वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| २०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलासक्तपाणये ।<br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्न नमोऽस्तु ते ॥ ७३<br>नमो मुण्डाय चण्डाय अण्डायोत्पत्तिहेतवे ।<br>डिण्डिमासक्तहस्ताय डिण्डिमुण्डाय ते नमः ॥ ७४ | हे त्रिपुरनाशक! तीन जटावाले, तीन सिरवाले, हाथमें त्रिशूल लिये रहनेवाले त्र्यम्बक एवं त्रिनेत्र (कहलानेवाले) आपको नमस्कार है। हे मुण्ड, चण्ड और अण्डकी उत्पत्तिके हेतु, डिण्डिमपाणि एवं डिण्डिमुण्ड! आपको नमस्कार है॥ ७३-७४॥ |
| नमोर्ध्वकेशदंष्ट्राय शुष्काय विकृताय च ।<br>धूम्रलोहितकृष्णाय नीलग्रीवाय ते नमः ॥ ७५<br>नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।<br>सूर्यमालाय सूर्याय स्वरूपध्वजमालिने ॥ ७६<br>नमो मानातिमानाय नमः पटुतराय ते ।<br>नमो गणेन्द्रनाथाय वृषकन्धाय धन्विने ॥ ७७<br>संक्रन्दनाय चण्डाय पर्णधारपुटाय च ।<br>नमो हिरण्यवर्णाय नमः कनकवर्चसे ॥ ७८ | हे ऊर्ध्वकेश, ऊर्ध्वदंष्ट्र, शुष्क, विकृत, धूम्र, लोहित, कृष्ण एवं नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। अप्रतिरूप, विरूप, शिव, सूर्यमाल, सूर्य एवं स्वरूपध्वजमालीको नमस्कार है। मानातिमानको नमस्कार है। आप पटुतरको नमस्कार है। गणेन्द्रनाथ, वृषकन्ध एवं धन्वीको नमस्कार है। संक्रन्दन, चण्ड, पर्णधारपुट एवं हिरण्यवर्णको नमस्कार है। कनकवर्चसको नमस्कार है॥ ७५-७८॥ |
| नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तुतिस्थाय नमोऽस्तु ते ।<br>सर्व्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतशरीरिणे ॥ ७९<br>नमो होत्रे च हन्त्रे च सितोद्रग्रपताकिने ।<br>नमो नम्याय नम्राय नमः कटकटाय च ॥ ८०<br>नमोऽस्तु कृशनाशाय शयितायोत्थिताय च ।<br>स्थिताय धावमानाय मुण्डाय कुटिलाय च ॥ ८१<br>नमो नर्त्तनशीलाय लयवादित्रशालिने ।<br>नाट्योपहारलुब्धाय मुखवादित्रशालिने ॥ ८२ | स्तुत किये गये तथा स्तुतिके योग्य (आप)-को नमस्कार है। स्तुतिमें स्थित, सर्व, सर्वभक्ष एवं सर्वभूतशरीरी आपको नमस्कार है। होता, हन्ता तथा सफेद और ऊँची पताकावालेको नमस्कार है। नमन करनेयोग्य एवं नम्रको नमस्कार है। आप कटकटको नमस्कार है। कृशनाश, शयित, उत्थित, स्थित, धावमान, मुण्ड एवं कुटिलको नमस्कार है। नर्तनशील, लय वाद्यशाली, नाट्यके उपहारके लोभी एवं मुखोंमें बम-बम-जैसे मुँहसे बोले जानेवाले वाद्य-प्रेमीको नमस्कार है॥ ७९-८२॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलातिबलघातिने ।<br>कालनाशाय कालाय संसारक्षयरूपिणे ॥ ८३<br>हिमवद्दुहितुः कान्त भैरवाय नमोऽस्तु ते ।<br>उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ८४<br>चितिभस्मप्रियायैव कपालाक्तपाणये ।<br>विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ८५<br>नमो विकृतवक्त्राय नमः पूतोग्रदृष्टये ।<br>पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बिवीणायप्रियाय च ॥ ८६ | ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, बलवान्से भी बलवान्को नष्ट करनेवाले, कालनाश, कालस्वरूप एवं संसारक्षयस्वरूप आपको नमस्कार है। हे हिमालयकी पुत्रीके पति-पार्वतीपति! आप भैरवको नमस्कार है और उग्ररूप आपको नित्य नमस्कार है। दस बाहुओंवाले (शिव)-को नमस्कार है। चिताके भस्मको प्रिय माननेवाले, कपालपाणि, अत्यधिक भयंकर भयरूप (भीष्म) एवं व्रतधर (आप)-को (नमस्कार) है। विकृत मुँहवाले (आप)-को नमस्कार है। पवित्र तेजस्विनी दृष्टिवाले, कच्चे-पक्के फलके गूदेको प्रिय माननेवाले, तुम्बी एवं वीणाको प्रिय माननेवालेको नमस्कार है॥ ८३-८६॥ |
| नमो वृषाङ्कवृक्षाय गोवृषाभिरुते नमः ।<br>कटङ्कटाय भीमाय नमः परपराय च ॥ ८७<br>नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदायिने ।<br>नमो विरक्तरक्ताय भावनायाक्षमालिने ॥ ८८<br>विभेदभेदभिन्नाय छायायै तपनाय च ।<br>अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ॥ ८९ | वृषाङ्कवृक्षको नमस्कार है। गोवृषाभिरुतको नमस्कार है। कटङ्कट, भीम एवं परसे भी परको नमस्कार है। सर्ववरिष्ठ, वर एवं वरदायीको नमस्कार है। विरक्त एवं रक्तरूप, भावन एवं अक्षमालीको नमस्कार है। विभेद एवं भेदसे भिन्न, छाया, तपन, अघोर तथा घोररूप एवं घोरघोरतर रूपको नमस्कार है। |
अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक [२०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च।<br>बहुनेत्रकपालाय एकमूर्ते नमोऽस्तु ते॥ ९०॥ | शिव एवं शान्तको नमस्कार है। शान्ततम, बहुनेत्र एवं कपालधारीको नमस्कार है। हे एकमूर्ति! आपको नमस्कार है॥ ८७—९०॥ |
| नमः क्षुद्राय लुब्धाय यज्ञभागप्रियाय च।<br>पञ्चालाय सिताङ्गाय नमो यमनियामिने॥ ९१॥<br>नमश्चित्रोरुघण्टाय घण्टाघण्टनिघण्टिने।<br>सहस्रशतघण्टाय घण्टामालाविभूषिणे॥ ९२॥<br>प्राणसंघट्टगर्वाय नमः किलिकिलिप्रिये।<br>हुंहुंकाराय पाराय हुंहुंकारप्रियाय च॥ ९३॥<br>नमः समसमे नित्यं गृहवृक्षनिकेतने।<br>गर्भमांसशृगालाय तारकाय तराय च॥ ९४॥ | क्षुद्र, लुब्ध, यज्ञभागप्रिय, पञ्चाल एवं सिताङ्गको नमस्कार है। यमके नियमनकर्ताको नमस्कार है। चित्रोरुघण्ट, घण्टाघण्टनिघण्टीको नमस्कार है। सहस्रशतघण्ट एवं घण्टामालाविभूषितको नमस्कार है। प्राणसंघट्टगर्व, किलिकिलिप्रिय, हुंहुंकार, पार एवं हुंहुंकारप्रियको नमस्कार है। समसम, गृहवृक्षनिकेती, गर्भमांसशृगाल, तारक एवं तरको नित्य नमस्कार है॥ ९१—९४॥ |
| नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च।<br>यज्ञवाहाय हव्याय तप्याय तपनाय च॥ ९५॥<br>नमस्तु पयसे तुभ्यं तुण्डानां पतये नमः।<br>अन्नदायान्नपतये नमो नानान्नभोजिने॥ ९६॥<br>नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च।<br>सहस्रोद्यतशूलाय सहस्राभरणाय च॥ ९७॥<br>बालानुचरगोप्त्रे च बाललीलाविलासिने।<br>नमो बालाय वृद्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च॥ ९८॥ | यज्ञ, यजी, हुत, प्रहुत, यज्ञवाह, हव्य, तप्य और तपनको नमस्कार है। पयरूप आपको नमस्कार है। तुण्डोंके पतिको नमस्कार है। अन्नद, अन्नपति एवं अनेक प्रकारके अन्नभोजीको नमस्कार है। हजारों सिरवाले, हजारों चरणवाले, हजारों शूलको उठाये हुए और हजारों आभूषणवालेको नमस्कार है। बालानुचरकी रक्षा करनेवाले, बाललीलामें विलास करनेवाले, बाल, वृद्ध, क्षुब्ध एवं क्षोभणको नमस्कार है॥ ९५—९८॥ |
| गङ्गालुलितकेशाय मुञ्जकेशाय वै नमः।<br>नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च॥ ९९॥<br>नग्नप्राणाय चण्डाय कृशाय स्फोटनाय च।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कथ्याय कथनाय च॥ १००॥<br>साङ्ख्याय साङ्ख्यमुख्याय साङ्ख्ययोगमुखाय च।<br>नमो विरथरथ्याय चतुष्पथरथाय च॥ १०१॥<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने।<br>वक्त्रसंधानकेशाय हरिकेश नमोऽस्तु ते।<br>त्र्यम्बिकाम्बिकनाथाय व्यक्ताव्यक्ताय वेधसे॥ १०२॥ | गङ्गालुलितकेश और मुञ्जकेशको नमस्कार है। छः कर्मोंसे संतुष्ट तथा तीन कर्मोंमें लगे रहनेवाले (आप)-को नमस्कार है। नग्नप्राण, चण्ड, कृश, स्फोटन तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके कथ्य और कथनको नमस्कार है। सांख्य, सांख्यमुख्य, सांख्ययोगमुख, विरथरथ्य तथा चतुष्पथरथको नमस्कार है। काले मृगचर्मके उत्तरीयवाले, साँपके जनेऊवाले, वक्त्रसंधानकेश, त्र्यम्बिकाम्बिकनाथ, दृश्य एवं अदृश्य और वेधास्वरूप हे हरिकेश! आपको नमस्कार है॥ ९९—१०२॥ |
| कामकामदकामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे।<br>नमः सर्वद पापघ्न कल्पसंख्याविचारिणे॥ १०३॥<br>महासत्त्व महाबाहो महाबल नमोऽस्तु ते।<br>महामेघ महाप्रख्य महाकाल महाद्युते॥ १०४॥<br>मेघावर्त्त युगावर्त्त चन्द्रार्कपतये नमः।<br>त्वमन्नमन्नभोक्ता च पक्वभुक् पावनोत्तम॥ १०५॥<br>जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजोद्भिदजाश्च ये।<br>त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः॥ १०६॥ | हे काम! हे कामद! हे कामको नष्ट करनेवाले! आप तृप्त और अतृप्तविचारीको नमस्कार है। हे सर्वद! हे पाप दूर करनेवाले! आप कल्पसंख्याविचारीको नमस्कार है। हे महासत्त्व! हे महाबाहु! हे महाबल! हे महामेघ! हे महाप्रख्य! हे महाकाल एवं हे महाद्युति! आपको नमस्कार है। हे मेघावर्त्त! हे युगावर्त्त! आप चन्द्रार्कपतिको नमस्कार है। आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, पक्वभुक् एवं पवित्रोंमें श्रेष्ठ हैं। हे देवदेवेश! आप ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—चतुर्विध भूतसमुदाय हैं॥ १०३—१०६॥ |
| २०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्रष्टा चराचरस्यास्य पाता हर्ता तथैव च।<br>त्वामाहुर्ब्रह्म विद्वांसो ब्रह्म ब्रह्मविदां गतिम्॥ १०७<br><br>मनसः परमज्योतिस्त्वं वायुर्ज्योतिषामपि।<br>हंसवृक्षे मधुकरमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः॥ १०८<br><br>यजुर्मयो ऋङ्मयस्त्वामाहुः साममयस्तथा।<br>पठ्यसे स्तुतिभिर्नित्यं वेदोपनिषदां गणैः॥ १०९<br><br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये।<br>त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युतोऽशनिगर्जितम्॥ ११० | आप इस चराचरकी सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले एवं संहार करनेवाले हैं। विद्वज्जन आपको ब्रह्म एवं ज्ञानियोंकी (कैवल्य) गति कहते हैं। आप मनकी परमज्योति हैं और ज्योतियोंके (धारण करनेवाले) वायु हैं। ब्रह्मवादीजन आपको हंसवृक्षपर रहनेवाला भ्रमर कहते हैं। वे आपको यजुर्मय, ऋङ्मय एवं साममय कहते हैं। वेद और उपनिषदोंके समूह स्तुतियोंद्वारा आपका ही नित्य पाठ करते हैं। आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अवर वर्ण, मेघसमूह, विद्युत् तथा मेघगर्जन भी हैं॥ १०७—११०॥ |
| संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च।<br>युगा निमेषाः काष्ठाश्च नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः॥ १११<br><br>वृक्षाणां ककुभोऽसि त्वं गिरीणां हिमवान्गिरिः।<br>व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योनन्तश्च भोगिनाम्॥ ११२<br><br>क्षीरोदोऽस्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च॥ ११३<br><br>त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे।<br>व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ॥ ११४ | आप युग, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, निमेष, काष्ठा तथा कला हैं। आप वृक्षोंमें अर्जुन वृक्ष, पर्वतोंमें हिमालय, पशुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ और साँपोंमें शेषनाग हैं। आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रोंमें धनुष, आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य हैं। आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं॥ १११—११४॥ |
| त्वं शरी त्वं गदी चापि खट्वाङ्गी च शरासनी।<br>छेत्ता भेत्ता प्रहर्ताऽसि मन्ता नेता सनातनः॥ ११५<br><br>दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>समुद्राः सरितो गङ्गा पर्वताश्च सरांसि च॥ ११६<br><br>लतावल्ल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः।<br>द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः॥ ११७<br><br>आदिश्चान्तश्च वेदानां गायत्री प्रणवस्तथा।<br>लोहितो हरितो नीलः कृष्णः पीतः सितस्तथा॥ ११८<br><br>कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा।<br>सवर्णश्चाप्यवर्णश्च कर्त्ता हर्त्ता त्वमेव हि॥ ११९ | आप बाण धारण करनेवाले, गदा धारण करनेवाले, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले एवं धनुर्धारी हैं। आप विदारण करनेवाले, प्रहार करनेवाले, अवबोधन (सतर्क) करनेवाले, प्राप्त करानेवाले और सनातन हैं। आप दस लक्षणोंसे संयुक्त धर्म, अर्थ एवं काम तथा समस्त समुद्र, नदियाँ, गङ्गा, पर्वत एवं सरोवर हैं। समस्त लताएँ, वल्लियाँ, तृण, ओषधियाँ; पशु, मृग, पक्षी; पृथ्वी, अप् आदि नवों द्रव्यों; उत्क्षेपण-आक्षेपण आदि पाँच कर्मों; रूप, रस, गन्ध आदि चौबीस गुणोंके आरम्भक भी आप ही हैं। आप ही समयपर फूल एवं फल देनेवाले हैं। आप वेदोंके आदि और अन्त हैं, गायत्री तथा प्रणव भी आप ही हैं। आप ही लोहित, हरित, नील, कृष्ण, पीत, सित, कद्रु, कपिल, कपोत, मेचक, सवर्ण, अवर्ण, कर्ता एवं हर्ता हैं॥ ११५—११९॥ |
| त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः।<br>उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च॥ १२०<br><br>शिक्षाछौत्रं त्रिसौपर्णं यजुषां शतरुद्रियम्।<br>पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्॥ १२१<br><br>तिन्दुको गिरिजो वृक्षो मुद्गं चाखिलजीवनम्।<br>प्राणाः सत्त्वं रजश्चैव तमश्च प्रतिपत्पतिः॥ १२२ | आप इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, पवन, उपप्लव, चित्रभानु, स्वर्भानु एवं भानु हैं। आप शिक्षा, होत्र, त्रिसौपर्ण, यजुर्वेदका शतरुद्रिय, पवित्रोंमें पवित्र एवं मङ्गलोंमें मङ्गल हैं। आप तिन्दुक, शिलाजतु, वृक्ष, मुद्ग, सबके जीवन, प्राण, सत्त्व, रज, तम तथा प्रतिपत्पति हैं। |
५१- मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन
अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०९
| प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च।<br>उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च॥ १२३ | आप ही प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष, छींक एवं जँभाई हैं॥ १२०-१२३॥ |
| लोहितान्तर्गतो दृष्टिमहावक्त्रो महोदरः।<br>शुचिरोमा हरिशमश्रूरूर्ध्वकेशश्चलाचलः॥ १२४<br><br>गीतवादित्रनृत्यज्ञो गीतवादित्रप्रियः।<br>मत्स्यो जालो जलौकाश्र्च कालः केलिकला कलिः॥ १२५<br><br>अकालश्च विकालश्च दुष्कालः काल एव च।<br>मृत्युश्च मृत्युकर्ता च यक्षो यक्षभयंकरः॥ १२६<br><br>संवर्त्तकोऽन्तकश्चैव संवर्त्तकबलाहकः।<br>घण्टा घण्टी महाघण्टी चिरी माली च मातलिः॥ १२७ | आप लोहितके अन्तःस्थित, दृष्टि, बड़े मुँहवाले, भारी पेटवाले, पवित्र रोमावलीवाले, हरिश्चश्मश्रु, ऊर्ध्वकेश एवं चल तथा अचल हैं। आप गाने, बजाने, नृत्यकलाके विद्वान् हैं तथा गाना-बजाना करनेवालोंके भी आप प्रिय हैं। आप मत्स्य, जाल, जलौका, काल तथा केलिकला एवं कलह हैं। आप अकाल, विकाल, दुष्काल और कालस्वरूप हैं। आप मृत्यु, मृत्युकर्ता, यक्ष तथा यक्षको भी भय देनेवाले हैं। आप संवर्तक, अन्तक एवं संवर्तक नामक बादल हैं। आप घण्टा, घण्टी, महाघण्टी, चिरी, माली और मातलि भी हैं॥ १२४-१२७॥ |
| ब्रह्मकालयमाग्नीनां दण्डी मुण्डी त्रिमुण्डधृक्।<br>चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्त्तकः ॥ १२८<br><br>चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरस्तथा।<br>नित्यमक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः॥ १२९<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिको गिरिकप्रियः।<br>शिल्पं च शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्त्तकः॥ १३०<br><br>भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः॥ १३१ | आप ब्रह्मा, काल, यम और अग्निको दण्ड देनेवाले, मुण्डी एवं त्रिमुण्डधारी हैं। आप चतुर्युग, चतुर्वेद एवं चातुर्होत्रके प्रवर्तक हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। आप नित्यद्यूतप्रिय, (धर्म्य) धूर्त्तईके भी प्रयोक्ता, गणाध्यक्ष और गणोंके स्वामी हैं। आप लाल माला और लाल वस्त्र धारण करनेवाले हैं तथा गिरिक, गिरिकप्रिय, शिल्प, शिल्पिश्रेष्ठ तथा हर प्रकारके शिल्पोंके प्रवर्तक हैं। आप भगनेत्राङ्कुश, चण्ड एवं पूषाके दाँतोंके विनाशक हैं। आप स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १२८-१३१॥ |
| गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकास्तारकामयः।<br>धाता विधाता संधाता पृथिव्या धरणोऽपरः॥ १३२<br><br>ब्रह्मा तपश्च सत्यं च व्रतचर्यमथार्जवम्।<br>भूतात्मा भूतकृद् भूतिर्भूतभव्यभवोद्भवः॥ १३३<br><br>भूर्भुवः स्वर्ऋतं चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः।<br>दीक्षितोऽदीक्षितः कान्तो दुर्दान्तो दान्तसम्भवः॥ १३४<br><br>चन्द्रावर्त्तो युगावर्त्तः संवर्त्तकप्रवर्त्तकः।<br>बिन्दुः कामो ह्यणुः स्थूलः कर्णिकारस्त्रजप्रियः॥ १३५ | आप गूढ़व्रतवाले, गुप्ततपस्यावाले, तारक और तारकामय हैं। आप धाता, विधाता, संधाता और पृथ्वीके श्रेष्ठ धारण और पोषण करनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, व्रत-चर्या और सरल एवं शुद्ध हैं। आप (पञ्च) भूतस्वरूप ऐश्वर्य और प्राणियोंके उत्पत्ति-स्थान हैं। आप भूः, भुवः, स्वः, ऋतः, ध्रुव, कोमल तथा महेश्वर हैं। आप दीक्षित, अदीक्षित, कान्त, दुर्दान्त (उग्र) और दान्तसे उत्पन्न हैं। आप चन्द्रावर्त, युगावर्त, संवर्तक और प्रवर्तक हैं। आप बिन्दु, काम, अणु, स्थूल तथा कनेरकी मालाके प्रेमी हैं॥ १३२-१३५॥ |
| नन्दीमुखो भीममुखः सुमुखो दुर्मुखस्तथा।<br>हिरण्यगर्भः शकुनिर्महोरगपतिर्विराट्॥ १३६ | आप नन्दीमुख, भीममुख, सुमुख तथा दुर्मुख हैं। आप हिरण्यगर्भ, शकुनि, महासर्पपति तथा विराट् हैं। |
| २१० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अधर्महा महादेवो दण्डधारो गणोत्कटः।<br>गोनर्दो गोप्रतारश्च गोवृषेश्वरवाहनः॥ १३७<br>त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गो मार्ग एव च।<br>स्थिरः श्रेष्ठश्च स्थाणुश्च विक्रोशः क्रोश एव च॥ १३८<br>दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः।<br>दुर्द्धर्षो दुष्प्रकाशश्च दुर्दर्शो दुर्जयो जयः॥ १३९ | आप अधर्मका नाश करनेवाले महादेव, दण्डधार, गणोत्कट, गोनर्द, गोप्रतार तथा गोवृषेश्वर-वाहन हैं। आप त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द, गोमार्ग तथा मार्ग हैं। आप स्थिर, श्रेष्ठ, स्थाणु, विक्रोश तथा क्रोश हैं। आप दुर्वारण, दुर्विषह, दुःसह, दुरतिक्रम, दुर्धर्ष, दुष्प्रकाश, दुर्दर्श, दुर्जय तथा जय हैं॥ १३६—१३९॥ |
| शशाङ्कानलशीतोष्णः क्षुत्तृष्णा च निरामयः।<br>आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिनाशनः॥ १४०<br><br>समूहश्च समूहस्य हन्ता देवः सनातनः।<br>शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः॥ १४१<br><br>त्र्यम्बको दण्डधारश्च उग्रदंष्ट्रः कुलान्तकः।<br>विषापहः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पते।<br>अमृताशी जगन्नाथो देवदेव गणेश्वरः॥ १४२<br><br>मधुश्च्युतानां मधुपो ब्रह्मवाक् त्वं घृतच्युत।<br>सर्वलोकस्य भोक्ता त्वं सर्वलोकपितामहः॥ १४३ | आप चन्द्र, अनल, शीत, उष्ण, क्षुधा, तृष्णा, निरामय, आधिव्याधि, व्याधिहन्ता एवं व्याधियोंको नष्ट करनेवाले हैं। आप समूह हैं और समूहके हन्ता तथा सनातन देव हैं। आप शिखण्डी, पुण्डरीकाक्ष तथा पुण्डरीकवनके आश्रय हैं। मरुत्पति! हे देवदेव! आप तीन नेत्रवाले, दण्डधारी, भयंकर दाँतवाले, कुलके अन्त करनेवाले, विषको नष्ट करनेवाले, सुरश्रेष्ठ, सोमरस पीनेवाले, अमृताशी, जगत्के स्वामी तथा गणेश्वर हैं। आप मधुसंग्रह करनेवालोंमें मधुप, वाणियोंमें ब्रह्मवाक्, घृतच्युत, समस्त लोकोंका पालन-पोषण और उपसंहार करनेवाले एवं सर्वलोकके पितामह हैं॥ १४०—१४३॥ |
| हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेकः<br>त्वं स्त्री पुमांस्त्वं हि नपुंसकं च।<br>बालो युवा स्थविरो देवदंष्ट्रा<br>त्वन्नो गिरिविश्वकृद् विश्वहर्ता॥ १४४<br>त्वं वै धाता विश्वकृतां वरेण्य-<br>स्त्वां पूजयन्ति प्रणताः सदैव।<br>चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते भवान् हि<br>त्वमेव चाग्निः प्रपितामहश्च।<br>आराध्य त्वां सरस्वतीं वाग्लभन्ते<br>अहोरात्रे निमिषोन्मेषकत्र्ता॥ १४५<br>न ब्रह्मा न च गोविन्दः पौराणा ऋषयो न ते।<br>माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन शंकर॥ १४६<br>पुंसां शतसहस्राणि यत्समावृत्य तिष्ठति।<br>महत्तस्तमसः पारे गोप्ता मन्ता भवान् सदा॥ १४७ | आप हिरण्यरेता तथा अद्वितीय पुरुष हैं। आप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक भी हैं। आप ही बालक, युवक, वृद्ध, देवदंष्ट्रा, गिरि, संसारके रचयिता तथा संसारके संहार करनेवाले भी हैं। आप विश्व रचनेवालोंमें वरणीय धाता हैं। विनयी जन सदैव आपकी पूजा करते हैं। चन्द्रमा एवं सूर्य आपके नेत्रस्वरूप हैं। आप ही अग्नि एवं प्रपितामह हैं। सरस्वतीरूप आपकी आराधना कर लोग (प्राञ्जल) वाणीकी प्राप्ति करते हैं। आप दिन और रात्रि हैं और निमेष एवं उन्मेषके कर्त्ता हैं। हे शंकर! ब्रह्मा, गोविन्द तथा प्राचीन ऋषि भी आपकी महिमाको ठीक-ठीक नहीं जान सकते। आप (अपनेमें) लाखों पुरुषोंको समावृत कर स्थित हैं। आप सदा महान् तमसे परे रहनेवाले परम रक्षक एवं (सबके) अवबोधक हैं॥ १४४—१४७॥ |
| यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ १४८ | निद्रारहित (अतः सदा जागरूक), श्वासपर विजय प्राप्त करनेवाले, सत्त्वगुणमें सदा स्थित एवं संयतेन्द्रिय योगिजन जिस ज्योतिका दर्शन करते हैं, उस योगात्मक (आप)-को नमस्कार है। |
| या मूर्तयश्च सूक्ष्मास्ते न शक्या या निदर्शितुम्।<br>ताभिर्मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम्॥ १४९ | सूक्ष्म होनेके कारण आपकी जो मूर्तियाँ प्रदर्शित नहीं की जा सकतीं उनके द्वारा आप सदा मेरी इस प्रकार रक्षा करें जैसे पिता अपने औरस |
| अध्याय ४७ ] | स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक | २११ |
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| रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते।<br>भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि॥ १५०<br><br>जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे।<br>कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ १५१ | पुत्रकी रक्षा करता है। पुण्यात्मन्! आप मेरी रक्षा करें। मैं आपका रक्षणीय हूँ। आपको नमस्कार है। आप भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् हैं; मैं सदा आपका भक्त हूँ। जटी, दण्डी, लम्बोदरशरीरी तथा कमण्डलुनिषङ्ग रुद्रात्माको नमस्कार है॥ १४८—१५१॥ |
| यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसन्धिषु।<br>कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः॥ १५२<br><br>संभक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते।<br>यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम्॥ १५३<br><br>प्रविश्य वदनं राहोर्र्यः सोमं पिबते निशि।<br>ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानू रक्षितस्तव तेजसा॥ १५४<br><br>ये चात्र पतिता गर्भा रुद्रगन्धस्य रक्षणे।<br>नमस्तेऽस्तु स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्ति तदद्भुते॥ १५५ | जिनके केशोंमें बादल, समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें नदियाँ एवं कुक्षिमें चारों समुद्र हैं, उन तोयात्मा भगवान्को नमस्कार है। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर भूतोंको अपने उदरमें स्थित रखकर जो जलके मध्यमें शयन करते हैं उन जलशायी (विष्णु)-की मैं शरण लेता हूँ। रात्रिमें आप जो राहुके मुखमें प्रवेश कर सोमको पीते हैं तथा आपके तेजसे रक्षित राहु सूर्यको ग्रस लेता है, ऐसे आपको नमस्कार है। रुद्रगन्धकी रक्षामें जो यहाँ गर्भ (वाष्पराशि) गिरे, आपके ही तेजसे गिरे; अतः आपको नमस्कार है; उन्हीं अद्भुत (तेजों)-में स्वाहा तथा स्वधाको वे प्राप्त करते हैं॥ १५२—१५५॥ |
| येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम्।<br>रक्षन्तु ते हि मां नित्यं ते मामाप्याययन्तु वै॥ १५६<br><br>ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च।<br>वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च॥ १५७<br><br>चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च।<br>हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥ १५८<br><br>ये च पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च।<br>चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥ १५९<br><br>रसातलगता ये च ये च तस्मात् परं गताः।<br>नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यश्च नित्यशः॥ १६० | सभी देहधारियोंकी देहमें स्थित अङ्गुष्ठमात्रमें निवास करनेवाले जो पुरुष हैं, वे नित्य मेरी रक्षा करें तथा वे मुझे सर्वदा संतृप्त करें। जो नदियों, समुद्रों, पर्वतों, गुहाओं, वृक्षकी जड़ों, गायोंके रहनेके स्थानों, घने जंगलों, चौराहों, गलियों, चबूतरों, सभाओं, हथसारों, घुड़सारों और रथशालाओं, जीर्ण बाग-बगीचों, आलयों, पञ्चभूतों, पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशाओं एवं अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण एवं ईशानकोणोंमें स्थित हैं। जो चन्द्र और सूर्यके बीचमें रहनेवाले, चन्द्र तथा सूर्यकी किरणोंमें स्थित, रसातलमें रहनेवाले एवं उससे भी आगे पहुँचे हुए हैं, उनको नित्य बारम्बार नमस्कार है; नमस्कार है; नमस्कार है॥ १५६—१६०॥ |
| येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च।<br>असंख्येयगणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः॥ १६१<br><br>प्रसीद मम भद्रं ते तव भावगतस्य च।<br>त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिमतिस्त्वयि॥ १६२<br><br>स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम द्विजोत्तमः॥ १६३ | जिनकी कोई संख्या नहीं है और न प्रमाण तथा रूप ही है, उन अनगिनत रुद्रगणोंको सदा नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आपके भक्तिभावमें स्थित मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। हे देव! आपहीमें मेरा हृदय, मेरी बुद्धि एवं मति है। द्विजोत्तमने इस प्रकार महादेवकी स्तुति करके विराम ले लिया॥ १६१—१६३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७॥
| २१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४८ |
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अड़तालीसवाँ अध्याय
वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, वेन आदिकी सुगतिका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— |
|---|---|
| अथैनमब्रवीद् देवस्त्रैलोक्याधिपतिर्भवः।<br>आश्वासनकरं चास्य वाक्यविद् वाक्यमुत्तमम्॥ १<br><br>अहो तुष्टोऽस्मि ते राजन् स्तवेनानेन सुव्रत।<br>बहुनाऽत्र किमुक्तेन मत्समीपे वसिष्यसि॥ २<br><br>उषित्वा सुचिरं कालं मम गात्रोद्भवः पुनः।<br>असुरो ह्यन्धको नाम भविष्यसि सुरान्तकृत्॥ ३<br><br>हिरण्याक्षगृहे जन्म प्राप्य वृद्धिं गमिष्यसि।<br>पूर्वाधर्मेण घोरेण वेदनिन्दाकृतेन च॥ ४ | इसके बाद किसीकी किसी प्रकारकी भी उक्तिके अभिप्रायको भलीभाँति जाननेवाले तीनों लोकोंके स्वामी शंकरभगवान्ने उस (वेन)-को आश्वासन देनेवाला उत्तम वचन कहा—राजन्! सुव्रत! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं संतुष्ट हूँ। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है; तुम मेरे निकट (में ही सदा) निवास करोगे। बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद तुम फिर देवोंको नष्ट करनेवाले अन्धक नामक असुर होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होओगे और वेदकी निन्दा करनेसे पूर्वकालिक प्रचण्ड पापके कारण पुनः हिरण्याक्षके घरमें उत्पन्न होकर बड़े होगे—सयाने होगे॥ १—४॥ |
| साभिलाषो जगन्मातुर्भविष्यसि यदा तदा।<br>देहं शूलेन हत्वाहं पावयिष्यामि समार्बुदम्॥ ५<br><br>तत्राप्यकल्मषो भूत्वा स्तुत्वा मां भक्तितः पुनः।<br>ख्यातो गणाधिपो भूत्वा नाम्ना भृङ्गिरिटिः स्मृतः॥ ६<br><br>मत्सन्निधाने स्थित्वा त्वं ततः सिद्धिं गमिष्यसि।<br>वेनप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्त्तयेद् यः शृणोति च॥ ७<br><br>नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>यथा सर्वेषु देवेषु विशिष्टो भगवाञ्छिवः॥ ८<br><br>तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां वेननिर्मितः।<br>यशो राज्यसुखैश्वर्यधनमानाय कीर्त्तितः॥ ९ | जब तुम जगत्की माता (पार्वती)-की अभिलाषा करोगे तब मैं शूलद्वारा तुम्हारी देहका हनन करके दस करोड़ वर्षोंतकके लिये (तुम्हें) पवित्र करूँगा। उसके बाद वहाँ पापसे रहित होकर पुनः मेरी स्तुति करोगे और तब तुम भृङ्गिरिटि नामसे प्रसिद्ध गणाधिप बनोगे। फिर मेरी संनिधिमें रहकर तुम सिद्धिको प्राप्त करोगे। जो मनुष्य वेनके द्वारा कही हुई इस स्तुतिका कीर्तन करेगा या इसे सुनेगा, वह कभी अशुभ (अकल्याण)-को नहीं प्राप्त होगा और दीर्घ आयु प्राप्त करेगा। जैसे सभी देवताओंमें भगवान् शिवकी विशिष्टता है, वैसे ही वेनसे निर्मित यह स्तव सभी स्तवोंमें श्रेष्ठ (विशिष्ट) है। इसका कीर्तन यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, धन एवं मानका देनेवाला है॥ ५—९॥ |
| श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः।<br>व्याधितो दुःखितो दीनश्चौरराजभयान्वितः॥ १०<br><br>राजकार्यविमुक्तो वा मुच्यते महतो भयात्।<br>अनेनैव तु देहेन गणानां श्रेष्ठतां व्रजेत्॥ ११<br><br>तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः।<br>न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः॥ १२ | विद्याकी इच्छा रखनेवालेको श्रद्धासहित यत्नपूर्वक इस स्तुतिको सुनना चाहिये। व्याधिसे ग्रस्त, दुःखित, दीन, चोर या राजासे भयभीत अथवा राजकार्यसे अलग किया गया पुरुष (इस स्तुतिके द्वारा) महान् भयसे मुक्त होकर इसी देहसे गणोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करता है एवं निर्मल होकर तेज एवं यशसे युक्त होता है। जिस गृहमें इस स्तवका पाठ होता है उसमें राक्षस, पिशाच, भूत या विनायकगण विघ्न नहीं करते। पतिकी आज्ञा प्राप्त कर |
