वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
1361
॥ ॐ ॥
संक्षिप्त
श्रीवराहपुराण
( सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी )
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० २०७४ तेरहवाँ पुनर्मुद्रण ३,०००
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॥ श्रीहरिः ॥
निवेदन
पुराण भारतकी सर्वोत्कृष्ट निधि हैं। प्राचीनकालसे ही भारतवर्षमें पुराणोंका बड़े आदरके साथ पठन-पाठन, श्रवण-मनन और अनुशीलन होता आया है। भारतीय मानसमें भगवद्भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार तथा धर्मपरायणताको दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित करने एवं मानव-जीवनके अन्तिम लक्ष्य—'भगवत्प्राप्ति' अथवा 'मोक्ष्य-साधन'की ओर प्रेरित करनेका श्रेय वस्तुतः पुराणोंको ही है। वेदादि शास्त्रोंके गूढ़तम ज्ञान-तत्त्वों एवं रहस्योंको सरल, रोचक एवं सुमधुर आख्यान-शैलीमें सर्वसाधारणके लिये सुलभ (उपलब्ध) करा देना ही पुराणोंकी अपूर्व विशेषता है। इसीलिये पुराणोंको भारतीय वाङ्मयमें विशिष्ट सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त है।
पुराणोंकी ऐसी विलक्षण महिमा और महत्त्वको सादर स्वीकार करते हुए गीताप्रेसने 'कल्याण'के विशेषाङ्कोंके माध्यमसे समय-समयपर अनेक पुराणोंका सरल हिन्दी-अनुवाद जनहितमें प्रकाशित किया है। 'संक्षिप्त वराहपुराणाङ्क' भी उनमेंसे एक है। यह 'कल्याण' के ५१वें वर्षके विशेषाङ्कके रूपमें जनवरी १९७७ ई०में प्रकाशित किया गया था। 'वराहपुराण'की गणना परम सात्त्विक पुराणोंमें की जाती है। इसकी कथाएँ बड़ी ज्ञानप्रद, रोचक और कल्याणकारी हैं। भगवत्परायणता, ज्ञान, वैराग्य, साधना एवं अध्यात्मके विकासके लिये इसका अनुशीलन बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है। इसमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ-यजन श्राद्ध, तर्पण, दान और अनुष्ठान आदिका शिक्षाप्रद और आत्मकल्याणकारी वर्णन है। भगवान् श्रीहरि (श्रीमन्नारायण)-की महिमा, पूजन-विधान, हिमालयकी पुत्रीके रूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शङ्करके साथ उनके विवाहकी रोचक कथा इसमें विस्तारसे वर्णित है। इसके अतिरिक्त इसमें वराह-क्षेत्रवर्ती आदित्य-तीर्थोंका वर्णन, भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाओंके प्रभावसे मथुरामण्डल और व्रजके समस्त तीर्थोंकी महिमा और उनके प्रभावका भी विशद तथा रोचक वर्णन है।
अमावस्या-तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी उत्पत्तिका कथन एवं पूर्णिमा-तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन, मोक्षदायिनी पवित्र नदियोंकी उत्पत्ति, प्रभाव तथा माहात्म्यादि भी इसमें वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त इसमें स्नान, दान, तर्पण आदिकी महिमाके साथ पुण्यकर्मों तथा पापकर्मोंके फलोंका विस्तृत वर्णन है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि त्रिदेवोंकी महिमासहित उनके दिव्य लोकों—ब्रह्मलोक, शिवलोक और वैकुण्ठ आदिका भी इसमें बड़ा ही सुन्दर वर्णन है। साथ ही पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप स्वर्गादि दिव्य लोकोंकी प्राप्ति और पापकर्मोंके परिणाम-स्वरूप भयावह नरकोंकी यातनाका भी वर्णन है। जो मनुष्यको अच्छे और बुरे कर्मोंके करने या उनसे बचनेकी प्रेरणा देता है। संक्षेपमें इसकी सभी कथाएँ अत्यन्त ज्ञानप्रद, रोचक और पुण्यप्रद कर्मोंकी ओर प्रेरित करनेवाली एवं पापकर्मोंसे विरत करनेवाली हैं। वराहपुराणकी फलश्रुति भी इसमें महत्त्वपूर्ण है।
हमारा विशेष प्रेमानुरोध है कि कल्याणकामी सभी महानुभावों, अध्यात्मचेता साधकों और समस्त श्रद्धालुजनोंको इसके अधिकाधिक अध्ययन-अनुशीलनद्वारा विशिष्ट पारमार्थिक लाभ उठाना चाहिये।
—प्रकाशक
विषय-सूची
| क्रम | पृष्ठ-संख्या | क्रम | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १-भगवान् वराहके प्रति पृथ्वीका प्रश्न और भगवान्के उदरमें विश्वब्रह्माण्डका दर्शनकर भयभीत हुई पृथ्वीद्वारा उनकी स्तुति................ | ९ | उनका ब्रह्ममें लीन होना .............................. | ४८ |
| २-विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमें दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति ........................ | ११ | १५-महातपाका उपाख्यान ................................ | ५० |
| ३-देवर्षि नारदद्वारा अपने पूर्वजन्मवर्णनके प्रसङ्गमें 'ब्रह्मपारस्तोत्र' का कथन............................ | १५ | १६-प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन ....... | ५१ |
| ४-महामुनि कपिल और जैगीषव्यद्वारा राजा अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका प्रत्यक्ष दर्शन कराना ................................. | १७ | १७-अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और उनके द्वारा भगवत्स्तुति ...................................... | ५२ |
| ५-रैभ्य मुनि और राजा वसुका देवगुरु बृहस्पतिसे संवाद तथा राजा अश्वशिराद्वारा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणका स्तवन एवं उनके श्रीविग्रहमें लीन होना...................................................... | २० | १८-गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, द्वितीया तिथि एवं रुद्रद्वारा जलमें तपस्या, दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष ........................................... | ५४ |
| ६-पुण्डरीकाक्षपार-स्तोत्र, राजा वसुके जन्मान्तरका प्रसङ्ग तथा उनका भगवान् श्रीहरिमें लय होना ... | २३ | १९-तृतीया तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें हिमालयकी पुत्रीरूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शंकरके साथ उनके विवाहकी कथा ..... | ५८ |
| ७-रैभ्य-सनत्कुमार-संवाद, गयामें पिण्डदानकी महिमा एवं रैभ्य मुनिका ऊर्ध्वलोकमें गमन ....... | २६ | २०-गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य ...................................... | ६१ |
| ८-भगवान्का मत्स्यावतार तथा उनकी देवताओंद्वारा स्तुति .................................... | ३० | २१-सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा .......................................... | ६३ |
| ९-राजा दुर्जयके चरित्र-वर्णनके प्रसङ्गमें मुनिवर गौरमुखके आश्रमकी शोभाका वर्णन ................ | ३२ | २२-षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा ............................ | ६५ |
| १०-राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग .................................... | ३५ | २३-सप्तमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें आदित्योंकी उत्पत्तिकी कथा .......................................... | ६८ |
| ११-राजा सुप्रतीककृत भगवान्की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना .............................. | ४० | २४-अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा .......................................... | ६९ |
| १२-पितरोंका परिचय, श्राद्धके समयका निरूपण तथा पितृगीत.......................................... | ४२ | २५-नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा ........................................... | ७१ |
| १३-श्राद्ध-कल्प.......................................... | ४५ | २६-दशमी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें दिशाओंकी उत्पत्तिकी कथा .......................................... | ७४ |
| १४-गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन तथा | २७-एकादशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें कुबेरकी उत्पत्ति-कथा ........................................... | ७४ | |
| २८-द्वादशी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके अधिष्ठाता श्रीभगवान् विष्णुकी उत्पत्ति-कथा ..... | ७५ | ||
| २९-त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन ........ | ७६ | ||
| ३०-चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी |
(५)
| क्रम | पृष्ठ-संख्या | क्रम | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| उत्पत्तिका वर्णन ................. | ७८ | ६३-कलियुगका वर्णन ................. | १२५ |
| ३१-अमावास्या तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी<br>उत्पत्तिका कथन ................. | ८१ | ६४-प्रकृति और पुरुषका निर्णय ................. | १२८ |
