वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३१५ | | :--- | :--- |
| पातालादपि दैत्येशं वीरं कन्दरमालिनम्।<br>स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय॥ १३२<br>इत्येवमुक्ते मुनिना प्राह वेदवती कपिम्।<br>गालवं वानरश्रेष्ठ इहानेतुं त्वमर्हसि॥ १३३ | लिये अञ्जन नामक पर्वतपर चले जाओ। फिर पातालसे वीर दैत्येश्वर कन्दारमालीको और स्वर्गसे गन्धर्वराज पर्जन्यको यहाँ शीघ्र बुला लाओ। मुनिके इस प्रकार कहनेपर वेदवतीने बन्दरसे कहा—कपिश्रेष्ठ! गालवको भी आप यहाँ बुला लावें॥ १३०-१३३॥ | | इत्येवमुक्ते वचने कपिर्मारुतविक्रमः।<br>गत्वाऽञ्जनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम्॥ १३४<br>पर्जन्यं तत्र चामन्त्र्य प्रेषयित्वा महाश्रमे।<br>सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः॥ १३५<br>तत्रामन्त्र्य महावीर्यं कपिः कन्दरमालिनम्।<br>पातालादभिनिष्क्रम्य महीं पर्यचरज्जवी॥ १३६<br>गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु।<br>समुत्पत्यानयच्छीघ्रं सप्तगोदावरं जलम्॥ १३७<br>तत्र स्नात्वा विधानेन सम्प्राप्तो हाटकेश्वरम्।<br>ददृशे नन्दयन्तीं च स्थितां वेदवतीमपि॥ १३८ | ऐसा कहनेपर वायुके समान पराक्रमवाला कपि अञ्जनपर्वतपर पहुँच गया और (गुह्यकको) आमन्त्रित कर पुनः सुमेरुपर्वतपर प्रविष्ट हो गया। वहाँ उसने पर्जन्यको आमन्त्रित किया और सप्तगोदावरतीर्थमें स्थित महाश्रममें उन्हें भेजनेके बाद वह फिर पाताललोकमें प्रविष्ट हो गया। वहाँ (जाकर उसने) महापराक्रमी कन्दारमालीको आमन्त्रित किया। वेगशाली बन्दर फिर पातालसे निकलकर पृथ्वीपर घूमने-फिरने लगा। तपोनिधि गालवको माहिष्मतीके निकट देखकर उसने छलाँग भरी और उन्हें शीघ्र सप्तगोदावरके जलके निकट ला दिया। वहाँ विधानसे स्नान करनेके बाद वह हाटकेश्वरके समीप पहुँचा और उसने वहाँ बैठी हुई नन्दयन्ती तथा वेदवतीको भी देखा॥ १३४-१३८॥ | | तं दृष्ट्वा गालवं चैव समुत्थायाभ्यवादयत्।<br>स चार्चयिष्यन्महादेवं महर्षीनभ्यवादयत्।<br>ते चापि नृपतिश्रेष्ठास्तं सम्पूज्य तपोधनम्॥ १३९<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा उपविष्टा यथासुखम्।<br>तेषूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिताः॥ १४०<br>समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः।<br>तानागतान् समीक्ष्यैव पुत्र्यस्ताः पृथुलोचनाः॥ १४१<br>स्नेहार्द्रनयनाः सर्वास्तदा सस्वजिरे पितॄन्।<br>नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना॥ १४२<br>सवाष्पनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा।<br>अथ तामाह स मुनिः सत्यं सत्यध्वजो वचः॥ १४३ | उन सभीने गालवको देखकर उठकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने भी महादेवकी पूजा कर महर्षियोंको प्रणाम किया। उन श्रेष्ठ राजाओंने भी उन तपस्वीकी पूजा की तथा वे अत्यन्त हर्षित होकर सुखपूर्वक बैठ गये। उनके बैठ जानेपर कपिद्वारा आमन्त्रित किये गये यक्ष, महानुभाव गन्धर्व एवं दानव वहाँ आ गये। उन्हें आया हुआ देखते ही उन विशालनयना पुत्रियोंके नेत्रोंमें स्नेहसे आँसू भर आये। वे सभी अपने-अपने पिताके गले लग गयीं। नन्दयन्ती आदिको पिताके साथ उपस्थित हुई देखकर विश्वकर्माकी सुन्दरी पुत्रीके नेत्रोंमें (पिताकी स्मृतिमें) आँसू छलक आये। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने उससे सच्ची बात कह दी—॥ १३९-१४३॥ | | मा विषादं कृथाः पुत्रि पिताऽयं तव वानरः।<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य व्रीडोपहतचेतना॥ १४४<br>कथं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्वं गतोऽधुना।<br>दुष्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्ष्ये कलेवरम्॥ १४५<br>इति संचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह। | पुत्रि! तुम उदास मत होओ। यह बन्दर ही तुम्हारा पिता है। उस वचनको सुनकर वह लजा गयी; क्योंकि मुझ कुपुत्रीके जन्म लेनेके कारण ये विश्वकर्मा इस समय बन्दर हो गये हैं; अतः (उसने सोचा—) मैं अपने शरीरका त्याग करूँगी। मनमें इस प्रकार |
| ३१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
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| परित्रायस्व मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥ १४६<br><br>पितृघ्नी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br><br>अथोवाच मुनिस्तन्वीं मा विषादं कृथाधुना ॥ १४७ | विचारकर उसने ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! मैं पापसे नष्टमतिवाली हूँ। आप मेरी रक्षा करें। पिताका घात करनेवाली मैं मरना चाहती हूँ। अतः आप स्वीकृति दें। तब मुनिने उस तन्वङ्गीसे कहा—अब विषाद मत करो ॥ १४४—१४७॥ | | भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्याक्षीः कलेवरम्।<br>भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्द्धकिः ॥ १४८<br>जातेऽपत्ये घृताच्यां तु नात्र कार्या विचारणा।<br>इत्येवमुक्ते वचने मुनिना भावितात्मना ॥ १४९<br>घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदां वचः ।<br>पुत्रि त्यजस्व शोकं त्वं मासैर्दशभिरात्मजः ॥ १५०<br>भविष्यति पितुस्तुभ्यं मत्सकाशान्न संशयः ।<br>इत्येवमुक्ता संहृष्टा बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥ १५१ | भवितव्यताका विनाश नहीं होता—होनी होकर रहती है। इसलिये देहका परित्याग मत करो। घृताचीकी कोखसे पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर तुम्हारे पिता फिर देवताओंके शिल्पी हो जायेंगे—इसमें संदेह नहीं है। मनके ऊपर नियन्त्रण रखनेवाले मुनिके इस प्रकार कहनेपर घृताचीने चित्राङ्गदाके पास जाकर उससे कहा—पुत्रि! तुम चिन्ता करना छोड़ दो। तुम्हारे पिताद्वारा मुझसे दस महीनोंमें निःसंदेह एक पुत्र उत्पन्न होगा। (फिर सुतरां शाप-विमोचन हो जायगा।) ऐसा कहनेपर चित्राङ्गदा हर्षित हो गयी ॥ १४८—१५१ ॥ | | प्रतीक्षन्ती सुचार्वङ्गी विवाहे पितृदर्शनम् ।<br>सर्वास्ता अपि तावन्तं कालं सुतनुकन्यकाः ॥ १५२<br>प्रत्यैक्षन्त विवाहं हि तस्या एव प्रियेप्सया ।<br>ततो दशसु मासेषु समतीतेष्वथाप्सराः ॥ १५३<br>तस्मिन् गोदावरीतीर्थे प्रसूता तनयं नलम् ।<br>जातेऽपत्ये कपित्वाच्च विश्वकर्माप्यमुच्यत ॥ १५४ | सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाहमें मिलनेवाले पिताके दर्शनकी (उत्सुकतासे) प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी सभी कन्याएँ भी प्रियकी प्राप्तिकी वाञ्छासे उसके विवाहके समयकी प्रतीक्षा करने लगीं। दस महीने बीत जानेपर अप्सराने उस गोदावरीतीर्थमें पुत्रको उत्पन्न किया, जो (आगे चलकर) नल (नामक) हुआ। पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर विश्वकर्मा भी वानरत्वसे छूट गये ॥ १५२—१५४ ॥ | | समभ्येत्य प्रियां पुत्रीं पर्यष्वजत चादरात् ।<br>ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्धकिः ॥ १५५<br>सुराणामधिपं शक्रं सहैव सुरकिन्नरैः ।<br>त्वष्टाऽथ संस्मृतः शक्रो मरुद्गणवृतस्तदा ॥ १५६<br>सुरैः सरुद्रैः सम्प्राप्तस्तत्तीर्थं हाटकाह्वयम् ।<br>समायातेषु देवेषु गन्धर्वेष्वप्सरस्सु च ॥ १५७<br>इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रेष्ठमृतध्वजमुवाच ह।<br>जाबालेर्दीयतां ब्रह्मन् सुता कन्दरमालिनः ॥ १५८<br>गृह्णातु विधिवत् पाणिं दैतेय्यास्तनयस्तव ।<br>नन्दयन्तीं च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥ १५९ | अपनी प्रिय पुत्रीके पास जाकर उन्होंने उसको स्नेहपूर्वक गले लगाया। उसके बाद प्रसन्न मनसे देवशिल्पीने देवताओं एवं किन्नरोंसहित देवराज इन्द्रका स्मरण किया। देवशिल्पीके स्मरण करनेपर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एवं रुद्रोंके साथ हाटक नामके तीर्थमें आ गये। देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओंके आनेपर इन्द्रद्युम्नने मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! जाबालिको कन्दरमालीकी कन्याका दान कर दें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनीका पाणिग्रहण कर ले। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्तीसे विवाह करें ॥ १५५—१५९ ॥ | | ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्रेयी सुरथस्य च।<br>बाढमित्यब्रवीद्धृष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ॥ १६० | यह वेदवती मेरी (इन्द्रद्युम्नकी) और त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथकी पत्नी हो। मुनिने मनुपुत्र राजासे कहा—ठीक है। |
६८- भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश
| अध्याय ६६ ] | दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ | ३१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम्।<br>ऋत्विजोऽभूद् गालवस्तु हुत्वा हव्यं विधानतः ॥ १६१<br>गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।<br>आदौ जाबालिनः पाणिर्गृहीतो दैत्यकन्यया ॥ १६२<br>इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः।<br>ततः शकुनिना पाणिर्गृहीतो यक्षकन्यया ॥ १६३<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत्।<br>एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥ १६४ | उसके बाद उन लोगोंने प्रसन्नतापूर्वक भलीभाँति विवाहकी विधिको पूरा किया। विधिसे हव्यका हवन करनेवाले गालव ऋत्विक् बने। उस समय वहाँ गन्धर्वोंने गाना गाया और अप्सराओंने नृत्य किया। सबसे पहले दैत्य-कन्याने जाबालिका पाणिग्रहण किया। कल्याणि! उसके बाद विधिपूर्वक इन्द्रद्युम्नने वेदवतीका, शकुनिने यक्ष-कन्याका तथा सुरथने चित्राङ्गदाका पाणिग्रहण किया। (कृशोदरि!) इस प्रकार विवाहकार्य क्रमशः सम्पन्न हुआ॥ १६०-१६४॥ |
