वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
६० • वेदान्तपरिभाषा [ समवायखण्डनम्
की अपेक्षा ( आवश्यकता ) होनी ही चाहिए। बिना उसके वह समवायी से कैसे सम्बन्धित हो सकेगा ?
अनवस्था दोष के निवारणार्थ यदि हम पूर्वोक्त विकल्पों में से दूसरे पक्ष का ( समवायी से बिना सम्बन्धित हुए ही समवाय विशिष्ट प्रत्यय का नियामक होता है ) ग्रहण करें तो ‘अतिप्रसंग’ दोष होगा। क्योंकि फिर तो कोई भी असम्बद्ध पदार्थ, विशिष्ट प्रत्यय का नियामक हो सकेगा। असम्बद्ध पट से भी ‘रूपी घटः’ प्रत्यय होने का प्रसंग प्राप्त होगा। सिवाय हम अद्वैतसिद्धांती आप तार्किकों से यह पूछते हैं कि समवाय अनेक हैं या एक ? आप उसे अनेक नहीं बता सकते, कारण यह है कि ‘समवायस्तु एक एव’, ‘विशेष’ पदार्थ के अनन्त होने पर भी ‘समवाय’ एक ही है—यह आप की परिभाषा है। इसलिए समवाय के अनेक मानने पर ‘अपसिद्धांत’ और ‘गौरव’ दोष प्राप्त होंगे। यदि ‘समवाय’ को एक बतावें तो रूप, ज्ञान आदि का समवाय वायु, घट आदि पर स्थित समवाय से पृथक् ( भिन्न ) न होने से ‘वायु रूपवान् है और घट विलक्षण गतिमान् है,’ प्रतीति होने का प्रसंग प्राप्त होगा। इस पर यदि आप ऐसा कहें कि वायु में रूप का, और घट में विलक्षण गति का अभाव होने से उपर्युक्त प्रतीति का प्रसंग कैसे प्राप्त होगा ? उत्तर—वायु में रूप की स्थिति के प्रयोजक ( कारण ) रूपसमवाय के रहने पर भी रूप का अभाव ( रूपं नास्ति ) बताने लगें तो ‘व्याघात’ दोष प्राप्त होगा।
इस प्रकार समवाय के सिद्ध न होने पर प्रत्यक्षगम्य कार्यत्व और ब्रह्मभिन्नत्व लिंगक अनुमान से तथा “हे सौम्य, यह समस्त कार्यरूप जगत्, उत्पत्ति से पूर्व सत् ही था,” इस श्रुति से सिद्ध ‘ब्रह्म से भिन्न सकल प्रपंच अनित्य है’ इस न्याय से नित्यत्व व समवेतत्व विशेषणों से युक्त जातित्व की घटत्वादि में असिद्धि है। ( समवाय की ही सिद्धि न होने से प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा घटत्वादिकों में जाति की सिद्धि नहीं होती। जाति में कार्यत्व होने से और वह ब्रह्मभिन्न होने से उसकी अनित्यता का अनुमान हो जाता है। एवं च अनुमान से भी जाति सिद्ध नहीं हो पाती। श्रुति से भी ‘समस्त प्रपंच अनित्य’ सिद्ध होने से नित्य व अनेकसमवेत जाति घटत्वादिकों में सिद्ध नहीं हो पाती ) ।
नैयायिकों से स्वीकृत जाति की इस प्रकार अप्रामाणिकता सिद्ध होने से ही ‘परोक्षत्व और अपरोक्षत्व’ को हम जातिरूप नहीं मानते। इसी प्रकार घटत्वादिकों के जातिरूप होने में भी कोई प्रमाण नहीं है। जाति की अप्रामाणिकता में तीन हेतु हैं— १—प्रत्यक्ष तो घटत्व की सत्ता में प्रमाण है, जातित्वरूपसाध्य की अप्रसिद्धि होने से अनुमान प्रमाण का अवसर ही नहीं प्राप्त होता। ३—जातिलक्षण घटित नित्यत्व, समवेतत्व, आदि की असिद्धि होने से भी जाति की सिद्धि नहीं हो पाती। इस पर तार्किक पूछता है कि आपने तो जाति की तरह उपाधि को भी अप्रामाणिक
ज्ञानप्रत्यक्षस्यनिष्कर्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६१
बताया था परन्तु तीन हेतुओं से मात्र जाति की परिभाषा अप्रामाणिक ठहरती है, उपाधि की नहीं। इस शंका का निरसन ग्रन्थकार 'एवमेव' ग्रन्थ से करते हैं। जातित्व की परिभाषा में अप्रामाणिकता दिखाने के लिये जो तीन हेतु दिये हैं, उन्हीं से उपाधित्व का भी निरसन हो जाता है। जैसे--'नीलघटत्व' आदि में उपाधित्व बतानेवाली आपकी नीलघटत्व की परिभाषा प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि १—'यह नीलघट है' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण नीलघटत्व के अस्तित्व में प्रमाण है, न कि नीलघटत्व के उपाधि होने में। २—उपाधित्व रूप साध्य के अप्रसिद्ध होने से तत्साधक अनुमान भी नहीं हो सकता। ( उपाधित्व रूप साध्य का साधक अनुमान¹—१—नील घटत्वादि उपाधि है, २—क्योंकि उस नील घटत्वादि पर जातिभिन्नसामान्य धर्मत्व है अर्थात् नीलघटत्व', 'घटत्व' जाति से भिन्न सामान्य धर्म है, ३--आकाशत्वादि के समान। परन्तु इस अनुमान में उपाधित्व रूप साध्य ही अप्रसिद्ध है।) ३—समवाय आदि की सिद्धि न होने से उपाधित्व की भी सिद्धि नहीं होती।
शंका—यद्यपि जाति और उपाधि दोनों अप्रमाणिक हैं तथापि एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का रहना कहाँ तक उचित है? इस प्रश्न का उत्तर—
पर्वतो वह्निमानित्यादौ च पर्वतांशे वह्न्यंशे चान्तःकरणवृत्तिभेदाङ्गीकारेण तत्त²द्वृत्त्यवच्छेदकभेदेन परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरेकत्र चैतन्ये वृत्तौ न³ विरोधः। तथा च तत्तदिन्द्रिययोग्य-वर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं तत्तदाकारवृत्त्यवच्छिन्नज्ञानस्य तत्तदंशे प्रत्यक्षत्वम् ।।
अर्थ—'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमितिज्ञान में हम 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में अन्तःकरणवृत्ति का भेद मानते हैं। 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में भिन्न-भिन्न अन्तःकरणवृत्तियाँ हैं, यह हमारा सिद्धान्त होने से उन भिन्न वृत्तियों का अवच्छेदक भी (भेदक भी) भिन्न है। इसलिए एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्वरूप परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है। अर्थात् वे दोनों धर्म, एक ही चैतन्य में रह सकते हैं। तस्मात् उन इन्द्रियों के योग्य, वर्तमान
१. 'नीलघटत्वादिकमुपाधिः जातिभिन्नसामान्यधर्मत्वात् 'आकाशत्वादिवत्' इत्यनुमानस्य अनवकाशात् समवायाद्यसिद्ध्या उपाधित्वासिद्धेश्च इत्येवं निरसनीयम्।
२. 'तत्तवच्छेदकः' इति पाठान्तरम्।
३. 'न कश्चिद् विरोधः'—इति पाठान्तरम्।
| ६२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षलक्षणम् |
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विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के साथ, तत्तद्विषयाकार हुई इन्द्रियवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद होना ही उस अंश में ज्ञान का प्रत्यक्षत्व (प्रत्यक्ष) है ।
**विवरण—**पीछे कह चुके हैं कि घटावच्छिन्न आकाश, मठावच्छिन्न आकाश से भिन्न नहीं है, क्योंकि 'घट' और 'मठ' दोनों विभाजक पदार्थ एक ही देश में स्थित रहते हैं । उसी तरह अन्तःकरण-वृत्ति और घट को एकदेशस्थ होने से उन्हें उपधेय-भेदकत्व नहीं है । वैसे ही 'पर्वत वह्निमान् है' इस ज्ञान में 'पर्वत' और 'वह्नि' इन दो उपाधियों को भी एक-देशस्थत्व है इसलिये उन्हें उपधेयभेदकत्व नहीं है । तब एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व कैसे सम्भव है ? इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार करते हैं—'यह घट' इस प्रत्यक्ष ज्ञान में घटावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरण-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य एक ही है । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में, चक्षुरिन्द्रिय का बाह्य पर्वत से सन्निकर्ष होकर पर्वताकार वृत्ति होती है, उस वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य, पर्वत के देश में रहता है अर्थात् उस वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का देश, बाह्य पर्वत है । परन्तु वह्न्याकारवृत्ति, व्याप्तिज्ञान से पैदा होती हुई हृदयस्थ चैतन्य की अवच्छेदिका है । इस कारण जिस अनुमितिज्ञान में 'पक्ष' का प्रत्यक्ष रहता है, उस 'पक्ष' के अंश में अपरोक्षत्व और परोक्षवह्नि के अंश में परोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है । ऐसा होने से प्रत्येक विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का प्रत्येक इन्द्रिययोग्य, वर्तमान और अबाधित विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से अभेद होना ही ज्ञानांश में प्रत्यक्षत्व कार्य प्रयोजक है, यही पूर्वोक्त ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का—'प्रमाण चैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद' प्रयोजक शब्द से विवक्षित अर्थ है । इस प्रकार ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताकर अब विषयगतप्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताते हैं (विकल्प के प्रथम पक्ष का उत्तर देकर अब द्वितीय पक्ष का दे रहे हैं) ।
घटादेर्विषयस्य प्रत्यक्ष¹त्वं तु प्रमात्रभिन्नत्वम् ।²