| ३२-पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी<br>चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन ................. | ८१ | ६५-वैराज-वृत्तान्त ................. | १२९ |
| ३३-प्राचीन इतिहासका वर्णन ................. | ८३ | ६६-भुवन-कोशका वर्णन ................. | १३२ |
| ३४-आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग, नारायण-मन्त्रश्रवणसे<br>बाघका शापसे उद्धार ................. | ८४ | ६७-जम्बूद्वीपसे सम्बन्धित सुमेरुपर्वतका वर्णन ........... | १३४ |
| ३५-सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग ................. | ८७ | ६८-आठ दिक्पालोंकी पुरियोंका वर्णन ................. | १३७ |
| ३६-मत्स्य-द्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन ...... | ८८ | ६९-मेरुपर्वतका वर्णन ................. | १३७ |
| ३७-कूर्म-द्वादशीव्रत ................. | ९३ | ७०-मन्दर आदि पर्वतोंका वर्णन ................. | १३९ |
| ३८-वराह-द्वादशीव्रत ................. | ९४ | ७१-मेरुपर्वतके जलाशय ................. | १३९ |
| ३९-नृसिंह-द्वादशीव्रत ................. | ९६ | ७२-मेरुपर्वतकी नदियाँ ................. | १४१ |
| ४०-वामन-द्वादशीव्रत ................. | ९७ | ७३-देवपर्वतोंपरके देव-स्थानोंका परिचय.................. | १४२ |
| ४१-जामदग्न्य-द्वादशीव्रत ................. | ९८ | ७४-नदियोंका अवतरण ................. | १४३ |
| ४२-श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत ................. | ९९ | ७५-नैषध एवं रम्यकवर्षोंके कुलपर्वत, जनपद<br>और नदियाँ ................. | १४४ |
| ४३-बुद्ध-द्वादशीव्रत ................. | १०० | ७६-भारतवर्षके नौ खण्डोंका वर्णन ................. | १४६ |
| ४४-कल्कि-द्वादशीव्रत ................. | १०२ | ७७-शाक एवं कुशद्वीपोंका वर्णन ................. | १४७ |
| ४५-पद्मनाभ-द्वादशीव्रत ................. | १०३ | ७८-क्रौञ्च और शाल्मलिद्वीपका वर्णन ................. | १४८ |
| ४६-धरणीव्रत ................. | १०५ | ७९-त्रिशक्ति-माहात्म्य और सृष्टिदेवीका आख्यान ....... | १४९ |
| ४७-अगस्त्य-गीता ................. | १०७ | ८०-त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी'<br>देवियोंका वर्णन ................. | १५१ |
| ४८-अगस्त्य-गीतामें पशुपालकका चरित्र ................. | १०८ | ८१-महिषासुरकी मन्त्रणा और देवासुर-संग्राम ........... | १५३ |
| ४९-उत्तम पति प्राप्त करनेका साधनस्वरूप व्रत .......... | १०९ | ८२-महिषासुरका वध ................. | १५५ |
| ५०-शुभ-व्रत ................. | ११० | ८३-'त्रिशक्तिमाहात्म्य'में रौद्रीव्रत ................. | १५८ |
| ५१-धन्य-व्रत ................. | ११२ | ८४-रुद्रके माहात्म्यका वर्णन ................. | १६१ |
| ५२-कान्ति-व्रत ................. | ११३ | ८५-सत्यतपाका शेष वृत्तान्त ................. | १६२ |
| ५३-सौभाग्य-व्रत ................. | ११४ | ८६-तिलधेनुका माहात्म्य ................. | १६४ |
| ५४-अविघ्नव्रत ................. | ११५ | ८७-जलधेनु एवं रसधेनु-दानकी विधि ................. | १६८ |
| ५५-शान्ति-व्रत ................. | ११६ | ८८-गुड़धेनु-दानकी विधि ................. | १६९ |
| ५६-काम-व्रत ................. | ११६ | ८९-शर्करा तथा मधुधेनुके दानकी विधि ................. | १७० |
| ५७-आरोग्य-व्रत ................. | ११७ | ९०-'क्षीरधेनु' तथा 'दधिधेनु'-दानकी विधि ........... | १७२ |
| ५८-पुत्रप्राप्ति-व्रत ................. | ११९ | ९१-'नवनीतधेनु' तथा 'लवणधेनु' की दानविधि ....... | १७३ |
| ५९-शौर्य एवं सार्वभौम-व्रत ................. | ११९ | ९२-'कार्पास' एवं 'धान्य-धेनु' की दानविधि .......... | १७५ |
| ६०-राजा भद्राश्वका प्रश्न और नारदजीके द्वारा<br>विष्णुके आश्चर्यमय स्वरूपका वर्णन............... | १२० | ९३-कपिलादानकी विधि एवं माहात्म्य ................. | १७६ |
| ६१-भगवान् नारायण-सम्बन्धी आश्चर्यका वर्णन ........ | १२२ | ९४-कपिला-माहात्म्य, 'उभयतोमुखी' गोदान,<br>हेम-कुम्भदान और पुराणकी प्रशंसा............ | १७७ |
| ६२-सत्ययुग, त्रेता और द्वापर आदिके गुणधर्म.......... | १२३ | ९५-पृथ्वीद्वारा भगवान्की विभूतियोंका वर्णन ........... | १८१ |
| ९६-श्रीवराहावतारका वर्णन ................. | १८२ |
( ६ )
| क्रम | पृष्ठ-संख्या | क्रम | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ९७- विविध धर्मोंकी उत्पत्ति | १८४ | १२३- शालग्रामक्षेत्रका माहात्म्य | २७० |
| ९८- सुख और दुःखका निरूपण | १८६ | १२४- रुरुक्षेत्र एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन | २७३ |
| ९९- भगवान्की सेवामें परिहार्य बत्तीस अपराध | १८८ | १२५- 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ और उसका माहात्म्य | २७५ |
| १००- पूजाके उपचार | १९० | १२६- स्तुतस्वामीका माहात्म्य | २७७ |
| १०१- श्रीहरिके भोज्य पदार्थ एवं भजन-ध्यानके नियम | १९४ | १२७- द्वारका-माहात्म्य | २७८ |
| १०२- मुक्तिके साधन | १९५ | १२८- सानन्दूर-माहात्म्य | २८० |
| १०३- कोकामुखतीर्थ (वराहक्षेत्र) का माहात्म्य | १९७ | १२९- लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य | २८१ |
| १०४- पुष्पादिका माहात्म्य | २०१ | १३०- मथुरातीर्थकी प्रशंसा | २८३ |
| १०५- वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य | २०३ | १३१- मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य | २८५ |
| १०६- माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार) का माहात्म्य | २०५ | १३२- मथुरा-मण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व | २८९ |
| १०७- कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश) का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा | २१३ | १३३- मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य | २९१ |
| १०८- दीक्षासूत्रका वर्णन | २२१ | १३४- देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव | २९५ |
| १०९- क्षत्रियादि-दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य | २२३ | १३५- 'कपिल-वराह' का माहात्म्य | २९७ |
| ११०- पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा | २२६ | १३६- अन्नकूट (गोवर्धन) पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव | ३०० |
| १११- राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त | २२९ | १३७- असिकुण्ड-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य | ३०३ |
| ११२- दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त | २२९ | १३८- मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य | ३०५ |
| ११३- भगवान्की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त | २३० | १३९- गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा | ३०७ |
| ११४- सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र | २३३ | १४०- सुगेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप | ३०९ |
| ११५- वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृंगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान | २३८ | १४१- गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना | ३११ |
| ११६- वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा) | २४७ | १४२- ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि | ३१३ |
| ११७- भगवान्के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य | २५१ | १४३- ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति | ३१६ |
| ११८- कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य | २५६ | १४४- साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन व्रत | ३१९ |
| ११९- 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य | २५९ | १४५- शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरा माहात्म्य | ३२१ |
| १२०- उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन | २६१ | १४६- श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा | ३२३ |
| १२१- मन्दारकी महिमाका निरूपण | २६२ | १४७- काष्ठ-पाषाण प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि | ३२७ |
| १२२- सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य | २६४ | १४८- मृन्मयी एवं ताम्र-प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा-विधि | ३३० |