| वृत्ते मुनिर्विवाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान्।<br>अस्मिंस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥ १६५<br>स्थेयं विशेषतो मासमिमं माधवमुत्तमम्।<br>बाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा दिवं क्रमात् ॥ १६६<br>मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात्।<br>भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥ १६७<br>प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान्।<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल।<br>तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥ १६८<br>इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-<br>स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम्।<br>स्तुवन्मृगाक्षीं मृदुना क्रमेण<br>सा चापि वाक्यं नृपतिं बभाषे ॥ १६९ | विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर मुनि (ऋतध्वज)-ने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—इस सप्तगोदावर तीर्थमें आपलोग सदा निवास करें। विशेषरूपसे इस उत्तम वैशाखके महीनेमें आपलोग यहाँ अवश्य रहें। देवतालोग 'ऐसा ही हो'—(ऐसा) कहकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग चले गये। मुनिलोग पुत्रसहित मुनि (ऋतध्वज)-को सादर साथ लेकर चले गये। राजालोग भी अपनी-अपनी पत्नीके साथ अपने-अपने नगरमें आ गये। सभी लोग प्रिय विषयोंका उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक रहने लगे। कल्याणि! चित्राङ्गदाका पूर्व वृत्तान्त इस प्रकारका है। इसलिये सरोजनयने! ललनोत्तमे! तुम मुझे अङ्गीकार करो। ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) ब्राह्मणकी उस सुन्दरी मृगनयनी पुत्रीकी कोमल वाणीसे स्तुति करने लगे। उसने भी राजासे (आगेवाला वचन) कहा — ॥ १६५-१६९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरजा उवाच<br>नात्मानं तव दास्यामि बहुनोक्तेन किं तव।<br>रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ॥ १ | अरजाने कहा— पृथिवीपते! आपके अधिक कहनेसे क्या लाभ? (थोड़ेमें समझ लीजिये कि पिताके) शापसे आपकी और अपनी रक्षा करती हुई (ही) मैं अपनेको आपके लिये समर्पित नहीं करूँगी ॥ १॥ |
| ३१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ | | :--- | :--- |
| प्रह्लाद उवाच | |
|---|---|
| इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुतां बलात्।<br>कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः॥ २<br>तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः।<br>निष्क्रामाश्रमात् तस्माद् गतश्च नगरं निजम्॥ ३<br>साऽपि शुक्रसुता तन्वी अरजा रजसाप्लुता।<br>आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी॥ ४<br>चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः।<br>महाग्रहोपसृप्तेव रोहिणी शशिनः प्रिया॥ ५ | प्रह्लादने कहा—कामसे अंधे हुए उस मूर्खने इस प्रकार विवाद (निषेध) करती हुई श्रेष्ठ भार्गव कुलमें प्रसूत उस कन्याको हठात् अपावन (ध्वस्तशील) कर दिया। मदसे अंधा बना हुआ वह चरित्रसे च्युत हो करके उस आश्रमसे बाहर निकलकर अपने नगर चला गया। उसके बाद रजसे लपटायी वह कृशाङ्गी शुक्रपुत्री अरजा भी आश्रमसे बाहर निकलकर नीचे मुख लटकाये बैठ गयी। राहुसे पीड़ित चन्द्र-प्रिया रोहिणीके समान वह अपने पिताका चिन्तन करती हुई बारम्बार (बिलख-बिलखकर) रोने लगी॥ २—५॥ |
| ततो बहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि।<br>पातालादागमच्छुक्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः॥ ६<br>आश्रमान्ते च ददृशे सुतां दैत्य रजस्वलाम्।<br>मेघलेखामिवाकाशे संध्यारागेण रञ्जिताम्॥ ७<br>तां दृष्ट्वा परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि धर्षिता।<br>कः क्रीडति सरोषेण सममाशीविषेण हि॥ ८<br>कोऽद्यैव याम्यां नगरीं गमिष्यति सुदुर्मतिः।<br>कस्त्वां शुद्धसमाचारां विध्वंसयति पापकृत्॥ ९<br>ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः।<br>रुदन्ती व्रीडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह॥ १० | उसके बाद जब बहुत तिथियोंवाला समय बीत गया और यज्ञ समाप्त हो गया तब शुक्रममुनि पातालसे अपने आश्रममें आये। दैत्य! उन्होंने आश्रमसे बाहर आकाशमें सन्ध्याके समय लालिमासे रञ्जित मेघमालाकी तरह धूलसे लिपटी हुई अपनी पुत्रीको देखा। उसे देखकर उन्होंने पूछा—पुत्रि! किसने तुम्हारा धर्षण (अपमान) किया है? क्रोधभरे साँपसे कौन खेल कर रहा है? पवित्र आचरणवाली तुम्हें शीलसे च्युत कर कौन दुर्बुद्धि पापी आज ही यमपुरी जानेवाला है? उसके बाद अपने पिताको देखकर बारम्बार काँपती, रोती एवं लजाती हुई अरजाने धीरे-धीरे कहा—॥ ६—१०॥ |
| तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत्।<br>बलादनाथा रुदती नीताऽहं वचनीयताम्॥ ११<br>एतत् पुत्र्या वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ १२<br>यस्मात् तेनावनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम्।<br>गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजा कृता॥ १३<br>तस्मात् सराष्ट्रः सबलः सभृत्यो वाहनैः सह।<br>सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्राववृष्ट्या भविष्यति॥ १४ | बार-बार बरजनेपर भी आपके शिष्य दण्डने रोती हुई मुझ अनाथाको बलपूर्वक निन्दनीया बना दिया है—हमारा शीलभ्रंश कर दिया है। कन्याकी इस बातको सुनकर शुक्राचार्यकी आँखें क्रोधसे अत्यन्त लाल हो गयीं। उन्होंने आचमन करके शुद्ध होकर यह (शाप) वचन कहा—यतः उस उद्दण्डने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरवको तिरस्कृतकर अरजाको धर्मसे च्युत किया है, अतः वह सात रात्रियों (दिनों)-में उपलवृष्टिके कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनोंसहित विनष्ट हो जायगा—हो जाय॥ ११—१४॥ |
| इत्येवमुक्त्वा मुनिपुङ्गवोऽसौ<br>शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच।<br>त्वं पापमोक्षार्थमिहैव पुत्रि<br>तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती॥ १५ | उन मुनिश्रेष्ठने ऐसा कहकर दण्डको शाप देनेके बाद अपनी पुत्रीसे कहा—पुत्रि! कल्याणि! पापसे छुटकारा पानेके लिये तुम तपस्या करती हुई यहीं रहो। |
अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शप्त्त्वेथं भगवाञ् छुक्रो दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम्।<br>जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम्॥ १६<br><br>दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रबलवाहनः।<br>महता ग्राववर्षेण सप्तरात्रान्तरे तदा॥ १७<br><br>एवं दण्डकारण्यं परित्यजन्ति देवताः।<br>आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शम्भुना॥ १८ | भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्डको इस प्रकार शाप देकर शिष्यके साथ दानवोंके निवास-स्थान पाताललोकमें चले गये। उसके बाद दण्ड भी बहुत बड़ी उपलवृष्टिके कारण सात रात्रियोंके भीतर ही अपने राष्ट्र, सेना और वाहनोंके साथ नष्ट हो गया। यही कारण है कि देवताओंने दण्डकारण्यको छोड़ दिया और शम्भुने उसे राक्षसोंका स्थान बना दिया॥ १५-१८॥ |
| एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि।<br>भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च पराभवम्॥ १९<br><br>तस्मादन्धक दुर्बुद्धिर्न कार्या भवता त्वियम्।<br>प्राकृताऽपि दहेन्नारी किमुताहोद्रिनन्दिनी॥ २०<br><br>शङ्करोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः।<br>द्रष्टुमप्यमितौजस्कः किमु योधयितुं रणे॥ २१ | इस प्रकार (जैसा कि ऊपर वर्णित है) परनारियाँ (अपनेको अपवित्र करनेवाले) पुण्यात्माओंको भी जलाकर राख (नष्ट) कर देती हैं, फिर साधारण मनुष्य तो बहुत बड़ा तिरस्कार प्राप्त करते हैं। अतः अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिये। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वतीका क्या कहना। दैत्येश! सुर या असुर कोई भी महादेवको नहीं जीत सकता। जब रणमें अत्यधिक ओजसे सम्पन्न शंकरको देखा भी नहीं जा सकता तब उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है॥ १९-२१॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने क्रुद्धस्ताम्रेक्षणः श्वसन्।<br>वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकासुरः॥ २२<br><br>किं ममासौ रणे योद्धुं शक्तस्त्रिणयनोऽसुर।<br>एकाकी धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः॥ २३<br><br>नान्धको बिभियादिन्द्रान्नामरेभ्यः कथंचन।<br>स कथं वृषपत्राक्षाद् बिभेति स्त्रीमुखेक्षकात्॥ २४<br><br>तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रह्लादः प्राह नारद।<br>न सम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा वचन कहनेपर क्रुद्ध एवं लाल-लाल आँखें किये हुए महातेजस्वी अन्धकासुरने लंबी साँस लेते हुए प्रह्लादसे कहा—असुर! क्या शरीरपर राख लपेटे, (किंतु, लोक) धर्मसे रहित अकेला वह त्रिनयन लड़ाईके मैदानमें मुझसे युद्ध कर सकता है? जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओंसे कभी नहीं डरता वह बैलकी सवारी करनेवाले तथा स्त्रीका मुख निहारनेवाले त्रिनेत्र (शंकर)-से कैसे डर सकता है? नारद! उसके उस कठोर वचनको सुनकर प्रह्लादने कहा—आप यह उचित नहीं कह रहे हैं। आपका कहना धर्म एवं अर्थके विपरीत है॥ २२-२५॥ |
| हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहक्रोष्टुकयोरिव।<br>गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुक्मपाषाणयोरिव॥ २६<br><br>एतेषाभिरुदितं यावदन्तरमन्धक।<br>तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च॥ २७<br><br>वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे।<br>शृणुष्व वाक्यं देवर्षेरसितस्य महात्मनः॥ २८ | अन्धक! अग्नि और जुगनू, सिंह और सियार, गजेन्द्र और मशक तथा सोने और पत्थरमें जितना अन्तर कहा जाता है, उतना ही अन्तर आप और शङ्करकी तुलनामें है। वीर! आपको मैंने रोका है और (अब भी) बार-बार रोक रहा हूँ। आप देवर्षि असितका वचन सुनें— |
| ३२० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ |
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| यो धर्मशीलो जितमानरोषो<br>विद्याविनीतो न परोपतापी।<br>स्वदारतुष्टः परदारवर्जी<br>न तस्य लोके भयमस्ति किंचित्॥ २९ | जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ, अभिमान और क्रोधको जीतनेवाला, विद्यासे विनम्र, किसीको दुःख न देनेवाला, अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट तथा परस्त्रीका त्याग करनेवाला होता है, उसे संसारमें कोई भय नहीं होता॥ २६-२९॥ | | यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा<br>परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः।<br>परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी<br>सुखं न विन्देत परत्र चेह॥ ३०<br><br>धर्मान्वितोऽभूद् भगवान् प्रभाकरः<br>संत्यक्तरोषश्च मुनिः स वारुणिः।<br>विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः<br>स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ ३१<br><br>एतानि पुण्यानि कृतान्यमीभि-<br>र्मया निबद्धानि कुलक्रमोक्त्या।<br>तेजोऽन्विताः शापवरक्षमाश्च<br>जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः॥ ३२<br><br>अधर्मयुक्तोऽङ्गसुतो बभूव<br>विभुश्च नित्यं कलहप्रियोऽभूत्।<br>परोपतापी नमुचिर्दुरात्मा<br>पराबलेप्सुर्नहुषश्च राजा॥ ३३ | जो व्यक्ति धर्मसे हीन, कलहसे प्रेम रखनेवाला, सदा दूसरोंको दुःख देनेवाला, वेद-शास्त्र (-के अध्ययन)-से रहित, दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीकी इच्छा रखनेवाला तथा भिन्न वर्णके साथ सम्बन्ध करनेवाला होता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पा सकता। भगवान् सूर्य धर्मसे युक्त थे, महर्षि वारुणि (वसिष्ठ)-ने क्रोध छोड़ दिया था, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान् थे और अगस्त्य ऋषि अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट थे। मैंने कुलके क्रमानुसार इन पुण्य करनेवालोंका उल्लेख किया है। शाप और वर देनेमें समर्थ ये सभी तेजस्वीलोग देवताओं और सिद्धोंके पूज्य हुए। अङ्गपुत्र (वेन) अधार्मिक और शक्तिशाली तथा नित्य कलहप्रिय था। दुरात्मा नमुचि परसंतापी एवं राजा नहुष परस्त्रीपर अधिकार प्राप्त करना चाहता था॥ ३०-३३॥ | | परार्थलिप्सुर्दितिजो हिरण्यदृक्<br>मूर्खस्तु तस्याप्यनुजः सुदुर्मतिः।<br>अवर्णसंगी यदुरुत्तमौजा<br>एते विनष्टास्त्वनयात् पुरा हि॥ ३४<br><br>तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः।<br>धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत्॥ ३५<br><br>धर्मस्तु गदितः पुम्भिस्तारणे दिवि चेह च।<br>पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परत्र च॥ ३६<br><br>त्याज्यं धर्मान्वितैर्नित्यं परदारोपसेवनम्।<br>नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम्।<br>सर्वेषामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रुवोऽन्धक॥ ३७ | दितिका पुत्र हिरण्याक्ष परधनका लालची था। उसका छोटा भाई दुर्बुद्धि एवं मूर्ख था तथा पराक्रमी यदु भिन्न जातिके साथ सम्बन्ध करनेवाला था। ये सभी पूर्वकालमें दुर्नीतिके कारण नष्ट हो गये। इसलिये धर्मको नहीं छोड़ना चाहिये; क्योंकि धर्म ही उत्तम गति है। धर्मसे हीन मनुष्य महान् रौरव नरकमें जाते हैं। पूर्वजोंने धर्मको ही परलोकको पार करनेवाला बताया है तथा अधर्मको इस लोक और परलोकमें पतनका हेतु बताया है। धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको परस्त्रीका सेवन करना सदैव वर्जनीय बताया है यतः परस्त्रियाँ इक्कीस नरकोंमें ले जाती हैं। अन्धक! सभी वर्णोंके लिये यह निश्चित धर्म है॥ ३४-३७॥ | | परार्थपरदारेषु यदा वाञ्छां करिष्यति।<br>स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः॥ ३८ | जो मनुष्य दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीमें कामना करता है, वह बहुत वर्षोंके लिये भयंकर रौरव नरकमें |
अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ [ ३२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं पुराऽसुरपते देवर्षिरसितोऽव्ययः।<br>प्राह धर्मव्यवस्थां खगेन्द्रायारुणाय हि॥ ३९<br><br>तस्मात् सुदूरतो वर्जेत् परदारान् विचक्षणः।<br>नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम्॥ ४० | चला जाता है। राक्षसराज! प्राचीन समयमें महात्मा देवर्षि असितने गरुड़ तथा अरुणसे धर्मकी यह व्यवस्था कही थी। इसलिये विद्वान् व्यक्ति दूसरी स्त्रियोंको दूरसे ही परित्याग कर दे; क्योंकि परस्त्रियाँ नीच बुद्धिवाले मनुष्योंको तिरस्कृत करा देती हैं॥ ३८–४०॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रह्लादं प्राह चान्धकः।<br>भवान् धर्मपरस्त्वेको नाहं धर्मं समाचरे॥ ४१<br><br>इत्येवमुक्त्वा प्रह्लादमन्धकः प्राह शम्बरम्।<br>गच्छ शम्बर शैलेन्द्रं मन्दरं वद शङ्करम्॥ ४२<br><br>भिक्षो किमर्थं शैलेन्द्रं स्वर्गंतुल्यं सकन्दरम्।<br>परिभुङ्क्षसि केनाद्य तव दत्तो वदस्व माम्॥ ४३<br><br>तिष्ठन्ति शासने मह्यं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>तत् किमर्थं निवमसे मामनादृत्य मन्दरे॥ ४४ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारका वचन कहनेपर अन्धकने प्रह्लादसे कहा कि आप अकेले धर्मनिष्ठ हैं। मैं धर्मका व्यवहार नहीं करता। प्रह्लादसे इस प्रकार कहकर अन्धकने शम्बरसे कहा—शम्बर! तुम मन्दर-पर्वतपर जाओ और शंकरसे कहो—भिक्षुक! तुम गुफामें रहनेवाले होकर और सबके समान मन्दर-पर्वतका उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बतलाओ कि तुमको इसे किसने दे दिया है? इन्द्र आदि देवता मेरा शासन मानते हैं। तुम मेरा अपमान करके इस मन्दर-पर्वतपर कैसे रह रहे हो?॥ ४१–४४॥ |
| यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम।<br>येयं हि भवतः पत्नी सा मे शीघ्रं प्रदीयताम्॥ ४५<br><br>इत्युक्तः स तदा तेन शम्बरो मन्दरं द्रुतम्।<br>जगाम तत्र यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक्॥ ४६<br><br>गत्वावाचान्धकवचो याथातथ्यं दनोः सुतः।<br>तमुत्तरं हरः प्राह शृण्वत्या गिरिकन्यया॥ ४७<br><br>ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेण धीमता।<br>तन्न शक्नोम्यहं त्यक्तुं विनाज्ञां वृत्रवैरिणः॥ ४८ | यदि यह पर्वतराज तुम्हें अभीष्ट है तो मेरे कहनेके अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह स्त्री है, उसे मुझे शीघ्र दे दो। उसके ऐसा कहनेपर शम्बर शीघ्रतासे उस मन्दरपर्वतपर गया, जहाँ पिनाक-पाणि शंकर देवीके साथ निवास कर रहे थे। दनु-पुत्रने वहाँ जाकर अन्धकके वचनको ज्यों-का-त्यों कहा। शङ्करने पर्वतनन्दिनीके सुनते हुए उसे उत्तर दिया। बुद्धिमान् इन्द्रने मुझे यह मन्दरपर्वत दिया है। इसलिये वृत्रासुरके वैरी इन्द्रकी आज्ञाके बिना मैं इसे नहीं छोड़ सकता॥ ४५–४८॥ |
| यच्चाब्रवीद् दीयतां मे गिरिपुत्रीति दानवः।<br>तदेषा यातु स्वं कामं नाहं वारयितुं क्षमः॥ ४९<br><br>ततोऽब्रवीद् गिरिसुता शम्बरं मुनिसत्तम।<br>ब्रूहि गत्वान्धकं वीर मम वाक्यं विपश्चितम्॥ ५०<br><br>अहं पताका संग्रामे भवानीशश्च देविनौ।<br>प्राणद्यूतं परिस्तीर्य यो जेष्यति स लप्स्यते॥ ५१<br><br>इत्येवमुक्तो मतिमान् शम्बरोऽन्धकमागमत्।<br>समागम्याब्रवीद् वाक्यं शर्वगौर्योश्च भाषितम्॥ ५२ | दानवने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनीको मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छासे जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। मुनिसत्तम! उसके बाद गिरिपुत्री पार्वतींने शम्बरसे कहा—वीर! तुम जाकर विद्वान् अन्धकसे मेरी बात कहो—संग्राममें मैं तो पताका हूँ। आप और शंकर खेलनेवाले हैं। प्राणोंका द्यूत फैलाकर (हार-जीतका दाँव लगाकर) जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा! ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् शम्बर अन्धकके पास गया एवं उसने शंकर तथा गौरीकी कही हुई बातें (ज्यों-की-त्यों) उससे कह दीं॥ ४९–५२॥ |
| ३२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ |
|---|
