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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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५२ : विज्ञानभैरव इस भावना के अभ्यास से साधक को अपने शिवस्वरूप का करामलकवत् (हथेली पर रखे आंवले की तरह) साक्षात्कार हो जाता है ॥४४॥ [ धारणा-२२ ] तनूदेशे शून्यतैव क्षणमात्रं विभावयेत् । निर्विकल्पं१ निर्विकल्पो निर्विकल्पस्वरूपभाक् ॥४५॥ तनूदेशे परिमितग्राहकपदे स्थूलशरीरे शून्यतैव इत्येतावन्मात्रं क्षणमल्पकालमपि निर्विकल्पं मनः कृत्वा भावयेत् । भावनयाऽनया भावको निर्विकल्पो विकल्पातीतः सन् निर्विकल्पस्वरूपभाक् चिद्विलासमयो जायते । शिवतत्त्वं विना न किमपि सर्वमेतत् चिद्विलासास्पदमाश्यानतया चित्रितमिव विभातीत्येवं गन्धर्वनगरादिवत् प्रसिद्धमप्रति- ष्ठितमिति ज्ञानेन चिदाकाशे स प्रतिष्ठितो भवतीति भावः ॥४५॥ तनूदेश अर्थात् परिमित ग्राहकता के स्थान इस स्थूल शरीर में पूर्वोक्त पद्धति से शून्यता ही सर्वत्र विद्यमान है, इस स्थिति की एक क्षण के लिये, स्वल्प काल के लिये भी निर्विकल्प रूप में भावना करे । इस तरह की भावना करने वाला साधक विकल्प व्यापार से ऊपर उठकर निर्विकल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, वह यह जान लेता है कि सब कुछ चित् का विलासमात्र है । इसका अभिप्राय यह है कि शिवतत्त्व के सिवाय यहाँ कुछ भी सत् नहीं है । यह सारा जगत् चित् का विलास मात्र है, चित्र के समान अथवा गन्धर्वनगर के समान यह केवल कल्पना का विलास मात्र है । अतः इसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। इस प्रकार के ज्ञान का जब इस धारणा के अभ्यास से उदय होता है, तो वह साधक अपने स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥४५॥ [ धारणा-२३ ] सर्वं देहगतं द्रव्यं वियद्व्याप्तं मृगेक्षणे । विभावयेत् ततस्तस्य भावन स्थिरा भवेत् ॥४६॥ हे मृगेक्षणे, प्रोक्तशून्यभावना यस्य न झगिति हृदयमध्यास्ते, स देहगतमस्थि- मांसादि सर्वं द्रव्यं वियता शून्येन व्याप्तं विशेषेण भावयेत् । तदनन्तरं तस्य संयमिनः सा भावना उपादेयशून्यवासना दृढा भवेत् । सर्वमिदं रज्जुभुजङ्गवत्, असत्यस्वरूपसाध्य- त्वाद्वा गन्धर्वनगरादिवत् शून्यव्याप्तमित्येवं धारणया देहगतमांसादिद्रव्याणामपि यदा शून्यताभावना दृढं प्ररूढा भवति, तदा भावकः प्रकाशमानप्रकाशो भवतीति भावः ॥४६॥ हे मृगेक्षणे, जिसके हृदय में उक्त शून्यता की भावना सरलता से न जम सके, उसको चाहिये कि वह अपने शरीर में विद्यमान अस्थि, मांस प्रभृति सभी धातुओं की शून्यरूप में भावना करे कि मेरे इस स्थूल शरीर में शून्य आकाश के सिवाय कुछ भी विद्यमान नहीं है । १. °ल्पे-ख० ।

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विज्ञानभैरव : ५३ इस तरह से स्थूल शरीर की हेय वासना के त्याग का अभ्यास करने से साधक के हृदय में उपादेय शून्यता की वासना दृढ़ होती जाती है और अन्ततः उसके हृदय में प्रकाश का आवि- र्भाव हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि यह सारा जगत् रज्जु में कल्पित सर्प की तरह अथवा सर्वथा असत्य स्वरूप में कल्पित गन्धर्वनगर की भांति कल्पनामय है, अर्थात् यह सब कुछ शून्य ही शून्य है, शून्य के सिवाय कुछ भी नहीं है। इस धारणा के अभ्यास से जब रज्जुसर्प, गन्धर्वनगर की तरह देहगत मांस प्रभृति द्रव्यों में भी यह शून्यता-भावना दृढ़ हो जाती है, तो साधक का हृदय सहसा आलोक से आलोकित हो जाता है, प्रकाश से भर जाता है ॥४६॥ [ धारणा-२४ ] देहान्तरे १त्वग्विभागं भित्तिभूतं२ विचिन्तयेत् । न किञ्चिदन्तरे तस्य ध्यायन्न३ध्येयभाग् भवेत् ॥४७॥ देहान्तरे स्वस्मिन् देहविषये त्वग्लक्षणो यो विशिष्टो बर्हिष्ठो भागस्तं भित्तिभूतं जडबाह्यभित्तिकल्पं विचिन्तयेत् भावयेत्। तस्य चान्तर्नं किञ्चिदस्तीति ध्यायन् अध्येय- भाक् परव्याप्तिरूपः स्यात्। पञ्चभूतपञ्चीकरणयुक्त्या संबद्धं सत् शरीरमुद्भूतम्। तच्च स्थूलं विनश्यत्स्वभावं करिकर्णाग्रिचपलं चेति नात्र स्थिरताऽऽसीदस्ति स्याद्वा। तथाऽत्र दिग्विभागादि नास्ति, बाह्यजडभित्तिमात्रमिदं दक्षिणपार्श्वमिदं वोत्तरमित्यादि, तस्मादस्रदिति समीक्षयेत्। एवं पुर्यष्टकप्रमातृभावोपशमात् शुद्धप्रमातृपदाविर्भावाद् भावको भैरवरूपो भवति ॥४७॥ अपने शरीर में त्वचा (चमड़ी) के रूप में जो बाहरी भाग विद्यमान है, उसकी भित्ति (दीवाल) के समान जड़ पदार्थ के रूप में भावना करे। उस त्वचा से आवृत शरीर के भीतर कुछ भी साररूप नहीं है, ऐसा ध्यान करते करते उस साधक को परतत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि पंचोकरण प्रक्रिया से पंच महाभूतों के परस्पर संबद्ध होने पर यह शरीर उत्पन्न होता है। यह स्थूल शरीर नाशवान् है, हाथी के कान की तरह अत्यन्त चंचल है, एक स्थान पर स्थिर नहीं रह पाता। इसमें न कभी स्थिरता थी, न है और न भविष्य में ही रहेगी। इसी तरह से इस शरीर के साथ दिशाओं के विभाग आदि की भी सत्ता नहीं है। इसका यह दक्षिण भाग है, यह उत्तर भाग है, यह सब कल्पना-प्रसूत होने से असत् है और निर्जीव दीवाल की तरह है। केवल प्रमाता ही सत्स्वभाव है, इस बात को जो व्यक्ति ठीक तरह से जानता है, वही ज्ञानी कहलाता है। इसलिये कि उसका १पुर्यष्टक के साथ प्रमातृभाव उपशमित, शान्त हो जाता है ॥४७॥ १. दि०-ख० । २. मात्रं-ख० । ३. ०न्त-ख० । १. पुर्यष्टक एक पारिभाषिक शब्द है। शास्त्रों में इसके अनेक अर्थ किये गये हैं। संक्षेप में सांख्य-संमत सूक्ष्म शरीर से इसकी तुलना की जा सकती है। स्पन्द-कारिका (श्लोक ४९)