| १४९- कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि | ३३३ | ||
| १५०- रजत-स्वर्णप्रतिमाके स्थापन तथा शालग्राम |
( ७ )
| क्रम | पृष्ठ-संख्या | क्रम | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| और शिवलिङ्गकी पूजाका विधान | ३३४ | १६०- कर्मविपाक-निरूपण | ३६९ |
| १५१- सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन | ३३५ | १६१- दानधर्मका महत्त्व | ३७१ |
| १५२- अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण | ३४० | १६२- पतिव्रतोपाख्यान | ३७४ |
| १५३- श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि | ३४५ | १६३- पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन | ३७७ |
| १५४- श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण | ३४८ | १६४- कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय | ३७८ |
| १५५- 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा | ३५३ | १६५- पाप-नाशके उपायका वर्णन | ३८१ |
| १५६- नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा | ३५६ | १६६- गोकर्णेश्वरका माहात्म्य | ३८४ |
| १५७- यमपुरीका वर्णन | ३५८ | १६७- गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान | ३८७ |
| १५८- यम-यातनाका स्वरूप | ३६१ | १६८- गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन | ३९२ |
| १५९- राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश | ३६७ | १६९- 'गोकर्णेश्वर' और 'शृङ्गेश्वर' आदिका माहात्म्य | ३९८ |
| १७०- वराहपुराणकी फल-श्रुति | ३९९ |
चित्र-सूची
सादे
नरकोंके दृश्य और उनके नाम—
| नरकका नाम | पृष्ठ-संख्या | नरकका नाम | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १- संदंश | ३६३ | ६- महारौरव | ३६३ |
| २- संतप्त | ३६३ | ७- प्राणरोध | ३६४ |
| ३- असिपत्रवन | ३६३ | ८- अवीचिमान | ३६४ |
| ४- कुम्भीपाक | ३६३ | ९- अयःपान | ३६४ |
| ५- रौरव | ३६३ | १०- सूकरमुख | ३६४ |
| ११- शूलग्रह | ३६४ | ||
| १२- सूर्मि | ३६४ |
(चित्र: भगवान् वराह अवतार का स्वरूप)
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीवराहपुराण
ॐ नमो भगवते महावराहाय
भगवान् वराहके प्रति पृथ्वीका प्रश्न और भगवान्के उदरमें विश्वब्रह्माण्डका दर्शनकर भयभीत हुई पृथ्वीद्वारा उनकी स्तुति
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम्।
खुरमध्यगतो यस्य मेरुः खणखणायते॥
दंष्ट्राग्रेणोद्धता गौरुदधिपरिवृता पर्वतैर्निम्नगाभिः
साकं मृत्पिण्डवत्प्राग्बृहदुरुवपुषाऽनन्तरूपेण येन।
सोऽयं कंसासुरारिर्मुरनरकदशास्यान्तकृत्सर्वसंस्थः
कृष्णो विष्णुः सुरेशो नुदतु मम रिपूनादिदेवो वराहः॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् वराह, नररत्न नरऋषि, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले वराहपुराणका पाठ करना चाहिये।
जिनके लीलापूर्वक पृथ्वीका उद्धार करते समय उनके खुरोंमें फँसकर सुमेरु पर्वत खन-खन शब्द करता है, उन भगवान् वराहको नमस्कार है।
जिन अनन्तरूप भगवान् विष्णु (वराह)-ने प्राचीन कालमें समुद्रोंसे घिरी, वन-पर्वत एवं नदियोंसहित पृथ्वीको अत्यन्त विशाल शरीरके द्वारा अपनी दाढ़के अग्रभागपर मिट्टीके (छोटे-से) ढेलेकी भाँति उठा लिया था, वे कंस, मुर, नरक तथा रावण आदि असुरोंका अन्त करनेवाले कृष्ण एवं विष्णुरूपसे सबमें व्याप्त देवदेवेश्वर आदिदेव भगवान् वराह मेरी सभी बाधाओं (काम, क्रोध, लोभ आदि आध्यात्मिक शत्रुओं)-को नष्ट करें।
**सूतजी कहते हैं—**पूर्वकालमें जब सर्वव्यापी भगवान् नारायणने वराह-रूप धारण करके अपनी शक्तिद्वारा एकार्णवकी अनन्त जलराशिमें निमग्न पृथ्वीका उद्धार किया, उस समय पृथ्वीने उनसे पूछा।
**पृथ्वीने कहा—**प्रभो! आप प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके आदिकालमें इसी प्रकार मेरा उद्धार करते रहते हैं; परंतु केशव! आपके स्वरूप एवं सृष्टिके प्रारम्भके विषयमें मैं आजतक न जान सकी। जब
१० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १
वेद लुप्त हो गये थे, उस समय आप मत्स्यरूप धारण कर समुद्रमें प्रविष्ट हो गये थे और वहाँसे वेदोंका उद्धार करके आपने ब्रह्माको दे दिया था। मधुसूदन! इसके अतिरिक्त जब देवता और दानव एकत्र होकर समुद्रका मन्थन करने लगे, तब आपने कच्छपावतार ग्रहण करके मन्दराचल पर्वतको धारण किया था। भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। जब मैं जलमें डूब रही थी, तब आपने रसातलसे, जहाँ सब ओर जल-ही-जल था, अपनी एक दाढ़पर रखकर मेरा उद्धार किया है। इसके अतिरिक्त जब वरदानके प्रभावसे हिरण्यकशिपुको असीम अभिमान हो गया था और वह पृथ्वीपर भाँति-भाँतिके उपद्रव करने लगा था, उस समय वह आपके द्वारा ही मारा गया था। देवाधिदेव! प्राचीन कालमें आपने ही जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें अवतीर्ण होकर मुझे क्षत्रियरहित कर दिया था। भगवन्! आपने क्षत्रियकुलमें दाशरथि श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण होकर क्षत्रियोचित पराक्रमसे रावणको नष्ट कर दिया था तथा वामनरूपसे आपने ही बलिको बाँधा था। प्रभो! मुझे जलसे ऊपर उठाकर आप सृष्टिकी रचना किस प्रकार करते हैं तथा इसका क्या कारण है? आपकी इन लीलाओंके रहस्यको मैं कुछ भी नहीं जानती।
विभो! मुझे एक बार जलके ऊपर स्थापित करनेके अनन्तर आप किस प्रकार सृष्टिके पालनकी व्यवस्था करते हैं? आपके निरन्तर सुलभ रहनेका कौन-सा उपाय है? सृष्टिका किस प्रकार आरम्भ और अवसान होता है? चारों युगोंकी गणनाका कौन-सा प्रकार है तथा युगोंका क्रम किस प्रकार चलता है? महेश्वर! उन युगोंमें किस युगकी प्रधानता है तथा किस युगमें आप कौन-सी लीला किया करते हैं? यज्ञमें सदा संलग्न रहनेवाले कितने राजा हो चुके हैं और उनमेंसे किन-किनको सिद्धि सुलभ हुई है? प्रभो! आप मुझपर प्रसन्न हों और ये सब विषय संक्षेपसे बतानेकी कृपा करें।
पृथ्वीके ऐसा कहनेपर शूकररूपधारी भगवान् आदिवराह हँस पड़े। हँसते समय उनके उदरमें जगद्धात्री पृथ्वीको महर्षियोंसहित रुद्र, वसु, सिद्ध एवं देवताओंका समुदाय दीखने लगा। साथ ही उसने वहाँ अपने-अपने कर्तव्यपालनमें तत्पर सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और सातों लोकोंको भी देखा। यह सब देखते ही भय एवं विस्मयसे पृथ्वीके सभी अङ्ग काँपने लगे। इस प्रकार पृथ्वीको भयभीत देखकर भगवान् वराहने अपना मुख बंद कर लिया। तब पृथ्वीने उनको चतुर्भुज रूप धारणकर महासागरमें शेषनागकी शय्यापर सोये देखा। उनकी नाभिसे कमल निकला हुआ था। फिर तो चार भुजाओंसे सुशोभित उन परमेश्वरको देखकर देवी पृथ्वीने हाथ जोड़ लिया और उनकी स्तुति करने लगी।
पृथ्वीने कहा— कमलनयन! आपके श्रीअङ्गोंमें पीताम्बर फहरा रहा है, आप स्मरण करते ही भक्तोंके पापोंका हरण करनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। देवताओंके द्वेषी दैत्योंका दलन करनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है। जो शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं, जिनके वक्षःस्थलपर लक्ष्मी शोभा पाती हैं तथा भक्तोंको मुक्ति प्रदान करना ही जिनका स्वभाव है, ऐसे सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर आप प्रभुको बारम्बार नमस्कार है। प्रभो! आपके हाथमें खड्ग, चक्र और शार्ङ्ग धनुष शोभा पाते हैं, आपपर जन्म एवं मृत्युका प्रभाव नहीं पड़ता तथा आपके नाभिकमलपर ब्रह्माका प्राकट्य हुआ है, ऐसे आप प्रभुके लिये बारम्बार नमस्कार है। जिनके अधर और करकमल
२-विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमें दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति
अध्याय २ ] विभिन्न सर्गोंका वर्णन ११
लाल विद्रुममणिके समान सुशोभित होते हैं, उन जगदीश्वरके लिये नमस्कार है। भगवन्! मैं निरुपाय नारी आपकी शरणमें आयी हूँ, मेरी रक्षा करनेकी कृपा करें। जनार्दन! सघन नील अञ्जनके समान श्यामल आपके इस वराहविग्रहको देखकर मैं भयभीत हो गयी हूँ। इसके अतिरिक्त चराचर सम्पूर्ण जगत्को आपके शरीरमें देखकर भी मैं पुनः भयको प्राप्त हो रही हूँ। नाथ! अब आप मुझपर दया कीजिये। महाप्रभो! मेरी रक्षा आपकी कृपापर निर्भर है।
भगवान् केशव मेरे पैरोंकी, नारायण मेरे कटिभागकी तथा माधव दोनों जङ्घाओंकी रक्षा करें। भगवान् गोविन्द गुह्याङ्गकी रक्षा करें। विष्णु मेरी नाभिकी तथा मधुसूदन उदरकी रक्षा करें। भगवान् वामन वक्षःस्थल एवं हृदयकी रक्षा करें। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु मेरे कण्ठकी, हृषीकेश मुखकी, पद्मनाभ नेत्रोंकी तथा दामोदर मस्तककी रक्षा करें।
इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके नामोंका अपने अङ्गोंमें न्यास करके पृथ्वीदेवी 'भगवन्! विष्णो! आपको नमस्कार है' ऐसा कहकर मौन हो गयीं।
[ अध्याय १ ]
विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमें दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—सभी जीवधारियोंके शरीरोंमें आत्मारूपसे स्थित भगवान् श्रीहरि पृथ्वीकी भक्तिसे परम संतुष्ट हो गये। उन्होंने वराह-रूप धारण करके पृथ्वीको अपनी योगमायाका दर्शन कराया और फिर उसी रूपमें स्थित रहकर बोले—'सुश्रोणि! तुम्हारा प्रश्न यद्यपि बहुत कठिन है एवं यह पुरातन इतिहासका विषय है, तथापि मैं सभी शास्त्रोंसे सम्मत इस विषयका प्रतिपादन करता हूँ। पृथ्विदेवि! साधारणतः सभी पुराणोंमें यह प्रसङ्ग आया है।'
भगवान् वराहने कहा—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—जहाँ ये पाँच लक्षण विद्यमान हों, उसे पुराण समझना चाहिये। वरानने! पुराणोंमें सर्ग अर्थात् सृष्टिका स्थान प्रथम है। अतः मैं पहले उसीका वर्णन करता हूँ। इसके आरम्भसे ही देवताओं और राजाओंके चरित्रका ज्ञान होता है। परमात्मा सनातन हैं। उनका कभी किसी कालमें नाश नहीं होता। वे परमात्मा सृष्टिकी इच्छासे चार भागोंमें विभक्त हुए, ऐसा वेदज्ञ पुरुष जानते हैं। सृष्टिके आदिकालमें सर्वप्रथम परमात्मासे अहंतत्त्व, फिर आकाश आदि पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए। उसके पश्चात् महत्तत्त्व प्रकट हुआ और फिर अणुरूपा प्रकृति और इसके बाद समष्टि बुद्धिका प्रादुर्भाव हुआ। सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंसे युक्त होकर वह बुद्धि पृथक्-पृथक् तीन प्रकारके भेदोंमें विभक्त हो गयी। इस गुणत्रयमेंसे तमोगुणका संयोग प्राप्त करके महद्ब्रह्मका प्रादुर्भाव हुआ, इसको सभी तत्त्वज्ञ प्रधान अर्थात् प्रकृति कहते हैं। इस प्रकृतिसे भी क्षेत्रज्ञ अधिक महिमायुक्त है। उस परब्रह्मसे सत्त्वादि गुण, गुणोंसे आकाश आदि तन्मात्राएँ और फिर इन्द्रियोंका समुदाय बना। इस प्रकार जगत्की सृष्टि व्यवस्थित हुई। भद्रे! पाँच महाभूतोंसे स्वयं मैंने स्थूल शरीरका निर्माण किया। देवि! पहले केवल शून्य था। फिर उसमें शब्दकी उत्पत्ति हुई। शब्दसे आकाश हुआ। आकाशसे वायु, वायुसे तेज एवं तेजसे जलकी उत्पत्ति हुई। इसके बाद प्राणियोंको अपने ऊपर
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धारण करनेके लिये तुम्हारी—(पृथिवीकी) रचना हुई।
पृथ्वी और जलका संयोग होनेपर बुद्बुदाकार कलल बना और वही अण्डेके आकारमें परिणत हो गया। उसके बढ़ जानेपर मेरा जलमय रूप दृष्टिगोचर हुआ। मेरे इस रूपको स्वयं मैंने ही बनाया था। इस प्रकार नार अर्थात् जलकी सृष्टि करके मैं उसीमें निवास करने लगा। इसीसे मेरा नाम 'नारायण' हुआ। वर्तमान कल्पके समान ही मैं प्रत्येक कल्पमें जलमें शयन करता हूँ और मेरे सोते समय सदैव मेरी नाभिसे इसी प्रकार कमल उत्पन्न होता है, जैसा कि आज तुम देख रही हो। देवि! ऐसी स्थितिमें मेरे नाभिकमलपर चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए। तब मैंने उनसे कहा—'महामते! तुम प्रजाकी रचना करो।' ऐसा कहकर मैं अन्तर्धान हो गया और ब्रह्मा भी सृष्टिरचनाके चिन्तनमें लग गये। वसुन्धरे! इस प्रकार चिन्तन करते हुए ब्रह्माको जब कोई मार्ग नहीं सूझ पड़ा, तो फिर उन अव्यक्तजन्माके मनमें क्रोध उत्पन्न हुआ। उनके इस क्रोधके परिणामस्वरूप एक बालकका प्रादुर्भाव हुआ। जब उस बालकने रोना प्रारम्भ किया, तब अव्यक्तरूप ब्रह्माने उसे रोनेसे मना किया। इसपर उस बालकने कहा—'मेरा नाम तो बता दीजिये।' तब ब्रह्माने रोनेके कारण उसका नाम 'रुद्र' रख दिया। शुभे! उस बालकसे भी ब्रह्माने कहा—'लोकोंकी रचना करो।' परंतु इस कार्यमें अपनेको असमर्थ जानकर उस बालकने जलमें निमग्न होकर तप करनेका निश्चय किया।
उस रुद्र नामक बालकके तपस्याके लिये जलमें निमग्न हो जानेपर ब्रह्माने फिर दूसरे प्रजापतिको उत्पन्न किया। दाहिने अँगूठेसे उन्होंने प्रजापतिकी तथा बायें अँगूठेसे प्रजापतिके लिये पत्नीकी सृष्टि की। प्रजापतिने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको उत्पन्न किया। इस प्रकार पूर्वकालमें ब्रह्माने स्वायम्भुव मनुके द्वारा प्रजाओंकी वृद्धि की।
पृथ्वी बोली— देवेश्वर! प्रथम सृष्टिका और विस्तारसे वर्णन करनेकी कृपा करें तथा नारायण ब्रह्मारूपसे कैसे विख्यात हुए? मुझे यह सब भी बतलानेकी कृपा करें।
वराह भगवान् कहते हैं— देवि पृथ्वि! नारायणने ब्रह्मारूपसे जिस प्रकार प्रजाओंकी सृष्टि की, उसे मैं विस्तृत रूपसे कहता हूँ, सुनो। शुभे! पिछले कल्पका अन्त हो जानेपर रात्रि व्याप्त हो गयी। भगवान् श्रीहरि उस समय सो गये। प्राणोंका नितान्त अभाव हो गया। फिर जगनेपर उनको यह जगत् शून्य दिखायी पड़ा। भगवान् नारायण दूसरोंके लिये अचिन्त्य हैं। वे पूर्वजोंके भी पूर्वज, ब्रह्मस्वरूप, अनादि और सबके स्रष्टा हैं। ब्रह्माका रूप धारण करनेवाले वे परम प्रभु जगत्की उत्पत्ति और प्रलयकर्ता हैं। उन नारायणके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है—
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं ततो नारायणः स्मृतः॥
पुरुषोत्तम नरसे उत्पन्न होनेके कारण जलको 'नार' कहा जाता है, क्योंकि जल भी नार अर्थात् पुरुषोत्तम परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। सृष्टिके पूर्व वह नार ही भगवान् हरिका अयन—निवास रहा, अतएव उनकी नारायण संज्ञा हो गयी। फिर पूर्व-कल्पोंकी भाँति उन श्रीहरिके मनमें सृष्टिरचनाका संकल्प उदित हुआ। तब उनसे बुद्धिशून्य तमोमयी सृष्टि उत्पन्न हुई। पहले उन परमात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र—यह पाँच पर्वोंवाली अविद्या उत्पन्न हुई। उनके फिर चिन्तन करनेपर तमोगुणप्रधान चेतनारहित जड़ (वृक्ष, गुल्म, लता, तृण और पर्वत)—रूप पाँच प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न हुई। सृष्टि-रचनाके रहस्यको जाननेवाले विद्वान् इसे मुख्य सर्ग कहते हैं। फिर
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अध्याय २ ] विभिन्न सर्गोंका वर्णन १३
उन परम पुरुषके चिन्तन करनेपर दूसरी पहलेकी अपेक्षा उत्कृष्ट सृष्टि-रचनाका कार्य आरम्भ हो गया। यह सृष्टि वायुके समान वक्र गतिसे या तिरछी चलनेवाली हुई, जिसके फलस्वरूप इसका नाम तिर्यक्स्रोत पड़ गया। इस सर्गके प्राणियोंकी पशु आदिके नामसे प्रसिद्धि हुई। इस सर्गको भी अपनी सृष्टि-रचनाके प्रयोजनमें असमर्थ जानकर ब्रह्माद्वारा पुनः चिन्तन किये जानेपर एक और दूसरा सर्ग उत्पन्न हुआ। यह ऊर्ध्वस्रोत नामक तीसरा धर्मपरायण सात्त्विक सर्ग हुआ, जो देवताओंके रूपमें ऊर्ध्व स्वर्गादि लोकोंमें रहने लगा। ये सभी देवता ऊर्ध्वगामी एवं स्त्री-पुरुष-संयोगके फलस्वरूप गर्भसे उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार इन मुख्य सृष्टियोंकी रचना कर लेनेपर भी जब ब्रह्माने पुनः विचार किया, तो उनको ये भी परम पुरुषार्थ (मोक्ष)-के साधनमें असमर्थ दीखे। तब फिर उन्होंने सृष्टिरचनाका चिन्तन करना प्रारम्भ किया और पृथ्वी आदि नीचेके लोकोंमें रहनेवाले अर्वाक्स्रोत सर्गकी रचना की। इस अर्वाक्स्रोतवाली सृष्टिमें उन्होंने जिनको बनाया, वे मनुष्य कहलाये और वे परम पुरुषार्थके साधनके योग्य थे। इनमें जो सत्त्वगुणविशिष्ट थे, वे प्रकाशयुक्त हुए। रज एवं तमोगुणकी जिनमें अधिकता थी, वे कर्मोंका बारंबार अनुष्ठान करनेवाले एवं दुःखयुक्त हुए। सुभगे! इस प्रकार मैंने इन छः सर्गोंका तुमसे वर्णन किया। इनमें पहला महत्तत्त्वसम्बन्धी सर्ग, दूसरा तन्मात्राओंसे सम्बन्धित भूतसर्ग और तीसरा वैकारिक सर्ग है, जो इन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखता है। इस प्रकार समष्टि बुद्धिके संयोगसे (प्रकृतिसे) उत्पन्न होनेके कारण यह प्राकृत सर्ग कहलाया। चौथा मुख्य सर्ग है। पर्वत-वृक्ष आदि स्थावर पदार्थ ही इस मुख्य सर्गके अन्तर्गत हैं। वक्र गतिवाले पशु-पक्षी तिर्यक्स्रोतमें उत्पन्न होनेसे तिर्यग्योनि या तैर्यक स्रोतके प्राणी कहे जाते हैं।
विधाताकी सभी सृष्टियोंमें उच्च स्थान रखनेवाली छठी सृष्टि देवताओंकी है। मानव उनकी सातवीं सृष्टिमें आता है। सत्त्वगुण और तमोगुणमिश्रित आठवाँ अनुग्रहसर्ग माना गया है; क्योंकि इसमें प्रजाओंपर अनुग्रह करनेके लिये ऋषियोंकी उत्पत्ति होती है। इनमें बादके पाँच वैकृत सर्ग और पहलेके तीन प्राकृत सर्गके नामसे जाने जाते हैं। नवाँ कौमार सर्ग प्राकृत-वैकृतमिश्रित है। प्रजापतिके ये नौ सर्ग कहे गये हैं। संसारकी सृष्टिमें मूल कारण ये ही हैं। इस प्रकार मैंने इन सर्गोंका वर्णन किया। अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो ?