| तच्छ्रुत्वा दानवपतिः क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन।<br>समाहूयाब्रवीद् वाक्यं दुर्योधनमिदं वचः॥ ५३<br>गच्छ शीघ्रं महाबाहो भेरीं सान्नाहिकीं दृढाम्।<br>ताडयस्व सुविश्रब्धं दुःशीलामिव योषितम्॥ ५४<br>समादिष्टोऽन्धकेनाथ भेरीं दुर्योधनो बलात्।<br>ताडयामास वेगेन यथा प्राणेन भूयसा॥ ५५<br>सा ताडिता बलवता भेरी दुर्योधनेन हि।<br>सत्वरं भैरवं रावं रुराव सुरभी यथा॥ ५६ | उसे सुनकर दानवपतिकी आँखें क्रोधसे जलने लगीं। लंबी साँस लेते हुए दुर्योधनको बुलाकर उसने कहा—महाबाहो! शीघ्र जाओ एवं मारू या संग्रामके समयमें बजनेवाले जुझाऊ नगाड़ेको (मस्तीसे) जोर-जोरसे ऐसे पीटो जैसे दुराचारिणीको कोई (उसके अपराधके कारण उसका अभिभावक आदि निर्भयतासे) ताड़ित करता है। उसके बाद अन्धकसे आदेश प्राप्त कर दुर्योधन अत्यन्त बलपूर्वक जी-जानसे वेगपूर्वक भेरीको बजाने लगा। बलवान् दुर्योधनद्वारा बलपूर्वक बजायी जाती हुई वह भेरी सहसा भयंकर ध्वनिमें घरघराने लगी, जिस प्रकार सुरभी घरघराती है॥ ५३–५६॥ | | याथातथ्यं च तान् सर्वान्हा सेनापतिर्बली।<br>ते चापि बलिनां श्रेष्ठाः संनद्धा युद्धकाङ्क्षिणः॥ ५८<br>सहान्धका निर्ययुस्ते गजैरुष्ट्रैर्हयै रथैः।<br>अन्धको रथमास्थाय पञ्चनल्वप्रमाणतः॥ ५९<br>त्र्यम्बकं स पराजेतुं कृतबुद्धिर्विनिर्ययौ।<br>जम्भः कुजम्भो हुण्डश्च तुहुण्डः शम्बरो बलिः॥ ६०<br>बाणः कार्तस्वरो हस्ती सूर्यशत्रुर्महोदरः।<br>अयःशंकुः शिबिः शाल्वो वृषपर्वा विरोचनः॥ ६१<br>हयग्रीवः कालनेमिः संह्लादः कालनाशनः।<br>शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६२<br>दुर्योधनश्च पाकश्च विपाकः कालशम्बरौ।<br>एते चान्ये च बहवो महावीर्या महाबलाः।<br>प्रजग्मुरुत्सुका योद्धुं नानायुधधरा रणे॥ ६३<br>इत्थं दुरात्मा दनुसैन्यपाल-<br>स्तदान्धको योद्धुमना हरेण।<br>महाचलं मन्दरमभ्युपेयिवान्<br>स कालपाशावसितो हि मन्दधीः॥ ६४ | उसकी उस ध्वनिको सुनकर सभी बड़े असुर ‘यह क्या है?’—ऐसा कहते हुए शीघ्रतासे सभामें आ गये। पराक्रमी सेनापतिने उन सभीसे उचित और सत्य वचन कहा। युद्धकी इच्छा करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वे सभी वीर तैयार हो गये। हाथी, ऊँट, घोड़ों और रथोंसहित वे सभी अन्धकके साथ बाहर निकले। पाँच नल्व—अर्थात् दो हजार हाथके प्रमाणवाले रथपर चढ़कर अन्धक त्रिलोचन शंकरको जीतनेका निश्चय कर बाहर निकला। जम्भ, कुजम्भ, हुण्ड, तुहुण्ड, शम्बर, बलि, बाण, कार्तस्वर, हस्ती, सूर्यशत्रु, महोदर, अयःशंकु, शिबि, शाल्व, वृषपर्वा, विरोचन, हयग्रीव, कालनेमि, संह्लाद, कालनाशन, शरभ, शलभ, पराक्रमी विप्रचित्ति, दुर्योधन, पाक, विपाक, काल एवं शम्बर—ये सभी तथा अन्य अनेक महापराक्रमशाली एवं महाबलवान् राक्षस भाँति-भाँतिके आयुधोंको लेकर प्रबल इच्छासे संग्राममें लड़नेके लिये चल पड़े। इस प्रकार काल-पाशसे बँधा हुआ वह अल्पमति दनुसैन्यपति दुष्टात्मा अन्धक शंकरसे युद्ध करनेके विचारसे महान् पर्वत मन्दरपर गया॥ ५७–६४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छाछठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६६॥
६९- शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि-दानव-युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ-देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव-वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य-देव और इन्द्र-जम्भ-युद्ध, मातलिकका जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ-कुजम्भ-वध
अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२३
सड़सठवाँ अध्याय
नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, उनसे हरि और हरका एकत्व प्रतिपादन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>हरोऽपि शम्बरे याते समाहूयाथ नन्दिनम्।<br>प्राहामन्त्रय शैलादीन् ये स्थितास्तव शासने॥ १<br>ततो महेशवचनान्नन्दी तूर्णतरं गतः।<br>उपस्पृश्य जलं श्रीमान् सस्मार गणनायकान्॥ २<br>नन्दिना संस्मृताः सर्वे गणनाथाः सहस्रशः।<br>समुत्पत्य त्वरायुक्ताः प्रणतास्त्रिदशेश्वरम्॥ ३<br>आगतांश्च गणान्नन्दी कृताञ्जलिपुटोऽव्ययः।<br>सर्वान् निवेदयामास शङ्कराय महात्मने॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले— शम्बरके चले जानेपर शंकरने भी नन्दीको बुलाकर कहा—नन्दिन्! तुम्हारे शासनमें जो पर्वत आदि रहते हैं, उन्हें इस (माङ्गलिक) कार्यमें आनेके लिये आमन्त्रित करो। उसके बाद महेशके कहनेसे नन्दी शीघ्रातिशीघ्र गये और उन्होंने जलका आचमन कर गणनायकोंका स्मरण किया। नन्दीसे स्मरण किये गये सभी गणनाथोंने हजारोंकी संख्यामें शीघ्रतासे आकर त्रिदशेश्वर शंकरको प्रणाम किया। अविनाशी नन्दीने महात्मा शंकरसे हाथ जोड़कर सभी आये हुए गणोंको निवेदित किया॥ १–४॥ |
| नन्द्युवाच<br>यानेतान् पश्यसे शम्भो त्रिनेत्राञ्जटिलाञ्शुचीन्।<br>एते रुद्रा इति ख्याताः कोट्य एकादशैव तु॥ ५<br>वानरास्यान् पश्यसे यान् शार्दूलसमविक्रमान्।<br>एतेषां द्वारपालास्ते मन्नामानो यशोधनाः॥ ६<br>षण्मुखान् पश्यसे यांश्च शक्तिपाणीञ्शिखिध्वजान्।<br>षट् च षष्टिश्चता कोट्यः स्कन्दनाम्नः कुमारकान्॥ ७<br>एतावत्यस्तथा कोट्यः शाखा नाम षडाननाः।<br>विशाखास्तावदेवोक्ता नैगमेयाश्च शङ्कर॥ ८ | नन्दीने कहा— शम्भो! तीन नेत्रोंवाले और जटा धारण करनेवाले तथा पवित्र जिन गणोंको आप देख रहे हैं, उन्हें रुद्र कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह कोटि है। बन्दरके समान मुँह और सिंहके समान पराक्रमवाले जिन्हें आप देख रहे हैं, वे मेरे नामको धारण करनेवाले यशस्वी इनके द्वारपाल हैं। हाथमें शक्ति लिये तथा मयूरध्वजी जिन छः मुखवालोंको आप देख रहे हैं, वे स्कन्द नामके कुमार हैं। इनकी संख्या छाछठ करोड़ है। शंकर! इतने ही छः मुख धारण करनेवाले शाखा नामके गण हैं और इतने ही विशाख और नैगमेय नामके गण हैं॥ ५–८॥ |
| सप्तकोटिशतं शम्भो अमी वै प्रमथोत्तमाः।<br>एकैकं प्रति देवेश तावत्यो ह्यपि मातरः॥ ९<br>भस्मारुणितदेहाश्च त्रिनेत्राः शूलपाणयः।<br>एते शैवा इति प्रोक्तास्तव भक्ता गणेश्वराः॥ १०<br>तथा पाशुपताश्चान्ये भस्मप्रहरणा विभो।<br>एते गणास्त्वसंख्याताः सहायर्थं समागताः॥ ११<br>पिनाकधारिणो रौद्रा गणाः कालमुखापरे।<br>तव भक्ताः समायाता जटामण्डलिनोऽद्भुताः॥ १२ | शम्भो! इन उत्तम प्रमथोंकी संख्या सात सौ करोड़ है। देवेश! प्रत्येकके साथ उतनी ही मातृकाएँ भी हैं। इन भस्मविभूषित शरीरवाले शूलपाणि त्रिनेत्रधारियोंको शैव कहा जाता है। ये सभी गणेश्वर आपके भक्त हैं। विभो! भस्मरूपी अस्त्र धारण करनेवाले अन्य अनगिनत पाशुपत गण सहायताके लिये आये हैं। पिनाक धारण करनेवाले जटामण्डलसे युक्त, अद्भुत भयङ्कर कालमुख नामक आपके अन्य गण (भी) आये हैं॥ ९–१२॥ |
| श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६७ ] |
|---|---|
| ३२४ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| खट्वाङ्गयोधिनो वीरा रक्तचर्मसमावृताः ।<br>इमे प्राप्ता गणा योद्धुं महाव्रतिन उत्तमाः ॥ १३<br><br>दिग्वाससो मौनिनश्च घण्टाप्रहरणास्तथा ।<br>निराश्रया नाम गणाः समायाता जगद्गुरो ॥ १४<br><br>सार्धद्विनेत्राः पद्माक्षाः श्रीवत्साङ्कितवक्षसः ।<br>समायाताः खरारूढा वृषभध्वजिनोऽव्ययाः ॥ १५<br><br>महापाशुपता नाम चक्रशूलधरास्तथा ।<br>भैरवो विष्णुना सार्द्धमभेदेनार्चितो हि यैः ॥ १६ | खट्वाङ्गसे संग्राम करनेवाले, लाल ढालसे युक्त महाव्रती नामके ये उत्तम युद्धके लिये आये हैं। जगद्गुरो! घण्टा नामके आयुधको धारण करनेवाले दिगम्बर और मौनी तथा निराश्रय नामक गण उपस्थित हुए हैं। तीन नेत्रोंवाले, पद्माक्ष एवं श्रीवत्ससे चिह्नित वक्षःस्थलवाले गरुड़ पक्षीपर चढ़े हुए तथा अविनाशी वृषभध्वजी गण यहाँ आ गये हैं। चक्र तथा शूल धारण करनेवाले महापाशुपत नामके गण आ गये हैं, जिन्होंने अभिन्नभावसे विष्णुके साथ भैरवकी पूजा (यहाँ) की है॥ १३-१६॥ |
| इमे मृगेन्द्रवदनाः शूलबाणधनुर्धराः ।<br>गणास्त्वद्रोमसम्भूता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १७<br><br>एते चान्ये च बहवः शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>सहायार्थं तवायाता यथा प्रीत्यादिशस्व तान् ॥ १८<br><br>ततोऽभ्येत्य गणाः सर्वे प्रणेमुर्वृषभध्वजम् ।<br>तान् करेणैव भगवान् समाश्वास्योपवेशयत् ॥ १९<br><br>महापाशुपतान् दृष्ट्वा समुत्थाय महेश्वरः ।<br>सम्परिष्वजताध्यक्षांस्ते प्रणेमुर्महेश्वरम् ॥ २० | आपके रोमोंसे उत्पन्न ये सभी सिंहके समान मुखवाले शूल, बाण और धनुष धारण करनेवाले वीरभद्र आदि गण तथा दूसरे भी सैकड़ों एवं हजारों गण आपकी सहायताके लिये आ गये हैं। अपनी इच्छाके अनुसार आप इन्हें आदेश दें। उसके बाद सभी गणोंने पास जाकर वृषभध्वजको प्रणाम किया। भगवान्ने हाथसे उन्हें विश्वस्तकर बैठाया। महापाशुपत नामके अपने अध्यक्षोंको देखनेके बाद महेश्वरने उठकर उनको गले लगाया। उन लोगोंने महेश्वरको अभिवन्दित किया॥ १७-२०॥ |
| ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा सर्वे गणेश्वराः ।<br>सुचिरं विस्मिताक्षाश्च वैलक्ष्यमगमत् परम् ॥ २१<br><br>विस्मिताक्षान् गणान् दृष्ट्वा शैलादिर्योगिनां वरः ।<br>प्राह प्रहस्य देवेशं शूलपाणिं गणाधिपम् ॥ २२<br><br>विस्मितामी गणा देव सर्व एव महेश्वर ।<br>महापाशुपतानां हि यत् त्वयालिङ्गनं कृतम् ॥ २३<br><br>तदेतेषां महादेव स्फुटं त्रैलोक्यविन्दकम् ।<br>रूपं ज्ञानं विवेकं च वदस्व स्वेच्छया विभो ॥ २४<br><br>प्रमथाधिपतेर्वाक्यं विदित्वा भूतभावनः ।<br>बभाषे तान् गणान् सर्वान् भावाभावविचारिणः ॥ २५ | उसके बाद उस अत्यन्त विचित्र दृश्यको देखकर सभी गणेश्वरोंकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। उसके बाद वे सभी बहुत ही लज्जित हो गये। गणोंको अचरजभरे नेत्रोंवाला देखकर योगिश्रेष्ठ शैलादि नन्दीने हँसकर गणाधिप देवेश शूलपाणिसे कहा—देव! महेश्वर! महापाशुपतोंको आपने जो गले लगाया है, उससे ये सभी गण आश्चर्यमें पड़ गये हैं। अतः महादेव! विभो! इनके तीनों लोकोंमें विख्यात रूप, ज्ञान एवं विवेकका अपने इच्छानुसार वर्णन करें। प्रमथोंके अधिपति नन्दीकी बात सुनकर भूतभावन महादेव भाव और अभावका विचार करनेवाले उन गणोंसे कहने लगे—॥ २१-२५॥ |
| रुद्र उवाच<br>भवद्भिर्भक्तिसंयुक्तैर्हरो भावेन पूजितः ।<br>अहंकारविमूढैश्च निन्दद्भिर्वैष्णवं पदम् ॥ २६ | रुद्रने कहा— अहंकारसे विमूढ किंतु मेरी भक्तिसे युक्त आपलोगोंने वैष्णवपदकी निन्दा करते हुए |
अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेनाज्ञानेन भवतोनादृत्यानुविरोधिताः।<br>योऽहं स भगवान् विष्णुर्विष्णुर्यः सोऽहमव्ययः॥ २७<br><br>नावयोर्वै विशेषोऽस्ति एका मूर्तिर्द्विधा स्थिता।<br>तदमीभिर्नरव्याघ्रैर्भक्तिभावयुतैर्गणैः॥ २८<br><br>यथाहं वै परिज्ञातो न भवद्भिस्तथा ध्रुवम्।<br>येनाहं निन्दितो नित्यं भवद्भिर्मूढबुद्धिभिः॥ २९<br><br>तेन ज्ञानं हि वै नष्टं नातस्त्वालिङ्गिता मया।<br>इत्येवमुक्ते वचने गणाः प्रोचुर्महेश्वरम्॥ ३० | भावपूर्वक शंकरकी पूजा की है। इसी अज्ञानके हेतु आप सभीका अनादर कर उनका विशेष आग्रह किया गया। जो मैं हूँ वही भगवान् विष्णु हैं एवं जो विष्णु हैं वही अविनाशी मैं हूँ। हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें अवस्थित है। अतः भक्तिभावसे युक्त इन पुरुषश्रेष्ठ गणोंने जैसा मुझे जाना है, निश्चय ही उस प्रकार आपलोग मुझे नहीं जानते। जड-बुद्धिवाले आपलोगोंने यतः नित्य मेरी निन्दा की है, अतः आपलोगोंका ज्ञान नष्ट हो गया। इसीलिये मैंने आपलोगोंको गले नहीं लगाया है। इस प्रकार कहनेपर गणोंने महेश्वरसे कहा —॥ २६–३०॥ |
| कथं भवान् यथैक्येन संस्थितोऽस्ति जनार्दनः।<br>भवान् हि निर्मलः शुद्धः शान्तः शुक्लो निरञ्जनः॥ ३१<br><br>स चाप्यञ्जनसंकाशः कथं तेनेह युज्यते।<br>तेषां वचनमर्थाढ्यं श्रुत्वा जीमूतवाहनः॥ ३२<br><br>विहस्य मेघगम्भीरं गणानिदमुवाच ह।<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये स्वयशोवर्द्धनं वचः॥ ३३<br><br>न त्वेव योग्या यूयं हि महाज्ञानस्य कर्हिचित्।<br>अपवादभयाद् गुह्यं भवतां हि प्रकाशये॥ ३४ | आप एवं जनार्दन ऐक्यरूपसे कैसे रहते हैं? आप निर्मल, शुद्ध, शान्त, शुक्ल और निर्दोष एवं अज्ञानसे रहित हैं। किंतु वे अञ्जनके तुल्य हैं; अतः उनसे आपका मेल कैसे होता है? उनके अभिप्राययुक्त वचनको सुननेके बाद जीमूतवाहन शंकरने मेघके समान गम्भीर वाणीमें हँसकर कहा—अपनी कीर्ति बढ़ानेवाली सम्पूर्ण बात मैं बतलाता हूँ; उसे सुनो—तुमलोग कभी भी महाज्ञानके योग्य नहीं हो। परंतु अपकीर्तिके डरसे मैं आप सभीके सामने गोपनीय वस्तु-स्थितिको प्रकाशित करता हूँ॥ ३१–३४॥ |
| प्रियत्वं मयि चैतेन यन्मच्चित्तास्तु नित्यशः।<br>एकरूपात्मकं देहं कुरुध्वं यत्नमास्थिताः॥ ३५<br><br>पयसां हविषाद्यैश्च स्नपनेन प्रयत्नतः।<br>चन्दनादिभिरेकाग्रैर्न मे प्रीतिः प्रजायते॥ ३६<br><br>यत्नात् क्रकचमादाय छिन्धध्वं मम विग्रहम्।<br>नरकार्हा भवद्भक्ता रक्षामि स्वयशोऽर्थतः॥ ३७<br><br>माऽयं वदिष्यते लोको महान्तमपवादिनम्।<br>यथा पतन्ति नरके हरभक्तास्तपस्विनः॥ ३८ | मुझमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेसे भी अन्य लोग प्रिय हैं। तुमलोग यत्नपूर्वक एक देहात्मक रूपको समझो। प्रयत्नपूर्वक दूध या घीसे स्नान कराने तथा स्थिरचित्ततापूर्वक चन्दन आदिद्वारा लेप करनेसे मुझे प्रसन्नता नहीं उत्पन्न होती। आरा लेकर मेरी देहको भले ही चीर डालो, परंतु अपनी कीर्तिके लिये नरकके योग्य आप भक्तोंकी मैं (उससे) रक्षा करता ही हूँ। (क्योंकि) यह संसार मुझे इस प्रकारका महान् कलङ्क न लगाये कि शंकरके तपस्वी भक्त नरकमें जाते हैं॥ ३५–३८॥ |
| व्रजन्ति नरकं घोरमित्येवं परिवादिनः।<br>अतोऽर्थं न क्षिपाम्यद्य भवतो नरकेऽद्भुते॥ ३९<br><br>यन्निन्दध्वं जगन्नाथं पुष्कराक्षं च मन्मयम्।<br>स चैव भगवान् शर्वः सर्वव्यापी गणेश्वरः॥ ४०<br><br>न तस्य सदृशो लोके विद्यते सचराचरे।<br>श्वेतमूर्तिः स भगवान् पीतो रक्तोऽञ्जनप्रभः॥ ४१ | इस प्रकारकी निन्दा करनेवाले लोग भयंकर नरकमें जाते हैं। इसलिये मैं आपलोगोंको अद्भुत नरकमें नहीं डालता। आपलोग मेरे स्वरूप जिन कमलनयन जगन्नाथकी निन्दा करते हैं, वे ही सर्वव्यापी गणेश्वर भगवान् शर्व हैं। इस समस्त चर और अचर लोकमें उनके समान कोई नहीं है। वे भगवान् श्वेतमूर्ति पीत, रक्त एवं |
| ३२६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६७ |
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| तस्मात् परतरं लोके नान्यद् धर्म हि विद्यते।<br>सात्त्विकं राजसं चैव तामसं मिश्रकं तथा।<br>स एव धत्ते भगवान् सर्वपूज्यः सदाशिवः॥ ४२<br>शङ्करस्य वचः श्रुत्वा शैवाद्याः प्रमथोत्तमाः।<br>प्रत्युचुर्भगवन् ब्रूहि सदाशिवविशेषणम्॥ ४३<br>तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा प्रमथानामथेश्वरः।<br>दर्शयामास तद्रूपं सदाशैव निरञ्जनम्॥ ४४<br>ततः पश्यन्ति हि गणाः तमीशं वै सहस्रशः।<br>सहस्रवक्त्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम्॥ ४५<br>दण्डपाणिं सुदुर्हृश्यं लोकैर्व्याप्तं समन्ततः।<br>दण्डसंस्थाऽस्य दृश्यन्ते देवप्रहरणास्तथा॥ ४६<br>तत एकमुखं भूयो ददृशुः शङ्करं गणाः।<br>रौद्रैश्च वैष्णवैश्चैव वृतं चिह्नः सहस्रशः॥ ४७<br>अर्द्धेन वैष्णववपुरर्द्धेन हरविग्रहः।<br>खगध्वजं वृषारूढं खगारूढं वृषध्वजम्॥ ४८<br>यथा यथा त्रिनयनो रूपं धत्ते गुणाग्रणीः।<br>तथा तथा त्वजायन्त महापाशुपता गणाः॥ ४९<br>ततोऽभवच्चैकरूपी शङ्करो बहुरूपवान्।<br>द्विरूपश्चाभवद् योगी एकरूपोऽप्यरूपवान्।<br>क्षणाच्छ्वेतः क्षणाद् रक्तः पीतो नीलः क्षणादपि॥ ५०<br>मिश्रको वर्णहीनश्च महापाशुपतस्तथा।<br>क्षणाद् भवति रुद्रेन्द्रः क्षणाच्छम्भुः प्रभाकरः॥ ५१<br>क्षणाद्धार्द्धाच्छङ्करो विष्णुः क्षणाच्चर्व्वः पितामहः।<br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा शैवादयो गणाः॥ ५२<br>अजानन्त तदैक्येन ब्रह्मविष्ण्वीशभास्करान्।<br>यदाऽभिन्नममन्यन्त देवदेवं सदाशिवम्॥ ५३<br>तदा निर्धूतपापास्ते समजायन्त पार्षदाः।<br>तेष्वेवं धूतपापेषु अभिन्नेषु हरीश्वरः॥ ५४<br>प्रीतात्मा विबभौ शम्भुः प्रीतियुक्तोऽब्रवीद् वचः।<br>परितुष्टोऽस्मि वः सर्वे ज्ञानेनानेन सुव्रताः॥ ५५<br>वृणुध्वं वरमानन्त्यं दास्ये वो मनसेप्सितम्।<br>ऊचुस्ते देहि भगवन् वरमस्माकमीश्वर।<br>भिन्नदृष्ट्युद्भवं पापं यत्तद् भ्रंशं प्रयातु नः॥ ५६ | अञ्जनके सदृश कान्तिवाले हैं। संसारमें उनसे श्रेष्ठ कोई दूसरा धर्म नहीं है। सर्वपूज्य वे सदाशिव (सदा मङ्गल करनेवाले) भगवान् ही सभी सात्त्विक, राजस, तामस एवं मिश्रित भावोंको धारण करते हैं॥ ३९-४२॥<br><br>शंकरके वचनको सुनकर शैव आदि श्रेष्ठ गणोंने कहा—भगवन्! आप सदाशिवकी विशेषता प्रकट करनेवाले गुणको कहिये। प्रमथेश्वरने उनके इस वचनको सुनकर उन्हें निरञ्जन सदाशिवरूपको दिखलाया। उसके बाद हजारों गणोंने उन ईश्वरको हजारों मुख, चरण एवं भुजाओंवाला हुआ देखा। वे लोकोंसे सभी ओर व्याप्त थे तथा दण्डपाणि एवं अत्यधिक सुदुर्हृश्य थे। देवताओंके अस्त्र उनके दण्डमें दिखलायी पड़ रहे थे॥ ४३—४६॥<br><br>उसके बाद पुनः गणोंने रुद्र एवं विष्णुके हजारों चिह्नोंसे युक्त एकमुख शंकरको देखा। उस रूपका आधा भाग शंकरके शरीरका था और आधा भाग गरुडध्वज था। (एक आधा भाग) गरुडध्वज वृषारूढ था एवं (दूसरा आधा भाग) वृषभध्वज गरुड़पर आरूढ़ था। गुणोंमें अग्रणी त्रिलोचन जैसे-जैसे रूप धारण करते जाते थे, वैसे-वैसे ही महापाशुपतगण भी होते जाते थे। उसके बाद एकरूपवाले शंकर बहुत रूपवाले हो गये। वे योगी दो रूप धारण करनेवाले, एक रूप धारण करनेवाले एवं बिना रूपके भी हो गये। वे प्रतिक्षण श्वेत, रक्त, पीत, नील, मिश्र वर्णवाले एवं वर्णहीन होते गये। महापाशुपतोंका भी स्वरूप उनके रूपके अनुरूप होता गया। श्रीशंकर किसी क्षणमें इन्द्र, किसी क्षणमें सूर्य, किसी क्षणमें विष्णु एवं किसी क्षणमें पितामहके रूपमें स्वरूप बदलते गये। यह अत्यन्त आश्चर्यजनक दृश्य देखकर शैव आदि गणोंने ब्रह्मा, विष्णु, ईश एवं सूर्यको (इनसे) अभिन्न समझा। उन लोगोंने जब देवाधिदेव सदाशिवको (सभी देवोंसे) अभिन्न मान लिया तब वे सभी पार्षद पापसे रहित हो गये। इस प्रकार अभेद-बुद्धिके कारण उनके पापसे विमुक्त हो जानेसे हरीश्वर शम्भु प्रसन्न हो गये। उन्होंने संतुष्ट होकर कहा—सुव्रतो! तुम्हारे इस प्रकारके ज्ञानसे मैं प्रसन्न हूँ। अब बहुतों-से वर फिर माँगो। मैं तुम्हें इच्छित वर दूँगा। उन्होंने कहा—भगवन्! महेश्वर! हमें यह वर दें कि भेदभाव रखनेके कारण उत्पन्न हमारे (शेष) सभी पाप नष्ट हो जायें॥ ४७—५६॥ |
| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३२७ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वश्चक्रे निर्धूतकल्मषान्।<br>सम्परिष्वजताव्यक्तस्तान् सर्वान् गणयूथपान्॥ ५७<br><br>इति विभुना प्रणतार्तिहरेण<br>गणपतयो वृषमेघरथेन।<br>श्रुतिगदितानुगमेनेव मन्दरं<br>गिरिमवतत्य समध्यवसन् तम्॥ ५८<br><br>आच्छादितो गिरिवरः प्रमथैर्घनाभै-<br>राभाति शुक्लतनुरीश्वरपादजुष्टः।<br>नीलाजिनातततनुः शरदभ्रवर्णो<br>यद्वद्विभाति बलवान् वृषभो हरस्य॥ ५९ | पुलस्त्यजी बोले— शंकरने कहा—'ऐसा ही होगा'। उसके बाद अदृश्य होते हुए शंकरने उन सभी गणाधिपोंको आलिङ्गित कर उन्हें पापसे (सर्वथा) रहित कर दिया। उसके बाद श्रुतिकी उक्तिका जैसे (शास्त्रोंमें) अनुगमन होता है उसी प्रकार वृष एवं मेघवाहन शरणागतोंके कष्टको हरण करनेवाले शंकरके साथ सभी गणपति मन्दरपर्वतको चारों ओरसे घेरकर रहने लगे। मेघके समान प्रमथोंसे घिरे शिव-चरणकी सेवा करनेवाले शुक्ल शरीरवाला पर्वतराज ऐसे सुशोभित हो रहा था जैसे नीले मृगचर्मसे ढके शरीरवाला एवं शरत्कालीन मेघके समान धवल रंगवाला शंकरका बलवान् वृषभ सुशोभित होता है॥ ५७—५९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६७॥
अडसठवाँ अध्याय
भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश
| पुलस्त्य उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः समं दैत्यैस्तथाऽन्धकः।<br>मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं प्रमथाश्रितकन्दरम्॥ १<br>प्रमथा दानवान् दृष्ट्वा चक्रुः किलकिलाध्वनिम्।<br>प्रमथाश्चापि संरब्धा जघ्नुस्तूर्यान्यनेकशः॥ २<br>स चावृणोन्महानादो रोदसी प्रलयोपमः।<br>शुश्राव वायुमार्गस्थो विघ्नराजो विनायकः॥ ३<br>समभ्ययात् सुसंक्रुद्धः प्रमथैरभिसंवृतः।<br>मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं ददृशे पितरं तथा॥ ४<br>प्रणिपत्य तथा भक्त्या वाक्यमाह महेश्वरम्।<br>किं तिष्ठसि जगन्नाथ समुत्तिष्ठ रणोत्सुकः॥ ५<br><br>ततो विघ्नेशवचनाज्जगन्नाथोऽम्बिकां वचः।<br>प्राह यास्येऽन्धकं हन्तुं स्थेयमेवाप्रमत्तया॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) इसी बीच दैत्योंके साथ वह अन्धक प्रमथोंसे सेवित गुफाओंवाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरगिरिपर आ गया। प्रमथोंने दानवोंको देखकर हर्षसूचक 'किलकिला'-ध्वनि की और फिर उन्होंने बहुत-सी तुरहियाँ बजायीं। प्रलय (कालीन ध्वनि)-के समान वह भयङ्कर ध्वनि आकाश और पृथ्वीके बीच भर गयी। आकाशमें स्थित विघ्नराज गणेशने उस ध्वनिको सुना। प्रमथोंसे घिरे हुए वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गये और उन्होंने अपने पिताको देखा॥ १—४॥<br>(फिर) श्रद्धापूर्वक प्रणामकर महेश्वरसे (यह) वाक्य कहा—हे जगन्नाथ! आप बैठे क्यों हैं? युद्ध करनेके लिये प्रबल इच्छा रखकर आप उठें। विघ्नेश्वर गणेशके कहनेपर जगत्पति महादेवने अम्बिकासे कहा—मैं अन्धकको मारनेके लिये जाऊँगा, तुम सावधानीसे रहना। |
| ३२८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६८ |
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| ततो गिरिसुता देवं समालिङ्ग्य पुनः पुनः।<br>समीक्ष्य सस्नेहहरं प्राह गच्छ जयान्धकम्॥ ७<br><br>ततोऽमरगुरोर्गौरी चन्दनं रोचनाञ्जनम्।<br>प्रतिवन्द्य सुसम्प्रीता पादावेवाभ्यवन्दत॥ ८ | उसके बाद पर्वतनन्दिनीने महादेवको बार-बार गले लगाकर एवं प्रेमपूर्ण दृष्टिसे उन्हें देखकर (मङ्गल वचन) कहा—जाइये और अन्धकपर विजय प्राप्त कीजिये। उसके बाद गौरीने देवश्रेष्ठ शंकरको चन्दन, रोचना एवं अञ्जन लगाया तथा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५—८॥ | | ततो हरः प्राह वचो यशस्यं मालिनीमपि।<br>जयां च विजयां चैव जयन्तीं चापराजिताम्॥ ९<br>युष्माभिरप्रमत्ताभिः स्थेयं गेहे सुरक्षिते।<br>रक्षणीया प्रयत्नेन गिरिपुत्री प्रमादतः॥ १०<br>इति संदिश्य ताः सर्वाः समारुह्य वृषं विभुः।<br>निर्जगाम गृहात् तुष्टो जयेप्सुः शूलधृग् बली॥ ११<br>निर्गच्छतस्तु भवनादीश्वरस्य गणाधिपाः।<br>समन्तात् परिवार्थैव जयशब्दांश्च चक्रिरे॥ १२ | उसके बाद महादेवने मालिनी, जया, विजया, जयन्ती और अपराजितासे कीर्ति बढ़ानेवाला यह वचन कहा—तुमलोग सुरक्षित घरमें सतर्कतासे रहना और प्रयत्नपूर्वक पार्वतीको असावधानीसे बचाना। उन सभीको इस प्रकार समझाने-बुझानेके बाद वृषभपर सवार होकर शूल धारण करनेवाले विजयाभिलाषी बलशाली भगवान् शंकर (आत्मविश्वासके साथ) संतुष्ट होकर घरसे चल पड़े। घरसे निकलते समय गणाधिपोंने शंकरको चारों ओरसे घेरकर 'जय-जयकार' किया॥ ९—१२॥ | | रणाय निर्गच्छति लोकपाले<br>महेश्वरे शूलधरे महर्षे।<br>शुभानि सौम्यानि सुमङ्गलानि<br>जातानि चिह्नानि जयाय शम्भोः॥ १३<br>शिवा स्थिता वामतरेऽथ भागे<br>प्रयाति चाग्रे स्वनमुन्नदन्ती।<br>क्रव्यादसंघाश्च तथाामिषैषिणः<br>प्रयान्ति हृष्टास्तृषितासृगर्थे॥ १४<br>दक्षिणाङ्गं नखान्तं वै समकम्पत शूलिनः।<br>शकुनिश्चापि हारीतो मौनी याति पराङ्मुखः॥ १५<br>निमित्तानीदृशान् दृष्ट्वा भूतभव्यभवो विभुः।<br>शैलादिं प्राह वचनं सस्मितं शशिशेखरः॥ १६ | महर्षे! शूल धारण करनेवाले संसारके पालक महेश्वरके युद्ध करनेके लिये घरसे निकलनेपर उनकी जयके लिये शुभ, सौम्य और मङ्गलजनक लक्षण (शकुन) प्रकट हुए। उनकी बायीं बगलमें शृगालिनी स्थित होकर ऊँचे स्वरमें बोलती हुई आगे-आगे जा रही थी। मांसभक्षी प्राणियोंका समूह प्रसन्नतापूर्वक रक्तके लिये जा रहा था। शूलपाणिका सारा दायाँ अङ्ग फड़क उठा। हारीत पक्षी मौन होकर पीछेकी ओर जा रहा था। भूत, भविष्य एवं वर्तमानस्वरूप एवं व्यापक चन्द्रमौलि महादेव शंकरने इस प्रकारके लक्षणोंको देखकर शैलादि (नन्दी)-से प्रसन्नतापूर्वक वचन कहा—॥ १३—१६॥ | | हर उवाच<br>नन्दिन् जयोऽद्य मे भावी न कथंचित् पराजयः।<br>निमित्तानीह दृश्यन्ते सम्भूतानि गणेश्वर॥ १७ | शंकरने कहा— नन्दिन्! गणेश्वर! इस समय कल्याणकारी लक्षण दिखायी दे रहे हैं। इसलिये आज मेरी विजय होगी। किसी भी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। | | तच्छम्भुवचनं श्रुत्वा शैलादिः प्राह शङ्करम्।<br>कः संदेहो महादेव यत् त्वं जयसि शात्रवान्॥ १८<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं नन्दी रुद्रगणांस्तथा।<br>समादिदेश युद्धाय महापाशुपतैः सह॥ १९<br>तेऽभ्येत्य दानवबलं मर्दयन्ति स्म वेगिताः।<br>नानाशास्त्रधरा वीरा वृक्षानशनयो यथा॥ २० | शंकरके उस वचनको सुनकर शैलादिने उनसे कहा—महादेव! आप शत्रुओंको जीत लेंगे, इसमें संदेह ही कौन-सा है? ऐसा कहकर नन्दीने महापाशुपतके सहित रुद्रगणोंको युद्ध करनेके लिये आदेश दिया। (फिर तो) भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको धारण करनेवाले वे वीर दानवसैन्यके पास पहुँचकर उसे ऐसे कुचलकर नष्ट करने लगे जैसे वज्र वृक्षोंको नष्ट करता है॥ १७—२०॥ |
| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३२९ | | :--- | :--- |
| ते वध्यमाना बलिभिः प्रमथैर्दैत्यदानवाः।<br>प्रवृत्ताः प्रमथान् हन्तुः कूटमुद्गरपाणयः॥ २१<br>ततोऽम्बरतले देवाः सेन्द्रविष्णुपितामहाः।<br>ससूर्याग्निपुरोगास्तु समायाता दिदृक्षवः॥ २२<br>ततोऽम्बरतले घोषः सस्वनः समजायत।<br>गीतवाद्यादिसम्मिश्रो दुन्दुभीनां कलिप्रिय॥ २३<br>ततः पश्यत्सु देवेषु महापाशुपतादयः।<br>गणास्तद्दानवं सैन्यं जिघांसन्ति स्म कोपिताः॥ २४ | बलशाली प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे दैत्य-दानवगण (भी) हाथोंमें कूट-मुद्गर लेकर प्रमथोंको मारने लगे। उसके बाद (युद्ध) देखनेकी लालसासे इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य एवं अग्नि आदि देवगण आकाशमें एकत्र हो गये। नारदजी! उसके बाद गाने-बजानेके साथ दुन्दुभियोंकी ध्वनि आकाशमें गूँजने लगी। फिर तो देवताओंके देखते-ही-देखते क्रुद्ध होकर महापाशुपत आदि गण दानव-सेनाका विध्वंस करने लगे॥ २१-२४॥ |
| चतुरङ्गबलं दृष्ट्वा हन्यमानं गणेश्वरैः।<br>क्रोधान्वितस्तुहुण्डस्तु वेगेनाभिससार ह॥ २५<br>आदाय परिघं घोरं पट्टोद्बद्धमयस्मयम्।<br>राजतं राजतेऽत्यर्थमिन्द्रध्वजमिवोच्छ्रितम्॥ २६<br>तं भ्रामयानो बलवान् निजघान रणे गणान्।<br>रुद्राद्याः स्कन्दपर्यन्तास्तेऽभज्यन्त भयातुराः॥ २७<br>तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा गणनाथो विनायकः।<br>समाद्रवत वेगेन तुहुण्डं दनुपुङ्गवम्॥ २८ | गणेश्वरोंद्वारा चतुरङ्गिणी—रथ, हाथी, घोड़े, पैदल चार अङ्गोंवाली सेनाको मारी जाती हुई देख करके क्रुद्ध होकर तुहुण्ड तेजीसे आगे बढ़ा। ढालसे बँधे हुए लौहके बने चमचमाते भयङ्कर परिघको लेकर वह इन्द्रके ऊँचे ध्वजके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। बलशाली तुहुण्ड उस परिघको घुमाते हुए युद्धमें गणोंको मारने लगा। रुद्रसे लेकर स्कन्दतक वे सभी गण भयभीत होकर भाग चले। उस सेनाको नष्ट हुई देखकर गणनाथ विनायक दानवश्रेष्ठ तुहुण्डकी ओर तेजीसे दौड़े॥ २५-२८॥ |
| आपतन्तं गणपतिं दृष्ट्वा दैत्यो दुरात्मवान्।<br>परिघं पातयामास कुम्भपृष्ठे महाबलः॥ २९<br>विनायकस्य तत्कुम्भे परिघं वज्रभूषणम्।<br>शतधा त्वगमद् ब्रह्मन् मेरोः कूट इवाशनिः॥ ३०<br>परिघं विफलं दृष्ट्वा समायान्तं च पार्षदम्।<br>बबन्ध बाहुपाशेन राहू रक्षन् हि मातुलम्॥ ३१<br>स बद्धो बाहुपाशेन बलादाकृष्य दानवम्।<br>समाजघान शिरसि कुठारेण महोदरः॥ ३२ | महाबलशाली दुष्टात्मा दैत्यने गणपतिको सामने आते देखकर (उनके) कुम्भस्थलमें परिघका वार कर दिया। ब्रह्मन्! वज्रसे अलंकृत वह परिघ विनायकके कुम्भस्थलपर ऐसे सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मेरुके शिखरपर वज्र सैकड़ों टुकड़े हो जाता है। परिघको विफल हुआ देखकर अपने मामाकी रक्षा करते हुए राहुने आनेवाले पार्षदको अपने भुजापाशमें जकड़ लिया। भुजापाशमें बँधे हुए (होनेपर भी) उन महोदरने दानवको बलपूर्वक खींचकर उसके मस्तकपर कुठारसे वार किया॥ २९-३२॥ |