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५४ : विज्ञानभैरव [ धारणा-२५ ] १हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसंपुटमध्यगः । अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥४८॥ हे सुभगे, हृदि भवे हृद्ये, हारिणि च आकाशे प्राणापानान्तरालपदे निलीनाक्षः, निलीनमक्षं मनस्तद्द्वारेण चान्येन्द्रियचक्रं यस्य तादृक्, पद्मसंपुटमध्यगः ऊर्ध्वाधरगत- पद्मसंपुटमध्यंगतो भावनयाऽनुप्रविष्टः । ऊर्ध्वगतं पद्मं प्रमाणम्, अधरगतं प्रमेयम् । तयोर्मध्ये चिन्मात्राख्ये प्रमातरि स्वस्वरूपे स्थितः । अत एव अनन्यचेताः, नान्यस्मि- श्चिन्मात्रातिरिक्ते चेतो यस्य तादृशः सन्, परं सौभाग्यं विश्वेश्वरतास्वरूपं परमानन्दम्, आप्नुयात् प्राप्नुयात् । हृत्पद्मे बद्धबाह्याभ्यन्तरेन्द्रियचक्रस्य बाह्यविषयोपरमादाभ्यन्त- रोदयः संभवेदित्यर्थः । प्रमेयादिरूपस्य संसारस्य निमेषोन्मेषात्मकसंकोचविकासधर्म- कत्वात् पद्मसंपुटेन रूपणा ॥४८॥ हे सुभगे, हृदय में उत्पन्न हुए मनोहर आकाश में, अर्थात् प्राण और अपान के मध्यवर्ती२ स्थान में जिसका आन्तर और बाह्य इन्द्रियचक्र (मन और उससे नियन्त्रित चक्षुरादि इन्द्रियां) लीन हो जाता है और जो ऊर्ध्व स्थान और अधर स्थान में विद्यमान पद्मों के संपुट के मध्य में भावना के बल से प्रविष्ट हो गया है, अर्थात् ऊर्ध्वगत प्रमाण रूपी पद्म और अधःस्थित प्रमेय रूपी पद्म के मध्य में चिन्मात्र प्रमाता के अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है और इसी लिये चिन्मात्रता के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु में जिसका चित्त संलग्न नहीं है, वह योगी विश्वेश्वरता रूप सौभाग्य के, परमानन्द के, विकसित हो जाने से अत्यन्त स्पृहणीय अवस्था को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् बाह्य विषयों का उपराम हो जाने से उसमें आन्तर प्रकाश की अभिव्यक्ति हो जाती है। वहां प्रमेयादि रूप संसार का निमेष और उन्मेष व्यापार पद्मदल के संकोच और विकास के तुल्य है, इसीलिये इसकी पद्मसंपुट से तुलना की गई है। चित्त जब चित्प्रकाश से भर जाता है, तो वह चित्प्रकाश से परिव्याप्त इस सारे विश्व को में पंच तन्मात्रा, मन, अहंकार और बुद्धि की समष्टि को पुर्यष्टक बताया गया है। तन्मात्रा को विषयों (प्रमेय) का तथा अन्तःकरण को प्रमाण का उपलक्षक (प्रदर्शक) मान कर इस पंक्ति का यह सरल अर्थ किया जा सकता है कि ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में प्रमाण और प्रमेय की कोई सत्ता न रह जाने से उसका संकुचित प्रमाता का स्वरूप तिरो- हित हो जाता है और निरावरण स्वात्मस्वरूप (शुद्ध प्रमाता = पर प्रमाता का स्वरूप) प्रकट हो जाता है। १. यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १६) और प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८९) पर उद्धृत है। २. प्राण और अपान के मध्यवर्ती स्थान से यहां सुषुम्ना (मध्य) नाड़ी अभिप्रेत है। बाह्य और आन्तर इन्द्रियचक्र का, प्रमाण और प्रमेय व्यापार का, इसी में लय हो जाता है। हृदय के मध्य में इसकी स्थिति मानी गई है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ५५ देख सकता है । "हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम्" (१।१५) इस शिवसूत्र में, "स च सर्वेषु भूतेषु भावतत्त्वेन्द्रियेषु च । स्थावरं जङ्गमं चैव चेतनाचेतनं स्थितम् ।। अध्वानं व्याप्य सर्वं तु सामरस्येन संस्थितम् ।" (४।३०७-३०८) स्वच्छन्दतन्त्र के इन श्लोकों में तथा "तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैव भविष्यति" (श्लो० ३९) इस स्पन्दकारिका में यही विषय प्रतिपादित है ॥४८॥ [ धारणा-२६ ] सर्वतः स्वशरीरस्य द्वादशान्ते मनो¹लयात् । दृढबुद्धेर्दृढीभूतं तत्त्वलक्ष्यं प्रवर्तते ॥४९॥ सर्वतो रोमकूपान्तरेष्वपि चैतन्यदेवस्य प्रवेशेन स्वशरीरस्य द्वादशान्ते स्वकीये शरीरे द्वादशान्तो योऽस्ति तत्र मनोलयात् मनसो लयात् वासनाक्षयात्, अथवा द्वादशान्ते शून्यातिशून्ये मध्यधाम्नि सुषुम्णायां मनसो लयात् दृढबुद्धेर्योगिनः, दृढीभूतं प्राप्तै- काग्र्यं तत्त्वलक्ष्यं परप्रकाशरूपं प्रवर्तते प्रसरति ॥४९॥ अपने शरीर में, सब तरफ से रोमकूपों के भीतर भी, चैतन्यस्वरूपी देवता के प्रविष्ट हो जाने से शरीर स्थित द्वादशान्त में एकाग्रता-प्राप्त मन दृढ़तापूर्वक प्रविष्ट हो जाता है । अथवा द्वादशान्त, अर्थात् सुषुम्णा नामक मध्यनाडी के शून्यातिशून्य धाम में यह लीन हो जाता है । द्वादशान्त में लीन हो जाने के कारण मन की वासनाओं का क्षय हो जाने से योगी का चित्त एकाग्रता की ओर दृढ़तापूर्वक बढ़ता जाता है और अन्ततः वह विश्रान्ति दशा में पहुँच जाता है, जहाँ कि उसके हृदय में परतत्त्व का प्रकाश आलोकित हो उठता है । ‘सोषुम्नेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम्" (श्लो० २४) इस स्पन्दकारिका की विभिन्न व्याख्याओं में इस विषय का विस्तार अवलोकनीय है ॥४९॥ [ धारणा-२७ ] ¹यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् । प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥५०॥ यथा तथेति स्वरसोदितेन येन तेन संवित्प्रसरप्रकारेण, यत्र तत्रेति पूर्वोक्तेषु यस्मिन् तस्मिन् प्रदेशे, द्वादशान्ते प्रतिक्षणं मुहुर्मुहुः, मनः क्षिपेत् एकाग्रीकुर्यात् । इत्थं क्षीणवृत्तेः प्रशान्तचाञ्चल्यस्य अस्य, दिनैरल्पेनैव कालेन, वैलक्षण्यम् असामान्यभैरवताऽ- भिव्यक्तिर्भवेत् स्यादेव । 'यथा यथा यत्र यत्र' इति पाठे तु येन येन प्रकारेण यस्मिन् यस्मिन् विषये मनोनिक्षेपणं तथा तथा तत्र तत्र वैलक्षण्यं भवेदित्यन्वयः ॥५०॥ १. °नो-क० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७८) तथा प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८९) में यह श्लोक मिलता है ।

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५६ : विज्ञानभैरव साधक योगी स्वाभाविक रूप से उठते हुए संविद्, अर्थात् ज्ञान के जिस किसी भी प्रकार को पूर्वोक्त स्थानों के बीच में से जिस किसी भी प्रदेश से द्वादशान्त में ले जाकर वहाँ प्रति क्षण बार-बार मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करे । ऐसा करने से मन की वृत्तियों के क्षीण हो जाने से उसकी चंचलता शान्त हो जाती है और वह योगी थोड़े ही समय में अपने भीतर विलक्षणता का, अर्थात् असामान्य परभैरव के स्वरूप की अभिव्यक्ति का, अनुभव करने लगता है । 'यथा यथा यत्र यत्र' इस पाठ में जिस जिस प्रकार से जिस जिस विषय में मन को लगाया जाता है, उसी उसी प्रकार से वहाँ वहाँ वैलक्षण्य का आविर्भाव होता है, इस तरह का अन्वय किया जाता है । तन्त्रालोक के— शाक्ते क्षोभे कुलावेशे सर्वनाड्यग्रगोचरे । व्याप्तौ सर्वात्मसंकोचे हृदयं प्रविशेत् सुधीः ॥ (५।७१) इस श्लोक में 'सर्वनाड्यग्रगोचरे' इस पद से इसी स्थिति का वर्णन किया गया है । सभी नाडियों के अग्रभाग में द्वादशान्त की ही स्थिति मानी जाती है ॥५०॥ [ धारणा-२८ ] १कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् । प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते शान्ताभा२स्सस्तदा भवेत् ॥५१॥ कालपदाद् दक्षिणपादाङ्गुष्ठाद् उत्थितेन कालाग्निना स्वकं पुरम् आत्मीयं देहमेव गुग्गुलम् "ॐ र क्ष र य ऊं तनुं दाहयामि नमः" इति मन्त्रोच्चारपूर्वकं शरीर- दाहादिचिन्तनयोगयुक्त्या आत्मभावनया प्लुष्टं विचिन्तयेन् दग्धं विभावयेत् । तदा अन्ते स योगी शान्ताभासो भवेद् अभिव्यक्तस्वात्मस्वरूपः स्यात् । 'शान्ताभासः प्रजायते' इति पाठे योगिनश्चिन्मयमूर्तिमान् विभावसुः प्रकाशत इत्यर्थः ॥५१॥ "ॐ र क्ष र य ऊं तनुं दाहयामि नमः" इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए कालपद, अर्थात् दाहिने पैर के अँगूठे से उठती हुई कालाग्नि का ध्यान करके, उसकी ज्वाला से मेरा पूरा शरीर भस्म हो गया है, ऐसी भावना करे । यहाँ अपने शरीर को ही गुग्गुल समझे । गुग्गुल जैसे अग्नि में भस्म हो जाती है, उसी तरह से साधक अपने शरीर के संबन्ध में भी, वह कालाग्नि में जल गया है, इस तरह की भावना करे । पुर शब्द गुग्गुल का भी पर्यायवाची है और यह शब्द देह का भी बोधक होता है । यहाँ इस श्लिष्ट पद के प्रयोग का यह अभिप्राय है कि गुग्गुल जैसे जल कर सर्वत्र सुगन्धि फैला देता है और वातावरण को विषाक्त कीटाणुओं के प्रभाव से निर्मुक्त कर देता है, उसी तरह से उक्त भावना के अभ्यास से साधक सभी १. °पुरा°-ख० । २. °सः प्रजायते-ख० शि० म० ।

  1. यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३८) और महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ११२) में विद्यमान है ।