**पृथ्वी बोली—**भगवन्! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माद्वारा रचित यह नवधा सृष्टि किस प्रकार विस्तारको प्राप्त हुई? अच्युत! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें।
**भगवान् वराह कहते हैं—**सर्वप्रथम ब्रह्माद्वारा रुद्र आदि देवताओंकी सृष्टि हुई। इसके बाद सनकादि कुमारों तथा मरीचि-प्रभृति मुनियोंकी रचना हुई। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, महान् तेजस्वी पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, नारद एवं महातपस्वी वसिष्ठ—ये दस ब्रह्माजीके मानस पुत्र हुए। उन परमेष्ठीने सनकादिको निवृत्तिसंज्ञक धर्ममें तथा नारदजीके अतिरिक्त मरीचि आदि सभी ऋषियोंको प्रवृत्तिसंज्ञक धर्ममें नियुक्त कर दिया। ये जो आदि प्रजापति हैं, इनका ब्रह्माके दाहिने अँगूठेसे प्राकट्य हुआ है (इसी कारण ये दक्ष कहलाते हैं) और इन्हींके वंशके अन्तर्गत यह सारा चराचर जगत् है। देवता, दानव, गन्धर्व, सरीसृप तथा पक्षिगण—ये सभी दक्षकी कन्याओंसे उत्पन्न हुए हैं। इन सबमें धर्मकी विशेषता थी।
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ब्रह्माके जो रुद्र नामक पुत्र हैं, उनका प्रादुर्भाव क्रोधसे हुआ था। जिस समय ब्रह्माकी भौंहें रोषके कारण तन गयी थीं, तब उनके ललाटसे इनका प्रादुर्भाव हुआ। उस समय इनका शरीर अर्धनारीश्वरके रूपमें था। ‘तुम स्वयं अपनेको अनेक भागोंमें बाँटो’—इनसे यों कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये। यह आज्ञा पाकर उन महाभागने स्त्री और पुरुष—इन दो भागोंमें अपनेको विभाजित कर दिया। फिर अपने पुरुष-रूपको उन्होंने ग्यारह भागोंमें विभक्त किया। तभीसे ब्रह्मासे प्रकट होनेवाले इन ग्यारह रुद्रोंकी प्रसिद्धि हुई। अनघे! तुम्हारी जानकारीके लिये मैंने इस रुद्र-सृष्टिका वर्णन कर दिया।
अब मैं संक्षेपसे युगमाहात्म्यका वर्णन करता हूँ। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग हैं। इन चारों युगोंमें परम पराक्रमी तथा प्रचुर दक्षिणा देनेवाले जो राजा हो चुके हैं एवं जिन देवताओं और दानवोंने ख्याति प्राप्त की है तथा जिन धर्म-कर्मोंका उन्होंने अनुष्ठान किया है; वह मुझसे सुनो। पूर्वकालकी बात है, प्रथम कल्पमें स्वायम्भुव मनु हुए। उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके लोकोत्तर कर्म मनुष्योंके लिये असम्भव ही थे। धर्ममें श्रद्धा रखनेवाले वे महाभाग प्रियव्रत और उत्तानपाद नामसे विख्यात हुए। प्रियव्रतमें तपोबल था और वे महान् यज्ञशाली थे। उन्होंने पुष्कल (अधिक) दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंद्वारा भगवान् श्रीहरिका यजन किया था। उन्होंने सातों द्वीपोंमें अपने भरत आदि पुत्रोंको अभिषिक्त कर दिया था और स्वयं वे महातपस्वी राजा वरदायिनी विशाला* नगरी—बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करने लगे थे। महाराज प्रियव्रत चक्रवर्ती नरेश थे। धर्मका अनुष्ठान करना उनका स्वाभाविक गुण था।
अतएव उनके तपस्यामें लीन होनेपर उनसे मिलनेकी इच्छासे वहाँ स्वयं नारदजी पधारे। नारदमुनिका आगमन आकाश-मार्गसे हुआ था। उनका तेज सूर्यके समान छिटक रहा था। उन्हें देखकर महाराज प्रियव्रतको बड़ा हर्ष हुआ और उन्होंने आसन, पाद्य एवं नैवेद्यसे नारदजीका भलीभाँति सत्कार किया। तत्पश्चात् उन दोनोंमें परस्पर वार्ता प्रारम्भ हो गयी। अन्तमें वार्तालापकी समाप्तिके समय राजा प्रियव्रतने ब्रह्मवादी नारदजीसे पूछा।
राजा प्रियव्रत बोले—नारदजी! आप महान् पुरुष हैं। इस सत्ययुगमें आपने कोई अद्भुत घटना देखी या सुनी हो, तो उसे बतानेकी कृपा करें।
नारदजीने कहा—महाराज! अवश्य ही मैंने एक आश्चर्यजनक बात देखी है, वह सुनो। कल मैं श्वेतद्वीप गया था, मुझे वहाँपर एक सरोवर दिखलायी पड़ा। उस सरोवरमें बहुत-से कमल खिले हुए थे। उसके तटपर विशाल नेत्रोंवाली एक कन्या खड़ी थी। उस कन्याको देखकर मैं अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गया। उसकी वाणी भी बड़ी मधुर थी। मैंने उससे पूछा—‘भद्रे! तुम कौन हो, इस स्थानपर कैसे निवास करती हो और यहाँ तुम्हारा क्या काम है?’ मेरे इस प्रकार पूछनेपर उस कुमारीने एकटक नेत्रोंसे मुझे देखा, पर न जाने क्या सोचकर वह चुप ही रही। उसके देखते ही मेरा सारा ज्ञान पता नहीं, कहाँ चला गया? राजन्! सम्पूर्ण वेद, समस्त शास्त्र, योगशास्त्र और वेदोंके शिक्षादि अङ्गोंकी मेरी सारी स्मृतियाँ उस किशोरीने मुझपर दृष्टिपात करके ही अपहृत कर लीं। तब मैं शोक और चिन्तासे ग्रस्त होकर महान् विस्मयमें पड़ गया। राजन्! ऐसी स्थितिमें मैंने उस कुमारीकी शरण ग्रहण की। इतनेमें ही मुझे उस कुमारीके शरीरमें एक दिव्य पुरुष
*महाभारत वनपर्व ९०। २४। २५ तथा भागवत-माहात्म्यके अनुसार विशालापुरी बदरिकाश्रम ही है।
३-देवर्षि नारदद्वारा अपने पूर्वजन्मवर्णनके प्रसङ्गमें 'ब्रह्मपारस्तोत्र' का कथन
अध्याय ३ ] देवर्षि नारदद्वारा अपने पूर्वजन्मवर्णनके प्रसङ्गमें ब्रह्मपारस्तोत्रका कथन १५
दृष्टिगोचर हुआ। फिर उस पुरुषके भी हृदयमें दूसरे और उस दूसरे पुरुषके हृदयमें तीसरेका दर्शन हुआ, जिसके नेत्र लाल थे और वह बारह सूर्योंके समान तेजस्वी था। इस प्रकार उन तीनों पुरुषोंको मैंने वहाँ देखा, जो उस कन्याके शरीरमें स्थित थे। सुव्रत! फिर क्षणभरके बाद देखा, तो वहाँ केवल वह कन्या ही रह गयी थी एवं अन्य तीनों पुरुष अदृश्य हो गये थे। तत्पश्चात् मैंने उस दिव्य किशोरीसे पूछा—भद्रे! मेरा सम्पूर्ण वेदज्ञान कैसे नष्ट हो गया ? इसका कारण बताओ।
कुमारी बोली—'मैं समस्त वेदोंकी माता हूँ। मेरा नाम सावित्री है। तुम मुझे नहीं जानते। इसीके फलस्वरूप मैंने तुमसे वेदोंको अपहृत कर लिया है।' तपरूपी धनका संचय करनेवाले राजन्! उस कुमारीके इस प्रकार कहनेपर मैंने विस्मय-विमुग्ध होकर पूछा—'शोभने! ये पुरुष कौन थे, मुझे यह बतानेकी कृपा करो।'
कुमारी बोली—मेरे शरीरमें विराजमान इन पुरुषोंकी जो तुम्हें झाँकी मिली है, इनमेंसे जिसके सभी अङ्ग परम सुन्दर हैं, इसका नाम ऋग्वेद है। यह स्वयं भगवान् नारायणका स्वरूप है। यह अग्निमय है। इसके सस्वर पाठ करनेसे समस्त पाप तुरंत भस्म हो जाते हैं। इसके हृदयमें यह जो दूसरा पुरुष तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ है, जिसकी उसीसे उत्पत्ति हुई है, वह यजुर्वेदके रूपमें स्थित महाशक्तिशाली ब्रह्मा हैं। फिर उसके वक्षःस्थलमें भी प्रविष्ट, जो यह परम पवित्र और उज्ज्वल पुरुष दीख रहा है, इसका नाम सामवेद है। यह भगवान् शंकरका स्वरूप माना गया है। स्मरण करनेपर सूर्यके समान सम्पूर्ण पापोंको यह तत्काल नष्ट कर देता है। ब्रह्मन्! तुमको दृष्टिगोचर हुए ये दिव्य पुरुष तीनों वेद ही हैं। नारद! तुम ब्रह्मपुत्रोंके शिरोमणि और सर्वज्ञानसम्पन्न हो! यह सारा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें संक्षेपसे बता दिया। अब तुम पुनः सभी वेदों और शास्त्रोंको तथा अपनी सर्वज्ञताको पुनः प्राप्त करो। इस वेद-सरोवरमें तुम स्नान करो। इसमें स्नान करनेसे तुम्हें अपने पूर्वजन्मकी स्मृति हो जायगी।