| काष्ठवत् स द्विधा भूतो निपपात धरातले।<br>तथाऽपि नात्यजद् राहुर्बलवान् दानवेश्वरः।<br>स मोक्षार्थेऽकरोद् यत्नं न शशाक च नारद॥ ३३<br>विनायकं संयतमीक्ष्य राहुणा<br>कुण्डोदरो नाम गणेश्वरोऽथ।<br>प्रगृह्य तूर्णं मुशलं महात्मा<br>राहुं दुरात्मानमसौ जघान॥ ३४ | वह काष्ठके समान दो टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर भी बलशाली दानवेश्वर राहुने उन्हें नहीं छोड़ा। नारदजी! उन्होंने छूटनेका प्रयत्न तो किया, किंतु उससे वे छूट न सके। राहुद्वारा विनायकको बँधा हुआ देखकर कुण्डोदर नामके गणेश्वरने तुरंत मुसल उठा लिया और उन महात्माने दुरात्मा राहुपर (दे) मारा। |
३३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६८ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो गणेशः कलशध्वजस्तु<br>प्रासेन राहुं हृदये बिभेद।<br>घटोदरो वै गदया जघान<br>खड्गेन रक्षोऽधिपतिः सुकेशी ॥ ३५<br>स तैश्चतुर्भिः परिताड्यमानो<br>गणाधिपं राहुरथोत्ससर्ज।<br>संत्यक्तमात्रोऽथ परश्वधेन<br>तुहुण्डमूर्द्धानमथो बिभेद ॥ ३६ | उसके बाद कलशके ध्वजवाले गणेशने प्रासद्वारा राहुके हृदयपर (भी) चोट कर दिया। घटोदरने गदासे तथा राक्षसोंके अधिपति सुकेशीने तलवारसे वार किया। उन चारोंद्वारा प्रहार किये जानेपर राहुने गणाधिपतिको छोड़ दिया। छूटते ही उन्होंने फरसेसे तुहुण्डके मस्तकको काट दिया॥ ३३–३६॥ |
| हते तुहुण्डे विमुखे च राहौ<br>गणेश्वराः क्रोधविषं मुमुक्षवः।<br>पञ्चैककालानलसन्निकाशा<br>विशन्ति सेनां दनुपुङ्गवानाम् ॥ ३७<br>तां वध्यमानां स्वचमूं समीक्ष्य<br>बलिर्बली मारुततुल्यवेगः।<br>गदां समाविध्य जघान मूर्ध्नि<br>विनायकं कुम्भतटे करे च ॥ ३८<br>कुण्डोदरं भग्नकटिं चकार<br>महोदरं शीर्णशिरःकपालम्।<br>कुम्भध्वजं चूर्णितसंधिबन्धं<br>घटोदरं चोरुविभिन्नसंधिम् ॥ ३९<br>गणाधिपांस्तान् विमुखान् स कृत्व<br>बलान्वितो वीरतरोऽसुरेन्द्रः।<br>समभ्यधावत् त्वरितो निहन्तुं<br>गणेश्वरान् स्कन्दविशाखमुख्यान् ॥ ४० | तुहुण्डके मारे जाने और राहुके पीठ दिखा देनेपर क्रोधरूपी विषको छोड़नेकी कामनावाले प्रलयकालकी अग्निके समान पाँचों गणेश्वर एक साथ दानवश्रेष्ठोंकी सेनामें पैठ गये। अपनी उस सेनाको मारी जाती हुई देखकर वायुके समान तीव्र गतिवाले बलशाली बलिने गदा लेकर विनायकके कुम्भस्थल, मस्तक एवं सूँडपर वार किया। कुण्डोदरकी कमर तोड़ दी, महोदरके सिरकी खोपड़ीको विधुन दिया, कुम्भध्वजके जोड़ोंको चूर-चूर कर डाला एवं घटोदरकी जाँघोंको तोड़ दिया। उन गणाधिपोंको पीछे भगाकर वीरश्रेष्ठ वह बलशाली असुरेन्द्र तुरंत स्कन्द, विशाख आदि मुख्य-मुख्य गणेश्वरोंको मारनेके लिये दौड़ पड़ा॥ ३७–४०॥ |
| तमापतन्तं भगवान् समीक्ष्य<br>महेश्वरः श्रेष्ठतमं गणानाम्।<br>शैलादिमामन्त्र्य वचो बभाषे<br>गच्छस्व दैत्यान् जहि वीर युद्धे ॥ ४१<br>इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन<br>वज्रं समादाय शिलादसूनुः।<br>बलिं समभ्येत्य जघान मूर्ध्नि<br>सम्मोहितः सोऽवनिमाससाद ॥ ४२<br>सम्मोहितं भ्रातृसुतं विदित्वा<br>बली कुजम्भो मुसलं प्रगृह्य।<br>सम्भ्रामयंस्तूर्णतरं स वेगात्<br>ससर्ज नन्दिं प्रति जातकोपः ॥ ४३<br>तमापतन्तं मुसलं प्रगृह्य<br>करेण तूर्णं भगवान् स नन्दी।<br>जघान तेनैव कुजम्भमाहवे<br>स प्राणहीनो निपपात भूमौ ॥ ४४ | भगवान् महेश्वरने उसे आते हुए देखकर गणोंमें सर्वश्रेष्ठ शैलादिको बुलाकर कहा—वीर! जाओ और संग्राममें दैत्योंको मारो। वृषभध्वजके ऐसा कहनेपर शिलादके पुत्र नन्दीने वज्र ले करके बलिके पास जाकर उसके सिरपर वार किया, जिससे वह अचेत होकर धरतीपर गिर पड़ा। अपने भतीजेको बेहोश जानकर बलवान् कुजम्भने क्रुद्ध हो मुसल लेकर उसे घुमाते हुए नन्दीकी ओर तेजीसे फेंका। भगवान् नन्दीने आते हुए उस मुसलको तुरंत हाथसे पकड़ लिया और उसीसे युद्धमें कुजम्भको मार दिया। वह प्राणहीन होकर भूमिपर गिर पड़ा॥ ४१–४४॥ |
| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हत्वा कुजम्भं मुसलेन नन्दी<br>वज्रेण वीरः शतशो जघान।<br>ते वध्यमाना गणनायकेन<br>दुर्योधनं वै शरणं प्रपन्नाः॥ ४५<br><br>दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन<br>वज्रप्रहारैर्निहतान् दितीशान्।<br>प्रासं समाविध्य तडित्प्रकाशं<br>नन्दिं प्रचिक्षेप हतोऽसि वै ब्रुवन्॥ ४६<br><br>तमापतन्तं कुलिशेन नन्दी<br>बिभेद गुह्यं पिशुनो यथा नरः।<br>तत्प्रासमालक्ष्य तदा निकृत्तं<br>संवर्त्य मुष्टिं गणमाससाद॥ ४७<br><br>ततोऽस्य नन्दी कुलिशेन तूर्णं<br>शिरोऽच्छिनत् तालफलप्रकाशम्।<br>हतोऽथ भूमौ निपपात वेगाद्<br>दैत्याश्च भीता विगता दिशो दश॥ ४८ | वीर नन्दीने कुजम्भको मुसलसे मारकर वज्रद्वारा सैकड़ों दानवोंको भी मार डाला। गणनायकद्वारा मारे जा रहे वे सभी दानव दुर्योधनकी शरणमें गये। दुर्योधनने गणाधिपद्वारा वज्रके आघातसे दैत्योंको मारा हुआ देखकर बिजलीके सदृश प्रकाशसे युक्त प्रास ले लिया तथा 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए उसे नन्दीकी ओर फेंका। नन्दीने आ रहे उस (प्रास)-को वज्रसे इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े काट दिया, जैसे चुगलखोर व्यक्ति गुप्त विषयका भेदन कर देता है। उसके बाद उस प्रासको विदीर्ण हुआ देख (दुर्योधन) मुट्ठी बाँधकर गण (नन्दी)-के पास पहुँचा। उसके बाद ही नन्दीने शीघ्रतासे तालके समान उसके मस्तकको कुलिशसे काट डाला। मारे जानेपर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा और भयभीत हुए सभी दैत्य तेजीसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥ ४५–४८॥ |
| ततो हतं स्वं तनयं निरीक्ष्य<br>हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम।<br>प्रगृह्य बाणासनमुग्रवेगं<br>बिभेद बाणैर्यमदण्डकल्पैः॥ ४९<br><br>गणान् सनन्दीन् वृषभध्वजांस्तान्<br>धाराभिरेवाम्बुधरास्तु शैलान्।<br>ते छाद्यमानासुरबाणजालै-<br>र्विनायकाद्या बलिनोऽपि वीराः।<br>सिंहप्रणुन्ना वृषभा यथैव<br>भयातुरा दुद्रुविरे समन्तात्॥ ५०<br><br>पराङ्मुखान् वीक्ष्य गणान् कुमारः<br>शक्त्या पृषत्कानथ वारयित्वा।<br>तूर्णं समभ्येत्य रिपुं समीक्ष्य<br>प्रगृह्य शक्त्या हृदये बिभेद॥ ५१<br><br>शक्तिनिर्भिन्नहृदयो हस्ती भूम्यां पपात ह।<br>ममार चारिपृतना जाता भूयः पराङ्मुखी॥ ५२<br><br>अमरारिबलं दृष्ट्वा भग्नं क्रुद्धा गणेश्वराः।<br>पुरतो नन्दिनं कृत्वा जिघांसन्ति स्म दानवान्॥ ५३<br><br>ते वध्यमानाः प्रमथैर्दैत्याश्चापि पराङ्मुखाः।<br>भूयो निवृत्ता बलिनः कार्त्तस्वरपुरोगमाः॥ ५४ | हस्ती (नामक असुर) अपने पुत्रको मारा गया देखकर नन्दीके समीप आ गया। उसने धनुष लेकर तीव्र वेगसे यमदण्डके समान बाणोंसे वार किया। बादल जिस प्रकार जलकी धाराओंसे पर्वतोंको ढँक लेता है, उसी प्रकार उसने नन्दीके साथ वृषभध्वजके उन गणोंको ढँक दिया। असुरके बाणसमूहसे घिरे वे विनायक आदि बलशाली वीर सिंहके द्वारा आक्रमण किये जानेपर वृषभोकी भाँति भयसे व्याकुल होकर चारों ओर भागने लगे। कुमारने गणोंको विमुख होते देख शक्तिद्वारा बाणोंको रोक दिया और तुरन्त ही शत्रुके पास पहुँचकर शक्तिसे उसके हृदयको बेध डाला। शक्तिसे हृदयके बिंध जानेपर हस्ती भूमिपर गिर पड़ा तथा मर गया और शत्रुसेना फिर पीठ दिखाकर विमुख हो गयी। दैत्यसेनाको छिन्न-भिन्न हुई देखकर कुपित हुए गणेश्वर नन्दीको आगे कर दानवोंको और मारने लगे; किंतु प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे सभी विमुख बलशाली कार्त्तस्वरादि दैत्य फिर लौट पड़े॥ ४९–५४॥ |
| तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन्।<br>नन्दिषेणो व्याघ्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान्॥ ५५ | उन्हें लौटकर आते देख वेगशाली व्याघ्रमुख नन्दिषेण भी क्रोधसे आँखें लाल कर हाँफता हुआ लौट |
| ३३२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६८ |
|---|