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विज्ञानभैरव : ५७ मलों (दोषों) से निर्मुक्त होकर अपने शान्त स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् उसके समक्ष चिन्मय मूर्तिमान् अग्नि प्रकाशित हो उठती है । महार्थमंजरी की— शोषो मलस्य नाशो दाह एतस्य वासनोच्छेदः । आप्लावनं तनूनां ज्ञानसुधासेकनिर्मिता शुद्धिः ॥ (४४ श्लो०) इस गाथा में प्राणायाम के अभ्यास से शोष, दाह और आप्लावन की प्रक्रिया के आधार पर साधक के देह को अमृतमय बना देने की बात कही गई है । 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' इस विधिवाक्य की सिद्धि के लिए इसी प्रक्रिया का सहारा लिया जाता है । भूतशुद्धि और प्राण- प्रतिष्ठा के माध्यम से भी इसी स्थिति तक पहुँचा जाता है । “शरीरे संहारः कलानाम्” (३।४) इस शिवसूत्र में भी यही बात वर्णित है ।।५१।। [ धारणा-२९ ] एवमेव जगत्सर्वं दग्धं ध्यात्वा विकल्पतः । अनन्यचेतसः पुंसः पुंभावः परमो भवेत् ॥५२॥ एवमेव कालपदादुत्थितेन कालाग्निना देहस्थं बाह्यस्थं च सर्वं जगद् विकल्पतो दग्धं ध्यात्वा नामरूपतः प्लुष्टं विभाव्य वर्तमानस्य अनन्यचेतसो निर्विकल्पचित्तस्य पुंसो योगिनः परमः पुंभावो भवेत् अपरिमितप्रमातृभैरवता प्रकाशते । अत्र पूर्वोक्त- धारणार्थ एव दृढीकृतः, परन्तु पूर्वं स्वपुरदाहचिन्तनमुक्तम्, इह सर्वजगद्दाहभावनेति विशेषः ।।५२।। इसी तरह से कालपद से उठी कालाग्नि की ज्वाला से देह के भीतर और बाहर वर्तमान सारे जगत् के सभी पदार्थ भस्म हो गये हैं, ऐसी भावना का अभ्यास करने वाले, अनन्यचित्त, निर्विकल्प स्वभाव, योगी के हृदय में परम पुंभाव (पुरुषार्थ), अर्थात् अपरिमित प्रमाता के रूप में वर्तमान भैरव का स्वरूप आविर्भूत हो जाता है। एक प्रकार से यहाँ पूर्वोक्त धारणा की ही पुष्टि की गई है, किन्तु इनमें अन्तर इतना है कि पहले श्लोक में केवल अपने शरीर के भस्म हो जाने की भावना बताई गई है और इसमें सारे जगत् के दाह की भावना वर्णित है ।।५२ ।। [ धारणा-३० ] स्वदेहे जगतो वापि सूक्ष्मसूक्ष्मतराणि च । तत्त्वानि यानि निलयं ध्यात्वान्ते व्यज्यते परा ॥५३॥ स्वदेहे निजदेहविषये संबद्धानि, जगतो वापि अथवा सर्वस्य जगतः संबन्धीनि यानि सूक्ष्माणि सूक्ष्मतराणि च तत्त्वानि प्रकृतिमहदहङ्कारादीनि तथा पृथिव्यादीनि तद्विकारभूतानि च यानि सन्ति, तेषां निलयं स्वस्वकारणेषु मृत्तिदशायां लयं ध्यात्वा अन्ते पर्यन्ते परा देवी व्यज्यते प्रकटीभवति । 'तत्त्वाति यातानि लयम्' इति पाठे तु सर्वतत्त्वानि लयं यातानि नष्टप्रायाण्येवेति ध्यात्वा पराभट्टारिकाविर्भावो भवेदित्यर्थः ।

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५८ : विज्ञानभैरव अयमत्र तात्पर्यार्थः—मयूराण्डरसन्यायेन परा देवी सर्वमेतदन्तःस्थितमेव बहिः प्रकाश- यति । अनया धारणया सर्वभेदाभेदगलनायां साधकः परोदयः स्यादेवेति ॥५३॥ अपने देह में वर्तमान अथवा इस सारे जगत् में विद्यमान जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतर प्रकृति, महान्, अहङ्कार प्रभृति तथा पृथिवी प्रभृति पंच महाभूत और उनके विकारभूत मांस, अस्थि आदि तत्त्व हैं, उनके विषय में ये अपने-अपने कारणों में लीन हो रहे हैं, इस तरह की भावना करने पर अन्त में परा देवी प्रकाशित हो जाती है । 'तत्त्वानि यातानि लयम्' ऐसा भी पाठ मिलता है । इसका अर्थ यह है कि सभी तत्त्व अपने-अपने कारणों में लीन हो गये हैं, प्रायः नष्ट हो गये हैं, इस तरह की भावना करने से परा देवी प्रकट हो जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि परा भट्टारिका ही मयूराण्डरस न्याय¹ से अपने भीतर वर्तमान इस पूरे जगत् को बाहर प्रकाशित कर देती है । जो साधक इस बात को समझ कर परा देवी में ही सारे जगत् को समर्पित कर देता है, तो सभी भेदों और उपभेदों के विगलित हो जाने से वह परम उदय की अवस्था को प्राप्त कर लेता है ॥५३॥ [ धारणा-३१ ] ²पीनां च दुर्बलां ¹शक्तिं ध्यात्वा द्वादशगोचरे । प्रविश्य हृदये ध्यायन् मुक्तः³ स्वातन्त्र्यमाप्नुयात् ॥५४॥ शक्तिं प्राणशक्तिम्, आदौ पीनां पीवराम् अन्नपानादिभोजनदिशा पीनत्वं प्राप्ताम्, ततः क्रमेण दुर्बलां कृशां गुरूपदेशमार्गेण कुम्भकादिना सूक्ष्मां भवन्तीं द्वादश- गोचरे द्वादशान्ते ध्यात्वा, हृदये प्रविश्य च ध्यायन् साधको मुक्तः सन् स्वातन्त्र्य- माप्नुयात् स्वतन्त्रपरमेश्वरस्वरूपः स्यात् ॥५४॥ भर पेट भोजन-पानी पाने से मोटी अकल के आरामतलबी आदमी का शरीर ही नहीं, प्राण शक्ति भी मोटी हो जाती है । बाद में सद्गुरु का उपदेश पाकर जब वह योगाभ्यास में लग जाता है, कुम्भक प्रभृति प्राणायामों का अभ्यास करने लगता है, तो धीरे-धीरे उसके शरीर के मोटापे के साथ ही प्राण-वायु भी कृश होती जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है । इसी सूक्ष्म प्राणशक्ति का द्वादशान्त स्थान में और हृदय में भी प्रविष्ट होकर जो साधक ध्यान करता है, वह मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक स्वतन्त्र स्थिति को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् उसमें परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति, जो कि उसका अपना ही स्वरूप है, १. चेव-त० । २. ºयेत् सुप्तः स्वाच्छन्द्यº-त० । ३. स्वप्नº-स्प० ।

  1. इस न्याय का अभिप्राय यह है कि मयूर (मोर) के अण्डे के रस में किसी प्रकार की विचित्रता के न रहते हुए भी जैसे उससे रंग-बिरंगे पक्षी (मोर) की उत्पत्ति होती है, उसी तरह से परा शक्ति से भी इस चित्र-विचित्र जगत् की सृष्टि होती है ।
  2. यह श्लोक स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) और तन्त्रालोक तथा उसकी टीका विवेक (भा० ९, आ० १५, पृ० २४०, २४३) में मिलता है ।

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विज्ञानभैरव : ५९ पूर्णतया अभिव्यक्त हो जाती है। "यथेच्छाभ्यर्थितो धाता" इस स्पन्दकारिका की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय (पृ० ५५-५६) में इस स्थिति की अधिक स्पष्ट व्याख्या की है। अभिनवगुप्त ने भी तन्त्रालोक (१५।४८०-४८१) में विज्ञानभैरव के इस श्लोक को प्रमाण रूप में उद्धृत कर शिष्यदीक्षा के प्रसंग से इसको जोड़ा है कि इस धारणा के अभ्यास से गुरु शिष्य के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर उसमें आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता है ॥५४॥ [ धारणा-३२ ] १भुवनाध्वादिरूपेण चिन्तयेत् क्रमशोऽखिलम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या यावदन्ते मनोलयः ॥५५॥ भुवनाध्वादिरूपेण भुवन-तत्त्व-कला-मन्त्र-पद-वर्णाख्यो यः षोढा २वाच्यवाचक- रूपोऽध्वा शब्दार्थमयस्तस्याध्वनः स्थूलसूक्ष्मपररूपतया क्रमशूर्ऽखिलं जगत् चिन्तयेत्, यावदन्ते तत्रैव मनोलयः पराकाष्ठावगतिः स्यात् ॥५५॥ भुवन, तत्त्व, कला, मन्त्र, पद और वर्ण—ये तन्त्रशास्त्र में षडध्व के नाम से प्रसिद्ध हैं। वस्तुतः यह वाच्य और वाचक के रूप में विद्यमान शब्द और अर्थ का ही विस्तार है। शब्द से वर्ण, पद और मन्त्र की और अर्थ से कला, तत्त्व, भुवन की उत्पत्ति होती है। स्थूल, सूक्ष्म और पर रूप में विद्यमान इन षडध्वों से क्रमशः यह सारा जगत् व्याप्त है। योगी इस भावना का तब तक अभ्यास करता रहे, जब तक कि अन्ततः उसका मन इसी में लीन नहीं हो जाता। इस विषय को कुछ विस्तार से समझने की आवश्यकता है। तान्त्रिक दीक्षा में षडध्व की शुद्धि अनिवार्य मानी जाती है। प्रायः सभी ग्रन्थों में, विशेष कर शैवागम के ग्रन्थों में, इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। वस्तुतः यह सारा जगत् पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप में, वाचक और वाच्य के रूप में, शब्द और अर्थ के रूप में प्रतीत हो रहे उस विश्वातीत और विश्वात्मक परब्रह्म की क्रियाशक्ति का ही विस्तार मात्र है। शब्दब्रह्म ही षडध्व के रूप में परिणत होता है। इनमें से वर्ण का इस विश्व के साथ अभेदात्मक, मन्त्र का भेदाभेदात्मक और पद का भेदात्मक संबन्ध रहता है। इसमें पहला अध्व उसके बाद के अध्व में व्यापक रूप से रहता है और बाद का अध्व अपने पहले अध्व में व्याप्य रूप से रहता है। इस तरह से ये सभी अध्व परस्पर व्याप्यव्यापकभाव से सब में स्थित हैं। इसीलिये शास्त्रों में जहाँ-तहाँ

