वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
॥ श्रीहरिः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते त्रिविक्रमाय ॥ अथ श्रीवामनपुराणम् पहला अध्याय श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न; शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ भगवान् श्रीनारायण, मनुष्योंमें श्रेष्ठ नर, भगवती सरस्वतीदेवी और (पुराणोंके कर्ता) महर्षि व्यासजीको नमस्कार करके जय (पुराणों तथा महाभारत आदि ग्रन्थों)-का उच्चारण (पठन) करना चाहिये*। जिन्होंने बलिसे (भूमि, स्वर्ग और पाताल-इन) तीनों लोकोंके राज्यको छीनकर इन्द्रको दे दिया, उन मायामय वामनरूपधारी और लक्ष्मीको हृदयमें धारण करनेवाले विष्णुको नमस्कार है। (एक बारकी बात है कि-) वाग्मियोंमें श्रेष्ठ विद्वद्वर पुलस्त्य ऋषि अपने आश्रममें बैठे हुए थे; (वहीं) नारदजीने उनसे वामनपुराणकी कथा-(इस प्रकार) पूछी। उन्होंने कहा-ब्रह्मन्! महाप्रभावशाली भगवान् विष्णुने कैसे वामनका अवतार ग्रहण किया था, इसे आप मुझ जिज्ञासुको बतलायें। एक तो मेरी यह शङ्का है कि दैत्यवर्य प्रह्लादने विष्णुभक्त होकर भी त्रैलोक्यराज्यमाक्षिप्य बलेरिन्द्राय यो ददौ। श्रीधराय नमस्तस्मै छद्मवामनरूपिणे ॥ १ पुलस्त्यमृषिमासीनमाश्रमे वाग्विदां वरम्। नारदः परिपप्रच्छ पुराणं वामनाश्रयम् ॥ २ कथं भगवता ब्रह्मन् विष्णुना प्रभविष्णुना। वामनत्वं धृतं पूर्वं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ३ कथं च वैष्णवो भूत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः। त्रिदशैर्युयुधे सार्धमत्र मे संशयो महान् ॥ ४
- महाभारतके उल्लेखानुसार नर-नारायण ब्रह्मर्षिरूपमें विभक्त परमात्मा ही हैं, जो बादमें अर्जुन और कृष्ण हुए। ये ही नारायणीय या भागवतधर्मके प्रधान प्रचारक हैं, अतः भागवतीय ग्रन्थोंमें सर्वत्र इन दोनोंको नमस्कार किया गया है। पुराण- प्रवचनमें भी इस श्लोकको माङ्गलिक रूपमें पढ़नेकी प्राचीन प्रथा है। महाभारतका प्राचीन नाम 'जय' है; पर उपलक्षणसे पुराणोंका भी ग्रहण किया जाता है। भविष्यपुराणका वचन है- अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा। कार्त्स्नं वेदपञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥ जयेति नाम चैतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ (भविष्यपुराण १।१।५-६) अर्थात्-अठारहों पुराण, रामायण और सम्पूर्ण (वेदार्थ) पाँचवाँ वेद, जिसे महाभारत-रूपमें जानते हैं-इन सबको मनीषीलोग 'जय' कहते हैं।
२- शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ
| १० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रूयते च द्विजश्रेष्ठ दक्षस्य दुहिता सती।<br>शंकरस्य प्रिया भार्या बभूव वरवर्णिनी ॥ ५<br><br>किमर्थं सा परित्यज्य स्वशरीरं वरानना।<br>जाता हिमवतो गेहे गिरीन्द्रस्य महात्मनः ॥ ६<br><br>पुनश्च देवदेवस्य पत्नीत्वमगमच्छुभा।<br>एतन्मे संशयं छिन्धि सर्ववित् त्वं मतोऽसि मे ॥ ७<br><br>तीर्थानां चैव माहात्म्यं दानानां चैव सत्तम।<br>व्रतानां विविधानां च विधिमाचक्ष्व मे द्विज ॥ ८ | देवताओंके साथ युद्ध कैसे किया और ब्राह्मणश्रेष्ठ! दूसरी जिज्ञासा यह है कि दक्षप्रजापतिकी पुत्री भगवती सती, जो भगवान् शंकरकी प्रिय पत्नी थीं, उन श्रेष्ठ मुखवाली (सती)-ने अपना शरीर त्यागकर पर्वतराज हिमालयके घरमें किसलिये जन्म लिया? और पुनः वे कल्याणी देवदेव (महादेव)-की पत्नी कैसे बनीं? मैं मानता हूँ कि आपको सब कुछका ज्ञान है, अतः आप मेरी इस शंकाको दूर कर दें। साथ ही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ हे द्विज! तीर्थों तथा दानोंकी महिमा और विविध व्रतोंकी अनुष्ठान-विधि भी मुझे बताइये॥ १—८॥ |
| एवमुक्तो नारदेन पुलस्त्यो मुनिसत्तमः।<br>प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो नारदं तपसो निधिम् ॥ ९ | नारदजीके इस प्रकार कहनेपर मुनियोंमें मुख्य तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ तपोधन पुलस्त्यजी नारदजीसे कहने लगे॥ ९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br><br>पुराणं वामनं वक्ष्ये क्रमान्निखिलमादितः।<br>अवधानं स्थिरं कृत्वा शृणुष्व मुनिसत्तम॥ १०<br><br>पुरा हैमवती देवी मन्दरस्थं महेश्वरम्।<br>उवाच वचनं दृष्ट्वा ग्रीष्मकालमुपस्थितम् ॥ ११<br><br>ग्रीष्मः प्रवृत्तो देवेश न च ते विद्यते गृहम्।<br>यत्र वातातपौ ग्रीष्मे स्थितयोर्नौ गमिष्यतः ॥ १२<br><br>एवमुक्तो भवान्या तु शंकरो वाक्यमब्रवीत्।<br>निराश्रयोऽहं सुदति सदारण्यचरः शुभे॥ १३ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! आपसे मैं सम्पूर्ण वामनपुराणकी कथा आदिसे (अन्ततक) वर्णन करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! आप मनको स्थिर कर ध्यानसे सुनें!* प्राचीन समयमें देवी हैमवती (सती)-ने ग्रीष्म-ऋतुका आगमन देखकर मन्दर पर्वतपर बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा—देवेश! ग्रीष्म-ऋतु तो आ गयी है, परंतु आपका कोई घर नहीं है, जहाँ हम दोनों ग्रीष्मकालमें निवास करते हुए वायु और तापजनित कठिन समयको बिता सकेंगे। सतीके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर बोले—हे सुन्दर दाँतोंवाली सति! मेरा कभी कोई घर नहीं रहा। मैं तो सदा वनोंमें ही घूमता रहता हूँ॥ १०—१३॥ |
| इत्युक्ता शंकरेणाथ वृक्षच्छायासु नारद।<br>निदाघकालमनयत् समं शर्वेण सा सती ॥ १४<br><br>निदाघान्ते समुद्भूतो निर्जनाचरितोऽद्भुतः।<br>घनान्धकारिताशो वै प्रावृट्कालोऽतिरागवान्॥ १५<br><br>तं दृष्ट्वा दक्षतनुजा प्रावृट्कालमुपस्थितम्।<br>प्रोवाच वाक्यं देवेशं सती सप्रणयं तदा ॥ १६ | नारदजी! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सती-देवीने उनके साथ वृक्षोंकी छायामें (जैसे-तैसे रहकर) निदाघ (गर्मी)-का समय बिताया। फिर ग्रीष्मके अन्तमें अद्भुत वर्षा-ऋतु आ गयी, जो अत्यधिक रागको बढ़ानेवाली होती है और जिसमें प्रायः सबका आवागमन अवरुद्ध हो जाता है। (उस समय) मेघोंसे आवृत हो जानेसे दिशाएँ अन्धकारमय हो जाती हैं। उस वर्षा-ऋतुको आयी देखकर दक्ष-पुत्री सतीने प्रेमसे महादेवजीसे यह वचन कहा —॥ १४—१६॥ |
* भविष्यपुराणके प्रमाणानुसार वामनपुराणके वक्ता चतुर्मुख (ब्रह्माजी) हैं, पर यहाँ पुलस्त्यजी ऐसा उल्लेख नहीं करते कि 'पुराणं वामनं वक्ष्ये ब्रह्मण च मया श्रुतम्।' इससे प्रतीत होता है कि एतत्-सम्बन्धी श्लोक अनुपलब्ध है। मत्स्यपुराणमें भी चतुर्मुख (ब्रह्मा)-के वक्ता होनेका उल्लेख है—
'त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः। त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम् ॥'
अध्याय १ ] श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनाश्रयी प्रश्न, शिवजीका लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना ११
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विवहन्ति वाता हृदयावदारणा<br>गर्जन्त्यमी तोयधरा महेश्वर।<br>स्फुरन्ति नीलाभ्रगणेषु विद्युतो<br>वाशन्ति केकारवमेव बर्हिणः॥ १७<br><br>पतन्ति धारा गगनात् परिच्युता<br>बका बलाकाश्च सरन्ति तोयदान्।<br>कदम्बसर्जार्जुनकेतकीद्रुमाः<br>पुष्पाणि मुञ्चन्ति सुमारुताहताः॥ १८<br><br>श्रुत्वैव मेघस्य दृढं तु गर्जितं<br>त्यजन्ति हंसाश्च सरांसि तत्क्षणात्।<br>यथाश्रयान् योगिगणाः समन्तात्<br>प्रवृद्धमूलानपि संत्यजन्ति॥ १९<br><br>इमानि यूथानि वने मृगाणां<br>चरन्ति धावन्ति रमन्ति शंभो।<br>तथाचिराभाः सुतरां स्फुरन्ति<br>पश्येह नीलेषु घनेषु देव।<br>नूनं समृद्धिं सलिलस्य दृष्ट्वा<br>चरन्ति शूरास्तरुणद्रुमेषु॥ २०<br><br>उद्वृत्तवेगाः सहसैव निम्नगा<br>जाताः शशाङ्काङ्कितचारुमौले।<br>किमत्र चित्रं यदनुज्ज्वलं जनं<br>निषेव्य योषिद् भवति त्वशीला॥ २१ | महेश्वर! हृदयको विदीर्ण करनेवाली वायु वेगसे चल रही है। ये मेघ भी गर्जन कर रहे हैं, नीले मेघोंमें बिजलियाँ कौंध रही हैं और मयूरगण केकाध्वनि कर रहे हैं। आकाशसे गिरती हुई जलधाराएँ नीचे आ रही हैं। बगुले तथा बगुलोंकी पंक्तियाँ जलाशयोंमें तैर रही हैं। प्रबल वायुके झोंके खाकर कदम्ब, सर्ज, अर्जुन तथा केतकीके वृक्ष पुष्पोंको गिरा रहे हैं—वृक्षोंसे फूल झड़ रहे हैं। मेघका गम्भीर गर्जन सुनकर हंस तुरंत जलाशयोंको छोड़कर चले जा रहे हैं, जिस प्रकार योगिजन अपने सब प्रकारसे समृद्ध घरको भी छोड़ देते हैं। शिवजी! वनमें मृगोंके ये यूथ आनन्दित होकर इधर-उधर दौड़ लगाकर, खेल-कूदकर आनन्दित हो रहे हैं और देव! देखिये, नीले बादलोंमें विद्युत् भलीभाँति चमक रही है। लगता है, जलकी वृद्धिको देखकर वीरगण हरे-भरे सुपुष्ट नये वृक्षोंपर विचरण कर रहे हैं। नदियाँ सहसा उद्दाम (बड़े) वेगसे बहने लगीं हैं। चन्द्रशेखर! ऐसे उत्तेजक समयमें यदि असुवृत्त व्यक्तिके फंदेमें आकर स्त्री दुःशील हो जाती है तो इसमें क्या आश्चर्य ॥ १७—२१॥ |