अध्याय ४८ ] वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य [ २१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विघ्नं कुर्युर्गृहे तत्र यत्रायं पठ्यते स्तवैः।<br>शृणुयाद् या स्तवं नारी अनुज्ञां प्राप्य भर्तृतः ॥ १३<br>मातृपक्षे पितुः पक्षे पूज्या भवति देववत्।<br>शृणुयाद् यः स्तवं दिव्यं कीर्तयेद् वा समाहितः ॥ १४<br>तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं गच्छन्ति नित्यशः।<br>मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचाऽनुकीर्तितम् ॥ १५<br>सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवनस्यानुकीर्तनात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृतमेनो विनश्यति।<br>वरं वरय भद्रं ते यत्त्वया मनसेप्सितम् ॥ १६ | इस स्तवका श्रवण करनेवाली नारी मातृपक्ष एवं पितृपक्षमें देवताके समान पूजनीया हो जाती है। जो मनुष्य समाहित होकर इस दिव्य स्तवको सुनेगा या कीर्तन करेगा, उसके सभी कार्य नित्य सिद्ध होंगे। इस स्तवका कीर्तन करनेवाले मनुष्यके मनमें चिन्तित तथा वचनके द्वारा कथित सभी कार्य सम्पन्न होते जायँगे और मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक—सारे पाप विनष्ट हो जायँगे। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो उस वरको माँग लो; तुम्हारा कल्याण हो॥ १०–१६॥ |
| वेन उवाच<br>अस्य लिङ्गस्य माहात्म्यात् तथा लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>मुक्तोऽहं पातकैः सर्वैस्तव दर्शनतः किल ॥ १७<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>देवस्वभक्षणाज्जातं श्वयोनौ तव सेवकम् ॥ १८<br>एतस्यापि प्रसादं त्वं कर्तुमर्हसि शंकर।<br>एतस्यापि भयान्येद्ये सरसोऽहं निमज्जितः ॥ १९<br>देवैर्निवारितः पूर्वं तीर्थेऽस्मिन् स्नानकारणात्।<br>अयं कृतोपकारश्च एतदर्थे वृणोम्यहम् ॥ २०<br>तस्यैतद् वचनं श्रुत्वा तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>एषोऽपि पापनिर्मुक्तो भविष्यति न संशयः ॥ २१<br>प्रसादान्मे महाबाहो शिवलोकं गमिष्यति।<br>तथा स्तवमिमं श्रुत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २२<br>कुरुक्षेत्रस्य माहात्म्यं सरसोऽस्य महीपते।<br>मम लिङ्गस्य चोत्पत्तिं श्रुत्वा पापैः प्रमुच्यते ॥ २३ | वेनने कहा— इस लिङ्गके माहात्म्यसे, इसके तथा आपके दर्शनसे मैं समस्त पापोंसे निश्चित रूपसे छूट गया हूँ। देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे शङ्कर! अपने उस सेवकपर कृपा करें जो देवद्रव्यका भक्षण करनेके कारण कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ है। पहले इस तीर्थमें स्नान करनेके लिये देवोंके मना करनेपर भी इस (कुत्ते)-के भयसे मैंने सरोवरमें स्नान किया। इसने मेरा उपकार किया है। अतएव मैं इसके लिये वर माँगता हूँ। उस (वेन)-के इस वचनको सुनकर शंकर सन्तुष्ट होकर बोले—महाबाहो! यह भी मेरी कृपासे निःसन्देह सभी पापोंसे बिलकुल छूट जायगा और शिवलोकको प्राप्त करेगा। इस स्तवको सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। राजन्! इस कुरुक्षेत्र तथा इस सरोवरका माहात्म्य और मेरे लिङ्गकी उत्पत्तिका वर्णन सुननेसे मनुष्य पापसे बिलकुल छूट जाता है॥ १७–२३॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् सर्वलोकनमस्कृतः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २४<br>स च श्वा तत्क्षणादेव स्मृत्वा जन्म पुरातनम्।<br>दिव्यमूर्त्तिधरो भूत्वा तं राजानमुपस्थितः ॥ २५<br>कृत्वा स्नानं ततो वैन्यः पितृदर्शनलालसः।<br>स्थाणुतीर्थे कुटीं शून्यां दृष्ट्वा शोकसमन्वितः ॥ २६<br>दृष्ट्वा वेनोऽब्रवीद् वाक्यं हर्षेण महताऽन्वितः।<br>सत्पुत्रेण त्वया वत्स त्रातोऽहं नरकार्णवात् ॥ २७ | सनत्कुमारने कहा— इस प्रकार कहकर समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत भगवान् सभी लोगोंके देखते हुए वहीं अन्तर्हित हो गये। वह कुत्ता भी उसी समय पूर्वजन्मका स्मरण करके दिव्य शरीर धारणकर उस राजाके सामने उपस्थित हुआ। उसके बाद वेनका पुत्र पृथु स्नान करके पितृदर्शनकी अभिलाषासे स्थाणु-तीर्थमें आनेपर कुटीको सूनी देख चिन्तित हो गया। वेन उसे देखकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक बोला—वत्स! तुमने नरक-सागरमें जानेसे मेरी रक्षा कर ली, अतः तुम सत्पुत्र सिद्ध हुए॥ २४–२७॥ |
| २१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४९ |
|---|
| त्वयाभिषिञ्चितो नित्यं तीर्थस्य पुलिने स्थितः।<br>अस्य साधोः प्रसादेन स्थाणोर्देवस्य दर्शनात्॥ २८<br><br>मुक्तपापश्च स्वर्लोकं यास्ये यत्र शिवः स्थितः।<br>इत्येवमुक्त्वा राजानं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्॥ २९<br><br>स्थाणुतीर्थे ययौ सिद्धिं तेन पुत्रेण तारितः।<br>स च श्वा परमां सिद्धिं स्थाणुतीर्थप्रभावतः॥ ३०<br><br>विमुक्तः कलुषैः सर्वैर्जगाम भवमन्दिरम्।<br>राजा पितॄन्नृणैर्मुक्तः परिपाल्य वसुन्धराम्॥ ३१<br><br>पुत्रानुत्पाद्य धर्मेण कृत्वा यज्ञं निरर्गलम्।<br>दत्त्वा कामांश्च विप्रेभ्यो भुक्त्वा भोगान् पृथग्विधान्॥ ३२ | तीर्थके तटपर रहने एवं तुम्हारे द्वारा नित्य अभिषिञ्चित होनेके कारण तथा इस साधुके अनुग्रह एवं स्थाणुदेवके दर्शन करनेसे मैं पापोंसे छूटकर उस स्वर्गलोकको जा रहा हूँ, जहाँ शिवजी (स्वयं) स्थित हैं। राजा पृथुसे ऐसा कहनेके पश्चात् उस पुत्रद्वारा (पापनिर्मुक्त) तारित वेनने स्थाणुतीर्थमें महेश्वरको प्रतिष्ठापित करके सिद्धि प्राप्त कर ली। स्थाणुतीर्थके प्रभावसे वह कुत्ता भी पापसे रहित होकर परम सिद्धिको प्राप्त हुआ और शिवलोकको चला गया। राजा पृथु पितृ-ऋणसे मुक्त हो गये और पृथ्वीका पालन करते हुए उन्होंने धर्मपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करके बाधारहित होकर यज्ञ (यज्ञानुष्ठान) किया। उन्होंने ब्राह्मणोंको मनोऽभिलषित पदार्थोंका दान दिया तथा भाँति-भाँतिके भोगोंका उपभोग किया॥ २८–३२॥ |
| सुहृदोऽथ ऋणैर्मुक्त्वा कामैः संतर्प्य च स्त्रियः।<br>अभिषिच्य सुतं राज्ये कुरुक्षेत्रं ययौ नृपः॥ ३३<br><br>तत्र तप्त्वा तपो घोरं पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>आत्मेच्छया तनुं त्यक्त्वा प्रयातः परं पदम्॥ ३४<br><br>एतत्प्रभावं तीर्थस्य स्थाणोर्यः शृणुयान्नरः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमां गतिम्॥ ३५ | मित्रोंको (भी) ऋणसे मुक्त तथा स्त्रियोंके मनोरथोंको संतुष्टि प्रदान करनेके पश्चात् पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर पृथु राजा कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहाँ घोर तपस्या तथा शङ्करका पूजन करके अपनी इच्छासे शरीरका त्याग कर उन्होंने परमपदको प्राप्त किया। जो मनुष्य स्थाणुतीर्थके इस प्रभावको सुनेगा, वह सभी पापोंसे छूट जायगा और परम गतिको प्राप्त करेगा॥ ३३–३५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति और स्थाणुतीर्थका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच<br>चतुर्मुखानामुत्पत्तिं विस्तरेण ममानघ।<br>तथा ब्रह्मेश्वराणां च श्रोतुमिच्छा प्रवर्तते॥ १ | मार्कण्डेयने कहा— निष्पाप! चार मुखों और ब्रह्मेश्वरोंकी उत्पत्तिको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी इच्छा हो रही है (अतः आप उसे सुनानेकी कृपा करें)॥ १॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>शृणु सर्वमशेषेण कथयिष्यामि तेऽनघ।<br>ब्रह्मणः स्रष्टुकामस्य यद् वृत्तं पद्मजन्मनः॥ २<br><br>उत्पन्न एव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ससर्ज सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ३ | सनत्कुमार बोले— अनघ! सृष्टिकी कामना करनेवाले एवं कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माका जो वृत्तान्त है, उसे मैं तुमसे पूर्णतः कहता हूँ, सुनो। लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने उत्पन्न होते ही पहले अचर और चररूप सम्पूर्ण भूतोंकी रचना की। |
५२- शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना, महर्षियोंका हिमवान्से शिवके लिये उमाकी याचना, हिमालयकी स्वीकृति और सप्तर्षियोंद्वारा शिवको स्वीकृति-सूचना
| अध्याय ४९ ] | चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति | २१५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुनश्चिन्तयतः सृष्टिं जज्ञे कन्या मनोरमा।<br>नीलोत्पलदलश्यामा तनुमध्या सुलोचना॥ ४<br><br>तां दृष्ट्वाभिमतां ब्रह्मा मैथुनायाजुहाव ताम्।<br>तेन पापेन महता शिरोऽशीर्यत वेधसः॥ ५<br><br>तेन शीर्णेन स ययौ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>सान्निहत्यं सरः पुण्यं सर्वपापक्षयावहम्॥ ६<br><br>तत्र पुण्ये स्थाणुतीर्थे ऋषिसिद्धनिषेविते।<br>सरस्वत्युत्तरे तीरे प्रतिष्ठाप्य चतुर्मुखम्॥ ७<br><br>आराधयामास तदा धूपैर्गन्धैर्मनोरमैः।<br>उपहारैस्तथा हृद्यै रौद्रसूक्तैर्दिने दिने॥ ८<br><br>तस्यैवं भक्तियुक्तस्य शिवपूजापरस्य च।<br>स्वयमेवाजगामाथ भगवान् नीललोहितः॥ ९<br><br>तमागतं शिवं दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>प्रणम्य शिरसा भूमौ स्तुतिं तस्य चकार ह॥ १० | पुनः उनके सृष्टिकी चिन्ता करनेपर एक नीले कमल-दलके समान श्याम, पतले मध्य भागवाली, सुलोचना, मनो-मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई। उस मनोहर कन्याको देखकर ब्रह्माने उसे संतानोत्पत्ति हेतु बुलाया। (बस,) उस महान् पापसे ब्रह्माका मस्तक गिर गया॥ २–५॥<br><br>वे (ब्रह्माजी) उस गिरे मस्तकको लेकर सभी पापोंका विनाश करनेवाले तीनों लोकोंमें विख्यात सान्निहत्यसर नामके तीर्थमें गये। ऋषि और सिद्धोंसे सेवित उस पवित्र स्थाणुतीर्थमें सरस्वतीके उत्तरी तटपर चतुर्मुख (चार मुखवाले शिवलिङ्ग)-को स्थापित कर प्रतिदिन मनोरम धूप, गन्ध, सुन्दर उपहारों एवं रुद्र-सूक्तोंसे उसकी उपासना करने लगे। उनके इस प्रकार भक्तिपूर्वक शिवपूजामें तन्मय हो जानेपर भगवान् नीललोहित (शंकरजी) स्वयं ही वहाँ आ गये। लोकपितामह ब्रह्माने उन आये हुए शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया और पुनः वे (ब्रह्माजी) उन (शिव)-की स्तुति करने लगे॥ ६–१०॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव भूतभव्य भवाश्रय।<br>नमस्ते स्तुतिनित्याय नमस्त्रैलोक्यपालिने॥ ११<br><br>नमः पवित्रदेहाय सर्वकल्मषनाशिने।<br>चराचरगुरो गुह्यगुह्यानां च प्रकाशकृत्॥ १२<br><br>रोगा न यान्ति भिषजैः सर्वरोगविनाशन।<br>रौरवाजिनसंवीत वीतशोक नमोऽस्तु ते॥ १३<br><br>वारिकल्लोलसंक्षुब्धमहाबुद्धिविघट्टिने ।<br>त्वन्नामजापिनो देव न भवन्ति भवाश्रयाः॥ १४ | ब्रह्माने कहा— भूत, भव्य तथा भवके आश्रयस्वरूप महादेवजी! आपको नमस्कार है। नित्य-स्तुति किये जानेवाले और तीनों लोकोंके रक्षक! आपको नमस्कार है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाले एवं पवित्र देहवाले! आपको नमस्कार है। चर और अचरके गुरु! आप रहस्योंके भी रहस्यको (गुप्त-से-गुप्त तत्त्वको) प्रकाशित करनेवाले हैं। वैद्योंकी दवाओंसे दूर न होनेवाले सभी रोगोंका विनाश करनेवाले! रुरुमृगचर्मधारी! शोकसे रहित शिव! आपको नमस्कार है। जलकी उत्ताल तरङ्गोंसे महाबुद्धिके विघटन करनेमें (स्वयं भी) संक्षुब्ध देव! आपके नामका जप करनेवाले प्राणी संसारमें नहीं पड़ते॥ ११–१४॥ |