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३८) और महार्थमंजरी की परिमल टीका (पृ० ७१, १४२) में यह उद्धृत है।
  2. शब्द और अर्थ के वाच्यवाचकभाव संबन्ध का निरूपण पृ० ६ की पहली टिप्पणी में किया जा चुका है।

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६० : विज्ञानभैरव पाँच अध्वों को अपने भीतर समेटे किसी एक अध्व की शुद्धि का विधान मिलता है। जैसा कि स्वच्छन्दतन्त्र के— अध्वावलोकनं पश्चाद् व्याप्यव्यापकभेदतः । भुवनव्यापिता तत्त्वेष्वनन्तादिशिवान्तके ।। व्यापकानि च षट्त्रिंशन्मन्त्रवर्णपदात्मकाः । तत्त्वान्तर्भाविनः सर्वे वाच्यवाचकयोगतः ।। कलान्तर्भाविनस्ते वै निवृत्त्याद्याश्च ताः स्मृताः । (४।९५-९७) इन श्लोकों में यह विषय प्रतिपादित है। यहाँ व्याप्यव्यापकभाव के आधार पर षडध्व की भावना का प्रतिपादन किया गया है। अनन्त से शिव पर्यन्त भुवनों में सर्वत्र तत्त्व व्यापक रूप से रहते हैं। ये व्यापक तत्त्व ३६ होते हैं। इनसे अतिरिक्त मन्त्र, वर्ण और पदात्मक अन्य तीन अध्व हैं। इनमें से वर्ण ५० तथा नवात्मसंबन्धी पद ८१ प्रकार के हैं। क्रमशः इनमें तत्त्व प्रभृति का अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि तत्त्व प्रभृति वाच्य और मन्त्र प्रभृति वाचक कहलाते हैं। कलाध्वा के शोधन की प्रधानता के आधार पर यह क्रम प्रतिपादित है। इस प्रक्रिया से कलाध्वा में ही अन्य सभी अध्वों का अन्तर्भाव हो जाता है और यह कलाध्वा निवृत्ति आदि के भेद से पांच प्रकारों में विभक्त है। इस विषय को हमने "वैष्णवेषु तदितरेषु चागमेषु षडध्वविमर्शः"१ नामक निबन्ध में विस्तार से समझाया है। इसको संक्षेप में इस तरह से समझा जा सकता है—चिदानन्दघन परम स्वतन्त्र परमेश्वर अपनी उन्मना नाम की स्वातन्त्र्य शक्ति की सहायता से शून्य से लेकर पृथ्वी पर्यन्त इस अनन्त जगत् को एक साथ प्रकाशित कर देता है। वाच्यवाचकरूप में विभक्त इस जगत् को यद्यपि वह अपने स्वरूप (स्वात्मभित्ति) में ही प्रकाशित करता है, अतः वास्तव में इनमें कोई भेद नहीं होता, किन्तु वह इसमें भेद-बुद्धि को भी पैदा कर देता है। यह वाचक अर्थात् ग्राहक के रूप में विद्यमान जगत् पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप में क्रमशः २वर्ण, मन्त्र और पद के रूप में तीन तरह से विभक्त हो जाता है। इसी तरह से वाच्य भी ग्राह्य स्वरूप में प्रविष्ट होकर पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप में क्रमशः कला, तत्त्व और भुवन का रूप धारण कर लेता है। पर-स्वभाव वर्ण अभेद विमर्श को पैदा करने वाले हैं। ये जब कुछ स्थूलता की ओर

  1. द्रष्टव्य—सारस्वती सुषमा, व० १७, अ० १-२, पृ० १७९-२००; तन्त्रयात्रा, पृ० १४-३४ ।
  2. तन्त्रालोक (६।३४-३५) में भी यही क्रम वर्णित है। शैवागमों में षडध्व का क्रम इस प्रकार दिया गया है—वर्ण, पद, मन्त्र और कला, तत्त्व, भुवन। वहाँ ५० वर्णों के बाद व्योमव्यापी प्रभृति ८१ पदों का विस्तार से वर्णन मिलता है और मुख्य मन्त्रों की संख्या ११ ही मानी गई है। षडध्व की शुद्धि में सर्वत्र प्रायः यही क्रम मान्य है। मन्त्रों का स्वरूप वाक्यों के सदृश है, अतः व्याकरण की दृष्टि से भी वर्ण और पद के बाद ही मन्त्र की स्थिति मानी जाय, यही उचित प्रतीत होता है। पूर्वोक्त क्रम को भी मन्त्र की नादात्मकता को स्वीकार कर मान्य किया जाता है।

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विज्ञानभैरव : ६१ बढ़ते हैं, तो सूक्ष्मस्वभाव भेदाभेद दृष्टि के प्रतिनिधि नादात्मक मन्त्र के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। पुनः आगे बढ़ने पर स्थूल-स्वभाव भेद दृष्टि को पैदा करने वाले पदों का आविर्भाव होता है। इसी तरह से वाच्यरूपा पारमेश्वरी कला-शक्ति उत्तरोत्तर स्थूल-स्वरूप को धारण करती हुई अन्ततः भुवनाध्व का रूप धारण करती है। वास्तव में यद्यपि परमेश्वर की इस शक्ति का स्फुरण बिना क्रम के ही होता है, तथापि अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति की सहायता से यह दर्पण में दिखाई पड़ने वाले विभिन्न प्रतिबिम्बों की भांति उनमें क्रम का आभास भी कराती है। जब क्रम का आभास होने लगता है, तो उसमें पहले आविर्भूत हुआ पदार्थ बाद में आविर्भूत हुए पदार्थ में व्यापक रूप से उसी तरह से विद्यमान रहता है, जैसे कि घट में मृत्तिका व्यापक रूप से रहती है। बाद में आविर्भूत होने वाला पदार्थ अपने पूर्ववर्ती कारण पदार्थ में शक्ति के रूप में उसी तरह से छिपा रहता है, जैसे कि वृक्ष अपने बीज में छिपा रहता है। इस तरह से विश्व के सभी पदार्थ एक दूसरे से परस्पर संबद्ध हैं, अतः कहा जा सकता है कि सभी¹ पदार्थ सर्वात्मक हैं। इस तरह से प्रत्येक प्रमाता अथवा भाव में वस्तुतः षडध्व का विस्तार देखा जा सकता है और यह सब कुछ परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विलास है। अकार से लेकर हकार पर्यन्त वर्णों का परामर्श जब परिपक्व हो जाता है, तो उसका अहन्ता में विश्राम होता है। पर भैरव का ही यह सारा खिलवाड़ है। इस तरह से भुवन आदि षडध्व के रूप में इस जगत् का ही विस्तार होता है, ऐसा विचार कर स्थूलतर का स्थूल में, स्थूल का सूक्ष्म में और सूक्ष्म का पर भाव में, अर्थात् चिन्मात्र के बोध में विलयन कर देना चाहिये। इस अध्वशोधन की प्रक्रिया के आधार पर शिव तत्त्व के स्वरूप का विमर्श (चिन्तन) करने से साधक का चित्त विलीन हो जाता है। इस पूरे प्रकरण को शिवोपाध्याय ने— भुवनादित्रयं वाच्यं पदादिवाचकं त्रयम्। शक्तिरेतच्चाध्वषट्कं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥ इस एक श्लोक में संगृहीत कर दिया है, अर्थात् भुवन प्रभृति तीन अध्व वाच्य वर्ग में और पद आदि तीन वाचक वर्ग में प्रविष्ट हैं। यह अध्वषट्क स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विस्तार है और इस शक्ति का अधिपति महेश्वर है, परभैरव शिव स्वयं इसका अधिष्ठाता है। महार्थमंजरीकार महेश्वरानन्द ने— यदध्वनां च षट्कं तत्र प्रकाशार्थलक्षणमर्धम् । विमर्शशब्दस्वभावमर्धमिति शिवस्य यामलोल्लासः ॥ २७॥