अर्थ—(द्वितीय पक्ष में) प्रमाता से घटादि विषय का अभिन्नत्व ही विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है ।
विवरण—'यह घट यह ज्ञान भी प्रत्यक्ष है और उस ज्ञान का विषय जो 'घट' वह भी प्रत्यक्ष है । इसी का दो प्रकार से—'घट का ज्ञान प्रत्यक्ष है' और 'घट प्रत्यक्ष है'—निर्देश किया जाता है । उनमें से ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यहाँ तक बताया गया । अब इसके आगे सिद्धान्ती विषयगत प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को
१. 'प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्याभिन्नत्वम्' इत्यर्थः ।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६३
बताता है। घटादि विषय का प्रमातृ-अभिन्नत्व (प्रमाता से अभिन्न होना) ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है, मूल में जो 'तु' शब्द है, वह नैयायिकों के विषय प्रत्यक्षत्व का निरसन करने के लिये है। नैयायिक—'इन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वं विषयप्रत्यक्षत्वम्' इन्द्रियों से उत्पन्न हुए-ज्ञान का विषय होना ही विषय का प्रत्यक्षत्व है'- लक्षण करते हैं। परन्तु वह (विषयप्रत्यक्ष का लक्षण) मनोरूप इन्द्रिय से होनेवाले अनुमितिज्ञान में अतिव्याप्त होता है। इसलिए नैयायिक के बताये हुए 'विषयप्रत्यक्षत्व' का निरसन कर 'घटादि विषय से प्रमाता का अभेद' इस विषयप्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को यहाँ बताया है। इस पर शंका करते हैं—
ननु कथं घटादेरन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्याभेदः ? अहमिमं पश्यामि इति भेदानुभावविरोधादिति चेत् ,
अर्थ—घटादि-विषयों का अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्य से अभेद कैसे सम्भव है ? क्योंकि विषय का प्रमाता से अभेद यदि मान लिया जाय तो मैं इस घट को देखता हूँ' इस भेदानुभव से विरोध होगा।
विवरण—'प्रमेय का प्रमाता से अभिन्नत्व (ऐक्य होना) ही घटादि प्रमेय का प्रत्यक्षत्व है' ऐसा आप कह रहे हैं। परन्तु 'प्रमात्राभिन्नत्व' से क्या तात्पर्य है ? घटादि विषयों का 'अभेद' या 'घटादिविषयावच्छिन्न चैतन्य का प्रमाता से अभेद' ।
इन दोनों विकल्पों में प्रथम विकल्प उचित नहीं, क्योंकि विषय स्वयं जड होने से उसका चेतन-प्रमाता से अभेद हो नहीं सकता। दूसरा विकल्प भी उचित नहीं, क्योंकि 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसी प्रतीति के समान 'मैं घट हूँ' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए। परन्तु 'मैं घट हूँ' इसी प्रतीति किसी को भी न होकर 'मैं इस घट को देखता हूँ' इस प्रकार तद्विरुद्ध भेदप्रतीति होती है। ऐसी स्थिति में 'प्रमात्राभिन्नत्व' का सम्भव कैसे हो सकता है? 'सिद्धान्ती' 'इति चेत्' ग्रन्थ से उपयुक्त शंका का अनुवाद कर 'उच्यते' से उसके निवारण की प्रतिज्ञा करता है—
३. 'अहमिमं घटं पश्यामि' इत्यनुभवे अस्मदर्थस्य प्रमातुः कर्तृतया प्रकाशः, इदमर्थस्य विषयस्य घटादेः कर्मतया प्रकाशः। कर्तृ-कर्मणोश्च भेदः सर्वानुभवसिद्धः। तथा च अस्मिन् अनुभवे प्रमातृ-विषययोर्भेदानुभवात् तदभेदो न युक्त इत्याशयः।
तत्रेदं समाधानम्—'प्रमात्राभेदः' इत्यनेन घटावच्छिन्नस्य अन्तःकरणावच्छिन्नस्य च ऐक्यं न विवक्ष्यते, येन विरोधो भवेत्, अपितु प्रमातृ-सत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावो विवक्षितः। 'प्रमातृसत्ता' इत्यस्य प्रमातृत्वलक्षणसत्ता बोध्या, न तु तन्निष्ठसत्ता-जातिः, प्रमातृ-प्रमेयनिष्ठसत्ताजातेरेकतया तन्निष्ठसत्तातिरिक्तसत्ताया असिद्धेः।
| ६४ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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उच्यते। प्रमात्रभेदो नाम न ^१तदैक्यम्, किन्तु प्रमातृसत्ताऽतिरिक्तसत्ताकत्वाभावः। तथा च^२ घटादेः स्वावच्छिन्नचैतन्ये^३ऽध्यस्ततया विषयचैतन्यसत्तैव घटादिसत्ता, अधिष्ठानसत्ताऽतिरिक्ताया आरोपितसत्ताया अनङ्गीकारात्। विषयचैतन्यञ्च पूर्वोक्तप्रकारेण प्रमातृचैतन्यमेवेति प्रमातृचैतन्यस्यैव घटाद्यधिष्ठानतया प्रमातृसत्तैव घटादिसत्ता नान्येति सिद्धं घटादेरपरोक्षत्वम् ॥
अर्थ—'विषय का प्रमात्रभेद कैसे' यदि पूछो तो कहते हैं—'प्रमात्रभेद' (प्रमातृ + अभेद) का अर्थ प्रमात्रैक्य (प्रमातृ + ऐक्य) नहीं। किन्तु 'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य रूप प्रमाता की सत्ता से भिन्न, घटादिविषय की सत्ता का अभाव' ही यहाँ 'प्रमात्रभेद' शब्द से विवक्षित है। अतः घटादिविषयों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य में घटादि विषयों का अध्यारोप (अध्यास) हुआ होने से विषयचैतन्य-सत्ता ही घटादिविषयों की सत्ता है। क्योंकि हम (वेदान्ती) अधिष्ठान की सत्ता से, आरोपित की सत्ता को भिन्न नहीं मानते। पूर्वोक्त प्रकार से प्रमातृचैतन्य ही विषयचैतन्य है। प्रमातृचैतन्य में घटादिविषयों की अधिष्ठानता होने से प्रमातृसत्ता ही घटादिसत्ता है, उससे भिन्न नहीं। इससे घटादिकों का अपरोक्षत्व (प्रत्यक्षत्व) सिद्ध हुआ।
विवरण—प्रमात्रभेद का अर्थ यदि यहाँ ऐसा होता कि "घटादि विषय और घटाद्यवच्छिन्न या अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य का ऐक्य" तो विरोध हुआ होता' परन्तु यहाँ 'विषय और चैतन्य का (घटादि विषयों का प्रमाता से ऐक्य) ऐक्य' रूप अर्थ विवक्षित नहीं। अर्थात् 'अभेद' का अर्थ 'ऐक्य' न होकर 'प्रमातृलक्षण जो सत्ता, वही प्रमेय सत्ता है, अर्थात् प्रमातृसत्ता से विषय की सत्ता का पृथक् न रहना' यही प्रमातृभेद शब्द का अर्थ है। यहाँ 'सत्ता' शब्द का अर्थ 'प्रमाता में रहनेवाली सत्तारूप जाति' नहीं है। कारण प्रमाता, और प्रमेय, (विषय) में रहनेवाली जो 'सत्ता' जाति उसके एक (अभिन्न) ही होने से प्रमातृनिष्ठ सत्ता से अतिरिक्त प्रमातृत्व व प्रमेयत्व (स्वरूप) सत्ता असिद्ध है। इस प्रकार सत्तैक्यरूप प्रमात्रभेद के होने से तात्पर्य यह निकलता है कि घटादि-विषय, घटाद्यवच्छिन्न-चैतन्य में आरोपित है। अतः विषय-चैतन्य की जो सत्ता है, वही घटादि-विषयों की सत्ता है। अर्थात् आरोपित घटादि-विषयों की सत्ता, अधिष्ठानरूप विषयावच्छिन्न-चैतन्य की सत्ता से पृथक् नहीं है। क्योंकि हम
१. 'तावदै०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'हि'-इति पाठान्तरम्।
३. 'चैतन्याध्यस्त०' इति पाठान्तरम्।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६५
'अधिष्ठान की सत्ता से आरोपित की सत्ता को पृथक् नहीं मानते' । शुक्ति रूप अधिष्ठान की सत्ता से आरोपित रजत की सत्ता पृथक् नहीं है । शुक्ति की सत्ता से ही शुक्तिरजत 'सत्तावत्' हुए की तरह प्रतीत होता है ।