राजन्! यह कहकर वह कन्या अन्तर्धान हो गयी। तब मैंने उस सरोवरमें स्नान किया और तदनन्तर आपसे मिलनेकी इच्छासे यहाँ चला आया। [ अध्याय २ ]
देवर्षि नारदद्वारा अपने पूर्वजन्मवर्णनके प्रसङ्गमें ब्रह्मपारस्तोत्रका कथन
प्रियव्रत बोले—भगवन्! आपके द्वारा पूर्व-जन्मोंमें जो-जो कार्य सम्पन्न हुए हों, उन सबको मुझे बतानेकी कृपा करें, क्योंकि देवर्षे! उन्हें सुननेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है।
नारदजीने कहा—राजेन्द्र! कुमारी सावित्रीकी बात सुनकर उस वेद-सरोवरमें मैंने ज्यों ही स्नान किया, उसी क्षण मुझे अपने हजारों जन्मोंकी बातें स्मरण हो आयीं। अब तुम मेरे पूर्वजन्मकी बात सुनो। अवन्ती नामकी एक पुरी है। मैं पूर्वजन्ममें उसमें निवास करनेवाला एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उस जन्ममें मेरा नाम सारस्वत था और सभी वेद-वेदाङ्ग मुझे सम्यक् अभ्यस्त थे। राजन्! यह दूसरे सत्ययुगकी बात है। उस समय मेरे पास बहुत-से सेवक थे, धन-धान्यकी अटूट राशि थी, भगवान्ने उत्तम बुद्धि भी दी थी। एक बार मैं एकान्तमें बैठकर विचार करने लगा कि संसार द्वन्द्वस्वरूप है; इसमें सुख-दुःख, हानि-लाभ आदिका चक्र सदा चलता रहता है। मुझे ऐसे संसारसे क्या लेना-देना है ? अतः मुझे अब अपनी सारी सांसारिक धन-सम्पदा पुत्रोंको सौंपकर
१६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ३
तपस्या करनेके लिये तुरंत सरस्वती नदीके तटपर चल देना चाहिये। यह विचार करनेके पश्चात्, क्या यह तत्काल करना उचित होगा, इस जिज्ञासाको लेकर मैंने भगवान्से प्रार्थना की। फिर भगवान्के आज्ञानुसार मैंने श्राद्धद्वारा पितरोंको, यज्ञद्वारा देवताओंको तथा दानद्वारा अन्य लोगोंको भी संतुष्ट किया। राजन्! तत्पश्चात् सभी ओरसे निश्चिन्त होकर मैं सारस्वत नामक सरोवरपर, जो इस समय पुष्करतीर्थके नामसे विख्यात है, चला गया। वहाँ जाकर परम मङ्गलमय पुराणपुरुष भगवान् विष्णुके नारायणमन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय ) -का जप एवं ब्रह्मपार नामक उत्तम स्तोत्रका पाठ करता हुआ मैं भक्तिपूर्वक आराधना करने लगा। तब परम प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् श्रीहरि मेरे सम्मुख प्रत्यक्ष रूपसे प्रकट हो गये।
प्रियव्रत बोले— महाभाग देवर्षे! ब्रह्मपारस्तोत्र कैसा है? इसे मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझपर सदा प्रसन्न रहते हैं, अतएव कृपापूर्वक मुझे इसका उपदेश करें।
नारदजीने कहा— जो परात्पर, अमृतस्वरूप, सनातन, अपार शक्तिशाली एवं जगत्के परम आश्रय हैं, उन पुराणपुरुष भगवान् महाविष्णुको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ। जो पुरातन, अतुलनीय, श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ एवं प्रचण्ड तेजस्वी हैं, जो गहन-गम्भीर बुद्धि-विचार करनेवालोंमें प्रधान तथा जगत्के शासक हैं, उन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो परसे भी पर हैं, जिनसे परे दूसरा कोई है ही नहीं, जो दूसरोंको आश्रय देनेवाले एवं महान् पुरुष हैं, जिनका धाम विशुद्ध एवं विशाल है, ऐसे पुराणपुरुष भगवान् नारायणकी परम शुद्धभावसे मैं स्तुति करता हूँ। सृष्टिके पूर्व जब केवल शून्यमात्र था, उस समय पुरुषरूपसे जिन्होंने प्रकृतिकी रचना की, वे भक्तजनोंमें प्रसिद्ध, शुद्धस्वरूप पुराणपुरुष भगवान् नारायण मेरे लिये शरण हों। जो परात्पर, अपारस्वरूप, पुरातन, नीतिज्ञोंमें श्रेष्ठ, क्षमाशील, शान्तिके आगार तथा जगत्के शासक हैं, उन कल्याणस्वरूप भगवान् नारायणकी मैं सदा स्तुति करता हूँ। जिनके हजारों मस्तक हैं, असंख्य चरण और भुजाएँ हैं, चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, क्षीरसागरमें जो शयन करते हैं, उन अविनाशी सत्यस्वरूप परम प्रभु भगवान् नारायणकी मैं स्तुति करता हूँ। जो वेदत्रयीके अवलम्बनद्वारा जाने जाते हैं, जो परब्रह्मरूप एक मूर्तिसे द्वादश आदित्यरूप बारह मूर्तियोंमें अभिव्यक्त होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेशरूप तीन परमोज्ज्वल मूर्तियोंमें स्थित हैं, जो अग्निरूपमें दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय—इन तीन भेदोंमें विभक्त होते हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण—इन तीन तत्त्वोंके अवलम्बनद्वारा लक्षित होते हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्यरूपसे त्रिकालात्मक हैं तथा सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्निरूप तीन नेत्रोंसे युक्त हैं, उन अप्रमेयस्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। जो अपने श्रीविग्रहको सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें पीतवर्णसे अनुरञ्जित और कलियुगमें कृष्णवर्णमें प्रकाशित करते हैं, उन पुराणपुरुष श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने अपने मुखसे ब्राह्मणोंका, भुजाओंसे क्षत्रियोंका, दोनों जङ्घाओंसे वैश्योंका एवं चरणोंके अग्रभागसे शूद्रोंका सृजन किया है, उन विश्वरूप पुराणपुरुष भगवान् नारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। जो परेसे भी परे, सर्वशास्त्रपारंगत, अप्रमेय और योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं, साधुओंके परित्राणरूप कार्यके निमित्त जिन्होंने श्रीकृष्ण-अवतार धारण किया है तथा जिनके हाथ ढाल, तलवार, गदा
४-महामुनि कपिल और जैगीषव्यद्वारा राजा अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका प्रत्यक्ष दर्शन कराना
अध्याय ४ ] अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका दर्शन कराना [ १७
और अमृतमय कमलसे सुशोभित हैं, उन अप्रमेय-स्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रणाम करता हूँ।
राजन्! इस प्रकार स्तुति करनेपर देवाधिदेव भगवान् नारायण प्रसन्न होकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें मुझसे बोले—‘वर माँगो।’ तब मैंने उन प्रभुके शरीरमें लय होनेकी इच्छा व्यक्त की। मेरी बात सुनकर उन सनातन देवेश्वरने मुझसे कहा—‘ब्रह्मन्! अभी तुम शरीर धारण करो, क्योंकि इसकी आवश्यकता है। तुमने अभी जो तपस्या प्रारम्भ करनेके पूर्व पितरोंको नार (जल) दान किया है, अतः अबसे तुम्हारा नाम नारद होगा।’*
ऐसा कहकर भगवान् नारायण तुरंत ही मेरी आँखोंसे ओझल हो गये। समय आनेपर मैंने वह शरीर छोड़ दिया। तपस्याके प्रभावसे मृत्युके पश्चात् मुझे ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई। राजन्! तदनन्तर ब्रह्माजीके प्रथम दिवसका आरम्भ होनेपर मेरी भी उनके दस मानस पुत्रोंमें उत्पत्ति हुई। सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टिका वह प्रथम दिन है—इसमें कोई संशय नहीं। इसी प्रकार भगवद्धर्मानुसार सारे जगत्की सृष्टि होती है।