  1. सभी पदार्थों की सर्वात्मकता का विवेचन "घटादौ" (श्लो० १०३) इत्यादि कारिका की व्याख्या के अवसर पर किया गया है। इस विषय को अधिक विस्तार से समझने के लिये शिवदृष्टि के प्रथम और पंचम आह्निक के इस विषय से संबद्ध अन्तिम अंश का और महार्थमंजरी की गाथा ३२-३३ की परिमल टीका का अवलोकन करना चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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६२ : विज्ञानभैरव स्थूलतरेष्वपि प्रेक्षध्वं भूतेषु खस्य निर्मलावस्थाम्। षट्त्रिंशिकातिलङ्घी कीदृशो भवतु सोमनाथः सः ॥५७॥ इन दो कारिकाओं की स्वनिर्मित परिमल व्याख्या में इसी विषय पर अन्य दृष्टिकोणों से भी विचार किया है ॥५५॥ [ धारणा-३३ ] १अस्य 'सर्वस्य विश्वस्य पर्यन्तेषु समन्ततः । अध्वप्रक्रियया तत्त्वं २शैव ध्यात्वा महोदयः ॥५६॥ अस्य सर्वस्य विश्वस्य पर्यन्तेषु समन्ततोऽध्वप्रक्रियया शैवं तत्त्वं ध्यात्वा अध्व- षट्केषु भुवनाध्वादिषु सामान्यतया विशेषतया वा न किमपि प्रकाशविमर्शात्मकशिवतत्त्वं विना सारभूतमिति षडध्वशोधनप्रक्रियया विज्ञाय महोदयः प्रकाशाभिव्यक्तिः परम- शिवावभासः स्यात् ॥५६॥ प्रकाश और विमर्श स्वरूप परमेश्वर ही शिव है। शैव तत्त्व उस शिव के स्वरूप को कहते हैं। शिव के इस स्वरूप का ध्यान करने पर साधक का महान् उदय हो जाता है, अर्थात् उसमें प्रकाश का आविर्भाव हो जाता है। इसलिये कि भुवन, तत्त्व और कलात्मक वाच्य वर्ग प्रकाश से आविर्भूत है और वर्ण, मन्त्र एवं पदस्वरूप वाचक वर्ग विमर्श से उद्भूत है। दो अरणियों (लकड़ियों) के संसर्ग से जैसे अग्नि पैदा होती है, उसी तरह से इन दोनों के संसर्ग से यह सारा जगत् आविर्भूत होता है। उन्मेष और निमेष नामक दो शक्तियों की सहायता से ही शिव इस जगत् की सृष्टि और संहार करता रहता है। इस षडध्वमय जगत् का स्वरूप शिव के स्वरूप को छोड़कर दूसरा कुछ भी नहीं है, अतः जगत् के स्वरूप को छोड़कर केवल शिव का ध्यान करने वाले योगी का महान् उदय हो जाता है, अर्थात् उसको परमशिव का साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है। शिव के इस स्वरूप की व्याख्या कर्मकाण्डक्रमावली के निम्न श्लोक में मिलती है— २त्रयीसप्तचतुर्युग्ममये त्रितयवर्त्मनि । स्थितो यः शक्तिसहितः स जयत्यमृतेश्वरः ॥ अर्थात् यह अमृतेश्वर मृत्युंजय भट्टारक शिव प्रथमतः अनुत्तर (अ), इच्छा (इ) और उन्मेष (उ) स्वरूप तीन ह्रस्व स्वरों के रूप में और बाद में आनन्द (आ), ईशन (ई), ऊर्मि (ऊ) तथा षण्ढ स्वर (ऋ ॠ ऌ ॡ) स्वरूप सात स्वरों के रूप में, तब चार सन्ध्यक्षरों १. विश्वस्य सर्वस्य-तवि० । २. ध्यात्वा शैवं-ख० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० ७, आ० १२, पृ० ९५) में यह श्लोक मिलता है ।
  2. सोमशम्भु कृत कर्मकाण्डक्रमावली के तीन संस्करण प्रकाशित हुए हैं । उनमें यह श्लोक कहीं उपलब्ध नहीं होता ।

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विज्ञानभैरव : ६३ (ए ऐ ओ औ) के रूप में और अन्ततः अनुस्वार और विसर्जनीय इन दो स्वरों के रूप में, अर्थात् षोडश कलात्मक पुरुष के स्वभाव में परिणत होता है। उस अमृतेश्वर शिव का यह त्रयीसप्तचतुर्युग्ममय, षोडश कलात्मक स्वरूप बाद में वर्ण, मन्त्र और पद नामक अध्वत्रय में, जो कि वाचक के रूप में इस संसार के समस्त भावों के साथ अभेद, भेदाभेद और भेद दृष्टि से वर्तमान रहते हैं, प्रविष्ट हो जाता है। इस स्थिति में उसका अपनी कला नामक शक्ति की सहायता से तत्त्व, भुवन और कला नामक अध्वत्रय में प्रविष्ट हुई शक्ति से साक्षात्कार हो जाता है, जो कि वाच्य अध्वा के नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है। इस शक्तिस्वरूप वाच्य अध्वा के साथ वाचक अध्वा के रूप में परिणत यह कालभक्षक, कालवंचक, मृत्युंजय भट्टारक (अमृतेश्वर) ही इस सारे संसार को जीतकर, अपने में समेट कर अपने सर्वोत्तम परप्रकाशमय स्वरूप में सदा विराजमान रहता है। यद्यपि यह शिव और शक्ति का परिणाम षडध्व के रूप में होता है, किन्तु वाच्य अध्वा का अन्तर्भाव वाचक अध्वा में मान लिया जाता है। इस तरह से 'त्रितयवर्त्मनि' शब्द से षडध्व का ग्रहण किया जाता है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि वाच्य और वाचक प्रत्येक अध्वा त्रितयात्मक है। फलितार्थ यह हुआ कि इस षडध्वप्रक्रिया का सहारा लेकर साधक अपनी महोदय अवस्था तक, स्वरूप-साक्षात्कार तक पहुँच सकता है। इस विषय को तन्त्रालोक के द्वादश आह्निक में अभिनवगुप्त ने— आसंवित्त्वमाबाह्यं योऽयमध्वा व्यवस्थितः। तत्र तत्रोचितं रूपं स्वं स्वातन्त्र्येण भासयेत् ॥४॥ इत्यादि श्लोकों में विस्तार से समझाया है ॥५६॥ [ धारणा-३४ ] विश्वमेतन्महादेवि शून्यभूतं विचिन्तयेत् । तत्रैव च मनो लीनं ततस्तल्लयभाजनम् ॥५७॥ हे महादेवि, एतत् सर्वं विश्वं चराचरभूतं जगत् शून्यभूतं¹शून्यातिशून्यतामाप्तं न किञ्चित्, गन्धर्वनगरादितुल्यमध्यासात्मकमसदित्याद्याख्यं नामरूपादिहीनं मायागहनं च विचिन्तयेत् विभावयेत् । तत्रैव च मनः स्वात्मनश्चित्तं लीनं कुर्यात् । तत एवं करणेन तल्लयभाजनं तत्र लयस्तन्मयीभावस्तस्य भाजनं पात्रं जायते। साधकः स्वप्रकाशात्मस्वरूपो भवतीति भावः ॥५७॥ हे महादेवि, साधक को ऐसा विचार करना चाहिये कि यह सारा चराचर जगत् शून्यभूत है, अर्थात् कुछ भी नहीं है। यह गन्धर्वनगर के तुल्य अध्यासात्मक, कल्पना प्रसूत, अत एव असत् है। यह नाम और रूप आदि से रहित मायाकलित है। इसी के साथ अपने मन को भी इसी भावना में लीन कर देना चाहिये। ऐसा करने से वह साधक लय का भाजन

  1. शून्यातिशून्य पद की व्याख्या पृ० ४८ की टिप्पणी में देखनी चाहिये । प्रस्तुत प्रकरण में इस शब्द का प्रयोग अत्यन्त असत् अर्थ में किया गया है। ५८वें श्लोक की व्याख्या में शून्या- तिशून्य शब्द का प्रयोग पूर्वोक्त अर्थ में हुआ है।