| नीलैश्च मेघैश्च समावृतं नभः<br>पुष्पैश्च सर्जा मुकुलैश्च नीपाः।<br>फलैश्च बिल्वाः पयसा तथापगाः<br>पत्रैः सपद्मैश्च महासरांसि॥ २२<br><br>इतीदृशे शंकर दुःसहेऽद्भुते<br>काले सुरौद्रे ननु ते ब्रवीमि।<br>गृहं कुरुष्वात्र महाचलोत्तमे<br>सुनिर्वृता येन भवामि शंभो॥ २३<br><br>इत्थं त्रिनेत्रः श्रुतिरामणीयकं<br>श्रुत्वा वचो वाक्यमिदं बभाषे।<br>न मेऽस्ति वित्तं गृहसंचयार्थे<br>मृगारिचर्मावरणं मम प्रिये॥ २४<br><br>ममोपवीतं भुजगेश्वरः शुभे<br>कर्णेऽपि पद्मश्च तथैव पिङ्गलः।<br>केयूरमेकं मम कम्बलस्त्वहि-<br>र्द्वितीयमन्यो भुजगो धनंजयः॥ २५ | आकाश नीले बादलोंसे घिर गया है। इसी प्रकार पुष्पोंके द्वारा सर्ज, मुकुलों (कलियों)-के द्वारा नीप (कदम्ब), फलोंके द्वारा बिल्व-वृक्ष एवं जलके द्वारा नदियाँ और कमल-पुष्पों एवं कमल-पत्रोंसे बड़े-बड़े सरोवर भी ढक गये हैं। हे शंकरजी! ऐसी दुःसह, अद्भुत तथा भयंकर दशामें आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस महान् तथा उत्तम पर्वतपर गृह-निर्माण कीजिये; हे शंभो! जिससे मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँ। कानोंको प्रिय लगनेवाले सतीके इन वचनोंको सुनकर तीन नयनवाले भगवान् शंकरजी बोले—प्रिये! घर बनानेके लिये (और उसकी साज-सज्जाके लिये) मेरे पास धन नहीं है। मैं व्याघ्रके चर्ममात्रसे अपना शरीर ढकता हूँ। शुभे! (सूत्रोंके अभावमें) सर्पराज ही मेरा उपवीत (जनेऊ) बना है। पद्म और पिंगल नामके दो सर्प मेरे दोनों कानोंमें (कुण्डलका काम करते) हैं। कंबल और धनंजय नामके ये दो सर्प मेरी दोनों बाँहोंके बाजूबंद |
| १२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |
| नागस्तथैवाश्वतरो हि कङ्कणं<br>सव्येतरे तक्षक उत्तरे तथा।<br>नीलोऽपि नीलाञ्जनतुल्यवर्णः<br>श्रोणीतटे राजति सुप्रतिष्ठः॥ २६ | हैं। मेरे दाहिने और बाँयें हाथोंमें भी क्रमशः अश्वतर तथा तक्षक नाग कङ्कण बने हुए हैं। इसी प्रकार मेरी कमरमें नीलाञ्जनके वर्णवाला नील नामका सर्प अवस्थित होकर सुशोभित हो रहा है॥ २२—२६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इति वचनमथोग्रं शंकरात्सा मृडानी<br>ऋतमपि तदसत्यं श्रीमदाकर्ण्य भीता।<br>अवनितलमवेक्ष्य स्वामिनो वासकृच्छ्रात्<br>परिवदति सरोषं लज्जयोच्छ्वस्य चोष्णम्॥ २७ | पुलस्त्यजी बोले— महादेवजीसे इस प्रकार कठोर तथा ओजस्वी एवं सत्य होनेपर भी असत्य प्रतीत हो रहे वचनको सुनकर सतीजी बहुत डर गयीं और स्वामीके निवासकष्टको देखकर गरम साँस छोड़ती हुई और पृथ्वीकी ओर देखती हुई (कुछ) क्रोध और लज्जासे इस प्रकार कहने लगीं— ॥ २७॥ | | देव्युवाच<br>कथं हि देवदेवेश प्रावृट्कालो गमिष्यति।<br>वृक्षमूले स्थिताया मे सुदुःखेन वदाम्यतः॥ २८ | सतीदेवी बोलीं— देवेश! वृक्षके मूलमें दुःखपूर्वक रहकर भी मेरा वर्षाकाल कैसे व्यतीत होगा! इसीलिये तो मैं आपसे (गृहके निर्माणकी बात) कहती हूँ॥ २८॥ | | शंकर उवाच<br>घनावस्थितदेहायाः प्रावृट्कालः प्रयास्यति।<br>यथाम्बुधारा न तव निपतिष्यन्ति विग्रहे॥ २९ | शंकरजी बोले— देवि! मेघ-मण्डलके ऊपर अपने शरीरको स्थित कर तुम वर्षाकाल भलीभाँति व्यतीत कर सकोगी। इससे वर्षकी जलधाराएँ तुम्हारे शरीरपर नहीं गिर पायेंगी॥ २९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>ततो हरस्तद्धनखण्डमुन्नत-<br>मारुह्य तस्थौ सह दक्षकन्यया।<br>ततोऽभवन्नाम महेश्वरस्य<br>जीमूतकेतुस्त्विति विश्रुतं दिवि॥ ३० | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद महादेवजी दक्षकन्या सतीके साथ आकाशमें उन्नत मेघमण्डलके ऊपर चढ़कर बैठ गये। तभीसे स्वर्गमें उन महादेवजीका नाम 'जीमूतकेतु' या 'जीमूतवाहन' विख्यात हो गया॥ ३०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पहला अध्याय समाप्त हुआ॥ १॥
दूसरा अध्याय
शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ
| पुलस्त्य उवाच<br>ततस्त्रिनेत्रस्य गतः प्रावृट्कालो घनोपरि।<br>लोकानन्दकरी रम्या शरत् समभवन्मुने॥ १<br><br>त्यजन्ति नीलाम्बुधरा नभस्तलं<br>वृक्षांश्च कङ्काः सरितस्तटानि।<br>पद्माः सुगन्धं निलयानि वायसा<br>रुरुर्विषाणं कलुषं जलाशयाः॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार तीन नयनवाले भगवान् शिवका वर्षाकाल मेघोंपर बसते हुए ही व्यतीत हो गया। हे मुने! तत्पश्चात् लोगोंको आनन्द देनेवाली रमणीय शरद्-ऋतु आ गयी। इस ऋतुमें नीले मेघ आकाशको और बगुले वृक्षोंको छोड़कर अलग हो जाते हैं। नदियाँ भी तटको छोड़कर बहने लगती हैं। इसमें कमलपुष्प सुगन्ध फैलाते हैं, कौवे भी घोसलोंको छोड़ देते हैं। रुरुमृगोंके शृङ्ग गिर पड़ते हैं और जलाशय |
अध्याय २ ] शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १३ विकासमायान्ति च पङ्कजानि चन्द्रांशवो भान्ति लताः सुपुष्पाः। नन्दन्ति हृष्टान्यपि गोकुलानि सन्तश्च सन्तोषमनुव्रजन्ति ॥ ३ सरःसु पद्मा गगने च तारका जलाशयेष्वेव तथा पयांसि । सतां च चित्तं हि दिशां मुखैः समं वैमल्यमायान्ति शशाङ्ककान्तयः ॥ ४ सर्वथा स्वच्छ हो जाते हैं। इस समय कमल विकसित होते हैं, शुभ्र चन्द्रमाकी किरणें आनन्ददायिनी होकर फैल जाती हैं, लताएँ पुष्पित हो जाती हैं, गौवें हृष्ट- पुष्ट होकर आनन्दसे विहरती हैं तथा संतोंको बड़ा सुख मिलता है। तालाबोंमें कमल, गगनमें तारागण, जलाशयोंमें निर्मल जल और दिशाओंके मुखमण्डलके साथ सज्जनोंका चित्त तथा चन्द्रमाकी ज्योति भी सर्वथा स्वच्छ एवं निर्मल हो जाती है ॥ १-४ ॥ एतादृशे हरः काले मेघपृष्ठाधिवासिनीम्। सतीमादाय शैलेन्द्रं मन्दरं समुपायायौ ॥ ५ ततो मन्दरपृष्ठेऽसौ स्थितः समशिलातले। रराम शंभुर्भगवान् सत्या सह महाद्युतिः ॥ ६ ततो व्यतीते शरदि प्रतिबुद्धे च केशवे । दक्षः प्रजापतिश्रेष्ठो यष्टुमारेभत क्रतुम् ॥ ७ ऐसी शरद्-ऋतुमें शंकरजी मेघके ऊपर वास करनेवाली सतीको साथ लेकर श्रेष्ठ मन्दरपर्वतपर पहुँचे और महातेजस्वी (महाकान्तिमान्) भगवान् शंकर मन्दराचलके ऊपरी भागमें एक समतल शिलापर अवस्थित होकर सतीके साथ विश्राम करने लगे। उसके बाद शरद्-ऋतुके बीत जानेपर तथा भगवान् विष्णुके जाग जानेपर प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ दक्षने एक विशाल यज्ञका आयोजन किया। उन्होंने द्वादश आदित्यों तथा कश्यप आदि (ऋषियों)-के साथ ही इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंको भी निमन्त्रित कर उन्हें यज्ञका सदस्य बनाया ॥ ५-८॥ द्वादशैव स चादित्याञ्छक्रादींश्च सुरोत्तमान् । सकश्यपान् समामन्त्र्य सदस्यान् समचीकरत् ॥ ८ अरुन्धत्या च सहितं वसिष्ठं शंसितव्रतम्। सहानसूययात्रिं च सह धृत्या च कौशिकम् ॥ ९ अहल्या गौतमं च भरद्वाजममायया । चन्द्रया सहितं ब्रह्मन्नृषिमङ्गिरसं तथा ॥ १० आमन्त्र्य कृतवान्दक्षः सदस्यान् यज्ञसंसदि। विद्वान् गुणसंपन्नान् वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ ११ धर्मं च स समाहूय भार्ययाऽहिंसया सह । निमन्त्र्य यज्ञवाटस्य द्वारपालत्वमादिशत् ॥ १२ नारदजी! उन्होंने अरुन्धतीसहित प्रशस्तव्रतधारी वसिष्ठको, अनसूयासहित अत्रिमुनिको, धृतिके सहित कौशिक (विश्वामित्र) मुनिको, अहल्याके साथ गौतमको, अमायाके सहित भरद्वाजको और चन्द्राके साथ अङ्गिरा ऋषिको आमन्त्रित किया। विद्वान् दक्षने इन गुणसम्पन्न वेद-वेदाङ्गपारगामी विद्वान् ऋषियोंको निमन्त्रितकर उन्हें अपने यज्ञमें सदस्य बनाया। और, उन्होंने (प्रजापति दक्षने) यज्ञमें धर्मको भी उनकी पत्नी अहिंसाके साथ निमन्त्रितकर यज्ञमण्डपका द्वारपाल नियुक्त किया ॥ ९-१२ ॥ अरिष्टनेमिनं चक्रे इध्माहरणकारिणम् । भृगुं च मन्त्रसंस्कारे सम्यग् दक्षः प्रयुक्तवान् ॥ १३ तथा चन्द्रमसं देवं रोहिण्या सहितं शुचिम्। धनानामाधिपत्ये च युक्तवान् हि प्रजापतिः ॥ १४ जामातृदुहितॄंश्चैव दौहित्रांश्च प्रजापतिः । सशंकरां सतीं मुक्त्वा मखे सर्वान् न्यमन्त्रयत् ॥ १५ दक्षने अरिष्टनेमिको समिधा लानेका कार्य सौंपा और भृगुको समुचित मन्त्र-पाठमें नियुक्त किया। फिर दक्ष- प्रजापतिने रोहिणीसहित 'अर्थशुचि' चन्द्रमाको कोषाध्यक्षके पदपर नियुक्त किया। इस प्रकार दक्षप्रजापतिने केवल शंकरसहित सतीको छोड़कर अपने सभी जामाताओं, पुत्रियों एवं दौहित्रोंको यज्ञमें आमन्त्रित किया ॥ १३-१५ ॥ नारद उवाच किमथ लोकपतिना धनाध्यक्षो महेश्वरः। ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि न निमन्त्रितः ॥ १६ नारदजीने कहा (पूछा)- (पुलस्त्यजी महाराज !) लोकस्वामी दक्षने महेश्वरको सबसे बड़े, श्रेष्ठ, वरिष्ठ, सबके आदिमें रहनेवाले एवं समग्र ऐश्वर्योंके स्वामी होनेपर भी (यज्ञमें) क्यों नहीं निमन्त्रित किया ? ॥ १६ ॥