पूर्वोक्त तडागोदकन्याय के अनुसार (जैसे तडागोदक ही केदारोदक होता है) प्रमातृचैतन्य ही विषयचैतन्य ( प्रमेयचैतन्य ) है । उस कारण प्रमातृचैतन्य ही घटादिविषयों का अधिष्ठान है । आरोपित घटादिकों का अधिष्ठान प्रमातृचैतन्य होने से प्रमातृचैतन्य की सत्ता ही घटादिकों की सत्ता है । प्रमातृचैतन्य की सत्ता से घटादि विषयों की सत्ता पृथक् नहीं है । इसलिये प्रमातृ-( प्रमाता ) की सत्ता से घटादिविषयों की सत्ता का अतिरिक्त (भिन्न) न होना ही घटादिकों को अपरोक्षत्व (प्रत्यक्ष) है । चैतन्य के नित्य होने से उसकी सत्ता भी नित्य है । परन्तु प्रमातृचैतन्य, प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य ( प्रमेयचैतन्य ) इस ( चैतन्य ) भेद के औपाधिक होने से उनकी सत्ता अनित्य है । घट, पट आदि विषयों को देखते समय उस उस विषय से सम्बद्ध वह वह त्रिपुटीरूप चैतन्य (घटप्रमातृ-चैतन्य, घटाकारवृत्तिचैतन्य और घटविषयचैतन्य) भी नवीन उत्पन्न हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है । इसीलिये ऊपर प्रमातृसत्ता का अर्थ प्रमातृलक्षणसत्ता बता चुके हैं, तन्निष्ठ सत्ताजाति नहीं । उस उस विषय के प्रमाता की जो सत्ता, वही उस उस प्रमेय की सत्ता है, यह तात्पर्य है । इस प्रकार घटादि-विषय का 'प्रमात्रभेद' का अर्थ प्रमातृचैतन्याभेद नहीं है, और अभेद का अर्थ ऐक्य भी नहीं, किन्तु प्रमाता की सत्ता ही घट की सत्ता है । अब मूल में 'प्रमातृचैतन्य' न कहकर 'प्रमातृ' ही क्यों कहा गया ? उसे कहते हैं—
अनुमित्यादिस्थले¹ त्वन्तःकरणस्य वह्न्यादिदेशनिर्गमनाभावेन-
वह्न्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्यानात्मकतया वह्न्यादिसत्ता
प्रमातृसत्तातो भिन्नेति नातिव्याप्तिः ।
**अर्थ—**परन्तु अनुमिति आदि ज्ञानों में अन्तःकरण, वृत्ति के द्वारा अनुमेय वह्नि आदि के देश में नहीं जाता । उस कारण वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य को प्रमातृचैतन्यरूपता नहीं है । इसी से वह्नि आदि की सत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न है । इस कारण पूर्वोक्त घटादिविषय के प्रत्यक्ष-लक्षण की अनुमेय वह्नि आदि परोक्ष-विषयों में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
**विवरण—**घटादि-विषयों के प्रत्यक्ष में प्रयोजक 'प्रमात्रभिन्नत्व' को यदि बतावें तो अनुमेय विषयों में ( अनुमिति के विषयों में ) अतिव्याप्ति होगी । क्योंकि 'प्रमात्रभिन्नत्व' का अर्थ 'प्रमातृचैतन्याभिन्नत्व' करने से अनुमेय वह्नि आदि की सत्ता, चैतन्य
१. 'लेऽन्तः'–इति पाठान्तरम् ।
| ६६ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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की सत्ता से पृथक् ( भिन्न ) नहीं है । ऐसी शंका हो सकती है । परन्तु अनुमेय विषय की सत्ता, चैतन्य की सत्ता से पृथक् न होने पर भी अनुमेय विषय प्रमातृरूप नहीं होता, इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है । घटादि के प्रत्यक्ष-ज्ञानों में अन्तःकरण-वृत्ति, घटादि-विषयों के प्रदेश में जाकर विषय के आकार को धारण करती है । इसलिये वहाँ घटादि विषयों का प्रमाता के साथ अभेद ( प्रमात्रभेद ) सम्भव होता है । परन्तु अनुमिति आदि ज्ञानों में अन्तःकरण-वृत्ति, विषय के प्रदेश में नहीं जाती । इसलिये वहाँ वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य इन दोनों का अभेद नहीं होता । अतः अनुमिति विषय की सत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न है । इसी कारण विषयगत-प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक-लक्षण की अनुमेय विषय में अतिव्याप्ति नहीं होती । लक्षण में इसीलिये 'चैतन्य' पद न रखकर 'प्रमात्रभेद' शब्द रखा गया है ।
इस पर पुनः वादी दूसरे प्रकार से अतिव्याप्ति की शंका करता है और सिद्धान्ती उसका थोड़े में ही निरसन करता है ।
नन्वेवमपि धर्माधर्मादिगोचरानुमित्यादिस्थले धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षत्वापत्तिः, ^१'धर्माद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नतया धर्मादिसत्तायाः प्रमातृसत्तानतिरेकादिति चेत् । न । योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात् ।
अर्थ—'प्रमात्रभेद' का अर्थ 'प्रमातृसत्ता से विषयसत्ता का भिन्न न रहना' मानने पर भी धर्माधर्म आदि परोक्ष पदार्थों को विषय करने वाले अनुमिति आदि स्थलों में धर्माधर्म के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होगा । क्योंकि प्रमातृचैतन्य से धर्माधर्मादि-विषयावच्छिन्न-चैतन्य का यहाँ पर अभेद है ही । ( विषयचैतन्य और प्रमातृचैतन्य का अभेद है ) उस कारण धर्मादिसत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न नहीं है । इसलिए विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक जो प्रमात्रभेद, उसकी परोक्ष धर्मादि-विषय में अतिव्याप्ति बताना उचित नहीं है, क्योंकि 'योग्यत्व' को भी विषयविशेषणत्व है, अर्थात् विषय में 'योग्य' इस विशेषण के लगाने से अतिव्याप्ति का निवारण होता है । क्योंकि धर्माधर्मादिकों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है ( प्रत्यक्ष के योग्य विषय 'धर्माधर्मादि' नहीं है ) ।
विवरण—'प्रमाता की प्रमातृलक्षणसत्ता से प्रमेय की सत्ता का पृथक् न होना' इस लक्षण की पूर्वोक्त प्रकार से अतिव्याप्ति, अनुमेय वह्नि आदि विषयों में अन्तःकरण के न जाने से न होने पर भी धर्म आदि परोक्षविषयक अनुमितिज्ञान में अतिव्याप्ति होती है अर्थात् धर्मादिकों का प्रत्यक्ष होता है कहना पड़ेगा । क्योंकि धर्मादि विषयों से अवच्छिन्न अन्तःकरणस्थ-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य का अभेद होने से धर्मादि की
१. 'धर्माधर्माद्यव०'-इति पाठान्तरम् ।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६७
सत्ता प्रमातृचैतन्य से भिन्न नहीं है । इस अतिव्याप्ति के वारण के लिए लक्षणगत 'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने से धर्मादिकों के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त नहीं होगा। यह समाधान दिया गया है।
किसी भी वादी के मत में 'धर्माधर्म पदार्थ' प्रत्यक्ष के योग्य नहीं है। सभी दार्शनिक धर्माधर्म को परोक्ष ही मानते हैं। इससे ( 'योग्य विषयावच्छिन्न चैतन्य' और प्रमाता के अभेद को विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक मानने से ) धर्माधर्मादि-परोक्ष-विषय में अतिव्याप्ति नहीं होने पाती ।
तथापि वादी पुनः दूसरे प्रकार से अतिव्याप्ति की शंका करता है—
नन्वेवमपि रूपी घट इति प्रत्यक्षस्थले घटगतपरिमाणादेः प्रत्यक्षत्वापत्तिः रूपावच्छिन्न-चैतन्यस्य परिमाणाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य चैकतया रूपावच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभेदे परिमाणाद्यवच्छिन्न-चैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया परिमाणादिसत्तायाः प्रमातृसत्ताऽतिरिक्तत्वाभावादिति चेत् ।