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६४ : विज्ञानभैरव हो जाता है, अर्थात् उक्त भावना के अभ्यास से यह जो स्वप्रकाशात्मक सत्‌तत्त्व उसके अपने स्वरूप में अभिव्यक्त हो गया है, उसी में उसका पूर्व-कल्पित रूप विलीन हो जाता है। तब साधक का स्वरूप में तन्मयीभाव हो जाता है ॥५७॥ [ धारणा-३५ ] घटादिभाजने दृष्टिं भित्तीस्त्यक्त्वा विनिक्षिपेत् । तल्ल्यं तत्क्षणाद् गत्वा तल्लयात्तन्मयो भवेत् ॥५८॥ घटादिभाजनेऽन्तःसुषिरे घटादिवस्तुनि भित्तीस्त्यक्त्वा दक्षिणोत्तरपार्श्वादि विहाय दृष्टिं विनिक्षिपेत् । धारणायाऽनया साधकस्तत्क्षणात् तस्मिन्नाकाशे लयं गत्वा तस्याकाशस्यापि लयात् परमशून्यातिशून्ये विश्रान्तेस्तन्मयो भवेत् परब्रह्मसमा- विष्टः सन् ब्रह्मैव सम्पद्यते ॥५८॥ भीतर से पोले (खाली) घट आदि पदार्थों में अगल-बगल की दीवारों को छोड़कर अपनी दृष्टि को सीधे उस पात्र के भीतर स्थित शून्यता में लगावे। घट प्रभृति के भीतर का आकाश विभिन्न आकारों में विभक्त हो जाता है। आकाश की इन विभाजक दीवारों की उपेक्षा कर योगी यह भावना करे कि घट आदि पात्रों के भीतर के आकाश को इस अनन्त शून्य से दीवारें अलग नहीं कर सकतीं। इस तरह से घट स्थित आकाश में साधक का चित्त जब विश्राम-लाभ कर लेता है, तो उसको शून्यातिशून्य में मेरा मन विलीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये। इससे साधक परब्रह्मभाव में समाविष्ट हो जाता है, स्वयं ब्रह्म बन जाता है ॥५८॥ [ धारणा-३६ ] १निर्वृक्षगिरिभित्त्या१दिदेशे दृष्टिं विनिक्षिपेत् । २विलीने मानसे भावे वृत्तिक्षीणः प्रजायते ॥५९॥ निर्वृक्षगिरिभित्त्यादिदेशे निर्वृक्षदेशे मरुस्थलादौ शून्यदिगादौ वा, गिरौ पर्वतादौ तुङ्गादिविषयादौ, भित्त्यादिदेशे च दृष्टिं विनिक्षिपेत् दृङ्निक्षेपं कुर्यात् । भावनयाऽनया मानसे भावे चित्तस्वरूपे तत्तदालम्बनाभावाद् विलीने गलिते सति योगी वृत्तिक्षीणः क्षीणसमस्तवृत्तिः प्रजायते महाप्रकाशस्वरूपो भवति, ब्रह्मैव संपद्यत इत्यर्थः ॥५९॥ वृक्षरहित प्रदेश मरुभूमि में अथवा शून्य दिशाओं में, पर्वत के शिखर अथवा किसी भी ऊँचे स्थान में और भित्ति (दीवाल) आदि प्रदेशों में अपनी दृष्टि को जमाने का, स्थिर करने १. °दौ-प० । २. नि°-ने० ।

  1. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ३११) में 'निर्वृक्षगिरिभित्त्यादि' इतना अंश और (पृ० ४२७) में तथा परार्त्रिशिका (पृ० १३६) में प्रथम पंक्ति मिलती है। नेत्रतन्त्रो- द्योत (भा० १, पृ० २००) में पूरा श्लोक मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ६५ का, अभ्यास करे। इस भावना के अभ्यास से साधक की दृष्टि में शून्यता समाने लगती है। ऐसी अवस्था में आलम्बन के अभाव में मानस भाव, अर्थात् चित्त के स्वरूप के विगलित हो जाने पर योगी की समस्त वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और उसमें महाप्रकाश का आविर्भाव ह जाता है, अर्थात् वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। "बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः" (यो० सू० ३।४३) इस सूत्र में वर्णित चित्त की स्थिति को 'महाविदेहा' नाम दिया है, जिसमें कि सब तरह के आवरणों का क्षय हो जाता है और प्रकाशात्मक स्वरूप आलोकित हो उठता है। अभिनवगुप्त ने परा-त्रिशिका की व्याख्या (पृ० १३६) में तथा ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३११ एवं ४२७) में इस श्लोक के पूर्वार्ध को उद्धृत कर साधक के भैरव-बोध में अनुप्रवेश की बात को अच्छी तरह से समझाया है ॥५९॥ [ धारणा-३७ ] 1उभयोर्भावयोर्ज्ञानं ज्ञात्वा2 मध्यं समाश्रयेत् । युगपच्च द्वयं त्यक्त्वा मध्ये तत्त्वं प्रकाशते ॥६०॥ उभयोर्भावयोर्ज्ञानि भावद्वयस्य प्रतीतिक्राले मध्यमन्तरालं तद्भावद्वयावच्छेदहेतुं शून्यं ध्यात्वा उपलभ्य तं समाश्रयेत् सम्यग् एकाग्र्येण आश्रयेत् । तत एव च तद्भावद्वयं युगपत् त्यक्त्वा अनालोचनेन परिहृत्य योगिनस्तत्र मध्ये तत्त्वं परं धाम व्यज्यते । अयं भावः—घटोऽयं पटोऽयं तटोऽयमित्यादिनानात्वेन वेद्यराशिपतितस्य सारं विज्ञाय तन्मध्ये च अत्र कश्चिद् वेदकोऽस्तीति ज्ञातृत्वावगमं कृत्वा तेन च ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेयादिनानात्वेन अनानात्वं विधाय विभागकल्पनात्यागाद् एकाग्र्यमेव प्रमातृतत्त्वाख्यं निर्विकल्पदशामयं “तत्त्वमसि” (छा० ६।८।७) इत्यादिवाक्यसमुत्पन्नमासाद्य परं धाम प्रविशति ॥६०॥ दो भावों की प्रतीति के समय में इन दोनों के मध्य में स्थित शून्य को ध्यान के द्वारा पकड़ कर उसमें चित्त को एकाग्रता के अभ्यास द्वारा स्थिर कर दे। इसके स्थिर हो जाने पर एक साथ उक्त दोनों भावों का 2अनालोचनात्मक पद्धति से परित्याग कर दे। इस भावना के १. °नं-ई० । २. ज्ञात्वा-ख० ने० तवि० ई० ।

  1. नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २०१) तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १२७ में यह उपलब्ध है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६) में 'उभयो- र्भावयो र्ज्ञानं ज्ञात्वा मध्यम्' केवल इतना अंश मिलता है।
  2. "शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्तिः" (श्लो० २८) सांख्यकारिका की इस कारिका में श्रोत्र प्रभृति पांचों बुद्धीन्द्रियों का प्रथम व्यापार आलोचनात्मक माना गया है, अर्थात् इन इन्द्रियों से पहले अपने-अपने विषयों का निर्विकल्पात्मक प्रत्यक्ष होता है। "अस्ति ह्यालोचनज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम्" भट्ट कुमारिल के श्लोकवार्तिक के इन श्लोकों में भी, जिनको कि सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने २७वीं कारिका की व्यख्या में उद्धृत किया है, इस निर्विकल्पक प्रत्यक्ष और उसके बाद होने वाले सविकल्पक

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६६ : विज्ञानभैरव अभ्यास से भावनिर्मुक्त शून्य में चित्त के लीन हो जाने के कारण उसमें परम तत्त्व की अभिव्यक्ति हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि यह घट है, यह पट है, यह तट है, इत्यादि नाना प्रकार की प्रतीतियों के आधार पर वेद्य (ज्ञेय) रूप में भासित हो रही वस्तुओं के सार को समझ कर कि इन सब के मध्य में ज्ञाता के रूप में विद्यमान तत्त्व एक ही है और इसी से ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के ये नाना प्रकार (भेद) केवल कल्पना से प्रसूत हैं, वस्तुतः यह सब एक ही तत्त्व का विस्तार है, योगी नानात्व का परिहार करके, अर्थात् विभाग (भेद) कल्पना का परित्याग करके चित्त को एकाग्र करने का अभ्यास करता है। बाद में इस भावना में चित्त के स्थिर हो जाने पर यह सब प्रमाता (ज्ञाता) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, इस तरह से निर्विकल्प दशा का सहारा लेकर साधक "तत्त्वमसि" (छा० ६।८।७) इत्यादि उपनिषद् वाक्यों में उपदिष्ट पद्धति से अपने (प्रमाता के) वास्तविक स्वरूप को जान लेता है। यह स्थिति ही परम धाम में प्रवेश के नाम से यहाँ वर्णित है। पहले २५-२६ संख्या के श्लोकों में ^1प्राण और अपान की मध्य-दशा का विकास कर उसमें चित्त को स्थिर करने की भावना का उपदेश किया गया है। यहाँ दो भावों के मध्य में मध्य-दशा के विकास की बात वर्णित है। "प्राणापानमयः" (३।२।१९) इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- कारिका की विवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६) में अभिनवगुप्त ने "एकचिन्ताप्रसक्तस्य" (४१ श्लो०) इस स्पन्दकारिका के श्लोक के साथ विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को भी उद्धृत कर इस स्वात्मविश्रान्ति दशा का विश्लेषण किया है। नेत्रतन्त्र के "नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत" (८।४१-४३) इत्यादि श्लोकों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने तो निरालम्ब भावना के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत श्लोकों को उद्धृत कर "अकिञ्चिच्चिन्तकस्य" (मा० २।२३) इत्यादि वचनों के आधार पर इस भावना के परित्याग की ही बात कही है। इसका अभि- प्राय यही है कि शाम्भव उपाय के अवलम्बन की सामर्थ्य प्राप्त हो जाने पर फिर आणव उपाय का सहारा न लिया जाय ॥६०॥ [ धारणा ३८ ] ^२भावे 'न्यक्ते निरुद्धा चिन्नैव भावान्तरं व्रजेत् । तदा तन्मध्यभावेन विकसत्यति भावना ॥६१॥ १. त्य°-ख० स्प० ने० ई० तवि० । प्रत्यक्ष का विवेचन मिलता है। प्रकृत धारणा में इन्द्रियों के इस आलोचनात्मक व्यापार में प्रवृत्त होने वाली वृत्तियों का निरोध कर लिया जाता है, भैरवी मुद्रा के सहारे विषयों को देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है और इस तरह से अनालोचनात्मक पद्धति से भावों का परित्याग हो जाता है।