राजन्! यह मेरे प्राकृत जन्मका प्रसङ्ग है, जिसके विषयमें तुमने प्रश्न किया था। राजेन्द्र! भगवान् नारायणका ध्यान करनेसे ही मुझे लोकगुरुका पद प्राप्त हुआ, अतएव तुम भी उन श्रीहरिके परायण हो जाओ। [अध्याय ३]
महामुनि कपिल और जैगीषव्यद्वारा राजा अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका प्रत्यक्ष दर्शन कराना
पृथ्वी बोली—भगवन्! जो सनातन, देवाधिदेव, परमात्मा नारायण हैं, वे भगवान्के परिपूर्णतम स्वरूप हैं या नहीं? आप इसे स्पष्ट बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं—समस्त प्राणियोंको आश्रय देनेवाली पृथ्वि! मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि—ये दस उन्हीं सनातन परमात्माके स्वरूप कहे जाते हैं। शोभने! उनके साक्षात् दर्शन पानेकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंके लिये ये सोपानरूप हैं। उनका जो परिपूर्णतम स्वरूप है, उसे देखनेमें तो देवता भी असमर्थ हैं। वे मेरे एवं पूर्वोक्त अन्य अवतारोंके रूपका दर्शन करके ही अपनी मनःकामना पूर्ण करते हैं। ब्रह्मा उन्हींकी रजोगुण और तमोगुण-मिश्रित मूर्ति हैं, उनके माध्यमसे ही श्रीहरि संसारकी सृष्टि एवं संचालन करते हैं।
धरणि! तुम उन्हीं भगवान् नारायणकी आदि मूर्ति हो, उनकी दूसरी मूर्ति जल और तीसरी मूर्ति तेज है। इसी प्रकार वायुको चौथी और आकाशको पाँचवीं मूर्ति कहते हैं। ये सभी उन्हीं परब्रह्म परमात्माकी मूर्तियाँ हैं। इनके अतिरिक्त क्षेत्रज्ञ, बुद्धि एवं अहंकार—ये उनकी तीन मूर्तियाँ और हैं। इस प्रकार उनकी आठ मूर्तियाँ हैं। देवि! यह सारा जगत् भगवान् नारायणसे ओत-प्रोत है। मैंने तुम्हें ये सभी बातें बता दीं। अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो?
पृथ्वी बोली—भगवन्! नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीहरिके परायण होनेके लिये कहनेपर राजा प्रियव्रत किस कार्यमें प्रवृत्त हुए? मुझे यह बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! मुनिवर नारदकी विस्मयजनक बात सुनकर राजा प्रियव्रतको
* नारं पानीयमित्युक्तं पितॄणां तद्ददौ भवान्। तदाप्रभृति ते नाम नारदेति भविष्यति॥ (३।२३)
| १८ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय ४ |
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महान् आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपने राज्यको सात भागोंमें बाँटकर पुत्रोंको सौंप दिया और स्वयं तपस्यामें संलग्न हो गये। परब्रह्म परमात्माके 'नारायण' नामका जप करते-करते उनकी मनोवृत्ति भगवान् नारायणमें स्थिर हो गयी; अतः उन्हें देहत्यागके पश्चात् भगवान्के परमधामकी प्राप्ति हुई। सुन्दरि! अब ब्रह्माजीसे सम्बन्ध रखनेवाला एक दूसरा प्रसङ्ग है, उसे सुनो।
प्राचीन कालमें अश्वशिरा नामके एक परम धार्मिक राजा थे। उन्होंने अश्वमेध यज्ञके द्वारा भगवान् नारायणका यजन किया था, जिसमें उन्होंने बहुत बड़ी दक्षिणा बाँटी थी। यज्ञकी समाप्तिपर उन राजाने अवभृथ स्नान किया। इसके पश्चात् वे ब्राह्मणोंसे घिरे हुए बैठे थे, उसी समय भगवान् कपिलदेव वहाँ पधारे। उनके साथ योगिराज जैगीषव्य भी थे। अब महाराज अश्वशिरा बड़ी शीघ्रतासे उठे, अत्यन्त हर्षके साथ उनका सत्कार किया और तत्काल दोनों मुनियोंके विधिवत् स्वागतकी व्यवस्था की। जब दोनों मुनिश्रेष्ठ भलीभाँति पूजित होकर आसनपर विराजमान हो गये, तब महापराक्रमी राजा अश्वशिराने उनकी ओर देखकर पूछा—'आप दोनों अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिवाले और योगके आचार्य हैं। आपने कृपापूर्वक स्वयं अपनी इच्छासे यहाँ आकर मुझे दर्शन दिया है। आप मनुष्योंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेवता हैं। आप दोनों मेरे इस संशयका समाधान करें कि भगवान् नारायणकी आराधना मैं कैसे करूँ?'
दोनों ऋषियोंने कहा—राजन्! तुम नारायण किसे कहते हो? महाराज! हम दो नारायण तो तुम्हारे सामने प्रत्यक्षरूपसे उपस्थित हैं।
राजा अश्वशिरा बोले—आप दोनों महानुभाव ब्राह्मण हैं, आपको सिद्धि सुलभ हो चुकी है। तपस्यासे आपके पाप भी नष्ट हो गये—यह मैं मानता हूँ, किंतु 'हम दोनों नारायण हैं,' ऐसा आपलोग कैसे कह रहे हैं? भगवान् नारायण तो देवताओंके भी देवता हैं। शङ्ख, चक्र और गदासे उनकी भुजाएँ अलङ्कृत रहती हैं। वे पीताम्बर धारण करते हैं। गरुड़ उनका वाहन है। भला, संसारमें उनकी समानता कौन कर सकता है?
(भगवान् वराह कहते हैं—) कपिल और जैगीषव्य—ये दोनों ऋषि कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे। वे राजा अश्वशिराकी बात सुनकर हँस पड़े और बोले—'राजन्! तुम विष्णुका दर्शन करो।' इस प्रकार कहकर कपिलजी उसी क्षण स्वयं विष्णु बन गये और जैगीषव्यने गरुड़का रूप धारण कर लिया। अब तो उस समय राजाओंके समूहमें हाहाकार मच गया। गरुड़वाहन सनातन भगवान् नारायणको देखकर महान् यशस्वी राजा अश्वशिरा हाथ जोड़कर कहने लगे—'विप्रवरो! आप दोनों शान्त हों। भगवान् विष्णु ऐसे नहीं हैं। जिनकी नाभिसे उत्पन्न कमलपर प्रकट होकर ब्रह्मा अपने रूपसे विराजते हैं, वह रूप परमप्रभु भगवान् विष्णुका है।'
कपिल एवं जैगीषव्य—ये दोनों मुनियोंमें श्रेष्ठ थे। राजा अश्वशिराकी उक्त बात सुनकर उन्होंने योगमायाका विस्तार कर दिया। अब कपिलदेव पद्मनाभ विष्णुके तथा जैगीषव्य प्रजापति ब्रह्माके रूपमें परिणत हो गये। कमलके ऊपर ब्रह्माजी सुशोभित होने लगे और उनके श्रीविग्रहसे कालाग्निके तुल्य लाल नेत्रोंवाले परम तेजस्वी रुद्रका प्राकट्य हो गया। राजाने सोचा—'हो-
अध्याय ४ ] अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका दर्शन कराना १९
न-हो यह इन योगीश्वरोंकी ही माया है; क्योंकि जगदीश्वर इस प्रकार सहज ही दृष्टिगोचर नहीं हो सकते, वे सर्वशक्तिसम्पन्न श्रीहरि तो सदा सर्वत्र विराजते हैं। भूत-प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वि! राजा अश्वशिरा अपनी सभामें इस प्रकार कह ही रहे थे कि उनकी बात समाप्त होते-न-होते खटमल, मच्छर, जूँ, भौंरे, पक्षी, सर्प, घोड़े, गाय, हाथी, बाघ, सिंह, शृगाल, हरिण एवं इनके अतिरिक्त और भी करोड़ों ग्राम्य एवं वन्य पशु राजभवनमें चारों ओर दिखायी पड़ने लगे। उस समय झुंड-के-झुंड प्राणियोंके समूहको देखकर राजाके आश्चर्यकी सीमा न रही। राजा अश्वशिरा यह विचार करने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये। इतनेमें ही सारी बात उनकी समझमें आ गयी। अहो! यह तो परम बुद्धिमान् कपिल और जैगीषव्य मुनिका ही माहात्म्य है। फिर तो राजा अश्वशिराने हाथ जोड़कर उन ऋषियोंसे भक्तिपूर्वक पूछा—'विप्रवरो! यह क्या प्रपञ्च है?'