**अर्थ—**पूर्वोक्त प्रकार से ( 'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने पर भी ) धर्मादि-परोक्ष-विषयों में विषयगतप्रत्यक्षत्व-प्रयोजक-लक्षण की अतिव्याप्ति न होने पर भी 'यह घट रूपवान् हैं' इस प्रत्यक्षप्रमा में घटगत-परिमाणादिकों का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि रूपावच्छिन्नचैतन्य और परिमाणावच्छिन्न-चैतन्य, दोनों का अभेद है । इस अभेद के कारण रूपावच्छिन्न चैतन्य का प्रमातृचैतन्य से अभेद सिद्ध होने के कारण परिमाणावच्छिन्न-चैतन्य का भी प्रमातृभिन्नत्व सिद्ध होता है । जिससे परिमाणादि सत्ता प्रमातृसत्ता से पृथक् प्रतीत नहीं होती ।
अर्थात् प्रमातृसत्ता ही परिमाणसत्तारूप होने से घटरूप के प्रत्यक्ष ज्ञान में घटगत-परिमाणादिकों का भी ज्ञान होने लगेगा । जिससे पूर्वोक्त प्रत्यक्षलक्षण की अलक्ष्य-भूत घटगत-परिमाणादि में अतिव्याप्ति होती है ।
**विवरण—**जिस समय घट के रूप का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है उसी समय घटगत परिमाण का भी प्रत्यक्ष होता है अतः उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति होती है। रूप-प्रत्यक्ष होने के समय घट-परिमाण का भी प्रत्यक्ष होता है यह मानना होगा । क्योंकि रूपावच्छिन्न चैतन्य ही परिमाणावच्छिन्न चैतन्य है इसलिए परिमाणादिकों की सत्ता प्रमातृसत्ता से भिन्न नहीं है, कारण यह है कि परिमाणादि कल्पित होने से उनके अधिष्ठानभूत चैतन्य की सत्ता ही परिमाणादिकों की सत्ता है । और स्वाधिष्ठानभूत चैतन्य के प्रमातृरूप होने से पूर्वोक्त लक्षण की परिमाण आदि में अतिव्याप्ति होती है ।
६८ वेदान्तपरिभाषा [ विषयप्रत्यक्षविचारः
इस प्रकार वादी के शंका करने पर सिद्धान्ती 'न' से निरसन की प्रतिज्ञा करके 'तत्तदाकार०' आदि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का निरसन करता है—
न। तत्तदाकारवृत्त्युपहितत्वस्यापि प्रमातृविशेषणत्वात् । रूपा- कारवृत्तिदशायां परिमाणाद्याकार-वृत्त्यभावेन परिमाणाद्याकार-वृत्त्यु- पहित-प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वाभावेनाऽतिव्याप्त्यभावात् ॥
अर्थ—( 'रूपी घटः' यह रूपवान् घट है, इस रूपप्रत्यक्षस्थल में घटगत-परिमाण आदि का भी प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होने का भय करना व्यर्थ है ) पूर्व-प्रदर्शित अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । क्योंकि 'प्रमात्रभेद' इस लक्षण के 'प्रमातृ' पद का विशेषण है 'तत्तदाकारवृत्त्युपहितत्व' । इसलिए भिन्न-भिन्न विषयाकार वृत्तिरूप उपाधि से उपहित ( युक्त ) हुए प्रमाता की सत्ता से उन उन विषयों की पृथक् सत्ता का न होना ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है । तात्पर्य यह हुआ कि अन्तःकरणवृत्ति जब रूपाकार होती है तब वह घटगत-परिमाणादि के आकार की नहीं रहती । अर्थात् रूपाकार-वृत्ति के समय परिमाणाकार-वृत्ति का अभाव रहता है । इसलिए परिमाणा-कारवृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्य से परिमाणादि विषय की सत्ता अभिन्न नहीं होती । ( उन विषयों में प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्व नहीं होता ) इसलिए 'रूपी घटः' इस प्रत्यक्ष के समय परिमाणादि विषयों का प्रत्यक्ष प्राप्त नहीं होता । अर्थात् विषयगत प्रत्यक्ष के प्रयोजक का लक्षण अतिव्याप्त नहीं है ।
विवरण— घटगत-परिमाण की सत्ता प्रमातृसत्ता, से पृथक् न होने पर भी ( उन दोनों का सत्ताकाल एक होने पर भी ) जिस समय घट का प्रमाता विद्यमान है उसी समय घट में घटगत-रूप से भिन्न गुणों के रहने पर भी तत्तदाकार (परिमाणाद्याकार) वृत्ति से युक्त प्रमातृचैतन्य की सत्ता से परिमाणादि विषयों की सत्ता भिन्न होने से पूर्वोक्त लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं ।
इस प्रकार विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण 'प्रमात्रभेद' बताकर लक्षणगत 'अभेद' का अर्थ 'ऐक्य' नहीं, किन्तु प्रमातृसत्ता से प्रमेयसत्ता का अभिन्न ( भिन्न न ) होना अर्थात् प्रमाता की जो सत्ता, वही विषय ( प्रमेय ) की सत्ता है, ( इस प्रकार 'अभेद' का अर्थ ) बताकर, इस लक्षण की अनुमिति आदि में अतिव्याप्ति का न होना बताया । धर्माधर्मादि परोक्ष स्थलों में अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'विषय' में 'प्रत्यक्ष-योग्य' विशेषण लगाने के लिए कहा । 'रूपी घटः' प्रत्यक्ष के समय घटगत परिमाणादि गुणों में अतिव्याप्ति नहीं होती, यह भी दिखाया । अब इसके आगे वादी 'विषयगत-प्रत्यक्षत्व' प्रयोजक के लक्षण में अव्याप्ति को दिखाता है ।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६९
नन्वेवं वृत्तावव्याप्तिः, अनवस्थाभिया वृत्तिगोचर-वृत्त्यनङ्गीकारेण तत्र स्वाकारवृत्त्युपहितत्वघटितोक्तलक्षणाभावात् ।
अर्थ— घटगत-परिमाण में अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'तत्तदाकारवृत्त्युपहित' विशेषण से प्रमाता को विशेषित करने पर भी 'वृत्ति' में पूर्वोक्त लक्षण की अव्याप्ति होती है। क्योंकि अनवस्था के भय से 'वृत्ति' को विषय करने वाली 'दूसरी वृत्ति' के स्वीकार न करने के कारण वृत्ति में 'वृत्त्याकारवृत्त्युपहितप्रमात्रभेद' लक्षण घटित नहीं हो पाया।
विवरण— सभी जड पदार्थ अज्ञान से आवृत होने से स्वतः प्रकाशमान नहीं होते। किन्तु उस पदार्थविषयक-वृत्ति के द्वारा आवरण का भङ्ग होने पर प्रकाशित होते हैं। घटादि जैसे जड़ है उसी तरह अन्तःकरणवृत्ति भी जड़ (अचेतन) है। अतः घटादिविषय जैसे वृत्ति से ही प्रकाशित होते हैं वैसे ही वृत्ति भी दूसरी अन्तःकरणवृत्ति से ही प्रकाशित होने के योग्य है। क्योंकि वृत्ति के जड़ होने से घट की तरह उसका स्वयं भान होना सम्भव नहीं। इसलिए उस वृत्ति के आवरणभंग के हेतु, वृत्ति-विषयक दूसरी वृत्ति की आवश्यकता है। क्योंकि जड़-पदार्थ के आवरण को भंग करनेवाली वृत्ति ही है। परन्तु एक वृत्ति के आवरणभंगार्थ दूसरी वृत्ति के मानने पर उसके आवरण भङ्ग के लिए तीसरी, उसके आवरण भंग के लिए चौथी इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होती है। और यदि वृत्ति को ही न माना जाय, तो बिना उसके जड़ वस्तु का भान होना सम्भव नहीं। ऐसी 'उभयतःपाशा रज्जु' सिद्धान्ती के गले पतित होती है।
अनवस्था के भय से वृत्तिविषयक-वृत्ति न मान सकने के कारण विषयाकारवृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता ही विषयावच्छिन्न-चैतन्य की और घटादिविषय की सत्ता है, अर्थात् उसकी सत्ता से इनकी सत्ता का पृथक् न होना, यह पूर्वोक्त विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण, वृत्ति में नहीं है। परन्तु वृत्ति का प्रत्यक्ष होता है। इस कारण 'लक्ष्य के एक देश में लक्षण का न रहना' यही अव्याप्ति है।
इस प्रकार वादी की शंका का 'इति चेत्' से अनुवाद कर 'न' से उसके निरसन की प्रतिज्ञा करके पूर्वोक्त लक्षण में दी हुई अव्याप्ति को दूर करते हैं—
इति चेत् । न । अनवस्थाभिया वृत्तेर्वृत्त्यन्तराविषयत्वेऽपि स्व-
१. वृत्त्याकारा वृत्तिर्यदि स्यात् तदा प्रथमा वृत्तिः द्वितीयवृत्तेर्विषयः। एवं द्वितीयवृत्तेः प्रत्यक्षाय तदाकारा अन्या वृत्तिः यदि भवेत्, तदा सा द्वितीयवृत्तिः तृतीयवृत्तेः विषयो भवेत्। एवं सति वृत्तिविषयक-वृत्त्यन्तराभ्युपगमे अनवस्था भविष्यति। अतः वृत्त्याकारा वृत्तिः न स्वीकार्या।
| ७० | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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विषयत्वाभ्युपगमेन¹ स्वविषयवृत्त्युपहितप्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वस्य तत्रापि भावात्²। एवं चान्तःकरणतद्धर्मादीनां केवलसाक्षिविषयत्वेऽपि तत्तदाकारवृत्त्यभ्युपगमेन उक्तलक्षणस्य³ तत्रापि सत्त्वान्नाव्याप्तिः ॥