९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २ पुलस्त्य उवाच ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आद्योऽपि भगवान्छिवः। कपालीति विदित्वेशो दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १७ नारद उवाच किमर्थं देवताश्रेष्ठः शूलपाणिस्त्रिलोचनः । कपाली भगवान् जातः कर्मणा केन शंकरः ॥ १८ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्। प्रोक्तामादिपुराणे च ब्रह्मणाऽव्यक्तमूर्त्तिना ॥ १९ पुरा त्वेकार्णवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्। नष्टचन्द्रार्कनक्षत्रं प्रनष्टपवनानलम् ॥ २० अप्रतर्क्यमविज्ञेयं भावाभावविवर्जितम् । निमग्नपर्वततरू तमोभूतं सुदुर्दर्शम् ॥ २१ तस्मिन् स शेते भगवान् निद्रां वर्षसहस्रिकीम् । रात्र्यन्ते सृजते लोकान् राजसं रूपमास्थितः ॥ २२ राजसः पञ्चवदनो वेदवेदाङ्गपारगः। स्रष्टा चराचरस्यास्य जगतोऽद्भुतदर्शनः ॥ २३ तमोमयस्तथैवान्यः समुद्भूतस्त्रिलोचनः । शूलपाणिः कपर्दी च अक्षमालां च दर्शयन् ॥ २४ ततो महात्मा ह्यसृजदहंकारं सुदारुणम्। येनाक्रान्तावुभौ देवौ तावेव ब्रह्मशंकरौ ॥ २५ अहंकारावृतो रुद्रः प्रत्युवाच पितामहम्। को भवानिह संप्राप्तः केन सृष्टोऽसि मां वद ॥ २६ पितामहोऽप्यहंकारात् प्रत्युवाचाथ को भवान् । भवतो जनकः कोऽत्र जननी वा तदुच्यताम् ॥ २७ इत्यन्योन्यं पुरा ताभ्यां ब्रह्मोशाभ्यां कलिप्रिय । परिवादोऽभवत् तत्र उत्पत्तिर्भवतोऽभवत् ॥ २८ भवानप्यन्तरिक्षं हि जातमात्रस्तदोत्पतत्। धारयनतुलां वीणां कुर्वन् किलकिलाध्वनिम् ॥ २९ पुलस्त्यजीने कहा- (नारदजी !) ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, वरिष्ठ तथा अग्रगणी होनेपर भी भगवान् शिवको कपाली जानकर प्रजापति दक्षने उन्हें (यज्ञमें) निमन्त्रित नहीं किया ॥ १७ ॥ नारदजीने (फिर) पूछा- (महाराज !) देवश्रेष्ठ शूलपाणि, त्रिलोचन भगवान् शंकर किस कर्मसे और किस प्रकार कपाली हो गये, यह बतलायें ॥ १८ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- नारदजी ! आप ध्यान देकर सुनें। यह पुरानी कथा आदिपुराणमें अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके द्वारा कही गयी है। (मैं उसी प्राचीन कथाको आपसे कहता हूँ।) प्राचीन समयमें समस्त स्थावर-जङ्गमात्मक जगत् एकीभूत महासमुद्रमें निमग्न (डूबा हुआ) था। चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, वायु एवं अग्नि - किसीका भी कोई (अलग) अस्तित्व नहीं था। 'भाव' एवं 'अभाव' से रहित जगत्की उस समयकी अवस्थाका कोई ठीक- ठीक ज्ञान, विचार, तर्कना या वर्णन सम्भव नहीं है। सभी पर्वत एवं वृक्ष जलमें निमग्न थे तथा सम्पूर्ण जगत् अन्धकारसे व्याप्त एवं दुर्दशाग्रस्त था। ऐसे समयमें भगवान् विष्णु हजारों वर्षोंकी निद्रामें शयन करते हैं एवं रात्रिके अन्तमें राजस रूप ग्रहणकर वे सभी लोकोंकी रचना करते हैं ॥ १९-२२ ॥ इस चराचरात्मक जगत्का स्रष्टा भगवान् विष्णुका वह अद्भुत राजस स्वरूप पञ्चमुख एवं वेद-वेदाङ्गोंका ज्ञाता था। उसी समय तमोमय, त्रिलोचन, शूलपाणि, कपर्दी तथा रुद्राक्षमाला धारण किया हुआ एक अन्य पुरुष भी प्रकट हुआ। उसके बाद भगवान्ने अतिदारुण अहंकारकी रचना की, जिससे ब्रह्मा तथा शंकर-वे दोनों ही देवता आक्रान्त हो गये। अहंकारसे व्याप्त शिवने ब्रह्मासे कहा- तुम कौन हो और यहाँ कैसे आये हो? तुम मुझे यह भी बतलाओ कि तुम्हारी सृष्टि किसने की है ? ॥ २३-२६ ॥ (फिर) इसपर ब्रह्माने भी अहंकारसे उत्तर दिया- आप भी बतलाइये कि आप कौन हैं तथा आपके माता- पिता कौन हैं? लोक-कल्याणके लिये कलहको प्रिय माननेवाले नारदजी ! इस प्रकार प्राचीनकालमें ब्रह्मा और शंकरके बीच एक-दूसरेसे दुर्विवाद हुआ। उसी समय आपका भी प्रादुर्भाव हुआ। आप उत्पन्न होते ही अनुपम वीणा धारण किये किलकिला शब्द करते हुए अन्तरिक्षकी ओर ऊपर चले गये। इसके बाद भगवान् शिव मानो
३- शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति; वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना
अध्याय २ ] शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ १५ ततो विनिर्जितः शंभुर्मानिना पद्मयोनिना। तस्थावधोमुखो दीनो ग्राहाक्रान्तो यथा शशी ॥ ३० पराजिते लोकपतौ देवेन परमेष्ठिना। क्रोधान्धकारितं रुद्रं पञ्चमोऽथ मुखोऽब्रवीत् ॥ ३१ अहं ते प्रतिजानामि तमोमूर्ते त्रिलोचन। दिग्वासा वृषभारूढो लोकक्षयकरो भवान् ॥ ३२ इत्युक्तः शंकरः क्रुद्धो वदनं घोरचक्षुषा। निर्दग्धुकामस्त्वनिशं ददर्श भगवानजः ॥ ३३ ततस्त्रिनेत्रस्य समुद्भवन्ति वक्त्राणि पञ्चाथ सुदर्शनानि । श्वेतं च रक्तं कनकावदातं नीलं तथा पिङ्गजटं च शुभ्रम् ॥ ३४ वक्त्राणि दृष्ट्वार्कसमानि सद्यः पैतामहं वक्त्रमुवाच वाक्यम्। समाहतस्याथ जलस्य बुद्बुदा भवन्ति किं तेषु पराक्रमोऽस्ति ॥ ३५ तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तेन शंकरेण महात्मना। नखाग्रेण शिरश्छिन्नं ब्राह्मं परुषवादिनम् ॥ ३६ तच्छिन्नं शंकरस्यैव सव्ये करतलेऽपतत्। पतते न कदाचिच्च तच्छंकरकराच्छिरः ॥ ३७ अथ क्रोधावृतेनापि ब्रह्मणाद्भुतकर्मणा। सृष्टस्तु पुरुषो धीमान् कवची कुण्डली शरी ॥ ३८ धनुष्पाणिर्महाबाहुर्बाणशक्तिधरोऽव्ययः । चतुर्भुजो महातूणी आदित्यसमदर्शनः ॥ ३९ स प्राह गच्छ दुर्बुद्धे मा त्वां शूलिन् निपातये। भवान् पापसमायुक्तः पापिष्ठं को जिघांसति ॥ ४० इत्युक्तः शंकरस्तेन पुरुषेण महात्मना । त्रपायुक्तो जगामाथ रुद्रो बदरिकाश्रमम् ॥ ४१ नरनारायणस्थानं पर्वते हि हिमाश्रये। सरस्वती यत्र पुण्या स्यन्दते सरितां वरा ॥ ४२ तत्र गत्वा च तं दृष्ट्वा नारायणमुवाच ह। भिक्षां प्रयच्छ भगवन् महाकापालिकोऽस्मि भोः ॥ ४३ इत्युक्तो धर्मपुत्रस्तु रुद्रं वचनमब्रवीत् । सव्यं भुजं ताडयस्व त्रिशूलेन महेश्वर ॥ ४४ ब्रह्माद्वारा पराजित-से होकर राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान दीन एवं अधोमुख होकर खड़े हो गये ॥ २७-३० ॥ (ब्रह्माके द्वारा) लोकपति (शंकर)-के पराजित हो जानेपर क्रोधसे अन्धे हुए रुद्रसे (श्रीब्रह्माजीके) पाँचवें मुखने कहा - तमोमूर्ति त्रिलोचन ! मैं आपको जानता हूँ। आप दिगम्बर, वृषारोही एवं लोकोंको नष्ट करनेवाले (प्रलयंकारी) हैं। इसपर अजन्मा भगवान् शंकर अपने तीसरे घोर नेत्रद्वारा भस्म करनेकी इच्छासे ब्रह्माके उस मुखको एकटक देखने लगे। तदनन्तर श्रीशंकरके श्वेत, रक्त, स्वर्णिम, नील एवं पिंगल वर्णके सुन्दर पाँच मुख समुद्भूत हो गये ॥ ३१-३४ ॥ सूर्यके समान दीप्त (उन) मुखोंको देखकर पितामहके मुखने कहा - जलमें आघात करनेसे बुद्बुद तो उत्पन्न होते हैं, पर क्या उनमें कुछ शक्ति भी होती है? यह सुनकर क्रोधभरे भगवान् शंकरने ब्रह्माके कठोर भाषण करनेवाले सिरको अपने नखके अग्रभागसे काट डाला; पर वह कटा हुआ ब्रह्माजीका सिर शंकरजीके ही वाम हथेलीपर जा गिरा एवं वह कपाल श्रीशंकरके उस हथेलीसे (इस प्रकार चिपक गया कि गिरानेपर भी) किसी प्रकार न गिरा। इसपर अद्भुतकर्मी ब्रह्माजी अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उन्होंने कवच-कुण्डल एवं शर धारण करनेवाले धनुर्धर विशाल बाहुवाले एक पुरुषकी रचना की। वह अव्यय, चतुर्भुज बाण, शक्ति और भारी तरकस धारण किये था तथा सूर्यके समान तेजस्वी दीख पड़ता था ॥ ३५-३९ ॥ उस नये पुरुषने शिवजीसे कहा - दुर्बुद्धि शूलधारी शंकर ! तुम शीघ्र (यहाँसे) चले जाओ, अन्यथा मैं तुम्हें मार डालूँगा। पर तुम पापयुक्त हो; भला, इतने बड़े पापीको कौन मारना चाहेगा? जब उस महापुरुषने शंकरसे इस प्रकार कहा, तब शिवजी लज्जित होकर हिमालय पर्वतपर स्थित बदरिकाश्रमको चले गये, जहाँ नर-नारायणका स्थान है और जहाँ नदियोंमें श्रेष्ठ पवित्र सरस्वती नदी बहती है। वहाँ जाकर और उन नारायणको देखकर शंकरने कहा- भगवन् ! मैं महाकापालिक हूँ। आप मुझे भिक्षा दें। ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र (नारायण)-ने रुद्रसे कहा- महेश्वर ! तुम अपने त्रिशूलके द्वारा मेरी बायीं भुजापर ताड़ना करो ॥ ४०-४४ ॥
| १६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २ | | :--- | :--- |