| नमस्ते नित्यनित्याय नमस्त्रैलोक्यपालन।<br>शंकरायाप्रमेयाय व्याधीनां शमनाय च॥ १५<br><br>परायापरिमेयाय सर्वभूतप्रियाय च।<br>योगेश्वराय देवाय सर्वपापक्षयाय च॥ १६<br><br>नमः स्थाणवे सिद्धाय सिद्धवन्दिसुताय च।<br>भूतसंसारदुर्गाय विश्वरूपाय ते नमः॥ १७ | नित्यके भी नित्य आपको नमस्कार है। तीनों लोकोंके पालक! कल्याणकारी (निश्चयात्मिका बुद्धिसे भी अगम्य) अप्रमेय शारीरिक-मानसिक रोगोंके नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। सबसे परे, अपरिमेय (मापमें न आने योग्य), सभी प्राणियोंके प्रिय देव एवं सभी पापोंके क्षय करनेवाले योगेश्वर! आपको नमस्कार है। (आप) स्थाणुस्वरूप सिद्ध एवं सिद्धों तथा वन्दियोंके द्वारा स्तुत आपको नमस्कार है। संसारके प्राणियोंके लिये दुर्ग बने हुए आप विश्वरूपके लिये नमस्कार है। |
| २१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४१ | | :--- | :--- |
| फणीन्द्रोक्तमहिम्ने ते फणीन्द्राङ्गदधारिणे।<br>फणीन्द्रवरहाराय भास्कराय नमो नमः॥ १८ | सर्पराजके द्वारा बखानी गयी महिमावाले, सर्पराजके बाजूबंद एवं माला धारण करनेवाले भास्करस्वरूप! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १५–१८॥ | | एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्माणं प्राह शङ्करः।<br>न च मन्युस्त्वया कार्यों भाविन्यर्थे कदाचन ॥ १९<br><br>पुरा वराहकल्पे ते यन्मयाऽपहृतं शिरः।<br>चतुर्मुखं च तद्भून्न कदाचिन्नशिष्यति ॥ २०<br><br>अस्मिन् सान्निहिते तीर्थे लिङ्गानि मम भक्तितः।<br>प्रतिष्ठाय विमुक्तस्त्वं सर्वपापैर्भविष्यसि ॥ २१<br><br>सृष्टिकामेन च पुरा त्वयाऽहं प्रेरितः किल।<br>तेनाहं त्वां तथेत्युक्त्वा भूतानां देशवर्त्तिवत् ॥ २२<br><br>दीर्घकालं तपस्तप्त्वा मग्नः संनिहिते स्थितः।<br>सुमहान्तं ततः कालं त्वं प्रतीक्षां ममाकरोः॥ २३ | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर शंकरने ब्रह्मासे कहा—ब्रह्मन्! जो कार्य अवश्यम्भावी है उसके विषयमें आपको कभी भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। पहले वराह-कल्पमें मैंने आपका जो मस्तक अपहृत किया था वही चार मुख हो गया। अब वह कभी विनष्ट नहीं होगा। इस सान्निहिततीर्थमें भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गोंकी प्रतिष्ठा करके आप सभी पापोंसे छूट जायँगे। प्राचीन कालमें सृष्टि रचनेकी इच्छासे आपने मुझे अनुप्रेरित किया था, अतः मैं 'ऐसा ही होगा' यह कहकर भूतोंके देशमें रहनेवालेकी भाँति दीर्घकालतक तप करके संनिहितमें विलीन होकर स्थित रहा। उसके बाद आपने बहुत दिनोंतक मेरी प्रतीक्षा की॥ १९–२३॥ | | स्रष्टारं सर्वभूतानां मनसा कल्पितं त्वया।<br>सोऽब्रवीत् त्वां तदा दृष्ट्वा मां मग्नं तत्र चाम्भसि॥ २४<br><br>यदि मे नाग्रजस्त्वन्यस्ततः स्त्रक्ष्याम्यहं प्रजाः।<br>त्वयैवोक्तश्च नैवास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः॥ २५<br><br>स्थाणुरेष जले मग्नो विवशः कुरु मद्द्वितम्।<br>स सर्वभूतनसृजद् दक्षादींश्च प्रजापतीन्॥ २६ | फिर आपने अपने मनमें सभी प्राणियोंकी सृष्टि करनेवालेका ध्यान किया। तब उन्होंने मुझे वहाँ जलमें विलीन देखकर आपसे कहा कि यदि मुझसे अन्य कोई बड़ा पहले हुआ न माना जाय तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा। आपने कहा—आपके सिवा कोई दूसरा अग्रज पुरुष नहीं है। ये स्थाणु जलमें विलीन तथा विवश पड़े हैं। आप मेरा कल्याण करें। फिर उन्होंने दक्ष आदि प्रजापतियों तथा समस्त भूतोंकी सृष्टि की ॥ २४–२६॥ | | यैरिमं प्रकरोत् सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम्।<br>ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् ॥ २७<br><br>बिभक्षयिषवो ब्रह्मन् सहसा प्राद्रवंस्तथा।<br>स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् ॥ २८ | (इस तरह) जिन्होंने इस चार प्रकारके प्राणि-समुदायको उत्पन्न किया, सृष्टि होते ही वे सभी प्रजाएँ क्षुधित हो गयीं और प्रजापतिको खानेकी इच्छासे उन्हींपर लपक पड़ीं। जब उन्होंने उन्हींका भक्षण करनेकी चेष्टा की, तब त्राण पानेकी इच्छासे वे पितामहके पास दौड़कर गये और उनसे बोले— | | अथासां च महावृत्तिः प्रजानां संविधीयताम्।<br>दत्तं ताभ्यस्त्वया ह्यन्नं स्थावराणां महौषधीः॥ २९<br><br>जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम्।<br>विहितान्नाः प्रजाः सर्वाः पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ ३० | प्रजाओंकी जीविकाका विधान कीजिये। फिर आपने उन्हें अन्न (जीवन-साधन) प्रदान किया। अचल प्राणियोंकी महौषधियाँ और निर्बल चल प्राणी शक्तिशाली प्राणियोंके अन्न (प्राण-शक्ति) बने। इस प्रकार जीवन-निर्वाहके लिये प्राण-शक्तिका विधान हुआ। फिर सभी प्रजाएँ अपने स्थानको लौट गयीं ॥ २७–३०॥ |
| अध्याय ४९ ] | चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति | २१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो ववृधिरे सर्वाः प्रीतियुक्ताः परस्परम्।<br>भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरौ त्वयि॥ ३१<br>समुत्तिष्ठञ्जलात् तस्मात् प्रजाः संदृष्टवानहम्।<br>ततोऽहं ताः प्रजा दृष्ट्वा विहिताः स्वेन तेजसा ॥ ३२<br>क्रोधेन महता युक्तो लिङ्गमुत्पाट्य चाक्षिपम्।<br>तत् क्षिप्तं सरसो मध्ये ऊर्ध्वमेव यदा स्थितम् ॥ ३३<br>तदा प्रभृति लोकेषु स्थाणुरित्येष विश्रुतः।<br>सकृद् दर्शनमात्रेण विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥ ३४<br>प्रयाति मोक्षं परमं यस्मान्नावर्तते पुनः।<br>यश्चेह तीर्थे निवसेत् कृष्णाष्टम्यां समाहितः ॥ ३५<br>स मुक्तः पातकैः सर्वैरगम्यागमनोद्भवैः।<br>इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३६ | फिर तो वे सब परस्पर प्रेमपूर्वक रहकर बढ़ने लगे। प्राणि-समुदायके बढ़ने एवं लोकके गुरु आपके हर्षित होनेपर मैंने उस जलसे निकलकर प्रजाको देखा। उसके बाद अपने तेजसे उत्पन्न हुई उन प्रजाओंको देखकर भारी क्रोधसे भरकर मैंने लिङ्गको उखाड़कर फेंक दिया। तालाबके बीचमें फेंका गया वह (लिङ्ग) ऊपर स्थित हो गया। तभीसे वह (लिङ्ग) संसारमें 'स्थाणु' नामसे प्रसिद्ध हो गया। इस (लिङ्ग)-का एक बार भी दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे छूटकर मोक्षपद प्राप्त कर लेता है; जहाँसे वह फिर नहीं लौटता। कृष्णाष्टमीके दिन मनको शान्त—समाहित कर इस तीर्थमें निवास करनेवाला व्यक्ति अगम्यागमनसे होनेवाले सभी पापोंसे छूट जाता है—ऐसा कहकर भगवान् महादेव वहीं अन्तर्हित हो गये॥ ३१—३६॥ |
| ब्रह्मा विशुद्धपापस्तु पूज्य देवं चतुर्मुखम्।<br>लिङ्गानि देवदेवस्य ससृजे सरमध्यतः ॥ ३७<br>आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं हरिपाश्र्वे प्रतिष्ठितम्।<br>द्वितीयं ब्रह्मसदनं स्वकीये ह्याश्रमे कृतम् ॥ ३८<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे तृतीयं च प्रतिष्ठितम्।<br>चतुर्थं ब्रह्मणा लिङ्गं सरस्वत्यास्तटे कृतम् ॥ ३९<br>एतानि ब्रह्मतीर्थानि पुण्यानि पावनानि च।<br>ये पश्यन्ति निराहारास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ ४० | पापके शोधन हो जानेके कारण ब्रह्माने भी चतुर्मुख महादेवका पूजन कर तालाबके बीचमें देवाधिदेव (शिव)-के लिङ्गोंकी सृष्टि की। पहले तो उन्होंने हरिकी बगलमें ब्रह्मसरको स्थापित किया और दूसरा अपने आश्रम ब्रह्मसदनका निर्माण किया। उसीकी पूर्व दिशामें ब्रह्माने तृतीय लिङ्गको एवं सरस्वती नदीके तटपर चतुर्थ लिङ्गको प्रतिष्ठित किया। जो प्राणी उपवास-व्रतपूर्वक इन पवित्र और पापनाशक ब्रह्मतीर्थोंका दर्शन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त करते हैं॥ ३७—४०॥ |
| कृते युगे हरेः पार्श्वे त्रेतायां ब्रह्मण आश्रमे।<br>द्वापरे तस्य पूर्वेण सरस्वत्यास्तटे कलौ ॥ ४१<br>एतानि पूजयित्वा च दृष्ट्वा भक्तिसमन्विताः।<br>विमुक्ताः कलुषैः सर्वैः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ४२<br>सृष्टिकाले भगवता पूजितस्तु महेश्वरः।<br>सरस्वत्युत्तरे तीरे नाम्ना ख्यातश्चतुर्मुखः ॥ ४३<br>तं प्रणम्य श्रद्दधानो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>लोलासंकरसंभूतैस्तथा वैभाण्डसंकरैः ॥ ४४ | सत्ययुगमें हरिकी बगलमें, त्रेतामें ब्रह्माके आश्रममें, द्वापरमें उसके पूर्व तथा कलिमें सरस्वतीके तटपर स्थित लिङ्गोंका भक्तिपूर्वक पूजन एवं दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे छूटकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। सृष्टि करनेके समय सरस्वतीके उत्तरी तटपर भगवान् ब्रह्मासे अर्चित भगवान् महेश्वर चतुर्मुख नामसे विख्यात हुए। मनुष्य उनको श्रद्धाके साथ प्रणाम कर लोलासाङ्कर्य (चंचलासे उत्पन्न वर्णसंकर) तथा वैभाण्डसाङ्कर्यसे उत्पन्न सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४१-४४॥ |
| तथैव द्वापरे प्राप्ते स्वाश्रमे पूज्य शङ्करम्।<br>विमुक्तो राजसैर्भावैर्वर्णसंकरसम्भवैः ॥ ४५<br><br>ततः कृष्णचतुर्दश्यां पूजयित्वा तु मानवः।<br>विमुक्तः पातकैः सर्वैर्भोज्यस्यान्नसम्भवैः ॥ ४६ | उसी प्रकार द्वापरयुगके आनेपर अपने आश्रममें शङ्करका पूजन कर ब्रह्मा वर्णसाङ्कर्यसे उत्पन्न होनेवाले रजोगुणके भावोंसे मुक्त हुए। मनुष्य कृष्णचतुर्दशी तिथिमें वहाँ शङ्करजीका पूजन कर अभक्ष्य अन्नके भक्षण करनेसे होनेवाले समस्त पापोंसे विमुक्त हो जाता है। |