  1. प्राण और अपान के संबन्ध में पृ० २९-३० पर दी गई टिप्पणी देखनी चाहिये । इस विषय पर अनेक प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर उपोद्घात में विचार किया जायेगा ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ० ६२), नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २०१), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृति-

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विज्ञानभैरव : ६७ न्यक्तेऽन्तर्हितेऽदृष्टे, भावे पदार्थे त्रिनेत्रचतुर्भुजाकारे ध्येयवस्तुनि, चित् चेतना, निरुद्धा अभ्यासपाटवेन नितरां रुद्धा स्थापिता सती, भावान्तरम् अन्यपदार्थं दृष्टदेह- घटादिकं नैव व्रजेत् । 'भावेऽव्यक्ते' इति पाठे तु अकारप्रश्लेषेणापि 'अव्यक्ते' इति पूर्वोक्त एवार्थः । 'भावेऽत्यक्ते' इति चाप्यकारप्रश्लेषण अत्यक्ते स्वीकृते इत्यर्थः । तदा तयोः व्यक्ताव्यक्तभावयोः, मध्यभावेन न किञ्चिद्रूपमध्यधामविश्रान्तया, भावना मध्य- दशाविश्रान्तिसंस्कारः, अति अतिशयेन, विकसति उद्बोधमायाति । अद्भुतफुल्ल- न्यायेन¹ मनश्चातिविकासत्वं यायात्, ब्रह्मैव संपद्यत इति भावः ॥६१॥ न्यक्त अर्थात् अन्तर्हित = अदृष्ट (कभी नहीं देखे गये) तीन नेत्र, चार भुजा आदि से युक्त शंकर, विष्णु आदि इष्ट ध्येय पदार्थों में चेतना को अभ्यास के सहारे स्थापित कर लेने पर वह पहले देखे गये शरीर, घट, पट आदि बाह्य पदार्थों की ओर आकृष्ट नहीं होती । यहाँ न्यक्त यह छान्दस प्रयोग है । वेदभाष्यकारों ने ²न्यक्त का अर्थ बुडित (डूबा हुआ), तिरोहित या अन्तर्हित किया है । 'भावे न्यक्ते' के स्थान पर 'भावेव्यक्ते' अथवा 'भावेत्यक्ते' ऐसे पाठ भी मिलते हैं। यहाँ सन्धि के नियमों के अनुसार 'भावेऽव्यक्ते' तथा 'भावेऽत्यक्ते' इस तरह से अकार का प्रश्लेष³ मानना चाहिये । इस तरह से अव्यक्त का अर्थ अदृष्ट और अत्यक्त का अर्थ स्वीकृत होगा, अर्थात् किसी अदृष्ट भाव में, इष्टदेव के रूप में स्वीकृत भाव में, चेतना को लगा देने पर वह फिर किसी दूसरे भाव की तरफ उन्मुख नहीं होती । योगशास्त्र में इसी स्थिति को 'समाधि' कहा गया है— विमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६), तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १२७; भा० ११, आ० २९, पृ० ८५) में यह उद्धृत है । ई० वि० वि० में केवल प्रथम चरण ही मिलता है ।

  1. कमल, गुलाब आदि के खिले हुए फूल को देखकर हमारे मन की कली खिल उठती है । उसी तरह से किसी भी अनोखी वस्तु को देख कर हमारे मन की यही स्थिति होती है । अद्भुतफुल्ल न्याय से इसी स्थिति की ओर इंगित किया गया है । "कुहनेन प्रयोगेण" (श्लो० ६५) इस श्लोक में भी इसी तरह की स्थिति में धारणा को केन्द्रित करने की बात कही गई है ।
  2. वैदिक पदानुक्रमकोश की सहायता से ज्ञात होता है कि न्यक्त पद तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि में आया है । उक्त स्थलों के मुद्रित भाष्यों में कहीं भी ऐसा अर्थ नहीं मिला । इसी से मिलता-जुलता अर्थ अवश्य मिलता है । जैसे कि—"न्यक्तं निमग्नं विस्मृतम्" (तै० सं० १।५।२।४ पर सायण का भाष्य) ।
  3. सन्धि के नियमों के अनुसार जब अकार या आकार पूर्व पद के साथ प्रश्लिष्ट हो जाता है, जुड़ जाता है, तो ऐसे स्थलों पर उनके लोप को दिखाने के लिये क्रमशः ऽ ऽऽ इस तरह के अवग्रह चिह्न लगाये जाते हैं । इन चिह्नों को देख कर सरलता से जाना जा सकता है कि यहाँ अकार या आकार प्रश्लिष्ट है ।

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६८ : विज्ञानभैरव ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ (पञ्चदशी १।५५) अर्थात् ध्याता और ध्यान को छोड़कर अभ्यास की परिपक्वता के कारण जब चित्त केवल ध्येय को ही अपना विषय बनाता है, तब वह उसी तरह से स्थिर हो जाता है, जैसे कि पवनरहित स्थान में दीपक स्थिर रहता है। चित्त की इसी अवस्था को 'समाधि' कहा जाता है। योगशास्त्र प्रतिपादित इस प्रक्रिया के अनुसार ध्याता और ध्यान को छोड़कर केवल ध्येय की आलम्बन रहित, शून्य स्वभाव, १मध्यम धाम में विश्रान्ति ही योगी के लिये उपेय (प्राप्तव्य) है। इसीलिये व्यक्त और अव्यक्त भाव के बीच में, रूपरहित स्वभावरहित मध्यम धाम में, चित्त की विश्रान्ति हो जाने से भावना (इस मध्य-दशा में विश्रान्ति का संस्कार) भलीभांति विकसित हो जाती है, उद्बुद्ध हो जाती है। अर्थात् इस संस्कार के उद्बुद्ध होने से व्यक्त और अव्यक्त इन दोनों भावों के बीच की अवस्था में इन दोनों दशाओं का एक रूप में अनुसन्धान करने वाली चिन्मात्रस्वरूपा विश्रान्ति की प्राप्ति होती है। उस अवस्था में किसी अद्भुत वस्तु को देखकर हुई चित्त की उत्फुल्ल दशा के समान साधक का चित्त हर्षातिरेक से खिल उठता है और उसी में उसको अपने स्वात्मस्वरूप का बोध होता है, वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। इस श्लोक को भी अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज ने पूर्व श्लोक के साथ उद्धृत किया है। तन्त्रालोक में— ईदृक्तादृक्प्रायप्रशमोदयभावविलयपरिकथया । अनवच्छिन्नं धाम प्रविशेद् वैसर्गिकं सुभगः ॥ (२९।११८-११९) • अनवच्छिन्न वैसर्गिक धाम के नाम से चित्त की इसी उत्फुल्ल दशा में प्रवेश की बात वर्णित है। साथ ही क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय में “एकचिन्ताप्रसक्तस्य” (श्लोक ४१) इस श्लोक की व्याख्या के प्रसंग में भी उन्मेषावस्था के रूप में चित्त की इसी विकासावस्था को समझाया है ॥६१॥ [ धारणा-३९] २सर्वं देहं चिन्मयं हि जगद् वा विभावयेत् । युगपन्निर्विकल्पेन मनसा१ परमोदयः२ ॥६२॥ १. °सः-ख० । २. °मा गतिः-ख०, °द्भवः-शि० । १. इस शब्द की पहले एकाधिक स्थलों पर व्याख्या की जा चुकी है। मध्यम धाम या मध्य- दशा को शून्यस्वभाव इस लिये कहा जाता है कि यहां ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय प्रभृति त्रिपुटियों की कोई सत्ता नहीं बची रहती। ७२ संख्या की कारिका में भी प्रमेय, मान आदि की शान्त दशा का वर्णन है। २. स्वच्छन्दतन्त्र की उद्योत टीका (भा० ३, प० ७, पृ० ३१२) में इस श्लोक की प्रथम पंक्ति और शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १७) में पूरा श्लोक मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ६९ आपादात् केशान्तं सर्वं देहं जगद् वा सर्वं चिन्मयं प्रत्यंशं चिदेकरूपं युगपत् अक्रमं निर्विकल्पेन मनसा स्फुरच्चिच्चमत्कारव्याप्त्या परिभावयेत् परितः अन्तर्बहिश्च भावयेत् । अनया धारण्या "प्रकाशमानं न पृथक् प्रकाशात्"¹ इति न्यायेन परमोदयो भवति, प्रकाशः प्रकाशात इति भावः । 'मनसः परमा गतिः' इति पाठे मनस उत्कर्षरूपा परमा गतिर्भवतीत्यर्थः ॥६२॥ पैर से लगाकर चोटी तक अपने पूरे देह की, इसके प्रत्येक अंश की, अथवा इस सारे जगत् की एक साथ अक्रम रूप से चिन्मय स्वरूप में भावना करे । इस तरह की भावना से मन के निर्विकल्प हो जाने से भीतर और बाहर चित् के चमत्कार की अभिव्यक्ति हो जाने पर सब तरफ केवल प्रकाश ही प्रकाश बच रहता है, अर्थात् "प्रकाशमान वस्तु, शरीर या जगत्, प्रकाश स्वभाव परमतत्त्व से भिन्न नहीं है" इस न्याय के अनुसार मन की निर्विकल्प दशा में सभी वस्तुओं के प्रकाश रूप में परिणत हो जाने पर योगी की परमोदय अवस्था अभिव्यक्त हो जाती है । 'मनसः परमा गतिः' इस पाठ में इसका अर्थ होगा कि मन की गति उत्कर्ष की ओर बढ़ जाती है । क्षेमराज ने "शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वाऽपशुशक्तिः" (१।१६) इस शिवसूत्र की व्याख्या करते हुए विज्ञानभैरव के इस श्लोक के साथ स्पन्दकारिका के— इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । संपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ इस श्लोक को भी उद्धृत किया है । स्वच्छन्दतन्त्र के 'तत्त्वाध्वधर्मनिर्मुक्तः....'सर्वं शिवमयं स्मरेत्" (७।२४२-२४४) इत्यादि श्लोकों में भी यही विषय प्रतिपादित है ॥६२॥ [ धारणा- ४०] ²सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् । युगपत् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥६३॥ सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं त्यक्तविषयानन्देन स्वकीयेनानन्देन भरितं स्वकीयचिदानन्दपूर्णं स्मरेत् चिन्तयेत् । भावनयाऽनया भावको युगपत् सहसा स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ! "आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीव- न्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति" (तै० उ० ३।६) इति दृष्ट्या कृतकृत्यो भवेदिति भावः । "इह आश्यानचिद्रसरूपस्य जगतोऽपि भासनात् "सर्वं देहं चिन्मयं हि" (श्लो० ६२) इति पूर्वस्याः प्रकाशधारणायाः सकाशाद् विशेषः" इति शिवोपाध्यायः । वस्तुतस्तु पूर्वं चिन्मयो, अत्र चानन्दमयी धारणा प्रदर्शिता ॥६३॥ १. शिवोपाध्यायेन पूर्वं 'वायुद्वयस्य' ततश्च 'सर्वं जगत्' इति श्लोको व्याख्यातः ।