| नारायणवचः श्रुत्वा त्रिशूलेन त्रिलोचनः।<br>सव्यं नारायणभुजं ताडयामास वेगवान्॥ ४५<br>त्रिशूलाभिहतान्मार्गात् तिस्रो धारा विनिर्ययुः।<br>एका गगनमाक्रम्य स्थिता ताराभिमण्डिता॥ ४६<br>द्वितीया न्यपतद् भूमौ तां जग्राह तपोधनः।<br>अत्रिस्तस्मात् समुद्भूतो दुर्वासा शंकरांशतः॥ ४७<br>तृतीया न्यपतद्धारा कपाले रौद्रदर्शने।<br>तस्माच्छिशुः समभवत् संनद्धकवचो युवा॥ ४८<br>श्यामावदातः शरचापपाणि-<br>र्गर्जन्न्यथा प्रावृषि तोयदोऽसौ।<br>इत्थं ब्रुवन् कस्य विशातयामि<br>स्कन्धाच्छिरस्तालफलं यथैव॥ ४९ | शिवजीने नारायणकी बात सुनकर त्रिशूलद्वारा बड़े वेगसे उनकी वाम भुजापर आघात किया। त्रिशूलद्वारा (भुजापर) प्रताड़ित मार्गसे जलकी तीन धाराएँ निकल पड़ीं। एक धारा आकाशमें जाकर ताराओंसे मण्डित आकाशगङ्गा हुई; दूसरी धारा पृथ्वीपर गिरी, जिसे तपोधन अत्रिने (मन्दाकिनीके रूपमें) प्राप्त किया। शंकरके उसी अंशसे दुर्वासाका प्रादुर्भाव हुआ। तीसरी धारा भयानक दिखायी पड़नेवाले कपालपर गिरी, जिससे एक शिशु उत्पन्न हुआ। वह (जन्म लेते ही) कवच बाँधे, श्यामवर्णका युवक था। उसके हाथोंमें धनुष और बाण था। फिर वह वर्षाकालमें मेघ-गर्जनके समान कहने लगा—'मैं किसके स्कन्धसे सिरको तालफलके सदृश काट गिराऊँ?'॥ ४५-४९॥ | | तं शंकरोऽभ्येत्य वचो बभाषे<br>चरं हि नारायणबाहुजातम्।<br>निपातयैनं नर दुष्टवाक्यं<br>ब्रह्मात्मजं सूर्यशतप्रकाशम्॥ ५०<br>इत्येवमुक्तः स तु शंकरेण<br>आद्यं धनुस्त्वाजगवं प्रसिद्धम्।<br>जग्राह तूणानि तथाऽक्षयाणि<br>युद्धाय वीरः स मतिं चकार॥ ५१<br>ततः प्रयुद्धौ सुभृशं महाबलौ<br>ब्रह्मात्मजो बाहुभवश्च शार्वः।<br>दिव्यं सहस्रं परिवत्सराणां<br>ततो हरोऽभ्येत्य विरञ्चिमूचे॥ ५२<br>जितस्त्वदीयः पुरुषः पितामहं<br>नरेण दिव्याद्भुतकर्मणा बली।<br>महापृषत्कैरभिपत्य ताडित-<br>स्तदद्भुतं चेह दिशो दशैव॥ ५३<br>ब्रह्मा तमीशं वचनं बभाषे<br>नेहास्य जन्मान्यजितस्य शंभो।<br>पराजितश्चेष्यतेऽसौ त्वदीयो<br>नरो मदीयः पुरुषो महात्मा॥ ५४<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्र-<br>श्चिक्षेप सूर्ये पुरुषं विरिञ्चेः।<br>नरं नरस्यैव तदा स विग्रहे<br>चिक्षेप धर्मप्रभवस्य देवः॥ ५५ | श्रीनारायणकी बाहुसे उत्पन्न उस पुरुषके समीप जाकर श्रीशंकरने कहा—हे नर! तुम सूर्यके समान प्रकाशमान, पर कटुभाषी, ब्रह्मासे उत्पन्न इस पुरुषको मार डालो। शंकरजीके ऐसा कहनेपर उस वीर नरने प्रसिद्ध आजगव नामका धनुष एवं अक्षय तूणीर ग्रहणकर युद्धका निश्चय किया। उसके बाद ब्रह्मात्मज और नारायणकी भुजासे उत्पन्न दोनों नरोंमें सहस्र दिव्य वर्षोंतक प्रबल युद्ध होता रहा। तत्पश्चात् श्रीशंकरजीने ब्रह्माके पास जाकर कहा—पितामह! यह एक अद्भुत बात है कि दिव्य एवं अद्भुत कर्मवाले (मेरे) नरने दसों दिशाओंमें व्याप्त महान् बाणोंके प्रहारसे ताडित कर आपके पुरुषको जीत लिया। ब्रह्माने उस ईशसे कहा कि इस अजितका जन्म यहाँ दूसरोंद्वारा पराजित होनेके लिये नहीं हुआ है। यदि किसीको पराजित कहा जाना अभीष्ट है तो यह तेरा नर ही है। मेरा पुरुष तो महाबली है—ऐसा कहे जानेपर श्रीशंकरजीने ब्रह्माजीके पुरुषको सूर्यमण्डलमें फेंक दिया तथा उन्हीं शंकरने उस नरको धर्मपुत्र नरके शरीरमें फेंक दिया॥ ५०-५५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥
अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १७ तीसरा अध्याय शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति; वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना पुलस्त्य उवाच ततः करतले रुद्रः कपाले दारुणे स्थिते। संतापमगमद् ब्रह्मंश्चिन्तया व्याकुलेन्द्रियः॥ १ ततः समागता रौद्रा नीलाञ्जनचयप्रभा। संरक्तमूर्द्धजा भीमा ब्रह्महत्या हरान्तिकम्॥ २ तामागतां हरो दृष्ट्वा पप्रच्छ विकरालिनीम्। काऽसि त्वमागता रौद्रे केनाप्यर्थेन तद्वद॥ ३ कपालिनमथोवाच ब्रह्महत्या सुदारुणा। ब्रह्मवध्याऽस्मि सम्प्राप्ता मां प्रतीच्छ त्रिलोचन ॥ ४ इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्महत्या विवेश ह। त्रिशूलपाणिनं रुद्रं सम्प्रतापितविग्रहम्॥ ५ ब्रह्महत्याभिभूतश्च शर्वो बदरिकाश्रमम्। आगच्छन्न ददर्शाथ नरनारायणावृषी ॥ ६ अदृष्ट्वा धर्मतनयौ चिन्ताशोकसमन्वितः । जगाम यमुनां स्नातुं साऽपि शुष्कजलाऽभवत् ॥ ७ कालिन्दीं शुष्कसलिलां निरीक्ष्य वृषकेतनः। प्लक्षजां स्नातुमगमदन्तर्द्धानं च सा गता॥ ८ ततो नु पुष्करारण्यं मागधारण्यमेव च। सैन्धवारण्यमेवासौ गत्वा स्नातो यथेच्छया ॥ ९ तथैव नैमिषारण्यं धर्मारण्यं तथेश्वरः। स्नातो नैव च सा रौद्रा ब्रह्महत्या व्यमुञ्चत ॥ १० सरित्सु तीर्थेषु तथाश्रमेषु पुण्येषु देवायतनेषु शर्वः। समायुतो योगयुतोऽपि पापा- न्नावाप मोक्षं जलध्वजोऽसौ ॥ ११ ततो जगाम निर्विण्णः शंकरः कुरुजाङ्गलम्। तत्र गत्वा ददर्शार्थ चक्रपाणिं खगध्वजम् ॥ १२ तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम्। कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हरः स्तोत्रमुदीरयत्॥ १३ पुलस्त्यजी बोले- नारदजी ! तत्पश्चात् शिवजीको अपने करतलमें भयंकर कपालके सट जानेसे बड़ी चिन्ता हुई। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं। उन्हें बड़ा संताप हुआ। उसके बाद कालिखके समान नीले रंगकी, रक्तवर्णके केशवाली भयंकर ब्रह्महत्या शंकरके निकट आयी। उस विकराल रूपवाली स्त्रीको आयी देखकर शंकरजीने पूछा - ओ भयावनी स्त्री ! यह बतलाओ कि तुम कौन हो एवं किसलिये यहाँ आयी हो ? इसपर उस अत्यन्त दारुण ब्रह्महत्याने उनसे कहा - मैं ब्रह्महत्या हूँ; हे त्रिलोचन ! आप मुझे स्वीकार करें- इसलिये यहाँ आयी हूँ ॥ १-४॥ ऐसा कहकर ब्रह्महत्या संतापसे जलते शरीरवाले त्रिशूलपाणि शिवके शरीरमें समा गयी। ब्रह्महत्यासे अभिभूत होकर श्रीशंकर बदरिकाश्रममें आये; किंतु वहाँ नर एवं नारायण ऋषियोंके उन्हें दर्शन नहीं हुए। धर्मके उन दोनों पुत्रोंको वहाँ न देखकर वे चिन्ता और शोकसे युक्त हो यमुनाजीमें स्नान करने गये; परंतु उसका जल भी सूख गया। यमुनाजीको निर्जल देखकर भगवान् शंकर सरस्वतीमें स्नान करने गये; किंतु वह भी लुप्त हो गयी ॥ ५-८ ॥ फिर पुष्करारण्य, मागधारण्य और सैन्धवारण्यमें जाकर उन्होंने बहुत समयतक स्नान किया। उसी प्रकार वे नैमिषारण्य तथा सिद्धपुरमें भी गये और स्नान किये; फिर भी उस भयंकर ब्रह्महत्याने उन्हें नहीं छोड़ा। जीमूतकेतु शंकरने अनेक नदियों, तीर्थों, आश्रमों एवं पवित्र देवायतनोंकी यात्रा की; पर योगी होनेपर भी वे पापसे मुक्ति न प्राप्त कर सके। तत्पश्चात् वे खिन्न होकर कुरुक्षेत्र गये। वहाँ जाकर उन्होंने गरुडध्वज चक्रपाणि (विष्णु) -को देखा और उन शङ्ख-चक्र- गदाधारी पुण्डरीकाक्ष (श्रीनारायण) -का दर्शनकर वे हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे- ॥ ९-१३॥
| १८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३ | | :--- | :--- |
| हर उवाच | भगवान् शंकर बोले— हे देवताओंके स्वामी! आपको नमस्कार है। गरुडध्वज! आपको प्रणाम है। शङ्ख-चक्र-गदाधारी वासुदेव! आपको नमस्कार है। निर्गुण, अनन्त एवं अतर्कनीय विधाता! आपको नमस्कार है। ज्ञानाज्ञानस्वरूप, स्वयं निराश्रय किंतु सबके आश्रय! आपको नमस्कार है। रजोगुण, सनातन, ब्रह्ममूर्ति! आपको नमस्कार है। नाथ! आपने इस सम्पूर्ण चराचर विश्वकी रचना की है। सत्त्वगुणके आश्रय लोकेश! विष्णुमूर्ति, अधोक्षज, प्रजापालक, महाबाहु, जनार्दन! आपको नमस्कार है। हे तमोमूर्ति! मैं आपके अंशभूत क्रोधसे उत्पन्न हूँ। हे महान् गुणवाले सर्वव्यापी देवेश! आपको नमस्कार है॥ १४–१८॥ | | नमस्ते देवतानाथ नमस्ते गरुडध्वज।<br>शङ्खचक्रगदापाणे वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ १४ | | | नमस्ते निर्गुणानन्त अप्रतर्क्याय वेधसे।<br>ज्ञानाज्ञान निरालम्ब सर्वालम्ब नमोऽस्तु ते॥ १५ | | | रजोयुक्त नमस्तेऽस्तु ब्रह्ममूर्ते सनातन।<br>त्वया सर्वमिदं नाथ जगत्सृष्टं चराचरम्॥ १६ | | | सत्त्वाधिष्ठित लोकेश विष्णुमूर्ते अधोक्षज।<br>प्रजापाल महाबाहो जनार्दन नमोऽस्तु ते॥ १७ | | | तमोमूर्ते अहं ह्येष त्वदंशक्रोधसंभवः।<br>गुणाभियुक्त देवेश सर्वव्यापिन् नमोऽस्तु ते॥ १८ | | | भूरियं त्वं जगन्नाथ जलाम्बरहुताशनः।<br>वायुर्बुद्धिर्मनश्चापि शर्वरी त्वं नमोऽस्तु ते॥ १९ | जगन्नाथ! आप ही पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, वायु, बुद्धि, मन एवं रात्रि हैं; आपको नमस्कार है। ईश्वर! आप ही धर्म, यज्ञ, तप, सत्य, अहिंसा, पवित्रता, सरलता, क्षमा, दान, दया, लक्ष्मी एवं ब्रह्मचर्य हैं। हे ईश! आप अङ्गोंसहित चतुर्वेदस्वरूप, वेद्य एवं वेदपारगामी हैं। आप ही उपवेद हैं तथा सभी कुछ आप ही हैं; आपको नमस्कार है। अच्युत! चक्रपाणि! आपको बारंबार नमस्कार है। मीनमूर्तिधारी (मत्स्यावतारी) माधव! आपको नमस्कार है। मैं आपको लोकमें दयालु मानता हूँ। केशव! आप मेरे शरीरमें स्थित ब्रह्महत्यासे उत्पन्न अशुभको नष्ट कर मुझे पाप-बन्धनसे मुक्त करें। बिना विचार किये कार्य करनेवाला मैं दग्ध एवं नष्ट हो गया हूँ। आप साक्षात् तीर्थ हैं, अतः आप मुझे पवित्र करें। आपको बारंबार नमस्कार है॥ १९–२३॥ | | धर्मो यज्ञस्तपः सत्यमहिंसा शौचमार्जवम्।<br>क्षमा दानं दया लक्ष्मीर्ब्रह्मचर्यं त्वमीश्वर॥ २० | | | त्वं साङ्गाश्चतुरो वेदास्त्वं वेद्यो वेदपारगः।<br>उपवेदा भवानीश सर्वोऽसि त्वं नमोऽस्तु ते॥ २१ | | | नमो नमस्तेऽच्युत चक्रपाणे<br>नमोऽस्तु ते माधव मीनमूर्ते।