| २१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५० |
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| कलिकोले तु संप्राप्ते वसिष्ठाश्रममास्थितः ।<br>चतुर्मुखं स्थापयित्वा ययौ सिद्धिमनुत्तमाम् ॥ ४७<br>तत्रापि ये निराहाराः श्रद्दधाना जितेन्द्रियाः ।<br>पूजयन्ति महादेवं ते यान्ति परमं पदम् ॥ ४८<br>इत्येतत् स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं कीर्त्तितं तव ।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ ४९ | कलिकाल आनेपर वसिष्ठाश्रममें स्थित होकर ब्रह्माने चतुर्मुख (शङ्कर)-की स्थापना की तथा उत्तम सिद्धि प्राप्त की। जो लोग वहाँ निराहार, श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय होकर महादेवकी पूजा करेंगे, वे परमपदको प्राप्त करेंगे। इस प्रकार मैंने आपसे स्थाणुतीर्थका माहात्म्य बताया, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४५—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४९॥
पचासवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीयाके महत्त्वकी कथा
| देवदेव उवाच | देवदेव (महादेव)-ने कहा— |
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| एवं पृथूदको देवाः पुण्यः पापभयापहः।<br>तं गच्छध्वं महातीर्थं यावत् संनिधिबोधितम्॥ १<br><br>यदा मृगशिरोऋक्षे शशिसूर्यौ बृहस्पतिः।<br>तिष्ठन्ति सा तिथिः पुण्या त्वक्षया परिगीयते॥ २<br><br>तं गच्छध्वं सुरश्रेष्ठा यत्र प्राची सरस्वती।<br>पितॄनाराधयध्वं हि तत्र श्राद्धेन भक्तितः॥ ३<br><br>ततो मुरारिवचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समाजग्मुः कुरुक्षेत्रे पुण्यतीर्थं पृथूदकम्॥ ४ | देवताओ! इस प्रकार पृथूदकतीर्थ पाप-भयको नष्ट करनेवाला और पवित्र है। तुमलोग 'सन्निहित' तालाबतक (उस) ज्ञात (व्याप्त) होनेवाले महातीर्थमें जाओ। जिस तिथिमें चन्द्रमा, सूर्य एवं बृहस्पति—ये तीनों ग्रह मृगशिरा नक्षत्रमें स्थित होते हैं, उस पवित्र तिथिको 'अक्षया' तिथि कहते हैं। श्रेष्ठ देवताओ! जहाँ सरस्वती नदी पूर्व दिशामें बह रही है, वहाँ जाकर भक्ति-श्रद्धासे श्राद्ध करके पितरोंकी आराधना करो। भगवान्का निर्देश सुनकर इन्द्रके सहित सभी देवता कुरुक्षेत्रमें विद्यमान पृथूदक नामवाले पवित्र तीर्थमें गये॥ १—४॥ |
| तत्र स्नात्वा सुराः सर्वे बृहस्पतिमचोदयन्।<br>विशस्व भगवन् ऋक्षमिमं मृगशिरं कुरु।<br>पुण्यां तिथिं पापहरां तव कालोऽयमागतः॥ ५<br><br>प्रवर्तते रविस्तत्र चन्द्रमाऽपि विशत्यसौ।<br>त्वदायत्तं गुरो कार्यं सुराणां तत् कुरुष्व च॥ ६<br><br>इत्येवमुक्तो देवैस्तु देवाचार्योऽब्रवीदिदम्।<br>यदि वर्षाधिपोऽहं स्यां ततो यास्यामि देवताः।<br>बाढमूचुः सुराः सर्वे ततोऽसौ प्राक्रमन्मृगम्॥ ७ | वहाँ स्नान करके सभी देवताओंने बृहस्पतिसे कहा—भगवन्! इस मृगशिरा नक्षत्रमें आप प्रविष्ट होकर पापविनाशिनी पवित्र तिथिका निर्माण (विधान) करें। आपका यह (निर्दिष्ट) समय आ गया है। सूर्य उस स्थानपर स्थित हैं तथा चन्द्रमा भी उसमें प्रविष्ट हो रहे हैं। हे बृहस्पति! देवताओंका कार्य आपके अधीन है, आप उसे पूरा करें। देवताओंके इस प्रकार कहनेपर देवोंके गुरु बृहस्पतिने यह कहा—देवताओ! यदि मैं वर्ष-स्वामी बनूँ तो (मृगशिरा नक्षत्रपर) जाऊँगा। सभी देवोंने कहा—ठीक है। तब उन्होंने (बृहस्पतिने) मृगशिरा नक्षत्रमें प्रवेश किया॥ ५—७॥ |
अध्याय ५१ ] मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन २१९
| आषाढे मासि मार्गर्क्षे चन्द्रक्षयतिथिर्हि या।<br>तस्यां पुरन्दरः प्रीतः पिण्डं पितृषु भक्तितः॥८<br>प्रादात् तिलमधूमिश्रं हविष्यान्नं कुरुष्वथ।<br>ततः प्रीतास्तु पितरस्तां प्राहुस्तनयां निजाम्॥९<br>मेनां देवाश्च शैलाय हिमयुक्ताय वै ददुः।<br>तां मेनां हिमवाँल्लब्ध्वा प्रसादाद् दैवतेष्वथ।<br>प्रीतिमानभवच्चासौ रराम च यथेच्छया॥१०<br>ततो हिमाद्रिः पितृकन्यया समं<br>समर्पयन् वै विषयान् यथेष्टम्।<br>अजीजनत् सा तनयाश्च तिस्रो<br>रूपातियुक्ताः सुरयोषितोपमाः॥११ | आषाढ़ महीनेके मृगशिरा नक्षत्रमें चन्द्रक्षय (अमावस्या) तिथिके आ जानेपर इन्द्रने प्रसन्न होकर कुरुक्षेत्रमें भक्तिके साथ पितरोंको तिल और मधुसे मिला हुआ हविष्यान्नका पिण्ड प्रदान किया। तब पितरोंने देवोंको अपनी मेना नामकी कन्या दी। देवताओंने उसे हिमालयको सौंप दिया। देवोंके अनुग्रहसे उस मेनाको पाकर वे हिमवान् प्रसन्न हो गये और इच्छानुकूल विनोद-विहारमें लग गये। हिमालय पितरोंद्वारा दी गयी उस कन्याके साथ दाम्पत्यसुखमें आसक्त हो गये। फिर उस मेनाने भी सुरनारियोंके समान अत्यन्त रूपवती तीन कन्याओंको उत्पन्न किया॥८—११॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥५०॥
इक्यावनवाँ अध्याय
मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन
| पुलस्त्य उवाच<br>मेनायाः कन्यकास्तिस्रो जाता रूपगुणान्विताः।<br>सुनाभ इति च ख्यातश्चतुर्थस्तनयोऽभवत्॥१<br>रक्ताङ्गी रक्तनेत्रा च रक्ताम्बरविभूषिता।<br>रागिणी नाम संजाता ज्येष्ठा मेनासुता मुने॥२<br>शुभाङ्गी पद्मपत्राक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा।<br>श्वेतमाल्याम्बरधरा कुटिला नाम चापरा॥३<br>नीलाञ्जनचयप्रख्या नीलेन्दीवरलोचना।<br>रूपेणानुपमा काली जघन्या मेनकासुता॥४<br>जातास्ताः कन्यकास्तिस्रः षडब्दात् परतो मुने।<br>कर्तुं तपः प्रयातास्ता देवास्ता ददृशुः शुभाः॥५<br>ततो दिवाकरैः सर्वैर्वसुभिश्च तपस्विनी।<br>कुटिला ब्रह्मलोकं तु नीता शशिकरप्रभा॥६<br>अथोचुर्देवताः सर्वाः किं त्वियं जनयिष्यति।<br>पुत्रं महिषहन्तारं ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥७ | पुलस्त्यजी बोले—मेनाको रूप और गुणोंसे सम्पन्न तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं और चौथा सुनाभ नामसे विख्यात पुत्र उत्पन्न हुआ। मुने! मेनाकी जेठी कन्या 'रागिणी' नामकी थी, जो लाल अङ्गों तथा लाल आँखोंवाली थी। वह लाल वस्त्रोंसे सुशोभित रहती थी। दूसरी 'कुटिला' नामकी कन्या थी, जो सुन्दर शरीरवाली, कमलदलनयना, नीले एवं घुँघराले बालोंवाली थी तथा उज्ज्वल माला और उज्ज्वल वस्त्र धारण किये रहती थी। मेनाकी तीसरी कन्याका नाम था 'काली'। उसका रंग नीले अञ्जनके ढेरके समान और आँखें नीले कमलके जैसी थीं। वह अत्यन्त सुन्दर थी॥१—४॥<br>मुने! वे तीनों कन्याएँ जन्मसे छः वर्षके बाद तपस्या करने चली गयीं। देवताओंने उन सुन्दरी कन्याओंको देखा, फिर आदित्य तथा वसुगण चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिवाली तपस्विनी (मध्यमा कन्या) कुटिलाको ब्रह्मलोकमें ले गये। उसके बाद सभी देवताओंने ब्रह्मासे कहा कि ब्रह्मन्! आप बतलायें कि क्या यह कन्या महिषासुरको मारनेवाले पुत्रको जनेगी? |
५३- हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति
| २२० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ |
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| ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्नेयं शक्ता तपस्विनी।<br>शार्वं धारयितुं तेजो वराकी मुच्यतां त्वियम्॥ ८ | तब सुरपतिने कहा—यह बेचारी तपस्विनी शिवका तेज धारण करनेमें समर्थ नहीं है; इसे छोड़ दो॥५-८॥ | | ततस्तु कुटिला क्रुद्धा ब्रह्माणं प्राह नारद।<br>तथा यतिष्ये भगवन् यथा शार्वं सुदुर्द्धरम्॥ ९<br><br>धारयिष्याम्यहं तेजस्तथैव शृणु सत्तम।<br>तपसाहं सुतप्तेन समाराध्य जनार्दनम्॥ १०<br><br>यथा हरस्य मूर्धानं नमयिष्ये पितामह।<br>तथा देव करिष्यामि सत्यं सत्यं मयोदितम्॥ ११ | नारद! उसके बाद कुपित होकर कुटिलाने ब्रह्मासे कहा—भगवन्! शङ्करके दुर्धरणीय तेजको जैसे धारण कर सकूँ, मैं वैसा उपाय करूँगी। सत्तम! आप सुनें, कठिनतर तपस्यासे जनार्दन भगवान्की उत्तम उपासना करके मैं उनके तेजको वैसे ही धारण करूँगी जिससे शङ्करका सिर नत कर दूँ। पितामह देव! मैंने जो कहा है वह सत्य है, सत्य है; मैं वैसा ही करूँगी॥ ९-११॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>ततः पितामहः क्रुद्धः कुटिलां प्राह दारुणाम्।<br>भगवानादिकृद् ब्रह्मा सर्वेशोऽपि महामुने॥ १२ | **पुलस्त्यजी बोले—**महामुने! उसके बाद आदिकर्ता सबके उपास्य पितामह भगवान् ब्रह्माने उग्र स्वभाववाली कुटिलासे कुपित होकर कहा—॥ १२॥ | | ब्रह्मोवाच<br>यस्मान्मद्वचनं पापे न क्षान्तं कुटिले त्वया।<br>तस्मान्मच्छापनिर्दग्धा सर्वा आपो भविष्यसि॥ १३ | **ब्रह्माने कहा—**पापिनी कुटिले! जिस कारण तुमने मेरे वचनको सहन नहीं किया, उसी कारण मेरे शापसे तुम निर्दग्ध होकर पूर्णतः जलमयी हो जाओगी। | | इत्येवं ब्रह्मणा शप्ता हिमवद्दुहिता मुने।<br>आपोमयी ब्रह्मलोकं प्लावयामास वेगिनी॥ १४<br><br>तामुद्वृत्तजलां दृष्ट्वा प्रबबन्ध पितामहः।<br>ऋक्सामार्थर्वयजुर्भिर्वाङ्मयैर्बन्धनैर्दृढम् ॥ १५<br><br>सा बद्धा संस्थिता ब्रह्मन् तत्रैव गिरिकन्यका।<br>आपोमयी प्लावयन्ती ब्रह्मणो विमला जटाः॥ १६ | मुने! इस प्रकार ब्रह्मासे अभिशप्त हिमालय-पुत्री (कुटिला) जलमयी होकर (अपने) वेगसे ब्रह्मलोकको जलसे आप्लावित करने लगी। पितामहने उसके उमड़कर बहते हुए जलकी धाराको देखकर ऋक्, साम, अथर्व और यजुष्की स्तुतियोंका पाठ करके उसे स्तुतिद्वारा दृढ़तापूर्वक बाँध दिया। ब्रह्मन्! जलमयी वह पर्वतपुत्री ब्रह्माकी विमल जटाको भिगोती हुई वहीं बद्ध (अवरुद्ध) हो गयी॥ १३-१६॥ | | या सा रागवती नाम सापि नीता सुरैर्दिवम्।<br>ब्रह्मणे तां निवेद्यैव तामप्याह प्रजापतिः॥ १७ | जो रागवती (रागिणी) नामवाली थी उसे भी देवतागण स्वर्गमें ले गये और उन्होंने ब्रह्माको उसे समर्पित कर दिया। उससे भी ब्रह्माने उसी प्रकार कहा। | | सापि क्रुद्धाऽब्रवीन्नूनं तथा तप्स्ये महत्तपः।<br>यथा मन्नामसंयुक्तो महिषघ्नो भविष्यति॥ १८ | उसने भी क्रुद्ध होकर कहा—मैं निश्चय ही ऐसी कठिन तपस्या करूँगी, जिससे मेरे नामसे सम्बद्ध पुत्र महिषको मारनेवाला होगा। | | तामप्यथाशपद् ब्रह्मा सन्ध्या पापे भविष्यसि।<br>या मदवाक्यमलङ्घ्यं वै सुरैर्लङ्घयसे बलात्॥ १९ | ब्रह्माने उसे भी शाप दिया—पापे! देवोंसे भी अनुपेष्य मेरे वचनको अहंकारवश न माननेसे तुम 'सन्ध्या' हो जाओगी। | | सापि जाता मुनिश्रेष्ठ संध्या रागवती ततः।<br>प्रतीच्छत् कृत्तिकायोगं शैलेयी विग्रहं दृढम्॥ २० | मुनिश्रेष्ठ! उसके बाद वह शैलतनया रागवती भी सन्ध्या हो गयी और स्वस्थ शरीर धारण कर कृत्तिकायोगकी प्रतीक्षा करने लगी॥ १७-२०॥ | | ततो गते कन्यके द्वे ज्ञात्वा मेना तपस्विनी।<br>तपसो वारयामास उमेत्येवाब्रवीच्च सा॥ २१ | (इस प्रकार) दो कन्याओंको चली गयी जानकर तपस्विनी मेनाने (तृतीय कन्या कालीको) तपस्या |