कपिल और जैगीषव्यने कहा—राजन्! हम दोनोंसे तुम्हारा प्रश्न था कि भगवान् श्रीहरिकी आराधना एवं उनको प्राप्त करनेका क्या विधान है? महाराज! इसीलिये हम लोगोंने तुमको यह दृश्य दिखलाया है। राजन्! सर्वज्ञ भगवान् श्रीहरिकी यह त्रिगुणात्मिका सृष्टि है, जो तुम्हें दृष्टिगोचर हुई है। भगवान् नारायण एक ही हैं। वे अपनी इच्छाके अनुसार अनेक रूप धारण करते रहते हैं। किसी कालमें जब वे अपनी अनन्त तेजोरराशिको आत्मसात् करके सौम्यरूपमें सुशोभित होते हैं, तभी मनुष्योंको उनकी झाँकी प्राप्त होती है। अतएव उन नारायणकी अव्यक्त रूपमें आराधना सद्यः फलवती नहीं हो पाती।* वे जगत्प्रभु परमात्मा ही सबके शरीरमें विराजमान हैं। भक्तिका उदय होनेपर अपने शरीरमें ही उन परमात्माका साक्षात्कार हो सकता है। वे परमात्मा किसी स्थानविशेषमें ही रहते हों, ऐसी बात नहीं है; वे तो सर्वव्यापक हैं। महाराज! इसी निमित्त हम दोनोंके प्रभावसे तुम्हारे सामने यह दृश्य उपस्थित हुआ है। इसका प्रयोजन यह है कि भगवान्की सर्वव्यापकतापर तुम्हारी आस्था दृढ़ हो जाय। राजन्! इसी प्रकार तुम्हारे इन मन्त्रियों एवं सेवकोंके—सभीके शरीरमें भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। राजन्! हमने जो देवता एवं कीट-पशुओंके समूह तुमको अभी दिखलाये, वे सब-के-सब विष्णुके ही रूप हैं। केवल अपनी भावनाको दृढ़ करनेकी आवश्यकता है; क्योंकि भगवान् श्रीहरि तो सबमें व्याप्त हैं ही। उनके समान दूसरा कोई भी नहीं है, ऐसी भावनासे उन श्रीहरिकी सेवा करनी चाहिये। राजन्! इस प्रकार मैंने सच्चे ज्ञानका तुम्हारे सामने वर्णन कर दिया। अब तुम अपनी परिपूर्ण भावनासे भगवान् नारायणका, जो सबके परम गुरु हैं, स्मरण करो। धूप-दीप आदि पूजाकी सामग्रियोंसे ब्राह्मणोंको तथा तर्पणद्वारा पितरोंको तृप्त करो। इस प्रकार ध्यानमें चित्तको समाहित करनेसे भगवान् नारायण शीघ्र ही सुलभ हो जाते हैं। [अध्याय ४]
* श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है—
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ (१२।५)
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्त चित्तवाले पुरुषोंके साधनमें क्लेश विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।
५-रैभ्य मुनि और राजा वसुका देवगुरु बृहस्पतिसे संवाद तथा राजा अश्वशिराद्वारा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणका स्तवन एवं उनके श्रीविग्रहमें लीन होना
२० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५
रैभ्य मुनि और राजा वसुका देवगुरु बृहस्पतिसे संवाद तथा राजा अश्वशिराद्वारा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणका स्तवन एवं उनके श्रीविग्रहमें लीन होना
राजा अश्वशिरा बोले—'मुनिवरो! मेरे मनमें एक संदेह है, उसे दूर करनेमें आप दोनों पूर्ण समर्थ हैं। उसके फलस्वरूप मुझे मुक्ति सुलभ हो सकती है।' उनके इस प्रकार कहनेपर योगीश्वर, परम धर्मात्मा कपिलमुनिने यज्ञ करनेवालोंमें श्रेष्ठ उस राजासे कहा।
कपिलजीने कहा—राजन्! तुम परम धार्मिक हो। तुम्हारे मनमें क्या संदेह है? बताओ, उसे सुनकर मैं दूर कर दूँगा।
राजा अश्वशिरा बोले—मुने! मोक्ष पानेका अधिकारी कर्मशील पुरुष है या ज्ञानी?—मेरे मनमें यह संदेह उत्पन्न हो गया है। यदि मुझपर आपकी दया हो तो इसे दूर करनेकी कृपा करें।
कपिलजीने कहा—महाराज! प्राचीन कालकी बात है, यही प्रश्न ब्रह्माजीके पुत्र रैभ्य तथा राजा वसुने बृहस्पतिसे पूछा था। पूर्वकालमें चाक्षुष मन्वन्तरमें एक अत्यन्त प्रसिद्ध राजा थे, जिनका नाम था वसु। वे बड़े विद्वान् और विख्यात दानी थे। ब्रह्माजीके वंशमें उनका जन्म हुआ था। राजन्! वे महाराज वसु ब्रह्माजीका दर्शन करनेके विचारसे ब्रह्मलोकको चल पड़े। मार्गमें ही चित्ररथ नामक विद्याधरसे उनकी भेंट हो गयी। राजाने प्रेमपूर्वक चित्ररथसे पूछा—'प्रभो! ब्रह्माजीका दर्शन किस समय हो सकता है?' चित्ररथने कहा—'ब्रह्माजीके भवनमें इस समय देवताओंकी सभा हो रही है।' ऐसा सुनकर वे नरेश ब्रह्मभवनके द्वारपर ठहर गये। इतनेमें महान् तपस्वी रैभ्य भी वहीं आ गये। उनको देखकर राजा वसुके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उनका रोम-रोम आनन्दसे खिल उठा। तदनन्तर रैभ्य मुनिकी पूजा करके राजाने उनसे पूछा—'मुने! आप कहाँ चल पड़े?'
रैभ्य मुनि बोले—'महाराज! मैं देवगुरु बृहस्पतिके पाससे आ रहा हूँ। किसी कार्यके विषयमें पूछनेके लिये मैं उनके पास चला गया था।' रैभ्य मुनि इस प्रकार बोल ही रहे थे कि इतनेमें ब्रह्माजीकी वह विशाल सभा विसर्जित हो गयी। सभी देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। अतः अब बृहस्पतिजी भी वहीं आ गये। राजा वसुने उनका स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् तीनों ही एक साथ बृहस्पतिके भवनपर गये। राजेन्द्र! वहाँ रैभ्य, बृहस्पति एवं राजा वसु—तीनों बैठ गये। सबके बैठ जानेपर देवताओंके गुरु बृहस्पतिने रैभ्य मुनिसे कहा—'महाभाग! तुम्हें तो स्वयं वेद एवं वेदाङ्गोंका पूर्ण ज्ञान है। कहो, तुम्हारा मैं कौन-सा कार्य करूँ?'
रैभ्य मुनि बोले—बृहस्पतिजी! कर्मशील और ज्ञानसम्पन्न—इन दोनोंमें कौन मोक्ष पानेका अधिकारी है? इस विषयमें मुझे संदेह उत्पन्न हो गया है। प्रभो! आप इसका निराकरण करनेकी कृपा करें।
बृहस्पतिजीने कहा—मुने! पुरुष शुभ या अशुभ जो कुछ भी कर्म करे, वह सब-का-सब भगवान् नारायणको समर्पण कर देनेसे कर्मफलोंसे लिप्त नहीं हो सकता। द्विजवर! इस विषयमें एक ब्राह्मण और व्याधका संवाद सुना जाता है। अत्रिके वंशमें उत्पन्न एक ब्राह्मण थे। उनकी वेदाभ्यासमें बड़ी रुचि थी। वे प्रातः, मध्याह्न तथा सायं—त्रिकाल स्नान करते हुए तपस्या करते थे। संयमन नामसे उनकी प्रसिद्धि थी। एक दिनकी बात है—वे ब्राह्मण धर्मारण्यक्षेत्रमें परम पुण्यमयी गङ्गानदीके तटपर स्नान करनेके उद्देश्यसे गये।