<br>लोके भवान् कारुणिको मतो मे<br>त्रायस्व मां केशव पापबन्धात्॥ २२ | | | ममाशुभं नाशय विग्रहस्थं<br>यद् ब्रह्महत्याऽभिभवं बभूव।<br>दग्धोऽस्मि नष्टोऽस्म्यसमीक्ष्यकारी<br>पुनीहि तीर्थोऽसि नमो नमस्ते॥ २३ | | | पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजीने कहा— भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार स्तुत होनेपर चक्रधारी भगवान् विष्णु शंकरकी ब्रह्महत्याको नष्ट करनेके लिये उनसे वचन बोले— ॥ २४॥ | | इत्थं स्तुतश्चक्रधरः शंकरेण महात्मना।<br>प्रोवाच भगवान् वाक्यं ब्रह्महत्याक्षयाय हि॥ २४ | | | हरिरुवाच | भगवान् विष्णु बोले— महेश्वर! आप ब्रह्महत्याको नष्ट करनेवाली मेरी मधुर वाणी सुनें। यह शुभप्रद एवं पुण्यको बढ़ानेवाली है। | | महेश्वर शृणुष्वेमां मम वाचं कलस्वनाम्।<br>ब्रह्महत्याक्षयकरीं शुभदां पुण्यवर्धनीम्॥ २५ | | | योऽसौ प्राङ्मण्डले पुण्ये मदंशप्रभवोऽव्ययः।<br>प्रयागे वसते नित्यं योगशायीति विश्रुतः॥ २६ | यहाँसे पूर्व प्रयागमें मेरे अंशसे उत्पन्न 'योगशायी' नामसे विख्यात देवता हैं। वे अव्यय—विकाररहित पुरुष हैं। वहाँ उनका नित्य निवास है। वहींसे उनके दक्षिण चरणसे 'वरणा' नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ नदी निकली है। वह | | चरणाद् दक्षिणात्तस्य विनिर्याता सरिद्वरा।<br>विश्रुता वरणेत्येव सर्वपापहरा शुभा॥ २७ | |
४- विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण-त्याग; शिवका क्रोध एवं उनके गणोंद्वारा दक्ष-यज्ञका विध्वंस
अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १९ सव्यादन्या द्वितीया च असिरित्येव विश्रुता। सब पापोंको हरनेवाली एवं पवित्र है। वहीं उनके वाम ते उभे तु सरिच्छ्रेष्ठे लोकपूज्ये बभूवतुः ॥ २८ पादसे 'असि' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरी नदी भी निकली है। ये दोनों नदियाँ श्रेष्ठ एवं लोकपूज्य हैं ॥ २५-२८ ॥ ताभ्यां मध्ये तु यो देशस्तत्क्षेत्रं योगशायिनः । उन दोनोंके मध्यका प्रदेश योगशायीका क्षेत्र है। त्रैलोक्यप्रवरं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम्। वह तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा सभी पापोंसे छुड़ा न तादृशोऽस्ति गगने न भूम्यां न रसातले ॥ २९ देनेवाला तीर्थ है। उसके समान अन्य कोई तीर्थ तत्रास्ति नगरी पुण्या ख्याता वाराणसी शुभा। आकाश, पृथ्वी एवं रसातलमें नहीं है। ईश! वहाँ पवित्र यस्यां हि भोगिनोऽपीश प्रयान्ति भवतो लयम् ॥ ३० शुभप्रद विख्यात वाराणसी नगरी है, जिसमें भोगी लोग विलासिनीनां रशनास्वनेन भी आपके लोकको प्राप्त करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी श्रुतिस्वनैर्ब्राह्मणपुंगवानाम् । वेदध्वनि विलासिनी स्त्रियोंकी करधनीकी ध्वनिसे शुचिस्वरत्वं गुरवो निशम्य मिश्रित होकर मङ्गल स्वरका रूप धारण करती है। उस हास्यादशासन्त मुहुर्मुहुस्तान् ॥ ३१ ध्वनिको सुनकर गुरुजन बारंबार उपहासपूर्वक उनका व्रजत्सु योषित्सु चतुष्पथेषु शासन करते हैं। जहाँ चौराहोंपर भ्रमण करनेवाली पदान्यलक्तारुणितानि दृष्ट्वा । स्त्रियोंके अलक्त (महावर) - से अरुणित चरणोंको देखकर ययौ शशी विस्मयमेव यस्यां चन्द्रमाको स्थल-पद्मिनीके चलनेका भ्रम हो जाता है किंस्वित् प्रयाता स्थलपद्मिनीयम् ॥ ३२ और जहाँ रात्रिका आरम्भ होनेपर ऊँचे-ऊँचे देवमन्दिर तुङ्गानि यस्यां सुरमन्दिराणि चन्द्रमाका (मानो) अवरोध करते हैं एवं दिनमें पवनान्दोलित रुन्धन्ति चन्द्रं रजनीमुखेषु। (हवासे फहरा रही) दीर्घ पताकाओंसे सूर्य भी छिपे दिवाऽपि सूर्यं पवनाप्लुताभि- रहते हैं ॥ २९-३३ ॥ दीर्घाभिरेवं सुपताकिकाभिः ॥ ३३ भृङ्गाश्च यस्यां शशिकान्तभित्तौ जिस (वाराणसी) - में चन्द्रकान्तमणिकी भित्तियोंपर प्रलोभ्यमानाः प्रतिबिम्बितेषु। प्रतिबिम्बित चित्रमें निर्मित स्त्रियोंके निर्मल मुख- आलेख्ययोषिद्विमलाननाब्जे- कमलोंको देखकर भ्रमर उनपर भ्रमवश लुब्ध हो जाते ष्पीयूर्भ्रमान्नैव च पुष्पकान्तरम् ॥ ३४ हैं और दूसरे पुष्पोंकी ओर नहीं जाते। हे शम्भो ! वहाँ सम्मोहनलेखनसे पराजित पुरुषोंमें तथा घरकी बावलियोंमें परिभ्रमंश्चापि पराजितेषु जलक्रीड़ाके लिये एकत्र हुई स्त्रियोंमें ही 'भ्रमण' देखा नरेषु संमोहनलेखनेन । जाता है, अन्यत्र किसीको 'भ्रमण' (चक्कर रोग) नहीं यस्यां जलक्रीडनसङ्गतासु होता*। द्यूतक्रीडा (जुआके खेल) - के पासोंके सिवाय अन्य कोई भी दूसरेके 'पाश' (बन्धन) - में नहीं डाला न स्त्रीषु शंभो गृहदीर्घिकासु ॥ ३५ जाता तथा सुरत-समयके सिवाय स्त्रियोंके साथ कोई न चैव कश्चित् परमन्दिराणि आवेगयुक्त पराक्रम नहीं करता। जहाँ हाथियोंके बन्धनमें रुणद्धि शंभो सहसा ऋतेऽक्षान्। ही पाशग्रन्थि (रस्सीकी गाँठ) होती है, उनकी मदच्युतिमें न चाबलानां तरसा पराक्रमं (मदके चूनेमें) ही 'दानच्छेद' (मदकी धाराका टूटना) एवं नर हाथियोंके यौवनागममें ही 'मान' और 'मद' करोति यस्यां सुरतं हि मुक्त्वा ॥ ३६ होते हैं, अन्यत्र नहीं; तात्पर्य यह कि दान देनेकी धारा पाशग्रन्थिर्गजेन्द्राणां दानच्छेदो मदच्युतौ । निरन्तर चलती रहती है और अभिमानी एवं मदवाले यस्यां मानमदौ पुंसां करिणां यौवनागमे ॥ ३७ लोग नहीं हैं ॥ ३४-३७ ॥
- यहाँ सर्वत्र परिसंख्यालंकार है। परिसंख्यालंकार वहाँ होता है, जहाँ किसी वस्तुका एक स्थानसे निषेध करके उसका दूसरे स्थानमें स्थापन हो। ऐसा वर्णन आनन्दरामायणके अयोध्या-वर्णनमें, कादम्बरीमें, काशीखण्डमें काशी आदिके वर्णनमें भी प्राप्त होता है।
| २० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३ |
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| प्रियदोषाः सदा यस्यां कौशिका नेतरे जनाः।<br>तारागणेऽकुलीनत्वं गद्ये वृत्तच्युतिर्विभो ॥ ३८<br><br>भूतिलुब्धा विलासिन्यो भुजंगपरिवारिताः।<br>चन्द्रभूषितदेहाश्च यस्यां त्वमिव शंकर ॥ ३९<br><br>ईदृशायां सुरेशान वाराणस्यां महाश्रमे।<br>वसते भगवाँल्लोलः सर्वपापहरो रविः ॥ ४०<br><br>दशाश्वमेधं यत्प्रोक्तं मदंशो यत्र केशवः।<br>तत्र गत्वा सुरश्रेष्ठ पापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४१ | विभो! जहाँ उलूक ही सदा दोषा (रात्रि)-प्रिय होते हैं, अन्य लोग दोषोंके प्रेमी नहीं हैं। तारागणोंमें ही अकुलीनता (पृथ्वीमें न छिपना) है, लोगोंमें कहीं अकुलीनताका नाम नहीं है; गद्यमें ही वृत्तच्युति (छन्दोभङ्ग) होती है, अन्यत्र वृत्त (चरित्र)-च्युति नहीं दीखती। शंकर! जहाँकी विलासिनियाँ आपके सदृश (भस्म) 'भूतिलुब्धा' 'भुजंग (सर्प)-परिवारिता' एवं 'चन्द्रभूषितदेहा' होती हैं। (यहाँ पक्षान्तरमें—विलासिनियोंके पक्षमें—संगतिके लिये, 'भूति' पद 'भस्म' और 'धन' के अर्थमें, 'भुजङ्ग' पद 'सर्प' एवं 'जार' के अर्थमें तथा 'चन्द्र' पद 'चन्द्राभूषण' के अर्थमें प्रयुक्त हैं।)<br>सुरेशान! इस प्रकारकी वाराणसीके महान् आश्रममें सभी पापोंको दूर करनेवाले भगवान् 'लोल' नामके सूर्य निवास करते हैं। सुरश्रेष्ठ! वहीं दशाश्वमेध नामका स्थान है तथा वहीं मेरे अंशस्वरूप केशव स्थित हैं। वहाँ जाकर आप पापसे छुटकारा प्राप्त करेंगे॥ ३८-४१॥ |
| इत्येवमुक्तो गरुडध्वजेन<br>वृषध्वजस्तं शिरसा प्रणम्य।<br>जगाम वेगाद् गरुडो यथाऽसौ<br>वाराणसीं पापविमोचनाय ॥ ४२<br>गत्वा सुपुण्यां नगरीं सुतीर्थां<br>दृष्ट्वा च लोलं सदशाश्वमेधम्।<br>स्नात्वा च तीर्थेषु विमुक्तपापः<br>स केशवं द्रष्टुमुपाजगाम ॥ ४३<br>केशवं शंकरो दृष्ट्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्।<br>त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश ब्रह्महत्या क्षयं गता ॥ ४४<br>नेदं कपालं देवेश मद्धस्तं परिमुञ्चति।<br>कारणं वेद्मि न च तदेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥ ४५ | भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर शिवजीने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर वे पाप छुड़ानेके लिये गरुड़के समान तेज वेगसे वाराणसी गये। वहाँ परमपवित्र तथा तीर्थभूत नगरीमें जाकर दशाश्वमेधके साथ 'असी' स्थानमें स्थित भगवान् लोलार्कका* दर्शन किया तथा (वहाँके) तीर्थोंमें स्नान कर और पाप-मुक्त होकर वे (वरुणासंगमपर) केशवका दर्शन करने गये। उन्होंने केशवका दर्शन करके प्रणामकर कहा—हृषीकेश! आपके प्रसादसे ब्रह्महत्या तो नष्ट हो गयी, पर देवेश! यह कपाल मेरे हाथको नहीं छोड़ रहा है। इसका कारण मैं नहीं जानता। आप ही मुझे यह बतला सकते हैं॥ ४२-४५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>महादेववचः श्रुत्वा केशवो वाक्यमब्रवीत्।<br>विद्यते कारणं रुद्र तत्सर्वं कथयामि ते ॥ ४६<br>योऽसौ ममाग्रतो दिव्यो ह्रदः पद्मोत्पलैर्युतः।<br>एष तीर्थवरः पुण्यो देवगन्धर्वपूजितः ॥ ४७<br>एतस्मिन्प्रवरे तीर्थे स्नानं शंभो समाचर।<br>स्नातमात्रस्य चाद्यैव कपालं परिमोक्ष्यति ॥ ४८ | **पुलस्त्यजी बोले—**महादेवका वचन सुनकर केशवने यह वाक्य कहा—रुद्र! इसके समस्त कारणोंको मैं तुम्हें बतलाता हूँ। मेरे सामने कमलोंसे भरा यह जो दिव्य सरोवर है, यह पवित्र तथा तीर्थोंमें श्रेष्ठ है एवं देवताओं तथा गन्धर्वोंसे पूजित है। शिवजी! आप इस परम श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करें। स्नान करनेमात्रसे आज ही यह कपाल (आपके हाथको) छोड़ देगा। इससे रुद्र! संसारमें आप |