| अध्याय ५१ ] | मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन | २२१ | | :--- | :--- | | तदेव माता नामास्याश्चक्रे पितृसुता शुभा।<br>उमेत्येव हि कन्यायाः सा जगाम तपोवनम्॥ २२<br><br>ततः सा मनसा देवं शूलपाणिं वृषध्वजम्।<br>रुद्रं चेतसि संधाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ २३<br><br>ततो ब्रह्माऽब्रवीद् देवान् गच्छध्वं हिमवत्सुताम्।<br>इहानयध्वं तां कालीं तपस्यन्तीं हिमालये॥ २४ | करनेसे रोका। उसने 'उ' 'मा' ऐसा कहा। पितरोंकी पुत्री, कल्याणमयी माता (मेना)-ने कन्याका वही दो अक्षरोंसे संयुक्त 'उमा' यह नाम रखा। उमा भी तपोवनमें चली गयी। उसके बाद उसने मनमें शूलपाणि वृषध्वज रुद्रका ध्यानकर कठिन तपस्या की। फिर ब्रह्माने देवताओंसे कहा—देवताओ! तुमलोग हिमालयपर तप करती हुई हिमालयकी पुत्री कालीके पास जाओ और उसे यहाँ लिवा लाओ॥ २१—२४॥ | | ततो देवाः समाजग्मुर्ददृशुः शैलनन्दिनीम्।<br>तेजसा विजितास्तस्या न शेकुरुपसर्पितुम्॥ २५<br><br>इन्द्रोऽमरगणैः सार्द्धं निर्द्धूतस्तेजसा तया।<br>ब्रह्मणोऽधिकतेजोऽस्य विनिवेद्य प्रतिष्ठितः॥ २६<br><br>ततो ब्रह्माऽब्रवीत् सा हि ध्रुवं शङ्करवल्लभा।<br>यूयं यत्तेजसा नूनं विक्षिप्तास्तु हतप्रभाः॥ २७<br><br>तस्माद् भजध्वं स्वं स्वं हि स्थानं भो विगतज्वराः।<br>सतारकं हि महिषं विद्ध्वं निहतं रणे॥ २८ | उसके बाद देवगण (हिमालयपर) आये और (उन लोगोंने) शैलनन्दिनीको देखा। परंतु उसके तेजसे व्यग्र (व्याकुल) हो जानेके कारण वे उसके निकट न जा सके। देवताओंके साथ इन्द्र भी उसके तेजसे कान्तिहीन-से हो गये। वे ब्रह्मासे उसके तेजका आधिक्य बतलाकर खड़े हो गये। उसके बाद ब्रह्माने कहा—वह निश्चय ही शङ्करकी पत्नी होगी; क्योंकि उसके तेजसे तुम सब आकुल और प्रभाहीन हो गये हो। अतः देवताओ! तुमलोग चिन्ता छोड़कर अपने-अपने स्थानको जाओ। अब समझ लो कि युद्धमें तारकके साथ महिष मारा (ही) गया॥ २५—२८॥ | | इत्येवमुक्ता देवेन ब्रह्मणा सेन्द्रकाः सुराः।<br>जग्मुः स्वान्येव धिष्ण्यानि सद्यो वै विगतज्वराः॥ २९<br><br>उमामपि तपस्यन्तीं हिमवान् पर्वतेश्वरः।<br>निवर्त्य तपसस्तस्मात् सदारो ह्यानयद्गृहान्॥ ३०<br><br>देवोऽप्याश्रित्य तद्रौद्रं व्रतं नाम्ना निराश्रयम्।<br>विचचार महाशैलान् मेरुप्राग्र्यान् महामतिः॥ ३१<br><br>स कदाचिन्महाशैलं हिमवन्तं समागतः।<br>तेनार्चितः श्रद्धयाऽसौ तां रात्रिमवसद्धरः॥ ३२ | इस प्रकार ब्रह्माने जब इन्द्रके साथ सभी देवताओंसे कहा तब देवगण चिन्तारहित होकर उसी समय अपने-अपने स्थानपर चले गये। फिर पत्नीसहित पर्वतराज हिमवान् तपश्चर्यामें लगी हुई उमाको भी उस तपश्चर्यासे हटाकर उसे घर ले आये। महाज्ञानी महादेव भी निराश्रय नामके उस कठिन (रौद्र) व्रतका आश्रय लेकर मेरु आदि बड़े-बड़े पर्वतोंपर भ्रमण करने लगे। वे कभी पर्वतराज हिमाचलपर गये। हिमालयने उनकी श्रद्धासे पूजा की। उस रात उन्होंने वहीं निवास किया॥ २९—३२॥ | | द्वितीयेऽह्नि गिरीशेन महादेवो निमन्त्रितः।<br>इहैव तिष्ठस्व विभो तपःसाधनकारणात्॥ ३३<br><br>इत्येवमुक्तो गिरिणा हरश्चक्रे मतिं च ताम्।<br>तस्थावाश्रममाश्रित्य त्यक्त्वा वासं निराश्रयम्॥ ३४<br><br>वसतोऽप्याश्रमे तस्य देवदेवस्य शूलिनः।<br>तं देशमगमत् काली गिरिराजसुता शुभा॥ ३५<br><br>तामागतां हरो दृष्ट्वा भूयो जातां प्रियां सतीम्।<br>स्वागतेनाभिसम्पूज्य तस्थौ योगरतो हरः॥ ३६ | दूसरे दिन पर्वतराज (हिमालय)-ने महादेवको निमन्त्रित किया (और) कहा—हे विभो! आप तपस्या करनेके लिये यहीं रहें। हिमालयके इस प्रकार कहनेपर शङ्करने भी वही विचार किया और बिना घरका रहना छोड़कर आश्रममें रहने लगे। देवाधिदेव त्रिशूलधारी शङ्करके आश्रममें रहनेपर गिरिराजकी कल्याणी कन्या काली उस स्थानपर आयी। अपनी प्रिया सतीको पुनः हिमतनया उमाके रूपमें उत्पन्न हुई और (अपने) सामने आयी देखकर शङ्करने उनके आनेका अभिनन्दन तो किया, पर वे फिर योगमें लीन हो गये॥ ३३—३६॥ |
| २२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सा चाभ्येत्य वरारोहा कृताञ्जलिपरिग्रहा।<br>ववन्दे चरणौ शैवौ सखीभिः सह भामिनी॥ ३७<br><br>ततस्तु सुचिराच्छर्वः समीक्ष्य गिरिकन्यकाम्।<br>न युक्तं चैवमुक्त्वाऽथ सगणोऽन्तर्दधे ततः॥ ३८<br><br>साऽपि शर्ववचो रौद्रं श्रुत्वा ज्ञानसमन्विता।<br>अन्तर्दुःखेन दह्यन्ती पितरं प्राह पार्वती॥ ३९<br><br>तात यास्ये महारण्ये तप्तुं घोरं महत्तपः।<br>आराधनाय देवस्य शङ्करस्य पिनाकिनः॥ ४० | सुन्दर शरीरवाली हिमसुताने वहाँ जानेके बाद दोनों हाथ जोड़कर सहेलियोंके साथ शिवके दोनों चरणोंमें अभिवादन (प्रणाम) किया। उसके बाद शङ्करने देरतक गिरिकन्याको देखा और कहा—यह उचित नहीं है। ऐसा कहकर शङ्कर अपने गणोंके साथ तिरोहित हो गये (छिप गये)। भय उत्पन्न करनेवाले शङ्करके वचनको सुनकर आन्तरिक दुःखसे जलती हुई ज्ञानिनी उन पार्वती ने भी अपने पितासे कहा—तात! पिनाक धारण करनेवाले शङ्करदेवकी आराधना एवं उत्कट तथा महान् तप करनेके लिये मैं विशाल वनमें जाऊँगी॥ ३७–४०॥ |
| तथेत्युक्तं वचः पित्रा पादे तस्यैव विस्तृते।<br>ललिताख्या तपस्तेपे हराराधनकाम्यया॥ ४१<br><br>तस्याः सख्यस्तदा देव्याः परिचर्यां तु कुर्वते।<br>समित्कुशफलं चापि मूलाहरणमादितः॥ ४२<br><br>विनोदनार्थं पार्वत्या मृण्मयः शूलधृग् हरः।<br>कृतस्तु तेजसा युक्तो भद्रमस्त्विति साऽब्रवीत्॥ ४३<br><br>पूजां करोति तस्यैव तं पश्यति मुहुर्मुहुः।<br>ततोऽस्यास्तुष्टिमगच्छच्छ्रद्धया त्रिपुरान्तकृत्॥ ४४ | पिताने कहा—ठीक है। उसके बाद शङ्करकी आराधनाकी इच्छासे ललिता (पार्वती) उसी (हिमालय) पर्वतकी विस्तृत तलहटीमें तप करने लगीं। उस समय उनकी सहचरियाँ समिधा, कुश, फल-मूल आदि लाकर देवीकी सेवा करने लगीं। (उन सहचरियोंने) पार्वतीके विनोदके लिये तेजस्वी त्रिशूलधारी शङ्करकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी। पार्वती ने भी कहा—सखियो! ठीक है। (फिर तो) वे (पार्वतीजी) उसी मूर्तिकी पूजा करतीं और बार-बार उसे निहारती रहती थीं। उसके बाद उनकी श्रद्धासे त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्कर प्रसन्न हो गये॥ ४१–४४॥ |
| वटुरूपं समाधाय आषाढी मुञ्जमेखली।<br>यज्ञोपवीती छत्री च मृगाजिनधरस्तथा॥ ४५<br><br>कमण्डलुव्यग्रकरो भस्मारुणितविग्रहः।<br>प्रत्याश्रमं पर्यटन् स तं काल्याश्रममागतः॥ ४६<br><br>तमुत्थाय तदा काली सखीभिः सह नारद।<br>पूजयित्वा यथान्यायं पर्यपृच्छदिदं ततः॥ ४७ | उसके बाद पलाशका दण्ड, मुञ्जकी मेखला, यज्ञोपवीत, छत्र एवं मृगचर्म, हाथमें कमण्डलु लिये एवं शरीरमें भस्म रमाये हुए वे (शङ्कर) वटुके रूपमें एक-एक आश्रममें घूमते हुए कालीके आश्रममें पहुँचे। नारद! उसके बाद सहचरियोंके साथ कालीने (उनका) प्रत्युत्थान किया और यथोचित पूजन कर उनसे यह पूछा—॥ ४५–४७॥ |
| उमोवाच<br>कस्मादागम्यते भिक्षो कुत्र स्थाने तवाश्रमः।<br>क्व च त्वं प्रतिगन्तासि मम शीघ्रं निवेदय॥ ४८ | **उमाने कहा (पूछा)—**अये भिक्षुक! आप शीघ्र मुझे बतायें कि आप कहाँसे आ रहे हैं? आपका आश्रम कहाँ है एवं आप कहाँ जायँगे?॥ ४८॥ |
| भिक्षुरुवाच<br>ममाश्रमपदं बाले वाराणस्यां शुचिव्रते।<br>अथातस्तीर्थयात्रायां गमिष्यामि पृथूदकम्॥ ४९ | **भिक्षुने कहा—**पवित्र व्रतोंवाली बाले! मेरा आश्रम वाराणसीमें है। अब मैं यहाँसे तीर्थयात्रामें पृथूदक जाऊँगा॥ ४९॥ |
| देव्युवाच<br>किं पुण्यं तत्र विप्रेन्द्र लब्धाऽसि त्वं पृथूदके।<br>पथि स्नानेन च फलं केषु किं लब्धवानसि॥ ५० | **देवीने कहा—**विप्रेन्द्र! पृथूदकतीर्थमें आपको कौन-सा पुण्य प्राप्त होगा? मार्गमें किन-किन तीर्थोंमें स्नान करनेसे आप कौन-कौन-सा फल प्राप्त कर चुके हैं?॥ ५०॥ |
| अध्याय ५१ ] | मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन | २२३ |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| भिक्षुरुवाच<br>मया स्नानं प्रयागे तु कृतं प्रथममेव हि।<br>ततोऽथ तीर्थे कुब्जाम्रे जयन्ते चण्डिकेश्वरे॥ ५१<br>बन्धुवृन्दे च कर्कन्थे तीर्थे कनखले तथा।<br>सरस्वत्यामग्निकुण्डे भद्रायां तु त्रिविष्टपे॥ ५२<br>कोनटे कोटितीर्थे च कुब्जके च कृशोदरि।<br>निष्कामेन कृतं स्नानं ततोऽभ्यागां तवाश्रमम्॥ ५३<br>इहस्थां त्वां समाभाष्य गमिष्यामि पृथूदकम्।<br>पृच्छामि यदहं त्वां वै तत्र न क्रोधुमर्हसि॥ ५४<br>अहं यत्तपसात्मानं शोषयामि कृशोदरि।<br>बाल्येऽपि संयततनुस्तत्तु श्लाघ्यं द्विजन्मनाम्॥ ५५<br>किमर्थं भवती रौद्रं प्रथमे वयसि स्थिता।<br>तपः समाश्रिता भीरु संशयः प्रतिभाति मे॥ ५६<br>प्रथमे वयसि स्त्रीणां सह भर्त्रा विलासिनि।<br>सुभोगा भोगिताः काले व्रजन्ति स्थिरयौवने॥ ५७<br>तपसा वाञ्छयन्तीह गिरिजे सचराचराः।<br>रूपाभिजनमैश्वर्यं तच्च ते विद्यते बहु॥ ५८<br>तत् किमर्थमपास्यैतानलंकाराञ्जटा धृताः।<br>चीनांशुकं परित्यज्य किं त्वं वल्कलधारिणी॥ ५९ | भिक्षुने कहा— कृशोदरि! मैंने पहले प्रयागमें स्नान किया, उसके बाद कुब्जाम्र, जयन्त, चण्डिकेश्वर, बन्धुवृन्द, कर्कन्थ, कनखलतीर्थ, सरस्वती, अग्निकुण्ड, भद्रा, त्रिविष्टप, कोनट, कोटितीर्थ और कुब्जकमें निष्कामभावसे स्नान कर मैं तुम्हारे आश्रममें आया हूँ। यहाँपर स्थित रहनेवाली तुमसे वार्ता करनेके बाद मैं पृथूदकतीर्थमें जाऊँगा। मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ, उसपर क्रोध न करना॥ ५१—५४॥<br><br>कृशोदरि! मैं बचपनमें भी शरीरको संयत कर तपस्यासे जो अपनेको सुखा रहा हूँ, वह तो ब्राह्मणोंके लिये प्रशंसनीय है। परंतु भीरु! तुम इस प्रथम अवस्थामें ही क्यों उग्र तप कर रही हो? (इसमें मुझे) शंका हो रही है। अयि स्थिरयौवने! अयि विलासिनि! प्रथम अवस्थामें स्त्रियाँ पतिके साथ सुन्दर भोगोंका भोग करती हैं। पर्वतपुत्रि! चर और अचर सभी प्राणी तपस्यासे संसारमें रूप, उत्तम कुल और सम्पत्ति चाहते हैं, सो तो तुम्हें अधिक-से-अधिक मात्रामें उपलब्ध हैं ही; फिर सौन्दर्य-साधनोंको छोड़कर तुमने जटा क्यों धारण कर ली है? तुमने रेशमी वस्त्र छोड़कर वल्कल क्यों पहन लिया है?॥ ५५—५९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>ततस्तु तपसा वृद्धा देव्याः सोमप्रभा सखी।<br>भिक्षवे कथयामास यथावत् सा हि नारद॥ ६० | पुलस्त्यजी बोले— नारद! उसके बाद तपस्यामें बढ़ी हुई पार्वतीकी सोमप्रभा नामकी सहचरीने उन भिक्षुसे वस्तुस्थिति कही॥ ६०॥ |
