महाराज भर्तृहरिकी भी वही दशा थी। महारानी पिंगला जो चाहती थी, वही महाराजसे करा लेती थी। महाराज बिना कुछ सोचे-समझे, बिना आगा-पीछा देखे, आँखें बन्द करके, रानी पिंगलाकी इच्छानुसार चलते थे। उन दिनों महाराज सच्चे स्त्रैण हो गये थे। रानी पिंगलाने ऐसा जादू कर दिया था, कि महाराज अपने होश-हवास खोकर, पूरे तौरसे उनके ज़रूखरीद गुलाम हो गये थे।
स्त्रैण होना अच्छा नहीं, स्त्रीका गुलाम होना उचित नहीं, स्त्रीके वशमें होना सर्वव्याशक्ता बीज बोना है। पर इन मोहिनियोंके आगे प्रायः सभीकी सिटी गुम हो जाती है। हम
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महाराजाको ही दोषी क्यों ठहरावें, जब कि बड़े-बड़े योगीश्वर मोहिनियोंके रूप-जालमें फँसकर अपनी बुद्धि खो बैठे ? इन योगिजनेमनोहरा कामिनियोंकी मोहिनी शक्तिके आगे किसने हार नहीं मानी ? इनके मोहनमन्त्रसे कौन पागल नहीं हुआ ? इनकी मोहिनी मायामें कौन नहीं फँसा ? शिव जैसे परम योगीश्वर मोहिनीकी रूपच्छटा, वटक-मटक और नाज़-नखरों पर पागल हो गये । विश्वामित्र जैसे महामुनि मेनकाके रूप-जालमें फँसकर अपना तप भङ्ग कर बैठे । मरीचि और भृंगी जैसे महर्षि इनकी मनोमुखकर रूप-माधुरी पर सुखबुध खोकर तपस्या छोड़ बैठे ; तब साधारण मनुष्योंकी कौन बात है ? बड़े-बड़े शूरवीर जो जगत्को परास्त कर सकते हैं, वे भी इनके लामने कायर हो जाते हैं । किसी कविने कहा है—
व्याकीर्ण केशर करालमुखा मृगेन्द्रा,
नागाश्र भूरिमदराजिविराजमानाः ।
मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः,
क्षीसत्रिघो परमकापुरुषा भवन्ति ॥
गर्दन पर बिखरे हुए बालों वाला करालमुखी सिंह, अत्यन्त मदवाला हाथी और बुद्धिमान समरशूर पुरुष भी खियोंके आगे परम कायर हो जाते हैं ।
परमात्माने भी खियोंके साथ पक्षपात किया है । उसने इन्हें अपूर्व क्षमता प्रदान की है । उसी क्षमतासे ये पुरुषोंको