अर्थ—अनवस्था के भय से 'एक वृत्ति को दूसरी वृत्ति का विषय होना' हमारे स्वीकार न करने पर भी वृत्ति में उस वृत्ति का ही (अपना ही) विषयत्व मानते हैं। इस कारण 'वृत्तिविषयक' जो वृत्ति (स्वयं को विषय करने वाली वृत्ति) उससे उपहित प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्व' यह विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण वृत्ति में है। इसी तरह अन्तःकरण और अन्तःकरण के धर्मादिकों को केवल साक्षिविषयत्व होने पर भी तत्तदाकार वृत्ति के स्वीकार करने से पूर्वोक्त लक्षण, उस साक्षिविषय-पदार्थों में भी है, अतः वहाँ भी अव्याप्ति नहीं होती।
विवरण—यद्यपि यह सच है कि ब्रह्म-भिन्न सभी पदार्थ जड़ हैं, तथापि उन जड़ पदार्थों में भी स्वभाववैचित्र्य है ही। सभी जड़ पदार्थ एक से स्वभाव के नहीं होते। जैसे घट और दीप दोनों पदार्थ ब्रह्मभिन्न होने से जड़ हैं। तथापि घट को प्रकाश और चक्षुरिन्द्रिय के सन्निकर्षादि-सम्बन्ध की स्वाभाविक अपेक्षा रहती है। किन्तु प्रदीप को आलोक (प्रकाश) की अपेक्षा नहीं होती। प्रदीप, घट को प्रकाशित करते हुए अपने को भी प्रकाशित करता है। ठीक उसी तरह अन्तःकरणवृत्ति भी जिस विषय को प्रकाशित करने के लिए पैदा हुई हो, उसे प्रकाशित करती हुई ही, दूसरी वृत्ति की अपेक्षा बिना किये स्वयं (अपने) को भी प्रकाशित करती है। क्योंकि जड़ पदार्थों के विचित्र अनुभव के बल से कुछ जड़ पदार्थों में भी कतिपय स्वभाव विशेषों को अगत्या स्वीकार करना पड़ता है।
एक वृत्ति को विषय करनेवाली दूसरी वृत्ति (वृत्ति-विषयक वृत्ति) के मानने पर अनवस्था प्रसङ्ग के भय से ही सिद्धान्त में वृत्तिविषयक वृत्ति नहीं मानी जाती, तथापि हमारे अभ्युपगम के अनुसार 'मैं इस घट को जानता हूँ' इस वृत्ति में स्वविषयत्व होने से अव्याप्ति नहीं होती। (कोई भी वृत्ति अपने से भिन्न वृत्ति के द्वारा अवच्छिन्न हुए
१. स्वविषयत्वाभ्युपगमेन अर्थात् स्वाकारवृत्त्युपहितत्वस्य स्वविषयवृत्त्युपहितत्वार्थकत्वाङ्गीकारेण। अत्र 'स्व'-पदं लक्ष्य-प्रत्यक्ष-विषयपरम्। एवञ्च यज्-ज्ञानं यद्विषयव्यवहारजननयोग्यं, तज्-ज्ञानं तद्विषयकमिति नियमः।
२. 'सम्भवात्'—इति पाठान्तरम्।
३. उक्तलक्षणस्य स्वविषयवृत्त्युपहितत्वघटितलक्षणस्येत्यर्थः। तत्रापि अन्तःकरणादिष्वपि।
विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७१
चैतन्य से प्रकाशित नहीं होती अर्थात् वह अपने ही से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से प्रकाशित होती है)।
इसी तरह अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों को केवल-साक्षिविषयत्व के होते हुए भी वृत्तिविषयत्व का भी स्वीकार करने से यहाँ भी अव्याप्ति नहीं होती। 'कामादि' यहाँ आदि शब्द से प्रातिभासिक रजतादिकों का ग्रहण करना चाहिये।
'केवल-साक्षिविषयत्व' यहाँ 'केवल' पद वृत्त्यादिकों की व्यावृत्ति करने के लिए है, (अन्तःकरणादिकों को वृत्त्यादिशून्य-साक्षिविषयत्व है) तब उसके विरुद्ध आप अन्तःकरणादिकों में वृत्ति-विषयत्व कैसे बता रहे हैं? इस शंका का अनुवाद करके सिद्धान्ती उसका परिहार करता है।
न^१ चान्तःकरणतद्धर्मादीनां वृत्तिविषयत्वाभ्युपगमे केवलसाक्षिविषय^२त्वाभ्युपगमविरोध इति वाच्यम्। न हि वृत्तिं विना साक्षिविषयत्वं केवल-साक्षिवेद्यत्वं, किन्त्विन्द्रियानुमानादिप्रमाणव्यापारमन्तरेण साक्षिविषयत्वम्।
**अर्थ—**अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में वृत्तिविषयत्व मानने से आपके पूर्वस्वीकृत 'केवल-साक्षिविषयत्व' के सिद्धान्त से विरोध होता है—यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि हमने 'केवल-साक्षिविषयत्व' में 'केवल' शब्द का प्रयोग, वृत्ति का परिहार करने के लिए नहीं किया है (बिना वृत्ति के ही साक्षिवेद्यत्व—'यह केवल-साक्षिवेद्यत्व' का अर्थ नहीं है) किन्तु इन्द्रिय (प्रत्यक्ष), अनुमान आदि प्रमाणों के व्यापार के बिना ही 'अन्तःकरण और तद्धर्मों में साक्षिविषयत्व होता है, इस आशय से 'केवल-साक्षिविषयत्व' कहा गया है।
विवरण—'केवल-साक्षिविषयत्व' यहाँ 'केवल' पद वृत्त्यादिकों के हटाने के लिए है—ऐसी अन्यथा कल्पना कर लेने से विरोधी की यह शंका थी। परन्तु यहाँ 'केवल' शब्द, वृत्ति आदि का व्यावर्तक न होकर प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों के इन्द्रियसन्निकर्षादि व्यापारों की व्यावृत्ति के लिए है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। ('बिना वृत्ति के साक्षिविषयत्व' यह 'केवल साक्षिविषयत्व, न होकर 'प्रत्यक्षादि-प्रमाणों के व्यापार के बिना साक्षिविषयत्व' यह 'केवल साक्षिविषयत्व है।)
१. अत्र शङ्कते—यदि सुख-दुःखाद्याकारा वृत्तिः स्यात् तदा तद्व्यवधानेनैव तेषां साक्षिवेद्यत्वं वक्तव्यम्। किन्तु तन्न युक्तम्, साक्षात् साक्षिचैतन्याध्यस्ताना मव्यवधानेनैव साक्षिग्राह्यत्वनियमात्। तथा च विवरणकाराः—"आत्मचैतन्येनाऽव्यवधानात् तत् प्रतिभासोपपत्तेः।" एवं च विवरणविरोधइत्याशङ्काकर्तुरभिप्रायः।
२. वेद्यत्वाभ्यु० इति पाठान्तरम्।
| ७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
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अब इस विषय में पद्मपादाचार्य की सम्मति बताते हैं—
अत एवाहंकार-टीकायामाचार्यैरहमाकारान्तःकरणवृत्तिरङ्गीकृता, अत एव च प्रातिभासिकरजतस्थले रजताकाराऽविद्यावृत्तिः ¹साम्प्रदायिकैरङ्गीकृता, तथा² चान्तःकरण-तद्धर्मादिषु केवलसाक्षिवेद्येषु वृत्त्युपहितत्वघटित-लक्षणस्य सत्त्वान्नाव्याप्तिः ॥
**अर्थ—**इस प्रकार 'केवल-साक्षिवेद्यत्व' में 'केवल' पद, वृत्ति का व्यावर्तक न होने से ही अहङ्कार-टीका में आचार्य ने अहमाकार-अन्तःकरण-वृत्ति का स्वीकार किया है। इसी कारण सर्वज्ञमुनिप्रभृति साम्प्रदायिकों ने प्रातिभासिक-रजतस्थल में रजताकार अविद्यावृत्ति को स्वीकार किया है। इस प्रकार केवल साक्षिवेद्य अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में वृत्त्युपहितत्व-घटित लक्षण संगत होने से अव्याप्ति नहीं है।
विवरण—'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' ( ब्र० सू० १।१।१ ) सूत्र के शांकरभाष्य पर पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नामकी टीका है। उस टीका पर श्री प्रकाशाचार्य का विवरण है, उसी का दूसरा नाम 'अहङ्कार टीका' है। उसके प्रथम वर्णक में 'अहं वृत्त्यवच्छिन्नमेव अन्तःकरणं चैतन्यस्य विषयभावमापद्यते'—अहं वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही विषयभाव को प्राप्त होता है—कहा है। ( श्री प्रकाशमुनि ने अन्तःकरण को विषय को करने वाली अहम्-इत्याकारक वृत्ति को माना है। उस कारण 'केवल साक्षिभास्यत्व' के 'केवल' शब्द से 'वृत्ति' की व्यावृत्ति न होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों के इन्द्रिय-सन्निकर्षादि व्यापारों की व्यावृत्ति होती है। इसलिये 'अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में वृत्तिविषयत्व के स्वीकार करने पर भी 'केवल-साक्षि-विषयत्व' के सिद्धान्त से विरोध नहीं होता। श्री प्रकाशाचार्य ने अहमाकार-अन्तः-करणवृत्ति का स्वीकार किया होने से संक्षेपशारीरकाचार्य सर्वज्ञमुनि प्रभृति साम्प्र-दायिकों ने भी प्रातिभासिक शुक्तिरजत-स्थल में रजताकार-अविद्यावृत्ति को माना है। इस प्रकार अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों को वृत्तिविषयत्व सिद्ध होने से पूर्वोक्त अव्याप्ति का निरसन अपने आप हो जाता है। यथा—पीछे 'विषयाकार-वृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्य की सत्ता से विषय की सत्ता का पृथक् न होना' ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताया गया है। यह लक्षण, केवल साक्षिवेद्य हुए अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में भी है। क्योंकि साम्प्रदायिकों ने अन्तःकरणादिविषयक 'अहमाकार' ( अहं इस आकार की ) वृत्ति मानी है। इस कारण 'वृत्त्युपहितत्व' विशेषण से युक्त