* लोलार्कके सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये देखिये सूर्याङ्कके ३०८वें से ३१०वें पृष्ठतक प्रकाशित विवरण।
अध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यक्षकी वार्ता, एवं सतीका प्राण-त्याग २१ ततः कपाली लोके च ख्यातो रुद्र भविष्यसि । कपालमोचनेत्येवं तीर्थं चेदं भविष्यति ॥ ४९ 'कपाली' नामसे प्रसिद्ध होंगे तथा यह तीर्थ भी 'कपालमोचन' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ४६-४९ ॥ पुलस्त्य उवाच एवमुक्तः सुरेशन केशवेन महेश्वरः। कपालमोचने सस्नौ वेदोक्तविधिना मुने ॥ ५० स्नातस्य तीर्थे त्रिपुरान्तकस्य परिच्युतं हस्ततलात् कपालम्। नाम्ना बभूवाथ कपालमोचनं तत्तीर्थवर्यं भगवत्प्रसादात् ॥ ५१ पुलस्त्यजी बोले- मुने ! सुरेश्वर केशवके ऐसा कहनेपर महेश्वरने कपालमोचनतीर्थमें वेदोक्त विधिसे स्नान किया। उस तीर्थमें स्नान करते ही उनके हाथसे ब्रह्म-कपाल गिर गया। तभीसे भगवान्की कृपासे उस उत्तम तीर्थका नाम 'कपालमोचन' पड़ा* ॥ ५०-५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता, सतीका प्राण-त्याग; शिवका क्रोध एवं उनके गणोंद्वारा दक्ष-यज्ञका विध्वंस पुलस्त्य उवाच एवं कपाली संजातो देवर्षे भगवान् हरः। अनेन कारणेनासौ दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १ कपालिजायेति सतीं विज्ञायाथ प्रजापतिः। यज्ञे चार्हापि दुहिता दक्षेण न निमन्त्रिता ॥ २ एतस्मिन्नन्तरे देवीं द्रष्टुं गौतमनन्दिनी। जया जगाम शैलेन्द्रं मन्दरं चारुकन्दरम् ॥ ३ तामागतां सती दृष्ट्वा जयामेकामुवाच ह। किमर्थं विजया नागाज्जयन्ती चापराजिता ॥ ४ सा देव्या वचनं श्रुत्वा उवाच परमेश्वरीम्। गता निमन्त्रिताः सर्वा मखे मातामहस्य ताः ॥ ५ समं पित्रा गौतमेन मात्रा चैवाप्यहल्यया। अहं समागता द्रष्टुं त्वां तत्र गमनोत्सुका ॥ ६ किं त्वं न व्रजसे तत्र तथा देवो महेश्वरः। नामन्त्रिताऽसि तातेन उताहोस्वित् व्रजिष्यसि ॥ ७ गतास्तु ऋषयः सर्वे ऋषिपत्न्यः सुरास्तथा। मातृष्वसः शशाङ्कश्च सपत्नीको गतः क्रतुम् ॥ ८ चतुर्दशेषु लोकेषु जन्तवो ये चराचराः। निमन्त्रिताः क्रतौ सर्वे किं नासि त्वं निमन्त्रिता ॥ ९ पुलस्त्यजी बोले- देवर्षे ! भगवान् शिव इस प्रकार कपाली नामसे ख्यात हुए और इसी कारण वे दक्षके द्वारा निमन्त्रित नहीं हुए। प्रजापति दक्षने सतीको अपनी पुत्री होनेपर भी कपालीकी पत्नी समझकर निमन्त्रणके योग्य न मानकर उन्हें यज्ञमें नहीं बुलाया। इसी बीच देवीका दर्शन करनेके लिये गौतम-पुत्री जया सुन्दर गुफावाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गयी। जयाको वहाँ अकेली आयी देखकर सती बोलीं- विजये! जयन्ती और अपराजिता यहाँ क्यों नहीं आयीं? ॥ १-४ ॥ देवीके वचनको सुनकर जयाने उन सती परमेश्वरीसे कहा - अपने पिता गौतम और माता अहल्याके साथ वे मातामहके सत्र (यज्ञ) -में निमन्त्रित होकर चली गयी हैं। वहाँ जानेके लिये उत्सुक मैं आपसे मिलने आयी हूँ। क्या आप तथा भगवान् शिव वहाँ नहीं जा रहे हैं? क्या पिताजीने आपको नहीं बुलाया है ? अथवा आप वहाँ जायेंगी ? सभी ऋषि, ऋषि-पत्नियों तथा देवगण वहाँ गये हैं। हे मातृष्वसः (मौसी)! पत्नीके सहित शशाङ्क भी उस यज्ञमें गये हैं। चौदहों लोकोंके समस्त चराचर प्राणी उस यज्ञमें निमन्त्रित हुए हैं। क्या आप निमन्त्रित नहीं हैं? ॥ ५-९ ॥
- कपालमोचन तीर्थ काशीके परिसरमें बकरियाकुण्डसे १ मीलपर स्थित है।
२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४ पुलस्त्य उवाच जयायास्तद्वचः श्रुत्वा वज्रपातसमं सती। मन्युनाऽभिप्लुता ब्रह्मन् पञ्चत्वमगमत् ततः॥ १० जया मृतां सतीं दृष्ट्वा क्रोधशोकपरप्लुता। मुञ्चती वारि नेत्राभ्यां सस्वरं विललाप ह॥ ११ आक्रन्दितध्वनिं श्रुत्वा शूलपाणिस्त्रिलोचनः। आः किमेतदितीत्युक्त्वा जयाभ्याशमुपागतः॥ १२ आगतो ददृशे देवीं लतामिव वनस्पतेः। कृत्तां परशुना भूमौ श्लथाङ्गीं पतितां सतीम्॥ १३ देवीं निपतितां दृष्ट्वा जयां पप्रच्छ शंकरः। किमियं पतिता भूमौ निकृत्तेव लता सती॥ १४ सा शंकरवचः श्रुत्वा जया वचनमब्रवीत्। श्रुत्वा मखस्था दक्षस्य भगिन्यः पतिभिः सह ॥ १५ आदित्याद्यास्त्रिलोकेश समं शक्रादिभिः सुरैः। मातृष्वसा विपन्नेयमन्तर्दुःखेन दह्यती ॥ १६ पुलस्त्य उवाच एतच्छ्रुत्वा वचो रौद्रं रुद्रः क्रोधाप्लुतो बभौ। क्रुद्धस्य सर्वगात्रेभ्यो निश्चेरुः सहसार्चिषः॥ १७ ततः क्रोधात् त्रिनेत्रस्य गात्ररोमोद्भवा मुने। गणाः सिंहमुखा जाता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १८ गणैः परिवृतस्तस्मान्मन्दराद्धिमसाह्वयम्। गतः कनखलं तस्माद् यत्र दक्षोऽयजत् क्रतुम्॥ १९ ततो गणानामधिपो वीरभद्रो महाबलः। दिशि प्रतीच्युत्तरायां तस्थौ शूलधरो मुने॥ २० जया क्रोधाद् गदां गृह्य पूर्वदक्षिणतः स्थिता। मध्ये त्रिशूलधृक् शर्वस्तस्थौ क्रोधान्महामुने॥ २१ मृगारिवदनं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः। ऋषयो यक्षगन्धर्वाः किमिदं त्वित्यचिन्तयन् ॥ २२ ततस्तु धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान्। द्वारपालस्तदा धर्मो वीरभद्रमुपाद्रवत्॥ २३ तमापतन्तं सहसा धर्मं दृष्ट्वा गणेश्वरः। करेणैकेन जग्राह त्रिशूलं वह्निसन्निभम्॥ २४ कार्मुकं च द्वितीयेन तृतीयेनाथ मार्गणान्। चतुर्थेन गदां गृह्य धर्ममभ्यद्रवद् गणः॥ २५ पुलस्त्यजी बोले-ब्रह्मन् ! (नारदजी!) वज्रपातके समान जयाकी उस बातको सुनकर क्रोध एवं दुःखसे भरकर सतीने प्राण छोड़ दिये। सतीको मरी हुई देखकर क्रोध एवं दुःखसे भरी जया आँसू बहाते हुए जोर- जोरसे विलाप करने लगी। रोनेकी करुणध्वनि सुनकर शूलपाणि भगवान् शिव 'अरे क्या हुआ, क्या हुआ'- ऐसा कहकर उसके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने फरसेसे कटी वृक्षपर चढ़ी लताकी तरह सतीको भूमिपर मरी पड़ी देखा तो जयासे पूछा-ये सती कटी लताकी तरह भूमिपर क्यों पड़ी हुई हैं? शिवके वचनको सुनकर जया बोली-हे त्रिलोकेश्वर ! दक्षके यज्ञमें अपने- अपने पतिके साथ बहनोंका एवं इन्द्र आदि देवोंके साथ आदित्य आदिका निमन्त्रित होकर उपस्थित होना सुनकर आन्तरिक दुःख (की ज्वाला)-से दग्ध हो गयीं। इससे मेरी माताकी बहन (सती)-के प्राण निकल गये ॥ १०-१६॥ पुलस्त्यजीने कहा - जयाके इस भयंकर (अमङ्गल) वचनको सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उनके शरीरसे सहसा अग्निकी तेज ज्वालाएँ निकलने लगीं। मुने ! इसके बाद क्रोधके कारण त्रिनेत्र भगवान् शिवके शरीरके लोमोंसे सिंहके समान मुखवाले वीरभद्र आदि बहुत-से रुद्रगण उत्पन्न हो गये। अपने गणोंसे घिरे भगवान् शिव मंदरपर्वतसे हिमालयपर गये और वहाँसे कनखल चले गये, जहाँ दक्ष यज्ञ कर रहे थे। इसके बाद सभी गणोंमें अग्रणी महाबली वीरभद्र शूल धारण किये पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशामें चले गये ॥ १७-२० ॥ महामुने ! क्रोधसे गदा लेकर जया पूर्व-दक्षिण दिशा (अग्निकोण)-में खड़ी हो गयी और मध्यमें क्रोधसे भरे त्रिशूल लिये शंकर खड़े हो गये। सिंहवदन (वीरभद्र)-को देखकर इन्द्र आदि देवता, ऋषि, यक्ष एवं गन्धर्वलोग सोचने लगे कि यह क्या है? तदनन्तर द्वारपाल धर्म धनुष एवं सर्पके समान बाणोंको लेकर वीरभद्रकी ओर दौड़े। सहसा धर्मको आता हुआ देखकर गणेश्वर एक हाथमें अग्निके सदृश त्रिशूल, दूसरे हाथमें धनुष, तीसरे हाथमें बाण और चौथे हाथमें गदा लेकर उनकी ओर दौड़ पड़े ॥ २१-२५ ॥
५- दक्ष-यज्ञका विध्वंस, देवताओंका प्रताड़न, शंकरके कालरूप और रथ्यादि रूपोंमें स्वरूप-कथन