| सोमप्रभोवाच<br>तपश्चर्या द्विजश्रेष्ठ पार्वत्या येन हेतुना।<br>तं शृणुष्व त्वियं काली हरं भर्तारमिच्छति॥ ६१ | सोमप्रभाने कहा— द्विजश्रेष्ठ! पार्वती जिस हेतुसे तपस्या कर रही हैं, उसे सुनिये। ये काली (तपस्याके बलसे) शिवको अपना पति बनाना चाहती हैं॥ ६१॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>सोमप्रभाया वचनं श्रुत्वा संकम्प्य वै शिरः।<br>विहस्य च महाहासं भिक्षुराह वचस्त्विदम्॥ ६२ | पुलस्त्यजी बोले— सोमप्रभाकी बात सुनकर भिक्षुने सिर हिलाते हुए बड़े जोरसे हँसकर यह वचन कहा—॥ ६२॥ |
| भिक्षुरुवाच<br>वदामि ते पार्वति वाक्यमेवं<br>केन प्रदत्ता तव बुद्धिरेशा।<br>कथं करः पल्लवकोमलस्ते<br>समेष्यते शार्वकरं ससर्पम्॥ ६३<br>तथा दुकूलाम्बरशालिनी त्वं<br>मृगारिचर्माभिभृतस्तु रुद्रः।<br>त्वं चन्दनाक्ता स च भस्मभूषितो<br>न युक्तरूपं प्रतिभाति मे त्विदम्॥ ६४ | भिक्षुकने कहा— पार्वती! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ; तुमको यह बुद्धि किसने दी? पल्लवके सदृश तुम्हारा कोमल कर शङ्करके सर्पयुक्त हाथसे कैसे मिलेगा? कहाँ तुम सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाली और कहाँ व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले ये रुद्र! कहाँ तुम चन्दनसे चर्चित और कहाँ भस्मसे भूषित शङ्कर! अतः मुझे यह मेल अनुरूप नहीं प्रतीत होता॥ ६३-६४॥ |
| २२४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>एवं वादिनि विप्रेन्द्र पार्वती भिक्षुमब्रवीत्।<br>मा मैवं वद भिक्षो त्वं हरः सर्वगुणाधिकः॥ ६५<br><br>शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनोऽपि वा।<br>अलङ्कृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलङ्कृतः॥ ६६<br><br>यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति।<br>निवार्यतामयं भिक्षुर्विवक्षुः स्फुरिताधरः।<br>न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वञ्शशिप्रभे॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— विप्रेन्द्र! भिक्षुकके इस प्रकार कहनेपर पार्वती ने उससे कहा—भिक्षुक! तुम ऐसी बात मत बोलो। शङ्कर सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। वे देवेश चाहे मङ्गलमूर्ति हों या भयङ्कर रूप, धनी हों या निर्धन तथा अलङ्कार-सम्पन्न हों अथवा अलङ्कार-विहीन—वे जैसे-तैसे ही क्यों न हों—पर वे ही मेरे स्वामी होंगे। (सहचरीको निर्देश कर) शशिप्रभे! इसे (भिक्षुकको) मना करो। यह पुनः कुछ कहना चाहता है; क्योंकि इसके ओठ फड़क रहे हैं। देखो, निन्दा करनेवाला व्यक्ति वैसा पापी नहीं होता जैसा कि निन्दाकी बात सुननेवाला होता है॥ ६५—६७॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत।<br>ततोऽत्यजद् भिक्षुरूपं स्वरूपस्थोऽभवच्छिवः॥ ६८<br><br>भूत्वोवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः।<br>तवार्थाय प्रहेष्यामि महर्षीन् हिमवद्गृहे॥ ६९<br><br>यच्चेह रुद्रमीहन्त्या मृण्मयश्चेश्वरः कृतः।<br>असौ भद्रेश्वरैत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति॥ ७०<br><br>देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः।<br>पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुभेप्सवः॥ ७१ | पुलस्त्यजी (पुनः) बोले— इस प्रकार कहकर वरदायिनी पार्वती ने (ज्यों ही) वहाँ से उठकर जाना चाहा त्यों ही शङ्कर (बनावटी) भिक्षुरूपको छोड़कर अपने वास्तविक रूपमें हो गये। वे अपने वास्तविक रूपमें आनेपर बोले—प्रिये! अपने गृह जाओ। मैं हिमवान् के घर तुम्हारे लिये महर्षियोंको भेजूँगा। रुद्रकी कामना करनेवाली तुमने यहाँ जिन पार्थिव रूपको ईश्वर माना है, वे संसारमें भद्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होंगे। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, उरग एवं मनुष्य जो भी कल्याणकी कामना करनेवाले होंगे, वे सदा उनकी पूजा करेंगे॥ ६८—७१॥ | | इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने।<br>जगामाम्बरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः॥ ७२<br>शङ्करोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकाम्।<br>पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः॥ ७३<br>ततस्तु देवप्रवरो महेश्वरः<br>पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः।<br>कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो<br>महागिरिं मन्दरमाजगाम्॥ ७४<br>आयाति त्रिपुरान्तके सह गणैर्ब्रह्मर्षिभिः सप्तभि-<br>रारोहत्पुलको बभौ गिरिवरः संहृष्टचित्तः क्षणात्।<br>चक्रे दिव्यफलैर्जलैन शुचिना मूलैश्च कन्दादिभिः<br>पूजां सर्वगणेश्वरैः सह विभोरद्रिस्त्रिनेत्रस्य तु॥ ७५ | मुने! शङ्करके इस प्रकार कहनेपर हिमालय-पुत्री पार्वतीजी आकाशमार्गसे अपने पिताके घर चली गयीं। महातेजस्वी शङ्कर भी पर्वतराजकी कन्याको विदाकर पृथूदक नामके तीर्थमें चले गये और वहाँ जाकर उन्होंने यथाविधि स्नान किया। उसके बाद देवोंमें प्रधान महेश्वर पृथूदकतीर्थमें स्नान करके पापसे विमुक्त होकर नन्दी, गणों एवं वाहनके सहित महान् मन्दर गिरिपर आ गये। सात ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों) तथा अपने गणोंके साथ त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्करके आ जानेपर पर्वतश्रेष्ठ मन्दर क्षणभरमें ही प्रसन्नचित्त हो गया। पर्वतराजने दिव्य फलों, मूलों, कन्दों एवं पवित्र जलसे समस्त गणेश्वरोंके साथ भगवान् शङ्करकी पूजा की॥ ७२–७५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥
५४- भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण, शिवका यज्ञकर्म करना, पार्वतीकी तपस्यासे ब्रह्माका वर देना, कौशिकीकी स्थापना, शिवके प्राङ्गणमें अग्नि-प्रवेश, देवोंकी प्रार्थना आदि और गजाननकी उत्पत्ति
अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना [ २२५
बावनवाँ अध्याय
शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना, महर्षियोंका हिमवान्से शिवके लिये उमाकी याचना, हिमालयकी स्वीकृति और सप्तर्षियोंद्वारा शिवको स्वीकृति-सूचना
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः सम्पूजितो रुद्रः शैलेन प्रीतिमानभूत्।<br>सस्मार च महर्षींस्तु अरुन्धत्या समं ततः॥ १<br>ते संस्मृतास्तु ऋषयः शङ्करेण महात्मना।<br>समाजग्मुर्महाशैलं मन्दरं चारुकन्दरम्॥ २<br>तानागतान् समीक्ष्यैव देवस्त्रिपुरनाशनः।<br>अभ्युत्थायाभिपूज्यैतानिदं वचनमब्रवीत्॥ ३<br>धन्योऽयं पर्वतश्रेष्ठः श्लाघ्यः पूज्यश्च दैवतैः।<br>धूतपापस्तथा जातो भवतां पादपङ्कजैः॥ ४<br>स्थीयतां विस्तृते रम्ये गिरिप्रस्थे समे शुभे।<br>शिलासु पद्मवर्णासु श्लक्ष्णासु च मृदुष्वपि॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद पर्वतद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित होकर भगवान् रुद्र बहुत प्रसन्न हुए। उसके बाद शङ्करने अरुन्धतीसहित सप्त महर्षियोंका स्मरण किया। महात्मा शङ्करके द्वारा स्मृत किये गये वे ऋषिगण सुन्दर कन्दराओंवाले महान् शैल मन्दरपर आ गये। उन (ऋषियों)-को आये हुए देखकर त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले महादेवने अभ्युत्थानकर उनका पूजन किया; फिर यह वचन कहा—प्रभो! यह पर्वतश्रेष्ठ देवताओंद्वारा प्रशंसनीय एवं पूजनीय होनेसे धन्य है, (और आज यह) आपके चरण-कमलोंकी अनुकम्पासे निष्पाप हो गया। अब आप-लोग इस विस्तृत, सम, रम्य तथा शुभ पर्वतशिखरपर बैठें। इसकी शिला कमल-वर्णकी तथा चिकनी एवं कोमल है॥ १–५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ता देवेन शङ्करेण महर्षयः।<br>सममेव त्वरुन्धत्या विविशुः शैलसानुनि॥ ६<br>उपविष्टेषु ऋषिषु नन्दी देवगणाग्रणीः।<br>अर्घ्यादिना समभ्यर्च्य स्थितः प्रयतमानसः॥ ७<br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्धर्म्यं वाक्यं हितं सुरान्।<br>आत्मनो यशसो वृद्ध्यै सप्तर्षीन् विनयान्वितान्॥ ८ | पुलस्त्यजी (फिर) बोले— भगवान् शङ्करके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महर्षिगण अरुन्धतीके साथ शैलशिखरपर बैठ गये। ऋषियोंके बैठ जानेपर देवताओंमें अग्रणी तथा संयत-चित्तवाले नन्दी अर्घ्य आदिसे उनकी पूजा कर खड़े हो गये। उसके बाद सुरपालक शिवने विनयसे युक्त सप्तर्षियोंसे अपने यशकी वृद्धि तथा देवताओंके कल्याणके लिये धर्मसे युक्त वचन कहा—॥ ६–८॥ | | हर उवाच<br>कश्यपात्रे वारुणेय गाधेय शृणु गौतम।<br>भरद्वाज शृणुष्व त्वमङ्गिरस्त्वं शृणुष्व च॥ ९<br>ममासीद् दक्षतनुजा प्रिया सा दक्षकोपततः।<br>उत्ससर्ज सती प्राणान् योगदृष्ट्या पुरा किल॥ १०<br>साऽद्य भूयः समुद्भूता शैलराजसुता उमा।<br>सा मदर्थाय शैलेन्द्रो याच्यतां द्विजसत्तमाः॥ ११ | शङ्करजीने कहा— कश्यप! अत्रि! वसिष्ठ! विश्वामित्र! गौतम! भरद्वाज! अङ्गिरा! आप सभी लोग सुनें—प्राचीन कालमें दक्षकी आत्मजा सती मेरी प्रिया थीं। उसने दक्षके ऊपर कुपित होकर योगदृष्टिसे अपने प्राणोंका त्याग कर दिया। वही आज फिर उमा नामसे गिरिराज हिमालयकी कन्या हुई है। द्विजसत्तमो! आपलोग मेरे लिये पर्वतराजसे उसकी याचना करें॥ ९–११॥ |