| तस्मिन् निवृत्ते गणपे पट्टिशाग्रकरे तदा।<br>कार्त्तस्वरो निववृते गदामादाय नारद॥ ५६<br>तमापतन्तं ज्वलनप्रकाशं<br>गणः समीक्ष्यैव महासुरेन्द्रम्।<br>तं पट्टिशं भ्राम्य जघान मूर्ध्नि<br>कार्त्तस्वरं विस्वरमुन्नदन्तम्॥ ५७<br>तस्मिन् हते भ्रातरि मातुलेये<br>पाशं समाविध्य तुरङ्गकन्धरः।<br>बबन्ध वीरः सह पट्टिशेन<br>गणेश्वरं चाप्यथ नन्दिषेणम्॥ ५८<br>नन्दिषेणं तथा बद्धं समीक्ष्य बलिनां वरः।<br>विशाखः कुपितोऽभ्येत्य शक्तिपाणिरवस्थितः॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा बलिनां श्रेष्ठः पाशपाणिरयःशिराः।<br>संयोधयामास बली विशाखं कुक्कुटध्वजम्॥ ६० | पड़ा। नारदजी! उसके बाद हाथके अग्रभागमें पट्टिश लिये हुए उस गणाधिपके लौटनेपर कार्त्तस्वर भी गदा लेकर लौट पड़ा। अग्निके समान प्रकाशवाले उस महासुरेन्द्रको आते देखकर गणपतिने पट्टिश घुमाकर उसके मस्तकपर मारा। कार्त्तस्वर चीत्कार करता हुआ मर गया। उस ममेरे भाईके मारे जानेपर वीर तुरङ्गकन्धरने पाशको लेकर पट्टिशके सहित नन्दिषेण गणेश्वरको बाँध लिया। नन्दिषेणको बँधा देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ विशाख क्रुद्ध होकर उसके पास गये और हाथमें शक्ति लिये हुए (उसके सामने) खड़े हो गये। उन्हें देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ अयःशिरा हाथमें पाश लेकर कुक्कुटध्वज विशाखके साथ संग्राम करने लगा॥ ५५—६०॥ | | विशाखं संनिरुद्धं वै दृष्ट्वायःशिरसा रणे।<br>शाखश्च नैगमेयश्च तूर्णमाद्रवतां रिपुम्॥ ६१<br>एकतो नैगमेयेन भिन्नः शक्त्या त्वयःशिराः।<br>एकतश्चैव शाखेन विशाखप्रियकाम्यया॥ ६२<br>स त्रिभिः शङ्करसुतैः पीड्यमानो जहौ रणम्।<br>ते प्राप्ताः शम्बरं तूर्णं प्रेक्ष्यमाणा गणेश्वराः॥ ६३<br>पाशं शक्त्या समाहत्य चतुर्भिः शङ्करात्मजैः।<br>जगाम विलयं तूर्णमाकाशादिव भूतलम्॥ ६४<br>पाशे निराशातां याते शम्बरः कातरेक्षणः।<br>दिशोऽथ भेजे देवर्षे कुमारः सैन्यमर्दयत्॥ ६५<br>तैर्वध्यमाना पृतना महर्षे<br>सा दानवी रुद्रसुतैर्गणैश्च।<br>विषण्णरूपा भयविह्वलाङ्गी<br>जगाम शुक्रं शरणं भयार्ता॥ ६६ | विशाखको अयःशिराके द्वारा युद्धमें घिरा हुआ देखकर शाख तथा नैगमेय नामके गण शीघ्रतासे शत्रुको ओर दौड़ पड़े। विशाखको प्रसन्न करनेकी इच्छासे एक ओरसे नैगमेयेने और दूसरी ओरसे शाखने शक्तिद्वारा अयःशिराको मारा। शंकरके तीनों पुत्रोंद्वारा ग्रस्त होनेपर उस अयःशिराने युद्ध छोड़ दिया। वे गणेश्वर शम्बरको देखकर शीघ्र ही उसके समीप पहुँचे। शम्बरने पाशको घुमाकर उनपर चलाया। शंकरके चार पुत्रोंने पाशपर वार किया, (इससे वह पाश) आकाशसे भूमिपर गिरकर नष्ट हो गया। पाशके नष्ट हो जानेपर भयभीत होकर शम्बर (इधर-उधर) दिशाओंमें भाग गया और कुमार सेनाको रौंदने लगे। महर्षे! उन रुद्र-पुत्रों एवं गणोंद्वारा मारी जा रही वह दानवी सेना दुःखी एवं भयसे व्याकुल होकर शुक्रकी शरणमें गयी॥ ६१—६६॥ |
<div align="center">॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६८॥
</div>
अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश [ ३३३
उनहत्तरवाँ अध्याय
शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि-दानव-युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ-देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव-वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य-देव और इन्द्र-जम्भ-युद्ध, मातलिक जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ-कुजम्भ-वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः स्वसैन्यमालक्ष्य निहतं प्रमथैरथ।<br>अन्धकोऽभ्येत्य शुक्रं तु इदं वचनमब्रवीत्॥ १<br>भगवंस्त्वां समाश्रित्य वयं बाधाम देवताः।<br>अथान्यानपि विप्रर्षे गन्धर्वासुरकिन्नरान्॥ २<br>तदियं पश्य भगवन् मया गुप्ता वरूथिनी।<br>अनाथेव यथा नारी प्रमथैरपि काल्यते॥ ३<br>कुजम्भाद्याश्च निहता भ्रातरो मम भार्गव।<br>अक्षयाः प्रमथाश्चामी कुरुक्षेत्रफलं यथा॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) उसके बाद अन्धकने अपनी सेनाको प्रमथोंद्वारा मारी गयी जान करके शुक्राचार्यके निकट जाकर यह वचन कहा—'भगवन्! विप्रर्षे! हम आपके ही बलपर देवता, गन्धर्व, असुर, किन्नर एवं अन्य प्राणियोंको बाधित (पराभूत) करते हैं। परंतु भगवन्! आप देखिये कि मेरे द्वारा संरक्षित (हमारी) यह सेना अनाथिनी नारी-सी होकर प्रमथोंद्वारा कालके मुखमें भेजी जा रही है। भार्गव! कुजम्भ आदि मेरे भाई तो मारे गये और ये प्रमथगण (अब तक) कुरुक्षेत्रतीर्थके फलके सदृश अक्षय बने हुए हैं॥ १—४॥ |
| तस्मात् कुरुष्व श्रेयो नो न जयेम यथा परैः।<br>जयेम च परान् युद्धे तथा त्वं कर्तुमर्हसि॥ ५<br>शुक्रोऽन्धकवचः श्रुत्वा सान्त्वयन् परमाद्भुतम्।<br>वचनं प्राह देवर्षे ब्रह्मर्षिर्दानवेश्वरम्।<br>त्वद्धितार्थं यतिष्यामि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ६<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं विद्यां संजीवनीं कविः।<br>आवर्तयामास तदा विधानेन शुचिव्रतः॥ ७<br>तस्यामावर्त्यमानायां विद्यायामसुरेश्वराः।<br>ये हताः प्रथमं युद्धे दानवास्ते समुत्थिताः॥ ८ | अतः आप हमलोगोंके लिये कल्याणका विधान करें, जिससे हमलोग शत्रुओंके द्वारा जीते न जायें और ऐसा भी उपाय करें जिससे हमलोग युद्धमें दूसरोंको जीत सकें। देवर्षे! ब्रह्मर्षि शुक्राचार्यने अन्धककी बातको सुनकर दानवेश्वरको आश्वासन देते हुए उससे कहा—मैं तुम्हारे कल्याणके लिये उद्योग करूँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। ऐसा कहकर पवित्र व्रतवाले शुक्राचार्यने विधानके अनुसार संजीवनी विद्याको प्रकट किया। उस विद्याके प्रकट होनेपर युद्धमें पहले मारे गये (सभी) असुरेश्वर और दानव जी उठे॥ ५—८॥ |
| कुजम्भादिषु दैत्येषु भूय एवोत्थितेष्वथ।<br>युद्धायाभ्यागतेष्वेव नन्दी शङ्करमब्रवीत्॥ ९<br>महादेव वचो मह्यं शृणु त्वं परमाद्भुतम्।<br>अविचिन्त्यमसह्यं च मृतानां जीवनं पुनः॥ १०<br>ये हताः प्रमथैर्दैत्या यथाशक्त्या रणाजिरे।<br>ते समुज्जीविता भूयो भार्गवेणाथ विद्यया॥ ११<br>तदिदं तैर्महादेव महत्कर्मकृतं रणे।<br>संजातं स्वल्पमेवेश शुक्रविद्याबलाश्रयात्॥ १२ | उसके बाद कुजम्भ आदि दैत्योंके फिर उठ खड़े होने तथा युद्ध करनेके लिये उपस्थित होनेपर नन्दीने शंकरसे कहा—महादेव! आप मेरा अत्यन्त अद्भुत वचन सुनिये। मरे हुए लोगोंका फिर भी जी उठना कल्पनासे परे तथा असहनीय है। संग्राममें प्रमथोंने जिन दैत्योंको बलपूर्वक मारा था, उन्हें भार्गवने संजीवनी विद्याद्वारा पुनः जीवित कर दिया। अतः हे महादेव! हे ईश! उन सभीने युद्धमें जो उत्कृष्ट कार्य किया था, वह शुक्रकी विद्याके बलसे महत्त्वहीन हो गया है—सबपर पानी फिर गया है॥ ९—१२॥ |
| ३३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
|---|
| इत्येवमुक्ते वचने नन्दिना कुलनन्दिना।<br>प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थसाधनमुत्तमम्॥ १३<br>गच्छ शुक्रं गणपते ममान्तिकमुपानय।<br>अहं तं संयमिष्यामि यथायोगं समेत्य हि॥ १४<br>इत्येवमुक्तो रुद्रेण नन्दी गणपतिस्ततः।<br>समाजगाम दैत्यानां चमूं शुक्रजिघृक्षया॥ १५<br>तं ददर्शासुरश्रेष्ठो बलवान् हयकन्धरः।<br>संरुरोध तदा मार्गं सिंहस्येव पशुर्वने॥ १६<br>समुपेत्याहनन्नन्दी वज्रेण शतपर्वणा।<br>स पपाताथ निःसंज्ञो ययौ नन्दी ततस्त्वरन्॥ १७ | कुलको आनन्द देनेवाले नन्दीके इस प्रकार कहनेपर महादेवने स्नेहपूर्वक स्वार्थसिद्ध करनेवाला उत्तम वचन कहा—गणपते! तुम जाओ और शुक्रको मेरे समीप लिवा लाओ। (फिर तो) मैं उन्हें पाकर योगक्रियासे संयमित कर दूँगा। रुद्रके ऐसा कहनेपर गणपति नन्दी शुक्राचार्यको पकड़ लानेकी कामनासे दैत्योंकी सेनामें गये। हयकन्धर नामके बलवान् श्रेष्ठ असुरने उन्हें सेनामें आते हुए देखा और जिस प्रकार साधारण पशु (दुस्साहससे) वनमें सिंहका मार्ग रोक दे, उसी प्रकार उनके मार्गको उसने रोका। नन्दीने समीप जाकर शतपर्व (वज्र)-से उसे मारा और वह अचेत होकर गिर पड़ा। उसके बाद नन्दी तुरंत वहाँसे चल दिये॥ १३—१७॥ | | ततः कुजम्भो जम्भश्च बलो वृत्रस्त्वयःशिराः।<br>पञ्च दानवशार्दूला नन्दिनं समुपाद्रवन्॥ १८<br>तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयह्लादपुरोगमाः।<br>नानाप्रहरणा युद्धे गणनाथमभिद्रवन्॥ १९<br>ततो गणनामाधिपं कुट्यमानं महाबलैः।<br>समपश्यन्त देवास्तं पितामहपुरोगमाः॥ २०<br>तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा प्राह शक्रपुरोगमान्।<br>साहाय्यं क्रियतां शम्भोरेतदन्तरमुत्तमम्॥ २१ | उसके बाद कुजम्भ, जम्भ, बल, वृत्र और अयःशिरा नामके पाँच श्रेष्ठ दानव नन्दीकी ओर दौड़े। इसी प्रकार युद्धमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवाले मय एवं ह्लाद आदि दानवश्रेष्ठोंने भी नन्दीका पीछा किया। फिर पितामहादि देवोंने महाबली दानवोंके द्वारा कूटे जा रहे गणाधिपको देखा। भगवान् ब्रह्माने उसे देखकर इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—आपलोग इस उत्तम (उपयुक्त) अवसरपर शम्भुकी सहायता करें॥ १८—२१॥ | | पितामहोक्तं वचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात्॥ २२<br>तेषामापततां वेगः प्रमथानां बले बभौ।<br>आपगानां महावेगं पतन्तीनां महार्णवे॥ २३<br>ततो हलहलाशब्दः समजायत चोभयोः।<br>बलयोर्घोरसंकाशो सुरप्रमथयोरथ॥ २४<br>तमन्तरमुपागम्य नन्दी संगृह्य वेगवान्।<br>रथाद् भार्गवमाक्रामत् सिंहः क्षुद्रं मृगं यथा॥ २५<br>तमादाय हराभ्याशमागमद् गणनायकः।<br>निपात्य रक्षिणः सर्वानथ शुक्रं न्यवेदयत्॥ २६<br>तमानीतं कविं शर्वः प्राक्षिपद् वदने प्रभुः।<br>भार्गवं त्वावृततनुं जठरे स न्यवेशयत्॥ २७<br>स शम्भुना कविश्रेष्ठो ग्रस्तो जठरमास्थितः।<br>तुष्टाव भगवन्तं तं मुनिर्वाग्भिरथादरात्॥ २८ | पितामहके कहे हुए वचनको सुनकर इन्द्र आदि देवता आकाशमार्गसे जल्दी ही शिवकी सेनामें आ गये। समुद्रमें जाती हुई नदियोंके महावेगके सदृश प्रमथोंकी सेनामें (आकाशसे) आते हुए देवताओंका वेग सुशोभित हुआ। उसके बाद प्रमथों और असुरों—दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें भीषण ‘हलहला’ शब्द उत्पन्न हुआ। उसी समय अवसर पाकर तीव्र गतिवाले नन्दी, जिस प्रकार सिंह क्षुद्र मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार भार्गवको लेकर रथसे भाग चले। गणनायक उन्हें लेकर सभी रक्षा करनेवालोंको मारते हुए शंकरके पास पहुँच गये। शुक्राचार्यको उन्होंने उनके निकट निवेदित कर दिया। समर्थ शंकरने लाये गये उन शुक्रको अपने मुखमें फेंका और अक्षुण्ण शरीरवाले भार्गवको अपने उदरमें (ज्यों-का-त्यों) रख लिया। शम्भुसे ग्रस्त होकर उनके उदरमें स्थित हुए वे मुनिश्रेष्ठ शुक्र प्रेमपूर्वक उन भगवान्की स्तुति करने लगे॥ २२—२८॥ |