  1. पूरा श्लोक 'ज्ञानप्रकाशकं सर्वं' (१३४) की व्याख्या में उद्धृत है। वहीं इसका अर्थ भी किया गया है । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६४) और महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ११२) में यह श्लोक उद्धृत है ।

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७० : विज्ञानभैरव इस सारे जगत् में अथवा अपने शरीर में, बाहरी विषयों के आनन्द से अलग अपने भीतरी स्वाभाविक आनन्द से यह सब परिपूर्ण है, इस तरह की भावना करे । इस भावना के अभ्यास से योगी सहसा उस अमृतमय स्वाभाविक आनन्दमय अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है, जिसका कि वर्णन उपनिषदों में मिलता है । तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि आनन्द से ही ये सब भूत (पदार्थ) उत्पन्न होते हैं, उसी की सहायता से पैदा होकर जीते हैं और प्रलय की अवस्था में उसी में लीन हो जाते हैं । इस स्थिति को पा लेने पर योगी कृतकृत्य हो जाता है । प्रस्तुत भावना में चिद्रस की आश्यान (घन=जमी हुई) अवस्था के रूप में जगत् का भी आभास होता रहता है, अतः यही पूर्व धारणा से इस धारणा की विशेषता है, ऐसा शिवोपाध्याय कहते हैं । वस्तुतः पूर्व श्लोक में चिन्मयी और इसमें आनन्दमयी धारणा वर्णित है । अतः स्पष्ट ही ये दोनों धारणाएं एक दूसरे से भिन्न हैं । "लोकानन्दः समाधिसुखम्" (१।१८) और "चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु" (३।३९) इन दोनों शिवसूत्रों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है । महेश्वरानन्द ने "शोषो मलस्य नाशो०" (श्लोक ४४) इत्यादि पूर्व उद्धृत गाथा में प्राणा- याम के प्रसंग में 'आप्लावन' शब्द की व्याख्या करते समय इस श्लोक का उदाहरण दिया है ॥६३॥ [ धारणा-४१ ] वायुद्वयस्य संघट्टादन्तर्वा बहिरन्ततः । योगी समत्वविज्ञानसमुद्गमनभाजनम् ॥६४॥ अन्तः हृदये, बहिः द्वादशान्ते, वा च, वाशब्दोऽत्र चकारार्थः । वायुद्वयस्य प्राणा- पानरूपस्य संघट्टात् योजनात् । अन्ततः प्रवेशनिर्गमयोः पर्यवसाने प्राणापानसंघट्टमनु- ल्लिखितभेदं निर्गमप्रवेशविनाकृतं शून्यकल्पं ध्यात्वा योगी प्रबुद्धः समत्वविज्ञानेन संमदृष्ट्या समुद्गमनभाजनं रहस्यस्थानपर्यवसायिप्राणापानादिगोचरः स्यात् । परम- सिद्धिभाग् भवेदिति भावः ॥६४॥ आन्तर स्थान हृदय और बाह्य स्थान द्वादशान्त में प्राण और अपान रूप दो वायुओं के संघट्ट से, अर्थात् इनकी हृदय और द्वादशान्त में अन्तः प्रवेश और बहिः (बाहर) निर्गमन काल की समाप्ति हो जाने पर, अन्ततः उस शून्यकल्प अवस्था का ध्यान करने पर, जिसमें कि प्राण और अपान के संघट्ट की अलग से प्रतीति नहीं हो पाती, योगी ^1प्रबुद्ध हो जाता है, उसमें समत्व दृष्टि का विकास हो जाता है । योगी में सर्वत्र समत्व बोध का उदय होने से सर्वत्र समान (एक सी) दृष्टि रखने से वह प्राण और अपान की भेद-स्थिति की जिस रहस्यमय स्थान में समाप्ति हो जाती है, उस साम्यावस्था को तो वह जान ही लेता है, साथ ही जागतिक सभी पदार्थों को भी वह इसी तरह से उस रहस्यात्मक परमतत्त्व में विलीन कर लेता है, अर्थात्

  1. प्रबुद्ध प्रभृति शब्दों के विषय में १२८वें श्लोक की अन्तिम टिप्पणी द्रष्टव्य । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ७१ अपने से अभिन्न रूप से देखने लगता है और इस समता-दृष्टि के विकसित होने से वह परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। तन्त्रालोक के— समता सर्वदेवानामोवल्लीमन्त्रवर्णयोः । आगमानां गतीनां च सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।२७४-२७५) इस श्लोक की व्याख्या करते हुए जयरथ ने तथा महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १६८) में महेश्वरानन्द ने समता-दृष्टि के बोधक त्रिकशासन के निम्न दो श्लोकों को उद्धृत किया है— समता सर्वभावानां वृत्तीनां चैव सर्वशः । समता सर्वदृष्टीनां द्रव्याणां चैव सर्वशः ॥ भूमिकानां च सर्वासामोवल्लीनां तथैव च । समता सर्वदेवानां वर्णानां चैव सर्वशः ॥ अर्थात् जगत् के सभी भावों, वृत्तियों, दृष्टियों, द्रव्यों, भूमिकाओं, ओवल्लियों, देवताओं और वर्णों में सब तरह से एक सी दृष्टि रखना ही समता दृष्टि कहलाती है। तन्त्रालोककार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सब कुछ शिवमयं है, अतः इस समता-दृष्टि का उदय हो, यह स्वाभाविक है। ऊपर की भावना के अभ्यास से इसी समता-दृष्टि का विकास होता है ॥६४॥ [ धारणा-४२ ] १कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव मृगेक्षणे । समुदेति महानन्दो येन तत्त्वं २प्रकाशते ॥६५॥ हे मृगक्षणे, कुहनप्रयोगः विस्मापकाद्भुतमायादिप्रयोगः, ऐन्द्रजालिकरचितमायी- योद्यान-तत्स्थितचित्रकुसुमवृक्षादितत्स्थस्वात्मविहरण-स्वाङ्गच्छेदन-पुनस्तत्संयोजनादि- -अतिविस्मयजनकप्रयोगस्तेन कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव विस्मयभरितो महानन्दः समु- देति, तथैवेदृशान् कुहनप्रयोगान् भावयतो योगिनस्तत्क्षणं परमानन्दोदयस्वरूपा निर्वि- कल्पावस्था समुदेति, येन तत्त्वं परमभैरवस्वरूपं प्रकाशतेऽभिव्यक्तीभवति ॥६५॥ हे मृगनयनि, कुहन प्रयोग (जादू का खेल) मनुष्य के मन में तत्काल विस्मय पैदा करता है। जादूगर जब अपने जादू से जादुई बगीचा बनाता है, उसमें विचित्र फल-फूलों से लदे वृक्ष दिखाई देने लगते हैं; उस बगीचे में वह बिहार करता दिखाई पड़ता है, बाद में दिखाई पड़ता है कि उसके हाथ-पैर आदि अंग कट-कट कर गिर रहे हैं, फिर दिखाई पड़ता है कि वे पुनः आपस में जुड़ गये हैं। इन सब आश्चर्यजनक कार्यों को देखकर देखनेवाले का मन उस समय कुछ क्षण के लिये अद्भुत आनन्द से सराबोर हो जाता है। इसी तरह की अद्भुत आनन्द से परिपूर्ण मिथ्या परिस्थितियों पर अपनी भावना को केन्द्रित करने वाले योगी के चित्त में १. विभाव्यते—तवि० । २. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह मिलता है।