१. साम्प्रदायिकैः विवरणानुयायिभिरिति ।
२. प्रातिभासिकेषु अविद्यावृत्तिस्वीकारफलं निर्दिशति ।
विषयप्रत्यक्षस्यनिकृष्टलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७३
लक्षण अन्तःकरणादि-प्रत्यक्ष में भी है। इसलिए लक्षण की अव्याप्ति (लक्ष्य के किन्हीं अंशों में न रहना) नहीं हो पाती।
इस प्रकार ज्ञानगत और ज्ञेयगत-प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को (सब दोषों का निरसन करते हुए) बताकर श्रोताओं के सुखबोधार्थ उपर्युक्त विशेषणों से निष्पन्न हुए लक्षण को संक्षेप में बताते हैं।
'तदयं निर्गलितोऽर्थः स्वाकारवृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्यसत्ताति-रिक्त-सत्ताकत्वशून्यत्वे सति योग्यत्वं विषयस्य प्रत्यक्षत्वम्। तत्र संयोग-संयुक्ततादात्म्यादीनां सन्निकर्षाणां चैतन्याभिव्यञ्जक-वृत्ति-जनने विनियोगः।
अर्थ—उसका यह निष्कृष्ट अर्थ है। 'स्व' = विषय- तदाकार = विषयाकार अर्थात् विषयगोचर वृत्ति (उपाधि) से उपहित प्रमातृचैतन्यरूप सत्ता से जिस विषय की सत्ता भिन्न होती है वह विषय, 'स्वाकारवृत्त्युपहित-प्रमातृ-चैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताक' होता है। उसका जो भाव उसे 'सत्तातिरिक्तसत्ताकत्व' कहते हैं, उससे शून्य होते हुए 'प्रत्यक्षयोग्यत्व होना ही विषय के प्रत्यक्ष-व्यवहार का प्रयोजक है। इस प्रकार ज्ञानगत और विषयगत (ज्ञेयगत) प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक सिद्ध होने पर संयोग, संयुक्त-तादात्म्य इत्यादि सन्निकर्षों का चैतन्याभिव्यंजक-वृत्ति के उत्पन्न करने में विनियोग (उपयोग) होता है।
विवरण—स्वाकारवृत्ति (विषयाकारवृत्ति) में उपहित (प्रविष्ट) हुए प्रमातृ-चैतन्य की सत्ता से, प्रत्यक्षयोग्य विषय की सत्ता का पृथक् न होना ही विषयगत प्रत्य-क्षत्व (प्रत्यक्ष-व्यवहार) का प्रयोजक है। प्रमातृ-चैतन्य की सत्ता और विषय की सत्ता के एक होने पर 'यह घट प्रत्यक्ष है' यह व्यवहार होने लगता है। इस प्रकार
१. 'तदयम्' इति मूलस्थपदस्य पञ्चमी-षष्ठी वा समासोऽवगन्तव्यः। 'तस्य पूर्वोक्तस्य अयम्' इति, 'तस्मात् अयम्' इति वा।
२. स्वयं विषयः तदाकारा तद्विषया या वृत्तिः तदुपहितं यत् प्रमातृचैतन्यं तद्रूपा या सत्ता तदतिरिक्ता सत्ता यस्य सः तथा तस्य भावः तत्त्वं तेन शून्यत्वे सति—तदति-रिक्तसत्तावत्त्वरहितत्वेसति प्रत्यक्षयोग्यत्वं प्रत्यक्षव्यवहारप्रयोजकम्।
एवञ्च—ज्ञानगतस्य ज्ञेयगतस्य च प्रत्यक्षत्वस्य यत् प्रयोजकमुक्तं तत्र 'तादृशवृत्त्य-वच्छिन्न-चैतन्यस्य तादृशविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं' ज्ञानगतप्रयोजकम्।
तादृशविषयस्य तथाभूतप्रमातृचैतन्याभिन्नत्वं विषयगतप्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकम्।
३. प्रत्यक्षस्य विषयस्य प्रत्यक्षज्ञानं चैतन्यमेव, तच्च अनादीति संयोगादिसन्नि-कर्षाणां क्व विनियोगः इति जिज्ञासायां घटतद्गतरूप-रूपत्व-शब्द-शब्दत्वावच्छिन्नचैत-न्याभिव्यञ्जकवृत्त्युत्पादने विनियोगो ज्ञातव्यः।
| ७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ वृत्तेश्चातुर्विध्यम् |
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ज्ञानगतप्रत्यक्षत्व और ज्ञेयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताया गया। प्रत्यक्षयोग्य-विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का प्रत्यक्षविषयावच्छिन्न चैतन्य (वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य और विषयावच्छिन्न-चैतन्यों की एकता)—ज्ञानगत ‘प्रत्यक्षत्व’ में प्रयोजक है। ‘विषयज्ञान प्रत्यक्ष है’ इस आकार में ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का व्यपदेश (व्यवहार) होता है। इसी प्रकार प्रत्यक्षयोग्य विषय का पूर्वोक्त प्रकार से प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद, विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है। ‘घटः प्रत्यक्षः’ घट प्रत्यक्ष है इस आकार में उसका व्यपदेश होता है।
चैतन्य ही प्रत्यक्ष-विषय का ज्ञान है और चैतन्य अनादि है। ऐसी स्थिति में संयोगादि सन्निकर्षों का उपयोग क्या है? इस आशंका के समाधान में ग्रन्थकार कहते हैं—पूर्वोक्त प्रकार से द्विविध प्रयोजकों के सिद्ध होने पर संयोग, संयुक्ततादात्म्य, संयुक्तभिन्नतादात्म्य, तादात्म्य, अभिन्नतादात्म्य आदि सन्निकर्षों का घट, घटगतरूप, रूपगत रूपत्व, शब्द और शब्दत्व से अवच्छिन्न हुए चैतन्य को अभिव्यक्त करनेवाली वृत्ति को उत्पन्न करने में विनियोग होता है। (वे संयोगादि-सन्निकर्ष तत्तद्विषयावच्छिन्न चैतन्य की अभिव्यंजकवृत्ति को पैदा करते हैं। संयोग से घटाकारवृत्ति, संयुक्ततादात्म्य से घटगतरूपाकारवृत्ति, संयुक्ताभिन्नतादात्म्य से घट-रूपगत रूपत्वाकार वृत्ति, तादात्म्य से शब्दाकार वृत्ति और अभिन्नतादात्म्य से शब्दगत-शब्दत्वाकार वृत्ति पैदा होती है। और प्रत्येक वृत्ति, चैतन्य की अभिव्यंजक है। अब इन संनिकर्षों से उत्पन्न होने वाली वृत्ति (अन्तःकरण वृत्ति) कितनी प्रकार की है? उसे ग्रन्थकार बताते हैं—
सा¹ च वृत्तिश्चतुर्विधा—संशयो, निश्चयो, गर्वः, स्मरणमिति। एवंविध²वृत्तिभेदेन एकमप्यन्तःकरणं मन इति बुद्धिरिति अहङ्कार इति चित्तमिति ³व्याख्यायते। तदुक्तम्—
मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं करणमान्तरम् ।
संशयो निश्चयो गर्वः स्मरणं विषया इमे ॥ १ ॥
अर्थ— और वह सन्निकर्षजन्य-वृत्ति चार प्रकार की है—संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण। अन्तःकरण के एक होने पर भी इस वृत्तिभेद के कारण वह मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त इन चार शब्दों से बोला जाता है⁴। इस अन्तःकरण-वृत्ति
१. सा चेत्यत्र प्रसिद्धा वृत्तिर्ग्राह्या ।
२. एवं सतिवृ०—इति पाठान्तरम् ।
३. चाख्या०—इति पाठान्तरम् ।
४. संशयाकारवृत्तिमदन्तःकरणं मनः, निश्चयाकारवृत्तिमदन्तःकरणं बुद्धिः, गर्वाकार-वृत्तिमदन्तःकरणमहङ्कारः स्मरणकारवृत्तिमदन्तःकरणं चित्तमिति प्रसङ्गप्राप्तः केषां-
वृत्तेश्चातुर्विध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७५
के विषय में पूर्वाचार्यों ने इस प्रकार कहा है—'मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त—रूप से चार प्रकार का अन्तःकरण ( भीतरी करण ) है। संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण—ये उसके क्रम से विषय हैं।'