अध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता एवं सतीका प्राण-त्याग २३ ततश्चतुर्भुजं दृष्ट्वा धर्मराजो गणेश्वरम्। तस्थावष्टभुजो भूत्वा नानायुधधरोऽव्ययः ॥ २६ खड्गचर्मगदाप्रासपरश्वधवराङ्कुशैः । चापमार्गणभृत्तस्थौ हन्तुकामो गणेश्वरम्॥ २७ गणेश्वरोऽपि संक्रुद्धो हन्तुं धर्मं सनातनम्। ववर्ष मार्गणांस्तीक्ष्णान् यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २८ तावन्योन्यं महात्मानौ शरचापधरौ मुने। रुधिरारुणसिक्ताङ्गौ किंशुकाविव रेजतुः ॥ २९ ततो वरास्त्रैर्गणनायकेन जितः स धर्मः तरसा प्रसह्य। पराङ्मुखोऽभूद्विमना मुनीन्द्र स वीरभद्रः प्रविवेश यज्ञम् ॥ ३० यज्ञवाटं प्रविष्टं तं वीरभद्रं गणेश्वरम्। दृष्ट्वा तु सहसा देवा उत्तस्थुः सायुधा मुने॥ ३१ वसवोऽष्टौ महाभागा ग्रहा नव सुदारुणाः । इन्द्राद्या द्वादशादित्या रुद्रास्त्वेकादशैव हि ॥ ३२ विश्वेदेवाश्च साध्याश्च सिद्धगन्धर्वपन्नगाः । यक्षाः किंपुरुषाश्चैव खगाश्चक्रधरास्तथा ॥ ३३ राजा वैवस्वताद् वंशाद् धर्मकीर्तिस्तु विश्रुतः। सोमवंशोद्भवश्चोग्रो भोजकीर्तिर्महाभुजः ॥ ३४ दितिजा दानवाश्चान्ये येऽन्ये तत्र समागताः । ते सर्वेऽभ्यद्रवन् रौद्रं वीरभद्रमुदायुधाः ॥ ३५ तानापतत एवाशु चापबाणधरो गणः । अभिदुद्राव वेगेन सर्वानैव शरोत्करैः ॥ ३६ ते शस्त्रवर्षमतुलं गणेशाय समुत्सृजन्। गणेशोऽपि वरास्त्रैस्तान् प्रचिच्छेद बिभेद च ॥ ३७ शरैः शस्त्रैश्च सततं वध्यमाना महात्मना। वीरभद्रेण देवाद्या अवहारमकुर्वत ॥ ३८ ततो विवेश गणपो यज्ञमध्यं सुविस्तृतम्। जुह्वाना ऋषयो यत्र हवींषि प्रवितन्वते ॥ ३९ इसके बाद धर्मराजने चतुर्भुज गणेश्वरको देख और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सज्जित हो तथा आठ भुजाओंको धारणकर उनका सामना किया और गणोंके स्वामी वीरभद्रपर प्रहार करनेकी इच्छासे वे अपने हाथोंमें ढाल, तलवार, गदा, भाला, फरसा, अंकुश, धनुष एवं बाण लेकर खड़े हो गये। गणेश्वर वीरभद्र भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर धर्मको मारनेके लिये वर्षाकालिक मेघके सदृश उनके ऊपर तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा करने लगे। मुने! धनुषको लिये रुधिरसे लथपथ (अतएव) लाल शरीरवाले वे दोनों महात्मा पलाश-पुष्पके समान दीखने लगे ॥ २६-२९ ॥ मुनिराज! इसके बाद श्रेष्ठ शस्त्रास्त्रोंके कारण वीरभद्रसे पराजित होकर धर्मराज खिन्न होकर पीछे हट गये। इधर वीरभद्र यज्ञशालामें घुस गये। मुने ! गणेश्वर वीरभद्रको यज्ञमण्डपमें घुसते देखकर सहसा सभी देवता अस्त्र-शस्त्र लेकर उठ खड़े हुए। महाभाग आठों वसु, अत्यन्त दारुण नवों ग्रह, इन्द्र आदि दिक्पाल, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, विश्वेदेव, साध्यगण, सिद्ध, गन्धर्व, पन्नग, यक्ष, किंपुरुष, महाबाहु, विहंगम, चक्रधर, वैवस्वत-वंशीय प्रसिद्ध राजा धर्मकीर्ति, चन्द्रवंशीय महाबाहु, उग्र बलशाली राजा भोजकीर्ति, दैत्य-दानव तथा वहाँ आये हुए अन्य सभी लोग आयुध लेकर रौद्र वीरभद्रकी ओर दौड़ पड़े ॥ ३०-३५ ॥ धनुष-बाण धारण किये गणोंने उन देवताओंके आते ही उनपर वेगपूर्वक शस्त्रोंद्वारा आक्रमण कर दिया। इधर देवताओंने भी वीरभद्रके ऊपर अतुलनीय बाणोंकी वर्षा की। गणनायक वीरभद्रने देवताओंके अस्त्रोंको छिन्न-भिन्न कर डाला। महात्मा वीरभद्रद्वारा विविध बाणों और अस्त्रोंसे आहत होकर देवता आदि रणभूमिसे भाग चले। तब गणपति वीरभद्र सुविस्तृत यज्ञके मध्यमें प्रविष्ट हुए जहाँ मुनिगण यज्ञकुण्डमें हविकी आहुति दे रहे थे ॥ ३६-३९ ॥
२४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४ ततो महर्षयो दृष्ट्वा मृगेन्द्रवदनं गणम्। भीता होत्रं परित्यज्य जग्मुः शरणमच्युतम् ॥ ४० तानातांश्चक्रभृद् दृष्ट्वा महर्षींस्त्रस्तमानसान्। न भेतव्यमितीत्युक्त्वा समुत्तस्थौ वरायुधः ॥ ४१ समानम्य ततः शार्ङ्गं शरानग्निशिखोपमान्। मुमोच वीरभद्राय कायावरणदारणान् ॥ ४२ ते तस्य कायमासाद्य अमोघा वै हरेः शराः। निपेतुर्भुवि भग्नाशा नास्तिकादिव याचकाः ॥ ४३ शरांस्त्वमोघान्मोघत्वमापन्नान्वीक्ष्य केशवः। दिव्यैरस्त्रैर्वीरभद्रं प्रच्छादयितुमुद्यतः ॥ ४४ तानस्त्रान् वासुदेवेन प्रक्षिप्तान् गणनायकः। वारयामास शूलेन गदया मार्गणैस्तथा ॥ ४५ दृष्ट्वा विपन्नान्यस्त्राणि गदां चिक्षेप माधवः। त्रिशूलेन समाहत्य पातयामास भूतले ॥ ४६ मुशलं वीरभद्राय प्रचिक्षेप हलायुधः। लाङ्गलं च गणेशोऽपि गदया प्रत्यवारयत् ॥ ४७ मुशलं सगदं दृष्ट्वा लाङ्गलं च निवारितम्। वीरभद्राय चिक्षेप चक्रं क्रोधात् खगध्वजः ॥ ४८ तमापतन्तं शतसूर्यकल्पं सुदर्शनं वीक्ष्य गणेश्वरस्तु । शूलं परित्यज्य जग्राह चक्रं यथा मधुं मीनवपुः सुरेन्द्रः ॥ ४९ चक्रे निगीर्णे गणनायकेन क्रोधातिरक्तोऽसितचारुनेत्रः । मुरारिरभ्येत्य गणाधिपेन्द्र- मुत्क्षिप्य वेगाद् भुवि निष्पिपेण ॥ ५० हरिबाहूरुवेगेन विनिष्पिष्टस्य भूतले। सहितं रुधिरोद्गारैर्मुखाच्चक्रं विनिर्गतम् ॥ ५१ ततो निःसृतमालोक्य चक्रं कैटभनाशनः। समादाय हृषीकेशो वीरभद्रं मुमोच ह ॥ ५२ हृषीकेशेन मुक्तस्तु वीरभद्रो जटाधरम्। गत्वा निवेदयामास वासुदेवात्पराजयम् ॥ ५३ ततो जटाधरो दृष्ट्वा गणेशं शोणिताप्लुतम्। निःश्वसन्तं यथा नागं क्रोधं चक्रे तदाव्ययः ॥ ५४ तब वे महर्षि सिंहमुख वीरभद्रको देखकर भयसे हवन छोड़कर विष्णुकी शरणमें चले गये। चक्रधारी विष्णुने भयभीत महर्षियोंको दुःखी देखकर 'डरो मत' ऐसा कहकर अपने श्रेष्ठ अस्त्र लेकर खड़े हो गये और अपने शार्ङ्ग धनुषको चढ़ाकर वीरभद्रके ऊपर शरीरको विदीर्ण करनेवाले अग्निशिखाके तुल्य बाणोंकी वर्षा करने लगे। पर श्रीहरिके वे अमोघ (सफल) बाण वीरभद्रके शरीरपर पहुँचकर भी पृथ्वीपर ऐसे (यों ही व्यर्थ होकर) गिर पड़े, जैसे कि याचक नास्तिकके पाससे विफल-निराश होकर लौट जाते हैं॥ ४०-४३॥ अपने (अव्यर्थ) बाणोंको व्यर्थ होते देखकर भगवान् विष्णु पुनः वीरभद्रको दिव्य अस्त्रोंसे ढक देनेके लिये तैयार हो गये। वासुदेवके द्वारा प्रयुक्त उन बाणोंको गणश्रेष्ठ वीरभद्रने शूल, गदा और बाणोंसे रोककर विफल कर दिया। भगवान् विष्णुने अपने अस्त्रोंको नष्ट होते देखकर उसपर कौमोदकी गदा फेंकी। किंतु वीरभद्रने उसे भी अपने त्रिशूलसे काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया। हलायुधने वीरभद्रकी ओर मूसल और हल फेंका जिसे वीरभद्रने गदासे निवारित कर दिया। गदाके सहित मूसल और हलको नष्ट हुआ देखकर गरुडध्वज विष्णुने क्रोधसे वीरभद्रके ऊपर सुदर्शनचक्र चला दिया ॥ ४४-४८ ॥ गणेश्वर वीरभद्रने सैकड़ों सूर्यके सदृश सुदर्शन चक्रको अपनी ओर आते देखा तो शूलको छोड़कर चक्रको वह ऐसे निगल लिया जैसे मीनशरीरधारी विष्णु मधुदैत्यको निगल गये थे। वीरभद्रद्वारा चक्रके निगल लिये जानेपर विष्णुके सुन्दर काले नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे उसके निकट पहुँच गये और उसे वेगसे उठा लिया तथा पृथ्वीपर पटककर उसे पीसने लगे। भगवान् विष्णुकी भुजाओं और जाँघोंके प्रबल वेगसे भूतलमें पटके गये वीरभद्रके मुखसे रुधिरके फौहारेके साथ चक्र बाहर निकल आया। चक्रको मुखसे निकला देखकर भगवान् विष्णुने उसे ले लिया और वीरभद्रको छोड़ दिया ॥ ४९-५२ ॥ भगवान् विष्णुद्वारा छोड़ दिये जानेपर वीरभद्रने जटाधारी शिवके निकट जाकर वासुदेवसे हुई अपनी पराजयका वर्णन किया। फिर वीरभद्रको खूनसे लथ- पथ तथा सर्पके सदृश निःश्वास लेते देख अव्यय
अध्याय ५ ] दक्ष-यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २५ ततः क्रोधाभिभूतेन वीरभद्रोऽथ शंभुना। पूर्वोद्दिष्टे तदा स्थाने सायुधस्तु निवेशितः ॥ ५५ वीरभद्रमथादिश्य भद्रकालीं च शंकरः । विवेश क्रोधताम्राक्षो यज्ञवाटं त्रिशूलभृत् ॥ ५६ ततस्तु देवप्रवरे जटाधरे त्रिशूलपाणौ त्रिपुरान्तकारिणि। दक्षस्य यज्ञं विशति क्षयंकरे जातो ऋषीणां प्रवरो हि साध्वसः ॥ ५७ जटाधर (शंकर) - ने क्रोध किया। इसके बाद क्रोधसे तिलमिलाये शंकरने अस्त्रसहित वीरभद्रको पहले बतलाये स्थानपर बैठा दिया। वे त्रिशूलधर शंकर वीरभद्र तथा भद्रकालीको आदेश देकर क्रोधसे लाल आँखें किये यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए। त्रिपुर नामक राक्षसको मारनेवाले उन त्रिशूलपाणि त्रिपुरारि देवश्रेष्ठ जटाधरके दक्ष-यज्ञमें प्रवेश करते ही ऋषियोंमें भारी भय उत्पन्न हो गया ॥ ५३-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४॥ पाँचवाँ अध्याय दक्ष-यज्ञका विध्वंस, देवताओंका प्रताड़न, शंकरके कालरूप और राश्यादि रूपोंमें स्वरूप-कथन पुलस्त्य उवाच जटाधरं हरिर्दृष्ट्वा क्रोधादारक्तलोचनम् । तस्मात् स्थानादपाक्रम्य कुब्जाग्रेऽन्तर्हितः स्थितः ॥ १ वसवोऽष्टौ हरं दृष्ट्वा सुस्रुवुर्वेगतो मुने । सा तु जाता सरिच्छ्रेष्ठा सीता नाम सरस्वती ॥ २ एकादश तथा रुद्रास्त्रिनेत्रा वृषकेतनाः । कान्दिशीका लयं जग्मुः समभ्येत्यैव शंकरम् ॥ ३ विश्वेऽश्विनौ च साध्याश्च मरुतोऽनलभास्कराः । समासाद्य पुरोडाशं भक्षयन्तो महामुने ॥ ४ चन्द्रः सममृक्षगणैर्निशां समुपदर्शयन् । उत्पत्यारुह्य गगनं स्वमधिष्ठानमास्थितः ॥ ५ कश्यपाद्याश्च ऋषयो जपन्तः शतरुद्रियम् । पुष्पाञ्जलिपुटा भूत्वा प्रणताः संस्थिता मुने ॥ ६ असकृद् दक्षदयिता दृष्ट्वा रुद्रं बलाधिकम् । शक्रादीनां सुरेशानां कृपणं विललाप ह ॥ ७ ततः क्रोधाभिभूतेन शंकरेण महात्मना । तलप्रहारैरमरा बहवो विनिपातिताः ॥ ८ पुलस्त्यजी बोले- जटाधारी भगवान् शिवको क्रोधसे आँखें लाल किये देखकर भगवान् विष्णु उस स्थानसे हटकर कुब्जाग्र (ऋषिकेश) - में छिप गये। मुने! क्रुद्ध शिवको देखकर आठ वसु तेजीसे पिघलने लगे। इस कारण वहाँ सीता नामकी श्रेष्ठ नदी प्रवाहित हुई। वहाँ पूजाके लिये स्थित त्रिनेत्रधारी ग्यारहों रुद्र भयके मारे इधर-उधर भागते हुए शंकरके निकट जाकर उनमें ही लीन हो गये। महामुनि नारद ! शंकरको निकट आते देख विश्वेदेवगण, अश्विनीकुमार, साध्यवृन्द, वायु, अग्नि एवं सूर्य पुरोडाश खाते हुए भाग गये ॥ १-४ ॥ फिर तो ताराओंके साथ चन्द्रमा रात्रिको प्रकाशित करते हुए आकाशमें ऊपर जाकर अपने स्थानपर स्थित हो गये। इधर कश्यप आदि ऋषि शतरुद्रिय (मन्त्र)- का जप करते हुए अञ्जलिमें पुष्प लेकर विनीतभावसे खड़े हो गये। इन्द्रादि सभी देवताओंसे अधिक बली रुद्रको देखकर दक्ष-पत्नी अत्यन्त दीन होकर बार-बार करुण विलाप करने लगी। इधर क्रुद्ध भगवान् शंकरने थप्पड़ोंके प्रहारसे अनेक देवताओंको मार गिराया ॥ ५-८ ॥