विवरण—पूर्वोक्त सन्निकर्ष से पैदा होने वाली 'वृत्ति' से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' ही प्रत्यक्ष और 'वृत्ति', अन्तःकरण का परिणाम है। अतः अन्तःकरण की घटक ( अवयव ) भूत-वृत्ति से युक्त अन्तःकरण का निरूपण करना प्रकृत में असंगत नहीं है। प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रकृत है और अन्तःकरण का निरूपण उसका उपकारक है। संशयाकार, निश्चयाकार, गर्वाकार और स्मरणाकार—इन चार प्रकार के आकारों में परिणत होने वाली वृत्ति चार प्रकार की है। वास्तव में एक होता हुआ भी अन्तःकरण, संशयादि विषयाकार से परिणत हुई विविध वृत्तियों के भेद से विविधता को प्राप्त होता है ( विविध = अनेक रूप होता है)। संशयाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'मन', निश्चयाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'बुद्धि', गर्वाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'अहङ्कार', और स्मरणाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तः-करण को 'चित्त' संज्ञाएं प्राप्त होती हैं। 'अन्तःकरण' का उपर्युक्त यह विभाग स्वकपोलकल्पित न होकर उसमें पूर्वाचार्यों की सम्मति 'मनो बुद्धिः', वचन से ग्रन्थकार दिखा रहे हैं—वृत्तिभेद से वृत्तिमान् का भेद होने से, एक ही अन्तःकरण, मन आदि भेद से चार प्रकार का हो जाता है। और उसके विषय—संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण होते हैं। इसी कारण तदाकार हुई वृत्तियों को भी संशय, निश्चय इत्यादि संज्ञायें प्राप्त हुई हैं।
इस प्रकार प्रत्यक्ष-प्रमा की घटक 'वृत्ति' के स्वरूप को बताकर विषयावच्छिन्न-चैतन्याभिन्न जो वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य तद्रूप प्रत्यक्ष के विभाग ( पूर्वोक्त विषयाच्छिन्न-चैतन्याभिन्न-वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्यरूप प्रत्यक्ष प्रमा के प्रकार ) को बताते हैं।
विदभ्युपगमः प्रदर्शितः। तेषां मते एकमपि अन्तःकरणं चतुर्धा भिद्यते। तद्भेदाभ्युप-गमात् अन्तःकरणस्य इन्द्रियत्वाभ्युपगमाच्च संशयादीनामन्तःकरणवृत्तित्वं युज्यते।
किन्तु सिद्धान्ते प्रमात्मकनिश्चयस्य अन्तःकरणवृत्तित्वेऽपि भ्रमात्मकनिश्चयस्य संशयादीनाञ्च अन्तःकरणवृत्तित्वं नैव युज्यते। यतः अन्तःकरणवृत्तिः इन्द्रियादिप्रमाण-व्यापारमपेक्षते। संशयादयस्तु अविद्यावृत्तिरूपाः, अतः प्रमाणव्यापारं नापेक्षन्ते, अन्तः-करणस्य च अनिन्द्रियत्वमभ्युपगम्यते सिद्धान्तिना।
ननु 'एतत् सर्वं मन एव' इति श्रुतौ संशयादीनां मनः-परिणामत्व-प्रतिपादनात् श्रुतिविरोधः। किन्तु एकस्मिन् धर्मिणि उभयकोटिकवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यमेव संशयः, तस्य च विशेषाकारमनोवृत्तिघटितत्वेन एककोट्याकारमनोवृत्तिघटितत्वेन वा मनस्तादात्म्य-निर्देशान्न श्रुतिविरोधः।
| ७६ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षद्वैविध्यम् |
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तच्च प्रत्यक्षं द्विविधम् । ¹सविकल्पक-निर्विकल्पकभेदात् । तत्र सविकल्पकं वैशिष्ट्यावगाहि² ज्ञानं । यथा घटमहं जानामीत्यादि ज्ञानम् । निर्विकल्पकं तु संसर्गानवगाहि ज्ञानम्³ । यथा--सोऽयं
१. विषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यरूपस्य प्रत्यक्षस्य विभागनिरूपणा- वसरे सकलवादिसम्मतत्वात् सर्वव्यवहारहेतुत्वाच्च प्रथमं सविकल्पकस्य निर्देशः ।
२. वैशिष्ट्यं विशेष्य-विशेषणयोः सम्बन्धमवगाहते विषयीकरोति-इति वैशिष्ट्या- वगाहि । तच्च तज्ज्ञानञ्चेति वैशिष्ट्यावगाहिज्ञानम् । यस्मिन् ज्ञाने विशेष्यं विशेषणं तयोः सम्बन्धश्च विषयो भवति, तज्ज्ञानं सविकल्पकं भवति । निर्विकल्पके अतिव्याप्ति- वारणाय वैशिष्ट्यावगाहीतिविशेषणदलम् । सविकल्पकस्योदाहरणं 'घटमहं जानामि' इति । अर्थात् 'घटविषयकज्ञानवानहम्' । अत्र घटविषयकज्ञानसाक्षात्कारे 'अहङ्कारः' विशेष्यतया, तत्र च 'घटज्ञानं' विशेषणतया, तयोः 'घटज्ञानाहङ्कारयोः सम्बन्धश्च' संसर्गतया, घटज्ञाने च 'घटः' विशेषणतया, 'ज्ञानञ्च' विशेष्यतया, तयोः 'घट घटज्ञा- नयोः सम्बन्धश्च' संसर्गतया, घटे घटत्वं विशेषणतया, घटः विशेष्यतया, तयोः घट- घटत्वयोः सम्बन्धः संसर्गतया भासते । अतः घटमहंजानामीति ज्ञानं वैशिष्ट्यविषय- कतया सविकल्पकं भवति ।
३. निर्विकल्पकस्योदाहरणं 'सोऽयं देवदत्तः' इति--लौकिकम् । 'तत्त्वमसि' इति वैदिकम् । इदं लौकिकं वैदिकञ्चोदाहरणं संसर्गानवगाहि संसर्गाऽविषयकं (विशेष्य- विशेषणयोः सम्बन्धाऽविषयकम् ) वर्तते ।
'सोऽयं देवदत्तः' इत्यनेन प्रत्यभिज्ञायामवगतमेकत्वं परस्मै प्रतिपादयति । इदं वाक्यं शृण्वन् पुरुषः 'तत्' पदस्य 'इदम्' पदस्य च प्रथमं तावत् सामानाधिकरण्यं जानाति । तदनन्तरं तस्य शृण्वतः पुरुषस्य चेतसि 'तत्' शब्दात् शक्त्या तद्देश-काल- विशिष्टस्य, 'इदम्' शब्दात् शक्त्या एतद्देश-कालविशिष्टस्य 'देवदत्त' शब्दात् शक्त्या देवदत्तस्य उपस्थितिर्भवति । ततः पश्चात् तस्य चेतसि द्वयोः विशिष्टयोः अभेदान्वयो भवति-'तद्देशकालविशिष्टाऽभिन्नः एतद्देशकालविशिष्टाभिन्नः 'देवदत्ततः' इति ।
परन्तु द्वयोर्विशिष्टयोः अभेदान्वयो न संभवति, विशिष्टयोर्द्वयोर्भिन्नत्वात् । यतः विशेषणभेदेन विशिष्टस्य भेदो भवति । अतः विशिष्टाऽभेदस्य मुख्यार्थस्य बाधप्रतिसन्धानं जायते । ततः तस्य पुरुषस्य देवदत्तस्वरूपमात्रबोधस्य तात्पर्यविषयत्वात् विशिष्टवाच- काभ्यां पदाभ्यां विरुद्धस्य स्वार्थैकदेशस्य तदेतद्देशकालस्य परित्यागेन देवदत्तस्वरूपलक्ष- णया देवदत्तस्वरूपमात्रविषयकं ज्ञानं भवति । तथा च संक्षेप शारीरके--
"सामानाधिकरण्यमत्र भवति प्राथम्यभागन्वयः, पश्चादेव विशेषणेतरतया पश्चाद् विरोधोद्भवः । उत्पन्ने च विरोध एकरसके, वस्तुन्यखण्डात्मके वृत्तिर्लक्षणया भवत्ययमिह ज्ञेयः क्रमः सूरिभिः" तच्च ज्ञानं स्वरूपमात्रविषयकत्वात् संसर्गानवगाहि भवति । शब्द-
प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७७
देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादि-वाक्यजन्य-^१ज्ञानम् ॥
**अर्थ—**और वह प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का है। एक सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक। उनमें विकल्प को विषय करनेवाले ज्ञान को 'सविकल्पक' ज्ञान कहते हैं। जैसे—'मैं घट को जानता हूँ' यह ज्ञान सविकल्प है। परन्तु संसर्ग को विषय न करनेवाला ज्ञान निर्विकल्प ज्ञान होता है। जैसे—'वह यह देवदत्त' 'वह (सत्) तू है' इत्यादि वाक्यों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान।
**विवरण—**प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करनेवाली वृत्ति का स्वरूप ऊपर बताया गया। अब प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रकारों को बताते हैं। 'विषयावच्छिन्न चैतन्यात्मक, जो वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य', वही प्रत्यक्ष-ज्ञान है। वह (प्रत्यक्ष) सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से दो प्रकार का है। मूल में 'सविकल्पक और निर्विकल्पक' ऐसा उद्देश्य किया है (प्रत्यक्ष के दो प्रकारों में से)—'सविकल्पक' का निर्देश प्रथम किया है। सविकल्पक ज्ञान सभी को सम्मत है और समस्त व्यवहार में उसके प्रयोजक होने से 'तत्र' ग्रन्थ से प्रथमतः सविकल्पक ज्ञान का लक्षण कहा जाता है। विकल्प का अर्थ, 'वैशिष्ट्य' है। जो ज्ञान विकल्प से युक्त रहता है, वह सविकल्पक कहलाता है (जिस ज्ञान का विषय 'वैशिष्ट्य' होता है, वह सविकल्पक ज्ञान है) ग्रन्थकार ने 'वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानं सविकल्पकम्' इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान का लक्षण करके 'मैं घट को जानता हूँ, यह उदाहरण दिया है। इसमें 'वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम्' इतना लक्षण है और 'सविकल्पकम्' यह लक्ष्य है। केवल 'वैशिष्ट्यवगाहि' इतना ही लक्षण यदि किया जाता तो वह 'इच्छा आदि' में अतिव्याप्त होता, क्योंकि इच्छादिक भी वैशिष्ट्य-विषयक होती हैं। (इच्छा का विषय वैशिष्ट्य ही रहता है) अतः इस अतिव्याप्ति का निवारण करने के लिए लक्षण में 'ज्ञान' पद दिया है। यदि केवल
जन्यमपि सन्निकृष्ट देवदत्तविषयकत्वात् प्रत्यक्षञ्च तत्, सन्निकृष्टविषये शब्दादपि प्रत्यक्षज्ञानाभ्युपगमात्।
एवं 'तत्त्वमसि' इत्यत्र तच्छब्देन शक्त्या सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य चैतन्यस्य युष्मच्छब्देन असर्वज्ञत्वादि विशिष्टस्य चैतन्यस्य, प्रथमया च विभक्त्या अभेदस्य उपस्थितिर्भवति, ततः विशिष्टयोर्द्वयोरभेदान्वयो जायते। ततो मुख्यार्थस्य विशिष्टाऽभेदस्य बाधज्ञानं सम्पद्यते, ततो विशिष्टवाचकाभ्यां पदाभ्यां विरुद्धांशस्य सर्वज्ञत्वादेः परित्यागेन चैतन्यस्वरूपलक्षणया चैतन्यस्वरूपमात्रविषयकं ज्ञानं जायते। तच्च ज्ञानं संसर्गाऽविषयकत्वात् सन्निकृष्टविषयकत्वाच्च निर्विकल्पकम्प्रत्यक्षम्।
तथा च विवरणकारा अष्टमवर्णके—"सोयमिति विशिष्टाऽभिधायिभ्याम्पदाभ्यां स्वार्थैकदेशपरित्यागेनै कदेशलक्षणया देवदत्तस्वरूपैक्यं प्रतिपादयति।"
१. जन्यं ज्ञानम्—इति पाठान्तरम् ।
७८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षविचारः
'ज्ञानम्' इतना ही लक्षण करें तो वह निर्विकल्पक ज्ञान में अतिव्याप्त होगा, इसलिये 'वैशिष्ट्यावगाहि' यह विशेषण भी आवश्यक है।
'मैं घट को जानता हूँ' यह सविकल्पक-ज्ञान का उदाहरण है। क्योंकि वह घटरूप-विशेषण से विशिष्ट घटज्ञान को विषय कर रहा है, अतः 'मैं घट को जानता हूँ' यह ज्ञान वैशिष्ट्यावगाहि है।
इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान का निर्दोष लक्षण बताकर 'निर्विकल्पकं तु०' ग्रन्थ से दूसरे प्रकार के ज्ञान का लक्षण बताते हैं। जिससे विकल्प (वैशिष्ट्य) निवृत्त हुआ हो वह निर्विकल्पक ज्ञान है। यहाँ 'निर्विकल्पकम्' लक्ष्य है और 'संसर्गाविगाहि ज्ञानम्' लक्षण है। संसर्ग का अर्थ है—विशेषण-विशेष्य-सम्बन्ध, इसी को 'वैशिष्ट्य' कहते हैं। एवं च संसर्ग (वैशिष्ट्य) को विषय न करनेवाले ज्ञान को 'निर्विकल्पक ज्ञान' कहते हैं 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत् त्वमसि' आदि वाक्यों से उत्पन्न हुआ ज्ञान, निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण है। 'सोऽयं देवदत्तः' इस ऐक्य प्रत्यभिज्ञा से ही 'सोऽयं देवदत्तः' ऐसे वाक्य का प्रयोग होता है। इस कारण देश और काल से उपलक्षित देवदत्त रूप अभेद को विषय करनेवाला इन्द्रियजन्य ज्ञान भी निर्विकल्प प्रत्यक्ष है। तब इन्द्रियजन्य निर्विकल्पक प्रत्यक्ष को उदाहरण रूप से न बताकर शाब्दज्ञान को ही उदाहरणरूप से क्यों बताया गया है ?
उत्तर :—देश और काल से उपलक्षित (जो) देवदत्त (तद्) रूप अभेद को विषय करनेवाले (वह यह देवदत्त) इस इन्द्रियजन्यप्रत्यक्षज्ञान में सन्निकर्ष के बल से, 'उपलक्षक देश-काल' का भी भान होता है, परन्तु शाब्दज्ञान में नियम से 'तात्पर्य-विषय' का ही भान होता है। इसलिए शाब्दज्ञान को अभेदमात्र विषयत्व होने से यहाँ पर शाब्द उदाहरण ही दिया है। मूल में 'तत्त्वमसि' इत्यादि के शब्द से 'प्रकृष्ट प्रकाश-श्चन्द्रः।' 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि अवान्तर वाक्यों को समझना चाहिए। इस पर वादी शंका करता है—
ननु शाब्दमिदं ज्ञानं न प्रत्यक्षमिन्द्रियाजन्यत्वात् ।
अर्थ—यह जो शाब्द (शब्दजन्य) ज्ञान है। प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय से पैदा नहीं है।
विवरण—निर्विकल्पक ज्ञान के उदाहरण में 'वाक्यजन्य ज्ञान' बताया देखकर वादी कहता है कि यह (निर्विकल्पक प्रत्यक्ष का तो लक्षण और उसका लक्ष्य वाक्य-जन्य ज्ञान) कथन अत्यन्त असंगत है। 'वह यह देवदत्त' इस वाक्य से होनेवाला ज्ञान, शाब्दज्ञान है, प्रत्यक्षज्ञान नहीं है। कारण इन्द्रियजन्य ज्ञान को ही प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं। तब वाक्यजन्य ज्ञान को निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कैसे कह सकते हैं? 'इति चेत्' आदि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का अनुवाद कर उसका निरसन करते हैं।
प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वस्याप्रयोजकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७१
इति चेत् । न । न हि इन्द्रियजन्यत्वं प्रत्यक्षत्वे तन्त्र, दूषितत्वात् । किन्तु योग्य-वर्तमान-विषयकत्वे सति प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभिन्नत्वमित्युक्तम् । तथा च सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्य-ज्ञानस्य सन्निकृष्ट-विषयतया बहिर्निःसृतान्तःकरणवृत्त्यभ्युपगमेन ^१देवदत्तावच्छिन्न ^२वृत्त्यवच्छिन्नचैतनयोरभेदेन सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्य-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् । एवं तत्त्वमसि इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानस्यापि । तत्र प्रमातुरेव^३ विषयतया तदुभयाभेदस्य^४ सत्त्वात् ।
अर्थ—'वाक्यजन्यज्ञान, इन्द्रियजन्य न होने से शाब्द है, प्रत्यक्ष नहीं है' ऐसा यदि कहें तो उचित नहीं। क्योंकि प्रत्यक्षत्व ( प्रत्यक्ष ) में 'इन्द्रियजन्यत्व' प्रयोजक नहीं है। हमने नैयायिकों के द्वारा स्वीकृत प्रयोजक को दूषित सिद्ध कर विषय में योग्यता तथा वर्तमानता ( विद्यमानता ) होते हुए प्रमाणचैतन्य का विषयचैतन्याभिन्नत्व होना प्रत्यक्ष में प्रयोजक है—ऊपर बताया है। 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट है, अतः हम ( वेदान्ती ) ने उस ज्ञान में बाहर निकली अन्तःकरण-वृत्ति को स्वीकार किया है। इस तरह इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय समीप होने से सन्निकृष्ट विषय को उद्देश्य कर अन्तःकरण-वृत्ति बाहर निकलती है, हमारे इस सिद्धान्त के कारण देवदत्तावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य का अभेद होता है, ( विषयावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का अभेद होने से ) जिससे 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। इसी न्याय से 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान का भी प्रत्यक्षत्व है। कारण उस ज्ञान में प्रमाता ही विषय होने से विषय-चैतन्य और वृत्तिचैतन्य का अभेद है।
विवरण—'वह यह देवदत्त' इत्यादि वाक्यजन्य-ज्ञान शब्दजन्य होने से (इन्द्रियजन्य-ज्ञान न होने से ) निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष ज्ञान का उदाहरण हो नहीं सकता, यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि शाब्दज्ञान को इन्द्रियजन्यत्व न होने पर भी उपर्युक्त प्रत्यक्षत्व-प्रयोजकत्व 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान में है। इस कारण यहाँ लक्षण और लक्ष्य की असंगति नहीं होती। नैयायिक 'इन्द्रियजन्य' ज्ञान को प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं, परन्तु वह अतिव्याप्त होता है, क्योंकि इन्द्रियजन्यत्व को प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक मानने पर नैयायिकों
१. देवदत्तावच्छिन्नचैतन्यस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याभेदेन—इति पाठान्तरम् ।
२. तद्वृत्यवच्छिन्नचैतन्याभिन्नतया-इति पाठान्तरम् ।
३. प्रमातृत्वोपलक्षित-स्वरूपचैतन्यस्यैव ।
४. तदुभयाभेदस्य स्वरूपाकारवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्वरूपचैतन्ययोरभेदस्य ।