२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ पादप्रहारैरपरे त्रिशूलेनापरे मुने। दृष्ट्यग्निना तथैवान्ये देवाद्याः प्रलयीकृताः ॥ ९ ततः पूषा हरं वीक्ष्य विनिघ्नन्तं सुरासुरान्। क्रोधाद् बाहू प्रसार्याथ प्रदुद्राव महेश्वरम् ॥ १० तमापतन्तं भगवान् संनिरीक्ष्य त्रिलोचनः । बाहुभ्यां प्रतिजग्राह करेणैकेन शंकरः ॥ ११ कराभ्यां प्रगृहीतस्य शंभुनांशुमतोऽपि हि। कराङ्गुलिभ्यो निश्चेरुरसृग्धाराः समन्ततः ॥ १२ ततो वेगेन महता अंशुमन्तं दिवाकरम्। भ्रामयामास सततं सिंहो मृगशिशुं यथा ॥ १३ भ्रामितस्यातिवेगेन नारदांशुमतोऽपि हि। भुजौ ह्रस्वत्वमापन्नौ त्रुटितस्नायुबन्धनौ ॥ १४ रुधिराप्लुतसर्वाङ्गमंशुमन्तं महेश्वरः । संनिरीक्ष्योत्ससर्जैनमन्यतोऽभिजगाम ह ॥ १५ ततस्तु पूषा विहसन् दशनानि विदर्शयन्। प्रोवाचैह्येहि कापालिन् पुनः पुनरथेश्वरम् ॥ १६ ततः क्रोधाभिभूतेन पूष्णो वेगेन शंभुना। मुष्टिनाहत्य दशनाः पातिता धरणीतले ॥ १७ भग्नदन्तस्तथा पूषा शोणिताभिप्लुताननः । पपात भुवि निःसंज्ञो वज्राहत इवाचलः ॥ १८ भगोऽभिवीक्ष्य पूषाणं पतितं रुधिरोक्षितम् । नेत्राभ्यां घोररूपाभ्यां वृषध्वजमवैक्षत ॥ १९ त्रिपुरघ्नस्ततः क्रुद्धस्तलेनाहत्य चक्षुषी । निपातयामास भुवि क्षोभयन् सर्वदेवताः ॥ २० ततो दिवाकराः सर्वे पुरस्कृत्य शतक्रतुम्। मरुद्भिश्च हुताशैश्च भयाज्जग्मुर्दिशो दश ॥ २१ प्रतियातेषु देवेषु प्रह्रादाद्या दितीश्वराः । नमस्कृत्य ततः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयो मुने ॥ २२ ततस्तं यज्ञवाटं तु शंकरो घोरचक्षुषा । ददर्श दग्धुं कोपेन सर्वांश्चैव सुरासुरान् ॥ २३ ततो निलिल्यिरे वीराः प्रणेमुर्दुद्रुवुस्तथा । भयादन्ये हरं दृष्ट्वा गता वैवस्वतक्षयम् ॥ २४ मुने ! शंकरने इसी प्रकार कुछ देवताओंको पैरोंके प्रहारसे, कुछको त्रिशूलसे और कुछको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निद्वारा नष्ट कर दिया। उसके बाद देवों एवं असुरोंका संहार करते हुए शंकरको देखकर पूषादेवता (अन्यतम सूर्य) क्रोधपूर्वक दोनों बाँहोंको फैलाकर शिवजीकी ओर दौड़े। त्रिलोचन शिवने उन्हें अपनी ओर आते देख एक ही हाथसे उनकी दोनों भुजाओंको पकड़ लिया। शिवद्वारा सूर्यके पकड़ी गयी दोनों भुजाओंकी अङ्गुलियोंसे चारों ओर रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी ॥ ९ - १२ ॥ फिर भगवान् शिव दिवाकर सूर्यदेवको अत्यन्त वेगसे ऐसे घुमाने लगे जैसे सिंह हिरण-शावकको घुमाता (दौड़ाता) है। नारदजी! अत्यन्त वेगसे घुमाये गये सूर्यकी भुजाओंके स्नायुबन्ध टूट गये और वे (स्नायुएँ) बहुत छोटी-नष्टप्राय हो गयीं। सूर्यके सभी अङ्गोंको रक्तसे लथपथ देखकर उन्हें छोड़कर शंकरजी दूसरी ओर चले गये। उसी समय हँसते एवं दाँत दिखलाते हुए पूषा देवता (बारह आदित्योंमेंसे एक सूर्य) कहने लगे- ओ कपालिन् ! आओ, इधर आओ ॥ १३-१६ ॥ इसपर क्रुद्ध रुद्रने वेगपूर्वक मुक्केसे मारकर पूषाके दाँतोंको धरतीपर गिरा दिया। इस प्रकार दाँत टूटने एवं रक्तसे लथपथ होकर पूषा देवता वज्रसे नष्ट हुए पर्वतके समान बेहोश होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार गिरे हुए पूषाको रुधिरसे लथपथ देखकर भग देवता (तृतीय सूर्यभेद) भयंकर नेत्रोंसे शिवजीको देखने लगे। इससे क्रुद्ध त्रिपुरान्तक शिवने सभी देवताओंको क्षुब्ध करते हुए हथेलीसे पीटकर भगकी दोनों आँखें पृथ्वीपर गिरा दीं ॥ १७-२० ॥ फिर क्या था ? सभी दसों सूर्य इन्द्रको आगे कर मरुद्गणों तथा अग्नियोंके साथ भयसे दसों दिशाओंमें भाग गये। मुने ! देवताओंके चले जानेपर प्रह्लाद आदि दैत्य महेश्वरको प्रणामकर अञ्जलि बाँधकर खड़े हो गये। इसके बाद शंकर उस यज्ञमण्डपको तथा सभी देवासुरोंको दग्ध करनेके लिये क्रोधपूर्ण घोर दृष्टिसे देखने लगे। इधर दूसरे वीर महादेवको देखकर भयसे जहाँ-तहाँ छिप गये। कुछ लोग प्रणाम करने लगे, कुछ भाग गये और कुछ तो भयसे ही सीधे यमपुरी पहुँच गये ॥ २१-२४ ॥
६- नर-नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम-दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन
| २८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५ |
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| विशाखांशमनुराधा ज्येष्ठा भौमगृहं त्विदम्।<br>द्वितीयं वृश्चिको राशिर्मेढ्रं कालस्वरूपिणः॥ ३८<br><br>मूलं पूर्वोत्तरांशश्च देवाचार्यगृहं धनुः।<br>ऊरुयुगलमीशस्य अमरर्षे प्रगीयते॥ ३९<br><br>उत्तरांशास्त्रयो ऋक्षं श्रवणं मकरो मुने।<br>धनिष्ठार्थं शनिक्षेत्रं जानुनी परमेष्ठिनः॥ ४०<br><br>धनिष्ठार्धं शतभिषा प्रौष्ठपद्यांशकत्रयम्।<br>सौरेः सद्मापरमिदं कुम्भो जङ्घे च विश्रुते॥ ४१ | विशाखाका एक चरण, सम्पूर्ण अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्र, मङ्गलका द्वितीय क्षेत्र वृश्चिक राशि कालरूपी महादेवका उपस्थ है। सम्पूर्ण मूल, पूरा पूर्वाषाढ और उत्तराषाढकी प्रथम चरणवाली धनु राशि जो बृहस्पतिका क्षेत्र है, महेश्वरके दोनों ऊरु हैं। मुने! उत्तराषाढ़के शेष तीन चरण, सम्पूर्ण श्रवण नक्षत्र और धनिष्ठाके दो पूर्व चरणकी मकर राशि शनिका क्षेत्र और परमेष्ठी महेश्वरके दोनों घुटने हैं। धनिष्ठाके दो चरण, सम्पूर्ण शतभिष और पूर्वभाद्रपदके तीन चरणवाली कुम्भ राशि शनिका द्वितीय गृह और शिवकी दो जंघाएँ हैं॥ ३८—४१॥ | | प्रौष्ठपद्यांशमेकं तु उत्तरा रेवती तथा।<br>द्वितीयं जीवसदनं मीनस्तु चरणावुभौ॥ ४२<br><br>एवं कृत्वा कालरूपं त्रिनेत्रो<br>यज्ञं क्रोधान्मार्गणैराजघान।<br>विद्धश्चासौ वेदनाबुद्धिमुक्तः<br>खे संतस्थौ तारकाभिश्चिताङ्गः॥ ४३ | पूर्वाभाद्रपदके शेष एक चरण, सम्पूर्ण उत्तरभाद्रपद और सम्पूर्ण रेवती नक्षत्रोंवाला बृहस्पतिका द्वितीय क्षेत्र एवं मीन राशि उनके दो चरण हैं। इस प्रकार कालरूप धारणकर शिवने क्रोधपूर्वक हरणिरूपधारी यज्ञको बाणोंसे मारा। उसके बाद बाणोंसे विद्ध होकर, किंतु वेदनाकी अनुभूति न करता हुआ, वह यज्ञ ताराओंसे घिरे शरीरवाला होकर आकाशमें स्थित हो गया॥ ४२-४३॥ | | नारद उवाच<br>राशयो गदिता ब्रह्मंस्त्वया द्वादश वै मम।<br>तेषां विशेषतो ब्रूहि लक्षणानि स्वरूपतः॥ ४४ | नारदजीने कहा— ब्रह्मन्! आपने मुझसे बारहौं राशियोंका वर्णन किया। अब विशेषरूपसे उनके स्वरूपके अनुसार लक्षणोंको बतलायें॥ ४४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>स्वरूपं तव वक्ष्यामि राशीनां शृणु नारद।<br>यादृशा यत्र संचारा यस्मिन् स्थाने वसन्ति च॥ ४५<br><br>मेषः समानमूर्तिश्च अजाविकधनादिषु।<br>संचारस्थानमेवास्य धान्यरत्नाकरादिषु॥ ४६<br><br>नवशाद्वलसंछन्नवसुधायां च सर्वशः।<br>नित्यं चरति फुल्लेषु सरसां पुलिनेषु च॥ ४७<br><br>वृषः सदृशरूपो हि चरते गोकुलादिषु।<br>तस्याधिवासभूमिस्तु कृषीवलधराश्रयः॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आपको मैं राशियोंका स्वरूप बतलाता हूँ; सुनिये। वे जैसी हैं तथा जहाँ संचार और निवास करती हैं वह सभी वर्णित करता हूँ। मेष राशि भेड़के समान आकारवाली है। बकरी, भेड़, धन-धान्य एवं रत्नाकरादि इसके संचार-स्थान हैं तथा नवदूर्वासे आच्छादित समग्र पृथ्वी एवं पुष्पित वनस्पतियोंसे युक्त सरोवरोंके पुलिनोंमें यह नित्य संचरण करती है। वृषभके समान रूपयुक्त वृषराशि गोकुलादिमें विचरण करती है तथा कृषकोंकी भूमि इसका निवास-स्थान है॥ ४५—४८॥ | | स्त्रीपुंसयोः समं रूपं शय्यासनपरिग्रहः।<br>वीणावाद्यधृङ् मिथुनं गीतनर्तकशिल्पिषु॥ ४९<br><br>स्थितः क्रीडारतिर्नित्यं विहारावनिरेस्य तु।<br>मिथुनं नाम विख्यातं राशिर्द्वैधात्मकः स्थितः॥ ५० | मिथुन राशि एक स्त्री और एक पुरुषके साथ-साथ रहनेके समान रूपवाली है। यह शय्या और आसनोंपर स्थित है। पुरुष-स्त्रीके हाथोंमें वीणा एवं (अन्य) वाद्य हैं। इस राशिका संचरण गानेवालों, नाचनेवालों एवं शिल्पियोंमें होता है। इस द्विखभाव राशिको मिथुन कहते हैं। इस राशिका निवास क्रीडास्थल एवं |